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ओम स्थापनाच धर्म कृष्णा यत नमः श्री रामकृष्ण कथामृति तो कल हमने देखा की किस तरह से ठाकुर मास्टर महाशय को कहते हैं तुम इधर उधर मत जो जो मेरे अंतरंग है वो सिर्फ यही पे आएंगे तो ये पढ़कर के हमको शायद आश्चर्य भी होगा की ठाकुर इतने लिबरल है कहते हैं की जितने पाठ जितने मत जितने धर्म और जितनी साधनाएं आप करें वो आपको एक ही ईश्वर की और ले जाति है तो क्या यही चीज गुरु के बड़े में सही नहीं है क्या आप जी किसी भी गुरु के पास में जाए आपको वो वही है की ईश्वर की और ले जाएगी फिर ठाकुर ने तो विभिन्नमतों की साधना की ठाकुर के खुद के इतने सारे गुरु थे विभिन्न साधना के लिए विभिन्न गुरु वेदांत साधना के लिए तोता पुरी तंत्र शक्ति साधना के लिए भाई रवि ब्राह्मणी इस तरह से हम देखते हैं की वो वैष्णव साधना के लिए जटाधारी तो ये चेक करके हमको आश्चर्य होगा की क्यों ठाकुर ऐसा कहते हैं की मेरे जो अंतरंग है वो सिर्फ यही पे आएंगे तो इसको इस पैराडॉक्स को या तो फिर इस उलझन को हमने इस तरह से समझा की हम लोग जो है एक सामान्य सड़क और एक सामान्य गुरु उसकी बात अलग है और अवतार और अवतार के पार्षद गण उन लोगों की बात अलग है अवतार एन पूरे संसार के तप पूरे संसार की दूसरा पूरे संसार की दुख कष्ट दर्द उसको दूर करने के लिए पृथ्वी पर अवतरण करते हैं जन्म ग्रहण करते हैं नर्मदे हर धरण करते हैं और साथ में ही अंतरंग शिष्यों का पूरा उनका ग्रुप उनके साथ में आता है उनकी लीला में सहायक होने के लिए तो मास्टर महाशय नरेंद्र सबके एग्जांपल हमने देखें नरेन का भी देखा स्वामी जी का भी की किस तरह से वह पोहरी बाबा के पास से वो है योग सीखने को सोच रहे थे तब ठाकुर प्रगति हुए और उनके सामने इस तरह से देख रहे हैं जिससे की नरेंद्र स्वामी जी समझ गए की ठाकुर की इच्छा नहीं है वो पावरी बाबा से शिक्षा ग्रहण करें तो एवं हम लोग भी रामकृष्ण मिशन के जो आज साधु और गृहस्थ भक्ति है हम लोग भी ठाकुर के अंतरंग है हम लोग भी ठाकुर की लीला सही के लिए पृथ्वी पे हम आए हैं तो जी तरह से उसे समय गुरु ही त्यागी और रूही भक्ति जो ठाकुर के साथ में थे उनको यह उचित नहीं था की अवतार को छोड़कर के और किसी गुरु के पास शिक्षा ग्रहण करें वैसे ही आज भी हम सन्यासी और गुरु ही भक्तों के लिए यह उचित नहीं होगा की एक बार हमने ठाकुर की शरण ली तो फिर हम कहानी जाकर के और दूसरे गुरु के पास करके उनके शिक्षा ग्रहण करें गुरु दो टाइप के होते हैं एक है दीक्षा गुरु एक है शिक्षा गुरु दीक्षा गुरु मंत्र देते हैं और हमारी आध्यात्मिक जीवन को हमको गाइड करते हैं और शिक्षा गुरु है जैसे की हम लोग ट्रेनिंग सेंटर में थे तो वहां संगीत सीखने के लिए एक मास्टर महाशय आया करते थे हमको अंग्रेजी सीखने के लिए बेलूर मठ के ट्रेनिंग सेंटर में ही और एक दूसरे मास्टर महाशय आते थे तो इस तरह से कोई भी विद्या सीखनी है तो उसके लिए भले चाहे अब जैसे यहां पे पब्लिकेशन सेंटर में मुझे कंप्यूटर सीखने की जरूर है मुझे यह सॉफ्टवेयर वगैरा सीखने की जरूर है तो उसके लिए मुझे अवश्य किसी की सहाय लेनी पड़ेगी किसी को मुझे पूछना पड़ेगा किसी का गाइडेंस लेना पड़ेगा तो वो बात अलग हो गई यहां तक की जैसे की संस्कृत सीखना है या तो हमारे उपनिषद की ये जो शंकर भया और शंकराचार्य की जो व्याख्या है उसको डिटेल से समझना है तो भी हमारे उत्तराखंड में बहुत अच्छे-अच्छे साधु साधु भी है सड़क भी है और आचार्य भी है जिन्होंने संस्कृत और शास्त्र प्रकरण ग्रंथ लेकर के बहुत ही डिटेल में स्टडी किया है तो हम लोग उनके वीडियो देखते रहते हैं जैसे रिसेंटली साधना सदन बोल करके कनखल में एक जगह है बहुत सुंदर आश्रम है छोटा सा है किंतु वहां के जो आचार्य जो होते हैं कोई त्यागी है ज्यादातर तो त्यागी आचार्य ही है वो लोग इतना सुंदर रूप से प्रस्थान जो हमारे हिंदू संस्कृति के मूलभूत ग्रंथ है उसके ऊपर में शंकराचार्य का जो बादशाह है वो इतना सुंदर रूप से हमको सीखने हैं की बहुत सारे साधु उनके युटुब पर वीडियो देखते हैं सुनते हैं और उसे नोट्स भी रखते हैं और बहुत ही डिटेल में समझना का पर्यटन है तो वह एक चीज हो गया की कोई पर्टिकुलर टॉपिक सीखने के लिए आप किसी पर्टिकुलर आचार्य के पास या तो फिर गुरु के पास जाए किंतु हमारा जो आध्यात्मिक पाठ है उसके मार्गदर्शक के रूप में ठाकुर के अलावा और किसी गुरु को हमको गुरु के पास जाना वो हमारे लिए उचित नहीं होगा तो इसीलिए इस तरह से हमने इसका एक समाधान करने का पर्यटन किया था ऑफ कोर्स इस तरह की जो ठाकुर मां स्वामी जी के जीवन की बहुत साड़ी घटनाएं है की जिसको हम लॉजिकल समझना का पर्यटन करते हैं कुछ हद तक समझते भी है किंतु फिर वो हमको ये भी हमको यह ख्याल रखना है की हमारे लॉजिक या तो हमारी बुद्धि की दौड़ कितनी दूर है मतलब किट कहां तक हम ये सब चीजों को ज्यादा डिटेल में समझ पाएंगे हो सकता है इसके पीछे कितने ही गुड अर्थ रहे हो जो की हमको बिना साधना किया एन समझ में आए एक चीज और दूसरा शायद आज ना समझ में आए क्योंकि अभी तो हम तो आ हम अभी मैं 20 साल से ठाकुर उमस स्वामी जी का एक किताबें को पढ़ रहा हूं किंतु यह तो कोई बहुत बड़ी बात नहीं हुई लोग पूरा जीवन भर हमारी किताबें का बड़ा ही गहराई से अध्ययन करते हैं तब कहानी जाकर के उनको नई-नई दिशाएं उनकी अंडरस्टैंडिंग में खोल है स्वामी जी का स्वयं स्वामी जी ने भगवान बुद्ध और बुद्धिस्म के ऊपर में बहुत सर कुछ चिंतन किया ठाकुर जब काशीपुर में कैंसर से बीमा थे तब उनकी सेवा छोड़कर के भी एक बार स्वामी जी बोधगया चले गए थे और बुद्धि वृक्ष के नीचे में बैठकर के ध्यान कर रहे थे और अचानक एक इस तरह का एक एक्सपीरियंस हुआ की फिर वो एकदम वह महापुरुष महाराज पास में ही बैठे थे उनके कंधे पर शेर रखकर के रो पड़े तो भगवान बुद्ध और हमको तो यह भी पता है की जब छोटे बच्चे थे और अपने कमरे में बैठकर के ध्यान कर रहे थे देखा एक सन्यासी उनके सामने एकदम उनका ओजस से भारत हुआ चेहरा गेरुआ वस्त्र धरण किया हुए अपने चेहरे पे एकदम गहन प्रशांति इस तरह के एक सन्यासी भिक्षुक उनके सामने आकर के उपस्थित हुए और किंतु अभी ये तो बच्चे थे नरेंद्र कर के खड़े होकर के भाग गए बाद में उन्होंने कहा की शायद उसे दिन मुझे भगवान बुद्ध का दर्शन हुआ था तो बचपन से ही जिनके दर्शन स्वामी जी को हुए हैं बचपन से ही युवावस्था से ही जिनके ऊपर स्वामी जी की अटूट श्रद्धा है उसे भगवान बुद्ध के बड़े में स्वामी जी अपने जीवन की आखिरी दोनों में कहते हैं की बुद्ध और बुद्धिस्म के बड़े में बुद्ध के बड़े में तो नहीं किंतु बुद्धिस्म के बड़े में बुद्धिस्म का भारत के इतिहास में भारतवर्ष के डेवलपमेंट में क्या फूल है उसके बड़े में मेरी जो धारणाएं थी उसमें धड़कन धार मूल अमूल परिवर्तन हो गया है ऐसा स्वामी जी अपने अपने मुंह से कहते हैं तो देखिए की बुद्ध और बुद्धिस्म को पूरा जीवन और हमारी तरह नहीं की हमारा मां तो 10 दिशा में फैला हुआ है स्वामी जी जब किसी चीज को स्टडी करते हैं तो रेजर शार्प लेजर शार्प उनका फॉक्स राहत है तो उसे फॉक्स के साथ किसी विषय को स्टडी करने के बाद में भी वो जीवन के आखिरी समय में कहते हैं की बुद्धिस्म के बड़े में मेरी धरना का मेरी अंडरस्टैंडिंग का मेरी समझ का अमूल परिवर्तन हुआ है तो हम लोगों के बड़े में भी हमारे बड़े में तो ये और भी ज्यादा ये सही होना चाहिए की यदि आज अभी तो मैं फिर भी रामकृष्ण मिशन में 40-45 तो कुछ नहीं कहे जाते हम 60 साल की उम्र होती है और हम कोई 60 साल का साध ऐसे तो कहा जाए तो रिटायरमेंट का आगे है वही कोई हेड क्वार्टर में जाएगा ट्रस्टी महाराज से मिलेगा वाइस प्रेसिडेंट महाराज जी से मिलेगा जनरल सेक्रेटरी असिस्टेंट सेक्रेटरी महाराज से मिलेगा तो वह लोग कहेंगे अरे ये तो अभी बच्चा है इसको क्या समझ में आएगा क्योंकि प्रेसिडेंट महाराज की उम्र 95 गौतम आनंद जी महाराज की उम्र भी शायद 19 प्रेसिडेंट महाराज कैचिंग 95 प्लस है आ गौतम आनंद जी की 95 है तो इस उम्र में भी उनके चेहरे पे जो ओजस उनकी त्याग तपस्या की प्रभा जी तरह से फेल रही है तो उनको लगता है की हां 90 प्लस हुए तो अभी उनके जीवन में सही सही स्पिरिचुअलिटी प्रगति होना शुरू हो तो उसके सामने हम लोग तो 40 45 50 55 60 65 हम लोग तो बच्चे हैं उनके सामने तो अभी जो हम लोग स्टडी कर रहे हैं अभी हम लोग जो अपनी बुद्धि से समझ रहे हैं यह तो अभी बचपन है हमारे लिए अभी तो यह शुरुआत मंत्र हुई है यह 20 साल का स्टडी है और कुछ नहीं है अभी आफ्टर 40 हमने तपस्या साधना स्टडी का एक लेवल अचीव किया है इसके बाद से सही सही अंडरस्टैंडिंग खोल है इससे पहले तो क्या है की जैसे की एक ओवरव्यू होता आना चाहिए की हां मैंने जितनी भी किताबें हैं मुख्यमंत्री किताबें रामकृष्ण संघ की उसको पढ़ लिया है उसका एक बेसिक स्ट्रक्चर मेरे मन में फिट हो गया है अभी चलो एक एक किताब लेकर के एक एक टॉपिक लेकर के उसमें गहराई में जाए तो अभी मैं जो जी तरह से इस सब चीजों की आ एक्सप्लेन समझ रहा हूं खुद में अपने अपने खुद के मन में की हां इसका इस तरह का एक्सप्लेन होना चाहिए या तो फिर मैं जी तरह से बता रहा हूं दिस इस जस्ट डी बिगनिंग आज से 15 साल 20 साल 20 साल जल्दी ने इतना जिऊंगा तो मेरी अंडरस्टैंडिंग कंपलीटली डिफरेंट होगी आईटी वुड बी पर रिचर्ड पर एनीथिंग डेट आई अंडरस्टैंड राइट नो तो फिर जो भी है अभी आगे ऑफ टुडे मुझे लगता है की मैंने जी तरह से इसको एक्सप्लेन किया है वो अभी आगे ऑफ टुडे वो ठीक ग रहा है मुझे अभी कल परसों 10 साल 15 साल के बाद इसका और एक डिपर मीनिंग मुझे समझ में आएगा तो चलिए मैं उसे समय क्लास लेट हूं तो मैं अवश्य उसको भी एक्सप्लेन करूंगा ठाकुर अभी ठाकुर का आखिरी सेंटेंस में पढ़ लेट हूं जरा अंतरंगों तारा के बोल एक हानियां जो लोग अंतरंग है ठाकुर कहते हैं वो सिर्फ यही पर आएंगे नरेंद्र भगवान राखल एरा अमर अंतरंग नरेंद्र भावनात रखा ये मेरे अंतरंग है एरा सामान्य यह सामान्य नहीं है तुम ही डर एक दिन खाई हो तुम एक दिन इन लोगों को खिलाना उन लोगों को खिलाना जैसे पहले के जमाने में वो ब्राह्मण भजन की प्रथम होती थी कोई भी शुभ प्रसंग है ब्राह्मण को भजन करो तो क्यों अभी ऐसा माना जाता है की ब्राह्मण लोगों का ज्यादातर ब्राह्मण का जीवन त्याग तपस्यमई होता है शास्त्रार्थ करते हैं एक सातवीं संध्या करते हैं एक शुद्ध सात्विक जीने का जीवन जीने का पर्यटन करते हैं तो उनको खिलौने से पूनिया मिलता है आज भी देखेंगे की बहुत सारे ग्रह भक्ति साधु ब्रह्मचारी अपने ब्रह्मचारी तो खैर नहीं जाते किसी के घर पे किंतु जो साधु होते हैं सीनरी साधु या राजकोट में भी ऐसा होता है कोई भी प्रसंग हुआ शुभ प्रसंग तो उसके एन उपलक्ष्य करके आश्रम में से सन्यासियों को बुलाया जाता है उनकी बड़ी श्रद्धा पूर्वक उनको बिताया बिठाकर के उनको प्रणाम करके फिर उनको भजन कराया जाता है और इससे वे लोग समझते हैं की उनको भी पुण्य प्राप्त होगा साधु सन्यासियों को लोग क्यों इस तरह से बुलेट हैं क्योंकि इनकी त्याग और तपस्या है ठाकुर के साथ में उनका वार्तालाप होता राहत है मतलब भक्ति लोग मानेंगे सब तो वे लोग जो आशीर्वाद देंगे तो उनसे भक्तों का गृहस्तों का कल्याण होगा तो वैसे ही यहां पे ठाकुर ऐसा कहते हैं की ये लोग तो अवतार की लीला को पूर्ण करने के लिए अवतार की लीला में सहायक होने के लिए जन्म बार-बार जितने भी बार अवतार न देहात धरण करते हैं उतनी बार ये लोग भी उत्तारित होते हैं तो उनको मिला करके बहुत सर पूनिया प्राप्त होता है नरेंद्र के तोमर के रूप दिशा हो नरेंद्र को तुम किस तरह से देखते हो नरेंद्र के बड़े में तुम क्या सोचते हो मनी अर्थात की मास्टर महाशय मास्टर महाशय अपना नाम बदलकर के इस तरह से कहते हैं तो मनी कहते हैं आजा खूब भालू जी बहुत अच्छा नरेंद्र कैसा ग रहा है तुमको नरेन के बड़े में तुम्हारा क्या अभिप्राय है तो मनी कहते हैं बहुत अच्छा श्री राम कृष्णा देखो नरेंद्र का तो गन देखो नरेंद्र के कितने गन हैं गायत्री बजाते विद्याय अमर जितेंद्र या गाने में बचाने में विद्या शक्ति में इतने तो गन है ही है और फिर जितेंद्र है अर्थात की इंद्रियों के लाभ के प्रवश हो करके अपने वो वो इंद्रियों का गुलाम नहीं है मैन जो इंद्रियों का गुलाम होता है उसका जैसे की वो जैसे की आजकल है ईटिंग डिसऑर्डर मैं आजकल चला है की मैं क्या खाता हूं उसके ऊपर में मैं कंट्रोल नहीं कर पता हूं हाइपरटेंशन है डॉक्टर ने माना किया है ताली हुई चीज या तो फिर यह सोलिटी चीज नहीं खानी तो फिर भी जब मेरे सामने वो सब ए जाता है मैं अपने को कंट्रोल नहीं कर पता मैं का लेट हूं शुगर है डायबिटीज है इंसुलिन भी लेट हूं किंतु फिर भी मिठाई मेरे सामने ए गई या तो कोई भी ऐसी मीठी चीज ए गई मेरे सामने तो मैंने फैट करके का लिया मैंने एन अपने परिवार में भी इस तरह से देखा है कुछ कुछ मेरे बुजुर्ग थे मेरे कुछ वडील थे और डायबिटीज भी है हार्ट डिजीज भी है वो कोरोनरी उनको एक बार हार्ट की सर्जरी भी हुई है वो हार्ट ब्लॉकेज की तो फिर भी उसके बावजूद भी खाने पे कंट्रोल नहीं कर का रहे हैं बाजार में से जो कुछ भी आता है अच्छा सा वो का लेते हैं फिर इस में फिर वो हार्ट अटैक हो गया फिर देहांत हो गया तो अब जैसे ठाकुर कहते हैं ना वो ऊंट वो कैमल का उदाहरण देते हैं वो उठ क्या करता है उसको पता है की वो जो पेड़ पौधे से वो खाना वो पेट छिपा रहा है उसमें कांटे हैं उसमें थोंस है अभी कांटे उसके वो पत्तों के रूप में वह कांटों को भी का रहा है उसके मुंह में कांटे ग रहे हैं मुंह में से खून भी बा रहा है किंतु फिर भी वो पत्तों को छिपा रहा है तो पत्तों के लाभ में वो कांटो को भी का लेट है खून निकलता है उसकी परवाह नहीं करता तो ये इंद्रियों का लाभ है वो हमको हमारे साथ में हमको अनिष्ट हमारे साथ में अनिष्ट भी करती है हमारे शरीर को हनी भी पहुंचती है हमारे मां को दुर्गुण खराब वृत्तियां जो है वो भी हमारे मां में वो प्रकट करवाती है किंतु फिर भी इंद्रियों का मो जो है हम इतना आसानी से नहीं छोड़ पाते तो अभी इनकी कंपेयर में जो जितेंद्र होता है उसकी देखिए की उसके लिए आध्यात्मिक जीवन में प्रगति करना कितना आसन है जब भी अभी मैं यहां पर क्लास लेट हूं आश्रम में मंदिर के नीचे में एक होल है एवरी सैटरडे इवनिंग मेरा क्लास होता है तो एक भाई क्लास के बाद में आकर के मुझे पूछने लगे की मैं बहुत पर्यटन करता हूं आ ध्यान नहीं हो रहा है तो ध्यान करने के लिए क्या करना है तो मेरा इस तरह से जो भी प्रश्न होता है मेरा एक स्टैंडर्ड सॉल्यूशन होता है थोड़ा सा चेंजिंग सिख लो चांटिंग यहां पे हर रोज सुबह को मंदिर में होता है बहुत भक्ति लोग आते हैं और महाराज जी जो चांटिंग करेंगे सन्यासी महाराज उनके साथ में वो किताब भी रहती है आपके पास में पड़ी होगी वो किताब लेकर के साथ-साथ में चेंजिंग सिख लीजिए तो अब जब संस्कृत मेट्रो का उच्चारण करते हैं उससे क्या होगा की उसके वाइब्रेशन आपके मां में जाएंगे आपके शरीर में उसका एक पूरा आपका वह जो फ्रीक्वेंसी है आपके मन और बॉडी का उसे संस्कृत मेट्रो के साथ में एक आकर हो जाएगा तो आपका मां धीरे-धीरे करके केंद्रित होने की शुरुआत होगी एक तो ये कीजिए दूसरा की कथामृत प्रतिदिन 10 मिनट 15 मिनट ध्यान करने से पहले पाठ कीजिए बोलकर के क्योंकि कथामृत के यह शब्द भी ठाकुर के वह भी तो उपनिषद के मेट्रो के समाज ही उसमें पावर है तो जब बोलकर के पाठ करते हैं तो उसका भी आपके मां पे बहुत ही सुंदर बहुत ही कलिंग कलिंग इफेक्ट होगा बहुत ही शांत करने वाला इफेक्ट होगा उसके बाद में आप ध्यान करेंगे तो देखेंगे ध्यान से पहले जब कीजिए जाप कर कर अपने दीक्षा ले लीजिए गुरु महाराज की शक्ति भी आपने प्रवेश करेगी एन और जाप करते जाइए तो धीरे-धीरे करके आ संस्कृत मेट्रो का चैटिंग कथामृत का पाठ और जब ये सब करने के बाद में थोड़ा सा ध्यान करेंगे देखिए की आपका मां इजीली कैन एकाग्र होगा ऐसा मैं का देता हूं किंतु मां में मां में मुझे पता है जो चीज हम लोग साधु लोग जनरली नहीं कहते लोगों को सुना भी इतना शायद अच्छा ना लगेगा की ब्रह्मचर्य के बिना जब ध्यान साधना ये आपका ज्यादा कुछ डेवलप होने वाला नहीं है ब्रह्मचर्य है इंद्रियों का संयम है की आखिर में हमको ध्यान में बूस्ट करता है जैसे की आप देखिए की आपकी गाड़ी जो लोग कर ड्राइविंग करते हैं उसमें गियर होते हैं बाइक भी जो लोग चलाएंगे तो फर्स्ट गियर सेकंड गियर थर्ड गियर फोर्थ गियर तो यदि आप सामान्य रूप से एक जीवन जीते हैं तो वो आपकी आपके वही कल को फर्स्ट गियर में चलने जैसा हो गया फर्स्ट गियर में गाड़ी चलती है और यही से आपको संतोष लेना है की हां किंतु यदि आपको फोर्थ गियर में एकदम सुपर फास्ट आपकी गाड़ी चलानी है तो आपको इंद्रिय जितेंद्रिय होना होगा जब जितेंद्र यह होंगे तभी ये सेकंड गियर थर्ड गियर उसमें आप गाड़ी चला पाएंगे आपकी आध्यात्मिक साधना आपकी आध्यात्मिक जर्नी तभी वो स्पीड पकड़ेगी तभी वो स्पीड अप होगी एडरवाइज बहुत किया तो सेकंड गियर पे आप शायद हो सकता है की जा सकते हैं ठाकुर के बहुत सारे गुरु ही भक्ति थे बलराम बाबू थे मास्टर महाशय थे नाग महाशय थे रामबाबू थे गिरीश खुश थे गिरीश घोष का खासकर के उदाहरण हम देखते हैं वो कहता है की मुझे यदि पता होता है की पाप डालने का मैंने जितने पाप किया है उसको फेक देने का इतना बड़ा गद्दा मुझे मिलता तो मैं और ना जान कितने पाप कर लेट किंतु यह बोलना है मुंह से किंतु जब सही सही ठाकुर के शरण में गया तो ठाकुर ने उसके पास में कैसी तपस्या करवा ली वो गिरीश घोष एक बार ठाकुर बोल रहा है की जितेंद्र यह होने के बिना कुछ नहीं होगा ओम एक बार यदि आप में कम कंचन की वो एक बार उसने मां चला गया तो उसे मां को फिर वापस लेना बड़ा ही मुश्किल है तो गिरीश खुश रहो थोड़ा चिंतित हो गया ठाकुर को पूछता है की अच्छा महाशय एक बार फिर उदाहरण देते हैं जी कटोरी में लहसुन रखा है उसे कटोरी को आप साबुन से जितना भी दो दीजिए उसमें से लहसुन की गढ़ नहीं जाएगी तो गिरीश तो थोड़ा चिंतित होकर के बाकी सब भक्ति चले गए तो ठाकुर को पूछता है की यहां महाशय क्या लहसुन की गंद सच में कभी नहीं जाएगी आपने तो ऐसा बार-बार कहा तो मैं क्या करूं तो ठाकुर कहते हैं देखो उसे कटोरी को जड़ी तुम आज में जलते हो तो आज में जलने से लहसुन की गंद भी चली जाएगी अर्थात उसे तरह की साधना करनी होगी जब उसे तरह की साधना करेंगे तो हमारी इंद्रियां जो विषय पर अवश्य थी एक समय उसमें से वो संपूर्ण रूप से मुक्त हो जाएगी और उसके जो दाग उसकी जो इंप्रेशन अपने मां पे लगी है वो दाग भी मिट्टी जाएंगे वो इंप्रेशन भी चली जाएगी अब जैसे की रखा राजा महाराज स्वामी ब्रह्मानंद ठाकुर के मानस पुत्र रामकृष्ण संघ के सर्वप्रथम प्रेसिडेंट स्वामी विवेकानंद ने खुद कहा है की आध्यात्मिकता में राजा मेरे से बड़ा है वो राजा महाराजा उनकी शादी भी हुई थी और उनको बच्चा भी हुआ था ठाकुर ने ही उनको अपनी बीबी के पास में भेज दिया था कहा था की उसका थोड़ा सा भोग बाकी बैक गया है तो उसको वापस जाना पड़ेगा तब वो किंतु जब राजा महाराज वापस आए तब उन्होंने जाकर के इस तरह की तपस्या और साधना की की वो वो उनकी जो भी उनके मां में कुछ भी इंप्रेशन रही होगी वो विवाहित जीवन की सब पुरी जैसे की आगुण में जलते हैं अपने मां को जब बाटी कुछ ऐसे जलते हैं वैसे ही तपस्या के आघूर्ण में जल करके अपने मां को शुद्ध परिषद कर दिया था तो यह जितेंद्र यह होना आध्यात्मिक जीवन में एक बहुत ही बड़ा ऐसेट है एक बहुत बड़ी रिटायरमेंट है किंतु साथ-साथ में यह याद रखना है की हम सब की एक इमिटेशन होती है मैं खुद यदि अपने बड़े में कहूं तो मैं कोई इतना बड़ा कोई यह नहीं हूं तपस्वी या सादात की मैं बहुत ही गर्व पूर्वक का सुकून की हां मैंने अपने मां के ऊपर में संपूर्ण रूप से विजय प्राप्त कर दिया है मैं बहुत सारे साधुओं का मैंने अब हमारे सीनरी साधुओं को इस तरह से प्रश्न किया है की क्या मां की चंचलता या तो फिर मां का यह जो रोग है विषयों की और सब समय दौड़ता है उसके यहां पे हम लोग साधु बने के लिए भी ए गए दिन-रात ठाकुर्मा स्वामी जी का चिंतन भी करते हैं किंतु उसे रोग से तो इमीडीएटली तो मुक्ति नहीं मिलती है तो उसका क्या सॉल्यूशन है क्या हम लोग साधु हो करके जो बैठे हैं क्या समाज को हम भ्रमित कर रहे हैं मां में तो वो 100% शुद्धता अभी नहीं आई तो जो उत्तर हमको जनरली मिलता है की देखो यह जन्म अंतर की साधना है एक दिन में किसी का मां 100% पवित्र नहीं होता हमको दी दे आफ्टर दे एयर आफ्टर एयर लाइफ आफ्टर लाइफ हमको इसके पीछे में लगे रहना पड़ता है और आखिरी मुक्ति तो ठाकुरमार स्वामी जी या तो फिर जी ईश्वर जी अवतार में हमारी श्रद्धा हो उनके आशीर्वाद के बिना वो तो अंतिम मुक्ति तो मिलने वाली नहीं है हमारी और से हमको एक सतत पर्यटन करते रहना है और साथ में ही ठाकुर को प्रार्थना करते रहना है की हां आप आशीर्वाद दीजिए तो हमको आखिरी यह मुक्ति मिले हम जितेंद्र ये हो पे तो दो चीज है एक तो जितेंद्र ये होने का प्रयास करना है सतत लगे रहना है दूसरा की यदि हम हमारे से यदि कोई गलती हो भी जाए हमारी वीकनेस हमको दिखती भी है तो उससे पूरा मायूस नहीं हो जाना है उससे पूरा डर करके निराशों के नहीं बैठ जाना है हमारे प्रयत्नों की सिंसेरिटी जो है मेरी ऑनेस्टी जो है मैं एक्सेप्ट करता हूं की दिस इस मी स्ट्रैंथ इन दिस इसे मी बिजनेस ओवर रियल ऐसेट दिस इस अवर रियल साधना कभी ऐसा नहीं कहना है की जो मैं नहीं हूं उसको दिखाना नहीं है जो मैं नहीं कर पता हूं उसको गलत रूप से प्रचार नहीं करना है बाहर जाके ऐसा नहीं करना कहना है की मुझे इतना दर्शन हो गया मैं इस तरह से साधना कर रहा हूं मैं पुरी रात बैठ करके जब ध्यान कर रहा हूं मेरा मां पूरा अभी ये किसी भी विषय में नहीं जाता इस तरह से गलत प्रचार करना लोगों को भ्रमित करना दिस इस वेरी डेंजरस एक्सेप्ट वोट आईएम एक्सेप्ट व्हाट यू आर और देन हैव फेथ इन ठाकुर और की डूइंग योर साधना दे आफ्टर दे ओवर आफ्टर ओवर मिनट आफ्टर मिनट इस प्रतिक्षण ठाकुरमार स्वामी जी का स्मरण मनन बना रहा है जो कुछ भी मां को किसी ने पूछा था की मां अब तो इतना बड़ा संसार लेकर बैठी है क्या सब ये चल रहा है कोई भक्ति आता है तो इस तरह का पागलपन करता है क्या उनके भाइयों में झगड़ा होता है अब किस तरह से वो अभी मठ मिशन की बड़ी-बड़ी समस्याओं को लेकर के अब देखिए की शरद महाराज इतने विद्वान पूरे रामकृष्ण संघ के जनरल सेक्रेटरी को इतने पूरे वर्ल्डवाइड मठ मिशन को संभालते हैं कितने विद्वान विद्वान साधु शरद महाराज के मार्गदर्शन में अपना आध्यात्मिक जीवन अपना कर्म जीवन गठित कर रहा है वही शरद महाराज के कभी-कभी इस तरह से निरसा मायूस हो जाते हैं मां को पत्र लिखने हैं कोठार गए हैं कोठार में दुष्कल वहां पे काल पड़ा है तो उसे जो रामकृष्ण मिशन के लिए जो रिलीफ चल रही थी वो देखकर के किंतु मां को एक बहुत ही दर्द भारत लंबा पत्र लिखने हैं कहते हैं की मां यहां पे जी तरह से मैं मैं बिहार देख रहा हूं जी तरह से लोगों का कष्ट देख रहा हूं उसके सामने रामकृष्ण मिशन चुटकी भर मदद कर का रहा है तो हमारा क्या कर्तव्य है क्या स्वामी जी तो हमको गए हैं की जीवन को सेवा कार्य में समर्पित करना है सेवा ही साधना है तो हम तो इस तरह से सेवा नहीं कर का रहे तो क्या हमारे साधना में कोई कमी ए गई है इस तरह से जो पत्र लिखने हैं तो वो पत्र पढ़कर के मां सबको कहती है की देखो शरद का दिल जो है कितना विशाल है वो वासु की तरह पुरी पृथ्वी को अपने कंधे पे धरण किया हुआ है अभी मां की ही जो कुछ सामान्य आशीर्वाद है उसको पढ़कर के भी उसको सुनकर के भी शरद महाराज का हृदय कितना ठंडा हो गया होगा तो इतना झंझट मां को मां के है सर पे और किसी ने मां को पूछा की मां इतना सब आपको डिस्ट्रक्शन इतनी साड़ी रिस्पांसिबिलिटी आपके सामने है इसके भीतर में आपका क्या मां आपको अपना स्वरूप जो है क्या सब समय याद राहत है मां का स्वरूप अध्याय शक्ति जगदंबा स्वयं आपको याद राहत है अपना स्वरूप तो मां कहती है जब मैं सब कर्म में कार्य में विकट रहते हो व्यस्त रहती हूं तब तो शायद नहीं राहत किंतु जी क्षण मेरा मां यह सब कम ये सब बाहर की चिंता को बाहर के कार्यकलाप है उसके बड़े में सोचना बैंड करके मैं दो एक एक घड़ी के लिए भी आंख बैंड करके अपने मां को अंतर्मुख करती हूं फैट करके वो उद्दीपन हो जाता है फैट करके वो अपना सही स्वरूप है वो याद ए जाता है तो साधना इस तरह से हनी है की भले चाहे हम लोग दिन में कुछ भी करते रहे मां के भीतर में ये स्मरण मनन का प्रवाह सतत बेहतर है तो यह जितेंद्र यह होना जितेंद्र क्योंकि यह ब्रह्मचर्य को लेकर के आज हमारे समाज में इस तरह की एक गलत धारणाएं इस तरह के कुछ प्रेज्यूडिश इतिहास वो बस ये है की इसके बड़े में बात करने से भी लोग डरते हैं की लोग यदि बोलेंगे स्टूडेंट को की ब्रह्मचर्य का पालनपुर करो फैट करके युटुब खोल देंगे की आपके लिए संभव होगा हमारे लिए नहीं है क्या इस आईटी एवं पॉसिबल दूसरा की वो बता देंगे देखो ये बड़े-बड़े साधु लोग ये कुछ-कुछ जी तरह से हम न्यूज़पेपर में पढ़ने हैं इस तरह की बड़ी-बड़ी बातें तो करते हैं किंतु जैसे ही उनके कुछ घोटाला सामने ए जाता है तो समझ जाते हैं की उनके मां के भीतर में क्या है बात कुछ और करते हैं मां में क्या है और कुछ होता है तो ये वेरी सेंसेटिव टॉपिक किंतु इसको इतना सेंसेटिव इतना मतलब प्रेज्यूडिश करने की कोई जरूर नहीं है इंद्रियों पे जीत विजय प्राप्त करना ये कोई इतना डिफिकल्ट टॉपिक भी नहीं है ठाकुरमार स्वामी जी पे श्रद्धा हनी चाहिए स्मरण मनन निद्या सन चलना चाहिए और बिना मतलब के गैप लगाना की मैंने ये कर दिया मैंने वो कर दिया इसको अवॉइड करना चाहिए इसी से धीरे-धीरे करके हम लोग देखेंगे की हमारा मां अपने वाश में आता जाता है तो आज यही तक कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति