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Sri Ramakrishna Kathamrita ·

श्रीरामकृष्ण कथामृत || 9 Dec 1883 - श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ दक्षिणेश्वर में || 2 Apr 2025

प्रार्थना

ओम स्थापकाय धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री रामकृष्ण कथामृत का हम पाठ कर रहे थे। हमने देखा कि किस तरह से मास्टर महाशय वहां पर पंचवटी के किनारे पर बैठे हैं। गंगा के किनारे पर बैठे हैं। नहबत में बैठे हैं। और कोई एक गहन चिंतन में डूबे हुए थे। एकाएक ठाकुर वहां पर आए और उनको कहा कि एक टू कोर ले केऊ बलवे ए थोड़ा सा ही तुम कुछ करोगे तो कोई आकर कह देगा यह यह अर्थात कि थोड़ी सी ही साधना करने से गुरु प्रकट होकर के आगे की साधना कैसे करनी है वह बता देंगे। इस चैप्टर का नाम है दक्षिणेश्वर में श्री रामकृष्ण भक्तों के साथ में और ठन ठन में सिद्धेश्वरी मंदिर में गमन। द्वितीय परिच्छेद चल रहा है। डेट है 1883 9th दिसंबर। जो हमने पढ़ा ऑलरेडी कल कि ठाकुर कहते हैं कि मैं जो मांगता था या तो जो मैं चाहता था वह सब इच्छा मां जगदंबा स्वयं उनकी पूर्ण कर देती थी। तो ठाकुर ने कहा कि कल किस तरह से हुआ कि उनकी वो सोच रहे थे कि मैं तो अपनी खुद की चिंता नहीं कर सकता। मैं अपनी खुद की केयर नहीं रख सकता। तो किसी को दो और फिर क्या है ठाकुर कहते हैं कि यदि कोई सामने आ जाए कोई भिक्षुक या साधु या संत तो फिर उनको दक्षिणा या तो फिर प्रणामी या तो फिर यह कमंडलु वगैरह यह भी मैं देना चाहता हूं। यदि भक्त आ जाए सामने भक्त मिलने के लिए आए तो उनको भी भोजन भी करवाना चाहता हूं। तो यह सब कैसे होगा? तो फिर एक बड़ा आदमी कोई एक उनका एक सेवक के रूप में हो तो फिर यह सब काम करें। तो फिर जैसे ही ठाकुर ने कहा तो फिर मां ने उनको मथुर बाबू को दिया कि यह देखिए कि मथुर बाबू आपकी सेवा करेंगे। इसके बाद में ठाकुर ने सोचा कि यह पंचवटी के नीचे में यह तुलसी का क्या जैसा हो और उसके आसपास में बैरियर जैसा हो जिससे कि पौधों को कोई नुकसान ना पहुंचाए। कोई बैल या बकरी वगैरह आकर के तो फिर जैसे ही ऐसा ठाकुर ने सोचा उसी दिन देखा कि गंगा में वह जो रस्सी है वह जो बैरियर बनाने के लिए जो कोई मटेरियल चाहिए वह सब गंगा में ही तैरता तैरता आकर के पंचवटी का जो किनारा है वहां पे आकर के लगा और फिर वहां पे तो देखिए कि ठाकुर की जो इच्छा होती थी तो वह सब वह मां जगदंबा यह उनकी पूर्ण कर देती थी तो अभी उसके बाद में

ठाकुर के आत्मीय भक्तगण और मानस पुत्र

ठाकुर की और एक इच्छा है जो कि ठाकुर मां जगदंबा के सामने वर्णित करते हैं। ठाकुर क्या कहते हैं आभार बोले छिलाम मां आमार तो आर संतान होबे ना किंतु इच्छा कोरे एक्टी शुद्धो भक्तो छेले आमार शंगे शर्बदा थाके और फिर मैंने कहा था कि मां मेरा तो अभी संतान होने वाला नहीं है। ठाकुर तो थे पूर्ण ब्रह्मचारी और कोई सांसारिक संबंध तो मां शारदा देवी के साथ में था नहीं तो फिर किस तरह से उनका पुत्र होगा किंतु फिर भी मन में एक ऐसी इच्छा थी कि एक शुद्ध सात्विक संतान के रूप में एक बालक भक्त उनके साथ में सब समय रहे तो श रूप एकटी छेले आमायदा दाव इस तरह का एक लड़का इस तरह का एक बालक मुझे दो ताई तो राखाल हो इसीलिए तो फिर राखाल हुआ या तो फिर राखाल आया जारा जारा आियो तारा केऊ अंशो केऊ कला जो जो भी मेरे आत्मीय है उसमें से कोई कोई अंश है कोईकोई कला है यानी कि इन सबके भीतर में शक्ति का या तो डिवाइन एनर्जी का मैनिफेस्टेशन इन सब में अलग-अलग है। अच्छा देखिए यहां पे

माँ सारदा के आत्मीय भक्त संतान

ठाकुर ने अपनी तो व्यवस्था कर दी कि हां मुझे यदि एक संतान चाहिए तो एक शुद्ध सत बालक चाहिए तो फिर मां के फूल करके मैं अपने लिए इस तरह का एक संतान में अपने से जुगाड़ कर लूंगा। किंतु फिर मां शारदा देवी का क्या? तो फिर ठाकुर तो उनको कहते हैं कि एक समय ऐसा आएगा कि मां शारदा देवी के पास में इतने सारे शुद्ध सात्विक बालक होंगे कि वो उनकी मां मां पुकार सुनकर के वह त्रस्त हो जाएगी। तो आखिर में वही हुआ ठाकुर के पास में जिस तरह से राखाल रहता था जयराम भाटी और क्वालपाड़ा में देखिए देखिए कि यह जो त्यागी संतान जब मां के पास में आते थे मां उनसे एक तरह से दूरी मेंटेन करती थी क्योंकि क्या था कि मां इवन शारदानंद जी का भी आप देखिए कि शारदानंद जी जब भी मां के प्रणाम करने को जाते मां एक लंबा घुमटा टानती और फिर जब शारदानंद जी प्रणाम करके जाते तो फिर वह घुमटा उठाती तो शारदानंद जी कभी-कभी इस तरह से दुखित होकर कहते हैं कि आमी जनो बेटी शसुर जैसे कि मैं उनका स्वसुर हूं ससुरा हूं इस तरह से वह मेरे सामने घुमटा टानती है तो त्यागी संतान जितने भी थे ठाकुर के वो ठाकुर के पास ठाकुर के साथ में उनका जो आत्मीय संबंध था इस तरह से आत्मीय संबंध था तो सही किंतु हमेशा मां उनसे एक तरह की दूरी बरतती थी। उनको और जैसे देखिए कि यह त्रिगुणातींद जी ना कि कोई भी है जिन लोगों को घर जाने के लिए घर से आने जाने के लिए पैसों की जरूरत होती थी क्योंकि वह अपने पिताजी के पास में या मां के पास में नहीं मांग सकते थे। वो लोग कहेंगे कि अरे दक्षिणेश्वर के वह पागल ब्राह्मण को पागल ब्राह्मण को देखने के लिए जाना है तो उसमें पैसा क्यों भाई तुमको जाने की क्या जरूरत है तो ऐसा यदि कहते हैं तो फिर ठाकुर ने मां को कहा था कि उनको गाड़ी भाड़ा का ना कि नौका भाड़ा का एक पैसा ना कि जितना लगे वह उनको दे देना और फिर यह त्यागी संतानों को भी ठाकुर कहते थे कि दक्ष वहां पे नौबत में मां के पास में से ले लेना तो मां करती क्या थी कि वहां पे जो नौबत के जो उनका दरवाजा था। उसकी चौखाट जो होती थी उसके सामने एक पैसा रख के या जितना भी वह नौका या गाड़ी भाड़ा है वह रख के वह दरवाजा बंद करके भीतर चली जाती और जो त्यागी संतान आते वह वहां पर पैसा पड़ा हुआ देख के उसको लेके मां के उद्देश्य से प्रणाम करके वे लोग चले जाते। यानी कि उनके साथ में जिस तरह से ठाकुर का त्यागी संतानों के साथ में घनिष्ठ एक जो संबंध था। इस तरह से मां का ठाकुर के त्यागी संतानों के साथ में इतना नहीं था। मातृत्व हृदय था। मातृ प्रेम था। किंतु एक संतान को एक मां किस तरह से एकदम अपने पास में रखती है। उसके साथ में वार्तालाप करती है। हंसी मजाक करती है। इस तरह का ठाकुर के त्यागी संतानों के साथ में मां का नहीं था। किंतु हां यह योगिन मां वगैरह है जो कि मां इनको अपनी बिटिया की तरह ही देखती थी। अपनी पुत्री के समान ही देखती थी। खास करके योगिन मां को। तो योगिन मां की जो रेमिनेशंस हमने पढ़े पिछले चैप्टर में भी तो योगिन मां कहती है कि मैं जब नौबत में शयन करती तो मां खींच करके मुझे अपने पास में ले आती। जैसे कि एक पुत्री अपनी एक लड़की अपनी मां की गोद में जिस तरह से सोती है इसी तरह से वह योगिन मां मां के पास में शयन करती थी। किंतु यह जो त्यागी संतानों की जो बात है वह जो यदि मां के मन में ठाकुर की तरह इस तरह से एक इच्छा यदि होती कि हां मेरे भी इस तरह से पुत्र संतान हो तो वह इच्छा हम देखेंगे कि हमको जयराम बाटी और क्वालपाड़ा उस समय जो सब त्यागी संतान मां के पास में आते थे तो उनके साथ में मां का इसी तरह से एक बिल्कुल मां और पुत्र का जो संबंध होता है जैसे कि ठाकुर और राजा राजा महाराज का था वैसा ही संबंध हमको मां का अपने यह त्यागी संतान गांव के जो लड़के थे सब यह उसमें गौरीश्वरानंद जी महाराज है राममई महाराज है फिर यह जो यह महाराज है एक के बाद जो काम क्वालपाड़ा के जितने भी सब बच्चे थे वह सब मां के पास में इसी तरह से आते थे और इसी तरह से मां उनको अपने पुत्र संतान की तरह देखती थी तो वह जो इच्छा ठाकुर के मन की वह राजा महाराज के द्वारा पूर्ण हुई कि हां उनको एक शुद्ध सत्व बालक संतान चाहिए पुत्रवत संतान चाहिए तो मां की वह इच्छा बाद में जय राम बाटी कोलपाड़ा में वह पूर्ण हुई थी

ठाकुर के मानस पुत्र स्वामी ब्रह्मानंद का आगमन

तो इसीलिए ठाकुर कहते हैं यहां पे इसलिए तो राखाल हुआ अभी यहां पे देखिए हुआ शब्द एक्चुअली जन्म हुआ इस अर्थ में वह हम ले सकते हैं। वरना तो ठाकुर कहते हैं कि इसीलिए तो राखाल आया। राखाल आया था। राखाल हुआ नहीं था। माने उसका जन्म नहीं हुआ था। वह तो ठाकुर के पास में आया था। दर्शन करने के लिए जब प्रथम बार आया तब से ठाकुर के प्रति इतना स्नेह आकर्षण से वह बद्ध हो गया कि फिर ठाकुर के पास में ही रहने लगा। किंतु ठाकुर यहां पे ऐसा नहीं कह के कि ठाक राखाल आया। वह कहते हैं राखाल हुआ जैसे कि उनको एक पुत्र संतान होता है वैसे ही और यह सच-सच में मां ने उनको मां जगदंबा ने इसी तरह का उनको एक दर्शन दिलवाया था कि वहां पर ठाकुर पंचवटी के नीचे में ना कहां पर बैठे हैं। एकाएक मां ने आकर के एक पुत्र संतान उसको दे दिया। ठाकुर को दे दिया। तो ठाकुर जाकर के हृदय को बोलते हैं। उस समय हृदय वहीं पर था। तो ठाकुर हृदय को कहते हैं कि देखो मुझे इस तरह का दर्शन हुआ है। तो हृदय खुश होकर बोलने लगा कि अच्छा मामा वह तो ठाकुर तो हृदय के मामा थे तो मामा आपको एक पुत्र संतान होगा। तो ठाकुर तो बड़े ही नाराज हो गए हृदय के ऊपर में। क्या पागल जैसी बात कर रहे हैं। मेरी तो मातृ योनि है। अर्थात कि स्त्री को तो मैं जननी के रूप में देखता हूं। स्त्री के साथ में दैहिक संबंध बना करके एक दैहिक संबंध से एक पुत्र प्रकट हो ऐसा तो हो ही नहीं सकता। तो देखिए कि दूसरी बात है कि यह इच्छा कि राखाल आए माने एक पुत्र संतान आए वो इच्छा उस समय से थी। जब ठाकुर वहां पे हृदय था। उस समय से यह सब इच्छाएं थी। और ठाकुर ने मां को कहा भी था कि अच्छा मेरा तो मैं तो स्त्री को जननी के रूप में देखता हूं। मेरा संतान कैसे होगा? तब मां ने ही जगदंबा ने ही कह दिया था कि यह तुम्हारा मानस पुत्र है। तो यह पूरा राखाल के आने के पीछे की कहानी इसीलिए जो कि वह जो दर्शन ठाकुर को हुआ था और एक इस तरह से ही हुआ जैसे कि ठाकुर ठाकुर ने कि वो एक दिव्य अंश से ही राखाल का जन्म हुआ हो। इसीलिए यहां पे देखिए कि इस तरह से ठाकुर ने लिखा है कि कहा है कि राखाल होलो रेदर देन कि राखाल आया जारा जारा आत्मीियों तारा केऊ अंशो

माँ ने मास्टर महाशय को कथामृत लिखने की पर्याप्त शक्ति दी

केऊ कला अच्छा और एक बात बड़ा ही इंपॉर्टेंट ठाकुर कहते हैं जो भी मेरे आत्मीय है उनके भीतर में या तो ईश्वर की दिव्य शक्ति का कोई अंश है ना कि कोई कला है यानी कि शक्ति का तारतम सम्य है। किसी किसी में छोटा सा अंश ही है। जबकि किसी किसी में एक कला ना की कला जो होती है वो अंश से ज्यादा होती है। तो अभी जैसे कि मास्टर महाशय है तो मास्टर महाशय के बारे में इसी चैप्टर में ही मतलब इसी कुछ दिनों के भीतर में ही आगे में आएगा कि ठाकुर मां के साथ में वार्तालाप करते हैं। माने भाव में आकर के और मां को पूछते हैं कि मां के ए तो कलाई के दिलली फिर वह मां को फिर मां मां ने उनको कुछ कहा फिर वह उत्तर देते हैं अच्छा ए तो टाई तोर का जावे ठीक छ अर्थात कि वो भाव में आकर के मां को पूछते हैं मास्टर महाशय वहां पर ही बैठे हैं और वह पूरा बात वार्तालाप सुन रहे हैं। ठाकुर पूछते हैं मां को कि अच्छा मां इसको इतनी कला ही क्यों दी? फिर मां कुछ उत्तर देती है। तो उस उत्तर के उत्तर में उत्तर के उत्तर में ठाकुर कहते हैं कि अच्छा इतने में ही तुम्हारा काम हो जाएगा। अच्छा ठीक है। तो अभी यहां पर मेरा जो कंक्लूजन है मास्टर महाशय ऐसा स्पष्ट लिखते नहीं है। किंतु जो मेरा कंक्लूजन है कि यहां पर ठाकुर मास्टर महाशय के बारे में ही बात कर रहे थे। मास्टर महाशय में इतनी शक्ति नहीं थी कि वह संसार त्याग करके बाकी सब त्यागी संतानों की तरह वो वराह नगर मठ में सन्यासी की तरह आकर के रहे। किंतु उनमें इतनी तो क्षमता थी कि ठाकुर का कथामृत लिख पाए। तो उनका जो कार्य करने की आवश्यकता थी उसके उनका जो कार्य था रामकृष्ण मिशन में उनका जो रोल था उसको निभाने के लिए उनका कार्य करने के लिए उनको जितनी शक्ति की आवश्यकता थी उतनी शक्ति तो मां ने उनको दी ही थी तो इसलिए यहां पर ठाकुर पूछते हैं उनको इतनी कला ही क्यों दी अर्थात कि इनको इतनी शक्ति ही क्यों दी क्यों वह साधु नहीं हो सकता क्या संसार त्याग नहीं कर सकता क्या तो अभी देखिए कि मास्टर महाशय मैरिड थे। यह तो कोई बंधन नहीं है। हमको पता है कि और बच्चे भी हुए थे तो वह भी कोई बंधन नहीं है। राजा महाराज स्वयं उसका सबसे बड़ा उदाहरण है कि उनकी भी पत्नी थी। उनका भी पुत्र संतान था। फिर भी उनको छोड़कर के वह आए थे। योगिन महाराज ने भी मैरिज किया था। हां और फिर उनकी पत्नी तो जीवित भी थी और जब उनका योगिन महाराज की आखिरी बीमारी चल रही थी उस समय मां ने उनकी पत्नी को उनकी सेवा करने के लिए बुलाया भी था। योगिन महाराज वैसे थोड़े से तो नाराज हो गए थे। किंतु जब मां की खुद की इच्छा है तो मां की इच्छा के सामने वो क्या करेंगे? घर संसार पत्नी को संपूर्ण रूप से छोड़ दिया है। किंतु फिर भी मां के मन में था कि देखिए उनकी पत्नी का भी तो एक हक बनता है अपने पति की सेवा करने का। तो योगिन महाराज के रहते-रहते जो ना कर पाई तो हो सकता है कि योगिन महाराज के आखिरी दिनों में जब उनका देह ईश्वर की ओर जा रहा है। उनका देह उनका मन ईश्वर की ओर जा रहा है। देह त्याग करने की अंतिम घड़ी आ गई है तो वह चंद दिन भले ही चाहे वो योगिन महाराज की सेवा करके अपने मन को तृप्त कर पाए। तो यह मां की इच्छा थी। तो ऐसा नहीं है कि मास्टर महाशय मैरिड है और संतान है बोलकर के वह वराह नगर मठ में आकर के वह सन्यासी नहीं हो सकते। वो बैरियर इस तरह की किसी को म एक बार यदि जिसके मन में वैराग्य आ गया ठाकुर के त्यागी संतानों में तो यह सांसारिक बंधन उनको रोकने के लिए किसी के भी शक्ति नहीं थी। तो यहां पर किंतु बात ऐसी है कि उनको जो कार्य करना था कथामृत का लेखन करना था उस कार्य के लिए यदि मुझे ऐसा लगता है कि वह वराह नगर मठ में आकर के बाकी सब त्यागी संतानों की तरह रहे होते राजा महाराज लाटू महाराज शशि महाराज की तरह तो मुझे लगता है कि उनसे यह कथामृत लेखन शायद ना हो पाया हो। उसके लिए उनको फ्रीडम चाहिए होता और फिर समय चाहिए था। यह समय और फ्रीडम जो कि हम खुद अपना कार्य करने के लिए जुगाड़ करें यह सब किसी मठ में रहकर के मुश्किल होता है। क्योंकि मठ का अपना रूटीन होता है। मठ की अपनी एक जिम्मेदारी होती है। रिस्पांसिबिलिटीज होती है। जैसे कि वो काली महाराज के क्षेत्र में हुआ था कि वो बाकी सब त्यागी जो गुरु भाई थे वो स्वामी जी के उन्होंने आकर के स्वामी जी के पास में कंप्लेन की थी कि ये काली जो है वो अकेला-अकेला बैठकर के अपने कमरे में पढ़ाई लिखाई करता रहता है और तपस्या करता रहता है। तो फिर उसको कहिए कि यह जो मठ का जो बाकी जो जिम्मा है अभी वह खाना बनाना है वो थोड़ी बहुत साफ सफाई करनी है। जो भी रूटीन है उसमें जो सबका ड्यूटी है वो थोड़ा ड्यूटी करें यहां पे आकर के तब स्वामी जी ने नाराज होकर के कहा था कि तुम लोगों का एक गुरु भाई यदि एक साधन भजन लेकर के विद्याभ्यास लेकर के रहना चाहता है तो तुम इसमें बाधा क्यों देते हो उसका क्या काम है बताओ मैं कर लूंगा तो ऑलरेडी और काली महाराज जिस कमरे में बैठकर के यह सब अध्ययन वगैरह करते थे उस कमरे का नाम ही दे दिया था काली तपस्वी का घर यानी काली तपस्वी का रूम तो इस तरह से यदि मास्टर महाशय भी यदि वराह नगर मठ में आकर के रहते तो वो जो वहां की एक जो पूरा एक स्पिरिचुअल एटमॉस्फियर था सत सतत भजन कीर्तन चलता रहता था सतत एक साधना का प्रवाह बहता रहता था वहां की जो ड्यूटीज थी जो जिम्मा सबको दिया गया था उसको निभाना है तो मुझे लगता है कि उनके पास में कथामृत लिखने के लिए जो सोचने के लिए समय और वो एक व्यवस्था भी तो होनी चाहिए चाहिए लिखने के लिए तो आपको सब सामान चाहिए और वराह नगर तो था शिव का संसार एक म उस दिनों की जो कुछ-कुछ बातें ऐसी है आज यदि हम पढ़ेंगे तो हमको आश्चर्य होगा उस समय स्वामी जी के जो छोटे भाई थे महेंद्रनाथ इनको सब महीन करके बुलाया करते थे गुरु भाई तो वो कभी-कभी मठ में आकर के देखते सभी लोग दिगंबर है तो वह एकदम ये हो जाते हैं कि अरे वस्त्र कपड़े क्यों नहीं पहने हैं तो उस समय ऐसा ऐसा था कि अभी कपड़े पहनने हैं, नहीं पहनने हैं। यह सब चीजों के प्रति गुरु भाइयों का कोई ध्यान ही नहीं था। ठाकुर ने जैसे कि किस तरह से ठाकुर कहते हैं ना लज्जा, घृणा, भय तीन थकते नहीं। अर्थात कि लज्जा, घृणा और भय यह तीन रहते रहते होगा नहीं। अगेन ठाकुर की वो क्रिप्टोग्राफिकल लैंग्वेज क्या होगा नहीं? ईश्वर दर्शन होगा नहीं। किंतु यहां पर देखिए कि इसके बारे में भी एक है। ठाकुर जो कहते हैं कि लज्जा, घृणा और भय यह ईश्वर के साथ में नहीं रखना है। किंतु मां का ही फिर सामने है। मां कहती है एकदम स्पष्ट कहती है कि ठाकुर कहते हैं कि लज्जा, घृणा भय तीन थकते नोए। किंतु आमी बोलची लज्जा, घृणा, भय तीन थकते होय। अर्थात कि ठाकुर कहते हैं कि लज्जा, घृणा, भय यह तीन रहते-रहते नहीं होगा। किंतु मैं कहती हूं कि लज्जा, घृणा, भय यह तीन रहते रहते ही होगा। यहां पर मां क्या कहना चाहती है? खास करके स्त्रियों के लिए और यह संसार के यह जो भी रूढ़िच चुस्तता है तो इसके बारे में हमको बहुत ही ज्यादा अलर्ट रहना होगा। यह जो ठाकुर का है कि स्पिरिचुअल लाइफ वो हमने एक बार डिस्कस किया था कि किस तरह से ठाकुर मां स्वामी जी ने तीनों ने यह जो पूरा ह्यूमैनिटी है ह्यूमन सिविलाइजेशन है उसको तीन एस्पेक्ट जो तीन मेजर एस्पेक्ट है वो तीन मेजर एस्पेक्ट को यही तीन एक-एक एस्पेक्ट रिप्रेजेंट करते हैं। ठाकुर रिप्रेजेंट्स द इंडिविजुअल स्पिरिचुअल एफर्ट ऑफ द मैनकाइंड। मदर रिप्रेजेंट्स द फैमिली लाइफ एंड स्वामी विवेकानंदा रिप्रेजेंट्स द सिविलाइजेशनल अंडरस्टैंडिंग। यह जो एक व्यक्तिगत आध्यात्मिकता है, वह ठाकुर रिप्रेजेंट करते हैं। उसके बारे में ठाकुर उपदेश देते हैं। हमारी व्यक्तिगत आध्यात्मिकता ईश्वर के साथ में हमारा संबंध उसमें किसी तरह की लज्जा नहीं होनी चाहिए। इसमें किसी तरह की घृणा यानी कि किसी तरह का एक घृणा का भाव यानी कि यह मुझे पसंद नहीं है, वह पसंद नहीं है। इस तरह से और किसी तरह का भय नहीं होना चाहिए। ठाकुर कहते हैं ना वो लीला प्रसंग में हमने देखा कि ठाकुर कहते हैं कि ईश्वर के दर्शन प्राप्त करने की इच्छा छोड़ दो। ईश्वर यदि अपने ऐश्वर्यमय रूप में आकर के दर्शन देंगे तो हम भयभीत हो जाएंगे। उनसे दूर हो जाएंगे। हालांकि यदि ठाकुर की बात को ठाकुर के ही जब प्रसंगों से काटनी हो तो हमको पता है कि जैसे ठाकुर के ही पिताजी खुदीराम उनको वो शीतला देवी एक छोटी बच्ची के रूप में आकर के दर्शन देती थी। वो खुदीराम सुबह को फूल तोड़ने को जाते तो वही शीतला माता एक सात छ सात साल की बच्ची के रूप में आकर के उनके साथ-साथ में घूमती। वो जब फूल तुलना है तो वह बच्ची कहती कि अच्छा मैं डाल को पकड़ करके रखती हूं झुका करके रखती हूं। आप फूल तोड़ लीजिए। तो इस तरह से छोटी बच्ची के भी रूप में आकर दर्शन देते हैं। ऐसा नहीं है कि सब समय ईश्वर दर्शन देंगे तो वह अपने विश्वूप स्वरूप में ही देंगे। जिस तरह से गीता में कृष्ण ने दिया अर्जुन को दर्शन और अर्जुन भयभीत हो गया कि आपका यह जो विराट स्वरूप है वह अभी मैं नहीं देख पा रहा हूं। आप फिर से मेरा सखा जो थे सौम्य रूप में फिर से आ जाइए। तो ऐसा नहीं है कि ईश्वर सब समय इस तरह से विराट रूप में ही दर्शन दे। किंतु एनीवे यहां जो बात थी कि यह वराह नगर मठ में मास्टर महाशय आकर के रह सकते थे। उसमें ऐसा कुछ नहीं था। किंतु फिर भी देखिए कि उनका जो मेन कार्य था कि वह था कथामृत का लेखन करना। कथामृत को लिपिबद्ध करना और यह तभी संभव था कि जब कि उनके पास में फ्रीडम हो सोचने का अपने हिसाब से अपने रूटीन को फिक्स करने का। इसीलिए ठाकुर कहते हैं कि अच्छा इसको इतनी कला ही क्यों दी? अर्थात कि इसको इतनी शक्ति ही क्यों दी? तो इतनी शक्ति से ही उनका काम होगा। इतनी शक्ति नहीं दे देनी है कि वह वराह नगर मठ में जाकर सन्यासी हो जाए तो फिर उनका जो कथामृत लेखन का कार्य ही रुक जाए। इतना शक्ति ही सिर्फ देना है। वह जो ठाकुर कहते हैं ना कि वह जो गाय होती है गाय को एक रस्सी बांध करके वह छोड़ देता है। फिर वह जो उसका वो जो किसान होता है तो जितने एरिया में वह रस्सी बांधी हुई है उतना एरिया में गाय घूम करके वो घास खाएगी। फिर इतना घास जब खा लिया तब रस्सी को और थोड़ा सा लूज़ करेगा और थोड़ा सा उसका लेंथ बढ़ाएगा तो और ज्यादा एरिया में जाकर के यह गाय घास खा पाएगी। तो यहां पे भी ऐसा है कि मास्टर महाशय का जो कार्य था उस कार्य को वह पहले कथामृत लेखन का करें। उसके बाद में यह जो रस्सी से जो उनको बांधा गया है उनको वो थोड़ा और रिलीज करेंगे ठाकुर स्वयं और फिर बाद में ठाकुर खुद कहते हैं कि वो भागवत पंडित जो होता है मां उसको एक पाश बांध करके वो रख देती है। क्यों? यदि देखिए कि भागवत सुनकर के मनुष्य जीवन के जितने भी पाश है पाश यानी कि बंधन बंधन यानी कि ये जो षडरिपु है जो काम क्रोध मद लोभ मोह मत्सर यह षडरिपु मनुष्य के देह को मनुष्य के मन को बांध करके रखते हैं। तो यह जब तक यह षडरिपु है या तो यह अष्टपाश अष्टपाश जब तक मनुष्य को बांध करके रखते हैं तब तक मुक्ति मुश्किल है। मुक्ति असंभव है। तो ठाकुर कहते हैं कि भागवत सुनकर के तो वैसे सबके पाश अष्टपाश से लोग मुक्त हो जाएंगे। किंतु जो भागवत पंडित है उसको मां एक पाश से बांध करके रख देती है। क्यों? तभी तो वह संसार में रहेगा और तभी तो वह लोगों को भागवत सुनाएगा। तो यहां पर भी देखिए कि बात ऐसी है कि ऐसा नहीं है कि कि कोई एक अंश है, कोई एक कला है। तो ऐसा नहीं है कि ठाकुर किसी को संपूर्ण होने का आशीर्वाद नहीं दे सकते थे या नहीं देना चाहते थे। वही लीला प्रसंग में ही हमने पढ़ा। ठाकुर तो कहते हैं कि अरे मैं तो चाहता हूं कि तुम सबको ईश्वर दर्शन हो। किंतु ऐसा होता कहां है? क्यों नहीं होता है? क्योंकि क्या है कि मां की क्या इच्छा है यह रामकृष्ण मिशन जो वर्ल्ड वाइड जो आज इतना स्प्रेड हुआ है इस मिशन में किसका क्या कार्य है उस कार्य के अनुसार उनको उतनी शक्ति दी जाती है। अभी जैसे कि देखिए कि मैं वहां पर राजकोट में बैठकर के बेलूर मठ में बैठकर के एडिटिंग किया करता था। अभी यह किताबों का अभी यदि मेरे पास में इतनी शक्ति आ जाती कि मैं यदि मुक्त हो जाने की म वहां के वो थ्रेशहोल्ड पे आकर के खड़ा हो जाता मुझे ऐसा लगता कि बस अभी तो यह आध्यात्मिक मुक्ति मुझे मिलने ही वाली है। निर्वाण प्राप्ति की कतार पे मैं आ ही गया हूं। वहां पर मैं एकदम थ्रेशहोल्ड पे आ ही गया हूं। तो मैं थोड़ी ना बेलूर मठ में या राजकोट में बैठकर के वह किताबें एडिट करता। मैं कहीं हिमालय वगैरह में चला जाता। वहां पर मैं निर्वाण के आनंद में बूंद होकर के बैठा रहता। उसके बाद में कौन यह एडिटिंग करने को आएगा? तो क्या है कि म ऐसा नहीं है कि मुझे मां ने इस कार्य के लिए अपॉइंट किया है। किंतु जस्ट मैं कहना चाहता हूं कि हम सबकी ये जो लिमिटेशन है उसको ऐसा है ना कि वो कहते हैं कि ग्लास आधा भरा हुआ है या तो ग्लास आधा खाली है। हाफ फुल और हाफ एंप्टी। आप किस तरह से इसको देखते हैं? ग्लास के भीतर में 50% वाटर है। आधा पानी भरा हुआ है। तो आपका पॉजिटिव एटीट्यूड होगा तो आप कहेंगे कि ग्लास आधा भरा हुआ है। यदि आपका नेगेटिव एटीट्यूड होगा तो आप कहेंगे कि ग्लास आधा खाली है। तो यह क्या है कि पॉजिटिव स्पिन देने के बराबर है। मेरे पास में इतनी शक्ति है तो और ज्यादा शक्ति क्यों नहीं? इस तरह की टेंशन लेने की बजाय इस तरह से सोचिए कि इतनी शक्ति जो मुझे मिली है वह शक्ति मुझे मां जगदंबा ने ठाकुर ने माने स्वामी जी ने इसलिए दी है कि इस शक्ति से जो मुझे कार्य करना है वह कार्य मैं समाप्त कर लूं। इसके बाद में ही जैसे वह गाय का उदाहरण है। गाय को रस्सी से बांधा है तो रस्सी वाले दायरे में जितना घूम सकती है गाय वहां का घास उसने खा लिया तो फिर वह किसान आकर के रस्सी को और थोड़ा सा रिलीज करेगा और बड़ा दायरा गाय को खाने के लिए मिलेगा। तो वैसे ही यदि गाय वहां पर बैठी-बैठी यह सोचती रहती कि अच्छा मेरी रस मुझे जिस रस्सी से बांधा गया है वह तो इतनी छोटी है। मैं इतने छोटे से एरिया का ही घास खा पाऊंगी। इससे ज्यादा देखिए कि इतना विशाल मैदान है। इतना सारा घास है। वो मुझे नहीं मिलने वाला है। तो मैं क्या करूं? हाय रे मेरी किस्मत ही फूटी हुई है। ऐसा बोलकर के गाय यदि वहां पे बैठ जाती अपने नसीब को दोष देते तो वह बेचारी वहीं पे बैठी रहती। हो सकता है कि किसान उसकी रस्सी कभी भी लूज नहीं करेगा। तो बेटर है कि हमका हमारे पास में आज जो शक्ति है आध्यात्मिक शक्ति उस शक्ति का इस्तेमाल करके जो साधन भजन सेवा हमसे हो पाए वह कर लें और फिर देखेंगे कि यह जब ग्रेजुएट हो जाएंगे इस लेवल में तब कहीं जाकर के ठाकुर ही रस्सी को और रिलीज कर देंगे और नेक्स्ट लेवल पर हमको ले जाएंगे। तो इसीलिए यहां पर ठाकुर कहते हैं कि जो मेरे आत्मीय है उसमें से कोई अंश है तो कोई कला। इसका अर्थ इस तरह से नहीं लेना है कि इन लोगों में यह लिमिटेशन है। इसको इस अर्थ में लेना है कि जिसको जो कार्य करना था ठाकुर के मिशन में वह उस कार्य को करने के लिए जितनी क्षमता का अधिकारी था। उनके लिए जितनी क्षमता थी चाहिए थी आवश्यक थी उतनी क्षमता उनको दी गई है। जैसे कि शशि महाराज है शशि महाराज तो चेन्नई में इतना सारा कार्य किया। अभी स्वामी जी की इच्छा थी कि शशि महाराज आए लंदन में। लंदन आकर के वहां का जो विदेश का कार्य उस समय स्वामी जी लंदन में थे और वो ईटी स्टडी के साथ में वो संस्कृत टेक्स्ट का ट्रांसलेशन कर रहे थे। तो अभी उनका अमेरिका जाने का समय आया तो उन्होंने सोचा कि किसी एक गुरु भाई को बुला करके यहां पर रखें वो ईटी स्टडी को हेल्प करेगा संस्कृत ट्रांसलेशन करने में। तो पहले तो इच्छा थी शशि महाराज आए किंतु शशि महाराज को कोई एक स्किन डिसीज था तो स्वामी जी ने कहा कि नहीं यह गोरे लोग तो वैसे ही हम काले लोगों से घृणा करते हैं। ऊपर से इसको स्किन डिसीज है। तो बिल्कुल इसको तो लोग अछूत ही कर समझेंगे। तो बेटर है कि वह ना आए। तो ठीक है। चलिए शशि महाराज का विदेश जाना नहीं हुआ। किंतु फिर देखिए कि साउथ इंडिया में दक्षिण भारत में शशि महाराज ने जो कार्य किया है वह अद्भुत है। तो देखिए कि उनकी जो लिमिटेशन थी वो उसको लिमिटेशन नहीं समझ के इस तरह से समझना चाहिए कि विदेश में शशि महाराज जो कंट्रीब्यूशन कर पाते उससे कहीं गुना कंट्रीब्यूशन शशि महाराज ने दक्षिण भारत में किया है। तो जिसकी जो आवश्यकता है भगवान श्री रामकृष्ण देव के इस मिशन में जिसका जो रोल है जिसका जो पात्र है वो पात्र निभाने के लिए वो रोल अप्लाई करने के लिए आपको जो चाहिए शक्ति उतनी शक्ति सबको मिली है। इसके बाद

काली मंदिर का सुन्दर उद्यान पथ

में मास्टर महाशय लिखते हैं ठाकुर आबार पंचवटी दिके जते छन ठाकुर फिर से पंचवटी की ओर जा रहे हैं मास्टर शंगे आन आर के हो नाई मास्टर महाशय साथ में है और कोई नहीं है यह दो अकेले सोचे कि मास्टर महाशय का जो गुड फॉर्च्यून भी कितना है कि वही वह दक्षिणेश्वर के सुंदर गार्डन पथ जो है वो जो बागान का रास्ता एक और गंगा है एक और यहां पे वह पंचवटी है और वह जो रास्ता है सुंदर फूलों से सजाया हुआ और वह भी माने उस समय की शांति आज की तरह नहीं कि ट्रैफिक ना एयर पोल्यूशन ना नॉइस पोल्यूशन वगैरह सुंदर रमणीय जगह उसमें नारायण के साथ में स्वयं वो इस गार्डन पथ के ऊपर में चल रहे हैं और दोनों है अकेले कितना उनका यह गुड ग्रेट फॉर्च्यून है। मुझे ऐसा एक अनुभव प्रतिदिन होता था कि मेरा कितना ग्रेट गुड फॉर्च्यून है। यह मैं प्रतिदिन अनुभव करता था। जबकि मैं बेलूर मठ में था। बेलूर मठ में जब सुबह को मंगल आरती होती है उसके बाद में हम सभी लोग साधु ब्रह्मचारी वहीं पर मंदिर में ही बैठकर के जप ध्यान किया करते हैं। और मैं बैठता था वहां पे यदि आप बिलूर मठ का मेन टेंपल देखा होगा तो देखेंगे कि गंगा के किनारे गंगा की ओर दिशा में गंगा के सामने की दिशा में एक साइड दरवाजा है बाहर निकलने का। एक तो मेन टेंपल में प्रवेश करने का एक मुख्य दरवाजा तो है ही है किंतु दो दो है साइड दरवाजे हैं। साइड डोर है उसमें एक दरवाजा है गंगा की ओर ओपन होता है। तो वहां पे मैं एग्जैक्ट वहीं पे मैं बैठा रहता था दरवाजे के सामने ही और जैसे ही आप यदि अर्ली मॉर्निंग वहां पे गए होंगे तो आपने देखा होगा कि गंगा के सामने किनारे पे सूर्योदय होता है। वह पूर्व दिशा है। तो जैसे ही सूर्योदय होगा और उसकी प्रथम किरण यह दरवाजे में से प्रवेश करके मंदिर में प्रवेश करेगी उसी समय मैं वहां पर बाहर निकल कर के वह जो एक बड़ा एक चौगान जैसा है मंदिर के सामने वहां पर जाकर खड़े रह के सूर्यदेव को प्रणाम करता था और जितने और वो जो समय होता था अर्ली मॉर्निंग वहां पे तो सूर्योदय हो जाता है 5:30 ना की इसके आसपास में तो एकदम अर्ली मॉर्निंग का समय है इतना सुमधुर शांति है और उस समय तो भक्तों को भी प्रवेश नहीं है। भक्तों को प्रवेश आई थिंक 6:00 बजे के बाद में ना कि ऐसा कोई है। मंदिर में वही भक्त आ सकते हैं जो लोग हमारे गेस्ट हाउस में रहते हैं। तो वह इतना शांतिमय समय और फिर सिर्फ साधु ब्रह्मचारी जहां तक नजर जाएगी आपकी गंगा के किनारे पे साधु ब्रह्मचारी ही दिखेंगे। कोई इस मंदिर में कोई राजा मंदिर में राजा महाराज के मंदिर में प्रणाम करने के लिए जा रहा है तो कोई मां के मंदिर में और हो सकता है अपने नसीब अच्छे हैं तो रिवियर्ड प्रेसिडेंट महाराज हैं उनके भी दर्शन हो जाए। मैं जब उस समय था बेलूर मठ में तो आत्मस्थानंद जी महाराज श्रीमद स्वामी आत्मस्थानंद जी महाराज उस समय प्रेसिडेंट थे तो वो अर्ली मॉर्निंग को वो दर्शन करने के लिए निकलते थे तो वह सेवक भी उनके साथ में रहेंगे महाराज भी रहेंगे और महाराज और हम साधु ब्रह्मचारियों को पता चल जाएगा दूर से ही देख लेंगे कि महाराज आ रहे हैं तो जितने भी साधु होंगे वह सब क्या करेंगे उनको महाराज का रूटीन पता है तो मां के मंदिर के सामने वह जो घाट है वह बड़ा चौड़ा घाट है बड़ा म प्रशस्त घाट है तो वहां पर सब साधु खड़े हो जाएंगे और फिर महाराज जब वैसे सब उनको कभी डिस्टर्ब नहीं करना है जब महाराज प्रणाम करते हैं तो किंतु महाराज आखिरी में प्रणाम करते थे मां के मंदिर में तो जब मां के मंदिर में प्रणाम करके बाकी सब प्रणाम समाप्त करके मां के मंदिर में प्रणाम करके महाराज जी जब बाहर आएंगे तब साधु ब्रह्मचारी उनको प्रणाम करेंगे और महाराज भी उनको अपने पॉकेट में महाराज को भी पता है इन लोगों की ट्रिक क्या है सब तो अपने पॉकेट में चॉकलेट वगैरह रखा करते थे तो जैसे ही हम लोग प्रणाम करेंगे हमको एक-एक चॉकलेट अपने हाथ में देंगे। तो वि इज वेरी गुड। एक्चुअली महाराज को उनके कमरे में उनके जो प्रेसिडेंट क्वार्टर्स है प्रेसिडेंट महाराज क्वार्टर उसमें प्रणाम करना और वो जो मां के मंदिर के सामने अर्ली मॉर्निंग सूर्योदय हो रहा है उस समय प्रणाम करना। तो एक बड़ा ही एक म आनंद का वो समय था। तो उस समय एवरीडे मेरे मन में वह आता था कि कितने जन्म जन्मांतर के अच्छे कर्म किए हैं। तब आज कहीं जाकर के इस समय में बेलूर मठ में उपस्थित रहने का सद्भाग्य मुझे मिला है। तो यहां पे भी देखिए कि मास्टर महाशय ठाकुर के साथ में वही दक्षिणेश्वर के रास्ते पे अकेले जा रहे हैं पंचवटी की ओर। कितने जन्म जन्मांतर की सुकृति होंगी। या तो फिर कहेंगे कि ठाकुर के वह तो अंतर अंतरंग है ना आत्मीय है। ठाकुर ने खुद कहा है आत्मीय तो ठाकुर के आत्मीय होने से जन्म जन्मांतर में ठाकुर के साथ में आने का जन्म लेने का जो उनको एक मौका मिलता है तो यह यह सुकृति की वजह से यह सद्भाग्य उनके पास में आकर खड़ा हुआ है। अभी वह प्रश्न हुआ था ना एक दिन कि कौन सा बेटर है माने ठाकुर के साथ में जन्म ग्रहण करने का माने जितनी भी बार अवतार पृथ्वी पर आएंगे उतनी ही बार क्या ठाकुर के साथ में आकर के पृथ्वी पर जन्म ग्रहण करने का वो बेटर है ना कि फिर साधन भजन करके मुक्ति प्राप्त कर लेना बेटर है तो क्या है कि वो अपनी जो कैपेसिटी है या तो फिर अपनी ये जो अंडरस्टैंडिंग है उसके ऊपर में डिपेंड करता है। जैसे रंगनाथानंद जी को किसी ने पूछा था कि आपका आपका तो मुक्ति अवश्यभावी है। तो रंगनाथानंद जी कहते हैं नहीं मैं तो बार-बार जन्म ग्रहण करके यही रामकृष्ण मिशन में साधु होने के लिए आना चाहता हूं। तो आपकी ठाकुर के प्रति जो आपकी निष्ठा है वो ना कि आपकी मुक्ति की ओर निष्ठा है। मैं मुक्ति चाहता हूं कि ठाकुर चाहता हूं। यह दोनों रस्ते हैं। और ऐसा कोई कहेगा नहीं। एटलीस्ट अपने हिंदू धर्म में ऐसा कोई नहीं कहेगा कि यह ज्ञान का रास्ता बेटर है ना कि यह भक्ति का रास्ता बेटर है। अपने यहां पे जितने भी पथ है आध्यात्मिक पथ वो चाहे वह आपको निर्वाण की ओर ले जाए ना कि आपको निर्विकल्प समाधि की ओर ले जाए ना कि आपको जन्म जन्मांतर तक ठाकुर के आत्मीय बनकर के नारायण के आत्मीय बनकर के इसी नारायण के साथ में पृथ्वी पर बार-बार जन्म ग्रहण करना पड़े। इसलिए आप उनके आत्मीय होकर रहते हैं। तो वह आत्मीय होना यह बेटर है। निर्विकल्प समाधि बेटर है ना कि यह निर्वाण बेटर है। देयर इज नो सच फाइनल आंसर। जिसका जिस तरह का प्रकृति है उसके अनुसार वह अपना रास्ता सिलेलेक्ट करता है।

ठाकुर के अद्भुत दर्शन

ठाकुर सहास्य तहार सहित नाना कथा कहते छ। ठाकुर सहाय्य मास्टर महाशय के साथ में विभिन्न सब्जेक्ट्स के ऊपर में वार्तालाप कर रहे हैं। नाना कथा कहते छन विभिन्न बातें कर रहे हैं। अभी जो टॉपिक स्टार्ट होता है उसका टाइटल मास्टर महाशय ने दिया है। पूर्व कथा अद्भुत मूर्ति दर्शन बट गाछेर डाल। पूर्व कथा अर्थात कि ठाकुर के पूर्व जीवन की बातें जो ठाकुर खुद कहते हैं अद्भुत मूर्ति का दर्शन जिसके बारे में ठाकुर कहेंगे और वहां का जो वट वृक्ष है उसकी डाल के बारे में श्री रामकृष्ण मास्टर प्रति ठाकुर मास्टर के प्रति क्या कहते हैं देखो एक दिन देखी काली घोर थेके पंचवटी पर्यंत तो एक अद्भुत मूर्ति यह तुम्हारा विश्वास होए देखो मैंने एक दिन क्या देखा काली घर से लेकर के पंचवटी तक एक अद्भुत मूर्ति क्या तुमको इस बात पर विश्वास होता है मास्टर अब खोइया रही लेन मास्टर चुपचाप रह गए अभी क्या बोलेंगे इस तरह की जो एक अद्भुत मूर्ति जो कि काली घर से पंचवटी तक अभी इसका क्या अर्थ है पता नहीं पहले पहले मैं जब यह सब पढ़ता था तो मैंने सोचा था कि यह ठाकुर जो कहते हैं ना कि यह गौरांग का गौरांग के सांगोपांग यानी कि स अंग उपांग यह जो गौरांग के जो कीर्तन का दल है वह शायद ठाकुर ने देखा होगा। इसी के बारे में वह कह रहे हैं। वरना तो इस तरह से कैसे हो सकता है कि काली घाट से लेकर के पंचवटी तक एक अद्भुत मूर्ति दक्षिणेश्वर यदि आप गए होंगे तो देखा ही होगा। ये तो बड़ा लंबा डिस्टेंस है। इतने लंबे डिस्टेंस में इस तरह का कौन देवता एक सिंगल देवता इतना बड़ा होकर के दर्शन दे सकता है वो थोड़ा सा पता नहीं वी डू नॉट नो। तो उस समय में ऐसा अनुमान किया करता था कि वह जो गौरांग का जो कीर्तन दल है वह हो सकता है कि पंचवटी से चालू होकर के काली घाट वो जो मां काली का मंदिर है वहां तक वह विस्तृत हुआ होगा। ऐसा मेरा उस समय का अनुमान है। अभी आजकल मैं इस तरह के अनुमान नहीं करता हूं। कुछ भी हो सकता है। कोई एक ही देवी या देवता हो जो कि इतने बड़े हो कि वो काली काली मंदिर से पंचवटी तक के विस्तृत हुए हो या तो फिर यह कीर्तन का दल हो सकता है कुछ भी हो सकता है। इसीलिए मास्टर महाशय खुद ऐसा कोई स्पेककुलेशन नहीं करते। वो चुप होकर के रहे। देखिए हमने जो राजयोग है या ज्ञान योग स्वामी जी का इसका जो अभ्यास किया उसमें स्वामी जी हमको कहते हैं कि जब हम आध्यात्मिक चेतना का जागरण होता है या तो फिर हम आत्मदर्शन की ओर आगे बढ़ते हैं। आत्मदर्शन में जब स्थित हो जाते हैं तब यह समय और अवकाश और यह कोलिटी यानी कि कार्य कारण संबंध टाइम स्पेस एंड कोजालिटी समय अवकाश और यह कार्य कारण संबंध इससे परे हमारी चेतना चली जाती है। उसके बाद में इस विश्व में त्रिभुवन में तीनों लोक में तीनों समय में भूत वर्तमान भविष्य या ऐसा कुछ भी नहीं है जो कि हमारा मन ना देख पाए या ना समझ पाए पूरा विश्व पूरा जागतिक विश्व एक खुली किताब के सामने हमारे सामने स्पष्ट उद्भाषित हो उठता है। तो इस तरह से अति उच्च चेतना के अति उच्च शिखर पर आरूढ़ होकर के ठाकुर ने क्या देखा इसका क्या तात्पर्य है वह हम इसकी व्याख्या किस तरह से कर पाएंगे इसलिए मास्टर महाशय अवाक होकर के

दक्षिणेश्वर होगा भविष्य का महातीर्थ

रहे तिनी पंचवटी शाखा होते दुई एकटी पाता पॉकेट राखीते सेन उन्होंने क्या किया जैसे कि हम सामान्य लोगों के साथ में होता है कि जिस पंचवटी के नीचे में यह जो दर्शन हुआ वह तो समझ नहीं पाए किंतु पंचवटी की जो डाल है उसमें से जो दो एक पत्ते गिरे हुए थे उसको उठाकर के पॉकेट में रख लिए यह हमारी बुद्धि की दौड़ यहीं तक है श्री रामकृष्णम ए डाल पड़े गए छे देखे छो ए नीचे बोछताम यह डाल जो है यह ब्रांच जो है वह गिर गई है देख रहे हो तो मैं इसके नीचे में बैठता मास्टर आमी एटी कोची डाल भेंगे गए छ बाड़ी ते रखे दिए छ मैंने इसकी एक जो छोटी सी डाल है वह तोड़ करके मैं ले गया हूं मेरे घर में मैंने रख दी है श्री रामकृष्ण सहा से कैनो श्री रामकृष्ण सहा से पूछते हैं क्यों मास्टर देख ले आह्लाद होए देखकर के आहलाद होता है आनंद होता है शूके गले ए स्थान महातीर्थ होवे जब सब समाप्त हो जाएगा तब यह स्थान महातीर्थ हो जाएगा। देखिए मास्टर महाशय की दृष्टि वो जो ठाकुर कहते हैं ना कि किसी को अंश दिया है तो किसी को कला दी है तो इतनी तो शक्ति मास्टर महाशय के पास में नहीं है कि ठाकुर का यह जो अद्भुत दर्शन कि पंचवटी से काली मंदिर तक एक अद्भुत मूर्ति उसका क्या तात्पर्य उसका क्या फिलॉसोफिकल सिग्निफिकेंस वह तो वह नहीं समझ पाए किंतु उनमें इतनी तो अंतर्दृष्टि थी इतना तो भविष्य के प्रति उनकी की नजर थी कि जिस डाल के नीचे में जिस पंचवटी के नीचे में बैठकर के ठाकुर ने साधना की थी उसकी एक डाल टूटी हुई अपने घर ले गए हैं और रख दी है और देखकर के आनंद करते हैं और क्या कहते हैं कि जब सब समाप्त हो जाएगा सब चुके गले जब सब समाप्त हो जाएगा तब यह स्थान महातीर्थ हो जाएगा श्री रामकृष्ण सहाश की रकम तीर्थो की पेनेटो किस तरह का तीर्थ ठाकुर हंसते-हंसते पूछते हैं वह पानीहाटी की तरह अभी देखिए कि पानीहाटी एक महातीर्थ था। उसमें तो कोई प्रश्न ही नहीं। मास्टर महाशय इसका परिचय देंगे अभी इसके बाद में कि वहां पर महोत्सव होता है और ठाकुर खुद वहां पर जाते थे। ऑलमोस्ट एवरी ईयर और फिर उस महोत्सव में वह योगदान करते थे। कीर्तन करते थे। उदाम कीर्तन करते थे। और हमको यह भी पता है कि ठाकुर की यह जो आनंद पर्व जिसको हमने जिस पीरियड का ठाकुर के वो जो वो पीरियड का जीवन के जिस पीरियड का हमने नाम दिया है आनंद पर्व वो स्टार्ट होता है शोडशी पूजा से और उसका अंत आता है यही पानीहाटी के महोत्सव से। उसके बाद में ही ठाकुर को कैंसर हो जाता है और ठाकुर के जीवन का अंतिम पर्व प्रारंभ होता है। तो वह जो पानीहाटी वो इतना बड़ा महोत्सव क्षेत्र था तो ठाकुर पूछते हैं कि क्या वो पानीहाटी की तरह एक बड़ा महोत्सव हुआ किंतु देखिए कि उस समय इन लोगों ने सबसे जो बड़े महोत्सव देखे होंगे उसमें से पानीहाटी का एक होगा। आज हम रामकृष्ण संघ का जो व्याप देखते हैं। हमको पता है कि पानीहाटी का महोत्सव अभी आध्यात्मिक तुलना में एक ही जैसा होगा। किंतु जहां तक लोगों को आकर्षित करने की बात है रामकृष्ण संघ आज कितना विस्तृत हो गया है। ठाकुर की तिथि पूजा जिस तरह से पालन होती है बेलूर मठ में देखेंगे कि पब्लिक सेलिब्रेशन होता है या तो फिर यह जो पहली जनवरी का कल्पतरु उत्सव होता है। कितने लाखों लाखों नर नारी रामकृष्ण संघ के विभिन्न शाखा केंद्र में आते हैं। और सिर्फ रामकृष्ण मिशन में ही नहीं अपने-अपने घरों में जहां-जहां पे भक्त मंडलियां रहती है, वहां पे सब जगह पे ठाकुर का जन्मोत्सव, ठाकुर के जन्म के रिलेटेड ठाकुर के जीवन के रिलेटेड जितने भी उत्सव है, उसका जो पालन होता है, कितने लोग आते हैं, कितने धूमधाम से होता है। यानी कि पानीहाटी का महोत्सव तो इसके सामने कितना वो जहां तक लोगों की संख्या का सवाल है वो लोगों की संख्या पानी हाटी में कितनी कम थी किंतु देखिए कि भविष्य में इतना फैलेगा यह दोनों लोग समझते तो है जैसे भीतर में से किंतु मुंह से कहना नहीं चाहते मुंह से उसको व्यक्त नहीं करना चाहते इसलिए ठाकुर हंस के कहते हैं कि की रकम तीर्थ हो किस तरह का तीर्थ पानीहाटी की तरह फिर मास्टर महर्षि पानीहाटी का थोड़ा सा परिचय देते हैं। कहते हैं पेनेटी ते महा समारोह करिया राघव पंडितर महोत्सव होए पानीहाटी में महासमारोह पूर्वक राघव पंडित का महोत्सव होता है। ठाकुर श्री रामकृष्ण प्राय प्रति बस ए महोत्सव देखते गया थाकेन ओ संकीर्तन मध्य प्रेमंदे नृत्य करें जेनो श्री गौरांग भक्त काछे डाक शूनिया स्थिर थाकीते ना पारिया निजे आशिया संकीर्तन मध्य प्रेम मूर्ति दिखाईते छेन ठाकुर श्री रामकृष्ण लगभग प्रायः प्रत्येक साल प्रत्येक बत्सर इस महोत्सव को देखने के लिए जाते थे और संकीर्तन में संकी कीर्तन के मध्य में प्रेमानंद में नृत्य करते थे। जैसे कि श्री गौरांग महाप्रभु स्वयं भक्तों की पुकार सुनकर के स्थिर ना रह पाए और वह खुद आकर के संकीर्तन में जिन्होंने अपनी प्रेम मूर्ति दिखाई। इसी तरह से जैसे कि वह संकीर्तन वगैरह हो रहा है। गौरांग महाप्रभु को पुकार रहे हैं और गौरांग महाप्रभु यह भक्तों की पुकार सुन के रह नहीं पाए और श्री रामकृष्ण का देह धारण करके श्री रामकृष्ण का आवरण धारण करके वो इनके बीच में आए और अपनी प्रेम मूर्ति दिखाते नृत्य कीर्तन कर रहे हैं। तो यह परिच्छेद द्वितीय परिच्छेद यहां पर समाप्त होता है। इसके बाद आगे कल देखते हैं। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम

प्रश्न: हमारे संघ के महान साधु ठाकुर के साथ बार-बार जन्म लेना चाहते हैं।

कृष्णपणमस्तु जो स्वामी जी ने कहा था ना कि मैं बाहर से ज्ञान ज्ञानी हूं भीतर से पूरा भक्त हूं किंतु ठाकुर का कि ठाकुर बाहर से पूरे भक्त है किंतु भीतर से पूरे ज्ञानी है। यदि यह सनातन धर्म को स्वामी जी एक्सेप्ट नहीं करते। अह जैसा हमने कल डिस्कस किया था कि स्वामी जी ने पहले तो ठाकुर को एक्सेप्ट किया फिर अपने सनातन धर्म को एक्सेप्ट किया। वरना सनातन धर्म को एक्सेप्ट नहीं करने के लिए आर्गुमेंट बहुत सारी है। उस समय जो परिस्थिति थी भारत की हिंदू धर्म की जो सामाजिक रूढ़िच चुस्तता वगैरह तो इजीली वो सनातन धर्म को रिजेक्ट कर सकते थे। किंतु ऐसा नहीं करके खास करके यह जो वेदांत के सिद्धांतों को स्वामी जी ने एक्सेप्ट किया इससे यह कंट्रास्ट कहां खड़ा हुआ है पता है कि आज आप कैथोलिक चर्च को देखिए वे लोग कहते हैं कि जीसस की जो करुणा है वही हमारे लिए मुक्ति का एकमात्र माध्यम है। तो यदि हम लोग सनातन धर्म को नहीं फॉलो करते तो हम लोग यदि यह ठाकुर स्वामी जी है या तो अन्य गुरु भाई है या तो फिर यह जो अन्य अपने जो ग्रेट जो संत हुए हैं साधु हुए हैं उनको देखकर के हमारे मन में भी एक ऐसा बैठ जाता कि ठाकुर की करुणा के अलावा मुक्ति का और कोई उपाय नहीं है और मुक्ति की आवश्यकता ही नहीं है। हम लोग ठाकुर के साथ में ही जन्म जन्मांतर तक आएंगे। अभी कैथोलिक चर्च में वे लोग जन्म जन्मांतर नहीं मानते हैं। वे लोग कहते हैं कि यदि एक बार सेल्वेशन मिल गया देन वी विल बी लिविंग इन हेवन स्वर्ग में रहेंगे। और यहां पर भी यह ठाकुर लोक में ठाकुर के साथ में आना हमारा स्वर्ग पृथ्वी पर ही है। दक्षिणेश्वर यानी कि जितनी बार ठाकुर आते हैं उतनी बार यदि आने को मौका मिले तो हमारे लिए यह स्वर्ग है। तो किंतु अभी देखिए कि इस यह बात बहुत अच्छी तो लगती है। किंतु आज हम जब कैथोलिसिज्म को देखते हैं तो हमको लगता है कि उनका माइंडसेट बड़ा रिस्ट्रिक्टेड हो गया है। इस तरह की एक ही तरह के थिंकिंग से जबकि हिंदू धर्म और या तो फिर इवन विदिन आवर रामकृष्ण मिशन हमको जो हमारी साधन पद्धति इतनी विशाल लिबरल उदार हृदय क्यों लगती है क्योंकि हमने सिर्फ यह एक्सेप्ट नहीं किया कि मुक्ति नहीं चाहिए ठाकुर के साथ में ही हमारा जो स्वर्ग है वह पृथ्वी पर ठाकुर जब आए वह हमारा स्वर्ग है तो बार-बार ठाकुर के साथ में आएंगे। हमारे लिए सिर्फ यह एक मार्ग नहीं है। सनातन धर्म ने जो बाकी जितने भी मार्ग बताए हैं, वह सब हमारे लिए खुले हैं। तो यह कैथोलिक चर्च की तरह रामकृष्ण मिशन एक रिस्ट्रिक्टेड होकर के कभी नहीं रह जाएगा। जिसका जो इच्छा है वह उसकी इच्छा के अनुसार कोई किसी को मुक्ति चाहिए तो मुक्ति निर्वाण चाहिए तो निर्वाण अद्वैत वेदांत तो अद्वैत वेदांत द्वैत तो द्वैत सब रास्ते खुले हैं। सो सुनकर के बड़ा अच्छा लगता है कि ठाकुर के साथ में ही हम सब हर समय आएंगे। किंतु यहां तक ही हमारा सीमित नहीं है दायरा। वरना फिर वो एक तरह का फनेटिसिज्म हो जाता। जिस तरह से उन्होंने अपने धर्म को फैलाया कि अब जब तक हमारे मसीहा को नहीं स्वीकार करोगे तब तक तुम्हारी मुक्ति नहीं होगी। एक रिस्ट्रिक्टेड माइंडसेट जो 2000 साल के बाद में डेवलप हुआ है उन लोगों का हमारा भी ऐसा हो जाता। एक समय ऐसा आता कि ठाकुर के प्रति आपकी कितनी भक्ति है दिखाइए। वो जब तक आप प्रदर्शन नहीं करेंगे तब तक आप भक्त ठीक-ठीक साधु नहीं है। ठीक-ठीक साधक नहीं है। तो फिर एक छोटा सा एक ग्रुप बन करके रह जाता है जो कि सभी चीजों के ऊपर में अपना कंट्रोल बिठाता है और ठाकुर के नाम पे अपना पर्सनल एक ऑथॉरिटी चलाता है। वि इज जो कि हुआ है बार-बार इतिहास में। इसलिए स्वामी जी ने कहा ना कि भीतर से भक्त है किंतु बाहर से ज्ञानी है। बाहर से ज्ञान का आवरण उन्होंने पहन करके रखा है। वरना सेंट पीटर या सेंट पॉल की तरह वो कह सकते हैं कि भीतर में भी भक्त है बाहर में भी भक्त है। या नित्यानंद महाप्रभु है। नित्यानंद है जो कि महाप्रभु के संगीत है। अद्वैत गोस्वामी है। जितने भी डिसाइपल थे इस तरह से किसी अवतार के वो बाहर से भी भक्त थे। बिस्तर से भी भक्त थे। उन्होंने इस तरह का डिफरेंशिएशन नहीं किया। जबकि स्वामी जी का यह डिफरेंशिएशन बड़ा क्लियर था कि अपने को मारने के लिए सिर्फ सुई चाहिए किंतु दूसरों को मारने के लिए तलवार चाहिए। यानी कि यदि जगत को आपको मैसेज देना है तो आपको सनातन धर्म का ही मैसेज देना है। विदेश में जाकर के इवन स्वामी स्वामी जी के गुरु भाई वो मतलब यह हो गए थे कि क्यों तुमने ठाकुर का प्रचार नहीं किया? क्यों यह सब वेदांत की बातें कर रहे थे वहां पे। स्वामी जी कहेंगे कि मुझे यदि यह

प्रश्न: इसीलिए स्वामीजी ने मायावती आश्रम से ठाकुर की छवि हटा दी थी?

क्लेम पक्का रखना है कि मैं बाहर से ज्ञानी हूं तो मुझे माने कुछ तो चाहिए मुझे दिखाने के लिए कि जबकि मैं यह क्लेम कर पाऊं वरना तो आप मेरे ही जीवन प्रसंग को लेकर के मेरे ही क्लेम को ठुकराएंगे। स्वामी जी भले ही चाहे मुंह से बोल रहे हो मैं बाहर से ज्ञानी हूं किंतु जीवन का एक भी प्रसंग नहीं है वह दिखाता हूं कि वह ज्ञानी है बाहर से। वो क्लेम को प्रूव करने के लिए कुछ तो दिखाना पड़ेगा।

प्रश्न: कथामृत लिखने के लिए मास्टर महाशय को प्रूफरीडिंग, मुद्रण आदि में बहुत मेहनत करनी पड़ी होगी।

और देखिए ना वराह नगर मठ में तो यह संभव नहीं ही होता। स्वामी जी अमेरिका से वापस आए। इतना पैसा इतने डिवोटी को ले आए। रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। उसके बाद में वह उद्बोधन पत्रिका चालू की। तो वो जो त्रिगुणानंद त्रिगुणातिंद जी उद्बोधन के एडिटर थे। जो परिस्थिति थी उनकी कि अपने से ही टाइप सेटिंग करना है। अपने से ही प्रूफ करना है। अपने से ही वह वर्कर की तरह काम करना है। अपने से ही मैगज़ीन को डिस्ट्रीब्यूट करने के लिए जाना है। माने म खून के पसीने उनको निकल गए थे। म वराह नगर मठ में ऐसी परिस्थिति थी

प्रश्न: हमारे संघ के शुरुआती दिन हमारी बौद्धिक संपदा के निर्माण के दिन थे।

कि शशि महाराज को टीचर का नौकरी करना पड़ा था। वो टीचर की जॉब करके वो कहीं पैसा कमाते तब वराह नगर मठ चलता था। वह जो

प्रश्न: मास्टर महाशय साधु तो नहीं बन सके, लेकिन कथामृत लिखने में उनका योगदान साधु के योगदान के बराबर है।

मांडुक्य कारिका को कहते हैं ना श्रुति तुल्य तो श्रुति यानी कि वो उपनिषद जिसका कि और कोई मतलब यह नहीं है मतलब दे आर यूनिक इन देयर ओन वे मतलब म एवरेस्ट पे बैठे हुए हैं किंतु मांडूक्यकारिका है गौड पादाचार्य का जो कि श्रुति तुल्य माना जाता है तो इनको भी ये गुरु भाई तुल्य माना जाएगा भविष्य में यह जो मास्टर महाशय की तिथि पूजा मतलब उनका जन्म तिथि है नाग पंचमी तो ये पहली बार मैंने बेलूर मठ में देखा था कि बेलूर मठ में तो ऐसा कोई भी उत्सव होता है तो कुछ ना कुछ स्पेशल होता है। तो एक दिन कोई स्पेशल आ गया हम लोग मैं टीसी में था ना कि पीपीटीसी में भूल गया तो मैंने पूछा कि आज क्या है? आज तो कोई तिथि पूजा नहीं है वरना तो तिथि पूजा का दिन ऐसा होता है। बोला आज नाग पंचमी है ना। मैंने बोला नाग पंचमी तो ऐसा ऐसे तो हजार त्यौहार है हिंदूइज़्म में। हम थोड़ी ना सब मनाते हैं। बोला नहीं यह तो मास्टर महाशय की तिथि है ना जन्मतिथि है। मैंने कहा अच्छा कथामृत भवन हमको मिल गया है।

प्रश्न: ध्यान को बेहतर बनाने के बारे में हमें और बताइये।

यह जो आपने तीन तरह की यह जो डिफरेंट टाइप की यह जो कहा दुख यह इसको जैसे कहते हैं तीन तरह के दुख होते हैं जीवन में आध्यात्मिक आधिभौतिक और आधिदैविक आध्यात्मिक यानी कि उस तरह के दुख जो कि मेरे खुद के एक्शन से क्रियाकलाप से वह प्रकट होते हैं। आधि भौतिक यानी कि यह जो जगत है वह जगत हमको यह दुख देता है। यानी वो किसी भी तरह से हो रास्ते में चलते एक्सीडेंट हो गया हम गिर गए या किसी के साथ झगड़ा हो गया तो ये बाहर के जगत से जो हमको दुख मिलते हैं वो आधि भौतिक है और आध्या आधिदैविक है कि वो दैव घटनाएं इस तरह से होती है यह हमारा अपना नसीब कहो ना कि कुछ भी कहो जो कि बिल्कुल इस जगत से परे हैं इस तरह के दुख तो यह आध्यात्मिक आधिभौतिक आधिदैविक तीन तरह के दुख आते हैं और इसीलिए जब हम ओम शांति शांति शांति शांति कहते हैं। तो ये तीन तरह के दुखों की निवृत्ति हो इसके लिए हम शांति कहते हैं। अच्छा अभी जहां तक मेडिटेशन का बात है जब ध्यान का बात है। देखिए मैं जिस तरह से अपने खुद के माइंड को मैंने तैयार किया है। अ जिसको कि मैं एक कहता हूं मतलब मेडिटेशन करने के लिए ना जब ध्यान करने के लिए हमको ना कोई ना कोई एक मेथड को डेवलप करना है। व्हिच इज सबका अपना-अपना होगा। यह मेथड। लंबे समय तक यह हमको डेवलप करना है। तो इसको मैं कहता हूं कंस्ट्रक्ट। मेरा खुद का नाम है। सो एस अ कंस्ट्रक्ट इज समथिंग कि आप एक मेथड डेवलप करते हैं और इस मेथड के साथ में फॉर ए लॉन्ग टाइम आप इसको एक के बाद एक पॉइंट्स डेवलप करते जाते हैं। यह कैसा है पता है? जहां आप एक वीडियो गेम डिजाइन करते हैं। अभी इस वीडियो गेम के भीतर में आपको एक कैसल बनाना है। एक महल बनाना है। तो महल को आप लंबे समय तक सोचते जाएंगे कि उसका बाहर से ऐसा रहेगा। उसके भीतर का ब्लूप्रिंट यह रहेगा। इसका किचन इस तरह का रहेगा। डाइनिंग हॉल इस तरह का रहेगा। बैठक रूम इस तरह का रहेगा। लाइब्रेरी ऐसा रहेगा। इसको कि माइंड पैलेस या तो मेमोरी पैलेस ऐसा भी एक वेस्टर्न जो मेडिटेशन मेथड्स है उसमें इस तरह से कहते हैं। बेसिकली दिस इज ए मेंटल कंस्ट्रक्ट। यह मेंटल कंस्ट्रक्ट क्या है? कि अपने जितने भी साइकोलॉजिकल फिनोमिनास है, साइकोलॉजिकल पॉइंट है, उन सबके साथ में हम इस कंस्ट्रक्ट के एक ना एक पॉइंट को जोड़ देते हैं। फिर क्या होता है? हम लोगों को ध्यान करने में सबसे बड़ा प्रॉब्लम है डायग्नोसिस। अभी मैं ध्यान कर रहा हूं। एकाएक कुछ समय के बाद में ना मेरा मन एक ऐसी डायरेक्शन में चला गया। वो चाहे ग्रीफ हो ना कि चाहे रिग्रेट हो ना ही चाहे रेज हो। यह सब स्ट्रांग इमोशन है। पेज हो। यह सब स्ट्रांग इमोशन अपने माइंड को अपने रास्ते से भटका करके एक ऐसा दूसरी जगह पे ले जाएगा कि कुछ क्षण के लिए हमको पता ही नहीं चलेगा। यह जो मच्छर हमको काट के जो खून चूसता है उसके पीछे का पावर क्या है पता है? वह जो दंस जो होता है ना मच्छर का उसके भीतर में वह एनस्थेसिया होता है। यानी कि वो जैसे वो अभी कोई सुई मारेगा अपने हाथ में तो भाई सुई कितनी ही इंजेक्शन के लिए ब्लड निकालने के लिए जब इंजेक्शन मारेगा तो हमको कैसा दर्द होता है तो मच्छर भी वो जब वो अपना बिठाएगा दंश तो हमको तो दर्द होगा हमको पता चल जाएगा ना तो हम मच्छर को भगा देंगे तो तो मच्छर तो फिर इस तरह से मर जाएगा खून नहीं चूस पाएगा तो इवोल्यूशन ने मच्छर को क्या दिया है उसका जो दंश है उसमें थोड़ा सा एनस्थेसिया दे दिया है एनस्थेसिया वाला दंश हमको मारेगा आराम से खून चूसेगा। हमको पता भी नहीं चलेगा कि हमारा खून चूसा जा रहा है। कोई आकर के मित्र बोलेगा अरे तुम्हारे चेहरे पर मच्छर बैठा है। हम बोलेंगे अच्छा अरे ये पता ही नहीं था। तो क्या है कि यह एनस्थेसिया वाला दंश यह सब आकर के हम ध्यान कर रहे हैं। पता ही नहीं चलता कि यह सब आकर के हमारे मन को कहां से कहां ले गए। 10-15 मिनट के बाद में एकाएक मुझे लगा। अरे मैं क्या कर रहा हूं। यहां पे बैठा 10 मिनट से बैठा हूं। मुश्किल से 1 मिनट मैंने जब ध्यान किया है या मन को एकाग्र किया है। उसमें से 9 मिनट तो मेरा ऐसा ही चला गया। फिर मैं मन को खींच के लाता हूं। फिर एकाआध दो मिनट हुआ। फिर मन ऐसा भाग गया कहीं पे वो तो माने सबसे पहला तो प्रॉब्लम यह है कि यह सेल्फ अवेयरनेस कि मेरे साथ में क्या हो रहा है। बाद में तो मैं उसको ठीक करूंगा कि भाई यह उसको जो मन दौड़ा जा रहा है। योग की जितनी भी पद्धतियां है वह कहती है मन को एकाग्र करो। फिर पूछेगा कि अच्छा मन एकाग्र नहीं हो रहा है तो क्या करना है? तो फिर यह यह सब स्टेप है। इसका पालन करो। किंतु उससे भी एक फंडामेंटल क्वेश्चन है। मेरा मन एकाग्र नहीं हो रहा है और मुझे यह समझ में भी नहीं आ रहा है कि मेरा मन एकाग्र नहीं है। व्हाट टू डू इन दिस सिचुएशन? ना माने आप अपने पे ऊपर में सेल्फ डायग्नोसिस कोई भी डॉक्टर के पास जाएंगे। पहले होगा डायग्नोसिस उसके बाद में होगा ट्रीटमेंट। डायग्नोसिस ही नहीं हो पा रहा है। ट्रीटमेंट कहां से स्टार्ट होगा? सो यह सब मैं जब शुरू-शुर में सोचता था कि 10 मिनट बैठे हम लोग पीपीटीसी में थे तो हमको कंपलसरी एक घंटा बैठना होता था। वो मॉनिटर हमारे पीछे में बैठेगा। वो हमारे असिस्टेंट सेक्रेटरी महाराज उस समय सुहितानंद जी थे हमारे इंचार्ज तो एक लड़के को मॉनिटर बनाएंगे। फिर वह मॉनिटर हमारे पीछे में बैठेगा और देखेगा यदि कोई एक घंटे से पहले खड़ा होके पीपीटी ट्रेनिंग सेंटर में चला गया वो जाकर सुितानंद जी को कंप्लेन करेगा फिर सुितानंद जी उसको बुला के कहेंगे तुम अपने घर चले जाओ यहां पे रहने की जरूरत नहीं तो सब लोग डर के मारे बैठे रहते थे किंतु वो एक घंटा बैठना तो जबरदस्ती शरीर तो बैठा है किंतु मन पूरे जगत में घूम रहा है। सो हाउ टू सॉल्व दिस प्रॉब्लम? उस समय से मैंने ये कंस्ट्रक्ट यानी कि एक इस तरह का मॉडल तैयार करना कि जिसके साथ में ना हम अपने माइंड के जितने भी साइकोलॉजिकल पॉइंट है एक के बाद एक उसको कनेक्ट कर दें। तो क्या होगा कि अभी मैं थोड़ा सा कॉम्प्लिकेटेड है। मैंने एक पॉइंट ऐसा क्रिएट किया कि मेरा मन एकाग्र है तो मेरे मन में यह होगा। और मेरा मन यदि एकाग्र नहीं है तो इस तरह से रिएक्शन आना चाहिए। जैसे कि एक कंस्ट्रक्ट मैंने ऐसा बनाया है कि मेरा मन एकाग्र है तो वहां पर ईश्वर है। यहां पर मैं बैठा हुआ हूं और हम दोनों के बीच में यह जो एक विद्युत का एक प्रवाह बह रहा है। अब ऐसा मुझे मेहनत करके यह सिचुएशन खड़ी करनी पड़ेगी। अभी मान लीजिए कि उसका दूसरा पॉइंट है मेरा मन यदि एकाग्र नहीं हो रहा है तो क्या होगा? मेरा मन यदि एकाग्र है, तो क्या होगा? अह अब यह भी समझना है कि मन एकाग्र क्यों नहीं होता है। वह एकाग्र इसलिए नहीं होता है। यह जो तीन तरह के दुख है आध्यात्मिक, आदिभौतिक, आदिविक यह रेज या तो रिग्रेट या तो ग्रीफ यह आकर के हमारे मन को उसमें डिस्टरबेंस खड़ा करते हैं। बोल के मेरा मन एकाग्र नहीं हो पा रहा है। चलो इतना तो समझ लिया। इतना तो मैंने कर लिया। अभी इसके बाद का स्टेप क्या है? तो मैंने इस तरह से कंस्ट्रक्ट क्रिएट किया कि देखिए कि मेरे आसपास में जो भी सिचुएशन है उस सब सिचुएशन से मैं अपने मन को सेपरेट कर दे रहा हूं। उसके बाद में मेरे आसपास में वो जितने भी लोग जिन्होंने मुझे दुख दिया है या तो जिनके साथ में मेरा झगड़ा है उन सबको मैं क्षमा कर दे रहा हूं। और ऐसी कोई भी सिचुएशन जो कि मेरे भूतकाल में हुई है। अभी यहां पर बैठा हूं मैं बेलूर मठ में। उसके 20 साल पहले की कोई सिचुएशन क्योंकि मन को आप जैसे ही कार्यकर्ता बंद करेंगे तो भूतकाल में से सब भूत को निकालना शुरू करेगा भूत पिशाच को तो जो भी भूतकाल की सिचुएशन है उस सब से मैं ऊपर आ गया हूं बिकॉज़ ईश्वर के संतान यदि होते हैं तो ईश्वर के संतानों को यह सब छोटी-मोटी चीजों से कोई लेना देना नहीं होता है। उस समय मेरे लिए उसकाेंस था। आज मेरे लिए इसका कोईेंस नहीं है। यह सब करके अपने मन को यह जितने भी तीन तरह के दुख हैं उनसे सेपरेट करना है। किंतु अभी मैं इसको कंस्ट्रक्ट के साथ में कैसे पॉइंट करूंगा? मैपिंग कैसे करूंगा कि मैंने इस तरह से कंस्ट्रक्ट बनाया कि यदि देखिए कि यह जो ईश्वर का प्रकाश जो मेरे हृदय में आ रहा है तो साथ में ही मेरे हृदय में ईश्वर के साथ में यह जो रिलेशन है इसके साथ में ही मेरी यह जो पारिपार्श्विक अवस्था है इसके साथ में मेरा आश मैं उनको आशीर्वाद देता हूं या तो मैं उनको क्षमा करता हूं या तो इन सब से मैं अपने को डिसएसोसिएट कर देता हूं। यदि मैं ऐसा करता हूं तो मेरा जो हार्ट है ना इट विल बी लाइक अ डायमंड। तो डायमंड के ऊपर में सूर्य प्रकाश यदि आता है तो न्यूटन का आपने देखा होगा वह एक्सपेरिमेंट कि वह प्रिज्म के ऊपर में एक लाइट फेंकता है तो कैसा उसका वो पूरा सात रंग में वो बिखर जाता है तो वैसे ही मेरा हार्ट में जैसे कि डायमंड है और सूर्य ईश्वर के साथ में जब मैं ईश्वर के ऊपर में मन एकाग्र है आत्मन चिंतन में कर रहा हूं तो वह जो लाइट का प्रकाश है डायमंड पर गिरता है और डायमंड पूरा की झगमित हो जाता यानी कि मेरे चारों ओर प्रकाश फैल जाता है और यदि मेरा मन किसी कार्य में भटक रहा है। किसी पुरानी बातों में, किसी व्यक्ति के साथ में, कोई एक ऐसी सिचुएशन के साथ में तो यह डायमंड जो है जैसे कि कोयला हो गया है। अब जैसे कोयले पे प्रकाश गिरेगा तो कोई वो झगमगीत तो होगा नहीं। उससे चारों ओर लाइट तो फैलेगी नहीं। वो कोयला कोयले की तरह अंधकार ही फैलाएगा। यानी कि देखिए कि यह जो डायग्नोसिस फेज है उसको यदि आप इस कंस्ट्रक्ट के साथ में इतना एकाकार हो जाइए कि जब आप मेडिटेशन करते हैं जब ध्यान करते हैं तो आपका मन यदि एकाग्र है तो ऐसा फील होगा आपको कि ईश्वर के साथ में मेरा सीधा प्रकाश का संबंध है। हम दोनों के बीच में एक प्रकाश की लहर दौड़ रही है। वो लेजर जैसे फेंकते हैं ना वो एक सोर्स में से तो कैसा लेजर का बीम आता है। वैसे ईश्वर की ओर से उनकी करुणा उनके आशीर्वाद का एक किरण मेरे हृदय में आ रहा है और मेरे हृदय में डायमंड है। दैट इज कि मैंने आसपास की सभी सिचुएशन से अपने को सेपरेट कर दिया है। सभी को मैं अपना आशीर्वाद दे रहा हूं। यानी कि मैं प्रकाश से मैं प्रकाशित हो रहा हूं। दिस इज आइडियल सिचुएशन। और यदि मेरा मन यदि भटकता है तो इमीडिएटली यह डायमंड कोयले में परिवर्तित हो जाएगा। मेरे आसपास में जो प्रकाश है वह अंधेरे में परिणत हो जाएगा। तो यह इसको मैं कहता हूं अर्ली वार्निंग सिस्टम कि मैं कभी-कभी ऐसा मैंने देखा है इस तरह के कंस्ट्रक्ट क्रिएट करने के बाद में इसको इसके साथ में एकाकार हो जाने के बाद में कि भले ही पहले ऐसा होता था कि मेरा मन भटकता है तो समझ नहीं पाता था कि क्यों भटक रहा है कैसे जा रहा है किंतु जैसे ही मैंने इस तरह के कंस्ट्रक्ट के साथ में अपने को एकाकार किया तो जब यह प्रकाश जो मेरी चारों ओर फैल रहा है और जब अंधेरे में परिणत हो गया इमीडिएटली मुझे समझ समझ में आया कि अरे नहीं मेरा मन भटक रहा है। यानी कि देखिए कि दिस कंस्ट्रक्ट वांट्स मी इट सॉर्ट ऑफ वर्क्स लाइक अ डैशबोर्ड। मेरी जो स्टेटस है भीतर का वो एक कंस्ट्रक्ट मुझे दिखाता है। यदि मैं प्रकाश से घिरा हुआ हूं। यानी कि दोनों रिलेशन मेरा ईश्वर के साथ में रिलेशन वह भी ठीक चल रहा है। और जगत के साथ में जो रिलेशन है मेरा जगत को क्षमा कर दी। जगत से मैं अपने को डिसएसोसिएट कर दिया। जगत के साथ में मेरे कोई संपर्क छोड़ दिया। जितने भी लोग हैं मेरे दुश्मन हो, दोस्त हो, मित्र हो ना कि मेरे एनिमी हो सबको मैंने क्षमा कर दी। सबके प्रति मेरी करुणा है। तो माय रिलेशन विद दिस वर्ल्ड एंड माय रिलेशन विद द गॉड। यदि मैं मेरे चारों ओर प्रकाश फैल रहा है। दैट मींस कि यह दोनों रिलेशन करेक्ट चल रहे हैं। और जैसे ही मेरे चारों ओर अंधेरा फैल गया। दैट मींस कि या तो फिर वह जो ईश्वर की ओर से जो मेरा मेरी ओर प्रकाश आ रहा था उसमें कहीं ना कहीं वो गड़बड़ हो गई है। वह टूट गया है यानी कि मेरी एकाग्रता टूट गई है। या तो फिर मेरा मन इस संसार में घुस गया है फिर से। तो वो डायमंड की जगह कोयला हो गया है। तो आइदर और जगत के साथ में मेरा रिलेशन डिस्टर्ब हुआ है। ईश्वर के साथ में डिस्टर्ब हुआ है। मेरे चारों ओर अंधेरा फैल गया है। तो यह डायग्नोसिस मुझे यह कंस्ट्रक्ट दिखाता है। और दिस हैज़ रियली हैपेंड मेनी टाइम्स इट हैज़ हैपेंड कि वैसे मेरा मन कहां जा रहा है। मैं डायग्नोस या तो फिर डिटेक्ट नहीं कर पाता हूं। किंतु बिकॉज़ ऑफ दिस कंस्ट्रक्ट मैं इमीडिएटली समझ जाता हूं कि अरे नहीं लेट मी चेक कि क्या हो रहा है मेरे मन के भीतर में। सो दिस टाइप ऑफ डिवाइस दिस सॉर्ट ऑफ मेंटल एक्सरसाइज दैट वी विल हैव टू क्रिएट जो कि हमारे मन को एक अर्ली वार्निंग सिस्टम की तरह काम करें। एक स्टेटस या तो डैशबोर्ड की तरह काम करें। इमीडिएटली इमीडिएटली समझ में आ जाता है। म मेरा मन भटक रहा है वो नहीं समझ में आता। तो डायमंड का कोयला हो गया वह समझ में आ जाता है। दिस इज द ब्यूटी ऑफ़ दिस कंस्ट्रक्ट। ना आपको समय देना पड़ेगा। अब कंस्ट्रक्ट क्रिएट करने के लिए आपको समय देना पड़ेगा। आपको माने प्रैक्टिस करनी पड़ेगी। प्रैक्टिस मेक्स परफेक्ट। यू विल हैव टू प्रैक्टिस। एंड कंस्ट्रक्ट कैन बी एनीथिंग। मैंने बहुत सारे कंस्ट्रक्ट बनाए हैं। बहुत सारे हैं। सो एस पर माय मूड आई यूज़ देम। दिस इज़ ईजीएस्ट वन। दैट इज़ व्हाई आई टोल्ड अबाउट दिस। मतलब कोई-कोई बहुत कॉम्प्लिकेटेड है। कोई कोई बहुत कॉम्प्लेक्स है। किंतु जितना कॉम्प्लेक्स कंस्ट्रक्ट बनाएंगे ना उसका फायदा क्या होगा पता है? अपने माइंड के जितने भी स्टेटस है आप डैशबोर्ड आप देखिए कि सिंपल सिस्टम होगी उसका डैशबोर्ड बड़ा ही सिंपल होगा। कॉम्प्लेक्स सिस्टम होगी तो बहुत सारे डायल्स एंड बहुत सारे ये मीटर्स होंगे जो कि प्रत्येक स्टेट को आपको आपके नजर के सामने दिखाता है कि इसका क्या इस सब सिस्टम का क्या स्टेटस है? इस सब सिस्टम का क्या स्टेटस है। मतलब देयर आर सब सिस्टम्स विद इन दिस ग्रेटर सिस्टम। तो एव्री सब सिस्टम इज़ रिप्रेजेंटेड एज़ अ डायल। सो मैंने कुछ-कुछ कंस्ट्रक्ट इतने कॉम्प्लिकेटेड बनाया है कि इट गिव्स अ वेरी गुड आईडिया ऑफ व्हाट इज हैपनिंग इनसाइड मी और डायरेक्ट में जाकर के दिस इज़ लाइक अ हायर लेवल लैंग्वेज देखिए आप इंजीनियर हैं और डायरेक्ट बाइनरी लैंग्वेज में आप प्रोग्रामिंग करेंगे बहुत मुश्किल है जीरो ज़ीरो मतलब कंप्यूटर एक ही लैंग्वेज समझता है ज़ीरो वन की तो ज़ीरो वन में प्रोग्रामिंग करना इट्स ऑलमोस्ट इंपॉसिबल तो आजकल ये क्या है कि इंग्लिश लाइक लैंग्वेज लोग यूज़ करते हैं ये जो विजुअल बेसिक है या तो C C++ है वो उसमें में इंग्लिश की तरह ही कमांड जाता है कि कॉपी फाइल ए टू फाइल बी। तो, यह तो हम समझ सकते हैं कि 0 1 0 1 की जगह कॉपी ए टू कॉपी बी व्हिच इज़ ईज़ियर। और आजकल एआई आ गया है। एआई को यदि कहेंगे कि मेरे लिए एफ बना दो, सीधा-सीधी एआई आपके लिए एफ बना देगा। सो, एआई इज़ एन इंटरफ़ेस बिटवीन यू एंड कंप्यूटर। इज़ डायरेक्टली डीएलिंग विथ कंप्यूटर इन द लैंग्वेज ऑफ़ ज़ीरो एंड वन इज़ डिफिकल्ट। सो वी क्रिएट अ इंटरफ़ेस इन बिटवीन व्हिच अंडरस्टैंडिंग दिस इंटरफ़ेस इट्स ग्रेटर कंट्रोल ओवर दिस मशीन लेवल सिस्टम। तो डायरेक्टली अपने माइंड का डायग्नोसिस करना दिस इज़ समटाइ्स डिफिकल्ट। सो ऐसा एक कंस्ट्रक्ट बना दिया इंटरफ़ेस की तरह जिसको कि स्टडी करके हम समझ पाए कि भीतर में क्या हो रहा है। किंतु वो भीतर के साथ में कनेक्ट हो। फॉर दैट यू विल हैव टू वर्क सम टाइम। अदरवाइज़ क्या होगा कि भीतर के साथ में जो हो रहा है कंस्ट्रक्ट का या इंटरफ़ेस का इसके साथ में रिलेशन नहीं है तो हम समझ नहीं पाएंगे। दोनों के बीच में रिलेशन नहीं होगा तो गलत रीडिंग दिखाएगा व्हिच इज़ इवन बेड। सो वी हैव टू प्रैक्टिस। नो दैट इज़ अ ब्यूटी ऑफ़ दिस ना।

प्रश्न: क्या हीरा स्वतः ही कोयले में बदल जाता है या हमें इसे बदलना पड़ता है?

दैट इज़ अ ब्यूटी ऑफ़ इट। हां। यस यस यस। वह अलार्म बीप बीप करना शुरू कर देता है।

प्रश्न: इस कंस्ट्रक्ट का निर्माण बहुत कठिन प्रतीत होता है

किंतु देखिए यह बात आपको थोड़ा सा डिफिकल्ट लगता है। एक बार आपका एक हैंग आ जाएगा ना इसके ऊपर में तो आपको यह बहुत इजी लगने लगेगा। क्योंकि बिलीव मी कि दिस इज़ इज़ियर देन डीएलिंग विद द सब सिस्टम डायरेक्टली। ये मशीन लेवल कोडिंग जो है अपने ब्रेन का उसके साथ में डायरेक्ट डीएल करने से यह कंस्ट्रक्ट बना करके उसके थ्रू डीएल करना इट इज़ इज़ियर। बट देखिए कि दिस

Q: This seems beyond rationality

इज द दिस इज प्योर वेदांत। वेदांत कहता है कि जो पूरा जगत है ना विश्वम दर्पण दृश्यमान नगरी तुल्यम यह विश्व क्या है? तो दर्पण में जो दृश्यमान नगरी की तरह है। तो हमने भी अपने जगत अपने अंतर जगत में एक विश्व को खड़ा किया है। तो विश्व इस अंतर जगत में खड़े किए हुए कंस्ट्रक्ट के अलावा और कुछ नहीं है। बट ओनली थिंग इज़ दिस कंस्ट्रक्ट इज़ सो कॉम्प्लेक्स। इट इज़ वेरी डिफिकल्ट टू डीएल विथ इट। सो वी क्रिएट अ सिंपलर कंस्ट्रक्ट व्हिच डील्स विद मोर कॉम्प्लेक्स कंस्ट्रक्ट। फिर ये कांटे से कांटा निकाल देना। ये दोनों कांटे एक दूसरे को मार डालेंगे और आत्मन में स्थित

प्रश्न: हम आध्यात्मिक रूप से जितने अधिक परिपक्व होंगे, ठाकुर की सरल शिक्षाओं का उतना ही अधिक गहरा अर्थ हमें प्राप्त होता है.

हो जाएंगे। इसीलिए जो नए-नए साधक होते हैं ना उनको कहते हैं गीता मुखस्थ करो। तो मैं जब मैं तो रैशन माइंडसेट वाला मैं बहुत बार एक क्वेश्चन करता हूं। गीता मुखस्थ करने की क्या जरूरत है? समझने की जरूरत है। मुखस्ट क्यों करेंगे? किंतु अब यदि लग रहा है कि देखिए यदि मुखस कर दिया है तो उसके श्लोकों का अर्थ उस समय समझ में नहीं आया। किंतु यह जैसे-जैसे जगत के एक्सपीरियंस होते हैं ना वो फटाफट करके अच्छा वहां पे ऐसा पड़ा था। कृष्ण ऐसा कहते हैं इसके साथ में एग्जैक्ट मैच हो रहा है। मतलब वो एनलाइटनमेंट इट विल टेक यू एंटायर लाइफ टाइम टू अंडरस्टैंड। एक बार मुखस कर दो

प्रश्न: आपने जो कहा उसे समझना मुझे बहुत कठिन लगा।

किंतु। इसमें क्या है? देखिए थ्यरी इतना समझने में मुश्किल नहीं है। प्रैक्टिस थोड़ा डिफिकल्ट है। थ्योरी आप देखिए कि वेदांत कहता है कि यह जो पूरा जगत है ना अपने मन के भीतर में ही बना है। यह जो मेरे दुश्मन है या मेरे दोस्त है या जैसे मानो भाई ने कहा सिचुएशन कभी-कभी यह आदमी हमको दुख नहीं देता। सिचुएशन दुख देती है। तो कोई मैंने बहुत सारे लोगों से सुना है कि अच्छा उस समय मैंने ऐसा कार्य किया होता भूतकाल में तो कितना अच्छा होता। वो मैंने स्टेप मिस कर दिया। आज मैं दुखी हो रहा हूं। मैंने उस समय यह डिसीजन क्यों ले लिया? साइंस स्ट्रीम में जाने की बजाय कॉमर्स में क्यों आ गया? या तो कॉमर्स में आने की बजाय साइंस क्यों ले लिया स्कूल में? उसका परिणाम मैं आज तक भुगत रहा हूं। तो सिचुएशन हो ना कि मनुष्य हो दुख देने वाले जो जो भी जगत में है वो जगत इटसेल्फ हमारे मन के भीतर में है। वेदांत कहता है मन के बाहर जगत है ही नहीं। जगत इटसेल्फ इज अ कंस्ट्रक्ट। तो यदि जगत कंस्ट्रक्ट है और जगत के जो दुख मुझे मिल रहे हैं वह इस तरह से मुझे मिल रहे हैं जब ध्यान करने के समय इस तरह से मेरे मन को वो भ्रमित कर दे रहे हैं कि मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि क्या हो रहा है तो जगत के ऊपर में दूसरा जगत खड़ा करो छोटा सा जगत किंतु यह जगत हमने खड़ा किया है वो जगत खड़ा करना हमारे हाथ में नहीं था यह जगत खड़ा करना हमारे हाथ में है तो इस जगत को काटने के लिए दूसरा जगत खड़ा करो जो कि मैंने बनाया है और फिर उसके साथ में ये दोनों जगत लड़ते रहेंगे। मैं अपना ठाकुर का नाम लेता रहूंगा। सो थ्यरी इन थ्यरी दिस इज सिंपल। किंतु जैसा आपने कहा कि प्रैक्टिस रिक्वायर्स सम टाइम। और यदि आपको लगेगा ऐसा प्रश्न हो सकता है कि अच्छा मैं ईश्वर चिंतन करने की बजाय यह सब करने में अपना क्यों टाइम बिगाड़ू? तो इट्स अ वैलिड क्वेश्चन। किंतु क्या है पता है? देखिए मेरा 20 साल का एक्सपीरियंस है इस संघ में। ईश्वर चिंतन करना अच्छी बात है। सहज से हो सकता है किंतु इसको टिका के रखना मुश्किल है। जो कि मेरा अभी तक का एक्सपीरियंस है। मैं एक बार डिटरमिनेशन करके बैठूं कि हां आज मुझे इतना जप करना है। 10 1000 जप एटलीस्ट मुझे कर लेना है। तो मेरे डिटरमिनेशन करके मैं बैठा हूं तो 200300 तो मैं आराम से खींच लूंगा। वो कोई बड़ी बात नहीं है। प्रॉब्लम स्टार्ट होगा 10 मिनट के बाद में, 15 मिनट के बाद में, धीरे-धीरे करके मेरा डिटरमिनेशन स्लो होता जाएगा और मेरा मन भटकता जाएगा। उस समय आपको यह सब कंस्ट्रक्ट चाहिए कि मेरे मन को जगत से हटा करके सिर्फ ईश्वर में बनाए रखें। यानी कि ईश्वर चिंतन करने के लिए आपको दो स्किल चाहिए। एक तो ईश्वर में मन परो के रखना है। वह एक शक्ति चाहिए। दूसरा कि जगत जो आपको खींच रहा है उससे अपने मन को खींच करके वापस ईश्वर में ले आना वो दूसरा स्किल चाहिए दो स्किल चाहिए जो मेरा एक अनुभव जा रहा है आजकल का उसके अनुसार तो यदि यह कंस्ट्रक्ट उसमें आप थोड़ा सा समय देते हैं तो देखेंगे कि भविष्य में आप लंबे टाइम तक बैठ पाएंगे प्रैक्टिस करने से होगा धीरे-धीरे प्रैक्टिस करने से होगा दीज़ आर नॉट इजी सॉलशंस एटलीस्ट देखिए मैं बहुत बार कहता हूं कि यहां पे कोई इजी सॉल्यूशन नहीं है। इसका यह अर्थ नहीं कि रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य में इजी सॉल्यूशन नहीं है। एटलीस्ट मुझे नहीं मिला है।