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Sri Ramakrishna Kathamrita ·

श्रीरामकृष्ण कथामृत || 15 Dec 1883 - श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ दक्षिणेश्वर में || 27 Aug 2025

प्रार्थना

ओम स्थापकाय धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः आज गणेश चतुर्थी का शुभ दिन विघ्न हर्ता प्रभु को सबके कल्याण के लिए प्रार्थना और ईश्वर की कृपा हम उन सब पर बनी रहे। मैंने सोचा था आज सुबह से ही मेरे पास में दो-तीन मैसेज आ गए कि आज गणेश चतुर्थी है। हम क्लास में नहीं आ पाएंगे। तो पहले तो मैंने सोचा कि क्लास करें ना करें। किंतु फिर मैंने सोचा चलिए विघ्न हर्ता प्रभु का दिन है आज। तो क्यों नहीं क्लास करेंगे? उनका ठाकुर का नाम लेंगे जितना भी हो सके हमारे से ईश्वर का नाम लेने में ईश्वर की वाणी की चर्चा करने में इन सब में और क्या है तो कल हमने जो डिस्कशन किया था कि ठाकुर राखाल के साथ में बात कर रहे थे राखाल और मास्टर महाशय कि किस तरह से राखाल एक किताब पढ़ रहा है भविष्य के राजा महाराज स्वामी ब्रह्मानंद स्माइल बोलकर के एक ऑथर है। उसकी किताब है सेल्फ हेल्थ। तो ठाकुर ने फिर मास्टर महाशय को पूछा कि इसमें क्या लिखा है? तो मास्टर महाशय कहते हैं निष्काम कर्म करने के बारे में किताब में बात की गई है। फला फल की आकांक्षा न करके कर्तव्य कर्म करना इसके बारे में है। तो अभी क्या है यहां पर पता है यह जो फल की

कर्म कर्तव्य है या पूजा?

आकांक्षा न करके कर्तव्य कर्म करना यह एक यूरोपियन कांसेप्ट है। कांसेप्ट ऑफ ड्यूटी कि आपका जो ड्यूटी है उसको आपको निर्वाह करना है। अपने यहां पे किंतु हालांकि शब्द जैसे-वैसे एक ही जैसे दिखते हैं इसका अर्थ किंतु गीता का जो कर्म योग है उसका अर्थ काफी अलग है। इनफैक्ट मैं तो कहूंगा कि बिल्कुल ही अलग है। हम लोग फल की आकांक्षा नहीं करते ऐसा नहीं। हम लोग जैसे कि फल को ईश्वर को समर्पित कर देते हैं। ईश्वर की खुशी के लिए ईश्वर की आज्ञा को अपने सर पर धारण करके हम सब कार्य करते हैं। यानी कि हम लोग जब यह कहते हैं कर्मण्यवाही अधिकारस्ते मा फलेशु कदाचनम कर्म के ऊपर में तुम्हारा अधिकार है। नहीं के फल के ऊपर में तो यहां पे यह यूरोपियन कांसेप्ट की तरह नहीं कि आपका एक ड्यूटी है तो ड्यूटी का निर्वाह करो और यही मेरा एक जैसे क्षत्रिय धर्म है क्षत्रिय धर्म कहता है कि दुश्मनों के साथ में युद्ध करना है। तो यहां पर भी एक ऐसे धर्म की तरह ले लिया है कि संसार में आपका जो पोजीशन है उस पोजीशन के रिलेटेड जो ड्यूटी है उसका निर्वाह करना है। किंतु गीता में इस तरह से धर्म या ड्यूटी के रूप में कर्म योग को नहीं बताया गया है। वहां पर कर्म योग का अर्थ है फल को ईश्वर को समर्पित कर देना है। ईश्वर की खुशी के लिए ईश्वर की आज्ञा के अनुसार हमको कार्य करना है। जैसे भगवान कृष्ण कहते हैं कि निमित्त मात्रम भवसव्य साच यह मेरे ही द्वारा इन लोगों की हत्या हो चुकी है। तुमको तो सिर्फ निमित्त बनना है। तो यह जो डिफरेंस है, वह हमको थोड़ा सा ख्याल रखना है। जब यहां पर इस किताब के बारे में लिखा गया है। स्वामी जी के पास

स्वामी विवेकानंद: कर्तव्य (ड्यूटी) तपते सूर्य के समान जला देने वाली है

में एक लड़का आता था। वो उनका मित्र ही था। यह कॉलेज के दिनों की ही बात है। तो यह लड़का स्वामी जी का मित्र था। तो अभी एक दिन आया तो स्वामी जी एकाएक वैराग्य और यह ईश्वर के प्रति समर्पण यह भाव भीतर में से जो प्रकट होता है यह सब बातें करने लगे। तो यह लड़का थोड़ा सा अनकंफर्टेबल हो गया। सांसारिक है तो सांसारिक लोगों को क्या है? इस तरह से ईश्वर की बात होती है, भाव की बात होती है तो उनको थोड़ा सा डर लग जाता है। यही ऐसी ही एक और कहानी है कि स्वामी जी उस समय दक्षिणेश्वर में ठाकुर थे। ठाकुर के रहते-रहते ही आई थिंक यह कहानी है कि स्वामी जी और मोस्ट प्रोबेबबली उनके साथ में अखंडानंद जी थे। उस समय के गंगाधर महाराज गंजेस स्वामी जी की लैंग्वेज में। तो यह दोनों एक डिवोटी के वहां पर गए और फिर उसने कहा होगा कि आप कुछ गीत वगैरह भजन वगैरह गाइए तो स्वामी जी गान करने लगे तो गोपी का भाव से मधुर भाव से गीत गाने लगे तो यह यह था हाउसहल्डर जो भक्त वो थोड़ा सा अपसेट हो गया। वो कहता है मैं यहां पर बीवी बच्चों को लेकर के रह रहा हूं। आप इस तरह के भाव के गीत मत गाइए। यह गोपी का भाव, मधुर भाव वगैरह तो एक्चुअली क्या है सांसारिक लोगों को इस तरह से उच्च भाव की बात होती है। उनको थोड़ा सा ऐसा लग जाता है कि जैसे कि हमारे ऊपर में यह पूरी कमेंट्री हो रही है। जैसे कि हमको दिखाने के लिए यह लोग कह रहे हैं कि मेरे भीतर में वैराग्य है, ईश्वर के प्रति प्रेम है, भाव है किंतु तुम्हारे भीतर में नहीं है। तो इस तरह का कंपैरिजन वह अपने सर पर ले लेते हैं। तो वह थोड़े अपसेट हो जाते हैं। तो यह स्वामी जी का मित्र भी नरेंद्र का मित्र उसका साथ में वार्तालाप कर रहा है और स्वामी जी इस तरह से उच्च भाव की बात कर रहा है तो यह लड़का कहता है मित्र कहता है कि अच्छा मैं जा रहा हूं मुझे नौकरी है मेरा ड्यूटी है मैं ड्यूटी पर जा रहा हूं तो फिर स्वामी जी थोड़े से नाराज होकर के कहते हैं कि यह जो कर्तव्य मार्तंड अर्थात कि यह ड्यूटी रूपी जो मार्तंड अर्थात कि मध्याहन में तपता हुआ सूर्य ये ड्यूटी का यह जो यह है क्रूरता या तो कहेंगे कि ड्यूटी का जो बोझा है तुम्हारे सर पे इसी ने तुमको मार दिया है। यह ड्यूटी बोलकर के कुछ होता नहीं है। सब कुछ जैसे कि ईश्वर को समर्पित करना होता है। मैं यह कार्य कर रहा हूं क्योंकि यह मेरा ड्यूटी है। भले ही चाहे उससे मुझे कुछ ना मिलता हो। भले ही चाहे पर्सनल कुछ बेनिफिट ना होता हो। यह भाव अच्छा तो बड़ा लगता है किंतु यह यूरोपीय भाव है। हमारा भाव नहीं है। हमारा भाव है कि यदि मैं मुझे कुछ बेनिफिट नहीं भी होता। इसके बावजूद मैं कुछ कर रहा हूं तो मैं इसलिए नहीं कर रहा कि वह मेरा ड्यूटी है। मैं इसलिए कर रहा हूं कि ईश्वर के प्रति मेरी शरणागति है। अभी आप कहेंगे

भगवान कृष्ण का कर्म का सिद्धांत और हिटलर के कर्म के सिद्धांत में फर्क क्या है?

कि उसमें डिफरेंस क्या है? ऊपर ऊपर से यदि आप देखेंगे उपलक दृष्टि से कैजुअली देखेंगे तो वैसा कोई डिफरेंस नहीं दिखेगा। किंतु थोड़ा सा डीप में जाएंगे तो डिफरेंस दिखेगा। जैसे कि हमने न्यूरेंबर्ग ट्रायल के बारे में एक बार बात की थी। ये न्यूरेंबर्ग ट्रायल क्या है? जब हिटलर की हार हुई ये नादजी पार्टी के जितने भी हाई ऑफिशियल्स थे जनरल्स थे उनकी आर्मी के थर्ड रेक के उनको पकड़ कर के न्यूरेमबर्ग में लाया गया और एक इंटरनेशनल कोर्ट बिठाई गई जर्मन फ्रेंच ब्रिटिश और अमेरिकन लोगों की और फिर इनको प्रश्न किया गया कि ये जो जूस के ऊपर में यहूदियों के ऊपर में आपने जो अत्याचार किए तो आपने ऐसा क्यों किया। एक मनुष्य की एक सेंसिटिविटी तो होती है। किसी के ऊपर में क्रूर मेडिकल एक्सपेरिमेंट करना कि कंसंट्रेशन कैंप में डाल देना। गेस्ट चेंबर में लाखों लाखों को भेज देना। यानी कि यह तो एक क्रूरता की तो एक सीमा होती है ना। मुझे गुस्सा आ गया। किसी को मैंने मारपीट कर दी। गुस्से में मैंने किसी का मर्डर कर दिया। यह तो फिर भी एक पैशनेट क्राइम के रूप में हो जाता है। किंतु कोल्ड ब्लडेड लाखों लाखों लोगों की हत्या करनी यह मानवीय क्राइम ऑफ पेज नहीं है। यह तो पैशाचिक कृत्य है। तो इस तरह का पैशाचिक कृत्य आपने क्यों किया? तो सभी का एक ही उत्तर है कि वी वेर डूइंग आवर ड्यूटी। हमको बोला गया था हाई कमांड की ओर से हिटलर ने ऑर्डर दिया था हमारा जो यह जनरल हेड क्वार्टर है आर्मी का वहां से ऑर्डर आया था इसलिए हम यह सब कर रहे थे तो यह उत्तर था अभी यह वहां उस समय के साइकेट्रिस्ट आज के भी यह साइकोलॉजिस्ट यह उत्तर का काफी अध्ययन कर रहे हैं कि एक सोसाइटी को किस हद से मोरल अधः पतन होता है। एक एथिकल किस गड्ढे में यह लोग जाकर के गिरेंगे, तब यह लोग ड्यूटी के नाम पे इस तरह का नुसंसह अत्याचार करेंगे। पाशवीय अत्याचार करेंगे। तो वो एक देखने वाली बात है कि नाजिस जर्मनी इज अ क्लासिक केस ऑफ ड्यूटी रन वाइल्ड। कांसेप्ट ऑफ ड्यूटी रन वाइल्ड। अभी देखिए कि इसके साथ में आप हमारे यहां पे भी कृष्ण भगवान अर्जुन को युद्ध क्षेत्र में युद्ध करने को कहते हैं। किंतु जो युद्ध होता है वह युद्ध के नियमों की सीमाओं के भीतर में बद्ध होकर के होता है। आपको यह स्त्री है, बच्चे हैं उनके ऊपर में अत्याचार नहीं करना है। जो शत्रु पकड़ लिए जाते हैं जिसको आजकल की लैंग्वेज में प्रिजनर ऑफ वॉर कहते हैं। पीओ डब्ल्यू उनको टॉर्चर नहीं करना है। एक नीति नियम के साथ में युद्ध करना है। हालांकि हमको पता है कि भगवान कृष्ण ने इस नीति नियमों का भंग भी जथेष्ठ किया था। किंतु फिर ऐसा नहीं है कि यह एक देखिए वह नाजी पार्टी का जो अत्याचार था यहूदियों के ऊपर में या तो फिर प्रिजनर्स ऑफ वॉर के ऊपर में या तो फिर जिस टेरिटरी को उन्होंने जीत लिया सोवियत यूनियन में वहां पर जो जनरल आम आदमी है सिटीजंस है उन लोगों के ऊपर में जो पाशवीय अत्याचार किया था। यह सब तो आपको गीता में नहीं देखने को मिलेगा। भगवान कृष्ण कभी भी आपको यह नहीं कहेंगे कि बिना मतलब एक व्यक्ति को टॉर्चर कीजिए। धर्म और अधर्म का युद्ध होता है तो धर्म को अधर्म के ऊपर में विजय प्राप्त करनी है। यहां तक तो सब कुछ ठीक है। किंतु एक बार यह प्रिजनर्स ऑफ वॉर है या तो फिर कौरवों की पत्नियां या तो उनके बच्चे हैं या तो फिर एक बार कौरवों के राज्य पे उनका आ गया कंट्रोल। तो वहां पर कौरवों के जो असिस्टेंट थे, एसोसिएट थे, उनके ऊपर में यह टॉर्चर वगैरह करना यह सब तो भगवान कृष्ण हमको कभी नहीं कहेंगे। यानी कि ईश्वर को कर्म फल समर्पित करके कर्म करना और यह नाजी पार्टी का था कि यह ड्यूटी है बोलकर के मैं यह कर रहा हूं। ड्यूटी है। वहां से आदेश हुआ है कि इतने यहूदी इस शहर में से बंदी बना लो। उनको गैस चेंबर में डाल दो। तो वहां से 1 लाख यहूदियों को पकड़ लिया और फिर इनको गेस्ट चेंबर में डाल दिया। उसमें मुझे कोई कॉन्शियस जो है मेरी यह मैं मुझे किसी भी तरह से अफेक्ट नहीं कर रही है। भीतर में से थोड़ा सा भी रेबेलियन नहीं हो रहा है कि भाई मैं यह जो कर रहा हूं यह क्या धर्म के सम्मत है कि नहीं। यह मानवता रूपी तो एक धर्म होता है। भले ही चाहे क्रिश्चियन क्रिश्चियनिटी, इस्लाम या हिंदूइज़्म कोई भी धर्म को आप अस्वीकार कर दीजिए। तो मानवता रूपी तो एक धर्म होता है। तो उसके अनुसार यह सब ठीक हो रहा है कि नहीं? ऐसा कॉन्शियस किसी का भी जागृत हुआ हो और किसी ने इसका विरोध किया हो ऐसा कहीं पर डॉक्यूमेंटेशन ही नहीं है। बात बादबाद में बहुत सारे लोग बोलते थे कि हम लोग हिटलर के यह जो पॉलिसीज है उसके साथ में हमारा एग्रीमेंट नहीं था। तो एग्रीमेंट नहीं था। तो जब हत्याकांड हो रहा था उसी समय तो बोलना चाहिए था। अब आप लोग हार गए हैं। विजेता लोग आ गए हैं आपके सर पे और आप बोल रहे हैं कि उसकी पॉलिसी के साथ मेरा एग्रीमेंट नहीं था। तो यह बात का तो कोई अर्थ नहीं है। यह जो अन्याय का सामना ना करना और अन्याय का साथ देना यह दोनों एक ही है। ये बहुत बार कहते हैं ना कि वाइस मैन जो होता है ना उसका साइलेंस जो होता है वो दुष्ट लोगों के कर्म के बराबर ही है। दुष्ट लोग दूसरों पर अत्याचार करेंगे। और यह जो वाइस मैन है चुपचाप बैठकर के देखते रहेंगे तो वे लोग अधर्म का इतना ही सहभागी होंगे। क्लासिकल केस कि वह कौरवों की सभा में द्रौपदी का ये जो चीर हरण हो रहा था तो यह भीष्म पितामह वगैरह चुपचाप बैठे रहे थे। उस समय किसी ने विरोध नहीं किया। तो भीष्म पितामह का पूरा जीवन देखिए कि धर्म के अनुसार बिताया है। किंतु एक जो क्रिटिकल समय पर विरोध ना करना इसी ने उनको अधर्म के कैंप में जाकर डाल दिया। यानी कि मैं अधर्म का साथ कब दे रहा हूं। सिर्फ मैं अधर्म अधार्मिक कार्य करके ही नहीं किंतु अधर्म का विरोध नहीं करता हूं। तब भी तो मैं अधर्म का साथ दे रहा हूं। यानी कि यह जो कर्म का कांसेप्ट है वह भारत में बड़ा डिफरेंट है। गीता के अनुसार बड़ा डिफरेंट है। और यह जो विदेशी कांसेप्ट है कर्म का या तो फिर ड्यूटी का वह बड़ा डिफरेंट है।

यदि हमारे नेता हमें अधार्मिक कार्य करने का आदेश देते है, तो क्या हमें उनके आदेश का पालन करना चाहिए या नहीं?

सो इसीलिए यहां पे जब मास्टर महाशय कहते हैं कि फल की आकांक्षा न करके कर्तव्य कर्म करना तो ठाकुर उसका उसके ऊपर में कोई रिप्लाई नहीं देते हैं। कल हमने इसका एक दूसरी तरह से अर्थ गठन किया था। कल हमने यह देखा था कि ठाकुर शायद यह जो स्वामी जी का शिव ज्ञान है जीव सेवा का जो कांसेप्ट है उसको जैसे कि एक तरह से नो कमेंट बोलकर के खड़े रह जाते हैं। यानी कि उसके ऊपर में मुझे कुछ बोलना नहीं है। अभी आपको जो इंटरप्रिटेशन बिठाना है बिठाइए। आइदर ठाकुर की इच्छा नहीं यह सब हो या तो फिर ठाकुर साइलेंटली इसको एंडोर्स कर रहे हैं। वो मौनम सम्मति लक्षणम कहता है ना कि मौन है बहुत बार सम्मति का लक्षण है। यही भीष्म पितामह मौन रह गए तो उसका अर्थ तो वही हुआ कि द्रोपदी के चिरहरण में उनकी सम्मति थी। यह नाजी पार्टी के जो अत्याचार चल रहे थे और ज्यादातर जर्मन तो मौन ही थे अर्थात कि मौन रूप से सम्मति दिखा रहे हैं। तो यहां पर इस तरह से अर्थ गटन वो सब कल किए थे। आज हम इस तरह से भी देखते हैं कि यह जो कर्म योग यहां तो फिर कहेंगे निष्काम कर्म यहां पर जो लिखा गया है और अपना गीता का जो कर्म योग है उसमें फंडामेंटली डिफरेंट है डिफरेंस है। भारत में कर्म योग हमेशा धर्म के ही ऊपर में आधारित है। भले ही चाहे देखिए रामकृष्ण मिशन में जब मैं पहली पहली बार आया था मैं मेरा पहला ही मुलाकात देखिए यह सब कैसे वर्कआउट प्ले माने किस तरह से यह होता है माने प्ले आउट होता है ये हिस्ट्री वगैरह पढ़ के आया था मैं नाजी पार्टी का यह सब फिर मैंने यूरोपियन हिस्ट्री काफी पढ़ा था इंडियन हिस्ट्री भी थोड़ा बहुत पढ़ लिया था अपने इंडिपेंडेंस फ्रीडम मूवमेंट के बारे में वगैरह-वगैरह और बेलूर मठ में मैं आया जॉइ करने के लिए मैं वार्तालाप हो रहा है। पहले ही दिन बिल्कुल फर्स्ट डिस्कशन उनके साथ में तो उन्होंने ऑलमोस्ट पहला या दूसरा ही सेकंड स्टेटमेंट ऐसा किया वी आर द ब्लाइंड फॉलोअर्स ऑफ स्वामी विवेकानंद। तो जैसे ही उन्होंने यह बात कही वैसे ही मेरे माइंड में यह पूरा यह जो नाजी पार्टी का था वह फ्लैश हो गया। मैंने कहा यह किस तरह के भयानक फेनेटिक सेक्ट में मैं आ गया हूं। देखिए अ इंक्विजिशन एक चर्च के ऊपर में एक काला धब्बा इंक्विजिशन का क्या अर्थ है? उस समय खास करके स्पेन वगैरह में कि कुछ वहां के जो सत्ताधिकारी थे राजा और राजा के जो फेवरेट सब कार्डिनल वगैरह होते हैं उन्होंने ठीक कर लिया कि यह लोग कुछ लोग हैं वो हेरेटिक है। हेरेटिक इसलिए अर्थात कि विधर्मी है या तो फिर जो चर्च का जो मेन डॉक्ट्रिन है उसको सपोर्ट नहीं करते। तो क्यों नहीं सपोर्ट करते? क्योंकि वह लोग टैक्स एक्सेसिव टैक्स देने से मना करते हैं। राजा का जो अत्याचार है उसके सामने विरोध उठाते हैं। वगैरह-वगैरह सब पॉलिटिक्स है पूरा धर्म के साथ कोई लेना देना नहीं। ये जो पादरी पादरी थे उस समय के इंक्विजिशन के वो सब टॉप टू बॉटम करप्ट थे। मोरली भी करप्ट थे, पॉलिटिकली भी करप्ट थे और पैसा वगैरह कामिनी कांचन सब में डूबे हुए थे। तो ऐसा धर्म के साथ कोई लेना देना नहीं था। बस वही है कि पॉलिटिकल हमारा यह जो यह है सत्ता स्वीकार नहीं करते बोल के इनको हेरेटिक घोषित कर दो फिर इनको पकड़ करके किसी जेल में किसी डंजियन में ले जाओ उनको भयानक उनको अत्याचार करो उनके ऊपर में टॉर्चर करो कॉन्फेशन लिखवा दो कि हां अभी आदमी को आप पिटाई करेंगे तो वे तो बेचारा फिर कुछ समय के बाद में आप जो बोलेंगे वो कहने को तैयार हो जाएगा तो सब कॉन्फेशन लिखवा दिया फिर फिर एक पब्लिक ट्रायल होता है शो ट्रायल कि ये आदमी है वो शैतान की वरशिप कर रहा है तो उसको फिर वो आदमी भी बेचारा अभी उसके साथ में जो ट्रीटमेंट हुई है वो स्वीकार कर लेगा कि हां मैं शैतान की वरशिप कर रहा हूं फिर उसका क्या उसका यह है जजमेंट क्या है सॉल्यूशन क्या है इसको जिंदा जला दो बर्न हिम ऑन द स्टेक तो ये स्टेक के ऊपर में यानी कि एक खंबा होगा नीचे में लकड़ियां रखी होगी उसको बांध के उसको जला देंगे तो डार्के केस्ट चैप्टर इन चर्च हिस्ट्री ये स्पेनिश इंक्विजिशन था तो वहां पर सेम थिंग कि ये जो सबसे बेस्ट स्पिरिचुअल ऑर्डर कहे जाते थे उस समय के उसी ऑर्डर के साधुओं ने यह सब अत्याचार किया था। क्यों? इज़ अ सेंस ऑफ ड्यूटी सेंस ऑफ ऑर्डर। ये मतलब हमको यह रिजिड सिस्टम के भीतर में रहना है कि ऊपर से जो ऑर्डर हुआ है उसको फॉलो हमको करना ही करना है। तो अभी यह स्पिरिचुअल लाइफ के लिए तो ठीक है कि आपको कहा जाए कि किसी भी तरह के दैहिक सुख उपभोग को आपको त्याग करना है। एक बार आप मोनेस्ट्री जॉइ करते हैं तो किसी भी तरह के कंफर्ट का त्याग करना है। आपको फिर रूटीन फॉलो करना है। अर्ली मॉर्निंग को उठना है। देर रात तक फिर आपको जो मास जो होता है अर्थात कि प्रेयर जो होती है सामूहिक प्रेयर उसमें पार्टिसिपेट करना है। वह आपको करना ही करना है। आध्यात्मिक जीवन में इस तरह का रूटीन डिसिप्लिन इसके अलावा ओबिडियंस के अलावा आपका काम नहीं चलने वाला। किंतु जब यह टॉप लीडरशिप करप्ट हो गई तो यही रूटीन डिसिप्लिन और ओबेडियंस इसका किस तरह से भयानक दुरुपयोग हुआ। तो देखिए कि मैं हमेशा ऐसा सोचता हूं कि यह जो हिंदू धर्म है हिंदू धर्म को आप इस तरह से हिंदू धर्म के जो फॉलोअर्स हैं इसको आप इस तरह से करप्ट नहीं कर सकते हैं। इनको आप इनका दुरुपयोग किसी के ऊपर में अत्याचार करने के लिए नहीं कर सकते। क्योंकि हिंदू धर्म आपको हमेशा एक चॉइस देता है कि आपका मोरल भीतर में से क्या कहता है? आपकी कॉन्शियस क्या कहती है? आपका एक मोरल मैप जो आपके माइंड में बैठा हुआ है, वह आपको क्या कहता है? ठाकुर स्वयं कहते हैं ना कि ईश्वर को प्राप्त करने के लिए ध्रुव ने पिताजी की आज्ञा का उल्लंघन कर दिया। विभीषण ने बड़े भाई की आज्ञा का उल्लंघन कर दिया। वो जो एक पूरे एग्जांपल्स वगैरह देते हैं तो फिर धर्म के रास्ते पे हमको जो सही लगता है उसको फॉलो करने के लिए जिनके पास में सत्ता है या जिनके पास में ऑथॉरिटी है या जिनके प्रति हमारा ओबिडियंस होना चाहिए उसको हम उल्लंघन कर सकते हैं। क्लासिकल केस इन पॉइंट नचिकेता आइडियली स्पीकिंग कि पिताजी जब यह बीमार गायों को वृद्ध गायों को जब यह दान कर रहे हैं तो पुत्र के हिसाब से उसको चुपचाप यह सब देखना चाहिए। पिताजी में ज्यादा अकल है पुत्र से पुत्र तो बेचारा छोटा है। इसके बावजूद इसके भीतर में धर्म का उदय हुआ। कॉन्शियंस जागृत हुई और वह फिर पिताजी को जाकर के कहता है अभी यह सीधा-सीधी विरोध तो नहीं कर पाएगा। हमारी संस्कृति के विरोधात है। ज्यष्ठ भ्राता पिता इन सब की आज्ञा का पालन तो आपको हर किसी कीमत पर करना है। तो फिर फिर वह ऐसा तो जाकर के नहीं कह सकता कि पिताजी आप जो कर रहे हैं वह गलत है। तो फिर वो क्या किया? उसने जाकर के पिताजी को कहा कि आप मुझे किसको दान में देने वाले हैं? यानी कि यदि आपने वृद्ध गायों को दिया दान में जो कि आपकी प्रिय नहीं है तो आपको जो प्रिय है उसको भी तो आपको दान करना चाहिए। तभी तो जिस तरह का जो होम या जिस तरह का जो यह यज्ञ आप कर रहे हैं तभी तो वह सार्थक होगा। तो देखिए कि मेरा यह हमेशा से अंडरस्टैंडिंग रहा है कि हिंदू धर्म में आपको कॉन्शियस को फॉलो करने का एक है ऑप्शन आपके पास में यदि आपके यह जो सुपीरियर जिस बात को कहते हैं वह आपको स्वीकृत नहीं है वो आपको अनएथिकल लगती है इमोरल लगती है अधार्मिक लगती है तो आप उसके सामने अपना विरोध प्रदर्शित कर सकते हैं उसके सामने किंतु जैसे यह मुझे मुझे कहा वी आर द ब्लाइंड फॉलोअर्स ऑफ स्वामी विवेकानंद। यह बात मुझे जितना उस समय उस समय जितना जिसने मुझे अपसेट किया था उतना ही फिर स्वामी जी का वो स्टेटमेंट है कि अपने जो लीडर है वह आपको कहते हैं कि नदी में कूद पड़ो मगरमच्छ के सामने जाकर के यह आपका सामना करो। तो आपको पहले वह कर देना है। बाद में आपके लीडर को क्वेश्चन करना है। किंतु यहां पर देखिए कि स्वामी जी ने यह ऑप्शन तो हमको दिया है कि भले ही चाहे पहले आज्ञा का पालन कर लिया किंतु बाद में आप क्वेश्चन तो कर ही सकते हैं। तो किंतु यह सब है कि आपकी मोरल या तो कॉन्शियंस वगैरह जो है उसको आप फॉलो कर सकते हैं। दैट इज विदिन द फोल्ड ऑफ हिंदूइज़्म। जबकि यह यूरोपियन कांसेप्ट ऑफ ड्यूटी है कि आपको अच्छा लगे या ना लगे। आपके मोरल कंपास में यह बात फिट बैठे या ना बैठे। आपका कॉन्शियस आपके सामने रेबेलियन करे या ना करें। आपकी ड्यूटी है इसको करना यानी कि आपको करना है। एक सोल्जर को कहा कि इसकी हत्या कर दो तो सोल्जर को हत्या करनी ही करनी है। फिर यह क्वेश्चन नहीं करना कि किस हिसाब से आपने इस आदमी को एनिमी के रूप में घोषित किया है। सोल्जर का काम ही है कि जो जिसको दुश्मन डिक्लेअ करता है उसका सुपीरियर कमांडर तो उसके सामने उसको युद्ध करना ही करना है। देयर आर नो ऑप्शंस कि लास्ट मिनट रेबेलियन यदि होगा तो यह रेबेल को यह लोग शूट कर सकते हैं। आर्मी में यहां तक यह ऑफिसर्स के पास में यह होता है ऑथॉरिटी कि यह यदि लास्ट मिनट में यह लोग कोई गद्दारी करने को जाता है तो अब यू कैन शूट हिम। देयर इज नो प्रॉब्लम विथ दैट। तो यहां पर भी देखिए कि यह जो यूरोपियन कांसेप्ट और इंडियन कांसेप्ट यूरोपियन कांसेप्ट ऑफ ड्यूटी इंडियन कांसेप्ट ऑफ कर्म योग इसमें आसमान जमीन का अंतर है। तो एनीवे हमने कल

पूर्णज्ञान का लक्षण है किताबी ज्ञान से परे चले जाना

यह भी देखा कि ठाकुर ने जैसे कि इसके ऊपर में नो कमेंट करके छोड़ दिया था। किंतु ठाकुर जो दूसरी बात कहते हैं इसके रिप्लाई में वह भी बड़ा इंटरेस्टिंग था कि पूर्ण ज्ञान का लक्षण है एक किताब भी साथ में नहीं रहेगी। जैसे कि सुखदेव सब कुछ उनकी जहवा पर उपस्थित है। सरस्वती स्वयं उनकी जिहवा पर सवार होकर के वाणी विलास करती है। इसके और फिर आगे ठाकुर क्या कहते हैं देखिए इतना ही इंपॉर्टेंट बोइए शास्त्र

हमारे धर्मग्रंथों में सच्चे ज्ञान के साथ अनावश्यक ज्ञान भी मिलाया गया है। केवल ब्रह्म-ज्ञान को ही ग्रहण करें।

बालिते चीनीते मिशेल आच्छे किताबों में शास्त्रों में चीनी अर्थात कि शुगर और बाली अर्थात कि सैंड सैंड अर्थात कि रेती रेत तो यह सैंड एंड शुगर यह रेती और चीनी यह दोनों मिश्रित है। साधु चीनी टुकु लोए बाली त्याग को रे साधु यह चीनी ले लेगा और यह जो रेत है उसका त्याग करेगा साधु सार ग्रहण करे साधु सार ग्रहण करता है। देखिए इसका भी पहले तो जब यह कहा कि शास्त्र में बालते चिनीते मिशेल आचे तो उसमें खास करके आजकल एक जो डिस्कशन चल रहा है आज ये जो ये लिबरल जो हो है ना सब ये लोग कह रहे हैं मनुस्मृति उनका मनुस्मृति पे काफी उनका क्रोध है मनुस्मृति में इस तरह की बात है मनुस्मृति में इस तरह की बात है वगैरह-वगैरह जो कि आज की लिबरल वैल्यूस को वो वो अप्लाई नहीं होती है। या तो फिर अपना यह जो लिबरल कॉन्शियस है वह हम स्वीकार नहीं कर पाते हैं हम इस तरह की बातों को। तो देखिए कि स्वामी जी ने तो पहले ही कह दिया है कि यह जो दो तरह के जो शास्त्र है एक तो शास्त्र यह है जो कि हमेशा से जिसकी इटरनल वैल्यू है और दूसरे शास्त्र जो है जो कि यह श्रुति और स्मृति जिस तरह से कहते हैं कि यह स्मृति शास्त्र जो है वो इस तरह के हैं जिसकी वैल्यू जो है वो टेंपरेरी है। किसी एक पार्टिकुलर युग के लिए उसका यूज़ था। उसका एप्लीकेशन था। किंतु फिर यह युग जैसे कि समाप्त हो गया। उसकी एप्लीकेशन जैसे धीरे-धीरे चली गई। किंतु उपनिषद ऐसे हैं कि जिनकी वैल्यू जो है हमेशा हमेशा से है क्योंकि उसमें ब्रह्म ज्ञान है और उपनिषद में भी आप देखेंगे कि उपनिषद को भी तो यह वेद में से सेपरेट कर दिया गया है। वेद में फिर यह संहिता है, आरण्यक है और फिर यह उपनिषद है। यह जितने भी पोर्शन है, वेद में से उपनिषद को सेपरेट कर दिया गया है। उपनिषद में भी आप देखेंगे कि ब्रह्म ज्ञान के रिलेटेड जो कुछ भी है उसी को हम स्वीकार करते हैं। हालांकि क्योंकि ऐसा क्यों कहने की जरूरत पड़ी? क्योंकि उपनिषद फिर 108 है। तो 108 उपनिषद के ऊपर में कोई शंकराचार्य ने यह व्याख्या नहीं लिखी है। उनकी टीका भाष्य नहीं लिखा है। वो लिखा है सिर्फ 10 के ऊपर में। एक हम एक्स्ट्रा गिनते हैं श्वेताश्वतर को। तो इतने ही ऊपर में उन्होंने भाष्य लिखा है। यानी कि यह उपनिषदों में भी उसी उपनिषदों को आज हम ग्रहण करते हैं जिसके ऊपर में शंकर का भाष्य है। तो शंकराचार्य का भाष्य है। तो इसीलिए यहां पर ठाकुर कहते हैं कि शास्त्र में यह चीनी और रेत यह दोनों मिश्रित है। उसी को ले लेना है जो कि हमारे लिए आवश्यक है जो कि हमारी साधना के लिए आवश्यक है। अभी आप यह कह सकते हैं प्रश्न कर सकते हैं कि यदि यह रेत यानी कि इस तरह का पोर्शन जो कि हमारे लिए आवश्यक नहीं है तो ऋषि मुनियों ने उसको लिपिबद्ध किया ही क्यों? इसको शास्त्र की रचना की ही क्यों? इस तरह के श्लोक इस तरह के पोर्शन इसमें डाले ही क्यों? क्यों हमको मिसगाइड करना चाहते थे? तो ऐसा नहीं है। जैसे स्वामी जी ने कहा कि एक तो इटरनल पोर्शन है। एक तो टेंपरेरी पोर्शन है। इटरनल हमेशा आत्मन जीवात्मन का ईश्वर के साथ में या तो आत्मन के साथ में या तो फिर ब्रह्मन के साथ में जो रिलेशन है उसको डिस्क्राइब करता है। और यह जो टेंपरेरी पोर्शन है वह हमारा संसार के साथ में क्या संबंध है? किस तरह के कर्तव्य का पालन करके संसार में रहना है। लोगों के साथ में किस तरह से बिहेव करना है। वह सब यह सांसारिक पोर्शन है। यह बाद में आएगा। ऐहिक और पारत्रिक में क्या फर्क है? तो ठाकुर उसका फिर एक बड़ा सुंदर उत्तर देते हैं। किंतु यही है कि एक जो स्पिरिचुअल पोर्शन यानी कि हमारा ईश्वर के साथ में रिलेशन वही इटरनल है। संसार के जो नीति नियम है वह समय के अनुसार चलते रहते हैं। अभी जैसे कि देखिए

मा शारदा का जीवन आज की आधुनिक महिलाओं के लिए किस प्रकार प्रासंगिक है?

मेरी ही बहन वो रह रही है न्यू जर्सी में। तो अभी मैं उसको क्या कहूंगा मां के बारे में? न्यू जर्सी में रहती है। उसको जॉब करना है। तो अभी आप समझ ही सकते हैं कि अमेरिका का लाइफ कितना फॉरवर्ड है, कितना एडवांस है, कितना लिबरल है। और यहां पर मां शारदा नहबत में रहती है। पुरुषों के सामने भी नहीं जाएगी। घुमटा टानेगी। पुरुषों के साथ में वार्तालाप नहीं करेगी। इतनी सी छोटी सी यह जो नहबत आपने देखा होगा। मुझे तो आश्चर्य हुआ था पहली बार देखकर के कि म डिस्क्रिप्शन पड़ा है कि छोटी सी जगह है। किंतु पहली बार देखा तो मुझे इतनी छोटी सी जगह यह भी तो मुझे अंदाज नहीं था। तो इतनी सी जगह में फिर वहां पर ठाकुर के लिए वो जो मछली का वो बनता है झोल। तो ऊपर में एक वह जो झुला करके रखते हैं एक मटकी उसमें पानी भरा है। उसमें मछली डाली है। फिर वहीं पर खाना बनता है। वहीं पर मां रात को चटाई वो बिछा करके सोती है। वहीं पर यह लक्ष्मी दीदी रहती है। वहीं पर यह कोलकाता से जो स्त्री भक्त जाएगी। वहीं पर रहेगी। तो माने इट्स इंपॉसिबल टू इमेजिन कि यह लोग किस तरह से मैनेज करते होंगे। तो आज मैं मेरी बहन को क्या कहूंगा कि तुम अमेरिका रहती हो जॉब करती हो और यह पति सेवा मां की जो मां शारदा की ठाकुर के प्रति जो यह था एक निष्ठा थी ठाकुर के प्रति एक समर्पण था ठाकुर की जो जी जान से सेवा करती थी तो यह जो फैक्टर है मैं अपनी बहन को नहीं कह पाऊंगा कि तुम इस तरह से आज जियो कि तुम घुमटा टानो पुरुषों के साथ में बात मत करो इतनी छोटी सी जगह में रहो तुम्हारा हस्बैंड जो कहता है सब कुछ स्वीकार कर लो। दिस इज इंपॉसिबल। आज का जो युग है उसमें मैं किसी को भी इस तरह की सलाह नहीं दूंगा। तो इसका अर्थ यह है क्या कि न्यू जर्सी में एक लेडी रहती है। वह जॉब करती है। न्यूयॉर्क में जाकर के यानी डेली तो उसको एकद घंटे का तो कम्यू्यूट हो जाता है। आना जाना वगैरह और फिर जॉब के ऊपर में 10 तरह के लोगों के साथ में डीएल करना है। और यहां की तरह वहां पर ऐसा नहीं है कि स्त्री पुरुष का प्रभेद मैंने एक कहानी सुनी मुझे पता नहीं यह बात कितनी सच है किंतु सुना था मैं राजकोट में इस तरह की कहानियां काफी चलती थी तो एक कहानी ऐसी सुनी और एक दूसरे ऑर्डर के बारे में कि वहां के कुछ साधु लोग मिलकर के अमेरिका गए तो अभी क्या है अमेरिका में डिवोटीज तो आजकल बहुत सारे हो गए हैं गुजराती डिवोटीज बहुत हो गए पैसा भी बहुत है उनके पास में तो इस तरह से साधुओं को वे लोग इनवाइट करते हैं तो यह दूसरे ऑर्डर के हैं दूसरे संघ के साधु तो वे लोग वहां पर गए किंतु इन लोगों में क्या है कि स्त्री के सामने नहीं देखना वगैरह वगैरह बहुत कुछ होता है। अभी वहां पर क्या है वो फिजिकल चेकअप जैसा होता है ना कि आपको वो उसके कि आपके बॉडी पर कुछ है कि नहीं शस्त्र वगैरह तो एक लेडी ऑफिसर वो चेकअप कर रही थी तो ये सब साधुओं ने विरोध किया कि यदि कोई चेकअप करना है इस तरह का तो आप किसी जेंट्स को बोलिए लेडी नहीं करेगी लेडीज नहीं करेगी साधुओं को इस तरह से टच नहीं करेगी तो वो जो जैसे ही उसको पता चला इस लेडी को वो अमेरिकन अमेरिकन लेडी थी तो उसने क्या किया पता है कोर्ट में केस कर दिया कि ये लोग मुझे मेरे सामने डिस्क्रिमिनेट कर रहे हैं। जेंडर डिस्क्रिमिनेशन ऐसा करके कोर्ट में केस कर दिया और फिर इन लोगों को ना कि एक मिलियन डॉलर ना ऐसा कुछ उसको देना पड़ा था कि हां भाई कैसे भी करके उसको शांत करवाने के लिए तो यानी कि क्या है अमेरिका में इस तरह का जेंडर डिस्क्रिमिनेशन नहीं होता है कि लेडीज सिर्फ लेडीज के साथ बात करेगी। इवन इंडिया में वर्क प्लेस में भी आपको देखेंगे कि कोई स्त्रियां काम करती है तो फिर उनको उस तरह से ट्रीट किया जाता है। पुरुषों को पुरुषों की तरह से तो अमेरिका में इस तरह से नहीं है। तो अभी देखिए कि मेरी बहन जो वहां पर रह रही है। मैं उसको क्या यह सब कहूंगा कि मां को यदि तुमको फॉलो करना है तो तुमको इसी तरह से ना एक छोटी सी जगह पर रहना है। घुमटा टान के रहना है। पुरुषों के साथ बात नहीं करनी है। तुम्हारे सास ससुर जो है यह तुम्हारा हस्बैंड है। 100% ओबिडिएंट हो के रहना है। दिस इज नॉट पॉसिबल। तो अभी इसका अर्थ क्या है? कि मां शारदा का उपदेश उसके लिए नहीं है क्या? तो यह भी तो बात नहीं है। आपको वो बात ग्रहण करनी है जो कि इस युग के लिए है। इस युग में आपको क्या अप्लाई होता है? अभी इसका अर्थ यह है क्या कि मां का जो जीवन था उसमें से एक पोर्शन जो था नौबत वाला वो पूरा व्यर्थ चला गया आज के युग के लिए। नहीं यह यह सब चीजें जो है उसका इतना गहन तात्पर्य है कि एक पर्टिकुलर युग में रहकर के एक पर्टिकुलर सिचुएशन में रह के आप उसकी व्याख्या कभी नहीं कर पाएंगे कि हां यही सही है वो गलत है या तो वही सही है यह गलत है। आपको समझना है कि युग युग की प्राथमिकताएं होती है। समय-समय की देश काल पात्र जैसे कि भारत में कहते हैं देश काल पात्र के अनुसार उपदेश आपको ग्रहण करने हैं। आज की आधुनिक स्त्रियों को अभी वह तो अमेरिका की बात है। आज के ही भारत में ही देखिए स्त्रियां इसरो की साइंटिस्ट है। स्त्रियां कहीं ये मल्टीीनेशनल कंपनी में जॉब करती है और राजकोट में एक लेडी आती थी। शी इज़ वन ऑफ द टॉप लॉयर इन गुजरात हाई कोर्ट। तो वो वो मुझे कहती है कि मां का ये जो लाइफ है मुझे इतना ये अफेक्ट करता है मुझे इतना अच्छा लगता है। नाउ यू कैन इमेजिन यह जो हाई कोर्ट में जाकर के लॉयर को जो करना होता है वहां का जो एटमॉस्फेयर होता है वह किस तरह का होगा यू कैन जस्ट इमेजिन वो कहां एक हाई कोर्ट की लॉयर कहां और यह मां का जीवन कहां और उसी समय में देखिए ना कहां निवेदिता कहां मां शारदा निवेदिता इतनी अग्रेसिव थी यह पूरे भारत में घूम के ये जो फ्रीडम फाइटर थे उनको एनकरेज करती थी उनको स्वामी जी का संदेश देती थी इनस्पाइट ऑफ दैट यही निवेदिता जब मां उसको खूकी अर्थात कि मेरी बच्ची ऐसा करके पुकारती थी तो बिल्कुल बच्ची की तरह खुश होकर के मां के साथ में वह वार्तालाप करती थी। बच्ची की तरह मां के साथ में बिहेव करती थी। यानी कि देखिए कि किसी का भी जीवन या किसी का भी उपदेश उसमें हमको सार ग्रहण कर लेना है कि हमको कहां पर कौन सी चीज अप्लाई होती है। मां की जो ईश्वर के प्रति निष्ठा है। मां की ये जो साधन के प्रति निष्ठा है। मां का अपने संतानों त्यागी संतान गृहस्थ संतानों के प्रति जो प्रेम है और जो मां के जीवन में एस सच एक एथिक्स एंड मोरालिटी है। वह सब हमको ग्रहण कर लेना है। एक आत्मश्रद्धा एक आनंद जो कि मां को देखकर के हमको देखने को मिलता है। कहां ठाकुर कैंसर से ग्रस्त है। वहां पर काशीपुर में श्यामपुकुर में उनको रखा गया है ट्रीटमेंट के लिए। और गंभीरानंद जी क्या कहते हैं? मां हृदय पर पत्थर रखकर के जैसे कि भविष्य की एक सुंदर भविष्य की आशा रखकर के मां जैसे कि उनकी सेवा करती है। कितना कष्ट ग्रहण करती है ठाकुर की सेवा करने के लिए। यह भीतर में से यदि आत्मश्रद्धा नहीं होगी, ईश्वर पर निष्ठा नहीं होगी तो यह सी चीजें जो है आप नहीं कर पाएंगे। और आज के जीवन में देखिए

ईश्वर के अस्तित्व पर छिपा संदेह हमारे स्वास्थ्य को नष्ट कर रहा है

कि ईश्वर पर श्रद्धा नहीं होना या आत्मश्रद्धा नहीं होना इसका क्या परिणाम है? तो आधे लोगों को नींद की बीमारी है। इंसोमिया है कि रात को ठीक से नींद नहीं आती है। आपको नींद की गोली खानी पड़ेगी। आधे लोगों को आजकल ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है। यंग एज में डायबिटीज हो जाता है। क्यों? क्योंकि भीतर में जैसे कि सपोर्ट ही नहीं है। भीतर में सब खाली है। एक तरह की झूठमठ की नास्तिकता, एक तरह का अविश्वास शास्त्र के प्रति, गुरुजनों के प्रति, ईश्वर के प्रति यह सब लेकर के हम लोग अपने को अल्ट्रा मॉडर्न कहलाते हैं। अभी खास करके आजकल के जो मेट्रो सिटीज में जाएंगे भारत के ये दिल्ली है, चेन्नई है, बॉम्बे है। तो यहां पे आप यदि जाएंगे बेंगलुरु वगैरह देखेंगे कि इस तरह के भीतर से उनका कुछ भी यह नहीं है। कैरेक्टर को कोई सपोर्ट नहीं है। अपने को अल्ट्रा मॉडर्न कहलाते हैं। ऐसे लोगों की कमी नहीं और इन लोगों के भीतर में दुनिया भर के मेंटल डिसऑर्डर देखने को मिलेंगे। या तो यह नार्सिसिज्म का भोग बने होंगे। या तो फिर यह दूसरों के प्रति प्रचंड द्वेष और ईर्ष्या रखते होंगे। मन के भीतर में सब समय क्रोध है। सब समय एक तरह का असंतोष है। यह घूमता रहता होगा। भले ही चाहे वह कितनी ही अच्छी प्रोडक्ट बना देते हो, भले ही चाहे वह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस प्रोग्रामिंग कर देते हो, भले ही चाहे वह एयरक्राफ्ट कैरियर बना देते हो, भले ही चाहे वह कुछ भी कर देते हो, भीतर में इनको संतोष मिलता ही नहीं है। तो ऐसे लोगों की जगत में कमी नहीं। और फिर ऐसे लोग सोचेंगे

हमें शास्त्रों में से सार ग्रहण करना है

भी सही। आप इस तरह से कोई लेडी को जाकर के बोलेंगे मेट्रो सिटी में कि मां शारदा के जीवन को फॉलो करो। मां शारदा के उपदेशों को ग्रहण करो। मां से प्रेरणा प्राप्त करो। तो पहला ही क्वेश्चन होगा कि मैं तो नब में रहने वाली नहीं। मैं घुमटा टानने वाली नहीं। वे पुरुषों के साथ बात ना हो ऐसा मैं करने वाली नहीं। मेरे हस्बैंड की मैं सब बात स्वीकार कर लूं। उसकी मैं सेवा करूं यह सब मेरे से होने वाला नहीं। तो फिर मैं मां शारदा का क्या ग्रहण करूं? जब फंडामेंटली तो यहां पर डिफरेंस आ जाता है। तो अभी क्या है कि आपको उसके अनुसार मां के जीवन को उस जो अंश है उसको जो अप्लाई होते हैं वो उसको बताना है कि हां ईश्वर के प्रति निष्ठा होनी चाहिए। एक चरित्र की शक्ति होनी चाहिए। एक आत्मश्रद्धा होनी चाहिए। दूसरों के प्रति करुणा का भाव होना चाहिए। भीतर में एक आत्मविश्वास होना चाहिए। यह सब तुमको लेना है। बाकी सब चीजें कि घुमटा टानना वगैरह वगैरह ना लोगे तो चलेगा। डज नॉट मैटर। वो तुमको अप्लाई नहीं होता है। तो यहां पर भी देखिए जब ठाकुर यह कहते हैं ना कि शास्त्र में यह बालीते चीनीते मिशेल आ चीनी और रेती दोनों मिक्स है। इसका अर्थ हमको यह नहीं करना है कि ऋषि मुनि ये लोग झूठ-मुठ की बात करके हम हमको भ्रमित कर रहे हैं या मिसगाइड कर रहे हैं। हमको दो तरह से एक तो लेना है। जैसे कि स्वामी जी का श्रुति स्मृति का डिफरेंशिएशन है कि एक तो है इटरनल पोर्शन एक तो है टेंपरेरी पोर्शन और दूसरा एक लेना है इवन विदिन इटरनल पोर्शन अभी मां का जीवन आप इस तरह से नहीं कहेंगे कि मां ने जो आध्यात्मिकता के बारे में जो कहा वो श्रुति है और मां का खुद का जीवन था दक्षिणेश्वर के दिन वो स्मृति है वो टेंपरेरी है वो परमानेंट है इस तरह का पग पगलापन हम लोग नहीं करने वाले हैं। हम लोग तो मां का जीवन को समग्र रूप से ही लेंगे। किंतु यहां पर जो इंटरप्रिटेशन होगा वह इस तरह से होगा कि मेरी देश काल पत्र अनुसार मुझे क्या अप्लाई हो रहा है उसको ले लेना है और बाकी को अब मैं मुझे मेरे से नहीं होगा तो फिर नहीं लेना है उसको राइट ठाकुर स्वयं हमने कल ही डिस्कस किया था कि साधुओं को स्त्री के सामने देखना भी नहीं है किंतु एट द सेम टाइम रामकृष्ण संघ के कार्य जिस तरह से एक्टिविटीज है इस इस एक्टिविटीज में आप स्त्रियों का चेहरा भी ना देखें इट इज नेवर गोइंग टू बी पॉसिबल। तो क्या ठाकुर ने जो कहा वह गलत हो गया क्या? कथामृत में ही जो चीनी और रेत ऐसा मिश्रण है क्या? तो नहीं है। देश काल पात्र अनुसार स्वामी जी ने कर्म योग का प्रवर्तन किया है क्योंकि हमारे भीतर में तमस है। तमस में से पहले रजस में जाना होगा। रजस में से बाद में हम सत्व में जाएंगे। तो यह अंडरस्टैंडिंग अपना हो गया। इसके बाद में स्वामी जी के कहे अनुसार यहां की कार्य पद्धति होगी। उसको हमको सिंपली फॉलो करना है। बस वही बात है। तो देखिए कि देश काल पात्र अनुसार किसी भी शास्त्र में से सार ग्रहण कर लेना है और बाकी सब चीजों को भले मुझे यदि अप्लाई नहीं होती है तो डज नॉट मैटर ऐसा करके रिजेक्ट नहीं कर देना है कि इसमें जो कहा गया है वो हमको भ्रमित करने के लिए या मिसगाइड करने के लिए कहा है। इसीलिए यहां पे आखिर में ठाकुर कहते हैं साधु सार ग्रहण करे। साधु सार ग्रहण करता है सुखदेव

मन मुख एक करना: ठाकुर दिखावे के लिए कुछ करते नहीं थे

आदि नाम कोिया ठाकुर की निजे अवस्था इंगी तो कोरिया बुझते छ सुखदेव वगैरह का नाम करके ठाकुर क्या अपनी खुद की अवस्था इशारा करके समझा रहे हैं क्या कि जैसे कि सुखदेव के पास में एक भी पुस्तक नहीं था सरस्वती स्वयं जैसे कि उनको बातें करने की प्रेरणा देती थी ठाकुर भी क्या इसी परिस्थिति सुखदेव के नाम पर अपनी वर्णित कर रहे हैं क्या? ये जैसे कि शुरू में ही यह जो हमने यह जो 101 दिन की यह जो कहानी प्रारंभ की तो पहले ही दिन आई थिंक 14th दिसंबर को ही हमने देख लिया कि मास्टर महाशय जब ठाकुर की यह बात सुनते हैं कि चैतन्य देव की तीन अवस्था होती थी। अंतर्दशा, अर्धबाह्य दशा और बाह्य दशा। तो फिर यह करके क्या ठाकुर अपनी ही अवस्थाओं का वर्णन कर रहे हैं? ऐसा यह कथामृत में बार-बार आता है। मास्टर महाशय सब समय ऐसा सोचते हैं कि ठाकुर जैसे कि सुखदेव का नाम लेकर के चैतन्य देव का नाम लेकर के अपनी ही अवस्था का वर्णन कर रहे हैं। और फिर हमने यह भी देखा कि ऐसा तो नहीं है कि ठाकुर के पास में किताब नहीं है या तो फिर ठाकुर उसको श्रवण नहीं करते। आजकल की लैंग्वेज में ऑडियो बुक कि हम लोगों को पढ़ना अच्छा नहीं लगता तो एटलीस्ट श्रवण करो। ये पडकास्ट आजकल के जैसे कि तो उस समय के ये जो पडकास्ट थे वो रामलाल को बुलाकर के बिठा देते थे। वो पाठ करता था ठाकुर श्रवण करते थे। वो उस समय का पडकास्ट था। तो ठाकुर ऐसा नहीं है कि अब अब किताब को लिटरली नहीं लेना है। ठाकुर पढ़ते नहीं है बोलकर के ठाकुर ये सब अप्लाई हो जाता है। ऐसा नहीं है। श्रवण तो करते थे। देखिए ठाकुर इस तरह का डिस्टिंशन करते हैं कि अ किसी ने ठाकुर को कहा कि आपने तो पढ़ाई लिखाई की नहीं है। आपने तो स्टडी की ना किया नहीं है। कोई जिसको कि ये फॉर्मल एजुकेशन कहते हैं वो तो आपके पास में है नहीं। इसके बावजूद आपकी यह जो सिद्धियां है आध्यात्मिक जीवन में वो कितनी बड़ी है कितनी महान है तो ठाकुर इमीडिएटली उसको काउंटर करके कहते हैं ओगोमी शूचिक को तो अरे मैंने सुना कितना है यानी कि यदि मान लीजिए कि आपने किसी फॉर्मल एजुकेशन न लिया हो किंतु किसी महापुरुष के पास में से वो विद्या का श्रवण किया हो प्राप्त किया हो इट इज इक्विवेलेंट फिर उस तरह से डिफरेंशिएशन नहीं करना है जिसको हेयर स्प्लिटिंग आर्गुमेंट कहते हैं इस तरह से नहीं करना कि बिकॉज़ कि इसके पास में फॉर्मल एजुकेशन नहीं है। यह अनपढ़ है। या तो फिर कोई फॉर्मल आध्यात्मिक शिक्षा नहीं ग्रहण की है। तो फिर उनकी जो उपलब्धि है उसको फॉर्मेलिटी के साथ में या तो शास्त्र सम्मत विधि विधान के साथ में कोई रिलेशन है ऐसा नहीं है। ठाकुर ने स्पष्ट इमीडिएटली कह दिया उगवामी शनेत अरे मैंने सुना कितना है। तो यहां पर भी कि भले ही चाहे ठाकुर किताब पढ़ते ना हो किंतु ठाकुर ने किताबें सुनी कितनी है और यह यह कुछ ही दिनों में हमने दो ही दिन में देख लिया कि ठाकुर सतत स्मरण इस तरह से श्रवण करते रहते हैं। तो यहां पे भले ही चाहे ठाकुर ऐसा कहते हो कि सुखदेव वगैरह के पास में किताबें नहीं पूर्ण ज्ञान का लक्षण है कि एक भी किताब साथ में ना रहे किंतु क्योंकि इन लोगों को लोक शिक्षा देनी है। लोक शिक्षा के लिए यह सब करना पड़ता है। अगेन इस बात के बहुत सारे इंटरप्रिटेशन हो सकते हैं। ठाकुर यह सब जो श्रवण करते हैं लोगों को दिखाने के लिए करते हैं ना कि जेनुइनली ये सब श्रवण करना चाहते हैं। ठाकुर मां स्वामी जी का जीवन जिसने इवन सुपरफिशियली भी स्टडी किया होगा तो पता चल जाएगा कि ये दिखावा करने के लिए ये लोग कुछ नहीं करेंगे कि हां मुझे लोक शिक्षा देनी है बोलकर के मैं यह कर रहा हूं। ऐसा नहीं इन लोगों का जेनुइनली वो अपना लाइफ लीड कर रहे हैं। उसके ऊपर में से हमको शिक्षा ग्रहण करनी है। ये लोग झूठमठ का कि वो जो ठाकुर गए थे उसको मिलने के लिए एक वैष्णव ये थे बड़े संत थे तो ठाकुर उनको मिल भगवान दास बाबा जी यदि मुझे नाम याद है तो ठीक ठीक उनको ठाकुर मिलने के लिए गए तो देखा कि बड़े वृद्ध है कि सतत माला जप कर रहे हैं तो हृदय ने पूछा हृदय ठाकुर के साथ में गया था तो उसने पूछा कि आप तो इतने सिद्ध हैं। इसके बावजूद आप सतत माला जप क्यों कर रहे हैं? तो भगवान दास बाबा जी ने कहा कि देखो मुझे तो ऐसी कोई जरूरत नहीं है सतत माला जप करने की किंतु मैं यह कर रहा हूं देखकर के यह लोग सीखेंगे कि सतत माला जप करना चाहिए। अभी देखिए ठाकुर से रहा नहीं गया। ऑलरेडी ये जो बाबा जी थे उनके सामने एक केस आया था। एक कंप्लेन आई थी कि एक साधु है अपना वैष्णव वो क्या कर रहा है? धर्म के नाम पर अनाचार कर रहा है। तो बाबा जी ने कहा कि उसकी कंठी और माला ले लो। कंठी यानी कि वो गले में पहनने वाली और माला अर्थात कि उसको अपने यहां से भगा दो। ऐसा बोलकर के बाबा जी वो एक ये दे रहे हैं। एक जजमेंट दे रहे हैं। तो ठाकुर ने ऑलरेडी यह सब देख रहे हैं। फिर उनसे रहा नहीं गया। वो वो चादर ढक करके गए थे। थोड़ा सा शर्माते थे ऐसे कभी-कभी माने दिखावा होता है ऐसा दिखावा तो नहीं किंतु क्या है? एक भीतर में से एक रहता है ना कि जब तक यह स्वभाव है तब तक ये अपने को पीछे रखते हैं। किंतु जैसे ही जीवा पर सरस्वती सवार हो जाती है फिर वो जो अपने को पीछे रखना थोड़ा सा शर्माना थोड़ा सा ये झुक करके रहना ये सब कहां चला जाता है और ये गए क्यों थे एक्चुअली कि वो वहां पर गए थे वो चैतन्य सभा में हरि सभा में और वहां पर चैतन्य देव का एक आसन रहता है तो ठाकुर भाव में आकर के उस आसन पर जाकर के बैठ गए थे। अभी ठाकुर की सहज अवस्था होती है तो कितने विनम्रता से रहते हैं। किंतु जैसे ही भाव का आवेश होता है। जैसे ईश्वरीय आवेश होता है तो ईश्वर के आसन पर जाकर बैठ गए। तो ठाकुर की दोनों अवस्था थी। सहज अवस्था में रहेंगे तो एक भक्त की अवस्था में संतान की अवस्था में रहेंगे। और जब भाव का आवेश होगा तो जगत जननी स्वयं उनके ऊपर में आकर के सवार हो जाती है। फिर वह भगवान के चैतन्य देव के आसन पर भी जाकर बैठ जाते हैं। तो यह जब ठाकुर गए थे पहले तो सहज अवस्था में थे विनम्रता दिखाने के लिए अब वो चादर से अपने को ढक के गए थे। कोई पहचान ना ले किसी के साथ अननेसेसरी बात बातें ना करनी पड़े। किंतु जब ऐसे दो-तीन तरह के जो बातें सुनी एक तो भगवान दास बाबा जी उस साधु को डांट रहे हैं जो कि अनाचार कर रहा है। फिर हृदय को कह रहे हैं कि मैं माला जप इसलिए करता हूं जिससे कि लोगों को शिक्षा मिले। तो इमीडिएटली ठाकुर के ऊपर में वो जो भावावेश होता है ना जो भावावेश में आकर के उन्होंने रानी रासमणि को जो तमाचा मार दिया था। उन्होंने चादर फेंक करके उसको साधु को डांट के कहा बाबा जी को कि आप जो है ये मैं यह सब कर रहा हूं। मैं यह सब कर रहा हूं। यह सब क्या है? यह आपको तो यह जो शरणागति का भाव लेकर रहना है माला जप यदि करना है तो आप अपने लिए कर रहे हैं नहीं कि लोगों को दिखाने के लिए तो यह जो था ठाकुर मां स्वामी जी कोई भी दिखावे के लिए कुछ नहीं कर रहा था यानी कि ठाकुर यदि श्रवण करते भी थे तो स्व आनंद के लिए करते थे नहीं कि यह मास्टर महाशय सामने बैठे हैं तो उनको थोड़ी शिक्षा मिले कि हां इस तरह के धार्मिक ग्रंथों का श्रवण करना चाहिए बोलकर के वह श्रवण कर रहे हैं ऐसा ऐसा नहीं है। अपने खुद के आनंद के लिए वह सब कर रहे हैं। तो यहां पर भी देखिए कि किस तरह का कंट्राडिक्शन हमको दिखता है। एक ओर तो कहते हैं कि साधु के पास में एक भी पुस्तक नहीं होनी चाहिए और दूसरी ही ओर कुछ ही क्षण पहले उन्होंने पुस्तक में से प्रहलाद चरित का पाठ किया था। सो अभी इस कंट्राडिक्शन का क्या एक रिकॉन्सिलिएशन है वो देखना पड़ेगा। अपनी बुद्धि कितनी जाती है वो छोटी सी तो है दिखावा करने के लिए लोग शिक्षा करने के लिए ठाकुर कर रहे हैं यह सब ये ये क्या है ना लेजी इंटरप्रिटेशन है बहुत बार कोई इंटरप्रिटेशन किसी से सुनते हैं ना कि इसमें यह जो हुआ है इसका यह अर्थ है बहुत सारे इंटरप्रिटेशन लेजी इंटरप्रिटेशन होते हैं। इस अर्थ में कि एक समग्र को देखकर के यह लोग सोचते नहीं है कि यहां पर ठाकुर जो करते हैं इतना सिंसियरली करते हैं। सिंसियरिटी ही जैसे कि उनका मूल मंत्र है। दिखावा कोई मूल मंत्र नहीं है। दिखावा कभी नहीं करते। तो उस फैक्टर को हमको ख्याल में रखना है। जितने भी फैक्टर है सबको ख्याल में रख के आखिर में आपको उसका कोई एक पजल का कोई सॉल्यूशन लाना है। जो कि एक्चुअली देखें तो कोई सॉल्यूशन नहीं होता है। कल भी हमने जैसे डिस्कस किया था। दीज़ आर डिलीशियस पजल। एक डिलीशियस फूड फॉर थॉट। हम क्या चिंता करेंगे? यह संसार की चिंता करेंगे कि ट्रंप ने इतना टारिफ बिठा दिया है तो भी इंडियन इकोनमी का क्या होगा ना कि इसकी चिंता करेंगे कि एक और तो ठाकुर कह रहे हैं कि साधु के पास में पूर्ण ज्ञान का लक्षण तो यही है कि एक भी किताब ना रहे ऑन द अदर हैंड ये बोलने से पहले ही वह किताब का श्रवण कर रहा है और ठाकुर श्रवण इसलिए नहीं कर रहे हैं कि लोगों को इससे शिक्षा मिले। ठाकुर जेनुइनली उसको अपने आनंद के लिए श्रवण कर रहे हैं। तो फिर क्या सॉल्यूशन है? सो दिस थिंकिंग द थिंकिंग इटसेल्फ विल कीप अस एंगेज्ड विद इन दिस स्पिरिचुअल लाइफ। यह आध्यात्मिक जीवन में यही सब चीजें हैं जो कि हमको करनी है। तो आज यहीं तक अभी कल फिर से मिलते हैं। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु।

प्रश्न: कुछ वक्ता बुद्धि से बोलते हैं, कुछ - जैसे ठाकुर - हृदय से बोलते हैं। यदि वे हृदय से बोलें, तो हो सकता है कि वे तथ्यों के साथ कुछ गलतियाँ कर दें, लेकिन उन्हें सुनकर हम धन्य महसूस करते हैं।

नहीं एक्सजेक्टली यह वो स्वामी जी विदेश से लौटे वो शुरू शुरू में वो जो गोपाल लाल शील के वो घर में रह रहे थे वो फेमस प्रसंग है कि कुछ पंडित आए उनके साथ में वार्तालाप करने के लिए टेस्ट करने के लिए कि स्वामी जी का नॉलेज कहां जाता है तो वे लोग संस्कृत में सब माने अग्रेसिव होकर के कि स्वामी जी को टेस्ट करना है तो अग्रेसिव होकर के प्रश्न कर रहे हैं गुस्सा हो के ना कि इस तरह से स्वामी जी हंसते-हंसते शांत शांति से सबका उत्तर दे रहे हैं। तो उसमें और संस्कृत में पूरा चल रहा है। तो अभी अभी क्या है? स्वामी जी तो बहुत साल विदेश में रहे थे। तो वो नारायण शास्त्री के साथ में जो कौन था वो राजस्थान में जिसके पास वो पाणिनि ग्रामर पढ़ा था तो बहुत साल हो गए उसको। तो बात करने में ग्रामर की एक मिस्टेक हो गई। तो अब ये पंडित लोग तो पकड़ने के लिए आए थे स्वामी जी को। कहां पे उनकी गलती पकड़ ले तो ओो सब हल्लागुल्ला मच गया। वो सब चिल्लाने के लिए खुश हो गए। स्वामी जी की गलती पकड़ स्वामी जी की गलती पकड़ ली। तो स्वामी जी ने शांति से हंसते-हंसते कहा कि पंडिता नाम दासोहम क्षमस्य में अपराधम कि मैं आप पंडितों का दास हूं। मेरा अपराध क्षमा कर दीजिए। तो ऐसा बोलकर के स्वामी जी ने तो मामला निपटा दिया। उसके बाद में शरद चंद्र वो था वहां पे। वो जाकर के पंडितों से बात करता है कि आपने स्वामी जी के साथ बात किया। आपका क्या फीडबैक है? क्या आपका कमेंट है? तो उन लोगों ने कहा कि देखिए ग्रामर की दृष्टि से उनका नॉलेज कहीं इतना ज्यादा नहीं है किंतु उनकी विनम्रता जो है हमको बहुत अच्छी लगी। तो ठीक है ये उनकी कमेंट थी। तो उसने जाकर के बाद में स्वामी जी को पूछा कि स्वामी जी आपका क्या कहना है? तो स्वामी जी ने कहा देखो विदेश में यदि होता है ना इस तरह का डिबेट तो इस तरह के ग्रामर के पॉइंट पकड़ करके ये लोग चिल्लाते कभी नहीं। वे लोग फिलॉसोफिकल पॉइंट देखेंगे। फिलॉसोफी को आपको कहना है फिलॉसोफिकल डिबेट होनी चाहिए। बात करने में कहीं एक दो छोटी एरर हो गई तो वह कहीं आसमान टूट पड़ा ऐसा वे लोग कभी नहीं करते। यह लोग भारत में यह जो कॉन्टेक्स्ट को पकड़ के ही हम लोग बैठे हैं। उसका जो सार है वो हम खो बैठे हैं। तो यह बोलकर के ही भारत की ये दुरावस्था है। तो एग्जैक्टली जैसे आपने कहा कि ऐसे पंडित कितने ही होंगे जिसकी ग्रामर की कभी मिस्टेक नहीं होगी। परफेक्ट आपके साथ आर्गुममेंट करेंगे। किंतु भारत की जो दुरावस्था है वो आपको दिखती ही नहीं है। जैसे कि जैसे ये लाखों करोड़ों भाई बहन भूखे मर रहे हैं तो शास्त्र का क्या है जो कि उनको उद्धार करेगा वो कुछ नहीं दिखता है। वही ग्रामर का पॉइंट, वही डिबेट का पॉइंट उसी को लेके जैसे कि बैठे हैं। जय राम भाटी में एक

प्रश्न: यदि आधुनिक युग में ठाकुर, मा, स्वामीजी की शिक्षाओं को कैसे लागू किया जाए, इस पर पुस्तकें लिखी जाएं तो यह हम भक्तों के लिए बहुत लाभदायक होगा।

मैरिज करके एक लड़की आई थी वहां पर तो मां मां का तो है ना वो देखो बहु मां घड़ी ते कोल देते जाने यानी वो जो नई जो बहू आई है वो घड़ी में वो घड़ी होती है ना उस समय तो वो चाबी भरनी होती थी वो बैटरी वगैरह तो थी नहीं डिजिटल क्लॉक तो थी नहीं वो चाबी आप ऐसा करेंगे तो उसका जो स्प्रिंग है वो स्प्रिंग विंड होगा और फिर वो चलेगी घड़ी तो मां कहती है कि वो घड़ी ते कोल देते जाना है। माने घड़ी में वो चाबी वो दे सकती है। यानी मां को चाबी देना भी नहीं आता था इस तरह से घड़ी में और जो दे सकती थी तो मां कितनी खुश हो जाती थी। तो मां का जो आउटलुक था इट वास अल्ट्रा मॉडर्न। मां ने कभी जाकर के उस बहू को ऐसा नहीं कहा कि तुम मेरी तरह से यह सब चीजों के बारे में बिल्कुल अज्ञ होकर के रहो। मां के पास में यह जो डिवोटीज आती थी तो किसी ने कहा कि मां मेरी बच्ची 10 साल की हो गई है। अभी तक उसकी शादी नहीं हुई। तो अभी जिस तरह से उस समय की थी प्रथा मां की खुद की शादी तो छ साल की उम्र में हुई थी। तो मां ने इमीडिएटली क्या कहा कि शादी नहीं हुई है तो क्या है? उसको निवेदिता की स्कूल में भेज दो। वो पढ़ाई लिखाई करेगी। जिस घर में जाएगी वहां पे वह इतना कंट्रीब्यूट कर पाएगी। यानी कि मां के आइडियाज थे अल्ट्रा मॉडर्न। जिस तरह से निवेदिता को उन्होंने स्वीकार किया। निवेदिता, सारा, ओलीबुल, जोसेफ एंड मैक्लाउड इन तीनों से ज्यादा फॉरवर्ड और एडवांस उस समय में कौन हो सकता था? तो इनके बावजूद इन मां ने जिस सहजता से इनको ग्रहण किया दैट इट्स इटसेल्फ शोज़ कि मां अपना खुद का जीवन और उनके बाद की आने वाली जो पीढ़ी है उसका जीवन इन दोनों को क्लियरली डिफरेंशिएट करती है। मां निवेदिता को कभी नहीं कहेगी कि तुम घुमटा टानो या तो पुरुषों के साथ में बात ना करो। ऐसा मां कभी नहीं कहेगी। मदर होल हार्टेडली एंडोर्स्ड निवेदिता ने जो किया है। सो क्या है कि आइडियल जो है कि सिंसियरिटी कैरेक्टर यह सब ले लेना है और बाकी जो सब चीजें हैं उनको भाव से ग्रहण करना है। बट वी डू नॉट हैव टू ट्राई टू एमुलेट इट। किंतु यह जो आपने कहा ना कि बॉडी ऑफ वर्क जो होना चाहिए एक्चुअली वो लेडीज को ही करना है। स्त्रियों को ही करना है। हम लोग पुरुष लोग उसमें कुछ बोलेंगे तो वो रिलेवेंट नहीं रहेगा। जैसे मैंने कहा ना कि वो हाई हाई कोर्ट की लॉयर तो देखिए कि वो वहां पे वो जो वसाड़ में शारदा मठ है वो रेगुलरली वहां पे जाती है। वो तीनों बहनें एक्चुअली काफी अकंप्लिश्ड है। वो यूनिवर्सिटी में डिपार्टमेंट हेड एक है दो दो लेडी दो बहनें जो है वो प्रोफेसर है और यह जो थर्ड सिस्टर है शी इज़ अ हाई कोर्ट लॉयर और तीनों अनमैरिड है। तो और उनके घर में गया था देखा कि कितना वो ठाकुर का मंदिर बनाया है और वो उनको तो भजन वगैरह आता है हारमोनियम पे तो शाम को आरती करेगी वो हारमोनियम पे भजन गाएगी कितना सुंदर वातावरण उन्होंने बनाया है। सो उन लोगों को अभी ये प्रोड्यूस करना है इस टाइप का वर्क कि हाउ वी कैन एमुलेट मदर्स आईडिया इन आवर लाइफ। हम लोगों का क्या है कि उसे रिलेवेंस नहीं है। हम लोग बोलेंगे तो फिर इसका ये इंपैक्ट नहीं होगा। इस अभी जैसे यहां पर एक एक आती है हमारी स्कूल की रिटायर्ड वाइस प्रिंसिपल है। हमारी यहां पर एक स्कूल है। तो वो कल परसों ही आश्रम में आई थी। तुम मेरे साथ बात कर रही है। मुझे कहा कि स्वामी जी की 100 फिफ्थ एनिवर्सरी नहीं कि ऐसा कुछ था। तो बेलूर मठ में यह था डिवोटिस कन्वेंशन। सो वो यहां से एज ए डेलीगेट वहां पर गई थी और वहां पर इतना बड़ा असेंबली है। हजार लोग बैठे हैं। उसके सामने उसको स्पीच देनी है। तो मतलब बढ़िया मजे से उसने खड़े रह के मां का जो रिलेवेंस है आज के युग में बोल दिया। अभी वो जो कहेगी इट विल हैव मच ग्रेटर इंपैक्ट कि ये तो हम लोग कहेंगे। सो ऐसी लेडीज को स्त्रियों को इकट्ठा होकर के दे विल हैव टू पुट दिस फॉरवर्ड। मां ने खुद कहा था कि एरा होलो नेटो सन्यासी उठ बोलले उठ लो बस बदले बस लो। ये लोग हैं नंगे सन्यासी। उठने को बोला तो उठ गए। बैठने को बोला तो बैठ गए। कंधे पे झोला ले कहीं पे चले गए। किंतु मुझे तो यह सब जो मायाजाल है उसको ले रहना है। ये रास बिहारी महाराज वगैरह जो मां के सेवक थे ना तो ऐसा वो उपदेश देते हैं। कभी-कभी सलाह देते थे मां को जो कि मां के जीवन के साथ में कोई रिलेवेंस नहीं है उनका। हालांकि मां के प्रति प्रेम पूरा है किंतु कहां सन्यास जीवन उनका और कहां मां का फैमिली लाइफ। ना मैं समझ गया। अभी

प्रश्न: कुछ लोग ठाकुर में आस्था तो रखते हैं, लेकिन उनकी शिक्षाओं से सीखकर अपने जीवन में बदलाव नहीं लाते। वे झूठ बोलना या धोखा देना बंद नहीं करते।

देखिए इसी एक्चुअली यह दिस इज नॉट अ शॉर्ट कमिंग। दिस इज अ सिंपली अ कैरेक्टरिस्टिक ऑफ ह्यूमन रेस। देखिए कि वेदांत इनफ नहीं था। वेदांत में आपको सब कुछ बता दिया गया है। यह समाधि षटक संपत्ति है। क्षम, दम, तितक्षा, श्रद्धा, उपरति, समाधान यह सब आपको जीवन में डालना है। यह जो मैत्री, करुणा, मुदिता, उपेक्षा यह सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य, तप, शोच, संतोष, स्वाध्याय, ईश्वर प्रणिधान शास्त्र भरे पड़े हैं इस तरह के गुणों से। किंतु, यह गुण रेयरली 1%, 10% लोग शायद अपने जीवन में डाल पाते होंगे। क्योंकि यह ह्यूमन लिमिटेशन ही ऐसी है। तो फिर यह भक्ति शास्त्र की रचना, अवतार का आना यह क्या है कि भक्ति के माध्यम से प्रेम के माध्यम से हम इस संसार जाल जो है उसका भेदन करें। यानी कि भक्ति शास्त्र का प्रारंभ ही इसलिए हुआ है कि आप वो जो जो ये जो आइडियल्स है उसको आप फॉलो नहीं कर पा रहे हैं। यम नियम कहो ना कि ये समाधि षडक संपत्ति कहो फॉलो नहीं कर पा रहे हैं। वेदांतिक योगिक आइडियल्स बोलकर के ही यह अवतार और भक्ति शास्त्र की रचना। सो इट इज गिवन कि आप इस रास्ते पर चल रहे हैं। देयर आर सीरियस शॉर्ट कमिंग्स विद इन योर पर्सनालिटी बोल के ही आप इस शास्त्र पर चल रहे हैं। सो व्हाट यू आर सेइंग इट्स नॉट अ बग। इट्स अ फीचर आज की लैंग्वेज में जैसा है। म आप दूसरों की गलतियां देख रहे बोलकर के ये भक्ति शास्त्र पे चल रहा है। वरना तो वेदांत और योग तो है ही है। हां अरे रात

प्रश्न: वहां गणेश पूजा का उत्सव कैसा होता है?

को तो 1:00 बजे पटाखे फूटना शुरू हो गए। मेरी तो नींद ही उड़ गई। फिर सुबह से ही वह माइक लाउडस्कर चल रहा है। यहां हमारी यह सीपी क्लीनिक वगैरह सब जगह आज छुट्टी है। क्योंकि बिकॉज़ कि वहां के जो नॉर्थ इंडियन जो त्यौहार है सब यहां पे ऐसे होते नहीं है। जैसे दीपावली वगैरह में मैंने ज्यादा कुछ नहीं देखा। यहां पे पोंगल का ज्यादा महात्म है। सो नॉट नेसेसरी कि ये बिकॉज़ कि ये नॉर्थ इंडिया में होता है बोल के यहां पे होगा। किंतु देखा कि हो रहा है आज। आई डोंट मन अहमदाबाद में नहीं था। यह आश्चर्य की बात है। वड़ोदरा में तो बाप रे मतलब मैं तो छोटा था तब से देख रहा हूं। गणेश पूजा यानी कि ओ हो हो बहुत बड़ा उत्सव अहमदाबाद में नहीं था। व्हिच इज ना यहां पे सुबह से ही ये वो चालू हो गए लाउडस्पीकर पे। अभी तेलुगु भजन है तो समझ में नहीं आ रहा कि गणेश के किसके हैं। मैं अनुमान कर रहा हूं कि और किसी दिन नहीं होते। आज हो रहे बल्कि उन्हीं के आप जो कह

प्रश्न: क्या जन-कल्याण के लिए कर्म करने से ईश्वर प्राप्ति होगी?

रहे हैं कि मैं अपने बारे में ना सोच के दूसरों के बारे में सोचूं तो यह कर्म योग होगा। नो डाउट स्वामी जी का जो शिव ज्ञान से जीव सेवा है वह तो है किंतु स्वामी जी ने साथ-साथ में भक्ति वगैरह के बारे में भी कहा है। ठाकुर ने जैसे कहा कि ईश्वर विद्यासागर को अभी पता नहीं है कि हृदय में सोना छुपा है। यानी कि कर्म योग यदि राम रामकृष्ण संघ की यदि आइडियल आप समझे तो दूसरों के कल्याण के लिए नहीं किंतु ईश्वर की ईश्वर को प्रार्थना के रूप में हम कर रहे हैं। ये शिव ज्ञान जीव सेवा एक इसी सेंटेंस में ही है कि शिव समझ करके आपको जीव की सेवा करनी है। सिर्फ जीव सेवा नहीं कहा शिव ज्ञान जीव सेवा कहा है। यानी कर्म जो करते हैं ईश्वर की तृप्ति के विधान के लिए हम कर्म करते हैं। दैट विल बी ट्रू कर्म योग नहीं कि सिर्फ लोक कल्याण के लिए करना। मेरा रांची का अनुभव मैं आपको बताता हूं। सिर्फ लोक कल्याण के लिए कर्म करने से हृदय को तृप्ति नहीं मिलती है। एक समय ऐसा आएगा कि आपको ईश्वर के प्रति अपना जो है आराधना उपासना उसको प्रारंभ करना ही पड़ेगा। ना नहीं यहां पर यहां पर आपको इस तरह से देखना है सांसारिक कर्म भी कर रहे हैं। जैसे कि ठाकुर ने कहा ना कि जो कुछ भी कर्म है आप इस तरह से करना है कि इनके भीतर में आपको ईश्वर को देखना है। बच्चे के लिए ब्रेकफास्ट बना रहे हैं तो उसके भीतर में बाल गोपाल को देखना है। तो इनके भीतर में ईश्वर देख कर के उनकी आप पूजा कर रहे हैं। सेवा कर रहे हैं। इस तरह से करना है। सो एनीथिंग एनीवे आपको ईश्वर को बीच में ले आना है वो आप कैसे भी ले आए दैट इज अप टू यू बट शिव ज्ञान जीव सेवा सिर्फ जीव सेवा नहीं यदि यह ना हो यदि यह ना हो देखिए कर्म को तो आपको पवित्र करना है ना तो आप ऐसा कीजिए कि यह जो कर्म आप कर रहे हैं आप ठाकुर को समर्पित कर रहे हैं भले आप बच्चे के प्रति ठाकुर है ऐसा भाव ना आए आपके कलीग्स को वर्कर है देरानी जेठानी ये सास वगैरह जो है उनके भीतर में मां शारदा ना दिखे तो एटलीस्ट जो घर का कर्म कर रहे हैं मैं मां शारदा को अर्पण कर रही हूं बोल के कर रहे हैं। सो दैट विल आल्सो बी कनवर्टेड इनू कर्म योग। सो दैट इज व्हाट आई एम लिमिटेड पॉइंट एक बता रहा हूं कि ऐसा नहीं कि आप ऐसा ही कीजिए। कैसे भी करके ठाकुर मां को बीच में ले आइए। कैसे लाना दैट इज अप टू यू। बट सिर्फ सेवा इटसेल्फ इज नॉट इनफ। मैं अपने खुद के एग्जांपल से बता रहा हूं। आपको ईश्वर को तो कहीं ना कहीं लाना ही होगा। ओम