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Sri Ramakrishna Kathamrita ·

Sri Ramakrishna Kathamrita 17 July 2023 पूर्व कथा श्री रामकृष्ण के प्रथम प्रेमोन्माद की कहानी 1858

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हमने देखा की किस तरह ठाकुर अपने उसे समय के जीवन की बात कर रहे हैं जब वह तपस्या उनकी साधना समाप्त हो चुकी थी और जगत के साथ जो है बाकियों व्यवहार जो है वो फिर से करना उन्होंने शुरू किया था क्योंकि हमको पता है की ठाकुर जब साधना कर रहे थे तब वो ईश्वर मैन जो पार्टी ना कर रहे थे वह पर्टिकुलर ब्रांच की वो तंत्र कहो ना की वेदांत कहो ना की वो वैष्णव भाव की साधना कहो मधुर पाव की साधना वो उनमें उतना डब गए थे की फिर आसपास में क्या चल रहा है बहुत बार उनको उसे समय उनकी दृष्टि ही नहीं थी किंतु फिर जब वो धीरे-धीरे करके साधना समाप्त हुई इसके बाद में जब यह अंतरंग भक्ति आने लगे इसके बीच का यह जो पीरियड है है की हमको लगता है की हमको यदि अवतार को कभी मिलन है नेक्स्ट जन्म में ठाकुर को प्रार्थना करेंगे की ठाकुर आपके साथ में लेकर ही आएगा आप तो बार-बार पृथ्वी पे उतरते रहते हैं आपके सच में लेकर आएगा और उसे समय आपके साथ में मुलाकात करवाइएगा जब आपके साधना समाप्त हो गई है और आपके पास में ये हम लोगों जिससे लोगों के साथ में बात करने के लिए समय और सुविधा है तो उसे समय की बात है ठाकुर ने कृष्णा किशोर के बड़े में बताया सबसे पहले फिर बताया की उनकी ऐसी अवस्था हो गई थी की यदि देखते हैं की कोई जिसका मतलब सिंसेरिटी नहीं है जिसमें इन सिंसेरे हो करके जब करता है तो जाकर के उसको सीधा चांटा मार देते थे ठाकुर ने वो जय मुखर्जी की बात हुई और रानी रश्मोनी की दोनों को ठाकुर ने देखा की जब कर जय मुखर्जी जब कर रहा था किंतु जब मैं उसका ध्यान नहीं था और रश्मानी ने ठाकुर को कहा था की आप एक दो भजन गई मां के तो ठाकुर मां के गाने सुना रहे थे उसे समय रेखा की उसकी उसका मां कहानी दूसरी जगह चला गया है और वो जो ठाकुर को मां काली को ऑफर करने के लिए जो फूल रखें थे वो फूल पत्रों में से फूलों को चुन रही थी ये देख कर के ठाकुर ने उसको भी दो छाते मार दिए किंतु फिर जाकर के मां को कहा की किस तरह का स्वभाव हो गया है किंतु देखिए ये जो हमने देखा की जी तरह से उत्तम वैद्य होता है तो वैसे ही उत्तम दर्दी भी सामने होना चाहिए उत्तम गुरु जी हमको मिलते हैं की जो हमको मार्कर के हमको शिखा है की साधन के रास्ते में साधन भजन के रास्ते में किस तरह से आगे बढ़ाना है तो सामने में उसे तरह का उच्च सड़क भी चाहिए उच्च शिष्य भी चाहिए जो की वो उत्तम उत्तम शिष्य भी चाहिए जो की ये उत्तम गुरु के उपदेश को ग्रहण कर पे आज यदि हम लोग यहां पर रामकृष्ण मिशन में आते हैं और हम यदि जब करने को बैठे हैं और जब मैं मां नहीं ग रहा मैं यदि मंदिर बैठ करके जाप करने का पर्यटन कर रहा हूं मेरा मंडी पब्लिकेशन में ए गया है सोच रहा हूं की यह किताब प्रिंट हनी है वह इस महीने का मैगजीन का यह लेख छापना है लेख प्रूफ्रेड करना है इस किताब का वो पैसा पेमेंट करना है वो पेपर का पेमेंट ये जब चीजों में यदि मेरा मां चला जाता और कोई हमारे बड़े महाराज है या कोई सीनरी साधु आकर के मुझे एक चांटा मार देते हैं मेरे मुंह पे दो कहते तो मुझे कैसा लगता की हमने वो ले पाऊंगा की पॉजिटिव वे में की हां वो महाराज तो मेरे से सीनरी है और मेरी ही भलाई के लिए उन्होंने मुझे मारा जिससे की मेरा मां जाप में लगे जब मैं मंदिर में बैठ के जाप करता हूं तो जब मैं ही मेरा मां होना चाहिए फिर जब मैं पब्लिकेशन में आकर के कम करता हूं तो भले चाहे वो डिपार्मेंट का जो भी कम है उसको लेकर के मैं व्यस्त रहो मंदिर में बैठा हूं डिपार्मेंट का कम में मंदिर में क्यों ले जाऊंगा किंतु यह हम पॉलिटिकल सोचते हैं की यदि मेरे साथ में ऐसा होता तो फिर मैं इसको पॉजिटिव वे में लेट की नहीं ठाकुर का ही यह मैसेज है ठाकुर ने ही इस सीनरी साधु के थ्रू मुझे सिखाया है की मां लगाकर के जब करो किंतु ऐसा हम बोलते हैं वास्तव में ऐसा कभी नहीं होने वाला यदि हम सीनरी सातों के साथ में झगड़ा ना भी कर ले मां लीजिए हो सकता है की हम लोग झगड़ी लेंगे क्लियर है आपको कौन किसने अधिकार दिया है की मुझे इस तरह से करने का आप यदि सीनरी है और आपको यदि कंसर्न है मेरे बड़े में कुछ तो मुझे बताइए प्रेम से कहिए की अरे भैया मंदिर में बैठे हो दूसरी 10 बातें छोड़ो ठाकुर के ध्यान दो ऐसा मुझे अब शब्दों में कहिए करने की क्या जरूर थी ऐसा शायद कोई रहेगा कोई तो एकदम झगड़ लगा की आपने मुझे मारा तो मैं भी मारूंगा ऐसा भी किसी का हो सकता है बहुत ही रेयरली हम इसको उसे स्पिरिट में लेंगे जी पीरियड में रानी रश्मोनी और जय मुखर्जी ने लिया होगा क्योंकि ठाकुर उत्तम सड़क देखकर के ही ये उत्तम ट्रीटमेंट उसको देते हैं इसको कहेंगे उत्तम ट्रीटमेंट मुंह पे दो चांटा मारना ये जी तरह से तोता पुरी वो गंगा के किनारे नदी में बैठ के जा रहे थे नवयुका में फिर देखा की यहां पे सुंदर स्ट्राइक मंदिर है राजकुमार कालीबाड़ी चलो हम जाकर के मंदिर में रहते हैं कुछ दोनों के लिए मंदिर में तो क्या है साधु संतो के लिए वो भिक्षा की व्यवस्था होती ही है तो ऐसा सोच करके चांदनी में उन्होंने अवतरण किया देखा की ठाकुर वहां पे बैठे हुए हैं तो ठाकुर को देखकर के ही तोता पुरी को लगा की अरे वहां ये तो उत्तम सड़क है यह तो श्रेष्ठ शिष्य है वो तो ये तो वेदांत सिख ही सकता है तो तोतापुरी ने ठाकुर को कहा की क्या तुमको मैं तुम्हें वेदांत की शिक्षा ग्रहण करने के लिए सभी जो सदगुण है जो भी क्वालिटी से मैं तुम्हें देख रहा हूं क्या तुम वेदांत की शिक्षा ग्रहण करोगे क्या तुम मुझे वेदन साधना करोगे वेदांत सीखोगे क्या ऐसा जब ठाकुर तोतापुरी कहते हैं तो ये क्या कहते हैं ठाकुर की हां मैं पहले जाकर के अपनी मां को बोल के आता हूं मां की परमिशन लेकर आता हूं तो तोतापुरी सोच रहा है की अरे ये तो बच्चे जैसा स्वभाव है इनका और बच्चे जैसा सरल स्वभाव है बोलकर के ही तो वेदांत सीखने के लिए वो उत्तम शिष्य के रूप में उन्होंने सिलेक्ट किया है उनको किंतु जब यह ठाकुर यह कहते हैं ऐसा की जब ऐसा कहते हैं तोतापुरी की तुम जाकर के ठाकुर जब ऐसा कहते हैं की हां मैं जाकर के उनकी परमिशन लेकर आता हूं मां की तो तोता पुरी सोचते हैं की वो जाकर के अपनी गर्भधानी मां को पूछेंगे जिन्होंने ठाकुर को जन्म दिया उनको पता नहीं की ठाकुर ने जाकर के मां काली को पूछा है और मां काली ने ठाकुर को उत्तर दिया की हां जाकर के तुम वेदांत शिक्षा ग्रहण करो यह सुनकर के मां काली की परमिशन लेकर के ठाकुर ने ये तोता पुरी से वेदांत शिखा था तो ये जो है की वेदांत सीखना या तो फिर जब ध्यान करना साधना करना उसके लिए यदि हम चाहते हैं की हमको भी ठाकुर जैसे हमको भी तोता पुरी जैसे उत्तम शिक्षक उत्तम गुरु मिले तो हमें भी वो उत्तम शिष्य होने की तैयारी हनी चाहिए किंतु आजकल ऐसा उत्तम शिष्य मिलन मुश्किल है ठाकुर मैंने ठाकुर देखिए की स्वामी जी ठाकुर के सर्वश्रेष्ठ शिष्य थे किंतु ठाकुर ने स्वामी जी को मारा हो यह उल्लेख मैंने कहानी पे भी नहीं पढ़ा शायद ऐसा हुआ होगा किंतु यह रिकॉर्ड नहीं है तो ठाकुर ने इसीलिए फिर मां को प्रणाम बार-बार विनती की मां यह मेरा कैसा स्वभाव हो गया है की जिसके भीतर में भी मैं इन सिंसेरिटी देखा हूं तो मैं उसको जाकर करने के लिए दौड़ा जाता हूं दौड़कर चला जाता हूं यह आज इस जगत में इस तरह की शिक्षा ग्रहण करने वाले कलयुग में बहुत कम होंगे ऐसा ठाकुर ने मां को प्रार्थना की और मैन ठाकुर का इस तरह का जो स्वभाव है वो वापस ले लिया इसीलिए ठाकुर ने शायद स्वामी जी को मारा भी होगा चांटा मैंने कभी ऐसा पढ़ा नहीं है शायद रिकॉर्ड कहानी पे भी नहीं है तो इसलिए हमको मां लेना है की यह जय मुकुट जय और रानी रश्मोनी के बाद में जितने भी ठाकुर के पास में शिष्य आए स्वामी जी का शायद उनको छोड़कर के तो हम सब जो है मध्य शिक्षक मध्य विद्यार्थी है मध्य शिष्य है मध्य सड़क है उच्च सड़क या तो उत्तम सड़क शायद ठाकुर के पास में इन दोनों के बाद नहीं आए अच्छा ठाकुर ए गए कहते उसे अवस्था में ईश्वर की बटन को छोड़कर के और कुछ भी अच्छा नहीं लगता था विश्व और तथा उच्च सुन ले बोसे बोसे कांटा यह विषयों की बातें हो रही है यह सुनकर के मैं बैठे-बैठे रोटा था माथुर बाबू जो खून संगे कोर तीर्थ लोहे जेलो तो खून काशी ते राजा बाबू बड़ी ते कोई दिन अमर छिलम माथुर बाबू जब मुझे अपने साथ में तीर्थ यात्रा करने के लिए काशी ले गए तब राजा बाबू वहां पर कोई राजा बाबू होंगे उनके घर पर हम लोग कुछ दिन के लिए खाने में बैठा था राजा बाबू और उनका जो भी दाल वगैरा जो है देखा की वे लोग संसार और यह धन संपत्ति यह व्यापार यह सब बातें कर रहे हैं विषयों की बातें कर रहे हैं उनके व्यापार में यह सब बातें अमी कांटे लग्लैम बोलना मां कोठारी लगा कहां मां कहां ले आई हो तुम मुझे ई के रश्मनीर मंदिर खूब भालू चिलम में रश्मानी के काली वादी में मंदिर में कितना अच्छे से था तीर्थकारते शो कामिनी कंचन एयरपोर्ट था तीर्थ करने के लिए आए और देखा यहां पे भी ये सब कामिनी कंचन की बातें किंतु शेख ने अर्थात दक्षिणी चूड़ा कोठा सुनते हो नहीं किंतु दक्षिणेश्वर में तो मुझे विषयों की बातें सनी नहीं पड़ती थी देखिए कितना यह हम अनुमान करके देख सकते हैं कैसा एक दृश्य होगा यह सब विषय लोग यह सब व्यापारी लोग यह लोग सब दिन रात पैसे के मामले में यह अदालत के मामले में यह ले बीच के मामले में दुबे हुए यह राजा बाबू है और यह मथुरा बाबू है यह लोग सब बैठक खाने में बैठे हैं साथ में बेचारे ठाकुर बैठे हैं और ये लोग बातें कर रहे हैं की हमने इसके साथ में ये बिजनेस किया उसमें इतना रुपया नुकसान हुआ तो उसके साथ में ये बिजनेस किया तो हमको ये प्रॉफिट हुआ और ठाकुर बेचारे बैठ करके देख करके ये सब सुनते सुनते ही रोना शुरू कर दिए और रोते-रोते बोले मां ये तुम मुझे कहां लेक आई हो कालीबाड़ी में था दक्षिणेश्वर में था तो इटालिस्ट माथुर बाबू मुझे लेकर के कुठीवाड़ी में नहीं ले जाते थे जहां पे ऐसे विषय लोगों के साथ में बातें करते थे या तो फिर हमको पता है की ठाकुर माथुर बाबू के जांबाज स्थित जो घर था वहां पे भी ठाकुर रहे हैं किंतु किस अवस्था में ठाकुर का उसे समय दासी भाव था सखी भाव था मां की दासी मां की साकी मां काली की और ठाकुर उसे समय स्त्रियों के वस्त्र धरण करते थे और मधुर बाबू के घर में जो सब स्त्रियां थी अंतपुर जो की भीतर का जो आ कैमरा या तो भीतर का विभाग कहा जाएगा उसे समय तो पर्दा प्रथम थी तो स्त्रियां बाहर नहीं आई थी पुरुष लोग भीतर में नहीं जाते थे उसे समय में ऐसी अवस्था में भी ठाकुर के ऊपर में माथुर बाबू को संपूर्ण रूप से इस तरह का विश्वास था की अब उनके घर की स्त्रियां जी अंतपुर में रहती है वहां पे भी ठाकुर जाते थे स्त्रियों के कप वस्त्र धरण करते थे और उन सबके साथ में वह जो उनके घर की स्त्रियां हैं उनके साथ में मां काली को चमार व्यंजन करने के लिए जाते थे बिल्कुल और किसी को लगता नहीं था लड़कियां औरतें जो सब थी उनको लगता नहीं था की ठाकुर पुरुष है संपूर्ण रूप से सखी भाव दासी भाव अपने ऊपर में उन्होंने आरोपित किया था यह जो सब वैष्णव साधना की भाव साधना जो है वैष्णव वैष्णव ब्रांच के भीतर में यह भाव साधना एकदम पावरफुल साधनाएं किंतु क्या है की यह साधनाओं का ठीक से यदि अपना मां संपूर्ण रूप से निष्काम निष्पाप ना हो तो ये सब साधना करना बड़ा कठिन है इसीलिए बात-बात में रामकृष्ण मिशन में देखिए की स्वामी जी जब अमेरिका से आए थे और वो शिवा रात्रि वगैरा का कुछ उत्सव वो वो सेलिब्रेशन हो रहा था उसे समय किसी ने वो मधुर भाव का कोई भजन आरंभ किया तो स्वामी जी बड़े ही नाराज हो गए कहा की ये सब भाव छोड़ दो अभी अभी 1000 साल से तो हम लोग ये सब भाव मधुर भाव वगैरा कर रहे हैं अभी शिवा के भाव से अपने मां को भर दो तांडव नृत्य करो ये अफवाह का भाव अपने भीतर में जगह तो क्या है की मैं जब स्वामी जी और ठाकुर को पहले पहले बार पढ़ना था तो क्या है की बुद्धि इतनी परिपक्व नहीं थी की मैं यह समझ मुझे लगता था ये कांट्रडिक्शन क्यों है ठाकुर यहां पर भाव साधना करते हैं मां की दासी मां की सच्ची या तो फिर मधुर भाव साधन यह सब करते हैं स्त्रियों के साथ में रहते हैं स्त्रियों के वस्त्र पहना हैं यह भाव से भाव समुद्र में संपूर्ण रूप में डब जाते हैं किंतु स्वामी जी हमको दूसरी ही शिक्षा देते हैं कहते हैं अद्वैत भाव के साधना करो शिवा के भाव से अपने मां को भर दो तो यह मधुर भाव ये दोनों की विरोधाभास्ञ क्यों है यह मुझे ऐसा प्रश्न होता था किंतु आज मुझे पता है की इसका उत्तर यह है की जब तक मां में पवित्रता नहीं आई तब तक हमको यह भाव साधना में आगे जाना हमारे लिए बड़ा ही विपत्ति जनक है बड़ा ही ये एक डेंजरस चीज है क्योंकि यदि मेरे मां में कहां पर भी थोड़ा सा भी कम भाव र गया है तो यह सब साधना करते-करते पर फिसल जाएंगे और फिर जैसे हमारे साथ में बहुत बार बार होता है कितने सारे साधकों के साथ में की वह यह सब तरह की साधना करने को गए और फिर संसार में डब गए यह एक अचलानंद बोल करके एक तांत्रिक ठाकुर के पास आता था तो ठाकुर कहते हैं की मैं करण पान नहीं कर सकता करण का नाम सुनने से ही जगत करण का उद्दीपन हो जाता है तो अभी करण अर्थात की शराब ये अल्कोहल यह तन तांत्रिक साधना में यह शराब पी जाति है यह उसको ग्रहण करने के बाद में तांत्रिक साधना में मां लगता है ऐसा इन लोगों का एक चिंता है एक ऐसा इन लोगों का एक भाव है तो ठाकुर बोलते हैं की मैं शराब की बात सुनने से ही करण की बात सुनने से ही जगत करण का उद्दीपन हो जाता है जगत करण कौन तो मां काली मां जगदंबा तो जगत करण का उद्दीपन होने से ही मैं समाधि में चला जाता हूं किंतु मैंने देखा है जो ठाकुर कहते हैं की यह करण पान करने वाले जितने भी लोग हैं वह करण पान करने के बाद में अनाचार ही करते हैं किंतु ठाकुर कहते हैं की अचलानंद को मैंने देखा है की वो करण पान करने के बाद में स्थिर होकर के जाप करता है तो ऐसे कोई कोई सड़क होते हैं की इस तरह की साधना करेंगे भी और साधन इस तरह की साधना का अनुष्ठान करने के बाद में भी जब स्थिर हो करके जब करने को बैठने की उनकी क्षमता रहेगी ज्यादातर सड़क ऐसा नहीं कर सकते इसीलिए इस पूरे रास्ते में रामकृष्ण संघ के जो भी देवोटी है साधु है भक्ति है हम लोग इस डायरेक्शन में कभी नहीं जाते किंतु यह सब जानकर के समझ करके पढ़कर के रखना है की यह भी एक लेजिटीमेट साधना है और जब हम जाप करते हैं ध्यान करते हैं तो ठाकुर इस तरह की साधना करते हैं या तो ठाकुर के जो भी कार्यकलाप है ठाकुर की जो लीला है उसका चिंतन करना मेरे लिए बहुत ही फायदा कारक जिसको कहते हैं लीला लीला चिंतन अथवा तो लीला ध्यान लीला ध्यान करते-करते ठाकुर ने जी तरह की साधना करके जी तरह की सिद्धि प्राप्त की वो साधना मीणा की है वो सिद्धि हमको प्राप्त हो जाएगी मां के भीतर में स्त्रियों के भीतर में मां का दर्शन करना यह सिद्धि ठाकुर का लीला अध्ययन करके ही प्राप्त हो जाएगी इसके लिए मुझे उसे ठाकुर ने जी तरह की साधना की उसे तरह की साधना करने की मुझे जरूर नहीं है ठाकुर में ही सर्व देव देवी स्वरूपाय जी तरह से स्वामी जी ने ठाकुर के बड़े में कहा है वैसे ही सर्व साधना स्वरूप है जितनी भी साधना है जितने भी साधन भजन की पद्धतियां हैं उन सब का मूर्ति मंत्र स्वरूप ठाकुर है ठाकुर का नाम जाप करने से ही ये तंत्र साधना कहो की मधुर भाव की साधना कहो की अद्भुत वेदांत की साधना कहो की दसी भाव एन की सखी भाव एन की दासी भाव नक्की शांत भाव जितने भी भाव है हजारों भावों की मित्रों साधनाएं जो की हमारी भारतीय हिंदू परंपरा में वर्णित है वो सब साधनाओं का फल सिर्फ ठाकुर का नाम जाप करने से ठाकुर का चिंतन मनन करने से हमको प्राप्त होगा हमको उसे सब साधनाएं करने की आवश्यकता नहीं रहेगी दो चीज है एक तो हम एक क्षमता नहीं है दूसरा की हमारी ये जो पवित्रता हमारी इतनी नहीं है की हम अपने को संभल करके ये सब साधनाएं कर पे इसलिए ठाकुर का नाम स्मरण हमारे लिए जाता है किंतु साथ-साथ में ये सब पढ़ करके रखना है ठाकुर के बड़े में जिससे की हम ठाकुर का चिंतन करते करते यह सब साधनाओं का बेनिफिट जो है उसका परिणाम जो है वो हम प्राप्त कर पे अच्छा तो यह आखिरी प्रसंग इस ठाकुर जो बता रहे थे प्रसंग समाप्त हुआ फिर मास्टर महाशय लिखने हैं ठाकुर भक्ति डर विशेष हो नरेंद्र के एक तू विश्राम कोरीताब बोली लेने ठाकुर ने भक्तों को खास करके विशेषतः नरेंद्र को थोड़ा सा विश्राम करने को कहा नीचे वो छोटो खट्टे फ्टू विश्राम करेट जेलें वो खुद भी छोटा खाट जो है उसके ऊपर में विश्राम करने के लिए गए और यह बात हमने डिस्कस की थी की बार-बार ठाकुर नरेन को इंर्पोटेंस दे रहा है नरेंद्र के सामने देख करके बात कर रहे हैं नरेंद्र को का रहे हैं की नरेंद्र तुम विश्राम करो फिर बाकी सब कुछ जहां जगह मिली वो वहां पर सो जाएंगे या तो थोड़ा सा विश्राम करेंगे ठाकुर को नरेंद्र की फिक्र सबसे ज्यादा है तो हमने डिस्कस किया था की नरेंद्र ठाकुर के सॉन्ग की स्थापना करने के लिए ठाकुर का स्वभाव प्रचार करने के लिए अपने शरीर का प्रत्येक खून का प्रत्येक बिंदु जी तरह से बहाई है जी तरह से उन्होंने अपने आंसू अपने खून अपना पसीना बहाई है उन 40 साल की छोटी सी उम्र में ही उनके शरीर के भीतर में इतने सारे रोगन को प्रवेश मिल गया था उनकी कठिन कर्मयोग की वजह से उनके कठिन प्रचार की वजह से वेदांत के प्रचार की वजह से की 39 साल की उम्र में ही उनको महासम्मती लेनी पड़ी ये सब देखने के बाद में हमको लगता है की ठाकुर नरेन को जितना भी आधार जितना करें वह कम है क्योंकि नरेंद्र के ऊपर में ही उनका भाव प्रचार भविष्य का होने वाला है अच्छा अभी दूसरा एक प्रसंग आरंभ होता है मास्टर महाशय लिखने हैं इस दिन की संध्या हुई है शाम हुई है नरेंद्र बंधु प्रिय हाजरा शुक्ल नरेंद्र और उसका बंधु प्रिया और हाजरा सभी उपस्थित है नरेंद्र कीर्तन गाहिले खोल बजीते लगी लो नरेंद्र कीर्तन ग रहे हैं वह पखवाज बजाने लगा चिंता या मोमो मानुष भक्ति हृदय रंग जीतो कोटी शशि बिनती तो बिजली चमो के शेरों को आलोक के पुलकेश जी बानो रेडी कमल देखो शांतो मन प्रेम ठाकुर के स्वामी जी के में जो पहले पहले बार आया था राम कृष्णा बेलूर मठ में जॉइन करने के लिए वहां पर सब समय यह सब भजन चलते रहते हैं मुझे समझ में नहीं आता था की बंगाली में क्या कहना चाहता है किंतु इसका जो मथुरिया है इसका जो भाव है इसकी जो पवित्रता है वह ऐसा मुझे ग जाता था की यह सब भजन मेरे मुख्यस्त हो गए थे उसके उसके बाद में जब काली कीर्तन हो रहा है यह वहां पर हम साधु ब्रह्मचारियों के लिए एक विजिटर्स रूम है वहां पे वो का जाता है विजिटर्स में किंतु संध्या के बाद में सिर्फ साधु ब्रह्मचारी ही वहां पे रहते हैं और सब मिलकर के भजन कीर्तन करते हैं तो जब साधु ब्रह्मचारियों का भजन कीर्तन चल रहा हो ना की फिर वो दुर्गा पूजा के मंडप में वो काली कीर्तन चल रहा हो की अपना जो में टेंपल है वहां पे एक कीर्तन भजन चल रहा हो मुझे कभी भी वो कुश्ती का गण की पुष्टि का हाथ में लेकर के देखने की जरूर नहीं पड़ती थी इतने सब भजन मुझे मुकेश तक हो गए थे आज फिर आज तो मैं बहुत कुछ भूल गया हूं क्योंकि मैं मंदिर में जाना बहुत दोनों से बैंड कर दिया है आरती वगैरा होती है तो मैं अपने रूम में ही बैठ करके सुनता हूं और ठाकुर की कृपा से यहां राजकोट में मेरा रूम बिल्कुल मंदिर के बगल में है तो जो कुछ भी भजन ज्ञान चला है और यहां के साधु ब्रह्मचारी भी इतना सुंदर भजन जाते हैं ठाकुर ने इतना उनको कौशल दिया है राजकोट के ऊपर में ठाकुर की कृपा है की बहुत सारे कोई-कोई सेंटर में ऐसा होता है की अच्छे भजन गाने वाले साधु ब्रह्मचारी नहीं मिलते किंतु हमारे यहां पर एक नहीं दो बहुत सारे साधु ब्रह्मचारी है जो की बहुत ही सुंदर स्वर से ठाकुर का नाम कीर्तन कर सकते हैं तो ये सब मुझे अपने रूम में बैठकर को सुनने को मिलता है तो मैं क्या करूंगा संध्या बात आरती जब आरंभ होती है रूम में चला जाता हूं सब कम बैंड उसे समय अपने रूम की लाइट भी बैंड कर देता हूं पूरा अंधेरा राहत है खिड़की खुला राहत है तो मंदिर दिखता नहीं है वैसे किंतु मंदिर में से जो भी यह मधुर ध्वनि आई है पूरा वो खिड़की से रूम में आई है और मैं सुन करके बैठ करके सब सुनता राहत हूं तो इसलिए आजकल जो है यह मुख्त नहीं है किंतु जब भी मैं सुनता हूं यह सब तो लगता है की हां की सही में दक्षिणेश्वर में ठाकुर के उसे कमरे में जहां पर नरेंद्र ग रहा है और ठाकुर यह सब सुनकर के कीर्तन कर रहे हैं या तो समाधि में मैग्ना हो गए हैं चलो हम भी वहां पर चले जैन और वहां भी ठाकुर के साथ में बैठ करके ये सब सुन या तो ठाकुर के साथ में कीर्तन में हम लोग भी योगदान दें नरेंद्र बारगाही लन सत्यम शिवम सुंदरम भारतीय रिद्धि मंदिर है निरखी निरखी अनुदिना मोर डूबो रूपोसागर में और दूसरा एक भजन हमारा संबंध अच्छा राहत है नहीं राहत है कम का टेंशन राहत है यह सब जब चला है हमारा जब मां शुष्क हो जाता है करो नाम गण तब ईश्वर का नाम गण करो शब जानकारी यह छिन्नो करो पापा बंधन ये भी एक सुंदर है की ऐसा हुंकार करो भगवान का नाम लेकर के की पाप का बंधन चिन्ना भिन्न हो जाए और जैसे वीरभाव से ठाकुर का नाम लेना है स्वामी जी ने एक बहुत सुंदर बात कहीं है जब भी अपने मां में कम का आवेश होता है तब क्या करना है की साधुओं के बीच में जाकर के निर्वस्त्र हो जाना है और बोलना है देखो मेरे मां में एक कम का उदय हो रहा है तो जैसे ही आप ऐसा करेंगे कम भाव आपके मां से चला जाएगा अब सुन करके हंसी आई है मुझे भी पहले बार हंसी आई थी किंतु स्वामी जी समझते हैं साइकोलॉजी देखिए जहां पर अंधेरा होता है जहां पर सीक्रेसी होती है गोपनीय होती है वहां पर ही यह सब दुष्कर्म जो है दुर्गुण जो है यह पाप विचार जो है वो हमारे मां में आता है यह पाप विचारों के ऊपर में प्रकाश डालने से पवित्रता का प्रकाश डालने से सब पाप विचार चले जाते हैं इसीलिए सबके सामने जाकर के वो एक्सेप्ट कर लेना है की देखो मेरे मां में यह विचार ए रहा है जैसे ही बोला इमीडीएटली ये विचार भाग जाएगा जैसा हुंकार करके ठाकुर का नाम लेना है इसलिए यहां पर कहते हैं हम लोग मगन हो जाए कितने सुंदर एक के बाद एक भजन और भजन में भी किस तरह का यह तत्वज्ञान या तो फिर फिलासफी या तो दर्शन भारत हुआ है खोलकर ताल लोहिया कीर्तन हुई ते छे खोल और करताल खोल अर्थात में पखवाज ऐसा अनुमान कर रहा हूं ये संगीत वगैरा में मेरा इतना वो नहीं है वो मेरा अंडरस्टैंडिंग तो करताल अर्थात की वो हाथ से जो ताली बजाते हैं वो मंजीरा वो उसको लेकर के कीर्तन चल रहा है नरेंद्र आदि भकतीरा ठाकुर के बेड़िया बेड़िया कीर्तन कारी ते छे नरेंद्र और बाकी सब भक्ति ठाकुर के आसपास खड़े-खड़े कीर्तन कर रहे हैं कभी गेट हैं प्रेमानंद रस में हो चिरमगन हो आभार को खून गए थे सत्यम शिवम सुंदरम भारतीय विधि मंदिर है ठाकुर में नरेंद्र ने अपने से खोल धरण किया है को लेकर के ठाकुर के साथ में ग रहे हैं आनंदाबोदो ने बोलो मधुर हरनाम आनंद वर्धन ए बोलो मधुर हरिनाम कीर्तिदान नरेंद्र के ठाकुर अनेक खन डोरिया बार-बार आलिंगन कोरिलैंड बोली ते छे तुम के आखिर में ठाकुर बार-बार नरेंद्र को आलिंगन कर रहे हैं और का रहे हैं तुमने आज मुझे जो आनंद दिया उसकी में क्या बात करूं यहां पे क्या बात करूं ऐसा नहीं लिखा सिर्फ इतना लिखा है तुम्ही हमारी के आनंद दी ले तुमने मुझे क्या आनंद दिया है ऐसा आनंद जो शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता देखिए ठाकुर और नरेंद्र का यह जो संबंध है वह देखकर के उसके बड़े में पढ़कर के हमको लगता है की हमको भी यदि इस तरह के गुरु मिले होते तो हम भी अपने जीवन में कितना प्रगति कर पता है तो भले चाहे हमको ना मिले हो ठाकुर के साथ में हमारा मिलन शायद ना हुआ हो किंतु यह पढ़कर के तो हमको लगता है की इनके बीच का इन दोनों के बीच का जो मधुर गुरु शिष्य का जो संबंध है उसका एक गाना भी ये पढ़कर के हमारे हृदय में ए जाए तो भी हम धनिया धनिया हो जाएंगे है तो आज यही तक कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति