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Sri Ramakrishna Kathamrita ·

श्रीरामकृष्ण कथामृत || 14 Dec 1883 - श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ दक्षिणेश्वर में || 24 Jul 2025

प्रार्थना

ओम स्थापकाय धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री रामकृष्ण कथामृत 14th दिसंबर 1883 ऑलरेडी अह मास्टर महाशय दक्षिणेश्वर में रहने के लिए आ गए हैं। ठाकुर ने कहा है कि बीच-बीच में रिट्रीट पर जाना चाहिए और ईश्वर का नाम गुणगान कीर्तन करना चाहिए। तो इस भावना से प्रेरित ठाकुर के इस उपदेश से प्रेरित मास्टर महाशय आए हैं दक्षिणेश्वर में। ठाकुर के मार्गदर्शन नीचे वह साधना करेंगे। ठाकुर ईश्वर प्राप्त कैसे हो? ईश्वर दर्शन कैसे हो? उसकी तीन कहानियां कहते हैं। तीनों कहानियों का सार है सरल रूप से ईश्वर को पुकारना चाहिए। तो यह सरलता क्या है? इसके बारे में हमने ऑलरेडी चर्चा की। अभी यह कहानियां समाप्त हो गई है। संध्या का समय है। मास्टर महाशय आज सुबह को ही तो यहां पर आए हैं रहने के लिए। तो फिर रात को सोने की व्यवस्था कहां पर होगी? यह सब डिस्कशन अभी ठाकुर के साथ में चल रहा है।

दक्षिणेश्वर में पंचवटी स्थित कुटिया का माहात्म्य

क्या लिखते हैं मास्टर महाशय? शौंधा होइते देरिया छे संध्या होने में अभी भी देरी है। यह संध्या होने का ठाकुर का घड़ी तो हमको पता है। वो जो हाथ के ऊपर में यह जो रोमकूप जो होते हैं हाथ के जो बाल यहां पे जहां पर हम घड़ी पहनते हैं वहां पर वह ठाकुर देखेंगे कि यह हाथों के रोमकूप दिखाई दे रहे हैं कि नहीं। अंधेरे में नहीं दिखाई देंगे और उजाले में दिखाई देंगे। तो जिस समय यह दिखना बंद हो जाए उस समय समझिए कि संध्या हो गई। तो यह ठाकुर की संध्या की घड़ी थी। तो और दूसरा भी यहां पर एक दूसरी घड़ी कौन सी थी? तो जब मंदिर में आरती होगी तो नहबत में से शहनाई बजना शुरू हो जाएगा। और यह फिर घंटा है, निनाद है, वह सब बजने लगेगा। ठाकुर जी की ईश्वर की आरती होने लगेगी। मां काली की और राधाकांत के मंदिर में तो वह एक दूसरा साइन है कि संध्या हो गई है किंतु अभी तक संध्या नहीं हुई संध्या होने में देरी है। ठाकुर श्री रामकृष्ण नबत खानार दक्षिण पारश्व दाणया मणिर शहीद कथा कहते चैन ठाकुर श्री रामकृष्ण नहबत खाने के दक्षिण की ओर खड़े हुए मणि के साथ में वार्तालाप कर रहे हैं। मणिक कौन और ये हमारे मास्टर महाशय सन्मुख है गंगा सामने ही गंगा है शीतकाल ठाकुर गाय गरम कापड़ ठंडी के दिन है ठाकुर ने गर्म कपड़े पहने हुए हैं मोस्ट प्रोबेबबली एक शॉल पहना होगा श्री रामकृष्ण पंचवटी श्री रामकृष्ण कहते हैं मणि के साथ में वार्तालाप कर रहे हैं तो ठाकुर कहते हैं पंचवटी घोरे शोभे पंचवटी के घर में सोओगे। यह पंचवटी का घर अर्थात कि पंचवटी के नीचे में एक कुटिया थी। उस कुटिया में ठाकुर ने यह अद्वैत साधना की थी। तो ठाकुर कहते हैं कि क्या तुम उस कुटिया में सोओगे? तो मणि कहते हैं कि नहबत खाना और ऊपर घटकी देना। यह नहबत खाना जो है उसका जो फर्स्ट फ्लोर है वह क्या देंगे नहीं? अभी हमको तो पता है कि यह नहबत खाना वहां के फर्स्ट फ्लोर में मां रहा करती थी। जबकि यह पहली बार आई थी दक्षिणेश्वर तो ग्राउंड फ्लोर पर रहती थी चंद्रामणि देवी और फर्स्ट फ्लोर पर रहती थी मां। फिर कुछ समय के बाद में मां ने ग्राउंड फ्लोर पर रहना शुरू कर दिया। क्योंकि चंद्रामणि देवी को सतत किसी ना किसी की सहाय चाहिए होती थी। किंतु जब यह वार्तालाप हो रहा है उस समय मां नहबत खाने में नहीं थी तो उस समय नहबत खाना खाली पड़ा था तो मणि कहते हैं कि नबत खाना का यह जो ऊपर का जो घर है कमरा है वह क्या देंगे नहीं ठाकुर खजानची के मणिर कथा बोलीबेन ठाकुर क्या करेंगे खजानची अर्थात कि वहां का जो चीफ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर होगा सीईओ जो होगा वहां का मंदिर का काली मंदिर का उसको जाकर के कहेंगे कि यह मास्टर महाशय यहां पे रात को रहने वाले हैं कुछ दिन तो किसी कमरा उनको रहने के लिए दिया जाए तो ठाकुर यह खजान जी को जाकर के कहने वाले थे तो इसलिए दोनों मिलकर के डिस्कस कर रहे हैं ठाकुर और मणि अर्थात कि मास्टर महाशय कि मणि कहां पर रात को रहेंगे थाक बार घोर एकटी निर्देश कोरेदी कौन से घर में रहेंगे रात को वह बता देंगे तार नौबते ऊपर घोर पछंद होए छ मणि को नौबत के पहले फर्स्ट फ्लोर जो है ऊपर का जो घर है ऊपर का कमरा है वह पसंद हुआ है तीन कवित्व प्रिय मणि है कवित्व प्रिय मास्टर महाशय को कविता अच्छी लगती है अर्थात कि एक सौंदर्य बोध है यह जो नेचुरल ब्यूटी है वह देखना उनको अच्छा लगता है। तो नेचुरल ब्यूटी यदि देखना है तो नबत का जो फर्स्ट फ्लोर है आपने यदि दक्षिणेश्वर की मुलाकात ली होगी तो आपको पता होगा कि कितना सुंदर वो जो सामने वाला जो रास्ता है नबत का वो दिखता है। वह जो पेड़ों की यह जो पूरी लाइन है वो फूल के जो पौधे हैं वो जो गार्डन है उसको लगा हुआ उसकी पूरी लाइन दिखती है। यहां सामने में यह भागीरथी गंगा दिखती है। ऊपर में आकाश दिखता है। बड़ा ही सुंदर दृश्य वहां पे कमरे के बाहर से दिखता है। तो मणि का भी एक ऐसा सौंदर्य बोध था। मास्टर महाशय का कवित्व प्रिय थे। इसलिए वह चाहते थे कि नौबत के नौबत खाने के ऊपर वाले कमरे में रुके। नहबत थे के आकाश, गोंगा, चांदेरालो, फूल, गाछ यही सब देखा जाए। नहबत में से आकाश, गंगा, चांद का उजाला, यह जो फूल के पौधे हैं, यह सब देख सकते हैं। श्री रामकृष्ण देना केो। श्री रामकृष्ण कहते हैं कि क्यों नहीं देंगे? मणि की इच्छा है कि वह वहां पर रहे। ठाकुर की इच्छा है पंचवटी के उस कुटिया में रहे। पंचवटी की कुटिया यदि देखी होगी तो चारों ओर से पेड़ों से पौधों से घिरी हुई उसके बाहर में ज्यादा कुछ दिखता नहीं है। तो यह दोनों के बीच में यह डिस्कशन चल रहा है। ठाकुर क्या कहते हैं देबे ना केनो क्यों नहीं देंगे यह नबत के ऊपर का कमरा किंतु तबे पंचवटी घोर बोलछी ए जनो ओखाने अनेक हरि नाम ईश्वर चिंता होए छे किंतु मैं पंचवटी का घर इसीलिए बोल रहा हूं क्योंकि वहां पे बहुत हरि नाम और ईश्वर चिंता हुई है। देखिए यह जो पूरा माइंडसेट पूरा मेंटालिटी है ठाकुर और यह मास्टर महाशय का कैसे यह डिफर करता है। मास्टर महाशय आज की तरह एक मॉडर्न थिंकिंग वाले हैं। यदि कोई घर लेना है या तो फिर रहने के लिए कोई जगह खोजनी है तो आपको क्या करना है? वहां आसपास में यह नेचुरल ब्यूटी किस तरह की है वह देखेंगे। एक मटेरियलिस्टिक आउटलुक है। जबकि ठाकुर यह आसपास की नेचुरल ब्यूटी नहीं खोज करके अंतर में जो आंतरिक ब्यूटी जो है इनर नेचुरल ब्यूटी जो है उसको खोजते हैं। इसलिए ठाकुर कहते हैं कि तुम उस कमरे में रहो पंचवटी वाले जहां पे कि बहुत सारा हरि नाम और ईश्वर चिंता हुआ है। अभी खिड़की में से बाहर में ज्यादा कुछ दिखेगा नहीं। तो डज नॉट मैटर यहां पर तुम आए हो दक्षिणेश्वर में किसी पिकनिक के लिए नहीं ईश्वर चिंता करने के लिए रिट्रीट के लिए तो रिट्रीट में जितना हमको अपने हृदय की जो खिड़की खोल के आंतरिक सौंदर्य है उसका नजारा देखने का जितना ही हमको अपॉर्चुनिटी मिले जितना ही हमको फैसिलिटी मिले उतना ही ले लेना चाहिए। देखिए मेरा जब बेलूर मठ में पोस्टिंग हुआ था एग्जैक्टली इसी तरह का वार्तालाप वहां पर हुआ था। मैं जब बेलूर मठ गया कंप्लीट वर्क्स में मेरा पोस्टिंग था तो अभी 4 साल तो मिनिमम वहां पर रहना ही था तो अच्छा के कमरा रहना होना चाहिए रहने के लिए क्योंकि बेलूर मठ तो वैसे तो जगह बहुत बड़ी है बहुत तरह के साधुओं के रहने के लिए कमरे हैं किंतु कोईकोई कमरा ऐसा है कि कहां वो भीतर में है। कोई बड़ा सुंदर जगह पे है। तो मैंने एक साथ सीरियसली ठीक किया था कि अच्छी जगह पर रहना है। तो मेरा यह जो जितना भी यह समय है कंप्लीट वर्ष में बड़ा सुंदर रूप से बीतेगा। तो वहां पर जो स्वामी जी थे इंचार्ज स्वामी जी जो कि साधुओं को रहने का कमरा एलोकेट करते थे। उन्होंने मुझे कहा कि तुम एक काम करो मैं उनके पास में गया। मैं तो अभी देखिए वहां पर तो क्या है बेलूर मठ का सिस्टम कि आप सामने से कुछ बोल नहीं सकते हैं। जो आपको कहा जाए उसके अनुसार आपको करना है। तो मैं सोच के गया था कि यदि मुझे कोई ऐसा वैसा कमरा देंगे तो फिर मैं एक बार रिक्वेस्ट करके देखूंगा। देखूंगा यदि कोई सुन लेता है तो क्योंकि यदि आप ब्रांच सेंटर में रहते हैं हमारे कोई भी एक अध सेंटर में तो क्या है कि वहां पर बड़े महाराज होते हैं और हम होते हैं और हम लोग काफी अभी बाय दैट टाइम मेरा सन्यास हो गया था तो मेरा एक सीनियोरिटी लेवल बनता है तो मैं एक डिमांड कर सकता हूं मुझे यह चाहिए वह चाहिए बेलूर मठ में क्या है कि रिवियर्ड प्रेसिडेंट महाराज जनरल सेक्रेटरी महाराज असिस्टेंट सेक्रेटरी महाराज सीधे उस लेवल के लोग रहते हैं तो वहां पे ज्यादा कुछ बोलने का यह आपके पास में यह मौका नहीं रहता। वहां पर जो आपको कहा जाए कि बेलून मठ में रहना है तो ऐसा करना है, यहां पर रहना है, ऐसा खाना है तो आपको चुपचाप सुन लेना होगा। अपना सीनियोरिटी वहां पर बिल्कुल जीरो है। तो मैं यह सोच के गया था कि अच्छा कमरा मिले तो अच्छा है। तो मैं जाकर के महाराज को प्रणाम करके कहा कि महाराज मेरा पोस्टिंग हुआ है यहां पे। आप मुझे कमरा आपको मुझे देना होगा। क्योंकि क्या है कि जब एक बार आप पहली बार जाते हैं तो गेस्ट हाउस जो साधुओं का गेस्ट हाउस होता है बाहर से बहुत सारे साधु बेलूर मठ में आते हैं तो सबके लिए तो एक परमानेंट कमरा तो रखना संभव नहीं है तो गेस्ट हाउस है वहां पे माने मोनेस्टिक गेस्ट हाउस वहां पर सबको रहना है फिर यदि पोस्टिंग होता है तो एक परमानेंट कमरा आपको एलोकेट करेंगे तो मैं वहां पर गेस्ट हाउस में कुछ दिन था फिर मैं जाकर के महाराज को जाकर कहा जो वो एलोकेट करते थे रूम सबको कि महाराज आपको मुझे एक परमानेंट कमरा देना होगा। जनरल सेक्रेटरी महाराज से परमिशन मुझे मिला है। तो वह साधु कहते हैं मैं सोच सोच रहा था कि कौन सा कमरा देंगे। वहां पर बहुत सारी जगह है। मुझे पता है कौन-कौन सी जगह है। कौन-कौन से लोकेशन है। बेलूर मठ तो हम सबको बहुत अच्छे से फेमिलियर होते हैं जो दो साल ट्रेनिंग सेंटर में रहते हैं और मैं तो जॉइ भी वहीं पर करने को गया था। तो बेलूर मठ का पूरा लेआउट बड़ा ही मुझे एकदम क्लियर था मेरे माइंड में। तो मैं सोच रहा था कहां देंगे। तो पता है उन्होंने मुझे क्या उत्तर दिया? वेरी सरप्राइजिंगली। इस तरह का उत्तर मैंने किसी को क्योंकि क्या है कि साधुओं में तो सब बातें चलती रहती है ना। वहां पे जो जो साधुओं का जो ऑलरेडी पोस्टिंग हुआ था उन सबके साथ में सब तरह का वार्तालाप चलता है। तो वे लोग कहेंगे कि तुमको जो कमरा देंगे तुम उसमें कुछ बोल नहीं पाओगे। याद रखना ऐसा करके मुझे डरा करके भेजा था। उन जब महाराज ने मुझे उत्तर दिया आई वास सो सरप्राइज। वो महाराज मुझे कहते हैं अच्छा तुम एक काम करो जितने भी खाली कमरे हैं उसमें से कोई भी तुम अपनी इच्छा अनुसार पसंद कर लो। मैं तो एकदम आश्चर्यचकित हो गया। इस तरह का उत्तर किसी को मिलता है। इस तरह का चॉइस किसी को मिलता है। मैंने किसी से नहीं सुना था। तो जो भी है अभी ठाकुर की कृपा से ना कि स्वामी जी की कृपा से स्वामी जी का काम करने को गया था तो स्वामी जी की कृपा से यह ओपॉर्चुनिटी आया। तो जैसे ही महाराज ने मुझे ऐसा कहा कि तुमको जो कमरा चाहिए चुन लो। इमीडिएटली मेरा माइंड वह फिर मैंने महाराज को पहले तो इतना बुद्धि था मेरे में कि फटाक करके महाराज को कह ना दूं कि मुझे यह कमरा चाहिए। मैंने तो कहा कि महाराज आप मुझे थोड़े दिन दीजिए। मैं सब सर्वे कर लेता हूं बेलून मट का कौन-कौन से खाली कमरे हैं। फिर वहां पर जाकर के मैं देखूंगा। यह अच्छा लगता है तो मैं आपको आकर बताऊंगा। तो महाराज कहते हैं अच्छा ठीक है। ठीक है। जाओ। वो बड़े बिजी रहते हैं ना। हमारे जैसे इतने साधु 200 साधु तो वहां पर रहते हैं। फिर ब्रांच सेंटर में से प्रतिदिन 30 ने 40 साधु तो रेगुलरली वहां पर आते रहते हैं। तो ठीक है। मैं वहां से निकल कर के सीधा इधर-उधर दौड़ने लगा कि कहां पे कौन सा कमरा अच्छा है। मेरे माइंड में कौन सा कमरा था? यदि आप बेलूर मठ गए होंगे तो नीलांबर मुखर्जी गार्डन जो है उस जगह पर जाते जाने के समय में बीच में एक साधु निवास आता है। यह सिर्फ साधुओं के लिए ही है और साधु निवास बिल्कुल गंगा के किनारे है और ये जो प्रेसिडेंट महाराज का जो क्वार्टर है उससे थोड़ा सा आगे जाकर के वो आता है और बिल्कुल गंगा के किनारे है उसमें कि फर्स्ट फ्लोर यानी कि फर्स्ट फ्लोर उसका जो खिड़की है एग्जैक्ट गंगा के ऊपर में खुलता है। वह खिड़की में से गंगा आप देखेंगे डिस्टेंस कितना होगा? मुश्किल से 5 फुट होगा। 5 फुट आप हाथ लंबा आएंगे तो सीधा आप गंगा को गंगा के ऊपर में हाथ जाएगा फर्स्ट फ्लोर की खिड़की से इतना मतलब पास में है और गंगा बेलूर मठ के सामने आप तो देखे ही होंगे कितना सुंदर नजारा है और सामने में गंगा है पीछे में प्रेसिडेंट रिवर्ड प्रेसिडेंट महाराज का क्वार्टर थोड़े ही दूर में है। वर आप वॉकिंग डिस्टेंस आपको मुश्किल से दो-ती मिनट होगा। इतना ही दूरी पर प्रेसिडेंट महाराज क्वार्टर है और तो मैंने सोचा कि यह तो इतनी सुंदर और फिर मुझे पता था यह कमरा है बोल के हम लोग तो बार-बार बिलमठ में साधुओं को प्रणाम करने के लिए जाते हैं तो मैं इस कमरे में काफी बार आ चुका था जो भी महाराज वहां पर रहते थे उनको प्रणाम करने के लिए तो मैं सीधा उस कमरे में गया मुझे डर था कि यह कमरा खाली होगा कि भरा होगा किसी साधु को दिया होगा जाकर देखा तो कमरा खाली था तो मैं तो एकदम खुश हो गया। वहां पर जो स्वामी जी रहते थे उनको मैंने पूछ लिया महाराज यह कमरा खाली है कि कोई साधु आ रहे हैं यहां पर। बोला नहीं कमरा खाली है। तो मैं तो एकदम खुश हो गया। खुशी इसके मारे मैं सीधा जा रहा हूं। वो जो इंचार्ज महाराज थे कि जो कमरा देते थे उनका उनके पास में यह कहने के लिए कि वह साधु निवास में फर्स्ट फ्लोर पे जो कमरा है गंगा को फेसिंग वो मुझे चाहिए। ऐसा करके मैं जा रहा था। एकाएक एक दूसरे महाराज मुझे रास्ते में मिल गए। मेरा उनके साथ में बड़े सीनियर थे वो है बड़े सीनियर है मुझसे और काफी मेरे से थोड़ी हमदर्दी रखते हैं पता है कि यह नया आया है बेलून मठ में और थोड़ा सा उसको हेल्प की जाए तो पहले ही यही उन्होंने ही मुझे बताया था कि देखो जो कमरा मिलता है तुमको लेना पड़ेगा ऑप्शन नहीं है फिर बाद में मैंने ही उनको कहा कि महाराज देखिए मुझे ऐसा ऑप्शन मिला है कि जो खाली कमरा है वह ले लेना है तो मैंने जाकर के महाराज को पहले मेरे में इतना बुद्धि था कि सीधे वह इंचार्ज महाराज के पास नहीं जाकर के यह जो सीनियर साधु है उनके पास जाकर कहे कि महाराज मैंने वह वाला कमरा सेलेक्ट किया है साधु निवास में फर्स्ट फ्लोर बिल्कुल गंगा को फेस करके बड़ा ही सुंदर कमरा है मैं वहां पर रहूंगा और क्या है थोड़ा सिकलूडेड है जो एक्चुअल साधु निवास है जहां पे ज्यादातर साधु रहते हैं वह क्या है किचन के पीछे में है और वहां पे क्या है कि बहुत सारे साधु रहते भी है सामने ही किचन है बोल के वह वहां पर भीड़ भी लगी रहती है और फिर गप लगाना वगैरह तो चलता ही रहता है साधुओं में तो वह उसकी वजह वह एक सिक्लूडेड जगह है। चारों ओर सुंदर गार्डन है। सामने में यह रिवियर्ड प्रेसिडेंट महाराज क्वार्टर है। इस ओर गंगा है। इतना सुंदर सिक्लूडेड जगह यह मुझे चाहिए। आइडियली स्पीकिंग यदि गंगा के किनारे किसी आश्रम में मठ में रहना है तो इससे सुंदर जगह और नहीं हो सकती। तो इस महाराज ने सीनियर साधु ने मुझे कहा देखो तुम एक काम करो तुम साधु निवास में ही जाकर रहो तो तुम वहां पर रहोगे ना वह गंगा के किनारे एक तो जगह पूरी अलग है और वहां पर कोई इतना साधन भजन नहीं हुआ है भले ही चाहे साधु निवास है किंतु वह कमरे ज्यादातर खाली रहते हैं। वहां पर इतना साधन भजन नहीं हुआ है। जबकि यह साधु निवास जो है बहुत पुराना है। बहुत सीनियर साधु लोग यहां पर रहे हैं। बहुत साधन भजन हुआ है। तुम तुम यहीं पर आकर के रहना। तो मैंने कहा यह किस तरह की एडवाइस दे रहे हैं? जहां पे इतना सुंदर जगह मिल रहा है और इतना सुंदर अपॉर्चुनिटी मिला है। बेलूर मठ में रहने के समय में जो कमरा चाहिए वो ले लो। उसके मैं इसके बाद में मैं इस तरह की पागलपन थोड़ी ना करूंगा कि वही वो जो क्राउडेड साधु निवास है वहां पर जाकर के रहूं। किंतु फिर अब जब महाराज ने ऐसा कहा कि यहां पर बहुत साधन भजन हुआ है। तुम्हारा दिन जो है वह यहां पर अच्छे कटेंगे। साधन भजन में कटेंगे। वहां पर तुम नेचुरल सौंदर्य देखते रहोगे। यहां पर तुम साधन भजन कर पाओगे। तो मुझे लगा कि मामले में कुछ तो है दम है। थोड़ा सा सोचा जाए। उसके बाद में मैं दो-तीन दिन सोचता रहा। यह मेरे मन में घूमता ही रहता है। घूमता ही रहता है। क्या करूं? क्या ना करूं? क्या करूं? क्या ना करूं? आखिर में किंतु ठाकुर की कृपा से मैंने साधु निवास सिलेलेक्ट किया। वो किचन के पीछे में है। तीन मंजिला है। वैसे क्राउडेड है। बहुत सारे साधु आते जाते रहते हैं। और उसमें मुझे जो कमरा मिला था मैंने देख लिया। खाली कमरा कौन सा है तो टॉप फ्लोर पे था। अभी टॉप फ्लोर का मुझे जो रूम मिला था उस रूम में से सीधा ठाकुर का बेडरूम आप देख सकते हैं। ठाकुर का बेडरूम वो जो ठाकुर का जो शाइन है मेन टेंपल में उसके ऊपर में है। तो उसकी खिड़की ये लोग रात को खोल देते हैं। ठाकुर को थोड़ा वहां पे एयर सर्कुलेशन हो इसलिए तो सीधा ठाकुर का बेड देख सकते हैं। इस तरह की वह जगह थी। मेरे कमरे से बाहर आकर के वरांडे में जब खड़े खड़े रहेंगे तब तो वह कमरा फिर आखिर में मैंने सेलेक्ट किया और वहां पर मैं चार साल था और सही में मैंने वह जो सीनियर साधु हैं उनको बाद में जाकर के आभार भी व्यक्त किया था। मैंने कहा था महाराज सही में यह कमरा जो है वह सही में साधुओं के रहने के लिए है क्योंकि यह पूरा साधु निवास जो है काफी पुराना है और बहुत सीनियर साधु वहां पर रह चुके हैं। बहुत साधन भजन हुआ है। तो जो वाइब्रेशन है आई कैन रियली फील दैट वाइब्रेशन। तो वो सही में वो बेलूर मठ में रहने के समय जो कुछ-कुछ गुड फॉर्चूनेट डिसीजंस मैंने लिए थे उसमें से वो एक था। तो देखिए कि यह बात उस समय यह बात जो वार्तालाप था मेरे माइंड में नहीं था। बाद में मुझे स्ट्राइक हुआ कि कथामृत में इसी तरह का वार्तालाप है। तो जो भी है यहां पर भी ठाकुर वही कहते हैं मणि को कि यह जो प्राकृतिक सौंदर्य है ठीक है। आप देखते रहिए उसमें बुरा कुछ नहीं है। आपने जितने भी यह भारतीय मंदिर वगैरह देखे होंगे हिंदू मंदिर देखेंगे कि सब समय यह जो प्राकृतिक सौंदर्य है वहीं पर यह मंदिर बनते हैं। यहां पर सिंहाचलम बोलकर के एक मंदिर है। बड़े ही एक पहाड़ की टोच के ऊपर में है। तो वहां पे जाने का जो रास्ता है हम लोग सुहितानंद जी यहां पे आए थे तो उनको लेकर के वहां पर दर्शन के लिए गए थे। तो रिटर्न जब आ रहे हैं दो कार थी तो पहली कार में सुहितानंद जी फिर उनके सेक्रेटरी महाराज और सेवक महाराज और फिर यह हमारे बड़े महाराज इतने लोग बैठे थे और बाकी हम जनरल जो साधु थे वो दूसरी कार में बैठे थे। तो हमारी कार आ रही थी सुतानंद जी की कार के पीछे में। तो अभी जाते-जाते एकाएक सुहितानंद जी की गाड़ी स्लो हो गई। एकदम धीरे-धीरे करके जा रही है। तो हमारे कार में से ड्राइवर ने फोन किया उनकी कार में कि क्या हुआ कि इतना स्लो क्यों जा रहे हैं? तो उत्तर मिला कि सुतानंद जी यह प्राकृतिक सौंदर्य देखना चाहते हैं इसलिए हम स्लो जा रहे हैं। तो हमने भी सोचा चलो हम भी आनंद लेते हैं। तो खिड़की में से वो पहाड़ में से वो रास्ता जो है उसकी दूसरी ओर खाई है। तो इतना सुंदर आपको सीन दिखेगा। सुबह का समय था। हमको ऑलरेडी स्पेशल परमिशन मिला था। एकदम गर्भ गुरु वैसे गर्भगुरु में सभी को जाने देते हैं। किंतु हम लोगों को वहां पर गर्भ गुरु में लंबे समय तक रुकने का परमिशन मिला था। बाकी सबको क्या है? चलो चलो चलो ऐसा करके वो फटाफट फटाफट करके निकाल देंगे। जबकि हम लोग वहां पे एकदम शांति से खड़े रहे थे। वो महाराज आए थे बोल के एक विशेष छोटी सी पूजा भी की, आरती भी की और हमको फिर वो माला प्रसाद भी दिया। तो बड़ा सुंदर एक्सपीरियंस था। ऑलरेडी वह एक्सपीरियंस करके लौट रहे हैं और अभी यह जो रास्ते में से मैंने तो सोचा था फटाफट करके आश्रम में चले जाएंगे तो 10 काम पड़े हैं वह खत्म कर देंगे। किंतु देखिए कि हम लोग फटाक करके आश्रम में आ जाते तो यह जो मंदिर के गर्भ गुरु में लंबा समय रुकने का जो हमको मौका मिला था उसका एक जो आध्यात्मिक ये जो फीलिंग्स हमको हुई थी वो इमीडिएटली लॉस्ट हो जाती। इसकी वजह मैंने सुितानंद जी की वजह से एकदम धीरे-धीरे करके हम पहाड़ में से नीचे उतर रहे हैं। तो वह जो एक फीलिंग था ऑलरेडी मंदिर के गर्भ में लंबे समय तक रहने का भगवान की आरती देखने का वो फीलिंग जैसे ना कि मल्टीप्लाई हो रहा है। क्योंकि यह प्राकृतिक सौंदर्य ही ऐसा है जैसे कि भीतर में से वैराग्य का उद्दीपन करवाता है। ये अपने जितने भी हिमालय के तीर्थ क्षेत्र है सब जगह पर देखिए प्राकृतिक सौंदर्य भरा पड़ा हुआ है। प्राकृतिक सौंदर्य की प्रेजेंस में आपको वैराग्य का उद्दीपन भी होगा। किंतु वो वैराग्य का उद्दीपन कब होगा? जब आपको ऑलरेडी एक आध्यात्मिक अनुभूति हो गई होती। सुहिदानंद जी ने जाने के समय गाड़ी स्लो नहीं करवाई। ऐसा नहीं कहा कि प्राकृतिक सौंदर्य देखतेदेखते चलते हैं। एक बार जब भगवान का नाम ले लिया, एक बार गर्भगरूह में जाकर के लंबे समय तक रहकर के भगवान की आरती देखकर के लौट रहे हैं तब कहीं जाकर के यह सब आपको प्राकृतिक सौंदर्य का उपभोग करना है। उससे पहले नहीं। तो यहां पर भी यह ठाकुर कहते हैं कि पहले ईश्वर नाम पहले अपने हृदय की खिड़की में से भगवान का दर्शन कर लो। फिर यह नौबत की खिड़की में से जितनी गंगा ये चांद का उजाला पेड़ पौधे ये फूल का बगीचा जितना देखता देखना चाहते हो बाद में देखते रहना। फिर वो फोर्स मल्टीप्लाइंग का इफेक्ट करेगा। किंतु भीतर में कुछ नहीं है और सीधा आप वह सब देखने को जाएंगे तो काम नहीं बनेगा। इसलिए ठाकुर क्या कहते हैं देबे ना केनो नबत के फर्स्ट फ्लोर पर क्यों नहीं देंगे तब पंच बोटी घोर बोल छी ए जन उखाने अनेक हरि नाम ईश्वर चिंता होए छे किंतु मैं पंचवटी का घर कह रहा हूं इसलिए क्योंकि वहां पर बहुत हरि नाम और ईश्वर चिंता हुए हैं

ईश्वर को प्रेम करना ही है जीवन का उद्देश्य

अभी सप्तम परिच्छेद प्रारंभ होता है। समय वही है। संध्या का ही समय है। संध्या में समय में वो यह सब वार्तालाप हो गया। इसके बाद में यहां पर मास्टर महाशय लिखते तो नहीं है कि आरती समाप्त हो गई है कि नहीं? किंतु मुझे लग रहा है कि आरती समाप्त हो गई होगी। इसलिए यहां पर मास्टर महाशय क्या लिखते हैं? ठाकुर श्री रामकृष्ण घरे धुनो देवा होइलो ठाकुर श्री रामकृष्ण के घर में धूप और धुना उसको दिया गया हमारे मंदिर में भी आप ठाकुर के मंदिर में आप जाएंगे तो वो धूप जो होती है ना वो जो एक मिट्टी का एक बड़ा सा यह रहता है उसके भीतर में यह कोयला डाल के उसके ऊपर में धूप डाली जाती है वह पाउडर वो फिर पाउडर्स में से वह जो एकदम सुगंधित धुआं आता है तो ठाकुर को ऐसा करके दिखाते हैं और मंदिर में चारों ओर उसको घुमाते हैं। इतना सुंदर उसका यह खुशबू आएगा। ये जैसे कि अपना मन इस खुशबू से ही आध्यात्मिकता से भर जाएगा। छोटो खाट ते बोशिया ठाकुर ईश्वर चिंता करते छोटे खाट के ऊपर में बैठकर के ठाकुर ईश्वर चिंता कर रहे हैं मणि मेझे ते बोशिया छेन मणि जमीन के ऊपर में बैठे हैं राखा लाटू रामलाल इराओ घरे छेन राखा लाटू रामलाल वगैरह भी उसी कमरे में बैठे हुए हैं ठाकुर के चिर परिचित कमरे में ठाकुर मणि के बोली लिते छ कथाटा ए ठाकुर मणि को अर्थात मास्टर महाशय को कह रहे हैं बात है यह असली बात है याद रखना कथा ए यह बात है बात यह है ताके भक्ति करा ईश्वर ताके अर्थात कि ईश्वर को भक्ति करना ताके भलो भाषा उनको प्रेम करना स्नेह करना ईश्वर को प्रेम करना रामलाल अच्छा इतना कहने के बाद में फिर ठाकुर रामलाल को गाने के लिए कहते हैं। रामलाल के गायते बोली लेन तीन मधुर कंठे गायते छ रामलाल मधुर स्वर में गा रहे हैं। रामलाल अर्थात कि ठाकुर के भाई का पुत्र अर्थात कि ठाकुर का भतीजा जो कि काली मंदिर में मां काली का पुजारी था। ठाकुर एक-एक टी गान धौरयाते छे। ठाकुर एक के बाद एक गान बता रहे हैं कि इस पहले इस गान को गाओ फिर इसको गाओ फिर इसको गाओ ऐसा करके ठाकुर बोलाते रामलाल प्रथमे श्री गौरांगेर सन्यास गायते छे ठाकुर के कहने से रामलाल ने प्रथम श्री गौरांग के सन्यास का भजन गाना शुरू किया गान गाना शुरू किया की देखिलाम रे केशव भारती रटी रे अपरूप ज्योति श्री गौरांग मूर्ति दु नयन प्रेम बहे शतधारे क्या देखा रे केशव भारती की कुटीर में केशव भारती अर्थात कि गौरांग महाप्रभु के गुरु उनकी कुटीर में क्या देखा अपरूप ज्योति श्री गौरांग मूरति दो नयने प्रेम बहेशत धारे दोनों आंखों में से सैकड़ों आंसुओं की धारा के रूप में प्रेम बह रहा है गौर मतमा मातंगेर प्राय प्रेमावेशे नाचे गाय मत्त होकर के भगवान ये गौर महाप्रभु प्रेम के आवेश में नाच रहे हैं गा रहे हैं कब धराते लुटाए नयन जले भासे रे कभी-कभी जमीन पर लेट लुट माने वह रेंग जाते हैं। कभी-कभी उनकी नज आंखों के नयनों के जल से पूरे भीग जाते हैं। यह पूरा गान दिया है। उसको फिर ट्रांसलेट करना मुश्किल है। मेरे लिए बंगाली प्रो ट्रांसलेट करना आसान है। किंतु पोएट्री ट्रांसलेट करना मुश्किल है। उसके लिए ट्रांसलेशन अलग से चाहिए। तो जो भी है रामलाल पोरे गाय लेन उसके बाद में रामलाल ने गाया शची के दे बोल छे निमाई केमन करे तो के छेड़े थाकब वो शची अर्थात कि गौरांग महाप्रभु की मां रोती रोती कहती है निमाई तुमको छोड़कर के मैं किस तरह से रह सकती हूं ठाकुर बोली लेन श्री गांटी गा तो ठाकुर ने कहा वो गान गाओ तो तो कौन सा गान है आमी मुक्ति दीते कातर नहीं मैं मुक्ति देने में मुझे कोई एतराज नहीं है भक्ति दीते कातर होगो अर्थात कि भक्ति किंतु देने में मैं बड़ा ही कंजूसाई करता हूं ये उसके बाद में कौन सा गाना है राधा देखा की पाय शो को ले राधा प्रेम की पाय शो को ले राधा का दर्शन क्या सब कर सकते हैं राधा का प्रेम क्या सब पा सकते हैं राधा मां राधा का मातृ प्रेम अतिश दुर्लभ धन ना कोर ले आराधन अच्छा यह भी एक लंबा गाना मास्टर महाशय ने लिखा है इसके बाद में तीसरा है नव निरद वरण कि गण्य श्याम चांद रूप है रे वाह एक के बाद सब सुंदर गाने ठाकुर रामलाल के आभार बोलीते छ से गांटी गा ठाकुर रामलाल को फिर से कहते हैं वो गान गाओ गौर निताई तोमरा दु भाई गौर और निताई तुम दो भाई हो रामलाल शंगे ठाकुर जोक दते छ रामलाल जब गा रहे हैं तो ठाकुर भी साथ-साथ में गा रहे हैं गौर निताई तोमरा दु भाई परम दयाल हे प्रभु आि ताई सुने ऐसे छी हे नाथ तो यह भी पूरा गाना मास्टर महाशय ने यहां पर लिखा है देखिए यह जो पूरा गान का यह जो आसर बैठा था यह गान का जो पूरा एक दिव्य आनंद बह रहा था। जस्ट इमेजिन करके देखिए कि यह लोग जो थे यहां पे जो तीनचार नाम दिए हुए हैं यह मास्टर महाशय है, राखाल है, लाटू है और ला रामलाल है और शायद एक दो लोग होंगे। बस इतने ही लोग ठाकुर के साथ में बैठे थे और बस ठाकुर प्रेम के आवेश में आकर के इन लोगों के पास में से गान गवा रहे हैं और साथ-साथ में अपने से भी गा रहे हैं। कितना दिव्य सुंदर मधुर्यमय वह माहौल बना होगा। इस तरह की जगह पर रहकर के इस तरह से ठाकुर के गानों का श्रवण करने का सद्भाग्य मिलने से हमारे जन्म जन्मांतर के कर्म कहीं एक ही शाम में खत्म हो जाएंगे। यह जो ठाकुर कल कहते थे ना कि यह बच्चे ने रोते-रोते पुकारना शुरू किया और जैसे ही थोड़ा सा रोया थोड़ा सा पुकारा उसी में तो भगवान आकर के प्रकट हो गए और आकर के दर्शन देकर उसका धराया हुआ भोग खाने लगे। तो वह जो अल्प समय में सरल हृदय की पुकार से जो काम हुआ था यहां पर भी यदि एक पत्थर भी ठाकुर का इस तरह का एक एक शाम ठाकुर के साथ में बिठा बिता दे तो ठाकुर का यह जो भाव है यह गान का प्रवाह है यह जो उनका आध्यात्मिक उच्च तरंगे है सब वो जो उनके कमरे में जो प्रसारित होती होगी उसका एक बार रसास्वादन कर ले तो पत्थर भी चाहे हो सकता है की मुक्ति प्राप्त कर ले। यह जो मास्टर महाशय और ठाकुर का वार्तालाप मास्टर महाशय कहते हैं कि यह जो पंचवटी की यह जो एक ब्रांच है उसको मैंने अपने कमरे में अपने घर जाकर के रख दिया है। तो ठाकुर कहते हैं अच्छा तो फिर मास्टर महाशय कहते हैं कि जब सब समाप्त हो जाएगा तब यह जगह है महातीर्थ हो जाएगी। तो ठाकुर पूछते हैं किस तरह का महातीर्थ ये पानीहाटी की तरह तो देखिए आज हमको पता है कि कहां वो पानीहाटी का महातीर्थ और कहां यह दक्षिणेश्वर बेलूर मठ का तो यह जो भाव तरंग भविष्य में फैलने वाली थी उसका यह जो सीड फॉर्म है वह दक्षिणेश्वर में था यह पंचवटी है नबत है ठाकुर का कमरा है राधाकांत का मंदिर है द्वादश शिव मंदिर चांदनी यह मां काली का मंदिर यह नाट मंदिर मां काली का गर्भगह यह सब जगह कितनी कितनी पवित्र है एक देखिए मैंने मुझे एक बहुत सुंदर एक अपॉर्चुनिटी मिला था मैं सन्यास के लिए गया था उस समय 2015 की बात है तो एक दिन मैं और मेरा एक बैचमेट हम दोनों ने ठीक किया कि दक्षिणेश्वर जाकर के प्रणाम करके आते हैं तो अभी निकलतेिकलते थोड़ा सा हमको देरी हो गया और 10 के 10 11:00 बजे के आसपास में हम लोग दक्षिणेश्वर पहुंचे होंगे तो वहां पे जाकर के थोड़ा दर्शन वगैरह करके सोचा अभी तो 12:00 बजे ना कि इतना अमी एग्जैक्ट टाइम भूल गया उस समय तुम मंदिर तो बंद हो जाएगा सबको जाने को कह देंगे तो हम तो ज्यादा रुक नहीं पाए और फिर क्या है फिर से आना मुश्किल है क्योंकि यह सन्यास के लिए गए हैं सन्यास सेरेमोनी कुछ ही दिन में स्टार्ट हो जाएगा फिर इतना टाइट शेड्यूल हो जाएगा कि आप बाहर निकलने का सोच ही नहीं सकते हैं। तो यह आखिर एक ओपोरर्चुनिटी था। फिर तो हम आश्रम में चले जाएंगे अपने-अपने सेंटर। फिर कब आने का मौका मिलेगा? तो आज अच्छे से दर्शन हुआ नहीं। थोड़ा सा हम खड़े-खड़े सोच रहे थे जाने के समय। पता नहीं एकाएक कोई आदमी आकर के कहता है कि अच्छा महाराज आप क्या बेलूर मठ से आए हैं? हम लोग ब्रह्मचारी थे। सन्यास के लिए आए थे तो सफेद कपड़ों में थे। तो हमने कहा हां बेलर मठ से आए हैं। तो वह कहता है कि आप आप यदि यहां पर रुकना चाहे तो रुक सकते हैं। मैं सब बंद करके चला जाता हूं। आप मैं आऊंगा दोपहर को 4:00 बजे तो फिर आप जाइएगा। तो मैं तो एकदम खुश हो गया। मैंने कहा ऐसा अपॉर्चुनिटी कौन छोड़ने वाला है? तो वो आदमी हमको वहां पे सब बाकी सबको निकाल दिया। हम दोनों सिर्फ बैठे हैं नाट मंदिर में और फिर सब बंद करके दरवाजा दरवाजा सब बंद करके चला गया। हम लोग कहां पे बैठे हैं? यदि काली मंदिर का यह जो मेन सेंट्रल स्क्वायर है वहां पे ऑफ कोर्स सब कुछ बंद है। मां काली का गर्भगह ठाकुर का कमरा सब कुछ बंद है। किंतु वो जो एज इट इज जो जगह है इतनी पवित्र है। इतनी पवित्र है। पूरे चार घंटे हम लोग वहां पर बैठे थे। कभी यह नाट मंदिर में बैठते थे। कभी यह ठाकुर के कमरे के बाहर का जो वरांडा है वहां पर बैठते थे। कभी यह चांदनी के घाट पर जाकर बैठते थे। कभी शिव मंदिर में जाकर बैठते थे। चार घंटा इतना सुंदर रूप से बिताया है। कोई नहीं है। बस हम दो ब्रह्मचारी थे। तो माने अपने जीवन की एक यादगार घटना वो वहां पर हुई थी। तो यहां पर भी देखिए कि ठाकुर के पास में आप है तीनचार लोग ही है ठाकुर का पूरा अटेंशन जब वह वार्तालाप करते हैं तो आपको अटेंशन देकर के आपके साथ में पर्सनल वार्तालाप कर सकते हैं। अदरवाइज इतने सारे लोग इकट्ठा हो जाएंगे ठाकुर का अटेंशन बट जाएगा। उसमें भी यदि नरेंद्र आ जाएगा तो ठाकुर का अटेंशन पूरा उसके ऊपर में चला जाएगा। हालांकि सबको ऐसा लगता था ठाकुर के पास में जो लोग भी आते थे सबको ऐसा लगता था कि ठाकुर हमको ही सबसे ज्यादा स्नेह करते हैं। किंतु जो भी है यह जो इतना सुंदर समय और इतना माने भक्तिपूर्ण वातावरण नहबत खानार ऊपरे घरे मणि एकाकी बोश्या छन तो अभी रात हो गई है। ठाकुर के घर में यह आनंद की हाट बसी हुई थी। वह अभी टूट गई है। ठाकुर हो सकता है विश्राम कर रहे हैं या तो फिर भाव में मग्न है। मणि नहबत और ठाकुर ने निश्चय यह मास्टर महाशय के लिए परमिशन ले लिया होगा कि नहबत खाने के फर्स्ट फ्लोर पे वह रहना चाहते हैं तो उनको रहने का परमिशन दीजिए। खजानची ने हां भी कह दिया होगा। देर रात हो गई है। मणि नहबत खाने के फर्स्ट फ्लोर पे अकेले बैठे हुए हैं। अनेक रात्रि होइया छे बहुत रात हो गई है। आज अग्रहायण पूर्णिमा आज अग्रहायण की पूर्णिमा है। आकाश गंगा कालीबाड़ी मंदिर शीर्षो उद्यान पथ पंचवटी ए सब चांदेर आलोते भाषिया छे आकाश गंगा काली मंदिर मंदिर के शीर्ष अर्थात कि मंदिर के शिखर उद्यान पथ पंचवटी यह सब चांद के प्रकाश से प्रकाशमान है। चांद के यह जो शीतल चांदनी है उसमें वो जैसे कि प्रकाशमान है। मणि एकाकी ठाकुर श्री रामकृष्ण के चिंता कोते छेन मणि बैठे-बैठे श्री रामकृष्ण देव के बारे में सोच रहे हैं। ठाकुर की भक्ति, ठाकुर का गान, ठाकुर का नृत्य, ठाकुर का भाव, ठाकुर की समाधि, ठाकुर के उपदेश, ठाकुर का बालकपन यह सब सोच रहे हैं। रात प्राय तिनटा होइलो तीन उठले रात में ऑलमोस्ट 3:00 बज गए हैं। उन्होंने उठकर के खड़े हुए वो उठे उत्तराश होया पंचवटी अभिमुखे जाते छेन उत्तर की ओर मुंह करके पंचवटी की ओर जा रहे हैं ठाकुर श्री रामकृष्ण पंचवटी कथा बोलिया छे ठाकुर ने पंचवटी की बात कही थी आर नबत खाना भो लागी ते छेना अभी उनको नहबत खाना अच्छा नहीं लग रहा है तीन पंचवटी घरे थाकी स्थिर कोरिलेन वो पंचवटी के घर में रहेंगे। ठीक कर दिया है। ठाकुर ने पहले ही कहा था यह प्राकृतिक सौंदर्य की चिंता मत करो। जो आंतरिक सौंदर्य है उसको पहले तुम उसका पहले तुम जुगाड़ कर लो। उसको पहले तुम ठीक कर लो अपने हृदय में। बाद में यह बाह्य सौंदर्य जो भी लेना है वह ले लेना। उसका उपभोग जितना करना है कर लेना। तो मणि ने उस समय तो ठाकुर की बात सुनी नहीं। वो नहबत के घर में ही रहे। किंतु जब रात को 3:00 बजे तब और यह जो मन की इच्छा थी कि नबत के ऊपर वाले कमरे में रहकर के प्राकृतिक सौंदर्य का उपभोग करेंगे वो कर लिया वो करके फिर हृदय में शांति नहीं मिली है तो फिर बोल के यह पंचवटी की ओर पंचवटी के कमरे की ओर जा रहे हैं। देखिए हमारे मन में भी बहुत बार ऐसा होता है कि संसार का एक बार भोग कर लेते हैं। संसार का जो आकर्षण है वह देख लेते हैं एक बार कि क्या है किंतु कुछ ही समय में यदि हम जेन्युइन साधक हैं तो यदि हम जेन्युइन साधक है तो यह जो संसार का जो सौंदर्य है कुछ ही समय में हमारे सामने फीका पड़ जाएगा और ईश्वरीय सौंदर्य के लिए लालसा मुमुक्षुत्व हमारे हृदय में जागृत हो जाएगा। चतुर दिखे नीरव चारों ओर निरवता है रात 11 टार समय ज्वार आशिया छे रात को 11:00 बजे के समय यह ज्वार अर्थात कि यह वेव्स जो है गंगा के वो जो समुंदर में यह जो वेव्स आते हैं ना यह भरती ओठ आती है तो गंगा तो माने यह नबत और दक्षिणेश्वर जो था वह तो समुंदर के पास में ही था गंगा के किनारे समुंदर के पास में ही था तो गंगा में भी भरती ओठ आती थी। जनरली आपको नदी में भरती ओठ नहीं दिखाई देगी। किंतु क्योंकि यह समुंदर के बहुत पास में है यह जगह बोलकर के समुंदर की भरती ओठ का असर गंगा के ऊपर में भी होता है। तो गंगा में भी रात को 12 11:00 बजे भरती आई है। एक-एक बार जलेर शब्द सुना जाते छे। एक-एक बार जल का जो शब्द है भरती आती है यह वेव्स आते हैं तो किस तरह से वह किनारे के ऊपर में टकराते हैं तो उसकी आवाज सुनाई देती है तीन पंचवटी दिखे अग्रश होइते छ मास्टर महाशय पंचवटी की ओर आगे बढ़ रहे हैं दूर होइते एकटी शब्द सुनीते पायलेन दूर से एक शब्द सुन पाए के जेनो पंचवटी बृ मंडप भीतर होते आरनाथ कोरिया डाकीते छ कोथाय दादा मधु मधुसूदन कौन जैसे कि पंचवटी के यह जो वृक्ष से यह पेड़ों से पौधों से घिरा हुआ पंचवटी उसके भीतर में से कौन जैसे कि आर्तनाद कर रहा है कौन जैसे कि पुकार रहा है विगलित हृदय से कोथाय दादा मधुसूदन कहां पे हो दादा मधुसूदन देखिए हम सभी लोग ठाकुर की कहानी सुने हैं और हम लोगों में और यह जो ठाकुर के जो डिसाइपल है वह वही डिफरेंस है कि हम लोग कभी भी इस तरह से पुकार करके रोते-रोते सरल हृदय से ईश्वर को नहीं पुकारेंगे क्योंकि हमको पता ही है कि पुकारने से कोई लाभ होने वाला नहीं है। दूसरे लोग सुनेंगे और हमारी मजाक उड़ाएंगे। यह जो सोशल सेंक्शन जो होता है, लज्जा, घृणा, भय ठाकुर क्यों कहते हैं कि एक तो एक ईश्वर का नाम लेने के समय हमको लज्जा होती है, भय लगता है कि दूसरे लोग मेरी मजाक तो नहीं उड़ाएंगे। इवन हम लोग भी साधु लोग भी हमारी जो साधना है बड़े ही गोपनीयता के साथ करते हैं और किसी को पता नहीं चलना चाहिए कि कब कौन से समय हम ईश्वर का नाम ले रहे हैं। मंदिर में भी यदि बैठे हैं यदि साधु लोग ध्यान कर रहे हैं तो संपूर्ण रूप से निरवता आपको देखने को मिलेगी। रेयरली कोई इस तरह का हल्लागुल्ला करेगा। तो यहां पर भी देखिए कि यह मास्टर महाशय के हृदय में एक भय तो अवश्य था। मास्टर महाशय ने स्वयं इस तरह से पुकारा है। यह रिकॉर्ड कहीं पर नहीं है। किंतु यह जो थे ठाकुर का यह एक शिष्य वो इस तरह से पुकार रहा था। और कल हमने यह देखा भी था कि महापुरुष महाराज स्वयं कहते हैं कि मैं वहां पर पंचवटी में बैठकर के मधुसूदन को पुकारा करता था। किंतु हमको यह नहीं पता है कि इस दिन 14 दिसंबर 1883 इस दिन का जो विवरण जो मास्टर महाशय लिख रहे हैं उस दिन तारकदा महापुरुष महाराज वहां पर उपस्थित थे कि नहीं। देखिए वो जो कमरे में जो जो लोग बैठे थे उनका जो नाम दिया है उसमें यह लाटू है राखाल है और रामलाल है। रामलाल तो इस तरह से पुकारने वाले नहीं थे। हो सकता है कि लाटू या राखाल यानी कि भविष्य के अद्भुतानंद जी या तो ब्रह्मानंद जी दो में से शायद एक हो सकते हैं। हो सकता है कि तार महापुरुष महाराज भी हो वहां पे यह मास्टर महाशय ने नाम नहीं लिया है या तो वह देरी से आए हो जो भी है किंतु इस तरह से ठाकुर का कोई शिष्य वहां पर रहकर के पुकार रहा था। आज पूर्णिमा आज पूर्णिमा है चतुर दिके बट वृक्षे शाखा प्रशाखार मध्य दिया चांदेर आलो पाटिए पड़ीते छे चारों ओर से वृ वट वृक्ष की शाखा और प्रशाखा है उसमें से चांद की जो चांदनी है वह प्रकाश के किरणों की तरह चारों ओर फैल रही है आरो अग्रशर होइलेन मास्टर महाशय और भी थोड़ा सा आगे गए एकू दूर हो ते देखले पंचवटी मध्य ठाकुर एकटी भक्त बोशिया आन थोड़ा सा दूर से थोड़ा सा दूर से उनको दिखाई दिया कि पंचवटी के मध्य में ठाकुर के एक भक्त विराजमान है बैठे हुए हैं तीन निर्ज एकाकी डाकीते छेन कोथाए दादा मधुसूदन वही निर्जन में अकेले पुकार रहे है कहां हो दादा मधुसूदन मणि निह शब्दे देखते छ मणि चुपचाप बिना किसी शब्द के देख रहे हैं। देखिए यह इतना सुंदर यह शाम का समय ठाकुर के साथ में रहने का सद्भाग्य होना इस तरह से ठाकुर के जो शिष्य संतान गण है उनका दिव्य संग लाभ होना कि रात को सोकर के नहीं किंतु ईश्वर को पुकार करके वह अपना जीवन बिताते हैं। हम लोग यह देखिए यह सब ध्यान के लिए यह सब यह कंस्ट्रक्ट बनाने के लिए इमेजिनेशन करने के लिए कितना सुंदर यह दृश्य है। हम लोग भी सोच सकते हैं कि हम लोग भी ठाकुर के साथ में ठाकुर के कमरे में बैठे हैं। बस दो-तीन ही ठाकुर के संतान उपस्थित है। उसमें हम भी एक है। इतना हमारा सद्भाग्य है। इस ओर चांदनी है। इस ओर गंगा है। ऊपर में से चांद की चांदनी छा रही है। सभी चीजों के ऊपर में अपनी शीतल चांदनी बरसा रही है। पेड़ ये जो फूल के पेड़ है उसमें से सुंदर खुशबू बह रही है। फिर ठाकुर के साथ में वार्तालाप हो रहा है। ठाकुर के कमरे में धूप धुना दिया हुआ है। उसकी खुशबू है। एक पिल सूजे प्रदीप अर्थात कि यह जो एक स्तंभ होता है छोटा सा इसके ऊपर में एक प्रदीप बिठाया हुआ होता है। तो इस तरह का एक प्रदीप वहां पर प्रज्वलित हो रहा है। उसके बाद में बाहर जब आते हैं तो सामने यह है गंगा इस ओर है नहबत सामने है पंचवटी। वहां पर हम टहल रहे हैं। पंचवटी में जाकर कभी तपस्या कर रहे हैं। कभी यह नहबत में बैठकर के हम साधन भजन कर रहे हैं। और नहबत में रहने का। हालांकि ठाकुर ने यह कहा नहीं कि नबत में मां ने जो तपस्या की थी उसकी वजह से नहबत कोई कम साधारण जगह नहीं कोई कम तप एक आध्यात्मिक जगह नहीं है। किंतु फिर भी जो भी है ठाकुर ने जब कहा है कि पंचवटी में बहुत तपस्या हुई है तो उनके लिए शायद वही उपयुक्त होगा। सबका फिर साइकोलॉजी भी तो होता है ना। आध्यात्मिक वेव्स जो होते हैं उस किसका किसके साथ में मैच होता है वह जो सब उच्च स्तर का जो थिंकिंग है वह ठाकुर के अलावा कौन इतना अच्छे से कर सकता है तो इसलिए ठाकुर ने शायद कहा होगा कि तुम्हारे लिए पंचवटी से बेटर वहां पे वो नहबत से बेटर तुम्हारे लिए पंचवटी का कमरा है। मुझे यदि कहा जाता तो मैं ठाकुर की बात को किंतु यहां पर नहीं स्वीकारता। मैं वही पंचवटी में नहीं जाता क्योंकि मुझे पता है कि नहबत में मां रही है। मां की तपस्या नौबत में है तो मैं वहीं पर रहूंगा और मां थी नहीं उस समय तो वहां जो ग्राउंड फ्लोर पे जहां पर मां रहती थी हो सकता है यदि वहां पर रहने का सद्भाग्य मिल जाए तो उससे अच्छा और कुछ नहीं। तो यह दिन 14th दिसंबर आज समाप्त होता है। उसके बाद में अष्टम परिच्छेद में 15 दिसंबर मणि का मास्टर महाशय का ठाकुर के साथ में रहने का दूसरा दिन प्रारंभ होता है। इसको अभी हम नेक्स्ट क्लास में देखते हैं। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु।

प्रश्न: बचपन से ही हमें विवेक का प्रयोग करना सिखाया जाता है। हम कभी भी दूसरों की कही बात को आँख मूँदकर स्वीकार नहीं करते। इस संस्कार के सामने हम विश्वास कैसे प्राप्त कर सकते हैं?

यहां पर देखिए यह एक इवोल्यूशन का गिफ्ट है। एक्चुअली यह स्केप्टिसिज्म है ना यह गलत नहीं है। यह जो सेकंड वर्ल्ड वॉर जब समाप्त हुआ और जितने भी नाजी अत्याचारी थे सबको न्यूरेंबर्ग बोलकर के एक जगह है वहां पर ट्रायल के लिए ले ले लिया म उनको इकट्ठा किया गया। जितने को भी पूछते हैं अरे इतने लाखों जीवों की हत्या क्यों कर दी? तो बोला कि हमको ऑर्डर मिला था। हम लोग ऑर्डर का पालन कर रहे हैं। दूसरे को कहा कि इतने सारा तुमने यह जो प्रिजनर ऑफ वॉर है उसके ऊपर में अत्याचार क्यों किया? तो हम ऑर्डर का पालन कर रहे हैं। तीसरे को पूछा उस शहर पे आक्रमण किया। इतने निर्दोषों की हत्या क्यों कर दी? तुमको युद्ध करना है। सैनिकों से लड़ो। निर्दोषों को क्यों मारते हो? वो कहता है हम लोग ऑर्डर का पालन कर रहे थे। यह नाज़ पार्टी जो है उसने जो अत्याचार किया है वह माने आज यह जो साइकेटिस्ट जो लोग होते हैं ना यह नाज़ पार्टी को काफी स्टडी करते हैं कि एक पूरा समाज राक्षस में परिणत हो गया। जनरली ऐसा रेयरली आपको देखने को मिलता है। कोई एक पागल आदमी खड़ा होगा और पागल की तरह वो बोलना शुरू करेगा तो सभी लोग उसको फॉलो नहीं करेंगे। बहुत सारे लोगों का एक स्केपिसिज्म रहता है। अपना एक खुद का एक डिफरेंस ऑफ ओपिनियन रहता है। किंतु पूरा का पूरा सोसाइटी अपने को उस बात उस राक्षस की बात सुनकर के अपने को राक्षसीपन में वो परिणत कर दे। यह नाज़ जर्मनी इज़ अ म यूनिक एग्जांपल इन हिस्ट्री। तो बहुत सारे साइकेट्रिस्ट इसको स्टडी करते हैं। कहते हैं कि किस तरह से एक आदमी इतने सारे लोगों को ब्रेन वाश करके उनको इतना भयानक पैशाचिक कर्म उनसे कैसे करवा सकता है? ह्यूमन साइकोलॉजी के भीतर में यह सब गार्ड रेल्स ऑटोमेटिक बने हुए हैं। आप दूसरों की हत्या करेंगे तो उससे जो हम उसका कष्ट देखकर के मुझे जो कष्ट होगा मैं चाहे पत्थर हृदय का भी क्यों ना हूं यदि मैं इनफ लोगों की हत्या करूंगा तो उसका ब्लो बैक साइकोलॉजिकल मेरे पे आने ही वाला है। उस समय मैं हत्या करता ही जाऊं। अत्याचार करता ही जाऊं। यह कह के कि मुझे आदेश मिला है। मैं उसका पालन कर रहा हूं। इट इज समथिंग यूनिक। कि ह्यूमन सिविलाइजेशन का यह जो डेवलपमेंट हुआ उसमें जितने भी गार्ड रेल बने हैं सब टूट जाएंगे तब यह नाजी पार्टी बनेगी। तो यह हमको याद रखना है। हमको कोसना नहीं है अपने को। यह सब गार्ड रेल आर देयर फॉर स्पेसिफिक रीजन। देखिए स्वामी जी का एग्जांपल हमारे सामने है। यह ठाकुर का जो पूरा युग था और यह तो क्या था? सरल विश्वास का युग था। ठाकुर की कृपा से ईश्वर की कृपा से भारत में इस तरह का कोई अत्याचारी आया नहीं है कि जो लोग भोले लोगों को इस तरह से भ्रमित करके अपना काम करवा ले कठपुतली बना के पपेट बना के ठाकुर ईश्वर की कृपा से भारत में हुआ नहीं है। किंतु देखिए जब स्वामी जी जब आते हैं उनके भीतर में एक हेल्दी स्केप्टिसिज्म था। हमको स्वामी जी से क्या लेना है? दो चीज लेनी है। इट इज नेसेसरी टू हैव द हेल्थी स्केप्टिसिज्म। क्योंकि चलिए ठाकुर की कृपा से हम ठाकुर के पास में आए हैं। किसी बाबा के पल्ले में पड़ जाते हैं जो कि हमको भ्रमित करते पैसा भी उठा लेता मोरल करप्शन में भी डूबा देता तो हम कहां जाते और ऐसे किस्से आप पेपर पढ़ेंगे न्यूज़पेपर कितने ही होते रहते हैं तो वो तो कोई माने ऐसा नहीं है कि सरल विश्वास से सब कुछ हो जाता हेल्थी स्केप्टिसिज्म होना चाहिए स्वामी जी की तरह किंतु स्वामी जी की तरह ही यह करेज होना चाहिए कि आपका थिंकिंग प्रोसेस आपको जिस लॉजिकल कंक्लूजन तक ले जाता है वहां पे आप जाइए चाहिए। फिर आप उसको अधूरा मत छोड़ दीजिए। यह करेज साथ में चाहिए। माने यह दोनों चीजें चाहिए। हेल्थदी स्केप्टिसिज्म कि कोई आकर के मुझे बोलता है मैं अवतार हूं तो मैं थोड़ी ना आपकी बात सुन लूंगा। सब तरह के टेस्ट करूंगा। मुझे साइकोलॉजिकली भीतर से विश्वास होना चाहिए। कन्विक्शन होना चाहिए। किंतु एक बार वो लगा कि हां इसमें कुछ जेनुइननेस है तो फिर मेरे में वो करेज होना चाहिए कि अभी मैं उसको फॉलो करता हूं। और जब मैं फॉलो करूंगा तो यह लज्जा, घृणा, भय, जाति, शील, कुल, मान, अभिमान यह सब अष्टपाश छोड़कर के मैं उनके पीछे में लगूंगा। फिर चाहे जो भी हो जाए डज नॉट मैटर। ये दोनों हमको चाहिए तब होगा। सिर्फ सरल विश्वास से नहीं होगा। ठाकुर के जितने भी डिसाइपल है ये लाटू महाराज को छोड़कर के राजा महाराज को छोड़कर के आप सभी में देखिए थोड़ा-थोड़ा स्केप्टिसिज्म तो था ही था। योगानंद जी का तो सब किस्से जग जाहिर है। तो फिर क्या है कि ठाकुर के खुद के डिसाइपल ने उनको टेस्ट कर लिया था। तो हम लोग ना करें प्रारंभ में यहां पे आने के समय ऐसा हो ही नहीं सकता। किंतु एक बार आ गए हैं। एक बार कन्विक्शन आ गया है तो फिर आप लगाइए अपना जोर फिर बाद में। यस यस। एक एक कंक्लूजन तक पहुंचना है। फिर स्केप्टिसिज्म ले बैठे नहीं रहना है। वह आलस का निशानी हो गया। बहुत सारे लोग होते हैं ना पूरा जगत पूरा जीवन ही ना अपना स्केप्टिसिज्म में बिता देते हैं। किसी भी चीज पर विश्वास नहीं होता। किसी भी चीज पर श्रद्धा नहीं होती। भीतर भीतर में से यह नास्तिकता है। एक कटाक्षवृत्ति है। सभी चीजों के मैंने देखे हैं ऐसे लोगों को सभी चीजों पर कटाक्ष। कुछ भी कहेंगे ना तो सभी चीजों के प्रति डिसरिस्पेक्ट। अपने इंडियन कल्चर के प्रति डिसरिस्पेक्ट, अपने बड़ों के प्रति डिसरिस्पेक्ट, पुरखों के प्रति डिसरिस्पेक्ट। इस तरह का आदमी का जीवन भीतर से पूरा खाली हो जाता है।

प्रश्न: जैसा कि आपने कहा कि हमें "लज्जा, घृणा और भय" से साधना करने में कतराना नहीं चाहिए। ठाकुर ये बात मास्टर महाशय को कहते है. लेकिन ठाकुर यह भी कहते हैं कि साधना "मन में, वन में, कोने में" करनी चाहिए। तो क्या ये दोनों विरोधाभासी नहीं हैं?

यह है ना सिचुएशन स्पेसिफिक है। अब अब जैसे कि ठाकुर ने खुद ने कहा जब विधर्मी लोग होते हैं तो गौरांग महाप्रभु भाव का संवरण करते हैं। यानी कि ठाकुर का खुद का कि इस तरह के लोग जब उनके सामने आ जाएंगे। अब जैसे वह एक दिन की घटना थी ना कि एक तामसिक आदमी आया ठाकुर के पास में से कुछ मांगने के लिए। ठाकुर सीधा अपने कमरे में जाकर के छुप गए। राखाल को कहा जाओ उसको यहां से दूसरी जगह पर भेज दो। तो क्या है कि वो एक सिचुएशन स्पेसिफिक है। इस तरह के लोग जहां पर रहते हैं भाव प्रकट आप नहीं कर रहे तो भी उचित है तभी उचित है। यहां तक कि अ ये दो लोग वार्तालाप कर रहे थे। मास्टर महाशय और मोस्ट प्रोबेबबली कौन? एक डायरेक्ट डिसाइपल ही थे। योगानंद जी ही थे। उनका नाम भूल गया। तो वार्तालाप कर रहे थे। तो इसी ईश्वरीय वार्तालाप ही कर रहा है। एकाएक ठाकुर ने आकर के मास्टर महाशय को कहा कि यह भगवान की और साधना की बातें जितनी सीक्रेट रहे उतना ही अच्छा है। तो मास्टर महाशय म डायरेक्ट डिसाइपल के साथ में भविष्य के उसके साथ में वार्तालाप कर रहे थे। फिर भी ठाकुर ने ऐसा कहा। दूसरी ओर ठाकुर वही कीर्तन करते हैं, नृत्य करते हैं तो मास्टर महाशय का हाथ खींच करके वो नृत्य के भीतर में खींच लेते हैं। कहते हैं नाच साला तो वो आई थिंक सिचुएशन स्पेसिफिक होना चाहिए। जब वो भाव का जो धोध बहता है तो सभी को नहा लेना है। मैं आप यदि राजकोट का एक YouTube चैनल है रामकृष्ण ज्योत करके बाद में एक दूसरा चैनल बना है राजकोट का ही आश्रम का किंतु एक पहले रामकृष्ण ज्योत बोल के एक चैनल था। उसमें देखेंगे कि मंदिर में कीर्तन हो रहा है। सभी साधु लोग नृत्य कर रहा है। मैं भी वहां पे था एक्चुअली। मैं मैं किंतु साइड पर बैठा था। मेरे में वो नहीं है कि सब लोग कीर्तन कर रहे हैं तो मैं खड़ा होकर करना शुरू कर दूं। तो पता नहीं मैं उसमें दिखता हूं कि नहीं। किंतु जो लोग कीर्तन कर रहे हैं नृत्य कर रहे हैं ठाकुर के सामने वो दिखता है। बड़ा पॉपुलर है वो वीडियो। तो देखिए कि वो सिचुएशन जब खड़ा होता है तब आपको कर लेना है। फिर आप वैसे डेली आरती में तो कोई ऐसा खड़ा हो के कीर्तन नहीं करता है। उस दिन क्या था वह जुष्टानंद जी आए हुए थे। जुष्टानंद जी हमारे ट्रेनिंग सेंटर के आचार्य। अब बड़े ही प्रेमिक हृदय और वो उनका वो शंकरी चरण मनो मग्न होए जाओ रे वो बड़ा फेमस उनका वो गीत है। वो जब गाते हैं एकदम धूम मच जाती है। वो टीसी में जब गाते गाते थे सभी लोग खड़े होकर वो नृत्य करते थे। तो अभी एक्चुअली क्या है कि जुष्ठानंद जी थे बड़े सीनियर। अभी तो उनका देहांत हो गया। तो ऑलरेडी जितने भी साधु थे वो सब उनके स्टूडेंट रह चुके थे ट्रेनिंग सेंटर में। तो वह सब पता है किस तरह से गीत एक बार चालू होगा। फिर वो भाव की तरंग बहेगी तो सब लोग खड़े होकर साथ-साथ में नृत्य करना शुरू कर दिया तो क्या वो एक सिचुएशन स्पेसिफिक था उस समय मैं बैठा रहा वि वाज नॉट गुड किंतु खैर दैट इज अनदर मैटर किंतु इन जनरल आरती के समय कोई ऐसा नहीं करेगा

कथामृत के रचयिता मास्टर महाशय के बारे में

एक बार मास्टर महाशय का गिरीश घोष के साथ वार्तालाप चल रहा है तो गिरीश पूछता है मास्टर महाशय को कि मैंने सुना है आप कुछ लिख रहे हैं ठाकुर के बारे में मुझे दिखाएंगे तो मास्टर महाश कहते हैं मैं मरूंगा बाद में आपको देखने को मिलेगा। किंतु आप उनका बाद का जीवन देखेंगे ना तो उन्होंने तपस्या काफी की है। वह कभी-कभी जाकर के भिक्षा भी मांगते थे और भीतर में से जो अलगारीपना जिसको कहते हैं ना अपने खुद के घर जाते थे तो कहते थे एक भक्त के घर जा रहा हूं। वो जो डिटचमेंट ठाकुर ने जैसे कि उनको भर-भर करके दे दिया था। वह भी डायरेक्ट डिसाइपल हो ही जाते। किंतु ठाकुर की ही वाणी है ना कि वो भागवत पंडित को जैसे कि भगवान एक कला एक एक पाश देकर के रख देते हैं तो उनको इसके लिए और दूसरा कि इतना काम भी तो इतना बड़ा किया ना देखिए आप कोई भी एक क्रिएटिव वर्क में अपना जी जान डालते हैं ठाकुर क्या कहते हैं कोई भी कोई एक विद्या में माहिर होता है पारंगत होता है तो उसको उसी से ईश्वर दर्शन हो जाएंगे वो गाने में निपुण है बजाने में निपुण है माने वो वाद्य बजाने में तो उसी से उसको ईश्वर लाभ हो जाएगा। तो तो यह भी तो एक विद्या है ना। एक पुस्तक लिखना कथामृत जैसा पुस्तक लिखना। इससे बड़ी विद्या और कौन सी हो सकती है? तो विद्या में उन्होंने अपना जी जान डाल दिया। यानी कि मन को तो एकाग्र किया है। एट द एंड ऑफ द डे मन एकाग्र होना चाहिए। देश बंद चित्तस्य धरणा किसी एक ऑब्जेक्ट के ऊपर में मन को बांधना है। तत प्रत्यय एकतानता ध्यानम उसके प्रति तैल अखंड तैल धारा वत अपना मन बहना चाहिए। एक तान हो जाना चाहिए। तो मास्टर महाशय का कथामृत लेखन के ऊपर में जो एक ततानता बैठ गई थी। सो उसी वही तो उनको तार दिया ना और यह डायरी पहले से ही लिखते थे। ठाकुर के आने के पहले से ही उन्होंने डायरी लिखने का अभ्यास था। देखिए स्वामी जी स्वयं कहते हैं शशि महाराज को एक बार लेटर लिखा और कहा कि ठाकुर के जितने उपदेश है ना तुम कैटेगरी वाइज इकट्ठा करना शुरू करो। यह सब क्या घंटा घुमा रहे हो और यह सब क्या कर रहे हो? शशि महाराज का तो पूजा करने का ही था ना। तो स्वामी जी कहते हैं यह कैटेगरी अनुसार कैटेगरी वाइज ठाकुर के उपदेशों को कलेक्ट करो तो सही-सही काम होगा। यानी कि ये शिव ज्ञान जीव सेवा एक एक पंथा है। एक रिचुअलिस्टिक पूजा वो एक पंथा है। विद इन आवर ब्रॉडर सिस्टम। तो एक विद्या के ऊपर में प्राण ढाल देना वह भी एक पंथा है। यह जो कंटीन्यूस कंसंट्रेशन बना के रखना है ना रियली इट्स अ डजरी। आपने ठीक ही कहा मुझे प्राण-प्राण में इसका अनुभव हुआ है। अब जैसे शशि महाराज सभी गुरु भाई तपस्या करने के लिए चले गए। प्रवरज्या करने के लिए चले गए। हम लोगों को लगता है शशि महाराज ठाकुर घर में शांति से आनंद से बैठे एक जगह पे चार टाइम का खाना खाते हैं। ठाकुर को भोग लगाते हैं। इसमें कौन सी बड़ी बात है? किंतु करके देखेंगे पुजारी का काम एकदम रूटीन को फॉलो करना तब पता चलेगा। यह भी कितना डिफिकल्ट है। आप आप निरा एक अपने मन के आनंद से जहां पे अपने पैर ले जाते हैं वहां पे आप घूमते हैं। जहां पर मिला खाते हैं। जहां पर मिला सोते हैं उसका एक आनंद है। ऐसा लगेगा। मंदिर में काम करते करके ऐसा लगेगा कि वह फ्रीडम मुझे होता तो कितना अच्छा रहता। यानी कि एक तपस्या यदि आपने ठीक कर ली है तो फिर म इफ यू आर सिंसियर इफ यू टेक इट टू इट्स लॉजिकल कंक्लूजन तब उसमें से दोनों चीजें हैं। वो तपस्या भी है और फिर उसमें से जो आनंद मिलता है वो भी आपको इतना ही मिलेगा। आगे जाकर इवेंचुअली यह राजा महाराज वो विज्ञानानंद जी महाराज के बारे में कहते हैं वो गुप्त ब्रह्म ज्ञानी है। गुप्त ब्रह्म ज्ञानी क्यों? वो दिन भर वहां पे खड़े रह के कंस्ट्रक्शन काम करवाते हैं। वो घाट बनवाते हैं। कभी स्वामी जी का मंदिर बनवाते हैं। कभी ये ठाकुर का मंदिर बनवाते हैं। तो लगेगा कि ये वर्कर के साथ में काम कर रहे हैं। किंतु ऐसा नहीं ऐसा नहीं मतलब दिखेगा नहीं कि जब ध्यान कर रहे हैं। साधन भजन कर रहे हैं। हरि महाराज की तरह वेदांत चर्चा कर रहे हैं। शशि महाराज की तरह ठाकुर पूजा कर रहे हैं। लाटू महाराज की तरह रात भर जग करके जप कर रहे हैं। राजा महाराज की तरह भाव में आ रहे हैं। तो यह सब को देख के लगेगा हां यह लोग ब्रह्मज्ञानी है। किंतु विज्ञान महाराज क्या करते हैं? वह कंस्ट्रक्शन करवाते हैं। किंतु कंस्ट्रक्शन करवाते करवाते भीतर में ब्रह्मज्ञान हो चुका है। इसलिए गुप्त ब्रह्मज्ञानी मास्टर महाशय का भी शॉर्टहड नोट्स लिख दी थी। उसके बाद में कैसे उन्होंने कथामृत लिखा? मास्टर महाशय खुद कहते हैं कि मैं घंटों भर तक प्रत्येक सीन के बारे में सोचता रहता था। शॉर्टहैड के आधार पर जो मैं अपने सीन अपने माइंड में खड़ा करता था। ठाकुर जो बोलते थे एग्जजेक्टली उसको मैं याद करता था फिर उसको लॉन्ग फॉर्म में लिखता था तो यह कंस्ट्रक्ट बना करके इमेजिनेशन करके उसको ध्यान करके वो पूरे सीनों को उद्धार कर रहा है इससे ज्यादा बड़ी ध्यान और तपस्या क्या हो सकती है नहीं समय के अभाव से नहीं वो शॉर्टहड नोट्स थी काशीपुर की श्यामपुकुर की किंतु वो जो ठाकुर का कष्ट था ना वो उसके वो ध्यान नहीं कर पाए बेचारे देखिए हमको को पता है ना यह आनंद और कष्ट यह बाइनरी लैंग्वेज पे अपना ब्रेन चलता है। ठाकुर का आनंद देखकर के बार-बार वो दक्षिणेश्वर के दिनों की ओर जाते हैं। काशीपुर में ठाकुर का जो कष्ट था ना बेचारे से सहन नहीं होता था। बोल के उस दिनों की डायरी की नोट्स उन्होंने वैसी ही छोड़ दी थी। फिर प्रभानंद जी ने उसके ऊपर में अंत्य लीला लिखी है। लीला प्रसंग में भी तो ऐसा ही ना। काशीपुर का वर्णन कहां पे है? वो छोटा वर्णन करके छोड़ दिया। डिटेल में कुछ नहीं लिखा है। उस दिनों की याद ये डायरेक्ट डिसाइपल्स के माइंड में अंतरंग भक्तों के माइंड में इतना कष्ट देती थी कि उसके ऊपर में चिंतन करना इन लोगों के लिए बेचारों के लिए संभव नहीं होता था। यह जो कथामृत के प्रारंभ में ही मास्टर महाशय ने लिखा है ना कि वो जो कोर्ट में जाकर के बैठते थे। कोई भी साक्षी देने के लिए आता है तो उसकी जुबानी कितनी ट्रस्टवर्दी है? उसके क्या क्राइटेरिया है? उसको लंबा उसको इंटेरोगेशन करेंगे, इंक्वायरी करेंगे। यदि एक जगह पे भी वह झूठ बोल देता है यह जुबानी देने वाला तो बाकी जो कुछ भी बोला है सब वो डाउट के वो संदेह के दायरे में आ जाएगा। यानी कि यदि आपको ऑथेंटिसिटी बनाए रखनी है तो कहीं पे भी झूठ नहीं होना चाहिए। या तो फिर गलती से भी कुछ भी एरर नहीं आ जानी चाहिए। यह मतलब इतना हाई क्राइटेरिया लेकर के राजा महाराज की कहानी के वो छोटा सा एक छोटी सी किताब लिखी है। इतनी सी माने जस्ट इमेजिन मास्टर महाशय ने इतने बड़े-बड़े दो खंड लिख दिए हैं। राजा महाराज ने इतनी छोटी सी एक किताब लिखी है पॉकेट साइज श्री रामकृष्ण देव उपदेश। तो उसमें एक जगह पर उन्होंने ठाकुर के मुंह से कुछ बुलवाया है। ठाकुर एग्जैक्टली वह चीज बोले थे किंतु वह कोट कर रहे थे। तो राजा महाराज लिखकर के सो गए तो ठाकुर ने सपने में आकर के कहा कि अरे भाई यह जो बात मैं कह रहा हूं वो उसने कही थी। तुम वो मेंशन करना। सत्यानुसंधि ठाकुर है। सत्य को 100% पकड़ करके रहना है। तो एक पॉकेट किताब लिखने में राजा महाराज को ठाकुर को आकर के दर्शन देना पड़ा। तो इतने बड़े कथामृत लिखने में मास्टर महाशय को कितने दर्शन हुए होंगे? जस्ट इमेजिन। देखिए आज ही जो हम पढ़ रहे थे ना उसमें ठाकुर कहते हैं बोल करके कोमा करके सीधासीधी पैराग्राफ लिखा है। कोट मार्क में नहीं दिया है। यह भी एक मास्टर महाशय का एक बड़ा याद रखने वाला है। ठाकुर के शब्दों को एज इट इज वो जब रिमेंबर करते हैं उसको कोटेशन मार्क में देते हैं। और जो आज के ही पैराग्राफ में ऐसा था कि जहां पर वह कोटेशन मार्क नहीं दिया है। यानी कि मास्टर महाशय उसको थोड़ा सा पैराफ्रेज कर रहे हैं। यह एकेडमिक वर्क जो होता है ना उसमें जो इंटीग्रिटी रखनी है उसी तरह का इंटीग्रिटी इसमें है। यह जो आपने गवर्नमेंट की बात कही ना तो एक इंटरेस्टिंग कि मैं कल खोज रहा था कि गांधी जी बेलूर मठ में आए तो एक तो फेमस मुलाकात है। 1921 के आसपास में आए थे। महापुरुष महाराज उस समय मठ में थे और उनके साथ में वार्तालाप हुआ था। फिर वह लोगों को प्रवचन भी दिया था गांधी जी ने बेलूर मठ में। किंतु एक्चुअली गांधी जी पहली बार मठ में आए थे 1901 में। उस समय की स्वामी जीवित थे और स्वामी जी के साथ में वार्तालाप करना चाहते थे। अनफॉर्चूनेटली स्वामी जी उस समय बेलूर मठ में नहीं थे। कोलकाता में थे। बीमार थे। ट्रीटमेंट ले रहे थे। तो यह रेफरेंस में खोज रहा था। क्योंकि एक वीडियो में मैंने बोला था ऐसा। और जनरली आजकल मैं क्या करता हूं? आपने रिसेंट वीडियो देखे होंगे कि मैं साइड पैनल में ये सब रेफरेंस भी देता रहता हूं। मैं जो कुछ बोलता हूं उसका तो यह रेफरेंस मैं खोज रहा था। अपनी किताबों में ये रेफरेंस मुझे मिल नहीं रहा है। मैंने सोचा कि ये क्यों नहीं मिल रहा है? मैंने पढ़ा है ये तो पक्का है। फिर मैंने एक जनरल सर्च लगाया नेट के ऊपर में। तो पता है मुझे यह रेफरेंस कहां से मिला? मिनिस्ट्री ऑफ कल्चर गवर्नमेंट ऑफ इंडिया की वेबसाइट है। वहां पर गांधी जी के ऊपर में एक पोर्टल है। वहां पे यह मेंशन है कि ये 1901 में गांधी जी बेलूर मठ की मुलाकात के लिए गए थे। स्वामी जी के साथ में मिलने की बड़ी इच्छा थी किंतु मिल नहीं पाए तो डिसअपॉइंट हो के लौट आए। वो वहां पर मुझे मिला। तो देखिए गवर्नमेंट भी यह सब रिकॉर्ड रखती है। ओम