प्रार्थना
ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री श्री रामकृष्ण कथामृत श्रीमद् द्वारा लिपिबद्ध 16th दिसंबर 1883 दोपहर को 4:00 बजे हैं। जनाई के एक मुख्ज आए हैं। उनके साथ में ठाकुर वार्तालाप कर रहे हैं। कल और पिछले दो दिन हमने जो एक टॉपिक देखा था कि ईश्वर या तो फिर जो अल्टीमेट
श्रीरामकृष्ण ‘नेति नेति’ और ‘इति इति’—दोनों मार्गों का अद्वैत-अनुभूति के रूप में समन्वय करते हैं
रियलिटी है इस जगत में उसका स्वरूप क्या है? तो उस स्वरूप का चिंतन करतेकरते ठाकुर का जो कहना है उसको हमने बाकी जो भी फिलॉसोफीस है उसके साथ में कंपेयर किया और फिर देखा कि किस तरह से ठाकुर ने एक अवदान दिया है आध्यात्मिक जगत में यह इति इति मार्ग के द्वारा आप निर्विकल्प समाधि प्राप्त कर सकते हैं। यदि आप द्वैत वेदांत को देखेंगे तो द्वैत कहेगा कि ईश्वर का सानिध्य ईश्वर का प्रेम प्राप्त करना वही जीवन का उद्देश्य है। विशिष्ट अद्वैत देखेंगे तो वहां पर भी भक्ति मार्ग ही है। वही एक अद्वैत ही है। नॉन ड्यूल वेदांत जो कि हमको कहता है कि ईश्वर या तो ब्रह्मन के साथ में एकाकार हो जाना आत्मन का साक्षात्कार करना मैं आत्मन हूं। मैं यह देह नहीं यह जो एक छोटा सा मेरा आइडेंटिटी है वह नहीं किंतु वही इस समय और काल के परे यह जो कॉस्मिक इंटेलिजेंस है या तो फिर यह कॉस्मिक एग्जिस्टेंस है कॉस्मिक रियलिटी है वही मैं हूं तो उसके साथ में एकीकृत हो जाना वह अद्वैत वेदांत का लक्ष्य है किंतु अद्वैत वेदांत की यात्रा यह नेति नेति मार्ग से होती है। वह एक ज्ञान मार्ग से क्लासिकल आप अद्वैत वेदांत देखेंगे तो ज्ञान मार्ग के द्वारा आपको ब्रह्म साक्षात्कार होता है। आप अहम ब्रह्मास्मि यह जो उपनिषद कथित महावाक्य है उसकी उपलब्धि होती है। यहां पर ठाकुर का एक यूनिक अवदान है कि त्याग तो सही ही सही अर्थात कि सिर्फ ज्ञान मार्ग ही नहीं किंतु यह जो भक्ति मार्ग है शरणागति का वह दोनों का कॉम्बिनेशन करके आप यह महावाक्य है उसको और ज्यादा आसानी से साक्षात्कार कर पाएंगे और इसका सबसे बड़ा उदाहरण श्री रामकृष्ण स्वयं उनका जीवन देखेंगे तो ब्रह्मचर्य या तो फिर त्याग उसकी एक ज्वलंत मिसाल ठाकुर के जीवन में दिखती है। ठाकुर ने कहा है कि स्वप्न में भी मुझे इस तरह से काम का आवेग मेरे पर नहीं हुआ। किंतु साथ-साथ में ही देखिए कि ठाकुर के भीतर में शरणागति भी इतनी ही दृढ़ थी, इतनी ही डीपली रूटेड थी जितना कि त्याग था। तो त्याग और शरणागति यह दोनों भक्ति और ज्ञान यह जो क्लासिकल दो पथ है अपनी भारतीय परंपरा में ठाकुर के जीवन में इन दोनों का परफेक्ट कॉम्बिनेशन संपूर्ण संगम देखने को मिलता है। ठाकुर कहते हैं कि इन दोनों पथ के माध्यम से वेदांत में जो कथित महावाक्य है उसकी सहज उपलब्धि हो सकती है। तो यह ठाकुर का अवदान है और साथ-साथ में ही हमने देखा कि यह जो इतिवाचक इति इति करके जो हम साधना करते हैं वही एक पथ है जिसके माध्यम से हम बाद में मां शारदा और स्वामी विवेकानंद का अवदान समझ पाएंगे। यदि हम नेति नेति मार्ग को अवलंबन करेंगे तो फिर स्वामी जी का जो शिव ज्ञान है जीव सेवा है वह कांसेप्ट समझना मुश्किल हो जाता है और मां शारदा किस तरह से संसार में रही और फिर अपना यह जितना भी भाई है भाई की पत्नी है पागली और फिर उसकी लड़कियां है उन सबकी संभाल मां कैसे रख सकती है तो यह दोनों का जीवन का प्रॉपर आपको स्टडी करना है या प्रॉपर्ली एक फ्रेमवर्क के भीतर में समझना है तो ठाकुर का यह इतिवाचक साधन मार्ग है। वही एकमात्र हमारे लिए कॉम्प्रहेंसिव फ्रेमवर्क क्रिएट करता है। वरना तो ज्ञान मार्ग वाली जो फ्रेमवर्क है उसमें ना ही मां का जीवन फिट होगा ना ही स्वामी जी का होगा। और यदि हम सिर्फ भक्ति मार्ग वाली फ्रेमवर्क है उसको भी यदि देखेंगे तो ठाकुर का जो संपूर्ण त्याग है विषय वासनाओं के प्रति वो यहां पे इतना प्रॉपर्ली रिफ्लेक्ट नहीं होगा और ऑफकोर्स अगेन स्वामी जी का शिव ज्ञान जीव सेवा वह भी वहां पर रिफ्लेक्ट नहीं होगा। तो यह सब कुछ हमने ऑलरेडी देख लिया। काफी डिटेल में देखा है। वही एक लास्ट सेंटेंस फिर से रिपीट कर देते हैं। इस पैसेज का इस पैराग्राफ का क्या कहते हैं ठाकुर? ब्रह्म निर्लिप्त। ब्रह्म निर्लिप्त है। वायु ते सुगंध दुर्गंध पावा जाए किंतु वायु निर्लिप्त। वायु जो है उसमें सुगंध और दुर्गंध मिलती है किंतु वायु स्वयं निर्लिप्त है। यदि आप यह देखें और ठाकुर का वो जो फेमस एक उदाहरण हमने देखा था यह डिस्कस कर रहे थे कि आपने अग्नि प्रज्वलित किया है। होमाग्नि है या लकड़ी जला रहे हैं तो लकड़ी जलाने से उसका धुआं जो है तो आप देखेंगे कि दीवार के ऊपर में वह धुआं लग जाता है। बहुत सारे मंदिर में आप देखेंगे कि जहां पे वह होम होता है वहां पे उसकी छत जो है वह धुएं की वजह से काली हो जाती है। आपके घर में अभी तो आजकल चूल्हा नहीं जलता है। वरना तो पहले यह लकड़ी का या तो कोयले का चूल्हा जलता था। तो वहां पर भी आप देखेंगे कि जहां पर लकड़ी या कोयले का चूल्हा जल रहा है वहां की पास की दीवार जो है पूरी काली पड़ जाती है। तो ठाकुर कहते हैं कि लकड़ी जलाने से उसका जो धुआ है वो दीवार को काली कर सकता है किंतु आकाश को काली मां नहीं लगती है। आकाश जितना शुभ्र नील वर्ण था इतना ही शुभ्र नील वर्ण ऐसा ही रहेगा। हां मोमेंटरीली ऐसा होगा कि अभी वाइल्ड फायर लगा है। पूरे जंगल में आग लगी है तो काला-काला धुआं आकाश में उठ रहा है। तो कुछ क्षण के लिए ऐसा लगेगा कि आकाश काला पड़ गया है। अभी यह जो कैलिफोर्निया में वाइल्ड फायर चला था तो उसके वीडियोस शायद आपने देखे होंगे। पूरा आकाश जो है काला पड़ गया है। कहां पे यदि यह वोल्केनिक इरप्शन होता है तो जहां पे वोल्केनिक इरप्शन होगा देखेंगे पूरा आकाश उसकी राख और उसकी धुएं से काला हो गया है। किंतु वो है मोमेंटरीली। अभी 1 दिन 2 दिन एक सप्ताह दो सप्ताह रहेगा और उसके बाद में जैसे ही धुआं चला जाएगा देखेंगे कि आकाश वैसे ही शुभ्र नील वर्ण का है। मान लीजिए कि ऐसा हमारे घर की दीवार के साथ में होता कि चलो आज आपने अग्नि प्रज्वलित किया है। लकड़ी जलाई है तो दीवार अभी मोमेंटरीली काली पड़ गई है। किंतु यदि दो दिन के बाद में रात को उठकर के देखेंगे तो वैसे की वैसे ही दीवार स्वच्छ ही है। जो भी काली मां लगी थी चली गई है। यदि ऐसा होगा तो हमारी बहनों को कितना आनंद आएगा। ऑटोमेटिक क्लीनिंग करती है दीवार। तो किंतु अनफॉर्चूनेटली ऐसा है नहीं। दीवाल के ऊपर में एक बार धुआं लगता है तो वैसे का वैसा ही चिपका रहता है। फिर आपको मेहनत करके धुआं को इस काली मां को हटाना होगा। अभी वह गिरीश घोष का जो फेमस उदाहरण है ठाकुर बार-बार कहते हैं कि एक कटोरी में आपने यदि लहसुन रखा है उसके बाद में लहसुन को निकाल के कटोरी को जितना ही आप डिटर्जेंट पाउडर से धोते रहे वो कटोरी में से लहसुन की गंध जाएगी नहीं तो गिरीश बेचारा थोड़ा सा चिंता में पड़ गया ठाकुर क्या कहना चाहते थे कि एक बार आपने काम कांचन में अपना अपने को डाल दिया है उसके बाद में एक बार काम कांचन रूपी सेवन कर दिया है। उसके बाद में अपने चित्त के ऊपर में अपने संस्कारों के ऊपर में उसकी इतनी भयावह छाप छूटेगी कि इस जन्म में आप चाहे जितनी ही तपस्या कीजिए वह इजीली जाने वाली नहीं है। तो फिर बेचारा गिरीश दुखी होकर के ठाकुर को पूछता है कि क्या महाशय यह बाटी में से लहसुन की गंध कभी नहीं जाएगी? तो ठाकुर समझ गए कि वह क्या कहना चाहता है? गिरीश ने तो बहुत सारा कुछ अगड़म बगड़म करके रखा था। तो तो फिर ठाकुर कहते हैं क्यों नहीं जाएगी? बाटी को कटोरी को अग्नि में डालिए। जैसे ही अग्नि में डालेंगे अग्नि में यह कटोरी तपेगी वह फायर होगी। उसके बाद में देखेंगे कि लहसुन की गंध चली जाती है। तो यह तपस्या रूपी अग्नि जो है इस अग्नि में प्रज्वलित करके काम कांचन की यह जो छाप है काम क्रोध मदद लोभ मोह जो षड रिपु है उसने हमारे चित्त के ऊपर में जो संस्कार छोड़े हैं तपस्या के माध्यम से आप उसको हटा सकते हैं। तो यहां पे बेसिकली जो हम कहना चाहते थे कि यह ब्रह्मन और माया दोनों है इस जगत में ब्रह्मन माया कहे ना कि शक्ति कहे। ठाकुर कहते हैं शक्ति। तो देखिए कि वैसे तो शक्ति की जिस तरह से ठाकुर डेफिनेशन देते हैं वह माया की तरह ही लगती है। ये जो जैसे कि शंकराचार्य का फेमस उदाहरण कि शंकराचार्य का मुझे पता नहीं कि शंकराचार्य का है कि वो ट्रेडिशनल वेदांतिक लिटरेचर का है। व्हाटएवर किंतु जो ट्रेडिशनल वेदांतिक लिटरेचर का जो यह फेमस उदाहरण है कि रास्ते पर जाएंगे ये रस्सी पड़ी हुई है। अंधेरे में रस्सी आपको सांप की तरह दिखेगी। किंतु जैसे ही प्रकाश डाला वो सांप चला जाएगा। सांप रूपी जो भ्रम हमें हुआ था वो भ्रम चला जाएगा और रस्सी की रस्सी ही दिखेगी। किंतु ऐसा कहने से क्या एक बार हमको हमने रस्सी के ऊपर में प्रकाश डाला। सांप तो अदृश्य हो ही गया। सांप रूपी जो भ्रम था वह तो अदृश्य हो ही गया। रस्सी ही रही है तो रस्सी पर क्या सांप की कोई छाप छूट जाती है क्या? रस्सी पर ऐसा होता है कि सांप की तरह पूंछ बनी हुई है। सांप की तरह उसके दांत बने हुए हैं और स्पर्श करने को जाएंगे तो सांप की तरह हमको दसेगी। नहीं। रस्सी के भीतर में एक बार सांप रूपी सर्प रूपी अज्ञान या भ्रम चला जाता है। तो जाने के बाद में वह भ्रम रस्सी के ऊपर में किसी भी तरह की छाप नहीं छोड़ता। जैसे कि आप मरुभूमि में जा रहे हैं। स्वामी जी को खुद को यह मिराज हुआ था। यह दृष्टि भ्रम हुआ था कि मरुभूमि में जा रहे हैं। प्यास लगी है। देखते हैं कि दूर में एक सुंदर तालाब है। तालाब के किनारे सुंदर पेड़ है। तो स्वामी जी सोचते हैं जाएंगे वहां पे पानी पिएंगे। प्यास बुझाएंगे। प्यास को है जो कि संतुष्टि देंगे और फिर पेड़ की छांव में विश्राम करेंगे। तो जितना आगे जाते हैं उतना ही देखते हैं कि वहां पर वह ना ही वह पानी मिलता है ना ही वह पेड़ आता है। तब स्वामी जी समझे कि यह जो मिराज जो है जिसके बारे में मैंने सुना था वो इसी को कहते हैं मिराज कि जो चीज नहीं है उसका भ्रम होगा। किंतु मान लीजिए कि जहां पर मिराज है हमको पानी का भ्रम हुआ। वहां पर जाकर के हम एक बार खड़े रह गए तो पानी रूपी भ्रम तो दूर हो ही गया। हमको सिर्फ वह गर्म रहती ही मिलेगी सूरज में तपती हुई। किंतु क्या पानी अपनी कोई छाप वहां पर छोड़ जाता है? ऐसा होगा कि चलो पूरा तालाब तो ना मिला किंतु यहां पे एक जगह पर आपने देखा कॉर्नर में मिट्टी गीली हुई पड़ी है। वो जो पानी तालाब की जो एक भ्रम था भ्रम तो चला गया किंतु एक जगह पर थोड़ी सी रेत जो है रेत को गीली करके गया। यह जो पेड़ थे, पेड़ का भ्रम तो चला गया किंतु दो-तीन डालियां वहां पर अभी भी पड़ी हुई है। तो भ्रम जाने के समय क्या अपनी कोई छाप छोड़कर के जाता है? नहीं छोड़ के जाता। जैसे ही भ्रम अदृश्य हुआ उसके पीछे की जो असली वस्तु है वह एज इट इज हमको देखने में आती है। जबकि यह लहसुन की बाटी का ठाकुर उदाहरण देते हैं। देखिए कि किस तरह से यदि आप द्वैत को एक्सेप्ट करेंगे तो द्वैत में ऐसा है कि लहसुन की बाटी एक कटोरी में आपने लहसुन रखा। जैसे ही लहसुन को हटाया उसकी गंध जो है उसकी दुर्गंध जो है वह तो कटोरी में रह ही गई। उसको कटोरी को आपको अग्नि में तपाना ही होगा। तभी जाकर के वह गंध जाएगी। जबकि यहां पर यह मिराज का उदाहरण है। यह रेत गर्म रेत है। उसके ऊपर में हमको भ्रम हुआ कि एक जलाशय है और इसके चारों ओर पेड़ है। जिस क्षण भ्रम दूर हो गया उस क्षण क्या ऐसा होगा कि थोड़ा सा पानी वहां पे वह एक होल में एक गड्ढे में इकट्ठा होकर के रहा है। जैसे भी अपने रोड में होता है इंडियन रोड। जैसे ही बारिश आती है, पता चला कि यह पिछले महीने ही रोड का उद्घाटन हुआ था। मंत्री जी आए थे। बड़े ही फैनफेयर के साथ में उद्घाटन हुआ। उसके एक सप्ताह के बाद में बारिश हुई। रोड में गड्ढे हो गए। गड्ढे में जगह-जगह पानी भरा हुआ है। तो यहां जो गड्ढे में पानी भरा हुआ पड़ा है, ऐसा ही क्या हमको यह मरुभूमि में डेजर्ट में दिखेगा क्या कि डेजर्ट में जा रहे हैं। जलाशय का भ्रम हुआ, पेड़ का भ्रम हुआ। मिराज दिख रहा है। पास में गए तो मिराज तो अदृश्य हो गया। यह जलाशय तो अदृश्य हो गया। पेड़ तो अदृश्य हो गए। किंतु एक गड्ढे में थोड़ा सा पानी इकट्ठा हो के पड़ा है। एक पेड़ की एक आध डाल यहां पे और पेड़ के ऊपर में से खिजूर यह जो डेट पाम होते हैं ना डेजर्ट में यह खास करके ये अरेबिया वगैरह के जो बड़े-बड़े डेजर्ट है वहां पर जाएंगे तो डेट पाम्स होते हैं। तो यह पाम ट्रीज जो हमको वह मिराज में दिख रहे थे, वह तो अदृश्य हो गए किंतु कुछ डेट्स जो है खजूर जो है वह जमीन पर पड़े हुए हैं। तो हम सोचेंगे चलो गड्ढे में से एक खोबा पानी निकाल कर के पिएंगे और यह जो डेट्स कुछ पड़ी हुई है रेती में उसको खाएंगे। भले ही चाहे बड़ा जलाशय ना मिला। भले ही चाहे वह डेट्स के पूरे-पूरे पाम्स ना मिले किंतु इतना तो हमको मिल गया। किंतु देखेंगे कि मिराज जब अदृश्य होता है तो संपूर्ण रूप से अदृश्य होता है। पीछे में कुछ भी छोड़ता नहीं। किसी भी तरह की छाप छोड़ता नहीं। तो वो है अद्वैत वेदांत की अंडरस्टैंडिंग कि एक बार आपको ज्ञान हो जाता है। साथ-साथ में ही यह भ्रम कहो कि माया कहो संपूर्ण रूप से अदृश्य हो जाता है। उसकी कोई भी छाप वहां पर नहीं छूटती। ठाकुर का वह जो फेमस उदाहरण ठाकुर कहते हैं कि हजार साल से बंद कमरा है उसमें आपने जाकर के बत्ती जलाई तो जैसे ही आपने बत्ती जलाई तो एक सेकंड में तो उजाला हो जाएगा। पूरा कमरा जो है वह प्रकाश से झगमग करने लगेगा। ऐसा थोड़ी ना है कि हजार साल का घना अंधेरा है तो बत्ती जलाने से धीरे धीरे धीरे करके वह अंधेरा दूर होगा। ऐसा थोड़ी ना होने वाला है। जिस क्षण बत्ती जली उसी क्षण इंस्टेंटली 1000 साल का अंधेरा हो ना कि 10,000 साल का हो। यह जो सबटेरेनियन केव्स जो होती है, टनल जो होती है यह जो एक्सप्लोरर्स है वो कहीं पे एक्सप्लोरिंग करते-करते पता चला कि जमीन के नीचे में पूरा टनल का नेटवर्क है। केव्स का नेटवर्क है। तो वे लोग वह जो लैंप लेकर के भीतर में जाएंगे। पता चला कि यह लाखों साल पहले यह कैनल नेट केव नेटवर्क बना है अंडरग्राउंड और पता नहीं यहां पे वो कुछ-कुछ यहां पर किसी ने कभी प्रवेश नहीं किया है ना ही प्रकाश आता है। यह जो लाखों सालों की बनी हुई यह जियोलॉजिकल फॉरमेशन है। यह बोलकर के यदि आप लैंप लेकर के भीतर में जाएंगे तो 1 लाख साल का जो अंधेरा क्या आपको सामने में और 10 दिन लगेंगे जाने के लिए नहीं। जिस क्षण आपने 10 लाख साल पुरानी केव जिसमें कभी भी सूरज का प्रकाश नहीं गया। आपने लैंप प्रज्वलित किया। यह एक्सप्लोरर ने इंस्टेंटली पूरा अंधेरा चला जाएगा। और अंधेरा अपनी कोई भी छाप छोड़कर के नहीं जाएगा। जैसे कि यह अग्नि की यह जो छाप है दीवार पर लग जाती है। इस तरह की छाप अंधेरा कभी नहीं छोड़ेगा। इस तरह की इंप्रिंट अंधेरा कभी नहीं छोड़ेगा। तो देखिए कि अपने पास में दो तरह के उदाहरण है। एक उदाहरण है ज्ञान मार्ग का और दूसरा उदाहरण है ज्ञान मार्ग के अलावा जितने भी मार्ग हैं उनका। वह सभी मार्ग कहते हैं कि एक बार आपके मन के ऊपर में डरिपु है ना कि पंच कक्लेश है ना कि यह काम कांचन है ना कि अष्टपाश है। उसकी एक छाप आपके ऊपर में गिर गई तो फिर उसको निकालना बड़ा मुश्किल है। बड़ी तपस्या के बाद में जाएगी। तो वह ज्ञान मार्ग के अलावा जितनी भी साधन पद्धतियां हैं वह चाहे कर्म योग हो ना कि चाहे यह राजयोग हो ना कि चाहे यह भक्ति योग हो ना कि चाहे बुद्धिज्म हो ना कि यह क्रिश्चियनिटी हो ना कि जैनिज्म हो। जो भी सीरियस साधन पद्धतियां है, वह सभी कहती है कि तपस्या करके अपने को अपने चित्त को निर्मल करना होगा। जितनी भी सीरियस साधन पद्धतियां है उन सबके भीतर में तपस्या का एक बहुत ही बड़ाेंस है। बुद्धिज्म पूरा तपस्या पे ही बना है। भक्ति योग के जो आचार्य हैं वो चाहे ये अपने चैतन्य महाप्रभु हो ना कि फिर बाद में यह पूज्यपाद ये गोस्वामी गण जो हो जिनको भी आप देखिए या तो फिर यह भक्ति मार्ग के जो विभिन्न पोएट्स जो है यह तो यह अपने यह रामचरितमानस के रचयिता जो है या तो फिर यहां पे गुजरात में यह मीराबाई यह जो वगैरह है साउथ इंडिया में आप अलवारस वगैरह है जो भी भक्ति मार्ग के आचार्य हैं देखिए कि कितनी प्रचंड तपस्या उनके जीवन में है। ऑन द अदर हैंड ज्ञान मार्ग एक अकेला मार्ग है। वह कहता है कि एक बार आपको अहम ब्रह्मास्मि यह ज्ञान प्राप्त हो गया तो साथ-साथ में ही यह अज्ञान चला जाएगा और यह अज्ञान जाएगा। इतना ही नहीं कोई भी छाप नहीं छोड़ेगा अपने चित्त के ऊपर में। जैसे ही लाइट का स्विच ऑन किया वैसे ही झलमल करके प्रकाश चारों ओर बिखरने लगा। आत्मज्ञान रूपी प्रकाश। तो फिर और देखिए ऐसा नहीं है कि वेदांत के आचार्यों के जीवन में तपस्या नहीं है। वेदांत का तो फाउंडेशन ही है त्याग। वेदांत का तो फाउंडेशन ही है ब्रह्मचर्य। बिना ब्रह्मचर्य के ज्ञान मार्ग पर आप कुछ नहीं कर सकते हैं। ब्रह्मचर्य तो ज्ञान मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रथम सोपान है। बिना उसके आगे में कुछ नहीं होगा। तो देखिए कि तपस्या वैसे तो देखा जाए तो दोनों जगह पर है। किंतु दोनों का जो अल्टीमेट रियलिटी को प्राप्त करने की जो एक जर्नी है उसकी जो फ्रेमवर्क है उसमें यह एक बहुत बड़ा डिफरेंस दिखता है। ठाकुर इंटरेस्टिंगली हमको दोनों उदाहरण देते हैं। जैसे गिरीश घोष को यह लहसुन की बाटी का उदाहरण दिया। जैसे ही हमको यह उदाहरण दिया कि दीवार के ऊपर में तो छाप पड़ ही जाएगी। किंतु साथ में यह भी कहते हैं कि आकाश पर कोई छाप नहीं गिरेगी। साथ में ही हमको यह यह जो अंधेरे कमरे का भी उदाहरण देते हैं। स्विच ऑन करने से पूरा प्रकाशित हो जाएगा। तो ठाकुर के जीवन में देखिए कि दोनों तरह की विचारधाराओं का एक साथ में सम्मेलन देखने को मिलता है। एक विचारधारा है कि तपस्या करके चित्त को निर्मल करना होगा और उसके बाद में ईश्वर प्राप्ति करने के लिए शरणागति का आश्रय लेना होगा। भक्ति का भक्ति मार्ग का आश्रय लेना होगा। वह एक ट्रेडिशनल द्वैत मार्ग है, भक्ति मार्ग है। जबकि यह ज्ञान मार्ग है। कहता है कि एक बार आपने अपने मन के भीतर में यह ज्ञान ठीक बिठा दिया। महावाक्य स्मरण मनन निदि्यासन करके ठीक बिठा दिया कि अहम ब्रह्मास्मि प्रज्ञानम ब्रह्म वगैरह जो चार महावाक्य है आपने उसको ठीक ठीक रूप से धारणा कर ली। साथ-साथ में ही यह हजारों सूर्यों की तरह ज्योति प्रगटित होगी। जिस अंधेरे कमरे में हम बैठे हैं, उस अंधेरे कमरे में से अंधेरा साथ-साथ में ही अदृश्य हो जाएगा। तो वह ज्ञान मार्ग है। यह भक्ति मार्ग है। ठाकुर के जीवन में ज्ञान मार्ग और भक्ति मार्ग दोनों का एक अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। ज्ञान मार्ग के माध्यम से ठाकुर ने यह महावाक्य है। तोतापुरी से श्रवण किए थे और भक्ति मार्ग का ठाकुर ने शक्ति मंत्र ग्रहण किया था। वह केनाराम भट्टाचार्य उनके प्रथम गुरु। तो वह हम बात कभी-कभी भूल जाते हैं कि सर्वप्रथम तो मां का ही मंत्र लेकर के हृदय की आवेग पूर्वक हृदय की यह उत्कंठा से उन्होंने मां को पुकारा था और मां ने दर्शन दिया था। एंड अगेन सेकंड इंटरेस्टिंग फैक्ट कि जब मां ने दर्शन दिया ठाकुर को प्रथम दर्शन का वह जो विवरण लीला प्रसंग में पढ़ते हैं तो शरद महाराज हमको एक आश्चर्यजनक बात कहते हैं कि यह जैसे ही ठाकुर को ठाकुर ने खड़ग मां के हाथ में से उठाकर के अपने गले में डालने का प्रयास किया। गला काटने का प्रयास किया। साथ-साथ में ही देखा चारों ओर से प्रकाश की किरणें एक वेव तरंग की तरह समुंदर की तरंगों की लहरों की तरह आकर के उन पर टूट पड़ी और वह प्रकाश के समुंदर में जैसे कि निमग्न हो गए और उनका बाह्य ज्ञान है वो अदृश्य हो गया। तो यहां पे शरद महाराज लिखते हैं कि क्या मां काली ने ठाकुर को निराकार रूप में आकर के दर्शन दिया था क्या? यानी कि चाहे भले ही चाहे ठाकुर वैसे साकार उपासना कर रहे हैं। भले ही चाहे ठाकुर भक्ति मार्ग की साधना कर रहे हैं। प्रथम दर्शन ही ज्ञान मार्ग का वो जो निर्विकार निर्विकल्प ब्राह्मण जो है उसका हुआ था। प्रथम साक्षात्कार ही वही हुआ था। बाद में तो यह दर्शन की परंपरा चलना शुरू हुआ। तो दैट इज हाउ इंटरेस्टिंग कि भक्ति मार्ग और ज्ञान मार्ग कितना क्लोजली वोवन है ठाकुर के जीवन में। आप एनालिसिस करके इन दोनों को कभी भी सेपरेट नहीं कर पाएंगे। यह संपूर्ण रूप से एक दूसरे के साथ में मिला हुआ है। तो वह साधन पद्धति के बारे में हो गया। दूसरा कि वर्ल्ड व्यू के बारे में ओवरऑल फिलॉसोफी के बारे में क्लासिकल ज्ञान योग को फॉलो करके पता चलेगा कि पहले तो जगत मिथ्या है। उसके बाद में निर्विकल्प समाधि ब्रह्म साक्षात्कार और उसके बाद का स्टेज है। जगत ही ब्रह्मन है। ब्रह्मन ही जगत है। उस दोनों में कोई डिफरेंस नहीं है। तो वह एक क्लासिकल ट्रेजेजरी चलता है। जबकि ठाकुर के जीवन में यह आपको त्याग तो अवश्य करना है। कामना वासनाओं का जगत के साथ में अपना जो रिलेशन है उसको आपको सुसंस्कृत करना है। किंतु जगत मिथ्या है बोलकर के उसको उड़ा नहीं देना है। वही ब्रह्म ही जगत हुआ है। वह अनुभूति जो कि हमको ब्रह्म साक्षात्कार के बाद में जो प्राप्त होती थी इसको यहां पे स्टार्टिंग में ही टेकन फॉर ग्रांटेड ले लेना है। स्टार्टिंग में ही आपका जो कैलकुलेशन है उसमें बिठा देना है। और ज्ञान मार्ग में ऐसा क्यों नहीं है? क्योंकि ज्ञान मार्ग का फाउंडेशन है ब्रह्मचर्य। यदि आप यह कहेंगे कि ब्रह्म यह जगत जो है वह भी उसी के भीतर में वही ब्राह्मण है। जैसे कि मेरी पत्नी है या जो इतनी सुंदरी स्त्रियां है पुरुषों के लिए स्त्री और स्त्री के लिए पुरुष। तो यह जो ऑोजिट जो व्यक्ति है अपना उसके भीतर में यदि ब्राह्मण है ऐसा मैं पहले से ही मान लूं तो फिर प्रश्न होगा कि इनके साथ में काम संबंध बांधने में बुराई क्या है और इस तरह का थिंकिंग हमको यह तंत्र साधना में देखने को मिलता है विराचार साधना या वीर भाव की साधना जिसमें कि ईश्वरी के साथ में ऐसा सोच करके इस तरह के संबंध बांधे जाते हैं स्त्री के साथ में तो वैष्णव तंत्र यह जो है हमने वह कर्ता भजा है वैष्णव तंत्र है। इन सब के उदाहरण हमने कथामृत में देखे हैं। ठाकुर इन सब के बारे में चर्चा करते हैं और ठाकुर हमको सावधान कर देते हैं कि इस तरह की साधनाएं महा भयानक है। तो बोल करके ही और हमको यह भी पता है कि शंकराचार्य ने जब अपना दिग्विजय पर्व प्रारंभ किया था, उन्होंने यह बुद्धिज्म की अवनति के बाद में भारत में प्रवेशी हुई तंत्र साधनाएं और तंत्र साधनाओं के भीतर में प्रवेश हुए दुराचार को स्पष्ट रूप से देखा था। स्त्री और पुरुष काम का संबंध बनाकर के साधना करना चाहते हैं। अभी यह बड़ा ही भयानक है। इसलिए शंकराचार्य ने हो सकता है कि स्पेककुलेशन कि उन्होंने सोचा होगा कि ब्रह जगत जो है उसको संपूर्ण रूप से मिथ्या के रूप में ही प्रोजेक्ट करें। वरना तो फिर आप यह स्टार्टिंग में ही सोचेंगे। साधना के समय ही सोचेंगे कि हां जो सामने स्त्री है या पुरुष है उनके भीतर में भी वही ब्राह्मण है। तो काम रूप संबंध बनाने में बुराई क्या है? इतनी सारी ब्राह्मण का संबंध तो ब्राह्मण के साथ में ही होता है ना। उसमें बुरा क्या है? तो यह अकल या तो फिर यह मिस इंटरप्रिटेशन दु उसको दुषुद्धि कहते हैं। कुबुद्धि इस तरह की कुबुद्धि या तो फिर इस तरह का मिस इंटरप्रिटेशन ना हो बोलकर के जगत को मिथ्या के रूप में ही सर्वप्रथम परिणत परिगणित करो। समझो। उसके बाद में जब ब्रह्म साक्षात्कार होता है, जब अपनी बुद्धि संपूर्ण रूप से सुसंस्कृत हो जाती है और फिर यदि वापस आने का मौका मिलता है तो फिर आप जगत को ब्रह्ममय देख सकते हैं। इन दैट केस कोई प्रॉब्लम नहीं है। लोहे की तलवार जब सोने की हो जाती है तो उस तलवार से आप किसी का वध नहीं कर पाएंगे। तो यह सोचकर के शायद अद्वैत वेदांत के ज्ञान मार्ग में प्राथमिक चरण में जगत को मिथ्या के रूप में गिना गया है। जगत से संपर्क विच्छेद करना है। संपर्क शून्य करना है। जबकि ठाकुर की यह जो आई ठाकुर का जो वर्ल्ड व्यू है, ठाकुर का जो फ्रेमवर्क है, उसमें जो कंडीशन ब्रह्म साक्षात्कार के बाद की थी कि जगत ही ब्रह्ममय है। ब्रह्मन ही एक तरह से जगत में परिणत हुए हैं। रूपांतरित हुए हैं। जैसे कि समुंदर और समुंदर के ऊपर की यह लहर है। तो उस कंडीशन को उस थिंकिंग को आपको साधना के प्राथमिक चरण से ही आपको इंप्लीमेंट करना है। नहीं कि ब्रह्म ज्ञान के बाद में तो यह जब आप सोचेंगे तभी तो आपको स्वामी जी और मां के जीवन का तात्पर्य समझ में आएगा। ठाकुर कहते हैं कि जगत को मिथ्या बोलकर के उड़ा मत दो। देखिए मास्टर महाशय को यह कंफ्यूजन हो गया था। वो बार-बार आप कथामृत में देखेंगे कि मास्टर महाशय लिखते हैं कि क्या ठाकुर का यह विशिष्ट अद्वैतवाद है क्या? तो यह लोगों को हो गया था कि विशिष्ट अद्वैत में देखिए कि ब्राह्मण, जीव और जगत यह सब एक ही व्यक्ति के अलग-अलग ऑर्गन है। उसकी तरह है। यहां पे जैसे ठाकुर यह बेल फूल का बेल फल का उदाहरण देते हैं कि बेल फल में से बाहर का आवरण या तो शेल और उसके भीतर के बीज यह दोनों को निकाल देना है। सिर्फ पल्प जो है उसका सार भाग उसी को रहना है। तो फिर यह तो वजन में कम पड़ जाएगा। आपको संपूर्ण बेल फल को ही लेना है। तो यह सोच कर के यह इवन मास्टर महाशय को यह भ्रम हो गया था कि यह पल्प है, ब्रह्म है और यह सीड है और यह आवरण है, शैल है। जीव और जगत है। बोल के ठाकुर विशिष्ट अद्वैत का अनुमोदन कर रहा है। नहीं। ठाकुर विशिष्ट अद्वैत या द्वैत की साधन पद्धति जो कि भक्ति योग है उसको ले रहे हैं। किंतु विशिष्ट अद्वैत या तो द्वैत वेदांत का जो फिलॉसोफिकल एस्पेक्ट है इन दोनों का जो ओवरऑल थ्योरेटिकल फ्रेमवर्क है उसको नहीं ले रहे। थ्योरेटिकल फ्रेमवर्क तो ठाकुर ने अद्वैत वेदांत का ही लिया है। किंतु बस साधन पद्धति का कॉम्बिनेशन किया है। हार्मोनी ऑफ साधन पद्धति नहीं कि हार्मोनी ऑफ फिलॉसोफीस। यह बात हमको समझने की जरूरत है। बहुत बार हम लोग इस तरह से एक्सप्लेन करते हैं ठाकुर का हार्मोनी ऑफ रिलीजन क्या है? कि जब आप साधना में प्रथमप्रथम प्रवेश करें तो भक्ति योग को फॉलो कीजिए। कर्म योग को फॉलो कीजिए। थोड़ा सा आगे बढ़ते हैं तो ज्ञान योग है और राज योग को फॉलो कीजिए। तो हम लोग कहेंगे कि साधना के प्रारंभ में द्वैत वेदांत अच्छा है। थोड़ा सा आगे बढ़ेंगे तो विशिष्ट अद्वैत अच्छा है। और अल्टीमेटली देखेंगे तो अद्वैत वेदांत अच्छा है। तो यह हार्मोनी ऑफ रिलीजन को लेकर के बहुत तरह का थिंकिंग चलता है। मेरा जो पर्सनल रीडिंग है ठाकुर करते हैं हार्मोनी ऑफ योगास नहीं कि हार्मोनी ऑफ वेदांतिक स्कूल। इस अर्थ में कि यदि आप प्योर द्वैतवाद को लेंगे तो जो भक्त है उसका भगवान के साथ में एक ही कृत नहीं होने वाला है। वह दोनों हमेशा सेपरेट ही रहेंगे। जबकि अद्वैत वेदांत में मेरा जो स्मॉल आई है वह भ्रम मात्र है। यह जो लार्जर आई है, कॉस्मिक आई है, वही रियल आई है। तो यह जहां तक फिलॉसोफी का अंडरस्टैंडिंग या तो फिलॉसोफिकल फ्रेमवर्क जाता है, ठाकुर ने हमेशा अद्वैत वेदांत का ही अनुमोदन किया है। किंतु वही बात है कि यह जो चार योग है, चार योगों का कॉम्बिनेशन उन्होंने किया है। अद्वैत वेदांत की सर्वोच्च उपलब्धि है उसको प्राप्त करने के लिए। इसीलिए रामकृष्ण मिशन के लोगों में आप देखिए कि वह योग का कॉम्बिनेशन है। चार योग का कॉम्बिनेशन है। नहीं कि तीन अद्वैतिक फिलॉसोफी का कॉम्बिनेशन। सो वो एक समझने की हमको जरूरत है कि जो बात ब्रह्म साक्षात्कार के बाद में हमको समझ में आती है अनुभूति होती है कि ब्रह्मन ही जीव जगत हुए हैं। यह गियर चेंज करके ठाकुर कहते हैं कि जल स्थिर सर्प जो है वह कुंडली बनाकर के लेटा हुआ है तो भी वह सर्प है और सर्पाकार गति में चलता है तो भी वही सर्प है। वह गियर चेंज कर देना है। गाड़ी खड़ी है तो भी वही गाड़ी है। वही कार है। और जब वह कार चल रही है तो भी वही कार है। बस उसमें गियर चेंज कर दिया है। वह न्यूट्रल गियर में से फर्स्ट गियर, सेकंड गियर, रिवर्स गियर उसमें चल रही है। गियर चेंज का ही डिफरेंस है। कार में कोई फर्क नहीं पड़ता। यह मोड चेंज हो जाता है। किंतु वह जो एंटिटी है, ऑब्जेक्ट है वह तो सेम का सेम रहता है। तो यहां पे यह अद्वैत वेदांत ही है। बस वही बात है कि साधन पद्धतियों का समन्वय हुआ है अद्वैत वेदांत की अंब्रेला के नीचे में और दूसरा कि अद्वैत वेदांत की जो क्लासिकल फ्रेमवर्क थी कि नेति नेति निर्विकल्प समाधि इति इति तो उसमें ठाकुर ने पहले से ही इति इति निर्विकल्प समाधि अगेन इति इति वो इति इति वाला ही ठाकुर ने रखा है। फिलॉसोफी का जहां तक प्रश्न है कि यह जीव जगत ही ब्राह्मण हुए हैं और हमको इनके साथ में रिलेशन चेंज कर देना है। यह जनसाधारण को देखते हैं तो उनका शोषण नहीं करना है। उनको सहाय करनी है। उनको मिथ्या बोलकर के उड़ा नहीं देना है। ना ही उनका शोषण करना है। उनको सहाय करनी है। अपने सामने कोई स्त्री आ जाती है या स्त्री के सामने पुरुष आ जाता है तो उसको मिथ्या बोलकर के उड़ा नहीं देना है। उसके साथ में काम भाव का संबंध नहीं बनाना है। किंतु उसके साथ में जो रिलेशन है उसको ट्रांसफॉर्म कर देना है। उसके साथ में यदि हो सके तो अल्पसहाय करनी है या तो फिर उनसे उपेक्षा करनी है। तो देखिए कि जगत के साथ में अपना रिलेशन चेंज करने को ठाकुर कह रहे हैं। नहीं कि जगत को मिथ्या बोलकर के उड़ा देने का और ऑब्वियसली जो अब जैसे कि चैतन्य महाप्रभु ने यह जो नित्यानंद थे उनको विवाह करने को कहा तो अभी ठाकुर हालांकि ठाकुर के गुरुही तो संतान थे ही थे किंतु ठाकुर ने अपने जो प्रधान शिष्य है स्वामी विवेकानंद उनको तो त्याग का ही संदेश दिया है। अर्थात कि ठाकुर की यह जो समन्वय समन्वयमई जो फिलॉसोफी है उसमें एक और त्याग का पूर्ण प्राधान्य है जो कि आपको क्लासिकल ज्ञान मार्ग में दिखती है। साथ में ही शरणागति का इक्वल प्राधान्य है जो कि हमको क्लासिकल भक्ति योग में दिखता है और यह ज्ञान मार्ग और भक्ति मार्ग का समन्वय हमको निर्विकल्प समाधि की ओर लेकर जाएगा जो कि अद्वैत वेदांत का यह कंट्रीब्यूशन है। अद्वैत वेदांत का फ्रेमवर्क में से आता है और साथ-साथ में ही यह साधना करने के समय जो अपना वर्ल्ड व्यू रखना है। वह वर्ल्ड व्यू है। वह साधना की सिद्धि प्राप्त करके इति इति करके वापस आते हैं। वह वाला वर्ल्ड व्यू तो देखिए कि कितना यह एक डिलीशियस कॉम्बिनेशन है कि कितना यह हमको एक डिलीशियस या एक तरह का यह देखने को मिलता है। समन्वय देखने को मिलता है श्री रामकृष्ण के जीवन में और श्री रामकृष्ण की साधन पद्धति में। और इसीलिए बहुत सारे प्रयास हुए हैं कि ठाकुर को आप कौन सी क्लासिकल स्ट्रीम में डालना चाहेंगे। वैसे तो ऑफिशियली हम लोग कहते हैं कि अद्वैत वेदांत। वरना तो फिर कोई कहेगा जैसे मास्टर महाशय थे वो कहते थे विशिष्ट अद्वैत कोई कोई होंगे कहेंगे कि ठाकुर तो भक्त थे। कोई कहेंगे कि ठाकुर तो शाक्त थे। ठाकुर खुद कहते हैं कि वह ब्राह्म समाज वाले आते हैं तो कहते हैं यह तो हमारे ही मत के हैं। क्यों? क्योंकि ठाकुर के सामने जो आता था उनके मत के ठाकुर हो जाते थे और उनके मत के अनुसार उनके साथ में वार्तालाप करते थे। किंतु साथ में यह भी कहते थे कि ऐसा मत सोचो कि मेरा ही मत सही है और अन्य का मत गलत है। उदार दृष्टि रखो। यह बात ठाकुर उनको कहते थे। मास्टर महाशय है। मास्टर महाशय को शुरू शुरू में ठाकुर ने पूछा था कि तुमको साकार लगता है अच्छा लगता है कि निराकार अच्छा लगता है तो मास्टर महाशय ने कहा फिलहाल तो मुझे निराकार ही अच्छा लगता है तो ठाकुर ने उनको ऐसा नहीं कहा जोर करके कि तुम साकार में आओ ही आओ ठाकुर ने कहा अच्छा जिस मार्ग पर तुम्हारी निष्ठा है उस मार्ग को तुम अच्छे से निष्ठा पूर्वक पकड़ करके रखो उसी में सिद्धि प्राप्त करने का प्रयास करो तो यह ठाकुर को हम समझने को जाएंगे ट्रेडिशनल फ्रेमवर्क के भीतर में तो बहुत सारे कंट्राडिक्शन खड़े होंगे और फिर दूसरा एक प्रश्न आता है कि हम लोग ठाकुर को समझ अपनी समझ के अनुसार समझ करके एक नया फ्रेमवर्क क्रिएट करने को जाएंगे। जैसे कि अभी आजकल प्रयास हुए हैं कि ठाकुर मेरी दृष्टि के अनुसार ठाकुर का यह मत है। एक नया मत मैं खड़ा कर रहा हूं। इस नए मत के भीतर में मैं ठाकुर को बिठा रहा हूं। तो ठाकुर ने स्पष्ट कहा है कि जब यह ब्राह्म समाजियों के बारे में कि ये जितने भी सेक्ट है आएंगे जाएंगे किंतु वही हिंदू सनातन धर्म ही टिका रहेगा। यानी कि क्लासिकल फ्रेमवर्क में ठाकुर को बिठाना मुश्किल है तो एक नया मनगढ़ंत फ्रेमवर्क क्रिएट करके उसके भीतर में यदि ठाकुर को बिठाने का प्रयास किया तो वह फ्रेमवर्क भी टिकेगा नहीं। उस फ्रेमवर्क के जो प्रचारक है वह जितने दिन प्रचार करेंगे उतना ही दिन और उन्हीं के ऑडियंस तक ही यह टिकेगा। इसके आगे नहीं टिकेगा। तो ठाकुर का यह जो बहुपया भाव है इतने मल्टीपल एस्पेक्ट है हीरा जो होता है जो बहुत ही अच्छे से हीरे को आपको यह किया गया है उसको यह पॉलिश किया गया है तो थाउजेंड्स आफ्टर थाउजेंड्स फसेट्स आपको इस हीरे के दिखेंगे। जैसे-जैसे आप हीरे को ऐसा ऐसा करके घुमाते जाएंगे एक अलग-अलग कलर है, अलग-अलग ये रिफ्लेक्शन है, अलग-अलग शेड्स है देखने को मिलेंगे। सो ठाकुर इज़ आल्सो लाइक दैट थाउजेंड फसेटेड डायमंड। हम जितना एनालिसिस करते जाएंगे इतना ही हमको लगेगा कि अरे यह अभी यहां पर तो हमको अभी यह पैसेज के भीतर में हमने जो एनालिसिस किया वो ठीक बैठ जाता है। इसके बाद के पैसेज में ठाकुर ऐसा एक गुगली मारते हैं कि वो जो पहले वाला पूरा एनालिसिस हवा में मिल जाता है और अभी एक नया फ्रेमवर्क यहां पे क्रिएट करना पड़ेगा। सो कंटीन्यूसली ठाकुर को पढ़ने से ऐसा लगेगा और यदि साथ-साथ में ही आपने मां और स्वामी जी को ले आए तो तो फिर पूरा मामला गड़बड़ हो जाता है। ठाकुर मां स्वामी जी कोई भी फ्रेमवर्क आप क्रिएट कीजिए। उसका प्री कंडीशन है कि ठाकुर मां स्वामी जी तीनों को उसके भीतर में आपको समावेश करना होगा। यदि आप यह कहेंगे कि हां मैं कहता हूं कि ठाकुर का यह मत है। उसके बाद में यदि किसी ने आपको प्रश्न प्रश्न किया कि मां ने एक पत्र लिखा है। मां ने पत्र में स्पष्ट लिखा है। ठाकुर भी अद्वैत थे। तुम भी अद्वैती हो तो इस बात को तुम तुम्हारी फ्रेमवर्क में कैसे फिट बिठाओगे? और यदि सामने ऐसा प्रश्न का उत्तर इस प्रश्न का उत्तर ऐसा यदि मिलता है कि मां को तो वेदांत समझ में नहीं आता था। मां को तो फिलॉसोफी नहीं समझ में आती थी। अर्थात कि मां जो कहती है उसको सीरियसली लेने की जरूरत नहीं। ऐसा रिप्लाई मुझे लिटरली एक साधु के माध्यम से मिला है। तो फिर मैंने सोचा कि वो जो फिलॉसोफी बना रहा है वो किसी काम की नहीं है। वो क्यूरियोसिटी की तरह कुछ दिन रहेगी और फिर बाद में अदृश्य हो जाएगी। और फिर स्वामी जी का शिव ज्ञान है जीव सेवा। इस बात को आप कैसे आप फिट बिठाएंगे? बहुत सारे वेदांती जो है वह कर्म योग को पूरा स्कर्ट ही कर देते हैं। उसके बारे में बात ही नहीं करते। उसके बारे में सोचते ही नहीं है। और इनको यदि आप कर्म योग करने को कहेंगे कहेंगे कि जाओ ट्राइबल एरिया में तीन-चार साल बिता करके आओ गांव में जाना प्रतिदिन और गांव वासियों को जो भी सहाय चाहिए सहाय करना तो इन लोगों को बेचारे को बुखार आ जाएगा। इतना सीरियसली कर्म योग के प्रति उनका यह एक तरह का प्रजुडाइस रहता है। तो यदि स्वामी जी का कर्म योग है मां का यह करुणा और ममता है अपने परिवार जनों के ऊपर में यह भक्तों के ऊपर में तो छोड़ ही दीजिए। वह तो चलो ठाकुर का भी था। किंतु परिवार जनों के ऊपर में जो मां का जो ममत्व है खास करके राधु के साथ में मां का संबंध वो अभी आप कहेंगे कि नहीं मां को तो देह धारण करना था बोलकर के राधु का सहाय लिया था किंतु यह इस तरह से थिंकिंग करना मुझे उचित नहीं लग रहा है। देखिए कि मां का जीवन की वो घटना जब पढ़ेंगे कि वो किस एग्जजेक्टली वो कौन सी इवेंट थी कि मां ने राधु को स्वीकार किया। देखा कि छोटी बच्ची है राधु और उसकी मां पागल हो गई है ऑलरेडी और वह एक गुड़िया को लेकर के वह आगे में जा रही है। यह सोच के वही उसकी बच्ची है। जबकि उसकी सही बच्ची रोती-रोती वो क्रोलिंग करती करती छोटा बच्चा वो हाथ और पैर के ऊपर में चलता है ना इंग्लिश में उसको कहते हैं क्रोलिंग। बांग्ला में कहते हैं हामागोड़ी। तो यह हामागोड़ी करती-करती ना कि क्रोलिंग करती करती उसके पीछे में जा रही है रोती-रोती। तो जैसे ही मां ने यह दृश्य देखा मां का हृदय करुणा से भरपूर हो गया और दौड़ कर के जाकर के मां ने राधु को अपने हाथों में उठा लिया और सोचा कि यदि मैं इस बच्चे की संभाल नहीं रखूंगी तो और कौन रखेगा तो मां राधु को स्वीकार करते हैं उसके पीछे में मां का मातृभाव है नहीं कि एक तरह का साइनिकल थिंकिंग एक तरह का यूटिलिटेरियन थिंकिंग कि हां मैं एक लड़की को साथ में रखती हूं जिससे कि मेरा देह धारण हो और जिससे कि मैं लोगों को ठाकुर का जो मैसेज है उसका मैं प्रचार कर सकूं। इस तरह का सनिकल थिंकिंग इस तरह का यूटिलिटेरियन थिंकिंग नहीं था। वो तो मां ने ममत्व से परवश होकर के उसको अपने गोद में उठाया है। तो ममत्व परवश होना ममत्व से यह तो आपको कोई भी फ्रेमवर्क वेदांत की उसमें फिट नहीं होगा। अदर देन कि भक्ति मार्ग तो ये देखिए कि आपको यदि ठीक-ठीक समझना है तीनों को एक साथ में तो आपकी फ्रेमवर्क जो है बहुत ही लिबरल होनी चाहिए बहुत ही ब्रॉड होनी चाहिए एट द सेम टाइम जो कि यह बाकी जो फिलॉसोफीस में जो प्रवेश कर गया है कि साधना के नाम पर भोगवाद चलने लगा है। अद्वैत वेदांत ही एकमात्र ऐसी फिलॉसोफी है कि जिसने कि किसी भी भोगवाद को अपने भीतर में प्रवेश नहीं करने दिया है। वरना तो जितनी भी आप फिलॉसोफीस देखेंगे फिलॉसोफिकल फ्रेमवर्क के भीतर में ही आपको ये इंद्रियों के सुख को चरितार्थ करने की यह लूप होल मिल जाएंगे। अद्वैत वेदांत ने सब तरह के लूप होल को क्लोज कर दिया है। तो वह उसका स्ट्रेंथ है। उसको भी लेना है और साथ-साथ में ही द्वैत या विशिष्ट अद्वैत का जो लिबरलिज्म है दोनों उसको भी लेना है। यहां पे त्याग और प्रचंड वैराग्य तपस्या को लेना है। दूसरी ओर एक हार्ट को लेना है। स्वामी जी कहते हैं ना कि अपने जो हिंदू धर्म था क्लासिकल वैदिक हिंदू रिलीजन उपनिषदों का ऋषियों का उनके पास में था ब्रेन और भगवान बुद्ध के पास में था हार्ट। यह हार्ट और ब्रेन का कॉम्बिनेशन करके ही श्री रामकृष्ण देव का जो धर्म है, श्री रामकृष्ण देव का जो जीवन और उपदेश है, उसको समझना है। ये कॉम्बिनेशन यह जो ब्रेन सिर्फ था, हार्ट नहीं था बोलकर के वो जो क्लासिकल वैदिक सिविलाइजेशन का पतन हुआ। क्यों? क्योंकि वह प्योरिटी तो बहुत मेंटेन करते हैं। तपस्या तो बहुत मेंटेन करते हैं। किंतु समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग जो है वो उनसे बिछड़ गया है। वे लोग एलियनेट हो गए हैं। यहां पर बुद्धिज्म का हार्ट जो है इतना विशाल है कि सब तरह के लोगों को अपने पंथ के भीतर में प्रवेश करवा दिया। किंतु परिणाम यही आया जैसे हमने माय प्लान ऑफ कैंपेन प्रवचन में देखा था कि जितनी भी तरह की प्रजातियां है जो कि अपने जितनी भी तरह की यह कुबुद्धि है या तो फिर सुपरस्टिशन है या तो फिर यह जो बैड हैबिट्स है वो सब लेकर के बुद्धिज्म में आ गई और बुद्धिज्म में यह बैड हैबिट्स कुबुद्धि या तो सुपरस्टिशन उन सब ने मिलाकर के जो यहां पे तोलमाड़ मचाई है तोलपाड़ मचाई है कि भीतर में से बुद्धिज्म को पूरा खोखला कर दिया। उसके भीतर की जो प्योरिटी थी, उसके भीतर की जो तपस्या थी खत्म हो गई और पूरा करप्शन में डूब गया। और इसी बुद्धिज्म के भीतर में जो करप्शन आया उसके बाद में जो वामाचार है विभत्स जो सब कांड है धर्म के नाम पर वो भारत में चले हैं। स्वामी जी कहते हैं कि उसका वर्णन मैं यहां पर जो जेंटलमैन लोग बैठे हैं जो सभ्य समाज के सब लोग स्त्री और पुरुष उसके सामने में कर भी नहीं सकता। इस तरह का भयावह दुराचार यह करप्टेड बुद्धिज्म में से भारत में फैला था। तो यहां पर आपको जो वेदांत का जो तपस्यामय भाव है, प्योरिटी है, ब्रेन जो है, उसको लेना है। साथ-साथ में ही बुद्धिज्म ने जो प्रयास किया था हृदय को विस्तृत करने का उसको भी लेना है। और श्री रामकृष्ण देव इस अर्थ में वेदांतिक ब्रेन और बुद्धिस्ट आर्ट इन दोनों का कॉम्बिनेशन है। बहुत बार हम लोग कहते हैं कि स्वामी जी कहते हैं कि वेदांतिक ब्रेन एंड इस्लामिक बॉडी किंतु मुझे लगता है कि इससे बेटर स्वामी जी का ही एनालॉजी है और स्वामी जी ने ही दोनों एनालॉजी दी हुई है। दोनों उपमा स्वामी जी ने ही दी हुई है। किंतु आई विल प्रेफर टू से कि वेदांतिक ब्रेन एंड बुद्धिस्टिक हार्ट। तभी यह प्रॉपर कॉम्बिनेशन होगा। और यह कॉम्बिनेशन जो है हमको रामकृष्ण विवेका मां शारदा विवेकानंद भावधारा समष्टि रामकृष्ण मां शारदा विवेकानंद भावधारा समष्टि यह जो फ्रेमवर्क है उसमें देखने को मिलता है तो आज यहीं तक अभी नेक्स्ट क्लास होगा अपना नेक्स्ट मंडे को ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम राम कृष्णपणमस्तु
प्रश्न: हृदय और मस्तिष्क के समन्वय के बारे में स्वामीजी की एक अच्छी कहानी है. उनके विशाल हृदय और करुणा के कारण स्वामीजी को बहुत कष्ट झेलने पड़े। मुझे लगता है कि यही उनकी विशिष्ट देन है।
आबू रोड जंक्शन पे मुलाकात हुई थी। स्वामी जी प्रवरज्या करते-करते वहां पर गए थे और ये राजा महाराज और तुरियानंद जी ने उनको पकड़ लिया था वहां रास्ते में अमेरिका जाने के पहले की तो बात हो रही है तो स्वामी जी कहते हैं मुझे पता नहीं कि अनुभूति कितनी हुई किंतु हार्ट मेरा बड़ा विशाल हो गया है। सो यह अ वेरी गुड एग्जांपल। [हंसी] देखिए बहुत बार हम यह कहते हैं ना कि दिस इज ठाकुरस कंट्रीब्यूशन। दिस इज ठाकुरस यूनिकनेस। जैसे ठाकुर ने इसको दिया है जो कि वेदांत में नहीं था। बहुत बार ना वी सेल हिम चिप माने ठाकुर का रियल कंट्रीब्यूशन है व्हिच जैसे आपने कहा व्हिच पुशेस द एनवेलप किंतु वो अंडरस्टैंडिंग के लिए ना आपको बहुत डीप में जाना पड़ेगा। ऊपर ऊपर से आप कहेंगे ये ठाकुर का कंट्रीब्यूशन जैसे कि स्वामी जी का आत्मश स्वामी जी का यह शिव ज्ञान जीव सेवा जो कि उपनिषद में नहीं था। व्हिच इज़ नॉट लाइक दैट। उपनिषद जिस युग में लिखे गए थे उस युग में गरीबी इस तरह की नहीं थी कि आपको उन लोगों की सेवा करने के लिए आपको घर बार छोड़कर के साधु होना पड़े। उपनिषद का युग ही अलग था कॉन्टेक्स्ट अलग था। तो अब जैसे अमेरिका में वही कॉन्टेक्स्ट था कि वहां पर गरीबी नहीं लार्ज स्केल पॉवर्टी नहीं है। तो स्वामी जी ने वही उपनिषद का संदेश एज इट इज दे दिया। भारत का कॉन्टेक्स्ट अलग है। बोल के उपनिषद के जो थ्यरी है उसको प्रैक्टिकल करने के लिए प्रैक्टिकल वेदांत के रूप में स्वामी जी ने शिव ज्ञानी जीव सेवा स्टार्ट किया। दिस इज नॉट ए यूनिक एट्रिब्यूशन इन इटसेल्फ। द थिंग इज दैट के थ्योरिटिकल फ्रेमवर्क जो है उसको लार्ज किया गया है। जो वेदांतिक ब्रेन है उसको बुद्धिस्ट हार्ट के साथ में कंबाइन किया गया है। व्हिच इज अ रियल कंट्रीब्यूशन। बाकी का तो लॉजिकली फॉलो अप सिर्फ होता है। तो बहुत बार जो कि आप आर्टिकल पढ़ेंगे लोगों को बोलते हुए सुनेंगे विवेकानंदास यूनिक कंट्रीब्यूशन। मुझे ऐसा यूनिक उसमें कुछ नहीं लगता। यूनिक है बट यू हैव टू गो मच डीपर टू अंडरस्टैंड एंड एप्रिशिएट दैट। देखिए सबसे बड़ा उदाहरण क्या है? पता है जो वैदांतिक ब्रेन के साथ में प्रॉब्लम कहां पे है? कि ये जो रिलीजियस रेनेस है ना पूरे विश्व में उस समय आया था। क्रिश्चियनिटी में भी ये जो आजकल के मॉडर्न ऑर्डर्स है ना फ्रांसिस्कन ऑर्डर्स है फिर ये जो डोमिनिक ऑर्डर्स है वो सब बनना शुरू हो गए थे और जिन्होंने ही फिर अल्टीमेटली ये ओशन एक्सप्लोरेशन वगैरह को पुश किया और यह वेस्टर्न सिविलाइजेशन ने विश्व पे राज किया। सो ये जो रिलीजियस रेनेसा है 300 400 500 साल पहले वो ऑलमोस्ट सब जगह पे आना शुरू हुआ था। शंकराचार्य का जो अद्वैत वेदांत है। अभी जो शंकराचार्य को मॉडर्न एज में लेते हैं। लोग कहते हैं आदि शंकराचार्य 10,000 साल। सो उसको अभी फिलहाल छोड़कर के जो अभी एक कॉमन थिंकिंग है कि 800 इयर्स एगो उसको यदि लेते हैं। इस्लाम में भी वो रहनेस आया। मतलब इस्लाम भी प्रारंभ हुआ। शंकराचार्य भी हुआ। किंतु वे लोगों का पृथ्वी पर विजय क्यों हुआ? उन्होंने सबको अपने फोल्ड में ले लिया। जबकि शंकराचार्य का ऐसा है कि वहां पे एक से ज्यादा दूसरा साधु रह नहीं सकता। चार ही मठ बने हैं। चार मठ का नेटवर्क भी नहीं बना है। और चार मठ के भीतर में चार ही मठाधिपति या चार कि इतने ही साधु होंगे। उस बाकी को सबको से म्डरे बेस उन्होंने रिलीजन नहीं बना पाए। गुरु शिष्य परंपरा उन्होंने चालू की है। कार्ड्रे बेस रिलीजन नहीं बना पाए। जबकि ये क्रिश्चियनिटी और इस्लाम कार्डरे बेस रिलीजन बनाया बोल के एवरीवन कैन हैव देयर ओन स्टेक इन द सिस्टम। यहां पे है कि मठाधीश जो है जो कहता है वही सही। फिर आपका और कोई स्टेक नहीं है उसमें। सो हाउ एक्सक्लूसिव वी वेर बोल के इस्लाम और क्रिश्चियनिटी के सामने हम बहुत इजीली हार गए हैं। व्हिच इज द केस विद इस्लाम एंड क्रिश्चियनिटी। राइट? कि वहां पे देखेंगे कि बहुत आप बोलेंगे कि वो प्योर रिसर्च है ना। वो लोग बीच-बीच में ये फिगर पब्लिश करते हैं। इस्लाम के 2 बिलियन 2.3 बिलियन ना क्रिश्चियनिटी के समथिंग लाइक 2.3 बिलियन फॉलोअर्स हैं। इस्लाम के 1.8 बिलियन फॉलोअर्स हैं। किंतु आप देखेंगे कि वहां पे क्या ऐसे लोग प्रकट हुए हैं अभी रिसेंट हिस्ट्री में तो एटलीस्ट कि जिनको देखकर के हमको उनके चरणों में गिर जाने का एक ये मिले मतलब एक भीतर में से एक ऐसा आए वो जो महापुरुषों की परंपरा तो भारत में ही हुई है। वहां तो हुई नहीं है। वहां जो फाउंडर हुए वो हुए उसके बाद में तो सब मिडवकर ही लोग हैं। शारदानंद जी मां का जीवन मां की महासमाधि मतलब जो मां का जो पूरा लाइफ है उसके बाद में मां की महासमाधि के बाद में ना कि उसी समय में मां के बारे में भी वही कहते हैं कि तो लीला देखे अबक होए छी हसीबो की कादीबो बुझते ना पारते छ माने तुम्हारी लीला देखकर के अक हो गया हूं हंसू कि रोऊं समझ में नहीं आ रहा है [हंसी] मां के एक्चुअली गीत है किंतु वो मां के बारे में वो गीत गाते हैं [हंसी] लीलामई तो लीला देखे अबाक होए छ हाशी की कांधी वो बुझते ना प समथिंग लाइक दैट [हंसी]
प्रश्न: ठाकुर दो विरोधाभासी बातें कहते हैं — यदि हम किसी कमरे में, जो हज़ार साल तक बंद रहा हो, बिजली जलाएँ तो वह तुरन्त प्रकाशित हो जाएगा। दूसरी ओर, यदि किसी प्याले में लहसुन रखा हो तो उसकी गन्ध हटाने के लिए उसे आग में भूनना पड़ता है। इन दोनों का सामंजस्य कैसे बैठता है?
एक टिपा भी बूंद नहीं एक एक बूंद भी पानी नहीं निकलता [हंसी] गिरीश घोष कहते हैं महाशय एक बूंद भी नहीं गिरेगा ठाकुर कहते एक बूंद भी नहीं गिरेगा [हंसी] [हंसी] देखिए ठाकुर को जब कैंसर हुआ तो वह दो डिवीजन हो गए बहिरंग और अंतरंग। बहिरंग सोचते हैं कि ठाकुर अपने को ही नहीं ट्रीट कर पाते हैं। हमारा भवर रोग कैसे वह ठीक करेंगे। और दूसरे थे कि वो ठाकुर को रोग हुआ है। अवतार है किंतु देह धारण किया है। तो देह के धर्म भी उनको लगे हैं। बोलकर के अपना सेल्वेशन को फिलहाल भूल जाओ। ठाकुर की सेवा के लिए जीवन लगा दो। अभी ठाकुर का दोनों के प्रति बहिरंग होंगे। जैसे कि भनाथ और नरेंद्र परफेक्ट एग्जांपल दोनों साथ में आते थे। दो भवनाथ को ठाकुर ने वो जो एक उच्च साधक का वो दर्जा भी दिया था। पुरुष और प्रकृति नरेंद्र पुरुष भनाथ प्रकृति माने भवनाथ का इक्विवेलेंट मिलना मुश्किल है। वही भवनाथ ठाकुर को जब कैंसर हुआ तो वो निकल गया। बहिरंग में आ गया। जबकि नरेंद्र अंतरंग में आ गया। प्रॉब्लम कहां है कि भवनाथ ने यह सोच लिया कि ठाकुर के पास में से जो मिलना था उसका यहां पर अंत आ गया और नरेंद्र ने यह सोचा कि ठाकुर के पास में और भी बहुत कुछ मिलना है। तो ठाकुर पर श्रद्धा उनको कितनी थी दैट इज द मैटर। ऐसा नहीं है कि ठाकुर ने उसको कम प्रेम किया है या उसको भगा दिया है। इसको ज्यादा प्रेम करके रख लिया है। अपनी श्रद्धा का प्रश्न है। सो यहां पे भी यदि मैं यह सोचता हूं कि मेरे संस्कार निकलने में अभी सालों सालों लगेंगे तो मैं वहीं पर पड़ा रहूंगा। किंतु इस बात पे मुझे भरोसा हो जाए कि ना ठाकुर का नाम लिया है फिर मुझे डर किस बात का है? ठाकुर का नाम लिया है फिर इसी जन्म में मुक्ति होगी और क्या कहां का प्रश्न है? वो श्रद्धा यदि प्रकट होगी। इसलिए तो स्वामी जी कहते हैं ना आत्मश्रद्धा मूल है नहीं कि आप हजार तरह की साधना कर लें। जिस क्षण आत्मश्रद्धा का उदय हुआ देखिए कि दिया जल गया।
प्रश्न: हम ठाकुर, माँ और स्वामीजी के बारे में इतना पढ़ते और सीखते हैं, लेकिन अब चुनौती यह है कि इसे व्यवहार में कैसे उतारा जाए।
बहुत सस्ता है। नहीं इसीलिए ठाकुर कहते हैं ना चिड़ा भेंजा और बुद्धि माने यह जो गीला पोहा होता है ना कैसा सॉफ्ट होता है। इस तरह की बुद्धि हो गई है। बनत बनत बनी जाए। माने बनते बनते बन जाएगा। ठाकुर कहते हैं मुझे हालांकि ठाकुर ये गीत गाते हैं साथ-साथ में ही कहते हैं कि मैं मुझे यह गीत बिल्कुल अच्छा नहीं लगता। वही जो मैं पिंजरे की पंखी की तरह फिर ठाकुर सामने ही थूक के कहते हैं मैं क्यों पिंजरे के पंखी की तरह होने को जाऊंगा। यानी कि शरणागति का एक मार्ग है। ठाकुर उसको अपनाते हैं। साथ में ही उसकी लिमिटेशंस बता देते हैं। और फिर वही उदाहरण कि ठाकुर गुस्सा करके जैसे कि भाव में किसी के साथ वार्तालाप कर रहे हैं। गुस्सा करके कहते हैं तू यार किक होनी भी। और फिर मास्टर महाशय उसका इंटरप्रिटेशन देते हैं। क्या माया ठाकुर को टेंपट करने के लिए आई थी? और ठाकुर ने क्रोध करके कहा कि तुम मेरा क्या बिगाड़ लोगी? देखिए रुद्र स्वरूप है प्रकट करना होगा। हम हम सोचते क्या है कि आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश किए तो अभी सौम्य हो के रहना है। तो सौम्य जगत के साथ में रहना है। टेंप्टेशन आता है रुद्र स्वरूप प्रकट करना होगा। ये इवल ये जो कांसेप्ट ऑफ रुद्र काली ये क्यों अपने हिंदू धर्म में है? वह एक तो है कि प्रकृति का भयावह रूप है। वह भी है और हमको भी यह रुद्र स्वरूप धारण करने का कैपेसिटी होना चाहिए। जब टेंप्टेशन आता है। हम लोग बिल्कुल शरणागत होकर के पैर में गिर जाते हैं कि शरणागति कभी काम करेगी कभी नहीं करेगी। तो क्यों नहीं साथ-साथ में ही रुद्र स्वरूप को भी डेवलप करें। आइदर और दोनों को आजमाए जो काम करेगा वो करेगा।
प्रश्न: स्वामीजी कहते है की उपनिषद् के प्रत्येक पन्ने पर मुझे शक्ति - आत्मश्रद्धा - दिखाई देती है. पर मुझे तो ऐसा नहीं दिखता। उपनिषद् में शक्ति का प्रदर्शन करने की बात तो आती ही नहीं. हमने उपनिषद् की सौम्यता अपनायी परन्तु हम रूद्र-काली को भूल गए.
अब अब ठाकुर जो उदाहरण देते हैं कि गंगा में से एक स्त्री ने बाहर आकर के बच्चे को प्रसव किया और फिर उसी को भक्षण कर दिया कैनबलिज्म अभी और कौन सा धर्म है वो कहता है कि हमारे भगवान ने जगत को प्रसव करके उसी को खा गए म कराल मुखी हो के विकट स्वरूप धारण करके वो तो शैतान जगत को करप्ट करता है भगवान जगत को म ये करते हैं पुष्टि करते हैं वो शैतान जो है उसका संहार करता है जबकि अपना ब्रह्मा विष्णु महेश वो त्रिदेव जो है म वो तीनों देवता है सृष्टि के संहार करने वाले को कहीं वो शैतान का स्वरूप नहीं दे दिया सो दैट इज कि विद इन द डिविनिटी द संहार शक्ति जो है इज अ पार्ट ऑफ साधना और पार्ट ऑफ डिनिटी इटसेल्फ वो संहार शक्ति अपने में डेवलप करनी होगी रुद्र स्वरूप धारण करना होगा माया जब सामने आती है तो चिल्ला करके गाली देकर के उसको भगाना होगा अदरवाइज यदि एकदम गरीब होकर के बैठे रहेंगे तो एक समय ऐसा आएगा कि वह माया जिस तरह से हमको नचाना चाहे नचा लेगी। ऑफ कोर्स हमें जैसे कि अभी क्लासिकल उदाहरण गिरीश घोष का माया दो लोगों को फंसाने के लिए आई अपनी जाल में। स्वामी जी इतने बड़े हो गए कि जाल छोटी पड़ गई और ये जो नाग महाशय इतने छोटे हो गए कि वो जाल के जितने होल है उसमें से निकल गए। मेरा कहना है दोनों सीख लो ना। वहां हमको क्यों सिर्फ छोटा होना सीखे ना बड़ा होना सीखे। ठाकुर का है कि दोनों सीख लो। छोटा भी होना सीख लो, बड़ा भी होना सीख लो। फिर जो काम करें। देखिए यह जो शक्ति या आत्मश्रद्धा है, स्पिरिचुअल लाइफ में किस तरह से वो मैनिफेस्ट होती है कि हजार साल का अंधेरा उसमें दिया जलाने के लिए आत्मश्रद्धा काम करती है। यदि ये टेंप्टेशन नजर के सामने आते तो सर माने हाथ पटक करके चिल्ला करके उसको बोलना है भागो यहां से। तो माया भाग जाएगी। दैट इज़ एक इनर मैनिफ़ेस्टेशन, स्पिरिचुअल मैनिफ़ेस्टेशन। तो, वही जो दृढ़ संकल्प है, वह बाहर में कैसे मैनिफ़ेस्ट होगा? तो, यह तो है ही है कि दुश्मनों का संहार करने के लिए। किंतु साथ-साथ में ही देखिए कि यह जो पिछले 400 500 साल का जो हिस्ट्री है, हमको कहता है कि इंटेलेक्चुअल अचीवमेंट होनी चाहिए। साइंस एंड टेक्नोलॉजी ही है जो कि हमको आज स्ट्रेंथ देता है। आज अमेरिका के पास में जो टेक्नोलॉजिकल स्ट्रेंथ है उसमें अभी कोई भी देश अमेरिका के सामने नहीं टिक पाएगा। अमेरिका जो स्टिल्ड फाइटर्स डेवलप कर रहा है। इंडिया कितने साल पीछे है ये सब टेक्नोलॉजी में? तो वो टेक्नोलॉजिकल जो हेफ्ट है वो कहां पे आएगी? वो इंटेलेक्चुअल मैनिफेस्टेशन से आएगी। सो दैट इज मच मोरेंट मैनिफेस्टेशन ऑफ आत्मश्रद्धा कि मेरा जो एकेडेमिक इंटेलेक्चुअल अचीवमेंट है इन दैट फील्ड आई कैन एक्सेल बिकॉज़ टेक्नोलॉजी इज़ ट्रू पावर इन दिस एज आज अभी एक यूक्रेन का वॉर देखिए ना अभी पूरा ड्रोन पे लड़ा जा रहा है। आप एक सैनिक के पास में चाहे अभी यह मैंने वह कारगिल का वह वॉर का वह सब कुछ आर्टिकल पढ़ा था तो उसमें देखा कि वह पाकिस्तान के जो सैनिक हैं वो बोल रहे हैं कि ये चीटियों की तरह इंडियन सोल्जर्स से वो चढ़ रहे हैं पहाड़ के ऊपर में। हम ऊपर से चाहे जितना भी फायरिंग करते रहे वे लोग डर के मारे भागते ही नहीं है। ऊपर में चढ़े ही जा रहे हैं। चढ़े ही जा रहे हैं। इट टेक्स सच अ करेज कि आप स्टिप पहाड़ है उसके ऊपर में बिल्कुल डिफेंस हो के चढ़ना है ना। हाथ में तो गन है नहीं कि सामने से फायरिंग हो रहा है। मृत्यु निश्चित है। फिर भी आप चढ़े ही जा रहे हैं। चढ़े ही व्हिच काइंड ऑफ करेज इट विल टेक। और आज के युग में सब अभी अभी जो वो हुआ वो इसके बाद में ऑपरेशन सिंदूर पूरा ड्रोन तो अभी क्या है कि ये जो ट्रेडिशनल डेफिनेशन ऑफ करेज है इट आल्सो हैज़ चेंज नाउ डज़ ये जो प्रैक्टिकल वेदांत के जो चार लेक्चर है ना वो एक बार हम देखेंगे उसमें जोरदार चर्चा होगी एंड एंड एंड विथ ए म एक्सपेंडेड बेस ऐसा नहीं है कि आप स्वामी जी को ही पढ़ते-पढ़ते फिर आखिर में आप प्रैक्टिकल वेदांत तक गए आपका एक तरह का अंडरस्टैंडिंग होगा किंतु तो अपना जो बेस जो एक्सपैंड हो रहा है मां को भी हम अच्छे से समझ रहे हैं। ठाकुर को भी अच्छे से समझ रहे हैं। फिर ऑन दैट एक्सपेंडेड बेस ब्रॉडर बेस वी आर गोइंग टू स्टडी प्रैक्टिकल वेदांत। तो फिर उसका एक्सप्लेनेशन भी इतना ब्रॉड होना चाहिए होगा। ओम