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Sri Ramakrishna Kathamrita ·

श्रीरामकृष्ण कथामृत || 15 Dec 1883 - श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ दक्षिणेश्वर में || 26 Aug 2025

प्रार्थना

ओम स्थापकाय धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री श्री रामकृष्ण कथामृत श्रीम कथित डेट है 15th दिसंबर 1883 मास्टर महाशय ठाकुर के साथ में दक्षिणेश्वर में निवास करने के लिए आए हैं। ठाकुर ने जैसे कहा कि मने वने और कोणे बीच-बीच में तपस्या कर लेनी चाहिए। तो इसी तरह से यह आजकल की लैंग्वेज में हम जिसको कहते हैं स्पिरिचुअल रिट्रीट। तो इस तरह की एक स्पिरिचुअल रिट्रीट पे मास्टर महाशय आए हुए हैं दक्षिणेश्वर में। तो ऑलरेडी हमने देख लिया सुबह से किस तरह से उनका कार्यक्रम स्टार्ट होता है ठाकुर का। पहले तो प्रह्लाद चरित का पाठ होता है। अभी अर्ली मॉर्निंग उठकर के ठाकुर ने क्या किया या तो फिर ठाकुर ने मास्टर महाशय को क्या उपदेश दिया कि तुम इस तरह से साधना करो जप ध्यान करो यह सब तो वर्णन नहीं है अवेलेबल किंतु एटलीस्ट जब से लेकर के ठाकुर प्रहलाद चरित का पाठ कर रहे हैं तब से यह सुबह के 8:00 बजे से हमारे पास में विवरण उपलब्ध है। तो 8:00 बजे ठाकुर प्रह्लाद चरित का पाठ करते हैं। उसके बाद में ठाकुर मास्टर महाशय को डांटते भी हैं। पर जैसे कल हमने डिस्कस किया था कि

आज के शारीरिक - मानसिक दुर्बलता के युग में तपस्या कैसे करे: अपमान करने वाले के प्रति सहनशीलता बढ़ाकर

महापुरुष या किसी संत की डांट यह भी हमारा जो संस्कार है संस्कार को काटने के लिए बड़ी ही असरकार है। जो तितक्षा जो तपस्या हम आज के युग में नहीं कर पाते हैं। उपवास करना या तो फिर जैसे कि मां ने पंचतपा किया था तो ऊपर में सूरज तप रहा है और चारों ओर पांच अग्नि है तो इस तरह से पंचतपा करना यह तो इस तरह का कोई तपस्या हम लोग तो करते नहीं है। मैंने तो जैन साधुओं को देखा है कि कितना ये लोग उपवास करते रहते हैं। निर्जला उपवास भी करेंगे और या तो फिर जनरल उन लोगों के खानेपीने रहने के नियम इतने कठिन होते हैं। सूर्यास्त के बाद में नहीं खाना है। खड़े-खड़े खाना है। फिर हाथ को इस तरह से करेंगे। इस तरह से थाली में भोजन ग्रहण नहीं करना है। पहली तो बात है इस तरह से हाथ को करना है। इस इतने जो दो हाथों में जितना भिक्षा आए उसी को खड़े-खड़े ही खाना है। जब यात्रा करनी है तो किसी भी तरह के व्हीकल का इस्तेमाल नहीं करना। और मैंने तो दिगंबर साधुओं को देखा है। ठंडी हो ना कि गर्मी धूप हो ना कि बारिश बिना वस्त्र के दिगंबर रहेंगे। तो यह जो प्रचंड तितक्षा साधुओं के लिए जो आवश्यक है और सिर्फ साधु नहीं साधक इन जनरल बिना तितक्षा के बिना तपस्या के बिना कठोरता के हमारे संस्कार कटते नहीं है। किंतु जैसे हमको पता ही है कि इस युग में अपनी ततीक्षा तपस्या वगैरह सब कहां हवा हो गई है पता नहीं। ठाकुर ने कहा कि कली में अन्नगत प्राण थोड़ा सा भी आहार का कष्ट हुआ तो हम लोग सहन नहीं कर पाएंगे। थोड़ा सा भी सर्दी धूप लगा तो हम लोग सहन नहीं कर पाएंगे। यह फैन सब जगह पर चाहिए। अभी आजकल एसी भी चाहिए हमको। मुझे याद है मैं जब बेलूर मठ में ज्वॉइ करने के लिए गया था पीपीटीसी में तो मेन टेंपल जो है ठाकुर का मुख्य मंदिर वहां पर फैन नहीं थे। तो ऑब्वियसली अभी शाम धूप के दिन गर्मी के दिनों में पूरा टेंपल भरा हुआ है। ऑलमोस्ट आई थिंक 300 400 लोग टेंपल में आ जाते हैं। इतनी कैपेसिटी है वो नाट मंदिर की तो इतने सारे लोग एक साथ में बैठे हैं और फिर फैन नहीं है तो गर्म कितना लगेगा? किंतु क्या है पता है शुरू शुरू में बड़ा कष्ट होता तो था। बिना फैन के रहने की तो कभी आदत डाली नहीं है। तो किंतु एक बार जब वह संध्या आरती प्रारंभ होगी तो जो 5 मिनट प्रारंभ में जो कष्ट होगा संध्या आरती का दर्शन करते-करते और ठाकुर की आरती का गान सुनते-सुनते धीरे-धीरे करके यह शारीरिक कष्ट यह गर्मी लग रही है। पवन हवा बिल्कुल नहीं आ रही है। यह सब चीजें हम लोग भूल जाते थे। फिर ठाकुर की आरती में ही पूरा मन मग्न हो जाता था। सुबह को भी मंगल आरती के बाद में वहां पर हॉल में हम सभी लोग बैठे हैं। वैसे तो गंगा है पास में और वहां से पवन आता रहता है। किंतु कोई गारंटी नहीं है कि पवन हर बार आएगा ही। कभी-कभी बड़ा गर्म लगता था। यह पूरा हम लोग पसीना हो जाते थे। पसीना पसीना हो जाते थे। किंतु क्या है? यह सब शुरू शुरू में 5 10 मिनट ऐसा कष्ट होगा। किंतु जैसे ही आपका मन जप करने में लग गया मंगल आरती के बाद में सुबह को देखेंगे कि यह सर्दी, गर्मी, ठंडी, धूप, प्यास वगैरह कहां भूल जाते हैं। वो वातावरण ही इतना पवित्र है। बेलूर मठ का मेन टेंपल का यहां पर गंगा के किनारे वो जो पूरा एक जो माहौल जो खड़ा होता है और उस समय तो क्या था पता है? मैं बिल्कुल पहली बार बेलूर मठ में गया था। यह गंगा का किनारा अभी तो आप देख रहे हैं कि वहां पर यह सब बैरियर वगैरह बना दिया है। अब बैरियर अभी बना पिछले तीन-चार साल में। इससे पहले क्या था कि यह फूल के यह कुंडे रख दिए थे। ये फ्लावर पॉट रख दिए थे। जिससे कि क्या हो कि यह कोई छोटे बच्चे वो वहां पे वो गिर ना जाए कहीं गंगा में। तो यह फ्लावर पॉट रखे थे और अभी तो यह एक्चुअल बैरियर ही बना दिया है। किंतु मैं जब बिल्कुल पहली बार गया था तो गंगा का किनारा एकदम क्लीन था। यहां पर लोन खत्म होती है। लोन खत्म होने के बाद में यह जो वो पत्थर का ये जो है जो घाट वो प्रारंभ होता है और वहां से नीचे सीधी गंगा है। तो वहां पर उस समय में देखता था कि सुबह अर्ली मॉर्निंग को कई साधु ब्रह्मचारी वही गंगा के घाट के ऊपर में बैठकर के जप कर रहे हैं। तो इतना सुंदर नजारा दिखता था। तो 510 मिनट कष्ट होगा कि फैन नहीं है बोल के। किंतु बाद में आप सब भूल जाएंगे। अभी आप देखिए कि यह बेलूरमठ मैंने ओरिजिनल बेलूरम देखा था। अभी मैं जब ट्रेनिंग सेंटर में आया तो हम लोग आई थिंक दोपहर को 4:00 बजे ना कि ऐसा कुछ वहां पे ट्रेन हमारी आई होगी। तो जैसे कस्टमरी होता है अपने आश्रम में जहां पर भी जाते हैं तो वह मेन टेंपल में साइड टेंपल में प्रणाम करना है। अभी क्या है ट्रेनिंग सेंटर में जो ब्रह्मचारी आते हैं तो ज्यादातर लोग तो पहली ही बार आते हैं क्योंकि क्या है कि वे लोग सेंटर में जॉइ किए हैं और शायद उनको पता ही नहीं है रामकृष्ण संघ बेलूर मठ वगैरह तो अभी ट्रेनिंग सेंटर के लिए आए हैं तो बहुत सारे ब्रह्मचारी के लिए बेलूर मठ की प्रथम ही मुलाकात है यह तो फिर किसी एक सीनियर ब्रह्मचारी जो पीपीटीसी का एक जो ब्रह्मचारी होता है तो उसको कह देते हैं कि यह सब पहली बार ब्रह्मचारी आए हैं तुम इनको सब जाकर करके साइड टेंपल है, मेन टेंपल है, दर्शन करवा के ले आओ। तो मेरे साथ में मैं था और मेरे साथ में एक दूसरा पीपीटीसी ब्रह्मचारी था। तो हमको कहा कि यह नए ब्रह्मचारी को ले जाओ दर्शन करवा के आओ। तो हम लोग गए साइड अभी मैं तो पीपीटीसी मैंने बेलूर मठ ही ज्वाइन किया है मैंने। तो मुझे तो पता है साइड टेंपल क्या है? मेन टेंपल तो दर्शन वगैरह कर लिए। थोड़ा सा मैंने देखा कि काफी कुछ चेंज दिख रहा है किंतु ठीक है चेंज है तो है। वो गंगा के किनारे फ्लावर पॉट वगैरह रख दिए हैं। जैसे कि एक अनऑस्ट्रक्टेड व्यू जो एक गंगा का था वो थोड़ा सा पहले फ्लावर पॉट देखेंगे बाद में गंगा दिखेगी। तो ठीक है। चलो यह भी ठीक है। फिर हमें तो ट्रेनिंग सेंटर में चले गए। फिर दूसरे दिन मंगल आरती के लिए जैसे ही जाकर के बैठे मंगल आरती तो खत्म हो गई तब तक मुझे पता नहीं चला कि प्रॉब्लम एक्चुअली क्या है? नया प्रॉब्लम क्या स्टार्ट हुआ है। जैसे ही मंगल आरती समाप्त हुई और मुझे जो याद था कि संपूर्ण शांति संपूर्ण निरवता प्रसरित हो जानी चाहिए। उसकी जगह यह घर करके आवाज आ रहा है। मैंने कहा क्या हो गया है? ये कौन सा आवाज है? या अर्ली मॉर्निंग को इस तरह से कौन हल्ला मचा रहा है? फिर ऊपर देखा तो यह सब पेडेस्टल फैन रख दिए हैं चारों ओर। एक्चुअली पेडेस्टल फैन अगले दिन भी थे और मैं जब वो जैसे ही मंगल आरती के लिए मैं प्रवेश किया उस समय भी थे। किंतु क्या है माइंड ऐसा हैबचुएटेड हो गया है तो कि यह मंदिर में फैन है ही नहीं। फैन नहीं देखने के लिए जो हैबचुएटेड हो गया है। नजर के सामने भी फैन थे तो मैंने देखे नहीं थे। अभी यह आवाज इतना कर रहे हैं। मुझे इतना गुस्सा आया। मैंने कहा, अरे यह बेलूर मठ में यहां पर फैन रखने की क्या जरूरत है? हम तो इतने दिन तक इतने सारे साधुओं ने जब से बेलूर मठ का कंस्ट्रक्शन हुआ है मेन टेंपल का। बिना फैन के यहां पर साधु लोग बैठे हैं। अभी आज क्यों यहां पर पेडेस्टल फैन लगा दिए? हम लोग यहां पर जप कर रहे हैं। और यह फैन का आवाज चल रहा है। मुझे पहले दिन तो इतना मैं अपसेट हो गया था। ठीक से मैं जप ही नहीं कर पाया था। किंतु देखिए अब यह तो मेरी बात हुई या तो फिर उन लोगों की बात कि जिन्होंने बिना फैन का यह मेन टेंपल देखा होगा जो कि पहली ही बार आए हैं बेलूर मठ में जो कि पूरा लाइफ फैन में ही रहने को अभ्यस्त है। उन लोगों को यह फैन कोई ऐसा बड़ा कोई यह माने डिस्टरबेंस है बोल कर के समझ में ही नहीं आएगा। फैन की आवाज के साथ में यह लोग पहले से ही अभ्यस्त हो गए हैं। तो यहां पर फैन में बैठकर के जब भी कर लेंगे और कहेंगे अच्छा ही है। थोड़ा सा हवा आ रही है तो शांति से बैठ के जप करेंगे। तो एक्चुअली क्या है? देखिए कि मैंने फिर किसी को पूछा था किसी सीनियर साधु को। मैंने कहा कि महाराज अपने बेलूर मठ में मेन टेंपल में फैन क्यों लगा दिए हैं? अभी तक तो हम लोग एकदम शांति से हम लोग जप करते थे। अभी यह फैन का इतना आवाज आ रहा है। मैं डिस्टर्ब हो जा रहा हूं। तो उन्होंने मुझे बताया कि देखो भाई तुम ये ट्रेनिंग सेंटर में आज फैन है। हम लोग इस तरह के ट्रेनिंग सेंटर में रहे हैं। वहां पर फैन ही नहीं थे। तुम क्या रह पाओगे? मैंने कहा यह पता नहीं। माने मंदिर में बिना फैन के बैठना जप करना वो एक बात है। अपने कमरे में क्लासरूम में बिना फैन के बैठना आई डोंट नो कि यह हो पाएगा कि नहीं। तो देखो उन्होंने कहा कि हम लोग ने जो तपस्या की थी तुम नहीं कर पाओगे। तुमने जो तपस्या की थी वह पहले जॉइ करने के लिए आए थे। बिना फैन के मेन टेंपल में बैठते थे। वह आज के लोग नहीं कर पाएंगे। यानी कि क्या है कि यह तपस्या का स्टैंडर्ड धीरे से धीरे करके वो थोड़ा सा तो डाउन होता ही जाएगा। ये शारीरिक तपस्या शारीरिक कष्ट यह कोई रामकृष्ण संघ का ऐसा कोई यह बहुत इसके ऊपर में जोर नहीं दिया जाता। ठाकुर ने खुद ने शारीरिक कष्ट प्रचंड किया है। मां के यह जो प्रथम प्रथम जो दिन थे प्रथम क्या बाद में भी जय राम बाटी में देखिए ना दक्षिणेश्वर आती थी तो मां बीमार हो जाती थी गंगा की हवा सहन नहीं होती थी सब समय वो डायरिया वगैरह हो जाता था और जय राम भाटी जाएगी तो खाने का खाने के लिए कुछ नहीं है मां के घर में वो उनकी मां श्यामा सुंदरी देवी दूसरों के घर में काम करके वह जीवन निर्वाह कर रही है अपने खुद के बच्चों को अपने रिलेटिव्स के वहां पर रखना पड़ा था विद्याभ्यास करवाने के लिए कौन कौन मां अपने खुद के बच्चों को दूसरों के घर देकर आएगी? किंतु परिस्थिति ऐसी थी तो मां ने ठाकुर ने स्वामी जी ने वराह नगर के दिनों की तो बात हमको पता है। डायरेक्ट डिसाइपल ने जो प्रचंड तपस्या की थी। किंतु आज हम देखेंगे चाहे साधु हो ना कि भक्त हमारे जीवन में ऐसा कोई शारीरिक कष्ट तितक्षा या तो तपस्या ऐसा बहुत ही मिनिमम है। हम लोगों के जीवन में यदि ततीक्षा जैसा कुछ है तो बस वही है कि सुबह को अर्ली मॉर्निंग मंगल आरती के लिए उठना है तो रात आप जितने भी बजे सो गए होंगे तो आपको 4:30 बजे यहां पर 5:00 बजे का टाइम है सूर्योदय के अनुसार टाइम वेरीरी होता है बंगाल में बंगाल के जो सेंटर है तो सनराइज अर्ली हो जाता है तो 4:00 बजे मंगल आरती होती है और फिर जैसे-जैसे आप वेस्ट की ओर जाएंगे तो आपका सनराइज का टाइम देरी होता जाएगा तो बाकी इंडिया में बाकी सब इस साइड में देखेंगे वेस्टर्न साइड में तो 5:00 बजे का मंगल आरती का टाइम है। तो उसके अनुसार आपको एटलीस्ट 4:30 को उठना ही होगा। यदि 5:00 बजे आपको टाइम पे जाना है मंदिर में तो यह एक ततीक्षा हो गई। दूसरा है कि आपको आश्रम में रहना है। आश्रम का रूटीन फॉलो करना है। आश्रम का जो सिंपल खाना है वह खाना है। तो यह एक तपस्या हो गई। और ऑफ कोर्स कि यह ब्रह्मचर्य वगैरह जो है उसका पालन करना है। सत्य वचन का पालन करना है। एक इंटीग्रिटी ऑनेस्टी होनी चाहिए अपने जीवन में। जो काम दिया गया है, जो ड्यूटी दी गई है उसको सिंसियरली करना है। तो यह तो कोई बहुत आपको शारीरिक कष्ट नहीं करना पड़ता है। मेंटल डिसिप्लिन अवश्य चाहिए। किंतु यह जो फिजिकल जो स्ट्रगल थी पहले के जीवन में हमारे साधुओं के जीवन में वह आज आपको नहीं मिलेगी। तो फिर क्या है यह और कष्ट क्यों करते थे यह लोग? ऐसा नहीं था कि शारीरिक कष्ट करने का उनको शौक हो गया था। बोलकर के यह लोग करते थे। यह चर्चिल फर्चिल उस समय के थे जो भारत पे राज करते थे। उन लोगों का तो यही एक मानना था कि योगा यह योगी यह जो तपस्या यह लोग क्यों कर रहे हैं? क्योंकि इनके पास में खाने को नहीं है। खाने को क्यों नहीं है? क्योंकि यह लोग मानसिक कमजोर है। तो यह मेंटल वीकनेस की वजह से हम लोग कर्म नहीं कर पाते हैं। कर्म नहीं करने से हम लोग गरीब हैं। और गरीब है बोलकर के यह जो योगा वगैरह जो जो एक अदर वर्ल्डली फिलॉसोफीस है वो हमने डेवलप कर दी है। वो उनका मानना था। किंतु हमको पता है कि ऐसा नहीं है कि हम मेंटली फिजिकली वीक थे बोल के इस तरह से एक तरह की फैटिसिज्म जिसको इंग्लिश में कहते हैं इस तरह की फिलॉसोफी में प्रैक्टिस में हम चले गए थे। शारीरिक कष्ट इसलिए करना है जिससे कि हमारे संस्कार का शुद्धिकरण हो। किंतु आजकल के युग में इस तरह का शुद्धिकरण मुश्किल है। फिजिकल कष्ट करने की हमारी क्षमता बड़ी मिनिमम हो गई है। तो इसलिए यह जो एक्स्ट्रा वैल्यू एडेड टेक्स्ट टेक्स्ट जिसको कहते हैं ना वीएडी तो ऐसे ही यह सब एक्स्ट्रा तपस्याएं हैं साधुओं की डांट जो कि डांट सुनकर के यदि हम रिएक्ट नहीं करते हैं। सिर्फ डांट सुनना यह इनफ नहीं है। डांट सुनने के बाद में यदि हम रिएक्ट नहीं करते हैं, इसको उसके प्रॉपर स्पिरिट में लेते हैं, तो समझिएगा कि यह हमारी आज की तितक्षा है। इस तरह से अपने अहंकार को हम निर्मूल करते हैं। निर्विशेष करते हैं। देखिए मैंने कोई-कोई डिवोटी से इस तरह की कंप्लेंट सुनी है कि रामकृष्ण मिशन के आश्रम में कभी-कभी आते हैं तो कोई-कोई डिवोटी क्या होते हैं कि उनके मन में एक तरह का अभिमान हो जाता है कि हमाराेंस यहां पर ज्यादा है या तो फिर यहां के साधु जो है मुझे ज्यादा प्रेफर करते हैं दूसरों की वजह। मेरा मैं यहां पर ज्यादा काम करता हूं बोल के मेरा अधिकार यहां पर ज्यादा है। और फिर इस तरह के डिवोटी क्या करेंगे कि दूसरे डिवोटियों को उसके ऊपर में एक तरह का एक डोमिनेशन एस्टैब्लिश करना चाहेंगे। उन उनको डांटेंगे। उनको कुछ ना कुछ कहते रहेंगे। तुम ऐसा करो ऐसा मत करो। या तो फिर उनके पीछे में लगेंगे। उनके बारे में कुछ ना कुछ अफवाहएं फैलाएंगे। ये यह सब हमने सुना है मैंने किसी किसी से। तो देखिए कि कोई मुझे ऐसा कहता है कि इस सब की वजह से हम लोग आश्रम में आते ही नहीं है। तो मेरा कहना है कि देखो इस तरह से डर करके भाग जाना यह तो कोई जीवन नहीं हुआ। आप आइए आश्रम में भले ही चाहे आपको किसी भी तरह की नेगेटिव सिचुएशन का सामना करना पड़े डज नॉट मैटर। इसको आप तपस्या के रूप में लीजिए और तो कोई तपस्या आप नहीं कर रहे हैं। वही वह ध्रुव की तरह एक पैर पर खड़े रह के 1000 साल की जितना भी उसने किया था वो तप या तो ध्यान इस तरह से तो हम लोग नहीं करने वाले हैं। यह जैन साधुओं की तरह यह जो उपवास की परंपरा ये शारीरिक कष्ट वह सब तो हम लोग नहीं करने वाले हैं। यह वराह नगर के वराह नगर मठ के जो दिन थे, गुरु भाइयों ने जो तपस्या की थी, उसका 1% भी हमारे जीवन में कभी आने वाला नहीं है। तो क्या है कि शारीरिक कष्ट करने की हमारी क्षमता आज बिल्कुल मिनिमम हो गई है। बिल्कुल नहीं हो गई है। थोड़ा सा भी आज खाने में देरी होती है तो फिर यह डायबिटीज जिनको होता है या तो फिर हाई ब्लड प्रेशर जिसको होता है या तो फिर जो लोग इस तरह से मेडिसिन लेते हैं वे लोग सहन ही नहीं कर पाएंगे। तो क्या है कि अभी यह शारीरिक कष्ट नहीं करके मानसिक कष्ट उठाइए। कोई भी तपस्या हो उसके पीछे का आशय तो आखिर में वही है कि हमारे मन में दो गुण जो है उसका उदय हो। एक तो है वैराग्य दूसरा है शरणागति। त्याग और भक्ति ज्ञान और भक्ति। यह दो गुणों का हमारे मन में उदय हो। यही किसी भी तरह के तप की यह जो उद्देश्य है किसी भी तरह के तप का अंतिम आशय ही है। तो फिर हम यदि शारीरिक कष्ट नहीं कर सकते हैं तो आओ चलो हम मानसिक कष्ट उठाते हैं। भले ही चाहे कोई मेरा इंसल्ट करें। भले ही चाहे कोई मेरे पीछे में मेरे बारे में बातें करें। भले ही चाहे मेरे बारे में झूठ-मूठ की अफवाहएं मेरे पीछे में कोई फैलाए। इट डज नॉट मैटर। मैं रामकृष्ण मिशन में आऊंगा। ठाकुर के पास में मंदिर में जाकर के बैठूंगा। यदि कोई एक्टिविटी में पार्टिसिपेट नहीं करना है तो डज नॉट मैटर। किंतु एटलीस्ट ठाकुर के साथ में मेरा संबंध मैं कभी नहीं तोडूंगा। भले ही चाहे जो कुछ भी हो जाए। इस तरह के डर के मारे रिट्रीट कर देना तो फिर हमारे जीवन में और कोई तपस्या रहेगी ही नहीं। यदि आप अपने घर में बैठकर के फिर और कोई तपस्या करते हैं तो ओके चलो इसका सब्स्टट्यूट यह है चलो ट्रेडिशनल तपस्या करते हैं तो ट्रेडिशनल तपस्या नहीं हो रही है बोलकर के इस तरह की आधुनिक तपस्याएं

सहज संस्कार-शुद्धि: ठाकुर और स्वामीजी की डांट की महिमा

तो यहां पे भी हमने देखा कि ठाकुर ने जब मास्टर महाशय को डांटा और अच्छे से डांटा कि लज्जा नहीं होती है क्या कि बच्चे हो गए हैं उसके बाद में भी स्त्री संघ जिस पंच महाभूत के देह में जितनी भी विकृतियां है उसको लेकर के भी इस देह के प्रति आकर्षण क्या बिल्कुल लज्जा नहीं होती है क्यों इस शरीर को लेकर के रहना पशुओं की तरह व्यवहार करना जो मन भगवान की चिंतन करने में जो जो मन दिया गया है उस मन को लेकर के विषयों के आनंद में रमना यह सब किस तरह का व्यवहार है बोलकर के ठाकुर डांट लगा रहे हैं और हमने क्या देखा मणि चुपचाप नतमस्तक होकर के सब कुछ सुन रहे हैं। तो अभी देखिए कि ठाकुर की स्वयं डांट सुनने से उनके संस्कार कितने शुद्ध हो गए होंगे। स्वामी जी की डांट के बारे में तो हमने सुना ही है। इस तरह से डांटते थे कि कच्चा पोछा होगा तो उसका हार्ट फेल ही हो जाएगा। स्वामी जी की डांट सहन करने वाले वही राजा महाराज ही थे बेलूर मठ में और किसी का साहस नहीं था और स्वामी जी को पता भी था बोलकर के स्वामी जी ऐसे किसी को डांटते भी नहीं थे। वो जो फेमस घटना हमने एक बार डिस्कस की थी कि स्वामी बेलूर मठ में दुर्गा पूजा का आयोजन हो रहा है। मां शारदा स्वयं आई है। तो स्वामी जी ने जाकर के मां से प्रार्थना की कि मां मुझे बुखार करवा दो। तो मां आश्चर्यचकित होकर बोलती है बेटा यह तुम किस तरह का आशीर्वाद मांग रहे हो मेरे से लोग मुक्ति भक्ति क्या-क्या सब मांगते हैं? तुम बोल रहे हो कि मुझे बुखार चाहिए। तो स्वामी जी कहते हैं कि मां देखो यह बच्चे बेचारे दिन भर परिश्रम कर रहे हैं। इतना मेहनत करके दुर्गा पूजा सफल करने के लिए कष्ट कर रहे हैं। किंतु मेरे में तो अभी धीरज नहीं बचा है। तो शारीरिक अभी ये जो बीमारी की वजह से और फिर यह इतना बड़ा मिशन है। अभी एम इतना हाई है और अपना अचीवमेंट उसके अनुसार दिख नहीं रहा है। एटलीस्ट उस समय तो फिर मेरा मैं बहुत ही इंपेशेंट हो जाता हूं। हो सकता है कि बात बातबात में इनको डांट दूं। हो सकता है कि मारपीट भी कर बैठूं। अभी क्या है कि मैं कुछ करूंगा, मारूंगा भी, डांटूंगा भी तो यह लोग तो बेचारे चुपचाप सहन कर लेंगे। किंतु फिर बाद में मुझे ही कष्ट होगा। बोल कर के मुझे बुखार दे दो। मैं चुपचाप बुखार लेकर पड़ा रहूंगा। यह बच्चे लोग अपना काम करेंगे। जब पूजा समाप्त हो जाए फिर मैं बुखार छोड़कर उठूंगा। तो अभी मां ने क्या सही में आशीर्वाद दिया इस तरह का यह तो पता नहीं। मां स्वयं यह बात कहती है तो मां ने कहा नहीं कि मैंने क्या आशीर्वाद दिया नरेंद्र को किंतु सही में स्वामी जी को बुखार हो गया और फिर जैसे ही दुर्गा पूजा समाप्त हुई मां स्वामी जी को मिलने के लिए गई देखा स्वामी जी लेटे हुए हैं मां ने कहा कि बेटा अभी तो दुर्गा पूजा समाप्त हो गई अभी तुम खड़े हो जाओ तुम ही तो कहते थे कि पूजा के बाद में बुखार भाग जाएगा भगा दूंगा मैं करके तो जैसे ही मां ने ऐसा कहा स्वामी जी फटाक करके बैठ गए और कहा कि हां मां देखिए यह बुखार चला गया तो क्या है कि यह जो है कि स्पिरिचुअल लाइफ में एक तपस्या रूपी एक तितक्षा के रूप में इस तरह की डांट को हमको लेना है और सिर्फ यह डांट

साथ में रहने की, एक दूसरे को सहन करने की तपस्या

ही नहीं जैसे मैंने कहा रामकृष्ण संघ के साथ में जुड़कर के आपको बहुत कई तरह के नेगेटिव अनुभव होंगे। दूसरे भक्तों का अभिमान आपको दिखेगा। कभी-कभी साधुओं के भीतर में भी आपको अभिमान या तो इस तरह के कुछ दुर्गुण दिखेंगे। किंतु यदि हम उस सब चीजों को लेकर रहेंगे। मैंने कुछ-कुछ भक्तों को देखा है। साधुओं की निंदा करेंगे। आपस में मिलकर के यह साधु की यह दुर्गुण है। उस साधु के यह दुर्गुण है। अरे भाई जिस आदमी ने अपना पूरा जीवन ठाकुर को समर्पित कर दिया है तो वह जाने और ठाकुर जाने। आप लोग कौन होते हैं साधु की निंदा करने वाले? यह साधु की निंदा करना इससे बड़ा पाप और दूसरा कोई नहीं है। रामकृष्ण संघ के साथ में आप जुड़ते हैं तो यहां की जो कोई भी नेगेटिविटी है यदि आपको कष्ट देती है तो उसको ठाकुर का आशीर्वाद मानकर के स्वीकार कीजिए। कहिए कि यह जो मेरे सामने आ रहा है जिसकी वजह से मुझे मानसिक कष्ट मिल रहा है। तो भले ही चाहे मुझे मिले इससे मेरा अहंकार ही कम होगा। इससे मेरा अभिमान ही कट जाएगा। मेरे भीतर में ठाकुर के प्रति शुद्ध शरणागति ही प्रकट होगी। ऐसा बोल के धीरे से आपको बाकी सब चीजों में यदि इनवॉल्व होना है तो होइए ना होना है तो ना होइए। किंतु ठाकुर के साथ में अपना रिलेशन है उसको कभी तोड़िए मत। ठाकुर के मंदिर में आकर के जो नियमित जो कार्यक्रम होते हैं आरती उत्सव प्रवचन उसमें अवश्य पार्टिसिपेट करते रहिए। तो यह एक वो ठाकुर की डांट जो है उसके बारे में इसके बाद में हमने देखा कि किस तरह से ठाकुर काली मंदिर में जाते हैं। वहां पे वो भवदारा भय हरा नाम सुने छ तोमार यह भजन गाते हैं। इसके बाद में देखिए कि ठाकुर फिर काली घर से वापस आते हैं अपने कमरे में। सुबह के 10:00 बजे हुए हैं। 8:00 बजे से लेकर के मास्टर महाशय ने जो विवरण प्रारंभ किया है, अभी तक 10:00 बजे हुए हैं। दो घंटों का विवरण हमने ऑलरेडी पढ़ा। अभी आगे मास्टर महाशय क्या लिखते हैं? ठाकुर काली घर होते फिर आशिया तार घरे दक्षिण पूर्व बारंदाय बोशिया छैन। ठाकुर काली घर से वापस आकर के उनके घर के दक्षिण पूर्व वरांडा जो है वहां पर बैठे हुए हैं। बेला दोष्टा होबे सुबह के 10:00 बजे हैं। एकनो ठाकुर भोग भोग आरती हो ना। अभी तक ठाकुर का अर्थात कि मां काली का और अन्यान्य देवी देवताओं का भोग नहीं उनको ऑफर किया गया है ना ही भोग की आरती हुई है ना ही भोग आरती हुई है मां काली और राधाकांत प्रसादी माखन और फल मूल हते किछु लैया ठाकुर जल जोग करिया छे मां काली और राधाकांत का जो सुबह का बाल भोग होता है उसमें से माखन और यह फल इसमें से कुछ कुछ ठाकुर ने लेकर के जल जोग किया है अर्थात कि आहार किया है और राखाल वगैरह भक्त लोग भी इसमें से कुछ-कुछ प्राप्त किए हैं। देखिए ये एक दूसरी बात है। यहां पे जो मास्टर महाशय लिखते हैं राखाल वगैरह कुछ-कुछ भक्त कई कई जगह पर हमको इस तरह का विवरण दिखता है कि ठाकुर कहते हैं भक्तों को विश्राम करने के लिए। ठाकुर कहते हैं भक्तों को आहार करने के लिए। तो यदि नरेंद्र उपस्थित होता है तो जैसे कि ठाकुर का पूरा अटेंशन नरेंद्र की ओर है। जैसे कि ठाकुर नरेंद्र के साथ में ही बात कर रहे हैं। उनको नरेंद्र को देखकर के ही उनके चेहरे पर एक चमक आ जाती है। बात करने का एकदम बातों में उत्साह आ जाता है। ठाकुर इतने हर्षोत्फुल्ल हो जाते हैं और नरेंद्र है और ठाकुर है। बाकी सब थोड़े से साइड में हो जाते हैं। तो यह देखकर के भी किसी किसी के मन में ईर्ष्या होती थी। यहां तक कि यह शरद महाराज ने स्वामी शारदानंद जी ने तो लीला प्रसंग में लिख ही दिया है कि नरेंद्र को इतनाेंस देते हैं बोलकर के कि दूसरों के मन में शायद थोड़ी ईर्ष्या होती थी। कथामृत में वर्णन है कि यह किसी ने ठाकुर को कहा कि वह जैसे कि नरन ही आपके लिए सब कुछ है। आमराजो बेशची अर्थात कि यह पानी में यह जो सब चीजें तरती रहती है और इधर-उधर जाती है बिना पर्पस के वैसे ही हम लोग यहां पर तैर करके आ गए हैं पपसलेसली विदाउट पर्पस। तो ठाकुर हंस के कहते हैं कि देखो यह तुम्हारे ही बारे में बात कर रहा है। नरेंद्र को कहते हैं। तो क्या है कि यह जो एक ईर्ष्या होना तो इस तरह की ईर्ष्या होने से कि ठाकुर सिर्फ नरेंद्र को ही प्रेम करते हैं। इतना मुझे क्यों नहीं करते? इस तरह की ईर्ष्या होना भी और इस ईर्ष्या से युद्ध करके कैसे भी करके ठाकुर के प्रति अपना एक आकर्षण ठाकुर के प्रति श्रद्धा भक्ति यह बना रहे। इस यह भी एक ततीक्षा है। क्योंकि अगेन ठाकुर भले ही चाहे बच्चों को यह कहते थे कि तुमको रात को इतनी ही रोटी खानी है। ज्यादा रोटी खाओगे तो फिर रात भर बैठकर के तपस्या कौन करेगा? जप कौन करेगा? तो फिर ठाकुर की बात को काटने के लिए तो मां थी ही थी। मां के पास जाएंगे तो मां पेट भर के रोटी खिलाती थी। तो वहां पर तो तपस्या करने का ऐसा कोई चांस नहीं था। मौका नहीं था। इस तरह की ततीक्षा करने का, शारीरिक कष्ट करने का। किंतु यह जो एक मानसिक एक खड़ा होता है हमारी नजर के सामने। सो उसको सहन करना। ईर्ष्या है, द्वेष है, क्रोध है, अहंकार है, मान है। आप 10 लोगों के साथ में रहेंगे तो 10 तरह की आपके सामने समस्याएं खड़ी होंगी ही होंगी। एक इंटरेस्टिंग कहानी कि मैं उस समय बेलूर मठ में ज्वाइन करने के लिए ही गया था। बिल्कुल मेरा आई थिंक के पहला ही महीना था। उस समय बेलूर मठ का हेड क्वार्टर जो है वहां पे जनरल सेक्रेटरी महाराज और असिस्टेंट सेक्रेटरी महाराज और जो भी साधुओं का वहां पे पोस्टिंग था सबका रात को एक नाइट क्लास होता है तो उस समय रिवर्ड स्मरणानंद जी महाराज थे जनरल सेक्रेटरी तो महाराज जी बैठेंगे ऐसा एक चेयर के ऊपर में और सामने में मिशन ऑफिस यदि आपने देखा होगा तो उसके फर्स्ट फ्लोर का जो लॉबी है वहां पे ये नाइट क्लास होता था तो उनके सामने में सब बाकी सब असिस्टेंट सेक्रेटरी महाराज है। फिर सीनियर साधु है। वह सब एक साइड में बैठेंगे कारपेट के ऊपर में जमीन पे और दूसरी साइड पर कारपेट पे बैठेंगे हम लोग नए जॉइ करने के लिए जो ब्रह्मचारी गए हैं वे लोग। तो अभी क्या है कि डिस्कशन बहुत कुछ बेंगली में होता था तो वह तो मुझे समझ में नहीं आता था। उस समय बेंग इतना इंग्लिश में जो कुछ डिस्कशन होता था तो वह मैं समझ जाता था। और जीएस महाराज भी शायद ऐसा कॉन्शियसली प्रयास करते होंगे। वैसे तो स्मरणानंद जी को बेंगली आता ही था। वहां पर आप बेलूर मठ में रहेंगे कुछ समय तो आप कोई भी आपका मदर टंग हो कोई भी आप बैकग्राउंड से आते हो बेंगली तो सब लोग सीख जाते हैं। तो बट आई थिंक कि कॉन्शियसली शायद महाराज ऐसा ट्राई करते थे कि इंग्लिश में थोड़ा सा डिस्कशन हो। तो हम लोग जैसे मेरे जैसे जो नए लड़के आए हैं उनको भी कुछ सीखने का मौका मिले। तो एक बार इस तरह से इंग्लिश में डिस्कशन हो रहा था शिवमयानंद जी महाराज उस समय असिस्टेंट सेक्रेटरी थे तो महाराज के सामने ही वह बैठते थे तो वह एक बार बता रहे थे कि शिवमयानंद जी का इस तरह से भ्रमण करने का अच्छा एक शौक था और तीर्थ यात्रा करने का फिर जहां पर यह साधना तपस्या होती है मठ होते हैं मोनेस्टरीज होती है उसकी मुलाकात लेने का वहां के लोगों के साथ में वार्तालाप करने का टू कंपेयर द नोट्स। ऐसा कहते हैं ना कि हम लिए रामकृष्ण मिशन में इस तरह की साधना होती है। आपके यहां पे क्या होता है? तो ऐसा उनको एक अच्छा एक हैबिट था। तो एक बार बता रहे थे कि उन्होंने क्रिश्चियन सेमिनरी सेमिनरी अर्थात कि जैसा हमारा ट्रेनिंग सेंटर है वहां पर ट्रेनिंग सेंटर कम मोनेस्ट्री ऐसा एक था। तो वहां पर गए और वहां पे जो एबोट था एबोट अर्थात कि महंत तो उनके साथ में वार्तालाप कर रहा है। तो शिवमयानंद जी पूछते हैं कि व्हाट पीनंस डू यू परफॉर्म? आप आप लोग कौन सी तपस्या कर रहे हैं? तो एबोट ने एक ही दो ही शब्दों में उत्तर दिया कम्युनिटी लाइफ। अर्थात कि क्या तपस्या कर रहे हो? तो साथ में रहने की। तो देखिए कि यह साथ में रहने की 10 लोग यदि साथ में मिलकर के रहेंगे काम करेंगे तो ईगो क्लेश होना ही होना है। उस समय अपने को भीतर में से जो रिएक्शन आता है उसको कंट्रोल करके कैसे भी तरह से हम शरणागति को मेंटेन कर पाए। ठाकुर के प्रति अपने अपनी जो श्रद्धा है उसको हम लोग मेंटेन कर पाए तो देखेंगे कि वो मानसिक तपस्या है। हमको आध्यात्मिक जीवन में कितना ही दूर लेकर के जाएगी। तो यहां पर भी यह जो मास्टर महाशय लिखते हैं राखाल प्रभुति भक्तरा किछु किछु पया छ तो यहां पर राखाल था राजा महाराज थे बोलकर के ठाकुर का प्रेम ऐसा जैसे कि विजिबली दिखता है कि उसके प्रति इतना प्रेम है। यदि नरेंद्र होता तो नरेंद्र के प्रति ठाकुर का इतना प्रेम दिखता। किंतु देखिए कि मास्टर महाशय टू हिज क्रेडिट ऐसा कभी भी लिखते नहीं है और ना ही मुझे लगता है कि उनमें उनके मन में ऐसा कुछ आया होगा कि यह जो त्यागी संतान है उनके प्रति जो ठाकुर का एक प्रेम भाव है एक स्नेह भाव है इतना मेरे और क्यों नहीं है ठाकुर सबको इक्वली प्रेम करते थे उसमें कोई प्रश्न ही नहीं है किंतु जैसे होता है ना कि शक्ति का प्राधान्य ठाकुर ने खुद ने कहा विद्यासागर को विद्यासागर कहता है कि महा महाशय क्या ईश्वर ने किसी को ज्यादा शक्ति कम शक्ति दी है? तो ठाकुर कहते हैं कि विद्यासागर की वो एक बात सुनकर के उसकी कहां तक दौड़ है अकल की वो समझ में आ गई। ठाकुर कहते हैं कि तुम्हारे पास में शक्ति नहीं होती तो हम लोग तुमको देखने के लिए क्यों आते? क्या तुम्हारे दो सिंह निकल आए हैं क्या? देखिए कि शक्ति का तारतम्य होता ही है। इसके अनुसार ठाकुर जिनके भीतर में आध्यात्मिक शक्ति ज्यादा थी उनको अवश्य थोड़ा सा अटेंशन ज्यादा देते हैं। हालांकि बेलूर मठ वराह नगर मठ में एक बार ये गुरु भाइयों में इस तरह से झगड़ा लगा कि ठाकुर किसको सबसे ज्यादा प्रेम करते हैं। अभी सभी लोग ठाकुर के पास में आते हैं। ठाकुर का नरेंद्र के जो प्रेफरेंस है, राजा महाराज की ओर जो प्रेफरेंस है, वह सबको दिखता है। इसके बावजूद इस तरह का झगड़ा होता है। क्यों? क्योंकि ठाकुर के खुद के मन में ऐसा नहीं है कि यह छोटा है या बड़ा है। बस वही है कि शक्ति के तारतम्य के अनुसार हमको बाहर से ऐसा दिखता है कि हां उसको जो अटेंशन देना चाहिए उसको अब जैसे स्वामी जी कहते हैं ना कि ब्राह्मण के लड़के के लिए यदि एक टीचर की आवश्यकता है तो परिया के लड़के के लिए 10 टीचर की आवश्यकता है। अभी ऐसा नहीं है कि ब्राह्मण के लड़के की वैल्यू परिरिया के लड़के से कम है या ज्यादा है। बस वही बात है कि उसको जो बैकग्राउंड है, उसकी जो सिचुएशन है, उसके अनुसार उसको वो रिसोर्सेज एलोकेट करने चाहिए। तो उसी बात को रिवर्स करके जिसमें शक्ति ज्यादा है, हो सकता है ठाकुर उसके लिए उसकी साधना करने में सुविधा हो बोल के उसको थोड़ा सा ज्यादा अटेंशन देते होंगे। किंतु यह सब सरफेस लेवल पर है। तो मास्टर महाशय को यह सब समझ में एकदम क्लियर आता था। बोलकर के उन्होंने ऐसा लिखा है कि राखाल वगैरह भक्तों ने भी थोड़ा-थोड़ा प्रसाद पाया। ऐसा अपना नाम तो कभी लिखते ही नहीं है। राखाल और मैं ऐसा तो लिखते ही नहीं है। मैं और राखाल ऐसा तो कभी आपको सुनने में आएगा ही नहीं। तो देखिए कि यह सब तपस्याएं हमको जो कि ऊपर ऊपर से लगता है कि सुपरफिशियल लगता है या तो फिर ऊपर ऊपर से लगता है कि अरे यहां पे आने से हमको इस तरह की नेगेटिविटी ही दिखती है तो ऑलवेज कन्वर्ट दिस नेगेटिविटी इनू तपस्या

क्या कर्मयोग पर श्रीरामकृष्ण का मंतव्य अस्पष्ट था?

ठाकुर काछे बोशिया राखाल स्माइल सेल्फ हेल्प पड़ते छे लॉर्ड आर स्काइनेर विषय ठाकुर के पास में बैठकर ओके राखाल एक किताब पढ़ रहा है। उसका नाम है स्माइल्स सेल्फ हेल्प। सेल्फ हेल्प अर्थात कि अपने को खुद को हेल्प करना। स्माइल एक आदमी का नाम है। उसमें लॉर्ड आर स्काइन एक ब्रिटिश है। ब्रिटिशर उसके बारे में लिखा है। श्री रामकृष्ण मास्टर प्रति ओते की बोल छे ठाकुर मास्टर के ओर देख करके कह रहे हैं कि इसमें क्या लिखा है? देखिए इसमें भी एक छोटा सा ही है एक सेंटेंस इसके भीतर में देखिए कि डायनेमिक्स कितना सारा है। पढ़ रहा है राखाल तो लॉजिकली पूछना चाहिए राखाल को किंतु पूछ रहे हैं मास्टर महाशय को। यानी क्या है पता है ठाकुर ने वो जो जल जोग ये फल मूल प्रसादी माखन उसको वो जब आहार कर रहे होंगे यह लोग उस समय शायद राखाल के साथ में ज्यादा एक क्या कहते हैं अटेंशन दिखाया होगा तो यहां पर उसको यह कंपनसेट कर रहे हैं और राखाल का जो है कि बालक भाव है उसके अनुसार उसको उस तरह से ट्रीट करना है कहां पे उसकोेंस देना है मास्टर महाशय का है कि एक इंटेलेक्चुअल पर्सन है तो जहां पर इंटेलेक्ट की बात आती है, किताब की बात आती है, एकेडेमिक सब्जेक्ट है तो ठाकुर राखाल को नहीं पूछ के मास्टर महाशय को पूछ रहे हैं। इवन दो कि किताब पढ़ने वाला है राखाल तो मास्टर महाशय को पूछते हैं। पोते की बोलचे उसमें क्या लिखा है? उसमें क्या कह रहे हैं? मास्टर क्या कहते हैं? साहब फलाकांक्षा ना करे कर्तव्य कर्म करते ए कथा बोलचे निष्काम कर्म साहब अर्थात कि ब्रिटिश लोगों को ये बंगाली लोग साहिब कहते थे अभी आजकल भी कहते हैं पता नहीं क्यों तो एनीवे तो साहिब अर्थात कि यह जो स्माइल जो है जिसका ऑथर वो फल की आकांक्षा न करके कर्तव्य कर्म करने को कह रहे हैं। यह बात उसमें लिखी है। निष्काम कर्म तो ठाकुर क्या कहते हैं तबे तो बेश तो तो बहुत अच्छा है किंतु पूर्ण ज्ञान लक्षण एक खानाओ पुस्तक शंगे थाक बेना जैमोन सुखदेव तारश सब मुखे तो यह तो अच्छी बात है कि निष्काम कर्म के बारे में फल की आकांक्षा न रख के कर्म करने के बारे में कह रहे हैं किंतु पूर्ण ज्ञान का लक्षण है एक भी पुस्तक साथ में रहेगी नहीं जैसे कि सुखदेव सब कुछ उनका मुखस्थ था अर्थात कि जिकवा पे सरस्वती बैठी हुई थी। अभी देखिए इस एक सेंटेंस में है बहुत कुछ। पहली बात तो कि टॉपिक जो है अर्थात कि मास्टर महाशय जो कहते हैं कि उस किताब में क्या लिखा है तो निष्काम कर्म के बारे में किंतु उसके सामने जो ठाकुर का जो रिएक्शन है रिप्लाई तो नहीं रिएक्शन कहेंगे या जो ठाकुर का जो कमेंट है उसमें देखिए कि कर्तव्य कर्म के बारे में ऐसा कुछ नहीं कहा है। निष्काम कर्म के बारे में उन्होंने कुछ कोई ओपिनियन या कोई अपना मतामत जाहिर नहीं किया। सीधा-सीधी एक दूसरी ही टाइप का उन्होंने एक कमेंट किया कि पूर्ण ज्ञान का लक्षण है कि एक भी पुस्तक साथ में नहीं रहेगी जैसे कि सुखदेव। उनकी जिह्वा के ऊपर में ही जैसे कि सरस्वती सवार है। तो अभी प्रश्न होगा कि क्या ठाकुर का निष्काम कर्म के बारे में कोई ओपिनियन नहीं था? क्या ठाकुर का निष्काम कर्म के ऊपर में कोई एक तरह का क्या कहेंगे? रिजर्वेशन था। बोलकर के ठाकुर ने उस पर कुछ नहीं कह के एक दूसरा ही टॉपिक प्रारंभ कर दिया। और खास करके बाद में जो हुआ था स्वामी जी ने जब यह शिव्ञान जीव सेवा रामकृष्ण मिशन की स्थापना की आत्मनो मोक्षार्थम जगत हितायच का जो हमको नारा दिया सूत्र दिया और उसके अनुसार यह अखंडानंद जी फेमिन रिलीफ है वगैरह करने लगे यहां पे ये ऑर्फनेज स्टार्ट किया प्लेग रिलीफ वगैरह स्टार्ट हुआ था तो मास्टर महाशय एक खास करके एक थे कि जिनके मन में एक संदेह रहा था। देखिए हमने जब स्वामी जी का बायोग्राफी है उसका जब हम पाठ कर रहे थे उसमें भी हमने देखा था कि यह रामकृष्ण संघ की क्या भविष्य गतिविधि होगी ठाकुर की महासमाधि के बाद में उसको लेकर के गुरु भाइयों में दो दल बन गए थे। एक गृहस्थ थे दूसरे त्यागी थे। उसमें भी यह मास्टर महाशय जैसे कुछ लोग थे जिनका कि नरेंद्र के प्रति सहानुभूति पूरा था। नरेंद्र के बारे में, राजा महाराज के बारे में, त्यागी संतानों के बारे में, ठाकुर के जो वचन थे वह सब उनको पूरा-पूरा पता था। मां की महिमा के बारे में मास्टर महाशय संपूर्ण रूप से अवगत थे। इसके बावजूद अभी राम रामबाबू जैसे भक्तों की बात अलग है कि ठाकुर गुरु थे। उनके बाद में मैं ही एक गुरु हूं बोलकर के उनके मन में हो गया था। तो मास्टर महाशय का तो ऐसा नहीं है। अपने को गुरु की पदवी पर कभी बिठाया नहीं है। तो मास्टर महाशय इतने अपनी भावधारा से इतना क्लोजली कनेक्टेड होने के बावजूद जब यह शिव ज्ञान जीवन सेवा का भाव एक संघ होकर के एक कॉर्पोरेट बॉडी बनाकर के कार्य करना सिस्टमैटिक ऑर्डर बनाना इसके बारे में मास्टर महाशय का भी रिजर्वेशन था। उनका स्पष्ट मानना था कि ठाकुर ने जैसे कहा है काली मंदिर में जाते हैं तो बाहर में जो भिखारी बैठे हैं उनको हम भिक्षा देंगे पहले ना कि कैसे भी करके धक्कामुक्की करके पहले तो मंदिर में प्रवेश करके मां काली का दर्शन कर ले उसके बाद में बाहर आकर के जितने भी भिक्षा वगैरह देनी है उनको आपको दक्षिणा देनी है पैसा देना है बांटते रहिए पहले मां काली का दर्शन बाकी सब यह भिखारियों को दान दक्षिणा देने की बात तो यह सब मास्टर महाशय के माइंड में बड़ा ही क्लियर बैठा हुआ था। तो इसके बारे में ठाकुर के ऐसे जो सूक्ष्म सूक्ष्म ये जो सब है ना उनके जेस्चर्स या उनकी कमेंट्स मास्टर महाशय बड़ा ही डीपली इसको ग्रहण किए हैं। जैसे कि ठाकुर के कथामृत का सबसे ज्यादा पान किसने किया होगा त्यागी संतानों को छोड़कर के। तो वो है मास्टर महाशय। तो इतना जो सूक्ष्म एक उनको दिखाई दिया कि कहां निष्काम कर्म के बारे में ठाकुर को कोई ओपिनियन देना चाहिए कोई कमेंट देनी चाहिए वो नहीं देकर के उन्होंने दूसरा ही टाइप का कमेंट दे दिया कि आज जो पूर्ण ज्ञान का लक्षण है वहां पर किताबों का कोई आवश्यकता नहीं है। सब कुछ तो पूर्ण ज्ञानी की जहवा पे ही उपस्थित है। फिर किताब पढ़कर के आपको यह निष्काम कर्म क्या है? वह सब जानने की क्या आवश्यकता है? तो देखिए कि मास्टर महाशय ने शायद यह लक्ष्य किया होगा। यह शायद उन्होंने नोट किया होगा। बोलकर के ही बाद बात बादबाद में निष्काम कर्म के प्रति उनका थोड़ा सा जो रिजर्वेशन था वो रहा होगा। और हमको यह भी पता है जग प्रसिद्ध घटना कि किस तरह से मास्टर महाशय का यह रिजर्वेशन टूट गया था। किस तरह से मास्टर महाशय ने शिव्ञानी जीव सेवा को संपूर्ण रूप से अपना लिया था। वही काशी की घटना मां भी वहां पर है राजा महाराज भी है मास्टर महाशय भी वहां पर है स्वामी जी की महासमाधि के बहुत बाद की बात है तो वहां पर मां एक बार सेवा आश्रम देखने के लिए आई देखा कि रोगियों की इतनी सुंदर सेवा हो रही है मां ने पूछा कि यह जो प्लान है यह जो आईडिया है किसके मन में पहली बार आया था तो फिर उनको बताया गया कि वैसे तो आईडिया सब स्वामी जी के हैं। किंतु यह चारू बाबू वगैरह जो यंग लड़के थे उन्होंने मिलकर के फिर यह सेवाश्रम का गठन किया था वगैरह-वगैरह बाद में फिर संघ ने अपने ऑर्डर ने उसको ले लिया फिर सिस्टमेटाइज किया वगैरह तो मां बड़ी खुश होकर के वहां पर गई वहां से गई वो किरण दत्त महाशय के घर में जो आप काशी गए होंगे तो आपने देखा ही होगा कि अपने वो सेवा आश्रम के सामने में ही वह है उनका घर तो फिर लक्ष्मी निवास तो वहां से फिर मां ने किसी भक्त को भेज के उसके हाथ से ₹10 का नोट भेजा कि यह लीजिए सेवाश्रम के लिए मेरी भी ओर से दक्षिणा दान। तो अब राजा महाराज को यह पता चला तो उन्होंने कहा कि बुलाइए मास्टर महाशय को बात करते हैं उनके साथ में। मास्टर महाशय आए। राजा महाराज ने कहा देखिए मां ने यह ₹10 का दान दिया है और मां ने कहा है कि बहुत अच्छा कार्य चल रहा है। तो उस समय मास्टर महाशय कहते हैं कि ए बार ना मान जो नहीं माने इस बार इस बात को स्वीकार नहीं करने का अभी कोई उपाय नहीं है। तो देखिए कि यह रिजर्वेशन वगैरह जो है ठाकुर को बहुत अच्छे से मास्टर महाशय समझे थे। इसीलिए देखिए कि एक और तो अपना एक बिलीफ होता है कि ऐसा ऐसा होना चाहिए। यह मेरा पर्सनल ओपिनियन है। तो ऐसा पर्सनल ओपिनियन रखने वाले लोगों की संख्या अपने संघ में उस समय भी कम नहीं थी। आज भी नहीं है। किंतु यह पर्सनल ओपिनियन किसी काम का नहीं है। जब तक आप ठाकुर मां स्वामी जी को डीपली स्टडी ना करते हैं। फैक्ट के ऊपर में मेरे ओपिनियन बने हैं। फैक्ट के ऊपर में मेरा यह ऑब्जरवेशन बना है। फैक्ट्स को आप कैसे नजरअंदाज कर देंगे? जैसे हमने कल भी डिस्कस किया था कॉम्प्लीमेंटरिटी सभी बातों में यहां पर ठाकुर पंचमहाभूत के देह की निंदा कर रहे हैं। वहां पर वो मां के साथ में रहते हैं। हालांकि दैहिक संबंध नहीं है किंतु विवाह तो किया है। दैहिक संबंध भले ही चाहे नहीं है किंतु मां की चिंता कितनी करते हैं। वो जो एक हमने देखा ही मां के वो जीवन में कि मां को पूछते हैं कि कितनी रोटी खाओगी। फिर जैसे ही मां ने बेचारी ने बड़े शर्माते शर्माते उत्तर दिया लज्जित होकर के ठाकुर ने कहा कि तो फिर तुमको इतने रुपए से चल जाएगा। बोल के इतने रुपए बलराम बाबू की जमींदारी में इन्वेस्ट किए और इस इन्वेस्टमेंट में से जो इंटरेस्ट आता है उसमें से मां का खर्चा चलेगा। मां को पूछ मां के लिए जो गहने बना दिए थे तो उस समय भी प्रश्न हुआ था कि ठाकुर के पास में पैसे आए कहां से? यदि वो वो जो सैलरी है वो स्वीकार नहीं करते थे। मथुर बाबू से कुछ लेते नहीं थे। दूसरों से कुछ नहीं लेते थे। यहां पे यह जो मारवाड़ी भक्त आकर के ठाकुर को कहते थे कि आपको इतना रुपया दे देंगे। यह दे देंगे। ठाकुर एकदम घोरतर आपत्ति करते थे कुछ नहीं लेने के लिए। तो फिर मां के भविष्य की चिंता करने के लिए यह जो इन्वेस्टमेंट जो किया है भविष्य की रक्षा करने के लिए जो इन्वेस्टमेंट किया है, वह पैसा कहां से आया? फिर यह गहने बनाने के पैसे कहां से आए? तो क्या है ठाकुर का यह जो था एक बार आपने स्टडी किया तो आपको कॉम्प्लीमेंटाज दिखती है। किंतु यह कॉम्प्लीमेंटिटीज हम अपने मन में खड़ी करते हैं। हम इसके बारे में अपने से सोचते हैं कि हां यह एक और है ठाकुर का कि टाका माटी माटी टाका बोल के पैसा मिट्टी है। मिट्टी पैसा है। बोल के पैसों को एक बार गंगा में फेंक दिया। अभी यही ठाकुर बाद में कहते हैं कि मां लक्ष्मी यदि मेरे से नाराज हो जाएगी तो कैसे चलेगा? जो खेट बंद करे दे अर्थात कि खे अर्थात कि सैलरी या तो फिर यह जो भरण योगक्षेम जिसको कहते हैं कि आहार आहार है फिर निवास है रोटी कपड़ा मकान यह सब यदि मां छीन लेगी मेरे से तो कैसे चलेगा तो फिर ठाकुर क्या कहते हैं मां को कि तुम मेरे हृदय में रहना मां लक्ष्मी को कहते हैं किंतु यह तो कॉम्प्लीमेंटिटी हो गई एक बार तो उन्होंने जो प्रचंड त्याग जो है वह दिखा दिया है तो यदि हम इस तरह तरह से कॉम्प्लीमेंटरिटीज अपने माइंड में खड़ी करते रहेंगे। इस तरह की कंट्राडिक्शन हम खोजते रहेंगे जो ठाकुर के कोर मैसेज है तो फिर क्या हम लोगों को ऐसा नहीं लगेगा कि ठाकुर का यह जो कोर मैसेज है प्रचंड त्याग तपस्या वो डाइल्यूट होता जा रहा है फिर हम जब हमारे सामने ये चॉइस करने का जब मामला आएगा कि प्रेयश्च श्रेयश्च मनुष्य मेत ये जो प्रेय और श्रेय हमारे सामने आते हैं। आइडियली हमको श्रेय को सिलेलेक्ट करना है। किंतु फिर प्रेय की ओर तो हमारा आकर्षण है। उस समय ये जो क्रिटिकल पॉइंट होते हैं अपनी लाइफ के जिस समय हमको श्रेय सिलेक्ट करना ही है। उस समय इस तरह की आर्गुममेंट कि नहीं ठाकुर के मैसेज में तो कॉम्प्लीमेंटिटीज है। ठाकुर के मैसेज में कंट्राडिक्शन भी है। ठाकुर के जीवन में और उनकी कथन में कहीं-कहीं पर थोड़ा बहुत विरोधाभास दिख जाता है। एक और ठाकुर कहते हैं कि सत्य वचन का पालन मैंने मां को सब दे दिया मां काली को सत्य नहीं दे पाया। यहां पे तो मां शारदा कहती है कि अपने जो प्रियजन है उनके स्वास्थ्य की रक्षा करने के लिए मिथ्या भी वचन करना पड़े तो उसमें कोई गलत नहीं है। तो इस तरह से जो अपनी आर्गुमेंट अपना रिजॉल्व क्रिटिकल टाइम पर वीक हो जाएगा। तो क्या हम श्रेष्ठ निर्णय कर पाएंगे? श्रेष्ठ चॉइस कर पाएंगे अपनी लाइफ में। सो वो क्वेश्चन खड़े होते हैं। इन सब का कोई इजी उत्तर नहीं है। हम सबको अपना-अपना उत्तर खोजना है। और यह जो ज़हन क्वान जो होते हैं ना पजल जो होती है कि पजल को सॉल्व कर दिया तो फिर आपको निर्वाण मिल गया। तो यहां पे भी इस तरह की ये जो पजल है उसको सॉल्व करेंगे तो आपको फिर ठाकुर दर्शन हो जाएंगे। किंतु यह हमको ख्याल में रखना है कि दिस सॉर्ट ऑफ कंट्राडिक्शंस या तो फिर कॉम्प्लीमेंटिटीज या तो फिर यह ठाकुर मां स्वामी जी तीनों के एक-एक तरह का जो पॉइंट ऑफ व्यू था उसमें यह सब दिखता है। कीप इट इन योर माइंड। स्टडी इट। उसके ऊपर में चिंतन कीजिए। और साधक को चिंतन करने के लिए क्या है? यही तो सब है ना हमारे लिए। जो एक घंटा दो घंटा हम देते हैं ठाकुर को मां को स्वामी जी को दिन में उसमें हम क्या करेंगे जब तक जप होता है ध्यान होता है बहुत अच्छी बात है पाठ हम करते हैं वेरी गुड किंतु इस तरह का भी एक चिंतन एक चलना चाहिए बैकग्राउंड में कि अच्छा यहां पे ऐसा बोलते हैं किंतु यहां पे ऐसा बोलते हैं इसका क्या सॉल्यूशन है दैट विल यू नो इट विल मेक द स्पिरिचुअल लाइफ इंटरेस्टिंग यदि सब कुछ एक ही प्रवाह में बह रहा है यदि एक ही तरह का सब कुछ है कोई कोई कंट्राडिक्शन नहीं दिख रहा है। कोई आपको यह नहीं दिख रहा है। तो फिर आप चिंतन किस बात का करेंगे? तो वैसे ही यहां पे बोला है तो टॉपिक चल रहा है निष्काम कर्म का। किंतु ठाकुर एक दूसरा ही कमेंट करते हैं। दूसरी ही ओर जाकर के एज इफ कि निष्काम कर्म के बारे में उनके मन में कुछ रिजर्वेशन है। उसके ऊपर में वो आउटराइट कुछ कमेंट नहीं करना चाहते। ऐसा लग रहा है। डू नॉट नो कि एक्चुअली उनके मन में क्या होगा। तो किंतु अभी अभी दूसरी बात है

ठाकुर कहते है की पूर्ण ज्ञानी अपने पास किताबे नहीं रखता, किन्तु ठाकुर के कमरे में तो किताबे थी.

इवन जो ठाकुर पूर्ण ज्ञान का जो लक्षण कहते हैं उसमें भी हमको पता है कि भले ही चाहे ठाकुर यह कहते हो कि उनके पास में एकमात्र पुस्तक भी न रहे ठाकुर के खुद के घर में यह भक्तमाल है वगैरह पुस्तकें रहती थी यह अष्टावक्र संहिता है वह भी तो थी और ठाकुर उसमें से पाठ या तो जो दूसरे लोग पाठ करते थे उसका ठाकुर श्रवण भी करते थे। तो एक और तो जो जैसे ठाकुर ने सुखदेव के बारे में कहा कि सब कुछ तो उनके जिहवा पर उपस्थित है। तो यही बात मास्टर महाशय को तो अनुभव हो गई थी कि प्रथम दर्शन में ही वह ठाकुर के कमरे में जाने से पहले ठाकुर का कमरा बंद था। वो पहले तो ठाकुर का दर्शन किया। उसके बाद में सोचा कि देखता हूं कि मैं कहां पे आया हूं। तो देख के काली मंदिर में एक चक्कर लगा के फिर से जब ठाकुर के कमरे की ओर आए देखा कि दरवाजा बंद है तो ठाकुर मास्टर महाशय तो वेस्टर्न एजुकेशन तो फटाक करके दरवाजा खोल के कैसे भीतर में जाए तो बाहर में खड़े रहे वहां पे ये वृंदा जी खड़ी है जी अर्थात कि दासी ना कि वो जो काम करने वाली तो उसके साथ में वार्तालाप कर रहे हैं तो मास्टर महाशय पूछते हैं कि इन्होंने तो बहुत सारा अध्ययन किया होगा किताबें पढ़ी होगी तो वृंदा ने क्या उत्तर दिया अरे पुस्तक टू पुस्तक की और सब तो और मुख्य है यह सब किताब किताब मतलब क्या है? सब तो उनकी जीह्हा पर सवार उपस्थित है। स्थापित है। मां सरस्वती जैसे स्वयं ठाकुर की जीह्हा पर सवार होकर के वार्तालाप करती है। दूसरों को उपदेश देती है। तो मास्टर महाशय ने यह बात ऑलरेडी ठाकुर के बारे में सुन के रखी थी। यहां पर ठाकुर खुद म वो कहा वो वृंदा के मुंह से सुनी थी। एक दासी के मुंह से और यहां पर ठाकुर स्वयं यह बात कर रहे हैं। तो मास्टर महाशय नोस कि यह बात जो है ठाकुर के पूरे जीवन के साथ में कंसिस्टेंट है। एट द सेम टाइम हमको यह भी पता है कि ठाकुर के कमरे में पुस्तकें थी नहीं थी। ऐसा नहीं है। और ठाकुर यह सब चीजों का श्रवण भी करते थे। पौराणिक कथाओं का श्रवण करते थे। यह भक्तमाल का श्रवण करते थे। यह तो हमने ऑलरेडी दो दिन में मास्टर महाशय आए हैं। 14 तारीख को तो आए थे। आज 15 तारीख है। दो ही दिन में हमने देख लिया। वो राजा जयमल का चरित्र मास्टर ठाकुर श्रवण कर रहे थे। फिर यह इतना ही नहीं यह जो ये जो यह होता है थिएटर वो देखने के लिए जाते थे। वहां पे ये चैतन्य चरित वगैरह जो अभिनय होता था वह देखने के लिए जाते थे। तो ऐसा नहीं है कि ठाकुर किताब का श्रवण नहीं करते थे। पौराणिक कथाओं का श्रवण नहीं करते थे। किंतु फिर भी इन कंट्रास्ट टू दैट ठाकुर कहते हैं कि पूर्ण ज्ञान का लक्षण है सब कुछ जहवा पर होना चाहिए। एक भी पुस्तक साथ में ना हो। तो प्रश्न होगा कि ठाकुर स्वयं किताबें क्यों रखते हैं? तो इसका किस तरह से उत्तर देंगे? एक सहज उत्तर यह है कि किताबें ठाकुर के लिए नहीं है। भक्तों के लिए है। ठाकुर जब श्रवण करते हैं तो इस बहाने भक्त लोग भी श्रवण करते हैं। फिर जो नरेंद्र का ब्रेन वाश करना था तो नरेंद्र को कहा कि तुम भले ही चाहे अष्टावक्र संहिता ना पढ़ो तुम मुझे पढ़कर के सुनाओ। तो भक्तों के लिए रखी होगी। यह भी एक सॉल्यूशन हो सकता है। किंतु जैसे कि इन लोगों के कार्यकलाप है। इसके बारे में 100% कोई भी व्याख्या करना संभव नहीं है। इसके बाद का जो है अभी हम बाद में देखेंगे। इस पॉइंट में और भी दो तीन है। कल देखते हैं। आज ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु।

प्रश्न: क्या ठाकुर दक्षिणेश्वर मंदिर में अपना वेतन स्वीकार करते थे ?

ना किंतु देखिए ठाकुर बड़े क्लेवर है। ठाकुर ने ऐसा नहीं कहा कि देखिए ठाकुर का भी चालाकी कम नहीं है। वो ऐसा नहीं कहते मैं पैसा नहीं लूंगा। कहते हैं मैं साइन नहीं करूंगा। उनको पैसा देना है तो दे वरना ना दे। ना उनको यह पता था जब तक मथुर बाबू है तब तक वो ऑडिट का कोई टेंशन नहीं है। वो प्राइम मिनिस्टर अपने पॉकेट में है। पर चीफ ऑडिटर अपने पॉकेट में है। चिंता नहीं है।

प्रश्न: ठाकुर, माँ और स्वामीजी की शिक्षाओं में विरोधाभास हैं। क्या विरोधाभासरूपी इस पहेली को सुलझाने से हमें आत्मज्ञान प्राप्त होगा?

ना वी कैन टर्न इट टू आवर साधना ना जैसे यह ज़हन कुान है द साउंड ऑफ वन हैंड क्लपिंग अभी एक हाथ से आप ताली बजा ही नहीं सकते पहली बात तो और यदि ये बजाएंगे तो किस तरह का आवाज होगा थिंक ओवर इट देन दिस कंट्राडिक्शन विल बिकम सो बिग देन ही विल रियलाइज़ दैट माया के जगत में यही है माया के जगत में देयर इज़ नो सच सॉल्यूशन हमको जो चीज परफेक्टली एलाइन भी दिखती है उसमें भी आपको हजार कंट्राडिक्शन इनहेरेंट है जो कि हमको दिखती नहीं है। यहां पर कंट्राडिक्शन दिखती है वहां पे नहीं दिखती है। सो अभी जैसे वो युधिष्ठिर को वो यक्ष प्रश्न कर रहा है। जीवन का सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है? तो कहता है कि मृत्यु सबके सामने निश्चित है। उसके बावजूद इस तरह से बिहेव कर रहे हैं कि कोई कभी मरने वाला नहीं है। सब दिस इज द बिगेस्ट कंट्राडिक्शन इन आवर लाइफ कि अब आप यूथ है। यह एनर्जी है। ये ये सब कितने साल है 20 साल 30 साल 40 साल एट द मोस्ट आपका 50 क्रॉस हो गया। यह जो हम कल मिडिल लाइफ क्राइसिस की बात कर रहे थे। जैसे ही 50 60 क्रॉस होता है आपका पूरा लाइफ एक फिर उसके बाद में यदि आप वो ऐसा बिहेव करेंगे ना आई एम स्टिल इन माय 20 एंड स्टिल इन माय 30ज यू आर गोइंग टू सफर अभी आजकल ये जो धनपति लोग है ना बिलियनियर वे लोग इमोर्टिटी की खोज कर रहे हैं ये Google का एक प्रोजेक्ट एक कंपनी है केको मोस्ट प्रोबेबबली आई थिंक कि हाउ टू अटेन इमोर्टिटी कि बॉडी को किस तरह से आपको एक्सटेंड कर सकते हैं अपनी लाइफ को तो अभी मॉडर्न मेडिसिन ऑलरेडी हमको 6070 इयर्स तक तो हम बचा के ही रखती है। पेंडेमिक वगैरह का फटाफट करके यह वैक्सीन बन जाता है। यदि आप धनपति है और एम्स फेम्स में ट्रीटमेंट ले सकते हैं तो हार्ट हार्ट रिप्लेस भी कर सकते हैं। अभी आज ही मैंने पढ़ा कि यह पिग यानी कि वो पिग में से यह लंग ट्रांसप्लांट ह्यूमन में हुआ है। अभी ये कल आ जाएगा कि लेब ग्रोथ ये सब ऑर्गन्स हो रहे हैं। तो, अह यू मे एक्सटेंड योर लाइफ़ बियनड वन पॉइंट बट दैट लाइफ़ विल नॉट बी वर्थ लिविंग। तो, क्या है कि यह तो सबसे बड़ा कंट्राडिक्शन है अपने जीवन का। तो, वंस यू सॉल्व दिस कंट्राडिक्शन कि माया के राज्य में सब कुछ अपूर्ण है। माया के परे जाकर के ही पूर्णता प्राप्त होगी। दैट डे वी विल स्टार्ट वॉकिंग ऑन द पाथ ऑफ स्पिरिचुअलिटी। सो दिस कंट्राडिक्शंस गिव्स अस अ फूड फॉर थॉट। दैट थिंकिंग ओवर इट वी कैन कम आउट ऑफ दिस प भूल भुलैया कहते हैं ना माया की ये भूल भुलैया में से बाहर आएंगे हम लोग मेज इंग्लिश वर्ड है वी विल कम आउट ऑफ दी मेज ऑफ माया हां इमेज अंडरस्टैंड दैट इन द वर्ल्ड ऑफ़ माया देयर इज़ नो परफेक्ट सॉल्यूशन और वी विल ट्राई टू फाइंड सॉल्यूशन और हमने सॉल्यूशन डिस्कस भी किए हैं एट द एंड ऑफ द डे हम सबको पता है कि अपनी क्षुद्र बुद्धि से कोई यह सब सॉल्यूशन उनको को कोई परफेक्ट मिलने वाले नहीं है। सो अल्टीमेटली तो वही है कि माया के जगत में कंट्राडिक्शन रहेगा ही रहेगा। जीवन इटसेल्फ इज अ कंट्राडिक्शन कि कहां यह चैतन्य किस तरह से यह जड़ के साथ में मिलित होकर के देह को ये एनिमेट करता है। हाउ इज दिस पॉसिबल?

प्रश्न: जो लोग हमारे भक्त नहीं हैं वे हमारे विचारों पर हास्यास्पद टिप्पणियाँ करते हैं।

यह महापुरुष महाराज वाली बात पता है ना कि कनखल में गए एक बार देखा कि मां का फोटो हटा दिया है। तो महापुरुष महाराज पूछते हैं अरे मां का फोटो क्यों हटा दिया श्राइन में से? ठाकुर का मां का दोनों था। मां का क्यों हटा दिया? बोला यहां पर साधु समाज में स्त्रियों को तो मतलब ऑफ कोर्स साधुओं को स्त्रियों से दूर रहना चाहिए। तो स्त्री का फोटो क्यों रखा है आपने श्राइन में? बोल करके किसी साधु ने कमेंट किया तो हटा दिया। महापुरुष महाराज बोलते हैं जगत जननी का फोटो हटाएंगे तो फिर क्या अर्थ है ये सब काम का? रखो फोटो वापिस। लोग जो बोले बोलने दो। म ऐसे भी लोग थे कि साधुओं को ये स्त्री का फोटो बहुत समय पहले की बात है। मैं मेरे कोई रिलेटिव मुझे मिलने के लिए आए थे आश्रम में। तो मैंने किसी को कहा अरे तू बहुत अच्छा सुंदर साड़ी है। कहां पे मिलता है? कितना उसका प्राइस है? कहां से मैं परचेस कर सकता हूं? तो उन्होंने कहा अरे तू साधु हो के साड़ी की प्राइस ये सब पूछता है। मैं है ना हमारे श्राइन में मां को पहनाते हैं उसके लिए है ये और कुछ गलत इसका इंटरप्रिट मत करो।

प्रश्न: मास्टर महाशय ने कथामृत में स्वयं को कितनी अच्छी तरह छुपा कर रखा है!

ये जो सबसे बड़ा सर्टिफिकेट तो स्वामी जी ने ही उनको दे दिया है। वो पत्र वो जब ये कथामृत का ड्राफ्ट ओरिजिनल ड्राफ्ट उनको भेजा मास्टर महाशय ने तो कहते हैं कि प्लेटोस सोक्रेटिसिस डायलॉग्स आर प्लेटो ऑल ओवर बट यू हैव केप्ट योरसेल्फ परफेक्टली हिडन। यानी ये प्लेटो ने सोक्रेटिस के जो डायलॉग लिखे हैं अभी ये लोग कहते हैं प्लेटो के खुद के विचार थे सोक्रेटिस के मुंह में डाल दिए हैं। बट यू हैव केप्ट योरसेल्फ परफेक्टली हिडन। आपने अपना जो प्रजुडाइस उस समय बोलने वालों की कम संख्या नहीं थी कि ठाकुर तो अनपढ़ काली के पुजारी थे। वो इतने सब लिबरल आइडियाज कैसे उनके माइंड में आए? तो मास्टर महाशय तो एमए किए टीचर थे। अपने आइडियाज ठाकुर के मुंह में बिठा दिए। किंतु नरेंद्र तो ठाकुर को पहचानता है। वहां पर मास्टर महाशय का 1% भी आ गया होता तो नरेंद्र फटाक करके पॉइंट आउट करता। सो दैट इज वन थिंग। और दूसरा बहुत बड़ा सर्टिफिकेट स्वामी जी अपने लेटर में लिखते हैं कि यह जो सब अमेरिका से एक बार उन्होंने पैसा वैसा भेजने की शुरुआत की। फिर पैसों का मैनेजमेंट करना वो जब चल रहा था तो नरेंद्र स्वामी जी लिखते हैं लेटर में पैसों के बारे में मैं सिर्फ मास्टर महाशय को ट्रस्ट करता हूं और किसी गृहस्थ को मैं ट्रस्ट नहीं करता तो ये आप सोच लीजिए कि स्वामी जी की ओर से यह सर्टिफिकेट उनको मिला हुआ है कि और कोई नहीं है जिसको लेकर के स्वामी जी कामिनी कांचन को ले ट्रस्ट करें कि उनके हाथ में यह सब सेफ रहेगा। ओनली मास्टर महाशय इस सच अ पर्सन। सो

प्रश्न: जब कोई साधु डांटता है तो हम उसे तपस्या मान सकते हैं, लेकिन हमारे सांसारिक जीवन में जब कोई हमारे साथ दुर्व्यवहार करता है तो हम उसका प्रतिकार किए बिना रह नहीं सकते। तो इस विरोधाभास को कैसे सुलझाया जाए?

देखिए पहला तो यह जो मैंने कहा ना शिवमयानंद जी ने कहा कि व्हाट इज योर फाइनेंस तो कम्युनिटी लाइफ। सो दैट इज वन थिंग कि साथ में जब रहते हैं तो यह खटपट तो चलता ही रहेगा। अपने ईगो को उस समय संयम में रखना एक बहुत बड़ी साधना है। यह अपना हिंदू जॉइंट फैमिली यह क्या है? सबसे बड़ी साधना का तो जगह यही है। लेडीज की अवस्था एक तो एक होता है कि जैसे कि उनको क्या है कि सब समय ईगो के ऊपर में आघात रहते होते रहते हैं। जैसे मैंने मेरे बारे में बताया था। आई एम वेरी फॉरर्चूनेट टू ग्रो अप इन अ जॉइंट फैमिली। संयुक्त कुटुंब में बड़ा होना मुझे लग रहा है कि मेरे जीवन का सबसे बड़ा एक सद्भाग्य था। मेरे मां की ओर से भी और मां अर्थात कि मां के घर मैं जब जाता था मोसाल अपने वहां पे भी और पिताजी जहां पर रहते थे वहां पे भी दोनों जगह संयुक्त कुटुंब थे तो एट द सेम टाइम बच्चों के लिए जो हेवन था मैं ग्रोन अप्स जो थे मैं देख रहा था कि उनके जीवन में स्ट्रगल है अभी वो जैसे मैं अपने मौसाल जाता था गांव में तो एक चाची थी तो बड़ा स्नेह करती थी हम सब बच्चों को जो अच्छा अच्छा खाना खा के खिलाएगी किंतु फिर वो कंप्लेन भी करती करती रहती थी कि वह जो सीनियर मेंबर्स जो है फैमिली के वो उनके बारे में ऐसा कुछ कह रहे हैं या तो फिर जो भी उनका इंटरनल स्ट्रगल होगा तो ऑन वन हैंड कि मैं तो परिवार में जितने भी है सबको मुझे इक्वल स्नेह करते थे एट द सेम टाइम मुझे स्पष्ट दिख रहा है कि आपस में वो जो उनके कंट्राडिक्शंस मतभेद काफी है और आजकल के युग में आप किसी को कह ही नहीं सकते कि आप जॉइंट फैमिली में रहिए। मेरी खुद की बहन मुझे कहती है कि वो शादी करके अपने घर गई। उनके वो जो हस्बैंड के पेरेंट्स है उसके साथ नहीं पटता है। नहीं रहना है। तो अभी मैं तो उसको कहूंगा नहीं कि अब अपनी चाची को तो देखा, अपनी मां को देखा तुमने बचपन में कैसे जॉइंट फैमिली में एडजस्ट करके रहे हैं। तुम भी रहो। आई विल नॉट टेल हर दैट। क्योंकि आज का युग ही ऐसा हो गया है कि एक सेल्फ असर्ट सबका होता है। वह जो मैंने जॉइंट फैमिली में देखा था कि सीनियर लोग जो है घर में उनकी बात सभी लोग मान लेते हैं। यदि आपका यह भी होगा कुछ मतभेद अलग से होगा तो आप बिल्कुल ही आप संबंध तोड़ के सेपरेट नहीं हो जाएंगे जो कि आजकल हर जगह पे हो रहा है। आजकल आपको रेयरली जॉइंट फैमिली देखने को मिलेंगे। अभी तो सब न्यूक्लियर फैमिली हो गए हैं। तो एक तो था वो एक कि जॉइंट फैमिली में रहना सबसे बड़ी तपस्या थी। अब चाहे जैसे आपने कहा कि दूसरों की मोरल पोजीशन ना भी हो तो जस्ट आउट ऑफ सीनियोरिटी या तो फिर जो सोशल स्टेटस होता है वो उन लोगों के पास में है बोल के हमको यह मेंटल एडजस्टमेंट कंटीन्यूअस करना पड़ता है। तो उन्होंने जो एडजस्टमेंट किया द रिजल्ट वाज़ माय हेल्दी चाइल्डहुड। और सिर्फ मेरा ही नहीं हम मेरी जनरेशन के जितने भी लड़के होंगे सब लोगों ने मोर और लेस जॉइंट फैमिली देखा ही होगा और उनको जो एक इमोशनल सपोर्ट मिलता है और हम लोग यदि अपने को आज की जनरेशन के साथ कंट्रास्ट करेंगे कि ये न्यूक्लियर फैमिली में रह रहे हैं। मां-पिताजी दोनों कभी-कभी एब्सेंट होते हैं। जॉब करते हैं तो बच्चे को डे स्कूल में रख देते हैं या तो फिर किसी आया को रखते हैं घर में उसको केयर करने के लिए। तो हम लोग इनका जो इमोशनल देखते हैं कि नरिशमेंट कैसे हो रहा है और हमारा कैसा था? वी फिल आवरसेल्फ फॉर्चूनेट। अभी हमारे लिए उनको कष्ट करना पड़ा। हमारे पेरेंट्स को, हमारे फैमिली मेंबर को बट वी टूक बेनिफिट। अभी रिवर्स हो गया है कि पेरेंट्स जो है अपनी सुविधा के लिए जो कर रहे हैं, इट विल नॉट बी टू वेरी गुड फॉर चिल्ड्रन। सो दिस इज अ प्रोग्रेशन ऑफ हिस्ट्री। कोई किसी को कुछ कह नहीं सकता है। मैं अपनी खुद की बहन को ऐसा कभी फोर्स करके नहीं कहता कि तुम जॉइंट फैमिली में रहने का प्रयास करो। बिकॉज़ आज युग बदल गया है पूरा। एक सेल्फ एक्सप्रेशन, इंडिपेंडेंस सब में है। सो यू हैव टू गो विद दैट एज। तो कोई इस युग को चेंज नहीं कर सकता है। सो दैट इज वन थिंग कि फैमिली लाइफ में जो जॉइंट फैमिली हमने देखे थे दैट वास द परफेक्ट इनक्यूबेशन फॉर तपस्या। यदि ग्रोन अप हो के आपने जॉइंट फैमिली में रह लिया। जिनका सीनियर है, सोशल स्टेटस है, उनकी डांट है वगैरह आपने सहन कर ली। दैट विल बी वेरी गुड फॉर योर स्पिरिचुअल लाइफ एज वेल एज दी इमोशनल नरिशमेंट ऑफ चिल्ड्रन। सो वो तो एक बात हो गया। अभी कॉर्पोरेट लाइफ का तो एकदम प्रश्न ही अलग है। वहां पे यदि सेल्फ असर्शन इज द रूल। यदि आप अपने बॉस है या कलीग है वो आपको पॉलिटिक्स करके या नेगेटिव भाव से आपका जो कंट्रीब्यूशन है उसको हथिया लेना चाहता है तो आप उसको सहन नहीं कर पाएंगे। सो कॉर्पोरेट लाइफ इज कंप्लीटली डिफरेंट कि यू विल हैव टू असर्ट योरसेल्फ। यू विल हैव टू हैव कि अपना जो राइट है उसको आप गवा नहीं सकते हैं। पॉलिटिक्स में भी ऐसा है। भारत देश के साथ में देखिए ना क्या हुआ जो आध्यात्मिक वैल्यू्यूज है जो कि एक इंडिविजुअल और फैमिली तक सीमित रहनी चाहिए। उसी वैल्यूस को हमने नेशनल लाइफ में लाने का प्रयास किया। बुद्ध ने जब ऐसा किया 1000 साल की गुलामी। गांधी जी ने ऐसा किया तो भारत का पार्टीशन। सो क्या है कि नेशनल लाइफ है या तो कॉर्पोरेट लाइफ है उसकी वैल्यूस अलग है। वहां पे अपना राइट जो है वो हमको एसर्ट करना ही होगा। स्पिरिचुअल लाइफ इट इज़ एस सच इट इज़ रिलेटेड मेनली विद खास करके यह सहन करना यह जो ट्रेडिशनल स्पिरिचुअलिटी है इट इज़ मेनली रिलेटेड विथ आवर इंडिविजुअल रिलेशन विथ गॉड एंड विथ आवर फैमिली लाइफ। नॉट विथ आवर पॉलिटिकल और कॉर्पोरेट लाइफ। तो वहां के लिए सेपरेट रूल्स हो जाते हैं। स्वामी जी ने इंटरेस्टिंगली अहिंसा के बारे में ऐसा कभी कुछ नहीं कहा है। व्हिच इज वेरी ट्रू। देखिए अशोकानंद जी का एग्जांपल तो जग जाहिर है। वो बार-बार कहते हैं कि गांधी जी के विचार जो है स्वामी जी से डायमेट्रिकली ऑोजिट है और प्रबुद्ध भारत में एडिटोरियल लगते थे। गांधी जी की निंदा करके प्रारंभ कर दिया था। तो बिलूर मट को थोड़ा सा डर लग गया कि अभी गांधी जी इतने पॉपुलर है और अपने ही मैगजीन में उनकी निंदा हो रही है तो उनको अमेरिका भेज दिया था।

जब गांधीजी बेलूर मठ आए तो स्वामीजी मठ में मौजूद नहीं थे। यह भारत के लिए सबसे बड़ा अवसर खो गया।

देखिए मेरी दृष्टि से ना इंडिया का सबसे बड़ा मिस्ड ओपोरर्चुनिटी क्या है? पता है इन मॉडर्न एज गांधी जी गए थे बेलूरमठ स्वामी जी का दर्शन करने के लिए। 1902 के स्वामी जी के महासमाधि के पहले की बात है। उस समय अनफॉर्चूनेटली स्वामी जी थे कोलकाता में। मोस्ट प्रोबेब्ली बलराम भवन में बीमार थे तो ट्रीटमेंट के लिए गए थे। यहां पर गांधी जी आए देखा कि स्वामी जी नहीं है तो निराश होकर के चले गए। आई थिंक दिस इज द बिगेस्ट मिस्ड अपॉर्चुनिटी इन मॉडर्न इंडिया। ये गांधी जी और स्वामी जी का मिलन यदि हो जाता ना तो आई डोंट नो कि क्या होता माने क्योंकि क्या है पता है? वैसे तो गांधी जी का स्वामी जी के प्रति ऐसे तो फेद है किंतु मैंने गांधी जी का जो कंप्लीट वर्ड्स तो नहीं कहूंगा किंतु काफी मैंने स्टडी किया था मैं जब उस समय गुजरात में था तो गांधी जी ना बीच-बीच में स्वामी जी के बारे में कोई ना कोई नेगेटिव कमेंट करते रहते हैं। उनका एक सबसे बड़ा कंप्लेन था कि इंडिया में इतने गरीब है तो उनको छोड़कर के स्वामी जी अमेरिका क्यों गए? यदि आपको देश के लिए कुछ करना ही था तो भारत में ही रहकर के भारतवासियों के लिए आप काम करते। आपने अपनी जो पूरी प्राण शक्ति है विदेश में गवा दी। वापस आकर के ना ही भारत में प्रवचन किए। यू नो जो इवन स्वामी शिष्य संवाद में शरद चंद्र भी स्वामी जी को पूछता है कि महाशय स्वामी जी आपने विदेश में इतने प्रवचन किए भारत में क्यों नहीं कर रहे हैं? तो नेचुरली स्वामी जी का उत्तर बड़ा स्पष्ट था कि इस भूमि में इतने प्रवचन हो गए हैं कि अभी वो शब्द नहीं अभी कार्य चाहिए। सो दैट वास स्वामी जीसस रिप्लाई रामकृष्ण मिशन की स्थापना की वगैरह-वगैरह किंतु दिस इज़ दिस वाज़ अ पर्सिस्टेंट क्रिटिसिज्म अगेंस्ट स्वामी जी कि उन्होंने कार्य किया तो अमेरिका में किया। इंडिया में ऐसा उनकी कोई विज़िबल प्रेजेंस नहीं रही। एक एक बार एक हाइप खड़ा हो गया। स्वामी जी जब फर्स्ट टाइम रिटर्न हुए थे। उसके बाद में जैसे कि वो पूरा सब्सम हो गया है। मतलब सबमर्सिबल हो गया है। पूरा मूवमेंट स्वामी जी सब कुछ जो जिस तरह का हाइप इनिशियली क्रिएट हुआ था वो सस्टेन नहीं हुआ है। ना ही स्वामी जी के विचार ना ही स्वामी जी स्वयं ना ही रामकृष्ण मिशन। सो यह क्रिटिसिज्म था कि इतना प्रॉमिसिंग जो मूवमेंट था इतने प्रॉमिसिंग जो पर्सन थे हाउ दे हाउ द लॉ नेशन एज ए होल लॉस्ट साइट ऑफ देम। तो गांधी जी बार-बार ऐसा पर्सिस्टेंटली ऐसा कोई नेगेटिव कमेंट करते रहते हैं स्वामी जी के बारे में। सो आई थिंक कि गांधी जी ने स्वामी जी के साथ में एक बार मुलाकात हो गई होती और उनके मन के ये जो जो डाउट्स थे एक बार क्लियर कर लिए होते तो आई डोंट नो कि भारत की आज क्या परिस्थिति होती।

सहनशीलता (सहिष्णुता) और संघर्ष—क्या ये समान हैं या विरोधाभासी? -- हमें विज्ञान, कला, राष्ट्र-निर्माण जैसे क्षेत्र में पराक्रम प्रकट करना है, लेकिन कामना-वासनाओ का दमन करना है.

ना यह बड़ा ही इनाइटफुल क्वेश्चन है और स्वामी जी का जो ऑब्जरवेशन है ना वो बड़ा ही पावरफुल है यहां पे आजकल ना एक ऐसा मूवमेंट चला है लोग कहते हैं लिव इन ट्यून वि नेचर स्वामी जी कहते हैं यू कैन नेवर लिव इन ट्यून विथ नेचर नेचर इज ऑलवेज ट्राइंग टू क्रश यू यू हैव टू असर्ट योरसेल्फ इन ऑर्डर टू विन योर विक्ट्री अगेंस्ट नेचर अदरवाइज यू विल बी नथिंग यह भारत की यह जो दुरावस्था हुई है आत्म आत्मश्रद्धा का अभाव है। नचिकेता की तरह आत्मश्रद्धा लाओ। 10000 मेन एंड वुमेन स्वामी जी का फेमस कोटेशन फायर्ड विद द ज़ील ऑफ़ ओनलीनेस नर्व विद द करेज ऑफ लायन वि द मसल्स ऑफ़ आयरन एंड नर्व्स ऑफ स्टील। तो ए नर्व्स ऑफ स्टील मसल्स ऑफ आयरन लायंस करेज यह सब कोई सहन करने के लिए तो नहीं बना है ना? ये तो डंडा मारने के लिए बना है। सो देयर इज़ वेरी क्लियर कंट्राडिक्शन कि तपस्या हम जिसको कहते हैं और ये जो सेल्फ असर्शन है दैट इज कंप्लीटली डिफरेंट। तपस्या स्वामी जी ने नहीं की ऐसा नहीं है। स्वामी जी ने प्रचंड तपस्या की है। हमको पता है। किंतु तपस्या है हमेशा अपने ये जो काम कांचन या तो दैहिक सुख या तो इंद्रियों के विषय है उसका दमन करने के लिए जो होता है वो है तपस्या। और एक जो एक मैनिफेस्टेशन एक स्पिरिट होता है दैट इज सेल्फ असर्टशन। आज एक लड़का छोटा बच्चा अब जैसे मैंने लिमड़ी का उदाहरण दिया था कि मैं वहां पर गदाधर प्रकल्प चलता था तो मैं सरकारी स्कूल में जाता था। अभी सरकारी स्कूल के बच्चों की एक आर्थिक मानसिक परिस्थिति तो हम अनुमान कर ही सकते हैं। वह भी लिमड़ी जैसे गांव के तो अभी जैसे ही मैंने उन लोगों के साथ में बात करना शुरू किया। पहले तो इतने डरे डरे सहमे-सहमे से रहते थे। मेरे साथ में मैं कोई बोलूंगा तो एकदम ब्लैंकली मेरे सामने देखते रहेंगे। जैसे कि भीतर में कुछ गया ही नहीं है। और फिर मैंने देखा टीचर उनको मारते भी है। तो फिर मुझे बोलना पड़ा टीचर को कि मेरी प्रेजेंस में मारना नहीं है बच्चों को और दूसरा इसके बावजूद भी टीचर का डर लगता है तो मेरे क्लास में टीचर्स को उपस्थित नहीं रहना है। मैं उनको डिसिप्लिन कर लूंगा। जो भी करना है मैं करूंगा। आपको रहने की जरूरत नहीं है। धीरे-धीरे करके मेरे साथ में बात करके जो भीतर में से जो स्पिरिट मैनिफेस्ट होता है। अभी किसी को ड्राइंग का शौक है तो उसके लिए मैंने वो अच्छा सा एक ड्राइंग बुक है। वो पेस्टल कलर्स है वो दे दिया। किसी को सिंगिंग का शौक है गान गीत गाने का। तो हमने एक म्यूजिक टीचर को हायर किया था। सबको म्यूजिक सिखाता है। योगा में सिखा रहा था। यानी कि जो भीतर का जो स्पिरिट होता है विद इन सिक्स सेवन मंथ मैंने देखा कि जो एक मैनिफेस्टेशन हो रहा है बच्चों के भीतर में उत्साह जैसे ही मैं आऊंगा गाड़ी आएगी आवाज सुनूंगा बच्चे लोग सुनेंगे तो क्लास में बैठे हल्ला मचाना शुरू कर देंगे वो महाराजाएं महाराजा फिर यू नो जो कहां वो डरे डरे सहमेसहमे थे कहां ये उनका एक स्पिरिट एक मैनिफेस्ट हो रहा है रांची के ट्राइबल विलेज में अगेन उनका सोशल पॉलिटिकल सिचुएशन समझ ही सकते किंतु हमारी नाइट स्कूल जो रात्रि पाठशाला जब चलाते थे यह लड़का जो कि दिन भर खेत मजदूरी करता है। गवर्नमेंट के रूल है कि चाइल्ड लेबर नहीं होना चाहिए। किंतु यह सब थ्यरी है। सबको पता है। वो बेचारा खेत में काम करेगा ही करेगा। 10 12 साल का बच्चा ये खेत में काम करने के बाद में वो स्कूल में पढ़ाई लिखाई के लिए आता है। बट दैट एंथूजियाज्म इज देयर। क्योंकि हमने वो सिस्टम खड़ा किया था कि बच्चों को खास करके ट्राइबल बच्चों को एनकरेजमेंट मिले। तो भीतर का जो भ्रमण है वो जो मैनिफेस्ट होता है सच ए ब्यूटीफुल थिंग टू वॉच। उनको ना सदियों से इस तरह से दबा करके रखा गया है। जमींदार है, गवर्नमेंट है, यह धनी लोग हैं। यह लोग सब समय इनको डांट करके उनका शोषण करके दबा के रखते हैं। सो व्हेन दैट स्पिरिट इज मैनिफेस्टेड, इट्स सच अ ब्यूटीफुल साइट टू वॉच। किंतु हम बच्चों को ऐसा नहीं कहते कि इंडल्ज इन योर सेंसेस व्हिच इज कंप्लीटली डिफरेंट। कि आप अपनी इंद्रियों के सुख भोग को बढ़ाओ। ऐसा तो हम नहीं कहते। मैनिफेस्ट योर स्पिरिट बट कंट्रोल योर सेंसेस। सो अपेरेंटली शायद आपको कंट्राडिक्टरी दिखेगा। बट दिस इज़ कंसिस्टेंट विद इन दिस फिलॉसोफिकल बैकग्राउंड। तो आप जो कहते हैं कि एक तो नेचर हमको स्वामी जी का यह स्टेटमेंट कि यू कैन नेवर लिव इन ट्यून विथ नेचर। नेचर इज़ ऑलवेज ट्राइंग टू क्रश यू। यू हैव टू फाइट विथ इट एंड गेन विक्ट्री। सो व्हाट इज किस तरह से वो क्रश करने का ट्राई करता है। मेरा स्पिरिट जो है मैनिफेस्ट हो रहा है उसको नहीं होने दे रहा है। बट एट द सेम टाइम इंद्रियों के सुखों को उसको तो मैनिफेस्ट नहीं करना है। उसका हमको दमन करना है। देखिए ये जो इसी में एक पॉइंट ऐड करता हूं। ये वेस्टर्न सिविलाइजेशन है कि मटेरियलिस्टिक सिविलाइजेशन कि सुखों को मैक्सिमाइज करना है, भोग को मैक्सिमाइज करना है। अपने यहां पे रिवर्स है। अपने भोग को मिनिमाइज करना। स्वामी जी बड़ा अगेन स्टार्टिलिंग स्टेटमेंट कि वेस्टर्न सिविलाइजेशन इज़ फिगरिंग आउट हाउ मच अ मैन कैन पज़ेस एंड ईस्टर्न सिविलाइजेशन इज़ वर्किंग ऑन हाउ लेस अ मैन कैन पज़ेस। सो बट एट द सेम टाइम इंडिया में और विदेश में दोनों जगह पर इस कांसेप्ट का मिस इंटरप्रिटेशन हुआ है। विदेश में है कि सुख भोग मैक्सिमाइज करने की वजह से एक जो पूरा सिविलाइजेशन के भीतर में जो जहर घुस गया है ना अभी वाइट सुप्रीमसी ये जो आज दिख रहा है हमको न्यूक्लियर वेपन लेकर के वो पागल बैठा है। अभी यह तो कब कहां पे क्या फेंकेगा न्यूक्लियर बम वगैरह किसको पता तो दैट इज़ वेरी डेंजरस कि इतना बड़ा मिलिट्री इतना बड़ा न्यूक्लियर वेपंस का स्टॉक पाइल उसके ऊपर में वहां पे कुछ लोग बैठे हैं उनकी सेनिटी के ऊपर में अभी पूरी पृथ्वी का अभी यह है भविष्य सो वेरी डेंजरस सुख भोग को मैक्सिमाइज करना है इस फिलॉसोफी को ले बैठे हैं ये लोग तो वी डू नॉट नो कि क्या होगा तो दैट इज वन मिसरप्रिटेशन भारत में ऐसा हुआ कि ऑन हाउ मच लेस अ मैन कैन लिव? तो ऐसा अपने को जीरो करते-करते अपना स्पिरिट को भी हमने मार दिया। सो आइडियल सिचुएशन इज व्हाट कि भोगों को मिनिमाइज करें किंतु स्पिरिट को मैक्सिमाइज करें। आपका जो साइंटिफिक अचीवमेंट है, लिटरेरी अचीवमेंट है, आर्ट्स है, कल्चर है ये सब आपकी जो अचीवमेंट्स है, दैट शुड बी मैक्सिमाइज्ड। उसमें कोई प्रश्न ही नहीं है।

प्रश्न: राष्ट्र-निर्माण में चीन कितना सफल है!

देखिए मैं हमेशा कहता हूं कि शुक्र मनाओ भगवान का कि चाइना क्रिकेट नहीं खेल रहा है। वे लोग ओलंपिक में जिस तरह से गोल्ड मेडल लेके आते हैं उनका और इंडिया का टेली देखेगा तो यदि ये लोग क्रिकेट खेलना शुरू कर दे तो अपनी क्या हालत होगी?

प्रश्न: ट्राइबल लडके बहुत अच्छी तरह से विद्याभ्यास करने में सक्षम हैं।

स्वामी जी का फेमस दो स्टेटमेंट के स्पिरिचुअलिटी डिनिटी ऑलरेडी मैनिफेस्टेशन ऑफ डििनिटी ऑलरेडी विद इन मैन एंड एजुकेशन इज मैनिफेस्टेशन ऑफ परफेक्शन ऑलरेडी विद इन मैन स्वामी जी कहते हैं ना नो बॉय नो मैन इज स्टेबुलर राजा दैट इज़ नो वन इज अ ब्लैंक स्लेट हम लोग संस्कार को लेकर के आए हैं तो संस्कार अच्छे बुरे हैं उसके साथ में डीएल करना है और बिय्ड द संस्कार जो डिनिटी है तो उसको हमको मैनिफेस्ट करना है सो बहुत बार अब अभी देखिए ना ये एआई का एजुकेशन में यूज़ इतना रेपिडली हो गया है। अभी ये जो ये हो रहा है व्हिच इज़ वेरी गुड एक्चुअली कि आपको इतना परफेक्ट टीचर सब समय नहीं मिलने वाले हैं। यदि आप ऐसा सोचेंगे ओनली परफेक्ट टीचर कैन प्रोड्यूस परफेक्ट स्टूडेंट। सो ये ये इस तरह का कॉम्बिनेशन रेयरली बनता है। अपने वो राधाकृष्णन है ये इस तरह के जो कुछ टीचर्स थे म विचार आर ग्रेटेस्ट ऑफ देम अब कितने स्टूडेंट का सद्भाग्य है कि इस तरह के टीचर मिलेंगे किंतु यहां पे आपके सामने एआई एट द एट योर फिंगर टिप एनी इंफॉर्मेशन यू वांट वो प्रोड्यूस करता है। सो अभी आजकल के एआई में ये लर्निंग मोड आ गया है कि इट विल टेक यू स्टेप बाय स्टेप टुवर्ड्स द सॉल्यूशन ऑफ प्रॉब्लम रेदर देन गिविंग यू द सॉल्यूशन इट विल एनकरेज यू टू थिंक योरसेल्फ थ्रू पज़ल्स एंड क्विज एटसेट्रा सो ऑलरेडी यदि यही आपको सिखा सकता है तो फिर क्या है इट्स नॉट लाइक दैट के अभी ज्योत से ज्योत जल सकती है पत्थर में से तो ज्योत नहीं जलेगी और एक ह्यूमन टीचर कैन यदि उसमें परफेक्शन है वो परफेक्शन देगा वो तो फिर फिर भी समझ आया एआई कैसे परफेक्शन दे सकता है? वो दे सकता है तभी दे सकता है जबकि मेरे भीतर में वो जो है ऑलरेडी ओम