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ओम स्थापा कौच धर्म रखना यत नमः श्री रामकृष्ण कथा कल हमने देखा था की किस तरह से विजयदशमी के दिन बंगाल में दुर्गा पूजा बहुत ही सुंदर रूप से धूमधाम तरीके से होती है शास्त्रीय विधि से उसका पालनपुर होता है और षष्ठी सप्तमी अष्टमी नवमी और विजयदशमी विजय के दिन मां का विसर्जन होता है तो विजयदशमी के दिन मास्टर महाशय ठाकुर का दर्शन करने के लिए दक्षिणेश्वर में आए तो ठाकुर ने पूछा की अभी तो सहज एक कुतूहल होता है की सृष्टि या तो सप्तमी से छुट्टी हो गया होगा मिनिमम यदि मास्टर महाशय तो स्कूल में है तो स्कूल में तो शायद थोड़ा लंबा वेकेशन होता होगा तो ठाकुर ने पूछा की क्या तुम्हारी पूजा की छुट्टी हो गई है तो मास्टर महाशय ने कहा विजय के दिन अर्थात विसर्जन का दिन है तो ठाकुर ने पूछा की क्या कर रहे थे तो कितने दिनों तक क्या किया तुमने तो मास्टर महाशय कहते हैं की मैं केशव सेन के वहां पे गया था केशव सेन के वहां पर रोज सुबह को मां दुर्गा की पूजा होती है और केशव सेन प्रवचन देते हैं मां के बड़े में मां का मां के जो गन है मां की कल्पना मां का वर्णन ये सब कुशल सिंह प्रवचन में कहते हैं तो मुझे बड़ा ही अच्छा लगा और उसमें तो ठाकुर कहते हैं क्या बात कर रहे हो बताओ मुझे की केशव ने क्या कहा तो मास्टर महाशय कहते हैं की केशव ने कहा की जैसे जिसने अपने दुर्गा मां दुर्गा की प्रतिमा अच्छी होगी तो पास में लक्ष्मी सरस्वती गणेश और कार्तिक यह कर प्रतिमाएं भी मां के साथ में रहती है तो केशव कहता है की यदि अपने हृदय में मां दुर्गा को विराजमान कर सको प्रतिष्ठित कर सको तो साथ ही लक्ष्मी अर्थात धन संपत्ति ऐश्वर्या जो सरस्वती अर्थात विद्या पंङिद्या चतुराई गणेश अर्थात सिद्धि और कार्तिक अर्थात विक्रम बाल ये चारों साथ में ही एम मिलेगा मां के ऊपर श्रद्धा हो तो यह चारों भी साथ-साथ अवेद्युत होते हैं अभी किसको आ विद्या लक्ष्मी विक्रम या तो फिर सिद्धि नहीं चाहिए ये तो सबको चाहिए तो ये जिसको जिसको चाहिए उसके लिए बड़ा ही आसन उपाय मां को अपने हृदय मंदिर में प्रतिष्ठित करो तो केशव सेन की यह व्याख्या आश्रम सनी और वो बड़े ही वो खुश हो गए अभी देखिए ठाकुर आगे क्या कहते हैं ठाकुर शक्ल विवरण सुनालें ओ माझे माझे के शाबर उपासना संबंधित प्रश्नों को राइट लगी लेने ठाकुर ने पूरा विवरण सुना और बीच-बीच में केशव की उपासना के बड़े में प्रश्न करने लगे आपको पूरा केशव की उपासना के बड़े में पूरा विवरण सुना और आखिर में कहा तुम इधर-उधर मत जो सिर्फ यहां पे आओ ये अभी देखिए की आश्चर्य की बात है की ठाकुर खुद जब कहते हैं की सरवत धर्म सर्व संप्रदाय या तो फिर सर्व साधनाएं सब तरह की साधनाएं एक ही ईश्वर की और यदि जाति है तो उनका शिष्य या तो उनका अनुयाई मास्टर महाशय वहां जाकर के दुर्गा पूजा की व्याख्या सुनते हैं या तो दुर्गा पूजा देखते हैं तो उनको क्या उसमें दिक्कत ए गई क्यों ठाकुर ऐसा कहते हैं की इधर-उधर मत जो सिर्फ यहां पे आओ ये क्या ठाकुर के ठाकुर क्या जैसे अन्य स्वामी जी के बड़े में है की स्वामी जी जब कश्मीर में थे तो एक तांत्रिक था वहां का लोकल उसका एक केला स्वामी जी के पास नियमित आने लगा तो ये तांत्रिक बड़ा ही नाराज हो गया उसने सोचा की मेरे केले को स्वामी जी चूड़ा के ले जा रहे हैं अभी इन लोगों का तो क्या है ना की साधना वगैरा तो कुछ होती नहीं है थोड़ा बहुत कुछ मंत्रम में सिद्धि प्राप्त कर ली होगी और कुछ केले बनाकर के बैठे हैं तो केले उनका जीवन निर्वाह करेंगे और अफीम चाहिए ना दूध चाहिए ना की मां से चाहिए ऐसा उनकी जो तांत्रिक विधि में जो कुछ भी चाहिए वो सब केले लोग सप्लाई करेंगे और ये लोग वो कहानी पे पड़े रहेंगे एक जगह पे तो अभी ऐसे चलो कोई स्वामी जी ने उठा लिया तो अभी यह तो बड़ा ही नाराज हो गया तांत्रिक उसने क्या किया की ऐसा कोई विधि किया ऐसा कोई मंत्र फूंक की स्वामी जी इतने ही बीमा हो गए इतने बीमा हो गए की उनको बेचारे को कश्मीर छोड़कर के कोलकाता चले आना पड़ा अभी स्वामी जी अब सोचिए की स्वामी जी ब्रह्मज्ञानी स्वयं जिन्होंने निर्विकल्प समाधि में अध्याय ब्रह्मा वास्तु प्राप्त की है मानव संस्कृति की मानव समाज की जो सर्वोच्च सिद्धि है एक मनुष्य के लिए सर्वोच्च सिद्धि निर्विकल्प समाधि उसमें वह स्थित हुए हैं अवतार वरिष्ठ आए श्री राम कृष्णा स्वयं जिनके गुरु थे जिनके आशीर्वाद प्राप्त है आध्या शक्ति जगदंबा स्वयं मां जननी होकर के उनको आशीर्वाद उनको रक्षा दे रही है उनकी रक्षा कर रही है तो ऐसी सिद्धि प्राप्त करने के बाद में दो टेक के तांत्रिक की वह किसी विद्या से उसके शराब से स्वामी जी को कश्मीर छोड़कर के भाग के चले आना पड़ा तो स्वामी जी जाकर के मां को जाते अपने कंप्लेंट करने के लिए मां एएमए के उखंडे का लिया हंसते हो लो हमने उनको लूज मोशन हो गया था तो लूज मोशन करते-करते उनको कश्मीर से भाग करके कलकत्ते चले आना पड़ा ऐसा करके स्वामी जी मां को कंप्लेन करते हैं तो मां कहती है बेटा शक्ति मानते हुए बेटा शक्ति को मानना पड़ेगा देखिए ये शक्ति अवतार के साथ में जो आध्या शक्ति आई है तो वो तांत्रिक जिसकी ना ही कोई आध्यात्मिक कोई सर्वश्रेष्ठ अनुभूति होगी ना ही उसका चरित्र का कोई ठिकाना होगा ना ही उसके मां के भीतर में मैत्री करुणा मोदित अपेक्षा या तो फिर सत्य अहिंसा असते परिग्रह इस तरह के कोई उच्च आदर्श स्थापित होंगे किंतु फिर भी जो साधना करता है तो साथ में शक्ति प्राप्त होती है और उसे शक्ति को सत्कारिया में भी वो लगा सकता है खूब कार्य में भी वह लगा सकता है शक्ति को मानना होगा तो जो भी है यहां पर भी देखिए की अब अब हमको प्रश्न होगा की ये तांत्रिक तो जिसका कुछ मैन चरित्र नहीं है इस तरह का तांत्रिक तो ईर्ष्या करेगा स्वाभाविक है की उसके केले को स्वामी जी ने चूड़ा लिया यहां अवतार वरिष्ठ है ठाकुर कहते हैं मास्टर महाशय को की तुम इधर उधर मत जाना तुम सिर्फ यहां पे आना तो उसे ठाकुर जब ऐसा कहेंगे क्या तो ये सही है क्या ठाकुर के लिए कहना ठाकुर भी क्या एक सामान्य सड़क की तरह इरशाद द्वेष से प्रवश हो जाते हैं जैसे वो योगानंद जी योगानंद जी देखते हैं की मास्टर ठाकुर तो दिन रात वो ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या वह सब बोलते रहते हैं त्याग तपस्या का उपदेश देते रहते हैं फिर एक दिन उनके रूम में सोए हुए थे देखा की ठाकुर नहीं है तो अभी एकदम सदली उनको की आदि रात को ठाकुर नहीं है इसका अर्थ क्या है तो उसका अर्थ तो एक ही हुआ ना की नौबत में मां के पास गए हैं तो वो इतनी बड़ी दुविधा में फैंस गए की अरे ठाकुर मुझे हमको कम कंचन त्याग का उपदेश देते हैं रात को मां के पास में नौबत में जाते हैं तो इधर बड़े ही यूटीवी ना हो करके नौबत के सामने जाकर के खड़े र गए और सोचा की ठाकुर जैसे ही उसमें से निकलेंगे नौबत में से मैं उनको पकड़ूंगा और पूछूंगा की महाशय दिन भर तो आप कामिनी कंचन त्याग का उपदेश देते रहते हैं रात को तो आप मां के पास जाते हैं यह क्या ठीक है आपके लिए उचित है सोच करके वहां पर खड़े थे देखा की जाओ ताला की और से ठाकुर ए रहे हैं अर्थात झाऊ ताला दक्षिणेश्वर गए होंगे तो देखा होगा की ठाकुर का कैमरा तो गंगा के किनारे ही है और गंगा के किनारे पूरा एक रास्ता है तो ग ठाकुर के घर से कमरे से थोड़ा सा निकलेंगे थोड़ी ही दूर पे 15-20 फुट के आसपास में ही मां का नौबत है जहां पे मां रहती थी और वहां से यदि आगे जाएंगे तो फिर पंचवटी है और उसके आगे जो ताला है जाओ ताला का अर्थ है झाऊ नमक वृक्ष का और वृक्ष के नीचे की जो जगह है उसको झाड़ू ताला कहते हैं ताला अर्थात थी उसके नीचे की जगह उसकी छाप उसकी छाव जहां पे पड़ती है वो जगह गंगा के किनारे है और उसे समय तो यह मॉडर्न प्लंबिंग नहीं था की कमरे के भीतर में वो टॉयलेट हो या बाथरूम हो रनिंग वाटर यह प्लंबिंग वगैरा कुछ नहीं था तो सोच के लिए बाहर में जाना पड़ता था किसी नदी के किनारे या तो किसी र्नीचंद जगह पे तो यह ताला नाम की जगह पे लोग सोच करने को जाते थे तो ठाकुर एक्चुअली गए थे और उनको आते हुए देख करके महाराज जी बड़े ही परेशान हो गए बड़े ही लज्जित हो गए सोचा की अरे मैंने तो खामखा ठाकुर के ऊपर में शक कर दिया संदेह कर दिया मुझे तो ऐसा नहीं करना चाहिए था वह ऐसा सोच रहे हैं और ठाकुर भी उसे समय ए गए तो उन्होंने ठाकुर भी अंतर्यामी है समझ लिया की योगेन महाराज के मां में यह संदेह प्रकट हुआ है तो उन्होंने कहा बेस बेस साधु के दीने-देखिएi रात्रि बहुत अच्छा बहुत अच्छा की तुमने यहां पर इस तरह से आकर के खड़े हो संदेह होने से संदेह के निवारण के लिए साधु को दिन में देखो साधु को रात में देखो साधु की बात पर विश्वास करो तो ठाकुर खुद कहते हैं की एक नहीं करते हैं तो ईश्वर की प्रताप नहीं होगी तो यही ठाकुर इतने बड़े-बड़े उपदेश देते हैं और यहां पर यह कैसे उनकी हरकत है यह किसी बात उन्होंने का दी अपने शिष्यों को बोल दिया की मेरे शिष्य हो तुमको इधर-उधर कहानी पे जान की जरूर नहीं सिर्फ मेरे पास में आना क्या ठाकुर ने अपने खुद के जो उपदेश है इसका कांट्रडिक्शन यहां पे कर रहे हैं ये हमको तो आश्चर्य होगा ये सुनकर के पढ़कर के तो देखिए की पहले तो ठाकुर खुद क्या कहते हैं इसके बड़े में ठाकुर कहते हैं जरा अंतरंगों तारा केवल है वो सिर्फ यही पे आएंगे दो तरह के शिष्य बहरंग और अंतरंग अंतरंग अर्थात की हमको पता है की बहुत सारे लोग ठाकुर के पास इसलिए आते थे की उनकी कोई दुविधा है उनकी कोई समस्या है उनकी कोई उनको कोई रोग है वो सब निपटाना के लिए वो सब उसका कुछ ये कर निराकरण निकालना के लिए वो ठाकुर के पास में आते थे किंतु जब ठाकुर को खुद को कैंसर हो गया तब देखा की ऐसे लोग सब चले गए ये सोच करके की अरे उनको खुद को कैंसर है खुद का वो निराकरण नहीं कर उसे खुद की कोई चिकित्सा नहीं कर का रहे तो फिर हमारे लिए क्या करेंगे छोड़ो इनको ये भी कोई ऐसे ही ढोंगी महात्मा निकले ऐसा बोलकर के ऐसे लोग चले गए किंतु जो लोग अंतरंग थे उन्होंने सोचा उनको तो ठाकुर के पास से सर्वप्रथम तो कुछ चाहिए नहीं और ऊपर से वो ठाकुर की सेवा करने के लिए बुद्ध परिचर हो गए कटिबंध हो गए की वो हम लोग ठाकुर की सेवा करेंगे ठाकुर की सेवा करने के लिए घर वगैरा सब कुछ त्याग करेंगे ऐसा करते हुए लोग ठाकुर के पास में आनी मिले अभी इन में भी देखिए की उसमें भी दो कैटिगरी थी अंतरंग में भी गुरु अस्त और त्यागी हमको पता है की पहले जनवरी को ठाकुर जब कल्पतरु हुए थे तो अंतरंग जितने भी गृहस्थ भक्ति थे सबको स्पर्श करके उनको किसी ना किसी तरह की आध्यात्मिक सिद्धि का उनको उपल्ब उनकी अनुभूति करवाई थी तो वह गृहस्ती शिष्य तो थे ही अंतरंग किंतु साथ में त्यागी अंतरंग शिष्य भी थे जो लोग ठाकुर के घर की साफ सफाई कर रहे थे और उन्होंने देखा भी सही की ठाकुर सबको आशीर्वाद दे रहे हैं किंतु फिर सभी आशीर्वाद लेने के लिए किसी भी तरह की आध्यात्मिक अनुभूति लेने के लिए नहीं गए उनको पता है की ठाकुर की सेवा ही सर्वश्रेष्ठ कर्तव्य है ये आध्यात्मिक अनुभूति भी उसके सामने कुछ नहीं है या तो फिर कहेंगे की साधना करके त्याग तपस्या करके जो अनुभूति होगी वो जीरोज आई होगी तो अंतरंग और अंतरंग में भी गृहस्ट और त्यागी तो जो भी है ठाकुर यहां पे लिख कहते हैं की जो अंतरंग है वो सिर्फ यही पे आएंगे वो भले चाहे गुरु हंसना हो ना की भले चाहे त्यागी हो नरेंद्र भवानात राखल एरा अमर अंतरंग नरेंद्र भावना रखा लिए सब मेरे अंतरंग है एरा सामान्य यह लोग सामान्य नहीं है तुम ही अबीर एक दिन खैयो तुम एक दिन इन लोगों को कुछ खिलाओ नरेंद्र अच्छा देखिए की अभी यहां पर यह प्रसंग समाप्त होता है की किंतु यह प्रश्न हमारे मां में हमेशा के लिए र जाएगा की ठाकुर यदि इतने उदार चरित्र होते इतने उदार हृदय होते तो फिर क्यों वो अपने शिष्यों को ऐसा का रहे हैं की तुम को सिर्फ मेरे ही पास में आना है स्वामी जी को देखिए बाद में जब ठाकुर की महासमाधि के बाद में वो वहां पर गए थे उन्होंने देखा की पहाड़ी बाबा को है योग आता है अभी है योग देखकर के उनकी उन्होंने सोचा स्वामी है की हाथियों करने से क्या है की बंगाली शरीर है उनका कठोर परिश्रम साधना वगैरा करना होगा और फिर कितना ही घूम घूम कर के उपदेश देना होगा वेदांत का प्रचार करना होगा सोए हुए भारत मां का पुनः पुनः जागृत करना होगा आज तो फिर 15 अगस्त है भारत का स्वतंत्र दिन तो असली स्वतंत्र तो हमको स्वामी जी दे दिया है असली स्वतंत्र तो हमको ठाकुर और मैन दिया है जब ये कल कुंडलिनी भारत की जब जागरूकता हुई तभी तो भारत अपनी इतने हजार साल की निद्रा से जागृत हुआ और पॉलीटिकल इकोनॉमिकल और इंडस्ट्रियल महासत्ता बने की और उसने कम बढ़ाया तो असली हमारे फ्रीडम फाइटर को हो ना की असली भारत देश के फाउंडर्स को वो तो ठाकुर स्वामी जी है बात-बात में जितने भी फ्रीडम फाइटर हुए उन्होंने तो ठाकुर ने जो कम ऑलरेडी मेंटल लेवल पर पॉइंट सब सुपर कॉन्शियस लेवल पर कर दिया था उसको फिर कॉन्शियस लेवल पर उसको अप्लाई ही करना था तो भारत का स्वतंत्र ये सब कुछ स्वामी जी को करना है पूरे विश्व में जाकर के वेदांत का प्रचार करना है तो शारीरिक ठीक नहीं रहेगा तो कैसे होगा ये सोच कर के स्वामी जी हाथियों की साधना करने के लिए उन्होंने पोहरी बाबा को बोला अभी पोहरी बाबा से साधना करने की ऐसा सोच रहे हैं एक दिन रात को सोए हुए थे देखा की उनके पास में ही ठाकुर आकर के मारे बड़े ही करूं चेहरे से उनके सामने देख रहा है तो स्वामी जी सोच रहे हैं की अरे क्यों ठाकुर इस समय आकर के मुझे इस तरह से क्या मेरे सामने क्यों देख रहे हैं कुछ बोल भी नहीं रहे अभी ऐसा पहले दिन रात को हुआ दूसरे दिन रात को भी हुआ तीसरी दिन रात को भी हुआ ठाकुर बार-बार जब स्वामी जी लेते हैं रात को वो आकर के उनके सामने खड़े र जाते हैं बड़े ही करोड़ दृष्टि से उनकी और देखते हैं उनको उनका निरीक्षण करते हैं अभी आखिर में स्वामी जी को पता चला की ठाकुर की इच्छा नहीं है की वो पोहरी बाबा से हथियारों की साधना करें तो फिर उन्होंने पोहरी बाबा को छोड़कर के उसे स्थान से गण किया वहां से चले गए तो देखिए बार-बार ऐसा हुआ है की अपने शिष्य यदि और कुछ अभी देखिए वेदांत तुल्यानंद जी महाराज हरि महाराज वेदांत की वेदांत की किताबें बहुत पढ़ने थे तो इसलिए फिर ठाकुर के पास आना उन्होंने बैंड कर दिया तो टूरियनंद जी के कोई एक मित्र है एक बार दक्षिणेश्वर आए तो ठाकुर ने उनको पूछा की क्यों वो लड़का भी नहीं ए रहा है हरि नाम था उनका और जब वो लड़के थे तब तो वो उनके मित्र ने कहा की महाशय अभी तो वो बहुत वेदांत चर्चा करता है शास्त्र पाठ करता है उसमें इतना डब गया है की अभी वो दक्षिणेश्वर आने के लिए उसके पास समय नहीं है ठाकुर ने सोचा अच्छा फिर उनके मित्र को कहा की उसको शांति करो की एक बार वो आकर के मुझे मिले तब अभी उनकी विनंती को स्वीकार करके हरि महाराज आए एक दिन उन्हें ठाकुर को दर्शन करने के लिए तो ठाकुर ने पूछा की अरे तुम ये तुम्हारा वेदांत है उसमें तुम क्या पढ़ने रहते हो ब्रह्मा सत्य जगत मिथ्या वही तो इसके अलावा तो इस सब किताबें में शास्त्र में और तो कुछ नहीं मा वाक्य ही तो हमारे ऊपर निषाद का सर है तो ये बात जैसे ही सनी हरि महाराज ने तो वैसे ही उन्होंने खुद कहा है की मेरे मां में ऐसी एक अद्भुत अनुभूति प्रकट हुई जैसे की मुझे लगा हो की मैंने शास्त्रों का सर पूरा ग्रहण कर लिया है और फिर यह सब बार-बार किताबें पढ़ना ये सब कोई कम का नहीं है उसकी बजे जीवंतरूषी जो है हमारे आधुनिक युग के उनके श्री चरणों के पास में बैठ करके उनका कथा अमरूद पहन करें और उसके अनुसाया त्याग तपस्या में जीवन जी ऐसा उनको मां में धरना दृढ़ हो गई और यह शास्त्र वगैरा जितनी भी पुस्तक थी उन्होंने गंगा में सब अर्पित कर दी तो देखिए ये ठाकुर बार-बार उनके शिष्यों को कहते हैं की सर्वप्रत जो अंतरंग है वो सिर्फ यहां पे आएंगे इधर उधर कहानी नहीं जाएंगे अभी ये प्रश्न का उत्तर की ठाकुर ऐसा क्यों कहते हैं तो हमको ऐसा कहना पड़ेगा अभी मैं तो अनुमान करके का रहा हूं की जिसका आखिरी जन्म है या तो फिर ठाकुर कहते हैं ना कलमीर दाल अर्थात की वो कमल की सब झाडे हैं पानी के भीतर में जेड सब एक हो गई है उसे जेड सब आपस में वो गन गई है और कमल अलग-अलग दिखते हैं उसकी जड़ उसके रूट सब एक हो गए हैं एकाकार हो गए एक कमल को खींचोगे तो सब के सब कमल नीचे चले आएंगे क्योंकि उनकी जेड सब एकत्रित हो गई है स्वामी जी ने कहा है की हम लोग शिवा अवतार में भगवान शिवा के स्थित है राम अवतार में हम उनके बंदर थे तो यह भगवान राम भगवान शिवा के साथ में बार-बार हम लोग पृथ्वी पर अवतरण करते रहे हैं जो अंतरंग है उनको मुक्ति नहीं चाहिए उनको चाहिए लीला का अश्वदन जैसे की ठाकुर ने देखा था की गौरांग महाप्रभु के दाल में उन्होंने बलराम बसु को देखा था जीसस के दाल में उन्होंने शरद महाराज और शशि महाराज को देखा था तो पहले जितनी भी बार अवतार आए हैं तो अवतार के संगी सांगोपांग पोस्टल अवतार के साथ में ही अवतार की लीला में सहायक होने के लिए बार-बार पृथ्वी पर जन्म ग्रहण किया हैं शरीर धरण किया हैं तो इसीलिए ठाकुर कहते हैं बाकी सब जिसको जहां पर जाना हो जो केशव सिंह के वहां पर जाकर के दुर्गा पूजा की व्याख्या सुनो जो करना है वो करो किंतु जो अंतरंग है वह सिर्फ मेरे ही पास आएंगे मेरे पास अर्थात की अवतार के पास क्योंकि अंतरंग शिष्यों का जन्म ही अवतार की लीला की पुष्टि के लिए हुआ है तो अवतार जब-जब भी नर्मदे हर धरण करेंगे तब तक ये उनके अंतरंग शिष्य उनके साथ में आएंगे उनकी लीला की पुष्टि करेंगे उनकी जो उपदेश है उसका प्रचार प्रसार करेंगे पूरे विश्व और समाज के लिए एक ज्योतिर्मय स्तंभ की तरह एक आदर्श प्रस्तुत करेंगे तो आज यही तक रखते हैं आज तो इंडिपेंडेंस दे है यहां पर भी छुट्टी है देखते हैं आज का दिन में क्या करूंगा कल फिर से मिलते हैं