प्रार्थना
ओम स्थापकायच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री श्री राम कृष्ण कथामृत दक्षिणेश्वर में श्री रामकृष्ण भक्तों के साथ में और ठन में सिद्धेश्वरी मंदिर में गमन 1883 14th दिसंबर पंचम परिच्छेद हमारा चल रहा था। हमने देखा कि यह जो कुछ चैप्टर्स हमने सिलेलेक्ट किए हैं कथामृत में से इसका वैशिष्ट्य क्या है? इसका एक स्पेशलिटी क्या है? कि मास्टर महाशय ठाकुर कहते हैं कि मन में, वन में और कोने में तपस्या करनी चाहिए। तो फिर गुरु आकर के कह देंगे ए अर्थात कि ऐसे ऐसे करके और आगे बढ़ा जाए। तो इसीलिए मास्टर महाशय रिट्रीट के लिए आए हैं दक्षिणेश्वर में और ठाकुर के साथ में रह रहे हैं। ठाकुर ने कहा कि वहां पर पंचवटी के नीचे में जो कुटिया है वहां पर रहना। वहां पर बहुत सारी तपस्या, भजन, कीर्तन बहुत कुछ हुआ है। वहां की जो तन मात्राएं हैं, वहां के वाइब्रेशन है, वह बड़े ही पावरफुल है। किंतु मास्टर महाशय कवित्व प्रिय है और वह नौबत का प्रथम फर्स्ट फ्लोर ग्राउंड फ्लोर पर जब मां शारदा देवी रह दक्षिणेश्वर में रहती थी तो वह ग्राउंड फ्लोर पर रहती थी। किंतु इस समय मां थी नहीं तो मास्टर महाशय ने नौबत का फर्स्ट फ्लोर सिलेलेक्ट किया था। रहने के लिए क्योंकि वहां से सुंदर यह गंगा नदी है। चांद का प्रकाश है। यह पेड़ पौधे हैं। यह बड़ा सुंदर दिखेगा वहां से फर्स्ट फ्लोर के ऊपर में से। किंतु वो उसी दिन रात को फिर मास्टर वो आएगा बाद में कि किस तरह से मास्टर महाशय को लगा कि नहीं ठाकुर की बात सही है। तो उन्होंने फिर नौबत छोड़कर के वो कुटिया की ओर आगे बढ़ रहे थे। तो वह सब प्रसंग आएंगे और हमने यह
श्री रामकृष्ण पुराणों की कथाएँ सुनते हैं
भी देखा कि किस तरह से ठाकुर के बारे में जैसे हमारा एक धारणा रहती है कि ठाकुर क्या करते हैं तो एक तो है बाह्य दशा अर्ध बाह्य दशा और अंतरर्दशा ठाकुर का कैसा रहेगा बाह्य दशा में भक्तों के साथ में वार्तालाप करेंगे अर्धबाह्य दशा में भजन कीर्तन करेंगे और अंतरर्दशा में समाधिस्थ हो जाएंगे तो इस तरह से ठाकुर कहते हैं कि चैतन्य देव की यह तीन तीन अवस्थाएं होती थी। तो उसी समय मास्टर महाशय भी कहते हैं कि ठाकुर की भी तो यही तीन अवस्थाएं होती है। यानी कि क्या ठाकुर चैतन्य देव की तरह ही अवतार है क्या? इस तरह से मास्टर महाशय पूछते हैं किंतु साथ में ही जैसे कि हम सभी के साथ में होता है कि समय है और तपस्या करने की ऐसी कोई इच्छा नहीं है तो कोई सत कार्य में किस तरह से समय को बिताए तो फिर वह है सत ग्रंथ का पाठ करके तो यहां पर भी ठाकुर वही करते हैं रेयरली जो हमको कथामृत के भीतर में देखने को मिलता है ठाकुर अकेले ही बैठे हैं और वैसे किसी भक्तों के साथ में वार्तालाप नहीं कर रहे हैं। तो फिर यह रामलाल दादा है ठाकुर के भतीजे नेफ्यू उसको ठाकुर कहते हैं कि अच्छा यह भक्तमाल है या वगैरह इस तरह से जो ग्रंथ है उसमें से यह कहानियों का पाठ करो। तो फिर हमने देखा कि किस तरह से राजा जयमल की कहानी का पाठ हुआ। परशुराम चरित का पाठ हुआ। गुहक चरित का पाठ हुआ। तो यह पूरा हमने देखा कि एक यूनिक पर्सपेक्टिव, एक यूनिक विंडो ठाकुर के जीवन में हमको देखने को मिलता है। तो वह एक पूरा हमारा डिस्कशन हुआ और उसके बाद में यह पंचम परिच्छेद चार परिच्छेद है इस चैप्टर के वो हमने समाप्त कर लिए हैं। पंचम परिच्छेद यानी कि फिफ्थ यह जो यह है अह पैराग्राफ परिच्छेद को पैराग्राफ नहीं कहेंगे परिच्छेद ही कहेंगे। तो यह जो फिफ्थ टॉपिक जो है इस चैप्टर का उसमें हमने आधा पढ़ लिया है। यह गुहक संवाद हमने पढ़ लिया है। गुहक चंडाल की कहानी हमने पढ़ ली है। और इसके बाद में फिर आहार के बाद में ठाकुर थोड़ा सा विश्राम कर रहे थे। और उस समय मास्टर महाशय उनके साथ में बैठे हुए थे। उस समय श्याम डॉक्टर और कुछ भक्त आकर के उपस्थित हुए। अच्छा यह जो शुरू के जो
श्री रामकृष्ण और कर्म
दो-तीन प्रश्न है प्रथम प्रश्न तो कर्म के बारे में जब वार्तालाप होने लगा तो ठाकुर ने कहा कि कर्म जो नियमित रूप से करना है ऐसा नहीं है। एक बार यदि ईश्वर लाभ होता है तो कर्म अपने आप चले जाते हैं। यहां पे कर्म का जो अर्थ विदिन दिस पैराग्राफ़ किस तरह से हम कर सकते हैं उसके बारे में भी हमने डिस्कस किया था। कर्म को यहां पर धर्म के रूप में या तो फिर ऑब्लिगेशन के रूप में लेना चाहिए और यदि ईश्वर लाभ होता है तो जगत के जितने भी ऑब्लिगेशंस हैं वह सब चले जाएंगे। देखिए कि जब तक हम इंद्रियों के विषयों का भोग कर रहे हैं, जब तक हमारा मन काम कांचन में आसक्त है, तब तक हमको हमारे ऑब्लिगेशंस को हमारी यह जो ऋण है, उसको निभाना होगा। यह मातृ ऋण, पितृ ऋण, देव ऋण, ऋषि ऋण, ये राज जो जिस समाज में हम रह रहे हैं। समाज के जो एक नागरिक होने के नाते समाज की उन्नति के लिए हमको जो कंट्रीब्यूशन करना है, यह सब हमारे ऊपर में ऑब्लिगेशन है। जब तक कामकांचन में अपना मन है, तब तक सभी ऑब्लिगेशन का पालन करना होगा। यह एक कॉस्मिक यज्ञ है। एक वैश्विक यज्ञ एक हाथ से लीजिए, दूसरे हाथ से दीजिए। एक हाथ से आप विषयों के भोगों को भोगिए तो फिर दूसरे हाथ से आपको अपना ऋण चुकते करना होगा। आपको अपना धर्म निभाना होगा। तो यह एक कांसेप्ट हो गया। किंतु यदि यह जो धर्म, अर्थ, काम यह तीन जो यदि एक साथ रहते हैं तो यदि आप मोक्ष मार्ग की ओर जाना शुरू करेंगे तो ना ही आपका अर्थ और काम से मुक्त होकर के आप मोक्ष मार्ग की ओर जाएंगे तो फिर धर्म भी चला जाएगा। धर्म अर्थात कि जितने भी ऑब्लिगेशन है ऋण है चले जाएंगे। तो सिंपल फार्मूला है। जब तक मन विषय में आसक्त है तब तक हमको अपने ऑब्लिगेशंस को निभाना है। जैसे ही मन विषय से विमुख हो गया वैसे ही सब तरह के ऑब्लिगेशन से हमारी मुक्ति हो गई। हम मोक्ष मार्ग पर चलने के लिए एलिजिबल हो गए या तो फिर अधिकृत हो गए। तो यह पूरी हमने यह डिस्कशन ऑलरेडी किया था। इसके बाद में एक भक्त ने प्रश्न किया कि अच्छा पैसों के लिए तो सभी लोग प्रयास करते हैं। केशवसेन को भी देखा कि वह पैसों के लिए अपनी लड़की का विवाह एक राजा के साथ में करवा दिया। अच्छा अभी इसके पीछे में क्या कहानी है वह भी देखा कि ब्राह्म समाज में यह जो एज ऑफ कंसेंट अर्थात कि मिनिमम एज ऑफ मैरिज वह सब ठीक की गई थी। उससे कम उम्र में लड़की का विवाह देकर के ब्राह्म समाज के नेता होने के नाते बहुत सारे लोग केशव सेन को निंदा कर रहे थे। तो उसी समय ठाकुर ने कहा कि देखो केशव की तो अलग बात है। जो ठीक-ठीक राजा का बेटा है उसको किसी की चापलूसी करके या तो फिर कोई घृणित कार्य करके या तो फिर अपना अपमान सहन करके कोई पैसा कमाने की जरूरत नहीं है। राजा का बेटा उसको वैसे ही पेंशन मिलता है। मुशोहारा पाए तो मासिक मंथली स्टाइपेंड व्हाटएवर वो उसको मिलता है। तो इसका अर्थ यह है कि यदि ईश्वर पे आपकी ठीक-ठीक भक्ति है तो फिर यह जो छोटे-छोटे जो रूल्स एंड रेगुलेशंस है समाज के वह सब आपको बंधन में नहीं डालते हैं। तो यह एक डिस्कशन हुआ। इसके बाद में एक प्रश्न एक भक्त करता है। वहां पर आकर के हम लोग रुके थे। तो क्या है वह प्रश्न? एक भक्त पूछता है आज्ञा
एक भक्त का प्रश्न: हम गृहस्थों को इस संसार में कैसे रहना चाहिए? -- बीच बीच में संसार से दूर होकर ईश्वर के चिंतन में लगना चाहिए
संसारे की रोकम कोरे थाकते होवे। अच्छा जी संसार में किस तरह से रह सकते हैं? किस तरह से रहना होगा? तो श्री रामकृष्ण उत्तर देते हैं पाकाल माछेर मतो थाकबे अर्थात कि जो कादव में जो मछली रहती है उस तरह से रहना है संसार थेके तफाते गिए निर्जने ईश्वर चिंता माझे माझे करे कर ले ताते भक्ति जन्मे संसार से दूर होकर के निर्जन में यदि ईश्वर चिंता बीच-बीच में करने से ईश्वर के ऊपर में भक्ति का जन्म होता है। अच्छा यह पांकाल मां के माछर जो उदाहरण दिया इस तरह की मछली जो कादव में रहेगी भी सही और कादव उसको कीचड़ जो है वह उसको स्पर्श भी नहीं करेगा। तो इस तरह से फिर संसार में रहकर के बीच-बीच में निर्जन में जाकर के ईश्वर का नाम गुणगान कीर्तन करना है। तो निर्लिप्त होए थकते पारबे उस समय आप निर्लिप्त होकर के रह सकते हैं। पाक आ पाके भीतर थकते हुए तब गाय पाक लागे ना कीचड़ है कीचड़ के भीतर में रहना होता है। फिर भी देह पे शरीर पर कीचड़ स्पर्श भी नहीं करेगा। से लोग अनासक्त होए संसार थाके इस तरह के लोग अनासक्त होकर के संसार में रहते हैं। देखिए एक बड़ा ही सुंदर बड़े ही कम शब्दों में अल्प शब्दों में ठाकुर ने गृहस्थ का क्या कर्तव्य होता है वह बता दिया है कि किस तरह से संसार में तो रहना है किंतु साथ-साथ में ही बीच-बीच में निर्जन में चले जाकर के ईश्वर को पुकारना है। आज की लैंग्वेज में कहे तो यह रिट्रीट और इसीलिए यह देखिए कि रिट्रीट वाला जो कांसेप्ट है ठाकुर इसको काफी बार दोहराते हैं और इसीलिए हमने यह थीम इसको चुना है माने यह चैप्टर जो है दो-तीन वो पूरे इसी थीम के ऊपर में है कि मास्टर महाशय स्वयं वहां पर रिट्रीट के लिए गए हैं। तो क्या है कि यदि बीच-बीच में अपने मन को यह सब सांसारिक चिंताओं से ऊपर उठा ले तो क्या है कि आपका मन शांत हो जाएगा। फिर से आप उसको संसार में लगा सकते हैं। मैंने वह जो मेरे एक मित्र का उदाहरण दिया था कि मित्र तो नहीं। वो मैं जब रांची में था तो वह लड़का मेरे पास में आता था। उसके ऊपर में यह आक्षेप लगाया गया था कि उसने मोबाइल चोरी किया है। उसके मित्रों ने उसके ऊपर में यह आक्षेप लगाया था। तो अभी क्या है कि वो छोटी सी उम्र में इस तरह से सर के ऊपर में आ जाने से वह डिस्टर्ब हो जाता है। तो मैं वह आश्रम में आया था। मैं वहां पर टहल रहा था। तो मेरे साथ में कुछ वार्तालाप हुआ। तब से वह रेगुलर आता था मेरे पास में। तो अच्छा काफी इंटेलिजेंट था। एमएससी वह एमसीए ना कि ऐसा कुछ कर रहा था। मास्टर इन कंप्यूटर एप्लीकेशन तो जो भी है तो ये सब क्राइसिस आती है सबके जीवन में तो आकर के मुझे बार-बार पूछेगा कि अच्छा आप मेरा सॉल्यूशन ला दीजिए इसका मैं क्या करूं मैं उसको हमेशा कहता था कि देखो तुम्हारी कॉलेज में आकर के तुम्हारे दोस्तों को तो मैं मनाने ही वाला हूं कि हां भाई इसको छोड़ दो इसके ऊपर में यह आक्षेप मत लगाओ इसकी गलती हो गई तो यह क्षमा मांग रहा है फिर से उसके साथ में मित्रता कर दो ऐसा तो मैं नहीं करने वाला हूं तुम्हारी कॉलेज में जाकर के तुम्हारे मित्रों के साथ में बात करना या तो सुलह करवाना कंप्रोमाइज करवा देना तुम लोगों के बीच में यदि तुम यहां पे आश्रम में आते हो मेरे पास में बात मेरे साथ में वार्तालाप करते हो थोड़ा सा लाइब्रेरी में जाकर के मैं जो किताबें सजेस्ट करता हूं पढ़ो मंदिर में बैठकर के थोड़ा सा ठाकुर के सामने देख के ठाकुर को प्रार्थना करो और फिर यहां पे जो एक्टिविटी होती है थोड़ा सा कंट्रीब्यूशन करो यह सब करने से होगा क्या कि तुम्हारा मन जो है सतत एक इनफाइनाइट लूप में बैठ गया है कि अभी यह मेरे लोग यह लोग मुझे ऐसा कह रहे हैं। यह मेरे साथ में बात नहीं कर रहा। यह मेरा दुश्मन बन के बैठा है। मेरे कितने पुराने-पुराने मित्र थे। वह मेरे अभी शत्रु हो गए हैं। तो यह जो कंटीन्यूअस जो तुम्हारे मन में एक इनफाइनाइट लुक चल रहा है, वह टूट जाएगा। कुछ क्षण के लिए ठाकुर की यह जो पवित्र वाणी, ठाकुर का जो पवित्र दर्शन, ठाकुर का यह जो पवित्र विचार तुम्हारे मन में जाएगा और तुम्हारा मन शांत होगा। तो जब मन शांत होगा तो उस शांत मन से अपने को स्ट्रांग बना करके तुम्हारा विल पावर स्ट्रांग बना करके फिर से जगत में तुम युद्ध करना। क्योंकि यह तो शुरुआत ही मात्र है। अभी तो तुम कॉलेज के लड़के हो। आज तुम्हारे साथ में ऐसा हुआ कल शादी होगी परिवार होगा जॉब करनी पड़ेगी यहां से ट्रांसफर होगी वहां से हो सकता है कोई फायर कर दे तुमको बिजनेस यदि करोगे तो लॉस भी हो सकता है नॉट नेसेसरी कि सब समय प्रॉफिट हो तो ये तो लाइफ टाइम चैलेंज का प्रथम चैलेंज तुम फेस कर रहे हो आज तो उसी में तुम यदि मेरे पर भरोसा करके बैठोगे कि एक साधु उसका समाधान ला दे तो भविष्य में तुम अपने जीवन के साथ में क्या करोगे हर छोटी-छोटी समस्या में क्या तुम मेरे पर मेरे पास में दौड़ के आओगे कि अभी आप कुछ जादू चमत्कार कर दीजिए। लोगों के मन में साधुओं के बारे में यह धारणा भी ऐसी होती है कि ऐसा इन लोगों के पास में कोई मंत्र है, कुछ जादू चमत्कार की शक्ति है, कोई विधि है, कोई अंगूठी पहना देंगे, कुछ ग्रह नक्षत्र का कुछ कर देंगे तो हमारा काम बन जाएगा। ऐसी धारणा से भी कोई कोई आते हैं। तो मैं कहता था कि देखो रामकृष्ण मिशन में इस तरह से कुछ होता नहीं है। यदि तुम इस तरह से कुछ करवाना चाहते हो तो दूसरी हजार जगह है। तुम वहां पर जाओ फेंको पैसा तुम अपना। देखो कि क्या होता है। हो सकता है सॉल्यूशन आ जाए। यह सब चीजें कोई गलत तो है नहीं। हमने राजयोग में देखा। स्वामी जी ने तो स्पष्ट कहा कि यह तो प्राण का विज्ञान है। जितना भी मटेरियल है इस जगत में मैटर जिसको कहते हैं वह सब आकाश में से प्रकट हुआ है। और जितनी भी एनर्जी और जितनी भी फोर्सेस है वह सब प्राण में से प्रकट हुई है। तो यह जो कॉस्मिक प्राण है कॉस्मिक एनर्जी या कॉस्मिक फोर्स इसको हम यदि प्राणायाम का अभ्यास करें तो हम इस कॉस्मिक प्राण को नियमन कर सकते हैं। कंट्रोल कर सकते हैं और इससे हमारे पास में जादुई शक्तियां प्रकट होगी। सो यह सब तो किया हमने डिस्कशन तो गलत है ऐसा तो है नहीं। एक समय था कि मेरा जो नास्तिक भाव था सेुलर भाव तो यह सब चीजों को मैं बिल्कुल हंस के उड़ा देता था। अभी ऐसा नहीं करता हूं। ठाकुर का कथामृत जब पहली पहली बार पढ़ना शुरू किया और देखा कि यह ठाकुर टिकटिकी परजन तो मैनेज है। अर्थात कि यह जो दीवाल पर वो जो चलने वाली वो जो होती है ना तो क्या कहेंगे उसको वो भी नजर के सामने आ जाए तो उसके भी क्या शुकन अपशुकन है वो भी ठाकुर मानते हैं। तो क्या है कि उस समय मुझे आश्चर्य होता था कि हालांकि हिंदू धर्म क्योंकि इतना तो मुझे अंदाज हो गया था स्वामी जी को पढ़कर के वेदांत इज वन ऑफ द मोस्ट रैशनलिस्टिक मोस्ट साइंटिफिक और ऑल ऑफ ऑल द फिलॉसोफीस जितनी भी फिलॉसोफीस है उसमें सबसे ज्यादा रैशनलिस्टिक और साइंटिफिक वेदांत ही है। योग और वेदांत। इतना तो मुझे पहले से ही समझ में आ गया था। तो फिर ठाकुर इतने अंधश्रद्धालु क्यों है? वह समझ में नहीं आता था। सही में इवन स्वामी जी भी कहते हैं कि ये जो मेरा रैशनलिस्टिक मेरा था आउटलुक इसका परिणाम यह आया कि जो सबसे ज्यादा मूर्ति पूजक थे जो सब तरह की बातों में विश्वास करते थे उनके चरण तले पर बैठकर के उनके श्री चरण के सामने बैठकर के मुझे आध्यात्मिक शिक्षा लेनी पड़ी है। तो यह जितने भी रेशनलिस्टिक लोग हैं उनके अहंकार पर जैसे कि हथौड़ा मारने के लिए ठाकुर एक निरक्षर ब्राह्मण का देह धारण करके इस बार आए थे। तो जो भी है लोग यदि हमारे पास में से इस तरह की अपेक्षा रखते हैं तो वो रखेंगे क्योंकि यह बातें गलत नहीं है। किंतु एटलीस्ट एज ऑफ टुडे रामकृष्ण मिशन का जो कैरेक्टरिस्टिक है हम लोगों का जो मानना है कि मन को मजबूत करने से अपने विल पावर को स्ट्रेंथन करने से आप सब तरह की समस्या पे विजय प्राप्त कर सकते हैं। बस चाहिए विल पावर और यह जो विल पावर या तो फिर यह शक्ति इसका तात्पर्य क्या है? जैसे कि हमने अभी दो-तीन दिन पहले भी डिस्कस किया था कि व्हाट इज द मीनिंग ऑफ मैनिफेस्टेशन ऑफ दैट डिविनिटी विदिन। यह जो स्ट्रेंथ है उपनिषद्स आर माइन ऑफ स्ट्रेंथ। उपनिषद है महाशक्ति की खान। महाशक्ति का भंडार। इसमें से आप जितनी शक्ति निकालना चाहे वह निकाल करके अपने जीवन में उसको मैनिफेस्ट कर सकते हैं। तो फिर इसका अर्थ क्या है कि अर्जुन की तरह वह जब कुरुक्षेत्र में जाए और वह गांडीव लेकर के अपने शत्रुओं का संहार करने के लिए जो शक्ति चाहिए क्या उपनिषद में इस तरह की शक्ति मिलती है? वह भी मिलती है। मना नहीं करते। किंतु जो स्पेसिफिक जो स्पेसिफिक टाइप का जो एप्लीकेशन है उपनिषद की शक्तियों का वो है हमारे भीतर में जो संशय राक्षस और यह विषय वासनाएं ये जो दो भयानक हत्यारे दो भयानक राक्षस दैत्य हमारे भीतर में है उनका संहार करने के लिए विल पावर चाहिए तपस्या चाहिए पवित्रता चाहिए दृढ़ संकल्प शक्ति चाहिए उसके लिए जो शक्ति है वो शक्ति हमको उपनिषद से मिलती है तो यहां पर ठाकुर यही कहते हैं कि देखिए कि संसार का अर्थ क्या है? तो यह धर्म, अर्थ, काम इन तीन का चक्र जिस जितने दिन तक हम अर्थ और काम का भोग करेंगे तब तक हमको धर्म करना होगा। संसार के जितने भी ऑब्लिगेशंस है पत्नी के प्रति पुत्र के प्रति प्रति के पति के प्रति के पछी मां-बाप है राजा है शासन है फिर यह जो सोसाइटी है इन सबके प्रति अपना जो कर्तव्य है वह पालन करना ही होगा आप यह कहेंगे कि मैं भोग भी भोगूंगा विषय के रसों का आनंद भी करूंगा और सामने किसी भी तरह के ऑब्लिगेशन में मैं बद्ध नहीं होऊंगा तो नहीं चलेगा। यदि सरहद पे भारत का तो बड़ा फॉर्चूनेट है हम लोग कि 150 करोड़ का यह पॉपुलेशन है। वरना यह जो छोटे-छोटे देश होते हैं जैसे इजराइल वगैरह वहां पे मिलिट्री ड्यूटी कंपलसरी होती है। तो क्योंकि क्या है कि जनसंख्या कम है। तो जब भी शत्रुओं का आक्रमण होता है तो आपको बड़ा हैवी मिलिट्री चाहिए। तो सभी को कंपलसरी वो दो-ती साल का मिलिट्री ड्यूटी करना पड़ता है। और जब भी यह सरहद पर युद्ध हो या कोई भी क्राइसिस हो तो गवर्नमेंट के पास में राइट है कि आपको रिकॉल करने का। आपने वो कॉलेज के दिनों में या तो युवावस्था में दो-ती साल जो आपका ऑब्लिगेटरी मिलिट्री ड्यूटी है वह कर लिया। इसके बाद में आप चलो संसार करते हैं, नौकरी करते हैं, बिजनेस करते हैं, व्हाटएवर। किंतु जैसे ही युद्ध शुरू हुआ वह गवर्नमेंट का बुलावा आएगा कि आप अपने यूनिट में रिपोर्टिंग कीजिए। तो आपको रिपोर्टिंग करना पड़ेगा और यदि नहीं करेंगे तो डेजर्टर यानी कि आर्मी छोड़ के भागे हुए हैं। ऐसा वारंट निकलेगा आपके नाम पे और वह मिलिट्री पुलिस आकर के पकड़ करके जेल में बिठा देगी। तो क्या है कि छोटे देशों में तो यह बड़ा स्पष्ट है। यदि आप देश का संविधान है। देश की कानून व्यवस्था है। देश की ये जो इकोनॉमी है, इन सब से आप प्रॉफिट करते हैं। इन सब का आप यदि उपभोग करते हैं, तो देश की रक्षा करने के लिए शस्त्र उठा के, शस्त्र उठा के शत्रुओं का संहार करना पड़ेगा। आर्मी में आपको आकर के वह फाइट करनी ही पड़ेगी। देयर इज नो अदर वे। भारत में हम लोग बड़े सुखी हैं। इतनी बड़ी पॉपुलेशन है तो अपनी वंटियर आर्मी है। यह ड्राफ्ट आर्मी नहीं है। अपनी वॉलंटियर आर्मी है। तो देखिए कि भारत में वह सब चिंताएं नहीं है कि आप सरहद पर युद्ध होगा तो हमको अपना बिजनेस है। घर परिवार छोड़कर के सरहद पर जाना होगा। क्योंकि भारत में यह जो वंटियर आर्मी है इतनी बड़ी है कि वह सब तरह के शत्रुओं का मुकाबला कर सकती है। किंतु फिर भी चलो वो ऑब्लिगेशन नहीं है। किंतु फिर ये जो देखिए कि ये हमारी ये जो डेमोक्रेसी है ये जो हमारी ये जो गवर्नमेंट ये जो हमारी पब्लिक सर्विसेज है वो सबको तो ठीक-ठीक चलाए रखने के लिए हम लोगों को अलर्ट रहना पड़ेगा। अच्छे लोगों को इक्ट करना पड़ेगा। और फिर स्वामी जी का तो शिव ज्ञान जीव सेवा यदि गरीब लोगों को देखते हैं भूखे नंगों को देखते हैं तो गवर्नमेंट को कोसते हुए बैठ के तो काम चलेगा नहीं अपने को ही तो थोड़ा सा इनिशिएटिव लेकर के थोड़ा बहुत सबको सहाय करनी पड़ेगी। वह जो कोरोना के समय में जब बिजनेस वगैरह बंद हो गया था तो कैसा हमको कहा गया था कि आपके आसपास में पड़ोस में यदि लोगों को खाने के लिए यदि उपाय नहीं होता है तो आप लोग उनको खाना खिलाइएगा। तो स्वामी जी ने वो माय प्लान ऑफ कैंपेन में भी कहा कि यह जो वंडरफुल चैरिटेबल रेस ये जो भारतीय हैं वो इतने चैरिटेबल है इतने बड़े दाता है ये जो दाता कर्ण का जो डीएनए हम सबके भीतर में है इस तरह से दाता कर्ण का लहू हम सबके भीतर में है तो हम लोग जो चैरिटी करते हैं दान देते हैं उस दान को चलो इसको कोई पॉजिटिव डायरेक्शन में इसको कलेक्टिव पॉजिटिव डायरेक्शन में फोकस किया जाए आत्मनो मोक्षार्थम जगत हिताय च का व्रत धारण किया जाए तो देखिए कि यह पूरा साइकिल है। यदि आप संसार में रहते हैं धर्म अर्थ और काम का भोग करते हैं तो धर्म को आपको निभाना ही पड़ेगा। आपके ऑब्लिगेशंस को निभाना ही पड़ेगा। और इस ऑब्लिगेशन को निभाने के लिए आपको जो शक्ति चाहिए भीतर से उस शक्ति को रिचार्ज करने के लिए बीच-बीच में एकांत में जाकर के तपस्या करनी है। यह रिट्रीट है या तो फिर यह कोई भी आश्रम में मैं तो यहां पर देखता हूं या विशाखापट्टनम में भी देखता हूं। राजकोट में भी देखा था। कुछ-कुछ डिवोटी है एवरीडे विदाउट मिसिंग कि वह संध्या आरती में आएंगे ही आएंगे। अभी हो सकता है कि सभी के पास में यह मौका ना हो। आज का युग जिस तरह का है। तो खैर अभी ऑनलाइन भी बहुत कुछ अवेलेबल है। ऑनलाइन लाइव टेलीकास्ट होता है। बेलूर मठ की आरती का एक समय होता था। अभी मुझे पता नहीं इस बार होता है कि नहीं। राजकोट की आरती का होता है। यह मुझे पता है। अगेन यह अभी रिसेंट मुझे पता नहीं यहां पर आने के बाद में पता नहीं कि हो रहा है कि नहीं। किंतु कोई भी सेंटर अभी यह देखिए सोमनाथ है, द्वारकाना है। यह इवन जो अपने यह जो बड़े-बड़े तीर्थक्षेत्र है बहुत सारी आरती लाइव टेलीकास्ट होती है। तो देखिए कि अभी हमारे पास में शारीरिक यदि फिजिकली जाने का यदि यह नहीं होता है पॉसिबिलिटी तो यह ऑनलाइन तो बहुत कुछ अवेलेबल है तो कैसे ना कैसे करके कुछ समय के लिए अपने मन को ईश्वर चिंता में धावित कीजिए ईश्वर चिंता में लगाइए ईश्वर रस का आस्वादन कीजिए तो यह विषय रस है वह आपको निरस लगने लगेगा वह आपको फीका लगने लगेगा। तो इस तरह से यह जो ठाकुर यहां पर कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि संसार छोड़कर के चले जाना है क्योंकि मोक्ष मार्ग जो है वह बड़ा कठिन मार्ग है। विषय वासनाओं से आपको अपने मन को रिहा करना होगा। विषय वासनाओं से आपको अपने मन को संपूर्ण रूप से अलग कर देना होगा। जो कि सबके बस की बात नहीं है तो ठीक है। अर्थ, काम और धर्म यह तीनों का एक साथ में पालन कीजिए। और धर्म कौन सा? तो आत्मन मोक्षार्थम जगत हिताय च। आप अपने आत्मा के मोक्ष के लिए प्रयास भी करते रहिए। इस अर्थ में कि चलिए जितना भी हो सके हम जो असहाय है उनको सहाय करेंगे। आश्रम में जाकर के वलंटियर करेंगे और वंटियर वर्क करेंगे। कहीं पर भी जिस तरह से भी हो अपना सेटअप कर लेना है। कैसे भी करके लोगों को हेल्प करना है। बस इतना ही है। बहुत सारे लोगों से मैं ऐसा सुनता हूं। एक लॉयर के पास में मैंने सुना था। वो रिटायर हो चुकी थी। काफी बड़ी उनकी उम्र थी। 80 साल ना कि ऐसी किसी वजह कारण की वजह से मुझे उनके साथ में उनके वहां पर जाकर बात करना पड़ा था। किसी कारण की वजह से तो वह मुझे कहती है कि देखिए मेरा तो ऐसा है कि मैं सब जो जितने भी अभी यह गरीब लोग होते हैं उनको मैं सहाय करती हूं मुकदमा लड़ने के लिए। मैं खुद कोर्ट में नहीं जा पाती किंतु मेरा जो नॉलेज है जितना भी वो नॉलेज काफी एक्सटेंसिव है। तो मैं उनको इस तरह से कंसल्ट करती हूं। फ्री में उनको मैं समझाती हूं कैसे क्या करना चाहिए। तो आपका जो क्षेत्र है जो भी है कैसे भी है करके वह अपना एक कंट्रीब्यूशन कीजिए। तो इसलिए यहां पे ठाकुर कहते हैं पाकाल माछेर मतो थाकवे कीचड़ में जो मछली रहती है उस तरह से रहिए संसार से दूर होकर के निर्जन में ईश्वर चिंता बीच-बीच में करने से ईश्वर के ऊपर में भक्ति का जन्म होगा। उस समय निर्लिप्त होकर के आप रह पाएंगे। कीचड़ में है किंतु कीचड़ देह के ऊपर में लगता नहीं है। से लोग अनासक्त होए संसारे थाके इस तरह के लोग अनासक्त होकर के संसार में रहते हैं। ये जो कीचड़ और यह अनासक्त से वो नाग महाशय की बात याद आती है तो नाग महाशय को उनके पिताजी ने कहा था कि ये धर्म धर्म ये जो सब कर रहे हो आखिर में क्या करोगे नटो होए बैंक खावे ना कि म नंगे होकर के यह मेंढक खाओगे क्या तो जैसे ही पिताजी ने ऐसा कहा वैसे ही नाग महाशय ने सब वस्त्र निकाल दिए दिगंबर हो गए और वहीं से वह जो एक मेंढक जा रहा था उसको पकड़ करके खाना शुरू कर दिए कहा कि देखिए आपकी इच्छा मैंने पूरी कर दी है। बस अभी आप मेरे पीछे में मत लगिए। जो ठाकुर के ऊपर में मेरी श्रद्धा है उसको बने रहने दीजिए। तो थे देखिए कि नाग महाशय संसार में भी थे। स्वामी जी की एक रेमिनेशंस में है। स्वामी जी वहां पर गए थे। देवभाग ने कि कहां पे है? वो जहां पर वो नाग महाशय का वो जन्म स्थान है। तो उस समय उनकी पत्नी ने नाग महाशय की पत्नी उस समय जीवित थी। तो इतनी जतन करके स्वामी जी के लिए इतना सुंदर सब खाना वगैरह बनाया स्वादिष्ट खाना स्वामी जी कहते हैं खाकर के मैं बढ़िया मजे से सो गया इतना मुझे अच्छा लगा फिर वो नाग महाशय की शायद उस समय नाग महाशय का देहांत हो चुका था तो नाग महाशय की पत्नी ने स्वामी जी को एक वस्त्र भेंट में दिया तो स्वामी जी कहते हैं पगड़ी की तरह मैंने उस वस्त्र को अपने सर पर बांध दिया तो देखिए कि स्वामी जी खुद उनके घर जाकर के उनकी पत्नी का जो बनाया हुआ खाना है वह खाकर के बड़े तृप्त हुए थे। तो इस तरह से संसार में रह सकते हैं। वही है कि बीच-बीच में आपको थोड़ा सा निर्जन में जाकर के ईश्वर चिंता करनी होगी। अपने मन को फर्टिफाई कर लेना पड़ेगा। जिससे कि कोई-कई लोग कहते हैं कि संसार में रहकर के क्या हम ईश्वर के प्रति सब समय एक अवेयरनेस जागृत रख सकते हैं? नहीं होगा। आप आइडियल है कि ईश्वर के प्रति ही सब समय आपका मन रहे। जैसे कि ठाकुर कहते हैं कि दांत में दर्द हो रहा है तो मैं सब कुछ कर रहा हूं। नौकरी कर रहा हूं। अपना काम कर रहा हूं। ऑफिस में बैठ के खाना खा रहा हूं। सब कर रहा हूं। किंतु मन मेरा पड़ा है दांत के दर्द की ओर। तो यह सब पढ़कर के हमको लगता है कि क्या 24 आवर्स अवेयरनेस जागृत रह सकती है क्या? आइडियल है किंतु होगा नहीं। यहां तक कि जैसे हमने एक बार डिस्कस किया था। मां शारदा को किसी ने पूछा कि अच्छा मां आपको सब समय आपका स्वरूप याद रहता है। मां ने कहा नहीं बेटा यदि ऐसा होगा तो यह सब काम कौन करेगा? यदि मैं जगत धात्री हूं सोच करके बैठी रहूंगी। लोगों की पूजा लेती रहूंगी तो यह बच्चों के लिए खाना बनाना है। उनको खाना परोसना है। वे लोग खाना खा के फिर जो झूठा है उसको साफ करना है। वो मुझे ही तो करना है। मेरे अलावा कौन करने वाला है? तो फिर किंतु साथ-साथ में ही मां कहती है कि जब भी इच्छा होने से इमीडिएटली मैं अपने स्वरूप को याद कर पाती हूं। अपने स्वरूप में स्थित हो सकती हूं। तो वह कब आता है कि एक बार आपको मेहनत करके थोड़ी सी तपस्या कर लेनी है। एक बार मेहनत करके जप, ध्यान, साधन, भजन, ईश्वर का नाम, गुण, कीर्तन, कथामृत का पाठ एक बार बैठकर के जोरदार कर लगा देने हैं। जैसे वो ठाकुर का फेमस उदाहरण है कि जब झड़ आती है, जब यह तूफान आता है, स्टम आता है, तब यह जो नौका चलाने वाला जो खलासी होता है, वह क्या करता है? वह जोर लगा के वह अपनी नौका को तूफान में से एक बार पार करवा लेता है और उसके बाद में वह बैठकर के शांति से तंबाकू खाएगा धूम्रपान करेगा। अभी यह जो देखिए हम लोग कभी-कभी सोचते हैं अरे निर्विकल्प समाधि के पहले यह सब शांति हमको कहां मिलने वाली है? तो यह बात सही है। किंतु फिर भी इतना लंबा यदि सोचेंगे, इतना ऊंचा आइडियल रखेंगे तो क्या है कि हम लोग निराश ही होते जाएंगे। मैंने ऐसे कितने सद्गृहस्थों को देखा है कि युवावस्था में थोड़ी सी उन्होंने मेहनत कर ली है और फिर सतत मेहनत करते रहते हैं। किंतु बीच-बीच में जैसे राजकोट की ही बात कि कितने लोग हमारे जब भी उत्सव होता है ठाकुर मां स्वामी जी का गुरु पूर्णिमा काली पूजा कितने कितने दूसरे दूसरे गांवों से ये भक्त लोग आकर के रहते हैं। तीन-चार दिन वहां पर रहेंगे। बड़े खुश होकर के बड़े शांति से वह फेस्टिवल में पार्टिसिपेट करेंगे। फिर घर चले जाएंगे। तो यह जो दो-तीन दिन फेस्टिवल में पार्टिसिपेशन करने को मिला। अभी यह जैसे कि दिल्ली में दुर्गा पूजा हुई थी। बीच में मैंने सुना तो कितने सारे भक्त वहां पर गए थे। वहां के लोकल डिवोटी भी वहां पे वो खाना बनाने का मां के लिए भोग बनाने का उनको मौका मिला था। तो देखिए अभी आपको यह मौका मिलता है कि दुर्गा पूजा हो रही है और मां के लिए जगत जननी के लिए आप भोग रंध रहे हैं तो उस समय आपका संसार कहां आपके मन में से चला जाएगा। पूरा वो मां के भोग के ऊपर में ही आपका पूरा ध्यान है और जब तक यह दुर्गा पूजा चलेगी तब तक यही एक दिव्य प्रवाह चलता रहेगा। यह जो रिट्रीट में से अभी ये जो वो मिलन महाराज का रिट्रीट हुआ उसमें वो दो-तीन डिवोटी गए थे अपने वो किसी ने मुझे कहा कि महाराज ऐसा लगा कि ये जैसे यह जो 101 दिन जितने भी दिन वहां पर रुके मन पूरा ईश्वर से ईश्वर के चिंतन से भरा हुआ था। वेरी गुड। देखिए यही तो है संसार। बीच-बीच में चले जाने की कैपेसिटी अपने में होनी चाहिए। वरना ऐसा होता है। मैंने ऐसे लोगों को भी देखा है। एक दिन भी आप उनको छुट्टी लेने को कहेंगे। एक दिन भी किसी प्रसंग में जाने को कहेंगे तो 10 बहाने दिखा देंगे। शायद हो सकता है कि उनका बिजनेस या उनका जॉब इतना डिमांडिंग हो। किंतु कभी-कभी ऐसा भी होता है कि इन लोगों को एक तरह का डिस्टेस्ट होता है। सोशल फंक्शन के प्रति रिलीजियस फंक्शनंस के प्रति एक भीतर से एक एक तरह का क्या कहेंगे? स्केप्टिसिज्म होता है कि अरे वहां पे पॉलिटिक्स के अलावा और कुछ नहीं होता। इसका चरित्र ऐसा है, उसका चरित्र ऐसा है। हां, ठीक है। सभी लोग तो कोई ठाकुर मां स्वामी जी की तरह 100% पवित्र नहीं होते हैं। किंतु आप आश्रम में या तो कोई भी धार्मिक स्थल में जाते हैं और यदि इस तरह का माइंडसेट ले जाएंगे कि वहां के लोगों का चरित्र अच्छा नहीं है। वे लोग यह स्कैंडल करते हैं। वे लोग यह करते हैं। देखिए आप ही का नुकसान है। तीर्थक्षेत्र या तो फिर कोई भी आश्रम, कोई भी मठ, कोई भी मंदिर। आप यह देखेंगे कि ईश्वर के अलावा बाकी सबका चरित्र भी यह ईश्वर का जितना शुद्ध चरित्र है वैसे ही होना चाहिए। इस तरह का माइंडसेट हमारे लिए ही नुकसान इट इज वी आर मिसिंग आउट वेरी फ्रैंकली। जो भी लोग मंदिर में रहते हैं, मठ में रहते हैं, कोई भी धार्मिक जगह पर रहते हैं, उनका एक मेन कार्य होता है कि यह जो तीर्थ क्षेत्र है, कोई भी आश्रम, मठ, मंदिर है, उसको प्रॉपर्ली उसको एफिशिएंटली उसको यह चलता रहना चाहिए। तो यह सबका ड्यूटी रहता है। अभी इस ड्यूटी के रास्ते में थोड़ा बहुत इधर-उधर हो भी गया है। तो क्या है? यह सब चीजों के लिए दृष्टि करने के लिए आप नहीं जाते हैं ना। वहां पर तो ठाकुर या तो जो भी इष्ट विराजमान है उनका दर्शन करने के लिए उनके आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए आप जाते हैं। तो जहां पर भी जाइए खुले मन से जाइए। अपने देह मन को पवित्र करके जाइए। लोगों के प्रति द्वेष दृष्टि रखना कि अरे यहां पे इतना गंदा है। अभी चलिए तो आजकल तो बहुत माने अपने तीर्थक्षेत्र है। बड़े अच्छे और उनको सैनिटेशन और हाइजीन का ख्याल रखा जाता है। ये कूड़ा कचरा जो पड़ा रहता था। एक समय था कि हिंदू तीर्थक्षेत्र उसका नाम सुनने से ही वो कूड़ा कचरा बदबू ये हजार भिखारी सामने बैठे हैं। यही सब वो दृश्य नजर के सामने आते थे। अभी आजकल देखिए कि चलो ये सब जगह पे ये रिफॉर्मेशन हो रहा है। अपने तीर्थक्षेत्र है वहां पे यह जिस तरह की क्लीनलीनेस है या तो फिर जिस तरह की यह पब्लिक सर्विसेज अवेलेबल है। यह सब काफी इंप्रूवमेंट हुआ है। तो ऐसा ही होना चाहिए। बीच-बीच में चले जाकर के अपने मन को फर्टिफाई करके फिर से संसार में आकर के फिर से संसार की जवाबदारियों का निवाह करना है।
तीव्र वैराग्य से ही ईश्वर को पाया जा सकता है
ठाकुर देखते छे मणि बसिया एक मुने शमस्त सुनीते छेन ठाकुर ने देखा कि मणि वहां पर बैठकर के एक से सब कुछ ध्यान से सुन रहे हैं। मणि यानी कि मास्टर महाशय स्वयं श्री रामकृष्ण मणि दृष्टे मणि की ओर देखकर के श्री रामकृष्ण कहते हैं तीव्र वैराग्य होले तबे ईश्वर के पावा जाए तीव्र वैराग्य होगा तब ईश्वर को प्राप्त कर सकते हैं जार तीव्र वैराग्य को होए तार बोध होए संसार दाबानोल जिसको तीव्र वैराग्य होता है उसको लगता है कि संसार दाबानल है संसार महान अग्नि है जोल छे जल रहा है जलजल कर रहा है मां छे ले देखे जेनो पात कुआ स्त्री और पुत्रों को देखकर के लगता है एक अंधेरा कुआं जिसमें गिरेंगे तो कभी बाहर नहीं आएंगे रकम वैराग्य यदि ठीक ठीक हो ता होले बाड़ी त्याग होए पड़े यदि इस तरह का वैराग्य ठीक ठीक होता है तो फिर घर छूट जाता है घर त्याग हो जाता है शुद्ध अनाशक्त क्त होए थाका नहीं बस सिर्फ अनासक्त होकर के रहना ऐसा नहीं कामिनी कांचनी माया कामिनी और कांचन ही है माया माया के यदि चिंते पारो अपनी लज्जाएं पालावे माया को यदि समझ सक पहचान पाओगे तो वह अपने से लज्जा से भाग जाएगी एक जन बाघेर छाल पोरे भोए देखा छे एक आदमी बाघ बाघ जो होता है शेर होता है। उसका यह जो चमड़ा होता है वह पहन करके लोगों को भय दिखा रहा है। उसकी जो छाल होती है वह पहन करके लोगों को भय दिखा रहा है। जाके भय देखा छे से बोलले अमित तो के चीने छी तू या हमार होरे जिसको भय दिखा रहा है उसने कहा मैं तुमको पहचान लिए मैंने तुमको पहचान लिया है तुम तो मेरे हरे हो हरे नाम करके जो भी उसका रिलेटिव होगा वो है तखन से होशे चले ग और एक जन के भय दिखाते गलो तब यह हरे हंस करके चला गया और दूसरों को किसी को भय दिखाने लगा देखिए कि ये तीव्र अभी देखिए देखिए ये जो मणि के मन में ये जो कशमकश चल रही थी मास्टर महाशय के मन में कि यह संसार करना है कि संसार त्याग करना है तो ठाकुर कहते हैं कि देखिए एक मध्यम पंथा जो है कि संसार में ही रहिए किंतु बीच-बीच में निर्जन में जाकर के तपस्या कीजिए। तो यह जब सब बात कर रहे थे उस समय मणि उनके सामने एक दृष्टि से देख रहे थे। तो ठाकुर हो सकता है हो सकता है क्या पक्का कि मणि के मन का मास्टर महाशय के मन का भाव समझ लिए और उन्होंने शायद सोचा होगा कि इनके मन में अभी वैराग्य की जो ज्वाला जो है वो हो सकता है कि बड़ी प्रबल हो गई है ठाकुर के सानिध्य में वो जो एक कहानी वो जो है ना एक बार ठाकुर ब्राह्म समाज में गए थे तो वह ब्राह्म समाज में यह नरेंद्र और नरेंद्र के मित्र वह सब उपासना कर रहे थे तो मास्टर महाशय ठाकुर के पास में बैठे हैं तो फिर वह सब वो उपासना कर रहे हैं। देखा ठाकुर स्वयं आकर के बैठ गए। तो फिर उनके मन में यह नरेंद्र और उनके मित्रों के मन में वह सब वैराग्य का वो उद्दीपन हुआ ठाकुर को देखकर के और वह प्रार्थना करने लगे ईश्वर से कि सब छोड़कर के आपके श्री पाद पद्मों में हमारा मन चला आए ऐसा करो। तो फिर देखिए कि मास्टर महाशय पहले तो लिखते हैं कि ठाकुर को देखकर के इनके मन में वैराग्य का उद्दीपन हुआ और फिर जब यह लड़के लोग कहते हैं कि ईश्वर सब छोड़कर के आपके श्री पाद पद्म में हमारा मन आ जाए तो ठाकुर हल्के से बड़े ही मृदु स्वर से कहते हैं ता तो होए छे ये सिर्फ मणि सुन सुनने को पाए थे ता तो होए माने वो हो म वो हो होगा मतलब ऐसा ता तो होए छे देखता हूं यदि ऐसा होता है तो ऐसा कुछ अर्थ होगा इस अर्थ में कि ठाकुर स्केप्टिसिज्म प्रकाश कर रहे हैं कि वह मुंह से तो बोलते हैं कि हां सब छोड़कर के ईश्वर में मन लग जाए किंतु ठाकुर की उपस्थिति का जो मरकट वैराग्य है वो कितने क्षण स्थाई होगा जब ठाकुर वहां से चले जाएंगे। ऑफ कोर्स ठाकुर नरेंद्र के बारे में ऐसा नहीं कहते थे। नरन के मित्र जो थे बाकी उनके बारे में ऐसा कहते होंगे और देखिए यह जो बहुत सारे लोग इस तरह की जो मुंह से बड़ी-बड़ी बातें करते हैं उनके जीवन में किंतु त्याग नहीं देखने को मिलता है। यही हलधारी वो ठाकुर को कहता है कि तुम्हारे लड़कों का विवाह कैसे होता है मैं देखता हूं जो यह तुम पागलपन जो सब कर रहे हो यह जो जनेऊ उता करके फेंक दिया है उठा के ब्राह्मण होकर के कितने आपको सदभाग्य से ब्राह्मण देह प्राप्त होता है और तुमने जनेऊ फेंक दिया किस तरह से फिर यह जो भिखारी है ये कंगाल है वहां उनका जो झूठा तुम खाना खाते हो तुम्हारी जात जाएगी तुम्हारे लड़कों का विवाह कैसे होगा तो फिर ठाकुर नाराज होकर के कहते हैं अच्छा तुम भागवत पढ़ते हो फिर यह कहते हो कि मेरे लड़के होंगे क्या अर्थ है इसका भागवत यदि तुमको प्रचंड त्याग संपूर्ण त्याग सिखाता है तो वो त्याग सिर्फ बातों की बातें हैं ना कि फिर उसको अमल में भी लाना है प्रैक्टिकल उसका एप्लीकेशन भी करना है किस तरह से आपके लड़के हो सकते हैं यदि ठीक ठीक भागवत पढ़ा और उसके उपदेश को यदि आत्मसात किया तो यह बात देखिए कि यहां पे मास्टर महाशय के मन में ठाकुर के सानिध्य में रिट्रीट करने का जो परिणाम है वह रिजल्ट सामने दिखने लगा और वैराग्य का उद्दीपन होने लगा। किंतु ठाकुर ने साथ-साथ में ही जैसे कि उनके उत्साह के ऊपर में पानी डाल दिया। डैंपन कर दिया उनके एंथूजियाज्म को यह कह के कि संपूर्ण वैराग्य होने से तब आप कहीं जाकर के वैराग संपूर्ण इंद्रियों के विषय के प्रति संपूर्ण वैराग होने से आप घर छोड़ सकते हैं। इसके पहले नहीं यदि संपूर्ण वैराग्य होगा तीव्र वैराग्य यदि होगा तो संसार आपको महा वन का जो अग्नि है वन अग्नि उसकी तरह वाइल्ड फायर की तरह दिखेगा। आपके जो पत्नी और पुत्र हैं वह आपको अंधे कुएं की तरह दिखेंगे। यदि इस तरह का वैराग्य ठीक-ठीक होगा तो घर अपने से त्याग हो जाएगा। सिर्फ घर में अनासक्त रहकर के बात रहने की बात नहीं है। घर छोड़ जाएगा। किंतु कब? कामिनी कांचन ही माया है। इस माया को पहचानना होगा। माया को जैसे ही पहचानेंगे माया आपको छोड़कर के भाग जाएगी। किंतु इस माया को पहले पहचानना होगा। इस माया का क्या अर्थ है? इसके ऊपर में यदि हमारा मन है तो कैसे भी करके इस मन को उसके ऊपर में से हटाना होगा। इसके बाद में हम एलिजिबल होते हैं संपूर्ण वैराग्य के। यानी कि यदि हम स्पेक्ट्रम देखें कि किस तरह से यह चलता है लोगों का बिहेवियर तो एक तरह के लोग हैं जो कि पूरे माया में बंधे हुए हैं। काम कांचन के वशीभूत होकर के तामसिक होकर के जगत में रह रहे हैं। दूसरा एक्सट्रीम जो ऑपोजिशन है कि जिन्होंने काम कांचन से संपूर्ण मुक्ति प्राप्त कर ली है और संसार उनको दावानल की तरह दिखता है। यह वाइल्ड फायर की तरह दिखता है। किंतु इन दोनों के बीच में एक थर्ड पोज़शन है कि जहां पे आप संसार में भी रहते हैं, अनासक्त होकर के रहते हैं। बीच-बीच में रिट्रीट में चले जाते हैं। अपने माइंड को फोर्टिफाई करके फिर से संसार में आकर के अपनी जवाबदारियों का निर्वाह करते हैं। तो यहां पर ठाकुर यह जो थर्ड पोजीशन है एक्सट्रीम पोजीशन वह जब समझाते हैं कि जब वैराग्य होता है तो संसार चला जाता है तो वहां पर वो एक कंडीशन भी ऐड कर देते हैं। सिर्फ अनासक्त होकर के रहना नहीं जो कि ये मिडिल पोजीशन है। आप संसार में अनासक्त होकर के रहते हैं। ठाकुर क्लेरिफाई कर देते हैं। संसार में अनासक्त होकर के रहने की सिर्फ बात नहीं है। संसार त्याग संपूर्ण रूप से हो जाएगा। यदि हमारे मन में उस लेवल का वैराग्य प्रकट होगा। तो पहले तो बता दिया कि किस तरह से एक मध्यम पंथा है और अभी बताया सेकंड ये जो पैराग्राफ में कि यह जो संपूर्ण वैराग्य का रास्ता है वह भी एक ऑप्शन है हमारे सामने। फिर क्या कहते हैं?
हमें स्त्रियों के प्रति अपना वासना का त्याग है, उनसे घृणा नहीं करनी है
जतो स्त्री लोक शकोले शक्ति रूपा जितनी भी स्त्रियां है सब शक्ति रूपणी है से आध्या शक्ति स्त्री होए स्त्री रूप धरे रोए छेन वही आध्या शक्ति ही स्त्री होती है स्त्री रूप धर करके रहती है अध्यात्म में आ छे राम के नारद आदि स्तबो कोरे छेन स्तबोकोर छेन हे राम जतो पुरुष तुम आर प्रकृति जतो रूप सीता धारण करे छेन अध्यात्म राम रामायण में है कि भगवान राम को नारद वगैरह मुनि स्तव कर रहे हैं। कह रहे हैं हे राम जितने भी पुरुष है सब तुम हो और जितनी प्रकृति है वो सब सीता प्रकृति के जितने भी रूप है वो सब मां सीता ने धारण किए हुए हैं। तुम इन तुम ही इंद्रो शिता इंद्राणी तुम्ही शिव सीता शिवानी तुम्ही नरो शिता नारी तुम इंद्र हो सीता इंद्राणी है तुम शिव हो सीता शिवानी है तुम नर हो सीता नारी है बेश आर कीबल वो जेखाने पुरुष शेखाने तुम्ही जेखाने स्त्री शेखाने सीता और इससे ज्यादा मैं क्या कहूंगा जहां पुरुष है वहां पे तुम हो जहां पे स्त्री है वहां वहां पे सीता है। अच्छा यह जो पैराग्राफ है इसको ऊपर में जो डिस्कशन हुआ उससे थोड़ा सा अलग क्यों लग रहा है? ऊपर में तो डिस्कशन चल रहा था कि संसार यदि करना है तो संसार में कैसे रहना है? संसार नहीं कर सकते। तो किस किस सिचुएशन में संसार अपने से छूट जाएगा? वो सिचुएशन डिस्कस करते-करते एकाएक स्त्री के प्रति क्यों ठाकुर ने बात करना शुरू कर दिया? तो देखिए कि जैसे हमने कथामृत में और कथामृत के ऊपर में जिन्होंने टीका टिप्पणियां की है जिन्होंने आर्टिकल लिखे हैं सब लोगों ने यह कामिनी कांचन शब्द समझाया है। ऐसा नहीं है कि कामिनी बोलकर के स्त्री को माना जा रहा है। यहां पे इसका अर्थ है कि आपके स्पाउस यानी कि यदि स्त्रियों के साथ में ठाकुर बात करेंगे तो पुरुषों से सावत करेंगे। पुरुषों से बात करेंगे तो स्त्री से सहवत करेंगे। यहां पे काम भाव के विरुद्ध हमको सावध कर रहे हैं। नहीं कि स्त्री और पुरुष को एक दूसरे के विरोध में उनके मन में द्वेष भाव रोपित कर रहे हैं। तो यह जो मिसकसेप्शन हमारे मन में ना लग जाए। ठाकुर ठाकुर कामकांचन भी तो कह सकते हैं। एक स्टैंडर्ड वोकैबुलरी वो यूज कर सकते थे। उसकी वजह पुरुषों को कामिनी कांचन के सामने वो जो चेतावनी देते हैं। ऐसा क्यों? तो ठाकुर का सबसे बड़ा एक यह था कि जो लोग जिस बात को सहज रूप से सबसे ज्यादा सहज रूप से समझ पाए वैसे ही तो धर्म के जगत में इतने सब ये है मतलब एक जटिलताएं हैं कॉम्प्लेक्सिटीज है और यहां पे एक कॉम्प्लेक्सिटी खड़ा करने से क्या लाभ है कामिनी कांचन कह दो किंतु साथ में ही स्त्रियों के प्रति द्वेष भाव हमारे मन में जागृत ना हो जाए इसलिए यहां पर ठाकुर हमको स्त्रियों का जो सही स्वरूप है शक्ति रूपणी आध्या शक्ति रूपी वही स्त्री है जिन्होंने जीवन धारण किया है। प्रकृति में स्त्रियों के जितने भी रूप है वह सब मां सीता ने ही धारण किए हैं। यही स्त्रियां ही भगवान शिव के साथ में शिवानी होकर के इंद्र के साथ में इंद्राणी होकर के नरक के साथ में नारी होकर के विराज कर रही है। तो स्त्रियों के प्रति द्वेष भाव रखकर के उनका त्याग नहीं करना है। उनके प्रति जननी का भाव रख के, उनके प्रति सम्मान का भाव रख के, उनके प्रति श्रद्धा का भाव रख के, उनके प्रति यह जो काम भाव है वह दूर हटाना है। स्त्रियों के साथ में यदि संबंध होता है तो वह श्रद्धा का संबंध होना चाहिए। नहीं कि काम भावना का। तो यह मिसकसेप्शन यदि हमारे मन में ना खड़ा हो जाए। बार-बार ठाकुर कह रहे हैं कि मां छेले के देखे जेनो पात कुआ स्त्री और पुत्रों को जैसे देखते हैं कि अंधा कुआं है जिसमें गिरेंगे तो वहां से कभी हम खड़े बाहर नहीं निकलेंगे। तो एक ओर जैसे ठाकुर ने हमको यह कहा तो सामने दूसरी ही ओर यह कह दिया कि वही माघ अर्थात कि वही पत्नी उसको यदि पात कुएं के रूप में यदि तुम देखते हो अंधे कुएं के रूप में यदि देखते हो तो साथ-साथ में उनको शक्ति रूपणी जगत जननी रूपणी आध्या शक्ति के रूप में भी देखना है जगत जननी के रूप में भी देखना है शिवानी के रूप में भी देखना है इंद्राणी के रूप में भी देखना है यानी कि देखिए कि ठाकुर का लॉजिक कितना सबकॉन्शियस लेवल पर चलता है। यह सब चीजों का और थोड़ा सा अभ्यास करेंगे, पाठ करेंगे तो इसके और भी कितने जो सल लेयर्स है वह हमको समझ में आते जाएंगे। अच्छा आज यहीं तक अभी कल नेक्स्ट कल क्लास कल ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु
प्रश्न: आजकल लोग इतने भौतिकवादी हो गये हैं कि उनमें आध्यात्मिकता के प्रति कोई सहानुभूति नहीं है।
तो एक्चुअली जो आपने कहा वो बिल्कुल सही है। देखिए मैं भी जब यहां पे आने के लिए तैयार हुआ था माने मैंने पढ़ाई लिखाई छोड़ दिया था तो नेचुरली है कि कॉलेज में मैंने कॉलेज स्टार्ट ही नहीं किया था एक्चुअली 12th में ही पढ़ाई छोड़ दिया था तो अभी वो मेरे मित्र आकर के मुझे कहते थे कि अरे ये तुम क्या सब ये बेकार की सब ये तुम ये काम कर रहे हो यदि धर्म कर्म करना है तो बूढ़िया उम्र में करना है ये युवा एज में यंग एज में यह सब क्या करते हो मैंने भी देखा दूसरा कि इन लोगों का जो पूरा माइंडसेट होता है भोगवाद के प्रति इतना मैक्सिमाइज हुआ होता है। मुझे याद है कि मैं कुछ उस समय में सेवंथ ना ए्थ स्टैंडर्ड में पढ़ रहा था। तो मेरे कुछ मित्र मुझे कहे कि वो गार्डन है वहां पे वो एक होटल है म एक ढाबा जैसा वहां पे चलते हैं। बड़ा मजा आएगा। तो मैंने कहा अभी गया हूं मैं स्कूल से वेकेशन में तो चलो चलते हैं क्या है अभी मित्रों के साथ में किंतु वहां पे जाकर पूरा वो जो माइंडसेट सेटअप देखा मैंने कहा इस तरह की जगह पे कभी नहीं आ सकते वो मेरा वो मेरे बस की बात नहीं है उस समय मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि मैं भविष्य में साधु होऊंगा किंतु वो मैं इमीडिएटली समझ गया कि इस तरह की मेंटालिटी इस तरह का सिचुएशन आई हेट इट म लिटरली आई हेट इट किंतु क्या है कि देखिए सबके साथ में आपको रिलेशन रखने हैं, फ्रेंडशिप रखनी है। आप थोड़े अकेले होकर के रहेंगे। मैंने यह जो मेरे खास करके मैं 10थ स्टैंडर्ड में था। 10थ, 11th और 12th मैंने यह कंटीन्यूअसली फील किया कि मेरे जो मित्र हैं उनके साथ में मेरा कहीं पे कुछ मैचिंग नहीं हो रहा है। किंतु फिर भी अभी उनके साथ में रहना है। बाद में भी मैं कहां पे भी घर छोड़ के जहां-जहां पे भी गया हूं। बहुत बार मुझे यह फील हुआ है कि इन लोगों का जो माइंडसेट है और मेरा माइंडसेट है उसमें कोई मैचिंग नहीं है। किंतु फिर भी सम हाउ मुझे उनका संग करना है। तो फिर नेचुरली है कि किस तरह से हम यह सब करें। हाउ टू फर्टिफाई आवरसेल्फ। तो इसका कोई खास करके मैंने खुद का जो देखा कि आई हैव नॉट फाउंड एनी ईजी आंसर कि यह कोई पर्टिकुलर शोर फायर रामबाण उपाय है जिसके मदद से आप इन लोगों से आप दूर हो सकते हैं। म इन लोगों के साथ में रह के भी आपको कोई फर्क नहीं पड़ेगा। यह जो वो कहानी है ना कि वह जो एक ब्राह्मण वो एक गाय ले जा रहा है। वह चार चोर वो लोग सोच रहे हैं कि ब्राह्मण के पास में से गाय को हत्या लिया जाए। तो अभी क्या करेंगे? वह चारों चोर रास्ते के बीच-बीच में खड़े रह गए कुछ-कुछ डिस्टेंस पर और पहला चोर ब्राह्मण जा रहा है गाय को लेकर के। तो पहला चोर कहता है अरे पंडित जी आप ये बकरी को लेकर कहां जा रहे हैं? तो वह ब्राह्मण सोचता कहता है गुस्सा हो के कि अरे यह बकरी थोड़ी ना यह तो गाय है बोल के आगे जाता है। दूसरा चोर मिलता है। वह भी कहता है अरे पंडित जी ये बकरी लेकर कहां जा रहे हैं? अब इस बार वो पंडित के मन में थोड़ा संदेह हुआ कि ये दो आदमी कह रहे हैं कि ये बकरी है। मुझे तो गाय ही दिखती है। फिर थोड़ा सा आगे गया। वो तीसरा चोर भी यही कहता है। चौथा चोर भी यही कहता है। तब कहीं जाकर पंडित को लगा कि अरे मुझे लगता है कि यह बकरी ही है। गाय नहीं है। भले ही चाहे मेरी ही नजरें मुझे धोखा दे रही है। बोल के वो गाय को छोड़ के चला गया और ये चार चोरों ने गाय को हथिया लिया। तो ये कभी-कभी हमको लगता है कि पूरा जगत यदि यह कह रहा है तो क्या हम लोग गलत तो नहीं है। हमारी जो दृष्टि है, हमारा जो थिंकिंग है या इसी में कुछ गड़बड़ है यह होगा। कि दिस विल कम हमको इसके साथ में फाइट करना है। दिस इज द रियल चैलेंज ऑफ आवर फेथ। जो लोगों की संतों की कहानियां पढ़ेंगे, जितने भी महापुरुषों की कहानियां पढ़ेंगे यह म बाकी सबकी तो छोड़ ही दीजिए। यह जो डॉक्टर सरकार है कथामृत में कहते हैं कि मैंने जब पहली पहली बार होम्योपैथी की प्रैक्टिस स्टार्ट की तो यह जो गोरे जब डॉक्टर थे उन लोगों ने मेरे विरोध में जो जो मेडिकल जर्नल होती है उसमें आर्टिकल लिखना शुरू किया था। कितने जो बड़े-बड़े ख्यात नाम डॉक्टर थे उन्होंने मेरी प्रैक्टिस को डूबा देने का प्रयास किया था। मुझे बदनाम करने का प्रयास किया था। किंतु कैसे भी करके मैं टिका रहा और आज देखिए कि होम्योपैथी एस्टैब्लिश हो चुकी है एज ए प्रॉपर मेडिकल ट्रीटमेंट और मेरा इतना नाम हो गया है। यह जितने भी बिजनेसमैन होते हैं शुरू में आप देखेंगे कि उनको स्केप्टिसिज्म का सामना करना पड़ता है। किंतु यदि आपका फेथ रहा तो योर फेथ विल टेक यू टू द नेक्स्ट शोर। वो आपके मन को आपको मजबूत करना है। देयर इज नो अदर इजी वे। यह तो एक बात है। दूसरा कि आपने जैसे यह हाई सोसाइटी का जो उदाहरण दिया ना कि यहां पर लोग इस तरह के कि उनका जो पूरा माइंडसेट मटेरियलिस्टिक होता है। तो मैंने यह देखा है बहुत बार देखा है कि लोगों के भीतर में ना सुपरस्टिशन भी इतनी रहती है कि यानी यह चीज नहीं होनी चाहिए। यह साइन हो गई तो ऐसा कुछ होना चाहिए। माने यह बिल्ली में मानेंगे। उसमें मानेंगे, ज्योतिष में मानेंगे, ग्रहों में मानेंगे। हजार तरह की चीजों में मानेंगे तो क्या है कि देखिए भगवान पर विश्वास नहीं है किंतु ग्रहों पर विश्वास है तो यह भी तो एक विडंबना है ना यदि आपको विश्वास करना ही है तो बी फेथफुल टू गॉड आप ये ग्रहों की गणना क्यों करवाते हैं किंतु खैर अभी ऐसा है समाज में सो मतलब ऐसा नहीं है कि वे लोग इतने मतलब मटेरियलिस्टिक है तो भीतर में पूरा उनका खाली है ये जितनी भी अंधश्रद्धाएं हैं आकर के उनको खा जाती के भीतर से
प्रश्न: साधक अपनी साधना के दौरान एक-दूसरे को सहयोग देने के लिए समान विचारधारा वाले भक्तों का एक समूह बना सकते हैं।
देखिए आप दक्षिणेश्वर में जाएंगे ना तो बहुत बार मास्टर महाशय इस तरह का वर्णन करते हैं कि यह नरन है हाजरा है यह लोग गप लगा रहा है जहां पर ठाकुर नहीं है किंतु सिर्फ भक्त लोगों के आपस में वो गप लग रहा है और कथामृत में इतना ज्यादा नहीं किंतु बाकी सब अब खास करके यह जो स्वामी जी का जो लाइफ है हम स्टडी कर रहे हैं उसमें अभी जो वराह नगर मठ के जो प्रसंग आएंगे तो स्वामी जी के जो भाई थे महेंद्रनाथ दत्त तो उनका हम जब पढ़ेंगे स्वामी जी के जब रेमिनेशनंस कहते हैं कि ठाकुर के जाने के बाद में ठाकुर का जो भक्त संघ है उसमें इतना मतलब एक प्रेम का भाव प्रकट हुआ था। यह नरेंद्र कभी यह बलराम बाबू के घर जाकर गप लगाता है। कभी गिरीश के घर पड़ा रहता है। कभी यहां पर यह वराह नगर मठ में सब इकट्ठा होते हैं। जहां पे भी सब इकट्ठा होते हैं। ठाकुर की वाणी ठाकुर की ही बातें यही और फिर हंसीज़ाक भी वो जो उस दिन जब राम प्रसाद का वह जो हम उस दिन देखा था हमने ये वो शाक्त और वैष्णवों में कैसा वो एक मीठा झगड़ा चलता है तो वो कहता है उसको सुरेश मित्र बलराम बाबू को कि ये तुम्हारे राधा कृष्ण है वो पी पी करके वो बंसी बजाते हैं वो सात जन्म के उपवासी हैं भूखे हैं दुबले पतले हैं वो क्या तुम्हारा उद्धार करेंगे तो ऐसा वो जो हंसी मजाक ऐसे बहुत सारे उदाहरण है हम स्वामी जी के जीवन में करेंगे पार्ट। सो दिस इज व्हाट ठाकुर का संग कि हम सभी लोगों में ठाकुर के रिलेट वी आर रिलेटेड टू हुम एक्चुअली वी आर रिलेटेड टू ठाकुर एंड बिकॉज़ वी आर रिलेटेड टू ठाकुर वी आर रिलेटेड टू ईच अदर। जो ठाकुर कहते हैं ना विद्या का संसार और अविद्या का संसार। यह हो गया हमारा विद्या का संसार।
प्रश्न: हम आध्यात्मिक लोग भौतिकवादी लोगों से बचने की कोशिश करते हैं। लेकिन इस बात का खतरा है कि लोग हमें अहंकारी समझ लें।
देखिए यह जो यही बात एग्जैक्टली ठाकुर ने जस्ट अभी हमको कही। क्या कहा कि स्त्री और पुत्रों को अंधे कुएं की तरह देखना चाहिए। तो किंतु यदि इस तरह की बात करने का जो एक मिसअंडरस्टैंडिंग खड़ा हो सकता है कि इनके प्रति हमारा घृणा इनके प्रति घृणा का जन्म होगा। उनके प्रति द्वेष हो जाएगा। तो ये स्त्रियों के प्रति द्वेष ना हो इसलिए ही साथ-साथ में ठाकुर ने कह दिया कि स्त्रियां है शक्ति रूपणी शिव के साथ में शिवानी होकर के बैठी है। यानी कि उनको व्यक्तिगत द्वेष नहीं करना है। उनके साथ में जो हमारा काम भाव का रिलेशन है उसको परिशुद्ध कर देना है। तो वैसे ही यह बात सब जगह पे याद रखनी है कि ऐसे लोग जिसको कि हम मटेरियलिस्ट गिनते हैं उनका कंपनी हमको नहीं चाहिए। हम अपने को दूर रखेंगे तो उनके प्रति द्वेष भाव व्यक्तिगत रखकर के नहीं जो माइंडसेट को वह रिप्रेजेंट करते हैं उस माइंडसेट को से मैं दूर होना चाहता हूं। उस व्यक्ति एस सच वो गलत है या तो फिर वो घृणा का पात्र है। इस तरह से नहीं हो जाना चाहिए। ऑफ कोर्स यह दोनों को डिफरेंस करना एक व्यक्ति और उसका माइंडसेट आप कैसे करेंगे? माइंडसेट को छोड़ेंगे। व्यक्ति को नहीं धिक्कारेंगे। दिस इज़ अ वेरी कॉम्प्लिकेटेड इश्यूज किंतु यह हमको करना है। ठाकुर हमको इमीडिएटली चेतावनी दे देते हैं कि वरना तो फिर वही बात आप आध्यात्मिकता के रास्ते पे जाकर के अधर्म के रास्ते पर चलना शुरू कर देंगे। अभी जैसे ये कैथोलिक चर्च का जो भयानक इतिहास है कि जो हमारी एक नैरो डेफिनेशन है नैरो कैनन है रिगार्डिंग द होली ट्रिनिटी एटसेट्रा उसको फॉलो नहीं करेंगे तो आप हेरेटिक है। हेरेटिक के साथ में क्या करना है? हेटिक को वो स्टेक के ऊपर में जला देना है। तो फिर अरे किस तरह का धर्म रह गया आप? मैं धर्म को फॉलो करने के लिए मुझे लोगों को जिंदा जलाना होगा। यह कोई माने किस तरह का कंट्राडिक्शन है। इन लोगों को समझ में नहीं आता है। तो इस तरह का सिचुएशन हमारे जीवन में ना हो जाए कि धर्म का पालन करते-करते हम नाक सिकोड़ना शुरू करें। यह ऐसा है, वह ऐसा है। निंदा में चले जाए और लोगों को घृणा करना शुरू कर दें। जैसे देखिए मैंने एक बार बताया था मैं मेरा पोस्ट मैं जॉइ किया मैं बेलूर मठ में बेलूर मठ से मेरा पोस्टिंग हुआ था नागपुर और नागपुर से जब मैं बेलूर मठ वापस आया ट्रेनिंग सेंटर के लिए तो सुहितानंद जी हमारे इंचार्ज थे तो वैसे तो मैं मुझे नागपुर भेजने वाले वही थे और फिर नागपुर से वापस आया तो बात कर रहे हैं मेरे साथ में और वहां पे ऐसा था कि वो मेन टेंपल यदि आपने बेलूर मठ देखा होगा अभी मेन टेंपल के पास में अभी वो अभेदान ानंद वो एक लेक्चर हॉल बन गया है। वो कन्वेंशन सेंटर उस समय पूरा खाली था। पूरा मैदान था और वहां पर सुंदर एक गार्डन जैसा था। तो वो गार्डन में सुबह को अर्ली मॉर्निंग को टहलने के लिए सुतानंद जी के साथ में हम सबको एक मौका मिलता था। ट्रेनिंग सेंटर के जितने ब्रह्मचारी हैं सबको एक-एक दिन महाराज बुलाते थे। तो जिस दिन मेरा नंबर था तो वहीं पर टहलते टहलते और जस्ट इमेजिन द सीन यहां पर मेन टेंपल है और फिर मेन टेंपल सुंदर गार्डन है बेलूर मठ है अर्ली मॉर्निंग का समय है 5:00 बजे बुलाते थे तो 5:00 बजे का टाइम है इतना सुंदर वातावरण तो वो टहलते टहलते मुझे पूछते हैं अच्छा बताओ तुमने नागपुर में क्या किया तो मैं सब बता रहा हूं ऐसा वैसा फिर आखिर में मैंने कहा कि देखिए मैंने अपने को बड़ा प्योर रखने का प्रयास किया है मिनिमम मैं लोगों के साथ बात करता था। जितना समय मिलता था, मैं अकेले बैठकर के स्टडी करता रहता था वगैरह-वगैरह। तो जैसे ही मैंने कहा सुतानंद जी ने कहा कि देखो इस तरह का तुम्हारा माइंडसेट वैसे बुरा नहीं है किंतु तुम लोगों के प्रति तुम्हारे मन में द्वेष भाव ना खड़ा हो जाए यह तुम खास ख्याल में रखना। तो उस समय मैंने कहा सोचा कि महाराज ऐसा क्यों कहते हैं? किंतु आज इतने सालों के बाद में मुझे 20 साल हुए मुझे संग में अभी अभी मुझे समझ में आ रहा है कि महाराज ने ऐसा क्यों कहा था? क्योंकि जैसे ही हम यह सोचना शुरू करेंगे ना कि मैं पवित्र हूं, मैं ज्यादा स्पिरिचुअल हूं, मैं ज्यादा अपना लाइफ है, ज्यादा ओस्टियर लाइफ है दूसरों से साथ-साथ में ही दूसरों के प्रति घृणा का उदय होगा। तो वो तो स्पिरिचुअलिटी के फाउंडेशन में ही जैसे कि कुहाड़ी मारने जैसा हुआ। स्पिरिचुअलिटी का फाउंडेशन ही है कि सर्वम खलव इदम ब्राह्मण ये जो कुछ भी है सब ब्राह्मण है। यदि हां नेति करके हमको जगत त्याग करना है। किंतु नेति करते समय लोगों के प्रति घृणा नहीं करनी है। लोगों का जो माइंडसेट है या तो फिर इस माइंडसेट के प्रति अपना जो आकर्षण है उसको त्याग करना है। सो ये कितना सूक्ष्म है साइकोलॉजी वो हमको खास करके समझना है।
प्रश्न: हम आध्यात्मिक लोगों के लिए दूसरों के साथ जुड़ना कठिन है। मेरा मानना है कि दूसरों को आध्यात्मिकता के मार्ग पर मार्गदर्शन करना मेरा कर्तव्य है।
यहां पे एक प्रैक्टिकल कॉमन सेंस चाहिए। अह जैसे आपने कहा आपका कर्तव्य है किसी को गलत कर रहा है तो एक बार बताने का तो आपने बता दिया। यदि वो इंप्रूव नहीं होता है तो आपने छोड़ दिया। राइट? माने किसी का जीवन आप कहां तक ये कर सकते हैं? अप टू एन एक्सटेंट ही कर सकते हैं। ये सब चीजों में एक प्रैक्टिकल कॉमन सेंस ही चाहिए। इस सब में कोई यूनिवर्सल लॉ नहीं है। हो सकता है जहां तक आपने बताया आपने गाइड करने का प्रयास किया देखा कि वह नहीं काम हो रहा है तो आपने छोड़ दिया। बात खत्म हो गई रेदर देन कि भूतकाल में जो गलती हुई उसको रिग्रेट करने की वजह टेक दिस एज अ लेसन फॉर फ्यूचर कि हां पिछली बार ऐसा हुआ था तो फ्यूचर में मुझे ऐसा करना है। देखिए ठाकुर के साथ में भी वो जो तारक वो जो महापुरुष महाराज के साथ में एक लड़का आता है। फिर स्वामी जी के साथ में एक लड़का आता है। तो ठाकुर क्या कहते हैं ऐसे तो तुम जाओ और जाकर के बिल्डिंग देखो। है ना? वो ठाकुर उनको ये कोई आध्यात्मिकता के रास्ते पर जबरदस्ती खींचने का प्रयास नहीं करते हैं। ठाकुर संस्कार समझ लेते थे। नरेंद्र हो सकता है कि उनके वो हिप्नोटाइज हो जाए। ये तारक है महापुरुष महाराज ब्रेन वाश हो जाए। किंतु उनके साथ में जो लड़के आए थे उनका वो कुछ होने वाला नहीं है। ठाकुर के जाओ जाकर के बिल्डिंग देखो। तो ठाकुर भी समझते थे कि किसको कहां पुश करना है। वी आर देखिए ठाकुर जो सबसे बड़ा एक बात कहते हैं मास्टर महाशय को छाता भूल करके आ गए। ठाकुर कहते हैं मेरे कपड़े निकल जाते हैं फिर भी मैं छाता नहीं भूलता। तो इस तरह के प्रैक्टिकल ठाकुर के हम सेवक हैं। तो हम लोग आध्यात्मिक है किंतु मूर्ख नहीं है। जो योगेंद्र महाराज को ठाकुर ने कहा कि भक्त हो भी बोका हो के भक्त होना है। मूर्ख थोड़ी ना होना है। ये सब चीजों में हमको प्रैक्टिकल होना है। राइट? एक जिस जिद्दी स्वभाव जिसको कहते हैं ना कि मुझे ऐसा ही करना चाहिए। ऐसा ही करना उचित है। तो इस तरह से जििद जो है ना हमको ईश्वर के साथ में रखनी चाहिए। जैसे देखिए ठाकुर और स्वामी मां का एक कंट्राडिक्टरी स्टेटमेंट है। ठाकुर कहते हैं लज्जा, घृणा, भय तीन थकते नोए। ये लज्जा, घृणा और भय ये तीन होने से होगा नहीं।" मां क्या कहती है कि लज्जा, घृणा, भय तीन थकते होय ये लज्जा, घृणा और भय तीन रहने से ही होगा। तो ये कंट्राडिक्टरी क्यों है? तो यह लज्जा, घृणा, भय ईश्वर के साथ में नहीं रखना है जो कि ठाकुर कहना चाहते हैं। और मां कहती है कि लज्जा, घृणा, भय संसार जो है उसको हमको रखना ही होगा। बिना लज्जा के हम रहेंगे। बिना हर किसी को जैसे कि हम सभी बातें सुन लेंगे। सभी चीजों से डर नहीं करेंगे। तो यह संसार में रहना मुश्किल है। तो यह जो हमारी जििद है कि ऐसा ही होना चाहिए। वैसा ही करना चाहिए। वह सब ठाकुर के साथ में हमारा रिलेशन है। वह अच्छा है कि मुझे काम कांचन का त्याग करना ही है। कैसे भी करके करना है। किंतु यदि हम संसार में रहेंगे और कहेंगे कि यह हाईएस्ट आइडियल है और इसका पालन होना चाहिए। तो हम दुखी होंगे। हमारे आसपास जो है उनको हम दुखी करेंगे।