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जय जय राम कृष्णा अच्छा ठाकुर मास्टर महाशय दक्षिणेश्वर में है और ठाकुर के साथ बात कर रहे हैं बात करते करते श्याम हो गए और कमरे के दक्षिण पूर्वक की और बरामदे के द्वारा के पास ही अकेले में ठाकुर मनी के साथ बात कर रहे हैं अच्छा यहां पे दो चीज देखिए सबसे पहले तो लक्खा है दक्षिण पूर्वक की और बरामदे के द्वारा के पास अर्थात अभी जो लोग दक्षिणेश्वर गए होंगे दक्षिणेश्वर किस तरह से उसका लेआउट है की कौन सा बरांडा जो है मैन कौन सा वरांडा किस डायरेक्शन में है गंगा को अलग करके कौन सी डायरेक्शन काली मंदिर को अलग करके कौन सी डायरेक्शन फिर यह जो है नौबत की और जाति हुई कौन सी डायरेक्शन फिर उसके बाद में भी मैन नौबत की और जाते हुए दो ठाकुर के घर कमरे के बाहर में ही और दूसरा थोड़ा सा साइड पर जहां पर ठाकुर जब चल रहे थे और है वह मथुरा बाबू अपनी कुती पे खड़े थे कुटी की छठ पे तब उन्होंने देखा था की ठाकुर जब आगे ए रहे हैं और पीछे जा रहे हैं तो एक उन्होंने आगे-पीछे जो वॉकिंग कर रहा है वो टहल रहे हैं तो एक बार उनको शिवा के स्वरूप में दिखते हैं और दूसरी बार काली के स्वरूप में दिखते हैं तो वो और एक उन्होंने कुटी से वो सीधा दिखाई देने वाला वो दूसरा बरांडा मैन कितने वो वरांडे हो गए मैंने एक तो काली मंदिर की और है वह एक गंगा की और है एक वो जो है नौबत की और या तो पंचवटी की और और चौथ जो है वो कुठीवाड़ी से जो माथुर बाबू ने जो ठाकुर के काली और शिवा के रूप में जो दर्शन किया थे वो वाला तो कर जो वंद है वहां पे तो अभी क्या है की मास्टर महाशय जब भी कोई वंद में कोई दृश्य है वंद में कोई भी वो मैन नेति शास्त्र में इसको सीन बोलेंगे जब ये नाटक लिख रहे हैं तो नाटक में कैसा होता है अंक या तो फिर वह मैन अंक कौन सा शब्द है मेरे ख्याल से हिंदी शब्द है तो एक के बाद एक जो सीन होते हैं इंग्लिश में कहेंगे सन तो सन वन तो उसमें लिखा रहेगा की लोकेशन कौन सा है और टाइम कौन सा है और पत्र कौन-कौन से हैं तो यहां पे भी और फिर किस तरह का क्लाइमेट है उसके बाद में वो डायलॉग के रूप में वो सीन लिखने की शुरुआत होती है तो नाटक क्यों लिखा जाता है जिससे की आप 100% उसको परफेक्ट विजुलाइज कर सके क्योंकि उसका अभिनय होना है जबकि नोबल जो होती है तो नोबेल में क्या होता है की वहां प्रत्येक सीन का सेटिंग जो है वो इतना एक्युरेटली हो सकता है की शायद वो ना दिया हो वो कहानी अभी कहां पे बात कर रहे कहानी वो दूसरी क्षण के बाद में और कहां पे वो जो सीन है या एक्शन है वो चल रही है हमको बहुत साड़ी बार हमको जो असम कर लेना है अनुमान कर लेना है की यहां यह जो पर्टिकुलर लोकेशन में चल रहा है किंतु भारत में ऐसा नहीं चलेगा क्योंकि नाटक यहां पर भी मास्टर महाशय ने इसको नाट्य रूप में मैन नाट्य रूप हंड्रेड परसेंट नहीं है किंतु उसके जैसा एक स्वरूप क्यों दिया है जिससे की हम ये जो पूरा दृश्य है हमारे हृदय में उसका अभी नहीं कर सके हमारे हृदय में विजुलाइज कर पे की कौन से वरांडे में ठाकुर खड़े हैं और यहां तक की ठाकुर कौन सी दिशा में मुंह करके खड़े हैं वो भी बता देते हैं और सामने में कौन-कौन बैठे हैं या खड़े हैं किसके साथ में ठाकुर क्या बात कर रहा है और पूरा जैसे डायलॉग फोम में जिससे की हम इसको 100% जो है विजुलाइज कर पे और ये विजुलाइजेशन जो है दक्षिणेश्वर का अमृत का वह विजुलाइजेशन इस डी बेस्ट वे ऑफ मेडिटेशन यदि आपने एक सिम देख लिया पढ़ लिया की हां ये यहां पे ठाकुर चीजों के बड़े में बात करते हैं सामने इतने इतने लोग बैठे हैं फिर हम उसको आंख बैंड करके जब हम साधना करते हैं सुबह या शाम को तो हमको आंख बैंड करके सोचना है की हम भी उनके साथ में उपस्थित थे हम भी यदि वो कमरे में हो रहा है ठाकुर के तो हम वहां पे हैं यदि वो दूंगा पंचवटी में जो कोई सीन है पंचवटी में कोई दृश्य है तो हम वहां पे भी खड़े हैं ठाकुर क्या बोल रहे हैं उसको हम सुन रहे हैं तो यह जो ठाकुर की जो वाणी है वो हमारे हृदय में प्रवेश कर जाए इतनी गहनता से प्रवेश कर जाए की जिससे की क्या है की हम ठाकुर के शब्दों को सिर्फ शब्दार्थ ही नहीं उसके पीछे जो गहन उसका वो जो आध्यात्मिक आशीर्वाद जो है ठाकुर की वाणी तो मंत्र है मंत्र का जितना पाठ करेंगे जब करेंगे उसका जितना ही आप जो है उसको मैंने उसको रिपीटेशन करेंगे उतना ही मंत्रम में से वो आध्यात्मिक रस या तो फिर ओजस या तो यह प्राण शक्ति प्रकट होगी और आत्म दर्शन यह हमारी माया का यह जो पर्दा है वो पर्दा धीरे-धीरे करके खुलना जाएगा और पर्दे के पीछे जो है वो सामग्र ब्रह्मांड के विश्व ब्रह्मांड के अधिष्ठाता भगवान शिवा स्वयं जो की हमारे हृदय में विराजमान है वो आपको दिखाई देंगे और एक समय वो आएगा हमको पता चलेगा हम ही तो है भगवान शिवा कहां यह जीव बनकर के मारे मारे पृथ्वी पे घूम रहे हैं एक बार अगर मठ में एक बार ऐसा हुआ था की अभी क्या है की 65 तो है नहीं अब प्रत्येक छोटी-छोटी चीज के लिए आपको इतना ही मतलब आपको ये मैन कर्कसर करनी पड़ेगी कंजूसाई करनी पड़ेगी सर यानी की मैंने यू हैव तू बी एन वेरी मिसर विद एवरीथिंग 12 पैसा आपके पास में है तो 12 पैसे में से वह जो तरकारी खर आलू खरीदेंगे ना की फिर उसका और क्या करेंगे ठाकुर के लिए लुची भोग देंगे ना की ठाकुर के लिए पैर तोक देंगे ना की फिर यह जो ग्रुप भाइयों के पास में पहने के लिए सिर्फ एक जोड़ी कपड़े थे मठ में तो वो सिर्फ इनके रहते थे और कई कई बार पॉपीन भी नहीं पहना थे मैंने वो उसे दिन बात की थी ना दिगंबर साधुओं की तो ये इन लोगों ने सही से ये सब प्रयोग वरंगर मठ में कर लिए थे हालांकि ये बात पक्का है की जैसे ही वो कोई महिला भक्ति है ठाकुर की वो जबकि वो आई थी तो दूर से ही ये लोग बोल देते अरे वो जो एक मैगी मैन बंगाली आपस में तो वो पूरे डिगाम रहते थे एक पूरा एक दूर मैन एक पूरा एक युग बीता है वराह नगर मठ में की गुरु भाइयों ने 100% वोट ट्रेडिशनल सन्यासियों की तरफ रहने का पर्यटन किया है मैन वो स्नान भी नहीं करते थे उनके बाद भी बड़े रक्ष हो जाते थे बड़े हो जाते थे जाता की तरफ हो जाते थे चंडी पे मैन वो मिट्टी और धूल का पूरा एक लेयर बन जाता था मैंने कभी-कभी स्नान करने को जाते हैं तो स्वामी जी के जो छोटे भाई हैं महेंद्र नाथ डेट वो कभी जाकर के पत्थर से उनका शरीर घिसते है तो जैसे पत्थर से शरीर घिसते तो पूरा वो मैंने कल कल मिट्टी का वह पानी जो है पर कल कल मिट्टी वाला हो जाता मैन इतना वो लोग बेदरकर हो गए थे शारीरिक सुविधाओं के प्रति और सुविधा ही नहीं फिर एक हेल्थ और हाइजीन भी होता है तो उसके प्रति भी ये लोग जो है निरसा हो गए थे योगेन महाराज का देखिए जी महाराज का शरीर जो है बहुत ही छोटी उम्र में चला गया ठाकुर के जितने भी सन्यासी शिष्य है उनमें सबसे पहले जो देहाती किया था महासम्मती में ली हुए थे वो थे योगेन महाराज योगानंद जी महाराज उनका देहांत होगा 1898 के उसके ही आसपास कहानी पे जब स्वामी जी वो वर्ल्ड पार्लियामेंट ऑफ रिलिजन में वो जाकर के अमेरिका से इंडिया वापस आए थे बेलूर मठ की स्थापना की थी उसे समय की ये बात है एग्जैक्ट एयर में भूल गया मोस्ट प्रोबेबली 1898 है तो उसे समय स्वामी जी ने ही योगेन महाराज के डे की आरती की थी उनके नश्वर देहात की चेतन तो भीतर में से चला गया था नश्वर डे पढ़ा था डेड बॉडी था तो उसकी जैसे शब्द डे की जो आरती करते हैं वो साधु सन्यासियों की जब दे हत्या करते हैं तो डे को जो है गंगा में जाकर के धुले जाता है उसको नए पवित्र गिरवा वस्त्र पहनाए जाते हैं है और उसे डे की आरती की जाति है फिर वो देहात जो है वो अग्नि दहा दिया जाता है तो वैसे ही स्वामी जी ने उनकी आरती की थी तो अभी जब योगेंद्र महाराज का इतनी छोटी उम्र में जब बेहद देहांत हुआ महासम्मती हुई मां को बड़ा ही कष्ट हुआ था क्योंकि योगेंद्र महाराज की तो सर्व सबसे पहले मां की वो मां के वो सेवक बोलिए ना की मां के वो माना के द्वारा पर बोलिए वो या के मां के वो फिर कहिए की वो केयरटेकर या तो फिर वो मां की सब कुछ व्यवस्था वगैरा या गेंद महाराज करते थे जब भी मां कोलकाता आई थी और वैसे भी मां की जो मां कहा जाति है कैसे करती है रहती है उनको क्या कोई जरूर है की नहीं सब वो जो है पहले से ही योगिन महाराज देखते थे तो योगिन महाराज के जान से मां को कितना कष्ट होगा उसके बाद में एक दिन ऐसा हुआ की कोई किसी साधु ने अभी मैं नाम भूल गया तो कोई साधु ने मां को कोई तपस्या के बड़े में वो कुछ बात कर रहे थे तो कहा की देखो योगेंद्र ने वो सुखी सुखी रोटी खाकर के तपस्या की इसकी वजह से उसका डे जो है इतना जल्दी से उतनी कम उम्र में उसका देहात त्याग हो गया आप लोग जो है इतना कष्ट भी मत कीजिएगा की आपका जो है की स्वास्थ्य जो है वो इतना शिथिल बिगड़ जाए की फिर बहुत छोटी उम्र में आपका देहात त्याग हो जाए आपको तो लंबा जीना है ठाकुर का कम करना है स्वामी जी का कम करना है और ऐसा तो नहीं है की ये जो आत्म दर्शन है या ईश्वर प्रताप है हमको इतना फैट करके मिल जाएगा गुरु भाइयों की तो बात ही अलग है योगेन महाराष्ट्र तो दक्षिणेश्वर में ही रहते थे और वह पहले से ही वो उन्होंने शायद ठाकुर के दर्शन किया ही होंगे और फिर तो राजा महाराज है स्वामी जी है लथु महाराज है आनंद जी है इन लोगों की तो बात ही क्या है वो तो जन्म जन्मांतर से अवतार के साथ में लीला करने के लिए आते हैं आते रहेंगे आते थे तो उनकी तो बात ही क्या है उनको एक छोटी सी उम्र में स्वामी जी को 40 वर्ष में उनका देहांत मैन देहात त्याग हो गया महासम्मती हो गई तो डिसेंट मटर हो तो काशीपुर में ही उनको तो निर्विकल्प समाधि प्राप्त हो गई थी और वैसे भी तो वो जैसे थे तो उनको मैं समाधि पानमती अभी उनको क्या है उनके लिए तो छोटी-मोटी बात है तो हमारा तो ऐसा नहीं है हम कितनी साधना करेंगे तपस्या करेंगे जब ध्यान करेंगे तब तो कहानी जाकर के हमको कोई आध्यात्मिक अनुभूति होने की शुरुवात होगी तो हमारे लिए इतना कष्ट करना की छोटी उम्र में ही फिर जो है हमारा स्वास्थ्य बिगड़ जाए और फिर हम ठीक से साधन भजन भी ना कर पे और जो कहते है ना की शर्म आयाम कालू धर्म साधनम् अर्थात की हमारा जो स्वास्थ्य है हमारा जो ये सेहत है वो धर्म के लिए एक साधन स्वरूप है मैं यदि एक सीधा हो करके आधा घंटा वेट नहीं पाऊंगा तो फिर मेरे से जब ध्यान भी कैसे होगा भले ही चाहे मैं चेयर पे बैठी भले चाहे मैं कुर्सी पर बैठो किंतु इतना भी तो मुझे बैठा ना पड़ेगा तो इसके लिए जो स्वास्थ्य है उसको ठीक रखना आवश्यक है तो यह पूरा जो है की मां है यह एक के बाद एक जो मैन नाटक के अंक कहो ना की यह सीन कहो ये सन का वो जो है हमको उसको प्ले करना है हमारे हृदय में ठाकुर क्या कहते हैं ठाकुर किस तरह से बातें करते हैं उनकी वो जो मंत्र जो है वो मंत्र का हमारे मां में एक के बाद एक रिपीट होता रहेगा की ठाकुर ने हां यहां पे इस तरह से कहा है की निर्वाण निष्कपम एव प्रदीपम किसी किसी में योगिया के लक्षण दिखते हैं परंतु लोगों को भी सावधानी से रहना चाहिए ये जो बातें ठाकुर ने यहां पे कहानी इस तरह से कहानी तो ये चिंतन करते रहने से इसके पीछे का गुडार्ट जो है ठाकुर की बटन का वो भी ओपन होगा और ये जो मंत्र है मंत्र आशीर्वाद भी हम जो है प्राप्त करेंगे तो अभी अच्छा दूसरी बात है की मास्टर महाशय अपने को मनी के रूप में पहचानता है बोलते हैं की मनी अभी वो एक कभी-कभी अपने को मास्टर करके वो अपना परिचय देते हैं वो यहां पे लिखने हैं की ठाकुर मास्टर के साथ बात कर रहे हैं कभी-कभी लिखने हैं की मनी के साथ बात कर रहे हैं कभी-कभी लिखने हैं की मोहिनी मोहन के साथ बात करें और कभी-कभी लिखने हैं एक भक्ति के साथ बात कर रही है ऐसा ना हो जाए की मास्टर महाशय के साथ में ठाकुर ने इतना सर बातें किया ऐसा बोल करके हमको मास्टर महाशय पे इतनी श्रद्धा भक्ति ए जाए तो उसे समय जीवित है तो ठाकुर के पास जान की वजह उन्हें के पास जाकर के बैठे रहे वो काली कृष्णा महाराज गिरजानंद जी महाराज वो तो यंग थे उनका नाम था काली कृष्णा कॉलेज में पढ़ने थे और काली कृष्णा महाराज बाद में जी सन्यास नाम हुआ और हमारे संघ के प्रेसिडेंट महाराज हुए किंतु यह पहले की बात है जब वो कॉलेज में पढ़ाई करते थे कृष्णा महाराज है शुद्धनान जी महाराज सुधीर महाराज वह सब जो है उन लोगों का पूरा एक दाल था मैंने वो ग्रुप था वह लोग रामचंद्र डेट के पास में उसे समय तो क्या था की वह नगर मठ के बड़े में किसी को पता नहीं था और ये रामचंद्र डेट क्या करते थे नगर कीर्तन करते थे और वो दीवारों पे बड़े-बड़े अक्षर से लिख देते थे की काकुर्गाची में ठाकुर का इस उत्सव का पालनपुर हो रहा होने वाला है इस उत्सव का वो जो है इस महोत्सव जो है उसका आयोजन करने वाले हैं तो आप सबको निमंत्रण है तो ऐसा करके वह मटकी वो पब्लिसिटी करते थे एडवर्टाइज करते थे तो यह सब लड़के लोगों को ठाकुर के बड़े में पता था वह कथामृत हो सकता है की थोड़ा बहुत कहानी उसे समय पब्लिश हुआ होगा तो उसे समय पब्लिश नहीं हुआ था किंतु ठाकुर के बड़े में जनरल कुछ कुछ लोगों को मालूम होने लगा था तो यह लोग भी गए उन्होंने देखा की ठाकुर के बड़े में जानना है तो राम रेड के पास जाता है तो वहां पर रामचंद्र डेट के साथ में बहुत साड़ी बातें कर रहा है अभी कुछ दोनों के बाद में काली कृष्णा महाराज को पता चला काली कृष्णा महाराज एन की सुधीर मराठा मोस्ट प्रोबेबली काली कृष्णा महाराज उनको पता चला की उनके जो मास्टर महाशय है वो एकदम उनका वो जो स्वभाव है उनका वो जो पर्सनेल्टी है वो इतना गरिमामई है इतना शांत वो सुधीन उनका नेचर है जैसे की अमृत की सुधा जैसे बरस रही हो उनके चारों और और वो क्या है की इतना सुंदर उनका नेचर है पढ़ाई लिखी में भी वो बहुत ही मां है वो मिश्रण निपुण है और क्या है की जब वो रिसर्च होती है माने उसे समय वो बाकी सब टीचरों के साथ में स्टाफ रूम में इकट्ठा होकर के हल्ला गला नहीं मचाते कहानी अकेले में छठ पे चले जाते हैं और एक डायरी खुलकर के बड़ा ही मानो ध्यानपूर्वक उसका अध्ययन करते रहते हैं तो यह काली कृष्णा महाराज भी उनके पीछे-पीछे गए और एक दिन क्या है की जो आध्यात्मिक धार्मिक जी पे संस्कार अच्छे होते हैं वे लोग इस तरह के लोगों से धार्मिक पुरुषों से स्वत ही आकर्षित होते हैं तो वो उनके पीछे पीछे गए छठ के ऊपर में देखा की मास्टर महाशय वो एक व्यक्ति हैं तो उन्होंने जाकर के उनसे बात करने का पर्यटन किया तो उन्होंने बड़े अच्छे से उन्होंने बात किया उनके साथ में फिर धीरे-धीरे करके काली कृष्णा महाराज का मास्टर महाशय के साथ में परिचय बढ़ता गया तब उनको पता चला की ये मास्टर महाशय बीट हापुर के पास जाते थे और इतना ही नहीं ठाकुर ने जो कुछ बातें की है उन्होंने लिख करके राखी है और क्या कहा उन्होंने की देखो की तुम लोग वराह नगर मठ में जो वहां पे ठाकुर के त्यागी संतान रहते हैं और वही लोग हैं जो की ठाकुर की जो धरोहर है ठाकुर का यह जो मैंने इन्हेरिटेंस है उसके सही सही वास्तव जो है आध्यात्मिक संपादक वह इत्यादि शिष्य है हम लोग जैसे मैं वह हम लोग तो चलो ठाकुर कोई पास जाते थे आशीर्वाद प्राप्त किया हैं किंतु हम लोग जो है सही-सही वृस्तार नहीं है हम लोग सेकंड लाइन में आएंगे ये त्यागी संतान पहले लाइन में आएंगे तो ये बात सुनकर के काली कृष्णा महाराज द्वारा नगर मठ में गए वो पहले दिन का वर्णन बहुत ही सुंदर है वो गए जाकर के देखा तुम फर्स्ट फ्लोर था वो तो पूरा धसी गया था दिलवाले वगैरा और वो पूरा घास वगैरा युगा हुआ था निकाला हुआ था कोई पशु पक्षी भी वहां पे र रहे थे किंतु पहले जो फर्स्ट फ्लोर था वो ठीक था थोड़ा बहुत थोड़ा बहुत वैसे वो पूरा खंडहर जैसा ही था वो पूरा मकान तो फर्स्ट फ्लोर पे गए तो देखा एक होल है बड़ा सा और इसमें और जमीन पे चटाई लगा करके वो जो कारपेट लगा करके वो जो है वो जो बंबू का वो जो चटाई आता है ना वो लगा करके कुछ ये लोग गुरु भाई लोग बैठे हैं समय था तो कोई सोया हुआ है कोई लेट हुआ है कोई बैठा हुआ है जैसे काली कृष्णा महाराज और एक दो उनके वह साथ में गए थे वो जाकर के लड़के लोग जैसे ही वो वहां पे गए वर्णन नगर में वैसे ही ये गुरु भाई लोग उनको इतना प्रेम पूर्वक अमानत हमने उनको सत्कार किया बिताया उनके साथ में बात की ठाकुर की बातें हुई वह लोग क्या पढ़ाई लिखी करते हैं यह सब उनको पूछा गया और ठाकुर का प्रसाद दिया और कहा जान के समय की फिर से आना जब जान के समय कालीकृष्ण महाराज सोचते हैं की अरे कहां स्वर्ग में ए गए हैं और कैसे देवताओं के साथ में जैसे बात कर रहा है इन लोगों का स्वभाव देखिए जैसे की वह मनुष्य के ही नहीं पृथ्वी पे भगवान शिवा स्वयं यदि चल रहे होते तो वो कैसे दिखते तो ऐसे गुरु भाइयों का यह जो तेज प्रदीप्त चेहरा जो है वहां पे वो जो ओजस जो है चेहरे पे वो जो आत्महत्या जो है वो झलक रही है उनकी बटन में से जैसे मधु वर्षण हो हां है जैसे सुधा की बारिश हो रही है इस तरह से यह मैंने मनुष्य है ही नहीं ये लोग तो देवता है ये देखने के बाद में जो है काली कृष्णा महाराज और ये जो सब लड़के लोग थे उन्होंने कपूर्गाची जाना बैंड कर दिया और फिर वहां से वो नियमित बेलूर मठ बड़नगर मठ में जान लगे और इतना लिखने के बाद में काली कृष्णा महाराज कहते हैं की जब हम वो रामचंद्र डेट के पास जाते थे तो हमको लगता था की वही ठाकुर के सर्वश्रेष्ठ शिष्य है और यह नरेंद्र वगैरा जो है उनको ठाकुर के ऊपर में श्रद्धा ही नहीं थी क्यों नहीं थी क्योंकि वह तो सभी देवी देवताओं की मैन वो सभी धर्म की फिलासफी पढ़ने हैं और क्रिश्चियन फिलासफी भी पढ़ने हैं अद्वित वेदांत की फिलासफी भी पढ़ने हैं ठाकुर के ऊपर में श्रद्धा होती तो यह वेदांत है क्रिश्चियनिटी है ना की फिर बुद्धिस्म है यह सब पढ़ने की उसके बड़े में चर्चा करने की क्या जरूर है आप ठाकुर आशीर्वाद मिल गया तो सब कुछ मिल गया अर्थात और दूसरे वेदांत पढ़ने हैं या तो फिर मैंने ये तंत्र मैन शक्तिशाड़ना के बड़े में अभ्यास करते हैं तो उसका एक ही अर्थ हुआ की नरेंद्र को और बाकी जो जितने भी ग्रुप है वो त्यागी शिष्य उनको ठाकुर पर विश्वास नहीं है बस मुझे ही ठाकुर पर सबसे ज्यादा विश्वास है ऐसा वो रामचंद्र डेट कहते थे तो ये लोग भी भ्रमित हो गए थे बेचारे काली कृष्णा महाराज वो सोने लगे की सही-सही क्या मतलब वो रामचंद्र इतने ग्रेट है की ठाकुर के स्वयं आशीर्वाद सबसे प्रधान शिष्य ठाकुर के आशीर्वाद प्राप्त किया हुए तो किंतु जब वह नगर मठ में आए तब उनका ये ब्रह्म दूर हो गया तो देखिए यदि आप इसे झूठ भी बोलते हैं तो लोगों को पता चल जाता है की आप अपना अहंकार जो है वो उसको ठाकुर के वो जो उपदेश है उसके ऊपर में आप अहंकार का एक पर्दा चड्ढा करके आप लोगों को बता रहे हैं मैं ये जो आलम बाजार मठ जो है वो अभी तो हमारे पास ए गया है पहले हमारे पास में गीता अभी कुछ तीन-चार महीने पहले की ही बात है वह बेलूर मठ को वह दिया गया इससे पहले हम लोग जो ट्रेनिंग सेंटर में थे तब वहां की हमको मुलाकात के लिए वो कोलकाता के जितने भी तीर्थ स्थान है उसकी वो मुलाकात के लिए उसकी यात्रा करने के लिए हमको ले गए थे तो हमने जाकर के देखा था आलम बाजार में की ठाकुर मास स्वामी जी के छोटे-छोटे तीन फोटो है उसके पीछे बड़ा सा वहां का वो जो उसे समय के वो जो थे साधु या जो भी हो बहुत बड़ी एक मूर्ति और फोटोग्राफ है और उसके सामने तीन स्वामी जी के छोटे-छोटे तो मैंने भी सोचा की अरे वो अपने को ठाकुर महा और स्वामी जैसी भी इतना बड़ा माने वाला कौन है ये सब तो जो भी है उनका नाम भी है अभी किसी को याद नहीं है मुझे तो याद नहीं है वो आए और चले भी गए और ठाकुरमार स्वामी जी सनातन हमेशा के लिए रहेंगे तो मास्टर महाशय का अहंकार जो है इस तरह से निर्मल हो चुका था की उन्होंने ठाकुर के साथ इतनी साड़ी बातें की और उन्होंने खुद कथामृत का पूरा लेखन किया किंतु अभी सब समय यदि ठाकुर मास्टर के साथ बात कर रहे हैं मास्टर के साथ बात कर ऐसा लिखेंगे तो हमको ऐसा लगेगा अरे मास्टर महाशय कितने ग्रेट थे तो अपनी ग्रेटनेस को छुपाने के लिए कर नाम अपने अपने लिए विभिन्न जगह पे उसे करते हैं कहानी बोलते हैं मास्टर कहानी बोलते हैं मनी कभी कहते हैं मोहिनी मोहन और कभी कहते हैं एक भक्ति मैन एक भक्ति लिखने से वो कोई भी हो सकता है वो मास्टर भी हो सकते हो और भी कोई हो सकता है तो इतनी हद तक जो है उन्होंने अपने अहंकार को निर्मल कर के रखा था और जब कथामृत का वह जो फर्स्ट ड्राफ्ट उन्होंने जब स्वामी जी को भेजो तो स्वामी जी ने वो रिप्लाई में लेटर में क्या लिखा था की आ डायलॉग ऑफ ऑपरेटिंग आर प्लेटो जो ओवर बट यू हैव कैप्ट योरसेल्फ हिडन कंपलीटली इन दिस राइटिंग मिलिट्री बहुत बड़ा धर्मगुरु था फिलॉस्फर था तो उसके जो शिष्य था प्लेटो उसने सोक्रेट्स के डायलॉग लिख दिए थे किंतु ऐसा लगेगा की वह सोक्रेट्स के डायलॉग पढ़ते-पढ़ते की बहुत साड़ी जगह पे प्लाटों ने अपने खुद का मत जो है वो सिक्योरिटी इसके नाम पे चला दिया है किंतु जब मास्टर महाशय ने जब कथामृत का फर्स्ट ड्राफ्ट लिखा और बाद में भी संपूर्ण कथामृत में अपने को संपूर्ण रूप से छुपा के रखा है ये पूरे ठाकुर की ही बातें हैं उन्होंने अपने बड़े में अपना खुद का मत अपनी खुद की पर्सनालिटी या अपना खुद का वह जो लाइक सेंट डिसलाइक से अपने खुद की टेंडेंसी जो होती है यहां पे बिल्कुल भी जो है प्रकाश में नहीं आने दिया तो ये स्वामी जी ने खुद ने मास्टर महाशय को प्रेस करके कहा है तो यह तो बात हुई दक्षिण पूर्व के और हम अच्छी और मनी की दो ही लाइन अभी हुई अभी ठाकुर बोलते हैं योगिया का मां सदा ईश्वर में लगा राहत है सदा आत्मक राहत है शून्य दृष्टि देखते ही उनकी अवस्था सुचित्र हो जाति है समझ में ए जाता है की चिड़िया अंडे को से रही है सर मां अंडे की ही और है ऊपर दृष्टि तो नाम मंत्र है अच्छा ऐसा चित्र क्या मुझे दिखा सकते हो मनी ने कहा जैसी अाग्यश्ता करूंगा यदि कहानी मिल जाए आपको यदि पता होगा तो बंगाली कथामृत में इसमें हिंदी में तो नहीं है बंगाली कटहनुत में इस तरह का एक रेखाचित्र वो उसके शुरुआती में ही दिया हुआ है एक पंछी का एक घोंसला है एक वो उसका ये जो है घर उसका उसमें वो अंडे दिए हुए है उसके ऊपर में पंछी बैठा है इस तरह का रेखाचित्र बंगाली कथामृत के स्वरूप में है अब एटलिस्ट में खरीदना था उसे समय की एडिशन में था अभी के एडिशन में पता नहीं तो अभी देखिए की है इसकी इस ख्याल ख्याली दृष्टि मैन बांग्लादेश से रहा है तब पंखे की दृष्टि कैसी होगी मैन आंख तो खली है किंतु उसका मां जो है वो वहां पे नहीं है उसकी दृष्टि नजर है किंतु मां नहीं है मां कहानी और कहानी पे बैठा है मां अंडे पे जाकर के बैठा है तो वैसे ही योगी जब वह बैठ करके चिलम फूंक रहा है चिलम मैंने अर्थ की वो जो पाइप होती है वो जो पुराने जमाने में होती है गोल एक शॉप की वो चिलम में भीतर में तंबाकू भर देते हैं ट्रेडिशनल वो जो साधु सन्यासी योगी रहते थे वह जटाधारी वो मैन वो शरीर पे भस्म ले पी और वो जो अंगवस्त्र में वो सिर्फ वो कमर पे एक वस्त्र सिर्फ लगा है इस तरह वो पुराने योगी को देखेंगे तो बैठ करके वह चिलम पी रहे होंगे तो उसमें की दृष्टि जब वह स्मोक करते हैं धूम्रपान करते हैं देखेंगे की वैसे आंख खली है किंतु मां कहानी और ब्रह्म सत्ता में विचारण कर रहा है मां कहानी पूरे विश्व ब्रह्मांड का भ्रमण कर रहा है शरीर बैठा है छोटे छोटा सा एक तारा है अपना सूर्य ये छोटे से तारे का एक छोटा सा ग्रह है पृथ्वी उसमें चींटी जैसा हमारा शरीर है तो शरीर बैठा है इस पृथ्वी ग्रह के ऊपर में मां किंतु पूरा जो हाय डाइमेंशनल यूनिवर्स एक कॉसमॉस है वहां पे वो विचारण कर रहा है आत्मा जो ब्रह्मा सत्ता जो है ये जो ब्रह्मा समुद्र उसमें वो जो है वो कहानी वो मछली की तरह वो विचारण कर रहा है या तो ये ब्रह्मा आकाश जो है उसमें पंखे की तरह वो उड़ रहा है तो ऐसे वो पुराने योगिया को देखकर के वो भाव आएगा तो इस तरह मैं बेलूर मठ में पहले बार गया था तो मेक साधु को पहचानता था हेड क्वार्टर में तो मैं वहां पर जाकर के उनको प्रणाम करने के लिए गया की मैं आया हूं मठ में और आप कैसे हैं और जैसे वो सिर्फ एक राहत है की जूनियर साधु जो होते हैं सीनरी साधु को प्रणाम करने के लिए जाते हैं तो इस महाराज की ऑफिस में जाकर के देखा तो एक ऐसे एक साधु का एक फोटो रखा था मैंने एक जंगल है और बहुत कम है किसी ने पेंट किया था ये मैंने किंतु देखिए पहले के जो पेंटर थे ना वो देवी-देवताओं की जो चित्र भी वो अंकित करते थे ना तो उनके चेहरे पे कैसा एक सुमधुर एक सोमिया भाव राहत था ऐसा एक दिव्या भाव राहत था आजकल आप देखेंगे की देवी देवताओं का जो चेहरा भी अंकित करते हैं ना तो उनके चेहरे पे जैसे ब्लैक दिखते हैं जैसे की कोई भाव ही नहीं है जैसे कोई दिव्या उनके भीतर में जो आनंद है वो चेहरे पे प्रकट ही नहीं होता चेहरा देखेगा सुंदर किंतु यह तो बाकी है सौंदर्य होगा भीतर का सौंदर्य है और आंखों में होंठ की वह रचना है उसमें वह चेहरे का वो जो लालित्य है उसमें वो प्रगति ही नहीं होगा मैन ब्यूटीफुल देखेगा किंतु दिव्या नहीं दिखेगा शांत आशीर्वाद महीने ही दिखेगा तो पहले के चित्रकार ऐसे थे तो ऐसे ही किसी पहले के चित्रकार ने ये चित्र दो था वो जंगल है नदी है पहाड़ है और वृक्ष के नीचे साधु बेटा है और बैठ करके वो चिलम वो फूंक रहा है वो तो देख करके ही मेरे मां में इतना सुंदर वो एक भाव प्रकट हुआ इतना मुझे अच्छा लगा इतना मां को सुकून मिला मैंने कहा देखो की इस तरह का चित्र होना चाहिए अपने ऑफिस में की जैसे की वो दिन भर ये हम लोग जो है कम करते रहते हैं 10 लोगों के साथ में बातें करते रहते हैं तो एक चित्र के सामने देखकर के किंतु मानपुर ठंडा हो जाएगा तो इस तरह का चित्र ठाकुर इसलिए कहते हैं की ऐसा कोई चित्र जो है तुमको मिले तो ला करके मुझे देना तो मैं अपने रूम में लगाऊंगा दक्षिणेश्वर में जाएंगे तो ठाकुर के कमरे में सब तरह के वो चैतन्य महाप्रभु के विभिन्न विभिन्न अवतारों के वो जो छैयां है वो फोटोग्राफ फोटोग्राफ्स तो समझ नहीं थे छवि है सबकी वो चित्र है तो यह सब को देखकर के वो मां को सुकून मिलता है मां जो है हमारा अंतर मुख होता है जो राजस्व है चंचलता है उससे मां ऑटोमेटिक रिमूव हो जाता है तो आज यही तक कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति