मङ्गलाचरण
ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिने अवतार वरिष्ठाय रामकृष्णायते नमः
सारदानन्दजी: सेवा के आदर्श की कहानी
आलम बाजार मठ में काली महाराज को एक दिन वो लेटे हुए थे एकाएक हाथ पैर फूलना शुरू हो गया और इतनी पीड़ा शरीर में हो रही है। किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा। डॉक्टर को बुलाया गया। वे लोग भी समझ नहीं पा रहे कि ऐसा क्यों होता है? क्यों हो रहा है। इस तरह का रोग कभी देखा नहीं। फिर थोड़ा सा स्टडी करने के बाद पता चला टेप वॉर्म जिसको कहते हैं यह राजस्थान में या तो वृंदावन में ज्यादा पाया जाता है। ऐसा कुछ काली महाराज को हो गया है और इतना ही नहीं इसका क्या ट्रीटमेंट है कोलकाता के डॉक्टरों को पता नहीं था उस समय शुरू में धीरे-धीरे करके कुछ ना कुछ ट्रीटमेंट डेवलप तो किया उसमें भी जो यह पैर फूलना शुरू हो गए थे तो पैरों को बांध करके उसको रखा गया था जिससे कि थोड़ा सा भी हलनचलन ना कर पाए। अभी इस तरह से बेचारे काली महाराज को लंबा समय भुगतना पड़ा और बाय द टाइम वो ठीक हो गए उनकी बीमारी पैरों में इतना वीकनेस आ गया कि चलने की भी क्षमता नहीं रही क्योंकि लंबे समय तक पैरों को बांध करके रखा गया था और यह जो बीमारी है जो कि काफी इनफेशियस है तो उस समय भाई शरद महाराज ने अपने ऊपर में पूरा जिम्मा ले लिया कि काली महाराज की सेवा करेंगे। दिन रात उनके पास में बैठे रहते थे और किसी को पास में नहीं आने देते थे क्योंकि इनफेशियस रोग है तो और किसी को इंफेक्शन हो उससे बेटर है कि मुझे ही हो। यह शरद महाराज का सेवा भाव शरद महाराज की सेवा भाव के बारे में अभी कुछ दिनों पहले ही एक कहानी हमने देखी थी। शरद महाराज कहते हैं कि देखिए साधन भजन करके कुछ मिला नहीं मिला यह तो मुझे समझ में नहीं आता। किंतु अभी मैं चाहता हूं कि लोगों की सेवा करके ही मैं अपना जीवन जैसे कि पात कर दूं। जीवन मैं अपना समर्पण कर दूं। तो इतना प्रेम से इतना स्नेह से सेवा करते थे। सब समय उपस्थित रहेंगे। उनके भीतर में इतनी करुणा उस समय प्रकट हुई थी कि देखकर के लगेगा कि चेहरे पर जैसे कि देव भाव स्पष्ट रूप से दिख रहा है। तो वि इज यूनिक रामकृष्ण संघ में यह सेवा का आदर्श और फिर जब काली महाराज यह ठीक हो गए और पैरों को जो बांध के रखा गया था उसको खोला गया। अभी पैर इतने कमजोर है, इतने कमजोर है। काली महाराज बेचारे स्वामी अभेदानंद जी उनको चलने में भी बड़ी दिक्कत होती है। बड़ी तकलीफ होती है। तो फिर शरद महाराज स्वामी शारदानंद जी वो क्या करेंगे? काली महाराज का हाथ पकड़ करके उनको चलने का प्रैक्टिस करवाएंगे। एक हाथ में लाठी है और एक हाथ शरद महाराज ने पकड़ा है और जहां पर भी जाना है शरद महाराज उनको ले जाएंगे। किंतु क्या है जो पैर में जो पीड़ा होती है वो इतनी भयानक थी। मुझे पता है मैं राजकोट में था तो मेरा राजकोट में पोस्टिंग होने से पहले की घटना है। वहां के पुजारी महाराज चलते-चलते गिर गए थे। तो गिर गए तो पैरों में इतना सीरियस फ्रैक्चर जैसा कुछ हो गया था कि लंबे समय तक पैरों को प्लास्टर करके रखना पड़ा था और फिर जब प्लास्टर खोला गया और फिर से उनको फिजियोथरेपी में भेजा गया जिससे कि पैरों का सर्कुलेशन पैरों का जो नॉर्मल फंक्शन है वह वापस आए तो यह पुजारी महाराज जब मैं गया था तो वो पूरे ठीक हो गए थे किंतु वो बता रहे थे मुझे कि जब यह फिजियोथरेपी में पैरों को मोड़ा जाता था, सीधा किया जाता था। इतना दर्द होता था, मैं जोर-जोर से चिल्लाता था। अभी आप देखिए कि साधुओं का वैसे सहनशक्ति थोड़ा ज्यादा होता है और पुजारी महाराज तो काफी तपस्वी है। तो वो लोग यदि चिल्लाएंगे जस्ट इमेजिन कि यह पैरों में ऐसा कुछ होने के बाद में फिजियोथरेपी ट्रीटमेंट लेना कितना मुश्किल है। कितना पेनफुल है। और यह घटना तो आलम बाजार मठ की है। उस समय तो हमारा शिव का संसार था। कहां यह हॉस्पिटल, कहां यह फिजियोथरेपी, जो कुछ भी करना है अपने ही करना है। शरद महाराज जो सेवा करेंगे वही है बेचारे काली महाराज का फिजियोथरेपी। तो अभी काली महाराज को पैर में दर्द होता है। बार-बार मना करते हैं कि मेरे से चला नहीं जाएगा। सीढ़ी नहीं उठी जाएगी। माने जो डॉक्टर जनरली एडवाइस देते हैं अभी पैरों को फिर से आपको फंक्शनल करना है तो सीढ़ी चढ़ना उतरना आपको सीखना होगा अदरवाइज तो कैसे काम होगा हमेशा के लिए पैर जो है निकम्मे होकर रह जाएंगे आप यदि इमीडिएटली यह फिजियोथरेपी ट्रीटमेंट नहीं लेंगे तो तो अभी काली महाराज बेचारे कष्ट के मारे उन्हें नेचुरल है इतना पेन किससे सहन होगा आजकल की तरह यह यह मेडिसिन वो मेडिसिन हम लोग तो क्या है कि जनरली पेन को भूल ही गए हैं क्योंकि मेडिसिन ये इंजेक्शन वैक्सीन वगैरह इतना सब कुछ है अभी आज के मॉडर्न युग में उस समय तो कुछ नहीं था ये गिरीश घोष का एक नौकर था उड़िया नौकर एक दिन गिरा गिरा तो हाथ की हड्डी खिसक गई अभी वह बैठ के रो रहा है इमेजिन कीजिए हाथ की हड्डी खिसक जाना माने वो कितना पेन होगा तो गिरीश घोष उसने उसको एक पैसा दिया। कहा कि इसका जलेबी खरीद करके तुम दक्षिणेश्वर के परमहंस है। जाओ उनको कहो कि तुम्हारा हाथ ठीक कर दे। तो बेचारा देखिए इतना पेन में एक पैसे का जलेबी बाजार से खरीद किया। चलता-चलता दक्षिणेश्वर गया। जाकर के ठाकुर को कहा कि देखिए मेरा हड्डी खिसक गया। आप कुछ कर दीजिए। तो ठाकुर पता नहीं उस समय कैसे उदार भाव में करुणा के भाव में आ गए। कहा अच्छा ठीक है जा तुमको ठीक हो जाएगा तो अभी बोलने से तो ठीक होगा नहीं बेचारा ऐसा ही हाथ लेकर के वापस आया रोते-रोते तो गिरीश कहते हैं कि क्या हुआ रे तो बोला कि परमहंस महाशय ने तो कहा ठीक हो जाएगा तो अभी तो ऐसा ही ऐसा ही है तो गिरीश कहता है कि नहीं नहीं तो थोड़ा विश्वास रखो देखो क्या होता है दूसरे दिन क्या हुआ चल रहा था तो फिर से गिरा गिरा तो ऐसा गिरा कि जो खिसकी हुई हड्डी थी वो ठीक हो गई वो दौड़ा दौड़ा आकर के गिरीश को कहता है देखिए वहां से अभी ठीक हो गया। तो देखिए कि दिस वास ट्रीटमेंट का लेवल था उस समय का। ऐसा नहीं कि कुछ हुआ फटाक करके डॉक्टर के पास में दौड़ो डॉक्टर मिलता है नहीं मिलता है। पैसा कितना लेगा वो सब अनिश्चित था। तो यहां पे भी काली महाराज का फिजियोथरेपी ट्रीटमेंट शरद महाराज कर रहे हैं। किंतु काली महाराज का रेजिस्टेंस इतना है कि अभी सब लोगों को थोड़ा डर लग गया। यह पैर ठीक होंगे कि नहीं होंगे और साधु है प्रवरजाज्या वगैरह तो सब करते ही है सब काम करना है उसमें यदि इस तरह से बैठ जाएंगे और उनका तो तपस्या करनी है कैसे चलेगा तो एक दिन फर्स्ट फ्लोर पर था मठ तो तो उनको ग्राउंड फ्लोर पर ले गए आलम बाजार में शरद महाराज एक जगह पर बिठाया बड़े प्रेम से बातें कर रहे हैं। फिर शरद महाराज ने कहा अच्छा मैं एक मिनट आता हूं। ऐसा बोलकर के ऊपर में चले आए। अभी ऊपर में चले आकर के काली महाराज को बोलने लगे। अच्छा भाई काली तुम आ जाओ ऊपर। तुम चलो अपने से देखो चलते चल सकते हो कि नहीं? तो सुनकर के काली महाराज तो एकदम बेचारे घबरा गए। बोल रहे अरे भाई मेरे पैरों में तो तुम देख रहे हो। इतने दिन तक बांध के रखा। मैं चल भी नहीं पा रहा। क्या करूं? तुम आओ नीचे मुझे हेल्प करने के लिए। तो शरद महाराज नीचे आने की बजाय वहां पर खड़े रह के ऊपर में फर्स्ट फ्लोर पर जोरजोर से गाली देने लगे कि तुम्हारे में एक पैसे का भी अकल नहीं ये वो वो जो भी मतलब भयानक गाली देना शुरू कर दिया। आओ तुम ऊपर क्यों नहीं आ पाओगे? तो काली महाराज तो बेचारे क्या करें? बैठे-बैठे रोना शुरू कर दिया। वो दूसरे गुरु भाइयों को बुलाने लगे। कौन कहां पे है? आओ हेल्प करो। कोई नहीं दिख रहा है। भाई शरद महाराज जी खड़े-खड़े गाली दे रहे हैं। वो बेचारे काली महाराज रो रहे हैं। रो रहे हैं। फिर एकाएक भीतर में से क्रोध प्रकट हुआ। अच्छा मुझे इतना गाली देते हो। अच्छा मैं तुमको देख लेता हूं। बोल के काली महाराज भी गुस्से से गाली देना शुरू किया। वो जो लाठी थी उसका सहारा लेकर के कैसे भी तो खड़े हुए और कैसे भी करके प्राण की बाजी लगा के एक के बाद एक सीढ़ी के स्टेप्स चढ़ते-चढ़ते फर्स्ट फ्लोर पे आए। जैसे ही फर्स्ट फ्लोर पे आए देखा सभी गुरु भाई आपस दीवार के पीछे में छुपे हुए थे। वो सब बाहर आ गए और सब जोर-जोर से हंसीखुशी आनंद मनाने लगे। अरे देखो कालू भाई देखो तुमने सीढ़ी चढ़ लिया। कितना अच्छा किया। और फिर शरद महाराज बड़े ही म विनम्र भाव से कहते हैं कि देखो भाई मुझ पर गुस्सा मत करना। डॉक्टर ने ही मुझे बताया था कि तुम लोग यदि ऐसा कुछ नहीं करोगे और काली महाराज यदि अपने से चलना नहीं शुरू करेंगे तो फिर क्या है उनके पैर कभी ठीक नहीं होंगे। इसलिए मैंने ऐसा किया तो तुम गुस्सा मत करना। तो देखिए ये जो हृदय जो उदार हो जाना और इसी उदार हृदय में दिव्य भाव प्रकट होना ये कितना रामकृष्ण संघ का एक यूनिकनेस है वो फेमस कहानी तो सबको पता है राजा महाराज और हरि महाराज स्वामी जी को आबू जंक्शन रोड पे उनके साथ में मुलाकात हुई थी तो स्वामी जी ने क्या कहा देखो भाई धर्म कर्म कितना हुआ पता नहीं किंतु हृदय बड़ा उदार हो गया है। सभी के लिए मेरे प्राण रोते हैं। तो यह हृदय का उदार होना
ब्रह्म-शक्ति-अभेद: मन की पवित्रता और हृदय की उदारता
सभी के लिए प्राणों का रोना यह यदि आप संसार जिसको आप यदि मिथ्या कह के उड़ा देंगे तो यह बात कभी भी क्या है कि फिलॉसोफिकली उसका कोई प्राधान्य नहीं रहेगा। इसीलिए जैसे हमने यह थोड़ा सा एनालिसिस किया कि एक ओर तो गडपादाचार्य ने अजातिवाद बोलकर के संसार का अस्तित्व ही उड़ा दिया है। तबकि शंकराचार्य ने गपादाचार्य के अजातिवाद को थोड़ा सा मॉडरेट करके कहा कि पारमार्थिक सत्य के रूप में संसार नहीं है किंतु व्यावहारिक सत्य के रूप में संसार है। और देखिए इसको थोड़ा सा हम एनालिसिस करते हैं। प्रॉब्लम कहां से खड़ा होता है? जैसे हमने कल भी थोड़ा सा डिस्कस किया था। यह वैदिक कर्मकांड जो है वह इस हद तक हमारी हिंदू सभ्यता को मटेरियलिज्म की ओर लेकर गए थे कि हमको यदि इसमें से थोड़ा सा बाहर नहीं आएंगे तो फिर होगा क्या? वही मटेरियलिज्म में ही डूब जाएंगे। धर्म सिर्फ अर्थ और काम को प्राप्त करने का एक साधन मात्र हो जाएगा। एक लुटेरा है, एक क्रिमिनल है, एक महाभोगी राक्षस है। उसमें और धार्मिक व्यक्ति में डिफरेंस क्या है? वो जो राक्षस है, विोचन के संतान और यह देवता ये जो देवता और राक्षस सुर और असुर इन दोनों में फर्क क्या है? देखिए दोनों को काम और अर्थ चाहिए। वही है कि असुर जो है राक्षस जो है वे लोग अधर्म के रास्ते पर काम और अर्थ प्राप्त करते हैं और देवता जो है जो वो धर्म के रास्ते पर काम और अर्थ को प्राप्त करते हैं। किंतु दोनों के जीवन का लक्ष्य तो अर्थ और काम की प्राप्ति ही है। जबकि आत्मज्ञान एक ऐसा नया कांसेप्ट डेवलप हुआ है कि जहां पर अर्थ और काम को संपूर्ण रूप से वर्जन कर देना है। तो यदि अर्थ और काम को आप साथ में रखेंगे तो ब्रह्म ज्ञान प्राप्ति नहीं होगी। इसीलिए शंकराचार्य जो कहते हैं ज्ञान और कर्म दोनों साथ में नहीं रह सकते। कर्म जो है कर्म कहो धर्म कहो वह है आपका अर्थ और काम को प्राप्त करने का साधन। जब तक अर्थ और काम को प्राप्त करने का साधन आप अनुष्ठान करते हैं तब तक ब्रह्म ज्ञान आपको कैसे प्राप्त होगा? ब्रह्म साक्षात्कार कैसे होगा? ब्रह्मी स्थिति में आप स्थित कैसे होंगे? निर्वाण कैसे प्राप्त होगा? यानी कि यहां पे है धर्म, अर्थ और काम का रास्ता। यहां पर है मोक्ष मार्ग। मोक्ष मार्ग के लिए आपको कर्म को संपूर्ण रूप से त्याग करना होगा। अभी यहां पर देखिए कर्म की थ्यरी को थोड़ा सा समझते हैं। देखिए कर्म की थ्यरी हमको क्या कहती है? जैमिनी ऋषि के अनुसार अभी जैमिनी ऋषि क्या है? ये जो वेद के ब्राह्मण और ये संहिता पोर्शन है उसको सिस्टमेटाइज करने वाले फिलॉसोफर अ भारतीय हिंदू मटेरियलिज्म यदि कहेंगे धर्म के आधार पर बना मटेरियलिज्म तो इसके ऋषि है जैमिनी ऋषि तो जैमिनी ऋषि का जो सेंट्रल कांसेप्ट है कर्म का कांसेप्ट क्या कहते हैं तीन तरह के कर्म है हम जो भी इस संसार में करते हैं धर्म का अनुष्ठान हमको क्यों करना है? सबसे पहले तो वही बात है ना जो राक्षस है जो कि अधर्म के रास्ते पर अर्थ और काम भोग करते हैं उससे आप धर्म के रास्ते पर आएंगे ही क्यों? अर्थ और काम भोग कीजिए। किंतु धर्म के रास्ते पर कीजिए। क्यों? क्योंकि यहां पर अदर वाइज एक भयात वह कहते हैं ना कि भय से इंद्र, चंद्र, यम यह सभी लोग चलते हैं। तो यह भय का एक एलिमेंट इंट्रोड्यूस करना है। यदि पुलिस नहीं रहेंगे इस सोसाइटी में या सिटी में तो कितना क्रिमिनल लोग बढ़ जाएंगे। तो यह पॉलिसिंग सिस्टम जो है अब्राहमिक रिलीजन जो है जिससे कि कहते हैं जुडाइज्म क्रिश्चियनिटी और इस्लाम वहां पे बुरे कार्य का बुरा फल अच्छे कार्य का अच्छा फल कौन देता है तो ईश्वर देते हैं या भगवान देते हैं जो भी नाम से आप उनको पुकारिए तो भगवान है दैट इज अ सेंट्रल अथॉरिटी यहां पे जैसे सिटी में पुलिस एक सेंट्रल अथॉरिटी बिना पुलिस वाले के क्राइम बढ़ जाएगा। वैसे ही यहां पर भगवान जो है एक म्युनिसिपल अथॉरिटी की तरह है। वह है तो क्राइम कंट्रोल में है। मैं क्यों अच्छा बनूंगा? क्योंकि अच्छा नहीं बनके बुरा बनूंगा तो भगवान मुझे दंड देंगे। इटरनल हेल में डालेंगे। अनंत नरक मुझे भोग करना होगा। इसलिए बेटर है कि मैं अच्छा बनूं। तो यह बुराई से अच्छे की ओर जाने की यात्रा ही तो धर्म है। तो यहां पे जैेमिनी ऋषि का जो कांसेप्ट है वो कहते हैं कि देखिए आपको ईश्वर की जरूरत नहीं है कि अच्छे कर्म का अच्छा वो फल दे। बुरे कर्म का बुरा फल दे। नॉट नेसेसरी। आप एक काम कीजिए। कर्म का सिद्धांत इंट्रोड्यूस कीजिए। कर्म का सिद्धांत क्या कहता है? कि अच्छे कर्म का अच्छा फल, बुरे कर्म का बुरा फल। इट्स अ लॉ ऑफ नेचर लाइक ए ग्रेविटी या हम ग्रेविटी के बारे में ऐसा कहते हैं कि कहीं पर एक भगवान बैठा है जो कि ये यदि ये मैं यहां पे एक खड़ा बैठा हूं पृथ्वी पे तो मुझे पृथ्वी पर बांध के रखता है। अभी भगवान यदि सोने को गए तो फिर यह जब भूल गए कि ग्रेविटी के लॉ को अब होल्ड करना है तो मैं सीधा हवा में उड़ना शुरू कर दूंगा। ऐसा कभी होगा? नहीं। ग्रेविटी इज अ यूनिवर्सल लॉ। वहां पे किसी व्यक्ति की आपको जरूरत नहीं है। यह ऑटोमेटिक यह कार्य करता है। तो वैसे ही कर्म का सिद्धांत ऑटोमेटिक कार्य करता है। वो सूर हो ना कि असुर देवता हो ना कि राक्षस ऑटोमेटिक जैसे ही अच्छा कर्म किया अच्छा फल बुरा कर्म किया तो बुरा फल। ऑटोमेटिक होगा। उसमें आपको और कोई चिंता करने की जरूरत नहीं है। ए सेंट्रल ईश्वर उसका कांसेप्ट जो है एज अ म्यनिसिपल ऑथॉरिटी कि वह संसार में यह ऑर्डर लॉ एंड ऑर्डर बना के रखते हैं। वह रोल हटा दिया। आपको लॉ एंड ऑर्डर बनाने का जो ऑथॉरिटी है, कार्य है वह कर्म के सिद्धांत को दे दिया। अभी यह कर्म का सिद्धांत क्या कहता है? आपके तीन तरह के फल फलते हैं कर्म के। एक तो है संचित कर्म। मैंने जो कर्म किए हैं वह स्टोर में पड़े हुए हैं। इसको कहेंगे संचित कर्म। या तो फिर संचित कर्म फल। कर्म और कर्म फल बहुत बार वो सिनोनिमस लिखा जाता है। किंतु संचित कर्म का अर्थ यही है बेसिकली संचित कर्म फल। दूसरा है प्रारब्ध कर्म फल। यह प्रारब्ध कर्म क्या है? कि वह फल कर्म जो है कर्म का फल फलना शुरू हो गया है। और तीसरा है आगामी कर्म। यह आगामी कर्म अर्थात कि इस तरह के कर्म जो कि हमने अभी तक किए नहीं। तो यह जैमिनी ऋषि का जैमिनी ऋषि का यह जो मीमांसावाद जो है पूर्व मीमांसा थ्यरी उनका फिलॉसोफी इसमें यह कर्म के डिवीजन किए गए हैं। संचित कर्म, प्रारब्ध कर्म और आगामी कर्म तीनों जो है हमको कर्म फल देते हैं और उसके अनुसार हमको संभाल के रहना है। यदि थोड़ा सा भी हमने लाइफ में इधर-उधर किया, अवैदिक कार्य किया, अधार्मिक कार्य किया, तो वह कर्म फल संचित होंगे रहेंगे और धीरे-धीरे करके उसको प्रारब्ध के रूप में वह हमको मैनिफेस्ट होना शुरू करेंगे। तो यह है उनका कर्म का सिद्धांत। अभी गौडपादाचार्य खास करके उन्होंने क्या किया? अजातिवाद अर्थात कि सृष्टि की रचना हुई ही नहीं है। यह जो सृष्टि है स्वप्नवत ही है। स्वप्न में आपने जितने कर्म किए क्या वह जागृत अवस्था में उसका कोई कैरी फॉरवर्ड होता है? नहीं होता। ये जिस तरह से यह कर्म का थ्यरी है जैमिनी ऋषि का साथ में ही यह जन्म जन्मांतर का म पुनर्जन्म का थ्यरी वहां पे अप्लाई होता है। कर्म का थ्यरी पुनर्जन्म का थ्यरी यह दोनों साथ-साथ में चलते हैं। अगेन यदि पुनर्जन्म नहीं रहेगा तो फिर यह प्रारब्ध आगामी कर्म वगैरह का कांसेप्ट नहीं रहेगा। वो अब्राहमिक रिलीजन की तरह कि एक बार यह जन्म पूरा हुआ फिर आपका प्लस और माइनस जो भी है कर्म का बैलेंस वह सीधा फिर ऑन द डे ऑफ जजमेंट आखिर में जब आएगा ईश्वर सभी सोए हुए मृत देहों का जजमेंट करेंगे उस समय आपका पॉजिटिव कर्म होगा तो आप स्वर्ग में जाएंगे इटरनल स्वर्ग भोग करेंगे और नेगेटिव होगा तो इटरनल नर्क भोग करेंगे अपने यहां पर जैमिनी ऋषि का जो पूर्व मीमांसावाद है उसमें उन्होंने हमको यह अपॉर्चुनिटी दिया है कि एक जन्म मान लीजिए आपका बुरा गया डजंट मीन कि आपको इटरनल हेल भोग करना है। आप पुनर्जन्म लेकर के वापस आएंगे ही आएंगे और आपके जो नेगेटिव कर्म है उसको पॉजिटिव बैलेंस में कन्वर्ट करना आपके हाथ में है। अच्छे कर्म फिर से करते जाइए। वह नेट पॉजिटिव में परिणत हो जाएंगे। तो यह पुनर्जन्मवाद और कर्म का सिद्धांत यह जैमिनी ऋषि का सेंट्रल कांसेप्ट है। अभी इसके अगेंस्ट में यह जो गडपादाचार्य का अजातिवाद जो कि अपने उपनिषदों के ऊपर में खास करके मांडूक्य के ऊपर में जो आधारित है उनका कहना है ना ही यह कर्म कर्म का सिद्धांत और यह पुनर्जन्मवाद यह दोनों स्वप्न की तरह ही है। स्वप्न में जैसे मैं कितना ही मैं हजार जन्म ले लूं हजार जन्म में हजार अच्छे बुरे कर्म कर दूं मैं जब जागृत होता हूं तो कुछ भी कैरी फॉरवर्ड नहीं होता वो वहां का वहां ही समाप्त हो जाता है तो वैसे ही जिस क्षण मुझे जागृत अवस्था में से मुक्ति प्राप्त हो गई तुरीय अवस्था में मैं जब चला गया तो जागृत अवस्था के जितने भी कर्म थे ये जन्म मृत्यु जरा व्याधि का जितना भी ये फेरा है संसार का वह सब वहीं का वही रह गया। तुरीय अवस्था में कुछ भी कैरी फॉरवर्ड नहीं होता। और तुरीय अवस्था प्राप्त होने से विदेह मुक्ति अर्थात कि चला जाएगा। तो यह हो गया आपका गड पादाचार्य का अजातिवाद। अभी क्या है? शंकराचार्य ने इसको थोड़ा सा मॉडरेट किया। शंकराचार्य ने कहा कि कर्म के सिद्धांत को संपूर्ण रूप से उड़ा देने से नहीं चलेगा। विदेह मुक्ति बहुत ही ज्यादा मतलब अधर वर्ल्डली है। लोग क्या है कर्म के सिद्धांत को स्वप्नवत मानना शुरू करेंगे तो हो सकता है कि कर्म के सिद्धांत का जो ओरिजिनल पर्पस था ये म्युनिसिपल अथॉरिटी का कि अच्छे कर्म का अच्छा फल बुरे कर्म का बुरा वो यदि समाज में से चला जाएगा तो क्या है अनाचार भ्रष्टाचार शायद फैल सकता है जो भी है शंकराचार्य ने जो कुछ भी सोच करके किंतु अजातिवाद को थोड़ा सा मॉडरेट किया कहा कि देखिए व्यवहारिक सत्ता है जगत जगत की यह पारमार्थिक और व्यावहारिक दो लेवल पर बांट दिया। पारमार्थिक लेवल पर अजातिवाद सही है। व्यावहारिक लेवल पे जो है यह माया का सिद्धांत वो बेटर है। यहां पर क्या है देखिए कि आपको यदि मुक्ति प्राप्त होती है तो फिर आपके संचित कर्म और आगामी कर्म यह दोनों तो जल जाएंगे। किंतु आपके जो प्रारब्ध कर्म है यानी कि जो कर्म का फल ऑलरेडी मैनिफेस्ट होना शुरू हुआ है वह प्रारब्ध कर्म अभी चलते रहेंगे उससे आपको मुक्ति नहीं मिलने वाली इवन निर्विकल्प समाधि के बाद भी इवन ब्रह्म ज्ञान के बाद भी और इसीलिए ब्रह्म ज्ञान के बाद जो शरीर रहता है वो प्रारब्ध कर्म का भोग समाप्त करने के लिए है। ये जो प्रारब्ध कर्म जब तक चलते रहेंगे तब तक जो है ये आपका देह टिका रहेगा। जैसे ही प्रारब्ध कर्म समाप्त हो जाएंगे आपका देह जो है वो फिर चला जाएगा। तो यह जैमिनी ऋषि का जो मटेरियलिज्म म धर्म के यह जो राक्षस लोगों का यह जो असुर लोगों का जो अधर्म के बेस पे जो मटेरियलिज्म था उससे यह जैमिनी ऋषि का मटेरियलिज्म धर्म के बेस पे है। वह वन स्टेप ऊपर है। अजातिवाद एकदम हाईएस्ट लेवल पर चला जाता है। शंकराचार्य इसको थोड़ा सा मॉडरेट करके कहते हैं कि नहीं प्रारब्ध कर्म का भोग तो आपको भुगतना ही होगा। मुक्ति के बाद में जीवन मुक्त होकर के आप रहेंगे जब तक आपका प्रारब्ध समाप्त नहीं होता। देखिए ठाकुर यहां पर कहां पर आते हैं? क्या ठाकुर का ऐसा कहना है कि प्रारब्ध कर्म जो है वो निर्विकल्प समाधि के बाद में या तो फिर कहेंगे कि यह ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति के बाद में भी चलते हैं। संचित और आगामी कर्म तो नष्ट हो जाएंगे। प्रारब्ध कर्म का क्या? यह निर्विकल्प समाधि के बाद में शरीर टिकता क्यों है? ठाकुर यहां पे क्या कहते हैं? तो अभी यह मेरा एनालिसिस है। मुझे ऐसा लगता है कि ठाकुर के कहे अनुसार ठाकुर ने कहा ना कि 1000 साल से बंद कमरा हो तो उसमें आप दिया जलाएंगे तो क्या धीरे-धीरे उजाला होगा नहीं कि इंस्टेंटली उजाला हो जाएगा। तो यह सब बातों से मुझे ऐसा लगता है कि ठाकुर इन अ वे गडपादाचार्य को स्वीकार करते हैं कि संचित आगामी और प्रारब्ध तीनों कर्म जो है वह ब्रह्म ज्ञान की स्थिति में जल जाते हैं। नष्ट हो जाते हैं। किंतु यह जो पूरे विश्व के साथ में एकात्मता जो स्थापित हो जाती है ब्रह्म ज्ञान की स्थिति में तो इस एकात्मता से करुणा से परवश होकर के ईश्वर का यह जो ज्ञान प्राप्त हुआ है उसका आनंद लेने के लिए यह जो साधक या तो सिद्ध है वह इति इति करके संसार में वापस आता है। संसार में वापस इसलिए नहीं आता शंकराचार्य के अनुसार जैसे कि प्रारब्ध कर्म का क्षय करवाने के लिए संसार में वापस आता है ईश्वर ज्ञान का आनंद लेने के लिए ईश्वर ईश्वर के साथ में यह नृत्य कीर्तन हास्य यह सब करके आनंद प्राप्त करने के लिए वह वापस आता है। तो दिस इज अ डिफरेंस। वहां पे क्या है कि प्रारब्ध कर्म का भोग करना है। ये जैसे [गला साफ़ करने की आवाज़] कि ना मुझे ऐसा लगता है कि क्या कहेंगे? एक तरह का एक सैडनेस है इसके भीतर में। एक तरह का क्या कहेंगे? कंपलशन है। यहां पे ठाकुर की जो थ्यरी है इति इति करके वापस आना। इसमें कंपलशन जैसा कुछ नहीं है। आनंद ही आनंद है। आनंद का उपभोग करने के लिए अद्वैत में से द्वैत में आया जाता है। चीनी नहीं होकर के चीनी खाना यह पसंद करना, यह अद्वैत ज्ञान के बाद में आनंद का उपभोग करने के लिए वो वापस आते हैं ब्रह्मज्ञानी। सो दैट इज मेरा एक एनालिसिस और इसके बाद में हम लोग जो ये जो पैसेज है कथामृत का फिर से एक बार इसको पढ़ लेते हैं और
नेति नेति या इति इति: संसार त्याग या सबके प्रति करुणा
देखिए यदि यह सही नहीं होता कि ब्रह्म शक्ति अभेद और फिर यह इसलिए नहीं वापस आना कि कर्म का भोग करने के लिए किंतु आनंद प्राप्त करने के लिए वापस आना यह जब यदि सही नहीं होता तो फिर क्या है यह जो हृदय की करुणा यह जो हृदय का खुल जाना सबके प्रति अनंत प्रेम भलो भाषा प्रकट होना यह सब चीजों का कोई प्राधान्य ही नहीं रहता लीला प्रसंग में शरद महाराज ही तो लिखते हैं ना कि इति इति मार्ग से निर्विकल्प समाधि की प्राप्ति। अभी इति इति मार्ग अर्थात कि भक्ति मार्ग तो भक्ति सिर्फ ईश्वर के प्रति भक्ति और संसार में सभी के प्रति स्नेह और प्रेम करुणा और दया यह जो है यह दोनों साथ-साथ में चलते हैं। इसलिए ठाकुर वैसे कहते तो हैं कि नेति नेति करके निर्विकल्प समाधि की प्राप्ति और फिर इति इति करके वापस आना। किंतु बादब बाद में आप देखेंगे कि स्वामी जी है, मां है, बाकी सब डायरेक्ट डिसाइपल है। उन्होंने इस इक्वेशन को जैसे कि फ्लिप कर दिया है। इति इति करके निर्विकल्प समाधि आप प्राप्त कर सकते हैं कि जीव जगत ईश्वर सबके प्रति यदि हमारा एक बार हृदय खुल जाए इनके प्रति करुणा एक का प्रवाह बहना शुरू हो जाए तो फिर ब्रह्म ज्ञान कहीं बहुत दूर नहीं है हमारे लिए। यह जो ट्रेडिशनल जितनी भी साधना है वो साधनाएं करके तपस्या करके जब ध्यान करके ठाकुर कहते हैं कि ध्यान करने को बैठता था तो जैसे कि मेरे देह के जितने भी जॉइंट है लॉक हो जाते थे। खटखट खट करके आवाज आता था और लॉक हो जाते थे। जब तक ध्यान संपूर्ण नहीं होता तब तक यह खड़े होने का कोई प्रश्न ही नहीं रहता था। खड़ा होने का कोई बात ही नहीं आती थी। वो भैरव की ओर इशारा करके ठाकुर कहते थे कि इसकी तरह स्थिर होकर जप करना है, ध्यान करना है। यह जो भैरवी ब्राह्मणी ने जो सब तंत्र साधना ठाकुर के पास करवाई यह जो सब प्रचंड साधनाएं हैं संसार को जैसे कि ठाकुर भूल ही गए थे। तो वह एक रास्ता है और यहां पर देखिए यह शरद महाराज का सेवा भाव जहां पर भी कोई भी बीमार होता है शरद महाराज सबसे पहले वहां पर चले जाते हैं और सबकी सेवा करेंगे अपने देह को अपनी प्राण रक्षा को भी जैसे कि तुच्छ कर देंगे और यह सेवा करतेकरते ऐसा देव भाव प्रकट होगा कि उनके सानिध्य में आने से ही हमारा मन जो है संपूर्ण रूप से शांत हो जाएगा। तो यह इति इति करके आप सेवा करेंगे क्यों नहीं आप पंचवटी में जाकर जप ध्यान करें आलम बाजार मठ या बाद पहले जो वराह नगर मठ वहां पे कौन उनको रोकता था कि आप वहां पर दक्षिणेश्वर जाकर के जप ध्यान मत कीजिए कौन कहता था आलम बाजार मठ या वराह नगर मठ दोनों में अब मठ में भी आपको तपस्या की सुविधा है आप तीर्थ यात्रा में चले जाइए वहां पे भी तपस्या है तपस्या इन्होंने उन्होंने की भी है। किंतु साथ में ही यह जो एक सेकंड एस्पेक्ट डेवलप किया है दैट इटसेल्फ शोज़ कि यह ब्रह्म शक्ति अभेद यदि यह ब्रह्म शक्ति अभेद नहीं रहेगा तो यह बाकी का जो कुछ डेवलपमेंट हुआ है रामकृष्ण संघ में वो क्या है? वह मीनिंगलेस हो जाएगा। हम लोगों को सब समय आज मैं यहां पे आश्रम में विशाखापट्टनम आश्रम में हूं। अ मेरा ड्यूटी है। मुझे जो करना है ऑफिस में जाकर के मेरे मन के भीतर में सब समय यही चलता रहेगा कि कब यह सब छोड़कर के मैं कहीं नर्मदा किनारे चला जाऊं और ठाकुर ने जिस तरह से साधना की है वही करता रहूं। कहां यह स्वामी जी ने झूठमठ का हमको यह सब कर्म बंधन में डाल दिया है। और यहां पर तो फिर भी ठीक है। विशाखापटनम में तो ऐसा कुछ कामधाम जैसा है नहीं। किंतु जैसे वृंदावन है या तो फिर यह कोयंबतूर है ना कि नरेंद्रपुर है ना कि यह जो सब जहां पे प्रचंड कर्म योग चलता है ये हॉस्पिटल स्कूल कॉलेज ये ये स्टूडेंट होम जहां पे प्रचंड कर्म योग चलता है वहां पे जिस तरह से साधु ब्रह्मचारी काम करते हैं इसका तो कोई मीनिंग ही नहीं रह जाएगा। इसलिए देखिए कि ब्रह्म शक्ति अभेद यह कांसेप्ट अह बाकी का जो रामकृष्ण संघ का डेवलपमेंट है उसमें यह बहुत ही इंपॉर्टेंट है। और इसीलिए नेति नेति निर्विकल्प समाधि इति इति यह जो ठाकुर ने कहा, इसके बाद वाला जो इति इति निर्विकल्प समाधि इति इति इसमें परिणत हो जाता है। व्हिच इज सो सरप्राइजिंग। आप यदि सिर्फ अकुर को स्टडी करेंगे तो यह जो रामकृष्ण भावधारा समग्र है उसको आप नहीं समझ पाएंगे।
ईश्वर ही जीव और जगत हुए है
अच्छा यह जो कथामृत जो हमारा पाठ चल रहा है वह जनाई के जो मुकुद्ज है वह चले गए हैं और उसके बाद में मणि सोच रहे हैं कि वेदांत दर्शन के अनुसार सब स्वप्नवत सब स्वप्नवत है तो फिर यह जीव जगत में यह सब क्या मिथ्या है मणि ने थोड़ा-थोड़ा वेदांत देखा था और फिर वेदांत का जो अस्फूट प्रतिध्वनि है कांट हेगेल प्रवृति वगैरह तरह जर्मन पंडितों के विचारों को थोड़ा-थोड़ा पढ़ा था। किंतु ठाकुर श्री रामकृष्ण दुर्बल मनुष्यों की तरह विचार करते नहीं है। जगन माता उनको समस्त दर्शन करवा देती है। तो यही मणि सोच रहे हैं। और फिर जब थोड़ी देर के बाद में ठाकुर वहां पे मणि के साथ में मास्टर महाशय मणि अर्थात मास्टर महाशय तो मास्टर महाशय के साथ में ये जो पश्चिम की दिशा में जो अर्धचंद्राकार वो जो वरांडा है वहां पर बैठकर के वार्तालाप कर रहे थे तो फिर यह मास्टर महाशय पूछते हैं कि जगत क्या मिथ्या है तो ठाकुर कहते हैं मिथ्या क्यों यह सब तो विचारों की बातें हैं। पहले पहले नेति नेति करने के समय वह जीव नहीं, जगत नहीं, चतुर्विंशति तत्व नहीं, यह सब हो जाता है। यह सब स्वप्नवत यह सब आपको कर लेना है। किंतु उसके बाद में अनुलोम विलोम तब वही जीव जगत हुए हैं। यह समझ में आता है। और देखिए जब हम यह डिस्कस कर रहे थे तब हमारे सामने यह भी एक प्रश्न आया था कि क्यों यह जैमिनी ऋषि के मटेरियलिज्म से ब्रेक होने के लिए गडपादाचार्य ने अजतिवाद का प्रारंभ किया और यह सब प्रारंभ नहीं। देखिए यहां पे कहते हैं ना मास्टर महाशय कि दुर्बल मनुष्य यह सब चिंतन करते हैं, सोचते हैं। किंतु यह जो ब्रह्म ज्ञानी होते हैं इनको यह सब साक्षात दर्शन होते हैं। तो यह अजातिवाद के भीतर का यह जो फंडामेंटल कांसेप्ट है वो है त्याग का कांसेप्ट। धर्म अर्थ और काम को आपको संपूर्ण रूप से त्याग करना है। अर्थ और काम के जब तक आपको उसकी लालसा रहेगी आकांक्षा रहेगी तब तक ही तो आप धर्म फॉलो करेंगे। तो ये धर्म अर्थ काम ये जो राक्षसों का था अर्थ काम और अधर्म अधर्म के रास्ते पर अर्थ और काम इससे तो बेटर है कि धर्म के रास्ते पर अर्थ और काम का अनुष्ठान करें। बस गणपादाचार्य कहते हैं अर्थ और काम को ही छोड़ दो। फिर तो यह धर्म अधर्म की बात ही नहीं रहेगी। धर्म अधर्म कब आएगा? जब तक आपको अर्थ और काम का भोग करना है तब तक ही अर्थ और काम ही चले जाएंगे तो धर्म और अधर्म भी चला जाएगा। संचित प्रारब्ध, आगामी यह सब कर्म वगैरह उड़ जाएंगे। तो वो अजातिवाद। किंतु फिर अजातिवाद को मॉडरेट करते-करते आप यह कहेंगे नहीं कि व्यवहारिक लेवल पर जगत सत्य है और फिर आप यहां तक आ जाएंगे कि ब्रह्म और शक्ति अभेद तो क्या हम फिर वही जैमिनी के पास में चले गए क्या कि धर्म के आधार पर अर्थ और काम का भोग करना है नहीं ठाकुर यहां पर स्पष्ट कहते हैं कि कामिनी कांचन त्याग वही अर्थ और कामिनी और कांचन इसका त्याग करना दैट इज द अनदर एस्पेक्ट ऑफ ब्रह्म शक्ति अभेद यानी कि जहां तक कामिनी कांचन त्याग की बात है वहां तक ठाकुर कंप्लीटली फॉलोस गडपादाचार्य एंड शंकराचार्य और जहां पे ब्रह्म और शक्ति का अभेदत्व है वहां पे ठाकुर जैसे कि फॉलो कर रहे हैं। मैं यह नहीं कहूंगा कि जैमिनी ऋषि को फॉलो कर रहे हैं। किंतु एक प्रैक्टिकल सेंस है कि वही ब्राह्मण ही सब कुछ हुए हैं। और जैसे अगेन मास्टर महाशय कहते हैं यह सब विचारों की बात नहीं है। जैसे कि ठाकुर ने स्वयं स्पष्ट अपनी नजरों से सब कुछ देखा है कि ब्राह्मण ही है। उसके ऊपर में नाम रूप रूपी मुखौटा मात्र है। देश काल नाम रूप रूपी यह सब मास्क पहन करके यह अनंत यह जो सत चित आनंद ब्रह्मण ही जैसे कि स्थिर है तो फिर ब्रह्म ज्ञान की अवस्था है जब कार्य करते हैं तो यह फिर शक्ति के रूप में नाम रूप देश काल रूपी मुखौटा पहनते हैं शक्ति रूप रूप में शक्ति बन के और फिर इन दोनों के बीच में सुपरपजीशन वो एक कांसेप्ट हमने देखा था तो यहां पे ठाकुर कहते हैं कि तुम सीढ़ी उठकर के जब छत के ऊपर में उठे किंतु देखो कि जब तक तुमको यह पता लग रहता है कि छत है तब तक सीढ़ी भी है और जब तक ऊंचू बोध अर्थात कि छत ऊपर में है यह बोध जब तक रहता है तब तक नीचू बोध अर्थात कि मैं नीचे हूं यह भी रहता है बोध अर्थात कि छत ऊपर है जो कि साध्य है। मैं नीचे हूं जो कि अ साधक हूं और सीढ़ी जो है वो है साधन तो साध्य साधक साधन यह त्रिपुटी जो है तब तक रहती है जब तक हम डलिटी के जगत में है किंतु जैसे ही छत के ऊपर में उठकर के देखेंगे कि जिस चीज की छत तैयार हुई है उसी ही चीज की सीढ़ी तैयार तैयार हुई है। और यहां पर ठाकुर ने यह नहीं कहा कि साधक भी उसी चीज का तैयार हुआ है। किंतु हमको पता ही है कि ब्रह्म ज्ञान की अवस्था में साध्य साधक और साधना यह जो ट्रायंगल है वह मिट जाता है। सब कुछ एकाकार हो जाता है। और साथ में ठाकुर कहते हैं जैसे कि बेल फल की मैंने बात कही बिल्व फल है उसका पल्प सिर्फ हम लेंगे वो बाहर का शेल या तो आवरण उसको यदि हटा देंगे तो फिर क्या है वह वजन में कम पड़ जाएगा। यानी कि शक्ति एस्पेक्ट ब्रह्म एस्पेक्ट ही यदि लेंगे यह शक्ति एस्पेक्ट को छोड़ देंगे जीव और जगत को तो यह जो वास्तविकता है वह कंप्लीट नहीं होगी। जिसका अटल है उसका टल भी है। यह मैं तो जाने वाला नहीं। मैं रूपी घट जब तक रहा है तब तक यह जीव जगत भी रहे हैं। उनको लाभ करके देखा जाएगा कि वही जीव जगत हुए हैं। देखिए जब तक ब्रह्म ज्ञान प्राप्त नहीं होता, जब तक मैं ऐसा एक सेंस है, अहम रूपी एक सेंस है, तब तक जीव जगत है। यह सेंस भी रहेगा। यह ड्यूलिटी रहेगी ही रहेगी। और जब ब्रह्म ज्ञान होगा तब भी देखिए कि सब कुछ दिखाई देगा। किंतु स्पष्ट रूप से पता चलेगा कि वही जीव और जगत हुए हैं। और यहां पर ठाकुर वही कहते हैं बड़ा इंपॉर्टेंट स्टेटमेंट ऐड करते हैं। शुद्ध बिचारे नो है। सिर्फ विचार करके नहीं माने उनका ताके लाभ करे देखा जाए। तीन ही जीव जगत हुए छ उनको लाभ करके देखा जाता है वही जीव जगत हुए हैं और फिर यहां पे ठाकुर वो स्टेटमेंट देते हैं शुद्ध बिचारे नो ये सिर्फ विचार करके नहीं वो जो ठाकुर कहते हैं ना जय राम जय कृष्ण जो राम जो कृष्ण वही आज राम कृष्ण है तुम्हारी वेदांत की दृष्टि से नहीं तो यहां पे भी ठाकुर एकदम क्रूशियल एक क्लोज ऐड करते हैं नजरों से स्पष्ट देख पाओगे सिर्फ सिर्फ यह विचार करने की बात नहीं है। यानी कि यह एक जब तक हम ब्रह्म ज्ञान प्राप्त करने की स्थिति में है, साधना के रूप में है, साधक के रूप में है। साधना कर रहे हैं, तब तक साध्य साधक साधना यह ट्रायंगल रहेगा। भक्त भागवत और भगवान ये ट्रायंगल रहेगा। साधना सिद्धि के समय में भक्त भागवत भगवान एक हो जाएंगे। साध्य साधक साधना एकीकृत हो जाएगी और फिर किंतु जब वापस आएंगे इति इति करके तो पता चलेगा साध्य है साधक है साधना है भक्त है भगवान है भागवत है सब एक ही ब्रह्ममय ही है ब्रह्म जब स्थिर हो जाता माने यह जो ब्रह्म स्थिर होने पे हम माने अल्टीमेट रियलिटी स्थिर होने पे यह ब्रह्म ज्ञान के रूप में प्रतीत होती है वही अल्टीमेट रियलिटी कार्य करती है तो फिर यह देश काल नाम रूपी मुखौटा पहन लेती है। सो देखिए कि हमारे जीवन में साधक के जीवन में इस तरह से कन्वर्जन होता है। अरे साध्य साधक साधना यह जो नेति नेति मार्ग देखिए मैं यदि यह कहूंगा अह थोड़ा सा मॉडिफाई करके कि हमारी साधन पद्धति नेति नेति ब्रह्म ज्ञान इति इति तो फिर यह सिर्फ नहीं कि इति इति ब्रह्मज्ञान नेति ने इति इति हम कहेंगे कि इति इति प्लस नेति नेति अर्थात कि आपको जगत को सही मानकर के सबके साथ में स्नेह और करुणा का संबंध तो बनाना है। किंतु साथ में ही नेति नेति मार्ग का जो क्रूशियल एस्पेक्ट है वह है त्याग। काम कांचन त्याग अर्थ और काम का त्याग वह भी आपको बना करके रखना है। तभी आप ब्रह्म ज्ञान की स्थिति की ओर पहुंचेंगे। और फिर आप जब इति इति करके वापस आएंगे तो अर्थ और काम या तो कामिनी कांचन का त्याग यह आपको कॉन्शियसली करने की जरूरत नहीं। आपके डीएनए में ही वह रीाइट हो जाएगा। अभी का डीएनए काम कांचन की ओर आकर्षण करने वाला है। वह बाद का जो पूरा डीएनए ही अपना रीाइट हो जाएगा। काम कांचन की ओर से आकर्षण संपूर्ण मिट जाएगा। तो जाने के समय इति इति इस अर्थ में कि जीव और जगत वही ईश्वर ही है और उनके प्रति स्नेह करुणा श्रद्धा भक्ति का संबंध बनाना है। प्लस नेति नेति इस अर्थ में कि इनके साथ में काम कांचन का संबंध त्याग करना है। काम कांचन वर्जन करने है। फिर निर्विकल्प समाधि और फिर इति। सो दिस इज कंप्लीट पिक्चर ऑफ रामकृष्ण भावधारा। क्या कहते हैं ठाकुर शिव की दो अवस्था है जब समाधि में है महायोग में बैठे हुए हैं और तब आत्मा राम है और फिर जब उस अवस्था से नीचे आते हैं थोड़ा सा आमी जागृत होता है तब राम राम करके नृत्य करते हैं। तो ठाकुर श्री रामकृष्ण शिव की अवस्था का वर्णन करके क्या अपनी खुद की अवस्था इंगित कर रहे हैं? यह जो मास्टर महाशय का जो इवोल्यूशन कि पहली बार आए थे ठाकुर के साथ में आर्गुममेंट करते थे और अभी देखिए कि ठाकुर शिव की अवस्था का वर्णन करके अपनी अवस्था का वर्णन कर रहे हैं इस अर्थ में कि ठाकुर शिव स्वयं है यानी यह मास्टर महाशय का भी इवोल्यूशन हो रहा है। इसके बाद वाला पैसेज अभी हम नेक्स्ट क्लास में देखेंगे कल। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु
एक भक्त: कथामृत ऊपर ऊपर से पढ़ने से लगता है की ठाकुर भी शंकराचार्य या रामानुजाचार्य जैसे ही एक है. परन्तु अभी पता चल रहा है की उनका कैम्प अलग ही है
किंतु देखिए यदि आप कैंप की ही बात करेंगे ना तो मैं कहूंगा कि ठाकुर बिलोंग्स टू द सेम कैंप ऐज़ गडपादाचार्य एंड शंकराचार्य। कैंप डिफ़र कहां पे होता है? एक तो जैमिनी ऋषि का पूर्व मीमांसावाद है। जहां पे कि जगत को स्वप्न मानकर के कर्म का सिद्धांत इज़ अ फंडामेंटल। फिर कैंप डिफरेंट कहां पे होता है? द्वैत और विशिष्ट अद्वैत। वहां पे भी जगत सत्य है। ब्रह्मन का ही परिणाम होकर के। खास करके विशिष्ट द्वैत में देखिए कि जगत जो है ब्रह्मण का परिणा मतलब ट्रांसफॉर्मेशन होकर के जगत बना है। द्वैत में तो स्पष्ट है कि ईश्वर है और जगत है और भक्त है वह सेपरेट ही है एक तीनों से। तो यह जो मटेरियलिस्टिक फिलॉसोफी मैं कहूंगा जैमिनी ऋषि का विशिष्ट अद्वैत और द्वैत और मैं कहूंगा कि यह प्योर नॉन मटेरियलिस्टिक फिलॉसोफीस कि यह ठाकुर है, शंकराचार्य है और गडपादाचार्य है कि कर्म के सिद्धांत को आप ट्रांसेंट कर सकते हैं और अद्वैत ही एकमात्र रियलिटी है। आप देखिए कि रज्जु सर्प कहो कि ब्रह्म शक्ति कहो अल्टीमेटली तो एक ही है। रियलिटी तो दो नहीं है। देयर इज़ नो डलिटी माने गौडपादाचार्य में तो प्रश्न ही नहीं है। किंतु यदि आप शंकराचार्य और ठाकुर को भी देखेंगे तो रियलिटी इज ओनली वन। या तो आपको मिराज दिखता है या तो फिर यह रियलिटी गियर चेंज करती है। बट रियलिटी इज ओनली वन। सो दैट इज एन अद्वैत गेम। ठाकुर फर्मली बिलोंग्स टू अद्वैत गेम। ये जो मास्टर महाशय कंफ्यूज हो के बीच-बीच में लिखते हैं कि श्री ठाकुर श्री रामकृष्ण का विशिष्ट अद्वैतवाद। अभी है ऐसा कि ओरिजिनल जो बेंगली कथामृत है ना उसमें यह सब सबटाइटल मास्टर महाशय ने दिए हैं जो कि ट्रांसलेशन में बहुत बार मिस कर दिया जाता है तो फिर हमको पता नहीं चलता कि मास्टर महाशय इसको इस तरह से इंटरप्रेट करते हैं जब तक आप बेंगली नहीं पढ़ेंगे किंतु बंगाली में आप देखेंगे यह जो पूरा पैसेज है ना उसका टाइटल ही देखिए मैं पढ़ता हूं मैं खुद टाइटल अभी स्किप कर दिया किंतु ये मैं टाइटल पढ़ता हूं श्री रामकृष्ण दर्शन और वेदांत संबंधे गुजचो व्याख्या श्री राम रामकृष्ण की दर्शन और वेदांत के बारे में गुह्य व्याख्या अद्वैतवाद और विशिष्ट अद्वैतवाद अद्वैतवाद और जगत की मिथ्या यानी कि जगत मिथ्या है अद्वैतवाद के अनुसार किंतु ठाकुर का विशिष्ट अद्वैतवाद है जिसमें जगत मिथ्या नहीं है। राइट? ये मास्टर महाशय भी ये कंफ्यूजन कर रहे हैं कि ठाकुर कोई विशिष्ट अद्वैतवाद के नहीं है। ड्यूलिटी मटेरियलिज्म वगैरह ठाकुर में है ही नहीं। ठाकुर इस फर्मली विद इन अद्वैत वेदांत। वही है कि अद्वैत वेदांत का इंटरप्रिटेशन किस तरह से करते हैं। अद्वैत वेदांत में बहुत सारी स्कूल है। यह भामती स्कूल एक है वगैरह करके तो ठाकुर का भी मैं कहूंगा श्री रामकृष्ण स्कूल ऑफ अद्वैत जैसे गडपादाचार्य का अजातिवाद है। यहां पर शंकराचार्य का मायावाद है। तो ऐसे ही ठाकुर का यह ब्रह्म शक्ति अभेदवाद बट ठाकुर फर्मली बिलोंग्स टू दिस अद्वैत कैंप। एक ही रियलिटी है। रियलिटी इज वन। वह चाहे रज्जू हो ना कि सर्प हो। वो गियर चेंज करती है रियलिटी। बोथ आर द सेम रियलिटी। राइट? दैट इज अ थिंग। ऐसा नहीं कहते हैं ठाकुर कि रज्जू की अपनी सत्ता है। वो रज्जू वो चल उन्हें सर्प की अपनी सत्ता है। ठाकुर ऐसा नहीं कहते। ठाकुर कहते हैं रज्जू जब चलेगा तो सर्प की तरह दिखेगा। और यदि स्थिर बैठा रहेगा तो वह रज्जु की तरह दिखेगा। ठाकुर तो स्वयं कहते हैं ना जगत मिथ्या क्यों होने लगा? माने शंकराचार्य का जो इंटरप्रिटेशन के बारे में ठाकुर तो स्पष्ट मना करते हैं कि मायावाद जो है दैट इज नॉट अ ट्रू माने इंटर फाइनल इंटरप्रिटेशन। यह जो ब्रह्म शक्ति अभेद दैट इज अ म अकॉर्डिंग टू ठाकुर दैट इज अ फाइनल इंटरप्रिटेशन। अभी नेक्स्ट अवतार आएंगे वह जो कहेंगे दैट इज अनदर मैटर बट सो फार एज ऑफ टुडे दिस इज द फाइनल कंक्लूजन।
एक भक्त: असल समस्या अहंकार है—उसे छोड़ना ही पड़ेगा; कामिनी-कांचन और अहंकार एक ही परिवार के सदस्य हैं
वरा नगर की एक घटना है। सब लोग बातें कर रहे हैं तो एकदम एक्साइटमेंट सब में एकदम तो अपने लाटू महाराज किसी कोई डिवोटी के बारे में चल रहा था। तीनचार डिवोटी वगैरह के बारे में वो ऐसा है वो ऐसा है वो ऐसा है। तो लाटू महाराज एक्साइटेड हो गए। उनका तो बिहारी मिश्रित बंगाली तो तो बोल उठे मास्तुत्व मास्तुत्व चोरे भाई मातुत्व
हिंदी में कहते है
अर्थात कि वो जो रिलेटिव्स है वो सब के सब चोर है मास्तु तो मास्तु तो चोरे भाई [हंसी] अच्छा अच्छा चोरे चोरे मास्तु तो भाई अच्छा अच्छा अच्छा लाडू महाराज कहते हैं मास्तु तो मास्तु तो चोरे भाई
एक भक्त: सारदानन्दजी का सेवाभाव कितना गहन था. वे कितने निःस्वार्थ हो गए थे. हम तो यही सोचते है की हमारा क्या होगा।
और देखिए फिलोसोफी के साथ में यह सब डिस्कस करने से फिलोसोफी ग्राउंडेड रहती है। वरना क्या होगा कि टू मच एब्स्ट्रैक्ट हो जाएगा। ना इसलिए यह जो मटेरियलिस्टिक फिलॉसफी जो है यह तो जैमिनी ऋषि की हो या तो फिर यह असुरों का विोचन स्वामी जी ने कहा ना अमेरिका से लेटर लिखते हैं यह सब विरोचन की संतान है। माने [हंसी] वो काम कांचन यह अर्थ और काम इसका भोग ही अमेरिका वासियों का म अल्टीमेट एम है। सो वो विरोचनवाद हो ना कि यह पूर्व मीमांसावाद हो। दिस वेदांत इस हज जंप म आउट ऑफ दैट। हम ऑफकोर्स यह जंप सिर्फ उपनिषद ही नहीं बुद्धिज्म और जैनिज्म और उपनिषद माने इंडियन फिलॉसोफिकल ट्रेडिशन जो है ना इट इज सो रिच सो मेनी ने आप कहेंगे एस्पेक्ट्स माने आप देखने को जाएंगे त्याग भी करना है तो त्याग के पीछे की जो फिलॉसोफी है बुद्धिज्म का जो निहिलिज्म कहेंगे जैनिज्म का का ये जो स्यादवाद वगैरह आप कहेंगे ये अपना वेदांत का ब्रह्म शक्ति अजाति यह विशिष्ट अद्वैत द्वैत म सच वैष्णविज्म देखिए बात बाद बात का जो वैष्णविज्म जो डेवलप हुआ भाव साधना जो डेवलप हुई ठाकुर के जीवन में भाव साधना कितनी प्रचंड रूप से दिखती है मधुर भाव संतान भाव मातृ भाव म बालक भाव म सच रिचनेस इस देयर विदिन ठाकुर ऑल ऑफ दिस हैज़ बीन कलमिनेटेड।
एक भक्त: वैष्णव भाव की तरह क्या अद्वैत वेदांत भी क्या एक भाव है?
देखिए भाव के साथ में तो संबंध नहीं होगा क्योंकि अजातिवाद और बाद में यह जो मायावाद है वह भाव का त्याग करना ही वहां पर जाता है। इंटरेस्टिंगली शंकराचार्य को भी यह प्रश्न हुआ होगा। इसलिए उन्होंने यह पंचायतन पूजा प्रारंभ की। यह जो ब्रह शिव, विष्णु, देवी, सूर्य और गणेश ये जो पांच पूजाएं हैं वो शंकराचार्य ने ही प्रारंभ की। इंटरेस्टिंगली। देखिए यहां पे मैं एक साधु के साथ में मैं थोड़े दिन पहले बात कर रहा था। तो मैंने कहा तो रामानुजाचार्य तो साउथ के हैं तो वहां पे काफी यहां पे उनका प्रसिद्धि वगैरह होगा। तो मुझे साधु ने कहा कि देखो ऐसा नहीं है कि रामानुजाचार्य बहुत ज्यादा फेमस है। शंकराचार्य को ही लोग ज्यादा मानते हैं। तो मैंने कहा ऐसा क्यों? लोगों को तो भक्ति ही ज्यादा चाहिए। शंकराचार्य तो ज्ञान के प्रतीक है। तो बोला ऐसा नहीं इसलिए नहीं। शंकराचार्य के द्वारा यह जो पंचायतन पूजा प्रारंभ की गई और उसको फॉलो करके जितने भी मंदिर बने हैं वो संप्रदाय से पर है क्योंकि फाउंडेशन है अद्वैत वेदांत। कोई संप्रदाय को रिलेटेड नहीं है। सभी का वहां पर खुला म आवकार है। जबकि यह रामानुजाचार्य के जो वैष्णव भाव को लेकर के जो मंदिर बने हैं वहां पे गोंडामी कहो फनेटिसिज्म ऑर्थोडॉक्सी बहुत ज्यादा है। हमारे संप्रदाय को ही सर्वश्रेष्ठ मानते हैं। बाकी संप्रदायों को धत्कारते हैं। सो व्हिच इज अ रिवोलेशन फॉर मी। हम लोग इतना फिलॉसोफी देखते हैं बट वी ऑल शुड नो कि यही शंकराचार्य ने उसको प्रैक्टिकल बनाने के लिए पंचायतन पूजा प्रारंभ की है। सो जो अजातिवाद यदि माने इन अ प्योर अनडल्यूटेड वेदांत अद्वैत यदि कहेंगे सो देयर इज ऑफ कोर्स नो भाव नो साधना नो उपासना नथिंग राइट बट शंकराचार्य ऑनवर्ड्स उन्होंने यह भाव को थोड़ा सा एंटर करवा दिया है बट ऑलवेज रिमेंबर कि जो ट्रेडिशनलिस्ट है वे लोग कहते हैं यह जो सौंदर्य लहरी वगैरह जो कुछ भी है वो माने बाद के शंकराचार्य ने किया है नॉट आदि शंकराचार्य जो ट्रेडिशन जो कहते हैं वो कहते हैं जो प्रस्थानत्रय पे भाष्य है दैट एंड दैट ओनली बिलोंग्स टू आदि शंकराचार्य सो अगेन सी वी डू नॉट नो राइट आज इतने सालों के बाद में कौन कहेगा कि विवेक चूड़ामणि आदि शंकराचार्य ने लिखा है कि फिर सक्सेसिव शंकराचार्य ने लिखा है बट बट यदि शंकराचार्य ट्रेडिशन में है तो वही हुआ ना जैसे ठाकुर को भी आप कथामृत पढ़कर के ठाकुर स्पष्ट कहते हैं नेति नेति निर्विकल्प समाधि इति किंतु फिर मां और स्वामी जी जब जब हम आते हैं तो फिर इति इति प्लस नेति नेति हो जाता है माने साधना के रूप में तो क्या हम कहेंगे कि दिस हैज़ ओनली बीन ब्रॉट बाय मां और स्वामी जी हमको तो कहना पड़ेगा ना ठाकुर के जो आखिरी आखिरी दिन थे उन उनमें उन्होंने जो मां और स्वामी जी को स्पेशली जो ट्रेन किया है वि इंक्लूड्स एवरीथिंग राइट फिर मां ने और स्वामी जी ने सिर्फ उसको मैनिफेस्ट किया है किंतु ओरिजिनल सीड्स जो है ठाकुर ने ही प्लांट किए हैं। सो शंकराचार्य के जो फॉलोअर्स थे जिन्होंने बाकी का सक्सेसिव शंकराचार्यों ने जो यह सब लिखा है या तो फिर यह जो पद्मपादाचार्य है या तो फिर यह तोटकाचार्य है सुरेश्वराचार्य है वह भी तो ट्रेंड बाय शंकराचार्य हिमसेल्फ देखिए ठाकुर में थोड़ा सा भी कमी होता ना थोड़ा सा भी इंपरफेक्शन होता ना स्वामी जी का नेचर था कि एकदम उस इंपरफेक्शन को पकड़ लेते बिल्कुल छोड़ते नहीं राइट सो इन ऑर्डर टू स्वामी इन ऑर्डर फॉर स्वामी जी टू एक्सेप्ट ठाकुर ही हैज़ टू बी एस परफेक्ट एस ह्यूमनली पॉसिबल ह्यूमनली पॉसिबल इसलिए कह रहा हूं कि यदि ठाकुर खुद कहते हैं ना कि पंचमहाभूते फांदे ब्रह्म पड़े कादे वो भगवान राम भी वो मां सीता के लिए रोए थे यानी कि फिर आप 100 आप एक एक इंपॉसिबल आइडियल की अपेक्षा रखेंगे तो फिर शायद हो सकता है अवतार भी आपके उसमें ना आए बट एस फार एस इज पॉसिबल ठाकुर वास एस परफेक्ट एस वास पॉसिबल
एक भक्त: ठाकुर का एक गीत गाते है -- जो भाव का विषय है उन्हें अभाव से कैसे जानेंगे। तो क्या ठाकुर यहाँ पे द्वैत-भाव की बात कर रहे है?
यूजुअली दो चीज है जहां तक गानों का बात है ठाकुर जो गीत गाते हैं उसके ऊपर में कमेंट भी करते हैं वह फेमस है आ पिंजरे पाखी होते जावो के मैं पिंजर में ब पिंजरे में बद्ध पंखी हूं। ठाकुर ये गाना भी गाते हैं और फिर बाद में थूकते भी है। क्यों आ पिंजरे पंखी होते जाओ? क्यों मैं पिंजरे में बद्ध पंखी होने को जाऊंगा। तो बनत बनत बने जाए। वो जो गीत गाते हैं ठाकुर गीत गाते भी है। कहते हैं ये ढीमे ते ताला माने ये जो माने जिसका मंद वैराग्य है कि बनते बनते बन जाए इस तरह का क्यों मंद वैराग्य हो। सो ठाकुर गाते भी हैं, कमेंट भी करते हैं। भाव का जहां तक प्रश्न है, देखिए अभाव यानी कि ज्ञान मार्ग और भाव यानी कि भक्ति मार्ग। ठाकुर लगता तो है कि भक्ति मार्ग को प्राधान्य देते हैं। बार-बार हमको ऐसा लगता है चीनी खेते चाइना मा चीनी होते चाइना वगैरह-वगैरह। किंतु ठाकुर के खुद के जीवन में तो ज्ञान मार्ग उन्होंने फॉलो किया ही है ना। तो मैं कहूंगा कि भाव और अभाव दोनों पार्ट एंड पार्सल ऑफ रामकृष्ण विवेकानंद ट्रेडिशन। यहां पर जो अभाव बोलकर के जो ज्ञान मार्ग का जो जिस तरह से अ क्या कहेंगे अ तोतापुरी ने ठाकुर के पास में साधना करवाई हो सकता है कि ठाकुर उस तरह की साधना को ना करते हो प्रेफर किंतु ज्ञान मार्ग का जो हार्ट है कामिनी कांचन त्याग वह तो हमको लेना ही है। इस बात के बारे में हमने पहले भी थोड़ा सा डिस्कस किया था। ज्ञान मार्ग का हार्ट है काम कांचन त्याग। भक्ति मार्ग का हार्ट है शरणागति। अभी आप शरणागति को फॉलो करेंगे तो काम कांचन त्याग थोड़ा सेकंड स्टेप पे आ जाता है। वहां पे नहीं है ऐसा नहीं किंतु प्रायोरिटी में सेकंड पे आ जाता है। तो ठाकुर का जो यूनिकनेस है काम कांचन त्याग प्लस भक्ति बोथ आर ऑन द सेम पेडेशनल। सो भाव मार्ग को यदि आप लेते हैं तो विद दिस क्लियर आईडिया कि वो जो ट्रेडिशनल भक्ति मार्ग नहीं है कि जहां पर काम कांचन त्याग सेकंड पेडिडेस्टल पे आता है यहां पे इट हैज़ इक्वलेंस एस शरणागति तो भाव और भाव दोनों साधनाओं का मिश्रण यहां पे है। गीत जैसे भी लिखा हो बट दिस इज एनालिसिस। काम कंचन त्याग प्लस भाव उन्होंने यह लिया है। यह जो आ सुनो साधु होते जाो केनो मैं रुखा सुखा साधु क्यों होने को जाऊंगा ये जो ठाकुर कहते हैं वो जो राम के वो काकुड़गाछी गए थे रामचंद्र के बागान से वापस आ रहे देखा एक खटिया पे एक साधु बैठे हैं तो ठाकुर इमीडिएटली जैसा उनका हैबिट है वहां पे पहुंच गए बढ़िया मजे से हिंदी में बात कर रहा है फिर जब वापस आए तो कहा कि ये तो रुखा सूखा साधु है रुक्ष साधु तो किसी ने कुछ कहा होगा कि कोई कमेंट की होगी तो ठाकुर ठाकुर साथ-साथ में ही कहते किंतु देखो कि जो संसारी लोग हैं उससे तो वह बहुत आगे बढ़ गया है। भले ही चाहे रुखासखा साधु हो किंतु कामिनी कांचन त्यागी है और संसारी से तो बहुत आगे बढ़ गया है। सो वो जो साधना है ट्रेडिशनल जिसको कि वेदांत साधना कहते हैं। काम कांचन त्याग है। किंतु साथ में यदि भक्ति का रूपी रस आप यदि मिलाएंगे ना तो वह एकदम परफेक्ट हो जाएगा। भक्ति में कामकांचन का प्राधान्य है वह कभी-कभी नहीं रहता है और जो ज्ञान मार्ग है उसमें निरस हो जाता है। कंबाइन देम बोथ एंड इट बिकम्स परफेक्ट। और अल्टीमेटली देखिए यह जो सब फिर हम यह कहे भी क्यों कि चार योगों का समन्वय कौन कहता है चार योग है? योग तो अल्टीमेटली साधन पद्धति तो एक ही है। हमने तो वह अज्ञान वशतः उसके डिवीजन किए हैं ना। राइट ऐसा कहना कि यह भक्ति योग है, यह कर्म योग है, ज्ञान योग है, राजयोग है। हम ऐसा कहेंगे ही क्यों? हम तो कहेंगे रामकृष्ण योग है जिसमें कि सभी बातों का इक्वल समावेश है। गोइंग फॉरवर्ड फ्रॉम नाउ ऑनवर्ड्स जब तक इतिहास में हम हिस्ट्री स्टडी करते हैं, फिलॉसोफी स्टडी करते हैं तब तक हम देखते हैं कि चलो जैमिनी ऋषि ने ये मीमांसावाद डेवलप किया, गडपादाचार्य ने यह डेवलप किया, मधवाचार्य ने यह किया, राम रामानुजाचार्य ने यह किया। बट नाउ एज ऑफ नाउ हम ऐसा क्यों? अब जैसे आप फिजिक्स पढ़ने को जाएंगे आपको ऐसा नहीं सिखाएंगे न्यूटन का फिजिक्स है। ये आइंस्टाइन का फिजिक्स है। ये उसका फिजिक्स है। वो उसका फिजिक्स है। फिजिक्स इज़ फिजिक्स नाउ। भले उन्होंने चाहे डेवलप किया हो बट फिजिक्स इज़ अल्टीमेटली फिजिक्स। सो यहां पे भी साइंस ऑफ कॉन्शियसनेस इज़ साइंस ऑफ़ कॉन्शियसनेस। साइंस ऑफ़ स्पिरिचुअलिटी साइंस ऑफ़ स्पिरिचुअलिटी। उन्होंने डेवलप किया है। डजंट मीन के नाउ फॉरएवर ये वाटर टाइट कंपार्टमेंट में रहे। हां। माने इवन हमारे लिए भी ये रस आता है ये सब चर्चा करने में राइट जो बुद्धि दी है बुद्धि को हमको ये करना है सुसंस्कृत करना है इसलिए हम ये सब करते हैं सो इट इज गुड फॉर डिस्कशन बट जहां तक अपना लाइफ का प्रश्न है ये सब भेद तो कहां चले गए आम खा भी लो आम की पत्तियां भी गिन लो दोनों कर लो [हंसी]