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Sri Ramakrishna Kathamrita ·

श्रीरामकृष्ण कथामृत || 16 Dec 1883 - श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ दक्षिणेश्वर में || 19 Jan 2026

मङ्गलाचरण

ओम स्थापकायज धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री श्री रामकृष्ण कथामृत का पाठ करेंगे इस सप्ताह हम लोग देख रहे थे कि मास्टर महाशय आए हैं दक्षिणेश्वर में ठाकुर के साथ में रिट्रीट करने के लिए तो फिर एक जनाई के एक मुख बाबू आए हैं। उनके साथ में ठाकुर वार्तालाप कर रहे हैं। उसी वार्तालाप में एक पैसेज जो कि हमने लास्ट टाइम पढ़ा था। एक बार फिर से उसको देख लेते हैं। ध्यान

श्रीरामकृष्ण का अद्वैत वेदान्त 1

के ऊपर में ठाकुर कहते हैं मुखजे प्रश्न करते हैं। सबसे पहले तो ठाकुर कहते हैं कि आत्मा जैसे कि हम जीवात्मा और आत्मा ऐसे दो डिफरेंशिएशन ठाकुर खड़े करते हैं। आत्मा क्या है? हमारा रियल नेचर। आवर अल्टीमेट नेचर। राइट? तो मनुष्य के भीतर में देखिए उपनिषद का जो प्रतिपादित सिद्धांत है मैं कौन हूं तो ये हाथ नहीं पैर नहीं ये आंख नहीं कान नहीं नाक नहीं ये वाणी नहीं मन नहीं बुद्धि चित्त अहंकार इस सबके परे जो आत्मन है या ब्रह्मन है वही मेरा सही स्वरूप है तो यह तो एक उपनिषद का प्रतिपादित विषय है और फिर साथ में ही कहा जाता है कि तो फिर मेरे भीतर में जो चैतन्य है वो कौन सा चैतन्य है? तो इसका उत्तर देते हैं कि जैसे मान लीजिए एक घट है। घट के भीतर में पानी रखा है। अभी एक सूर्य है तो एक सूर्य का प्रकाश सभी घट के भीतर में प्रकाशित होता है। उसका रिफ्लेक्शन उसका प्रतिबिंब आपको सभी सूर्य में दिखाई देगा। आप जब पता है एक तरह का वो यह होता है बच्चों के लिए म्यूजियम जैसा म्यूजियम ना कि एक जगह जहां पे बहुत सारे डिफरेंट मिरर लगाए हुए हैं। तो कोई मिरर कॉन्वेक्स है। कोई कॉन्व कोई मतलब इस तरह से डिस्टोर्टेड मिरर है कि जिसमें अपना प्रतिबिंब डिस्टोर्टेड दिखेगा। किसी मिरर में आप देखेंगे तो आप लंबे दिखेंगे। किसी मिरर में देखेंगे तो आप मोटे दिखेंगे। तो इस तरह से डिस्टोर्टेड प्रतिबिंब आपको इस होल ऑफ मिरर उसमें दिखाई देंगे। चारों ओर डिफरेंट-डिफरेंट टाइप के मिरर लगे हैं। आईने लगे हैं। कहीं एक आईने में देखेंगे आप बहुत लंबे किसी में बहुत मोटे। किसी में आपका वो पूरा देह कुछ अष्टावक्र की तरह दिखेगा। तो क्या है? आपका तो आप तो वैसे के वैसे ही है किंतु मिरर जिस तरह से आईना जिस तरह से है उस तरह से आपका प्रतिबिंब आपको डिस्टोर्ट होता हुआ दिखेगा। तो यहां पे भी देखिए कि इतने सारे घट है। सभी घटों के भीतर में पानी है। सभी पानी में सूरज का एक-एक प्रतिबिंब रिफ्लेक्ट हो रहा है। तो अभी क्या है? मेरे भीतर में इसी तरह से सूरज का या आत्मन का प्रतिबिंब है। यह जो प्रतिबिंब है वो तो चेतन है किंतु एक जड़ पदार्थ के साथ में मिला हुआ है। यह जड़ पदार्थ क्या है? तो मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार मेरे मन में बुद्धि अर्थात कि जो निश्चयात्मिका बुद्धि है, मन है जो कि संकल्प विकल्प करता है। यह जो चित्त है वो है मेरी मेमोरीज़। ये जो कंप्यूटर के भीतर में यह रेम या रोम जो होता है जिसमें आप मेमोरी स्टोर करते हैं तो चित्त के भीतर में मेमोरी स्टोर होती है और अहंकार अर्थात कि माय सेंस ऑफ सेल्फ कि मैं कौन हूं ये जो अहम बुद्धि जो देता है जो सेंस ऑफ आईनेस जो देता है वो है अहंकार। तो एक तो है प्रतिबिंबित सूर्य या तो फिर प्रति आत्मा का प्रतिबिंब दूसरा है ये मन बुद्धि चित्त अहंकार ये दोनों मिलकर के जीवात्मा बनते हैं या तो फिर मेरे भीतर में जिसको मैं कॉन्शियसनेस कहता हूं ये कॉन्शियसनेस बनते हैं। अभी देखिए कि ये कॉन्शियसनेस एक अह एक नॉन मटेरियल एंटिटी है। ये कॉन्शियसनेस को इस बॉडी के भीतर में रख दिया। तो जैसे आपने वो आजकल तो क्या है रोबोट्स देखते हैं ना आपका रोबोट्स बहुत सारे बनते हैं तो मैं कभी-कभी ये किस तरह के रोबोट क्या करते हैं इस तरह के कुछ वीडियो देखता हूं क्या किस तरह का एडवांसमेंट चल रहा है तो एक रोबोट को अनपैक करेंगे वो पैकिंग में है वो रोबोट इस तरह के एक किसी बॉक्स के भीतर में बॉक्स में से उसको निकालेंगे फिर जैसे ही वो तो वैसे ही मतलब पत्थर की तरह ही पड़ा हुआ है बॉक्स के भीतर में किंतु जैसे ही उसका स्विच स्विच ऑन करेंगे वैसे ही वो खड़ा होकर चलना फिरना कार्य करना शुरू कर देगा। अभी स्विच ऑफ करेंगे तो उसका जो भीतर का कंप्यूटर है वो शट डाउन हो जाएगा और रोबोट जो है वैसे ही पत्थर की तरह पड़ा रहेगा। तो यह देह है वो रोबोट की तरह एक मटेरियल बॉडी ही है। इसके भीतर में यह कॉन्शियसनेस या तो फिर यह जीवात्मा जैसे ही स्विच ऑन होता है वैसे ही यह देह कार्य करता है। देखिए हम सबको पता है कि देह का जन्म मृत्यु जरा व्याधि है। किंतु जीवात्मा जो है यह हमारा जीवात्मा अर्थात कि मन बुद्धि चित्त अहंकार और यह आत्मन का प्रतिबिल आत्मन नहीं आत्मन का प्रतिबिंब अर्थात कि हमारे एक घट है। घट के भीतर में तो सूरज का प्रतिबिंब ही होगा। असली सूरज तो होगा नहीं। असली सूरज में आप 1 लाख से ज्यादा पृथ्वी बिठा सकते हैं। तो सोचिए कि असली सूरज की साइज क्या है? और कंपेयर टू घट एक जो है मिट्टी का घड़ा तो उसकी साइज क्या है? वो कोई कंपैरिजन ही नहीं है। किंतु यह असली सूरज को तो आप यह मिट्टी के घड़े में नहीं बिठा सकते। किंतु सूरज का प्रतिबिंब जो है वो मिट्टी के घड़े के भीतर में आ जाएगा। तो ये प्रतिबिंबित चैतन्य और ये मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार ये जो अपना जीवात्मा या मॉडर्न लैंग्वेज में कहेंगे कॉन्शियसनेस। यह कॉन्शियसनेस जो हमारा है उस देह को चालित करता है। यह जो मेरा दो हाथ दो पैर ये जो मेरा देह है उस देह को चालित करता है। तो अभी होगा क्या? देह का जन्म मृत्यु जरा व्याधि है किंतु ये मेरा कॉन्शियसनेस है। या तो जीवात्मा है। उसका जन्म मृत्यु जरा व्याधि नहीं। उसका संस्कार के अनुसार शुद्धिकरण होता है। अच्छे कर्म का अच्छा फल, अच्छे संस्कार, बुरे कर्मों के बुरे संस्कार। ये कॉन्शियसनेस के साथ में या जीवात्मा के साथ में होता है। यानी कि देह का है जन्म, मृत्यु, जरा व्याधि और जीवात्मा या तो कॉन्शियसनेस का है कर्म के अनुसार संस्कार का गठन। अभी देखिए कि देह का मृत्यु होने से देह का डेथ होने से हमारे भीतर में जो जीवात्मा है कॉन्शियसनेस है वो दूसरा देह धारण करता है। पहले जन्म के जो भी संस्कार का लेखाजोखा है अगले जन्म में जाता है। वहां पे दूसरे कर्म करता है। नेक्स्ट जन्म में वहां पे फिर से संस्कार का लेखाजोखा होगा और फिर अगले जन्म में जाता है। ये जो

क्या है कर्तृत्व और भोक्तृत्व? कैसे बनते है संस्कार?

संस्कार किस तरह से बनते हैं? कर्म का सिद्धांत क्या है? किस तरह से कार्य करता है? इसके बारे में भी वैसे तो हमने काफी डिस्कशन किया है। देखिए मन में कर्तृत्व भाव रखकर के हम कोई पुण्य कर्म करेंगे कि हां मैं किसी को दान दे रहा हूं। तो यह इस तरह से कर्तृत्व भावना से किया हुआ अच्छा कार्य हमको पुण्य अर्जन करता है और यह कर्तृत्व भावना से किया हुआ बुरा कार्य पाप अर्जन करता है। वो जो फेमस कहानी ठाकुर की कि एक आदमी का गार्डन उसमें बहुत मेहनत करके फूल उगाए हैं और वो बड़ा प्राउड है। उसको बड़ा गर्व है कि मैंने इस गार्डन में इतने सारे फूल उगाए हैं। अभी एक दिन एक गाय आकर के फूलों को खाने लगी तो इस आदमी ने क्रोधित हो करके गाय को लाठी मारी जोर से जिससे कि गाय का मृत्यु हुआ। अभी ये आदमी भयभीत हो गया। ये सोचता है कि ये तो गौ हत्या का पाप लगेगा तो क्या करें? तो जब उसको यमदूत लेने को आए नर्क में ले जाने के लिए तब उसने चालाकी क्या किया। कहता है कि गाय को लाठी मैंने थोड़ी ना मारी है। मेरे हाथ ने मारी है। अर्थात कि उसने पाप कर्म किया है किंतु साथ में कर्तृत्व बोध नहीं है उसका। तो ये यमदूत तो काफी इंप्रेस हो गए। सोचते हैं अच्छा उसका इतना देहाभिमान से ऊपर उठ गया है। अच्छा चलो इंद्र को पकड़ने को जाते हैं। तो जब इंद्र को पकड़ने को गए तो इंद्र कहता है वो ये आदमी का किस तरह से लॉजिक चलता है हाथ के देवता है इंद्र तो मैंने तो नहीं मारी लाठी हाथ ने लाठी मारी है। अर्थात कि ये इंद्र देवता ने लाठी मारी है। तो ये यमदूत भी इस लॉजिक से प्रभावित होके इंद्र को पकड़ने को गए। इंद्र कहता है थोड़ा समय दो जाके मुझे उसके साथ बात करने दो। फिर इंद्र आए पृथ्वी पे एक वृद्ध आदमी का देह धारण करके फिर इस गार्डनर के घर गए। कहता है कि बहुत सुंदर गार्डन है। प्रशंसा करने लगा। तो यह आदमी जिसका गार्डन था वो इतना म आउट ऑफ प्राइड माने अपने अहंकार से मत होकर के गर्व से मत होकर के कहता है हां महाशय इसको भी मैंने बनाया है। इसको भी मैंने बनाया है। मैंने ही अपने हाथों से फूलों को रोपा है। मैं ही अपने हाथों से इसकी मावजत करता हूं। इसकी संभाल रखता हूं। तब इंद्र अपना सहित स्वरूप धारण करके कहते हैं कि अरे बदमाश जब यह क्रेडिट लेने की बात है, प्रशंसा लेने की बात है तब तुमने किया है और यह जो पाप लेने की बात है तब मेरे पे दोष का टोकरा ढोल देते हो। ऐसा जैसे ही कहा तो वैसे ही यमदूत आकर के इस आदमी को पकड़ के ले गए। तो देखिए कि ये कर्तृत्व भावना से आप जो भी करते हैं उसका पुण्य और पाप दोनों आपको लगता है। मैंने अच्छा मैं लोगों मैं गरीब बच्चों को खाना खिला रहा हूं। तो ये मैं खिला रहा हूं। मुझे गर्व होता है। मुझे प्रशंसा चाहिए। ये जो कर्तृत्व भाव से करता हूं। मुझे पुण्य मिलेगा। पुण्य मिलेगा तो मैं स्वर्ग भोग करूंगा। मैं किसी की हत्या करता हूं। किसी का अपमान करता हूं। किसी का शोषण करता हूं तो वह तो निश्चय कर्तृत्व भाव से ही होता है। तो मुझे पाप लगेगा। पाप भुगतने के लिए नरक में जाऊंगा। किंतु यह पाप और पुण्य स्वर्ग और नरक दोनों से परे एक निष्काम कर्म है। कर्तृत्व या भोक्तृत्व से ऊपर उठकर के एक निष्काम कर्म करना है जो कि ईश्वर को समर्पित कर्म है। वो कर्म आप अच्छा करें ना कि बुरा करें उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। देखिए गीता में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को हत्या करने के लिए प्रेरित करते हैं। ऐसा कोई धर्म ग्रंथ नहीं है विश्व का जो कि इतना बोल्ड स्टेटमेंट देता हो। माम अनुस्मर युद्ध मुझे समग्र फल अर्पित करके तुम युद्ध करो। तुमको युद्ध का पाप नहीं लगेगा। तुम क्षत्रिय धर्म उसका पालन कर रहे हो। तो देखिए कर्तृत्व और भोक्त से ऊपर उठकर के देहाभिमान से परे उठकर के हम जो भी कर्म करते हैं ईश्वर को समर्पित जो भी कर्म करते हैं वो हमारे शुभ संस्कार गठन करता है और यही शुभ संस्कार का अल्टीमेट कॉम्बिनेशन हमको निर्वाण की ओर ले जाता है। तो यह जीवात्मन की जर्नी है। तो देखिए कि अभी हमारा कांसेप्ट क्लियर है। हम जो भी कार्य करते हैं, उसमें यदि हम अपना यह जो जड़ पार्ट है, कॉन्शसनेस के दो पार्ट है। एक है जड़ जो कि मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, दूसरा है चेतन जो कि आत्मन का प्रतिबिंब है। सूरज का प्रतिबिंब है। प्रतिबिंबित चैतन्य है। तो देखिए कि मैं जो भी कार्य करता हूं वो मेरे जड़ पार्ट जो है मेरे कॉन्शियसनेस का मेरे मन का उसको यदि पोषित करता है उसको स्ट्रेंथन करता है तो मैं यह कर्म के चक्कर में फंसता ही जाऊंगा फंसता ही जाऊंगा शुभ कर्म पुण्य और पाप की ये बेड़ियां मेरे पैरों में लगती ही जाएगी और स्वर्ग और नरक को भुगतना ही होगा मुझे और फिर बार-बार जन्म ग्रहण करना करना होगा क्योंकि मुझे अपने संस्कारों का क्षय करना है। तो वह हो गया एक तरह का कर्म जो कि मेरे जड़ पार्ट को पोषित करता है। दूसरे टाइप का कर्म है जो कि मेरे चेतन पार्ट को नरिश करता है। चेतन पार्ट को पोषित करता है। जो कि निष्काम कर्म है, साधना है, उपासना है, ईश्वर प्राप्ति के लिए किए गए जो भी कार्य है वो चाहे ज्ञान योग हो, कर्म योग हो, भक्ति योग हो ना कि राजयोग हो। इसकी ये जो उपासनाएं जो भी हम करते हैं या तो फिर जिस तरह से कृष्ण को उपदेश दिया कृष्ण ने उपदेश दिया अर्जुन को कि युद्ध भी यदि करते हैं और यदि ईश्वर को संपूर्ण रूप से समर्पित होकर के ईश्वर की अपने को अपने को ईश्वर की कठपुतली बना करके जो भी कर्म करते हैं इवन युद्ध भी करते हैं इवन हत्या भी करते हैं तो वो भी हमारे ये संस्कार का बंधन को ही काटेगा। इस तरह का कर्म हमारे चेतन पार्ट को नरिश करता है। अपने यह आत्मन को नरिश करता है। जीवात्मा जीवात्मन का अर्थ तो ये दोनों का कॉम्बिनेशन ही है। किंतु जीवात्मन के भीतर में जो चेतन पार्ट है उसको ये नरिश करता है। तो देखिए कि ये जीवात्मा की ये जर्नी है। जन्म आफ्टर जन्म बर्थ आफ्टर बर्थ जन्म जन्मांतर का ये चक्र है। उसमें से ये पसार होता है। जो भी कर्म है उसके जड़ पार्ट है उसके उसका जो जड़ एस्पेक्ट है उसको जितना नरिश करेंगे उतनी लंबी यात्रा उसको करनी होगी और उसके चेतन पार्ट को जो भी जितना नरिश करता जाएगा उस उतनी ही उसकी यात्रा कम होती जाएगी। उतना ही वो स्पीडीली मतलब झड़प से वेग रूप वो निर्वाण की ओर गति करेगा। तो यह एक पूरा कांसेप्ट है। अभी देखिए कि मुखय ठाकुर को

श्रीरामकृष्ण का अद्वैत वेदान्त 2

प्रश्न क्या करता है। मुखज ठाकुर को पहले तो ठाकुर कहते हैं कि हमारा जीवात्मन है वो और वो जैसे कि एक सुई की तरह है और ईश्वर या आत्मन जो है वो चुंबक पत्थर की तरह चुंबक की तरह है। मैग्नेट की तरह है। तो यह सुई अर्थ मेटल की बनी है। नेचुरली वो मैग्नेट की ओर अट्रैक्ट होगी। अर्थात कि दोनों का मिलन हो जाना यही तो आध्यात्मिक जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य है। सर्वोच्च लक्ष्य है। किंतु देखिए कि क्या है सुई के ऊपर में मिट्टी लगी हुई है। तो जितनी मिट्टी लगी है उसी की वजह से ये मैग्नेट जो है सुई को खींच नहीं पा रहा है। तो आपका कार्य है कि इस मिट्टी को धोना है। तो जैसे ही ठाकुर ऐसा कहते हैं साथ में ही यह मुख प्रश्न करता है कि महाशय किस तरह से यह सुई के ऊपर में लगा हुआ मेला जो है उसको धोया जाए अर्थात कि ये जो अपना जीवात्मन है उसने ये जितने भी ये कर्तृत्व भावना से किए हुए कर्म है उसकी वजह से संस्कार का ये जितना भी बोझ इसके ऊपर में पड़ा है इससे मुक्ति कैसे प्राप्त की जाए तो ठाकुर दो अ बातें कहते हैं। ठाकुर कहते हैं एक तो ईश्वर के लिए व्याकुल होकर के रो। जितना अपने अश्रुओं की वारी झरेगी जितने अपने अश्रु झरेंगे उतना ही ये सुई के ऊपर का मैला जो है वो धुलता जाएगा। सुई के ऊपर का कादव कीचड़ धुलता जाएगा। और फिर जैसे ही सुई फ्री हो जाती है तो ऑटोमेटिक ईश्वर की ओर चली जाएगी। देखिए दिस इज़ अ वेरी फंडामेंटल। लगता है कि ठाकुर अद्वैत वेदांत की बात कर रहे हैं। लगता है कि ठाकुर भक्ति की बात कर रहे हैं। किंतु इसके भीतर में कितना बड़ा ज्ञान छुपा हुआ है कि सुई और मैग्नेट एक ये दोनों का नित्य मिलन तो है ही है। दोनों का स्वभाव ही है। एक साथ में रहना एकाकार होकर के एकीकृत होकर के रहना। आपको सुई को मैग्नेट की ओर धक्का मारने की जरूरत नहीं है। वो स्वभाव के अनुसार वहां चली जाएगी। बस वही करना है कि बीच का जो आवरण है उसको हटा देना है। जैसे कि योगसूत्र में ऋषि पतंजलि कहते हैं कि ये जो नहर है नहर का पानी तो स्वाभाविक रूप से अपने लक्ष्य की ओर बह ही रहा है। बस कभी-कभी क्या है कि वो नहर में वो मिट्टी या कीचड़ पड़ के नहर को ब्लॉक कर देता है। तो आपको वो ब्लॉकेज ही ओपन करना है। जैसे ब्लॉकेज ओपन हो गया पानी फिर से वो बहना शुरू हो जाएगा। तो बस इतना ही है आपको यह ब्लॉकेज जो है पाइप के भीतर में या नहर के भीतर में उसी को हटाना है। पानी तो अपना स्वाभाविक गति से समुंदर की ओर या तो फिर खेत की ओर। किसान का उदाहरण है। तो खेत उस किसान तो नहर खोदता है अपने खेत में पानी लाने के लिए। तो खेत की ओर जाना उसका तो स्वभाव ही है। बस बीच में से ब्लॉकेज हटा देना है। तो किस तरह से सुई

भक्ति मार्ग से ज्ञान प्राप्ति: शरणागति पूर्वक ईश्वर के लिए क्रंदन करने से निर्विकल्प समाधी प्राप्ति

के ऊपर में से ये कादा या मिट्टी हटाया जाए? तो ठाकुर कहते हैं एक तो ईश्वर के लिए व्याकुल होकर के रोओ। जितना रोओगे जितना अश्रुवारी झरेगी, उतना ही ये कीचड़ जो है सुई के ऊपर का वो क्लीन होता जाएगा। तो यह एक है और ठाकुर बड़ा ही सुंदर बात करते हैं। ईश्वर के लिए यदि रो पाओगे तो दर्शन होगा समाधि होगी। तार जन काते पारले दर्शन होए समाधि होए। ईश्वर के लिए रोओगे रो सकोगे तो दर्शन होगा और समाधि होगी। जोगे सिद्ध होले ही समाधि योग में सिद्ध होने से ही समाधि। कान ले कुंभक आपनी हो तार पर समाधि। रोने से कुंभक अपने आप होता है और फिर इसके बाद में होती है समाधि। जो लीला प्रसंग हम पढ़ रहे हैं उसमें यही टॉपिक अभी चल रहा है। शरद महाराज कहते हैं कि किस तरह से भक्ति योग के माध्यम से आप समाधि की ओर निर्विकल्प समाधि की ओर जा सकते हैं। ट्रेडिशनली आप देखेंगे तो यह सब वाटर टाइट कंपार्टमेंट थे एक समय कि हां भक्ति योग के माध्यम से ईश्वर के लिए व्याकुल होकर के रोने से ईश्वर के दर्शन होंगे। ज्यादा से ज्यादा सविकल्प समाधि होगी जिसमें अपना अहम जो है वह जागृत रहेगा। ईश्वर के साथ में एक तरह की दूरी तो बनी ही रहेगी। किंतु भक्ति योग के माध्यम से निर्विकल्प समाधि भी होती है। ये ठाकुर भी कहते हैं और फिर शरद महाराज भी हमको कहते हैं। तो ये एक हो गया। और फिर दूसरा उपाय ठाकुर कहते हैं ध्यान। और

ध्यान मार्ग से निर्विकल्प समाधी प्राप्ति

एक उपाय है ध्यान। सहस्त्रार में शिव विशेष रूप में विराजमान है। उनका ध्यान करना है। शरीर जैसे कि एक हांडी है और एक घट है, घड़ा है और मन और बुद्धि है। जैसे कि पानी। इस पानी के भीतर में सच्चिदानंद सूर्य का प्रतिबिंब पड़ता है। इस प्रतिबिंब सूर्य का ध्यान करते-करते सत्य सूर्य उनकी कृपा से दर्शित होते हैं। सत्य सूर्य का उनकी कृपा से दर्शन होता है। तो यह जो अपना कांसेप्ट है कि एक है मन बुद्धि चित्त अहंकार दूसरा है यह प्रतिबिंबित चैतन्य या तो फिर सूर्य का प्रतिबिंब चैतन्य का प्रतिबिंब ये दोनों मिलाकर के अपना कॉन्शियसनेस बनाते हैं। तो देखिए कि हम देखें तो एक है जड़ शरीर जो कि संपूर्ण रूप से जड़ है जिसमें चेतन बिल्कुल है ही नहीं और दूसरी ओर ये देखिए कि संपूर्ण रूप से चेतन आत्मा तो इन दोनों को कनेक्ट क्या करता है? इन दोनों के बीच में मिसिंग लिंक क्या है? तो यह मिसिंग लिंक है यह अपना कॉन्शियसनेस। कॉन्शियसनेस में जड़ और चेतन इकट्ठा होते हैं। तो यह है आत्मन, यह है देह और बीच में आता है कॉन्शियसनेस। या तो फिर वेद की लैंग्वेज में कहेंगे, वेदांत की लैंग्वेज में कहेंगे जीवात्मा। तो यह जीवात्मा या कॉन्शियसनेस को समझना उसको उसको इंजीनियर इंजीनियरिंग आवर कॉन्शियसनेस यही तो है जैसे कि जीवन का अपना साधक जीवन का एक बहुत बड़ा उद्देश्य देखिए मैं बेलूर मठ गया था तो योगानु योग ऐसा हो गया कि 14th जनवरी को वहां पे वो गंगा आरती थी तो मां का घाट यदि आपने देखा होगा बेलूर मठ में वहां पे मां के घाट में आरती होती है और सब साधु है, डिवोटी है, सब वहां पे स्टेप्स के ऊपर में बैठे हैं। कुर्सियां लगाई है ज्यादातर लोगों के लिए। ब्रह्मचारी लोग वहां पे स्टेप्स के ऊपर में ही बैठे थे। तो मैं ब्रह्मचारियों के साथ में जाके बैठ गया। स्टेप्स के ऊपर में ही देखता हूं आगे बैठ के आनंद लेंगे। तो क्या है? देखिए एक तो संध्या का समय है। पवित्र वातावरण है। गंगा आरती चल रहा है। प्रेसिडेंट महाराज स्वयं पीछे में बैठे थे। अपने जितने भी सीनियर साधु हैं वो सब बैठे थे पीछे में। तो एक और मां का मंदिर है। मां का समाधि यहां पे है। तो इतना सुंदर पवित्र वातावरण तो मैं जैसे देख रहा था। एकाएक मुझे अनुभूति हुआ कि मैं अपने हृदय में ही देख रहा हूं। जैसे कि अपने हृदय के भीतर में जितना भी मुझे क्रोध है किसी के प्रति ईर्ष्या है किसी के प्रति या तो फिर एक तरह का उदासीनता है डिप्रेशन है वो सब जैसे कि मेरा जन्म जन्मांतर का भीतर में भरा हुआ है उसको जैसे कि मैं देख रहा हूं और एक के बाद एक उससे मैं मुक्त हो रहा हूं तो ये जो अपना जो जीवात्मन कहे कहेंगे या तो फिर अपनी कॉन्शियसनेस कहेंगे। कॉन्शियसनेस के ऊपर में ध्यान करना। यह कभी-कभी होता है। बड़ा मुश्किल होता है कॉन्शियसनेस को पकड़ना या किंतु कभी-कभी हम पकड़ पाते हैं अच्छे से लंबे समय तक साधना करने से हम अपने खुद के स्वभाव को देख पाते हैं। तो जब हम अपने खुद के स्वभाव को देखेंगे। जब हम अपनी खुद की कॉन्शियसनेस को देखेंगे तब पता चलता है वो जैसे गाड़ी होता है ना तो गाड़ी बिगड़ा है। बिगड़ गया है रास्ते में अपना कार तो क्या करेंगे? मैकेनिक के पास में ले जाएंगे। अभी कोई-कोई लोग होते हैं उनको छोटा-मोटा मरम्मत करना आता ही है। कार बिगड़ा है तो वो वुड ओपन करके वो देखते हैं इंजन में कुछ गड़बड़ है तो हो सकता है कि मैं ठीक कर दूं। किंतु जिसको आता है वह कर लेता है। नहीं आता है वह मैकेनिक के पास में ले जाता है। हम लोगों में से ज्यादातर लोगों की यही हालत है। यह शरीर रूपी कार हम लोग चला तो रहे हैं। किंतु जब भी कोई भी प्रॉब्लम होता है इस कार के साथ में तो ये इंजन खोल कर के ये जो हुड है उसको ओपन करके भीतर का जो मैकेनिज्म है उसको देख कर के उसको रिपेयर करने की क्षमता या नॉलेज हमको मिलता ही नहीं है। बहुत सारे लोग होते हैं ना उनका एक नेचुरल मैकेनिकल एक स्किल या तो एक इंसाइट रहता है। फटाफट करके ये मशीन मशीन की बातें सीख लेंगे। इलेक्ट्रिकल है। ये मैकेनिकल है। वे लोग गाड़ी चलाएंगे। छोटा-मोटा रिपेयरिंग अपने से करना सीख लेंगे। किंतु फिर बहुत सारे लोग ऐसे भी होते हैं। उनको आप इंजन ओपन करके दिखाइए। कुछ समझ में नहीं आएगा। उनको मैकेनिक के पास में जाना ही होगा। छोटी-मोटी बातों के लिए। घर में भी इलेक्ट्रिक का कुछ भी प्रॉब्लम है वो फटाफट करके इलेक्ट्रिशियन को बुलाइए और 1000 2000 तो इजीली वो आजकल ले लेते हैं। तो क्या है और कोई-कोई लोग होते हैं छोटा-मोटा ये अपने से सीख लेते हैं। खास करके अमेरिका में आप जाएंगे छोटा-मोटा मेंटेनेंस वे लोग अपने से ही कर लेते हैं। वो किसी पे डिपेंड नहीं रहते। तो देखिए कि अपना भी तो यह देह है। देह के भीतर में यह कॉन्शियसनेस रूपी इंजन है। जब यह इंजन बिगड़ता है, अपना गाड़ी को आधे रास्ते पर लाके छोड़ देता है, तो हम लोग बिल्कुल हताश ही हो जाते हैं। जैसे कि किसी मैकेनिक को खोजना पड़ेगा। गुरु को खोजना पड़ेगा। तब कहीं जाकर के हमको कुछ मार्गदर्शन मिलेगा। किंतु देखिए ये गाड़ी को मरम्मत करना, इंजन की मरम्मत करना यह हमको सीखना ही होगा। कौन से गुरु पे आप कितना भरोसा रखेंगे? है ना? आजकल तो आपको पता ही है रामकृष्ण संघ में यदि आपने रिवर्ड प्रेसिडेंट महाराज या वाइस प्रेसिडेंट महाराज से दीक्षा ली है तो उनके साथ में वार्तालाप करने का सुयोग रेयरली आता है। आपको तो रेयरली आता है। हम लोगों का भी ऐसा ही है। तो फिर क्या है? हम ही को यह शास्त्र पाठ करके यह क्लासेस करके अपना यह जो इंजन कैसे काम करता है वह सीख लेना है और जैसे ही ये इंजन का कार्य हमने सीख लिया वैसे ही जब भी निराशा हताशा क्रोध गुस्सा ये जो काम क्रोध मद लोभ मोह मत्सर ये जो डरिपु है वो जैसे ही भीतर में जन्म लेते हैं वैसे ही हमको पता चलता है कि इसमें इंजन के भीतर में यहां भी यह गड़बड़ हो रहा है। उसको मुझे ठीक करना है। तो देखिए कि ये मैं गंगा आरती की बात कर रहा था। आई स्टिल रिमेंबर कि सडनली मुझे एक ऐसा लगा कि मैं अपनी ओर देख रहा हूं। मेरे भीतर में ये जो कॉन्शियसनेस है ये गाड़ी के भीतर में जो इंजन है तो ये हुड ओपन करके ये इंजन को मैं देख रहा हूं। इसमें क्या-क्या सब प्रॉब्लम है दिखाई दे रहा है। प्रॉब्लम को दूर करना हो सकता है इतना इजी ना हो। किंतु ये अपने ये जो आंखों को रिवर्स करना अपनी ओर देखना और ये अपनी भीतर में ये जो प्रॉब्लम्स है इसको देखना और इसको समझ पाना दिस इटसेल्फ ये सेल्फ रिफ्लेक्शन जिसको कहते हैं दिस इटसेल्फ इज़ द ग्रेटेस्ट अचीवमेंट। वन ऑफ़ द ग्रेटेस्ट अचीवमेंट इन स्पिरिचुअल लाइफ। बहुत ज्यादा बहुत सारे लोग क्या है कि जब जीवन में प्रॉब्लम होता है तो भगवान को कोसेंगे अपने नसीब को कोसेंगे और किसी भूत प्रेत को कोसेंगे दूसरे लोगों को गाली देंगे कि उनकी वजह से मेरे साथ में ऐसा हो रहा है। नहीं अपना जीवन अपने कर्म के प्रवाह के अनुसार ही चल रहा है। कोई ग्रह नक्षत्र, भूत, पैशाच, देवता ऐसा कुछ नहीं है जो कि हमारे जीवन में हमारे साथ जो हो रहा है उसके लिए दाई हो। प्रत्येक डिसीजन, प्रत्येक एक्शन, प्रत्येक कर्म उसके लिए हम स्वयं दाई है। क्योंकि हमारे अलावा और कुछ है ही नहीं इस जगत में। तो देखिए कि दिस ये अद्वैत वेदांत का जो सर्वोच्च सिद्धांत है सर्वम खलव इदम ब्रह्मन इस जगत में जो कुछ भी है वो ब्रह्म ही है एंड अहम ब्रह्मास्मि और मैं ही हूं वही ब्रह्म तो यदि सब कुछ तारों में सितारों में ग्रह नक्षत्र भूत पे है प्रेत पिशाच में ये आधिदैविक आधि भौतिक आध्यात्मिक तीन तरह की विडंबनाएं कहते हैं ना तो आध्यात्मिक विडंबना भी मेरे से ही प्रकट होती है। ये आधी भौतिक या आधी दैविक वो सब मैं ही हूं। अल्टीमेटली मेरे अलावा और कुछ है ही नहीं। दिस अल्टीमेट अद्वैतिक अंडरस्टैंडिंग अद्वैतिक रियलाइजेशन।

श्री रामकृष्ण साधन मार्ग में द्वैत और अद्वैत का अद्भुत संगम

देखिए कि अभी तक ऐसा होता था। ठाकुर के आने से पहले आप द्वैत का मार्ग फॉलो कर रहे हैं। एक तरह का आपका थिंकिंग प्रोसेस है। अद्वैत फॉलो कर रहे हैं। एक तरह का थिंकिंग प्रोसेस है। योग मार्ग फॉलो कर रहे हैं। या तो फिर गीता में उपदेशित उपदेशित कर्म योग है। उसको फॉलो कर रहे हैं। एक-एक मार्ग से आप जा रहे हैं। वेद का ये जो संगीता पोर्शन है उसको यदि आप फॉलो कर रहे हैं। किंतु ठाकुर ने आ करके हमको बताया है कि अल्टीमेटली ये कोई वॉटर टाइट कंपार्टमेंट नहीं है। ये हार्ड एंड फ़ास्ट स्ट्रैटिफिकेशन नहीं है। जितने भी मार्ग है, जितने भी साधन पद्धतियां है, जितने भी ये योग है वो सब अल्टीमेटली इंटरचेंजबल है, इंटरमिंगलिंग है। कभी मिक्स होते हैं, कभी मैच होते हैं, कभी बिछड़ जाते हैं, कभी फिर से मिलते हैं। तो, क्या है कि वाटर टाइट या तो फिर हार्ड एंड फ़ास्ट इसी पाथ को फॉलो करना यह थिंकिंग रामकृष्ण भावधारा का नहीं है। यदि आप रो करके ईश्वर को पुकारेंगे तो भी आप जान लीजिए कि आप और ईश्वर दोनों एक ही है। ऐसा नहीं है कि आप अलग है, ईश्वर अलग है। आप ही रोते-रोते अपने को पुकार रहे हैं। दिस ये माने जो डिलीशियस कॉम्बिनेशन ऑफ द्वैत एंड अद्वैत अद्वैत यानी कि भक्ति साधना के जितने भी एस्पेक्ट है ये रागानुगा भक्ति है ना कि ईश्वर को रो-रो करके प्रार्थना करनी है ना कि ईश्वर के शरणागत होना है ना कि ये जो मन बुद्धि चित्त अहंकार को संयमित करके काम कांचन से मुक्त करके जिस अंतिम लक्ष्य की ओर हम जा रहे एकाएक वहां जाके पता चला कि जो सिंहासन पे जिन जो ईश्वर विराजमान थे जिनके श्री चरणों में मैं अपने को समर्पित करने को जा रहा हूं वो ईश्वर मैं ही हूं। मैं ही सिंहासन पर बैठा हूं। मैं ही जैसे कि कैलाश पर्वत उन्होंने बहुत मेहनत करके कैलाश पर्वत को चढ़ रहा हूं। ऊपर कितना मेहनत किया। माउंटेन क्लाइंबिंग में, ट्रैकिंग में जाकर के देखा कि पर्वत के ऊपर में जो शिव विराजमान थे वो मैं ही हूं। मेरे अलावा और कुछ नहीं है। तो देखिए कि एक ओर है ये स्ट्रगल। ये स्ट्रगल हमको करनी है। साथ में ही ये अद्वैतिक रियलाइजेशन है कि जिस अंतिम उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए हम स्ट्रगल कर रहे हैं। वो अंतिम उद्देश्य मैं ही हूं। ये ऐसी बात हो गई कि मेरे हाथ में मान लीजिए कि एक पेन है। अभी ये मेरे हाथ में ये है विक्स इन्हेलर है। तो मान लीजिए कि ये विक्स इन्हेलर है मेरे हाथ में। तो अभी मैं भूल गया हूं कि ये मेरे हाथ में है और मैं पूरे कमरे में चारों ओर खोज रहा हूं। एक्चुअली ऐसा ही हुआ। ये क्या? मैं रात में सोते समय मेरे बिस्तर पे था तो नीचे गिर गया। तो मुझे पता नहीं नीचे गिर गया। सुबह को उठकर मैं चारों ओर खोज रहा हूं। ये कहां गया, कहां गया? फिर एकाएक मुझे लगा कि जमीन पे तो नहीं गिरा तो फिर जाके देखा तो जमीन पे गिरा है। देखिए किंतु ये द्वैत है यदि हम द्वैत मार्ग को फॉलो करते हैं। तो ये इन्हेलर मेरे पास में से मेरे बिस्तर में से जमीन पे गिरेगा। छुप जाएगा। कहीं बिस्तर के नीचे मुझे चारों ओर खोजते खोजते आखिर में वो बिस्तर के नीचे जैसे ही मैंने झांका तो मुझे यह मिला किंतु अद्वैत मार्ग भी साथ-साथ में है। वो कहता है ऑल द टाइम यह मेरे हाथ में ही था। मैं भूल गया हूं कि यह मेरे हाथ में है और सब जगह पे खोजते हुए घूमता हूं। आखिर में यदि मुझे पता चला ये मेरे बिस्तर के नीचे में है। मैंने हाथ जैसे ही बढ़ाया उसको प्राप्त करने के लिए और जैसे ही उसको पकड़ा पता चला कि ये दोनों एक ही है। ऑल द टाइम सब समय ये मेरे हाथ में ही था। बस उसका एक प्रतिबिंब वहां पे मुझे दिख रहा था। सो सच ए डिलाइटफुल कॉम्बिनेशन ऑफ द्वैत एंड अद्वैत ये दोनों को हमको अपनी साधना में मिक्स करना है। तभी तो कहीं जाकर के हम लोग श्री रामकृष्ण के सही-सही चेले हुए। यदि आप प्योर अद्वैत को फॉलो करते हैं और कहेंगे कि ये ईश्वर के लिए रोना ये मातृभाव है, बालक भाव है, यह शरणागति है। संपूर्ण रूप से अपने को जैसे कि ईश्वर के श्री चरणों में विलय कर देना है। वो सब चीजों की कोई आवश्यकता नहीं। सिर्फ विचार मार्ग को फॉलो करो तो भी आप ठाकुर के संतान नहीं है। और यदि आप यह सोचेंगे कि हां शरणागति मेरी साधना है। अहंकार को मुझे समाप्त कर देना है। मुझे अपने मन में से काम कांचन को हटा करके जितना हो सके जपात सिद्धि ही जपात सिद्धि जैसे मां ने कहा है जप करते जाना है। जप करते जाना है। पता नहीं कितने जन्मों के बाद में मुक्ति मिलेगी। वही वो जो उद्बोधन की वो फेमस कहानी कि एक साधु को गुलाब मां डांट रही है। डॉक्टर महाराज उद्बोधन में थे तो गुलाब मां डांट रही है कि क्यों खाने को टाइम पे नहीं आते? तो बार-बार डांटने से फिर मां ने बुलाया वो डॉक्टर महाराज को। बोला बेटा तुम क्यों नहीं खाने को जाते टाइम पे? तो ये डॉक्टर महाराज बेचारे तो उम्र में तो छोटे ही थे। मां के सामने रो पड़े। कहा कि राजा महाराज ने कहा है तो 10,000 जप नियमित करने हैं। प्रतिदिन करना है और काउंट को ठीक रखना है। काउंट करने में यदि गड़बड़ हो गया तो तुम्हारा जप का फल राक्षस खा जाएगा। तो मां हंस पड़ी सुनकर के और फिर कहा देखो बेटा तुम्हारा मन एकाग्र रहे इसलिए राजा ने ऐसा कहा है। स्वामी ब्रह्मानंद ने ऐसा कहा है। किंतु मैं कहती हूं कि तुम आकर के ठीक समय पे खाना खा लो फिर बाद में जाके जप करना। तो देखिए कि ये एक थिंकिंग है कि 10,000 जप करने हैं। मां प्रतिदिन 1 लाख जप करती थी। तो वो एक हार्ड स्ट्रगल सतत नियमित साधना करना है। तो वो एक भाव है। किंतु साथ में ही ये अद्वैतिक रियलाइजेशन होना ही चाहिए। मैं यदि 10,000 जप करने को गुरु ने कहा है, संख्या ठीक रखने को कहा है और यदि ये भी कहा है कि यदि संख्या काउंटिंग जो है तुम्हारा ठीक नहीं रहेगा गड़बड़ होगी तो फिर से पहले से स्टार्ट करना है। वरना तुम्हारा जो जप का फल राक्षस खा जाएगा। उस समय यह बात याद रखनी है। जप करने वाला भी मैं हूं। जप का फल खाने वाला राक्षस भी मैं हूं। और जिस देवता की सिद्धि के लिए जिस देवता के दर्शन के लिए मैं जप कर रहा हूं वो देवता भी मैं हूं। दिस द्वैत और अद्वैत दोनों रियलाइजेशन अपने मन में साथ-साथ में चलने ही चाहिए। तब देखेंगे कि हम लोग श्री रामकृष्ण को ठीक-ठीक फॉलो कर रहे हैं। अपने लिटरेचर में जो भी कंफ्यूजिंग बातें लगती है वो सब ये दोनों रियलाइजेशन को कंबाइन करने से ठीक हो जाएगी। और इसीलिए यहां पर देखिए ये प्रतिबिंबित सूर्य का ध्यान करते-करते सत्य सूर्य उनकी कृपा से दर्शन होते हैं। ये प्योर अद्वैत वेदांत है। देखिए एक ही पैसेज में ठाकुर हमको दो उपदेश देते हैं। दो बात कहते हैं ईश्वर दर्शन कैसे होंगे? ठाकुर कहते हैं रो-रो करके ईश्वर को पुकारो तो ईश्वर दर्शन होंगे। कहते हैं सहस्त्रार पे शिव है। उनका ध्यान करो तो वही फिर वो शरीर शरीर है घट घड़ा और इसके भीतर में पानी है मन और बुद्धि। इस पानी में सच्चिदानंद सूर्य का प्रतिबिंब पड़ता है। प्रतिबिंब सूर्य का ध्यान करते-करते सत्य सूर्य उनकी कृपा से दर्शन होते हैं। दिस इज प्योर अद्वैत प्योर अद्वैत और प्योर द्वैत को ठाकुर एक साथ में लेके आते हैं। एक ही उपदेश के भीतर में एक ही उत्तर के भीतर में एक प्रश्न का एक उत्तर इस उत्तर में ठाकुर ने द्वैत और अद्वैत दोनों को मिक्स किया है। और आखिर में देखिए ये जो सेंटेंस ए से प्रतिबिंबित सूरजे ध्यान करते शक्त सूरजो तार कृपाए दर्शन होए उसी प्रतिबिंबित सूर्य का ध्यान करतेकरते सत्य सूर्य उनकी कृपा से दर्शन होते हैं। सत्य सूर्य का उनकी कृपा से दर्शन होता है। अद्वैत में ये जो कांसेप्ट है ये इमेजरी है। स्पष्ट रूप से दी गई है कि ये प्रतिबिंबित सूर्य है। उसका ध्यान करना है तो सत्य सूर्य होगा क्या? ये घड़ा जो है हमारे संस्कार की शुद्धि होगी तो ये घड़ा जो है वो टूट जाएगा। ये घड़ा टूट जाएगा। मन और बुद्धि बिखर जाएंगे तो ये प्रतिबिंब भी सूर्य अदृश्य हो जाएगा और हम जो है सत्य सूर्य में विलीन हो जाएंगे जो कि मेरा सही स्वरूप है। दिस इज पिक अद्वैता। किंतु ठाकुर इसी के साथ में कहते हैं उनकी कृपा से दर्शन होगा अर्थात कि ईश्वर की कृपा से ये घड़ा टूटेगा। दिस इज़ सो ब्यूटीफुल द्वैत और अद्वैत का ये कॉम्बिनेशन एक प्रश्न के उत्तर में ठाकुर ने दोनों को कम कंबाइन किया है। व्याकुल होकर के रहना है और प्रतिबिंबित सूर्य पर ध्यान करते-करते असली सूर्य तक पहुंचना है। ये तो दो डिफरेंट अह जो पॉइंट है। दो डिफरेंट पॉइंट को तो ठाकुर द्वैत और अद्वैत लेके ही आते हैं। किंतु एक ही सेंटेंस के भीतर में एक ही प्रक्रिया के भीतर में भी ठाकुर ये दोनों पॉइंट को मिक्स करते हैं कि प्रतिबिंबित सूर्य का ध्यान करते-करते ईश्वर की कृपा से असली सूर्य का दर्शन होगा। ये जो अपने भीतर में ये जो घट है घड़ा रूपी देह है इस देह के भीतर में मन और बुद्धि रूपी जो पानी है जल है उसमें ये जो प्रतिबिंबित सूर्य है ईश्वर की कृपा से ये घट टूट जाएगा ईश्वर की कृपा से ये घड़ा टूट जाएगा पुरुषार्थ और परमार्थ दोनों चाहिए ये दोनों का कॉम्बिनेशन ही रामकृष्ण संघ की श्री रामकृष्ण की साधना का सार भाग है द्वैत में जाएंगे कहेंगे बिना ईश्वर की कृपा के कुछ नहीं होगा अद्वैत वाले कहेंगे कि अपना ये जो सेल्फ एफर्ट है उसके बिना कुछ नहीं होगा तो ये सेल्फ एफर्ट के सबसे बड़े ये जो हिमायती सबसे बड़े वो जो क्या कहेंगे चैंपियन वो थे तोतापुरी तो तोतापुरी को भी मां ने दिखा दिया कि ये शक्ति के इलाके में जब आपने जन्म ग्रहण किया है तो फिर आपको शक्ति को स्वीकार करना ही होगा। नरेंद्र जिस दिन काली को स्वीकार करता है ठाकुर का यह जो खुशी कितना झलक उठता है नरेन काली में छे नरेन काली में नरेंद्र ने मां काली को माना है नरेंद्र ने काली को माना है ये स्वीकार किया है ये कितना ठाकुर उत्तेजित हो गए थे कितने खुश हो गए थे जिस नरेंद्र को वो अष्टावक्र संहिता सिखा रहे हैं उसी नरेंद्र ने जब काली को स्वीकार किया तब उनकी खुशी जैसे की छलक उठी यानी कि ठाकुर ने ऐसा नहीं किया कि अपने कुछ शिष्यों को उन्होंने सिर्फ द्वैत मार्ग में तैयार किया और स्वामी जी को उन्होंने सिर्फ अद्वैत मार्ग में तैयार किया। इस तरह का जो एक ट्रेडिशनल थिंकिंग कभी-कभी हम लोग सोचते हैं वो बिल्कुल गलत है। ठाकुर ने ये चाहे राजा महाराज हो ना कि चाहे शरद महाराज हो शशि महाराज हो इनको भी और यहां पे स्वामी जी को भी दोनों को द्वैत और अद्वैत के कॉम्बिनेशन से ही तैयार किया है। बस वही बात है कि स्वामी जी के भीतर में अद्वैत भाव जो है वो जैसे कि परिस्फुट होकर के दिखता है। स्वामी जी ने खुद ने कहा है ना किस तरह से कहा है ठाकुर बाहर से द्वैत है बाहर से पूरे भक्ति है भीतर में से पूरे ज्ञानी है जबकि मैं बाहर से पूरा ज्ञानी हूं किंतु भीतर से पूरा भक्त हूं। ये जो स्वामी जी का खुद का ये डेफिनेशन। तो वैसे ही ये जो गुरु भाई और स्वामी जी दोनों को हम कंबाइन करें ठाकुर का वो जो फेमस विज़न कि उन्होंने देखा कि एक और है जितने भी भक्त बाकी सब भक्त एक जगह पे है वो द्वैत का इलाका है। फिर एक जगह पे देखा कि लाल सुरकी की तरह ज्योति प्रज्वलित हो रही है। जिसमें कि नरेंद्र अद्वैत भाव में ध्यान कर रहा है। और द्वैत वाला कोई जाकर के एक नजर मारके आया किंतु अद्वैत के प्रभाव से भयभीत हो करके वापस चला आया और फिर वो जो अभेदानंद की तो फेमस कहानी स्वामी जी ने अपने खुद के अद्वैत भाव से जैसे कि उनको संक्रमित कर दिया था। उनको एक तरह से ये कर दिया था। तो फिर क्या है कि अभेदानंद जी द्वैत भाव से जो प्रोग्रेस कर रहे थे उसमें विघ्न हुआ और फिर वो उनके भीतर में उनके बिहेवियर में कुछ-कुछ इनकंसिस्टेंसी कुछ कुछ विकृतियां दिखने लगी। ठाकुर ने खुद नरेंद्र को बुला के डांटा था स्वामी जी को बुला के कि क्यों तुमने अपना भाव उसके भीतर में डाल दिया। वो तो अपने भाव से आगे बढ़ रहा था। किंतु देखिए ये जितनी भी कहानियां आप सुनते हैं ऐसा नहीं है कि ठाकुर उनको एक्सक्लूसिवली द्वैत भाव से तैयार करते हैं। इनको एक्सक्लूसिवली अद्वैत भाव से उनको एक्सक्लूसिव भक्ति सिखाते हैं। इनको एक्सक्लूसिव ज्ञान ये एक्सक्लूसिव भक्ति और एक्सक्लूसिव ज्ञान रामकृष्ण भावधारा में है ही नहीं। ज्ञान और भक्ति का मिश्रण ही है। बस वही है कि क्या मैनिफेस्ट होता है, क्या डोमिनेंट है। स्वामी जी के भीतर में ज्ञान मैनिफेस्ट होता है। भीतर में से तो भक्ति थी ही थी। बाहर में ज्ञान मैनिफेस्ट होता है। अदर वाइज वही मां को मां का दर्शन करने के लिए जा रहे हैं। अमेरिका से आकर के बाल बार-बार अपने पे गंगाजल छिटक रहे हैं। तुरियानंद जी पूछते हैं क्यों भाई नरेंद्र अपने पे गंगाजल छिटक रहे हो? इतना अभी तो बुखार हुआ है फिर बीमार स्वामी जी को बुखार था ऑलरेडी उस समय आई थिंक वो बीमार हो जाओगे स्वामी जी ने कहा अरे भाई विदेश में गया था पता नहीं कितने ये जो कुकर्म या तो यह सब मेरे पे लगा होगा इसलिए भय होता है कि कहीं अपवित्र देह लेके मैं मां के चरणों का दर्शन ना करूं तो ये भक्ति स्वामी जी में भरभर के था किंतु ये जो युग धर्म था अद्वैत उसको मैनिफेस्ट करना था बोल के वो ज्ञानी दिख लिखते हैं। जबकि गुरु भाइयों को स्वामी जी को फॉलो करना था। चुपचाप संघ का गठन करना था। बैकग्राउंड में रह के किसी को भी स्वामी जी की तरह जगत के सामने ये अपना व्यक्तित्व का प्रचार नहीं करना है। उनको अपने व्यक्तित्व को सब्सिसम कर देना था। अपने व्यक्तित्व को जैसे कि ठाकुर के श्री चरणों में अर्पित कर देना था। अपना अहंकार है, अपना जो भी एंबिशन है, अपनी इंडिविजुअलिटीज है, सबको उनको विसर्जित करके गंगा में विसर्जित करके संघ के लिए कार्य करना है। बोल करके भक्ति का मैनिफेस्टेशन था। किंतु भीतर में ज्ञान संपूर्ण था। तो देखिए जो भी कहानियां आप रामकृष्ण संघ में पढ़ते हैं, ठाकुर की, मां की, स्वामी जी की, गुरु भाइयों की, हमेशा ख्याल रखिए कि द्वैत और अद्वैत ज्ञान और भक्ति दोनों का कॉम्बिनेशन प्रत्येक कहानी में है। प्रत्येक इवेंट में है। प्रत्येक उपदेश में है। कोई भी कहानी, कोई भी उपदेश, कोई भी घटनाएं एक्सक्लूसिव भक्ति या एक्सक्लूसिव ज्ञान की नहीं है। सो दिस ऑलरेडी हमने पढ़ लिया था। किंतु एक रिवीजन आज हमने किया। इसके बाद का जो टॉपिक है वो भी हम कल से स्टार्ट करेंगे। हरि ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु ओम