प्रार्थना
ओम स्थापकायच धर्मस्य सर्वधर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री राम कृष्ण कथामृत दक्षिणेश्वर में श्री रामकृष्ण भक्तों के साथ में और ठन ठन में सिद्धेश्वरी मंदिर में गमन पंचम परिच्छेद 1883 14th दिसंबर कल हमने देखा कि किस तरह से मास्टर महाशय इस दिन को बड़े शुभ दिन को दक्षिणेश्वर में ठाकुर के साथ में रहने के लिए आए हैं और यहां पे कुछ दिनों बिताएंगे। क्रिसमस की छुट्टी है। उस समय ब्रिटिश राज था तो लंबा वेकेशन होता था स्कूल में तो इतने दिनों का बेनिफिट लेकर के मास्टर महाशय ठाकुर के साथ में रहेंगे। अभी आगे क्या होता है? पहले तो कल हमने देख लिया कि मास्टर महाशय अपने साथ में खाना बनाने वाले किसी को लाए हैं। क्योंकि ठाकुर ने कहा है कि अतिथिशाला का खाना साधुओं के लिए और कंगालों के लिए है। तो तुम तो साधु भी नहीं कंगाल भी नहीं तो तुमको वहां पर खाना उचित नहीं। ऐसा बोल करके जब मास्टर महाशय को कहा तो अपने साथ में एक कुक को लेकर आए थे रसोई बनाने वाले को। और फिर देखा कि वह दूध खाएंगे प्रतिदिन तो दूध कहां से मिलेगा? तो फिर ठाकुर रामलाल को कह देते हैं उनका भतीजे को कि वह गौशाला है। वहां से एक गिलास दूध का मास्टर महाशय के लिए बंदोबस्त कर देना है। अभी देखिए आज जो हम
धर्म ग्रन्थ पाठ है हमारे लिए सहज साधना
पढ़ेंगे वह फिर से वही बात कि हम लोग ठाकुर के बारे में क्या सोचते हैं कि वह ठाकुर दिन भर क्या करते होंगे। तो एक हमारे माइंड में एक मेंटल पिक्चर बनता है कि या तो वह समाधि में मग्न होंगे या तो फिर वह भक्तों के साथ में वार्तालाप कर रहे होंगे। ठाकुर ने खुद ने कहा है इसी चैप्टर के प्रारंभ में कि चैतन्य महाप्रभु की तीन अवस्था होती थी। तीन अवस्थाओं में बाह्य दशा में भक्तों के साथ में वार्तालाप करते थे। अर्धबाह्य दशा में मत्त होकर के नृत्य कीर्तन करते थे और अंतरर्दशा में एक के बार ईश्वर में लीन हो जाते थे। तो हम भी यह मास्टर महाशय ने भी नोट किया कि हां हमने तो ठाकुर के बारे में भी यही तीन अवस्थाएं देखी है। किंतु देखिए कि हम जो आम आदमी हैं हमारे लिए तो तीनों में से एक भी अवस्था हमारे लिए होना संभव नहीं है। बाह्य दशा हो सकती है। हम मित्रों के साथ में गप लगाएंगे वगैरह वो वो एक हो सकता है। किंतु अर्धबाह्य दशा और अंतरर्दशा तो हमारे लिए है नहीं। तो बाह्य दशा में ही और क्या-क्या हो सकता है? वार्तालाप करने के अलावा ईश्वरीय चर्चा विचारणा करने के अलावा बाह्य दशा में और क्या हो सकता है? तो हम लोगों के लिए आज के युग में जो सहज उपाय है वह है धर्म ग्रंथों का पाठ। खास करके रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य का स्वाध्याय, उसका पठन और उसके बारे में चिंता करना, उसके बारे में सोचना। तो देखिए कि ठाकुर भी वही कर रहे हैं यहां पे। पिछली बार भी हमने नाइंथ दिसंबर को भी देखा था कि ठाकुर वो भक्तमाल में से पाठ करवा रहे हैं मास्टर महाशय को। आज देखते हैं कि इसी तरह से वो दूसरी दूसरी सब कहानियां पढ़ते हैं। अध्यात्म रामायण में से पढ़ते हैं। यानी कि दो तरह से देखिए कि बहुत बार हम लोग जो कहते हैं कि ठाकुर निरक्षर थे। तो किसी ने कहा था ठाकुर को ही कहा था कि सुना है कि आप निरक्षर थे तो ठाकुर ने कहा है ओगो आमी सुने छिकतो अर्थात कि किसी ने पूछा एग्जैक्ट प्रश्न क्या था मैं भूल गया ऐसा ही था कि आप पढ़ाई लिखाई नहीं कर सकते हैं तो ठाकुर ने इमीडिएटली उत्तर दिया था ओगो आमी शने छ कतो अरे मैंने सुना कितना है तो वह सुना है उन्होंने सिर्फ अपने गुरुओं से नहीं जैसे कि तोतापुरी है भैरवी ब्राहणी है जटाधारी है और भी वहां पर कितने साधु संत आते रहते थे तो उनके पास में तो सुना ही है किंतु साथ में ही इस पुस्तकों का पाठ करके भी श्रवण करके भी उन्होंने सुना है। तो यहां पर देखिए वही सीन वही सिचुएशन फिर से हमारे सामने आती है। मास्टर महाशय लिखते
ठाकुर भगवान राम और परशुराम की कहानी का पाठ सुन रहे है
हैं श्रीक्त रामलाल अध्यात्म रामायण पढ़ते छेन और ठाकुर सुनीते छेन श्रीयुक्त रामलाल अध्यात्म रामायण पढ़ रहे हैं और ठाकुर सुन रहे हैं। सुबह के 9:00 बजे के आसपास का समय था। यह हमने कल देखा। उसी समय मास्टर महाशय आकर के उपस्थित हुए थे। तो मुझे लगता है कि वह जो उनका सामान वगैरह रखने में वगैरह करने में आई थिंक आधा एक घंटा गया होगा। बाद में क्या वह ठाकुर के पास में आकर के बैठे होंगे जो भी है। इसी कोई सुबह के ही समय में यह चल रहा है। रामलाल अध्यात्म रामायण पढ़ रहे हैं। ठाकुर सुन रहे हैं। मणियो बसिया सुनते छन मणि यानी कि मास्टर महाशय। मास्टर महाशय भी बैठे-बैठे सुन रहे हैं। रामचंद्र सीता के विबा कोरिया अयोध्या आशेते चैन रामचंद्र सीता के साथ में विवाह करके अयोध्या वापस आ रहे हैं। पोथे परशुराम सहित देखा होलो रास्ते में परशुराम के साथ में मुलाकात हो गई। राम हर धनु भंग कोरिया छ शून्या परशुराम रास्ता बोलमाल कोते लागी लेन राम ने हरधनु शिव का धनुष उसको तोड़ दिया है उसके ऊपर में वह तीर लगा के यह सुनकर के परशुराम रास्ते में बड़ा ही हल्लागुल्ला मचाने लगे दशरथ भय आकुल दशरथ तो भय से व्याकुल हो गए हैं। परशुराम आर एकटा धनु राम के छुंडिया मारी लेन परशुराम ने और एक धनुष्य राम के ऊपर में उन्होंने मारा जोर से आर ओई धनु ते ज रोपण करीते बोली लेन और उसी धनु के ऊपर में धनुष्य के ऊपर में ज अर्थात कि वह जो दोरी होती है धनुष्य के ऊपर में जो लगाने वाली जिसके ऊपर में से हम तीर छोड़ते हैं तो वह ज उसके ऊपर में लगाने आने को बोले धनु के बाण योजना कोरिया परशुराम के बोलीलेन एक ए बाण कोथाई त्याग करबो बोलो देखिए यह लोग जो धनुष भी इस तरह के प्रचंड पावरफुल इस्तेमाल करते थे कि उसके ऊपर में इस तरह से वह दोरी बांधना यह भी बड़ा मुश्किल का काम था। यदि कोई महावीर महापराक्रमी प्रचंड बलशाली और शक्तिशाली नहीं होगा तो इस धनुष को थोड़ा सा बेंड करके उसके ऊपर में रस्सी लगाना दोरी बांधना यह बड़ा ही मुश्किल होता था। वो आजकल आप देखते होंगे वो यूरोप में खास करके वो बुल फाइट होता है। एक बुल होता है यानी कि एक बेल वो बेल को एक मैदान में छोड़ दिया जाता है। फिर वो जो मेटाडोर होते हैं वो आदमी लोग एक कुछ वो एक आदमी खड़ा रहता है लाल कलर का कपड़ा लेकर के वो लाल कलर का कपड़ा जैसे-जसा फैलाएगा वह बेल जो है उसके सामने दौड़ेगा जोर से दौड़ेगा। अभी यदि एग्जैक्टली लास्ट मोमेंट में यह मेटाडोर साइड पर नहीं हट जाता तो फिर क्या होगा कि यह बेल सीधा उसी को अपनी सींग मार के पटक देगा और उसकी मृत्यु हो जाएगी। तो यह मदानगी की निशानी है वहां पे। जो सही मर्द है वह इस तरह से बुल फाइट कर सकते हैं। सामने जोर से दौड़े आते हुए बेल को भी वह उसको फेस कर सकते हैं। वह जो स्वामी जी को कहा था ना वह साधु ने कि फेस द ब्रूट। वहां काशी में कि वृंदावन में कहीं पर वह जा रहे थे। वह बंदरों का पूरा उनका एक दल उनके पीछे में लगा। तो स्वामी जी अपनी जान बचाने के लिए दौड़ रहे हैं। रास्ते में एक साधु मिला। उन्होंने जोर के जोर से चिल्ला करके कहा फेस द ब्रूट। पशुओं का सामना करो। भय का सामना करो। यदि भय से भाग जाएंगे तो भय और हमारे पीछे दौड़ेगा। तो यह जो भीतर की मददानगी है कि आपके भीतर में साहस है, पुरुषत्व है, पौरुषत्व है कि उसकी मदद से उसकी वजह से आप सामने आते हुए भय को भी आप रोक सकते हैं। उसका सामना कर सकते हैं। तो, यहां पे भी यह जो अपना प्राचीन भारत था, वहां पे यदि आपको पौरुष प्रकट करना है, आपको यदि अपनी मर्दानगी का प्रदर्शन करना है, यदि साहस और एक तरह की शक्ति का प्रदर्शन करना है, तो आप कैसे करेंगे? तो कोई धनुष होता है बड़ा ही पावरफुल धनुष उसको आपको बेंड करके उसके ऊपर में आपको रस्सी बांधनी है। यदि आप यह कर पाए क्योंकि यह धनुष इतने पावरफुल होते थे कि इसको बेंड करना किसी आम आदमी का कार्य नहीं था। प्रचंड मसल पावर चाहिए। प्रचंड उसके लिए दैहिक शक्ति चाहिए। तो इस तरह से परशुराम ने सुना कि यह राम ने वो शिव का धनुष भंग किया है। तो उन्होंने सोचा होगा पहले तो या तो यह रूमर है या तो फिर भगवान राम ने कोई ट्रिक आजमाई है। तो इसको अपनी नजरों से परीक्षा करने के लिए इसी तरह का एक दूसरा पावरफुल धनुष्य परशुराम ने श्री रामदेव श्री भगवान राम की ओर फेंका। तो भगवान राम ने भी उसको हवा में से पकड़ा। उसको बेंड किया। भगवान राम तो इतने पावरफुल थे बेंड किया उसके ऊपर में यह ज उसको लगा दी रस्सी लगा दी और फिर उसके ऊपर में यह बाण उसके ऊपर में लगा करके कहा कि अभी आप बताइए कि इस बाण को कहां पे छोड़ा जाए और यह तो राम बाण है। वह तो मिथ्या होने वाला नहीं है। उसको तो जिस डायरेक्शन में जिस शत्रु पे उसका वार करेंगे उसके ऊपर में वह जाकर के अटैक करने ही वाला है। तो फिर देखिए कि जब भगवान राम ने ऐसा कहा तब क्या हुआ परशुरामेर दर्पो चूर्ण होइलो परशुराम का घमंड परशुराम का अहंकार चूर्ण विचूर्ण हो गया तिनी श्री राम के परम ब्रह्म बोले तब कोते लागी लेन वो श्री राम को परम ब्रह्म कह के स्तव करने लगे परशुरामेश तब सुनीते सुनीते ठाकुर भाबा बिष्टो परशुराम नाम का स्तव सुनतेस सुनते ठाकुर भावाविष्ट हुए हैं। माझे माझे राम राम ए नाम मधुर कंठे उच्चारण करते छ और बीच-बीच में राम राम यह मधुर कंठ से भगवान का नाम उच्चारण कर रहे हैं। श्री रामकृष्ण रामलाल के अभी यहां पे तीन डॉट्स दिए हैं बीच में। यानी कि इसके बीच का जो नरेशन है वह मास्टर महाशय हमको यह ट्रांजिशन कैसे हुआ कि ठाकुर अर्धबाह्य दशा में चले गए थे बाह्य दशा में से वो ट्रांजिशन इस सेकंड सीन में कैसे हुआ वो तो मास्टर महाशय बताते नहीं है। थ्री डॉट्स देकर के छोड़ दिया है। देखिए कि यदि हम बाह्य दशा है। बाह्य दशा में ऐसा कोई कार्य करें इस तरह की साधना करें कि वह हमको अर्धबाह्य दशा की ओर ले जाए। तो बाह्य दशा में जैसे पहले पैराग्राफ में ठाकुर ने कहा था कि वह भक्तों के साथ वार्तालाप करना है या तो फिर ऐसा कोई भी जैसे मंदिर में जाकर के मां काली को ठाकुर चमर व्यंजन करते थे। चामर व्यंजन करते थे। वह एक है। फिर इस तरह से धर्म ग्रंथ का पाठ है। वह सब करते हैं। देखिए ठाकुर के जीवन का जो इंटेंस तपस्या का वो पीरियड था वो पीरियड अभी समाप्त हो गया है। हमको याद रखना है कि ठाकुर अभी इस पीरियड में कहां पे विराजमान है। नेति नेति करके साधना करके प्रचंड साधना के जो एक झंझवाट जो है साधना का प्रचंड तूफान जो है उनके हृदय पर बह गया था। ऑलरेडी ऑलरेडी उसमें सफलता प्राप्त करके निर्विकल्प समाधि में आरूढ़ हो गए थे। ऑलरेडी अध्यात्म जगत में सर्वोच्च प्राप्ति है। वह भगवान रामकृष्ण देव को प्राप्त हो गई थी। उसके बाद में मां ने प्रकट होकर के कहा था अगेन वो पैराडॉक्स कि निर्विकल्प समाधि में शक्ति का प्रागट्य कैसे हो? तो खैर इसका उत्तर थोड़ा अभी तो मुश्किल है हमारे दिमाग में जाना। हमने स्पेककुलेशन बहुत किए हैं। तो वहीं पर मां काली ने या तो जिसने भी हो उन्होंने शक्ति ने प्रकट होकर के ठाकुर को आदेश दिया था। तू ही भाव मुखे था। तुम भाव मुख में रहना। यानी कि यह कॉन्शियसनेस और सुपरकॉन्शियसनेस की बाउंड्री पे। अभी देखिए यह जो अर्धबाह्य दशा है यह अर्धबाह्य दशा एग्जैक्टली मुझे ऐसा लग रहा है मेरा पर्सनल स्पेककुलेशन है कि यह भाव मुख ये जो ठाकुर की तीन दशाओं का वर्णन जिन्होंने जो उन्होंने किया उसमें कौन सी दशा के साथ में यह मैच होगा? मैं बाह्य दशा के साथ में कि अर्धबाह्य दशा के साथ में मुझे ऐसा लग रहा है कि अर्धबाह्य दशा के साथ में मैच होगा। यानी कि ठाकुर का ऑलरेडी जो जो न्यूट्रल गियर है हम गाड़ी को न्यूट्रल गियर में रखते हैं ना फिर वो गियर वन गियर टू या तो फिर रिवर्स गियर उसमें डालते हैं। तो ठाकुर का जो न्यूट्रल गियर था वो ऑलरेडी अर्धबाह्य दशा थी। इसीलिए ठाकुर को देखिए कि यह सब छोटी-छोटी वासनाएं प्रकट करनी पड़ती थी कि तांबा खावो भाजे जाबो माने तंबाकू खाऊंगा या तो फिर यह शौच के लिए जाऊंगा और फिर ठाकुर मां को बार-बार प्रार्थना करते थे कि मां चीनी होते चाय ना चीनी खेते चाय मैं चीनी होना नहीं चाहता शुगर होना नहीं चाहता शुगर खाना चाहता हूं यानी कि ईश्वर या तो फिर आत्म तत्व के साथ में अभिन्न नहीं हो जाना चाहता। उनसे थोड़ा सा दूरी बना करके रखना चाहता हूं। ईश्वर के साथ में विलास करना चाहता हूं। इसीलिए एक वेदांती साधु को ठाकुर ने कहा था ए सोोहम उड़ाए दा ए बार विलास। यह सोहम है उसको उड़ा दो। इस बार विलास ए बार विलास इस बार विलास यानी कि ईश्वर मेरे ईश्वर के साथ में मैं कोई एक संबंध स्थापित करूंगा यदि मैं बाल गोपाल हूं तो मां ईश्वर है मां यशोदा यदि मैं मां यशोदा हूं तो ईश्वर है बाल गोपाल यदि मैं सुदामा हूं तो ईश्वर है भगवान कृष्ण सख्य भाव मातृभाव बालक भाव यदि मैं गोपी हूं या तो यदि मैं राधा हूं तो भगवान कृष्ण है मेरे प्रियतम मधुर भाव और महाभाव यह ऋषि मुनियों का शांत भाव यह महावीर का दास्य भाव इस तरह से ईश्वर के साथ में एक भाव का संबंध स्थापित करके हमको रहना है। तो ठाकुर इस तरह की सलाह काफी लोगों को देते हैं। हालांकि यह बात भी हमको बिल्कुल विस्मृत नहीं होना है कि ठाकुर थे त्यागी कामिनी कांचन त्याग ये करना किसी भी भाव साधना का फाउंडेशन है। यदि मन में त्याग नहीं है और यदि भाव साधना करने को गए तो भयानक विपद आ सकती है। यह बात ठाकुर ने ही हमको एक बार नहीं बार-बार कही है। कहा है साधु सावधान। साधु यानी कि साधक सिर्फ जो लोग गेरुआ पहनते हैं वह नहीं सभी तरह के साधक जो भी साधक है उसको सावधान होने की जरूरत है। भाव राज्य में बिना त्याग के भाव संभव नहीं और यदि भाव होगा तो उसमें वह फिर गिरावट आ सकती है। उसमें करप्शन आ सकता है। तो देखिए कि अह यह जो है कि ठाकुर यहां पे परशुराम का स्तव सुनते-सुनते ही भावाविष्ट हो गए। यानी कि गाड़ी इसके पहले वह बेचारे रिवर्स गियर में डाल रहे थे। कैसे भी करके अपने मन को पृथ्वी पर रख रहे थे तो रिवर्स गियर में से न्यूट्रल गियर में आ गई। अभी अर्ध भावाविष्ट हो गए हैं। अर्ध अर्धबाह्य दशा में चले गए हैं। इसके बाद में किंतु देखिए कि बहुत बार ऐसा होता है कि अर्धबाह्य दशा न्यूट्रल गियर में से फर्स्ट गियर सेकंड गियर यानी कि और फिर वो ईश्वर की ओर मन जाता जाएगा। संपूर्ण रूप से समाधस्त हो जाएंगे। सविकल्प समाधि में चले जाएंगे। निर्विकल्प समाधि में चले जाएंगे। जैसे कि
ठाकुर की भाव-अवस्था देखकर माँ सारदा को भय लगता है
मां शारदा देवी शुरू-शुर में आई थी। श्री दक्षिणेश्वर 1972 1872 1873 उस दिनों की बात है 1872 1873 कि ठाकुर के साथ में एक ही कमरे में रात को सोया करती थी किंतु ठाकुर को रात में बार-बार भावावस्था होती थी। बार-बार वह समाधि में चले जाते थे। तो एक बार तो और मां सब समय भयभीत रहती थी। बेचारी मां को तो समझ में नहीं आता था कि यह सब ठाकुर के साथ में क्या हो रहा है। हालांकि देखिए कि ठाकुर जब जय कामार पुकुर आते थे तो मां भी तो जयराम बाटी से कामरार पुकुर आती थी और इस तरह का वर्णन भी है कि भैरवी ब्राह्मणी के साथ में जब ठाकुर आए थे कामार पुकुर तो भैरवी ने ठाकुर को गौरांग महाप्रभु का स्वांग उनके ऊपर में सजाया था। गौरांग महाप्रभु की तरह उनको वस्त्र वगैरह पहनाया था और फिर मां शारदा देवी को कहा था कि आकर के ठाकुर का एक बार दर्शन कर लीजिए तो ठाकुर ऑलरेडी बाह्य अर्धबाह्य दशा में अंतर्दशा में चले गए थे तो मां आकर के भयभीत वो तो आई थिंक 13 14 साल की उम्र होगी मां की उस समय तो भयभीत होकर के ठाकुर को प्रणाम करके वो वहां से चली गई थी तो यानी कि ठाकुर की भावावस्था उन्होंने देखी तो थी किंतु इसके बारे में डिटेल शायद शायद इतनी नहीं पता थी। इसीलिए जब मां ठाकुर के कमरे में रात को रहती थी तो भयभीत रहती थी। जब भी ठाकुर को समाधि हो जाएगी, अंतर्दशा हो जाएगी, भाव में चले जाएंगे तो फिर मां तो थोड़ी देर तो बैठी रहेगी कि क्या हो रहा है देखती थी। किंतु फिर ठाकुर लंबा समय यदि अंतर्दशा में बिताएंगे, समाधि में बिताएंगे तो बेचारी चिल्लाना शुरू कर दी थी। फिर यहां से वह हृदय दौड़ा दौड़ा आएगा। अभी हृदय को थोड़ा सा पता है ठाकुर के बारे में तो कौन सी समाधि वो लक्षण देख के फिर वह कौन से देवता का नाम देना और देवता का वो फिर वो चटिंग शुरू करना वो देवता का नाम सुनाना फिर हृदय शुरू करेगा और कुछ समय के बाद में ठाकुर फिर से वो पृथ्वी लोक पे वो न्यूट्रल गियर में आकर के हाजिर होंगे तो यह ठाकुर की ये जो गियर सिस्टम है तो फिर कुछ दिनों के बाद में ठाकुर ने मां को भी सिखा दिया कि किस तरह की समाधि के लक्षण देख के कौन से देवता का नाम सुनाना है जिससे कि वह फिर से न्यूट्रल गियर में आ जाए। उनकी गाड़ी फिर से वह पृथ्वी लोक पे आ जाए जो कि उनका एक क्योंकि ठाकुर को तो यह सब कार्य भी तो करना था। कोलकाता में लोगों को ईश्वर का नाम सुनाना था। मां काली का नाम सुनाना था। उनका संदेश देना था। इसके लिए ठाकुर कैसे भी करके अपने मन को पृथ्वी लोक पर रखते थे। तो यहां पर भी देखिए कि परशुराम का स्तव सुनते-सुनते ठाकुर भावाविष्ट हो गए हैं और फिर बीच-बीच में मधुर राम नाम कर रहे हैं। इसके बाद
ठाकुर भगवान राम और गुहक की कहानी का पाठ सुन रहे है
में क्या हुआ मास्टर महाशय ने नहीं लिखा किंतु इसके बाद के पैसेज में ही ठाकुर जैसे कि फिर से बाह्य दशा में आ गए हैं और रामलाल को कहते हैं एक टू गुहक चंडालेर कथा बोल देखी थोड़ी सी गुहक और गुहक चंडाल की बात कहो तो रामचंद्र जखन पितु सत्य कारण बनेगिया छिलेन गुहक राज चमकित होइया छिलेन रामचंद्र जब पिता का वचन पिता के वचन का भंग ना हो इसके लिए पितु सत्य पिता का सत्य वचन भंग ना हो इसके लिए भगवान राम ने वन में जाना स्वीकार किया था और जब यह समाचार गुह भकराज के पास में आया तो वह चमकित हो गए थे। रामलाल भक्तमाल पढ़ते छ रामलाल भक्तमाल पढ़ रहे हैं। यह वही भक्तमाल जिसके बारे में ठाकुर कहते हैं कि यह तो ग्रंथ तो अच्छा है किंतु एक घे अर्थात कि एक एक ही तरह के भाव की बात कही है। जो लोग वैष्णव नहीं है उनके बारे में निंदा भी की है। तो जो भी है किंतु ठाकुर को यह ग्रंथ अच्छा लगता होगा। क्योंकि पिछली बार भी नाइंथ दिसंबर को भी इसी ग्रंथ का पाठ होते हुए देखा था। आज भी देख रहे हैं। रामलाल क्या पढ़ते हैं? नोने गोलोए धारा मने उतरोल चमकी चाहििया रहे ना आई बोल निमखो ना को पड़े चाहिया रही का पुतुली प्राय स्पंदन होईलो अर्थात कि आंखों में से आंसू बह रहे हैं। फिर मन में बड़ा ही यह एक तरह का तूफान चल रहा है। चारों ओर चमकित होकर के देख रहे हैं। गुहक राज के बारे में ही यह सब बातें कर रहे हैं। तार पर धीरे-धीरे रामेर काछे गिया बोलीलेन अमार घरे एशो फिर धीरे-धीरे करके राम के पास में जाकर के कहा कि हमारे घर में आइए रामचंद्र ताके मीता बोले आलिंगन कर लेन रामचंद्र ने उनको मीता अर्थात कि मित्र बोल के आलिंगन किया गुह तो ताहा के आत्मसमर्पण करेते छेन उस समय गुह भगवान राम के सामने आत्मसमर्पण कर रहे हैं गुह बले भालो भालो तुम मोर मीते तोमाते शपिनु देहो प्राण सहते तुम मेरे इतने अच्छे मित्र हो मैंने तुमको देह प्राण देह और प्राण यह दोनों मैंने आपको समर्पित किया है तुम ही मोर सर्वश प्राण धन त्याज्य तुम ही मोर भक्ति मुक्ति तुम ही शुभ कार्य तुम ही मेरे सब कुछ हो तुम ही हो मेरी भक्ति मुक्ति और शुभ कार्य आमी मरिया जाए तबो बालाय शने देहो समर्पिणु मीता तोमार चरण यह देह मैंने तुम्हारे श्री चरणों में समर्पित किया है रामचंद्र 14 बस बने थाकीबेन ओ जटा बोलकोल धारण करबेन शून्या गुह ओ जटा बोलकोल धारण कोरिया रहीन रामचंद्र 14 साल वन में रहेंगे और जटा वलकल धारण करेंगे सुनकर करके गुह ने भी जटा और व्कल धारण किया है। और फल मूल छाड़ा अन्न किछू आहार को लेना और फल और मूल छोल करके और कुछ आहार नहीं कर रहे हैं। 14 बराते राम आशेते छ ना देखिया गुहो अग्नि प्रवेश करते जते छन 14 साल के बाद में भगवान राम आगमन नहीं कर रहे हैं। देखकर के गुह अग्नि में आत्मसमर्पण करने को जा रहे हैं। एमोन समय हनुमान आशिया संवाद दिलन उस समय हनुमान ने आकर के संवाद दिया संवाद पया गुहो महानंदे भाषेते छ भगवान राम आ रहे हैं। ऐसा करके वो महावीर हनुमान ने आकर के समाचार दिया। यह समाचार सुनकर के गुह महानंद में तैर रहे हैं। रामचंद्र और सीता पुष्पक रथ कोरिया आशिया उपस्थित होईलेन रामचंद्र और सीता पुष्पक रथ में बैठकर के आकर के उपस्थित हुए दयाल परमानंदो प्रेमाधीनो रामचंद्र भक्त व्सल गुणधाम प्रिय गु प्रिय भक्त राज गुहो हेरिया पुलको देो हृदय लैया प्रियतमो गाढ़ आलिंगन दोहे प्रभु वृत्त लागी हे अश्रु जले दोहा अंग भजे धन्य गुह महाशय चार दिके जय जय कोलाहल होलो खति माजे इसका ट्रांसलेशन नहीं करूंगा किंतु यही है कि जब भगवान के साथ में उनका मिलन होता है तो उनका देह प्राण सब कुछ पुलक से भर गया है और अश्रु से उनका चेहरा भर गया है और आखिर में गुह की स्तुति है धन्य गुह महाशय चार दिके जय जय जाए गुह की भी गुह भी धन्य है कि जिसकी भगवान राम के ऊपर में इतनी भक्ति है। अभी देखिए इस बार फिर
मास्टर महाशय की आध्यात्मिक यात्रा: परशुराम से गुहक तक: घमंड टूटने से शरणागति की और
किंतु ठाकुर मास्टर महाशय को और फिर वो कुट प्रश्न नहीं करते हैं। इसमें कोई चमत्कार की बात नहीं है। इसमें तो देखिए कि वह भाव की बात है। तो पिछली बार जैसे हुआ था कि वो जयमल राजा है। वह श्यामल सुंदर की वह आराधना करता है। तो, वह फिर उसके बाद में जब शत्रु का आक्रमण होता है, तो वही वह श्यामल सुंदर वह सिपाही का रूप धारण करके वह रण के मैदान में आकर के शत्रु का वध करते हैं। तो फिर मास्टर महाशय को ठाकुर पूछते हैं कि अच्छा तुमको यह बात अविश्वास होती है कि वह श्यामल सुंदर सिपाही का देह धारण करके स्वरूप धारण करके आएंगे पृथ्वी पे। तो मास्टर महाशय क्या उत्तर देते हैं कि भक्त भगवान को पुकारता है प्राण के आवेग से अपने हृदय के अंतराल से यह तो विश्वास होता है किंतु इस प्रार्थना का उत्तर भगवान कैसे देंगे क्या भक्त के हृदय में शांति स्थापित करेंगे धीरे-धीरे करके जो नसीब जो है हम हमारा जिसको कि हम जनरली फॉर्च्यून या तो लक कहते हैं वह अपना रास्ता धीरे-धीरे करके साफ करना शुरू करेंगे अपने कर्म प्रवाह है उसको क्या शुद्ध करेंगे कि फिर वह एक्चुअली देह धारण करके पृथ्वी पर आकर के हमारी सहाय करेंगे। बाकी की बातें हमको सुनने में कोई अविश्वास इतना नहीं होता। हां चलो भगवान को प्रार्थना की तो मेरे हृदय में शांति स्थापित हो गई। भगवान को प्रार्थना की तो मेरा नसीब जो है वह खुल गया। हम लोग जैसे कहते हैं ना नसीब खुल गया। अभी मेरे साथ में जो हो रहा है सब अच्छा हो रहा है। जो वह व्यक्ति जो कि मेरे साथ में अच्छे से बात नहीं कर रहा था वह मेरे से अच्छे से बात कर रहा है। ऐसी सब परिस्थितियां जो कि मेरे प्रतिकूल जा रही थी वह सब परिस्थितियां मेरे अनुकूल हो रही है। तो यह सब बातें हमको फिर भी विश्वास होती है कि हां भगवान आकर के भगवान के आशीर्वाद से यह सब हो सकता है। किंतु भगवान देह धारण करके आएंगे चमत्कार करेंगे। यह अपना जो रैशनलिस्टिक माइंड है वह कभी-कभी एक्सेप्ट नहीं करता। तो उस वार्तालाप में ठाकुर ने मास्टर महाशय को जैसे कि यह कूट प्रश्न किया था और मास्टर महाशय ने डिप्लोमेटिक उत्तर दिया था कि भक्त के हृदय की बात और भक्त के ऊपर में भगवान का आशीर्वाद इतना तो विश्वास होता है। किंतु चमत्कार पर विश्वास नहीं होता। तो देखिए कि आज के दिन में यह तो बात अच्छी है कि यह जो दोनों प्रसंग है यह परशुराम का प्रसंग ना कि यह गुहकराज का प्रसंग यह दोनों में हृदय की ही बात है। वहां पर परशुराम का घमंड भंग होता है। यहां पे परशुराम का जो यहां पे जो गुहकराज का दास्य भाव है जिस तरह के महावीर हनुमान का था वही दास्य भाव प्रकट होता है। दास्य भाव और सख्य भाव देखिए कि भगवान राम ने खुद ने उनको मीते कह करके संबोधन किया था। मित्र कह के पुकारा था। तो यह सख्य भाव वह वही सख्य भाव यहां पे प्रदर्शित होता है। तो यह तो मास्टर महाशय ने इतना तो दोनों को स्वीकार कर लिया है कि भाव राज्य के बात है जहां तक यह बात तो हम स्वीकार करते हैं कि आध्यात्मिक जगत में जितने जितने आगे बढ़ते जाएंगे भगवान की जितनी कृपा आशीर्वाद मिलते जाएंगे उतना ही भाव परिवर्तन या तो फिर हम जिसको कहते हैं हृदय परिवर्तन वो होगा। इतना तो फिर हम सभी लोग स्वीकारते हैं। तो मास्टर महाशय को इसीलिए ठाकुर ने यह सब पूरा वह जो वार्तालाप करने के बाद में माने ये जो पाठ करने के बाद में ठाकुर ने मास्टर महाशय को इस बार कोई प्रश्न नहीं किया है कि अच्छा इस पर तुमको विश्वास होता है कि नहीं कि वो परशुराम का घमंड चूर्ण हुआ और भगवान राम का स्तव करने लगे। तो मास्टर महाशय को यदि यह प्रश्न करते तो मास्टर महाशय अपना ही उदाहरण दिखा देते। वही तो ठाकुर के पास में वो पढ़ाई लिखाई करके आए थे और सोच रहे थे कि ठाकुर यदि इतनी अच्छी बातें करते हैं तो पता नहीं उन्होंने और कितनी किताबें पढ़ी होंगी। किंतु फिर वो ठाकुर एक के बाद एक उनका घमंड चूर्ण करने लगे। उसके बाद में मास्टर महाशय लिखते हैं कि ठाकुर के साथ में वार्ता चर्चा म वो डिबेट करने का घर दरवाजा यहीं पर बंद हो गया। यही मास्टर महाशय का ठाकुर के साथ में प्रथम और आखिरी आखिरी तर्क तो वह तर्क करके वह मास्टर महाशय जब ठाकुर को बताने जाते हैं ठाकुर ने उनका घमंड जो चूर्ण किया है तो वो बात यहां पर परशुराम का घमंड चूर्ण करते हैं भगवान राम तो यह बात तो मास्टर महाशय सहज रूप से स्वीकार कर लेंगे क्योंकि दोनों तरह से दोनों कहानियां देखिए कि वह मास्टर महाशय के साथ में मिल जाती है मास्टर महाशय की जैसे जर्नी है यह जर्नी जैसे कि डिपेक्ट करती है वही वह प्रथम द्वितीय दर्शन में अपनी पढ़ाई लिखाई का घमंड वो घमंड चूर्ण हुआ तो यहां पर पहली कहानी देखिए वो परशुराम का घमंड चूर्ण हुआ और तब से लेकर के आज तक की यानी कि 14th दिसंबर 1883 कि मास्टर महाशय श्री रामकृष्ण के चरणों में साधन भजन करने के लिए दक्षिणेश्वर में आकर के रुके हैं। तो यह पूरी जो समर्पण की कहानी है वही ट्रेजेक्टरी जैसे कि यह दो कहानियों में वह मिलती है हमको वह प्रथम दर्शन की बात वो परशुराम की कहानी और जो प्रेजेंट डे है 14th दिसंबर कि मास्टर महाशय दक्षिणेश्वर में रहने को आए हैं तो वही गुहकराज की कहानी तो वो मास्टर महाशय का खुद का जो ट्रांसफॉर्मेशन परशुराम में से ये गुहकराज का तो वो पूरा ट्रांसफॉर्मेशन जैसे कि सिंबॉलिकली यह दो कहानी कहानी में दिखता है। तो पिछली बार हमको पिछली जो कहानी थी जयमल की उसमें से हमने वो जो एनालिसिस किया था कि चमत्कार हो सकता है कि नहीं। अभी आज ये दो कहानियां है उसमें से हम इस तरह से तारण निकाल सकते हैं कि ठाकुर ने जैसे कि म प्लान करके हो। अच्छा आज परशुराम जयंती है। अरे वाह अच्छा तो ये देखिए ये सब देखिए मैं वही बोलने वाला था। ठाकुर प्लान करके कर रहे हैं कि ये सब वो इंसिडेंटली कोइंसिडेंटली मां काली ये सब करवा रही है। तो जो भी है किंतु अपने एनालिसिस में यह बात हो जाती है फिट कि वो पूरी मास्टर महाशय की जो जर्नी है वो यहां पर हमको दो कहानियों में देखने को मिलती है। अच्छा इसके बाद में
श्रीरामकृष्ण भक्तों से वार्तालाप करते हैं
आगे क्या होता है? आहारते ठाकुर श्री रामकृष्ण एकू विश्राम करते छ आहार के अंत में ठाकुर श्री रामकृष्ण थोड़ा सा विश्राम कर रहे हैं। मास्टर काछे बसिया आ मास्टर महाशय पास में बैठे हैं। ऐन शोमय श्याम डॉक्टर और आरो कक्टी लोग आशिया उपस्थित होईले उस समय श्याम डॉक्टर और भी उसके साथ में कुछ लोग आकर के उपस्थित हुए। देखिए अभी का जो प्रसंग है वो दैट इज क्लासिकल ठाकुर कि हां भक्तों के साथ में वार्तालाप कर रहे हैं जो कि हम सब समय अभी तक सुनते आते थे और आगे में भी सुनेंगे क्योंकि मास्टर महाशय एक बार जो यह चले जाएंगे वो इस रिट्रीट को समाप्त करके फिर इस तरह की घटना है कि हां ठाकुर कोई नहीं है अकेले बैठे हैं अपने कमरे में रामलाल है या तो मास्टर महाशय है और ये एकांत में ठाकुर माने जिसको कहते हैं ना डाउन टाइम टाइम आजकल के समय में कहते हैं वो डाउन टाइम में ठाकुर अपना समय कैसे बिताते हैं? यह जो आलेखन है वह मुझे जहां तक मेरी मेमोरी जा रही है पूरे कथामृत में यही एक दो बार ही देखने को मिलता है। तो वो अभी देखिए कि वह तो एकदम अकेले किंतु फिर जब भक्त आते हैं तो क्या होता है? तो वही क्लासिकल कथामृत जो कि हमको पूरे दो वॉल्यूम में और अभी तो अखंड में भी मिल रहा है। तो पूरे अखंड कथामृत में जितने भी वार्तालाप है या जो भी प्रसंग है 90% यही है कि ठाकुर भक्तों के साथ में वार्तालाप कर रहे हैं। तो फिर से वही प्रसंग आकर के उपस्थित होता है श्याम डॉक्टर और उनके साथ में और कुछ लोग आकर के उपस्थित हुए ठाकुर श्री रामकृष्ण उठिया बोशी लेन और कथा को हते लागी लेन श्री रामकृष्ण बैठकर के खड़े होकर के बैठ गए और फिर भक्तों के साथ में वार्तालाप करने लगे श्री रामकृष्ण कर्म जे
ईश्वर-लाभ होने से कर्म अपने से चला जायेगा : कर्म, धर्म, और ज्ञान का अर्थ समझना
बराबरी करते हुए ता नहीं कर्म जो सब समय हमेशा करते रहना पड़ता है ऐसी बात नहीं है ईश्वर लाभ होले आर कर्म थाके ना ईश्वर लाभ यदि होगा तो फिर कर्म रहेगा नहीं फल हले फूल अपनी ही जरे जाए यदि फल होगा तो फूल अपने से ही वह गिर जाएगा देखिए कि हमने इसके बारे में उस समय कुछ समय पहले भी कुछ डिस्कशन किया था कि कर्म और ज्ञान शंकराचार्य जैसे कहते हैं कि कर्म और ज्ञान एक साथ में कभी नहीं रह सकते। कर्म ही यदि आप साधन भजन के रूप में करेंगे तो वह ज्ञान में मैच्योर होता है। और फिर स्वामी विवेकानंद का जो आईडिया है कि कर्म योग के माध्यम से आप ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। ईश्वर प्राप्ति कर सकते हैं। यानी कि हमने उस समय देखा था कि शंकराचार्य का और स्वामी विवेकानंद का इन दोनों आइडियाज में ऐसा कोई बहुत बड़ा तफावत नहीं है। वही बात है कि शंकराचार्य कहते हैं कि कर्म को साधन के रूप में करेंगे तो इससे शायद ज्ञान प्राप्ति नहीं होगी। जबकि स्वामी जी कहते हैं कि कर्म को साधन रूप से करने से ज्ञान प्राप्ति हो जाएगी। शंकराचार्य कहते हैं कर्म को साधन रूप से करने से चित्त शुद्धि होगी। ज्ञान प्राप्ति नहीं होगी। ज्ञान प्राप्ति के लिए ज्ञान के वेदांत की ये जो साधनाएं हैं स्मरण मनन निध्यासन या तो फिर महावाक्य चिंतन उसी के द्वारा होगी। किंतु हमको अभी यह तो पता है कि शंकराचार्य कर्म की जो डेफिनेशन करते हैं वह सब विधि पूर्वक जो कर्म किए जाने वाले थे जो वैदिक कर्म थे जो पूजा पाठ का कर्म है वह सब के बारे में कहते थे। हालांकि आज की मॉडर्न डेफिनेशन को देखेंगे तो यह स्मरण मनन निदि्यासन है। यह महावाक्य चिंतन है। वह भी तो एक कर्म ही है। ठाकुर ने कहा ना कि यदि हम बैठे हैं तो कर्म है। सांस ले रहे हैं तो कर्म है। अन्न ग्रहण कर रहे हैं तो कर्म है। बिना कर्म के आप एक क्षण नहीं रह सकते। चिंतन कर रहे हैं वह भी कर्म है। शास्त्रार्थ कर रहे हैं वह भी कर्म है। महावाक्य चिंतन कर रहे हैं वह भी कर्म है। यानी कि शंकराचार्य की कर्म की डेफिनेशन थोड़ी नैरो थी। उसको उसी डेफिनेशन को थोड़ा सा ब्रॉड कर दे तो स्वामी जी के साथ में मैच हो जाता है। ठाकुर के साथ में मैच हो जाता है कि कर्म को यदि साधना के रूप से करें जिसमें यह महावाक्य चिंतन भी आ जाता है तो वह हमको ज्ञान की ओर ले जाता है। इसलिए ठाकुर यहां पर कहते हैं। अच्छा यहां पे जो ठाकुर कर्म के बारे में कहते हैं वह है सांसारिक कर्म। कर्म को यहां पर कर्म नहीं करके धर्म कहेंगे तो वह बेटर रहेगा। देखिए सभी का धर्म है। संसार में पति का पति धर्म है। पत्नी का पत्नी धर्म है। बच्चों का विद्यार्थी धर्म है। राजा का राज धर्म है। यह धर्म का पालन करके हम जगत में रहते हैं। आज यदि मैं गृहस्थ हूं और मेरे पत्नी है, बच्चे हैं और यदि मैं कहूंगा कि पैसा कमाना मैं नहीं चाहता। मैं चाहता हूं कि कहीं पर वह पेड़ के नीचे बैठा रहूं। राम का नाम लेता रहूं। तो फिर ठाकुर ने ही डांटा था। कहा था कि वह एक आदमी आया था यहां पे दक्षिणेश्वर में रह रहा है। तो मैंने जाकर के कहा उसको कि तुम्हारे बीवी बच्चे हैं। उनकी संभाल कौन लेगा? तुम्हारे पड़ोसी ले गए क्या? तुम जाओ और पहले उनकी चिंता करो। तो क्या है कि धर्म जो है धर्म को निभाना है। यदि संसार किया है तो संसार धर्म अपने पर जो डिपेंडेंट है उनको धोखा देकर के जब ईश्वर का नाम लेंगे तो बिल्कुल गलत है। इवन मैं यहां पर आश्रम में रह रहा हूं। तो हम लोगों का धर्म है कि यह जो एक के बाद एक जितने भी कार्य है आश्रम के करने हैं। यदि मैं यह कहूंगा कि एक भी काम नहीं करूंगा। चुपचाप मैं अपने कमरे में बैठा रहूंगा तो तो वह तो चलेगा नहीं। दो ही दिन में ये लोग मुझे यहां से भगा देंगे। सबका सबके पास में अपना-अपना धर्म होता है। धर्म यानी कि ड्यूटी। यह हमको कार्य करना ही पड़ेगा। यह हमारे पर ऑब्लिगेशन है। तो यहां पर ठाकुर कहते हैं कि यदि आपका संसार धर्म हो कि इवन हमारा यह आश्रम धर्म है ना कि कोई भी धर्म हो यह धर्म ये या तो फिर यह धार्मिक कर्म हमको पूरा जीवन करना है ऐसा नहीं है। ईश्वर लाभ होने से और फिर यह कर्म रहेगा नहीं। क्योंकि क्या है कि यदि आप जैसे कि एक इंपॉसिबल सिचुएशन को सोचते हैं यदि मुझे आज निर्विकल्प समाधि या ऐसा कुछ हो गया तो फिर यह जो आश्रम के कर्म है वो फिर मेरे लिए रहेंगे ही नहीं वो अपने से चले जाएंगे। ठाकुर कहते हैं ना कि वह एक वह जो बहू है वह जब उसको संतान होने वाला है, गर्भवती है तो मां उस उस सास सास जो है उसकी वो धीरे-धीरे करके उसके कार्य कम कर देती है। और जब फिर वह बच्चे का प्रसव होता है तो फिर बहू का काम है कि बच्चे के आसपास में ही घूमते रहना, उसकी संभाल रखना, उसकी केयर करना, उसको खिलाना, पिलाना वगैरह-वगैरह। तो फिर क्या है कि इसी तरह से कर्म या तो फिर धर्म या तो फिर ड्यूटी यह शब्दों में हमको कंफ्यूज नहीं होना है। कांसेप्ट इसका जो है कांसेप्ट को पकड़ना है। तो यह जो आईडिया है कि मेरा यह ऑब्लिगेशन है समाज में उसको मुझे करना ही है। वो ऑब्लिगेशन कितने दिनों तक रहेगा जब तक ईश्वर प्राप्ति नहीं होती है। जैसे ही ईश्वर प्राप्ति हो गई, वैसे ही आपके यह संसार के ऑब्लिगेशन चले जाएंगे। इसलिए कहते हैं कि दो तरह के सन्यास है। एक तो है विद्वत सन्यास। ये विद्वत सन्यास जो ठाकुर अभी यहां पे जो बात कर रहे हैं एग्जैक्टली उसी के साथ में मैच हो जाता है। विद्वत सन्यास का अर्थ क्या है कि आपको ईश्वर दर्शन या तो फिर आत्म साक्षात्कार हो गया है। अभी आप ये संसार के जितने भी ऑब्लिगेशन है उसमें से आप मुक्त हो गए हैं। यह मातृ ऋण, पितृ ऋण, ये देव ऋण, गुरु ऋण ये इनके ऋण है हमारे ऊपर में इन सबके। हम उन्होंने मां पिताजी ने हमको लालनपालन करके बड़ा किया है। इस समाज ने हमको बहुत कुछ दिया है। देवताओं ने हमको आशीर्वाद दिए हैं। गुरुजनों ने हमको पढ़ाई लिखाई सिखाया है। हमारी शिक्षा और उसकी व्यवस्था की है। तो इन सबके प्रति हमारा ऋण है, डेट है, ऑब्लिगेशन है। किंतु जिस क्षण हमने यह ईश्वर प्राप्ति कर ली तो यह जितने भी ऋण है वह सब मिट जाएंगे। यह जितनी भी डेट है वह फुलफिल हो जाएगी। तो उसके बाद में आपका सन्यास लेना सार्थक होता है। इसको कहते हैं विध्वत सन्यास। और फिर दूसरा है कि विविधदिशा सन्यास। विविध दिशा सन्यास में क्या है कि मैंने ईश्वर प्राप्ति की तो नहीं है। किंतु यदि ईश्वर प्राप्ति नहीं की है, आत्म साक्षात्कार नहीं किया है। दैट मींस कि टेक्निकली मेरे सर के ऊपर में सब तरह के ऑब्लिगेशन है। 8 घंटे मुझे नौकरी करनी ही पड़ेगी। आठ अभी तो वह पहले के जमाने की बात है। 8 घंटे नौकरी करना। अभी तो मैं देखता हूं बेचारे लोग जो जॉब करते हैं तो 10 घंटे 9 घंटे इतना लंबा टाइम उनको नौकरी करनी पड़ती है बिजनेस करते हैं तो 10 12 घंटे आपके तो सहज रूप से वो बिजनेस में चले जाएंगे कोई भी कार्य करते हैं 10 12 घंटे आपको देने ही देने हैं डेली तो ये जो आपका ऑब्लिगेशन है वो ऑब्लिगेशन में से आप मुक्त कब होंगे ऋण में से मुक्त कब होंगे मुझे ईश्वर दर्शन करना है इस इच्छा के साथ में यदि मैं सन्यास लेता हूं हूं तो वह विविध दिशा सन्यास होगा। किंतु बहुत ही सावधान क्योंकि विध्वत सन्यास तो चलिए आपको ईश्वर प्राप्ति हो गई है। आपको कोई चिंता नहीं है। यदि आपने विविध दिशा सन्यास लिया जैसे कि हम सबका रामकृष्ण मिशन में जितने भी साधु हैं हम सबका विविध दिशा सन्यास है। इस अर्थ में कि ईश्वर की प्राप्ति करने के लिए हम यहां पर आए हैं। अभी देखिए कि प्रॉब्लम यहां पर क्या होता है। सर के ऊपर में ऋण है। किंतु इस ऋण को हम चुका नहीं रहे हैं। हमने मोक्ष मार्ग पसंद किया है। तो यदि हम मोक्ष मार्ग के रास्ते पे बड़ा ही डडीिकेशन और ऑनेस्टी और इंटीग्रिटी के साथ में आगे नहीं बढ़ेंगे यदि मन में विकार रहेंगे तो फिर क्या होगा कि देखिए कि यह भोग जो यह अपने जो पुरुषार्थ है चार पुरुषार्थ वेद में कहे गए हैं। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष। तो इसमें से मोक्ष मार्ग तो एक हो गया। जब तक संसार में है तो अर्थ काम यह दोनों हमको वेद ने दिए हैं। हमारे शास्त्रों ने दिए हैं। ऐसा नहीं कहा कि अर्थ और काम से आप दूर हो जाइए। यह कामिनी और कांचन के प्रति अपनी जो स्प है वह तो अपने डीएनए में लिखी हुई है। उससे आप कैसे मुक्त होंगे? उन दोनों का भोग कीजिए किंतु धर्म के आधार पर कीजिए। यदि आप भोग करते हैं तो साथ में ऋण भी स्वीकार कीजिए। साथ में ऑब्लिगेशन भी स्वीकार कीजिए। एक हाथ से लीजिए, दूसरे हाथ से दीजिए। यदि आप कामिनी कांचन को एक हाथ से ग्रहण करते हैं, तो दूसरे हाथ से संसार जो है, मां-पिताजी है, गुरुजन है, देवताएं हैं उनको आप मुक्त रूप से उनकी सेवा कीजिए। तो यह लेनदेन जो है वह हमारे शास्त्र हमको कहते हैं कि धर्म, अर्थ, काम यह तो तीनों एक साथ में चलने चाहिए। अभी यदि यह हमारे शास्त्र कहते हैं कि गृहस्थ का आदर्श है। अभी यदि इस साइकिल में वह एक एक तरह का ब्रेक पड़ जाए, मैं अर्थ और काम ग्रहण तो कर रहा हूं। किंतु फिर मैं धर्म का पालन नहीं कर रहा। फिर मैं अपना जो ऋण है उसको नहीं चुका रहा। अपना जो ऑब्लिगेशन है उसको नहीं निभा रहा। मुझे जो देना है इस समाज को मेरे परिवार जनों को गुरुजनों को देवताओं को वो मैं नहीं दे रहा। सिर्फ ग्रहण कर रहा हूं। दान नहीं कर रहा। सेवा नहीं कर रहा। तो फिर क्या होगा कि मैं महापाप में पतित होऊंगा। यानी कि देखिए शास्त्र बड़े क्लियर है। वह ऐसा नहीं कहते कि आप अर्थ और काम को तज दीजिए। कहते हैं ग्रहण कीजिए। किंतु फिर उसको बैलेंस कर लीजिए आप दान और सेवा करके तो फिर यह लेनदेन जब तक चलती रहेगी तब तक देखेंगे कि आपका लाइफ बैलेंस रहेगा और इस आशा के साथ में कि एक जन्म तो आएगा जबकि यह संसार का चक्र है वह टूटेगा। एक हाथ से अर्थ और काम ग्रहण कर रहे हैं। दूसरे हाथ से हम धर्म के रूप में अपना एक कंट्रीब्यूशन सेवा और दान कर रहे हैं। तो ये और आराधना कर रहे हैं। प्रार्थना कर रहे हैं। ये जिसको जिस तरह से सेवा करनी है। मां-पिता जी की एक तरह से सेवा करनी है। गुरुजनों की हमको उनकी उनकी एक तरह से सेवा करनी है। देवताओं की आराधना करनी है। तो जिसको जो प्राप्त्य है वह हमारे धर्म में आता है। अर्थ काम ग्रहण किया। धर्म से हमने अपना कंट्रीब्यूशन दिया। यह साइकिल यदि आप फेथफुली चलाते रहेंगे तो आशा है कि एक जन्म तो आएगा कि हमारा मन मोक्ष मार्ग की ओर बढ़ेगा। तो यह हो गया अपना वेद। अभी देखिए कि यह वेद की साइकिल है। उसमें से बाहर जाकर के हमने जीना शुरू किया तो कितना महा भयानक पाप में हम पड़ सकते हैं। एक तो पाप है कि हमने सिर्फ अर्थ और काम को एक हाथ से ग्रहण करते रहे हैं। करते रहे हैं। दूसरे हाथ से धर्म रूपी अपना जो कंट्रीब्यूशन है, सेवा है, दान है, आराधना है, वह नहीं कर रहे हैं तो फिर महापाप में पतित होंगे। यह तो एक दूसरा कि मान लीजिए आपने ईश्वर दर्शन का रास्ता चुना है। मोक्ष मार्ग चुना है। मोक्ष मिला नहीं है। यहां पर जो ठाकुर कहते हैं जो कि मोक्ष मिल गया तो ऑटोमेटिक कर्म खत्म हो जाएगा। ऑटोमेटिक ये अर्थ काम और धर्म का यह जो लेनदेन है संसार चक्र है ऑटोमेटिक टूट जाएगा। वो एक आइडियल सिचुएशन है। किंतु हम लोगों के साथ में कि हम लोगों ने मोक्ष मार्ग चुना है। मोक्ष मिला नहीं है। तो फिर हमका हमारे लिए क्या आदर्श है कि अर्थ और काम को ग्रहण करना बंद कर दिया। क्योंकि हमने धर्म तो छोड़ दिया ना। अपना ऋण था अपना ऑब्लिगेशन था वो तो हमने छोड़ दिया मोक्ष मार्ग पे जाने के लिए। तो फिर उसको बैलेंस करने के लिए अर्थ और काम को भी छोड़ना पड़ेगा। तभी यह चक्र बैलेंस होगा। या तो आप अर्थ और काम को ग्रहण कीजिए और धर्म के माध्यम से अपना दान कीजिए। अर्थ कंट्रीब्यूशन कीजिए। या तो फिर यदि धर्म को तज देते हैं तो अर्थ और काम को भी तज दीजिए। फिर आप मोक्ष मार्ग की ओर जाइए। और यदि मोक्ष मार्ग की ओर जातेजाते आपने फिर से अर्थ और काम में यदि आप डूबे तो देखिए कि कितना भयानक परिणाम आएगा। धर्म को तो छोड़ा है और यहां पर अर्थ काम ग्रहण कर रहे हैं। यानी कि महा भयानक पाप में पतित होंगे। तो देखिए कि यह वेद हमको दो बात सिखाता है। तीन तीन रास्ते एक्चुअली हमको देता है कि क्या है कि आदर्श है कि एक हाथ से अर्थ काम ग्रहण कीजिए। दूसरे हाथ से धर्म के माध्यम से दान कीजिए। या यह यदि नहीं कर पाएंगे और यदि अर्थ काम ही ग्रहण करते रहेंगे। आप धर्म का पालन नहीं करेंगे, तो महापाप में डूबेंगे। यह एक हो गया। और तीसरा सर्वोच्च है कि मोक्ष मार्ग की ओर जाइए। यदि आपको अर्थ, काम और धर्म तीनों का त्याग करना है। तो, यहां पर देखिए कि ठाकुर जो वो लास्ट सिचुएशन है कि धर्म, अर्थ, काम तीनों का त्याग करके मोक्ष मार्ग की ओर जाने को कह रहे हैं। क्योंकि बिकॉज़ के दिस इज ठाकुर। ठाकुर हमको एकदम जो अल्टीमेट आइडियल है वह दिखा देते हैं। ठाकुर कहते हैं मोक्ष मिलने से धर्म अर्थ काम ऑटोमेटिक चले जाएंगे। हालांकि अभी देखेंगे बाद में कि ठाकुर इसके बारे में कुछ कहते हैं कि नहीं कि हम मोक्ष प्राप्ति के लिए ईश्वर दर्शन के लिए प्रयास तो कर रहे हैं किंतु साथ में ही हमको यह प्रयास सफल नहीं हुआ है। उस क्षण में हमको क्या करना है? उस क्षण में जो कर्म होता है उस क्षण जो हमारा धर्म होता है वह सतत ईश्वर आराधना इस ईश्वर साधना हमारी बनी रहनी चाहिए उस समय वो कर्म हमारा होता है तो यहां पर ठाकुर कहते हैं कर्म जे बराबरी करते हो ता नहीं कर्म जो हमेशा करते रहना पड़ेगा ऐसा नहीं है तो इसका डेफिनेशन क्या हुआ कि यह अर्थ काम और धर्म यह जो चक्र है संसार का वो सतत चलता रहेगा ऐसा कोई जरूरी नहीं है ईश्वर लाभ होले आर कर्म थाके ना अर्थात कि ईश्वर लाभ होने से धर्म अर्थ काम यह चक्र आपका टूट जाएगा। फल होले फूल अपनी ज्वरे जाए। यदि फल होगा तो फूल अपने से ही गिर जाएगा। अपने से ही खर जाएगा। यह फल क्या है? ईश्वर दर्शन और फूल क्या है? तो धर्म अर्थ काम का यह संसार चक्र। अच्छा इसके बाद के जो कांसेप्ट है वो भी हम उसको नेक्स्ट क्लास में देखेंगे। आज यहीं तक ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम
प्रश्न: स्वामीजी का कर्म योग साधना का उत्तम मार्ग है
कृष्णपणमस्तु ना यह बड़ा अच्छा आईडिया है। देखिए अर्थ और काम जब तक यह है तब तक आपको धर्म करना है। किंतु आप मोक्ष मार्ग की ओर जाते हैं तो आइडियली स्पीकिंग कि धर्म छूट जाता है। धर्म और मोक्ष साथ में नहीं चलेंगे। किंतु ऐसा तो नहीं है कि आपने धर्म छोड़ दिया तो अर्थ और काम छूट गए। वह तो है ही है वहां पे। उसके बाद में जो आप साधना करते हैं आपका जो पूरा जीवन जो ईश्वर के समर्पित होता है ईश्वर को अभी जैसे देखिए क्लासिकल वेदांत की डेफिनेशन के अनुसार देखें जैसे ही आपने मोक्ष मार्ग का प्रारंभ किया साथ में ही आपको स्मरण मनन निधिसन प्रारंभ कर देना है। स्मरण मनन निधिसन के माध्यम से महावाक्य मनन चिंतन मनन के प्रारंभ माध्यम से आपको मोक्ष प्राप्त करना है। किंतु भीतर में अर्थ और काम तो है ही है। और वेद शास्त्र कहते हैं कि अर्थ और काम को बैलेंस करना है आपको धर्म के माध्यम से। तो एक हो गया वन एक्सट्रीम कि अर्थ काम है जिसको कि आप धर्म से बैलेंस करते हैं। दूसरा एक्सट्रीम है कि मोक्ष मार्ग पे चल रहे हैं। तीनों चले गए। किंतु तीनों तो एक साथ में जाते नहीं है। अर्थ काम रहेंगे साथ में आपको मोक्ष मार्ग पे जाना है। तो क्या करना है? तो यह जो धर्म है बीच वाला धर्म दैट इज निष्काम सेवा। आपने बिल्कुल परफेक्ट यह कहा। देखिए आप चार मॉडल खड़े कर सकते हैं। एक मॉडल है कि अर्थ काम है। हमने धर्म छोड़ दिया, मोक्ष भी छोड़ दिया। यह एक्सट्रीम मॉडल हो गया जिसमें से वह पूरा महानक में जाएगा। फिर अपना वेद का मॉडल है कि आप धर्म, अर्थ, काम तीनों का एक साथ में अनुष्ठान करें। फिर यह तीसरा जो मॉडल है एक्सट्रीम मॉडल अपना वो जो अद्वैत वेदांत कहता है कि मोक्ष मार्ग पे जाइए। धर्म, अर्थ, काम तीनों को छोड़ दीजिए। मोक्ष मार्ग पे जाते-जाते महावाक्य चिंतन करते-करते मुक्ति प्राप्त कर लीजिए। किंतु आज के समय में हम लोगों की जो हालत है रामकृष्ण मिशन के साधुओं की हम तीनों मॉडल में नहीं आते। अर्थ काम छोड़कर के अर्थ काम का भोग करके धर्म को छोड़ा है। उस पाप में भी नहीं जाते। अर्थ काम धर्म तीनों का पालन भी नहीं कर रहे। मोक्ष मार्ग पे जा रहे तो मोक्ष भी नहीं मिला। तो हम लोगों के लिए एक मिडिल पाथ स्वामी जी ने ठीक किया है। अर्थ काम थोड़े बहुत तो है भीतर में। तो यह ईश्वर सेवा रूपी धर्म का पालन कीजिए तो यह अर्थ काम चले जाए। चित्त शुद्धि व्हाट इज द मीनिंग ऑफ चित्त शुद्धि? निष्काम सेवा करके चित्त शुद्धि करनी है। ऐसा हम बार-बार सुनते हैं। व्हाट इज दैट? कि ये अर्थ और काम चले जाएंगे निष्काम सेवा करके। फिर आप वो सीधे मोक्ष की ओर जाइए।
प्रश्न: कर्म योग समझौता जैसा नहीं लगता। यह ईश्वर तक पहुंचने का एक अनिवार्य मार्ग है। वेदांत के विचार इतने कठिन हैं कि हम गृहस्थों को उनमे सफल होने की कोई आशा नहीं है।
आसीनो व्रजति दूरम शयानो भाति सर्वतः आसीिनो वजति दूरम बैठा है लगता है दूर में शयानो भति सर्वतः सोया हुआ है लगता है चारों दिशा में है तो स्वामी जी जिस तरह से कहते हैं ना मतलब स्वामी जी एक्सैक्टली नहीं किंतु अपने संग में जिस तरह से चलता है कि वह उच्च अधिकारी है तो आप सीधा अद्वैत वेदांत की ओर जाइए किंतु आप मंद अधिकारी या मध्यम अधिकारी है तो आपको फिर वह मिडिल पाथ एक आपको अपना अपनाना पड़ेगा। एक मिडिल स्टेप एक होना चाहिए। फर्स्ट स्टेप से सीधे टॉप स्टेप पे जंप लगाना होगा नहीं। मिडिल में कुछ स्टेप चाहिए आपको। स्टेप बाय स्टेप ले जाए। सो मध्यम अधिकारी या मंद अधिकारी के लिए निष्काम सेवा कि जो कि सहज है करने में असंभव नहीं है।
प्रश्न: क्या वेदांत विचार कर्म योग से भी बड़ा है?
नॉट नेसेसरी क्योंकि चार योग जो अपने संघ में कहे गए हैं कर्म ज्ञान भक्ति ध्यान चारों पैरेलल चलते हैं और चारों में वैसे हायरार्की नहीं है। जहां तक ठाकुर मास्वामी जी को हमने पढ़ा है। अद्वैत वेदांत की दृष्टि से निश्चय कहेंगे कि कर्म, ज्ञान और भक्ति यह तीनों है। आपको कर्म, ध्यान और भक्ति आपको ज्ञान की ओर ले जाते हैं। तो ज्ञान की ओर ज्ञान ही है अल्टीमेटली जो कि आपको मोक्ष देगा। हम लोग इस तरह का पेडेस्टल पे नहीं रखते ज्ञान को क्योंकि हम कहते हैं कि यदि कर्म भी ठीक से करें, भक्ति भी मतलब भक्ति योग कर्म योग यदि ठीक से करें तो इट विल गिव अस इक्वल बेनिफिट एस टू ज्ञान योग। क्योंकि इसमें साइकोलॉजी को देखना है। देखिए आप कर्म दो तरह से करते हैं ना। चिंतन भी करते हैं वह भी कर्म है। शारीरिक करते हैं वह भी कर्म है। तो यहां पे अभी भक्ति में कर्म में ध्यान में हम शारीरिक कर्म करते हैं। शारीरिक मानसिक साइकोसोमेटिक ये दोनों तरह का कर्म आ जाता है। ज्ञान योग में प्योर मानसिक कर्म है। बट कर्म तो है। राइट? सो जब तक आप कर्म के क्षेत्र में है तब तक आप फिर ज्ञान कहां से मिला? आप अल्टीमेटली कर्म आप आप ऐसा हो सकता है कि कर्म योग में देखिए कि आप मन इतना शुद्ध हो जाए कि मन में सब कर्म खत्म हो जाए। दैहिक आप कर्म कर रहे हैं। गरीबों को खाना खिलाना ये सीपी क्लीनिक ये सब चलाना यह सब हो रहा है किंतु मानसिक कर्म खत्म हो गए हैं। यह मोक्ष के लिए प्री कंडीशन है मानसिक कर्मों का खत्म होना। नहीं कि दैहिक कर्मों का खत्म होना। यदि ऐसा होता कि दैहिक कर्म भी खत्म हो जाए तो फिर यह निर्विकल्प समाधि के बाद में इति इति करके आप पृथ्वी पर आ ही नहीं सकते क्योंकि निर्विकल्प समाधि में मानसिक कर्म खत्म हो गए प्रश्न ही नहीं है। दैहिक कर्म खत्म हो गए। अब जड़ की तरह पड़े हैं। किंतु आप वापस आएंगे। हाउ इज इट पॉसिबल कि दैहिक और मानसिक दोनों कर्म नहीं है। तो फिर निर्विकल्प समाधि के बाद में कोई उपाय ही नहीं है। दैट इज द एंड राइट? किंतु ठाकुर कहते हैं एकदम स्पष्ट रूप से कि समाधि के बाद की भी अवस्था है। सो व्हाट इज दैट अवस्था? कि मन सोने का हो गया है। शुद्ध सत्व का हो गया है। इस मन से अभी किसी भी तरह का पाप होगा नहीं। और देह से कर्म चलते रहेंगे। ठाकुर दक्षिणेश्वर में बैठकर के हमको जो उपदेश देते हैं यह गुहक और परशुराम की कहानी सुनते हैं दैहिक रूप से सब कुछ कर रहे हैं। मन में अभी किंतु वो जैसे वो वो खेत में वो खेत खेड़ते भी हैं तो बीज लगता नहीं है। बीज में से वो फसल नहीं होने वाली है। दगद बीज हो गया
प्रश्न: मोक्ष प्राप्ति के लिए अर्थ और काम -- दोनों का त्याग करना होगा
है। हां, ऑफ़ कोर्स कोई प्रश्न ही नहीं है अह कि और वह अब देखिए कि डिजायर का संपूर्ण खत्म होना सिर्फ साधना से नहीं होता है। मुक्ति प्राप्त होने से ही होता है। जब तक हम साधन के क्षेत्र में है कुछ ना कुछ वासनाएं बनी ही रहेगी। तो, ऐसा गिल्ट फीलिंग ना हो जाना चाहिए कि मैं साधना कर रहा हूं और फिर यह मेरी वासनाएं खत्म क्यों नहीं हो रही? वासना तो आखिरी स्टेप में खत्म होगी। वासना का विनाश होना वो डेस्टिनेशन है। वो आपका मीडियम भी है किंतु साथ में डेस्टिनेशन भी है। सो वो बात याद रखनी है। अदरवाइज देखिए हमको भी एक गिल्ट फीलिंग होता है मेरे मन में वासना क्यों है? दूसरा है कि जो साधक है उनके प्रति एक तरह का एक कटु भाव प्रकट हो जाता है। जैसे वो होता है ना कि वो विज्ञान महाराज और हरि महाराज दोनों के साथ में हुआ। ठाकुर के घर में आए हैं। कमरे में आए हैं। पहली पहली बार ठाकुर को मिल रहे हैं। देखा कि एक बहुत बड़े थाले में भर के ठाकुर के लिए बहुत सारे व्यंजन सजा के रखे हुए हैं। तो फिर यह लोग सोचते हैं ये किस तरह के परमहंस हैं। यदि खाने में इतना इनका यह है। किंतु फिर खाना देखा। विज्ञान महाराज कहते हैं स्वामी विज्ञानानंद जी महाराज कि वो चिड़िया की तरह इतनाइतना खाते हैं। तो फिर पता चला कि देखिए थाला उनको दिया है खाने का बड़ा भर के किंतु उसके ऊपर में उनका कोई आसक्ति नहीं है। तो ये हमको ये भारत में और सिर्फ भारत में ही नहीं पूरे विश्व में जो धर्म के विरुद्ध में एक तरह का एक ये है ना कि ये जितने भी धार्मिक लोग हैं सब करप्ट है देख तो रहे हैं उनका लाइफस्टाइल वगैरह रामकृष्ण मिशन में मैं जब पहली बार आया था मैंने दिगंबर साधुओं को देखा था मेरे पूर्वाश्रम में वो दिगंबर साधु ना ही वस्त्र पहनते हैं ना ही किसी वाहन में बैठते हैं ना ही वह खड़े-खड़े खाना खाएंगे ऐसा करके हाथ रख के उस दोनों हाथ में जितना खाना आएगा उतना ही खाना खाएंगे तो इतनी इतनी प्रचंड तपस्या देखी थी। तो मैंने सोचा सभी साधु इस तरह के होंगे। पहली बार मैं रामकृष्ण मिशन में आया लिमड़ी में देखा वो जो Toyota गाड़ी पड़ी है उसमें ये साधु लोग घूम रहे हैं। खानेपीने का सब तरह का सामान है। ऑफिस में कंप्यूटर पड़ा है। मैंने सोचा ये किस तरह के साधु हैं। तो खैर बाद में पता चला। किंतु ये आईडिया क्लियर होना कि वासना कामनाएं तब तक नहीं जाएगी जब तक ईश्वर प्राप्ति नहीं होगी। यह क्लियर होना जरूरी है। इससे दो चीज नहीं होगी कि अपने से गिल्ट फीलिंग नहीं आएगी। दूसरा कि साधुओं के प्रति कटुभाव नहीं
प्रश्न: अद्वैत वेदांत पढ़ने वाले लोग अपने दर्शनशास्त्र के ज्ञान को लेकर अहंकारी हो जाते हैं।
आएगा। मैं जब ट्रेनिंग सेंटर गया था बेलूर मठ तो सुहितानंद जी इंचार्ज थे उस समय हमारे असिस्टेंट सेक्रेटरी थे। तो सब ब्रह्मचारियों के साथ में एक-एक दिन हमको बुला करके बात करते थे हमारे साथ में। तो वहां पर बड़ा सुबह को मंगल आरती के बाद में 5:00 बजे तो उस समय तो वहां पर सूर्योदय हो जाता है तो बड़ा खुशनुमा वातावरण रहता है। तो वहां पे बड़ा सा गार्डन है तो गार्डन में वॉकिंग करते-करते हमारे साथ बात करेंगे। सो वी यूज़्ड टू लुक फॉरवर्ड टू दैट कि सितानंद जी के साथ में इस तरह के वातावरण में आप अकेले बात कर रहे हैं। आपके मन की बहुत सारी बात आप कह सकते हैं उनको जो कि आप यूजुअली नहीं करेंगे। तो आपके पास में वो एक ओपोरर्चुनिटी रहता है। तो मुझे बुलाया एक दिन सभी को बारी-बारी से बुलाते थे। मेरा टर्न आया तो मुझे पूछ रहे हैं कि अच्छा तुमने नागपुर में क्या किया? क्योंकि मेरा पोस्टिंग हुआ था नागपुर में। तो मैं बात कर रहा हूं कि नागपुर में मैंने जो पीपीटीसी में सीखा था कि सब तरह का रूटीन पक्का फॉलो करने का प्रयास किया है। जितने भी मैं किताबें पढ़ सकता हूं, पढ़ने का प्रयास किया है। मंदिर में ड्यूटी था। तो एज ऑनेस्टली एज पॉसिबल विथ एज मच डेडीकेशन एस पॉसिबल मैंने प्रयास किया है जिससे कि मेरा भविष्य का साधु लाइफ अच्छा हो। ऐसा मैं अच्छे से बोल रहा हूं। वो सुन रहे चुपचाप सुन रहे। काफी देर तक सुना। फिर उन्होंने एक बात कही देखो कि तुम यह जो बार-बार कह रहे हो कि मैंने इसको बहुत अच्छे से करने का ट्राई किया है। आई हैव ट्राई टू मेक मसेल्फ परफेक्ट। तो जब भी तुम यह कहते हो ना कि आई हैव ट्राई टू मेक मसेल्फ परफेक्ट। साथ में ही तुम्हारे मन में ना कभी-कभी एक रिेंटमेंट पैदा हो जाएगी कि मैं परफेक्ट हूं तो दूसरे लोग इंपपरफेक्ट हैं। दूसरे साधु रूटीन नहीं फॉलो करते। वह मेरी तरह डेडिकेटेड नहीं है। वह मेरी तरह उनका स्टडी नहीं है। उनका ठाकुर के प्रति मेरी तरह भक्ति नहीं है। तो तुम बी केयरफुल मुझे कहते हैं भविष्य में बड़ा केयरफुल होना कि परफेक्ट हूं परफेक्ट हूं। ऐसा तुम जो तीन-चार बार बोले कि आइदर मतलब परफेक्ट नहीं हूं किंतु परफेक्ट होना चाहता हूं। उसका जो बाय प्रोडक्ट है ना दैट इज रिेंटमेंट दूसरे साधुओं के प्रति एक तरह का द्वेष भाव यह आ सकता है इसके बारे में तुम केयरफुल रहना तो देखिए कि दैट जो एनालिसिस इज़ सो परफेक्ट मैंने बहुत बार देखा है अपने बाद की लाइफ में कि दूसरों के प्रति यह रिजेंटमेंट आ ही जाता है जितनी बार मैं यह सोचता हूं कि आई एम बेटर देन अदर्स या तो फिर आई एम ट्राइंग टू मेक मायसेल्फ परफेक्ट साथ-साथ में ही यह रिजेंटमेंट आता है कि दूसरे लोग प्रयास नहीं कर रहे हैं दूसरे लोग जो इंपपरफेक्ट है। आई एम बेटर देन देम। यह रिेंटमेंट माने ईगो होना तो एक बात है। यह घमंड हो जाना कि मैं दूसरों से अच्छा हूं। रिजेंटमेंट इज इवन डेंजरस कि फिर और वो क्या है कि देखिए घमंड के बारे में हम तो फिर भी एक एक तरह से ये हो गए हैं। अलर्ट हो गए हैं कि ईगो नहीं होना चाहिए। जितना भी आप स्पिरिचुअल किताबें पढ़ो आपको कामिनी, कांचन और अहंकार तीन त्याग करने को बोल रहे हैं। तो इन तीनों के बारे में वैसे ही हम अलर्ट है। किंतु जिस चीज के बारे में अलर्ट नहीं है एकदम छुपके से आकर के भीतर में प्रवेश कर जाती है। वह है रिेंटमेंट या तो फिर दूसरों के प्रति द्वेष भाव। तो मैंने बार-बार देखा है यह महाराज की बात को याद करके कि बहुत बार ऐसा मेरे मन में आया है। और बिकॉज़ कि महाराज ने मुझे वर्न किया था। आई ट्राई टू मतलब उस समय अपने को यह करने का प्रयास करता हूं कि देखो यह रिाइनमेंट आ रही है। बी केयरफुल अबाउट
प्रश्न: साधु संग का यही लाभ है
दैट क्षणमह सज्जन संगति रेका भवति भवनव तरण नौका क्षण भर आप सज्जन का संग करेंगे तो आपकी भव की नौका हमेशा के लिए तैर जाएगी।
प्रश्न: हम अपने काम में श्रेष्ठ होने का प्रयास करते हैं, लेकिन हम यह भी सोचते हैं कि हमें अपने काम से क्या लाभ हुआ है। लाभ की इस इच्छा से कैसे छुटकारा पाया जाए?
इसीलिए ठाकुर कहते हैं ना कि मन है वन और कोने यह मन के मन में वन में और कोने में जाकर तपस्या करनी चाहिए यह रिट्रीट ये मास्टर महाशय रिट्रीट के लिए आए हैं और रिट्रीट इज अ बेस्ट वे कि बीच-बीच में रिट्रीट पे चले जाना चाहिए डेली क्योंकि सी काजल की कोठरी में रहने से दांत तो लगने वाला है यदि हम आपकी क्या बात करते हैं हम मैं अपनी मैं मेरी बात करता हूं यह जो काम करता था मैं राज अभी यहां पे तो इतना कोई एक्टिविटी है नहीं राजकोट में जो मेरा सुबह को दिन स्टार्ट होता था जैसे ही यह क्लास खत्म होगा वो 9:30 से जो स्टार्ट होगा वह सीधा शाम को 7:00 बजे तक चलेगा ईजीली चल जाएगा तो उस समय मैं इतना बिजी रहता था यही मैं अपने कमरे में भी जाऊंगा वो थोड़ा सा किताब लेने का प्रयास भी करूंगा तो वही सब घूमता रहेगा कि अच्छा पेपर परचेस करना है वो किताब का ऑर्डर एक महीने पहले दिया था तो अभी क्या सिचुएशन है प्रेस में जाकर के देखना है कि प्रिंटिंग ठीक से हो रहा है कि नहीं फोर कलर रजिस्ट्रेशन ठीक से होता है कि नहीं यह वो वही चलता ही रहेगा। म कमरे में भी जाने से वही मंदिर में आरती में बैठे हैं तो भी वही तो वो तो हम सबके साथ में है। सो इसके लिए जो एक ही उपाय है कि मन वन और कोना तो बीच-बीच में वो रिट्रीट में चले जाना है जिससे कि ये सब चीजों को हम भूल जाएं। क्योंकि अल्टीमेटली जब तक मुक्ति नहीं मिलती है, मोक्ष नहीं मिलता है तब तक तो यह चलता ही रहेगा। इसी को कहते हैं कि वह अश्वत्था संसार वृक्ष उसमें एक डाल काटेंगे तो वह दूसरी डाल बीच में से आ ही जाएगी।