मङ्गलाचरण
ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री श्री रामकृष्ण कथामृत का पाठ कर रहे थे 16th दिसंबर 1883 मास्टर महाशय ठाकुर के साथ में रहने को आए हैं। 16th दिसंबर को दोपहर को 4:00 बजे एक मुख ठाकुर के साथ में वार्तालाप करने के लिए ठाकुर का दर्शन करने के लिए दक्षिणेश्वर में आए हैं। पूरा वार्तालाप समाप्त हो गया। अभी वह उठकर के जा रहे हैं। तो ठाकुर उनके सम्मान के लिए जैसे वह खड़े हुए मुखर्जी बाबू तो ठाकुर भी उनके सम्मान के लिए खड़े हुए। अब जैसे वह होता है कन्वेंशन कि घर में गेस्ट आने से यदि वह खड़े होते हैं तो हमको भी खड़ा होना है। ऐसे शिष्टाचार है। तो ठाकुर भी खड़े हुए तो मुख ने हंसते-हंसते कहा आपको फिर उठना बैठना ठाकुर तो अवतार है। उनका मन कहां ब्रह्म ज्ञान में पड़ा रहता है। भाव में आ जाएंगे तो धोते भी खुल जाएगा। एक दिगंबर बालक की तरह घूमेंगे। तो जिनका मन संपूर्ण रूप से ब्रह्म भाव में विलीन हो गया है और जो एक बालक भाव में रहते हैं। अब बच्चे के पास में आप थोड़ी ना शिष्टाचार की अपेक्षा रखेंगे। घर में गेस्ट आए अभी गेस्ट विदाई ले रहे हैं। हम सभी लोग उनको विदाई कर करवाने के लिए दरवाजे तक गए घर के तो बच्चे से हम यह अपेक्षा नहीं रखेंगे। शिशु से यह अपेक्षा नहीं रखेंगे कि वह भी यह शिष्टाचार को समझे और वह भी खड़ा हो और वह भी जो है गेस्ट को विदाई देने के लिए घर के दरवाजे तक आए। क्यों? क्योंकि वह शिशु है। ऐसा नहीं है कि शिशु शिष्टाचार का पालन नहीं करता तो वह कोई उसका स्वभाव में कोई दुष्टता है। शिशु इतना निर्मल होता है कि वह क्या करता है, क्या नहीं करता? जैसे कि ईश्वर के साथ में उसका सीधा हॉट लाइन होता है। इस तरह से यह शिशु बिहेव करता है। तो ठाकुर जब उठकर के खड़े हुए तो मुख कहता है कि आपको भी फिर उठना और बैठना तो ठाकुर हंसते-हंसते कहते हैं उठने और बैठने में क्षति भी क्या है? जल स्थिर रहने पर भी जल है। हलन चलन करने पर भी जल है। जड़ में यह झूठा पत्ता यह तूफान आता है। तो तूफान में यह झूठा पत्ता वो जहां पर हवा उसको ले जाती है, जिस डायरेक्शन में हवा उसको ले जाती है, उस डायरेक्शन में जाता है। मैं यंत्र हूं, वह यंत्री है। अब देखिए कि है तो ठाकुर ने सिर्फ दो-तीन सेंटेंस ही कहे यहां पे किंतु विदिन दिस टू थ्री सेंटेंस ठाकुर का पूरा फिलॉसोफी और साधन मार्ग दोनों पूरा एनकैप्सुलेट करके उसका सीड फॉर्म में हमको दे देते हैं। तो इसके बारे में हम चर्चा कर रहे थे। कल ऑलरेडी हमने कुछ फिलॉसोफिकल कंपैरिजन देखा। मैंने फिर आपके साथ में वह एक पीडीएफ फाइल भी शेयर किया है कि जहां पर मैंने यह सब कंपैरिजन का एक टेबल बनाया है। अभी देखिए कि
विशिष्ट-अद्वैत और अजाती-वाद के अनुसार सृष्टि की रचना: निमित्त कारण और उपादान कारण
ठाकुर का जो सिद्धांत है यह ब्रह्म शक्ति अभेद यह इस फिलॉसोफिकल जो सिस्टम है वहां पर कैसे फिट बैठता है। देखिए एक तो है रामानुजाचार्य का परिणामवाद। इसका अर्थ क्या है? परिणामवाद का? देखिए सृष्ट सृष्टि की जो रचना होती है उसमें दो फैक्टर होते हैं। अब जैसे कि देखिए कुम्हार एक घड़ा बनाता है। तो अभी यहां पे घड़ा बनाने वाला कौन है? तो वह है कुंभार। और घड़ा किस चीज का बनता है? तो वह बनता है मिट्टी का। और घड़ा है। घड़ा बनता है मिट्टी का और घड़ा बनाने वाला है कुम्हार। तो यहां पर देखिए घड़े को यदि हम सृष्टि की उपमा सृष्टि को हम यदि घड़े की उपमा दें तो यह सृष्टि बनती किस चीज से है और सृष्टि को बनाने वाला कौन है? इन दोनों को टेक्निकल लैंग्वेज में कहते हैं निमित्त कारण और उपादान कारण। निमित्त कारण अर्थात कि सृष्टि का रचयिता कौन है? उपादान कारण अर्थात कि सृष्टि कौन से पदार्थ से बनी है? अभी आज की लैंग्वेज में आप देखेंगे तो यह लोग कहेंगे कि सृष्टि का रचयिता कोई नहीं है। बिग बैंग के बाद में यह सृष्टि ऑटोमेटिक प्रारंभ हुई है। तो यह तो हो गया रचयिता या तो फिर निमित्त कारण तो उन्होंने उड़ा ही दिया। और उपादान कारण क्या है? कौन से पदार्थ से यह सृष्टि बनी है? तो सृष्टि बनी है प्योर एनर्जी की। E = MC² अर्थात कि एनर्जी में से ही मैटर प्रकट होता है। तो यह जो बिग बैंग जो था दैट वाज़ एन एक्सप्लोजन ऑफ एनर्जी। उसमें से जो प्रचंड एनर्जी प्रकट हुई वही एनर्जी फिर धीरे-धीरे करके यह सब एटॉमिक पार्टिकल है। चाहे वह आप उसको क्वार्क कहो ना कि चाहे स्ट्रिंग कहो। वह प्रकट हुए। स्ट्रिंग में से फिर यह जो इलेक्ट्रॉन प्रोटॉन न्यूट्रॉन प्रकट ट्रांस कन्वर्ट हुए ट्रांसफॉर्म हुए और फिर ये जो इलेक्ट्रॉन प्रोटॉन न्यूट्रॉन जो है वो फिर कलेक्ट होकर के एटम बना है और यह जो एटम है एटम में से केमिकल बने और यह फिर केमिकल का पूरा सृष्टि है। तो यह हो गया आपका मॉडर्न साइंस। निमित्त कारण अर्थात कि सृष्टि का रचयिता कोई नहीं है और उपादान कारण है प्योर एनर्जी। तो यह मॉडर्न साइंस अभी हमारा हिंदू शास्त्र क्या कहता है? तो रामानुजाचार्य का परिणामवाद है। परिणामवाद क्या कहता है? एक है सगुण ब्रह्म या तो फिर ईश्वर। ईश्वर ने जैसे कि अपने में से ही इस सृष्टि को प्रकट किया है। जैसे मकड़ी है। मकड़ी अपने मुंह में से जैसे कि वह जाल बनाती है। तो जाल तो यह मकड़ी में से ही प्रकट हुई है। और मकड़ी के जो बायोलॉजिकल उसका जो डीएनए है उसी डीएनए में से ही जैसे कि यह जाल प्रकट हुई है। ब्रह्मन ही जैसे कि अपने एक पार्ट को कन्वर्ट करता है। ट्रांसफॉर्म करता है। दिस ट्रांसफॉर्मेशन यह एक्चुअल जैसे कि दूध का दही बनता है। अभी दही तो बना है दूध का ही। दूध में से ही तो परिण ट्रांसफॉर्म होकर के दही बना है। तो यह दूध का परिणाम है दही। तो वैसे ही ब्राह्मण अपना एक पार्ट कन्वर्ट करके सृष्टि को रचित करते हैं। तो यह हो गया परिणामवाद। अभी यह परिणामवाद यह हो गया यदि रामानुजाचार्य का तो दूसरा एक एक्सट्रीम जो है वह है गडपादाचार्य का अजातिवाद अजातिवाद क्या कहता है अजातिवाद कहता है कि सृष्टि की रचना हुई ही नहीं है। अर्थात कि सृष्टि आप यह तो प्रश्न कर रहे थे ना कि यह घड़ा किसने बनाया? घड़ा किस पदार्थ से बना है? यह तो घड़ा यदि होता है तो तो यह दो प्रश्न होंगे कि घड़ा किसने बनाया और घड़ा किस पदार्थ का बना है? यदि घड़ा ही नहीं है तो उसको बनाने वाला या तो किस पदार्थ से बना है? ये दोनों प्रश्नों का प्रश्न करने का कोई तात्पर्य नहीं। प्रश्न दोनों है वह निरर्थक प्रश्न है। इलॉजिकल प्रश्न है। इसको कहते हैं अजातिवाद कि घड़े की सृष्टि ही नहीं हुई। सृष्टि होती तो फिर आप पूछते कि कौन सा चीज का घड़ा बना है? किसने घड़े को बनाया? सृष्टि ही नहीं है तो सृष्टि का कर्ता कौन है? कोई नहीं। सृष्टि कौन से पदार्थ से बनी है? तो किसी पदार्थ से नहीं बनी। तो यह देखिए गडपादाचार्य का अजातिवाद अभी दोनों का
अजाति-वाद और विशिष्ट-अद्वैत के गुण और दोष: जीव निर्गुण ब्रह्मन् के साथ एकीकृत हो सकते है, सगुण ब्रह्मन् के साथ हमेशा दुरी बनी रहेगी
मेरिट और डीमेरिट देखिए गडपादाचार्य का जो अजातिवाद है उसका मेरिट क्या है मेरिट यह है कि निर्गुण निराकार ब्रह्मण यहां पे है। ब्राह्मण ही है और कुछ नहीं। राइट? तो निर्गुण निराकार ब्रह्मण यहां पर अल्टीमेट रियलिटी है जो कि एक आध्यात्मिक जीवन की सर्वोच्च प्राप्ति है। दैट इज यहां पर मेरिट है। वो उसका प्लस पॉइंट है। और यह जो प्लस पॉइंट है वो रामानुजाचार्य का जो परिणामवाद है उसका माइनस पॉइंट हो जाता है। रामानुजाचार्य कहते हैं कि सगुण ब्रह्म अपना एक पार्ट को ट्रांसफॉर्म करके सृष्टि की रचना करते हैं। तो यहां पर सगुण ब्रह्म कर्म करने वाले तो सगुण ब्रह्म है। यदि ब्रह्म कर्म नहीं करते तो सृष्टि की रचना नहीं होती। यहां पर निर्गुण निराकार ब्रह्म है गडपादाचार्य के जो कि किसी भी तरह का कर्म नहीं करते। वि इज दी हाईएस्ट स्पिरिचुअल एटेनमेंट इन दी वर्ल्ड। तो वो उसका एक प्लस पॉइंट है कि निर्गुण निराकार ब्रह्म उसकी यहां पे उपस्थिति है गडपादाचार्य के फिलॉसोफी में और वह है आध्यात्मिक जीवन की सर्वोच्च उपलब्धि। जबकि यहां पे हाईएस्ट आप जा सकते हैं सगुण ब्रह्म तक। तो फिर क्या है कि सगुण ब्रह्म की उपासना करते हैं तो फिर यह सयुज्य है, सारूप्य है। यह सब उपलब्धि हो सकती है। आप नारायण के साथ में वैुंठ में निवास कर सकते हैं। नारायण के साथ नारायण की सेवा कर सकते हैं। भक्ति का कोई भी एक भाव लेकर के नारायण के साथ में रिलेशनशिप एस्टैब्लिश कर सकते हैं। जैसे कि सख्य भाव, दास्य भाव, संतान भाव, मातृ भाव, मधुर भाव, शांत भाव वगैरह। तो नारायण के साथ में एक बहुत ही गहरा आपका रिलेशन हो सकता है। आप नारायण स्वयं नहीं बन सकते हैं। वह डिफरेंशिएशन हमेशा हमेशा रहेगा सगुण ब्रह्म की कल्पना में। तो फिर देखिए ठाकुर कहते हैं ना कि एक राजा है वह अपने रसोइए पे बड़ा खुश हो गया। तो अपने रसोइयों को आकर के कहता बुला के कहता है अरे तुम मेरे साथ में मेरे सिंहासन पर बैठो। मैं जो हूं वह भी तुम ही हो। तो रसोइया खुश होकर के राजा के साथ में राजा के ही सिंहासन पर बैठता है। किंतु यह रसोइया जो है वह अपने से राजा कभी नहीं हो पाएगा। राजा की प्रसन्नता प्राप्त करेगा। किंतु राजा स्वयं नहीं हो पाएगा। राजा के साथ में एक ही सिंहासन पर विराज हो सकता है। राजा को जिस तरह का सम्मान उनके यह जो दरबारी वगैरह है चेले चपाटे वो राजा को जितना सम्मान करते हैं उतना ही सम्मान शायद रसोइयों को कर सकते हैं। क्योंकि वह राजा का फेवरेट पर्सन है। स्नेह पात्र है। किंतु यह रसोइया अपने से राजा कभी नहीं हो पाएगा। तो यह जो आध्यात्मिक जीवन की सर्वोच्च अनुभूति है कि ब्रह्म साक्षात ब्रह्म अहम ब्रह्मास्म यानी कि ब्रह्म भाव में स्थिति मैं अपने से ब्राह्मण हो सकता हूं। ब्रह्मन के साथ में एकीकृत हो जाना एकाकार हो जाना यह जो है वह आपका सगुण ब्रह्म वाली परिकल्पना है। उसमें नहीं होगा। तो यह देखिए कि अजातिवाद का जो प्लस पॉइंट क्या है? जो आध्यात्मिक जीवन की सर्वोच्च उपलब्धि है निर्गुण निराकार ब्रह्म में निर्विकल्प समाधि में स्थिति तो वह वहां पर पॉसिबल है। जबकि यह जो परिणामवाद है अपने रामानुजाचार्य का वहां पर हमेशा आप यह जो हाईएस्ट एटमेंट पॉसिबल है आध्यात्मिक जीवन की जीव ब्रह्म ऐक्य वह वहां पर पॉसिबल नहीं है। तो यह हो गया पहला पॉइंट प्लस और माइनस दोनों का। किंतु
अजाति-वाद और विशिष्ट-अद्वैत के गुण और दोष: ब्रह्मन् निर्गुण होने से मानव स्वप्न मात्र है उसकी सेवा किसी काम की नहीं। सगुण ब्रह्मन् ही मनुष्य हुए है तो मानव-सेवा ईश्वर-उपासना हो सकती है।
यहां पर यह रामानुजाचार्य का आप देखिए कि दूसरा एक प्लस पॉइंट है जो कि यहां पर नहीं है। अजातिवाद में नहीं है। रामानुजाचार्य का परिणामवाद क्या कहता है कि ब्राह्मण का ही जगत बना है। तो फिर आप जिस समय ब्राह्मण की डायरेक्ट उपासना आराधना नहीं करते हैं ब्राह्मण के रूप में उस समय आप इसी ब्राह्मण को लोगों के भीतर में देख सकते हैं। लोगों की सेवा कर सकते हैं। ये जो दूसरों के जगत में ये जो जितने भी मनुष्य हैं उनके प्रति करुणा रखना उनके प्रति कंपैजन या तो सहानुभूति रखना उनके प्रति अपने मन में एक दर्द प्रकट होना उनके प्रति स्नेह भाव प्रकट होना उनकी केयर करना उनकी संभाल रखना उनको हेल्प करना सहाय करना यह जो इंटरपर्सनल रिलेशन है वह यहां पर लेजिटमेट है रामानुजाचार्य के परिणामवाद में। क्यों? क्योंकि वही सगुण ब्रह्मण ही एक तरह से परिणित होकर के ट्रांसफॉर्म होकर के जीव और जगत बने हैं। अर्थात कि मैं अपना जो बंधु है यह जो देशवासी है, पड़ोसी है, यह दरिद्र नारायण वगैरह जो कोई भी है उनकी यदि मैं सेवा भी करता हूं तो वह भी उपासना में परिणत होगा। वह भी ईश्वर प्राप्ति की साधना में परिणत होगा। क्यों? क्योंकि वही ब्रह्मन ही यह मनुष्य का रूप धारण किए हुए हैं। परिणामवाद ब्रह सगुण ब्रह्मन का ही एक अंश ट्रांसफॉर्म होकर के मनुष्य बना है। तो फिर इस मनुष्य की सेवा करना एक तरह से देखिए कि फिर यह मनुष्य वे लोग सेवा शब्द यदि नहीं यूज करेंगे तो जीवे दया यह जो शब्द उनका है कि लोगों के ऊपर में दया करनी यदि उनका कोई नुकसान हो रहा है वह तकलीफ में है तो उनको सहाय करनी तो यह जो है यह ले कर या तो सहाय या तो फिर हेल्पफुलनेस इट्स अ लेजिटमेट वे ऑफ साधना यह सगुण ब्राह्मण की परिकल्पना में परिणामवाद में तो यह यहां पे एक यदि प्लस पॉइंट है तो यहां पे देखिए कि अजातिवाद का यह माइनस पॉइंट हो जाता है गॉड पादाचार्य की फिलॉसोफी में यदि जगत का सृष्टि हुआ ही नहीं है तो फिर आप ये मनुष्य लोग जो है जितने भी वह तो स्वप्न ही है सपना के अलावा और कुछ नहीं आप उनको हेल्प करेंगे ही क्यों? उनके प्रति आप सद्भाव रखेंगे ही क्यों? देखिए जिस तरह से गडपादाचार्य हमको बताते हैं स्वप्न जागृत सुशुप्ति और तुरीय तो फिर जिस तरह से स्वप्न है जब निद्रा भंग होती है। हम नींद में से उठ जाते हैं तो हमको स्वप्न किस तरह से लगता है? वह किसी उसका कोई अस्तित्व ही नहीं है। स्वप्न का इस बाहर के जगत के साथ में वास्तव जगत के साथ में अबब्सोल्यूटली कोई रिलेशन नहीं है। वो जो ठाकुर की कहानी कि एक किसान था रात को स्वप्न देखता है राजा हुआ है। सात लड़के हुए हैं। तो अभी जब स्वप्न खुल गया नींद से जब नींद टूट गई जग गया तो देखा वो जैसा किसान है वैसा ही है। और इतना ही नहीं ऊपर से उसका जो लड़का था उसका भी मृत्यु हो गया है। तो जो स्वप्न की वेल्थ थी वह क्या उसको वास्तव जगत में उसका कोई एक अंश दिखा भी एक अंश भी नहीं दिखा। जैसे कि यह मरुभूमि है, डेजर्ट है। उसमें आपको मिराज के रूप में एक जलाशय दिखता है। बहुत बड़ा जलाशय है। अभी मान लीजिए आप दौड़ करके वहां पर जाते हैं। प्यास के मारे आपका गला सूख रहा है। दौड़ करके आप उस जगह पर गए जहां पर आपको यह जलाशय रूपी मिराज जो है भ्रम जो है दिख रहा था। किंतु जैसे ही आप वहां पर गए आपने क्या देखा कि पूरा जलाशय अदृश्य हो गया है। अभी सिर्फ अदृश्य नहीं हुआ। इतना बड़ा जलाशय यह जो रेती का एक कण भी भिगो नहीं पाया। एक कण भी नहीं। ठाकुर कहते हैं ना कि पंचांग है। पंचांग में लिखा है कि बारिश होगी। किंतु पंचांग को आप कितना ही ट्विस्ट और टर्न कर लीजिए, स्क्वीज़ कर लीजिए। एक बिंदु जल भी उसमें से नहीं निकलने वाला। तो गिरीश घोष पूछता है मजाक करते-करते क्या महाशय एक बिंदु जल भी नहीं निकलेगा। ठाकुर कहते हैं नहीं एक बिंदु जल भी नहीं निकलेगा। तो देखिए कि ये जो अजातिवाद है सृष्टि एक भ्रम मात्र है। असत्य है। उसका एब्सोल्यूटली कोई अस्तित्व नहीं। तो फिर आप लोगों की सेवा करेंगे ही क्यों? लोगों के साथ में सद्भाव आप रखेंगे ही क्यों? यह ऐसा कभी होता है कि मैंने स्वप्न में एक भिखारी को देखा तो मैं उसको सहाय करने के लिए दौड़ा दौड़ा चला गया। स्वप्न में भिखारी को सहाय करना इस बात का कोई प्रयोजन नहीं। कोई अर्थ नहीं, कोई तात्पर्य नहीं। इट्स एन कहते हैं ना नॉन एप्लीकेबल। स्वप्न में भिखारी को सहाय करना। इट्स अ नॉन एप्लीकेबल। आप आंख खोल के देखेंगे जगत में जितने भी भिखारी हैं जितने भी दरिद्र लोग हैं जितने भी अनफॉर्चूनेट लोग हैं वो वैसे के वैसे ही रहेंगे। स्वप्न में आपने एक करोड़ लोगों को भोजन करवा दिया। दरिद्र लोगों को यहां खुलकर के देखेंगे कि एक दरिद्र व्यक्ति को भी एक कण भी अन्न प्राप्त नहीं हुआ। तो यहां पर जगत के साथ में खास करके जगत के यह जो लोग हैं मनुष्य है अन्य मनुष्य उनके साथ में किसी भी तरह का व्यवहार रखना उनको किसी भी तरह की हेल्प करना किसी काम का नहीं है। तो यह देखिए कि हाईएस्ट स्पिरिचुअल रियलाइजेशन आपको करवा सकता है अजतिवाद किंतु एट द सेम टाइम यह संभव है कि लोग एथिक्स और मोरालिटी को भूल जाए। जैसे कि वो एक कहानी है। फेमस कहानी है वेदांत में अजातिवाद का मिस इंटरप्रिटेशन कैसे होता है? तो एक जज के सामने मैजिस्ट्रेट के सामने एक साधु को लाया गया। तो मैजिस्ट्रेट ने साधु को पूछा तुमको शर्म नहीं आती। तुम साधु होकर के एक स्त्री के साथ में दुराचार करते हो? तो साधु ने उत्तर दिया मैंने कहां किया है? मैं तो अजात निर्विकल्प निराकार निर्गुण ब्रह्म हूं। जो भी किया है मेरे शरीर ने किया है। तो यह मैजिस्ट्रेट को भी थोड़ा बहुत वेदांत आता था। तो उसने उत्तर दिया ठीक है हम तुमको छोड़ देते हैं। निर्गुण निराकार ब्राह्मण को दोषी नहीं ठहराते। तुम्हारा शरीर जो है पंचमहाभूत का उसी को दोषी ठहराते हैं और उसी को फांसी देते हैं। तो अभी देखिए कि यह जो अजातिवाद है जब यह यह कहेगा कि जगत तो असत्य है। जगत स्वप्न मात्र है। तब यह एथिक्स और मोरालिटी किस फाउंडेशन पे आप रखेंगे? यह एक क्वेश्चन आ जाता है। एक्चुअली यह क्वेश्चन नहीं आना चाहिए। ये अजातिवाद मेरी दृष्टि से सर्वोच्च फिलॉसोफी है। सर्वश्रेष्ठ फिलॉसोफी है। किस अर्थ में? कि यदि आपको अजातिवाद में निर्दिष्ट निर्गुण निराकार ब्राह्मण का साक्षात्कार करना है तो उसके लिए एकमात्र उपाय है एथिक्स एंड मोरालिटी। बिना एथिक्स एंड मोरालिटी के और कुछ भी संभव नहीं। यह प्योर अजातिवाद में गडपादाचार्य का जो यह सिद्धांत है उसमें थोड़ा सा भी आगे बढ़ना है। आपको 1% ब्रह्मचर्य का पालन करना है। 1% सत्य का पालन करना है। 1% मैत्री, करुणा, मुदिता, उपेक्षा यह जो चित्त प्रसाद है उसका पालन करना है। उसमें 1% भी गड़बड़ा गए तो आप सीधे आउट हो गए इस रास्ते से। तो मेरी दृष्टि से शास्त्र की दृष्टि से आपके मन में अजातिवाद या तो फिर उसके रिलेटेड जो साधना है उसको लेकर के किसी भी तरह की दुविधा नहीं होनी चाहिए। किंतु फिर भी क्या है मनुष्य का जो जिस तरह से नेचर है हमेशा हर तरह के लूप होल खोजता है। हर तरह से हमेशा कुछ ना कुछ प्रॉब्लम गड़बड़ खड़ी करने के लिए वासनाओं की तृप्ति के लिए वो कोई ना कोई बहाना खोजते रहता है। तो फिर देखिए कि शंकराचार्य ने जो विवर्तवाद है उसका यह जो प्रारंभ इसीलिए किया कि यह जो लूप होल क्लोज कर दें कि आप अनएथिकल या इमोरल बिहेवियर कर सकते हैं अजातिवाद का निर्गुण निराकार ब्राह्मण और यह जो हाईएस्ट आध्यात्मिक उपलब्धि है कि अहम ब्रह्मास्मि जीव ब्रह्म ऐक्य यह जीव ब्रह्म ऐक्य का जो उसका जो हाईएस्ट उपलब्धि है अजातिवाद की उसको तो रखा किंतु साथ में ही यह जो मोरल लूप होल जो खड़ा हुआ था कि जगत है ही नहीं जगत स्वप्नवत है जिस तरह से स्वप्न में आप किसी दरिद्र व्यक्ति को सहाय करेंगे उस बात का कोई प्रयोजन नहीं है कोई अर्थ नहीं है कोई तात्पर्य नहीं है तो साथ में ही उस दरिद्र व्यक्ति की हत्या भी करेंगे तो भी तो कोई फर्क नहीं पड़ता है मदद करने से पुण्य नहीं होता। पुण्य नहीं लगता तो उसकी हत्या करने से पाप भी नहीं लगता। अभी देखिए गीता में तो स्पष्ट कहा है कि जो ब्रह्म साक्षात्कार जिसने किया है या तो फिर जो ब्रह्म साक्षात्कार के पद पे पथ पे है वो हत्या करते हुए भी हत्या नहीं करता। तो यह हो गई हाईएस्ट अजातवाद की बात। किंतु फिर क्या है ना वह फिर मुंह से बोलने से तो नहीं चलेगा ना कि मैं अजातिवाद का फॉलोअ हूं। निर्गुण निराकार ब्रह्म की उपासना कर रहा हूं। जगत तो स्वप्नवत है। मिथ्या है। ऐसा मुंह पे बोलना और जैसे कि मुंह मुख में राम बगल में छुरी मुंह पे ऐसा सब बोलते रहना। और फिर जो व्यवहार जो है व्यवहार में जितनी भी तरह की बदमाशी है दुष्टता है इन अनएथिकल इमोरल बिहेवियर है वो सब करते रहना तो फिर क्या है
शंकराचार्य का मध्यम-मार्ग : अद्वैत-वेदान्त : पारमार्थिक और व्यावहारिक सत्ता
शंकराचार्य ने क्या किया यह अपेरेंट लूप होल जो है अजातिवाद का उसको कोई बेनिफिट उठाकर के इमोरल कार्य ना करें इसके लिए शंकराचार्य ने पारमार्थिक और व्यावहारिक ऐसा दो डिवीजन कर दिया पारमार्थिक लेवल पे अर्थात कि हाईएस्ट लेवल पे अजातिवाद सत्य है। हाईएस्ट लेवल पर निर्गुण निराकार ब्राह्मण है। किंतु व्यावहारिक लेवल पे सृष्टि की रचना हुई है। पारमार्थिक लेवल पर सृष्टि की रचना नहीं हुई क्योंकि हाईएस्ट लेवल तो अजाती ही है। किंतु फॉर द सेक ऑफ वर्ल्डली रिलेशनशिप यह जो समाज में रहना है, जगत में रहना है, मोरालिटी और एथिक्स है, उसका पालन करना है, तो उसके लिए अपेरेंटली आपको जगत तो चाहिए। जगत की सृष्टि होनी चाहिए। इसके लिए शंकराचार्य का विवर्तवाद है। यह विवर्तवाद क्या कहता है कि जैसे कि वो फेमस कहानी है कि यह रास्ते में जा रहे हैं। अंधेरे में रस्सी दिख गई। अभी एकदम हृदय धकधक करने लगा कि अरे यह सांप है। माने रास्ते में सांप पड़ा हुआ है। रस्सी सांप की तरह दिखती है। किंतु जैसे ही टॉर्च लाइट उसके ऊपर में फेंकी पता चला सांप नहीं है। रस्सी ही है। किंतु अभी यहां पर देखिए रस्सी का सांप होना जागृत अवस्था में है। जबकि वि अजातिवाद में है कि जो सृष्टि की रचना हुई है वह स्वप्न अवस्था में हुई है। सी द डिफरेंस ना ही स्वप्न अवस्था सही है, सत्य है, ना ही यह जो सर्प है, वह सत्य है। एक तरह से देखेंगे वहां पे जैसे नींद खुल जाएगी, स्वप्न अदृश्य हो जाएगा। यहां पर जैसे आपको ज्ञान प्राप्त हो जाएगा, सर्प अदृश्य हो जाएगा। देखिए स्वप्न और सर्प दोनों का कोई अस्तित्व नहीं। किंतु स्वप्न जो है वह निद्रित अवस्था में दिखता है। जबकि सर्प जो है हमको जागृत अवस्था में दिखता है। अर्थात कि जगत है वो व्यावहारिक लेवल पर सत्य है। पारमार्थिक लेवल पर सत्य नहीं व्यावहारिक लेवल पर सत्य है। इसके लिए यह विवर्तवाद देखिए परिणामवाद रामानुजाचार्य का क्या कहता है? सर्प जो है रज रज्जू जो है एक्चुअल सर्प में रूपांतर हुआ है। यदि आपको माने रज्जू और सर्प ये दोनों सही है। रज्जू का एक पार्ट जो है सर्प में रूपांतरित हुआ है। यह हो गया रामानुजाचार्य का परिणामवाद। अजातिवाद गौडपादाचार्य का कहता है कि जो सर्प दिख रहा है आपको सपने में ही दिख रहा है। जैसे आप जागृत अवस्था में आ गए। सर्प चला गया। यह रज्जू का सर्प आपको सिर्फ स्वप्न में दिखता है। जागृत अवस्था में नहीं दिखता। जबकि यह शंकराचार्य का यह एक रिकंसिलिएशन है कि हां रज्जू ही है। सर्प नहीं किंतु यह रज्जू में से सर्प का जो रूपांतरण है जागृत अवस्था में दिखता है। यानी कि रामानुजाचार्य का है कि जागृत अवस्था में ही आपको यह रज्जु भी है, सर्प भी है। क्यों? क्योंकि रज्जु का एक पार्ट सर्प में रूपांतर हुआ है। यहां पे है विवर्तवाद है गपादाचार्य का कि सपने में वह दिख रहा है सर्प किंतु जागृत अवस्था में आपको रज्जु ही दिखेगा। रस्सी ही दिखेगी। जबकि शंकराचार्य कहते हैं कि जागृत अवस्था में भी यह जो रस्सी है उसका सर्प दिख सकता है किंतु वह दिखता है अज्ञान की वजह से अविद्या या तो माया की वजह से तो यह माया का कांसेप्ट यह विवर्तवाद यह शंकराचार्य यहां पे लेके आए हैं। यानी कि आप देखिए कि परिणामवाद में सिर्फ दो ही है। बेसिकली सगुण ब्रह्मण है और सृष्टि है। यहां पे भी आप देखिए कि एक ही है अपने गॉड पादाचार्य के अजातिवाद में सिर्फ रज्जू ही है। सर्प है ही नहीं। जबकि यहां पे रज्जु भी है। शंकराचार्य के विवर्तवाद में सर्प भी है और एक एक्स्ट्रा कांसेप्ट है माया। यह माया या तो अविद्या या तो अज्ञान। उसके चश्मे पहनने से हमको यह रज्जू है। सर्प सा दिखाई देता है। यानी सर्प जो है सांप जो है उसकी एक व्यावहारिक सत्ता है। यह व्यावहारिक सत्ता होने की वजह से आप यह जो मनुष्य है, पेड़ पौधे हैं, पशुपंखी है, चांद सितारे हैं, वह सब देख सकते हैं। और इस जगत के साथ में आप मीनिंगफुली इंटरेक्ट भी कर सकते हैं। यदि दूसरे मनुष्य को आप सहाय करें तो वो लेजिटमेट है यहां पे क्योंकि व्यावहारिक सत्ता तो उसकी है उस मनुष्य की पारमार्थिक लेवल पर असत्य है किंतु व्यावहारिक लेवल पर तो मनुष्य की सत्ता है ही है अर्थात कि निमित्त कारण भी यहां पे है माया या तो फिर कहेंगे ब्रह्म प्लस माया इक्वल्स ईश्वर शंकराचार्य के फिलॉसोफी में उपादान कारण निमित्त कारण और सृष्टि। ठीक? तो सृष्टि की रचना है यहां पे। उपादान कारण क्या है? कौन से पदार्थ में से सृष्टि बनी है? तो ब्राह्मण में से बनी है सृष्टि। क्योंकि रज्जु का सर्प होता है। रज्जु नहीं होता तो सर्प भी नहीं होता। यानी कि उपादान कारण है रज्जु। किंतु निमित्त कारण क्या है? वह कहेंगे या तो माया है या तो फिर ब्रह्म प्लस माया इक्वल्स ईश्वर। तो यह ईश्वर है वह जो कि सृष्टि की रचना करता है या तो फिर सृष्टि की रचना करता हुआ सा प्रतीत होता है विवर्तवाद। तो यह है शंकराचार्य का रिकंसिलिएशन। यह जो दो एक्सट्रीम फिलॉसोफीज़ है सगुण ब्रह्म और सगुण ब्रह्म में से ही सृष्टि उत्पन्न होती है। परिणामवाद यहां पे निर्गुण निराकार ब्रह्मण और सृष्टि है ही नहीं वो अजातिवाद और यहां पे देखिए निर्गुण निराकार ब्रह्मण भी ले लिया और सृष्टि का एक व्यावहारिक सत्ता भी स्थापित कर दिया। पारमार्थिक लेवल पर सृष्टि नहीं है। व्यावहारिक लेवल पर सृष्टि है। क्योंकि यह जो सर्प है सर्प हमको जागृत अवस्था में दिखता है। वह हमको स्वप्न अवस्था में नहीं दिखता। तो यह हो गया शंकराचार्य का रिकंसिलिएशन। अभी देखिए शंकराचार्य को यदि आप ब्रॉडली प्रॉब्लम जो भी अद्वैत वेदांत के साथ में आज जितने भी एलगेशंस सो कॉल्ड तथाकथित एलगेशंस या तो आप उसके ऊपर में एक्यूज़ेशंस डालते हैं वो एक्चुअली सभी है ना अजातिवाद के ऊपर में है कि जगत है ही नहीं जगत तीनों काल में नहीं है जगत के साथ में किसी भी तरह का व्यवहार करना किसी लाभ का नहीं है और फिर यही अजातिवाद का एक बहुत ही बड़ा मिस इंटरप्रिटेशन या तो फिर अजातिवाद का लाभ उठाकर के वासना को चरितार्थ करने वाला जगत यदि स्वप्न ही है तो इस स्वप्न में मैंने किसी को सहाय की ना कि मैंने किसी का शोषण किया। फर्क क्या पड़ता है? तो इस तरह का जो लूप होल है शंकराचार्य ने अद्वैत वेदांत में यह लूप होल क्लोज कर दिया है। किंतु प्रॉब्लम यही है कि शंकराचार्य के जो एक्सट्रीम इंटरप्रिटर्स है वो शंकराचार्य को अजातिवाद के भी वो बॉक्स में बिठा देते हैं। प्रॉपर जो अद्वैत वेदांत है या तो यह जो विवर्तवाद है उसका प्रॉपर इंटरप्रिटेशन यह लोग करते ही नहीं। शंकराचार्य के ऊपर में यह अजातिवाद बिठा देते हैं। एक्चुअली देखिए शंकराचार्य का सहानुभूति जो है वो अजातिवाद की ओर ही है। जैसे मेरा खुद का है। मैं खुद यह समझता हूं कि निर्गुण निराकार ब्राह्मण जो है वह अल्टीमेट सत्ता है और जगत स्वप्न ही है। स्वप्न के अलावा कुछ नहीं। जैसे ही हमारी नींद खुल जाएगी, जगत इस तरह से अदृश्य हो जाएगा कि इसका कोई भी अत्तापत्ता कहीं पर नहीं रहेगा। किंतु एट द सेम टाइम मेरा यह कांसेप्ट बड़ा क्लियर है कि एथिक्स और मोरालिटी के फाउंडेशन पर ही अजातिवाद की साधना हो सकती है। किंतु जैसे कि बहुत समय बहुत बार ऐसा हुआ है। बहुत सारे लोगों ने इसका एक मिस इंटरप्रिटेशन करने का प्रयास किया है कि हम लोग हाईएस्ट फिलॉसोफी को फॉलो कर रहे हैं। एट द सेम टाइम हम लोग लोगों का शोषण कर रहे हैं। स्वामी जी ने कहा ना कि भारत जैसा कोई देश नहीं कि जिसमें इतनी हाईएस्ट फिलॉसोफी होती हो। एट द सेम टाइम भारत जैसा और कोई देश नहीं कि जहां पे लोगों के अधिकार का इस हद तक शोषण होता हो। तो अजातिवाद इज द हाईएस्ट ऑफ द फिलॉसोफी। एट द सेम टाइम भारत में ये जो नाती जाति प्रथा जिस हद तक घर कर गई थी वह भारत को भीतर से पूरा को खत्म कर दिया। भारत को भीतर से जैसे कि पूरा रोट कर दिया, सड़ा दिया। तो देखिए कि हाईएस्ट ऑफ फिलॉसोफी को यदि आप प्रॉपर इंटरप्रिटेशन नहीं करेंगे, उसका एक व्यवहारू एक एस्पेक्ट नहीं डेवलप करेंगे तो फिर यह हाईएस्ट ऑफ फिलॉसोफी का मिस एप्लीकेशन बहुत बार होने की संभावना है। तो यह मिस एप्लीकेशन ना हो अजातिवाद का। इसके लिए यह विवर्तवाद है शंकराचार्य का कि सृष्टि की अपेरेंट रचना तो हुई है। जागृत अवस्था में भी मुझे यह सृष्टि दिखती है। जागृत अवस्था में भी मुझे यह स्वप्न दिखता है। उनका गडपादाचार्य का है स्वप्न देखने के लिए मुझे सोते रहना पड़ेगा। नींद से जग जाऊंगा तो यह स्वप्न अदृश्य हो जाएगा। अर्थात कि जब मुक्ति मिल जाएगी जगत अदृश्य हो जाएगा। यहां पे है शंकराचार्य का कि जगत अदृश्य कब होता है? निर्विकल्प समाधि में जगत अदृश्य हो जाता है। पहले तो अज्ञान की अवस्था थी कि मुझे सर्प दिखता है। फिर मैं निर्विकल्प समाधि में चला गया। अर्थात कि मैंने टॉर्च मारी उसके ऊपर में रज्जू के ऊपर में तो फिर यह सर्प अदृश्य हो गया। रज्जू ही दिख रहा है। वह हो गई निर्विकल्प समाधि। किंतु टॉर्च पूरा दिन में चालू रखूंगा तो क्या होगा? वह बैटरी डाउन हो जाएगा। तो एक बार देख लिया कि यह सांप नहीं है, रज्जू ही है, रस्सी ही है। मैंने टॉर्च ऑफ कर दिया तो फिर मैं अभी मैं आराम से हूं। भले ही चाहे टॉर्च ऑफ करने से फिर से अंधरा छा गया है और फिर से मुझे वह सांप दिख रहा है। किंतु अभी मुझे ज्ञान हो गया है कि वह एक्चुअली सांप सांप दिखता है किंतु सांप है नहीं। यह जो है कि ठाकुर जिसको कहते हैं ना कि नेति नेति करके निर्विकल्प समाधि में जाना और निर्विकल्प समाधि के बाद में इति इति करके कि सर्वम खलव इदम ब्रह्म जगत में जो कुछ भी है ब्रह्मन ही है। ब्राह्मण के अलावा और कुछ नहीं। यह जो रज्जु के ऊपर में सर्प दिखता है। जैसे कि ब्राह्मण ने एक मुखौटा पहना हुआ है विभिन्न विभिन्न व्यक्तियों का। तो वही एकमात्र है। जैसे ही यह नाम रूप रूपी मुखौटा हटा देंगे उसके भीतर में हमको ब्राह्मण ही दिखेंगे। ब्राह्मण के अलावा और कुछ नहीं दिखेगा। तो यह है कि शंकराचार्य का वो विवर्तवाद का ब्यूटी कि आप जगत में वापस आ सकते हैं। सिर्फ यह नहीं कि आप जब साधना करते हैं उस समय आप लोगों को सहाय करते हैं। सिर्फ यह नहीं। आप साधना समाप्त होने के बाद में जगत में वापस आकर के ब्रह्म भाव से आप जी सकते हैं। जिसको कि जीवन मुक्त कहते हैं। जीवन मुक्ति का एक तात्पर्य है। आप चारों ओर ब्राह्मण ही देखेंगे क्योंकि ब्राह्मण का ही यह ब्राह्मण ही नाम रूप के मुखौटे के द्वारा विभिन्न व्यक्तियों के रूप में दिखाई देता है। जबकि अजातिवाद में प्रॉब्लम क्या है? वापस आप आएंगे ही क्यों? यह तो ऐसा हो गया कि मैं नींद से एक बार जग गया। अभी मुझे मुक्ति तो प्राप्त हो गई। तो फिर अभी मुक्ति प्राप्त करने के बाद में अभी मुक्ति की अवस्था में मुझे ज्यादा नहीं रहना। चलो मैं फिर से सो जाता हूं। चलो मैं फिर से स्वप्न देखता हूं। ये स्वप्न देखने का कोई अर्थ है क्या? मैं क्यों वापस सोने को जाऊंगा? मैं क्यों वापस अज्ञान की अवस्था में जाऊंगा? मैं क्यों वापिस वही सपना देखूंगा? जिस सपना से मैं छूट करके आया हूं। यहां पे टॉर्च ऑफ करने का तो एक प्रयोजन बनता है। हमको ज्ञान हो गया है कि रज्जू ही है, सर्प नहीं है। टॉर्च ऑफ कर देने से हो जाएगा। निर्विकल्प समाधि से आप वापस आ सकते हैं। अजातिवाद में निर्विकल्प समाधि एक बार प्राप्त कर ली तो उसके बाद में वापस आने का कोई प्रयोजन ही नहीं बनता। क्यों? क्योंकि निर्विकल्प समाधि यह जागृत अवस्था है। तो वापस आना तो स्वप्न वाली अवस्था में आना हो गया। मैं क्यों फिर से सोऊं? मैं क्यों फिर से अज्ञान में प्रवेश करूं? मैं क्यों फिर से वही अज्ञान रूपी स्वप्न बार-बार देखूं। यानी कि वहां पर विदेह मुक्ति का कांसेप्ट है। एक बार निर्विकल्प समाधि मिल गई उसके बाद में जगत में वापस आने का कोई प्रयोजन नहीं है। यानी कि जब आप साधना करते हैं तब लोगों को सहाय करने का कोई प्रयोजन नहीं। क्योंकि लोग स्वप्न मात्र है। एट द सेम टाइम यदि मुक्ति मिल गई तो फिर वापस आने का कोई प्रयोजन नहीं। ये तो ऐसा हो गया। एक बार में वो ठाकुर की कहानी है ना कि दो एक दो-तीन मित्र है। एक बड़ी दीवाल है। तो एक मित्र दीवार पर खड़ा उठ के उसने देखा कि दूसरी ओर एक बहुत सुंदर बहुत ही अच्छा सा एक मेला लगा है। तो वो हंसते-हंसते वो कूद गया दूसरी साइड में। दूसरा मित्र उठा दीवार पे। उसने भी देखा बड़ा सुंदर मेला है। तो वह भी कूद के चला गया। तीसरा मित्र जब दीवार पे उठा उसने सोचा कि अरे यहां के लोगों को पता ही नहीं है दीवार की इस साइड में कि उस साइड में इतना सुंदर मेला है तो वह दीवार पे खड़े रह कर के कूद जाने की बजाय मेले में वो इस साइड में जो लोग रहते थे उनको चिल्ला-चिल्ला करके कहता है अरे चलो चलो उस साइड में चलो आप लोग यहां पे क्यों झूठ-मूठ का टाइम वेस्ट कर रहे हो उस साइड में चलो बहुत सुंदर मेला है। अभी ये कहानी अजतिवाद में अप्लाई ही नहीं होती। मैं नींद में था। सपना देख रहा था। स्वप्न में बहुत सारे लोग थे। अभी मेरी नींद खुल गई। मुझे वास्तव पता वास्तविकता क्या है पता चल गई। तो क्या मैं फिर से सोने को जाऊंगा? सपना में जो लोग थे दूसरे उनको कहूंगा चिल्ला चिल्ला करके कि अरे चलो सब नींद से जग जाओ। देखो कि वहां पे जागृत अवस्था का जो जगत है वहां की जो वास्तविकता है स्वप्न अवस्था की वास्तविकता से बहुत ही सुंदर है। आप लोग जो अभी स्वप्न में हो सब लोग स्वप्न से खड़े हो जाओ। मैं ऐसा करूंगा ही नहीं। क्या प्रयोजन है? यह पूरा बात ही लॉजिकल है कि मैं नींद से उठूं। फिर फिर से मैं सोने को जाऊं। फिर मेरे सपनों में जितने भी दूसरे लोग थे, सबको चिल्ला-चिल्ला करके कहूं कि आप लोग सब स्वप्न में से निकल जाओ। सब स्वप्न में से निकल जाओ। तो देखिए कि अजातिवाद में ना ही लोगों को हेल्प करने का कोई प्रयोजन है। एस सच अ एथिक्स एंड मोरालिटी उसी के लिए है। उसका एक ही प्रयोजन है। वो है निर्विकल्प समाधि प्राप्त करने का। लोगों को सहाय करने के लिए नहीं। एथिक्स और मोरालिटी। एथिक्स और मोरालिटी है निर्विकल्प समाधि प्राप्त करने के लिए। तो वो एक है साधना अवस्था में लोगों को सहाय करें ना करें फर्क नहीं पड़ता। एट द सेम टाइम सिद्धि प्राप्त करने के बाद में जगत में वापस आकर के लोगों को सहाय करें। इस बात का भी कोई प्रयोजन नहीं है। आप आइए कीजिए अच्छा है। नहीं आएंगे नहीं करेंगे कोई फर्क नहीं पड़ता। किंतु शंकराचार्य का जैसे अभी रामानुजाचार्य का है वहां पर तो स्पष्ट है कि ब्राह्मण ही सगुण ब्रह्मण ही ईश्वर ही परिणत होकर के यह मनुष्य बने हैं। तो साधना की अवस्था में लोगों को सहाय करने का प्रयोजन है क्योंकि लोगों को सहाय करते हैं। ईश्वर को ही सहाय करते हैं। यदि ईश्वर साक्षात्कार हो गया, ईश्वर दर्शन हो गया और फिर आप समाज में वापस आकर रहते हैं। उसका भी प्रयोजन है क्योंकि यह सृष्टि ही ईश्वर की रचना है। सृष्टि में जितने भी मनुष्य हैं एक तरह से देखिए कि ईश्वर ने ही उनका निर्माण किया है तो उनको सहाय करना वो भी उसका एक प्रयोजन है। उसका लॉजिकल एक तात्पर तात्पर्य बनता है। जबकि वह अजातिवाद में नहीं बनता। तो शंकराचार्य का यह जैसे अपेरेंट सृष्टि हुई है। व्यावहारिक लेवल पर सृष्टि हुई है। रज्जू तो है एटलीस्ट रज्जू का जो म सर्प जो है सर्प की एक व्यवहारिक सत्ता है। जागृत अवस्था में मुझे सर्प दिखाई दे रहा। इसका अर्थ यह हुआ कि जब मैं साधना करता हूं तब भी मैं जब लोगों को सहाय करता हूं वह भी एक लॉजिक बनता है और सिद्धि प्राप्त कर ली। निर्विकल्प समाधि प्राप्त कर ली। उसके बाद में इति इति करके जगत में जब वापस आता हूं देखता हूं सर्वम खलवम इदम ब्रह्म जो कुछ भी है ब्रह्मन ही है दरिद्र नारायण चंडाल नारायण ये जो जितने भी है मूर्ख नारायण सभी लोग नारायण ही है उनकी सहाय करने का प्रयोजन है सहाय करने का एक लॉजिकल एक बनता है केस बनता है तो यह है शंकराचार्य का रिकंसिलिएशन एक और निर्गुण निराकार ब्राह्मण जो कि आध्यात्मिक जीवन की सर्वोच्च उपलब्धि है, सर्वोच्च कांसेप्ट है वह भी यहां पे है। और ये जो व्यावहारिक लेवल पर लोगों को सहाय करना, लोगों को लोगों के प्रति सहानुभूति होना, एथिक्स और मोरालिटी का पालन करना यह भी यहां पे है। दोनों केस यहां पे एक साथ में शंकराचार्य इकट्ठा करते हैं। शंकराचार्य के सामने जितने भी विरोध प्रदर्शित होते हैं, वह यह मान के होते हैं कि शंकराचार्य प्योर अजातवाद फॉलो करते हैं। अजतिवाद के सामने हमारा ये एक हो सकता है एक्यूज़ेशन कि आपकी फिलॉसोफी को फॉलो करके हम लोग एथिक्स और मोरालिटी को छोड़ दे सकते हैं। यह एक पॉसिबिलिटी है। आपकी फिलॉसोफी को फॉलो करके यदि मुझे निर्विकल्प समाधि बाय चांस हो जाए तो मैं जगत के कल्याण के लिए वापस कभी नहीं आऊंगा। यह केस आप जिस तरह से अजातिवाद के सामने खड़ा कर सकते हैं शंकराचार्य के सामने नहीं कर सकते। किंतु यही प्रॉब्लम है कि शंकराचार्य का जो इंटरप्रिटेशन ये कहो ना कि मिस इंटरप्रिटेशन कहो इतना सारा यह है एक पूरा एक इंडस्ट्री खड़ा हो गया है भारत में शंकराचार्य को उनकी निंदा करने का उन वही है जैसे जाति प्रथा के ये जो मेन स्तंभ ऐसा करके शंकराचार्य के पीछे लगने का वो एक चालू हो गया है किंतु मेरी दृष्टि से शंकराचार्य ही इज़ अ समन्वयाचार्य। म सरप्राइजिंगली लोग कहते हैं कि अद्वैत वेदांत इज़ वन ऑफ द दी मोस्ट एक्सट्रीम फिलॉसोफी। शंकराचार्य पूरा एक्सट्रीम वाद में जाते हैं। किंतु नहीं शंकराचार्य इज अ मॉडरेट पर्सन। एक्सट्रीमिस्ट यदि कोई है यदि एक्सट्रीमिस्ट का लेबल लगाना ही है तो वह गडपादाचार्य को लगा सकते हैं। शंकराचार्य ने एक्चुअली उन गडपादाचार्य की जो हाईएस्ट फिलॉसोफी है अजातिवाद उसको थोड़ा सा मॉडरेट स्वरूप करके हमारे सामने रखा है। सो देखिए कि यह शंकराचार्य का रिकंसिलिएशन है। किंतु यहां पे अभी एक
शंकराचार्य के मध्यम-मार्ग-रूपी अद्वैत-वेदान्त के गुण और दोष: व्यवहार की सत्ता है, परन्तु ईश्वर द्वितीय कक्षा पे है
प्रॉब्लम है। शंकराचार्य का जो रिकंसिलिएशन है उसमें एक छोटा सा प्रॉब्लम रह जाता है। देखिए शंकराचार्य ने दो मेजर प्रॉब्लम सॉल्व कर दिए हैं। अह परिणामवाद रामानुजाचार्य का परिणामवाद उसमें प्रॉब्लम क्या है कि सगुण ब्रह्मण हाईएस्ट रियलिटी है। किंतु एक्चुअली सगुण ब्रह्मण के ऊपर में भी निर्गुण निराकार ब्रह्मण है। जो कि हम प्योर यदि उसको फॉलो करें परिणामवाद को विशिष्ट अद्वैत को तो हम नहीं पहुंच पाएंगे। सो दैट इज वन प्रॉब्लम और यहां का जो प्रॉब्लम है कि अजातिवाद का गौडपादाचार्य का कि व्यावहारिक लेवल पर उसका कोई एप्लीकेशन हमको नहीं दिखता है। तो शंकराचार्य ने यह दो तो रिकंसाइल कर दिया कि हाईएस्ट ऑफ द निर्विकल्प निर्गुण निराकार ब्राह्मण और उसका व्यवहारिक एप्लीकेशन यह दो तो रिकंसाइल कर दिया। किंतु एक प्रॉब्लम यह हो गया है शंकराचार्य के इस अद्वैत वेदांत में कि ईश्वर जो है सगुण ब्रह्म जो है वह एक स्टेप नीचे आ गए हैं। जो कि रामानुजाचार्य के फॉलोअ या तो भक्ति मार्ग के जो फॉलोअ है वे लोग इस बात को स्वीकार नहीं करेंगे। वे लोग कहेंगे कि निर्गुण निराकार ब्राह्मण को जो आपने हाईएस्ट अल्टीमेट रियलिटी के रूप में स्वीकार किया है और आप यह कहते हैं कि निर्गुण निराकार ब्रह्मण निर्गुण ब्रह्म प्लस माया इक्वल्स ईश्वर यानी कि ईश्वर जो है वो निर्गुण निराकार ब्रह्म से एक स्टेप नीचे है क्योंकि वो माया की प्रोडक्ट है। तो यह बात हम लोग स्वीकार नहीं करेंगे। हम लोग कहेंगे कि जितना इंपॉर्टेंट जितना महात्म्य आपके ज्ञान मार्ग का है जितनाेंस और जितना महात्म्य उतना हीेंस उतना ही महात्म्य हमारे भक्ति मार्ग का है। तो ज्ञान और भक्ति दोनों को आपको इक्वल करना होगा। यह जो परमार्थ और व्यवहार को जैसे कि शंकराचार्य ने रिकंसाइल किया है तो यहां पे एक भक्ति और ज्ञान को रिकंसाइल करने की आवश्यकता है। दोनों योग मार्ग जो है दोनों साधन मार्ग जो है दोनों को एक ही पेडेस्टल पे रखना है। आप यह कहेंगे कि यह ऊपर है, यह नीचे है। ऐसा करके नहीं चलेगा। तो, यह हो गया एक प्रॉब्लम। एक क्वेश्चन। दूसरा है कि देखिए शंकराचार्य ने फिर भी तो परमार्थ और व्यवहार ऐसा करके दो डिवीजन किए हैं। सृष्टि जो है सृष्टि अपेरेंट सत्य मात्र है। अज्ञान की वजह जिस तरह से जो ईश्वर ब्रह्म प्लस माया इक्वल्स ईश्वर ईश्वर को जैसे एक स्टेप नीचे रख दिया है वैसे ही ब्रह्म प्लस माया इक्वल्स जगत जीव और जगत यानी जीव तो नहीं पर एटलीस्ट जगत को हम ले लेते हैं जीव और जगत दोनों वैसे तो यह सृष्टि है वो भी तो एक स्टेप नीचे है तो फिर यह जिस तरह से भक्ति मार्ग है उसका प्राधान्य ज्ञान मार्ग से कम हो जाता है। तो साथ में ही यह जो सेवा मार्ग है उसका प्राधान्य भी आपका प्योर ज्ञान मार्ग से कम हो जाता है। कर्म योग जिसको कहते हैं भक्ति योग और कर्म योग दोनों हम कहां पर करते हैं? भक्ति योग ईश्वर की ओर है। कर्म योग जगत की ओर है। लोगों की ओर है। किंतु यह ईश्वर और यह जगत यह दोनों जो है माया की प्रोडक्ट है। यानी कि यदि आपको निर्विकल्प समाधि प्राप्त करनी है। हाईएस्ट स्पिरिचुअल अटेनमेंट निर्गुण निराकार ब्राह्मण प्राप्त करना है तो यह भक्ति मार्ग और कर्म मार्ग आपके चित्त शुद्धि के साधन मात्र है। वह चित्त शुद्धि होने के बाद में आपको ज्ञान मार्ग में प्रवेश करना है और फिर जैसे ज्ञान मार्ग में प्रवेश किया फिर जो है आप निर्गुण निराकार ब्राह्मण की ओर जा सकते हैं। तो यह हो गया एक प्रॉब्लम शंकराचार्य का जो यह रिकंसिलिएशन है परमार्थ और व्यवहार ऐसे दो स्टेप बना दिए हैं। परमार्थ अर्थात की हाईएस्ट रियलिटी है। निर्गुण निराकार ब्राह्मण और फिर निर्गुण निराकार ब्राह्मण के साथ में माया ऐड होती है। तब यह व्यवहारिक जगत प्रकट होता है। व्यवहारिक जगत में आप जो कुछ भी करेंगे भक्ति मार्ग की साधना करेंगे। ईश्वर प्राप्ति के लिए कर्म योग्य की साधना करेंगे। लोगों को सहाय करने के लिए यह सब कुछ स्टेपिंग स्टोन है टुवर्ड्स दी परमार्थ। तो ये हो गया शंकराचार्य के साथ में एक प्रॉब्लम।
श्रीरामकृष्ण का ब्रह्म-शक्ति-अभेद वाद : ज्ञान और भक्ति का समन्वय
अभी देखिए कि ठाकुर कहां पर आते हैं। ठाकुर कहते हैं कि ब्रह्म और शक्ति अभेद अर्थात कि जब स्थिर है तब ब्रह्म है और जब कार्य करते हैं तो शक्ति है। अर्थात कि एक ही रियलिटी है। एक ही रियलिटी गियर चेंज करती है। कार है। कार को टॉप गियर में ले जाएंगे तो आगे जाएगी। न्यूट्रल गियर में बिठाएंगे तो स्टॉप हो जाएगी। रिवर्स गियर में ले जाएंगे तो पीछे चलेगी। कार एक ही है। गियर चेंज करते हैं। तो वैसे ही यहां पर सुप्रीम रियलिटी कहो ना कि अल्टीमेट रियलिटी कहो एक ही है। बस वही है कि वह गियर चेंज करती है। टॉप गियर में है कर्म करती है तो वह शक्ति है। न्यूट्रल गियर में है स्थिर है तो ब्राह्मण है। अर्थात किर जैसे ठाकुर उदाहरण देते हैं। सांप है। यदि कुंडली बना करके पड़ा है तो भी सांप है। तिर्यग गति से सर्पागार गति से चलता है तो भी सांप है। बाबू है। बाबू बैठे हुए हैं तो फिर बैठे हैं वही बाबू है। जब कर्म करते हैं ऑफिस में जाकर के तो भी वही बाबू है। अर्थात कि रियलिटी एक ही है। बस उसके मोड़ चेंज हो जाते हैं। तो फिर आप कहेंगे हाउ इज दिस पॉसिबल? कि सृष्टि के प्रारंभ में ब्रह्म स्थिर थे। फिर सृष्टि हुई। ब्रह्म कर्म करने लगे और फिर सृष्टि का अंत हुआ। यानी कि ब्रह्म फिर से स्थिर हो गए। क्या ऐसा है? ऐसा नहीं है। ब्रह्म और शक्ति दोनों एक साथ में पैरेलली एग्जिस्टेंट है। बट हाउ इज दिस इवन पॉसिबल? कि एक ही अब यह तो समझ गए कि सर्प जो है कुंडली बना करके बैठा है तभी सर्प है। चलता है तभी सर्प है। किंतु यह तो दो डिस्टिंक्ट फेस है ना। बाबू घर में बैठे हैं, स्थिर बैठे हैं। ब्रह्म है। ऑफिस में जाकर कर्म करते हैं। तब वो है कि वो वो भी वही बाबू है। घर में बैठे वही बाबू है। क्या एक ही बाबू एक साथ में दो कर सकता है कि घर में भी बैठे हैं। ऑफिस में भी है। कुंडली बना के भी बैठे हैं। सर्पागार गति से चल भी रहे हैं। दो कार्य क्या एक साथ में हो सकता है? मास्टर वहां से जैसे पूछते हैं सफेद दूध है। वो कभी काला दिखाई दे सकता है? नहीं। दूध सफेदी है। यानी यदि कुंडली बना करके बैठे हैं तो कुंडली बना करके बैठे हैं। सर्पाकार गति से चल रहे हैं तो सर्पाकार गति से कार है। टॉप गियर में है तो चल रही है। न्यूट्रल गियर में है तो खड़ी है। क्या दोनों एक साथ में हो सकता है? नहीं हो सकता। किंतु सृष्टि के साथ में तो ऐसा ही है। ब्राह्मण भी है, शक्ति भी है। निर्विकल्प समाधि में हमको ब्राह्मण साक्षात्कार होगा। निर्विकल्प समाधि से बाहर आ जाएंगे तो सृष्टि चलती हुई फरती हुई दिखेगी। एक साथ में दोनों मोड जो है एक साथ में दोनों एक्टिविटी है चल रहे हैं। हाउ इज दिस पॉसिबल? तो इसका जो सॉल्यूशन है मेरी दृष्टि से वो अभी हम कल उसको करेंगे डिस्कस। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु
प्रश्न: श्रीरामकृष्ण के “ब्रह्म-शक्ति अभेद” ने शंकराचार्य की उस समस्या का पूर्ण समाधान कर दिया, जिसमें ईश्वर को दूसरे स्तर पर रखा गया था। अब ब्रह्म और शक्ति दोनों समान स्तर पर हैं।
प्रॉब्लम यही है कि जल हिलता भी है, स्थिर भी है, एक साथ में है। हाउ टू अकोमोडेट दैट? चैलेंज यहां पे है। सांप चलता है तो भी वही सांप है, कुंडली बना करके बैठा है तो भी वही सांप है। प्रॉब्लम है कि सांप चलता भी है, कुंडली भी बना करके बैठा है। बोथ एट द सेम टाइम हो रहा है। दैट इज अ क्वेश्चन कि वो क्वांटम डायनेमिक्स दैट इज माय एक्सप्लेनेशन।
प्रश्न: अद्वैत-वेदांत और जातिवाद के बीच में डिफरेंस है ऐसा सोचा नहीं था
एक्चुअली क्या है ना देखिए शंकराचार्य और गपादाचार्य इन दोनों के बीच में क्लियर डिस्टिंशन फिलॉसोफिकली बहुत कम लोग करते हैं। तो वे लोग माने कभी-कभी अजातवाद में चले जाते हैं। जगत है ही नहीं। कभी-कभी व्यवहार्य उसका एक कर लेते हैं कि चलो व्यवहार में तो जगत है। खाना तो पड़ेगा ही। इवन तोतापुरी को भी खाना पड़ेगा। राइट? आप बिना आहार के कैसे रहेंगे? तो अब ठाकुर कहते हैं ना कि मुंह पे बोलने से क्या होगा कि कांटा नहीं है। कांटा नहीं लगा है। कांटा लगेगा तो दर्द तो होगा। जगत की व्यवहारिक सत्ता तो है। सो आपको तो स्वीकार तो करनी पड़ेगी। राइट? सो कॉन्शियसली अनकॉन्शियसली व्यवहारिक लेवल पर सभी लोग आ जाते हैं। तोतापुरी को तो मैंने इवन कि मां को स्वीकार किया। उससे पहले भी उनको जीवन धारण तो करना है। राइट? यदि सब जगत स्वप्नवत ही है तो आप खाना क्यों खाएंगे? कपड़े क्यों पहनेंगे? सोएंगे क्यों? म जो जीवन धारण करने के लिए जो है यानी कि शंकराचार्य ने उसको फिलॉसोफी का कपड़े पहनाए हैं। इन प्रैक्टिस एवरीवन व्यवहार करना है। यानी कि प्योर अजातवाद फॉलो करना इस अर्थ में कि जगत के साथ में मेरा कोई संबंध नहीं। कोई नाता नहीं। सिर्फ मैं ब्रह्मचर्य एथिक्स मोरालिटी का पालन करूंगा। इसके बेस पर मुझे ब्रह्म ज्ञान हो जाएगा। ऐसा देखना आई डोंट नो। पौहारी बाबा एक आप कह सकते हैं कि वह खाना भी नहीं खाते थे। पारी बाबा हिमसेल्फ नेवर आइडेंटिफाई हिमसेल्फ विद अजातिवाद। स्वामी जी ने उनके रिलेटेड यह शब्द कभी प्रयोग किया ही नहीं। ऊपर से वह उपासना करते थे। अग्नि की उपासना करते थे। सो वह तो पूरा आउट ही हो गया। अग्नि की उपासना क्यों करना है? वो खाना नहीं खाते तो अग्नि की उपासना क्यों करेंगे? यानी कि इसका जो प्योर एप्लीकेशन जो है ना आई डोंट नो कि देखने को मिलेगा कि नहीं मिलेगा। कॉन्शियसली सबकॉन्शियसली सभी लोग व्यवहारिक सत्ता एक्सेप्ट करते हैं। बोल के शंकराचार्य के लेवल पर सभी लोग आ जाते हैं। देखिए शंकराचार्य को यह जो प्रच्छन्न बौद्ध कहते हैं ना एक्चुअली शंकराचार्य इस नॉट अ प्रक्षन्न बौद्ध। इस अर्थ में कि सृष्टि है ही नहीं। शंकराचार्य इस अ प्रक्षन्न गड पादाचार्य गडपादवादी अजातवादी कि सृष्टि है ही नहीं इस अर्थ में वह है प्रच्छन्न बोध इज़ अ रॉन्ग वर्ड अबाउट हिम सो प्रच्छन्न अजातवादी विदेह मुक्ति विदेह मुक्ति निर्विकल्प समाधि हुई बस बात खत्म हो गई अब जगत में वापस आना ही
प्रश्न: एक पूर्ण अजातिवाद के साधक -- जैसे की गौड़पादाचार्य -- का जीवन कैसा होगा।
क्यों है डोंट नो उनका लाइफ किसको पता कैसा था हो सकता है कि पूर्ण ज्ञान होने के पहले लिखी हो नहीं इट विल बी वेरी इंटरेस्टिंग यदि कोई क्लेम करता है कि मैं पूर्ण अजातवादी हूं और फिर उसका लाइफ देखना इट वुड हैव बीन अ वेरी इंटरेस्टिंग स्टडी। मुझे ख्याल नहीं है कि ऐसा कोई है कि पूर्ण अजातवादी है। या ऐसा क्लेम करके कोई रहता है। आई डोंट नो मुझे नहीं पता।
प्रश्न: इन सब में करुणा कहां पर आती है
ना जब ठाकुर जब दोनों को इक्वल पेडेस्टल पर रखेंगे। अब जैसे देखिए विशिष्ट अद्वैत में यह प्रश्न ही नहीं है। ब्राह्मण ही परिणत होकर के जीव जगत हुए हैं। अर्थात कि लोगों को सहाय करना ब्राह्मण को ही सहाय करना है। यानी कि ब्राह्मण की उपासना करना ईश्वर के रूप में या तो फिर उनको कर्म योग के द्वारा लोगों को सहाय करना। बोथ आर ऑन ए इक्वल पेडेस्टल एज अ पाथ ऑफ अटेनिंग ईश्वर। राइट? तो वहां तो बहुत सहज है। तो सेम चीज यहां पे भी आ जाता है कि ब्रह्म शक्ति अभेद। राइट? तो वहां पर भी कर्म योग है, भक्ति योग है, ज्ञान योग है और आर ऑन इक्वल पेडेशनल। ठाकुर का जो ब्रह्म शक्ति अभेद है वहां पर प्रश्न एक ही है कि हाउ कैन वन थिंग बोथ बी ट्रू एट द सेम टाइम? यही एक प्रश्न है। अदर देन दैट ऑल द क्वेश्चंस आर सोल्वड बाय ब्रह्म शक्ति अभेद। आप ऐसा कैसे कहेंगे कि लोगों को सहाय करना वह एक स्टेप नीचे है क्योंकि ब्राह्मण ही जब कार्य करते हैं तो शक्ति है तो शक्ति ही तो एक रूप में एक तरह से कहे तो पूरा जीव जगत है तो करुणा भक्ति ये दोनों इक्वल पेडेस्टल टू ज्ञान क्योंकि ब्रह्म शक्ति अभेद म इक्वल पेडेस्टल पे आ गए हैं। शंकराचार्य का प्रॉब्लम था कि व्यवहारू परमार्थ दो स्टेप हो जाते हैं। यहां पे इक्वल पेडेस्टल पे दोनों आ जाते हैं। यानी कि ज्ञान, कर्म, भक्ति ये तीनों एक इक्वल पेडेस्टल पे आ गए। इसको हम देखेंगे पूरा डिटेल में कल हम देख आज आज मैंने फिर भी शंकराचार्य और तीन ट्रेडिशनल तक ही लिमिट रखा। टुमारो वी विल डिवोट आवर एंटायर टाइम टू ठाकुर। हाउ ठाकुर रिकंसाइल्स द होल थिंग। व्यवहार परमार्थ वाला स्टेपिंग है वह भी उड़ा दिया। माने व्यवहारू जगत और यह पारमार्थिक जगत इक्वल पेडेस्टल पे ले आए और साधन पद्धति का वो जो तारतम्य था हायरार्की था वो भी उड़ा दिया फ्लैट कर दिया साधन पद्धति ज्ञान हो भक्ति हो ना कि ज्ञान हो तीनों एक ही पेडेस्टल पे आ गए यानी कि ब्रह्म शक्ति अभेद से सब क्वेश्चन सॉल्व हो जाते हैं। बस एक ही क्वेश्चन रहता है कि हाउ बोथ कैन बी ट्रू टुगेदर वही है। उसका भी देयर इज़ नो म देयर इज़ नो सीक्रेट हियर क्वांटम डायनेमिक्स के थ्रू हम करेंगे ओम