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Sri Ramakrishna Kathamrita ·

श्रीरामकृष्ण कथामृत : दक्षिणेश्वर में भक्तों के साथ श्रीरामकृष्ण Sri Ramakrishna Hindi 7 June 2023

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टहले ठाकुर मनी के साथ में बातचीत हो रही है और मनी यानी की मास्टर महाशय मास्टर महाशय अपने कुछ छिपने के लिए इस तरह से मनी है मोहिनी मोहन है यह सब नाम उसे कर रहा है तो मास्टर महाशय गुरु को पूछ लेना चाहिए की सब संदेह का क्लियर हो जाए की यदि संसार में रहना वो क्या गलत है की नहीं है यदि संसार में रहे तो धन अर्जन करना गलत है की नहीं है तो ठाकुर ने क्या कहा की धन अर्जन करना जो है वो कोई बुरी चीज नहीं है मैन देखिए वैसे तो सन्यासी और संसारी दो संसार और सन्यास दो मार्ग है तो सन्यासी के लिए तो ऑफ कोर्स धन अर्जन का कोई प्रश्न नहीं आता किंतु यदि संसार दिया है किंतु यदि संसार किया है तो जो है धन के बड़े में आपको सोचना चाहिए तो इसीलिए आपने देखिए की ठाकुर क्या कहते हैं की धन अर्जन कर सकते हैं यदि वो विद्या के संसार के लिए हो यह शब्द जो है ठाकुर बार-बार कथामृत में उसे करते हैं विद्या का संसार और अविद्या का संसार और यह बड़ा ही इंपॉर्टेंट कॉन्सेप्ट है विद्या का संसार अच्छा अविद्या का संसार का क्या अर्थ है यदि सबसे पहले देखते हैं तो ये इस तरह का एक फैमिली इस तरह का एक कम्युनिटी इस तरह का एक सोसाइटी या तो फिर एक तार इस तरह का एक देश जो की अपने को इस जगत में अपना प्रभाव विस्तार करना चाहता है जैसे देश के बड़े में कहा जाए तो हमारे पास में यह जो हिटलर का वह जो जर्मनी है या तो फिर वह जो स्टालिन का रसिया है या तो फिर यह जो का चीन है या फिर एवं पाकिस्तान है यह सब देश का उदाहरण हमारे पास में है उनको मिलिट्री पावर उसे करके दूसरों की जमीन को हड़प करनी है ये जो दूसरों की जमीन ले लेना दूसरों को अपनी जमीन से भाग देना और मैन दूसरों का धन जो है वो किसी भी तरह से वो इलीगल मिंस से वो धार्मिक रास्ते से दूसरों का धन जो है उसके ऊपर में कब्जा जमा लेना ये सब जो वृत्ति रहती है वो जो सोसाइटी का हो की फैमिली कहो की नेशन कहो राष्ट्र कहो वो जो है अविद्या का संसार कहा जाता है तेरे ग्राम से खुद ही राम को चले जाना पड़ा अपने वो एन्सेस्ट्राल जमीन थी मूर्ख की जमीन थी आप दादा उनकी जमीन थी जहां पर वे लोग रहते थे इतना उनका घर था उनका फैमिली था सब कुछ उनको छोड़ना पड़ा क्यों जमींदार ने कहा की आपको मेरे मुझे शुरू करने के लिए आपको एक गलत जो है वह साक्ष्य देना पड़ेगा कोर्ट में जाकर के आपको एक गलत बात कहानी पड़ेगी कोर्ट में की हां वो जमींदार जो है वो सही है और दूसरे जो आदमी है वो गलत है अभी क्या है की खुद ही राम का ऑलरेडी सत्य के प्रति जो निष्ठा है खुदीराम का जो धार्मिक जीवन है खुदीराम की जो यूनेस्टी है वो सबको पता थी एवं जज को भी पता होगी तो वो यदि देखेंगे की हां खुदीराम ने इस तरह से सबूत दिया है खुद ही राम ने स्वयं यदि इस तरह से साक्षी दी है तो वो तो जमींदार सही ही होगा तो इस तरह से जमींदार ने खुदीराम के ऊपर में प्रेशर डाला खुद ही राम कौन ठाकुर के पिता जी तो खुदीराम के ऊपर में इस तरह से प्रेशर डाला तो खुद ही राम ने का दिया की नहीं मैं यदि अपने मैन क्या है की पहले तो प्रलोभन देते हैं ना की हां तुम मेरे बड़े में इस तरह से झूठ बोलोगे जिससे की मुझे लाभ होगा तो मैं तुमको भी कुछ सामने दे दूंगा या तो पैसा दे दूंगा या तो जमीन दे दूंगा ऐसा कुछ महत्व कोई पोस्ट दे देंगे तो क्या है की प्रलोभन तो सबसे पहले दिया जाता है खुदीराम प्रलोभन से नहीं मैन होंगे तब कहानी जाकर के धमकियां देनी शुरू की तो इससे भी नहीं डेयर किंतु क्या है की फिर फैमिली को लेकर के र रहे हैं जमींदार के साथ में झगड़ा करके गांव में कितने दिन रहेंगे वो तो ऐसा हो गया ना की पानी में रहना और मगरमच्छ के साथ में बर वह कैसे रहेंगे इतना तो आप इसके साथ में तो जो है वो तेरे ग्राम छोड़कर के कम और कुकर ए गए तो सत्य निष्ठा के लिए उन्होंने जो है की अपने कितना कष्ट सहन किया तो खुद ही राम का संसार हुआ विद्या का संसार की प्रलोभन या तो भाई ये दोनों चीजों से उन्होंने डर करके या तो फिर वो मो में पढ़कर के सत्य का रास्ता ना छोड़ तो उनका जो पूरा फैमिली है उन्हें सिर्फ खुदीराम नहीं चंद्रमणि देवी फिर जो रामकुमार रामेश्वर तो शायद उसे समय थोड़े से बड़े होंगे तो क्या है की इनको ये सब त्याग करके आना है तो पूरा फैमिली का तो सपोर्ट चाहिए ना तो ये पूरा फैमिली वो हो गया विद्या का संसार वो जमीन डर जो है अपना वो कुछ ना कुछ अपनी प्रतिष्ठा के लिए या तो धन वैभव के लिए एक अच्छे एक गरीब ब्राह्मण को एक निष्ठावान ब्राह्मण से झूठ बुला रहा है तो वो तो अयोध्या का संसार हो गया उसका तो इस तरह कोई भी देश है कोई भी राष्ट्र है कोई भी समाज है कोई भी फैमिली है गलत रास्ते से धन उपाय धनोपाजर्न करना चाहता है धन का उपार्जन करना चाहता है वो अविद्या के रास्ते पे चल रहा है और जो सत्य के रास्ते पे चल करके सत्य निशीथ होकर के ये जो धन प्राप्त करते हैं उनको विद्या का संसार कहते हैं भगवान राम ने विभीषण को कहा जब युद्ध समाप्त हो गया रावण का वध हो गया राम ने विभीषण को कहा अभी तुम लंका के राजा बन जो तो विभीषण ने कहा अरे भगवान राम मैं तो आपका सेवक हूं कहां मैं आपके साधना करूंगा ना की कहा मैं ये राज्य संभल लूंगा राज्य संभालना मैन की कितना दुनिया भर का वो झंझट सहन करना पड़ता है मेरे से ये सब होगा नहीं मैं तो वो भी अशोक वटी हूं हमें जाकर के चुपचाप बैठ करके आपका नाम स्मरण करता रहूंगा उसे समय भगवान राम ने क्या कहा था विभीषण तुम मूर्ख के लिए राजा बानो देखिए कितना सुंदर बात है मूर्ख के लिए राजा बन्ना क्यों मूर्ख के लिए राजा बन्ना लोग ऐसा बोलेंगे की अरे विभीषण ने राम का इतना नाम लिया राम के इतने भक्ति हैं राम के इतने शरणाग है तो फिर इतनी राम की भक्ति करके आखिर में क्या मिला वो बूढ़े हो करके वो लांग वो अशोक वाटिका में बैठकर के बूढ़े होकर के वो देहात त्याग कर दिया यही उनको मिला लोग तो यह नहीं देखते भीतर में जो सोना पड़ा हुआ है भीतर में जो आपका वो जो ईश्वर प्रताप का वो जो स्नेक आनंद जो है दिव्या ज्योति जो है वह प्रज्वलित हो रही है हृदय में लोग तो मूर्ख लोग तो यह देखते नहीं है तो इसलिए राम ने कहा की तुम मूर्ख लोगों के लिए राजा बानो तो मूर्ख लोगों को पता चलेगा की हां मेरी भक्ति करके तुमको राज्य मिला है तो इस तरह से ऐसा नहीं है की भगवान राम ने यह का दिया की चलो मेरे शिष्य हो तो सबको राज वगैरा छोड़कर के ये जो भगवान कृष्णा ने क्यों महाभारत का युद्ध करवाया जो पांडवों को कहा की अपनी जमीन अपना हक अपना जो राइट है उसके लिए युद्ध करो अपने ये जो पितराई भाई है आपके जो पितामह है आपके जो गुरु है आपकी ये जो भाई है उनके साथ में युद्ध करो पूरा फैमिली में युद्ध आपस में झगड़ा लगता दिया कृष्णा ने क्यों ऐसा किया की धर्म के रास्ते पे चलते हैं तो आपको इस तरह से कष्ट सहन क्यों करना पड़े मैन कष्ट सहन कीजिए साधना के लिए किंतु साथ-साथ में ही यदि धार्मिक रास्ते पर चल करके खासकर के ये गुरु हस्त लोगों के लिए है धर्म के रास्ते पर चलकर के यदि आप राज्य प्राप्त कर सकते हैं तो उसको प्राप्त करके उसका कोई गलत मैन राज्य प्राप्त करना कुछ गलत नहीं है हां ये जो धन प्राप्त किया वैभव प्राप्त किया राज्य प्राप्त किया उसके साथ में फिर आपको क्या करना है वो बहुत बड़ी बात है रावण था या तो फिर ये जो ये ध्रुव तारा था या तो फिर दुर्योधन था ये लोग ये कंस था वे लोग राज्य प्राप्त करके क्या करेंगे प्रजा का शोषण करेंगे और अपना भोग विलास में दुबे रहेंगे अपनी भौतिक सुख सुविधाओं की वृद्धि करते जाएंगे और उनकी जो प्रजा है वो धीरे-धीरे गरीब होती जाएगी उनको कष्ट में पढ़ने जाएंगे तो इस तरह यह तो अयोध्या का हो गया उनका संसार यदि भगवान राम की कृपा से राज्य मिला है तो राज्य अपने खुद के भूख संभोग के लिए नहीं है हम मूर्ख के लिए आप राजा हो गए के रास्ते पर धर्म का पालनपुर करने के लिए धर्म की प्रतिष्ठा करने के लिए विभीषण है की फिर यह जो पांच पांडव है उनको राज्य मिला किंतु राज्य का क्या करेंगे तो प्रजा की रक्षा करेंगे प्रजा का ललन पालनपुर करेंगे प्रजा का पोषण करेंगे तो धन वैभव अपने लिए नहीं मिला उन लोगों के लिए कल्याण के लिए मिला है जगत हटाया के लिए मिला है इसीलिए जो ठाकुर की ये जो रसद्दार थे माथुर बाबू थे की ये शंभू मालिक था वे फिर ये जो सुरेश मित्र था फिर ये जो बलराम बाबू थे फिर ये मैन पैसा वगैरा तो सब लोग बीच-बीच में देते ही रहते थे मास्टर महाशय एक बार वो धोती और कुर्ता लेक आए थे फिर गिरीश घोष जो है बीच-बीच में कुछ-कुछ दे दिया करता था तो ये क्या है की आप धन जड़ी अर्जन करते हैं तो अर्जुन करना कोई बुरी बात नहीं है मूर्ख के लिए धन अर्जन करना चाहिए जैसे की भगवान राम कहते हैं यदि संसार है तो किंतु फिर उसका सादव्या होना चाहिए उससे उसे धन से ईश्वर की भक्ति के लिए ईश्वर के जो सड़क ईश्वर के जो अनुयाई है जो भक्ति है साधु संत है उनकी सेवा के लिए और जो गरीब है जो की पद्दलित है जो की समाज से बिछड़े हुए हैं उनकी सेवा करने के लिए उनके कल्याण के लिए ये धन इस्तेमाल होना चाहिए तो ये हो गया विद्या का संसार और अयोध्या का संसार की दूसरों को कष्ट देखकर के दूसरों को एक्सप्लोइट करके धन अर्जन किया उनकी संपत्ति हड़प कर ली और फिर वो जो अर्जन किया हुआ धन से दूसरों का और भी ज्यादा शोषण करेंगे और अपनी खुद की भौतिक सुख सुविधा बड़ा दे जाएंगे ये हो गया अयोध्या का राज्य या तो फिर विद्या का परिवार या तो फिर अविद्या का समाज या तो फिर अविद्या का संसार तो इस तरह से ठाकुर यहां पर एकदम क्लियर दो हमको बताते हैं की संसार में किस तरह से रहना है क्या बात हुआ फिर से एक बार पढ़ लेते हैं मास्टर महाशय कहते हैं जी हां अच्छा पहले ठाकुर कहते हैं कर्मन निष्काम करना चाहिए ईश्वर चंद्र विद्यासागर जो कर्म करता है वे अच्छे हैं वह निष्काम कर दें कर्म करने की चेष्टा करता है तो मनी कहते हैं जी हां अच्छा जहां कर्म है वहां क्या ईश्वर मिलते हैं राम और कम क्या एक साथ र सकते हैं तो राम और कम राम और राज्य एक साथ र सकते हैं विभीषण के बड़े में हमने देखा राम और कम क्या एक साथ र सकते हैं हिंदी में मैंने पढ़ा है की जहां कम कहां राम नहीं जहां राम नहीं कम अर्थात ये क्या है फिर साधकों के लिए है जैसे नरसिम मेहता है जैसे की मीराबाई है जैसे भगवान कृष्णा चैतन्य है जैसे भगवान शंकराचार्य है जैसे भगवान राम कृष्णा है या तो फिर जैसे की रामकृष्ण मिशन के जो सन्यासी है या तो फिर जो अच्छे अच्छे संस्थाओं के जो सन्यासी होते हैं हमारी जो परंपरागत जो साधु सन्यासी साधु संत संप्रदाय जो सड़क गण है उनके लिए यह बात ठीक है की चलो अर्थ जो है धन जो है उसका मिनिमम अपने पास में रखें अपना जीवन निर्वाह करने के लिए जो चाहिए उतना रखें बाकी का सामग्र जीवन जो है प्रतिक्षण अपने दिन की जाप करते-करते बीता दे बस चाहे जैसे सांस चलती है साथ-साथ में जब चले त्रिगुणा तीतानंद जी की बात है सुंदर बात है वह नगर में एक बार उन्होंने प्राण कर लिया और उन्होंने एक वचन उन्होंने एक प्रॉमिस कर दिया अपने को की हां मैं अभी अखंड जाप करूंगा अखंड जाप करने के लिए अभी वराह नगर मठ अपने देखा होगा नहीं देखा है किंतु उसका वर्णन पड़ा है तो ग्राउंड फ्लोर पूरा जो है जंगल जैसा था वहां तो वह पशु में एशिया कुत्ते वगैरा भी रहते थे और फर्स्ट फ्लोर में जो है वह था और वह कुछ घूम रहे थे तो यह जो ग्राउंड फ्लोर पर जहां पूरा जंगल जैसा है तो त्रिगुणा तीता नानजी चले गए और अखंड जाप करना शुरू कर दिया और इस तरह से प्राण लिया इस तरह से वचन लिया की बस अभी मैं अखंड जब नहीं छोडूंगा जब तक ईश्वर ठाकुर का दर्शन ना हो जाए या तो फिर ठाकुर को जी तरह से ये सब एक के बाद एक मां काली के भगवान राम के महावीर के जो दर्शन होते थे मुझे ऐसा ना हो जाए ऐसा मैं अखंड जाप करूंगा अखंड जब करने की शुरुआत कर दी अभी अखंड जब करने के साथ से प्रॉब्लम क्या है की आपको भजन नहीं कर सकते जैसे ही पानी पीने का पर्यटन किया तो वैसे ही आपका जब जो है उसमें विराम ए गया जब जो है उसे फिर हो गया उसे क्षण के लिए यदि आप भजन करेंगे आहार ग्रहण करेंगे तो भी हर भी नहीं ग्रहण करेंगे कर सकते हैं की जैसे ये आहार ग्रहण करने की शुरुआत की तो आपकी जीव जो है वो ईश्वर का नाम लेने की बजे आहार ग्रहण करने में वो व्यस्त हो गए वो कथामृत में एक सुंदर कहानी है ना एक कौवे हम देखते हैं राम और लक्ष्मण जा रहे जंगल में उसको बहुत प्यास लगी है और नदी के किनारे बैठा है और नदी के किनारे प्यास लगी है तो धीरे-धीरे करके वो नदी के पास जाता है अपनी कोंच डूबने का पर्यटन करता है पानी पीने के लिए किंतु पानी पीने की बजे वो फैट करके वो अपनी कोंच को बाहर निकाल लेट है फिर से वो दूर चला जाता है और ऐसा कितनी बार हुआ प्यास लगी है किंतु पानी नहीं पी रहा है और कष्ट से बेचारे को एकदम जान जान की अवस्था ए गई है तो लक्ष्मण ने राम को पूछा की अरे बड़े भैया ये कौवा क्या पागल हो गया है वो प्यास लगी है यहां नजर के सामने पानी है तो पानी क्यों नहीं पी रहा तो राम ने कहा देखो वो अखंड जाप कर रहा है और जैसे ही पानी पीने की शुरुआत करेगा जब मैं विराम हो जाएगा अखंड जब टूट जाएगा इसलिए डे जान का समय ए गया है अवस्था हो गई है किंतु फिर भी पानी नहीं पी रहा है देखिए कौवा ऐसा कर रहा है तो त्रिगुणा यदि कौवे की ऐसी प्रतिज्ञा होगी तो त्रिगुनंदन जी की तो क्या बने वो किस तरह के वो अलग अपने प्रतिज्ञा में रहेंगे तो अखंड जब किया ही जा रहे किया जा रहे अभी सब गुरु भाई लोग परेशान हो गए खाने का समय ए गया है और वरंगर की बात सनी हो तो पता होगा की शशि महाराज जो है सबकी मां जैसे थे ठाकुर की सेवा भी करते थे गुरु भाइयों की सेवा भी करते थे गुरु भाई जब एकदम तपस्या में मगन हो जाते थे तब हाथ पकड़ पकड़ कर के उनको खाने के लिए बुला के लेक आते थे और वहां जल्दी नहीं आएंगे तो जोर से मुंह खोल के मुंह में जो खाना दाल देंगे इस तरह से शशि महाराज ने रामकृष्ण संज्ञा वास्ता में संघ को पोषित किया है संघ का पोषण किया है तो राम को शशि महाराज एकदम टेंशन में ए गए परेशान नहीं होगा परेशान हो गए की अरे यह त्रिगुणा तीता नानजी जड़ी भजन नहीं करेंगे तो देहात त्याग कर देंगे तो अभी उनको तो सबके साथ में रहना है उनके साथ में गैप नहीं लगाएंगे उनके साथ में वो बीच-बीच में झगड़ा है वगैरा नहीं होगा तो कैसे कम चलेगा वरना अगर मठ में बहुत झगड़ा वगैरा बीच-बीच में होता था क्या सब लोग तो यंग एकदम वो खली तलवार की तरह है ना प्रदीप शिखा की तरह सबका वो जो आइडियल है इतना तीव्र था की आइडियल के सामने यदि कोई भी कुछ भी बोल ले शशि महाराज पिताजी उनके आए हैं उनको ले जान के लिए ठाकुर के पास शशि महाराज र रहे हैं ठाकुर की सेवा करने के लिए तो पिताजी आए हैं शशि को लेने के लिए चलो शशि तुम घर चलो वापस ये क्या एक बूढ़े पगले मामून की तुम सेवा कर रहे हो वो क्या है वो मूर्ख आदमी है अनपढ़ है काली का पुजारी है किस तरह से तुम्हारा ब्रेन वॉश कर दिया है जैसे ही शशि महाराज ने यह बात सनी पिताजी की अभी पिताजी के ऊपर में कितनी श्रद्धापट्टी कितने सुसंस्कार थे ना इस लड़कों के इसीलिए तो ठाकुर के पास आए थे इतने संस्कार नहीं रहेंगे तो ठाकुर के पास कैसे आते पिताजी की भक्ति करना माताजी की सेवा करना गुरु जनों को आदर्श हनुमान सत्कार देना यह सब तो उनके हृदय में पहले से ही था जन्म जन्म अंतर से था बोलकर के तो ठाकुर के पास आया किंतु पिताजी के प्रति इतनी श्रद्धा भक्ति होने के बावजूद जैसे सुना की अपने पिताजी ठाकुर की निंदा कर रहे हैं तो सीधा खड़े होकर के उनको करने को गए टाबर साला अमर गुरु निंदा कोशिश पिताजी को बोल दिया अरे साले तुम मेरे गुरु की निंदा कर रहे हो तो क्या है की इन लोगों का आइडियल इतना तीव्र था की किसी की बात नहीं मानेंगे जब भी वो आइडियल के ऊपर में आदर्श के ऊपर में बात आपके अट जाएगी और वरना अगर मठ क्या है की अपने संघ की शुरुआत थी तो संघ का क्या आदर्श होना चाहिए संघ किस पद्धति से कम करना चाहिए उसके बड़े में डिस्कशन होता था उसमें बहुत सारे मतभेद भी होते थे और फिर आखिर में तो क्या है ठाकुर के संतान है साथ में मिल बैठ करके मत भेज दूर कर देते थे किंतु जब इंस्ट्रूमेंट होता था तब इस आर्गुमेंट होता था की जैसे बाहर में कोई खड़ा हो तो उसको ऐसा लगेगा जैसे भीतर में युद्ध हो रहा है ऐसे जोर जोर से चिकन चिल्लाना हाथापाई भी हो जाति थी शशि महाराष्ट्र ठाकुर की सेवा करते थे इतनी झन लगा करके तो स्वामी जी को पसंद नहीं ए रहा था कहां की अरे हम तो वेदांती है हम तो अद्वेती है तो इस तरह से तुम ये जो इतना जो इतना ज्यादा बड़ा चड्ढा करके जो ठाकुर की पूजा कर रहे हो वो ठीक नहीं है हमारे लिए बाद में यदि मां लो की हमारा तो कुछ ठीक नहीं है यहां रहे कहां रहे कहां चले जाएंगे तुम यदि यहां पे नहीं रहोगे स्वामी जी शशि महाराज को का रहा है तुम जल्दी यहां पर नहीं रहोगे तो फिर ठाकुर की सेवा तुम्हारी तुम जितनी निष्ठा के सहित करते हो उतनी निष्ठा के सहित और कौन करेगा दूसरी बात है की यदि निष्ठा से जेबी सेवा करने का प्रारंभ किया और यदि उसे सेवा में यदि ए गया तो सेवा अपराध होता है वो बड़ा ही डेंजरस है चलो आत्माराम का कोटा आत्माराम का जो कलश जिसमें की ठाकुर की हड्डियां भारी हुई थी ठाकुर के जो अस्थि थे अस्थि रखें हुए थे तो अस्थि जहां पर जी वह कलश में रखें थे स्वामी जी उसको आत्माराम का कलश करके पुकारते थे तो आत्माराम की पूजा जो है इतनी निष्ठा के शाहिद जब प्रारंभ की है तो वो तो हमेशा के लिए चलनी चाहिए यदि उसे सेवा में व्याघात ए गया अभी हम लोग हैं हम लोग शायद कर लेंगे दूसरे लोग कर पाएंगे की नहीं कर पाएंगे तो यदि सेवा अपराध हो गया तो पूरा संघ जो है नष्ट हो जाएगा ठाकुर की सेवा में अपराध हुआ तो ठाकुर की सेवा करके ही तो संघ का गठन हुआ है ये लड़के लोग इकट्ठा हुए हैं सेवा ही जो है वो केंद्रीय बिंदु है ठाकुर की सेवा और मां का प्रेम माया भालोबासा तो है संघ का आधार जिसके ऊपर में संघ खड़ा है तो अभी ठाकुर की सेवा में यदि हो गया सेवा में विराम हो गया तो पूरा सॉन्ग नष्ट हो जाएगा तो स्वामी जी अपने दृष्टि से ठीक है और शशि महाराज अपनी दृष्टि से ठीक थे की नहीं जिसके नाम पर संसार त्याग किया है जिसके नाम पे सन्यास ग्रहण किया है उसकी सेवा नहीं करेंगे तो यह बैठकर के बाकी सब लोग जो तपस्या कर रहे हैं उसका क्या अर्थ है ऐसा उनका मानना था तो दोनों में ऐसा एक बार झगड़ा हो गया तो स्वामी जी ने एक बार का दिया की अरे हम लोगों को खाने के लिए रोटी भी नहीं मिल रही है और तुम अपने ठाकुर को लुची खिलाओगे लुची अर्थात पुरी वो जो मेड की बंटी है तो अपने ठाकुर को लुची और पिक्स का भोग डॉग मैन अर्थ खीर और ठाकुर को तुम इस तरह से खाना खिलाओगे और हम लोगों को रोटी भी नहीं मिल रही हालांकि ये बात है की जो भूख डराया गया ठाकुर को प्रसाद के रूप में फिर गुरु भाई ही ग्रहण करेंगे किंतु स्वामी जी का जो कहना था की ये सब चीजों के पीछे की हमको यह भोग देना है तो उसकी तैयारी करना कहां हम लोग भिक्षा करके खाना जुगाड़ करते हैं और तुमको ठाकुर सेवा की फिक्र रहे तो ऐसा करके एक भी और स्वामी जी गुस्से में आकर के ठाकुर के जो गर्भाग ठाकुर घर जो था वह नगर मठ में जहां पे अस्थि कलश रखा था और जहां पर उनका फोटो रखा था उनकी छवि राखी थी तो वो उसे वहां पे जान लगे और खाने लगे जोर जोर से चिल्लाकर के मैं तुम्हारे अमित तुम्हारे ठाकुर के फाइल थी तुम्हारे अब्दुल क्या मैं एक देता हूं मैंने अर्थात वो फोटो जो है वहां से हटा लेंगे तो अभी क्या है ऐसा नहीं है की स्वामी जी तो ऐसा कुछ करेंगे वो टेस्ट करना चाहते थे की शशि महाराज की निष्ठा कितनी प्रबल है क्योंकि एक बार सेवा आरंभ की है तो वो चलनी ही चाहिए तो ऐसा टेस्ट करने के लिए स्वामी जी ऐसा बोल रहा है और शशि महाराज का वो जो गुस्सा एकदम वो गुस्से में ए गए उनका वो टेंपर एकदम हाय हो गया जाकर के दौड़ करके गए स्वामी जी को धक्का मार के जमीन पर गिरा दिया उनके बाल पकड़े और बाल से खींच कर के ठाकुर घर से बाहर ले आए बोला तुम भीतर में जाओगे तो देखा हूं तुम कैसे जाते हो अभी दोनों पहलवान है दोनों वो कुश्ती का अब उसे करते थे तो कौन किस मैन वह जब यदि सही में वो जो मारपीट हो जाति तो कौन जीता कहना मुश्किल है किंतु वो लाटू महाराज वहां पे बैठे थे तो एकदम नाराज हो गए और अपनी वो जो बिहार जो शैली है बिहार स्टाइल में बात करने का वो बोलने लगेगा अरे तुम लोग क्या है ठाकुर के नाम पे ये सब कर रहे हो ये वो सब वो स्वामी जी जोर से हंस दिए थे स्वामी जी टेस्ट कर रहे थे शशि महाराज की निष्ठा कितनी है किंतु यह सब होता राहत था तो देखिए की अभी आ शशि महाराज की इतनी निष्ठा गुरु भाइयों को खिलौने की उनका ललन पालनपुर करने की उनका पोषण करने की ये लोग आइडियल जिनका इतना स्ट्रांग होता है तो केयर भी प्रेम भी इतना स्ट्रांग भी करते हैं तो यहां पे त्रिगुणा तीता नानजी जो है वो अखंड जाप कर रहा है अभी आहार नहीं कर का रहे तो अभी क्या होगा शशि महाराज बड़े चिंता में पद गए तो वो सब गुरु भाइयों ने जाकर के त्रिगुणा जी के पास में बैठ गए कहा अरे भाई तुम यदि आहार ग्रहण नहीं ओके तो यह हमारा इतना सुंदर संसार है कभी-कभी हंसी मजाक चलती है कभी मारामारी चलती है कभी झगड़ा झाड़ ही चला है किंतु यह जो विद्या का संसार है टूट जाएगा तुम इतना जल्दी चले जाओगे तो फिर त्रिगुणा तथा ना जी वो एग्री हो जाते हैं राजीव हो जाते हैं आहार ग्रहण करने के लिए किंतु क्या कहते हैं मैन क्या ठीक करते हैं इशारों इशारों से बता देता है की महापुरुष महाराज शिवानंद जी महाराज उनके पास में बैठेंगे और त्रिगुणा टीटा नानजी महाराज जो है उनको स्पर्श करके रहेंगे अभी महापुरुष महाराज की आध्यात्मिक शक्ति इतनी थी की यदि त्रिगुणा तीतानंद जी उनको स्पर्श करके आहार ग्रहण करते हैं तो वो अखंड जब जो है उसमें विराम नहीं होगा क्योंकि वो महापुरुष महाराज उसे स्पष्ट किया हुए हैं महापुरुष महाराज के भीतर में ये अविराम जाप जो है वो सतत चला ही राहत है तो उनको स्पर्श करके यदि अपने खुद के जाप में यदि उनकी जफा जो है वह जाप करने में विराम लेती है आहार ग्रहण करने के लिए तो वो जब भांग नहीं होगा वो जब चला ही रहेगा तो ऐसा ठीक हुआ महापुरुष महाराज जी ने उनके डे को स्पष्ट किया एक हाथ से और दूसरे हाथ से आहार ग्रहण करने लगे तो देखिए यह जो है वो था विद्या का संसार अभी हालांकि ये बात हो गई है किंतु संसार हो ना की सन्यास हो एक निष्ठा जब ए जाति है तब जो है पैसों की या धन की यह सब लालसा या स्पृहा नहीं रहती किंतु यदि धन अर्जन भी करना चाहे तो भी उसमें गलत नहीं है यदि लोक कल्याण के लिए किया जाए जो की आज रामकृष्ण मिशन आज वराह नगर मठ देखिए और आज का बेलूर मठ देखिए कितना बड़ा डिफरेंस है वह अगर मठ में यदि एक दिन भिक्षा नहीं मिलती तो आपको उसे दिन का खाना नहीं चुकता और बैलून मटका आज का जो स्थिति है की पूरे वर्ल्ड वाइड हम लोग रिलीफ एक्टिविटी करते हैं कितने कितने लोगों को हमारे हॉस्पिटल में हमारी डिस्पेंसरी में कितने रोगियों की सरवर होती है सेवा होती है कितनी स्कूल कॉलेजेस है जहां पर कितने सारे विद्यार्थियों को जो है अच्छे से पढ़ाई लिखी सिखाई जाति है संस्कार दिए जाते हैं अभी रिसेंटली ही मुझे तो नहीं पता था वह कोलकाता से प्रोटीन ने मुझे फोन करके बताया की अपनी वह जो नरेंद्रपुर कॉलेज स्कूल है या तो फिर राडा किसको है तो वहां का वो जो रिजल्ट आया बोर्ड का उसमें टॉप टेन में से ना की साथ आठ स्टूडेंट जो है वो अपने रामकृष्ण मिशन के हैं तो ये बात सुनकर के मुझे तो बड़ा अच्छा लगा की चलो ठाकुर के नाम पे ये प्रतिष्ठान जो आरंभ हुए हैं वो ठीक ठीक सेवा अभी तक तो कर ही रहे हैं तो धन अर्जन जो अभी हो रहा है वो लोक कल्याण के लिए हो रहा है तो वराह नगर मठ भी सही था अपनी जगह पे की यदि आपने जी जान लगा दिया ईश्वर को प्राप्त करने के लिए और धन को समर्पित धन को विसर्जित कर दिया तो वो भी एक रास्ता है और यदि धन अर्जन कर रहा है तो लोक कल्याण के लिए तो यह भी एक रास्ता है दोनों रास्ते सही है गलत कुछ नहीं है इसलिए किंतु यह जो मास्टर महाशय पूरा वो अपने संदेह क्लियर कर देना चाहते हैं की नहीं कर रहा है तो मनी कहते हैं जी हां अच्छा हिंदी में पड़ा है जहां कम था राम नहीं जहां राम नहीं कम तो ठाकुर कहते हैं कर्म सभी करते हैं उनका नाम लेना कर्म है सांस लेना और छोड़ना भी कर्मे क्या मजाल है की कोई कर्म छोड़ दे इसलिए कर्म करना चाहिए किंतु फल ईश्वर को समर्पित कर देना चाहिए तो मास्टर महाशय अभी एकदम इंपॉर्टेंट क्वेश्चन करते हैं एकदम क्रिस्टियल क्वेश्चन क्या इसी चेष्टा की जा शक्ति है जिससे की अधिक धन मिले तो ठाकुर कहते हैं हां की जा शक्ति है किंतु यदि विद्या का संसार हो विद्या का परिवार हो तो अधिक धन कमाने का पर्यटन करो परंतु सदुपय से उद्देश्य उपार्जन नहीं ईश्वर की सेवा है धन से यदि ईश्वर की सेवा होती है तो उसे धन में दोष नहीं है देखिए यह जो तीन-चार लाइन है इसको हम इतने में ही पूरे रामकृष्ण व्यक्ति जो फिलासफी है ठाकुर ने दे दी है सिर्फ रामकृष्ण संघ नहीं ये जो पूरा रामकृष्ण परिवार है साधुओं के सन्यासी हम सबके लिए संसार में धन के साथ में हमको क्या करना चाहिए ठाकुर ने बता दिया है हमारे में से बहुत सारे साधु क्या करते हैं की उनको लगता है की मुझे मिशन में नहीं रहना चलो मैं बाहर जाकर के कहानी हिमालय में जाकर के या तो फिर नर्मदा के किनारे छोटी सी कुटिया बनाकर के जब ध्यान करता हूं मुझे यह जो सब इतना जो कर्म जो है मिशन में किसी किसी को पसंद नहीं आता वे लोग चाहते हैं मैं वेदांत का अभ्यास करूंगा और बस जब ध्यान करूंगा तो उनका भी रास्ता सही है और मिशन में जो हम लोग साधु रहते हैं हमारे पास में यह जो बिल्डिंग से ये इंफ्रास्ट्रक्चर है ये बैंक बैलेंस है जो सर्विस एक्टिविटी है ठाकुर की जो सेवा है भक्तों की जो सेवा है ये भी एक रास्ता है और संसार में रहकर के यदि आप कहते हैं की मिनिमम जो है वो मतलब झंझट हम रखेंगे बाकी दिन भर जो है हम त्याग तपस्या और ईश्वर की सेवा लेकर रहेंगे वो भी एक है और यदि धरो पर जान करना चाहते हैं सब उपाय से ठाकुर ने कहा है सदुपय से तो वो भी गलत कुछ नहीं है प्रोवाइड की जो धन का अर्जन किया है वो साधु संतो की गरीब लोगों की सेवा में लगे तो आज यही तक कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति