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Sri Ramakrishna Kathamrita ·

श्रीरामकृष्ण कथामृत || 9 Dec 1883 - श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ दक्षिणेश्वर में || 5 Mar 2025

प्रार्थना

ओम स्थापक यच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः श्री राम कृष्ण कथामृत श्री म लिखित इसका हम पाठ कर रहे थे चैप्टर का नाम है दक्षिणेश्वर में श्री राम कृष्ण भक्तों के साथ में और ठन ठन में सिद्धेश्वरी मंदिर में दर्शन के लिए गमन द्वितीय परिच्छेद डेट है 1883 नाथ दिसंबर यह द्वितीय परिच्छेद हमने थोड़ा सा पढ़ा इसका टाइटल है ठाकुरर तपस्या ठाकुर की तपस्या ठाकुरे आत्मीय गुण और भविष्यत महातीर्थ ठाकुर के आत्मीय गण और भविष्य का महातीर्थ तो इसमें हमने देखा कि कल मणि अर्थात कि मास्ट महाशय मास्टर महाशय जो कि कथामृत के लेखक हैं वह अपने को विभिन्न नामों से कथामृत में उल्लेख करते हैं वह सब समय ऐसा नहीं कहते कि मास्टर ने ऐसा कहा या मास्टर ने वैसा कहा या तो फिर उनका जो पेन नेम है ऑथर नेम श्री म तो श्री म के नाम से भी वह अपने को नहीं पुकारते अपने को या तो मणि कहते हैं या तो फिर मोहिनी मोहन कहते हैं कभी-कभी मास्टर महाशय कभी कभी-कभी श्रीमा भी कहते हैं कभी-कभी एक भक्त भी कहा करते थे तो यहां पर इस परिच्छेद में वह अपने को मणि बोल कर के उल्लेख करते हैं हमने देखा कि कल उन्होंने कहा था कि मणि वहां नौबत में एकाकी बैठे हुए हैं अकेले गभीर चिंतन में मग्न है और पता नहीं क्या सोच रहे हैं अभी हमने मास्टर महाशय की साइकोलॉजी समझने का प्रयास कल किया था हमको पता है कि उनके डोमेस्टिक प्रॉब्लम्स थे पिताजी के साथ में भी कुछ प्रॉब्लम्स था उनकी पत्नी के साथ में भी इतना अच्छा नहीं पट रहा था हालांकि जो उनकी पत्नी है वह आखिरी समय में मां शारदा देवी की भक्त हो गई थी ठाकुर के पास में भी आती थी तो चलो ठाकुर ने जितना कहा उनको कि यदि आपकी ईश्वर के ऊपर में निष्ठा ठीक-ठीक है तो जो लोग हमको त्रास देते हैं हमको पीड़ा देते हैं या तो वह स्त्री हो और यदि स्त्री के केस में उसका पति हो तो वह डोमेस्टिक पार्टनर जो भी हो दुष्ट लोग है राजा है यह सब लोग उसके वश में आ जाते हैं तो ठाकुर की यह प्रेडिक्शन सफल हुई और उनकी पत्नी आखिर में ठाकुर की मां की भक्त हो गई थी किंतु यह जिन दिनों की बात है उस समय मणि अर्थात कि मास्टर महाशय डोमेस्टिक प्रॉब्लम के शिकार थे तो एकाएक देखा कि ठाकुर उस समय झावतला गए थे वहां से आकर के उन्होंने ठाकुर ने देखा कि यह मणि वहां पर नबत में रांडे में बैठ कर के बड़ी चिंता में मग्न है तो ठाकुर आकर के खड़े रह गए और जैसे कि मणि की चिंता में चिंता रूपी अग्नि में शीतल जल जल प्रदान करने की तरह उन्होंने कहा कि एक टू कोरले के बोलबे ई ई अर्थात कि थोड़ा सा जद आप कुछ करेंगे तो कोई आके कह देगा यह यह यह ठाकुर की क्रिप्टिक लैंग्वेज है ठाकुर इस तरह की एनक्रिप्टेड लैंग्वेज में कभी-कभी बात करते थे वह जो एक बार ठाकुर बाबूराम महाराज को कहते हैं रा छुना बा छु अर्थात कि बा छु ना रा छु ऐसा कुछ वह कहते हैं अर्थात कि जब ठाकुर खुद भावा वस्था में होते हैं तो और कोई उनको स्पर्श नहीं कर पाएगा राखल सिर्फ स्पर्श कर पाएगा तो इस तरह से अ यदि इस तरह से वह शॉर्ट फॉर्म करके कोई सेंटेंस कहेंगे यदि उनको सीक्रेट मैसेज किसी को देना है तो अभी वह कहां पर कोलकात्ता में गए थे किसी भक्त के घर पे तो वहां से वह आ रहे हैं घर के बाहर तो वह राखल ना कि कोई राखल महाराज ही थे उनके साथ में राजा महाराज तो वो पूछते हैं ओरा जुवा नाहा अरे ऐसा ही कुछ बोलते हैं अर्थात कि ओरा खाल जू तोवा छे ना कि हरिय गछ अर्थात कि राखल तो उनका संगी था भविष्य के राजा महाराज ठाकुर उनको पूछते हैं कि जूता है ना कि कोई उठा के चला गया है तो सबके सामने ठाकुर जो जी किसी बात को प्रकाश नहीं करवाना चाहते तो इस तरह की एनक्रिप्टेड कोड लैंग्वेज में अपने भक्तों के साथ बात करते थे तो यहां पर भी यह वैसे यह तो समझने में स्पष्ट है इसमें तो हमको कोई व्याख्या की जरूरत नहीं है थोड़ा सा कुछ करने से ही थोड़ा साधन भजन करने से ही गुरु आकर के इष्ट हमारे सामने आकर के कह देंगे कि अभी भविष्य का रास्ता आपको इस तरह से लेना है देखिए कि हम जितने भी साधक हैं हम सभी साधकों में जीवन में टर्निंग पॉइंट आते ही है एक ऐसी घड़ी आकर के खड़ी हो होती है कि जैसे कि हमारे सामने बहुत बड़े दुविधा का हम शिकार हो जैसे कि बहुत सारे रास्ते हमारी नजर के सामने खुले हो किंतु एकाएक एक दिन खड़े होकर के हम देखते हैं नींद में से उठकर के कि अरे जैसे कि जितनी भी समस्याएं हैं जितने ऑप्शंस हमारे सामने थे वह सब एकाएक रिजॉल्व हो गए हैं और भीतर में से एक स्थिर निश्चय प्रकट होता है कि नहीं यह कार्य करने से यह ऑप्शन सिलेक्ट करने से मेरा भविष्य में कल्याण होगा तो यह जो एक भीतर में से रेजोल्यूशन प्रगट होता है वह रेजोल्यूशन भी हमको इष्ट ना कि गुरु ही प्रदान करते हैं किंतु इसके लिए प्रीकंडीशन है जैसे कि ठाकुर कहते हैं एक टू को एक टू कोरले अर्थात कि थोड़ा सा करने के बाद में ही यानी कि थोड़ा सा कुछ करना होगा यदि हम जीवन में कुछ भी साधन भजन नहीं करेंगे और यदि अपेक्षा रखेंगे कि हमारी समस्या के समय ईश्वर आकर के हमको मार्गदर्शन दे तो ऐसा तो होने वाला नहीं है तो इसीलिए हमेशा थोड़ा बहुत साधन भजन जीवन में रखना ही है यहां पर ठाकुर का प्रॉमिस है हम सबको कि इवन अल्प देखिए एक टू कोरले ऐसा नहीं कहा कि बहुत ज्यादा कुछ करने से थोड़ा सा करने से ही फिर गुरु रूपी इष्ट इष्ट रूपी गुरु हमको आ कर के मार्गदर्शन देना शुरू कर देंगे तो यह थोड़ा बहुत अल्प मात्रा में साधन भजन हम सबको करना ही चाहिए तो अभी आगे में ठाकुर क्या कहते हैं कि तुम्हारा

ठाकुर मास्टर महाशय को अभयदान देते है

समय हो गया है पंखी जैसे कि पंखी का इंडा है अंडा है तो वह अंडे में क्या होता है जब तक इसके भीतर का पंखी छोटा होता है या तो फिर वह उसका इवोल्यूशन हो रहा है डेवलपमेंट तब तक तो अंडा वैसे ही रहेगा किंतु उसके भीतर में पंखी का बच्चा तैयार हो जाने से वही बच्चा अपनी चोंच मार करके अंडा तोड़ कर के बाहर आ जाएगा तो यह एक एक मैच्योरिटी का समय है एक नेक्स्ट स्टेज पे जाने का समय है यदि वीडियो गेम कोई खेलता होगा तो उसको पता है कि एक ले फर्स्ट लेवल से हम वीडियो गेम खेलना शुरू करते हैं जैसे ही फर्स्ट लेवल में जीत गए वह हमको सेकंड लेवल पे ले जाएगा सेकंड लेवल पे थोड़ा सा डिफिकल्ट चैलेंज आए तो अभी य यदि डिफिकल्ट चैलेंज सेकंड लेवल में जीत गए तो थर्ड लेवल में चले जाएंगे तो ऐसे ही जीवन में हमको ऐसा लगे कि अच्छा चलो अभी मैं एक लेवल क्रॉस करके सेकंड लेवल में चला गया तो क्या है कि सामने चैलेंज भी बढ़ जाती है किंतु क्या है कि ऑलरेडी हमारा स्किल सेट भी इतना डेवलप बाय दिस टाइम हो चुका है कि हम लोग उस हायर लेवल पर अच्छे से खेल पाए मैं जब स्कूल में पढ़ रहा था ऑलमोस्ट मेरी उम्र मैं कौन से स्टैंडर्ड में हूंगा सेवंथ ना कि एथ स्टैंडर्ड में ऐसा कुछ तो उस समय में क्या सोचा करता था अभी यदि आप हाई स्कूल में आ जाते हैं तो आपके सामने सबसे बड़ा चैलेंज है 10थ की बोर्ड की एग्जाम अभी आजकल तो बोर्ड की एग्जाम बड़ी डाइल्यूट कर दी गई है उस समय किंतु बड़ी कॉम्पिटेटिव हुआ करती थी उसमें फिर टॉप 10 रैंकिंग आएंगे फिर वोह रैंकिंग पब्लिश हो गए वगैरह वगैरह तो बड़ी प्रेस्टीजियस बड़ी ही चैलेंजिंग एग्जामिनेशन है 10थ स्टैंडर्ड की और उसके बाद में 12थ की एग्जाम है तो मैं हाई स्कूल में था उस समय तो मैं सोच रहा था कि देखिए अभी मेरे जीवन में दो सबसे बड़ी चैलेंज है एक तो मैं 10थ की बोर्ड की एग्जाम पास कर लूं इसके बाद में 12थ पास कर लूं उसके बाद में आराम से रहेंगे तो क्या है कि मैं जब यह सोचता था मेरे मैं बचपना था मेरे भीतर में मुझे पता नहीं था कि जब वो स्कूल पास करके कॉलेज में जाएंगे तो जो चैलेंज है वो इतनी सारी बढ़ जाएगी कि उसके सामने हमको फिर स्कूल के दिन याद आएंगे कि इतनी सारी रिस्पांसिबिलिटी है उससे तो बेटर हम स्कूल में थे भले ही चाहे बोर्ड की एग्जाम का टेंशन क्यों ना हो यह कॉलेज लाइफ से तो वो बेटर था फिर कॉलेज में ग्रेजुएशन करके जॉब करना शुरू करेंगे तो फिर कॉलेज के दिन आना याद आना शुरू होंगे और फिर जॉब करने के बाद में फैमिली स्टार्ट करेंगे तो फिर वह अपने बैचलर डेज याद आना शुरू होंगे यानी कि क्या है कि एवरी लेवल जब हम हायर जाते हैं तो सामने चैलेंज भी बढ़ती जाती है एट द सेम टाइम ऐसा कभी हो नहीं सकता कि मैं चाहूं कि अभी मैं बड़ा हो कर के यदि मैं कॉलेज में जाऊंगा फैमिली स्टार्ट करूंगा या तो फिर मैं जॉब करूंगा उसमें जो चैलेंज है बेटर है कि मैं स्कूल में ही पढ़ा रहूं ऐसा तो होने नहीं वाला है यदि मैं दो-तीन साल भी फेल करके एक ही स्टैंडर्ड में रहूं तो फिर वह इतना मतलब वो एक ऐसा सिचुएशन हो जाएगा स्कूल वाले फिर भगा देंगे कहेंगे कि यह दो-तीन साल से एक ही स्टैंडर्ड में पड़ा है यह पढ़ाई लिखाई के लायक नहीं है उसको यहां से निकालो तो क्या है कि ना ही हम आपको एक जगह पर स्टॉप करके रखने वाले हैं रखने पाएंगे ना ही हमको कभी यह जो कंटीन्यूअस प्रोग्रेस है उससे कभी अटकना है दोनों तरह से हमारे सामने देखिए एक जगह पर हम रुक नहीं पाएंगे और जितना जितना जितना प्रोग्रेस करेंगे उतना ही ग्रेजुएट दिस इज लाइफ यह लाइफ साइकिल चलाने की तरह है जैसे ही आप जब तक आप साइकिल चलाते रहते हैं तब तक आपको एजर्स लगता रहता है किंतु आप ब्रेक लगा के खड़े हो जाइए यदि अब जैसे ही आपने ब्रेक लगाया वैसे ही साइकिल गिर जाएगी दो पहिए वाली साइकिल अपने से खड़ी कभी रहने वाली है और या तो गिर जाएगी या तो आपको चलाते रहना है वह खड़े कभी नहीं नहीं रह पाएंगे तो यह जीवन भी ऐसा ही है यदि हम सोचेंगे कि अभी आज मैं जिस परिस्थिति में हूं बहुत अच्छा हूं अभी इससे ज्यादा और कुछ नहीं चाहिए तो क्या होगा कि चारों ओर से इतनी समस्या आकर के घिर लेगी कि हम लोग फिर परेशान हो जाएंगे हम लोग सतत सोचते रहेंगे कि आई वांट ए हायर स्टेज हायर स्टेज हायर स्टेज बट एज वी सो दैट एवरी हायर स्टेज कम्स विथ इट्स ओन सेट ऑफ चैलेंजेबल यही लाइफ है हमको एक के बाद एक वीडियो गेम के लेवल क्रॉस करते ही जाना पड़ेगा और प्रत्येक लेवल में चैलेंज बढ़ती ही जाएगी हमको अपना स्किल सेट इस चैलेंज के को फेस करने के लिए हमको बढ़ाना ही पड़ेगा देयर इज नो ऑप्शन आउट ऑफ दिस तो यहां पे भी देखिए कि ठाकुर ने कहा कि पंखी का जब अंडे में से निकलने का समय जैसे हो जाता है वैसे ही मास्टर महाशय का समय आ गया है अभी नेक्स्ट लेवल पर जाने का और उसके बाद में ठाकुर कहते हैं कि तुमको जो तुम्हारा घर बताया है वही घर तुम्हारा है और ऐसा बोल कर के ठाकुर ने मणि का घर फिर से बता दिया अभी यह घर का क्या अर्थ है कि उनका माइंड सेट किस तरह का है उनका भक्ति का उनका जो यह है मार्ग कि ज्ञान का मार्ग है भक्ति का मार्ग है तो उनके इष्ट कौन से हैं उनके लिए किस तरह की साधना करना उचित है मास्टर महाशय को यह पूरा जो आध्यात्मिक कुंडली जो है वह कुंडली वह घर ठाकुर ने मणि को बता दिया क्या घर बताया वह तो हमको मास्टर महाशय ने कहा नहीं किंतु देखिए ठाकुर के पास में वह क्षमता थी कि इंडिविजुअल को देख कर के उसके क्या संस्कार है वह समझ कर के पिछले पिछले जन्म का कर्म का प्रवाह उनको किस किस डायरेक्शन में ले जाता है वह समझ करके उनको वह आध्यात्मिक मार्गदर्शन दे पाते थे जैसे कि स्वामी विवेकानंद लेक्चर फ्रॉम कोलंबो टू अल्मोड़ा भारत में दिए हुए व्याख्यान में कहते हैं कि एक हमारा भारत का एक ऐतिहासिक प्रवाह है कर्मों का प्रवाह और पश्चिम का अपना पश्चिमी सभ्यता का अपना एक ऐतिहासिक प्रवाह है उन लोगों ने पॉलिटिक्स है नेचुरल सा से उसमें बहुत ज्यादा सिद्धियां प्राप्त की है अभी यदि आपको उनको धर्म भी सिखाना होगा तो उनको कहना पड़ेगा कि आपको पॉलिटिकल बेनिफिट क्या हो रहा है इकोनॉमिकल बेनिफिट क्या हो रहा है और देखिए कि बेनिफिट होगा इसके लिए आप लोग वेदांत को एक्सेप्ट कीजिए जबकि भारत का जो कर्म प्रवाह है हमेशा के लिए हमको धर्म की ही डायरेक्शन में आगे ले जाता है यदि हम कोई पॉलिटिकल इप प्रूवमेंट भी करना चाहते हैं तो स्वामी जी कहते हैं कि हमारे भारतीयों को यह बताना पड़ेगा कि यह पॉलिटिकल इंप्रूवमेंट करने से आपके धर्म में इस तरह से बेनिफिट होगा तो अपना-अपना यह प्रवाह है स्वामी जी कहते हैं कि आजकल जो रिफॉर्मर है वह चाहते हैं कि भारत को धर्म के रास्ते से अलग करके यह यूरोपियन सभ्यता की तरह मटेरियल ज्म में लेकर जाए किंतु यह बात शक्य ही नहीं है यह चॉइस आज से 10000 साल पहले ना कि इतने हजार साल पहले जो हमारे ऋषि मुनियों ने कर दी है उस चॉइस को अभी आप बदलने वाले नहीं है बदल नहीं पाएंगे इस समय हमको जो हमारे ऋषि मुनियों ने जो हमारा प्लान आर्किटेक्चर व जो ब्लूप्रिंट है ब्लूप्रिंट जो भारत का तैयार किया था उसी ब्लूप्रिंट के अनुसार हमको आगे बढ़ते जाना है तो यहां पे भी अ ठाकुर आपको देख कर के किसी भी भक्त को देख कर के उसका घर बता देते थे और इसी घर के अनुसार उनको तपस्या करनी है अभी देखिए कि ठाकुर

ठाकुर की अद्भुत तपस्या का वर्णन

आगे क्या कहते हैं शोको ले रही जे बेशी तपस्या करते हुए तान होए सभी को ज्यादा तपस्या करनी पड़ेगी ऐसा नहीं है आमार किंतु बड़ो कष्ट करते हुए छलो मुझे परंतु बहुत कष्ट करना पड़ा था अभी देखिए कि यह जो दो सेंटेंस है उसमें क्या है पता है जो कि हम लोग ठाकुर के अनुयाई है ठाकुर के शिष्य हैं तो हमारे लिए ठाकुर की तपस्या है वो तपस्या का ही बहुत सारा बेनिफिट हमको मिलता है ठाकुर ने जैसे कि कहा है कि कोई मेहनत करके अग्नि प्रज्वलित करता है तो इस अग्नि की गर्मी का फायदा बहुत सारे लोग उठाते हैं ठंड की रातों में ठंड के दिनों में अग्नि में आकर के किसी ने अग्नि प्रकट किया है तो बहुत सारे लोग आकर के अग्नि का जो ताप है वह ग्रहण करके ठंड से मुक्ति पाएंगे तो यहां पर भी वह ठाकुर कहते हैं कि तुम सबको इतनी करने की जो हालांकि इस भाषा में ठाकुर बात नहीं करते मैं इस तरह का इंटरप्रिटेशन कर रहा हूं ठाकुर ने तो इतना ही कहा है कि सबको तपस्या करनी पड़े ऐसा नहीं है किंतु मुझे बहुत ज्यादा करनी पड़े थी तो क्यों करनी पड़े थी तो वही बात है कि ठाकुर एक बार कहते हैं कि ऋषि मुनि लोग वह थोड़ा सा डरते थे अभी सभी ऋषि नहीं कुछ-कुछ ऋषि वह थोड़ा सा डरते थे कैसे भी करके मेहनत करके अपने से भवसागर पार कर ले तो बस हो गया जबकि यह नारद वगैरा क्या थे बहादुरी काठ अर्थात कि इस तरह का बड़ा सॉलिड एक लकड़ी जिसकी आप बड़ी नौका बना सकते हैं और उस नौका में लाखों लाखों लोग भवसागर पार हो सकते हैं यानी कि कोई कोई करता है कि अपने लिए कोई कोई करता है दूसरों के लिए ठाकुर कहते हैं कि कोई आम आम खा कर के अपना मुंह पूछ करके आम को छुपा देता है यानी कि जद उसके मुंह पर आम का दाग दिखेगा मैंगो का तो लोग कहेंगे कि अरे इसने आम खाया है हमारे साथ में शेर नहीं करता इसलिए कोई कोई अकेले अकेला जो रहते हैं उनका ऐसा होता है कि आम खाया फिर मुंह पूछ लिया यानी कि किसी को पता ना चले मैंने आम खाया ज कि कोई कोई होता है सबके साथ में शेयर करते हैं तो यहां पर भी ठाकुर की जो तपस्या है वह सिर्फ उनके कल्याण के लिए या तो उनकी ईश्वर दर्शन के लिए नहीं होकर के पूरे जगत के लिए उन्होंने तपस्या की है जैसे कि स्वामी जी ने कहा कि ठाकुर ने ब्रह्म कुंडलिनी जागृत कर दी है एक तो हम अपनी खुद की कुंडलिनी जागृत करने के लिए तपस्या करें और दूसरा है कि ई समष्टि ये पूरे कॉस्मो की कुंडलिनी जागृत करने के लिए तपस्या करें तो इसलिए ठाकुर कहते हैं कि किंतु मुझे आर किंतु बड़ो कोटो करते हुए छलो मुझे परंतु बहुत कष्ट करना पड़ा था माटर ढिपी माथा दिए पड़े थक ताम मिट्टी गीली मिट्टी अपने सर के ऊपर में रख कर के पड़े रहता क्यों क्योंकि तपस्या इतनी की थी कि उनके शरीर में इतनी जैसे कि ज्वाला प्रगट होती थी कि गीली मिट्टी होती है वह ठंडी होती है शीतल होती है तो गीली मिट्टी करके अपने सर के ऊपर में रख कर के पड़े रहते थे जिससे कि सर ठंडा हो वो और एक जगह पर ठाकुर ने कहा है कि जिस पेड़ के नीचे बैठ कर के मैं तपस्या करता था उस पेड़ के पत्ते झुलस जाते थे तो वो भी एक है और फिर दूसरी एक बात हमने देखी है कि भैरवी ब्राह्मणी भैरवी ब्राह्मणी को ठाकुर को स्पर्श नहीं कर पाती थी इतना तप्त उनका देह हो जाता था तो फिर क्या करना पड़ता था एक एक कंबल से ठाकुर को ढक देगी फिर वह ठाकुर को सहाय करके गंगा में ले जाएगी उनको स्नान करवाने के लिए ठाकुर यहां तक कहते हैं कि मेरे शरीर पर देह प जो मिट्टी लग जाती थी अभी क्या है खाना स्नान करना अपने देह को स्वच्छ रखना वो सब तो कहां पर चला जाता है साधन भजन करते-करते तो देह के ऊपर में मिट्टी तो लगेगी ही तो ठाकुर कहते हैं देह के भीतर में इतना ताप प्रकट होता था कि मिट्टी जैसे कि शक जाती थी अर्थात कि मिट्टी को सेक करके भट्ठी में सेक करके आप उसकी ईंट बनाते हैं तो वो क्या होती है कि गीली मिट्टी जब सेकते हैं तो वह सॉलिड हो जाती है तो ठाकुर कहते हैं ऐसा ही उनके देह के साथ में होता था गीली मिट्टी उनके देह पे जद लकी है तो वह सेक जाती थी और सॉलिड हो जाती थी तो इस तरह से ठाकुर ने तपस्या की है तो यहां पे ठाकुर कहते हैं गीली मिट्टी सर के ऊपर में रख कर के में बैठा रहता था कोथा दिए दिन चले ज तो कहां पर यह दिन चला जाता था ईश्वरीय नाम गुणगान करते-करते कभी रोएंगे कभी हसेंगे कभी कीर्तन करेंगे कभी नृत्य करेंगे कभी समाधि में चले जाएंगे कभी मां के साथ में वार्तालाप करेंगे कभी मां के साथ में जीद करेंगे झगड़ा करेंगे क्या से क्या ठाकुर की तपस्या एं थी किस तरह की ठाकुर की साधना थी कहां पर दिन चला जाता था पता नहीं चलता था केबल मां मां बोले डकता कांता बस में मां मा बोल कर के पुकारता रहता था और रोता रहता

मास्टर महाशय का प्रोफाइल (परिचय): विदेशी शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद, उन्होंने ठाकुर के समक्ष आत्म-समर्पण किया

था मणि ठाकुरर काछ प्राय दुई बचर आशीते छन अभी देखिए अभी यहां पर मास्टर महाशय देखिए कि पहले तो मणि क्या कहते हैं मास्टर महाशय कहते हैं कि मणि ठाकुर के पास में प्रायः ऑलमोस्ट 2 साल से आ रहे हैं अभी यह जो पूरे दो पैराग्राफ है उसमें क्या है कि मास्टर महाशय अपना एक छोटा सा बैकग्राउंड बताते हैं बैकग्राउंड क्यों बताते हैं देखिए कि यदि आप ठाकुर के पास में आते हैं तो सबसे इंपॉर्टेंट चीज क्या है कि आप ठाकुर को प्रश्न करते हैं ठाकुर उसका उत्तर देते हैं या तो फिर ठाकुर अपनी जो तपस्या की कहानियां है जैसे कि परमे ठाकुर ने कहा वो बताते हैं हम सुनते हैं तो यहां तक तो हो गया कथामृत का एक जनरल इस तरह से कुछ-कुछ लिखा है कथामृत में किंतु यहां से इस पैसेज से देखिए कि मास्टर महाशय बड़ा ही सीरियसली ठाकुर की बात के ऊपर में सोचना शुरू करते हैं कि थोड़ी सी तपस्या करने से फिर गुरु आकर के बता देंगे क्या करना है यानी कि जो एक कैजुअल रिलेशन था गुरु एक कि हां एक आध्यात्मिक पिपास ठाकुर के पास में आते हैं उनकी बात सुनते हैं चले जाते हैं व एक कैजुअल रिलेशनशिप के ऊपर में से अभी यह जैसे नेक्स्ट स्टेप में मास्टर महाशय जा रहे हैं जैसे कि आगे में ठाकुर ने कहा ना कि पंखी जब बड़ा हो जाता है तो अंडा तोड़ कर के बाहर आता है यानी कि नेक्स्ट स्टेप ऑफ इवोल्यूशन वह जाता है तो यहां पे भी ठाकुर और मास्टर महाशय का जो रिलेशन है उसमें अभी नेक्स्ट स्टेप नेक्स्ट लेवल आने वाला है एक कैजुअल रिलेशनशिप से कि हां मैं ठाकुर के पास में आता हूं उनसे कुछ सीखता हूं वहां से एक गभीर उन दोनों का संबंध होने वाला है मास्टर महाशय ठीक करते हैं कि ठाकुर के पास में आकर के रहेंगे और जैसे एक गुरु शिष्य परंपरा जो अपनी जो पाठशाला एं गुरुकुल हुआ करते थे वैदिक युग में तो इसी तरह दक्षिणेश्वर को गुरुकुल बनाएंगे ठाकुर रूपी इष्ट ठाकुर रूपी गुरु के पास में आकर के रहेंगे और उनके पास में से शिक्षा ग्रहण करके अपने जीवन को ट्रांसफॉर्म करेंगे तो यह देखिए कि अभी तक तो सिर्फ ठाकुर की बातें सुन रहे थे किंतु फ्रॉम दिस पॉइंट ऑन वर्ड्स उन्होंने अपने जीवन को परिवर्तित करने का प्रयास प्रारंभ किया और यही है आध्यात्मिक जीवन में नेक्स्ट स्टेप हम चाहे कितना ही वेदांत के प्रवचन सुन ले ठाकुर महा स्वामी जी के के जीवन पर बातें सुन ले किंतु जब तक हम यह नेक्स्ट स्टेप पे नहीं जाएंगे अपने जीवन को परिवर्तित करने का प्रारंभ नहीं करेंगे तब तक वो बातों की बातें ही रह जाएंगी हालांकि हमको यह भी पता है कि ठाकुर मा स्वामी जी के प्रसंगों में इतना पावर है कि वह सुनते रहने से ही धीरे-धीरे हृदय में परिवर्तन होना शुरू हो जाएगा तो यह भी एक बात है उसमें कोई प्रश्न ही नहीं है और इसीलिए कुछ दिनों के बाद में मास्टर महाशय वापस भी चले गए थे यहां पर आकर के परमानेंट रहे नहीं क्यों क्योंकि ठाकुर कहते हैं कि भागवत पंडित को एक पाश देकर के मां रख देती है एक पाश अर्थात कि एक बंधन में डाल कर के रख देती है क्योंकि इनको संसार में वापस जाना है लोगों को भागवत सुनाना है इसीलिए जब ठाकुर की महासमाधि हुई इसके बाद में कुछ लोगों ने त्यागी लड़कों ने घर छोड़ कर के सन्यास लेकर के मठ में रहना शुरू किया किंतु मास्टर महाशय उन लोगों में से नहीं थे तो जब भी यह जीवन परिवर्तन होता है तो अपनी क्षमता के अनुसार या तो फिर संपूर्ण रूप से विभिन्न दूसरी ही डायरेक्शन में अपना जीवन चला जाए जैसे कि नर का राजा महाराज का बाबूराम महाराज का हुआ न कि फिर यह मास्टर महाशय है न कि इवन फिर यह नाग महाशय है बलराम बाबू है योगिन मां या गौरी मां इन लोगों का है कि हां कुछ हद तक परिवर्तित हुआ है उनका जीवन किंतु फिर वे लोग संसार में वापस गए हैं और संसार में रह कर के ही साधना करते हैं तो आप देखिए कि कितनी कैटेगरी होगी यहां पे भक्तों की एक तो जो है कि सिर्फ इस तरह से कथा का आनंद लेकर के ही अपना जीवन बिताते हैं दूसरी कैटेगरी थोड़ा सा हायर होगा कि उन्होंने एक रिट्रीट में जाकर के गुरु के पास में अपने जीवन को परिवर्तित करने का प्रयास किया है किंतु वह कुछ हद तक सफल हुआ है और बाद में वह संसार में फिर गए हैं किंतु बट विथ एन अवेयरनेस कि यह जीवन अभी गुरु का है इष्ट को समर्पित कर दिया है अभी संसार में रहकर के संसार की जो रिस्पांसिबिलिटीज है उसका निभाव तो करना है किंतु भीतर में इष्ट चेतना सब समय जागृत है तो वो एक कैटेगरी हो गई और फिर तीसरी कैटेगरी जैसे कि साधुओं की संतों की उन्होंने एक बार ठीक किया कि नहीं ठाकुर मा स्वामी जी ही हमारे जीवन सर्वस्व है तो फिर उन्होंने संसार छोड़ कर के पूरा पूरा यह सन्यास जीवन में अपने को डाल दिया है झोंक दिया है तो यहां पर भी और यह जो फर्स्ट कैटेगरी है उसमें भी मैं तो कहता हूं कि नियमित रूप से कथा का श्रवण करेंगे ठाकुर मा स्वामी जी की वो इट सेल्फ हमको भीतर में से हमारी चेतना को हमारे कर्मों को निर्मल परिशुद्ध करता जाता है तो यहां पे मास्टर महाशय एक लेवल ऊपर जाकर के ठाकुर के पास में आकर के रहने वाले थे तो इसके लिए उन्होंने पहले तो अपना एक बैकग्राउंड दिया कि मास्टर महाशय का बैकग्राउंड क्या है और इस बैकग्राउंड को लेकर के वह ठाकुर के पास में आ रहे हैं तो ठाकुर ने उनको किस तरह से उपदेश देकर के उनके जीवन को परिवर्तित किया तो इसीलिए अभी मास्टर महाशय दो पैराग्राफ में अपना परिचय देते हैं क्या कहते हैं मणि ठाकुरर काछ प्राय दुई बसर आशीते छेन मणि ठाकुर के पास में ऑलमोस्ट 2 साल से आ रहे हैं तीनी अंग्रेजी पढ़े छन उन्होंने अंग्रेजी का अभ्यास किया है ठाकुर तहा के कोखन कोखन इंग्लिशमन बोलते हैं ठाकुर उनको कभी-कभी इंग्लिश मैन कहते कॉलेजे पढ़ा सुना कोरेजन कॉलेज में उन्होंने अभ्यास किया है विवाह करे छन विवाह भी किया है तिनी केशव और अन्ना नो पंडित देर लेक्चर सुनी ते अंग्रेजी दर्शन और विजान पढते भालो भाषन उनको केशव और अन्य जो पंडित गण है उनका प्रवचन सुनने में अंग्रेजी दर्शन शास्त्र यानी कि यूरोपियन फिलोसोफी है और यूरोपियन साइंस है दर्शन और विज्ञान यूरोपियन फिलोसोफी और साइंस पढ़ने में उनको आनंद आता है किंतु ठाकुरर काछ आशा अधी यूरोपीय पंडित देर ग्रंथ और अंग्रेजी बा अन्य भाषा लेक्चर ताहर आल नि बोध होया छ किंतु जब से वह ठाकुर के पास में आए हैं तब से यह यूरोपियन पंडितों के ग्रंथ और यह अंग्रेजी या तो फिर दूसरी भाषाओं के जो लेक्चर है उसके ऊपर में से उनकी पूरी वितृष्णा हो गई है उसके ऊपर में से उनका मन उठ गया है आल बोध होया छ अर्थात कि उसके ऊपर में से उनका मन उठ गया है एक खन केबल ठाकुर के रात दिन देखीते व तहर श्री मुखर कथा सुनीत भलो बा सेन और अभी वो ठाकुर को दन रात देखते रहना और उनके श्रीमुख की वाणी सुनना ही उनको सबसे ज्यादा अच्छा लगता है वाणी सुनना ही उनको सबसे ज्यादा पसंद है देखिए

Educated Middle Class : Rationality vs. Faith

कि मास्टर महाशय का प्रोफाइल क्या है यह जो प्रोफाइल है वह ज्यादातर आजकल का जो मिडल क्लास एजुकेटेड इंडियन है उनको यह अप्लाई होता है हम लोग भी देखिए कि थोड़ा बहुत एजुकेशन सिस्टम के माध्यम से अंग्रेजी तो पढ़े ही है या तो फिर अंग्रेजी के जो इंग्लिश भाषा या तो इंग्लिश साहित्य या तो इंग्लिश साइंस हमको जो चीज सिखाता है वह बॉटम लाइन है रेलिटी भारत में देखिए कि बहुत बार हम लोग विश्वास के ऊपर में चीजों को ले देते हैं जैसे कि हां कि यहां पर एक चमत अभी कोई भी यह जो सूर्य है सूर्य पृथ्वी की आसपास क्यों घूमता है क्योंकि यह सूर्यदेव अपने रथ में पृथ्वी की परिक्रमा करते हैं यह सूर्य ग्रहण क्यों होता है तो राहु आकर के राहु ना केतु आकर के सूर्य को ग्रस कर लेते हैं यानी कि कोई भी नेचुरल फिनोमिना है उसमें एक दैवी संज्ञा कोई भी एक डिवाइन साइन खोजने का हम प्रयास करेंगे तो यह अभी यह मने बारिश क्यों हो रही है तो बहुत ज्यादा बारिश और यह थंडर स्टोर्म क्यों हो रहा है थंडर स्टोम तो यह भगवान इंद्र नाराज हो गए हैं इसके लिए और यदि बारिश नहीं हो रही है तो फिर चलो कि किसी इंद्र को इंद्र की पूजा करें ना कि शिव पूजा करें वगैरह वगैरह एक इस तरह का एक प्रसंग है कि राजा महाराज और हरि महाराज स्वामी ब्रह्मानंद स्वामी तुर्या परिव्राजक अवस्था में भ्रमण करते करते राजस्थान ना कहीं पर गए थे वहां पर एक पहाड़ के ऊपर में एक मंदिर है वहां पर बैठ के वे दोनों तपस्या कर रहे थे उस समय आसपास के गांव में अकाल पड़ रहा था तो वहां के गांव वालों ने ठीक किया कि यह शिव मंदिर जहां पर यह राजा महाराज हरि महाराज तपस्या कर रहे हैं वहां पर जाकर के शिवलिंग के ऊपर में हम पानी चढ़ाएंगे तो अभी क्या है कि यह जो पहाड़ था पहाड़ के नीचे में एक जलाशय था तो अभी जलाशय में से सतत एक-एक घट पानी भर कर के पहाड़ चढ़ कर के शिव भगवान शिव के वह शिवलिंग प अर्पित करना वह तो थोड़ा सा कष्ट का मामला है ही है किंतु फिर सुबह से सभी गांव वासियों ने शुरू कर दिया कि चलो सुबह से ही जलाशय में से एक-एक घट पानी भर के ऊपर में जाएंगे शिव के सर पर पानी चढ़ाएंगे और फिर प्रार्थना करेंगे बाबा बरसाओ अर्थात कि बाबा बारिश को बरसाओ तो अभी यह हरि महाराज और राजा महाराज देख रहे हैं तो वह बड़े ही उनको अच्छा लगा कि देखिए कि गांव वालों की कितनी सरल भक्ति है कि अकाल पड़ा है तो बार-बार पानी चढ़ा कर के भगवान शिव के पास में से प्रार्थना करते हैं तो फिर उन दोनों ने ठीक किया कि हम भी चलो यहां पर जो तपस्या कर रहे हैं जप कर रहे हैं तो जप में हम भी प्रार्थना करते हैं भोलेनाथ के पास में कि बारिश बरसाए तो यह दोनों यहां पर जप कर रहे हैं यहां पे यह गांव वाले सतत पानी लाकर के जलाशय में से पहाड़ चढ़ कर के इतना मेहनत करके शिवलिंग के ऊपर में जल चढ़ा रहे हैं और फिर ऐसा हुआ शाम होते-होते कि सही में भगवान शिव ने उनकी बात सुनी और धोध मार बारिश चालू हो गई तो सभी गांव वाले खुश हो गए और यह दो अपने सन्यासी थे वह भी बड़े खुश हो गए तो अभी देखिए कि यह हमारा एक ट्रेडिशनल एटीट्यूड है बारिश क्यों आती है तो भगवान इंद्र बारिश लाते हैं क्यों नहीं आती तो इंद्र नाराज हो जाता है चलो कहीं जाकर के भगवान शिव से प्रार्थना करें तो वह इंद्र की अकल ठिकाने लाए और फिर से बारिश होना शुरू हो तो यह जो फेथ बेस एटीट्यूड है अपना भारत का था जो कि बड़े लंबे समय से था किंतु यह जो यूरोपियन साइंस यूरोपियन फिलोसोफी यह है पूरा रेशनल यह रेशनल हमको सिखाता है सूरज पृथ्वी की आसपास में क्यों घूम रहा है तो ऐसा नहीं है कि सूरज भगवान यह रथ के ऊपर में चढ़कर के चारों ओर घूमते हैं थोड़ा सा वो टेलिस्कोप लेकर देखो थोड़ा सा पता चलेगा मैथमेटिक्स से यह फिजिक्स से डेवलप करो अभी पता चलेगा कि पृथ्वी सूरज के आसपास में घूम रही है नहीं कि सूरज पृथ्वी के आसपास में और फिर पृथ्वी सूरज के आसपास में क्यों घूम रही है बिकॉज ऑफ लॉज ऑफ ग्रेविटी ग्रेविटी खोज लो अभी यह यदि आपको प्रेसा इज कैलकुलेशन करना है कि कौन से समय में पृथ्वी कहां पर होगी यह जो नवग्रह है वह कहां पर होंगे तो इसके लिए कैलकुलस खोज लिया है ट्रिगोनोमेट्री खोज ली है यह सब यानी कि यह पूरा रेशनल आउटलुक है यूरोपियन साइंस का और फिलोसोफी का तो भारत में जैसे ही यह अंग्रेज लोगों का प्रवेश हुआ इवन देखिए कि इस्लामिक सिविलाइजेशन भी कुछ हद तक रेशनल थी जब वह उनका गोल्डन एज जब चल रहा था इस्लामिक सिविलाइजेशन का गोल्डन एज यानी कि एथ सेंचुरी नाइंथ सेंचुरी उसके आसपास का है उसके बाद में यह मंगोल लोगों ने आक्रमण किया बगदाद को संपूर्ण रूप से तहस-नहस कर दिया और तब से लेकर के इस्लाम में डार्क एज स्टार्ट हो गए तो इस्लाम में डार्क मंगोल लोगों के हमले के पहले तक की बात है कि इस्लामिक सिविला का गोल्डन एज था वहां पर भी यह रेशनल चल रही थी किंतु बाद बाद में जिस इस्लामिक आक्रमणों ने भारत पर हमला किया वे लोग भी हमारी तरह हमारी तरह तो नहीं कहेंगे यह तो गलत होगा मैं कहूंगा कि वे लोग अंधश्रद्धा में काफी डूबे हुए थे जो एक गोल्डन एज था इस्लाम का उसका वह जो था रेशनल आउटलुक यह भारत में जो आक्रमणकारी आए उन लोगों में इतना नहीं था अकबर के राज्य में ऐसा सु ने में आता है कि उसने बहुत सारे पंडितों को अपनी सभा में बुला करके रखा था किंतु वह अकबर यूनिक था ऐसा कहे तो चलेगा उसके बाद बाद में जितने भी मुगल राजा आए उन लोगों का भी एक तरह से देखें कि मिडिवल माइंड सेट था अंधश्रद्धा से भरे हुए थे यानी कि यह यूरोपियन लोगों का भारत में आगमन वह सिर्फ एक नया कल्चर नई लैंग्वेज नई फिलोसोफी ही नहीं लाया है एक पूरा डिफरेंट माइंड सेट लाया है रेशनल माइंड सेट हम लोग सभी चीजों को क्वेश्चन करते हैं हम सभी चीजों को इन्वेस्टिगेट करते हैं हम सभी चीजों के पीछे का साइंस खोजने का प्रयास करते हैं और यह रेशनल माइंडसेट का सबसे जो सर्वोच्च उदाहरण है वह नरेण स्वामी विवेकानंद स्वयं जब भी ठाकुर कहते हैं कि ये मुझे यह भगवान के दर्शन हो रहे हैं इमीडिएट नरेण कहेगा कि अरे ये तो लुसिन है आपके मन का भ्रम है वो जो एक भक्त के घर गए थे उसके बड़े भाई ने आकर के ठाकुर को पानी दिया ठाकुर पानी पी नहीं पाए तो उस समय और किसी के मन में तो यह बात नहीं आई कि ठाकुर ने पानी क्यों नहीं पिया नरेण था इन्वेस्टिगेटिव रेशनल माइंड नरेण का तो फिर बाद में उसने इन्वेस्टिगेशन करके पता निकाला कि खोज निकाला कि यह जो आदमी था जिसने ठाकुर को पानी दिया था उसका चरित्र अच्छा नहीं था धर्मा लिंग धारी वो जो था व्यक्ति तो अभी धर्म के चाहे जितने बाहर में उसने लिंग य ये हो मने वो पीतांबरी पहनी है सर के ऊपर में तिलक डाला है गले में रुद्राक्ष है हाथ में माला जप कर रहा है वगैरह वगैरह किंतु उसका चरित्र अच्छा नहीं है तो यह जो रेशनल जो नरेण लेकर आया है यहां पे उसका बेनिफिट क्या है कि नरेंद्र ने ठाकुर को प्रश्न करके करके ठाकुर के भीतर में जो डेप्थ है वह खोज निकाली है अदर वाइज क्या होता कि यदि हम सभी लोग ठाकुर को फे विध के ऊपर में ही ले लेते तो हमको पता नहीं चलता कि उनके रियलाइफ कितनी है इस तरह के हजार बाबाज जद बैठे हैं और उसमें ठाकुर बैठे हैं सबके साथ में तो ठाकुर की यूनिकनेक्ट मंडल है और सभी भक्त कहते हैं कि हमारे जो गुरु है वही इष्ट है और वही अवतार है और वही अवतार वरिष्ठ आया है तो अभी इस तरह के 10 लोग इस तरह का क्लेम करेंगे अपने गुरु के बारे में तो हम किसके पास में जाएंगे जबकि ठ स्वामी जी ने सबसे पहले किया कि ठाकुर को ही इन्वेस्टिगेट किया सबसे पहले देखा कि ठाकुर की खुद की जो डेप्थ ऑफ कन्विसिटी जो डेप्थ है वो आप रेशनल से मेजर कभी नहीं कर पाएंगे किंतु रेशनल से मेजर करने का एक प्रयास तो यह हुआ कि हां यह अनंत डेप्थ है अनंत रियलाइफ हों की इतना तो अकल हम में आई है जैसे देखिए कि टॉर्च लाइट लेकर के आप रास्ते में जाते हैं अंधेरी रात है मैं जब रांची में रहता था और वहां पर गांव में जाता था तो जो अंधेरा मुझे देखने को मिलता था हमको शहरवासियों को तो पता ही नहीं है कि एक्चुअली अंधेरा क्या है रात होने से ही 1000 लाइट चारों ओर ऑन हो जाएगी यदि मैं अपने घर में भी लाइट बंद करूंगा तो वह स्ट्रीट लाइट चालू रहेगी यदि लाइट चली गई है पूरे एरिया में तो 10 लोग अपना मोबाइल खोल के बैठ जाएंगे तो हमने तो सही-सही अंधेरा देखा ही नहीं है रांची में मैं था देखा कि सही में अंधेरा इलेक्ट्रिसिटी का तो कोई प्रश्न ही नहीं है दिया जलाना है और दिया 1015 जलेंगे यदि आप अपने घर से बाहर आ गए आकाश में देखा तो पूरे तारों से आकाश परा हुआ है तो उस समय मेरे पास में एक बड़ा ही पावरफुल टॉर्च लाइट लेकर के मैं घूमता था क्योंकि मुझे वहां पे क्या है कि सांप क कहां से आ जाएगा हाथी कब आ जाएगा यह सब बड़ा डर रहता था तो मैं जब भी अपने कमरे में से बाहर निकलूंगा एक पावरफुल टॉर्च लाइट लेकर निकलूंगा तो यदि मैं उसको ऐसा करके ऑन करूंगा ना तो हमारा जो जैसे ही बाहर आएंगे बहुत बड़ा जंगल है वन है तो यदि टॉर्च लाइट ऑन करेंगे तो कितना दूर तक आप जो पेड़ों को देख पाएंगे तो मैं मुझे ऐसा देखने में आनंद आता था टॉर्च लाइट ऑन करने से मैं कितने दूर तक पेड़ों को देख पाता हूं तो दिन में देखता था कि अच्छा सबसे दूर वाला पेड़ मुझे वह दिख रहा है फिर रात को मैं टोर्च लेकर के देखता था कि अच्छा टॉर्च का पावर है कितना देखता हूं तो तो फिर मैंने इस तरह से दो-तीन टॉर्च चेंज करके सबसे पावरफुल टॉर्च था उससे मैं काम चलाता था कि हां इतना दूर का पेड़ वो मुझे दिन में दिखता है तो रात में भी दिखता है तो ये वाला टॉर्च लाइट ठीक है तो अभी देखिए कि पास में ही पहाड़ थे तो मैं यदि पहाड़ के ऊपर में टॉर्च लाइट फेंकू तो वो सही में वो पहाड़ भी दिखने लगता था वो पूरा एक लाइट का सर्कल दिखेगा जहां-जहां पे टॉर्च लाइट का सर्कल जाएगा वो आपको स्पष्ट दिखेगा वहां पे क्या है किंतु इसी टॉर्च लाइट को मैं यदि आकाश में फेंकू तो चाहे मैं जितनी ही पावरफुल टॉर्च लाइट हो वो लाइट का सर्कल मुझे कभी नहीं दिखेगा आकाश को मैं कभी भी प्रकाशित नहीं करने पाऊंगा क्यों क्योंकि यह जो रात्रि का आकाश है वह तो अनंत है चाहे हजार पावरफुल हजार वोट की टॉर्च लाइट आप आकाश में फेंक दीजिए कभी भी आकाश को आप प्रकाशित नहीं करने वाले हैं तो यहां पे भी देखिए कि यदि मेरे पास में टॉर्च लाइट नहीं है तो मुझे लगेगा कि अच्छा यह जो अंधेरे में जितने पेड़ मेरे से दूर है उसके बाद में वह पहाड़ मेरे से जितना दूर है उतना ही दूर ये आकाश है अंधेरे में क्या पता चलेगा जैसे ही मैंने टॉर्च लाइट ऑन की तब पता चला कि पेड़ मेरे से कितना दूर है पहाड़ मेरे से कितना दूर है और आकाश अनंत आकाश है वह तो कितना कितना दूर है तो रेशनल का हमको यहां तक एक बेनिफिट मिलता है कि भले ही चाहे रेशनल से ठाकुर के मन की गहराई को आप समझ ना पाए ना देख पाए किंतु एटलीस्ट इतना तो पता चलता है कि ठाकुर के मन की गहराई इतनी है कि रेशनल उसके सामने छोटी पड़ जाती है उनको समझने के लिए जबकि और कोई संत महापुरुष होंगे तो रेशनल इन्वेस्टिगेशन करके उनकी कहां तक जाती है सिद्धि उनकी अनुभूति उनका अनुभव यह आपको समझ में आएगा जैसे कि नरेंद्र का ही अनुभव है नर ने अपने जीवन में यदि किसी को गुरु बनाया था तो दो को गुरु बनाया था एक नहीं दूसरे गुरु थे पहारी बाबा तो ठाकुर के पास में भी उन्होंने सब कुछ ग्रहण किया गुरु शिष्य के रूप में और फिर वह गए थे गाजीपुर और वो फिर इनके पास में से सब सीखना चाहते थे हठ योग पहारी बाबा के पास में से किंतु देखिए यह तो पक्की बात है हमको पता है कि ठाकुर ने आकर के नरेण के सामने करुण दृष्टि से देखा तो फिर नरेद ने पहारी बाबा का संग छोड़ केर चला गया किंतु उससे पहले ही नरेद ने अपने पत्रों में यह लिखना शुरू कर दिया है कि पहारी बाबा मेरे प्रश्नों का सीधा उत्तर नहीं देते हैं जब भी नरेंद्र कोई प्रश्न करेगा तो पहारी बाबा कहेंगे कि अरे इस दास को क्या पता है अरे इस दिन को क्या पता है मुझे तो कुछ पता नहीं मैं तो कौन हूं मैं कुछ भी नहीं हूं वगैरह वगैरह तो इस बात का दो इंटरप्रिटेशन होता है ठाकुर को कोई भी प्रश्न करेगा नरेंद्र तो इमीडिएट ठाकुर उत्तर देते हैं ठाकुर के भीतर में इतनी मतलब कहेंगे कि शरणागति थी अहंकार संपूर्ण रूप से खत्म हो गया था फिर भी ठाकुर ने ऐसा कभी नहीं कहा कि इस गरीब को क्या पता इस दास को क्या पता इस दिन को क्या पता ये झुठ मुठ की दनता हो गई इसका उदाहरण ठाकुर खुद देते हैं कि एक गुरु का एक शिष्य था तो गुरु ने शिष्य को कहा कि तुम मेरे लिए तमाकू सजा करके हुक्के में ले आओ हुक्का पीना चाहते थे तो यह शिष्य को काम नहीं करना था तो शिष्य ने क्या कहा गुरु को कि मैं क्या आपका हुक्का सजाने के लायक हूं मैं तो इतना दीन हूं इतना अधम हूं तो फिर ऐसा करके उसने गुरु का हुक्का नहीं सजाया गुरु को तंबाकू डाल के हुक्का पीने को नहीं दिया क्यों अभी यह बात नहीं है कि उसके भीतर में इतनी ह्यूमिडिटी है इतनी दीनता है कि वह गुरु का हुक्का सजाने को लायक अपने को नहीं समझता बात वही है कि वह आलस है तामसिक है और इसलिए वह हुक्का नहीं सजाना चाहता तो यहां पर भी यह बात तो नरेंद्र ने ठाकुर के पास में सब कुछ सीख लिया था तो फिर जब इसी रेशनल यार्ड स्टिक को लेकर के यही पावरफुल टॉर्च लाइट को लेकर के जब नरेंद्र पहारी बाबा के पास में जाता है तो एकदम इमीडिएट समझ में आ जाता है कि पहारी बाबा की दौड़ कहां तक है अभी ऐसा नहीं है कि हम यह कहना चाहते हैं कि पहारी बाबा की सिद्धि कम थी वही बात है कि टॉर्च लाइट लेकर के जैसे कि मेरा रांची का अनुभव था पहाड़ के ऊपर में टॉर्च लाइट डालेंगे रात को पता चलेगा अरे पहाड़ इतना दूर है किंतु यदि वही टॉर्च लाइट आप आकाश के ऊपर में डालेंगे तो पता चलेगा आकाश तो अनंत दूर है तो वैसे ही पहारी बाबा सिद्ध थे नरेंद्र खुद उनसे प्रभावित था कोई प्रश्न ही नहीं है किंतु कंपेयर टू ठाकुर वो कहीं पे नहीं थे तो यह रेशनल आउटलुक का एक बेनिफिट है कि क्या किसका डेप्थ कितना है वह हम समझ पाएंगे तो यहां पे भी देखिए कि मास्टर महाशय का एक रेशनल आउटलुक था उस रेशनल आउटलुक को लेकर के उन्होंने कितने ही पंडित लोगों का प्रवचन सुना था व्याख्यान सुना था केशव सेन से उस समय का समाज बड़ा ही प्रभावित था तो वह भी केशव सेन को भी उन्होंने सुना था किंतु जब यही रेशनल यार्ड स्टिक ठाकुर के ऊपर में अप्लाई करने का का प्रयास किया मास्टर महाशय ने तब वह आश्चर्य चकित हो गए यह तो आकाश के ऊपर में टॉर्च लाइट डालने जैसा है यह आकाश इतना अनंत है कि आपकी टॉर्चलाइट उसके सामने फीकी पड़ जाएगी तो यहां पे फ्रॉम दिस डे ऑनवर्ड मास्टर महाशय क्या करते हैं इस रेशनल रूपी टॉर्चलाइट को फेंक दी ठाकुर के श्री चरणों में संपूर्ण शरणागति उन्होंने स्वीकार की और इसीलिए वो मास्टर महाशय कहते हैं लिखते हैं यहां पे कि यूरोपियन पंडितों के लेक्चर फिर उनके दर्शन विज्ञान पढ़ने में बड़ा आनंद आता था किंतु ठाकुर के पास में जब से आए हैं तब से यह यूरोपियन पंडितों के ग्रंथ अंग्रेजी या तो फिर दूसरी भाषाओं के लेक्चर तहर आल बोध होया छ उनको रस हीन लगने लगे हैं ऐसा लगता है उसमें कुछ रस नहीं है एकन केबोल ठाकुर के रात दिन देखीते ओ तहर श्री मुखे कथा सुनी ते भालो बासन अभी तो सिर्फ ठाकुर को रात दिन दर्शन करना और उनकी श्री मुख से वचनामृत कथामृत सुनना ही उनको सबसे ज्यादा पसंद है आजकल तिने ठाकुरे एकटी कोथा सर्वदा भावे आजकल वह ठाकुर की एक बात हमेशा सोचते थे सोचते हैं ठाकुर बोले छ साधन कर ईश्वर के देखा जाए ठाकुर ने कहा है कि साधन करने से ही ईश्वर दर्शन हो सकता है ईश्वर को देख सकते हैं आरो बोले छन और भी कहे हैं ईश्वर दर्शन मानुष जीवने उद्देश ईश्वर दर्शन ही मनुष्य जीवन का उद्देश्य है तो अभी इसके बाद में ठाकुर आगे बात करते हैं किस तरह से धीरे-धीरे करके मास्टर महाशय का ब्रेन वश करके उनको अपने शिष्य के रूप में पर नत करते हैं वह सब आगे देखेंगे कल अभी आज यहीं तक ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णर्पण

प्रश्न: अपने बिस्तर पर बैठ कर जप कर सकते है?

मस्तु हां हां कनो ना देखिए पूजा करने में सब कुछ विधि विधान होते हैं किंतु जप करने में ऐसा कुछ नहीं है जब आप अभी जैसे कि आप ट्रेन में जर्नी कर रहे हैं या तो फिर अपने जहां पर जॉब करते हैं वहां पर थोड़ा सा समय मिला है तो कहां पर भी आप जप कर सकते हैं उसमें कोई असुविधा नहीं है वह बेटर रहेगा उंगली पर गिन के क्योंकि माला को बाहर कहीं ले जाना वह भी ठीक नहीं है या तो फिर क्या करना है पता है जैसे मैंने किया है मेरे पास में दो मालाएं हैं एक तो है कि जो गुरु महाराज ने वह मंत्र जप करके दी है वह है जिसको मैं हमेशा कमरे में ही रखता हूं फिर एक छोटी मालाई जो 52 वो ये होता है ना जिसके भीतर में रुद्राक्ष वह वाली छोटी एक माला होती है तो वह मैं कभी-कभी बाहर ले जाता हूं अपने साथ में तो अपने पॉकेट में हाथ रख कर के उसका जप कर सकते हैं आप एक छोटी सी माला खरीद कर सकते हैं जब बाहर जाए तो ले जा सकते हैं नहीं करना उचित है क्योंकि बाहर गए और माला मिस हो गई तो फिर तो ठीक नहीं रहेगा

प्रश्न: कहते है की माला को अभुक्त नहीं रखना चाहिए

वह तो आपने गुरु के पास में से शोधन नहीं करवाई है इसलिए उसमें वह सब नियम काम नहीं करेगा जो गुरु के पास में शोधन करवाई हुई माला है उसको कभी अभु क्त नहीं रखते हैं य

प्रश्न: मन को शांत रखने का सहज उपाय क्या है?

ज ठाकुर मा स्वामी जी प्रसंगो एकर पर एकर एकर पर एक सुनते जान तहली मन टा एक ठंडा होए जावे देखु बैठ कर के जप ध्यान करना वह सबसे अच्छा उपाय है चंचल मन को वश में लाने का किंतु यह उपाय तभी संभव है जबकि हमारा विल पावर इतना स्ट्रांग हो अपने में साधन भजन करने की इतनी क्षमता हो तभी यह संभव है किंतु जब तक यह डेवलप नहीं होती साधन भजन करने की क्षमता मां कहती है ना कि रोज एक लाख जप करके देखो देखो कि पता चलेगा कि किस तरह से मन अशांत रहता है किंतु क्या वह एक लाख जब करना प्रतिदिन बैठ कर के वह क्या इतना आसान थोड़ी ना है तो फिर उसका एक अल्टरनेट है कि जब तक हम प्रतिदिन 108 जप करते हैं या 1008 जप करते हैं तब तक हमको क्या करना चाहिए कुछ समय जप के बाद में आधा एक घंटा कथामृत का नियमित रूप से पाठ करना चाहिए जिससे कि क्या होगा कि कथामृत का पाठ करके भी हमको इतनी ही शांति मिलेगी जितनी हमको माला जप करके मिलती है ना असुविधा केन होवे झपटा नाड़ी ठाकुर

प्रश्न: काम करते करते जप करे तो जीभ चलती रहती है. इससे कोई बुराई नहीं है तो?

खुद बोलते हैं कि राखल के देखो सब समय ठो ना माने राखल को देखो कि सब समय उसके होठ जो है वह हिल र है क्यों क्योंकि वह सब समय जप कर रहा है तो यह देख कर के ठाकुर को उद्दीपन होता था तो उसमें देखिए हम जिस परिस्थिति में रहते हैं उस परिस्थिति का बात अलग है किंतु मेरे ख्याल से कोई असुविधा तो नहीं होनी चाहिए

प्रश्न: आसन पर बैठकर जप करें तो शुद्ध वस्त्र पहनने पड़ेंगे तो?

देखिए यह सब जो विधि विधान है ना हमारे मन को शुद्ध करने के लिए किए गए हैं कि जैसे ठाकुर कहते हैं हमने वह मां के जीव जी वन में पड़ा ठाकुर ने क्या कहा कि लक्ष्मी दीदी और मां को कि मैं जो मैं जो यह सब ईश्वरीय बात तुमसे करता हूं तो तुम लोग जब काम करोगी ना खाना पकाओ गी बर्तन धोग घर की सफाई करोगी तब यह सब बातों को अपने मन में मनन करते रहना जैसे कि गाय टा जाबर काटे अर्थात कि गाय खाने के बाद में चिबा है तो इससे क्या होगा यह सब कहानियां अपने मन में गहराई तक जाएगी अभी प्रॉब्लम क्या है कि जैसे आपने कहा कि स्नान करके धुले हुए वस्त्र पहन कर के जप करना यदि आप कर सके तो बहुत अच्छी बात है क्योंकि यह सब विधि विधान का एकमात्र प्रयोजन है अपने मन को ईश्वरीय प्रसंग में लगा कर के रहना किंतु यदि यह मैंने आज स्नान नहीं किया है आज मेरे पास में धुला हुआ वस्त्र नहीं है तो मैं बैठ के जप नहीं करूंगा ऐसा ना हो जाए यानी यह जो जो बात हमको ईश्वर के नजदीक लाने के लिए कही गई है उसी बात हमको ईश्वर से दूर ले जाए ऐसा ना हो कभी इस बात का भी ख्याल रखना है मैंने पहले भी एक बार कहा था एक डिवटी से मैंने पूछा कि अच्छा तुम मंदिर में आते थे रेगुलरली अभी बंद क्यों कर दिया बोला कि मैं सुबह को स्नान कर नहीं कर पा रहा हूं इसलिए मैं सुबह को मंदिर में नहीं आता हूं मैंने कहा अरे भाई तू यह बात ठीक है कि स्नान करके मंदिर में आना है किंतु स्नान नहीं कर पाता हूं इसलिए मंदिर में नहीं आना ऐसा मत करो स्नान करना तुमको नियम है कि ईश्वर के पास में ले जाता है अब यह स्नान का बहाना करके तुम मंदिर में आना बंद कर दोगे तो यह तो उल्टा हो गया स्नान तुमको ईश्वर से दूर ले जा रहा है ऐसा मत करो ईश्वर के पास में आ जाओ स्नान करो नहीं करो वह बात की बात है बिल्कुल देखिए जितने भी आध्यात्मिक धार्मिक नियम है ना हमको ईश्वर के पास में ले जाने के लिए बने हैं अभी वही धार्मिक नियम हमको ईश्वर से दूर ले जाएंगे तो फिर क्या अर्थ है इतने सब नियम का पालन ठीक ठीक गंगाजल थोड़ा सा टकने से ही वो हो जाएगा देखिए कि एक बात याद रखिए आध्यात्मिक जीवन में हमारा सबसे बड़ा शत्रु है तमस यानी कि तमस से छूटने के लिए हमको यह सब नियम बनाए गए हैं कि आप जल्दी से उठ जाइए स्नान कीजिए धुले हुए वस्त्र पहनिस बाद में मंगल आरती अटेंड कीजिए ऐसा करने से ही आपका तमस चला जाएगा अभी मान लीजिए कि मैं उठकर के स्नान करने का समय नहीं है तो मंदिर में नहीं जाऊंगा तो यह नियम हमको ईश्वर से दूर ले जाए तो इस तरह का नियम पालन करने की जरूरत नहीं ऑन द अदर हैंड साथ में दूसरा एक खतरा देख लीजिए एक बार मैंने अपने मन में ठीक कर लिया कि चलो अभी ना ही स्नान करने की जरूरत है ना ही धुले हुए कपड़े पहनने की जरूरत है कुछ करने की जरूरत नहीं है स्वेच्छा चार जो मैं मन में आए करूं तो वह तो तमस आ गया यानी कि यह दोनों खतरे हैं एक और बहुत ज्यादा नियम का पालन करने को जाएंगे और नियम का पालन नहीं होगा तो ईश्वर से दूर हो जाएंगे यह भी ठीक नहीं है और फिर एक बार हमने मन में ठीक कर लिया कि नियम का पालन करने की जरूरत ही नहीं मैं स्वेच्छाचारी करूंगा तो मन फिर से तमस में डूब जाएगा यानी कि मध्यम मार्ग क्या है जहां तक हो सके नियम का पालन कीजिए नियम का पालन आप तभी मत कीजिए जब वह आपका शरीर असत है या तो फिर नहीं हो पा रहा है उस क्षेत्र में पालन मत कीजिए किंतु जहां तक हो सके पालन कीजिए तो यह एक मध्यम पंथा है हां बिल्कुल हो जाएगा बिल्कुल हो जाएगा

प्रश्न: मैं वात के कारण अपने पैरों को मोड़ नहीं सकता। इसलिए मैं कुर्सी पर बैठकर जप करता हूं। क्या यह ठीक है?

उसमें कोई दिक्कत वाली बात नहीं देखिए जैसे मैंने कहा कि नियम बने हैं हमारे मन में से तमस को दूर करने के लिए तो अभी नियम छोड़ दिया तो स्वेच्छाचारी आ जाएगा और नियम की इतनी चिंता करी कि फिर भगवान से ही दूर हो गए ये दोनों एक्सट्रीम से हमको बचना है मध्यम मार्ग रखना है जहां तक हो सके मैंने आसन पर बैठ के जब किया और नहा नहीं हो पाए अभी पैरों में दर्द है तो क्या करेंगे अभी मां को ही देखिए मां जब करती है मां कुछ भी करती है पैर सीधे रख कर के बैठती है क्यों क्योंकि मां को पैर में आर्थराइटिस है मां पैर वो फोल्ड नहीं कर सकती मां का इस तरह का फोटो आखिर में देखिए कि हमको देखता है तो फिर अभी आर्थराइटिस है तो फिर क्या करेंगे जो शरीर की जो अवस्था है उसको भी तो हमको देखना पड़ेगा इसलिए ठाकुर ने कहा कि आमी तुम्हार पिरबी टरबीन होते जाओ ना मैं तुम्हारा प्रवीण टवीन होने वाला नहीं हूं शेख घटना अच्छ है यह जो आपने कहा ना

प्रश्न: उपवास के कष्ट के बारे में

वह घटना है कि दो-तीन नववधू अभी शादी हुई है ऐसी दो-तीन लड़कियां दो लड़कियां ठाकुर के पास में आई तो ठाकुर ने देखा कि चेहरा सूख गया है तो उन्होंने कहा कि वे लोग उपवास करके शिव पूजा ना कि ऐसा कुछ कर रही थी तो इमीडिएट ठाकुर ने कहा कि देखो तुम लोगों का ऐसा चेहरा देख कर के मुझे कष्ट होता है अभी जाओ नौबत में जाके मां के पास में से खाना खाके आओ और इस तरह का कष्ट मत करना और मैंने ठाकुर ने स्पष्ट कहा कि आपका इस तरह का चेहरा देख कर के मुझे कष्ट हो रहा है है ना तो यह बात है कि नबत में यह दक्षिणेश्वर में यह घटना हुई है देखिए कि यह जब ये उपवास करना यह सब क्या है ना जैसे कि एकादशी का उपवास है हमारे संग में बहुत सारे साधु करते हैं एकादशी का उपवास तो करना चाहिए ठाकुर ने खुद ने मास्टर महाशय को कहा कथामृत में देखिए ठाकुर कहते हैं कि तुम एकादशी करो तो अभी क्या है हमेशा देखिए कि एक्सट्रीम से बचना है एक और है कि कृष्ण किशोर की एकादशी है ठाकुर उसकी मजाक उड़ाते हैं तो बढ़िया मजे से लची खा लिया उसके बाद में देखा कि दूध के भीतर में दो तीन रोटियां भिगा करके रखी है बाद में उसको खाएंगे तो वह कृष्ण किशोर वाली एकादशी भी नहीं करनी है कि एकादशी के दिन इतना ज्यादा खा लिया कि ऊपर में से पेट खराब हो गया वह भी नहीं फिर एकादशी या तो फिर उपवास इतना भी नहीं करना है कि चेहरा सख जाए ठाकुर को कष्ट हो सभी चीजों में मध्यम पंथा रखना है यह हमारे संघ का आदर्श है या कि नियमों का बिल्कुल मने उड़ा कर के बंद करके स्वेच्छाचारी में नहीं चले जाना है यह कभी नहीं करना है और नियमों के बंधन में ऐसे पड़ गए कि फिर भगवान को भूल कर के नियम के पीछे दौड़ने लगे ऐसा भी नहीं करना है मध्यम पंथा हमेशा रखना

प्रश्न: विधवा को एकादशी व्रत रखना चाहिए या नहीं? माँ शारदा क्या कहती हैं?

है देखिए एकादशी करना नहीं करना इन सबके पीछे मां ने जो कहा था ये जो विधवाओं के जो कुछ नियम होते हैं ना व बड़े कठिन होते हैं आपने विधवा कहा कि सदवाक्य समझ नहीं पाया किंतु मां ने जो यह उपदेश दिया है वह एक विधवा स्त्री को उपदेश दिया है उन्होंने उन्होंने कहा कि तुम अभी क्योंकि विधवाओं के बड़े कठिन नियम है अपने समाज में उनको खाना में खाना खाने में तपस्या करने में इतना सब कुछ उनको यह कर दिया जाता है कि उनका जीवन बड़ा कष्टम हो जाता है इसलिए मां ने कहा था इस विधवा स्त्री को कि तुम लोग एकादशी करोगे तो मछली खाके एकादशी करना यानी कि क्या है कि इतना देखिए कि विधवाओं के पास में ऐसा कोई ऑप्शन नहीं रहता है कोई कोई विधवा होती है जैसे कि अघोर मणि देवी गोपाल की मां तो गोपाल की मां इच्छा करके सब तपस्या करती थी यह गोलाप मा इच्छा करके तपस्या करें सभी तो ऐसा नहीं होता है वो तो बहुत सारी विधवा चाहती है कि अच्छे से खाने को मिले पहनने को मिले सब कुछ हो तो समाज के नियम उनको फोर्स करते हैं तपस करने के लिए यह तो देखिए कि जबरदस्ती की हुई तपस्या किसी काम की नहीं है इसलिए मां ने इस स्त्री को कहा था कि तुम मछली खा करके भात अच्छा तो देखिए कि यह सब चीजों में अगेन जोर जबरदस्ती करके करने से कोई लाभ नहीं है विधवा को माने बोला है यह प्रसंग मुझे पता है सद्वाप सेए होती है इच्छा करके करनी है समाज के नियम है इसलिए करना इस तरह की तपस्या का कोई अर्थ नहीं तो इसके लिए जितना भी हमसे हो सके आपकी इच्छा है मछली देकर के भात खाना तो खा सकते हैं एकादशी नहीं करना तो वह भी कर सकती है डिपेंड है कि ईश्वर की जो प्राप्ति है या तो फिर आध्यात्म का रास्ता है वह पूरा वॉलंटरी होना चाहिए इवॉलेंट कुछ नहीं होना चाहिए अभी मास्टर महाशय यहां पर आए तो ठाकुर ने ऐसा तो नहीं कहा कि तुम हमेशा के लिए यहां पर रुक जाओ जिस तरह से उन्होंने यह जो त्यागी संतानों को पकड़ के रखा था अपने पास में तो जिसका जो संस्कार है उस संस्कार उस दिशा में उनको ले जाएगा तो नियम क्या है उसकी इतनी चिंता किए बिना मेरे शरीर की क्या आवश्यकता है मेरे संस्कार मुझे किस डायरेक्शन में ले जा रहे हैं उसको देखना थोड़ा ज्यादा बेटर

प्रश्न: एकादशी के उपवास के समय हमारा मन भोजन की ओर ही जाता रहता है

रहेगा मेन चीज एक बात याद रखनी है कि ऐसे भी करके ठाकुर में मन बना र है उसमें एकादशी करके बना रहे तो भी अच्छा है एकादशी नहीं करके बना रहे तो भी अच्छा है इस सब चीजों में हम जितना गहराई में जाएंगे उतना ही कंफ्यूजन बढ़ता जाएगा इसलिए मेरा तो बहुत स्पष्ट मानना है आजकल के जो हम भक्त है हम सभी लोगों के लिए कथामृत ठाकुर मा स्वामी जी की और जितनी पुस्तकें हैं उसका नियमित पाठ करते रहना और जो गुरु महाराज के पास में से जो मंत्र मिला है उसको जितना हो सके उतना जप करते रहना यह दो चीज सबसे ज्यादा इंपॉर्टेंट है बाकी फिर मैंने इसके साथ-साथ में और क्या किया नहीं किया उस सब में इतना कभी मत जाइए वह फिर क्योंकि क्या है कि ठाकुर क्या कहते हैं कलिते अनगतला कली में हमारा अनगतला है अभी आज से 100 साल पहले अभी जो साधुओं ने मास्टर महाशय ने जो तपस्या की उसका 1 पर भी हम लोग नहीं करने पाने वाले हैं तो फिर वह सब टेंशन अपने सर पर रखे ये बेटर है कि जितना हो सके जप करते जाओ जितना हो सके ठाकुर म स्वामी जी की पुस्तकें पढ़ते जाओ यह दो होने से ही हमारे लिए हो जाएगा बाकी का फिर जैसे ठाकुर ने कहा ना एक टू कोले क्य ऐसे बले देवे एई एई थोड़ा सा करने से ही कोई आकर के कह देगा यह यह तो कुछ ही दिनों में हमको ठाकुर ही भीतर में से ही मन में से ही यह आ जाएगा समझ में कि अभी हमको आगे क्या करना है जितना हो सके जबकि की संख्या बढ़ाते जाइए जितना हो सके अपना साहित्य का पाठ करते जाइए बाकी सब ठाकुर पर छोड़ दीजिए इतना टेंशन मत लीजिए