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Sri Ramakrishna Kathamrita ·

श्रीरामकृष्ण कथामृत 27 Oct 1882 केशव सेन के साथ ठाकुर का नौका विहार 21 Aug 2024

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ओम स्थापक च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार षय राम कृष्णा यते तो हमने देखा के श्री रामकृष्ण कथामृत में ब्रह्म भक्तों के साथ में ठाकुर एक जहाज में बैठ कर के गंगा में टहलने के लिए जाते हैं और ब्रह्म भक्त उनकी अमृतम वाणी सुनते हैं और इसी में ठाकुर ने अपना जो भारतीय शास्त्र का एक एक बहुत बड़ी एक पहली है पहली तो नहीं कहेंगे एक्चुअली पहली है नहीं उलझन है नहीं जिसको बनानी है इसको उलझन उन्होंने बनाया है जो उसको उलझन नहीं बनाना चाहते उनके लिए तो बड़ा ही सहज है कि ब्रह्मण का स्वरूप क्या है और हमारा स्वरूप क्या है हम क्या ब्रह्मण के साथ में एकही एकही भूत है एकाकार है ना कि हम ब्रह्मण से अलग है हमारे भीतर में जो जीवात्मा है जन्म जन्मांतर की जो यात्रा करता है यात्रा करने के बाद में आखिर में जब कर्मों का प्रवाह उसका समाप्त हो जाता है कर्मों का लेखा जोखा शून्य हो जाता है उस समय जीवात्मा विघटित हो जाता है हमको मुक्ति प्राप्त होती है फिर हम चाहे उसको ईश्वर दर्शन कहे ना कि हम चाहे उसको मुक्ति कहे ना कि निर्वाण कहे जो भी इसको हम कहना चाहे आत्मज्ञान कहे कि आत्मदर्शन कहे जो भी कहे वह हम प्राप्त कर लेते हैं जो कि आध्यात्म जगत का सर्वोच्च शिखर है आध्यात्म जगत की सर्वोच्च उपलब्धि है अभी इस सर्वोच्च उपलब्धि को प्राप्त होने के बाद में क्या होता है उसके बारे में भी कुछ प्रश्न है तो इस प्रश्नों का उत्तर देने के लिए हमारे शास्त्रों में उपनिषदों के बाद में जो कुछ ग्रंथों की रचना हुई उन ग्रंथों को कहा जाता है प्रकरण ग्रंथ और इस प्रकरण ग्रंथों में से प्रकरण ग्रंथों की रचना करने वाले थे आचार्य जैसे कि मधुवा चार्य जैसे कि रामानुजाचार्य जैसे कि शंकराचार्य इन तीन मुख्य आचार्यों का नाम हमारे इतिहास में भारतीय धर्म साहित्य में लिया जाता है म चार्य ने त वेदांत की रचना की वेदांत की रचना की अर्थात की जो उपनिषदों में हमने जैसे देखा कि वेदांत के तीन प्रमाण वृत ग्रंथ है जिसको कि हम प्रस्थान त्रय कहते हैं श्रुति प्रस्थान स्मृति प्रस्थान और न्याय प्रस्थान श्रुति प्रस्थान हो गया अपने उपनिषद स्मृति प्रस्थान हो गया भगवत गीता और न्याय प्रस्थान हो गया अपना ब्रह्मसूत्र तो इन तीनों को वेदांत के प्रमाण भूत ग्रंथ माने जाते हैं किंतु कहा कोई कोई लोग ऐसा मानते हैं कि इसमें वेदांत को जो कुछ कुछ डीपर क्वेश्चन है फिलोसॉफिकल क्वेश्चन उसकी मीमांसा इसमें नहीं मिलेगी इसके लिए उसके ऊपर में भस्य की रचना करनी पड़ेगी तो बाद के युग में जब यह प्रस्थानत्रई की रचना हो गई उसके बाद के युग में उसके ऊपर में भाष्य की रचना हुई भाष्य का या तो फिर चार्य मुख्यत वे तीन है द्वैत भाष्य की रचना करने वाले मधवा चार्य विशिष्ट अद्वैत भाष्य की रचना करने वाले रामानुजाचार्य और अद्वैत भाष्य की रचना करने वाले श्रीमद शंकराचार्य तो यह तीन आचार्यों के माध्यम से जो तीन भाष्य या तो फिर जो तीन इंटरप्रिटेशन उपनिषद वेदांत के ऊपर में रचित किए गए उसको लेकर के बाद में काफ कुछ संघर्ष कहो ना कि वाद विवाद कहो अपने भारत में चलता रहा हिंदू धर्म में चलता रहा कोई कहते हैं कि हम तो द्वैत फॉलो करते हैं हम तो भगवान कृष्ण के उपासक है जिसमें भक्ति को ही प्राधान्य दिया गया है कोई कोई होए कि आदि सांख्य शास्त्र को सांख्य दर्शन को फॉलो करते हैं कहते हैं कि योग ही एकमात्र प्रमाण भूत साधन पद्धति है तो कोई कोई शंकराचार्य को फॉलो करके कहते हैं नहीं जी यह अद्वैत वेदांत ही यानी कि जीव ब्रह्म ऐक्य यही एकमात्र सही सत्य है और इसकी साधन पद्धति है ज्ञान तो ज्ञान ही सही साधन है तो यह जो पूरा जो अपना इतिहास चलता आ रहा था इसका समन्वय श्री राम कृष्ण ने यहां पर जो किया इसको हमने लास्ट टाइम देखा ठाकुर क्या कहते हैं कि ब्रह्मा और शक्ति अभेद एक के मानले आरटी के मानते हुए ब्रह्म और शक्ति अभेद है एक को मानने से ही दूसरी को मानना होगा और इस जो पूरा पैसेज है इसका इंटरप्रिटेशन इसके बारे में कुछ चर्चा हमने लास्ट टाइम की थी कि किस तरह से ब्रह्म और शक्ति को अभेद मानने से इसके इंप्लीकेशंस क्या होते हैं सर्वप्रथम तो इंप्लीकेशन यह है कि ठाकुर सभी साधन पद्धतियों को स्वीकृत करते हैं जैसे कि ध्व वाले कहेंगे अवैत या तो विशिष्ट अद्वैत वाले कहेंगे कि सिर्फ भक्ति ही सही सही साधन पद्धति है अद्वैत वाले कहेंगे कि नहीं ज्ञान ही सही साधन पद्धति है ठाकुर सभी साधन पद्धतियों को स्वीकृत करते हैं सांख्य योग में जो दी गई योग शास्त्र वाली पद्धति ज्ञान पद्धति भक्ति मार्ग और गीता में जो कहा गया है वह कर्म मार्ग या तो फिर अपनी संहिता हों में जो कहा गया है वह कर्म मार्ग तो कर्म ज्ञान भक्ति और ध्यान न चारों साधन पद्धतियों को ठाकुर स्वीकार करते हैं तो यह तो हो गया प्रथम इंप्लीकेशन सेकंड इंप्लीकेशन क्या है सेकंड इसका जो रिजल्ट क्या है ब्रह्म शक्ति को अभेद मानने का तो दूसरा इंप्लीकेशन है कि भले ही चाहे निर्विकल्प समाधि सर्वोच्च उपलब्धि हो आध्यात्म जगत की किंतु वोह आखिरी उपलब्धि नहीं है यह आध्यात्मिक जीवन का अंत नहीं है ऑन द अदर हैंड ज हम लोग अभी तक जो मानते थे कि निर्विकल्प समाधि आध्यात्मिक जगत का आध्यात्मिक साधना का अंत है वह चरम शिखर है चरम शिखर है चरम सीमा है तो चरम शिखर और चरम सीमा अवश्य है किंतु आध्यात्मिक जीवन का अंत नहीं है ऑन द अदर हैंड जैसे कि लास्ट टाइम हमने डिस्कस किया था कि यह तो आध्यात्मिक जीवन का प्रारंभ ही है राजा महाराज कहते हैं समाधि आध्यात्मिक जीवन का प्रारंभ ही है तो इसका अर्थ अर्थ क्या हुआ कि जब साधक सर्वोच्च निर्विकल्प समाधि प्राप्त करता है तो उसमें से हालांकि 21 दिन में मृत्यु होने की पूरी संभावना है किंतु कुछ कुछ साधक ऐसे हैं जो कि इती इती अर्थात कि जिस ब्रह्मण को प्राप्त करने के लिए मैंने जो पूरा जगत त्याग किया मेरे जो अपनी कामनाएं वासना है मेरा जो अहंकार जो कुछ भी मैंने छोड़ दिया जिसको कि मैंने संपूर्ण रूप से तज दिया ये इवन यह जो डिजायर्स जो है यह मेरा जो अहंकार जो है यह जो पूरा जगत है इवन यह जो भोग्य वस्तुएं जो है सब कुछ तो ब्रह्मण का ही बना हुआ है और इसी ब्रह्मण से ही यह पूरा जगत चल रहा है तो यह साधक इति इति करके जगत में वापस आएगा उसका अहंकार पुनः जागृत होगा किंतु इस अहंकार से किसी भी तरह का भोग होगा नहीं उससे किसी भी तरह की कामना वासना का इसको लेश भी नहीं लगेगा ऑन द अदर हैंड देखिए कामना वासना रहेगी शायद किंतु वो बिल्कुल निर्दोष हो जाएगी ठाकुर का है कि एक छोटा बच्चा आया है ठाकुर जलेबी खा रहे हैं ठाकुर को जलेबी बड़ी ही प्रिय है किसी के साथ में शेयर नहीं करना चाहते खास करके दूसरे छोटे बच्चे के साथ तो इमीडिएट ठाकुर ने जलेबी का जो वो बास्केट था अपने पीछे में छुपा दिया और फिर समाधि में चले गए तो देखिए कि यह जो बचपना कामनाएं एक तरह से रह जाती है किंतु वो संपूर्ण रूप से निर्दोष हो जाती है इससे किसी भी तरह का कर्म का बंधन नहीं लगेगा जो कि हम अभी तक साधक है या तो जिन्होंने साधना करने की शुरुआत नहीं की उनकी कोई भी कामना या कोई भी वासना होगी वोह वासना को चरितार्थ करने को जब जाएंगे वासना की पूर्ति करने के लिए जब भी जाएंगे तभी तभी कर्मों का बंधन कर्म की बेड़ी और तेज होकर के अपने पैरों में लगेगी और भी अपना जो नेगेटिव बैंक बैलेंस है वो और भी बढ़ेगा किंतु जिस क्षण ये कामनाएं वासना एं निर्दोष हो गई तो उसकी पूर्ति करने से कुछ भी होगा नहीं किसी भी तरह का कर्म का बंधन कर्म की कोई भी जंजीर अपने पैरों में लगेगी नहीं तो ये इस दोनों स्थितियों में तफावत है जब हम जब साधना कर रहे हैं उस समय की और जब सिद्ध होकर के फिर से यही अहंकार यही काम क्रोध मद लोभ मोह वही सब वापस आ जाता है किंतु संपूर्ण रूप से निर्दोष हो जाता है कभी-कभी ठाकुर की बातें हम सुनते हैं तो हमको लगता है कि अरे ठाकुर इतने सिद्ध होकर के इस तरह का आचरण क्यों करते हैं उनका जो छोटा सा भतीजा था तो वो ऐसा वो तूफान करता था ये करता था नटखट था वोह बच्चा तो ठाकुर परेशान होकर के अभी उसको मारने को जाएंगे ऐसा मने ऐसा वो ठाकुर बोलते हैं कि मैं गुस्सा आ गया तो मैं उसको मारने को गया हालांकि वो मारे नहीं उसको किंतु गुस्सा तो आ गया एक समय देखे तो ये ठाकुर का गुस्सा भी फिर कभी-कभी इसके ऊपर में क्रोधित हो जाते थे हृदय के ऊपर में तो हृदय के ऊपर में क्रोध करना या फिर ऐसे छोटे बच्चे पर क्रोध करना किंतु यह क्रोध निर्दोष है इस क्रोध से किसी भी तरह की काम कर्म की जंजीर वो बनेगी नहीं कर्म का नेगेटिव बैलेंस बढ़ेगा नहीं तो ये इस दोनों अवस्थाओं में डिफरेंस है तो अच्छा यहां तक तक तो हमने सोचा था इसके बाद में किंतु एक और दूसरा प्रश्न खड़ा होता है दूसरा प्रश्न यह है कि यदि आप सभी तरह की साधन पद्धतियों को स्वीकार करते हैं सभी तरह के दर्शन शास्त्रों को स्वीकार करते हैं कि अवस्था विशेष के अनुसार यदि मैं प्रारंभ में हूं यदि आध्यात्मिक जगत के तो ध्व मेरे लिए बेटर है कि भगवान कृष्ण है मैं उनका उपासक हूं और मैं उनकी आराधना करता हूं जैसे-जैसे मेरी आध्यात्मिक उन्नति होती गई मैं विशिष्ट अद्वैत से अद्वैत की ओर जाऊंगा कि हां मैं ही हूं वही परब्रह्म जो कि भगवान श्री राम कृष्ण थे जो राम जो कृष्णा वही मैं खुद हूं यह कहने की हमारी क्षमता है यदि हम उस लेवल पे चले जाए साधना के तो ये साधना का जो पूरा स्पेक्ट्रम है उसको यदि हम स्वीकार करते हैं तो एक प्रश्न यह होता है कि स्वामी जी खास करके बार-बार अद्वैत वेदांत के ऊपर में अ भार क्यों देते हैं अद्वैद वेदांत का इंपॉर्टेंस सब समय क्यों वर्णना करते रहते हैं यह एक प्रश्न हो सकता है अपने ऑर्डर में भी देखेंगे तो मैंने जितने भी सीनियर साधुओं को देखा कुछ-कुछ को छोड़ कर के सभी सीनियर साधु अद्वैत वेदांत को ही मानते हैं कि यह हमारा प्रमाणिक एक दर्शन शास्त्र है हमारे संघ के लिए दूसरा कि मां का भी वो फेमस पत्र है जिसको लेकर के मेरा कुछ साधुओं के साथ में डिबेट हुआ था मां ने कहा कि तुम्हारे गुरु भी अद्वैत थे तुम भी अद्वैत ही हो अर्थात कि जब स्वामी जी के मायावती गए थे देखा ठाकुर का फोटो वहां पर भी चला आया है तो ठाकुर का फोटो हालांकि उन्होंने खुद ने हटाने को नहीं बोला था किंतु स्वामी जी का मन का भाव समझ करके वहां के साधुओं ने फोटो को हटा दिया था किंतु वो फिर मां को पत्र लिखा गया कंप्लेन की गई कि मां देखिए कि स्वामी जी के इस तरह से सोचना है तो माने इमीडिएट कहा कि तुम्हारे गुरु भी अद्वैत थे तुम भी अद्वैत हो तो तो अभी देखिए कि यह प्रश्न होता है कि हम लोग अद्वैत वेदांत को इतना इंपॉर्टेंस क्यों देते हैं जबकि कर्म ज्ञान भक्ति ध्यान चारों पद्धतियों को हम स्वीकार करते हैं भक्ति को भी स्वीकार करते हैं ईश्वर को भी स्वीकार करते हैं ब्रह्मण को भी स्वीकार करते हैं आत्मन को भी करते हैं तो फिर ऐसा क्यों तो ऐसा होने के पीछे एक सूक्ष्म रहस्य छुपा हुआ है वो सूक्ष्म रहस्य क्या है देखिए मैं यदि ये कहूं कि भक्ति मार्ग या तो फिर भक्ति स्कूल ऑफ दर्शन शास्त्र भक्ति दर्शन शास्त्र और भक्ति दर्शन और ज्ञान दर्शन दोनों को मैं जद समान पेडेस्टल पे रखूं एक समान स्टेज पे रखूं तो पता है हमको पता है कि जिसको हम त्याग कहते हैं उसकी महिमा सर्वोच्च वर्णित की गई है ज्ञान शास्त्रों में ज्ञान दर्शन में अद्वैत वेदांत ने अद्वैत वेदांत एकमात्र एक ऐसा वेदांत शास्त्र है ऐसी वेदांत की स्कूल है जहां पर कि त्याग की महिमा को सर्वोच्च रूप से उसको स्वीकृत किया गया है ब्रह्मचर्य को सर्वोच्च साधन पद्धति के रूप में स्वीकारा गया है यह मैं आत्मन हूं यह शरीर नहीं शरीर के विकार नहीं शरीर की भोग वासना एं नहीं यह सबसे ज्यादा स्वीकृति इसको अद्वित मार्ग में मिली है अभी इसका अर्थ यह नहीं है कि ध्व मार्ग में त्याग की महिमा को स्वीकृत नहीं किया गया है ऑफकोर्स त्याग की महिमा का स्वीकार है किंतु वहां पर आप साथ में यह भी देखिए कि भक्ति या तो फिर शरणागति को भी इक्वल इंपॉर्टेंस मिला है साधन पद्धति के रूप में जबकि ज्ञान योग है या तो फिर यह अद्वैत वेदांत है वहां पर त्याग के समान और कोई साधन पद्धति नहीं त्याग ही सर्वोच्च साधन पद्धति है इस तरह की की महिमा अद्वैत वेदांत में गाई गई है तो इससे होता क्या है यदि हम द्वैत को फॉलो करते हैं तो बहुत सारे लोग ऐसा सोचते हैं कि चलो भाई मन के ऊपर में संयम रखना कंट्रोल रखना यह तो कोई बहुत आसान नहीं है चलो थोड़ा बहुत बीच-बीच में भोग कर लेते हैं क्योंकि यदि ईश्वर सही है और ईश्वर तारण हार है तारण करता है तो वोह तो किसी नियम के वश में नहीं है जैसे कि ठाकुर ने वो जो मथुर बाबू को बताया था मथुर बाबू कहते है कि ईश्वर को भी तो अपने खुद के बनाए हुए नियम का पालन करना पड़ता है तो ठाकुर कहते हैं अरे भाई ईश्वर जिसने नियम बनाया वो तो नियम के परे हैं फिर अभी मथुर बाबू को फिर कैसे समझाए तो दूसरे दिन देखा कि जास्वंद का एक पेड़ था उसके ऊपर में दो अलग तरह के सफेद और लाल मैं एग्जैक्ट कलर भूल गया तो लाल और सफेद ऐसे ही जो भी हो दो कलर के दो विभिन्न कलर के फूल एक ही डाल के ऊपर में थे तो ठाकुर ने उस डाल को तोड़ कर के मथुर बाबू को बताया कि देखो दो अलग-अलग विभिन्न रंग के फूल एक ही डाल के ऊपर में है तो इसका अर्थ है कि ईश्वर भी अपने नियमों बनाए हुए नियम को तोड़ सकता है जनरली लाल फूल का पेड़ हो तो उसके ऊपर में लाल ही फूल आएंगे सफेद पेड़ फूल का कलर का फूल हो तो सफेद फूल ही आएंगे हालांकि देखिए आज की दृष्टि से देखें तो इसको म्यूटेशन कहते हैं और म्यूटेशन भी तो वैसे तो जगत के नियम के भीतर में ही है एक डाल पे विभिन्न रंग के फूल आना कोई असंभव बात नहीं है जेनेटिक म्यूटेशन की वजह से ऐसा होता है तो वो भी तो म्यूटेशन भी तो ईश्वर के नियमों के भीतर में है तो भले चलो इतना कॉम्प्लिकेटेड आर्गुमेंट नहीं करके एक सुपरफिशियली इसको ले लेते हैं कि यह नियम ईश्वर अपने से भंग कर सकता है यह तो सिर्फ उपमा के लिए दिया गया है ठाकुर ने तो दिव्य दृष्टि से सही सही ईश्वर को अपने नियमों को भंग करते हुए देखा होगा तो जो भी है तो यदि ईश्वर अपने नियमों का भंग कर सकता है तो जैसे कि यह रामचंद्र दत्त कहते हैं कि हम लोग गृहस्थ होकर के संसार में रह कर के ठाकुर का गुण गान कीर्तन करेंगे उसमें गलत क्या है अवतार का शरण हमने ले लिया अभी इस जगत में करने को बाकी क्या बच गया है और यह जो नरेण वगैरह जो लड़के हैं झूठ मूठ के सबको घर छुड़वा करके माता-पिता को त्याग करके एक नया एक दूसरा एक मठ में जाकर के रहते हैं क्या सब नाटक करते हैं यह सब चीजों की क्या ज जरत है क्यों सन्यास लिया है भाई क्यों बिना मतलब काम धम नहीं करते यंग हो इतना सक्षम शरीर है भिक्षा मांग के घूमते हो ये जो भिक्षा करने को जाते हैं योगन महाराज वगैरह का ये जो अनुभव कभी-कभी वर्णन करते हैं कि हम भिक्षा मांगने को गए और वो एक औरत ने आकर के कहा कि अरे इतना बलिष्ठ शरीर है बलवान शरीर है भिक्षा मांगते शर्म नहीं आती जाओ जाओ थोड़ा सा काम करो काम करके खाओ तो यह सब एक क्यों नाटक बना कर के रखा है ऐसा कुछ कुछ लोगों का जो मानना था वो इसीलिए मानना था कि शरणागति को इक्वल इंपॉर्टेंस से भक्ति शास्त्र में त्याग की तरह ही त्याग का जितना इंपॉर्टेंस है उतना ही शरणागति का भी है किंतु यह जो हम सन्यास परंपरा में अपने संघ की रचना हुई है अपने संघ अर्थात हम सभी त्यागी हो सन्यासी हो ना कि गृहस्थ हो हम सभी तो रामकृष्ण संघ से जुड़े हुए हैं हम चाहे त्याग का जो सर्वोच्च आदर्श कितना हम उसको अपना पाए तना ना अपना पाए यह अभी एक दूसरा प्रश्न है किंतु त्याग के आदर्श को स्वीकृत तो किया है रामकृष्ण संघ से दीक्षा तो ली है तो ये संघ की जो परंपरा है यह संघ का जो फाउंडेशन है वह त्याग के ऊपर में बना हुआ है ब्रह्मचर्य के ऊपर में बना हुआ है यह इसी फाउंडेशन को इसके बारे में किसी के मन में द्विधा ना हो इसके लिए अद्वैत वेदांत की सर्वोच्चता अपने संघ में कभी-कभी हम लोग सीख करते हैं कि यदि कोई भी स्कूल के बारे में स्टडी करना है कोई भी दर्शन शास्त्र का अभ्यास करना है तो अद्वैत वेदांत का कीजिए सर्वप्रथम जिससे कि मन में जो कोई भी संदेह हो मन में जो कोई भी आपको ये एक्सक्यूज जो भोगी व्यक्ति है वो एक्सक्यूज सोचने में बहाना खोजने में बड़ा ही वो विद्वान होता है कहां से कैसे बहाना करेगा वो जो एक ब्राह्मण की वो जो फेमस कहानी है ना ठाकुर ने बताई कि एक ब्रा एक ब्राह्मण था उसने एक बगीचा बनाया और बगीचे में वो बड़ा उसका प्रेम था बगीचे पे एक दिन एक गाय आई और बगीचे में वह जो पेड़ पौधे लगाए थे उसको खाने लगी तो अभी ब्राह्मण को आ गया गुस्सा एक लाठी लेकर के गाय को जोर से मारी तो अभी गाय वहीं पर मर गई आघात होकर आघात प्राप्त करके तो अभी यह तो बड़ा ही चिंता में पड़ गया अरे गौ हत्या का पाप लगेगा तो नरक में जाना पड़ेगा क्या करें क्या करें तो अभी ये जो जो इस तरह से जिसका वो जो अकट बकट व जिसका दिमाग होता है ना विचित्र दिमाग ये लोग बहाने बनाने में बड़े ही पारंगत होते हैं तो उसने बढ़िया सा एक लॉजिक बना दिया क्या लॉजिक बनाया गाय की हत्या तो मैंने नहीं की है इस हाथ ने की है और हाथ के देवता है इंद्र अर्थात कि गाय का हत्यारा है इंद्र तो ऐसा करके उसने लॉजिक बना दिया जब यमदूत आए उसको लेने के लिए चलो नरक में तो ये कहता है कि मैंने तो हत्या नहीं की इंद्र ने की है इंद्र को जाकर के पकड़ लो और लॉजिक बताया अ यमदूत भी बेचारे इस लॉजिक में फंस गए वो गए जाकर के इंद्र को पकड़ने के लिए तो इंद्र सोचता ये तो बड़ा ही मुश्किल हो गया ये ब्राह्मण वो पहले तो हत्या करता है फिर मुझे फंसा आता है ऐसा तो कैसे चलेगा उसने थोड़ा सा समय मांगा मुझे थोड़ा सा समय दीजिए जो असली हत्यारा है उसके पास से मैं कन्फेशन निकालू हगा तो ठीक है व उसको थोड़ा समय दिया गया तो इंद्र एक सामान्य व्यक्ति का देह स्वरूप धारण करके उसके बगीचे में आता है पूछता है कि अरे पंडित जी ये तो इतना सुंदर गार्डन है इतने सुंदर पौधे हैं इतने सुंदर फल है किसने लगाया तो वो पंडित बड़ा ही वो ब्राह्मण बड़ा ही गर्व पूर्वक कहता है मैंने लगाया अच्छा यह तुमने पेड़ लगाए तो क हां मैंने पेड़ लगाए ये क्या तुमने यह पौधे लगाए तो हां मैंने पौधे लगाए तो अभी यह सुन कर के इंद्र अपना सही स्वरूप धारण करके बोलता है अरे पाजी जब तुम पेड़ लगाने है फिर जो पेड़ लगाने की जो क्रेडिट लेनी है उस समय तुम और जो गौ हत्या का पाप है उस समय में ऐसा कैसे चलेगा भाई तो फिर यमदूत आ है और ब्राह्मण को पकड़ के ले गए तो ये जो पापी मन जो होता है वो ने बनाने में बड़ा ही एक्सपर्ट होता है अभी कब भी कैसे भी करके मैं पाप करूंगा मने दुष्कर्म करूंगा अभी रोग वासना है एक तरह से देखा जाए तो कोई पाप कर्मा हम इसको नहीं कहेंगे संसार में यह जो काम ये जो सब शक्तियां है यह तो ईश्वर ने ही हमको दी है इसके बिना तो संसार कैसे चलेगा किंतु यदि अमृत के मार्ग पर चलना है तो संसार के सामने लड़ कर के जाना पड़ेगा उस समय यदि हम त्याग करते हैं तो यह मन हजार बहाने खोजे और हजार बहाने खोज करके हमारे हमको भ्रमित करने का प्रयास करेगा उस समय यदि हम फिर यह भक्ति शास्त्र पढ़ के यह सोचना शुरू कर दे कि शरणागति का भी इक्वल इंपॉर्टेंस है त्याग की तरह तो आज शरणागति कर लेते हैं कल त्याग करेंगे परसों त्याग करेंगे तो उस समय हमारे किसी भी साधक के मन में किसी भी तरह का यह दुविधा ना खड़ा हो इसके लिए हमारे सीनियर साधु स्वामी जी के बाद में जितने भी सीनियर साधु है व सभी लोग आपको कहेंगे कि अद्वैत वेदांत को ही सर्वोच्च सिद्धांत समझ के चलिए और इसके पीछे का रहस्य क्या है कि त्याग को ही सर्वोच्च सिद्धांत के रूप में स्वीकृत करना है शरणागति है यह निष्काम कर्म है यह बैठ कर के जब ध्यान है किंतु यह तीनों बाकी तीनों योग है यह त्याग के फाउंडेशन के ऊपर में ही इसका फिर वो निर्माण होगा बिना त्याग आप हजार शरणागति कर लीजिए बिना त्याग के आप लाखों निष्काम कर्म कर लीजिए बिना त्याग के आप लाखों लाखों मंत्र जप कर लीजिए ठाकुर कहते हैं ना कलकाता में लोकेरा लखो लखो जॉब करे खानकी पजन तो जॉब करे जा अर्थात की कलकाता में लोग लाखों लाखों जप कर लेते हैं दुष्चिंता है दुष्चगेल त्याग छोड़ कर के बाकी कुछ भी करें ना तो वो ठाकुर का जैसे दूसरा उदाहरण है जो शराबी थे कुछ नशे में रात को एक नौका में बैठे और नौका को फिर वह चला रहे हैं वह हले सा मार कर के तो पूरी रात नौका चलाई सुबह वो देखा कि वो किनारे प ही है क्यों किनारे प है क्योंकि नौका तो रस्सी से बंधी हुई थी रस्सी ही नहीं खोली पूरी रात भर नौका चलाई कहां से आप आगे जाएंगे वैसे ही आप पूरी रात भर जब करेंगे किंतु यदि त्याग रूपी फाउंडेशन नहीं होगा तो कुछ भी प्राप्त नहीं होने वाला तो यह त्याग की महिमा को हमारे मन में संपूर्ण रूप से दृढ़ करके बिठा देने के लिए अद्वैत वेदांत को हम लोग सर्वोच्च स्वीकृति देते हैं तो इसीलिए मैं जब यहां पर आया था कोई कोई साधु कहते थे कि चलो कथामृत अभी मत पढ़ना कथामृत हमारे लिए नहीं है गृहस्थ लोगों के लिए है क्यों ऐसा कहा तो ऐसा नहीं है कि ठाकुर त्याग की महिमा का वर्णन नहीं करते ठाकुर तो त्याग के राजा है ठाकुर और त्याग ये तो सिनोनिम है जो वो जो थिसलस एक होता है थिसलस पता है ना जिसमें समानांतर शब्द दिए जाते हैं तो जैसे कि एक सम एक शब्द है तो गुड तो ये गुड का समानांतर क्या है तो बेटर या तो फिर नाइस एट्स एक्सटरा उसके 10 समानांतर शब्द है तो ठाकुर का जद वो थेसोरस में एंट्री करेंगे तो समानांतर शब्द त्याग ही होगा त्याग के राजा है ठाकुर तो ठाकुर का कथामृत पढ के भाई हमारा मन भ्रमित क्यों होगा तो इसलिए हो सकता है कि ठाकुर तो थियोरेटिकली और प्रैक्टिकली दोनों तरह से सभी शास्त्र सभी दर्शन शास्त्र सभी साधन पद्धतियों को समान एक इंपॉर्टेंस देते है किंतु ठाकुर के खुद के मन में यह भ्रम कभी नहीं रहा कि त्याग को छोड़ कर के सिर्फ एक मात्र शरणागति से काम होगा यह भ्रम ठाकुर के मन में कभी नहीं रहा ठाकुर आज जन्म शुद्ध पवित्र थे उस शुद्धता और पवित्रता के ऊपर में उन्होंने भक्ति की यह महल भक्ति रूपी महल की रचना की थी हम जद भक्ति करने को जाए और जद ये गड्ढे में जद महल बनाए तो जिस दिन थोड़ा बहुत भी पानी आएगा थोड़ा बहुत भी खिचड़ इकट्ठा होगा अपना पूरा महल टूट जाएगा तो सर्वप्रथम त्याग की महिमा जिस तरह से ठाकुर ने समझी जिस तरह से स्वामी जी हमको समझाते हैं उसको समझ कर के फिर हम ये कहे थोड़ा सा मैच्योर होकर के नहीं जी शरणागति का भी इक्वल इंपॉर्टेंस है ये निष्काम सेवा का भी वही इंपॉर्टेंस है यह जो बैठ कर के सुबह शाम जब ध्यान करते हैं ठाकुर के सामने बैठ कर के या मैं अपने घर में बैठ कर के तो उसका भी वही इंपॉर्टेंस है तो वो इक्वल इंपॉर्टेंस कब यह जो कर्मयोग के माध्यम से भी आपको ईश्वर प्राप्ति होगी तो यह कब यह तभी जब कि मैं संपूर्ण रूप से ब्रह्मचर्य का पालन करता हूं तभी अदर वाइज आप हजार ब्रम कर्म योग कर लीजिए आपको कुछ नहीं मिलने वाला है तो यह जो सीक्रेट है वो सीक्रेट समझने के बाद में सर्वधर्म सर्वधर्म तो नहीं किंतु सर्व दर्शन समन्वय सर्व साधन समन्वय यह तभी हो सकता है जबकि यह छोटा सा सीक्रेट हम समझ ले कि ब्रह्मचर्य ही आध्यात्मिक साधना का फाउंडेशन है इसके अलावा हम एक डग भी आगे नहीं बढ़े हैं जो कुछ भी है ब्रह्मचर्य को इंपॉर्टेंस देने के लिए त्याग की महिमा का गान करने के लिए हम सब कुछ कर रहे हैं जैसे जैसे आप मान लीजिए कि मैं चलो आज मुझे लगा कि ठाकुर के पास आना चाहिए उस दिन से मैं प्रतिदिन मंदिर में जाता हूं साधुओं का संग करता हूं साधुओं की बातें सुनता हूं इस तरह से किसी कोई ना कोई कार्यक्रम में उत्सवों में पार्टिसिपेट करता हूं तो वो सब कब तभी इस सब का प्रयोजन क्या है तो प्रयोजन तो यही है कि आपको यह सभी चीजें त्याग की ओर ले जाती है जैसे ही त्याग प्रारंभ होगा तभी तो आपकी सही साधना प्रारंभ होगी यानी कि देखिए कि ये जो पूरा जो अपना साधक जीवन है उसमें दो बड़े-बड़े माइलस्टोन ठाकुर की दृष्टि से है सर्वप्रथम तो माइलस्टोन है कि हमने त्याग करने का प्रारंभ किया 100% त्याग पहले दिन होगा नहीं जीवन के आखिरी दिन भी नहीं होगा कितने हजारों हजारों जन्म जन्मांतर बीत कर के त्याग हमारे मितर में दृढ़ होगा तो ऐसा नहीं है कि आज से ही मैंने नियम किया कि जितने भी कामनाएं हैं वासना एं है सबसे मैं मुक्त हो जाऊंगा होने वाला नहीं है इस तरह की कोई गिल्ट फीलिंग नहीं रखनी है हमारे मन में ऑन द अदर हैंड त्याग को निष्ठा पूर्वक पकड़ के रहना है तो जिस दिन हमने त्याग को निष्ठा पूर्वक एक साधन मार्ग के रूप में स्वीकृत किया तब से हमारा सर्वप्रथम माइलस्टोन साधक जीवन में आता है सर्वप्रथम माइलस्टोन हमने पार किया सेकंड माइलस्टोन क्या है जब त्याग संपूर्ण हो गया उसी दिन हमको ईश्वर प्राप्ति हो गई आत्म साक्षात्कार हो गया और फिर वहां से पूरे जगत को जैसे-जैसे हम अपने को नेती नेती यह नहीं यह नहीं जगत से दूर जाना है इससे दूर जाना है इससे दूर जाना है वह संकुचित होकर के होने की बजाय अभी हम फिर से विस्तृत होते हैं फिर से वही घर में जाते हैं फिर से वही रिलेटिव्स को मिलते हैं फिर से वही मित्रों को मिलते हैं किंतु वही रिलेटिव्स वही मित्र वही घर के भीतर में ईश्वर का प्रकाश देखते हैं तो यह हृदय को विस्तृत बनाना वो हो गया सेकंड माइलस्टोन तो ये दो माइलस्टोन साधन जगत में है और जिसने ये प्रथम अभी हम ज्यादातर लोग जो यहां पर रामकृष्ण संघ में आते हैं हमने यह प्रथम माइलस्टोन क्रॉस कर लिया है कि हां त्याग की महिमा को समझ गए हैं और यथाशक्ति त्याग करने का प्रयास कर रहे हैं कोई त्याग के मार्ग में अभी प्रारंभ कर रहा है कोई होगा कि त्याग के मार्ग में काफी आगे बढ़ा है हमारे प्रेसिडेंट महाराज है वाइस प्रेसिडेंट महाराज है उनको देखिए कि उनका मन का जो विल पावर है इतना स्ट्रांग होता है तो इतने स्ट्रांग विल पावर से यह लोग त्याग के रास्ते पर बहुत आगे बढ़े होते हैं तो ज्यादातर अभी जितने भी संघ के साथ में साधु ब्रह्मचारी भक्त संलित है संलग्न है हम सभी लोग त्याग की महिमा को समझ चुके हैं प्रथम माइलस्टोन पार कर चुके हैं अभी दूसरा माइलस्टोन है कि निर्विकल्प समाधि प्राप्त होगी जन्म जन्मांतर के यह फेरे कट जाएंगे जन्म मृत्यु जरा व्याधि के ये भवसागर से ऊपर उठ कर के ब्रह्म में स्थित हो जाएंगे मन में अनंत आनंद की धारा प्रवाहित होगी पूरा जगत हमको ईश्वर मय दिखने लगेगा अनंत आनंद से मन भर जाएगा सबके प्रति करुणा दया मैत्री और आशीर्वाद हमारे मन में प्रकट होगा जो हमारा सबसे बड़ा शत्रु है उसको भी हम मन से आशीर्वाद देंगे ये शेर और बकरी दोनों जद हमारे सामने आएंगे तो शेर बकरी का शिकार करने की बजाय हमारे सामने शांत होकर के बैठेगा हजार जैसे कि वो ठाक कहते हैं ना कि फूल जद खिलता है तो भ्रमर अपने से आ जाते हैं तो हमारे व्यक्तित्व से आकर्षित होकर के हमारी शांति से आकर्षित होकर के जितने भी साधक है सब हमारे पास में उपदेश लेने को आएंगे वो स्टेज तो अभी कब आएगा पता नहीं वो निर्विकल्प समाधि कब प्राप्त होगी वो पता नहीं किंतु एटलीस्ट हमने प्रथम माइलस्टोन तो पार किया है वही हमारे लिए एक बहुत बड़ा भरोसा है तो यह हो गया अद्वैत वेदांत का सीक्रेट आपको जद जब भी लगे कि कथामृत में आप देखिए कि ठाकुर भक्ति की महिमा बार-बार गाते हैं बार-बार कहते हैं कि अरे जो ईश्वर है वही शक्ति है मैं ईश्वर पर संपूर्ण भरोसा रख के आनंदमय जीवन जिऊंगा उसमें क्या है तो उससे कभी भी यह भ्रमित मत होएगा कि इसका अर्थ है कि जो त्याग है तपस्या है एक आंतर जीवन है एक गंभीरता है उसको ठाकुर नकारते हैं उसको ठाकुर अस्वीकृत करते हैं नहीं वो पार होकर के बाद में ये स्टेज आता है कि मन में और जगत में आनंदमय ही सब कुछ दिखता है वो तो अल्टीमेट स्टेज है किंतु हाईएस्ट स्टेज जो है वो तो नेति नेति करके ही प्राप्त होगा वो तो त्याग करके ही प्राप्त होगा इस बारे में किसी तरह का भ्रम हमको कथामृत पढ़ कर के ना रहे ये ठाकुर कभी-कभी मधुर भाव में आ जाते हैं गोपी भाव में आकर के भगवान कृष्ण की आराधना करते हुए कीर्तन करते हैं तो यह सब देख कर के हमको लगता है कि चलो यह जो भाव साधना है बालक भाव फिर यह मातृ भाव फिर यह सख्य भाव फिर यह दास भाव शांत भाव मधुर भाव तो मैं भाव कर भाव साधना करके ही मैं सिद्धि प्राप्त कर लूंगा उसमें गलत क्या है स्वामी जी को पढ़ कर के जितने भी युवा है सब अपने गांव की ओर जाए गरीब लोगों को सहाय करें जितने भी सन्यासी है वो सन्यासी गांव-गांव शहर शहर जाकर के धर्म की शिक्षा दे तो ये कर्मयोग की बात सुनकर के लेक्चर फ्रॉम कोलंबो टू अल्मोड़ा पढ़कर के हमको लगता है कि कर्मयोग ही सर्वश्रेष्ठ है मुझे सन्यास लेने की या त्याग करने की क्या जरूरत है तो फिर मने यह जितने भी प्रश्न जब प्रकट होते हैं या तो फिर इवन राजयोग है राजयोग में इतना सुंदर सुस्पष्ट रूप से साधना के सब आयाम बताए गए हैं तो मुझे लगता है कि चलो मैं कहीं वृंदावन या तो फिर यह हरिद्वार जाकर के किसी आश्रम में रह लेता हूं वहां पर दिन रात योगाभ्यास करूंगा प्राणायाम करूंगा आसन करूंगा और उसी से मैं सिद्धि प्राप्त कर लूंगा आजकल आप देखिए काफी कुछ यह चलता है जब से इंटरनेशनल योगा डे चला है यह बहुत सारे आश्रम अपना पब्लिसिटी करते रहते हैं कि यहां पर आपको योग सिखाया जाएगा फिर यहां पे प्राणायाम सिखाया जाएगा तो यह आसन प्राणायाम योग साधना ध्यान इससे आकर्षित हो कर के चले तो जाते हैं किंतु जो क्रिटिकल इंग्रेडिएंट्स नहीं होता तो आप जितना भी कर लीजिए यह सब इससे ज्यादा कुछ होने वाला नहीं और जिस दिन त्याग के के रास्ते पर चलना शुरू कर दिया उसी दिन से चाहे हम शरणागति या भाव का रास्ता हो निष्काम कर्म का सेवा का रास्ता हो ना कि योग ध्यान का रास्ता हो जिस रास्ते पर जाएंगे हमको बहुत ही आसानी से बहुत ही जल्दी सिद्धि प्राप्त होना शुरू हो जाए तो यह है पूरा ठाकुर के वेदांत का विश्लेषण अभी थोड़ा सा आगे पढ़ते हैं ठाकुर फिर यह जो सब ब्रह्म और शक्ति को अभेद बोल कर के एक के बाद एक उदाहरण देते हैं तो कैसे उदाहरण देते हैं कि सूर्य के बाद दिए सूर्य रशमी भवा जाना सूरज को छोड़ कर के सूरज की किरणों के बारे में आप कल्पना भी नहीं कर सकते और सूर्य रश्मी के छेड़े सूरज के भावा जाना सूरज की किरणों को छोड़ कर के सूरज की कल्पना नहीं कर सकते दूध के मन दूध कै सा है ना धोबोलो अर्थात कि सफेद सफेद दूध के छेड़े दूधे लत्व भावा जायना दूध को छोड़ कर के दूध के धवल जो है उसकी जो सफेद रंग है उसकी आप कल्पना नहीं कर सकते आबार दूधेर थब तोव छेड़े दूध के भावा जाए ना और दूध का जो सफेद रंग है धवल क्व है उसको छोड़ कर के आप दूध की कल्पना नहीं कर सकते ताई ब्रह्म के छेड़े शक्ति के शक्ति के छेड़े ब्रह्मा के भावा जायना और उसी ये ब्रह्मा को छोड़ कर के शक्ति को अर्थात कि ये पूरे विश्व ब्रह्मांड को इसकी कल्पना नहीं कर सकते और शक्ति को छोड़ कर के ब्रह्म की कल्पना नहीं कर सकते अर्थात की यह विश्व ब्रह्मांड छोड़ करर के निराकार ब्रह्म की कल्पना करना मुश्किल है इसीलिए जब हम ब्रह्म की कल्पना ईश्वर की कल्पना करते हैं तो एक अवतार की कल्पना करते हैं एक मनुष्य की कल्पना करते हैं जो कि इतने निराकार जो ये है धर्म उसमें भी देखेंगे कि देवी देवताओं वगैरह है मनुष्य के आकार के ही होते हैं तो मनुष्य का किसी ना किसी तरह का आकार तो आपको स्वीकार करना ही पड़ेगा मानना ही पड़ेगा तभी तो उसको पकड़ कर के आप निराकार को पकड़ सकते हैं नित्य के छेड़े लीला और लीला के छेड़े नित्य भावा जाना नित्य को छोड़ के लीला की कल्पना नहीं कर सकते लीला को छोड़ कर के नित्य की कल्पना नहीं कर सकते आध्या शक्ति लीलाम सृष्टि स्थिति प्रलय और छैन आध्या शक्ति लीलाम है वो सृष्टि स्थिति और प्रलय करती है तार नाम काली उसी का नाम काली है काली ब्रह्म ब्रह्म काली काली ही ब्रह्म है ब्रह्म ही काली है एकही वस्तु जखन तिनी निष्क्रिय सृष्टि स्थिति प्रलय कोनो काज को चना एक ही चीज है जब वह निष्क्रिय है तो ना ही सृष्टि करती है ना ही स्थिति ना ही प्रलय एक कोथा जखन भावी तखन ता के ब्रह्म बोले कई जब निष्क्रिय है ना ही सृष्टि स्थिति प्रलय करती है तब उसको मैं कहूंगा ब्रह्म जखन सब कार कर तखन ता के काली बोली शक्ति बोली और जब वह सृष्टि स्थिति प्रलय करती है तो उसी को मैं काली कहूंगा शक्ति कहूंगा एकही व्यक्ति नाम रूप भेद व्यक्ति एक है नाम रूप अलग है कार्य अलग है जब स्थिर है ब्रह्मण है जब कार्य कार्यरत है डायनेमिक है तब एक शक्ति जमन जल वाटर पानी जैसे कि जल है वाटर है पानी है एक ही चीज है किंतु अलग-अलग नाम है एक पुकुरे तीन चार घाट एक तालाब के किनारे तीन चार घाट है एक घाट में हिंदू हिंदू रा जोल खाए एक घाट में बैठ कर के हिंदू जल पीते हैं तारा बोले जल एक घाटे मुसलमाने रा जल खाए एक घाट में बैठ कर के मुसलमान पानी पीता है तारा बोले पानी आर एक घाटे अंग्रेज रा जल खाय तारा बोले वोटर एक घाट में बैठ के अंग्रेज लोग यानी कि गोरे लोग पानी पीते हैं और वो लोग कहते हैं वोटर तीन एक केवल नाम तफावत तीन एक ही है नाम अलग-अलग है पानी कहो जल कहो कि वोटर कहो एक ही चीज है बस नाम अलग-अलग है ताकि क्यों बोल से अल्लाह क गड क्यों बोलचे ब्रह्म केव काली केव बोलचे राम हरि जिशु दुर्गा कोई कहते हैं अल्लाह कोई कहता है गॉड कोई कहता है ब्रह्मा कोई काली कोई राम कोई हरि कोई जेसो तो कोई दुर्गा इस तरह से नाम रूप अलग-अलग है कार्य तो एक ही है व्यक्ति भी एक ही है अभी यहां पर यह जो शक्ति शब्द ठाकुर यूज करते हैं उसका भी एक इंटरेस्टिंग एक बैकग्राउंड है जनरली वेदांत में देखेंगे कि शब्द यूज किया गया है माया माया या तो फिर इसी तरह का कुछ किंतु यहां पर ठाकुर बार-बार शक्ति शब्द यूज करते हैं अभी हमको पता है कि शक्ति तंत्र साधना के साथ में जुड़ा हुआ शब्द है या तो फिर शक्ति साधना के साथ में जुड़ा हुआ शब्द है तो कोई कोई लोग फिर यह भी कहते हैं कि ठाकुर का जो वेदांत है वो है शाक्त द्वैत अर्थात कि शाक्त अद्वैत शाक्त अर्थात की जो देवी के उपासक है उनको शाक्त कहेंगे और अद्वैत वेदांत तो इसमें है ही है तो शाक्त त शाक्त रूपी अद्वैत ऐसा कुछ है ठाकुर का सिद्धांत ऐसा कोई कोई लोग कहते हैं तो इसके पीछे का क्या सीक्रेट है वह थोड़ा सा अभी हम कल देखें आ ओम शा ते परही त श्री राम कष्णा देखो संसार में रहकर ब्रह्मचर्य पालन का जो अर्थ भगवान राम के जीवन में हम देखते हैं कि एक पत्नी व्रत पालन जो मां सीता के प्रति भगवान राम की जो निष्ठा थी तो इस तरह से थी कि इस यह जो सह धर्म ये जो दोनों का विवाह जो संस्कार है अपने शास्त्रों में जो कुछ संस्कार कहे गए हैं अभी मुझे तो सभी संस्कार याद नहीं जो लोग ब्राह्मण होते हैं जो यह सब विधि करते हैं उनको यह सब याद रहता है किंतु तो विवाह एक संस्कार और विवाह संस्कार को क्यों रखा गया यो वेद की कोई भी विधि है उसको आपको यदि करनी है तो उसके लिए आपको सहधर्मिणी साथ में चाहिए पुरुष अकेला कोई भी विधि नहीं कर पाएगा तो ये विवाह संस्कार जो है उसको क्यों इंट्रोड्यूस किया गया क्योंकि यदि आप विवाह रूपी संस्कार नहीं है अभी त्यागियो की बात छोड़ दीजिए इन जनरल हम बात करते हैं यदि विवाह रूपी संस्कार नहीं है तो समाज में तो अनाचार दुराचार फैल जाएगा जिसका भी जिसी के साथ में संबंध बनाना चाहे वो बनाना शुरू कर देगा उससे जो भयानक अराजकता फैले गी उसकी तो हम कल्पना भी नहीं कर सकते इसलिए जो एक पत्नी व्रत या तो फिर यह एक पति व्रत यह विवाह रूपी संस्कार जो कि यह जो आपका संबंध है उसको पवित्र उसको आधार पर रखा गया है ईश्वर के आशीर्वाद लेकर के इस संबंध की रचना की गई है और इस संबंध के भीतर में जितना आवश्यक हो उतना संबंध रखें बाकी जितना हो सके इतना साधन भजन को लेकर के रहे तो ये अपने वेदा वेद में जो व्यवस्था है विवाह संस्कार के बारे में दांपत्य जीवन के बारे में जो भी उपदेश दिए गए हैं वो इसीलिए दिए गए हैं कि त्याग तो एक इमीडिएट सबका होगा नहीं आपको तो जन्मा जन्मांतर की यात्रा है सन्यासी जो होगा उसने कितने जन्म ये सब कुछ ना कुछ सोचा होगा त्याग किया होगा त्याग के प्रथम कदम द्वितीय कदम लिए होंगे तब कहीं जाक आज वो सन्यासी हुआ है तो प्रथम जन्म से तो कोई होने वाला नहीं है प्रथम मनुष्य जन्म से दैट इज हमारे तो वैसे तो कितने ही जन्म है किंतु प्रथम मनुष्य जन्म जो हमारा होता है उसी से तो हम सन्यासी हो नहीं पाएंगे तो इसीलिए इस संबंध को पवित्र आधार पर रखने के लिए दांपत्य जीवन और विवाह संसार की रचना हुई है संस्कार की रचना हुई है तो इसको यदि आप निष्ठा पूर्वक इसका पालन करते हैं तो वो ब्रह्मचर्य का पालन करने जैसा ही है इसका कुछ जन्म तक ठीक से पालन करेंगे तो बाद में फिर पूर्ण ब्रह्मचर्य की ओर हम आगे बढ़ना शुरू हो जाएंगे जद मेरे सेंटेंस को थोड़ा सा मॉडिफाई कर दू तो फिर मैं यह कहूंगा कि ब्रह्मचर्य पालन के लिए जो प्रथम स्टेप है जो वह है सफल दांपत्य जीवन या तो फिर वेद के आधार पर जो दांपत्य जीवन है वह वह कुछ जन्म जन्मांतर तक पालन करेंगे फिर हम ब्रह्मचर्य के लिए एलिजिबल हो जाएंगे देखिए मैं तो जैन साधुओं से फैमिलियर था जब घर में में रहता था तो मुझे याद है पहला आश्रम मैंने सबसे पहले आश्रम की मुलाकात ली थी लिड़ीं 2001 में अर्थक्वेक हुआ था गुजरात में जो शायद आपको याद होगा सबको तो रिलीफ के लिए मैं मेरे शहर में एक प्राइवेट सेंटर था तो वहां प गया फिर उनको कहा कि रिलीफ करना चाहता हूं बोला जाओ तुम लिमडी चले जाओ बापा है बापा के पास में जाना तो बापा वो तो लिमिट गया अभी मैं पहली बार एक आश्रम में प्रवेश कर रहा हूं रामकृष्ण मिशन के हमारे शहर में तो प्राइवेट सेंटर था तो ऐसा कोई आईडिया नहीं था कि किस तरह का ये होगा किस तरह के साधु होंगे किस तरह का आश्रम होगा कुछ पता नहीं तो ये बैकग्राउंड जैन था तो वो एक बैकग्राउंड लेकर के मैं गया जाकर के देखा कि वहां पे एक बड़ी सी पुलिस गाड़ी पड़ी हुई है तो मैंने सोचा कि कोई मिलने के लिए आया होगा दर्शन के लिए तो वहां पे चौकीदार खड़ा था मैंने कहा ये गाड़ी किसकी है तो बोले तो तो बापू की है बापू इसमें जाते हैं मैंने कहा इतनी बड़ी कॉलीस में बैठ कर के बापू घूमते हैं तो किस तरह के साधु है [हंसी] उस समय 12 बजे थे भोजन चल रहा था तो जैसे ही गया तो बोला कि चलो बैठ जाओ खाना खाने के लिए तो भूखा था बैठ गया व खाना भी एकदम व्यवस्थित खाना वो जो जैन साधु लोग जो हाथ में लेकर खाते हैं और जो मिल जाए वह भिक्षा के रूप में यहां तो खाना भी बड़ा व्यवस्थित था मैंने बोला यह साधू लोग है नहीं कि ये लोग किस तरह का तो वो एक आश्चर्य मुझे पहली पहली बार हुआ था बाद बाद में मैं जितना समझता गया देखिए जद प्रश्न यह है कि जैन साधु लोग जिस तरह से त्याग करते हैं और हमारा जो त्याग का रास्ता है उसमें डिफरेंस क्या है तो डिफरेंस यही है कि हम लोग त्याग के साथ में शरणागति जप ध्यान और निष्काम कर्मा चारों को इक्वल प्राधान्य देते हैं यह रामकृष्ण मिशन की एक वैशिष्ट्य है जबकि जैन धर्म में त्याग ही सबसे बड़ा गुण है त्याग ही एकमात्र साधना है बा आप कुछ भी करें ना करें इससे ज्यादा कुछ फर्क नहीं पड़ने वाला तो इसीलिए ये एक बड़ा डिफरेंस है और इस डिफरेंस की वजह से ही कभी-कभी हमारे जैसे मेरे खुद की बात करूं तो ये कभी-कभी एक भ्रम प्रकट होता है कि त्याग आज नहीं कल करेंगे आज थोड़ा सा कर्म कर लेते हैं आज थोड़ा सा मंदिर में जाकर भजन कर लेते हैं तो यह भ्रम होने का कारण भी यही है कि त्याग के साथ में ही शरणागति का इक्वल इंपॉर्टेंस है किंतु सब समय अह यह एक ऐसी पहली है ना जिसका कोई आसान उत्तर नहीं है त्याग बड़ा की शरणागति बड़ी बिना त्याग के शरणागति किसी काम की नहीं त्याग अपने से अपने आप में खड़ा रह सकता है यह हमने जैन धर्म में भी देखा बुद्धिज्म में भी देखा दोनों में देखिए कि त्याग का ही सर्वश्रेष्ठ प्राधान्य है जैसे कि अद्वैत वेदांत में है तो यह जैनिज्म बुद्धिज्म और अद्वैत वेदांत त्याग के ऊपर में ही बने है त्याग ही एकमात्र साधना है तो यह और अपना रामकृष्ण संग है चारों साधनाएं का का वैसे तो इक्वल इंपॉर्टेंस है सभी दर्शन शास्त्र का इक्वल इंपॉर्टेंस है तो यह भ्रम हमको कभी-कभी खड़ा हो सकता है सिंगल साधना लेकर चलेंगे तो आपके मन में कोई भ्रम नहीं आएगा किंतु चार साधना को एक साथ में इक्वल इंपॉर्टेंस देंगे तो ये ब्रह्म खड़ा हो सकता है तो यही एक डिफरेंस है फिलोसॉफिकली यदि देखा जाए तो देखिए कि हम लोग त्याग की फिलोसोफी यानी कि अद्वैत वेदांत को फॉलो करते हैं जबकि उनका जो होना वो सांख्य के आसपास का है यानी कि सभी के भीतर में एक चेतन तत्व तो है या तो फिर कहेंगे कि जगत पूरा है जड़ है और जड़ जगत के पार जाना है अभी जड़ जगत के पार जा करर के क्या होगा आपको कोई चेतन तत्व मिलेगा कि नहीं मिलेगा वोह सब एक डिबेटेबल है जैसे कि भगवान बुद्ध ने कहा कि आत्मन है कि नहीं ईश्वर है कि नहीं यह सब चीजों के बारे में मुंह से बोलना मुश्किल है क्योंकि ठाकुर ने खुद ने कहा सब कुछ झूठा हो गया ब्रह्म झूठा नहीं हुआ अर्थात कि मुंह से वर्णित नहीं हुआ तो वो जो चेतन तत्व जो है व्हिच इज बियोंड स्पेस टाइम एंड पजेशन चेन ऑफ पोजीशन उसका वर्णन ही करना मुश्किल है तो उसको वर्णन करके फिर उसको लेकर के झगड़ा करें 10 स्कूल बन जाए एक स्कूल कहता है आत्मन इस तरह का है दूसरी स्कूल कहती है आत्मन उस तरह का है तो किसी भी तरह का झंझट खड़ा ही नहीं करना है सिंगल वन ट्रैक रास्ते प चलना है कि जड़ जगत से परे जाना है इसके बाद में जो होगा वह आपको जब वो प्राप्त होगा आपको ऑटोमेटिक समझ में आ जाएगा तो यह जो सिद्धांत है वो सांख्य के ज्यादा नजदीक है क्योंकि सांख्य भी आखिर में यह 24 तत्त्वों की वर्णना करता है अर्थात कि जड़ जगत जो है उसको बड़ा ही ध्यान से उसका निरीक्षण करता है बड़ा ही ध्यान बड़ा ही केयरफुली उसको लेबलिंग करता है तो यह जो पंच महाभूत है यह पंच तन मात्राएं है फिर ये पंच ज्ञानेंद्रिय है पंच कर्मेंद्रिय है ये ऑब्जर्वेशन एनालिसिस एंड लेबलिंग क्लासिफिकेशन ये क्लासिफिकेशन एंड एनालिसिस बहुत ही स्ट्रांग सांख्या में किया गया है और इसी को ले करके फिर अद्वैत वेदांत अपना महल खड़ा करता है अद्वैत वेदांत फिर नया एनालिसिस नया लेबलिंग नहीं करता यह क्लासिफिकेशन को अद्वैत वेदांत मान्य रखता है तो ये जो क्लासिफिकेशन है जगत का कि ये जड़ जगत है जड़ जगत को समझ समझ कर के उसको त्याग करना है ये भ्रम में ना रह जाओ कि चलो मैं चिंतन करता हूं चिंतन मुझे बड़ा अच्छा लगता है चिंतन भी तो एक देर इज अ सॉर्ट ऑफ कर्म इसमें व्यापत है तो कर्म के परे जाना यह जो शंकराचार्य क्या है कि ज्ञान कर्म है वहां कर्म नहीं जहां कर्म है वहां ज्ञान नहीं तो यही बात को कि कर्म क्या है कर्म क्या करने से क्या परिस्थिति में कौन से फैक्टर से आप कर्म के बंधन में बनते हैं इसका प्रचंड एनालिसिस बुद्धिज्म और जैनिज्म में है जिसको कि स्मानिक स्कूल कहते हैं अपनी है श्रमण स्कूल और वो है शमन स्कूल तो ये श्रमण ये जो श्रवण स्कूल से ही आखिर में यह ब्राह्मण स्कूल इसको एक ही मने सिनोनिम है और दूसरी है कि ये ना सॉरी श्रमण और ब्राह्मण दो स्कूल है तो श्रवण स्कूल है उसमें से ये जैनिज्म बुद्धिज्म आया है ब्राह्मण स्कूल जो है उसी में से यह अपना वेदांत वेद वेदांत आए हैं तो ये जो श्रवण स्कूल है तो श्रवण स्कूल में यह बड़ा ही डिटेल में एनालिसिस है कि कर्म क्या है कर्म के बंधन में हमको क्या बांधता है यह कर्म करने वाले अंग कौन-कौन से हैं यह जो पूरा जो सृष्टि है सृष्टि का नक्शा क्या है सृष्टि का एनालिसिस क्या है और इसके परे कैसे जाया जाए जो का रास्ता क्या है तो यह श्रवण स्कूल का यह फाउंडेशन है जिसी को थोड़ा सा डिफरेंट डिफरेंट एनालिसिस करके जैनिज्म और बुद्धिज्म डेवलप हुआ है त्याग अर्थात की कर्म त्याग कर्म त्याग ही सही त्याग अभी किंतु प्रश्न बहुत सारे इसमें से खड़े हो जाते हैं मैं यहां पर यदि निकम्मा होकर बैठा रहूंगा तो मैं सीधा तमस में डूब जाऊंगा तो यह जो एनालिसिस है कि त्याग यानी कि कर्म त्याग और कर्म त्याग करने का सीक्वेंस क्या है तो वो सांख्य बताता है कि सत्व रजस तमस तीन अवस्थाएं हैं मन की कर्म की परिस्थिति में है तो मैं राजसिक परिस्थिति में आ किंतु जैसे ही मैं कर्म त्याग करूंगा मैं सीधा तमस में डूबू यानी कि कर्म त्याग भी नहीं करना है और तमस में भी नहीं जाना है तो वो कैसे हो वो बैलेंस करने के लिए फिर ये साधन पद्धतियां डेवलप की गई आज हम जिसको निष्काम कर्म कहते हैं वो क्या है कर्म को त्याग इमीडिएट नहीं करते ना कर्म को पहले सुसंस्कृत करना है देखिए कितना सुंदर ये लॉजिक देते हैं स्वामी जी खुद कहते हैं वो हिमालय गए एक साधु को देखा कंबल ओढ करके वो खर्राटे बुला रहा है स्वामी जी ने कहा इसके कंधे प हल डाल दो हल जोतो तब पता चलेगा कि कैसे साधन भजन होता है तो ये कर्मा को पहले सुसंस्कृत करो फिर सुसंस्कृत कर्मा को धीरे-धीरे करके आप उसको विघटित कर दो तो यह है रास्ता तो कर्मा बोले तो कर्म त्या इसीलिए आप देखिए कि बहुत सारे लोग कहते हैं स्वामी जी ने निष्काम कर्म का प्रारंभ किया ये तो ठाकुर के कहने के बिल्कुल विरोध में चले गए संसार में जाकर के आप लोग यह सब कर रहे हैं तो खैर लॉजिक समझ जाने से पता चलेगा कि कर्म त्याग करेंगे तो सीधा तमस में जाएंगे बेटर है कि इसको सुसंस्कृत करो अभी किंतु इसका एक डीपर अर्थ है कर्मा हम कर्म को क्या कहते व्हाट इज योर डेफिनेशन ऑफ कर्मा यहां पे एक दूसरा प्रश्न होता है कि मैं जो हाथ से काम करता हूं जब मैं पूजा करता हूं या मैं खाना खाता हूं या तो फिर मैं डिस्पेंसरी में काम करता हूं इसको कर्मा कहते हैं कि व्ट इज कर्मा तो कर्मा है वृत्ति मन की वृत्ति को कर्मा कहते हैं जैसे ही योग शास्त्र प्रारंभ होता है सबसे पहले है अथ योगासनम योग चित्तवृत्ति निरोध प्रथम और दूसरा सूत्र है तो दूसरे सूत्र में योग की डेफिनेशन को क्या कहते हैं मन की वृत्तियों के निरोध को योग कहते हैं अर्थात कि कर्म तो अपने मन में चलता है असली कर्म आप आंख बंद करके बैठिए सब दुनिया भर का चिंतन मनन चालू हो जाएगा अच्छा बुरा सही गलत सब कुछ तो उसको शांत कर देना यह हो गया कर्म त्याग किंतु हमको पता है कि इसको शांत करने के जो तरीके है जो एल्कोहोलिज्म है लोग शराब क्यों पीते हैं क्योंकि लोग चीजों को भूलना चाहते हैं कोई ऐसा बड़ा तकलीफ अपने जीवन में आ गया है तो भूला नहीं जाता वो सब मेरे मन में गल बोल बोल घूम करके स्ट्रेस खड़ा करता है स्ट्रेस से स्ट्रेस सेय डायबिटीज ब्लड प्रेशर हार्ट डिसीज यह सब होता है तो मैं स्ट्रेस को भूलना चाहता हूं तो शराब पियो ना कि कुछ ना कुछ ये एडिक्शन लगा दो ये एडिक्शन जो है वो कर्म जो गड़बड़ कर देता है विकृत हो जाता है तब ये एडिक्शन स्टार्ट होता है तो वो वो जो है मन की वृत्तियों को शांत करना वो हो गया कर्म का त्याग मने इस इस परिस्थिति को आप कैसे समझेंगे कब कब पता चलेगा कर्म कम हो रहा है ऐसा नहीं है कि मैं एक्चुअल काम करना कम कर दूंगा बात यह है कि मैं जैसे आंख बंद करूंगा वैसे ही मेरा मन संपूर्ण रूप से शांत हो जाएगा किसी भी तरह का कोई भी उल्टा पुल्टा विचार ये वो कुछ नहीं रहेगा वो है असली टेस्ट यानी कि फिजिकल कर्म तो हमको आखिर तक करना है उसके बिना तो चलेगा नहीं ठाकुर खुद वो घर-घर जाकर के लोगों को उपदेश देते थे वो तो कम कर्म नहीं था व जब मां का अंतिम समय आया वो लड़का एक उनको मिलने के लिए आया झगड़ा कर रहा है सबने उसको बाहर बिठा के रखा है तो मां अपने बिस्तर पर लेटी हुई आखिरी समय है उस समय बिस्तर से खड़ी होकर कहती है कि क्या हम लोगों ठाकुर का जन्म रसगुल्ला करने के लिए हुआ है तो आखिरी घड़ी तक ये लोग उपदेश देते गए हैं भगवान बुद्ध स्वयं आखिरी घड़ी में उन्होंने लेटे लेटे उपदेश दिया है बाद में उन्होंने शरीर त्याग किया है शंकराचार्य स्वयं गांव-गांव शहर शहर घूम कर के डिबेट किए हैं यानी जो शारीरिक कर्म कभी खत्म नहीं होगा किंतु मानसिक वृतिया है वो उसका निरोध हो जाएगा संपूर्ण जैसे ही मैं आंख बंद करके बैठता हूं कोई मुझे मेहनत करने की जरूरत नहीं इमीडिएट बढ़ बढ़ करके आनंद का प्रवाह मन में चालू हो जाएगा वो है कि आप सिद्धि की ओर जा रहे हैं कर्म को सुसंस्कृत करना हुआ य हम सिर्फ कर्म करेंगे तो रजस में रहेंगे कर्म को छोड़ देंगे तो तमस में डूब जाएंगे यदि सत्व में जाना है तो कर्म को सुसंस्कृत करना है तो वो है साधन पद्धति अभी वो साधन पद्धति के रूप में आप गरीबों को सहाय करें ना कि बैठ कर के जब ध्यान करें कि ईश्वर को प्रार्थना करें ना कि सद ग्रंथों का पाठ करे ना कि मंदिर में जाए कोई भी अच्छा सुसंस्कृत कर्म करें वह साधन पद्धति में परिणत हो गया आपको सत्व की ओर ले जाएगा किंतु अल्टीमेटली आपको रजस हो तमस हो कि सत्व हो तीनों गुणों को पार करना पड़ेगा यदि सही सिद्धि प्राप्त करनी है तीनों गुणों को पार करना अर्थात कि पहले तो जो असं स्कृत कर्म थे उसको सुसंस्कृत कर्म में कन्वर्ट करो आखिर में सुसंस्कृत कर्म को भी त्याग कर दो मन संपूर्ण रूप से शांत हो जाएगा वो हो गई गुनातीत अवस्था यह सीक्रेट जब समझ लिया तो भारतीय साधन पद्धति को आपने समझ लिया क्योंकि देखिए कि यह भक्ति स्कूल कहो कि ज्ञान स्कूल कहो कि योग स्कूल कहो कि कर्म स्कूल वो सब बाद में डेवलप हुआ है सबसे पहले वेद में देखिए कि अपना कर्मों का सिद्धांत सर्वप्रथम डेवलप हुआ है कर्म क्या है अकर्मण्यता क्या है और कर्म के परे की अवस्था क्या है यह तीन गुण सत्व रजस तमस ये एनालिसिस सर्वप्रथम वेद वैदिक समय में हुआ है और इसको सभी स्कूल रखती है उसके बाद में उसके ऊपर में फाउंडेशन क्रिएट करती है कि हां ईश्वर का स्वरूप क्या है साधन पद्धति क्या है उसको लेकर के डिबेट है किंतु कर्म के सिद्धांत के ऊपर में सत्व रजस तमस के ऊपर में इसके ऊपर में कहीं पर कोई भी डिफरेंस ऑफ ओपिनियन नहीं है इसीलिए हम लोग जैनिज्म बुद्धिज्म को भी हिंदू धर्म के बहुत ही पास में क्यों गिनते हैं यह लोग भी कर्म के सिद्धांत को स्वीकार करते हैं जबकि जो लोग दूसरे धर्म है जो कि इस सिद्धांत को स्वीकार नहीं करते वही हमारे लिए डिफरेंट धर्म है बाकी ये जैनिज्म बुद्धिज्म और हिंदुइज्म तीनों एक ही ग्रुप में आएंगे क्योंकि तीनों एक ही कर्म के सिद्धांत पर चलते हैं योगशास्त्र में जो है ना मैत्री करुणा मुदिता और उपेक्षा जो अपने समान लेवल पर है उनके साथ में मैत्री जो अपने से छोटे हैं या तो कम भाग्य है उनके लिए करुणा फिर जो हमारे से बड़े हैं उनके प्रति उदारता मुदिता और जो हमारे दुश्मन है उनकी उपेक्षा इस चारों को चित्त प्रसाद कहते हैं यह योग शास्त्र में है