Transcript
अच्छा तो श्री रामकृष्ण कथामृत पिछली बार हमने प्रश्न देखा था की किस तरह से नरेंद्र मास्टर महाशय को प्रश्न करता है की आजकल के लड़के कैसे हैं उसका उत्तर देते और उसके बड़े में चर्चा करते करते किंतु मास्टर महाशय फैंस गए ठाकुर ने आकर के मास्टर महाशय को ही दांत दिया बोल दिया की अरे तुम तो उम्र में बड़े हो तुम्हारे में इतनी अकाल नहीं है की ये बच्चे लोग तो कुछ भी मैंने बोलते रहते हैं बातें करते रहते हैं तुम्हारे में तो इतना मेच्योरिटी होना चाहिए था की यहां पे ठाकुर के पास आकर के दक्षिणेश्वर में मां काली के मंदिर में आकर के सिर्फ ईश्वर की ही बातें करनी चाहिए और यह जो सब बाहर में क्या हो रहा है क्या नहीं हो रहा है उसका यहां से क्या लेना देना यहां से क्या वास्ता सुन करके वो लड़के वगैरा नरेंद्र वगैरा चुप हो गए और मास्टर महाशय प्रस्तुत हो गए थोड़े से वो लचित हो गए तो जो भी है हमने इसके बड़े में डिस्कस किया था की मास्टर महाशय रखकर जो प्रसंग देते हैं वैसे दो तरह से इसका इंटरप्रिटेशन हो सकता है की एक तो मास्टर महाशय ने अपना अहंकार किस हद तक ठाकुर के श्री चरणों में अर्पित कर दिया था की ठाकुर जामुन को दांते भी थे तो भी वो उसको एक पॉजिटिव वे में लेते थे की हां इस मेरी ही मुझे ही अपने को इंप्रूव करने की जरूर है मुझे ही इस रास्ते पे अध्यात्म के साधना के ईश्वर प्रताप के रास्ते पे आगे बढ़ाना है और इसलिए मेरे कल्याण के लिए जो कुछ आवश्यक है मेरे गुरु मुझे बताएंगे और मुझे उसका पालनपुर करना है ये तो मास्टर की मास्टर महाशय की मीरा हुंकारिता का परिचय हुआ और साथ-साथ में ही इसका एक दूसरा भी अथॆघाटन हम कर सकते हैं की भविष्य में जब नरेंद्र स्वामी विवेकानंद बनकर के पूरे विश्व का परिभ्रमण कर रहे थे तब उनकी नजर ये थी जहां पर भी किसी भक्ति के घर करेंगे यदि किसी बच्चों के संपर्क में आएंगे वह सब समय ध्यान रखते थे की यह बच्चे क्या सीखने हैं उनका एजुकेशन किस तरह से होता है खासकर के अमेरिका और ब्रिटेन वहां पर इतना इंडस्ट्रियल टेक्नोलॉजी साइंटिफिक पावर उन लोगों का जो है मिलिट्री पावर तो इसके पीछे ऐसा तो कौन सा सीक्रेट है वे लोग बच्चों को क्या सीखने हैं की वे लोग भारत जैसे इतने बड़े सिविलाइजेशन कंट्री पे सिविलाइजेशन पे आकर के राज कर सकते हैं और हम लोग उनके सामने बिल्कुल जैसे की वो मरियल मुर्दाल हो जाता है तो ये स्वामी जी के मां में ये सब था तो पहले से ही था एक क्यूरोसिटी की सिर्फ अपने बड़े में नहीं जगत के बड़े में सोने की आजकल हम लोग पॉलिटिक्स के बड़े में न्यूज़ पेपर में बहुत कुछ पढ़ने हैं की हां यहां पर ऐसा हो रहा है अमेरिका में यह हो रहा है फ्रांस में यह हो रहा है चीन में ऐसा हो रहा है किंतु हम लोगों का क्यूरोसिटी और स्वामी जी का क्यूरोसिटी इस दोनों में फंडामेंटल डिफरेंस है हम लोग जैसे की आ हम लोगों का जो क्यूरोसिटी है वह हमको ज्ञानपीपासा एक होती है एक हंगर पर नॉलेज होता है जो की हम लोगों को ये सब करवाता है की हां मैं जानू इस जगत के बड़े में की यहां जगत में क्या हो रहा है मैं जब स्टूडेंट था स्कूल में पढ़ना था तो मैंने क्या किया था एक वर्ल्ड में पीला करके अपने घर मेरा जो एक कैमरा था वहां कमरे की दीवाल पे मैंने और टांग दिया था और उन्हें बीच-बीच में देखा था की अच्छा ये मैं पढ़ना था यह सब मुझे हिस्ट्री यह करंट अफेयर्स वगैरा पढ़ने का पहले से ही शौक था थोड़ा सा फिलासफी वगैरा तो जैसे ही किसी देश का वर्णन हुआ बेल्जियम तो बेल्जियम कहां पे है मैं वह मैप के ऊपर में देखा था अच्छा यह फ्रांस और जर्मनी के बीच में बेल्जियम है अच्छा ठीक है वह पहले तो उसका नाम ही कभी नहीं सुना था जो अभी वर्ल्ड में पर मैंने उसको लॉकेट किया तो मैं उसको थोड़ा सा इमेजिन कर सकता हूं ए बेल्जियम जाना हुआ तो नहीं हुआ नहीं हुआ नहीं हुआ किंतु एटलिस्ट मुझे पता है की वो नक्शे में वो कहां पे आता है तो ऐसी क्यूरोसिटी थी जबकि स्वामी जी क्यूरोसिटी डिफरेंट स ही इसे उनका आउटर रन ही हुआ है जगत के कल्याण के लिए और जिसका कल्याण करना है उनके बड़े में सब कुछ जन की स्वामी जी को आवश्यकता थी तो इसके लिए वो जानते थे हम लोगों का होता है एक ज्ञान पेपर सा एक जनरल क्यूरोसिटी और बहुत सारे कैसे में ऐसा होता है की जैसे मैंने एक बार कहा था की मेरे एक रिलेटिव थे वो बीमा थे तो मैं मुझे बोला गया था की तुम जाकर के हॉस्पिटल में उनके साथ मेरे ना उनका हार्ट का ऑपरेशन किया गया था उसे समय तो मैं वहां पर राहत था दो-तीन घंटा प्रतिदिन जाता था और साथ में वह जवाहरलाल नेहरू का डिस्कवरी ऑफ इंडिया वो मैं किताब पढ़ना था डॉक्टर वह विजिट के लिए आए तो आते थे रेगुलरली और देखने के लिए की पेशेंट कैसे है वो सब कर रहा है प्रोग्रेस के सा है तो डॉक्टर ने आकर के मुझे पूछा की क्या तुम इस होने की तैयारी कर रहे हो कितनी बड़ी-बड़ी किताबें पढ़ रहे हो क्या है की बहुत सारे लोग ये समझते हैं की ये क्यूरोसिटी भी की क्या जरूर थी यदि आपको कॉम्पिटेटिव एग्जाम देना है तो ये सब किताबें पढ़िए और इतना ही पढ़िए जिससे की आपकी एग्जाम पास हो जाए और जैसे परीक्षा के आगे आगे के दोनों में वो बाकी सब जगह का तो पता नहीं हमारे गुजरात में तो वह टेंपलेट फिर वो क्वेश्चन पेपर इंपॉर्टेंट क्वेश्चंस ये सब बहुत चलते हैं वो किसी ने लड़के ने आकर के बोल दिया मेरे पास इंपॉर्टेंट क्वेश्चन ए गए हैं परीक्षा के कुछ दिन आगे ही वह किसी टीचर ने दिए होंगे जिसका वो कोचिंग क्लास अटेंड करता होगा तो टीचर्स सोचता होगा की मैं अपने मेरे जो स्टूडेंट है उनको इंपॉर्टेंट क्वेश्चन दे देता हूं जो की परीक्षा में आने वाले हैं तो मां लीजिए की 10 क्वेश्चन दिए उसमें से 6 साल तो परीक्षा में आएंगे तो इतना सही वह स्टूडेंट वह जिसको प्राइवेट कोचिंग करते हैं ना यह टीचर लोग तो उतना ही चार-पांच क्वेश्चन उसने कर दिया तो उसका वो बाकी सब से वो अच्छा परसेंटेज ए जाएगा और बाकी सब स्टूडेंट सोचेंगे की अरे ये इस टीचर का हमको कोचिंग क्लासेस सेकंड करना चाहिए उसका ट्यूशन हमको अटेंड करना चाहिए ऐसा वो सब चला है वो सब जगह पे मुझे पता नहीं बाकी सर क्योंकि यहां पे गुजरात में तो बहुत चला था तो अभी ये भी एक है की परीक्षा पास करने के लिए जितना पढ़ना है उतना ही हम पढ़ेंगे किंतु यह तो एक चीज हो गया की हम किसी स्वार्थ के लिए परीक्षा पास करने के लिए पढ़ने हैं दूसरा हो गया की एक ह्यूमन एक मानव सहज क्यूरोसिटी हमने होना चाहिए की जगत में जो हो रहा है उसके बड़े में हम जान और फिर देखिए ये माया और ये ईश्वर दोनों है तो ईश्वर के बड़े में हम आध्यात्मिकता के बड़े में जानेंगे तो इस माया के जगत के बड़े में भी थोड़ा सा जान करके रखेंगे की ये किस तरह से कहां पर कैसे-कैसे लोगों को फसता है मैंने तो वो वो भी एक जान लिया और इससे भी हायर एक जन का रीजन राहत है वो है स्वामी जी का और ठाकुर का जगत के कल्याण के लिए आए हैं जैसे की लीला प्रसंग में शारदानंद जी महाराज लिखने हैं हमको पता है की जब केशव सेंड ठाकुर के पास आता था तो केशव कुछ भी नहीं बोलना था ठाकुर ही बोलते जाते थे केशव उनके पर के सामने बैठ करके चुपचाप श्रद्धा भक्ति पूर्वक सब कुछ सुनता था तो ये देख करके बाकी लोग जो है वो केशव के शिष्य बड़े ही परेशान हो जाते थे पूछते थे की अरे महाशय आप कुछ बोलते क्यों नहीं है आप तो लंदन गए हैं यूरोप का टूर किया है क्वीन विक्टोरिया ने स्वयं आपका सम्मान किया है तो आप यदि ऐसे गरीब ब्राह्मण एक काली का पुजारी वो जितना ही चाहे विद्वान क्यों ना हो जितना ही चाहे वह आध्या क्यों ना हो उसके पर के सामने बैठकर के जरिया आप सब कुछ सुनते ही जाएंगे तो फिर लोग क्या कहेंगे हम लोग लोगों को क्या मुंह दिखाएंगे की क्या ये विश्वविद्यालय पुजारी के सामने बैठकर के दो हाथ जोड़ करके उनसे शिक्षा ले रहा है अब कुछ बोलिए तो केशव सेन तो पता था की उसकी औकात क्या थी ठाकुर के सामने तो वो तो ठाकुर का उपदेशी ग्रहण करता था ठाकुर को सामने उपदेश ने ही देता था उसको पता है की किसको उपदेश देना चाहिए किसको नहीं देना चाहिए किंतु जब केशव का मृत्यु हुआ उसके बाद में उसके विषय पर लोग उसके जो शिष्य अनुयाई है उन्होंने ऐसी बात लिखना प्रचार करना शुरू कर दिया की हां ठीक है चलो केशव ने परमहंस महाशय से कुछ शिखा किंतु परमहंस महाशय ने भी केशव के पास से बहुत कुछ शिखा है इसलिए उनके इतने सारे देवोते हुए तो यह बात जब अपने राम कृष्णा ठाकुर का मां ठाकुर की महासमाधि हो गई है स्वामी विवेकानंद पूरा विश्व का भ्रमण करके भारत में लोट करके रामकृष्ण मिशन की स्थापना कर दी है और शरद महाराज लीला प्रसंग लिख रहे हैं उसे समय जब यह सब चल रहा था की केशव को तो लोग भूल ही गए थे किंतु स्वामी जी का और ठाकुर का प्रताप ऐसा है की रामकृष्ण मिशन रामकृष्ण भावधारा रामकृष्ण ठाकुर के राम कृष्णा देव के भक्तों की संख्या दिन प्रतिदिन बाढ़ रही थी तो यह लोग बेचारे सोच रहे हैं की हम लोग कुछ बोलेंगे नहीं तो हमारा अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा तो उन्होंने ऐसा प्रचार करना शुरू कर दिया की केशव हुसैन के पास से ठाकुर ने कुछ शिखा है तो अभी सब लोग आकर के ये ठाकुर के सब शिष्य देवोटी दीक्षार्थी साथ महाराज के पास आकर के कंप्लेंट करने लगे बोले अरे वो मुर्ख श्लोक क्या बोलते हैं की ठाकुर केशव के पास सीखेंगे अवतार वरिष्ठ है स्वयं जो की राम और कृष्णा के उसे जी लाइनेज में जिन्होंने जन्म ग्रहण किया है उनको यह मनुष्य केशव कितना ही महान है तो एक मनुष्य और उसके पास से उसको ठाकुर को क्या सीखना है क्या यह बातें कर रहा है बेटू की बातें कर रहे हैं तो शरद महाराज शारदानंद जी महाराज लीला प्रसंग लिख रहे थे तो उन्होंने इसमें ये पैसेज एक एड कर दिया एक आर्गुमेंट एड कर दी है उन्होंने लिखा है लीला प्रसंग में की हां हमको पता है की केशव के जो अनुयाई है फॉलो ओवर है ब्राह्मी समाज के वे लोग बोलते हैं की ठाकुर ने केशव के पास से बहुत कुछ शिखा तो और दूसरे सामने भक्ति लोग ये आर्गुमेंट करेंगे की ठाकुर को केशन के पास से सीखने की कुछ भी जरूर नहीं थी किंतु मैं हम मानते हैं शरद महाराज लिखने हैं की हां ठाकुर ने केशव के पास में शिखा है तो ये जो पहले लाइन जो पढ़ेंगे हमको आश्चर्य होगा अरे शर्ट महाराज जैसे शर्ट महाराज जैसी बात कर रहा है ठाकुर के सॉन्ग का जो संघ के जो सेक्रेटरी ठाकुर जी का भारत ग्रहण करने वाले ठाकुर का संघ का जो भगवान कर रहे हैं वासु की मां के वासु की वो ऐसी बातें कर रहा है की हां ठाकुर ने केशन के पास से कुछ शिखा है यह कैसा आश्चर्य हो गया किंतु फिर बाद में शरद महाराज उसकी एक्सप्लेनेशन देते हैं की ठाकुर के पास में केशव सेन के आने से पहले ठाकुर के पास में जितने भी आए ये पंडित या तो सड़क हो या तो फिर एवं रसमणि और माथुर बाबू ये सब लोग भारतीय परंपरा में उन्होंने संपूर्ण रूप से ग्रहण की थी सड़क थे और भारतीय आध्यात्मिकता हिंदू धर्म को अच्छे से पहचानते थे यह भैरवी ब्राह्मणी को नाती तोता पुरी कहो ना की चाताधारी कहो ना की हलधारी कहो ये कृष्णा किशोर कहो की जय मुखोजे कहो जिसको ठाकुर ने जाता मारा था यह सब हिंदू धर्म से अपने को पूरे पूरे हिंदू धर्म में दुबे हुए थे किंतु केशव के आने के साथ में ही एक नए तरह के लोगों का आने की शुरुआत हुई यह जो हमको पता है की 1836 में यह इंग्लिश एजुकेशन सिस्टम भारत में लाई गई उसका एक ही मकसद था की भारतीयों को क्लार्क बना दिया जाए इस तरह से इंग्लिश सभ्यता ब्रिटिश सभ्यता ये वेस्टर्न कलर में इस तरह से उनको मोहित कर दिया जाए की अपना हिंदू धर्म भारतीय संस्कृति और सभ्यता को भूल जाए और ऐसा माने लगे की उनके पुरखे जो थे उनके जो पूर्वज थे वो सब महामूर्ख थे और ये जो वेस्टर्न फिलॉस्फर्स वेस्टर्न साइकोलॉजिस्ट वेस्टर्न ऑथर्स और लिटरेचर लिटरेरी पीपल यही लोग जो है वो ग्रेट है ऐसा एक इनको मेंटल इंफिनिटी दे दिया जाए बोलकर के वेस्टर्न एजुकेशन सिस्टम इंग्लिश एजुकेशन सिस्टम भारत में लाई गई और केशव सेन के बाद में जितने भी लोग आए हैं ना वो इस आधुनिक कहो ना की ये मतलब रिग्रेशन सिस्टम की प्रोडक्ट है की स्वामी जी खुद जब ठाकुर के पास में आकर के किसी गीता की प्रशंसा करनी शुरू कर दी एक दिन तो ठाकुर बोलते पता है की मुझे ग रहा है की किसी यूरोपियन पंडित ने गीता की प्रशंसा की है इसीलिए नरेंद्र आज गीता की प्रशंसा कर रहा है वरना तो वो तो जब भी चाहे मैं जो कुछ भी कहता हूं उसकी वह मजाक उड़ता है आ ऐसे लोगों इस तरह के लोग जो आज के कॉलेज एजुकेटेड लड़के अंग्रेजी सीखे हुए मास्टर महाशय नरेन ये निरंजन बाबूराम महाराज ये जितने भी है फिर ये गिरीश घोष है जितने भी लोग हैं ये आदरसेन हैं वे लोग इस तरह की एक एजुकेशन सिस्टम की वो प्रोडक्ट है जिनको की हिंदू धर्म के ऊपर में ही संशय हो गया था और कहानी कहानी ऐसा माने लगे की वेस्टर्न कलर हमारे से शुक्रिया है किंतु हां भीतर में वह तपस्या साधना सत्कर्म का एक इतना प्रचंड प्रवाह बा रहा था की वह नहीं छह करके भी ठाकुर के पास ए गए वो अलग बात है किंतु ऐसा एक संक्षे तो प्रगति हो गया था तो ऐसे संशय वन संदेह वन लोगों को किस तरह से मां की बात की जाए यह ठाकुर ने केशव को शिखा करके शिखा है तो यहां पर भी ऐसा है की क्यों स्वामी जी यह जगत के बड़े में लड़के लोग क्या कर रहे हैं जगत में क्या कर रहा है वो सीखना चाहते हैं क्योंकि इस जगत को उपदेश देना है जगत को माया से बचाना है वेदांत का प्रचार करना है तो लोग क्या किस तरह से सीखने हैं किस तरह से उन लोगों की साइकोलॉजी मेंटालिटी चलती है ये समझ करके ही तो वो बता पाएंगे की किसको क्या किस तरह से उपदेश देना है स्वामी जी अमेरिका गए थे बहुत ही सुंदर एक छोटा सा उदाहरण है एक घटना है एक एक गर्ल्स कॉलेज में गए थे लड़कियों की कॉलेज थी जहां पे वो उनको बुलाया गया था की हां आप आकर के वेदांत के बड़े में बोलिए तो स्वामी जी जाकर के बोल रहे हैं उसे समय क्या हुआ की कुछ आस-पास के यह जो पादरी मिशनरी वगैरा है उनको पता चला की ये क्या एक हिडन कहता है ना वो जंगली एक बार इंडियन उसको बुला दिया है गर्ल्स कॉलेज में और वह उनको शिखा रहा है वह बोलकर के बड़े ही भड़क गए और स्वामी जी के साथ में आर्गुमेंट करने के लिए डिबेट करने के लिए आकर के उपस्थित हो गए वो बने बड़ी उम्र के वो वयोवृद और मिशनरी वो पादरी और धर्मगुरु यह सब गुरु का एक दाल आकर के मिल गए भीड़ गया स्वामी जी के साथ में अभी देखिए एक वहां की एक लड़की उसे कॉलेज की उसका नाम था पोंगल तो कॉर्नर लिया ये सब पुरी बात वो लड़की थी तो बिल्कुल मतलब कॉलेज में पढ़ रही उसने ये पूरा डिबेट देखा था बाद में जब वो बड़ी हुई तब उसमें उसको वेदांत के प्रति आकर्षण हुआ उसने वो बेलूर मठ भी आई थी और हमारे प्रेसिडेंट महाराज भी जो उसे समय थे शायद महापुरुष महाराज की जो भी हो वो शंकारानंद जी उनके साथ में वो मिली भी थी और बेलूर मठ में रही थी और उसने दीक्षा भी शायद मंत्र दीक्षा भी ग्रहण की थी तो वह कार्नेट लिया इस पुरी घटना के बड़े में लिख रही है वो बोल रही है की हम लड़कियां सब चुपचाप एकदम डर की मेरी एक जगह पे कोनी में बैठी हुई है देख रही है की यह कहां एक स्टंट एक इंडिया से भारत से इस तरह का एक योगी आया है जिसका चेहरा की चेहरे के ऊपर में ये दिव्याप्रभा दिव्या आभा जलमल कर रही है उसका उसकी बातें इतनी मतलब अदर वर्ल्ड है इतनी मतलब मां को अट्रैक्ट करने वाली है की इस तरह की दिव्या बातें हमने कभी पवित्र बातें कभी सनी नहीं है और इनके सामने इस भारतीय योगी के सामने हमारे अमेरिका के धर्मगुरु सब बूढ़े सब मूर्ख उनका चेहरा देखकर के ही पता चला है की भोग में दुबे हुए ऐसे सब दर्द माना करके भारतीय योगी के सामने आर्गुमेंट कर रहा है और वो लिखती है की हमारी सिंपति पुरी भारतीय योगी के ऊपर में है ऐसा क्यों समझ में नहीं ए रहा अमेरिकन होने के नाइट मेरी सिंपैथी या तो मेरा सपोर्ट तो यह अमेरिकन धर्मगुरुओं के प्रति होना होना चाहिए किंतु ऐसा नहीं हो करके मेरा पूरा सिंपैथी हम लड़कियों की पुरी सिंपैथी सपोर्ट पूरा भारतीय योगी के ऊपर में है और जब डिबेट हो रही है तो हमारे धर्मगुरु बाइबिल में से उदाहरण दे रहे हैं बाइबल में से एग्जांपल दे रहा है तो उसका काउंटर ये स्वामी जी वही बाइबल के उससे भी बटर उदाहरण देकर के करेंगे कभी धर्म गुरु लोग किसी वेस्टर्न फिलॉस्फर को पोर्ट कर रहे हैं तो यह स्वामी जी इस वेस्टर्न उससे भी बटर वेस्टर्न फिलॉस्फर को उससे भी बटर पोर्ट करके उसकी दे उसका काउंटर करेंगे काउंटर आर्गुमेंट देंगे ऐसा करके उनकी मेधा और प्रतिभा इतनी प्रचंड थी की यह पूरे धर्मगुरुओं का दाल उनके सामने हर मां गया तो देखिए यह डिबेट यानी कॉलेज की लड़की थी उसे समय देखा था और इतनी प्रभावित हो गई थी यह धर्म वेदांत के जो बी जो है वेदांत का यह जो एक प्रकाश कुंज जो है रूस के हृदय में जागृत हुआ था बोलकर के ही आखिर में वो भारत में आई और बेलूर मठ में रही और वेदांत के रास्ते पे उसने पूरा बाकी का जीवन निकाला और अमेरिका की वेदांत सोसाइटी में भी वो जाति थी दीक्षा भी थी तो इस तरह से ऐसे लोगों का हृदय परिवर्तन करना है तो वेस्टर्न फिलासफी वेस्टर्न साइकोलॉजी वेस्टर्न इतिहास उसे सबके बड़े में स्वामी जी को जानना तो जरूरी है बोलकर के ही वो लोगों को मां परिवर्तन लाइव ट्रांसफॉर्म कर पाएंगे जीवन को परिवर्तित कर पाएंगे तो ये छोटी सी घटना है किंतु इस घटना का अर्थ गठन हम किस हद तक कर सकते हैं और ये तो मेरी लिमिटेड बुद्धिस्म ने किया जिसकी जो और भी ज्यादा डिटेल में जाकर के पढ़ना है वो क्या से क्या नहीं इसमें से अर्थ निकलेगा इसमें से क्या से क्या नहीं डिपर मीनिंग इसमें से छोटी सी घटना से निकलेगा तो आज थोड़ा सा और पाठ करते हैं थोड़ा सा पढ़ना हूं मास्टर महाशय लिखने हैं ठाकुर श्री रामकृष्ण दादा या हंसते हंसते नरेंद्र आदि भक्ताेंकों के ख्वाई ते छैयां ठाकुर आज मा आनंद ठाकुर श्री राम कृष्णा खड़े खड़े भक्तों के साथ में नरेंद्र आदि भक्तों को मिला रहे हैं ठाकुर आज मा आनंद में है नरेंद्र आदि भकतीरा आहार कोरिया ठाकुर समय लिखने हैं नरेंद्र आदि भक्ति नरेंद्र और अन्य सब भक्ति ऐसा नहीं लिखने की सब भक्तगण किंतु नरेंद्र का यह जो प्राथमिकता है नरेंद्र सब समय मास्टर महाशय खुद स्वीकार करते हैं मास्टर महाशय खुद बार-बार जो है हमको समझते हैं की नरेंद्र आदि भक्तों आहार करके ठाकुर के घर की फर्श पर बैठकर के विश्राम कर रहे हैं और ठाकुर के साथ में गैप लगा रहे हैं मतलब हम हनुमान करके कर सकते हैं पवित्र तो वैसे ही मां काली का पूजा हो रहा मां काली की पूजा हो रही इसलिए बोलकर की इतनी उमधुर सुंदर पवित्र जगह होगी उसमें भी गंगा का किनारा उसमें भी शांत रात आज की तरह नहीं आज तो क्या होता है रात होती है तो कहानी वो टीवी की आवाज आई है कहानी वो वहां व्हीकल की आवाज आई है वो कहानी पे वो पॉल्यूशन कहानी पे वो लोग मैन यहां आज कल रात होने से जो शांति होने की बजे चारों और लाइट ही लाइट आवाज ही आवाज जैसे की अपने मां को रात को भी शांति नहीं मिलती किंतु उसे समय तो ऐसा नहीं था ठाकुर की कृपा से इलेक्ट्रिसिटी नहीं थी ठाकुर की कृपा से यह टीवी रेडियो मोबाइल डीजे यह सब भी नहीं थे ठाकुर की कृपा से पापुलेशन आज की वजह आज जितनी पापुलेशन है उसकी 14th पापुलेशन शायद उसे समय होगी तो रात यानी की सही सही रात आप आकाश में इतने सारे सितारे चंद देख सकते हैं आजकल तो हम लोग शहर में जो लोग रहते हैं आकाश में सारे दिखते ही नहीं है मैं पहले बार मैं कन्याकुमारी गया था एक समय कन्याकुमारी में कुछ समय रहा था तो वहां पर तो भारत का अंतिम किनारा है बाद में तो पूरा समुद्र शुरू हो रहा है और समुद्र कहां जाति चक्कर के अटकेगा सीधा ही वो साउथ पाल पर जाकर के अटकेगा सीधा ही इंटर टीका वहां से कन्याकुमारी और अंटार्कटिका के बीच में फिर और कुछ नहीं है तो इतना वहां की हवा शुद्ध थी थोड़ा सा भी और पॉल्यूशन एन की ये साउंड पॉल्यूशन की लाइट पॉल्यूशन नहीं था की रात को जब आकाश देखेंगे तो इतने तारे दिखेंगे इतने तारे दिखेंगे जैसे मैंने अपने पूरे जीवन में इतने सारे देखें नहीं है मैं सोच रहा हूं पहले दिन में समुद्र के किनारे जाकर लेट राहत था और इतना आकाश कभी देखा नहीं है शहर में रहकर के मैं आधी-आधी रात में प्रतिदिन जाकर के लेट राहत था वो समुद्र के किनारे आकाश को देखते हुए और सोचता था की मतलब ऐसा लगता था की जैसे मैं खुद इसे तारों के बीच में घूम रहा हूं तारों के बीच में सफर कर रहा हूं उड़ रहा हूं उसे समय एक दिन देखा की एक तारा जैसे की धीरे-धीरे धीरे-धीरे करके वो मूव हो रहा है चल रहा है तो मैंने सोचा की इस तरह से चलने वाला ना ही एरोप्लेन हो सकता है ना ही ये शूटिंग स्टार जिसको कहते हैं ना की मीत यू राइट जब पृथ्वी के वातावरण में प्रवेश करती है तो जल जाति है तो वो जलती है तो फैट करके ऐसा करके हमको जाते हुए देख बहुत फास्ट हो जाति है प्लेन भी तो काफी वह स्पीड में जाता है तो यह तारा जो चल रहा है उड़ रहा है और ना ही वो शूटिंग स्टार की तरफ फास्ट जा रहा है ना ही वह प्लेन की तरह जा रहा है तो यह है क्या फिर दूसरे दिन जाकर के मैंने वहां पे रहने वाले दूसरे लोग भाई एक भाई को पूछा की अरे भैया ये मैंने आकाश में क्या देखा रात को तो वो बोल रहा है अरे तुमको पता नहीं सैटेलाइट दिखता है यहां से अरे आप रे आकाश में जो सैटेलाइट है वो तब तक अब देख सकते हैं इतना सुंदर पवित्र आकाश में कन्याकुमारी तो वहां पर यदि इतना स्वच्छ निर्मल आकाश होगा तो हम कल्पना करके सोच सकते हैं की उसे समय जबकि और पॉल्यूशन नहीं था साउंड पॉल्यूशन नहीं था लाइट पॉल्यूशन नहीं था आकाश वातावरण हवा पानी कितना शुद्ध पवित्र निर्मल स्वच्छ और सुंदर होंगे तो इतनी सुंदर सुहानी जगह पे वहां पे ठाकुर अवतार वरिष्ठ है अपने पार्षद के साथ में बैठकर के गैप लगा रहा है तो मास्टर वहां से लिखने हैं जैसे की आनंद की हार्ट बची हुई है आनंद की हार्ट लगी हुई है बाजार में जाएंगे तो खिलौना मिलेगा बेचे को या परचेज कर सकते कोई खिलौना बचता है कोई खाने की चीज बेस्ट है कोई यह कपड़े बचता है कोई वह कुछ डर दवाई बचता है यहां पर जैसे की बिकता है आनंद पवित्रता और ईश्वर प्रेम तो इसीलिए आनंद की हार्ट बिछी हुई है कथा कहानी पर कहानी पर नरेंद्र के ठाकुर बोलते सेन बात करते करते ठाकुर नरेंद्र को कहते हैं छिलका से हलो पूर्ण प्रेमचंद्रोदय है एक घंटी एक बार गाना चिड़कस में हुआ पूर्ण प्रेमचंद का उदय यह गण गांव ना एक बार नरेंद्र ग हाइट आरंभ गोरी लेंस नरेंद्र ने यह गण गाने की शुरुआत की खोलकर लाल अनुभव तो गन बजायते लगी लेने साथ-साथ में ही खोल कल बजाने की शुरुआत हो गई बाकी सब भक्तगण खोल और करताल बजाने लगे चिड़काशी हलो पूर्ण प्रेमचंद हृदय है उठा लियो प्रेम सिंधु की आनंद मोहे इस चिड़ा का शनि की हमारे चित के भीतर में जो आकाश है उसके भीतर में हमारा हृदय जो है हृदय रूपी आकाश के भीतर में पूर्ण प्रेमचंद का उदय हुआ है प्रेम सिंधु छल रहा है क्या सब कुछ जगत आनंदमय हो गया है वह झलमला कर रहे हैं भक्ति के साथ स्वर्गीय दो यार खली आनंद लोहड़ी तुली नाबाविधान बशुंधरा विधानसभा इतना सुंदर यह गाना है गीत है अभी इसका ट्रांसलेशन भी मुश्किल है किंतु इसका भाव जो है वो भाव ही हम समझ करके उनको कितना आनंद आता है तो आज यही पर कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति