Transcript
तो कल हमने देखा कि किस तरह से ब्राह्मण समाज हों के आमंत्रण से केशव सेन के आमंत्रण से श्री रामकृष्ण देव नौका विहार करने के लिए जहाज पर बैठने के लिए वहां पर जब दक्षिणेश्वर इनका जहाज आया तो उसके ऊपर में सवार हुए और कितना सुंदर दृश्य के नौका के ऊपर में गंगा के ऊपर में यह जहाज में बैठकर के प्रकृति का सौंदर्य का उपभोग करते हुए यहां पर काली मंदिर है वहां पर सब द्वादश शिव मंदिर है ऊपर में शरत ऋतु का नील आकाश है इसका सुंदर प्राकृतिक एक परिवेश के भीतर में साक्षात सनातन धर्म जैसे कि मास्टर महाशय कहते हैं मास्टर महाशय ठाकुर के बारे में कहते हैं साक्षात सनातन धर्म तो यह साक्षात सनातन धर्म श्री रामकृष्ण के देह में मूर्तिमंत होकर के अवतरित हुआ है और श्री राम कृष्ण देव क्या कह रहे हैं वेद मय अमृतवाणी श्री स्वामी जी का एक विजन था अ स्वामी जी जब चैटिंग करते थे वेदिक चैटिंग साम गान जिसको कहते हैं हम अपने यहां पे तो यह साम गान का अलग-अलग बहुत सारे राग होते हैं व उसको गान करने की अलग-अलग विभिन्न शैलियां होती है जिस घराने का जिस उस परंपरा से आप आते हैं सभी परंपराओं का बहुत सारी परंपराएं होती है साम गान की वैदिक साम गान की उसमें से स्वामी जी जिस परंपरा को जिस तरह से यह चैटिंग करते थे उसके बारे में पता है ना हमको स्वामी जी ने खुद कहा था कि एक बार उनको दर्शन हुआ देखा कि कहीं हिमालय में गंगा के किनारे एक ऋषि बैठ कर के ध्यान मुद्रा में बैठ कर के योग मुद्रा में बैठ कर के वह शाम गान कर रहे हैं और ऊपर आकाश में बादल जैसे कि एक तूफान की तरह आता है इस तरह से बादल उनके सर पर मंडरा रहे हैं और वो ऋषि जिस तरह से साम गान कर रहे थे वैदिक ऋचाओं का चैटिंग कर रहे थे वो स्टाइल वो स्वामी जी को उस दर्शन में सुनने को मिली श्रवण करने को मिली और उसी शैली में स्वामी जी यह रचाओ का वैदिक चैटिंग करते थे अपने रामकृष्ण मिशन की रामकृष्ण संघ के कोई भी सेंटर की आपने मुलाकात ली होगी आश्रम की मुलाकात ली होगी तो आपने देखा होगा कि सुबह को 7:00 बजे या 6 बजे या इवन 5:00 बजे अलग-अलग आश्रमों में अलग-अलग समय होता है किंतु ऐसे ही किसी समय पर सुबह को वैदिक चैटिंग होता है हमारे यहां पर भी होता है राजकोट में 7:00 बजे होता था यहां पर 5:00 बजे होता है तो किंतु वोह होता है तो वह चैटिंग सुन कर के आपको एक ऐसा एक हृदय में एक शांति अनुभूत होगी क्योंकि यह श्रुति है ना स्वामी जी या तो फिर अपने सनातन शास्त्र में अपने जितने भी ग्रंथ है अपने जितने भी शास्त्र है उसको दो विभाग में बांटे जाते हैं श्रुति और स्मृति तीसरा है वैसे न्याय किंतु अभी न्याय को छोड़ कर के श्रुति और स्मृति के ही बारे में बोले तो श्रुति अर्थात कि आपने ध्यान में आपने समाधि में ईश्वर की जो वाणी प्रत्यक्ष श्रवण की है उसको श्रुति कहते हैं और फिर अर्थात कि यह ऋषि मुनियों ने जब हायर सुपरकॉन्शसनेस लेवल पर जाकर के ईश्वर के साथ में जो डायरेक्ट कनेक्शन बिठा कर के ईश्वर की वाणी का या तो फिर आत्मन की वाणी का या तो फिर ब्रह्मण का जो दर्शन किया था उससे जो उन्होंने श्रवण किया उसी को जो उन्होंने लिपिबद्ध किया उसको उपनिषद कहते हैं और उपनिषदों की वाणी को कहते हैं श्रूती किंतु बाद बाद के ऋषि मुनियों ने बाद की जनरेशन में जो इस चिंतन करके मनन करके दर्शन शास्त्रों को खोजा और इसके आधार पर उन्होंने जो ग्रंथों की रचना की उसको कहते हैं स्मृति स्मृति अर्थात की स्मृति शक्ति यह मेमोरी जो है यह अपनी जो चिंतन मनन मंथन करने की यह जो फैकल्टी है वहां से जो शास्त्रों का उद्भव होता है उसको स्मृति शास्त्र कहते हैं तो श्रुति शास्त्र और स्मृति शास्त्र श्रुति में ज्यादातर तो यह उपनिषद ही आते हैं जो कि वेदों का एक हिस्सा है और स्मृति में बाकी सभी ग्रंथ आ जाते हैं जैसे कि पुराण है वगैरह वगैरह बहुत सारे ग्रंथ स्मृति शास्त्र में आते किंतु श्रुति में आते हैं सिर्फ उपनिषद तो यह उपनिषद युग एक था कि जब ऋषि मुनि साक्षात ब्रह्मण साक्षात्कार करते थे ईश्वर के साथ में सीधा वार्तालाप करते थे या तो फिर अद्वैत की भाषा में कहे तो ब्रह्म रूप में स्थित होकर के अपने सही स्वरूप में स्थित होकर के अपने साथ में अपने भीतर में जो सब चिंतन वो जो वाणी या तो फिर जो साक्षात्कार या तो फिर जो दर्शन वह प्रस्फुटित करना उसको कहेंगे शु श्रुति अभी देखिए कि मेरा खुद का मानना है यह अभी सबका अपना-अपना विश्वास के ऊपर में है मेरा खुद का ऐसा मानना है कि कथामृत श्रुती ग्रंथ है वैसे तो हमने ऐसा ठीक कर दिया है कि जितने भी उपनिषद है उन्हीं को श्रुती ग्रंथों में लिया जाए क्योंकि वह तो ईश्वर की साक्षात वाणी के रूप में प्रकट हुए हैं बाकी सब चिंतन मनन मंथन करके लिखे गए हैं किंतु देखिए कि श्रुति की जो डेफिनेशन है वह कथामृत को सीधे-सीधे अप्लाई होती है किस तरह से श्रुति का अर्थ या तो फिर ब्रह्म स्वरूप में स्थित होकर के अपने ही भीतर में जो दर्शन होते हैं उसका वर्णन करना यदि हम अद्वैत में विश्वास करते हैं और यदि द्वैत में विश्वास करते हैं तो ईश्वर के साथ में सीधा वार्तालाप करके ईश्वर की वाणी का श्रवण करके उसका वर्णन करना तो द्वैत और अद्वैत दो डेफिनेशन के अनुसार आप श्रुति को डिफाइन कर सकते हैं तो यहां पर आप देखिए कि यहीं पे अभी जस्ट इसके पहले वाले पैराग्राफ में ठाकुर मां के साथ में वार्तालाप कर रहे हैं ठाकुर मां को पूछ रहे हैं कि मां तुम मुझे यहां पर क्यों लाई हो क्या यह लोग जिस जंजीर में बंद है संसार किता रूपी जो सं जंजीर में जो बेडर भीतर थे के आमी की कोरे रखा करो बंगाली में जो ठाकुर कहते हैं कि जिस बंधन में यह लोग बंद है इस बंधन में से क्या मैं इनकी रक्षा कर पाऊंगा यह जो ठाकुर मां के साथ में जो सीधा वार्तालाप करते हैं या तो फिर कभी-कभी ब्रह्म स्वरूप में स्थित होकर के एक सुंदर एक घटना है कि ठाकुर एकाएक स्व स्वरूप में लीन हो गए स्व स्वरूप सुंदर शब्द है स्व अर्थात कि मेरा स्वयं में खुद स्वरूप अर्थात कि असली उसका स्वरूप तो स्व स्वरूप अर्थात कि मेरा खुद का स्वरूप तो ठाकुर स्व स्वरूप में लीन होकर के एकाएक बात कर रहे थे किसी को स्पर्श किया किसको स्पर्श किया मैं भूल गया शायद योगी महाराज को होगा जो भी है जो स्पर्श किया एकाएक वो स्व स्वरूप में लीन हो गए और फिर उनको एक के बाद एक दर्शन दिखने लगे फिर जब वह वापस आए तो क्या कहते हैं पता है कि मैंने सबका देखा कि कौन कहां तक पहुंचा है किसका कहां तक प्रगति हुआ है कौन किसको कहां पर थोड़ा सा रास्ते में रुकावट आ गई है किसके साथ में क्या प्रॉब्लम है यह सब मैंने देखा कि नरेंद्र कहां तक पहुंचा है यह बाबूराम कहां तक पहुंचा है ये जितने भी भक्त है उ आध्यात्मिक यात्रा में उन्होंने कहां तक प्रगति की है और प्रगति करते करते प्रगति में बाधा जदी है तो कहां पर बाधा आ रही है वह भी मैंने देखा देखिए कि यह जद आप ब्रह्म स्वरूप में स्थित नहीं होंगे तब तक दूसरों की आध्यात्मिक यात्रा देखिए कि हमको खुद को ज्यादातर समय समझ समझ में नहीं आता है कि मैं कहां तक पहुंचा हूं या मेरे मार्ग में रुकावट कहां पर है यदि कोई बहुत बड़े सिद्ध गुरु मिल जाए यदि और हमको कह दे कि तुम्हारे रास्ते में यह एक रुकावट है इसका त्याग करो छोटा सा इसके बारे में उदाहरण माने बात यह नहीं होती सिर्फ कि सब समय कि आपके जीवन में कामिनी कांचन बोलकर के ही रुकावट आए और छोटी मोटी कितनी बाधाएं होती है तो मास्टर महाशय को एक बार ठाकुर ने कहा था कि तुम अपनी जीभ अपनी जो टंग है जीभ उसको प्रतिदिन साफ करना क्लीन करना अभी यह जो हम लोग ब्रश करने के बाद में जीभ को भी साफ करते हैं तो उस समय शायद मास्टर महाशय नहीं करते होंगे तो ठकुर ने उनको यहां तक कहा था किय अपनी झप जो है ब्रश करने के बाद में अपनी टंग उसको भी साफ करते रहना तो देखिए कि ठाकुर की जो सूक्ष्म दृष्टि है कहां तक जाती है वह पता और हमको यह बात पता है कि ठाकुर जो भी उपदेश देते हैं आध्यात्मिकता के साथ में रिलेटेड ही होते हैं तो जब मास्टर महाशय को ठाकुर ने यह बात कही होगी तो सिर्फ एक हेल्थ और हाइजीन के दृष्टिकोण से नहीं कही होगी इसका कुछ ना कुछ स्पिरिचुअल डायमेंशन भी हो होगा एक ना एक स्पिरिचुअल पर्सपेक्टिव भी होगा ऐसा मेरा मानना है तो देखिए कि ठाकुर यहां तक उपदेश देते हैं यहां तक देखते हैं कि किसके रास्ते में कौन सी बाधा कब आती है और उसको किस तरह से दूर करना है तो देखिए कि यहां पे ठाकुर को जो दर्शन हुआ सब जितनी भी भक्त मंडली है उसमें कौन कहां तक पहुंचा है अपनी आध्यात्मिक यात्रा के कौन से सोपान ऊपर है कौन से स्टेप के ऊपर में है कौन से स्टेज में है वो देख कर के और यह भी समझ में आ रहा है कि किसके रास्ते में कौन सी बाधा है तो हम लोग मान लीजिए कि मुझे यदि ऐसी छोटी-मोटी पता नहीं मेरे रास्ते में कितनी ही बाधाएं होंगी भव बंधन तो जो है सो है कि कर्मों का बंधन जन्म जन्मांतर का है वह तो है ही है फिर उसके साथ-साथ में ही कामना वासना भी दुनिया भर की भरी होती है हमारे भीतर में किंतु इसके अलावा भी छोटी-मोटी जो बाधाएं होती है पता नहीं अभी एक भक्त के साथ में मेरी बात हो रही थी तो उसने कहा कि मेरे घर में थोड़े से बस चेंज किए हैं वो कहीं एक एक फोटोग्राफ घोड़े का लगाया है कई फिर महावीर की एक मूर्ति यहां पर रखी है एक कॉर्नर में तो मैंने कहा कि क्यों ऐसा किया मैंने कोई एस्थेटिक्स की दृष्टि से माने कमरा अच्छा दिखे घर अच्छा दिखे इसलिए ऐसा किया तो नहीं बोले कि हमने वास्तु शस्त्र वाले को एक को बुलाया था आजकल बहुत सारे निकले हैं ऐसे तो वो घर में आकर के पूरा घर देख कर के बताते हैं कि आपको यहां भी यह रखना है यहां भी यह रखना है आपका बेड इस तरह से होना चाहिए तो घर में सब शुभ होगा तो मैंने कहा यह तो अच्छा यह वास्तुशास्त्र है वैसे इसका भी एक महात्म्य है किंतु इस तरह से रिअरेंज करने से क्या जो अपने जो भी बाधाएं हैं वह दूर हो जाएगी पता नहीं मुझे तो इतना कोई खास विश्वास नहीं है शास्त्र पर विश्वास है ज्योतिष शास्त्र है वास्तु शास्त्र है आयुर्वेद है यह सब शास्त्रों पर विश्वास है किंतु शास्त्र का नाम लेकर के जो लोग यह सब प्रैक्टिस करते हैं उन लोगों पर विश्वास इजली नहीं आता ज्योतिष शास्त्र है वैसे बड़ा पावरफुल मां के पास में इस तरह से एक ज्योतिष आया था यह ठाकुर की महा समाधि के बहुत बाद की बात है 1920 में मां का देह त्याग होने वाला था उससे आई थिंक एक दो साल पहले की मां कोवाल पाड़ा में थी और एक युवान ज्योतिष एक यंग ज्योतिष वह वहां पर आया और माकू के बच्चे को देख कर के वो धु माकू और नलिनी यह सब मां की भतीज आं मां के भाई की लड़कियां तो अभी उनका संभाल तो मां को ही करना है वो सब तो आकर के मां के सर पर बैठने वाले है जो भी है ये मां को फिर वो एक मां की भतीजी थी मां के साथ में ही रहती थी उसका एक छोटा सा बच्चा था अ तो एक छोटे बच्चे को देख कर के ही यह ज्योतिष ने कह दिया कि इसका जो जीवन है बहुत लंबा नहीं है कुछ ही समय में इसका देहांत हो जाएगा तो यह सुनकर के अभी तो लड़कियां रोने लगी सब रा माकू वगैरह माकू दी वगैरह नलिनी दी और मां के पास में आई कहने लगी कि ज्योतिष ने ऐसा किया कहा है तो मां तो थोड़ी सी नाराज हो गई वो जो लड़का था यंग लड़का उसको बुलाया बोला कि अरे भाई तुम तुमको जद ऐसा लगता है तुम तुम्हारे मन में या तो तुम्हारी गणना में जद ऐसा दिखा कि ये लड़का का शीघ्र देहांत होने वाला है तो तुमको आकर के मुझे बताना था तुमने उसकी मां को क्यों बताया बिना मतलब वो टेंशन में आ गई है अभी तुम्हारे जो जति शास्त्र में जो विधान है वह करो तुम तो वह ठीक है वह ज्योतिष शास्त्र के अनुसार विधान वगैरह किए मां के पास में से अच्छे से रुपए भी मने व वो अदाई किए रुपए भी लिए मां के पास से बहुत सारे किंतु फिर उसका कोई निवारण नहीं हुआ और माकू दी का बच्चा उसी समय कुछ समय के बाद में उसका देहांत हो गया अभी यह घटना शरत महाराज को पता थी तो अभी कुछ समय के बाद में मां का जब आखिरी समय चल रहा था उस समय शरत महाराज ने उसी ज्योतिषी को बुलाया और बोला कि अभी तुम गणना करके कहो कि मां का जीवन कहां तक है तो अभी ज्योतिषी कहता है गणना के अनुसार मां का जीवन प्रदीप अभी कुछ ही समय में बूझने वाला है कुछ ही समय में वह अभी अप्रगत हो जाएगा मां का देह चला जाएगा तो अभी शरत महाराज कहते हैं कि जो भी शांति स्वस्थ यन है अभी करो तुम जो भी इसका जो विधान है शास्त्र के अनुसार तो वह ज्योतिषी यह सब करने लगा तो उस विधान के अनुसार एक घट रखना होता है घट में पानी भर के उसको एक रखना होता है तो घट में पानी भर के रखा गया अब जैसे ही घट में पानी भर के रखा गया एकाएक देखा कि उसमें छोटी सी दरार आ गई है और पानी निकल रहा है तो जैसे ही यह साधुओं ने भक्तों ने यह देखा सब लोग बड़े ही भयभीत और आशंकित हो गए अरे यह खट में ऐसे तो कैसे दर आ गई तो उन्होंने क्या किया कि दूसरा घट लेकर आए घट तो मिट्टी का होता है तो उसको बड़ा अच्छे से जांचा परखा देखा कि भाई इसके भीतर में दरार ना हो कुछ ना हो बड़े अच्छे से जांच करके इसको रखा गया विधि विधान करके उसके भीतर में पानी भरा गया उसके पतर में पानी भरा कुछ ही समय के बाद में देखा इसमें भी दरार आ गई है अभी सभी लोग बड़े ही चिंतित हो गए जैसे कि दैव खुद माने ठीक करके बैठा है कि अभी मां को तो यहां पर नहीं ही रखना है हम लोगों के साथ में मृत्य लोग में मां का समय अपने निज स्थान पर निज निवास में जाने का वैकुंठ लोक में जाने का समय आ गया है किंतु बच्चे तो छोड़ेंगे नहीं इतना आसानी से अभी एक पीतल का घट मंगवाया गया मिट्टी का घट तो टूटेगा ना पीतल का घट कैसे टूटेगा पीतल का घट मंगवाया गया बड़े अच्छे से जांचा परखा गया उसके भीतर में अभी पानी भरा गया देखिए कि कैसी अनहोनी उसी के भीतर में भी दरार आ गई और उसी में भी पानी निकलने लगा तब कहीं जाकर के शरद महाराज ने हार मान ली कि हां कि अभी मां ने ठीक कर लिया है कि अभी वह मृत्य ध्या पे हमारे साथ में नहीं रहने वाली और उसी के कुछ ही दिनों के बाद में मां का माने समाध महा समाधि ग्रहण की तो देखिए कि ये ज्योतिष शास्त्र जिनको ज्योतिष शास्त्र कहो ना कि वास्तुशास्त्र कहो इन सब में सार है किंतु यदि आपको उसके भीतर में आपका का एक एक्सपर्टाइज्ड होते हैं जैसे कि अग्नि और तार दहि का शक्ति एक दिया सलाई के ऊपर में जब अग्नि प्रकट होती है तो कैसी वह अग्नि तो डायनेमिक है किंतु दिया सलाई जो होती है वह स्टैटिक रहती है वह स्थिर रहती है तो वैसे ही ब्रह्मण तो स्थिर है किंतु ब्रह्मण के ऊपर में यह प्रकृति अपनी माया की शक्ति से एक के बाद एक दर्शन प्रकट करती है यह पूरा विश्व ब्रह्मांड इसी तरह का एक दर्शन है ब्राह्मण के भीतर में तो इस तरह से जो दर्शन प्रकट होते हैं इसका जो जहां पर जिस ग्रंथ में वर्णन किया गया है वह ग्रंथ है श्रुति ग्रंथ और श्रुति ग्रंथ की जितनी भी डेफिनेशन है सब डेफिनेशन में अपना श्री श्री रामकृष्ण कथामृत इस डेफिनेशन में फीट बैट जाता है ठाकुर ने जब भी जब भी ईश्वर के साथ में वार्तालाप किया कोई भी दर्शन हुआ उसका वर्णन ठाकुर जो अपने स्वयं मुंह से वर्णित करते हैं तो मास्टर महाशय उसी को लिपिबद्ध कर लेते हैं बाकी के जितने भी ग्रंथ देखिए स्वामी जी का कंप्लीट वर्क स हो न कि शरद महाराज का लीला प्रसंग हो जितने भी ग्रंथ देखिए वो सभी चिंतन मनन स्मरण करके दूसरों से सुन कर के स्मृति कथाओं को कलेक्ट करके उसके ऊपर में दर्शन शास्त्र का एक आवरण पहना करके सभी ग्रंथ लिखे गए हैं किंतु यह एक ऐसा ग्रंथ है कथामृत जो कि सीधा ईश्वरीय वाणी को हमको सुनाता है बिना किसी फिल्टर के अभी बिना किसी फिल्टर के यहां पर जब हम कहते हैं तब थोड़ा सा एक डिस्प्यूट खड़ा होता है कुछ-कुछ लोग सीनियर लोगों का मत है सीनियर साधकों का मत है कि मास्टर महाशय ठाकुर के शब्दों के ऊपर में यह जो इंटरप्रिटेशन बिठाते हैं वह गलत है उनको यह सब करने को किसने कहा था जैसे कि ठाकुर ने कहा कि खोलता अर्थात कि जब पहारी बाबा के घर में या तो फिर उनकी गुफा में जो फोटोग्राफ देखा उनको जब कहा गया कि वहां प यह फोटोग्राफ है तो ठाकुर ने कहा कि इस खल का एक आवरण का फोटोग्राफ है तो इमीडिएट मास्टर महाशय ने इसके ऊपर में तीन-चार लाइन का वर्णन हमको दे दिया कि ठाकुर क्या यह कहना चाहते हैं कि देही एक है देह एक है और देह तो नश्वर है आता रहेगा जाता रहेगा उसका फोटोग्राफ लेकर क्या होगा इसके भीतर में जो देही है अर्थात अ की ठाकुर के शब्दों में कहे तो गाड़ी और इंजीनियर अर्थात कि यह वाहन है इसके जो चालन चालक है इसका जो ड्राइवर है जगदंबा स्वयं तो इसकी जो चालक है ड्राइवर है उसका चिंतन मनन करना देख गाड़ी का फोटो लेकर क्या करेंगे ऐसा क्या ठाकुर कह रहे हैं यह जो इंटरप्रिटेशन कहीं कहीं पर मास्टर महाशय देते हैं और कहीं कहीं पर जैसे कि अपने बहुत सीनियर साधक जो होते हैं वह अद्वैतवाद होते हैं क्योंकि यहां पर भी एक बात है रामकृष्ण मिशन में अद्वैतवाद को इतना प्राधान्य क्यों दिया जाता है हालांकि आप कथामृत पढ़ेंगे तो आप देखेंगे कि द्वैत हो ना कि अद्वैत हो ना कि विशिष्ट अद्वैत हो कोई भी भाव हो कोई भी परंपरा हो कोई भी यह स्कूल ऑफ थॉट हो सभी को ठाकुर ने समान प्राधान्य दिया है कहीं पर ठाकुर ने ऐसा नहीं कहा कि यही सही है और यह गलत है इनफैक्ट यदि कहा जाए तो ठाकुर द्वैत भाव को ज्यादा प्राधान्य देते हैं ठाकुर कहते हैं ना कि मैं चीनी होना नहीं चाहता चीनी खाना चाहता हूं मैं शुगर होना नहीं चाहता शुगर खाना चाहता हूं क्यों क्योंकि यदि मैं शुगर खुद हो जाऊंगा चीनी खुद हो जाऊंगा तो फिर ब्रह्म भाव में स्थित हो जाऊंगा किंतु मैं चीनी खाऊंगा अर्थात कि भक्त भगवान का यह जो डिस्टेंस है वह मैं जद मेंटेन करूंगा तो मैं भक्तों के साथ में लीला कर सकता हूं उनके साथ में वार्तालाप कर सकता हूं उनके साथ में मिलकर के आनंद कर सकता हूं तो ठाकुर तो यह चाहते थे अर्थात यदि कथामृत पढ़ेंगे तो आपके मन में एक ऐसा भाव आएगा कि ठाकुर द्वैत भाव को शायद ज्यादा प्राधान्य देते हैं भक्ति को शायद ज्यादा प्राधान्य देते हैं और ठाकुर की बातें भी ऐसी है कि जो ज्ञान है वो पुरुष है वो जैसे कि घर में किसी के घर में जाएंगे तो आप देखेंगे कि उस समय की जो प्रथा थी एक अंदर महल होता था घर का एक अंदर का भाग जहां पर किचन होगा और बाकी सब जगह होगी जहां पर सिर्फ स्त्रियां ही जा पाएंगी पुरुष लोग घर के भीतर में नहीं जा पाएंगे पुरुष यदि मेहमान होकर के आते हैं कोई मुलाकात के लिए आता है पुरुष तो बाहर में बैठक खाना जो होता है वहीं पर उसको बिठाया जाता है भीतर के जहां पे किचन है जहां पे सोने का कमरा है वगैरह जो जहां पर सिर्फ स्त्रिया ही जाएगी उस समय की जो प्रथा थी कि विदेशी आक्रमणों के बाद में स्त्रियों की असुरक्षा स्त्रियां बड़ी असुरक्षित थी इसलिए यह सब पर्दा प्रथा है अंदर महल प्रथा है यह सब डेवलप हुआ था आज ऐसा नहीं है ज्यादातर जगहों पर देखेंगे शहरों में तो एटलीस्ट नहीं ही है तो ठाकुर कहते हैं कि जो ज्ञान है वो पुरुष है सिर्फ वो बैठक खाने तक जा सकता है किंतु भक्ति स्त्री है अंदर महल तक जा सकती है जहां पर सिर्फ स्त्रियों को ही जाने का अधिकार है अर्थात कि ज्ञान लेकर के आप एक ही सतह एक ही हद तक जाएंगे उसके बाद में आखिरी बैरियर जो पार करनी है वह आपको भक्ति के माध्यम से करनी पड़ेगी तो कथामृत पढ़कर शायद किसी किसी को लगता है कि भक्ति का प्राधान्य या तो फिर भक्ति के साथ में एसोसिएटेड जो दर्शन शास्त्र है उसको कहते हैं द्वैत या तो फिर विशिष्ट अद्वैत तो उसका प्राधान्य ज्यादा इस शास्त्र में दिया गया है किंतु स्वामी जी को पढ़ेंगे स्वामी जी बार-बार कहते हैं कि महावीर के भाव से अपने को भर दो यह जो कीर्त है वगैरह वह सब अभी कुछ समय के लिए बंद कर दो और महावीर के भाव से शिव के भाव से अपने को भर दो प्रचंड रजस दिखाना है तभी तो कहीं जाकर के आपको ब्रह्म साक्षात्कार होगा तो स्वामी जी ने जो अद्वैत भाव को जो प्राधान्य दिया है तो यह देख कर के अद्वैत भाव में जो जो लोग ज्यादा विश्वास करते हैं स्वामी जी को पढ़कर उसमें से कोई कोई साधक ऐसा कहते हैं कि कथामृत को नहीं पढ़ना चाहिए क्योंकि कथामृत आपको भक्त या तो धत भाव सिखाता है या तो फिर मास्टर महाशय कहीं-कहीं पर खुद लिखते हैं अपने यह जो टाइटल में बोल कर के सुनाता हूं तो चैप्टर के टॉपिक के उसमें कहीं-कहीं पर मास्टर महाशय लिखते हैं श्री रामकृष्ण देव का विशिष्ट अद्वैतवाद तो अभी यह देख कर के कुछ-कुछ साधक पहले पहले ऐसा कहते थे कथामृत मत पढ़ो कथामृत पढ़ कर के तुम दूसरी डायरेक्शन में चले जाओगे बेटर है कि स्वामी जी को पढ़ो और फिर शंकराचार्य को पढ़ो क्योंकि स्वामी जी जी ने खुद ने अद्वैत भाव वीर भाव की साधना करने की हमको बात कही है अभी वीर भाव यानी कि वो तंत्र साधना का वीर भाव नहीं साहस शौर्य आत्म श्रद्धा इसका इस स्वरूप में यह वीर भाव तो अभी यह कंफ्लेक्स शुरू शुरू में आया था कथामृत के बारे में ऐसे कुछ-कुछ साधकों ने मुझे ऐसा कहा कि कथामृत को बाद में पढ़ना पहले लीला प्रसंग है स्वामी जी का कंप्लीट वर्क से यह सब पढ़ कथामृत तो गृहस्थ लोगों के लिए है भक्तों के लिए है साधुओं के लिए सन्यासियों के लिए नहीं है तो खैर ठाकुर की कृपा से यह सब बातें मैंने सुनी नहीं मैं तो कथामृत पहले ही दिन से पढ़ता आ रहा हूं और हमेशा से पढ़ता रहूंगा किंतु यह जो कंफ्लेक्स का यह रूट है कि स्वामी जी ने ऐसा क्यों अद्वैत भाव पर बार-बार जोर देक कहा है क्यों शौर्य और वीरता का प्रदर्शन करने को कहा है जबकि ठाकुर एक मृदु भाव है एक कहेंगे कि एक मधुर भाव है उस सब ठाकुर के जीवन में ज्यादा दिखते हैं तो इस कंफ्लेक्स आंसर बड़ा ही स्पष्ट है ऐसा नहीं है कि ठाकुर गलत है स्वामी जी सही है या तो स्वामी जी गलत है ठाकुर सही है हम किस स्टेज के ऊपर में है जो भी मैं साधक हूं तो मैं क्या तमस में हूं तो तमस में जद हूं तो मुझे पहले तो रजस प्रकट करना होगा शौर्य वीरता प्रकट करनी होगी आत्म श्रद्धा प्रकट करनी होगी तब कहीं जाकर के ना मैं सत्व में जाकर के यह मधुर भाव है यह भक्ति भाव है इस सब भावों को अपने हृदय में स्थापित कर पाऊंगा जिसके हृदय में जो आदमी तामसिक है उसको यदि आप मधुर भाव है या तो सखी भाव है या तो मातृ भाव है या तो वात्सल्य भाव है यह सब मृद मृदु भावों की साधना करने को बोलेंगे तो उससे तो उसके भीतर में विकृति ही खड़ी होगी वो शुद्ध साधना नहीं कर पाएगा भाव को ले करके शुद्ध रूप से साधना नहीं कर पाएगा उसके भीतर में विकृति ही खड़ी होगी तो बेटर है यदि हम तमस में है तो सर्वप्रथम तो महावीर हनुमान का भाव शौर्य वीरता का भाव आत्म श्रद्धा का भाव नचिकेता जो कि स्वामी जी को सबसे ज्यादा पसंद थी यह कहानी उपनिषदों में कि सीधे मृत्युलोक में जाकर के यमराज को प्रश्न करता है और यमराज भी थोड़े से पहले तो यह हो जाते हैं घबरा जाते हैं कि अरे ब्राह्मण का ल का है तीन दिन यहां पर निवास किया है बिना किसी आगत स्वागत के तो फिर यदि श्राप दे देगा तो मेरा क्या होगा तो तीन वरदान मैं देता हूं तुमको ऐसा यमराज को बोलना पड़ा ऐसा भीतर में शौर्य वीर्य होना चाहिए कि भगवान स्वयं आकर के हमको कहे भाई तुमको जो कष्ट हुआ इसके लिए मैं क्षमा मांगता हूं तो वो शौर्य भाव पहले तो अपने में प्रकट करो फिर कहीं जाकर के जो मृदु भाव है फिर जो मधुर भाव है यह सब शांत भावों की साधना बाद में होगी तो यह अधिकारी भेद के अनुसार सब कुछ है तो जो भी है मेरा जो ओरिजिनल विचार था कि कथामृत बाकी जितने भी ग्रंथ है अपने संघ के उसमें कथामृत का एक विशिष्ट स्थान इसलिए है कि श्रुति की जितनी भी डेफिनेशन है वह सब इसको अप्लाई होती है इसलिए जनरली हिंदू शास्त्र में जो माना जाता है कि श्रुती ग्रंथ अर्थात की सिर्फ उपनिषद और कुछ नहीं सिर्फ एक मांडूक्योपनिषद को देते हैं तो चलिए अभी थोड़ा सा आगे पाठ करते हैं अभी कल हमने देखा कि फोटो के बारे में ही बात हो रही थी ठाकुर कहते हैं इस आवरण का फोटो है उसके ऊपर में मास्टर महाशय ने अपना एक मंतव्य भी दिया कि देही और देह देह तो अविनाशी नश्वर है व देह का फोटो लेकर क्या होगा तो इसी सिलसिले में ठाकुर एकट प्रकृति स्थ होया छन तीनी बोली दे छन ठाकुर थोड़े से सहज भाव में आए हैं और वह बात कर रहे हैं तबे एकटी कोथा आचे तबे एक बात है भक्ते हृदय तार अवस्न भक्त का हृदय है वह है ईश्वर का अवस्न ईश्वर का निवास स्थान तीनी सर्व भूते आन बटे किंतु भक्त हृदय विशेष रूपे आन ईश्वर वैसे तो सब जगह पर है कण कण में व्याप्त है सर्वव्यापी है किंतु भक्त के हृदय में ईश्वर का वि विशेष निवास स्थान है जेमन कोनो जमीदार तार जमीदारी शकुल स्थान था कीते पारे जैसे कि कोई जमींदार है जमींदार की बहुत बड़ी जमीन है 100 एकड़ ना कि 200 एकड़ बहुत बड़ी जमीन है किंतु आपको यदि जमींदार के साथ में मुलाकात करने के लिए जाना है तो वह कहीं कोने में एक तालाब है उसके किनारे जाकर के आप अपेक्षा करेंगे ना कि दूसरे किनारे वह नारियल के पेड़ लगे हैं खजूर के पेड़ लगे हैं या तो फिर आम का पेड़ है उसके नीचे में जाकर अपेक्षा करेंगे ना कि जहां पर जमीन दार ने अपना निवास ग्रुप बनाया है जहां पर वह रह रहा है जिसके भीतर में एक बैठक कक्ष है ड्रॉइंग रूम है वहां पर जाकर के आप अपेक्षा करेंगे जो ड्रॉइंग रूम है बैठक खाना है निवास कक्ष है वहां पर जमींदार को मिलने की संभावना बहुत ज्यादा है कंपेयर टू कहीं जाकर एक कोने में तालाब है वहां जाकर अपेक्षा करेंगे दूसरे कोने में कोने में आम के आम का पेड़ है उसके नीचे जाकर अपेक्षा करेंगे सबसे बेटर है उसके निवास स्थान पर जाकर के उसकी अपेक्षा करना वो वहां पर रहने की संभावना सबसे ज्यादा है तो वैसे ही यह भक्ते हृदय भगवान बैठक खाना जमींदार री जमींदारी के सब जगह पर रह सकते हैं किंतु तीनी तार अमुक बैठक खाना प्रा था केन ही लो लोके बोले लोग कहेंगे कि जमींदार वैसे तो अपनी जमींदारी के कोई किसी भी कोने में मिल सकते हैं किंतु उनका जो बैठक खाना है वहां पर उनको मिलने की संभावना सबसे ज्यादा है भक्ते हृदय भगवाने बैठक खाना भक्त का हृदय है ईश्वर का भगवान का बैठक खाना निवास कक्ष यदि भगवान को खोजना है तो भक्त के हृदय में खोजो और इसीलिए भक्त हृदय जिस भक्त के देह में है इसका फोटो आपने अपने घर में लगाया है तो इससे कोई हानि नहीं है यहां पर भी देखिए ठाकुर का वही सेंस ऑफ प्रैक्टिकल प्रैक्टिकल सेंस अ ठाकुर जब कैंसर हो गया था ठाकुर को आखिरी समय चल रहा था उस समय वह उनको उनके भक्त उनको कलकत्ता लेकर गए क्योंकि दक्षिणेश्वर तो कोलकात्ता से थोड़ा सा दूर रहता है और ट्रीटमेंट करने में आने जाने में डॉक्टर को लाने जाने में असुविधा रहती है इसलिए उनको कोलकाता लेकर गए पहले तो श्यामपुर में रखा बाद में रखा ठाकुर को काशीपुर में तो तो उस समय ठाकुर कलकाता में थे कहां पर एगजैक्टली मुझे याद नहीं है श्यामपुकुर ना काशीपुर किंतु एक ऐसी घटना हुई कि कुछ भक्त ठाकुर का दर्शन करने के लिए दक्षिणेश्वर आए देखा कि ठाकुर वहां पर उपस्थित नहीं है और वो ठाकुर के लिए कुछ ठाकुर को ऑफर करने के लिए कुछ मिठाई या ऐसी कोई चीज वानगी लाए थे तो देखा कि ठाकुर नहीं है तो उन्होंने ठाकुर के फोटो जो वहां पर रखा था उसके सामने इसको अर्पण किया इसको ऑफर किया इसका प्रसाद बना दिया और फिर घर ले गए इस प्रसाद को यह मान कर के कि अभी यह ठाकुर का प्रसाद है हम इसको ग्रहण करेंगे अभी उनका तो यह प्रसाद हो गया ठाकुर के फोटो के सामने ऑफर करके अर्पण करके किंतु जब इस बात का मां शारदा देवी को पता चला तो बेचारी बड़ी ही भयभीत हो गई क्योंकि किसी जीवंत व्यक्ति के फोटो की पूजा करना यह थोड़ा सा अशुभ माना जाता है अब फोटो की पूजा कब करेंगे जबकि आप इस व्यक्ति का देहांत हो गया तभी तो आप फोटो की पूजा करेंगे अदर वाइज तो व्यक्ति यदि आपको किसी की पूजा करनी ही है तो व्यक्ति की ही कीजिए फोटो की पूजा तो तभी होगी जबकि उनका देहांत हो जाता है बहुत सारे लोगों के घर में मैंने देखा है भक्तों के घर में कि उनके जो स्वर्गवासी जो पिताजी है माताजी है नाना नानी है उनका फोटो रखा गया है उसके ऊपर में माल माला अर्पण की गई है माला पहनाई गई है तो अभी आपके पिताजी या माता जी जीवित है और उसके फोटो को क्या माला पहनाए ऐसा कभी नहीं होगा भाई यह तो अशुभ हो गया तो अभी यह बात मां को जब पता चली तो मां थोड़ी सी घबरा गई कि अरे ठाकुर तो अभी जीवित है तो अभी उनके फोटो की पूजा की गई है तो क्या ठाकुर को वैसे ही कैंसर है ऑलरेडी लोग कहते हैं ग्रहणी रोग है आयुर्वेद के अनुसार और इसका कोई वैसे सहज इलाज नहीं है तो भी ठाकुर का क्या होगा मैंने ठाकुर क्या अभी बहुत ही जल्दी देह त्याग कर देंगे क्या तो ठाकुर भी थोड़े से उस समय चिंतित हो गए कि अरे इन लोगों ने ऐसा क्यों कहा किंतु उसी दिन रात को जब मां ठाकुर के पास में अकेली बैठी हुई थी तब ठाकुर ने कहा था कि देखना एक ऐसा समय आएगा कि जब इस फोटो की घर-घर पूजा होगी तो देखिए कि ठाकुर वैसे तो कहते हैं कि ये देह और देही माने ये आवरण का फोटो है इसका रख के क्या होगा एट द सेम टाइम ठाकुर वैसे बड़े प्रैक्टिकल भी है हमको जद संशय हो यह बात सुनक के कि अपने तो घर में हमने ठाकुर का फोटो रखा है अपने मंदिर में भी ठाकुर का चित्रपट रखा है या तो फिर आरस पहाड़ की मार्बल की मूर्ति रखी है तो यह क्या गलत हो गया क्या तो यहां पर ठाकुर पहले से ही इस बात को काट देते हैं कि हृदय जो है ईश्वर तो वैसे सर्वव्यापी है किंतु उस भक्त का जो हृदय है वह ईश्वर का बैठक खाना है भक्त के हृदय में ईश्वर हमेशा विराजमान रहेंगे तो यदि भक्त का हृदय जिस देह में है उसका फोटो यदि आप रखते हैं तो इससे कोई आपत्ति नहीं असुविधा नहीं गलत कुछ नहीं तो ठाकुर थियोरेटिकल भी है प्रैक्टिकल भी है वो जो मेरा सबसे फेवरेट एग्जांपल वो मास्टर वहां से छाता छोड़ के आते हैं तो ठाकुर कहते हैं मैं जब ध्यान में चला जाता हूं भाव में होता हूं तो मेरे वस्त्रों का भी ठिकाना नहीं रहता किंतु मैं छाता कभी नहीं भूलता ये ठाकुर का ये दोनों एस्पेक्ट है जितने थियोरेटिकल है उतना ही प्रैक्टिकल है जितने देवी भाव में कते हैं इतने ही यह सांसारिक का या तो इस जगत में कैसे रहना उसका एकदम उनको पक्का नॉलेज है कि लोगों की लोगों के समाज में रहते हैं ना समाज में 10 लोगों का 10 तरह का मंतव्य होता है अभी जब पानी हाटी उत्सव में सभी भक्त लोग जा रहे हैं नौका में सवार हो गए हैं यह गोलाप मां है योगेन मां है स्त्री भक्तो भी जा रही है ठाकुर ने कहा था कि ये तुम आजकल के यंग बंगोल हो माने यंग टर्क वो जो चला था ना इसके नाम से ये सब चीजों को यंग बंगोल तो आज के ठाकुर ये इंग्लिश शब्द का व्यवहार करते हैं कि तुम लोग आजकल के यंग बंगोल अर्थात कि ये जो सब युवान सब भक्त ठाकुर के पास आते थे तो ठाकुर कहते हैं तुम लोगों को तो पता नहीं यह सब अपने ट्रेडिशनल उत्सव कैसे मनाए जाते हैं चलो हम लोग नौका लेकर पाणी हाटी चलते हैं नृत्य कीर्तन करेंगे बड़ा आनंद आएगा तो सब लोग एकदम रेडी हो गए सब नौका तीन चार नौका इकट्ठी हो गई पुरुष भक्त तो जा रहे हैं स्त्री भक्त भी जा रही है उस समय पूरा इलेक्ट्रिक वातावरण हो गया था सब उत्साह उत्साह दक्षिणेश्वर में कोई यह तैयारी कर रहा है कोई यह तैयारी कर रहा है कोई नौका लगा रहा है तो मां बेचारी अकेली चुपचाप नबत में बैठी थी और मां के मां को भी तो होगा कि अरे भाई सभी लोग जा रहे हैं इतना आनंद आएगा और मैं अकेली यहां पर रहूंगी तो मां ने ठाकुर को किसी स्त्री भक्त के द्वारा यह कह कर के भेजा कि क्या मैं भी आऊं आपके साथ में तो ठाकुर ने उत्तर दिया कि यदि उसकी इच्छा है तो आए ठाकुर जितने प्रैक्टिकल उतने ही प्रैक्टिकल मां मां ने कहा कि ठाकुर की जद ऐसी इच्छा होती कि मैं जाऊं तो उन्होंने ऐसा कहा होता कि हां हां वो भी तो आए बहुत अच्छा होगा ऐसे उत्साह प्रकट किया होगा किंतु निरुत्तर के जब ऐसा कहा कि उसकी इच्छा है तो आए मेरे पर जब छोड़ दिया है इसका अर्थ है कि ठाकुर नहीं चाहते कि मैं जाऊं ऐसा करके मां ने जाना बंद कर दिया अपना विचार वापस ले लिया यहां पर ठाकुर को जब यह पता चला कि मां नहीं जाने वाली ऐसा उन्होंने ठीक किया है तब उन्होंने कहा कि अच्छा हुआ देखो वोतो बुद्धिमता वोह कितनी बुद्धिमता है कि वह मेरे साथ में नहीं आ रही वो यदि साथ में आती तो लोग क्या कहते हैं कि देखो ये हंसो हंसी ऐसे छ ठाकुर परमहंस तो वो हंस है उनके साथ में उनकी पत्नी है तो वह हंसी है वो हंस और हंसी दोनों साथ में आए हैं ऐसा करके लोग मजाक उड़ाते हैं तो अच्छा किया कि वह मेरे साथ में नहीं आ रही तो देखिए कि कभी-कभी हमको लगता है कि अ मां तो ठाकुर की पत्नी थी व ठाकुर के साथ में यदि जाती भी तो उसमें लोगों को क्या है इतना या तो फिर ठाकुर इतनी चिंता क्यों करते हैं ठाकुर ने जब साधना कर रहे थे दुनिया भर ठाकुर को पागल कह के तिरस्कार कर रही थी उस समय तो ठाकुर ने यह बात नहीं मानी कि लोग मुझे पागल कहेंगे इसके लिए मैं मां का नाम लेकर रोंगा अ चिल्लाऊंगा दिगंबर हो जाऊंगा वस्त्रहीन होकर के अपना उपनयन है उसको फेंक दूंगा यह जब लोगों की इतनी ही चिंता ठाकुर को होती तो उन्होंने जिस साधन चक्रवात में से पसार हुए हैं वो पसार होने का साहस ही नहीं किया होता लोगों की कभी परवाह नहीं की ठाकुर ने और अपने ही बलबूते प अपनी ही शक्ति का प्रगट करके पूरे जमाने को अपने सामने झुकाया है यही ठाकुर आज मां के लिए ऐसा क्यों कहते हैं जब हम मां का जीवन चिंतन कर रहे थे तब भी मैंने बहुत बार यह नोट किया मैं जब पहली बार पढ़ रहा था बार-बार मुझे ऐसा लग रहा कि ठाकुर मां के साथ में अन्याय कर रहे हैं और इस घटना में भी देखिए सभी लोग आप खुद देखिए अपने घर में मान लीजिए कि आप आपके घर में सभी आपके रिलेटिव है आपके जितने भी माता-पिता भाई बहन सब लोग किसी बड़े उत्सव में जाने के लिए बड़ा ही उत्साह तैयारी कर रहे हैं कोई स्वम कर रहा है कोई यह कर रहा है तो आपसे व आप जभी कहा जाए कि तुमको नहीं आना है तो आपका कितना आप कितने मायस हो जाएंगे आप कितने बिची हो जाएंगे अरे जहां पर सभी ने जाकर के आनंद कर रहे उस आनंद का एक कण प्राप्त करने का भी क्या मेरा अधिकार नहीं है और जद ठाकुर जिस आनंद का प्रवाह बने वाले थे उसको सबसे पहले न करने का अधिकार मा का ही था पत्नी थ ठाकुर की सहर्म थ तो अभी वो ऐसा ठाकुर मान ऐसा साइड