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Sri Ramakrishna Kathamrita ·

Sri Ramakrishna Kathamrita 1 Sep 2023 श्रीरामकृष्ण विजया के दिन दक्षिणेश्वर मन्दिर में 22 Oct 1886

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ओम स्थापनाय धर्म सर्व धर्म स्वरूप रामकृष्ण या ते श्री राम कृष्णा कथा व्रत तो सर्व धर्म और उसके बड़े में हम पढ़ रहे थे ठाकुर का रहे थे की सभी रास्तों से मुझे एक-एक बार साधना कर लेनी पड़ी है जिससे की उसका अर्थ क्या है ठाकुर ने कहा था जो सकरवादी है उसके साथ में मैं सरकार निराकारवादी के साथ निराकार अर्थात की ठाकुर ने सब तरह की साधना करके सब तरफ की सिद्धियां दर्शन प्राप्त किया हैं जिससे की उनके पास में किसी भी साधना का किसी भी पाठ का प्रतीक आई ठाकुर उनको अच्छे से गाइड कर सकते हैं तो यह पूरा बात हमारा कल हुआ आज ठाकुर आगे कहते हैं अच्छा उसके बाद में मास्टर महाशय ने कहा की जिनकी बात हो रही है अर्थात ईश्वर वो भी जैसे अनंत है वैसे ही आप भी अनंत है अर्थात की ठाकुर आपका भी अंत नहीं मिलता ये बात सुनकर के ठाकुर हंसने लगे और क्या कहा तुम्ही मुझे फेल हो तुम समझ चुके हो की जानू क्या पता है शॉप धर्मो एक बार कोर नाइट हुए सब धर्म एक बार कर लेने चाहिए शौक पाठ दिए कोलेस्ट्रॉल सब रास्ते से एक बार चलना पड़ता है कुछ खेल और घटी शॉप घर ना पैर पेरोल की चिक उठे घटी जो खून की के उठे क्यों टेक धरते पैर ना अर्थात की एक गेम है उसमें एक वो पीस है गेम का वह सभी बॉक्स से गुर्जर जाएगी तब कहानी जाकर के अपने अल्टीमेट डेस्टिनेशन तक पहुंच जाएगी तो यह बात ठाकुर ने कहीं और हमने ये भी देखा था की किस तरह से ठाकुर पहले कहते हैं ठाकुर ने एक बार कहा है की अपने करने अपने को करने के लिए सी भी काफी है किंतु दूसरों को करने के लिए तलवार चाहिए अर्थात की यदि जो लोग कल्याण जिसको करना है पूरे विश्व में जिनको धर्म और शांति का संदेश फैलाना है उनके लिए सब तरह की साधना की आवश्यकता है किंतु जिसको सिर्फ अपने खुद के आदमी को उन्नति के लिए यदि कुछ करना है तो उसके लिए उसकी प्रकृति के अनुसार जो साधना है वो करने से उसके लिए काफी है तो यह बात हमारी हुई थी अभी आगे कहते हैं ठाकुर कहते हैं योगी दी प्रकार योगी दो तरह बहुदक ऋतिक बहुदक और कुटिचक जैन साधु अनेक तीर्थ कोर बेड़ा छे जो साधु बहुत सारे तीर्थ यात्रा कर रहे हैं जर मैन शांति हुए नहीं जिसके मां में अभी भी शांति नहीं हुई है ताकि बहुदक बोले उसको बहू तक कहते हैं अभी बहुदक का अर्थ क्या है बहू उदक अर्थात की बहुत जगह का पानी पिता है उसको बहुत कहते हैं मैंने अभी मैं राजकोट में हूं तो मैं राजकोट का पानी पी रहा हूं कोलकाता आऊंगा तो कोलकाता का पानी पियूंगा लखनऊ में जाऊंगा तो लखनऊ का पानी पियूंगा वहां क्या तालाब का वहां की नदी का अलग-अलग जगह से बहुत साड़ी जगह से पानी पीने से उसको बहुत फिर जी योगी ने सब जगह पर घूम करके अपने मां को स्थिर कर दिया है जिसको शांति प्राप्त हो गई है और फिर वह कहानी नहीं जाता श्री एक स्थान है बॉशहितर आनंद उसे एक स्थान पर बैठने से ही उसको आनंद मिलता है तार तिरछे जवा कोनो प्रयोजन करें उसको तीर्थ यात्रा करने का कोई प्रयोजन नहीं है यदि इसे तीर्थ जय केवल उद्दीपनर जानो यदि वो तीर्थ यात्रा करता है तो वो ईश्वर का आनंद जो है सब प्रत्येक तीर्थ में एक खास प्रकार का एक वाइब्रेशन होता है तो वो वाइब्रेशन ग्रहण करके उसकी साधना को सुपर चार्ज यदि करना है आज की मॉडल लैंग्वेज यदि हम उसे करें थोड़ा सा तो अपनी साधना को सुपर चार्ज करने के लिए यदि वह हो सकता है थोड़ा सा तीर्थ यात्रा करेगा अभी यह बात सुनकर के हमको थोड़ा स्वामी जी की बात याद आई है एक बार में टच में था तो हम कुछ ब्रह्मचारी सोच रहे थे की स्वामी जी ने अपनी पुरी लाइफ में कितनी जर्नी की होगी कितने किलोमीटर उसका एक कैलकुलेशन किया जाए तो कैलकुलेशन कितने में होगा भारत में ही उन्होंने अभी आप एक रूल ऑफ थंब लगा करके देख लीजिए की कलकत्ता से हिमालय हिमालय से नॉर्थ इंडिया नॉर्थ इंडिया से राजस्थान से गुजरात से महाराष्ट्र से साउथ इंडिया से फिर से चेन्नई हैदराबाद फिर वहां से फिर राजस्थान राजस्थान से मुंबई मुंबई से अमेरिका हजारों किलोमीटर की लाखों किलोमीटर की यात्रा उन्होंने की होगी तो अभी स्वामी जी खुद कहते थे की मैं भावों भूरे हूं बंगाली में शब्द है अर्थात की जिसका जन्म अंतर से घूमता राहत है ऐसा कुछ होना चाहिए तो स्वामी जी का जीवन इस तरह का था इतना घूमे थे इतना घूमे थे एक जगह पे कितने दिन स्थिर हो करके नहीं बैठे हैं मैंने स्वामी जी की लाइफ का एक पूरा क्रोनोलॉजी बनाया है वहां पर मेरे पास में प्रत्येक दिन का रिकॉर्ड है ठाकुर रहते तो हमारे पास में इतना रिकॉर्ड में थे तब भी इतना रिकॉर्ड नहीं है किंतु जैसे ही स्वामीजी वडनगर से निकले और एक बार भ्रमण आरंभ की ए तब उनके पत्र उनको लिखे हुए पत्र उनकी खुद की यादें रिमिनेशन से उनके बड़े में लोगों की यादें उनके ऊपर में लिखे हुए न्यूज़ पेपर आर्टिकल यह सब मिलकर के अपने पास में इतना सॉलिड मटेरियल है स्वामी जी की लाइफ के बड़े में की आप का सकते हैं की 90 ऑनवार्ड्स 92 ऑनवार्ड्स ऑलमोस्ट एवरी दे का रिकॉर्ड है अपने पास स्वामी जी के जीवन का ऑलमोस्ट एवरी प्रतिदिन का रिकॉर्ड है क्या स्वामी जी कहां पर गए थे किसके साथ बात किया था क्या बात हुई थी फिर दूसरे दिन क्या हुआ दूसरे दिन क्या हुआ ऑलमोस्ट एवरीडे का रिकॉर्ड है तो मैं देख रहा हूं की एक जगह पर स्वामीजी स्थिर हो करके बैठे हैं ऐसा क्या मतलब मैक्सिमम कितने दिन बैठे होंगे सत्ता दो सत्ता तीन सत्ता इससे ज्यादा मैक्सिमम ये हो गया की वो एक जगह पर बैठे हैं वरना सतत भ्रमण करते रहते हैं या तो फिर सतत कहानी ना कहानी एक जगह से दूसरी जगह यात्रा करते रहते हैं यहां पर क्लास है आज तो कल वहां पर है परसों वहां पर है कैलिफोर्निया में जब रहते थे तो सन फ्रांसिस्को में सुबह को क्लास होगा फिर एक्रॉस डी बी वहां पर बीच में समुद्र है तो समुद्र का वो खड़ी जिसको हिंदी गुजराती में कहते हैं की बंगाल की ये कहते हैं की गर्लफ्रेंड कहते हैं तो वहां पर आक्रोश एक दूसरा ऑकलैंड एक करके एक जगह है तो वहां पे जाकर के वह दूसरा लेक्चर देंगे यानी की एक ही दिन में दो-दो तीन-तीन जगह जाकर केवल लेक्चर देते थे तो यहां पे ठाकुर जो कहते हैं की जो महोदक है जो बहुत साड़ी जगह पे घूमता है और कुटी चक है क्योंकि एक जगह पे बैठा राहत है तो कुटी चक होना अच्छा है जो बहुदक है उसके मां को शांति नहीं मिली तो ये बात ठाकुर की हम सुनते हैं तो हमको प्रश्न होता है की क्या स्वामी जी के जीवन को हम क्या कहेंगे प्रश्न ही नहीं है उनको कुटी चेक खाने का एक जगह पे एक सप्ताह दो सत्ता से ज्यादा वो कभी रहने नहीं है वो बेचारे पूरा जीवन एक जगह से दूसरी जगह घूमते रहे हैं तो तो वह बहुदक कहे जाएंगे और यदि बहुदक है तो उनका मां अशांत था यदि मां अशांत था तो स्वामी जी के बड़े में ऐसा कहना यह तो किस तरह का एक विचित्र एक बात हो गया किंतु एक बात है की जहां ठाकुर जो कहते हैं वो सड़क के लिए कहते हैं और स्वामी जी तो सिद्ध हो चुके हैं स्वामी जी सिद्ध होने के बाद में जगत कल्याण के लिए एक जगह से दूसरी जगह जाते थे आप ठाकुर को खुद को देख लीजिए एक समय था जब ठाकुर साधना करते थे बहुत कम लोगों के संपर्क में आते थे दक्षिणेश्वर में ही रहते थे किंतु एक बार उनको मां का आदेश मिला की तू ही भागो मुख्यतः आज अर्थात जब निर्विकल्प समाधि में वो एक के बाद एक सोपान पर करके निर्विकल्प समाधि में स्थित हो गए तब वहां तो 21 दिन में शरीर चला जाता है निर्विकल्प समाधि में रहने से तब मां का आशीर्वाद काली का उनको वाणी सुने दिया जगदंबा का वाणी सुने दिया की तू ही भागो मुख्य था अर्थात यह जो सुपरकोइंस और ये अपनी नॉर्मल कॉन्सायर्स इन दोनों की जो बॉर्डर लाइन है उसे बॉर्डर लाइन पे रहो जब चाहे सुपर कॉन्शियस में डब लगा सकते हो जब चाहे नॉर्मल कॉन्शसनेस पर रहे करके लोगों के साथ में हंसी मजाक कर सकते हो वार्तालाप कर सकते हो मां की बातें सुना सकते हो भजन कीर्तन कर सकते हो इसीलिए बात की जब ठाकुर के पास में सब भक्ति आना शुरू हो गए तब ठाकुर बार-बार उनको जैसे ही उद्दीपन होता था वह सब बॉर्डर लाइन पर र रहे हैं तो अभी लोगों के साथ बात कर रहा है अभी उद्दीपन हो आप फैट करके वो संभव में चले गए इस गाड़ी में बैठ करके यहां पर विद्यासागर के घर सुद्दनली मास्टर महाशय बता रहे हैं सब कुछ की यह उसका घर है ये ये जगह है वो वो जगह है एक है ठाकुर का भावांतर उपस्थित हुआ मास्टर महाशय समझ नहीं पे और वैसे बोल रहे हैं की अच्छा हम अभी इस जगह पे ए गए हैं तो ठाकुर ने क्या कहा की अभी ये सब बातें रहने दो अभी ये सब बातें अच्छी नहीं लगती तो मास्टर मा शादी बेचारे सोच में पद गए की अभी तो बड़ा ही इंटरेस्ट लेकर के सब कुछ देख रहे हैं की ये कौन सा रास्ता है वो कौन सा मोनीमेंट है वो कौन सा बड़ा बिल्डिंग है ये कौन सा पैलेस है अभी एक बोल रहा है की अरे अब ये सब छोड़ दो बताना मुझे यह सब चीजों में इंटरेस्ट नहीं है ऐसा फर्स्ट करके भावांतर उपस्थित हो जाता था इसलिए ठाकुर बोलते थे बीच-बीच में की अमित चीनी होते चीन चीनी खेती चाहिए अर्थात की मैं शुगर या तो फिर चीनी चीनी अर्थात शुगर चीनी होना नहीं चाहता मैं शुगर होना नहीं चाहता मैं शुगर खाना चाहता हूं ये देखिए की एक ही सेंटेंस में उन्होंने भारतीय दर्शनशास्त्र का गुड तत्व समझा दिया है यदि आप काशी में जाएंगे ब्राह्मण का लड़का है काशी में जाकर के या तो फिर नौबत हुई पर जाकर के न्याय शास्त्र का अभ्यास करेगा या तो फिर वेदांत का अभ्यास करेगा सालों साल तक वो पढ़ाई लिखी करता रहेगा फिर अपने घर आएगा फिर वो ठाकुर की जैसे कहानी है की पिताजी दोनों लड़कों को पुष्ट है बड़े लड़के को पूछा की बताओ ब्रह्मा का स्वरूप क्या है तो बड़े लड़के ने बताना शुरू कर दिया वेद में से उपनिषद में से एक के बाद एक श्लोक निकलता गया और बोलना गया की इस श्लोक में ब्राह्मण का स्वरूप इस तरह से वर्णित किया गया है इस श्लोक में ब्राह्मण का स्वरूप दूसरी तरह से वर्णित किया गया है तो पिताजी तो चुपचाप सुनते रहे फिर वह बच्चे को छोटे लड़के को कुछ अच्छा बेटा तुम बताओ की तुमने ब्राह्मण के बड़े में क्या समझा तो छोटा बच्चा अपना चुपचाप सर निशा किया खड़ा रहा उसने एक भी शब्द उत्तर नहीं दिया तब पिताजी ने बड़े ही खुश होकर के बोला की बेटा तुमने ही ब्राह्मण को ठीक-ठीक समझा है क्योंकि ब्राह्मण का स्वरूप क्या है अब मुंह से नहीं का सकते अभी आज के आप का सकते हैं की ऐसा हो सकता है की छोटे लड़के ने कुछ भी स्टडी नहीं किया उसको कुछ भी नहीं पता इसलिए मुंह छुपा कर के खड़ा है या तो मुंह निशा करके खड़ा है ऐसा बोल सकते हैं यदि ये मजाक करना चाहते हैं तो किंतु देखिए आप इस तरह की बटन में मजाक भी नहीं कर सकते क्योंकि क्या है पता है जो पढ़ाई लिखी नहीं करता वो तमस में डूबा हुआ होता है और उसका चेहरा देखकर के पता चल जाता है ये तामसिक आदमी है जो सात्विक है जिसने पढ़ाई लिखी करके ब्राह्मण के स्वरूप को सही सही समझा है उसका चेहरा उसकी वाणी वो तेज और ओजस से प्रदीप्त हो जाएगी उसका चेहरा देखकर के पता चल जाता है की हां उसने कुछ अनुभूति की है तो इसीलिए है जो यदि मुंह बैंड करके खड़ा है कुछ नहीं बोल रहा तो इस तरह का आप अनुमान करके का सकते हैं की ये मूर्ख नहीं है ये तामसिक नहीं है वो आज्ञा की वजह से मुंह बैंड करके नहीं खड़ा है सही सही चेहरे पे तेज है उसका अर्थ है की कुछ अनुभूति हुई है तो जो ब्राह्मण का जो स्वरूप है सही स्वरूप इतना कठिन है समझना किंतु ठाकुर जब यह बात कहता है की चीनी होना नहीं चाहता चीनी खाना चाहता हूं अर्थात की हमारी विभिन्न फिलोसॉफियों का जो सर तत्व है कितना संक्षिप्त में कितना सुंदर रूप से समझा दिया मैं यदि ब्रह्मस्वरूप हो जाता हूं जी तरह से अद्वैत वेदांत में कहा गया है तो यह जो पूरा जगत जो है यह पुरी लीला जो है या तो फिर जो पुरी माया है वो माया मेरे लिए अदृश्य हो जाएगी माया मेरे लिए थे वो रख हो जाएगी मेरा जो सही स्वरूप है मैं उसमें वो प्रविष्टि हो जाऊंगा किंतु यदि मैं भक्ति हूं और भगवान के साथ में जैसे की नरसी मेहता का है नरसी मेहता का गुजरात के एक संत है एक बार वो एक खंडहर में बैठे थे एकाएक उनको भगवान की वृंदावन का एक दर्शन हुआ भगवान कृष्णा गोपियों के साथ में वो रासलीला कर रहे हैं तो वो देख कर के नरसी मेहता को इतना आनंद आया इतना आनंद आया और कब से उसका जीवन परिवर्तित हो गया उससे पहले वो घर में बैठे रहते थे अपने भाई के घर में और भाई की पत्नी है उनकी भाभी वो सब समय उनको उनका इंसल्ट किया करती थी उनको गली दिया करती थी की बिना किसी कम का पड़ा हुआ है कोई कम धाम नहीं करता पैसा भी नहीं कामता बैठ करके वो भगवान का नाम लेकर रोटा राहत है इस तरह के जीवन से क्या लाभ है तो उनकी जो उनकी पत्नी सब समझ गली देती थी तो इस दिन वो तो भाग करके ही निकाल गए थे घर से के अभी क्या इतना इंसल्ट साइन करना छोड़ो तो इस तरह का उनका एक जीवन था एकाएक ये जो वृंदावन का रासलीला का दृश्य से जीवन परिवर्तित हो गया और फिर उन्होंने एक के बाद एक दोहे इतने सुंदर लिखना शुरू की है की जो की आज गुजरात के सर्वश्रेष्ठ संतो में से एक मैन जाते हैं तो यदि आपको ईश्वर की लीला का दर्शन होता है तो आप इमेजिन कर सकते हैं की मैं भी गोपी हूं या तो फिर मैं गोपाल बालक हूं और भगवान कृष्णा के साथ में मैं यदि उसे रक्सन का वक्त कर रहा हूं या तो फिर वृंदावन लीला में यह रस लीला में भगवान कृष्णा के साथ में हूं तो उसका जो आनंद आएगा वो अथवितीय अनुपम आनंद की तो बात ही कुछ और है यानी की यदि मैं ब्रह्म स्वरूप हो जाऊंगा तो यह जगत का सात्विक आनंद में नहीं ले पाऊंगा ब्रह्मा लेट जो खंड आनंद है वह प्राप्त होगा किंतु यदि मैं भक्ति हूं और यदि भगवान का दर्शन करता हूं तो इंद्रिय से यह जो सात्विक आनंद मिलता है मैं उसका उपभोग कर सकता हूं तो यह जो शास्त्र का जो सर का दिया ठाकुर ने यहां पे की मैं चीनी होना नहीं चाहता चीनी खाना चाहता हूं तो यदि इस तरह से जो आपकी अनुभूति है एक बार ठाकुर को यह अनुभूति हो गई हमारी बात चल रही थी बहुदक और कुटी जैक्स है हमने स्वामी जी के बड़े में कहा की स्वामी जी क्या है बहुदक है ना की कुटी चेक है वो तो ऑफ कोर्स बहुत है कुटी चक्की से हो सकते हैं तो इतना सर भ्रमण किया हैं तो हमको लगेगा क्या ठाकुर बहुत है या कुटी चाट है तो देखिए की ठाकुर के जीवन में भी यदि आप ठीक से स्टडी करें तो पता चलेगा की जब वो साधना कर रहे थे दक्षिणेश्वर में शांति से बैठे थे किंतु मां का जब आदेश प्राप्त हुआ पूर्व मुख में रहो तब कहानी जाकर के ठाकुर ने वो उठी घर पर जाकर के उठी घर अर्थात की जहां पे ये माथुर बाबू कोलकाता से दक्षिणेश्वर में आकर का रहे थे वो तो दक्षिणेश्वर के मलिक थे तो बहुत सुंदर घर उन्होंने बनाया था अपने लिए दो मंजिला तीन मंजिला ऐसा कुछ है तो उसकी छठ पे जाकर के ठाकुर रोटी रोटी अपने भक्तों को बुलेट हैं तोर आए कोठा आज आए रे तुम लोग सब कहां पे हो आओ इस अंसारी लोगों की बातें सुनकर के मेरे कान जल गए मैं तुम लोगों के साथ में ऐश्वर्या बातें करना चाहता हूं तो जब ठाकुर ने स्टार से पुकार भक्ति लोगों का आगमन हुआ ठाकुर उनके साथ में भजन गण कीर्तन करते हैं नृत्य करते हैं भगवान की बातें करते हैं उसके बाद में उन्होंने कलकत्ता जान की शुरुआत की नियमित रूप से कोलकाता जाते थे एक के बाद एक हम लोग मास्टर महाशय का वर्णन पढ़ने हैं पहले एक भक्ति के घर गए फिर दूसरे भक्ति के घर गए ऐसा करके वह सब कर करके वह दक्षिणेश्वर में आते थे कभी केशव से आता था बोलते थे महाशय चलिए जहां जय है जहाज पे सवारी करेंगे तो जहाज में सवारी करके वो ए जाते थे तो स्वामी जी पूरे विश्व में घूमे थे किंतु ठाकुर वैसे कम नहीं थे पूरे कोलकाता में अच्छे से घूम लिए थे तो ठाकुर को हम क्या कहेंगे बहुदखेंगे की कुटी चेक कहेंगे तो यहां पे हम जी सामान्य साधनों के लिए जो मानव दंड है ये ठाकुर और स्वामी जी के लिए नहीं है उनका मां था वो कुटी चक था उनका शरीर जगत कल्याण के लिए बहुत था उनका मां एक बार ईश्वर में स्थित हो गया तो मां में कहानी विक्षेप पढ़ने की संभावना ही नहीं है यहां पे ठाकुर ने बहुत का डेफिनेशन दिया है जिसका मां अशांत है और यात्रा करता है वह बहुत दुख है किंतु जिसका मां शांत है और ईश्वर उद्दीपन के लिए यात्रा करता है तो वह अलग बात हो गई जैसे की ठाकुर ने कहा ना की मधुमक्खी जब एक बार भूखी और प्यासी होती है और मर्द खाती है तो एकदम शांत हो जाति है पहले भन-बन करती है मधु खोजना के लिए मत खोजना के लिए किंतु एक बार मदद मिल गया मधुमक्खी एकदम शांत होकर के मर्द का पान कर दिया है किंतु जब मधु पान हो गया तब फिर से आनंद में आकर के हो सकता है कोई गाना जाएगी तो इसीलिए जब ठाकुर दूसरा एक उदाहरण देते हैं ब्राह्मण भजन है भजन शुरू होने से पहले हल्ला गला चल रहा है हटो गोल चल रहा है कोई क्या बोल रहा है कोई कोई कुछ बोल रहा है फिर जब भजन सम चालू हो गया तो एकदम शान सब लोग बैठ करके खाना का रहे हैं तब सिर्फ एक ही बात यह दही ले आओ ये लड्डू ले आओ बस इतनी ही बात होगी और कुछ बात नहीं होगी किंतु जब फिर भजन समाप्त हो जाएगा तब कहानी जाकर के थोड़ा बहुत लगा लेंगे हालांकि ठाकुर ने कहा है की भजन समाप्त होने के बाद में लोग सो जाते हैं तो जो भी है तो ईश्वर प्रताप हो गई तो उनका मां कुटी चक हो गया फिर उसका शरीर बहुदक हो सकता है तीर्थ तीर्थ जा सकता है उद्दीपन के लिए या तो फिर तीर्थ तीर्थ जा सकता है लोगों को कन्या लोगों को उपदेश देने के लिए जैसे की ये तोता पुरी थे तो टपोरी को इस तरह से पता नहीं कहानी से एक ऐश्वर्या प्रेरणा हुई होगी तो वो भ्रमण कर रहे थे भ्रमण करते-करते वो दक्षिणी ईश्वर ए पहुंचे भैरवी ब्राह्मणी का भी ऐसा था उनको कहा गया था की आपके तीन शिष्य होने वाला है ऐसा उनको ऐश्वर्या आदेश ऐश्वर्या वाणी उनको सुनने में आई थी तो वो चंद्र और गिरिजा बोलकर के दो शिष्य उनके ऑलरेडी थे फिर वो तीसरी शिष्य की खोज में चल रही थी तब कहानी जाकर के वह ठाकुर को मिली तो यह जो ईश्वरीय आदेश प्राप्त करके ईश्वरीय उद्दीपन अपने के लिए जब शरीर इधर उधर भ्रमण करता है यात्रा करता है तो शरीर बहुत हुआ ठाकुर आगे कहते हैं मुझे सब धर्म एक बार कर लेना पड़ा था हिंदू मुसलमान क्रिश्चियन एबार्शक तो वैष्णो वेदांत इशक पद्यो असते हुए छे हिंदू मुसलमान क्रिश्चियन एक और दूसरी और हिंदू धर्म के ही जो विभिन्न स्कूल है विभिन्न शाखाएं है शर्ट वैष्णव वेदांत यह सब रास्ते से मुझे चल करके ईश्वर प्रताप करनी पड़ी थी देखना हम ईश्वर देखा की वही एक ईश्वर है वही एक ईश्वर है उन्हें के पास सभी लोग आते हैं विभिन्न विभिन्न रास्तों से तीर्थ अकेला का वर्णन कर रहा है उन्होंने साधना समाप्त कर दी उसके बाद में मथुरा बाबू ने ठीक किया था की चलो काशी की यात्रा की जाए नॉर्थ इंडिया के जितने भी तीर्थ क्षेत्र है एक के बाद एक देख लिए जाए वहां गया जान की भी बात थी तो ठाकुर ने माना कर दिया की गया नहीं जाएंगे क्योंकि वहां पर जड़ी में जाऊंगा तो शायद ये शरीर वापस नहीं आएगा तो गया छोड़कर वृंदावन काशी यह सच मथुरा ये सब जगह पे ठाकुर गए थे देखना जिला तो एक-एक बार भारी कष्ट हो तो मैं गया था किंतु बीच-बीच में मुझे बड़ा कष्ट होता था राजा बाबू डर बैठक खाना है काशी में से जो बाबू अर्थात की माथुर बाबू वो बचेली वाले दमत थे बड़े वाले दामाद छोटे वाले दामाद और बीच वाले दामाद तो बीच वाले दामाद को से जो बाबू तो बीच वाले दामाद के साथ में मैं राजा बाबू डर बैठक बैठक खाना दिए चिलम अभी राजा बाबू बोलकर के वहां पे कोई धनी व्यक्ति होगा इसकी हवेली होगी तो उसकी हवेली के बैठक खाने में बैठे थे मथुरा बाबू के साथ शेखन अच्छी तारा विश्व कथा कुछ है वहां पर जाकर के देखा तो पैसे वो धन संपत्ति और बिजनेस वही विषयों की बातें कर रहे हैं काका जमीन यह सब कथा सुन अमी यह सब बातें सुनकर के मैं रन लगा तुम मुझे कहां पर ले आई हो दक्षिणेश्वर में मैं बड़े मजे से बड़े आनंद अर्थात की प्रज्ञा महासंगम वहां पर जाकर के देखा तो वही जी तरह से कोलकाता में जी तरह से कमरपुकुर वगैरा पे जो कुकर अर्थात तालाब है तो इस तरह का तालाब है शेर दुर्भा इस तरह का दूर्वा घास हैतूल पता इस तरह इस तरह के कुछ सोच करके जाएंगे की मेरा ए गया वृंदावन कुछ अलग से ही कुछ दिखेगा मैन अलग तरह के पेड़ पौधे होंगे अलग तरह के लोग होंगे अलग तरह की विभिन्न प्रकार की कुछ किस तरह की यह घास फस वगैरा होगा तो ऐसा नहीं वही तालाब है वही घास है वही पेड़-पौधे हैं वही तेतुल पता है वही सब वह नया तो कुछ है नहीं केवल तूफान पश्चिम लॉकर बुझीर तफावत देखा सिर्फ एक डिफरेंस देखा की पश्चिम में लॉकर अर्थात की नॉर्थ इंडिया बांग्लादेश की दृष्टि से पश्चिम भारत किंतु यहां पे यदि हम लोग बैठे हैं उनकी दृष्टि से उत्तर भारत उत्तर भारत के लोगों का बशीर मटन भांजे भूसी की तरह विष्ठा है अभिभूषि का अर्थ क्या है मुझे देखना पड़ेगा मैं आज सुबह को हिंदी किताब खोल करके देख रहा था हमारी हिंदी वचन अमृत क्योंकि हिंदी वचन अमृत तो वाद बाई वर्ल्ड ट्रांसलेशन है यह सेंटेंस तो है की वही तालाब है वही दूर्वा है वही पेड़ पौधे है किंतु यह जो परिवर्तन परिवर्तन तो ये सेंटेंस ही वहां पे नहीं है मैन देखिए की ये ट्रांसलेशन करने में मैं हमेशा मुझे जब यहां पे आया था पहले बार तो मुझे कहा गया था की बंगाली सीखना बंगाली में देखो ठाकुर का जो भाव है ठाकुर की जो भाषा है वो बिल्कुल ठीक तक राखी गई है जब ट्रांसलेशन में उनको लगता है की कोई सेंसेटिव मटर है तो छोड़ देते हैं तो अभी ये बात तो मुझे समझ में आई है की चलो आप नॉनवेज मछली वगैरा वर्णन है वो सब आप शायद ना करें ट्रांसलेशन में किंतु जो जो कुछ अंबारिशिंग चीज हैं ना उसका भी वर्णन वो भी छोड़ देते हैं ट्रांसलेशन में जैसे की ठाकुर एक बार बोल रहे हैं की वहां पर चिलम अर्थात की जहां पे वो तो ओपन डिफेकेशन था ना उसे समय बाहर में सोच जाते थे नदी के किनारे या ऐसा कुछ तो वहां पर नदी के किन गंगा नदी किनारे जाओ तालाब बोलकर जगह है वहां पे ये लोग सोच करने को जाते थे तो ठाकुर ने कहा की मैं झांवटाला में बैठकर के सोच कर रहा था सडनली मुझे कोई एक बात याद आई तो ट्रांसलेशन में देखेंगे की ठाकुर कहां पे बैठे थे क्या कर रहे थे वो नहीं लिखा सीधा लिखा है एक दिन मुझे ये बात याद है यानी वो सोच का उल्लिखित छोड़ दिया है यहां पे भी ये जो एकदम सुंदर एक मैन क्या कहेंगे रामू जी एक ह्यूमर्स ठाकुर का ऑब्जरवेशन वो हिंदी में ट्रांसलेट ही नहीं किया अभी इतना क्या उसमें मतलब इंटेंसिटिव या तो फिर सेंसेटिव आ कोई एंबर्रासिंग मुझे तो ऐसा कुछ नहीं लगता की लोगों का क्योंकि क्या है की आप ओपन में जाएंगे सोच करने के लिए तो फिर आपको खुद की तो दूसरों की सोच कैसी होती है विष्ठा वो देखने को मिलेगी तो ठाकुर ने इस तरह से एक ऑब्जरवेशन किया है की वहां के लोगों की विष्ठा इस तरह की होती है तो उसमें पढ़ करके बड़ा आनंद आता है हंसी भी आई है ठाकुर ऑब्जरवेशन भी इस तरह से और ठाकुर वह गांव के थे ना तो वो बोलने में ऐसा हम लोग शेयर के लोग 10 बार कुछ भी बोलने से पहले सोचेंगे हमारे लिए कुछ कुछ सब्जेक्ट हम कभी भी मेंशन नहीं करेंगे तो किंतु ठाकुर का ऐसा नहीं था वो ही इसे वेरी ह्यूमर्स परसों वेरी अथली परसों और वेरी और परसों ये सब चीज है तो है उसमें क्या अंबरीश होने की बात है वो फैट करके बोल देते थे ये भतरो समाज जाके बोला तो मैंने ये झटन में जेंटलमैन हो सब ठाकुर के पास आते थे वो कभी-कभी शौक हो जाते थे ठाकुर की बात सुन करके इसलिए की मास्टर महाशय ने जब पहले ड्राफ्ट लिखा कथा अमरूद का स्वामी जी को भेजो मेरे स्वामी जी उसे समय अमेरिका में थे तो स्वामी जी ने कहा देखो ये जो ठाकुर की भाषा है ना वो वैसे पढ़ने में सुनने में हमको बड़ा आनंद आता है ह्यूमरस है और एकदम शार्प तू दी पॉइंट है मैंने ईश्वर तत्व आध्यात्मिकता दर्शनशास्त्र हमको फटाफट शिखा देगी जैसे ये ठाकुर ने कहा की चीनी होना नहीं चाहता चीनी खाना चाहता हूं तो इतना छोटा सा ऑब्जरवेशन में ध्वहित और अद्वैत का डिफरेंस हमको इम्मीडिएटली समझ में ए जाता है तो ठाकुर की लैंग्वेज बड़ी शार्प है बड़ी सुंदर है बड़ी ही रसात्मक है बड़ी ही ह्यूमरस है किंतु जब ठाकुर यह सब बातें करते थे ना तो हम पुरुष लोगों के सामने करते थे उसे समय स्त्रियां अचानक नहीं होती थी अभी तुम आपने यह जो सब लिखा है तो वो तो सब लोगों के घर में जाएगा लोग फैमिली के साथ में पढ़ेंगे और कुछ-कुछ ठाकुर की बातें फैमिली के साथ में बैठ करके पढ़ने लायक नहीं है तो आप ऐसा कीजिए की उसे तरह की बातें उसे तरह के शब्द प्रयोग आप एक कथामृत में से हटा दीजिए तो मास्टर महाशय ने वो उनकी बात सुनकर के उसे तरह के शब्द प्रयोग कथम रूप में से निकाल दिए और अभी हमारे पास में ये सेनीटाइज वर्जन है कथामृत का और एक ट्रांसलेशन है उसको भी सेनीटाइज कर दिया मैंने ठाकुर ने 100 ऐसे कोई ऑब्जरवेशन दिए होंगे ह्यूमर्स और बड़े ही कहेंगे की आ क्या कहेंगे उसको अथली ऑब्जरवेशन इंग्लिश शब्द है अथली अर्थात की जो की जी अनपॉलिश या तो फिर ऐसा कुछ कहेंगे की इस तरह से जो ठाकुर ने 100 ऑब्जरवेशन दिए होंगे उसमें से मास्टर महाशय ने मुश्किल से कर पांच इस तरह के बातें लिखी होगी और जब ट्रांसलेशन हुआ है उसमें तो यह भी सब निकाल दिया है अर्थात ट्रांसलेशन को बिल्कुल वाटर डॉ कर दिया है इसलिए मैं जब प्रेफर करता हूं हमेशा बंगाली पढ़ना और मैं ब्रह्मचारियों का क्लास लेट हूं तो अभी तो ये तो सब यहां के लोकल ब्रह्मचारी है उनको बंगाली नहीं आता तो उनको मैं कहता हूं की सबसे पहले बंगाली पढ़ना सीखो और ठाकुर मां खासकर के ठाकुर और स्वामी जी को तो चलो की उनको इंग्लिश में पढ़ सकते हो किंतु ठाकुर और मां को तो अवश्य पढ़ो तो कहानी जाकर के उनका वो जो रियल जो नेचर है वो हमको समझ में आएगा उनके रियल पर्सनालिटी के साथ में हम फैमिलियर होंगे तो आज यही तक दे ही हरि ओम तत्सत श्री रामकृष्ण परमहंस