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हम देख रहे थे कि किस तरह से भगवान श्री राम कृष्ण हमको वेद और तंत्र का समन्वय समझाते हैं अभी यह वेद और तंत्र का समन्वय शब्द जो प्रयोग किया है मास्टर महाशय ने इसके पीछे का कारण यह है कि ठाकुर यहां पर वेदांत की जो जनरल एक स्टैंडर्ड जिसको कहेंगे वोकेबुलेरियो ठाकुर शब्द यूज करते हैं शक्ति तो शक्ति साधना हमको पता है कि तंत्र में काफी शक्ति साधना हों का वर्णन है और भारत में शक्ति साधना इतनी ही पुरानी है जितनी कि वैदिक साधनाएं है तो यह शक्ति साधना में से शक्ति शब्द ठाकुर यहां पर प्रयोग करते हैं इसलिए मास्टर महाशय यहां पर वेद और तंत्र का समन्वय इस तरह से टाइटल देते हैं जो ठाकुर की यह जो पूरी बात हमने पिछले कुछ दिनों से समझ रहे थे स्वामी जी के भी स्वामी शिष्य संवाद में भी हमने देखा कि किस तरह से स्वामी जी समाधि की अवस्था का वर्णन करते हैं कि सबसे पहले तो स्थूल जगत है वोह शब्द जगत में विलीन हो जाएगा जितने भी शब्द है वो ओमकार में विलीन हो जाएंगे ओमकार विलीन हो जाएगा अनादि नाद में और अनादि नाद विलीन होगा ब्रह्म तत्व में जब हम ब्रह्म अवस्था में स्थिति प्राप्त करते हैं उसके बाद में यदि अवतार का कल्प पुरुष होगा वही इसी जो अनुलोम जो यात्रा है वह अनुलोम और विलोम यह जो नेती नेती करके त्याग करना और इती इती करके पूरे विश्व को ग्रहण करना फिर से तो अवतार कल्प पुरुष ही उस ब्रह्म अवस्था में से वापस आ सकता है किस तरह से तो जो प्रोसेस हमने ऊपर जाने के समय देखी वही प्रोसेस रिवर्स होगी ब्रह्मण में से तो सर्वप्रथम अनादि नाद प्रकट होगा अनादि नाद में से ओ ओमकार नाद प्रकट होगा ओमकार में से जितने भी शब्द है इस पृथ्वी की विश्व ब्रह्मांड की अवस्था को वर्णन करने के लिए जितने भी शब्द चाहिए जितने भी आइडिया चाहिए जितने ब्लूप्रिंट और डीएनए चाहिए वो सब उस ओमकार नाद में से प्रकट होंगे फिर इस शब्दों की सहाय से स्थूल भौतिक जगत की रचना होगी यह पूरी चेन ऑफ इवेंट्स हमने स्वामी जी को बोलते हुए देखा और साथ में यह भी देखा कि यह जो हम जिस चीज को त्याग कहते हैं वो त्याग क्या है त्याग का रहस्य क्या है बहुत सारे लोग बोलते हैं कि मैंने कर्म त्याग कर दिया है अर्थात कि मैं किसी भी तरह का काम नहीं करता हूं जैसे कि मास्टर महाशय की प्रथम या द्वितीय मुलाकात में ही ठाकुर ने कहा था कि वह प्रताप का भाई आया था वो अपने बीवी बच्चों को अपने घर पर छोड़ के आया है वह दक्षिणेश्वर में आके कि मेरे पास रहेगा तो मैंने उसको नाराज होक के कहा कि तुम्हारे बीवी बच्चों की संभाल क्या तुम्हारे पड़ोसी लोग रखेंगे क्या उसकी संभाल रखने के लिए तो तुमको वापस जाना होगा तो अभी ऐसा नहीं है कि ठाकुर त्याग को डिस्कस करते हैं किंतु ठाकुर को पता है कि ये रजस में से हम जनरली ज्यादा सभी तर ज्यादातर हम सभी लोग रजस के इलाके में रजस के राज्य में होते हैं यह सत्व रजस और तमस तीन गुण है रज क्या है कार्यक्षमता या तो कार्यावटम करेंगे ही करेंगे किंतु जिस क्षण हमने कर्म बंद कर दिया तो क्या हम योग में स्थित हो जाएंगे नहीं हम लोग तमस में डूब जाएंगे तो पहले तो यदि कर्म का त्याग करना है तो कर्म क्या है कर्म का सीक्रेट क्या है वो समझना होगा योगशास्त्र की दृष्टि से मन की या तो चित्त की जो वृत्तियां है उसी को सही सही कर्म कहा जाएगा और योग शास्त्र कहता है कि योगस चित्तवृत्ति निरोध चित्त की वृत्तियों का निरोध ही असली योग है अर्थात कि योग कर्म त्याग करना है तो बाय जो कर्म कर रहे हैं नौकरी है ना कि अपना बिजनेस है अपने परिवार का लालन पोषण पालन है वगैरह जो कुछ भी कर्म हम कर रहे हैं हम सबके धर्म होते हैं विद्यार्थी धर्म है गृहस्थ धर्म है राज्य धर्म है जितने भी धर्म है जितनी भी अवस्था जो आश्रम है जितनी भी पोजीशन से अपने समाज में सभी का अपना अपना धर्म है सभी को अपना धर्म पालन करना पड़ेगा यदि मैं अपने धर्म का पालन करने से विमुख हो जाऊंगा तो यह समाज धीरे-धीरे करके डिटेट हो जाएगा मैं तमस में चला जाऊंगा यह स्वामी जी कहते हैं कि बुद्ध अवस्था में यह बौद्धिक रेवोल्यूशन जब भारत में आया बुद्धिज्म का भारत में बड़े पैमाने पर प्रचार होने लगा तो कर्म त्याग कर दिया बहुत सारे क्षत्रिय लोगों ने यह देख कर के कि यह भगवान बुद्ध तो ये गौतम प्रिंस थे वो राजकुमार थे उन्होंने अपना जद राज्य त्याग कर दिया तो मैं भी कर देता हूं ऐसा बोलकर के बहुत सारे क्षत्रियों ने अपना राज्य त्याग तो किया किंतु फिर ऐसा नहीं है कि वे लोग भगवान बुद्ध की तरह उनको निर्वाण मिल गया क्षत्रिय लोग अपना धर्म त्याग करके क्षत्रिय धर्म त्याग करके जब मॉनेस्ट्रीज में मठ में जाकर के रहने लगे तो मोनेस्ट्री में सर्वप्रथम तो तमस प्रवेश किया मोनेस्ट्री को खत्म कर दिया तमस प्रवेश करके और जब भारत पर आक्रमण प्रारंभ हुए तो भारत की रक्षा करने वाले क्षत्रिय क्लास जो है जो क्षत्रिय जात वो नहीं रही अपनी रक्षा करने के लिए दोनों ओर से डूब गए माया मिली ना राम जैसा ऐसी अवस्था हो गई नहीं देश की रक्षा हो पाई नहीं धर्म प्राप्ति हुई धर्म भी पूरा ध्वंस हो हो गया तो यह कर्म त्याग करने से तो हम लोग कोई निर्माण वगैरह प्राप्ति नहीं करने वाले हैं हमको चित्त की वृत्तियों का शमन करना होगा अभी चित्त की वृत्ति का शमन कैसे होगा तो कर्म को सुसंस्कृत करके नहीं कि उसका त्याग करके अपने खुद के स्वार्थ परायणता के लिए जो कर्म करते हैं उसको विश्व कल्याण के लिए कर्म में परिवर्तित कर दीजिए उसको साधन रूप कर्म में परिवर्तित कर दीजिए जैसे कि चार साधना बताई गई है राम कृष्ण संघ में चार साधना हों को हम फॉलो करते हैं कर्म है ज्ञान है भक्ति है और ध्यान है कर्म अर्थात की निष्काम सेवा ज्ञान अर्थात की नित्या नित्य वस्तु विवेक अपने शास्त्रों का पठन और यह सब सत्संग भक्ति अर्थात की शरणागति और यह जो भाव साधनाए हैं बालक भाव मातृ भाव मधुर भाव दास सख्य शांत वगैरा भाव साधना और आखिर में ध्यान गुरु के पास में से मंत्र लेकर के जप करना तो यह चार में से एक या एक से ज्यादा का कॉमिनेशन एकदम कठोर रूप से पालन करेंगे तब तो कहीं जाकर के हम रजस में से सत्व में जाएंगे तो यह सब चिंतन हमने किया अभी एक आखिरी एक प्रश्न इसी पैसेज में रह जाता है कि ठाकुर ने यह शक्ति शब्द प्रयोग क्यों किया शक्ति माया भी तो कह सकते थे कि यह पूरा जगत जो है माया के इलाके में है जब तक माया के राज्य में रहेंगे माया को तो स्वीकार करना ही पड़ेगा ऐसा नहीं कहके ठाकुर कहते हैं जब तक हम शक्ति के राज्य में है तब तक शक्ति को स्वीकार करना पड़ेगा तो इसके पीछे का रहस्य वही है कि यह शक्ति साधना भारत में इतने सालों से चली आती है और इसी शक्ति को ही आधार बना करके हम लोग शक्ति को हम लोग लोक कल्याण या तो फिर यह जगत में व्यापत होते हैं जैसे कि हमने गंभीरानंद जी महाराज की मां की बायोग्राफी है उसकी अवतरण का देखी थी काफी विस्तृत चर्चा हुई थी कि किस तरह से देवी पृथ्वी पर अवतार धारण करती है राक्षसों का विनाश करने के लिए और इस युग के राक्षस आजकल वो बाहर के वो 10 हाथ वाले 10 सिर वाले मुंह में से आग निकालने वाले इस तरह के राक्षस नहीं है आजकल के जो राक्षस है वो है संशय राक्षस संदेह रूपी यह भूत पिशाच जो है वह सब हमारे हृदय में बैठे हुए हैं हम चाहे भले मुंह से कितना ही कह दे कि मुझे भगवान में विश्वास है मुझे ईश्वर में विश्वास है किंतु वो चोर की कहानी की तरह एक चोर को पता है कि बगल वाले कमरे में धन पड़ा हुआ है सोना मोहर पड़ी हुई है तो वो जद सही सही चोर होगा और जद उसको सही सही धन प्राप्त करने की और उसको कन्वे होगा सच्ची सच्ची ये उसको भरोसा होगा होगा कि ना यह धन है उस कमरे के भीतर में तो कैसे भी करके दरवाजा तोड़ कर के वह धन प्राप्त किए बिना नहीं रह पाएगा किंतु यदि उसको भरोसा ही नहीं है विश्वास ही नहीं है कन्विंसिंग वो बीड़ी होक पीता रहेगा फूंकतायन करके कि मैं इतनी मेहनत करके दरवाजा तोडूंगा भीतर में जाऊंगा कुछ भी नहीं मिला तो बिना वृथा मेरी मेहनत गई तो हम लोगों का भी ज्यादा लोगों को देखिए कि भगवान है भगवान है बोलते रहते हैं किंतु भगवान प्राप्त करने के लिए जो थोड़ी बहुत भी मेहनत करनी चाहिए थोड़ी बहुत भी साधना करनी चाहिए उसके बारे में बिल्कुल शून्य बस चाहे बीच-बीच में मंदिर में चले गए और कुछ पूजा विधि में भाग ले लिया किंतु जो आंतरिक परिवर्तन है अपने चित्त का अपने संस्कारों का वह परिवर्तन लाने के बारे में हम कभी सोचते भी नहीं है तो यह हो गया कि आज का जो संशय राक्षस से उसका विनाश करने के लिए शक्ति का पृथ्वी पर अवतरण हुआ है मां शारदा के रूप में और ठाकुर ने सबसे पहले देखिए कि शक्ति मंत्र में ही उन्होंने दीक्षा ग्रहण की थी क्योंकि अपने भाई बड़े भाई थे रामकुमार उनकी जगह पे उनको पूजा करनी थी मां काली की दक्षिणेश्वर में वो कामर पुकुर में रहते थे अपनी मां के साथ में घर की अवस्था बड़ी ही खराब है उनके बड़े भाई गए हैं कलकाता यदि कुछ पैसों का जुगाड़ हो पाए वहां पे टोल वगैरह टोल अर्थात की संस्कृत पाठशाला तो टोल चालू करके संस्कृत पाठशाला चालू करके बच्चों को यदि थोड़ा बहुत पढ़ाएंगे थोड़ी बहुत कुछ यह विधि ब्राह्मण लोग जो विधि करते हैं विवाह संस्कार वगैरह कुछ संस्कार इस तरह की कोई विधि करके घर में किसी के घर में यजमान के घर जाकर के कुछ पूजा वगैरह करके धन अर्जन कर ले तो जैसे-जैसे उनकी निष्ठा के बारे में बातें सेलती गई उनको काम भी इतना मिलता गया तो उनको लगा कि सहाय के लिए किसी की आवश्यकता है तो वह कामर पुकुर गांव में गए मां को कहा कि मां गदाई को भी दीजिए ठाकुर का बचपन का नाम था गदाधर और सब उनको प्रेम से गदाई करके पुकारते थे तो गदाई को दीजिए तो मेरा काम वहां पर ठीक-ठीक चलेगा तो फिर यह गदाधर भी अपने बड़े भाई के साथ में कलकाता आए और इस तरह से उन्होंने य पूजा वगैरह करना शुरू किया अभी हमको पता है कि काली मंदिर की स्थापना हुई काली मंदिर की स्था ना के बाद में रामकुमार ठाकुर के बड़े भाई वहां पर पुजारी का कार्य करने लगे और उनकी सेहत जैसे-जैसे खराब होनी शुरू हुई गदाधर अर्थात की ठाकुर उन्होंने मां की सेवा का मां की पूजा का भार ग्रहण किया तो यह जो मां की पूजा है शक्ति साधना है वहां से तो ठाकुर ने सर्वप्रथम प्रारंभ किया था हालांकि उनके घर में सभी का नाम राम से है राम मंत्र में ज्यादातर लोग दीक्षित थे फिर भी किंतु ठाकुर ने शक्ति साध साधना प्रारंभ की और मां का नाम लेते लेते ही वह आखिर में साधना में संपूर्ण हुए सिद्ध हुए तो यह जो शक्ति साधना जो है जो भारत की एक विशिष्ट परंपरा है जो लाखों हजारों हजारों सालों से चली आई है वेद के साथ में ही कहा जाता है कि तंत्र का उद्गम हुआ है शक्ति साधना का उद्गम हुआ है भारत में और यही शक्ति साधना तो यहां पर ठाकुर वेद का जो कांसेप्ट है ब्रह्मण और श साधना का कांसेप्ट है शक्ति इन दोनों को ठाकुर मिला देते हैं और इसीलिए ठाकुर कहते हैं कि ब्रह्मा और शक्ति अभेद यहां पर दूसरी भी एक चीज है कि यदि आप ब्रह्मण के साथ में माया कांसेप्ट यदि हम लोग उसके बारे में सोचे तो माया एक एक मिथ्या चीज है माया का अपने आप में कोई यह नहीं है क्या कहेंगे सिग्निफिकेंट शति का अपने आप में एक सिग्निफिकेंट है माया के साथ में आप क्या करेंगे माया से बचने के लिए आपके पास में वैसा कोई उपाय नहीं है माया से जैसे कि ठाकुर एक बार उदाहरण देते हैं हमको यदि सूरज की ओर जाना है तो हम हम पृथ्वी से दूर जाना है तो क्या करना है सूरज की ओर जाते जाना है जितना जितना हम सूरज की ओर उड़ेंगे जितना जितना सूरज के पास में जाते जाएंगे इतना ही पृथ्वी से दूर जाते जाएंगे यदि अंधेरा दूर करना है तो क्या करेंगे प्रकाश को जलाएंगे प्रकाश को जलाने से अंधेरा अपने आप में चला जाएगा तो किंतु यह माया का कांसेप्ट है माया को यदि दूर करना है माया से जद मुक्ति प्राप्त करनी है तो हमको क्या करना है ब्रह्म ज्ञान प्राप्त करना है ब्रह्म ज्ञान तभी प्राप्त होगा जबकि हम त्याग का रास्ता अपनाएंगे ज्ञान का रास्ता अपनाएंगे नित्या नित्य वस्तु विवेक करेंगे यह देह देह के साथ में जुड़े जितने भी विकार है जितने भी गुण धर्म है यह सब मिथ्या है इसके परे जो है अस्तित्व जिसका वो मैं हूं वो ज्ञान का रास्ता अपना करके आप माया रूपी एक ये जो भ्रम अपनी आंखों के सामने खड़ा हुआ है उसको आप काट देंगे किंतु शक्ति साधना में देखिए शक्ति को यदि आप स्वीकार करते हैं माया की जगह तो आप शक्ति को ही प्रार्थना कर सकते हैं ठाकुर का दूसरा जो एग्जांपल है राम लक्ष्मण और सीता तीन वन में जा रहे हैं आगे सर्वप्रथम राम है बीच में मां सीता है और आखिर में लक्ष्मण तो लक्ष्मण को भगवान राम के दर्शन नहीं हो रहे क्योंकि मां सीता इन दोनों के बीच में चल रही है तो अभी यदि भगवान राम का दर्शन करना होगा तो लक्ष्मण क्या करेंगे सीता को मां सीता को प्रार्थना करेंगे कि मां आप दया करके रास्ता छोड़ दीजिए तो भगवान राम का द दर्शन हो तो यदि मां दया करके रास्ता छोड़ देगी आशीर्वाद देकर के कृपा करके तो भगवान राम का दर्शन अवश्य होगा तो अभी देखिए कि यह जो भक्ति यह जो प्रार्थना यह जो शरणागति वैसे यह तो है ध्व और विशिष्ट अद्वैत के राज्य में आता है द्वैत और विशिष्ट अद्वैत वेदांत की यह दो जो फिलोसोफी है जो दो स्कूल है वो क्या कहती है कि मैं श् और स्वयं नहीं हूं मैं ब्रह्मण स्वयं नहीं हूं ब्रह्मण और मेरे में थोड़ा सा पार्थ क्य है तो जद मैं ब्रह्मण को ईश्वर मान कर के ईश्वर की आराधना करूं ईश्वर की उपासना करूं ईश्वर के साथ में सख्य रूपी दास रूपी माधुर्य मय या तो फिर बाल्य रूपी एक संबंध यदि बनाओ तो वह संबंध बना करर के भाव का संबंध बना करर के शरणा गति से मैं ईश्वर को प्राप्त कर सकता हूं यह फिलोसोफी है द्वैत वेदांत और विशिष्ट अद्वैत वेदांत की किंतु यदि आप अद्वैत वेदांत में आते हैं तो ब्राह्मण की खुद की तो कोई उनके भीतर में तो कोई गुण धर्म नहीं है ब्रह्मण तो निराकार है निष्क्रिय है उनको प्रार्थना करने से क्या प्राप्त होगा कुछ प्राप्त नहीं होगा तो फिर यहां पर आप शरणागति या तो भक्ति योग को किस तरह से प्रवेश करवाएंगे अद्वैत वेदांत में क्योंकि ब्रह्मण जद ईश्वर के कोई गुण है ईश्वर यदि आशीर्वाद देने वाला प्रेममय ईश्वर है तो उनको तो आप प्रार्थना कर सकते हैं उनकी तो आप भक्ति कर सकते हैं जो कि द्वैत और विशिष्ट अद्वैत में जिसको कि स्वीकृत किया गया है किंतु अद्वैत में यदि आपको प्रार्थना करनी है तो ब्राह्मण को तो प्रार्थना करने से कोई लाभ नहीं ब्राह्मण तो वैसे ही अपने सिंहासन प चुपचाप शांति से बैठा है तो आप प्रार्थना किसको करेंगे प्रार्थना अभी यदि क्लासिकल अद्वैत वेदांत को देखेंगे तो ना ही ब्रह्मण को प्रार्थना करने से कोई लाभ है क्योंकि ब्रह्मण निराकार है ना ही माया को प्रार्थना करने से कोई लाभ है क्योंकि माया का खुद का कोई अस्तित्व ही नहीं है इंडिपेंडेंट वो तो मिथ्या है वो तो एक इल्यूजन मात्र है तो फिर आप प्रार्थना किसको करेंगे ये तो क्लासिकल अद्वैत की फिलोसोफी से प्रार्थना या तो भक्ति योग इसके साथ में आता ही नहीं किंतु यदि हम माया की जगह शक्ति की कल्पना करें शक्ति जो कि लीलाम करुणामय एक देवी जो कि पूरे जगत को वह एनर्जी या तो फिर शक्ति प्रदान करती है पूरे जगत को एनिमेट करती है अपनी खुद की शक्ति प्राप्त करती है अपने खुद को एनिमेट करती है ब्रह्मण की शक्ति से किंतु फिर जैसे कि मान लीजिए कि एक प्रिज्म है प्रिज्म ये जो एक्सपेरिमेंट हम सबने बचपन में अपनी स्कूलों में किया है हम लोग को बताया जाता है कि सूरज का प्रकाश भले ही चाहे सफेद दिखता हो उसके भीतर में सातों कलर का सम्मेलन है सात कलर इकट्ठा होकर के ये इंद्रधनुष के सफेद प्रकाश सूरज का बनता है तो हम इस बात पर कैसे विश्वास कर ले तो हमको एक प्रिज्म दिया जाता है बोलते हैं कि सूर्य का प्रकाश एक होल में से एक एक एक पर्दा लगा दो पर्दे में एक छोटा सा होल करो एक छोटा सा उसमें छेद बनाओ इस छेद में से सूरज का प्रकाश इस प्रिज्म के ऊपर में पड़ने दो तो प्रिज्म यानी त्रिकोण आकार का और ट्रायंगुलर शेप का एक क्रिस्टल होता है एक कांच का टुकड़ा होता है तो प्रिज्म के एक कोने पे सूरज का प्रकाश गिरेगा तो दूसरी ओर से ये मेघ इंद्रधनुष के साथ तो कलर खुल कर के दिखाई देंगे ये जैसे आकाश में हमको इंद्रधनुष दिखता है या मेघधनुष दिखता है बारिश के समय में उसका भी यही इसके पीछे यही थिरी है कि बारिश के समय यह जो प्रकाश की ये जो पानी के जो बिंदु है जल के बिंदु है बारिश में जो हमारे सर पे बादलों में रहते हैं उसके ऊपर में जब सूरज का प्रकाश होता है तो फिर वो रिफ्रैक्ट होक के ये इंद्रधनुष बनाते हैं तो ये है वैसे दिखता है सफेद कलर का एक प्रकाश किंतु उसमें सातों कलर का मिलन है तो वैसे ही ब्रह्मण में जो पावर है ब्रह्मण में जो जीवन शक्ति है वह किस तरह से मेनिफेस्ट होगी एक तो प्रिज्म तो चाहिए सफेद कलर को सात कलर में कैसे परिवर्तित करेंगे एक प्रिज्म चाहिए तो वो प्रिज्म है यह शक्ति या तो फिर देवी तो ब्रह्मण में से सफेद प्रकाश इस शक्ति पर पड़ता है और शक्ति इस पूरे प्रकाश को सात कलर में विभाजित करती है यानी कि सृष्टि की रचना करती है ब्रह्मण में अपने में कोई इच्छा नहीं उसके कोई गुण नहीं उसका कोई कार्य नहीं किंतु यसी निराकार निष्क्रिय ब्रह्म की शक्ति जो है वह तो उसमें है एनिमेट जिसको कहेंगे चेतन शक्ति वो चेतन शक्ति को ही कन्वर्ट करके जगत में परिवर्तित करना यह कार्य शक्ति करती है तो अभी देखिए कि ठाकुर ने किस तरह से अद्वैत वेदांत की कल्पना की है या तो फिर ठाकुर की दृष्टि से वेदांत क्या है क्लासिकल वेदांत को हम फिर से एक बार देखते हैं क्लासिकल वेदांत के अनुसार ध्व अद्वैत और जो कि नॉन अद्वैत फिलोसोफी दो फिलोसोफी में हम क्लासिकल वेदांत को बांट सकते हैं अद्वैद फिलोसोफी कहती है कि एक तो ब्रह्मण है जो कि निष्क्रिय है उसके ऊपर में अज्ञान की वजह से माया का एक आवरण है जो कि माया कार्य करती सी दिखाई देती है माया कार्य करती नहीं है किंतु अज्ञान की वजह से दिखाई देता है तो अभी इस ब्रह्मण को कैसे प्राप्त करें यह हो गया दर्शन शास्त्र या तो फिलोसोफी अभी साधन पद्धति क्या है दर्शन इस ब्रह्मण को कैसे प्राप्त करें तो सार असार नित्य अनित्य वस्तु का विचार करके कि यह जो कुछ भी कार्य ये जो जितनी भी इच्छा शक्ति है डायनामि जम एनिमेशन जो मुझे जगत में दिख रहा है वो तो माया का है इसके परे जो है वह है असली ब्राह्मण तो यह त्याग या तो फिर ज्ञान के माध्यम से हम ब्राह्मण को प्राप्त करेंगे और क्लासिकल नॉन अद्वैत फिलोसोफी है जैसे कि अद्वैत और विशिष्ट अद्वैत वे लोग क्या कहती है कि ईश्वर है ईश्वर के भीतर में करुणा है दया है और ईश्वर के हम हम खुद कभी ईश्वर नहीं होने वाले हैं ईश्वर से थोड़ा बहुत डिग्री ऑफ सेपरेशन बना रहेगा ये जो डिग्री सेपरेशन कितना है बहुत ज्यादा सेपरेशन है तो द्वैत में चले जाएंगे मिनिमल सेपरेशन है तो विशिष्ट अद्वैत में रहेंगे किंतु सेपरेशन हमेशा रहेगा हमारे और ईश्वर के बीच में और यह ईश्वर की आराधना करके हमको ईश्वर के दर्शन होंगे अपने जन्म जन्मांतर के जन्म मृत्यु जरा व्याधि के कर्म का जो पूरा एक प्रवाह है वो टूट जाएगा जन्म जन्मांतर की यात्रा अपनी समाप्त हो जाएगी मुक्ति प्राप्त होगी तो प्रार्थना करेंगे शरणागति करेंगे तो ईश्वर कृपा करेंगे क्यों क्योंकि ईश्वर के भीतर में वो कृपा तत्व है और तो ये हो गया अपना क्लासिकल नॉन अद्वैद स्कूल अभी ठाकुर का सोल्यूशन देखिए ठाकुर सभी साधन पद्धति को स्वीकार करते हैं तो साधन पद्धति को स्वीकार करने के लिए फिलोसोफी में क्या मॉडिफिकेशन होना चाहिए ब्रह्मण तो निष्क्रिय निराकार य ही है शक्ति के भीतर में हम वो करुणा दया और ममता के भार ममता का भाव आरोपित करेंगे और यह शक्ति अपनी प्रार्थना सुनकर के करुणा और दया से उनकी खुद की करुणा और दया की शक्ति से हमको ब्रह्म अवगा ही होने का रास्ता वो उन्मुक्त कर देगी तो ये हो गया ठाकुर का सॉल्यूशन कि अद्वैत वेदांत का जो त्याग का फाउंडेशन है ठाकुर ने क्यों सीधे सधी ध्व में ना चले गए हालांकि ठाकुर को पढ़ के ऐसा ही लगता है कि वह धत और विशिष्ट अद्वैत के ऊपर में ही उनका पूरा जीवन रचा है सब तरह की साधना की है तो ये खुल कर के द्वैत और विशिष्ट अद्वैत में क्यों नहीं आ गए क्योंकि ठाकुर के जीवन का फाउंडेशन ही था त्याग और त्याग की जो जय घोषणा सबसे विषद सूर में अद्वैत वेदांत ने ही की है इसलिए अद्वैत वेदांत को तो वो छोड़ नहीं सकते अद्वैत वेदांत को तो डिस्कार्ड नहीं कर सकते साथ में ही प्रेम करुणा दया वरशिप शरणागति भाव साधना उसको भी लेकर के आना है तो फिर इसका काउंटर पॉइंट है शक्ति तो देखिए कि ब्राह्मण जो है वो निष्क्रिय निराकार है त्याग ही ब्रह्मण को प्राप्त करने का एकमात्र तरीका है किंतु साथ में दूसरा एक तरीका है शरणागति का यदि शक्ति रास्ता छोड़ दे तो भी हम ब्राह्मण के पास में पहुंच जाएंगे यानी कि यहां पर देखिए कि ड्यूल पावर है अपने पास में मान लीजिए कि जैसे हम लोग क्लासिकल अद्वैद वेदांत में कहते हैं कि हमको यदि प्रकाश लाना है तो प्रकाश लाने के लिए यदि दिया को ही जला दिया तो अंधेरा चला जाएगा अंधेरे को चलाने के लिए अंधेरे अंधेरे को भगाने के लिए और अलग से कुछ नहीं करना है किंतु ठाकुर के पास में ड्यूल पावर है एक तो दिया का प्रकाश करके चालू करके आप प्रकाश ला सकते हैं और साथ मेंही अपने पास में शरणागति रूपी भक्ति रूपी एक दूसरा अस्त्र है जिसके सा जिसका सहारा लेकर के हम अंधेरे से लड़ सकते हैं तो दोनों तरह से आप ईश्वर प्राप्ति या तो ब्रह्म प्राप्ति कर सकते हैं त्याग से भी और शरणागति से भी ये दोनों एक दूसरे के कॉम्प्लीयंट मेंटरी है वैसे ही त्याग और भक्ति भी एक दूसरे के कंप्लीमेंट है तो ये हो गया भगवान श्री राम कृष्ण की दृष्टि से वेदांत अभी आप देखेंगे तो कोई बहुत ज्यादा डिफरेंस नहीं है क्योंकि यह जितनी भी साधन पद्धतियां है जितनी भी दर्शन शास्त्र है यह सब कुछ तो ऑलरेडी हमने खोज के ही निकाला है वही बात है कि इनके भीतर में जो बाह्य उपलक्ष दृष्टि से जो कंफ्लेक्स दिखता था कि मास्टर महाशय खुद जब ठाकुर को मिलने के लिए पहली बार आते हैं तो कहते हैं कि दूसरी बार में कि क्या जो सफेद दूध है वह कभी क्या काला हो सकता है भगवान यदि निराकार होंगे तो वह क्या कभी साकार हो सकते हैं यह दोनों चीज एक साथ में कैसे हो सकती है तो यह जो प्रश्न मास्टर महाशय ने किया था इसका यह एक उत्तर है साकार और निराकार एक ही सिक्के के दो पहलुओं की तरह है एक ही रियलिटी के दो डिफरेंट एस्पेक्ट है जब वह कार्य करता है तब वह शक् जब निष्क्रिय होता है तब वो ब्रह्मण स्थिर होता है तब भी साफ और वह गोल गोल घूम कर के तिर्यक गति से साप की जो गति होती है उसको तिर्यक गति कहती है जिगजैग मोशन उसका जिगजैग उसकी उसकी जो स्लाइडिंग तो वो जो तिर्यक गति से साप जद चलता है तो उसको भी साप ही कहते हैं तो ये हो गया ठाकुर का सोल्यूशन कि ब्रह्मा और शक्ति अभेद ज्ञान और और भक्ति हमको एक ही रास्ते पर ले जाएंगे यदि हम ज्ञान और भक्ति दोनों का एक साथ में अनुष्ठान करें तो बहुत अच्छा है यदि एक का भी अनुष्ठान कर पाए तो भी हम वहीं पर जाएंगे इसलिए ठाकुर कहते हैं कि जो भक्ति मार्ग से भी हम वहीं पर जाएंगे जहां पर ज्ञान मार्गी जाता है ज्ञान मार्गी डायरेक्ट ब्रह्मण के पास में जाता है भक्ति मार्गी मां शक्ति को प्रार्थना करता है कि मां रास्ता छोड़ दो ब्रह्मण का दर्शन करा तो मां कृपा करके रास्ता छोड़ कर के ब्रह्म ब्रह्म दर्शन ब्रह्म साक्षात्कार उनको करवा देगी तो ये ज्ञान और भक्ति ब्रह्मण और शक्ति ये एक ही है एक ही रियलिटी के दो एस्पेक्ट है तो यह हो गया ठाकुर का समन्वय जद यह सब कहने को जाते हैं कि ठाकुर सर्वधर्म समन्वय करने को आए थे तो यह तो बहुत ही उपल दृष्टि से हो गया यह ब्र अब्राहम जितनी भी स्कूल है ये यदि क्रिश्चियनिटी कहो ना कि इस्लाम कहो ना कि जुडा इजम कहो उनके भीतर की फिलोसोफी एक ही है बस अपने भगवान को अलग-अलग नाम दे दिए हैं विधि धर्मशास्त्र वगैरह अलग है और उसी को लेकर के उनका झगड़ा चलता रहता है कि हमारे भगवान बड़े उनके भगवान बड़े किसके बड़े किंतु यहां पे एक्चुअल फिलोसॉफिकल जो एक समन्वय करना था डिफरेंट डिफरेंट फिलोसोफी का डिफरेंट डिफरेंट स्कूल्स ऑफ थॉट्स का डिफरेंट डिफरेंट साइंस का जैसे कि क्लासिकल साइंस में कहा जाता था कि देयर आर फोर फोर्सेस ऑफ नेचर ये जो कॉस्मो में यूनिवर्स में चार तरह की एनर्जीस या शक्तियां है एक तो है ग्रेविटी दूसरा है मैग्नेटिज्म तीसरा है इलेक्ट्रिसिटी चौथा है यह अपना स्ट्रांग न्यूक्लियर फोर्स और फिफ्थ है कि वीक न्यूक्लियर फोर्स तो अभी ये पांच तरह की जो अलग-अलग शक्तियां दिखती है तो जैसे-जैसे यह साइंस ये फिजिक्स और मैथमेटिक्स इसका जब वो एडवांसमेंट डेवलपमेंट होता गया तो वैसे ही यह जो डिफरेंट डिफरेंट देखने वाली फोर्स सब एक साथ में एक ही इक्वेशन से सॉल्व करने का हमने प्रारंभ किया सर्वप्रथम इलेक्ट्रिसिटी और मैग्नेटिज्म को कंबाइन किया उसको नाम दिया इलेक्ट्रो मैग्नेटिज्म उसके बाद में वीक और स्ट्रांग न्यूक्लियर फोर्सेस उसके बाद में ये न्यूक्लियर फोर्सेस के साथ में इलेक्ट्रोमैग्नेट ज्म तो इतनी यहां पर इतने लोगों का कॉमिनेशन हो गया और इस और में ग्रेविटी है अभी विज्ञान के सामने सबसे बड़ी चैलेंज है कि ग्रेविटी के साथ में बाकी की जो फोर्सेस है इलेक्ट्रो मैग्नेटिज्म वीक न्यूक्लियर फोर्स और स्ट्रांग न्यूक्लियर फोर्स इन तीनों का कॉमिनेशन करना है जो कि अभी हो नहीं रहा है काफी कठिन दिख रहा है किंतु जो भी है एक नया आइंस्टाइन आएगा एक नया न्यूटन आएगा तो वो इसका सॉल्यूशन ला देगा ये कोई असंभव सी बात नहीं है ऑलरेडी थ आर मेनी क्रेडिबल कैंडिडेट्स इन दी मार्केट वो साइंस की जर्नल में बहुत सारे सोल्यूशन ऑलरेडी हमको दिख रहे हैं तो यह समन्वय है वो यदि आप चाहे विज्ञान में कहे ना कि धर्मशास्त्र में धर्म के क्षेत्र में कहे ये जितने भी विभिन्नता जितनी भी डायवर्सिटी जितना भी यह हमको डिफरेंट डिफरेंट दिखता है यह सबको एक ही फिलोसोफी एक ही थिरी के द्वारा एक ही सिस्टम में डाल कर के हम इसका ये जो वैविध्य है वो समझ पाए यह प्रयास ही सभी का प्रयास है कोई ऐसा नहीं कहता कि जितनी भी डाइवर्सिटी है उसको समाप्त कर दो क्योंकि किसका किसका मन जो होता है भक्ति मार्ग के लिए उपयुक्त होता है किसी-किसी का बहुत ही जिसमें की कार्यक्षमता होती है उनको यदि आप एक जगह पर बिठा देंगे तो वे लोग पागल हो जाएंगे उनको आपको कर्म योग देना ही पड़ेगा कोई कोई होता है इनकी विल पावर इतना स्ट्रांग होता है कि वह ज्ञान योग है या तो फिर राजयोग अर्थात कि ध्यान है इसके माध्यम से सीधे ईश्वर के पास में सीधे ब्रह्म साक्षात्कार कर पाएंगे तो किसका कितना विल पावर है किसमें कितना रजस है उसके अनुसार डायग्नोसिस करके प्रॉपर उसका मेडिकेशन प्रिस्क्रुटनी है ना कि किसी को मलेरिया है ना किसी को कोरोना है तो जिसका जिस जिस तरह से डायग्नोसिस होता है उसको उसी तरह का मेडिकेशन देना है एक ही मेडिकेशन से सबका काम नहीं चलेगा तो यह प्रॉपर एक अंडरस्टैंडिंग होना किंतु यह सब करने के लिए जो वैद्य है जो ये सब डिस्क्राइब करता है उसके पास में साइंस बड़ा पक्का होना चाहिए भले ही चाहे जो मेनी ये जो जिसको क्या कहते हैं रोग के जो लक्षण है वो भले सिमटम्स जिसको कहते हैं सिमटम्स भले एक ही जैसे दिखते हो भीतर में उसके जो कॉसेस है वो बड़े ही डिफरेंट है तो यहां पर भी यह भिन्न-भिन्न चीजें हमको जो दिखती है भिन्न-भिन्न फिलोसोफी दिखती है मैं कहां हूं इसमें मुझे क्या करना है मेरा क्या कर्तव्य है वो यदि समझना है तो पहले तो क्या इन सब को यूनिफाई करता है वो समझ लीजिए तो यूनिफाई करने के जो फैक्टर है वो समझने के बाद में फिर मेरे लिए क्या उपयुक्त है वो मैं इमीडिएट समझ जाऊंगा और साथ में द्विधा भी नहीं रहेगी किसी किसी के मन में यह द्विधा होती है कि मैं तो अब खास करके अपने रामकृष्ण आश्रम के सेंटर में देखेंगे कि बहुत सारा कर्म चलता रहता है बहुत सारे वोलंटीयरिज्म नहीं बिल्कुल नहीं क्योंकि थिरी और फिलोसोफी यह आइडिया और प्रैक्टिस दोनों कहते हैं कि जितने भी ब्रह्म और शक्ति वो भी अभेद है और साधन पद्धतियां भी एक कॉम्प्लीयंट मेंटरी है तो इतना समझने के बाद में हमने जो ठाकुर ने कहा ब्रह्म शक्ति अभेद उसका अर्थ हमको अभी ठीक-ठीक समझ में आएगा और इसमें भी क्या है देख देख यह जो सब फिलोसोफी होती है वो इतने हायर लेवल पर होती है कि अपनी सामान्य बुद्धि से एक जन्म में हम इसका वो कोई अंत पाने वाले नहीं है जब तक हम साधना नहीं करेंगे जब तक हम इसके भीतर में डीप प्रवेश नहीं करेंगे तब तक इस सूक्ष्म तत्त्वों का रहस्य भेदन होने वाला नहीं है तो किंतु एक बार हमने उपल दृष्टि से इंटेलेक्चुअली तो समझ लिया कि ठाकुर क्या कहना चाहते हैं और जब हम बाकी जब अद्वैत वेदांत का पाठ करते हैं तो हमको जो उपलक्ष दृष्टि से सुपरफिशियल जो सब कंट्रा इक्स दिखती है इसका भी क्या सॉल्यूशन है वो भी हमने समझ लिया और हमने ये भी समझा देखिए भले ही चाहे ठाकुर ब्रह्म और शक्ति के बारे में बात करते हो रामकृष्ण मिशन में बार-बार जितने भी सीनियर साधु है अद्वैत विदा के बारे में ही कहेंगे ये ये क्यों कहते हैं यह भी हमने समझा कि किसी के मन में ये भ्रम ना प्रकट हो जाए कि प्रेम का रास्ता ही यह प्रेम भक्ति का रास्ता ही एकमात्र रा मतलब इटस अ वेरी गुड मने इ कॉम्प्लीयंट मेंटरी है तो त्याग को फिलहाल छोड़ देते हैं अभी भक्ति करते हैं बाद में नेक्स्ट जन्म में देखा जाएगा तो यह त्याग के प्रति किसी भी तरह का एक क्या कहेंगे एक इग्नोर म एक नेगलेक्ट करने वाला भाव ना चला आए इसलिए अद्वैद वेदांत के बारे में स्वामी जी से लेकर के जितने भी सीनियर साधु है उन्होंने भार दिया है कि अद्वैत वेदांत अर्थात कि त्याग को पहले बिल्कुल ठीक-ठीक पकड़ लो उसके बाद में जो करना है करना यदि भक्ति होती है तो भी ठीक है नहीं होती है तो भी ठीक है और इसके बारे में एक सुंदर उदाहरण है ठाकुर एक बार रामचंद्र दत्त के बागान के आसपास में से कहीं से जा रहे थे देखा कि ये खटिया के ऊपर में एक साधु महात्मा विराजमान है तो ठाकुर तो अपनी वो जो स्टाइल है उसके अनुसार इमीडिएट उनके पास में जाकर के गब लगाना शुरू कर दिया और थोड़ी देर के बाद में वो वहां से निकल गए अपने भक्त के साथ में और बात-बात में कहने लगे कि साधु है किंतु बड़ा रुखा सुखा रुक्ष उसके भक्ति के बारे में कुछ भी जानता नहीं भक्ति को माया को प्रेम को स्वीकार नहीं करता है तो इसके बारे में रामचंद्र दत्त ने कोई टका टिप्पणी की होगी कुछ कटाक्ष में बात की होगी तो इमीडिएट ठाकुर ने क्या कहा किंतु साधु गृहस्थ देर थे के तो अनेक आगे चले गए से अर्थात कि भले ही चाहे आप साधु के बारे में कितनी ही निंदा कर दो किंतु यह जो प्रेम में यह जो भाव में कीर्तन वगैरह करते हैं लगता है कि जिनका हृदय भाव से परिपूर्ण है उनसे तो वो बहुत आगे है क्योंकि त्याग की महिमा ही सर्वोच्च महिमा है यहां तक कि यह नृत्य गोपाल बोलक के नित्य गोपाल ना नृत्य गोपाल मैंने दोनों नाम पढ़े हैं पता नहीं कौन सा सही है जिसको कि बाद में ज्ञानानंद अवधूत बोल कर के अपना प्रचार करता था वो ठाकुर के पास आता था यंग लड़के के रूप में और ठाकुर उसको बड़ा ही स्नेह करते जब कीर्तन होता था तो कीर्तन में उसको भाव हो जाता था चेहरा लाल हो जाता ठाकुर को स्वयं उसको शांत करना पड़ता था इस इस इतने सिद्ध जो साधक थे उसको भी ठाकुर ने कहा था कि साधु सावधान यदि कोई स्त्री भक्त आकर के बहुत ज्यादा प्रेम दिखाना भक्ति दिखाना शुरू करती है इमीडिएट उससे दूर हो जाओ क्योंकि यह वात्सल्य भाव ही बाद में तल्य भाव में परिवर्तित हो जाता है तो ये ठाकुर कहीं पर भी अपने जितने भी शिष्य थे बड़ी कड़ी नजर रखते थे कि कोई भी ये भाव भक्ति कीर्तन वगैरह का नाम लेकर के कोई दुराचार या अनाचार न प्रारंभ कर दे तो इसके लिए अद्वैत वेदांत की महिमा का सविशेषठकल दृष्टि से देखे तो ब्रह्मा और शक्ति अभेद तो यह हो गया ठाकुर का पूरा वेदांत के बारे में चिंतन अभी नेक्स्ट क्लास होगा हमारा आज फ्राइडे है तो नेक्स्ट क्लास होगा नेक्स्ट उस दिन फिर से मिलेंगे हस श्री राम
Question Answer
क स्वामी जी स्वामी जी जब मां के पास में मांगने को गए तो वही तो ज्ञान दो भक्ति दो वैराग्य दो तो भक्ति तो मांगी साथ में ज्ञान और वैराग्य भी मांग लिया वो पैकेज डियल बोलते हैं ना क्योंकि देखिए ब्रह्म और शक्ति अभेद होंगे तभी तो आप फिर से ब्रह्मण से वापस आ पाएंगे यदि माया मिथ्या है और एक बार व दृश्य हो गई तो फिर से माया प्रकट कहां से होगी राइट तो शक्ति है तो शक्ति को अपनी एक शक्ति है भले ही चाहे ब्राह्मण के साथ में ही मिली हो किंतु शक्ति का अपना एक डिग्निटी है अप एक वैलिडिटी है बोलकर के आप ब्रह्मण में से जगत में वापस आ पाते हैं शक्ति है तो जगत पूरा शक्ति मय है अर्थात कि ब्रह्म मय है माया के भीतर में आप ब्रह्मण कैसे खोजें माया तो अपने आप में मिथ्या है शक्ति के भीतर में ब्रह्मण खोजें क्योंकि शक्ति ब्रह्म एक है राइट तो इस हिसाब से आप उसमें से वापस आ सकते हैं यह शक्ति ब्रह्म अभेद बोल के दो चीज हो सकती है एक तो ज्ञान और भक्ति का समन्वय हो सकता है दूसरा कि आप निर्विकल्प में से वापस आ सकते हैं ये दोनों पॉसिबल तभी है जब शक्ति ब्रह्म अभेद कहेंगे माया जद मिथ्या है तो एक बार नेती नेती करके माया को काट दिया तो फिर से वो माया किस तरह से आप वापस लेकर आए यदि घर के भीतर में अंधेरा है आपने दिया जलाया फिर मुझे अंधेरा वापस लाना है तो दिए को बुझा देना पड़ेगा दिए को चालू रख के तो अंधेरा वापस नहीं आने वाला है तो ठाकुर ने ब्रह्मज्ञान छोड़ कर के माया के जगत में आए ऐसा तो नहीं है ब्रह्मज्ञान को अपनी पॉकेट में रख कर के माया के जगत में रह रहा है तो वो हाउ इज इट पॉसिबल कि मैं दिए को भी जला के रखूं साथ में अंधेरा भी रखूं ये दोनों पॉसिबल हो ही नहीं सकता या तो अंधेरा रहेगा या तो दिया रहे प्रकाश रहेगा तो अंधेरा प्रकाश और प्रकाश की शक्ति दाही का शक्ति दो साथ में रह सकते हैं दिए की दाही का शक्ति जो है हीटिंग पावर एनर्जी वो रह सकती है अंधेरा नहीं रह सकता है माया को जद आप अंधेरे के रूप में रखेंगे तो जैसे ही प्रकाश चलाया माया चली गई किंतु प्रकाश के सा में प्रकाश की दाही का शक्ति अवश्य रहेगी सो ट इज हाउ यू रिटर्न बैक टू द वर्ल्ड शक्ति कर रही है जैसे कि स्त्री को आप भोग भोग्य वस्तु के रूप में भी देख सकते हैं और मातृ रूप में भी दे सकते हैं इसी तरह से शक्ति का भी आप मिसयूज कर सकते हैं शक्ति को भोग्य वस्तुओं के साथ में लिप्त करके देख सकते हैं शक्ति को सुसंस्कृत करके मातृ रूप पीणी के रूप में देख सकते हैं तो शक्ति के राज्य में रह कर के आप शक्ति का किस तरह से प्रयोग करेंगे उसके ऊपर है मैं यदि भोग्य वस्तुओं प्राप्त करने के लिए अज्ञान के भीतर में जाकर के मैं शक्ति का प्रयोग करूंगा तो वो अभी जैसे देखिए एक एक इविल की भी एक शक्ति होती है ना हिटलर को देखिए हिटलर पूरा इविल पर्सन था पूरा एक शैतान आदमी था किंतु फिर भी उसके पास में ऐसी ओरेट पावर था कि पूरे जर्मनी को उसने अपनी ओरेट पावर और अपनी वो क्या कहेंगे सोहनी शक्ति में वो बंदी बना कर के रख दिया था सेकंड वर्ल्ड वॉर का डिस्क्रिप्शन पढ़ेंगे ये सोवियत आर्मी और एक ओर से सोवियत आर्मी दूसरी ओर से ब्रिटेन और अमेरिका और फ्रांस ये तीनों की कंबाइन आर्मी चार-चार आर्मिया बर्लिन के ऊपर में इकट्ठी हो रही है भयानक गोला बारूद हो रहा है बर्लिन के ऊपर में फिर भी ये जर्मनी के लोग ये जर्मन लोग ये हिटलर की ये जो मोहिनी शक्ति में ऐसे फंसे हुए थे सरेंडर करने का नाम नहीं संपूर्ण रूप से जब उनका यह विनाश हुआ डिस्ट्रक्शन हुआ डेली डेली 1000 बंबर जर्मनी के ऊपर में बम फेंकते थे तब कहीं जाकर के हिटलर ने आत्महत्या की तो उन्होंने सरेंडर किया जब तक हिटलर जीवित था इन लोगों ने सरेंडर नहीं किया भले ही चाहे हम मर जाए तो यह भी तो एक शक्ति है पावर ऑफ इवल यह कहां से आता है वही शक्ति जिसका कि दुष्प होता है अब जापान की बात देख लीजिए जापान का एंपायर पूरा पैसिफिक में फेलना लगा और जितने भी और फिर जब अमेरिका ने काउंटर अटैक किया हवाई के ऊपर में आक्रमण के बाद में एक के बाद एक जितने टापू थे आइलैंड थे जितना शुरू किया फिर वहां तक बात गई कि टोक्यो के ऊपर में जितने भी इंडस्ट्रियल सिटीज है जापान के सबके ऊपर में डेली डेली थाउज बॉम्बर्स जा कर के वो इंसेंडियरी बॉम फेंकते थे अभी जापान के जितने भी घर थे वो बांबू के वो पेपर के बने हुए थे इंसेंडियरी अर्थात कि फायर स्टार्टिंग बॉम इसको फेंकें तो पूरे के पूरे सिटी जल जाते थे हजारों लाखों लोग मर जाते थे उस फायर स्टोम के भीतर में किंतु जब तक कहीं इन दोनों के ऊपर में वो एटम बम नहीं फेंका वो भयानक विनाश जब तक नहीं हुआ यह लोग सरेंडर नहीं कर रहे तो किस तरह कीय मोहिनी शक्ति है कि भ आप पूरे जगत को खत्म करने को निकले हैं और अपना खुद का डिस्ट्रक्शन इन द प्रोसेस हो रहा है समझ में नहीं आ रहा है ये ये एक शक्ति है जिसको की हम वर्णना नहीं कर सकते हम पुराणों के राक्षस के बारे में तो बहुत सुन लिए किंतु यह जो आधुनिक राक्षस है थोड़ा सा हिस्ट्री को ठीक से पढ़े पता चलता है कि इन लोगों की सोहनी शक्ति कैसी थी कि यह पूरे पूरे प्रजा पूरे पूरे देश संपूर्ण रूप से सेल्फ डिस्ट्रक्ट हो गए किंतु वो आखिर तक जब तक उसका वो लीडर है वह मर नहीं गया यह लोग निकले नहीं बाहर ये लोगों को धर्म में विश्वास क्यों नहीं हो रहा है कभी-कभी ये जितने भी धार्मिक लोग है उनको हम देखते हैं निकम में है बिना किसी काम के कुछ भी काम नहीं कर सकते वह जगत का भला कर कर ही नहीं सकते जबकि ये जोग अ धार्मिक लोग हैं वो अपना काम तो निकाल देते हैं भले ही चाहे अधर्म के रास्ते से निकालते हैं किंतु निकालते तो है यह जो ये जो माफिया लोग है माफिया लोग का पावर कहां पे है आप पुलिस आपके पास आपके साथ में कुछ अन्याय हुआ आप पुलिस के पास में जाइए आप कोर्ट कचहरी में जाइए वो किसी एनजीओ में जाइए आपका काम ही नहीं होगा फिर किसी माफिया को पकड़िए अरे भैया ऐसा हो रहा है मेरे साथ में कुछ करो उपाय तो माफिया लोग जाकर के जो हमको परेशान करता है उसको गोली मार देंगे या तो फिर उसको पिटाई कर देंगे तो चलो भाई मुसीबत में से तो छूटे तो प्रश्न यह होता है कि भारत देश में जद अब गवर्नमेंट है पुलिस डिपार्टमेंट है सब कुछ है फिर भी काम नहीं हो रहा है फिर वो मुझे वो उल्टा रास्ता देकर के काम करवाना पड़ता है तो फिर मुझे किसकी शक्ति ज्यादा दिखती है अधर्म की ही तो ज्यादा दिखती है धर्म की दिखती ही नहीं है तो यह प्रश्न कितने सारे लोग के मन में होता है गुजराती में जो बहुत ज्यादा धार्मिक लोग होते हैं उनको वेदियो के वेदियो से माने बहुत अच्छा आदमी है किंतु निकम्मा है किसी काम का नहीं है