प्रार्थना
ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय रामकृष्णाायते नमः श्री श्री रामकृष्ण कथामृत श्रीम कथित 16th दिसंबर 1883 दोपहर को 4:00 बजे हैं। जनाई के एक मुख आए हैं। डिवोटी उनके साथ में ठाकुर वार्तालाप कर रहे हैं। कल हमने एक बड़ा ही इंपॉर्टेंट पॉइंट देखा वेदांत का। जल स्थिर रहने से भी जल है। तरंग होने से भी वही जल है। दोनों में कोई डिफरेंस नहीं है। तो देखिए कि मैं फिर से एक बार इस पैसेज को पढ़ लेता हूं। जो दो-तीन उपमाएं ठाकुर देते हैं। ठाकुर कहते हैं
शंकराचार्य का ‘नेति नेति’ साधनमार्ग बनाम श्रीरामकृष्ण का ‘इति इति’ साधनमार्ग
पहले तो मुखजे ठाकुर कहते हैं कि तीन मोने कर ले ज्ञानी के संसार रखते पारे तार इच्छा ते जीव जगत होए छ तनी इच्छामय ईश्वर यदि इच्छा करेंगे तो फिर ज्ञानी को संसार में भी रख सकते हैं। उनकी इच्छा से जीव जगत हुए हैं। उनकी वही तो है इच्छामय। तो मुख हास्य करतेकरते कहते हैं कि उनकी फिर इच्छा कैसी? माने जो जगत जननी है या तो फिर ब्राह्मण है वह इच्छा कैसे कर सकते हैं? उनका क्या कोई अभाव है? यहां पर मुख एक टिपिकल वेदांतिक पॉइंट ऑफ व्यू हमारे सामने प्रस्तुत करते हैं कि ब्रह्म में तो किसी भी तरह का विकार नहीं है। किसी भी तरह की तृष्णा नहीं है। यदि प्यास लगेगी तभी तो हम पानी पीने को जाएंगे। प्यास नहीं लगी तो हम पानी पीने को जाएंगे ही क्यों? यह जो ठाकुर एक कहानी बताते हैं ना कि अयोध्या में मां सीता ये जितने भी गरीब लोग हैं उनको देखकर के उनका हृदय द्रवित हो गया और करुणा के आवेश में आकर के भगवान राम को कहा कि आपके खजाने में जो इतने सारे हीरा माणिक रत्न जवाहरात थे तो सब गरीब लोगों में बांट दीजिए। आपके खजाने में पड़े हैं बिना मतलब के और यह गरीब लोगों को इतना मेहनत करना पड़ता है दो वक्त की रोटी पाने के लिए। तो भगवान ने कहा देखिए जो संसार की जो नीति है कर्म करके अन्न प्राप्त करना वो नीति हमेशा से चली आई है। मुफत का आएंगे तो पता नहीं क्या होगा। किंतु यहां तो मां सीता की जििद है। तो भगवान राम ने कहा कि चलो बांटो जितने भी जवाहरात सोना सोना मोहर जिसको जितना चाहिए। अभी हुआ ऐसा कि यह गांव वाले, शहर वाले सब यह सब धन, खजाना, वैभव, पैसा लेकर के बैठ गए। अभी खाना तो मिल रहा है मुफ्त में। तो फिर काम कौन करेगा? अभी हुआ ऐसा भगवान राम की हवेली में बारिश के समय में छत लीक होने लगी। पानी गिरने लगा। तो मां सीता ने कहा जाओ किसी बुलाओ किसी को। यह जो कारीगर ना कि वर्कर जो कोई भी है यह सब कड़िया काम जानता है। तो जब यह चौकीदार लोग सेनापति लोग गए बुलाने के लिए तो पता चला अभी कोई काम करने को तैयार नहीं है। क्यों? क्योंकि मुफ्त में खाना मिलता है। कौन काम करेगा? तो फिर जब उन्होंने आकर के मां सीता को कहा तो मां नाराज हो गई। कहा कि जितने भी पैसे थे, जवाहरात थे अभी देना बंद कर दो। वह लोग भी काम करेंगे तो फिर ये सब संसार का कार्य चलेगा ना। तभी तो यह महल की मरम्मत होगी। तभी तो यह संसार चक्र जो है साइकिल ऑफ इकोनमी जो है विल ऑफ कॉमर्स जो है वो चलेगा। बोल के मां सीता ने खजाने खजाने में से रुपया बांटना बंद कर दिया। तो अभी देखिए कि यदि आपको खाने को मिलता है, भूख नहीं लगी है तो आप कर्म करेंगे ही क्यों? कर्म तो वही करेगा जिसको कि भूख लगी है खाना खाने के लिए उसको तो कर्म करना पड़ेगा तो ब्राह्मण के भीतर में तृष्णा ही नहीं है विकार ही नहीं है तो वह कुछ भी इच्छा क्यों करेगा तो यहां पर वह टिपिकल पॉइंट ऑफ व्यू मुख बताते हैं उसके सामने ठाकुर उत्तर देते हैं कि ब्रह्म यदि इच्छा करते हैं तो उसमें दोष क्या है? जल स्थिर रहने से भी जल है। तरंग होने से भी जल के ऊपर में वही जल है। वही एक समुंदर है जो कि शांत रहता है तभी वही समुंदर है। जब यह साइक्लोन वगैरह आ जाता है उसके ऊपर में तरंगे उठती है तो भी तो वही समुंदर है। इसके अलावा तो और कुछ है नहीं। सांप जब कुंडली बनाकर के जब बैठा रहता है तब भी वही सांप है और सर्पाकार गति में चलता है तो भी वही सांप है। बाबू जब चुप होकर के बैठे हैं तो वह भी तब भी वही बाबू है और बाबू जब वार्तालाप कर रहे हैं, कार्य कर रहे हैं तो भी वही बाबू है। जीव जगत को बाद देंगे किस तरह से? ऐसा करने से वजन में कम पड़ जाएगा। यह बेल फल है। उसका यह जो बाह्य आवरण है जो अखाद्य है उसके भीतर के यह जो सीड्स वगैरह है वह भी अखाद्य है। उसको हटा दिया और जो पल्प रह गया पल्प का जूस होता है उसको आप खा सकते हैं। सिर्फ वही रख दिया तो फिर जो वह ओरिजिनल बेल फ्रूट था उसकी कंपेयर में तो उसका वेट कम हो जाएगा ना। देखिए यहां पे एक बहुत ही इंपॉर्टेंट एनालॉजी है। एक बड़ी ही इंपॉर्टेंट उपमा ठाकुर देते हैं। देखिए एक है ओरिजिनल बेल फ्रूट जिसके कि बाह्य एक शेल होता है। फिर उसके भीतर में पल्प होता है और फिर बीच-बीच में आपको यह बीज दिखाई देंगे। अभी ठाकुर कहते हैं कि यह समस्त बेल फ्रूट को लीजिए और फिर उसका सार भाग लीजिए। सिर्फ सार भाग। तो यह सार भाग क्या है? बाहर का आवरण हटा दिया। शेल काट करके फेंक दिया। भीतर के जो बीज वगैरह थे उसको निकाल कर के फेंक दिए। तो जो पल्प रहा वो रह गया सार भाग। अभी आप दोनों को कंपेरेटिवली वेट कीजिए। वो वेट वो जो तुला होता है ना वो तुला वो आप मार्केट में जाएंगे सब्जी खरीदने के लिए तो वो त्राजू जिसको कहते हैं गुजराती में। एक ओर में आप कहेंगे 1 किलो आलू दो तो वह 1 किलो आलू निकाल करके वह त्राजवा जो होता है उसके एक साइड में रखेगा और 1 किलो का वेट जो होगा वो दूसरी साइड में रखेगा जब वो दोनों इक्वल हो जाएंगे जब तक यह वेट नीचे जाता है तब तक वो आलू निकाल निकाल करके उस साइड में डालता रहेगा जब यह दोनों इक्वल हो जाते हैं यदि ये नीचे आ जाएगा तो एक आलू निकाल देगा किंतु जब ये इक्वल हो जाएंगे तो उसका अर्थ कि ये एक वन केजी आलू हो गए तो वह निकाल करके फिर वह हमको देगा तो क्या है वह जो त्राजू जो होता है उसका मतलब इसी तरह से वो जो पता है ना ठाकुर एक कहानी कहते हैं इसी तरह से वो भगवान कृष्ण का वेट कर रहे हैं वो सत्यभामा वगैरह उनकी जो रानियां होती है तो देखा कि एक ओर भगवान कृष्ण को बिठाया है और दूसरी ओर जितने भी है हीरा जवाहरात सोना माणिक जो कुछ भी धन वैभव जितना भी यह खजाना है ट्रे ट्रेजर है वह सब रख रहे हैं। किंतु इसके बावजूद भगवान कृष्ण वाला जो पल्ला जो है वह नीचे का नीचा ही रहता है। और यह जो ट्रेजर जो पूरा रखा है वह ऊपर ही रहता है। तब फिर किसी ने आकर के एक तुलसी पत्र उसमें रख दिया। वो खजाने के ऊपर में देखा कि फटाक करके खजाने वाला जो ये है नीचे आ गया और वह भगवान कृष्ण वाला जो है वो ऊपर चला गया। तो दैट इज कि वह त्राजू या तो तुला जो भी है। तो अभी मान लीजिए कि ठाकुर जैसे कहते हैं कि ओरिजिनल बेल फ्रूट है जो कि कंप्लीट है। उसमें बाह्य आवरण भी है, भीतर का पल्प भी है और फिर रुकमणी। अच्छा रुकमणी। अच्छा। तो एक और है ओरिजिनल बेल फ्रूट। उसका बाह्य आवरण है। भीतर का पल्प है और भीतर में बीज भी है। तो वह आपने वह जो त्राजवा है तुला है उसके एक साइड में रखा और वो जो दूसरी साइड में आपने रखा उसका सिर्फ सार भाग सार भाग अर्थात कि पल्प अर्थात कि बाह्य आवरण निकाल कर के हटा दिया और भीतर के जो बीज है उसको भी हटा दिए। अभी आप दोनों को कंपैरेटिवली वेट कीजिए। क्या होगा? ओरिजिनल जो बेल फ्रूट है वह नीचे आ जाएगा उस साइड वाला वह वेट उसका ज्यादा है और जिसका कि सिर्फ आपने पल्प रखा है वह साइड वाला ऊपर चला जाएगा अर्थात कि उसका वेट कम है क्योंकि हमने बाह्य आवरण और बीज वगैरह निकाल दिया है। अभी ठाकुर कहते हैं कि यदि ब्राह्मण का वेट कम हो जाएगा तो नहीं चलेगा। दोनों का इक्वल वेट होना चाहिए। अभी देखिए कि द्वैत वेदांत क्या कहता है? द्वैत कहता है कि ब्राह्मण और जीव जगत का रिलेशन है वो मां और बच्चे की तरह है। मां ने भले ही चाहे बच्चे को प्रसव किया हो। जब मां बच्चे को प्रसव करती है तो बच्चा मां से सेपरेट हो जाता है। मां मां है, बच्चा बच्चा है। दोनों में चाहे जितना भी प्रेम हो वे दोनों फिर से एक नहीं हो सकते। यानी कि ऐसा हो गया कि ये जो तुला जो है उसकी एक साइड में आपने मां और बच्चे को रखा व्हिच रिप्रेजेंट्स जीव जगत और ब्रह्मन और दूसरी साइड में आपने सिर्फ मां को रखा जो कि जो सार भाग या तो ब्रह्मन को रिप्रेजेंट करता है। तो मां वाला जो पल्ला है ऊपर चला जाएगा और मां और बच्चा वाला जो पल्ला है वह नीचे आ जाएगा। यानी द्वैत वेदांत इस डेफिनेशन में फिट नहीं होता। अद्वैत वेदांत क्या कहता है? ब्रह्मण और जीव जगत का क्या रिलेशन है? यह देह जो है समष्टि कहे कि देह का जो कोर ऑर्गन है कहो हार्ट ना कि कहो ब्रेन वो है ब्रह्म। किंतु फिर यह जो पेरिफेरल ऑर्गन्स जो है हाथ है, पैर है या तो फिर यह आंखें हैं, कान है वह सब मिलाकर के जीव जगत होते हैं। एंटिटी एक ही है किंतु विदिन दैट एंटिटी डिफरेंट ऑर्गन्स है। अभी फिर से ठाकुर की यह उपमा देखा जाए तो एक ओर आप ब्राह्मण जीव जगत को रखेंगे। यानी कि संपूर्ण मनुष्य देह। और दूसरी ओर आप सिर्फ ब्राह्मण को रखेंगे यानी कि हार्ट और ब्रेन निकाल करके रख दिया। किंतु उसमें ना ही हाथ पैर है ना ही आंख, कान, नाक है। तो फिर क्या होगा कि यह जो हार्ट और ब्रेन निकाल के रखा है, वह वाला ऊपर आ जाएगा और यह जो पूरा मनुष्य देह है, उसका वेट ज्यादा हो जाएगा। यानी कि फिर से इमंबैलेंस होता है। यह भी नहीं चलेगा। अभी अद्वैत वेदांत का फिलॉसोफी आप देखिए कि अद्वैत वेदांत जो एक अपना वो मोस्ट फेमस उदाहरण है सर्प और रज्जू अर्थात कि आप जाएंगे तो रास्ते में आपको एक रस्सी पड़ी हुई दिखाई देगी। अभी रस्सी को आप देखते हैं अंधेरे में तो आपको ऐसा लगेगा कि अरे यह तो सांप है। सांप सोच के आप एकदम डर गए। आपका हृदय धकधक कर रहा है। किंतु फिर अभी टॉर्च तो आजकल हम लोग रखते नहीं है। मोबाइल निकाल करके उसका टॉर्च ऑन किया तो पता चला कि वह सांप नहीं है। रस्सी है। जैसे ही अज्ञान दूर हो गया वैसे ही सत्य का साक्षात्कार हुआ। अभी इस एनालॉजी को ठाकुर की इस उपमा में कैसे रखेंगे? एक और आपने रखा है रस्सी जो कि रस्सी और उसके ऊपर अंधेरे में रखा है। राइट? रस्सी रखी है अंधेरे में जिसकी वजह से ऐसा लगता है कि वहां पर रखा है सांप। किंतु एक्चुअली रस्सी और सांप दोनों यहां पर रखे हैं। दूसरी ओर आपने रखा है रस्सी ही किंतु वहां पर लाइट जला दिया है। यानी कि वो जो सांप वाला जो भ्रम था वो चला गया है। अभी आप दोनों को वेट कीजिए। क्या होगा? एक्चुअली दोनों इक्वल होंगे। क्योंकि यहां पे सांप है ही नहीं। अंधेरा है बोलकर के सांप दिख रहा है। है तो सिर्फ रस्सी ही। वेट तो सिर्फ रस्सी का ही है। अंधेरे की वजह से जो भ्रम होता है सर्प रूपी उसका तो कोई वेट ही नहीं है। अज्ञान का कोई वेट नहीं होता है। तो बोलकर के यह रस्सी जो कि अंधेरे में रखी है जिसकी वजह से हमको सर्प होने का भ्रम होता है और यह रस्सी जो कि उजाले में रखी है जो कि स्पष्ट रूप से रस्सी के रूप में ही दिखती है। यह दोनों इक्वल ही होगा। अर्थात कि देखेंगे कि ठाकुर की जो उपमा है जीव जगत को बाद देने से नहीं जा चलेगा। ऐसा करने से वह ओरिजिनल जो वेट था वह वेट कम हो जाएगा। तो इस उपमा में अद्वैत वेदांत जो है वह फिट बैठ जाता है। तो फिर प्रश्न होगा कि ठाकुर यहां पे जो यह उदाहरण देते हैं कि जल स्थिर रहने से भी जल उसमें तरंग उठने से भी जल तो यह क्या अद्वैत वेदांत का उदाहरण है? एक्चुअली यदि देखें तो ऊपर ऊपर से दोनों सेम ही लगेंगे। एक ओर यह जो त्राजवा है ये तुला है उसकी एक साइड में आप पूरे समुंदर को रख दीजिए जो कि शांत है और दूसरी ओर में इस तरह का समुंदर रखिए वही समुंदर डुप्लीकेट करके कॉपी पेस्ट करके इस दूसरी ओर रखिए किंतु उसके ऊपर में तरंगे उठ रही है। अभी देखिए कि तरंग का अपना अलग से कोई वेट नहीं है। वेट तो दोनों का सेम ही होगा। अभी एक बाबू है। बाबू बैठे हुए हैं चुपचाप। उसको एक ओर में रखिए। दूसरी ओर में वही बाबू को रखिए जो कि वार्तालाप कर रहे हैं या तो कार्य कर रहे हैं। किंतु कार्य इस तरह से कर रहे हैं जिससे कि उसको नोट पेन या तो और किसी चीज की जरूरत ना पड़े। उसको इंट्रोड्यूस करेंगे तो वह वाला वेट ज्यादा हो जाएगा। किंतु सिर्फ अभी उपमा के लिए ऐसा सोचते हैं कि ऐसा कुछ कार्य कर रहे हैं जिसमें किसी एक्सटर्नल इंस्ट्रूमेंट की आवश्यकता नहीं। तो चुपचाप बैठा हुआ जो बाबू है और कार्यकर्ता हुआ बिना किसी एक्सटर्नल इंस्ट्रूमेंट के वह बाबू ये दोनों का वेट सेम ही होगा। एक सांप है वह कुंडली बना करके सोया हुआ है। एक पल्ले में रखिए और दूसरे पल्ले में रखिए। वही सांप कॉपी पेस्ट करके किंतु वही सांप अभी सर्पाकार गति से चल रहा है। इन दोनों का वेट सेम ही होगा। तो फिर प्रश्न होगा कि यहां पर यह जो रस्सी जो है दोनों रस्सी सेम है। एक रस्सी को अंधेरे में रखा है। बोल के हमको रस्सी की जगह साफ होने का भ्रम होता है। दूसरी रस्सी को उजाले में रखा है। बोल के उसका रस्सी रूपी जो सत्य स्वरूप है हमको स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। इन दोनों का वेट जैसे इक्वल ही है। तो वैसे ही ठाकुर ने यह जो तीन उपमाएं दी बाबू की उपमा दी यह जो सर्प की उपमा दी और फिर यह जल की उपमा दी। यह तीनों उपमाएं तो वेदांतिक उपमा के साथ में मिल ही जाती है ना। कहां डिफरेंस आता है? तो देखिए कि डिफरेंस आता है थोड़ा सा प्रैक्टिकल जब होंगे तब वेदांत में कहते हैं कि यह जो अंधेरा है जो कि रस्सी को अंधेरे में रखा है बोलकर के रस्सी के ऊपर में हमको सर्प रूपी जो भ्रम होता है इस अंधेरे को हमको काट देना है। वह हमारे रास्ते में एक बाधा है। तो ठाकुर जब अद्वैत वेदांत की साधना कर रहे थे। मां काली जब भी उनकी नजरों के सामने आती है, जब भी वह ध्यान करने का प्रयास करते हैं, जब भी वह अपने मन, बुद्धि, चित्त अहंकार से परे जाने का प्रयास करते हैं, तब भी उनकी नजर के सामने मां काली का दर्शन होता है। तो आखिर में तोतापुरी ने उनकी यह जो फोरहेड है भ्रू मध्य जिसको कहते हैं, वहां पर कांच का एक टुकड़ा लाकर के यहां पर उनको मारा। जिसकी वजह से वहां पर एक तरह का दर्द होने लगा जिससे कि उनका जो अटेंशन है वो वहीं पर एग्जजेक्टली फिक्स हो जाए और जैसे ही फिक्स हुआ ठाकुर डीप मेडिटेटिव स्टेट में चले गए और इसके बाद में जब मां काली आती है उनकी उर्ध्वगति में बीच में तब यह तल ज्ञान रूपी तलवार से मां काली को काट दिया और फिर वह निर्विकल्प समाधि को प्राप्त हुए। तो यहां पर क्या है जिसको कि अंधेरा है, अज्ञान है, माया है, उसको एक बाधा के रूप में देखते हैं। उसको एक ऑब्स्ट्रक्शन या ऑब्सकल के रूप में देखा जाता है। विल पावर को दृढ़ करके इस ऑबस्टकल को आपको काटना है। तो यह है अद्वैत वेदांत का ज्ञान मार्ग। किंतु यहां पर जो भगवान रामकृष्ण हमको यह शक्ति मार्ग की जो बात करते हैं वह क्या है कि है तो वही कि वही ब्राह्मण है। वही ब्राह्मण गियर चेंज करके एक्टिव होता है। वही ब्राह्मण जो है गियर चेंज करके पैसिव हो जाता है। वह किंतु यह जो गियर चेंज जिसको कहते हैं इसको ठाकुर कहते हैं शक्ति और शक्ति की आराधना करके शक्ति से मुक्त होना है। दिस इज द डिफरेंस बिटवीन अद्वैत वेदांत का जो ज्ञान मार्ग है और ठाकुर का यह जो ब्रह्म शक्ति अभेद यह शक्ति मार्ग है। इसमें यह डिफरेंस है कि शक्ति की आराधना करके शक्ति को आपको प्रार्थना करके वही जो फेमस उदाहरण ठाकुर देते हैं कि भगवान राम, मां सीता और लक्ष्मण वन में से जा रहे हैं। तभी देख पता चला कि लक्ष्मण को भगवान राम का दर्शन करना है। किंतु बीच में मां सीता चल रही है। तो उन्होंने मां सीता की आराधना करके कहा कि मां आप थोड़ी देर के लिए रास्ता छोड़ दीजिए। तो मुझे भगवान का दर्शन होगा। यहां पर लक्ष्मण ने तलवार लेकर के मां सीता को दो टुकड़ों में काट नहीं दिया था। सो दैट इज दी डिफरेंस कि थ्योरेटिकली देखें फिलॉसोफिकली देखें तो जो क्लासिकल अद्वैत वेदांत है और ठाकुर का यह जो शक्ति या तो फिर कहेंगे कि रामकृष्ण का इंटरप्रिटेशन मैं शब्द देना नहीं चाहता। मैंने जितनी बार देखा है ना कि कोई इसको कोई एक फिलॉसोफी को एक नाम देता है तो वैसे ही उसके ऊपर में 10 लोग टूट पड़ते हैं उसको डिस्प्रूव करने के लिए। इसलिए ठाकुर की कोई फिलॉसोफी को मैं नाम नहीं देना चाहता। मैं सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि वेदांता अकॉर्डिंग टू श्री रामकृष्ण। वेदांता इज टॉट बाय श्री रामकृष्ण और श्री रामकृष्ण वेदांत सिंपल एकदम उसको कहे तो एक है कि शंकराचार्य का वेदांत। शंकराचार्य कहते हैं कि यह अज्ञान जो है अज्ञान को आपको ज्ञान मार्ग के रास्ते पर चल के मैं यह देह नहीं मैं यह पंच ज्ञानेंद्रिय पंचकर्मेंद्रिय नहीं बोलकर के नेति नेति मार्ग से उसको काट देना है। जबकि भगवान रामकृष्ण का जो वेदांत है यह एक पॉजिटिव वेदांत है। यहां पर आपको इति इति करके आपको सिद्धि प्राप्त करनी है। अर्थात कि यह जो मां है जिसको कि वह वे लोग अज्ञान कहते हैं उसी को हम लोग यहां पर शक्ति कहते हैं और इस शक्ति की आराधना करके आत्म समर्पण करके हमको मुक्ति प्राप्त करनी है। तो देखिए कि वह हो गया नेति नेति मार्ग। यह हो गया इति इति मार्ग। अभी ऐसा कहने से ही बहुत सारे प्रश्न खड़े होंगे। ठाकुर कहते हैं कि नेति नेति करके ईश्वर साक्षात्कार या तो ब्रह्म साक्षात्कार करना है। उसके बाद में इति इति करके अर्थात कि जो ब्रह्म साक्षात्कार मैंने इंद्रिय संयम करके किया था। जो ब्रह्म साक्षात्कार मैंने जगत के साथ में संपूर्ण जो विषयों का रिश्ता है उसको तोड़ के किया था। वही ब्रह्म इसी जगत में चारों ओर फैले हुए हैं। मैं इति इति करके वापस आऊंगा और स्नेह, प्रेम, करुणा का निस्वार्थ संबंध इस जगत के साथ में फिर से बनाऊंगा जिससे कि मेरी करुणा, मेरी आध्यात्मिक शक्ति लोगों के भीतर में प्रवाहित हो। लोक कल्याण के लिए मैं रह पाऊं। तो यह हो गया ठाकुर का एक जनरल फ्रेमवर्क। इस जनरल फ्रेमवर्क में यह जो ठाकुर का कांसेप्ट है वह इतना बड़ा पत्थर डालता है कि इति इति करके आप वापस आते हैं वह भी इति इति मार्ग है। और जब आप नेति नेति करके जो ऊपर जाते हैं ब्रह्म साक्षात्कार की ओर उसको भी थोड़ा सा शिफ्ट करके इति इति मार्ग बना देना है कि यह जो अज्ञान है यह जो मेरे विषय के मेरे इंद्रियों के जो विषय है उसको मुझे त्याग नहीं करना उसके सामने मुझे लड़ना नहीं है। मुझे जैसे कि यह सब भी ईश्वर के ही एक-एक रूप है बोल करके आत्मसमर्पण करना है। ऐसा करके जब हम आत्मसमर्पण करेंगे तब पता चलेगा कि इति इति मार्ग से भी इति इति साधना का मार्ग और इति इति करके माने ऊपर जाने का समय इति इति और नीचे आने के समय इति इति राइट सो एसेंडिंग इति इति जो है ऊपर जाने का साधना का समय का इति इति मार्ग उससे भी उतना ही इंद्रिय संयम होगा जितना कि नेति नेति मार्ग से होता है। यहां पे देखिए कि ठाकुर का यह जो इति इति मार्ग है और जिसको कि जनरली भक्ति योग कहा जाता है द्वैत वेदांत की फिलॉसोफी के भीतर में उन दोनों में डिफरेंस क्या है? देखिए पहला तो जो नेति नेति या तो ज्ञान मार्ग जो है उसके साथ में ठाकुर का इति इति मार्ग जो है इन दोनों के बीच में क्या डिफरेंस है कि ज्ञान मार्ग में आपको परिश्रम करके कष्ट करके विल पावर को मजबूत करके आपको इंद्रिय संयम करना है। जबकि ठाकुर कहते हैं कि जब आप ईश्वर को समर्पण करेंगे या तो फिर इंद्रियों के विषय है उसके भीतर में वही आध्या शक्ति जगदंबा का दर्शन करेंगे तो इंद्रिय संयम अपने आप में होने लगेगा। यह हो गया कि ज्ञान मार्ग और ठाकुर के इति इति मार्ग के बीच में डिफरेंस। अभी यदि आपने वेदांत या तो योग पढ़ा होगा तो पता तो आप कहेंगे कि ठाकुर का यह जो इति मार्ग है भक्ति योग के साथ में बहुत ही मेल खा रहा है। भक्ति योग में भी परिश्रम करके इंद्रिय संयम नहीं करना है। किंतु जैसे ठाकुर का वो जो फेमस उदाहरण कि वो वहां से कहां पे वह कुछ लोग गए थे वाराणसी ने कि कहां पे एक साधु को मिलकर आए। कहा कि उन्होंने साधु ने कहा है कि पहले इंद्रिय संयम करो फिर बाद में बाकी सब करना। तो ठाकुर कहते हैं हां यह भी एक मार्ग है वेदांत का कि इंद्रिय संयम करके सब कुछ होगा। तो किंतु ठाकुर अपने से इस मार्ग को समर्थन नहीं देते। तो यह पैसेज पढ़ के ऐसा लगेगा कि क्या ठाकुर इंद्रिय संयम करने को मना कर रहे हैं? नहीं। ठाकुर का कहना है कि जो परिश्रम करके जो इंद्रिय संयम कर रहे हो वह रास्ता बहुत ही कठिन है। अपने विल पावर पर इतना अपना विल पावर जो है इतना स्ट्रांग होना चाहिए कि इंद्रियों के जो विषय है नजर के सामने आने से भी कभी भी किसी भी तरह का टेंपटेशन नहीं होगा। वह जो विल पावर है वह चंद गिने चुने लोगों के पास में होता है। इस जगत में ज्यादातर लोगों को यदि आध्यात्मिक जीवन में आगे बढ़ता है तो भक्ति योग को फॉलो करना होगा। भक्ति योग में है कि यह ईश्वर है। ईश्वर की यह जो नवधा भक्ति है वो इस तरह से ईश्वर की आराधना करनी है। ईश्वर के सामने शरणागत होना है। ईश्वर के सामने दीनहीन होना है। तो यहां पर देखिए कि ठाकुर भी जब इस तरह से शरणागति या साधना के दौरान इति इति मार्ग की जो बात कर रहे हैं वह क्या भक्ति योग के साथ में सिमिलर है क्या? तो नहीं वहां पर भी एक डिफरेंस है। भक्ति योग जिस तरह से बादबाद में मिस इंटरप्रिट हुआ है उसमें एक तरह की दीनता एक तरह की भय एक तरह का डर एक तरह की अंधश्रद्धा प्रवेश कर चुकी है। जबकि ठाकुर का जो इति इति मार्ग है वह जैसे कि उल्लास से भरा हुआ है। जैसे कि वह आत्मश्रद्धा से भरा हुआ है। मां और संतान मां का संतान का मां के ऊपर मां के प्रेम के ऊपर में अधिकार है। वो जो ठाकुर वो जो राम प्रसाद का वो गीत गाते हैं माए पोए मुकदमा धूम होवे राम प्रसाद बोले अर्थात कि मां यदि संतान को उसका हिस्सा नहीं देगी तो संतान कोर्ट में केस करेगा और फिर धूम मच जाएगी। तो मां के पास में से छीन करके डिमांड करके हट करके जििद करके अपना अधिकार प्राप्त करना है। वो एक उल्लास से भरा हुआ भावे हासे कांदे नाचे गाए अर्थात कि भाव में हंसेगा नाचेगा गाएगा और रोएगा। यह जो भाव रूपी उल्लास है वह उल्लास और आत्मश्रद्धा से भरपूर ठाकुर का इति इति मार्ग है। जबकि यह जो ट्रेडिशनल आपका यह जो भक्ति मार्ग है उसमें दीनता और शरणागति को ही ज्यादा एक प्राधान्य है। दूसरा कि ठाकुर का इति इति मार्ग अल्टीमेटली अद्वैत वेदांत का जो अल्टीमेट एम है कि निर्विकल्प समाधि ब्रह्म साक्षात्कार ईश्वर के साथ में एक एकाकार उसमें परिणत होता है। जबकि भक्ति योग है उसका फिलॉसोफी है द्वैत वेदांत। मां और बच्चा या तो फिर यह जो सुदामा और कृष्ण या तो महावीर हनुमान और राम इन दोनों में जितना ही परस्पर स्नेह का संबंध हो हमेशा दोनों तो सेपरेट ही रहने वाले हैं। जबकि ठाकुर का इति इति मार्ग अल्टीमेटली ब्राह्मण के भीतर में विलीन होने का जो अद्वैत वेदांत का अल्टीमेट एम है वहां तक ले जाता है। तो यह एक दूसरा डिस्टिंशन और तीसरी बात कि देखिए कि स्वामी विवेकानंद ने जब यह कर्म योग का प्रावधान किया कर्म योग का प्रवर्तन किया शिव ज्ञाने जीव सेवा की बात उन्होंने की तो ठाकुर का इति इति मार्ग के साथ में परफेक्टली वो मैच हो रहा है। यहां पर ठाकुर ने जैसे ही कह दिया कि विषय के जितने भी इंद्रियों के जितने भी विषय हैं ये विषयों के जितने भी ऑब्जेक्ट्स है उन सबके भीतर में वही ईश्वर या ब्रह्मन का साक्षात्कार करो और उनके साथ में अपना रिलेशन है उसको चेंज कर दो। काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह रूपी जो रिलेशन है इनके साथ में ठाकुर कहते हैं उनका डायरेक्शन चेंज करके उनका चेहरा घुमा करके ईश्वर की ओर दिव्यता से भर दो। मैत्री, करुणा, मुदिता, उपेक्षा वाला रिलेशन इनके साथ में बनाओ। तो नेति नेति मार्ग में जैसे कि जगत का ही त्याग करना है। ठाकुर का जो इति इति मार्ग है उसमें जगत को स्वीकार करना है। किंतु जगत के साथ में अपना रिलेशन है उसको चेंज कर देना है। सो स्वामी जी का जो कर्म योग है ठाकुर के इति इति मार्ग के साथ में कितना परफेक्टली फिट हो जा रहा है। बहुत बार हम लोग जब क्लासिकल वेदांतिक फ्रेमवर्क में ठाकुर और स्वामी जी को समझने का प्रयास करते हैं। इवन मां को भी जब ले आते हैं तो इतना सारा कंफ्यूजन खड़ा होता है। किंतु अभी यही ठाकुर का इति इति मार्ग के साथ में आप मां का बिठा दीजिए। बहुत लोग यही वही जो योगिन मां योगिन मां गंगा में स्नान करने को गई है देखा कि सोच रही है स्नान करते-करते तो ठाकुर तो इतने बड़े त्यागीश्वर थे और मां किस तरह यह राधुराधु लेकर के वो मोह में पड़ी हुई है तो ऐसा सब सोच रही थी कि मां इतनी घोर संसारी ठाकुर इतने घोर त्यागी कि मां का जो भक्तों के ऊपर में इतना स्नेह ठाकुर का भक्तों के ऊपर स्नेह था किंतु वह तो साधना में सिद्धि प्राप्त करने के बाद में मां को तो इस तरह से साधना करते हुए साधना में सिद्धि प्राप्त करके इति इति करके नीचे आते तो देखा ही नहीं है। मां इस तरह से अपने को छुपा करके ठाकुर की तो दासी हूं। उनके चरणों में मुझे स्थान मिला है। वही मेरा सद्भाग्य है। वह जो बोलती रहती है तो इन लोगों को ऐसा लगता ही नहीं था कि मां कभी साधिका के स्टेज से ऊपर उठी हो। ब्रह्म साक्षात्कार किया हो और इति इति करके जगत में वापस आई हो। ऐसा तो उनको लगता ही नहीं था। तो फिर मां किस कैटेगरी में फिट होती है? उसी समय जैसे ही ठाकुर को पता चला ठाकुर का तो वैसे महासमाधि हो चुका था। उसके बहुत सालों की बाद की बात है। ये उद्बोधन के दिनों की बात किंतु वह जहां पे भी ठाकुर रहते होंगे भक्तों के हृदय में जहां पे भी तो उनको पता चला कि योगिन मां के भीतर में संदेह प्रकट हुआ है। तो साथ-साथ में ही उन्होंने योगिन मां को एक दर्शन दिलवा दिया कि यह जो गंगा के ऊपर में से यह दर्शन नहीं था। ये तो एक्चुअली योगिन मां ने देखा कि एक स्योज जात शिशु अर्थात कि जिसका जन्म हुआ है और जन्म के साथ-साथ में ही उसका मृत्यु हुआ है। इस तरह का एक शिशु गंगा के ऊपर में बहता जा रहा है। तो जैसे ही योगिन मां ने इस तरह के शिशु को देखा साथ-साथ में ही ठाकुर ने प्रकट होकर के योगिन मां को कहा कि इस तरह के कितने ही मृत देह भले ही चाहे गंगा के ऊपर में बहते जाते हो गंगा अपने से कभी भी अपवित्र नहीं होती तो वैसे ही तुम मां को जानना भले ही चाहे जितना भी यह काली मामा ये पागली मामी ये राधु नलिनी माकू कितने पागल लोगों को लेकर के रहती हो मां को कभी भी अपवित्र मत जानना। कभी भी यह मत सोचना कि मां के भीतर में संसार ने प्रवेश किया है। तो जैसे ही योगिन मां ने यह दृश्य देखा इमीडिएटली वो उद्बोधन गई। रोती-रोती मां के चरण पकड़ लिए। कहा कि मां क्षमा करो। आपके ऊपर में मुझे संदेह प्रकट हो गया था। तो फिर मां भी उनको क्षमा करती है। तो देखिए कि स्वामी जी का कर्म योग हो कि मां का यह संसार में रहना। यह दोनों वेदांत की जो क्लासिकल फ्रेमवर्क है, उसमें फिट ही नहीं होता है। आपको फिट करना है कैसे भी करके तो आपको द्वैत वेदांत का ही सहारा लेना पड़ेगा। अद्वैत वेदांत की फ्रेमवर्क में और द्वैत में भी आपको वह सब गोलमटोल करना पड़ेगा। यहां से कुछ काटना पड़ेगा। यहां पर कॉपी पेस्ट करना पड़ेगा। यहां पे कट पेस्ट करना पड़ेगा। तब कहीं जाकर के होगा। अद्वैत वेदांत में तो फिट होता ही नहीं है। किंतु जैसे मेरा कहना है कि ठाकुर को यदि आप ठीक-ठीक पढ़ते हैं तो लगता है कि यह ठाकुर का फिलॉसोफी जो है वो अद्वैत वेदांत के साथ में फिट हो जाता है इस तरह से कि अहम ब्रह्मास्मि यह मैं और ब्राह्मण एक ही है। ब्राह्मण मेरा स्वरूप है ही है। उसमें और अद्वैत वेदांत में परफेक्ट मैचिंग है। द्वैत वेदांत या विशिष्ट अद्वैत वेदांत के साथ में इस बात का मैचिंग नहीं होता है। तो वह ठाकुर की खुद की उपलब्धि को भी आप देखिए कि उन्होंने ब्रह्म साक्षात्कार किया था। निर्विकल्प समाधि प्राप्त की थी। तो इस दृष्टि से देखें तो थ्योरेटिकल कंक्लूजन जो है उसमें आप अद्वैत वेदांत के साथ में ठाकुर का थ्योरिटिकल कंक्लूजन ऑलमोस्ट परफेक्टली फिट बैठ जाता है। बस डिफरेंस कहां पे आता है कि साधन पद्धति में जो अद्वैत वेदांत की नीति नीति साधन पद्धति है और ठाकुर की जो इति इति साधन पद्धति है उसमें डिफरेंस आता है। ये एक डिफरेंस है और ऑब्वियसली कि दूसरा जो मोर ऑब्वियस डिफरेंस यह है कि अद्वैत वेदांत वो ब्रह्म साक्षात्कार करने के बाद क्या होता है इसके बारे में बहुत ज्यादा डिस्कस नहीं करता। जबकि ठाकुर स्पष्ट रूप से कहते हैं कि इति इति करके साधक या सिद्ध फिर से जगत में आ सकता है। आएगा ऐसा कोई श्योर नहीं है। आ सकता है। आ सकता है और फिर जगत कल्याण के लिए फिर से जीवन धारण कर सकता है। वि इज इन नो वे इनफीरियर टू ब्रह्म ज्ञान। बहुत बार सोचेंगे कि इति इति करके जगत में वापस आए तो जो ब्रह्मज्ञान की स्थिति है उसमें से तो हम नीचे आ गए और ठाकुर एक्चुअली शब्द भी वही यूज करते हैं कि नेति ने इति इति करके नीचे आना या वापस आना दैट शो मतलब एटलीस्ट वाक्य रचना जिस तरह से कही गई है तो ऐसा लगता है कि सर्वोच्च ब्रह्म ज्ञान की स्थिति से तो यह एक स्टेप नीचे है। किंतु मेरा कहना है कि यदि आप ब्रह्म ज्ञान या तो फिर निर्विकल्प समाधि को हाईएस्ट गिनते हैं तो यह जो ठाकुर को ठाकुर जिसको कहते हैं यह विज्ञान जो फेज है विज्ञान फेज उसको हम अल्टीमेट गिनेंगे। यानी कि वो शायद नीचे है एक स्टेप किंतु वो है अल्टीमेट। जैसे ठाकुर खुद कहते हैं ना स रे गा मा पा धा नी तो नी रूपी जो स्वर है वो आप लंबे समय तक आप गा नहीं पाएंगे। आपका गला जो है वह डैमेज हो जाएगा। यानी कि आपको एक दो सुर नीचे आकर के ही रहना होगा। तो फिर निर्विकल्प समाधि है शायद हाईएस्ट बट यह जो विज्ञान वाला फेस जो है वही ब्राह्मण ही यह जीव जगत ईश्वर हुए हैं। वह है अल्टीमेट। तो यह है अल्टीमेटली ठाकुर का फ्रेमवर्क। क्लासिकल वेदांत कहेगा कि नेति नेति करके ब्रह्म ज्ञान प्राप्त करो। ठाकुर को आप पहली बार पढ़ेंगे तो लगेगा कि नेति नेति करके ब्राह्मण को प्राप्त करो और इति इति करके फिर जगत में आकर के आप लोक कल्याण का कार्य करो। मास्टर महाशय यहां तक पहुंचे थे। किंतु मास्टर महाशय जब स्वामी जी का कर्म योग देखा तो मास्टर महाशय डर गए कि यह तो साधना के समय नेति नेति करके ऊपर जाना है। उसमें यह शिव ज्ञान जीव सेवा कहां पर आ गया। फिर जब आप मां को देखेंगे तो और ज्यादा कंफ्यूज हो जाएंगे। कहां यह संसारियों की तरह मां रहती है। योगिन मां जैसे कंफ्यूज हो गई थी कि घोर संसारी हो गई है मां। तो जब आप स्वामी जी और मां को फिर वो इस तरह की मास्टर महाशय या तो फिर योगिन मां वाली जो ठाकुर की फ्रेमवर्क है उसमें फिट करना चाहेंगे तो फिर नहीं होगा। तो फिर आपको थर्ड एक अंडरस्टैंडिंग थर्ड फ्रेमवर्क चाहिए। ठाकुर का साधना के समय में भी इति इति मार्ग है और साधन के बाद में भी इति इति मार्ग है। साधना के समय का जो इति इति मार्ग है उसमें ऐसा नहीं है। बहुत बार भक्ति योग में देखेंगे कि वैराग्य को एक सेकेंडरी स्टेज दिया गया है। शरणागति को प्राइमरी स्टेज दिया गया है। किंतु इसीलिए बहुत बार स्वामी जी कहते हैं ना कि यह ज्ञान से अपने को भर दो। शंकर के भाव से, शिव के भाव से अपने को भर दो। अभी कुछ समय के लिए मधुर भाव है। उसको भूल जाओ। क्यों? क्योंकि भक्ति योग में भाव है, शरणागति है, श्रद्धा है, भक्ति है। उसको जो प्राधान्य मिला है, उससे एक स्टेप नीचे ही इंद्रिय संयम या ब्रह्मचर्य को प्राधान्य है। ब्रह्मचर्य एक स्टेप नीचे आता है। जबकि ठाकुर त्याग के ऊपर में किसी भी तरह का कंप्रोमाइज नहीं करते। इन दिस ठाकुर शंकर के बहुत नजदीक है। शंकराचार्य भी त्याग ही सर्वोच्च साधना है। एकदम दृढ़ रूप से पकड़ के बैठे हैं। बोलकर के ही यदि आप ठाकुर की यूनिक अंडरस्टैंडिंग को ना समझे। यदि आप ट्रेडिशनल क्लासिकल वेदांत की फ्रेमवर्क में ही जाना चाहते हैं तो फिर आप शंकराचार्य को फॉलो कीजिए। रेदर देन के किसी भी भक्ति मार्ग को। क्योंकि शंकराचार्य का ज्ञान मार्ग जो है वह वैराग्य, त्याग और ब्रह्मचर्य को सेंट्रल रूप समझता है। सेंट्रल फैक्टर समझता है आध्यात्मिक साधना में आध्यात्मिक जीवन में। जबकि भक्ति योग जो है वहां पर त्याग सेंटर नहीं है। त्याग सेकेंडरी है। शरणागति सेंटर में आती है। इस अर्थ में यदि आप ठाकुर को ना समझकर के सिर्फ वेदांत फॉलो करना चाहते हैं तो अपना ऑर्डर स्पष्ट रूप से कहता है कि हम लोग शंकराचार्य के फॉलोअर्स हैं। इस अर्थ में नहीं कि हम शंकराचार्य को संपूर्ण रूप से स्वीकार करते हैं। क्योंकि स्वीकार करेंगे तो मां और स्वामी जी कहां पर फिट बैठेंगे? तो फिर तो कहते हैं कि अभी फिलहाल के लिए मां और स्वामी जी को भूल जाओ और शंकराचार्यों को पकड़ के साधना करो। तो उस दृष्टि से हम लोग सही हैं। किंतु जैसे-जैसे आप रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य में डीप जाने का प्रयास करेंगे। मां जो यह संसार में रहती थी। स्वामी जी ने शिव ज्ञाने जीव सेवा का जो प्रवर्तन किया इन दोनों को फिर आप ऐड करना है ठाकुर की फ्रेमवर्क में। तो फिर आपको यह ठाकुर का यूनिक कंट्रीब्यूशन है इति इति एज ए साधन मार्ग उसको समझना होगा और इस साधन मार्ग में शरणागति और त्याग यह दोनों इक्वलेंस है। भक्ति योग में शरणागति काेंस पहले है त्याग मार्ग में या ज्ञान मार्ग में पहले भी हमारा डिस्कशन हुआ था कि शंकराचार्य ने सौंदर्य लहरी की रचना की है। मतलब कि शंकराचार्य में भी भक्ति तो थी। अभी वो एक दूसरा डिबेट है कि वो शंकराचार्य को ट्रेडिशनली कहा जाता है कि प्रस्थानत्रय पे भाष्य ही उनका ओरिजिनल है। बाकी का इंटरप इंटरपोलेशन है या तो फिर बाकी बाकी के जो शंकराचार्य थे मठाधीश जो थे शंकराचार्य द्वारा स्थापित मठों के मठाधीश उन्होंने उसकी रचना की है। तो जो भी है आइदर और वो सौंदर्य लहरी जैसे वह जो भक्तिमय जो स्तोत्र है वह तो वेदांतिक ट्रेडिशन में है ही है। तो किंतु समझना है कि शंकराचार्य के पाथ में ज्ञान या तो त्याग सेंटर में है। शरणागति सेकेंडरी लेवल पर है। तो देखिए यह क्लासिकल अद्वैत वेदांत ज्ञान मार्ग कहता है त्याग सेंटर है। शरणागति या भक्ति सेकंड लेवल पे है। और यह जो क्लासिकल द्वैत मार्ग है या तो फिर विशिष्ट अद्वैत मार्ग या तो भक्ति मार्ग वो कहता है भक्ति और शरणागति सेंटर में है। त्याग सेकेंडरी है। जबकि ठाकुर का है कि शरणागति और त्याग दोनों का इक्वलेंस है और दोनों सेंटर में है। बिना त्याग के शरणागति नहीं बिना शरणागति के त्याग नहीं। यह है ठाकुर का इति इति मार्ग और इसी मार्ग के भीतर में ही आप स्वामी जी का शिव ज्ञानी जीव सेवा और मां का संतानों के प्रति जो करुणा है उसको आप फिट बैठा पाएंगे। कि यह दोनों को आप ना ही प्योर भक्ति मार्ग में फिट बिठा पाएंगे ना ही प्योर ज्ञान मार्ग में। उसके लिए ठाकुर का इति इति मार्ग ही चाहिए। तो यह है ठाकुर का एक ओवरऑल फ्रेमवर्क। मेरी दृष्टि से हम सबका देखिए एक समय आता है कि जब आप प्रारंभ करते हैं रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य का स्टडी का तो आप बहुत कुछ पढ़ते रहते हैं। अच्छा वो गंभीरानंद जी क्या कहते हैं? क्या ठाकुर की फिलॉसोफी है? क्या स्वामी जी की है? रंगनाथानंद जी क्या कहते हैं? फिर तपस्यानंद जी क्या कहते हैं? यह साधु क्या कहते हैं? वो क्या कहते हैं? ऐसा हम पढ़ते हैं। किंतु फिर यदि देखिए कि आप रामकृष्ण विवेकानंद फिलॉसोफी में डीप में जाएंगे तो आप अपना एक इंडिविजुअल अपना एक पर्सनल कस्टमाइज्ड अंडरस्टैंडिंग डेवलप करेंगे ही करेंगे और वो होना ही चाहिए। रामकृष्ण विवेकानंद फिलॉसोफी जो है ठाकुर मां स्वामी जी का जो वर्ल्ड व्यू इतना वास्ट है कि कोई भी एक व्यक्ति उसको संपूर्ण रूप से समझ ही नहीं पाएगा। इस तरह का जो दावा करता है, वह आदमी मूर्ख है और उस दावे को जो सुनते हैं वह सुनने वाले भी मूर्ख है। दावा करने वाला भी और सुनने सुनने वाला भी। किंतु होना क्या चाहिए? वि एक ओपन माइंड एंड वह जो जितने भी यह डिस्क्लेमर है वह सब लगा करके बड़े ही हंबल रूप से बड़ी ही विनम्रता से अपनी अंडरस्टैंडिंग लोगों के सामने रखनी है कि यह जो 20 साल हुए मुझे रामकृष्ण संघ में और उसमें जो मैंने ठाकुर मां स्वामी जी को समझने का प्रयास किया उसमें मेरी अंडरस्टैंडिंग एज ऑफ टुडे यहां पे आई है। कल का किसको पता? तो अभी यह जो कल का जो पॉइंट था मैंने सोचा फिर से एक बार डिस्कस कर लेते हैं। आखिरी जो लाइन ठाकुर कहते हैं वायु में सुगंध और दुर्गंध दोनों होती है किंतु वायु निर्लिप्त होता है। ब्रह्म और शक्ति अभेद से आध्या शक्ति ते ही जीव जगत होए छे। ब्रह्म और शक्ति अभेद है। उसी आध्या शक्ति से ही जीव और जगत हुए। इसके बाद में नया टॉपिक स्टार्ट होता है। मुख पूछता है कि योग भ्रष्ट क्यों हुआ जाता है? क्यों हम लोग योग भ्रष्ट होते हैं? तो ठाकुर जो उत्तर देते हैं उसको अभी हम कल देखेंगे। आज तक ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु
प्रश्न: कृपया साँप और रस्सी वाले उदाहरण को फिर से समझाइए; इसे समझने में थोड़ी दिक्कत हो रही है।
अब जैसे रस्सी है। रस्सी के ऊपर में आप सांप देखते हैं तो ऐसा तो नहीं है कि सांप अलग से आया है और उसके ऊपर में लाइट फेंकने से सांप चला जाएगा। यदि सांप और रस्सी दोनों होते तो वह उस साइड वाला जो वेट ज्यादा हो जाता और यहां पर सिर्फ रस्सी होता तो उस वाला कम हो जाता। तो ऐसा नहीं है। लाइट फेंकने से सांप अदृश्य हो जाता है। बस वही तो है ना। दूसरा सांप था और फिर चला गया सिर्फ रस्सी रहा। ऐसा नहीं है। बोल करके रस्सी ही है यहां पे और यहां पे भी रस्सी है। दोनों का वेट सेम रहता है। थोड़ा मैं समझता हूं कि समझने में मुश्किल है। आप नहीं भी समझेंगे तो भी चलेगा क्योंकि यह सब चीजें क्या है पता है ना कि इंटेलेक्चुअल क्यूरियोसिटी जिसकी होती है इन लोगों के लिए है। जनरली जो भक्त होते हैं उनको तो सार वस्तु ले लेनी है। तो सार वस्तु क्या है? तो ठाकुर मां सार वस्तु तो है इंद्रिय संयम। और इंद्रिय संयम कैसे होगा? तो ऐसे तो नहीं है कि अपना कि विल पावर इतना ज्यादा है कि हम लोग विल पावर से इंद्रियों को कंट्रोल में रखेंगे। हमारे लिए जो उपाय है वो ठाकुर मां स्वामी जी की ये जो छोटी-छोटी कहानियां है उसको सुनते जाइए, सुनते जाइए और फिर वह हृदय निर्मल होता जाएगा। अपने लिए यही सार वस्तु है।
प्रश्न: आपने कहा कि शंकराचार्य के ज्ञानमार्ग में त्याग सबसे महत्त्वपूर्ण है, भक्ति-मार्ग में शरणागति सबसे महत्त्वपूर्ण है, परन्तु श्रीरामकृष्ण कहते हैं कि दोनों ही समान रूप से महत्त्वपूर्ण हैं। कृपया इसे फिर से समझाइए। और क्या स्वामीजी और माँ के जीवन में भी ज्ञान और शरणागति दोनों समान रूप से महत्त्वपूर्ण हैं?
देखिए पहले सेकंड उत्तर का मैं पहले सेकंड क्वेश्चन का उत्तर दे देता हूं। बहुत ऑब्वियस है कि ठाकुर मां स्वामी तीनों के जीवन में त्याग और भक्ति इक्वल वेट है। आप थोड़ा सा भी स्टडी करेंगे आप कह नहीं पाएंगे कि ठाकुर स्वामी जी में ज्ञान ज्यादा था, भक्ति कम था या तो फिर मां में भक्ति ज्यादा थी, ज्ञान कम था। बाहर बाहर से ऐसा दिखता है कि स्वामी जी त्यागीश्वर है। किंतु ठाकुर के प्रति जो भक्ति और कल ही जो हमने उदाहरण देखा था ना कि स्वामी जी मां को कहते हैं कि गुरु के चरण को उड़ा दूंगा तो ज्ञान खड़ा कहां रहेगा? गुरु के चरण के ऊपर में ही तो ज्ञान खड़ा रहता है। यानी कि भक्ति और ज्ञान का समन्वय जो है इक्वल वेटेज कॉम्बिनेशन ये तीनों की लाइफ में है। उसमें मुझे कोई संदेह नहीं। सो दैट इज क्लियर। और यहां जहां जैसे आपने कहा कि दोनों का इक्वलेंस ठाकुर के इति इति मार्ग में क्या है? तो देखिए कि शंकराचार्य का जो नेति नेति मार्ग है उसमें सिमिलरिटी कहां है कि यहां पे भी ठाकुर इंद्रिय संयम तो करते ही है उसमें कोई प्रश्न ही नहीं और अल्टीमेट उद्देश्य जो है आध्यात्मिक जीवन का वो है ब्रह्म ज्ञान इसमें भी कोई प्रश्न नहीं यहां पर शंकराचार्य के साथ में मेल है। मेल कहां पे नहीं है? शंकराचार्य कहते हैं कि इंद्रिय संयम करने के लिए विल पावर चाहिए। जबकि ठाकुर कहते हैं कि विल पावर तो है ही है किंतु ईश्वर की करुणा ईश्वर की कृपा के बिना 100% वो पूराएगा नहीं। तो यहां पर फिर वो उनका भक्ति के साथ में मैच हो जाता है कि शरणागति चाहिए ही चाहिए वरना आप इंद्रिय संयम 100% नहीं कर पाएंगे। सो दैट इज वन थिंग कि भक्ति के साथ में यहां पे मैल है। भक्ति के साथ में डिसिमिलरिटी कहां है कि भक्ति में अल्टीमेट ऐ है ईश्वर का दर्शन। नहीं कि ईश्वर के साथ में एक ही कृत्य। सो वो एक डिफरेंस है और दूसरा डिफरेंस है कि भक्ति में त्याग को जो संपूर्ण प्राधान्य नहीं मिला त्याग का सेकेंडरी प्राधान्य है जो कि ठाकुर वहां पे भी डिफरेंस क्रिएट करते हैं कि त्याग का इक्वलेंस है। सो भक्ति के साथ में कहां पे सिमिलरिटी है? कहां पे डिसिमिलरिटी है? ज्ञान के साथ में कहां पे सिमिलरिटी है? कहां पे डिसिमिलरिटी है। सो दैट इज हाउ ठाकुर का एक यूनिक पाथ बनता है। और ऑफ कोर्स ठाकुर का यूनिकनेस फिर आप मां और स्वामी जी को ऐड करेंगे तो और भी बहुत ज्यादा हो जाएगा। मां दिखती है कि संसार को लेकर रहती है किंतु मां के भीतर में त्याग है।
त्याग और करुणा की अद्भुत कहानी: माँ सारदा स्वच्छ पानी पीना नहीं चाहती थीं, क्योंकि उसे घर तक लाने में उनके त्यागी संतानों को बहुत परिश्रम करना पड़ता था
एक उदाहरण है मां के जो एक संतान थे परमेश्वरानंद जी किशोरी महाराज तो वो अभी क्या है कि वहां पे तो मलेरिया का बार-बार प्रकोप होता है ना जयराम बाटी में तो अभी वो पुण्य पुकुर वगैरह जो तालाब वगैरह है वहां से लोग पानी पीते हैं। अभी उसी के किनारे पे ये लोग कपड़े भी धोते हैं और उसी के किनारे पर शोज भी करते हैं। ऑब्वियसली कि तालाब का पानी कितना कलूषित हो जाएगा। अभी यही पानी सब लोग पीते हैं तो भयानक मलेरिया हो जाता है सबको माने यह वो ट्रेडिशन ही है वहां पे मां को भी मलेरिया होता है शरीर बिल्कुल टूट जाता है तो अभी ये किशोरी महाराज सोचते हैं वो वो क्या करते थे वहां दामोदर नदी में स्नान करने को जाते थे तो उन्होंने देखा कि नदी में किनारे पे यह जो रेती जो पड़ी है ना रेती को यदि आप थोड़ा सा खुदाई करेंगे तो उसमें से एकदम स्वच्छ निर्मल जल निकलता है तो उन्होंने सोचा कि मैं मां के लिए यह जल ले जाता हूं। तो एक दिन ले आए तो मां ने जैसे ही देखा तो मां नाराज होकर बोलती है कि तुमको किसने लाने को कहा यह जल ये जैसे सभी लोग ये तालाब का पानी पीते हैं मैं भी पऊंगी। तुम क्यों जल लाते हो? ऐसा करके उनको डांटा। तो किशोरी महाराज सोचते हैं कि अरे मैंने तो अच्छा काम किया। मुझे क्यों बिना मतलब की झूठमठ की डांट पड़ रही है? तो ठीक है। वह तो अभी डांट खा के चुप बैठे हैं। थोड़ी देर के बाद में देखा जिस कलसी में वो पानी लाए थे स्वच्छ निर्मल जल मां उसी पानी से ठाकुर की पूजा भी कर रही है और उसी पानी को पी भी रही है। तो महाराज ने सोचा अभी मां ऐसे तो डांट रही है। फिर पानी यूज़ भी कर रही है। अर्थात कि वो दूसरे दिन फिर से जाकर के ले आए। अब फिर से जाकर के ले आए। मां फिर से नाराज हो गई। फिर से उनको डांटा और फिर किंतु अभी किशोरी महाराज समझ गए यहां पे कुछ दाल में काला है तो वो छुप छुप करके देख रहे हैं मां फिर से ठाकुर पूजा में यूज़ करती है फिर से पीते हैं तो तीसरे दिन ले आए तो तीसरे दिन डांट सुननी पड़ी तब महाराज ने कहा मां मैं तो देखता हूं कि आप मुंह पे तो मुझे डांटती है किंतु बाद में इस पानी को पीती है माजरा क्या है बताइए मुझे सीक्रेट क्या है तो फिर मां फिर शांति से कहती है देखो बेटा तुमको इतना कष्ट करके यह पानी लाना पड़ रहा है बोल के यह कष्ट मुझसे सहन नहीं हो पाता मैं समझती हूं कि यह ताला तालाब का पानी पीने से मलेरिया होगा। किंतु मैं तुमको कष्ट नहीं देना चाहती मेरे स्वास्थ्य के लिए। तो किशोरी महाराज बोलते हैं मैं तो अक ही रह गया कि किस तरह का यह उत्तर ये देवी नहीं है तो फिर एक जननी या सामान्य स्त्री इस तरह का उत्तर दे ही नहीं सकती। सो दिस इज अपने को संपूर्ण रूप से यह कर देना। अपने को अपने को संपूर्ण रूप से बिला देना या संपूर्ण रूप से क्या कहेंगे कि सैक्रिफाइस कर देना। दिस इज सो यूनिक इन मदर।
प्रश्न: ठाकुर इतने सात्त्विक थे कि वे न तो पैसे छू सकते थे और न ही ऐसे व्यक्ति का लाया हुआ पानी पी सकते थे जिसके संस्कार अच्छे न हों। परन्तु माँ तो सात्त्विकता से भी परे हैं।
मां की एक कहानी है। यही किशोरी महाराज कहते हैं कि जय राम बाटी में एक लड़का था। बड़ा लोभी था। तो उसकी दृष्टि भी है ना थोड़ी सी अशुभ मानी जाती थी। तो यह लड़का क्या करता था? खाने का भी बड़ा यह था उसका। तो किसी का भी घर खुला होगा, किचन खुला होगा ना भीतर में जाकर खाना खा लेगा, चोरी करके खाना खाएगा। तो लोग जब भी उसको देखते थे ना उसको मार के भगा देता है। तो एक दिन की बात है कि ठाकुर को नैवेद्य ऑफर किया गया है और यह लड़का आकर के बाहर से देख रहा है नैवेद्य के सामने। तो नेचुरली अभी तो नजर गिरेगी ना। अभी ठाकुर का सिमिलर उदाहरण देखिए कि ठाकुर को बूढ़ो गोपाल वो तो अभी तो त्यागी संतान उनके जो कि भविष्य में अद्वैतानंद नाम धारण करने वाले हैं अपने संग में उन्होंने ठाकुर को खाना दिया तो खाने के ऊपर में उनकी सांस गिर गई माने थोड़ा सा ज्यादा वो उन्होंने यह कर दिया तो उनकी सांस गिरी निश्वास तो ठाकुर ने कहा अभी यह खाना मैं नहीं खा पाऊंगा तो यह ठाकुर है अभी यह कालो जो लड़का ठाकुर के नैवेद्य के सामने लोलुपता भरी दृष्टि से देख रहा है तो मां ने एक बार तो कहा कि अच्छा यह नैवेद्य अभी ठाकुर को नहीं ऑफर कर सकते। इसको हटाओ यहां से। तो उस बार तो उसको हटा दिया। दूसरे एक दिन देखा किशोरी महाराज देखते हैं कि नैवेद्य ठाकुर के लिए रखा है। अभी तो ऑफर भी नहीं हुआ और यही कालो बोलकर के लड़का उसके सामने लोलुपता भरी दृष्टि से देख रहा है। मां ने उसको देखा तो नैवेद्य में से फल निकाल करके उसको खिला रही है। अभी वो नैवेद्य को तो ठाकुर को ऑफर करना बाकी है। तो किशोरी महाराज इतने आश्चर्यचकित हो गए। दौड़े-दौड़े आए। मां ये आप क्या कर रही है? ठाकुर को तो नैवेद्य ऑफर ही नहीं किया। क्या दूसरा बनाना है क्या? अब पहले से बोल दीजिए वरना तो पूजा का टाइम खत्म हो जाएगा। मां बोलती है नहीं नहीं दूसरा बनाने की जरूरत नहीं है। तो फिर पूछता है अरे तू मां आप इसको क्यों खिला रही है? मां बोलती है इसके भीतर में तो ठाकुर है ना। तो [हंसी] किशोरी महाराज बोलते हैं मैं उसका क्या उत्तर दूं?
प्रश्न: 'इति इति' मार्ग के बारे में और बताइये
इति इति एज ए साधन मार्ग और इति इति एज ए कि साधना के मतलब सिद्धि के बाद का मार्ग दोनों तरह से इति इति यानी वो कंफ्यूजन ना हो जाए बोलने के मतलब डिस्कस करने के समय माने कि यहां पे शंकराचार्य है शंकराचार्य का अंडरस्टैंडिंग है कि नेति नेति और निर्विकल्प समाधि इसके सेकंड स्टेज पे आएंगे तो मास्टर महाशय ने जो समझा कि नेति नेति करके सिद्धि प्राप्त करनी है किंतु फिर इति इति करके जगत जगत में आना है और फिर वो ठाकुर का वही उदाहरण कि आप वो काली मंदिर में गए तो आप भिखारियों को भिक्षा देंगे ना कि कैसे भी धक्कामुक्की करके मां काली को आप पहले प्रणाम देंगे करेंगे फिर बाहर आकर के जितना भिक्षा देना चाहो दो तो नेति नेति ईश्वर प्राप्ति ब्रह्म साक्षात्कार इति यह मास्टर महाशय का अंडरस्टैंडिंग है किंतु जब स्वामी जी जब आ गए गेम में तब बेचारे मास्टर महाशय कंफ्यूज हो गए यह कहां पे फिट नहीं होता है [हंसी]
प्रश्न: हम लोगों की सेवा दो तरह से कर सकते हैं—निर्विकल्प समाधि से पहले इसे साधना के रूप में, और निर्विकल्प समाधि के बाद स्वाभाविक जीवन के रूप में। अब यह बताइए कि जिस व्यक्ति को हमारी सेवा मिलती है, क्या उसके लिए हमारे भीतर की भावना कोई महत्त्व रखती है?
सामने रेसिपिएंट है ही नहीं ना। यहां पे ठाकुर शंकराचार्य को फॉलो करते हैं कि विश्वम दर्पण दृश्यमान नगरी तुल्यम। जो ऑब्जेक्ट्स दिखते हैं हमको वो तो सिर्फ अपनी कॉन्शियसनेस रूपी मिरर में सब वो जो भ्रम रूपी जो है वही है। नथिंग मोर देन दैट। है तो सब्जेक्ट ही। यही सब्जेक्ट अज्ञान रूपी पर्दे की वजह से हमको विभिन्न विभिन्न दिखते हैं। यानी कि मां अपने बच्चे को स्वार्थ से खाना खिलाती हो ना कि निस्वार्थ से खाना खिलाती हो। एक्चुअली खाना अपने को ही खिलाती है। सो इन दैट सेंस अब जैसे कहा ना कि वो वही फेमस कि ईश्वरी के लिए तो सब लीला है। तो वो ब्राह्म समाज वाला कहता है उनके लिए लीला है। हमारा तो यह जान निकली जा रही है। उसका क्या? तो ठाकुर बोलते हैं कि तुम सोच करके देखो कि है क्या? जीव जगत जो कुछ भी देखते हो अलग तो कुछ है ही नहीं वही ईश्वर ही यह जीव जगत हुए हैं। यह सब्जेक्ट ऑब्जेक्ट रूपी जो डवालिटी है ये तो पूरा अपना यह भ्रम है। है तो सिर्फ सब्जेक्ट ही सब्जेक्ट ठाकुर कहते हैं ना कि कभी-कभी सोचता हूं तुम्ही तुम और आमी आमी। और तुम्ही तुम और आमी आमी। और कभी-कभी होता है कि तुम ही तुम तुम्ही तुम ही होए जाए। आमी कोथामी खोजते हो पाई ना। यानी मैं अपने को तो खोज ही नहीं पाता हूं। सिर्फ तुम ही तुम हो जाता है। तो यह तुम बोलकर के तो एक्चुअली है ही नहीं। मतलब आमी बोल के कुछ है ही नहीं। जो है वो ईश्वर ही है। यदि आप भक्ति मार्ग को फॉलो करते हैं और अद्वैत मार्ग को फॉलो करेंगे तो कहेंगे तुम बोल के कुछ है ही नहीं। मैं ही मैं हूं। बस वही है कि स्मॉल मैं नहीं बड़ा मैं हूं। सो सब्जेक्ट ऑब्जेक्ट डलिटी के रिलेटेड जितने भी क्वेश्चन है दोज़ क्वेश्चंस आर इररिलेवेंट। क्या मैटर क्या करता है? ऑब्जेक्ट के साथ में अपना रिलेशन क्या है? वह हमको मैटर करता है। नहीं कि ऑब्जेक्ट इटसेल्फ बिकॉज़ इट इज़ इरिलेवेंट बिकॉज़ इट इज़ इरिलेवेंट। हमको ऑब्जेक्ट के साथ में जो रिलेशन है उसके बारे में सोचना है। मां का अमजद के साथ जो रिलेशन था उसको देखना है। हां, अब स्वामी जी स्पष्ट कहते हैं कि यह जगत है कुत्ते की पूंछ की तरह। जितना भी सीधा करते रहेंगे वह टेढ़ा का टेढ़ा ही रहेगा। तो फिर प्रश्न होगा हम कर्म योग करेंगे ही क्यों? हां, कर्म करना है संस्कार शुद्धि
प्रश्न: माँ ने पागल राधू के साथ रहकर हमें सहनशीलता का पाठ पढ़ाया। वेदान्त के अनुसार लीला केवल हमें मूल्य सिखाने के लिए होती है। पर क्या यह पूछना उचित है कि माँ के प्रेम से स्वयं राधू ने क्या पाया?
के लिए। ना इट इज अ रिलेवेंट क्वेश्चन एंड इट कैन बी आंसर्ड कैटेगरीली माने एग्जजेक्टली जो प्रश्न आपने किया है ना उसका जैसे कि उत्तर के रूप में ही एक घटना है अ राधु का लड़का जो कि अब पता ही है कि राधु खुद तो पागल है। अब राधु खुद उसकी मां जब पागल थी बोलकर के छोटी जो राधु थी बच्ची राधु बेबी राधु उसको जो कष्ट हो रहा है बोलकर के मां का हृदय जो है इतना द्रवित हो गया कि राधु को जैसे कि अपनी खुद की बच्ची के रूप में मां ने ले लिया। अभी एग्जैक्टली सेम कहानी राधु के बच्चे के साथ में भी रिपीट होती है। उसका जो लड़का था वह जब शिशु था और राधु जिस तरह का पागलपन करती थी मां ने उसके शिशु को भी अपने शिशु के रूप में अपनाया। अभी उस बालक को उस लड़के को मां गोपाल की तरह ही बाल गोपाल की तरह ही सजाती थी। उसी की तरह उसको खिलाती थी और उसी की तरह उसको स्नेह करती थी। तो अभी मां के एक त्यागी संतान लिखते हैं कि ऐसा लगता था कि यह बिल्कुल बाल गोपाल है। उस तरह के दिव्य आभा उसके अंदर में दिखती थी। और सही में लगता था कि उसके भीतर में दैवी गुण है। किंतु जिस दिन मां का मां की महासमाधि हुई और उसके बाद में बच्चा और मां यह जो उसके साथ में मां का संबंध जो टूटा उसके बाद में इस बच्चे के भीतर में विकृतियां खड़ी होने लगी। उसके भीतर में यह लोभ है खाने के प्रति जो लालसा है वह सब दिखने लगी और उसके अंग प्रत्यंग विकृत होने लगे। उसको देखने से पता नहीं हम समझ भी नहीं पाएंगे कि वही है लड़का जिसको कि हम बाल गोपाल के रूप में देखते थे। मां का स्नेह प्राप्त करके तो मां का स्नेह हटा दिया तो पूरा उसके भीतर में विकृति आ गई। सो दिस इज एकदम स्मॉल स्केल पे स्पष्ट रूप से दिखता है। काली मामा राधु की ट्रेजजेक्टरी 20 ईयर 30 ईयर 40 इयर्स की है। किंतु यह वििन अ शॉर्ट स्पान ऑफ वन ईयर हमको स्पष्ट रूप से दिखता है कि मां का स्नेह प्राप्त करके बाल गोपाल था। स्नेह चला गया तो उसमें विकृतियां आने लगी। सो ऑब्वियसली कि जिसको आप स्नेह करेंगे उसके भीतर में तो चेंज तो आएंगे ही। राइट? प्रश्न यह नहीं है कि उनमें चेंज नहीं आते हैं या आते हैं तो क्यों आते हैं? क्या आते हैं? साधना की दृष्टि से वो इररिलवेंट है। अभी आप रामकृष्ण मिशन की कार्यप्रणाली को देखिए। इतने सारे स्कूल चल रहे हैं, हॉस्पिटल चल रहे हैं। हम कहेंगे कि जो लोग इसमें बेनिफिशरी है उनको क्या बेनिफिट हो रहा है? दैट इज इररेिलेवेंट फॉर अस फ्रॉम द पॉइंट ऑफ व्यू ऑफ़ साधना। वो ठीक है। किंतु जो लोग बेनिफिशियरी है उनके जीवन में तो लाइफस्टाइल इंप्रूवमेंट तो हुआ ना। आरोग्य प्राप्त हुआ या एजुकेशन प्राप्त हुआ उनके जीवन में तो इंप्रूवमेंट हुआ। तो वह किंतु पुण्य कहा जाएगा। व्हिच इज डिफरेंट। संस्कार शुद्धि अलग है, पुण्य अलग है। पुण्य हमको तो पाप और पुण्य दोनों से परे जाना है। सो दैट इज अ डिफरेंट एक फैक्टर खड़ा हो जाता है। और यहां पे एक डिफरेंट फैक्टर है कि संस्कार शुद्धि करनी है जिससे कि हमको ब्रह्म ज्ञान हो। वहां पे है कि पुण्य मिला तो स्वर्ग में जाएंगे। किंतु वो तो पता है क्षण पुण्य मृत्यलोके विषती पुण्य खत्म हो जाएगा। फिर से मृत्यलोक में आ जाना है। सो वो एक अकाउंट अलग चलता है। यह अकाउंट अलग चलता है।
सेवा का उद्देश्य चित्त को शुद्ध करना है—पुण्य कमाना नहीं
जैसे जिसको यदुमलिक को ठाकुर ने यह कहानी कही थी ना कि तुम पहले जो भिक्षा भिखारी को भिक्षा दे रहे हो उसके उसकी जगह पे तुम भीतर में जाके पहले मां काली दर्शन करो। बाहर में आकर जितनी भिक्षा देना है दो। यह उदाहरण जो है ऐसा लगता है कि यह शंकराचार्य के बहुत नजदीक जाता है। नेति नेति और फिर इति इति किंतु इस उदाहरण को आप थोड़ा सा और डिटेल में देखिए। यदि आप पहले आप उसको भिक्षा देते हैं ना आप पुण्य अर्जन करते हैं। यह पुण्य अर्जन जो होता है एक्चुअली ब्रह्म ज्ञान में बाधा हो करके आएगा। ठाकुर कहते हैं पुण्य अर्जन मत करो। किंतु ठाकुर यह तो नहीं कहते कि तुम लोग चित्त निर्मल मत करो जो कि स्वामी जी एक ऐड ऑन करते हैं। सो स्वामी जी जो लाते हैं वह चित्त निर्मल की बात है। यानी कि आप भीतर में जाने के पहले भी आप भिक्षा दीजिए। बाहर में आने के बाद में भी भिक्षा दीजिए। पर किंतु भीतर में जाने के समय आप उसको यह मत देखिए कि मैं उसके ऊपर में दया कर रहा हूं। जिससे कि आपका पुण्य अर्जन नहीं होगा। और जब बाहर आकर भिक्षा देंगे ऑलरेडी ब्रह्म ज्ञान हो चुका है। अभी पाप पुण्य के परे चले गए हैं तो आप भिक्षा देंगे तो भी तो आपको पुण्य नहीं लगने वाला है। सो दिस इज द डिफरेंस। वहां यदुमलिक वाले मॉडल में आप उसके ऊपर में दया करके भिक्षा दे रहे हैं। यानी कि पुण्य अर्जन होता है। वह ठाकुर करने को मना कर रहा है। नहीं कि चित्त शुद्धि मत करो। ऐसा कह रहा है।
प्रश्न: ठाकुर यदु मलिक से कहते थे—पहले माँ काली का दर्शन करो, उसके बाद भिखारियों को भिक्षा देना। लेकिन स्वामीजी से उन्होंने कहा कि निर्विकल्प समाधि में बने रहना केवल स्वार्थ है; तुम्हें तो वटवृक्ष बनना है, लोगों को छाया देने के लिए।
वो पुण्य कमाना चाहता था। स्वामी जी ब्रह्म ज्ञान चाहते थे। यदि उसका अहंकार नहीं भी बढ़ाएगा तब भी तो पुण्य तो ब्रह्मज्ञान में बाधा है ना। स्वामी जी ठाकुर कहा है कि नथिंग लेस देन ब्रह्मज्ञान वो छोटी-मोटी बातें ही नहीं करनी है। [हंसी] स्वर्ग में जाना उद्देश्य नहीं है। स्वामी जी यह बात है ना अमेरिका में बड़ा स्पष्ट रूप से कहते हैं। एक जगह पे अब स्वामी जी का वो जो टैलेंट है ना वायरल ट्रेंड खड़ा करने का तो एक जगह पर जाकर बॉम्ब शेल फेंकते हैं। गोइंग टू हेवन इज नॉट आवर ऑब्जेक्टिव। तो एकदम धमा मतलब धमाल मच जाती है। क्रिश्चियनिटी पूरा बना है गोइंग टू हेवन। और ये कहते हैं कि गोइंग टू हेवन इज नॉट आवर ऑब्जेक्टिव। म शैतानिज्म सिखा रहा है कि क्या शैतान की उपासना सिखा रहा है ना क्या? मतलब स्वामी जी में वो टैलेंट थी कि वो देखते हैं कि वो जैसा आपने कहा ना कि पल्स पकड़ के पॉपुलर हो जाना। स्वामी जी वाज़ लाइक दैट। पता चला कि लोगों को स्वर्ग में जाना है। तो ऐसा बम शेल फेंक दिया कि स्वर्ग में जाना उद्देश्य नहीं है। बट उद्देश्य है क्या? ब्रह्म ज्ञान प्राप्त करना। स्वर्ग में जाने के जितने भी रास्ते हैं, वह सब एक्चुअली ब्रह्म ज्ञान में बाधा रूप है। बोल के हमको अनाचार में नहीं जाना है। दैट इज अगेन आपको एक सामने काउंटर पॉइंट खड़ा करना है कि स्वर्ग में जाना हमने एक बनाया है इसलिए क्योंकि लोग अनाचारी थे, दुराचारी थे, दुष्ट थे। बदमाश थे। तो बदमाशी दुष्टता में से उनको अच्छे रास्ते पर लाना है। बोल के स्वर्ग का प्रलोभन दिया, पुण्य का प्रलोभन दिया। हमको उससे परे जाना है। सो भारत का जो एक हमेशा एक प्रॉब्लम क्या हुआ है ना स्वामी जी खुद यह बात कहते हैं कि हाईएस्ट ऑफ फिलॉसोफी कि हमने चलो स्वर्ग को भी त्याग करके ब्रह्म ज्ञान को प्राप्त करने का सोचा। तो 99% उनको समझ में नहीं आता कि यह स्वर्ग से परे जाना है। वे लोग इसको लाइसेंस के रूप में लेकर के फिर से वही दुष्टता में चले जाते हैं। जिस दुष्टता से निकालने के लिए पहले तो यह भक्ति मार्ग और यह जो ट्रेडिशनल द्वैत वेदांत बना है कि अच्छे मार्ग का अच्छे कर्म बुरे मार्ग बुरे कर्म का बुरा फल यह जो ट्रेडिशनली जो बना है वो उस कंस्ट्रेंट से लोगों को हटा दिया और सीधा अद्वैत वेदांत में ले गए। अभी मैंने सर्वप्रियनंद जी का वो एक मांडूक्य उपनिषद पे लेक्चर सुन रहा था। वो महाराज बोल रहे हैं ट्रेनिंग सेंटर में एक बड़े ही वो महाराज अपने खुद के ट्रेनिंग सेंटर के दिनों की बात कर रहे हैं। सर्वप्रियनंद जी कहते हैं एक बड़े सीनियर महाराज आए तो महाराज ने पूछा कि आप लोग क्या सिखाते हैं ब्रह्मचारियों को? तो उत्तर मिला कि मांडूक्य उपनिषद तो ये महाराज कहते हैं अरे ये लोग तो नास्तिक हो जाएंगे। यह सब क्या सिखाते हो? [हंसी] देखिए कि महाराज अपनी दृष्टि से ठीक है कि अच्छे कर्म का अच्छा कर्म बुरे कर्म का बुरा फल। सो ये तो आपको पक्का रखना है वरना तो दुराचार में चले जाएंगे। मांडूक्य उपनिषद कहता है कि अच्छे बुरे कर्म का यह जो घात प्रत्याघात है उससे परे ब्रह्म ज्ञान है। दैट इज द अल्टीमेट एम ऑफ ह्यूमन लाइफ। सो ठाकुर जब बहुत बार कहते हैं कि वह पुण्य की दृष्टि से कहते हैं किंतु बाद में स्वामी जी सीधा ब्रह्म ज्ञान को लेकर आ जाते हैं।
प्रश्न: चैतन्य महाप्रभु पहले तो कहते हैं—“मगुर मछली का रस और युवती का आँचल -- बोल हरि बोल।” लेकिन इसी के साथ जब हरिदास एक स्त्री-भक्त से बातचीत करते हैं, तो महाप्रभु उन्हें त्याग देते हैं।
स्त्री के साथ में वार्तालाप किया तो उनको जाने को कह दिया। ऑडियंस वास डिफरेंस, पर्पस वाज़ डिफरेंट। यहां पे कैसे भी करके उनको हरि मार्ग में ले आना है। किंतु हरि मार्ग में आ जाने के बाद में उसको त्याग कर देना है। जैसे कि आप एक बेट होता है। बेट से आप मछली को पकड़ते हैं। किंतु फिर जब मछली को लेके आते हैं तो बेट तो भीतर में रहता है। खाने के समय, पकाने के समय। उस समय तो बेट निकाल देना है तो वह क्या है प्रलोभन है माुर माछेर झोल जुबती मेयर कोल अर्थात कि मागुर रूपी मछली का जूस और युवती में का वो अंग तो ये प्रलोभन देकर के ले तो आ गए किंतु अभी प्रलोभन ले लाए तो बेट जो है प्रलोभन उसको हटा देना है अभी वो नहीं चलेगा [हंसी] इसीलिए हमको फ्रेमवर्क डेवलप करना है एक बार एक फ्रेमवर्क डेवलप हो जाता है ना तो आप जितने भी उदाहरण उस फ्रेमवर्क में डाल के आप समझ सकते हैं कि हां इसका यह है। इसका यह है। नेक्स्ट क्लास में और होगा। नेक्स्ट क्लास में और होगा। गोल घूमर कर यही तो करना है ना। रज्जु का सर्प और सर्प का रज्जु यही तो करना है। और क्या करना है? [हंसी] नहीं। ऐसा नहीं। जो चैतन्य महाप्रभु कहना चाहते हैं कि हरि नाम करने से जो आनंद आएगा ना वो आनंद इस तरह के आनंद के समकक्ष है या तो उससे भी बड़ा है। ठाकुर क्या कहते हैं कि देखिए ईश्वर प्राप्ति अब जैसे ठाकुर कहते हैं ना छोटी बच्ची है वह गुड़िया के साथ में खेलती है। किंतु जब उसका पति आया तो वह गुड़िया को भूल जाती है। तो क्या है? पहले तो उसको वह गुड़िया का आनंद आता है। किंतु जब पति आएगा तो गुड़िया का आनंद भूल जाएगी। सो पहले मागुर माच का झोल और युवती मेय का खोल हरि नाम बोलने से इतना आनंद आएगा जैसे आप हरि नाम लेना शुरू कर देंगे यह तो टेंप्टेशन था ना लोगों को यहां पर लाने के लिए जैसे हरि नाम लेना शुरू कर देंगे पता चलेगा कि उसका आनंद इन दोनों आनंद से कहां ज्यादा है। राम