Transcript
ओम स्थापा का यॉट धर्म स्वरूप ने अवतार वरिष्ठ आओ रामकृष्ण यत नमः तो आज हम फिर से कथामृत से आरंभ करते हैं बीच-बीच में जैसे हम टॉपिक चेंज करते हैं जैसे की हमको सब कुछ अपूर्वा स्वामी और डायरेक्टर किया था तब विद्यासागर ईश्वर चंद्र विद्यासागर के बड़े में पड़ा था और हम लोग हिंदी कथामृत में से पढ़ रहे थे इस बार हम बंगाली से स्टार्ट करेंगे तो वह भी सुनने को हो जाएगी जैसे की संस्कृत के जो मंत्र है उपनिषद के शास्त्र के गीता के तो किस तरह से हम पहले संस्कृत में मेट्रो का पाठ करते हैं बाद में हम उसकी व्याख्या करते हैं तो वैसे ही यहां पर पहले हम बंगाली ओरिजिनल बंगाली जो की ठाकुर के खुद के शब्द है उसको पढ़ेंगे बाद में उसके बड़े में चर्चा करेंगे है तो मास्टर महाशय ने लिखा है चैप्टर का नाम है अध्याय का नाम है ठाकुर श्री रामकृष्ण दक्षिणेश्वर नरेंद्र आदि अंतरंग और अन्न भक्तों सॉन्ग ठाकुर श्री रामकृष्ण दक्षिणी स्वर में नरेंद्र और अन्य अंतरंग भक्तों के साथ अब नरेंद्र कौन नरेंद्र थे स्वामी विवेकानंद उनके बड़े में हमको पता है तो चतुर्थ परीक्षित चौथ परीक्षित आज ठाकुर श्री रामकृष्ण महानंद जैन आज श्री राम कृष्णा महानंद में है दक्षिणेश्वर आरो का एकटी अंर्तरंगों अच्छे और भी कुछ अंतरंग है यहां पर अंतरंग अर्थात की वो भक्ति जो की ठाकुर के साथ में नियमित आते थे उसमें सन्यासी भी शामिल है और गृहस्ती भी शामिल है ठाकुर ने ऐसा नहीं की जो अंतरंग है वो सिर्फ सन्यासी या तो सिर्फ त्यागी लड़के किंतु मास्टर महाशय है बलराम बाबू है यह रामचंद्र डेट है यह लोग भी ठाकुर के अंतर्गत है तो यहां पे लिखा है की साथ में कुछ और भी अंतरंग भूपत है तो यहां पे इसका अर्थ है की मास्टर महाशय स्वयं वहां पर बैठे हुए हैं हालांकि हमको पता है की उन्होंने लिखा है तो वहां पर उपस्थित होंगे ही होंगे किंतु फिर भी एक बात जो हमने नोट की है तथा मृतक पढ़ने पढ़ने की मास्टर महाशय कहानी पे भी अपने नाम का उल्लेख नहीं करते प्रथम दर्शन द्वितीय दर्शन तृतीय दर्शन वह एक उनका थोड़ा एक पर्सनल था की हमको बताया की किस तरह से उनका मां के परिवर्तन हुआ एक भक्ति की जर्नी होती है एक देवोते की किस तरह से वो संशय से उसे श्रद्धा की और जाता है तो वो झरने दिखाने के लिए मास्टर महाशय ने प्रथम तीन दर्शन में अपना नाम लिख करके ठाकुर को अपने जी तरह से मैं खुद ठाकुर को पूछ रहा हूं ठाकुर मेरे संदेह का समाधान कर रहे हैं इस तरह से वह प्रथम तीन दर्शन में देखा है इसके बाद में जब भी हम देखेंगे मास्टर महाशय कहेंगे अपने को चिन्हित करेंगे या तो मनी या तो मोहिनी मोहन या तो सिर्फ एक भक्ति ऐसा का के अपने को चिन्हित करेंगे अपना खुद का नाम कभी नहीं लेंगे तो हमको तो पता है हालांकि की ये सब मास्टर मंशा की ही लीला है वही स्वयं उपस्थित है बहुत साड़ी जगह पे बहुत सारे प्रश्न वो भी करते हैं किंतु फिर भी यह हमको देखना है की श्रद्धा या तो फिर भक्ति जो है वो किस तरह से वो आत्मा समर्पण के लिए हमको प्रेरित करती है बहुत सारे लोग हैं की जैसे की प्लेटो और सोक्रेट्स के बड़े में स्वामी जी ने कहा है की प्लेटो सोक्रेट्स का नाम लेकर के अपनी ही फिलासफी बहुत सर समय चला देता है बहुत सारे समय जब हम किसी सीनरी साधु की स्मृति कथा कहते हैं या तो किसी प्रसंग का वर्णन करते हैं तो बहुत सर समय हम यही बताते रहते हैं की उसे प्रसंग में उसे घटना में मैंने क्या किया मैंने घटना का इंर्पोटेंस कितना नहीं है की मैंने उसे घटना में संलग्न हो करके मैंने क्या किया उसे बात का हमारे लिए इंपॉर्टेंट हो जाता है तो वो अपने में को अपने हम को संपूर्ण रूप से तिलांजलि देना संपूर्ण रूप से त्याग करना वो हमको सीखना है मास्टर महाशय नरेंद्र ठाकुर बड़ी टिशिया स्नान कोरिया प्रसाद परिया में दक्षिणेश्वर ठाकुरवादी में काली घर में आकर के स्नान किया है और प्रसाद पाया है आज 31 से अश्विन शुक्ला चतुर्दशी तिथि आज 31 अश्विन चतुर थी शुक्ला थी 16 अक्टूबर 1882 सोमवार अक्टूबर 1882 सोमवार तिथि थे श्री दुर्गा पूजा अगले ब्रशपतिवार को अगले गुरुवार को सप्तमी तिथि है उसे दिन दुर्गा पूजा हनी है ठाकुर श्री राम कृष्णा कांच ने राखल रामलाल और हाजरा अक्षय ठाकुर के साथ में राखल रामलाल और हजल हाजरा रहते हैं अभी रखा हमको पता है स्वामी ब्रह्मानंद ठाकुर के मानस पुत्र और त्यागी संता जो की बाद में रामकृष्ण संघ के प्रेसिडेंट हुए प्रथम प्रेसिडेंट हुए रामलाल पता है ठाकुर का भतीजा ठाकुर के भाई का लड़का और हाजरा हाजरा ठाकुर के गांव के पास में कुकर के पास में कहानी पर राहत था उसके घर पर उसके सर पे देना था पैसा लिया था उसने उधर कभी उधर रुपया चुकाना है तो अभी गांव में तो कोई आई का साधन नहीं है क्या करेगा तो फिर यहां दक्षिणेश्वर आकर के ठाकुर के पास में राहत था ठाकुर के कमरे के सामने बैठता था पितांभरी लगाकर के सर पे तिलक करके गले में माला लेकर और माला जला करके और एक हद से वह जाप करता राहत था माला का और आंख नाक बैंड है दूसरी आंख खुलकर देखा राहत था की कौन आता है कौन जाता है और यदि कोई धनी व्यक्ति ए जाए सामने नजदीक जाए तो फिर उसको उपदेश देना आरंभ कर देगा इस आशा से की वो धनी व्यक्ति प्रभावित होकर के हाजरा को कुछ पैसा दे दे तो उसका जो देना है उसका जो सुधा है उसके सर पे री और री चुटकी हो जाएगा तो ये लोग ठाकुर के साथ में रहते थे आज मास्टरों आज मास्टर महाशय भी आए हैं अपने बड़े में बोला ये बहुत बड़ी बात है नरेंद्र ठाकुर के पास में ही बैठ करके आहार ग्रहण किया बोली लेने आहार के बाद में ठाकुर ने कहा की कमरे के फर्श के ऊपर में बिछाना लगा दो नरेंद्र आदि भकतीरा विशेषतः नरेंद्र विश्राम करीबन नरेंद्र और अन्य लड़के और खास करके नरेन विश्राम करेगा देखिए यह बार-बार नरेंद्र को इतना जो प्रधान नियम मिल रहा है लीला प्रसंग में शारदानंद जी जिनका नाम था शरद पूर्व आश्रम का नाम शरत महाराज रामकृष्ण संग के सर्वप्रथम जनरल सेक्रेटरी स्वामी विवेकानंद के गुरु भाई ठाकुर के पास आते थे तो देखते थे की ठाकुर जी तरह से नरेन को लेकर के पागल हो जाते हैं नरेंद्र करते रहते हैं और बाकी सब लोग वहां पर है की नहीं वही भूल जाते हैं तो अभी हमको तो पता है ना आजकल हम लोग सोचते हैं इक्वल अपॉर्चुनिटी इक्वल इक्वलिटी ये सब सबको इक्वल ट्रीटमेंट मिलनी चाहिए ये सब मॉडर्न इतिहास जो है तो वो शरद महाराज कभी-कभी सोचते थे की ठाकुर हमको इस तरह से इग्नोर करते हैं नरेन को इतना इंर्पोटेंस देते हैं क्या बात है भाई ऐसा क्यों करते हैं यह पर्सनल लोगों के मां में आता था किंतु नरेंद्र जी तरह से अपना अपने शरीर का खून का प्रत्येक प्रत्येक बिंदु अपने खून का भा करके ठाकुर के सॉन्ग की यह न्यूड डाली यह देख करके हमको लगता है की ठाकुर ने नरेंद्र को जी तरह से वह प्रेम करते थे वह उसके साथ उसके सामने लाख गुना करके नरेंद्र ठाकुर को यह सॉन्ग ठाकुर की ही कृपा से नारायण ने सब कम किया है किंतु वह भुगतना तो नरेंद्र को ही पड़ा था स्वामी विवेकानंद बन करके वह 39 39 साल की उम्र में बेचारे का देहांत हो गया एक क्षण उनको शांति नहीं मिली सब समय घूमते राहत है घूमते रहते हैं एक शहर से दूसरे शहर एक गांव से दूसरे गांव इस जंगल से उसे जंगल कहां-कहां घूमे हैं जो सामने आया देखा की वो अधिकृत पत्र है उसको पकड़ करके उसको वेदांत सिखाया है भारत में विदेश में स्वामी जी ने जो किया उसके बड़े में बहुत सर विवरण हमको मिलता है क्योंकि स्वामी जी के जो शिष्य थे तो वो क्या विदेश की प्रथम के अनुसार बहुत लोगों ने स्वामी जी के बड़े में लिखकर के रखा है तो स्मृति कथाएं बहुत साड़ी हमारे पास में अवेलेबल है और स्वामी जी जब अमेरिका से भारत लौटे तब तो जग विख्यात स्वामी विवेकानंद हो चुके थे अमेरिका ब्रिटेन में उनके कितने भी मल्टीपल थे शिष्य थे अनुयाई थे मित्र थे तो जब भारत में लौटे विश्वविद्यालय होकर के शिकागो पार्लियामेंट ऑफ रिलिजन में अमेरिकन बहनों और भाइयों यह वाला भाषण देकर के तब तो पूरे भारत में हलचल मैच गए राजा महाराजा कॉलेज के लड़के कितने भक्ति लोग स्वामी जी को मिलने को ए रहे हैं स्वामी जी के बड़े में लिख रहे हैं किंतु स्वामी जी के जीवन का वो फेस वो तबक का जब स्वामी जी ने वराह नगर मत छोड़ कर के पूरे भारत में ब्राह्मण किया था वराह नगर से उत्तर भारत उत्तर भारत से हिमालय हिमालय से दिल्ली दिल्ली से राजस्थान से गुजरात गुजरात से महाराष्ट्र महाराष्ट्र से आज का केरल उसे समय का रावण को और बाद में कन्याकुमारी फिर यहां मद्रास फिर हैदराबाद फिर मद्रास फिर वहां से मुंबई फिर वहां से लिमडी राजपूताना यानी की राजस्थान और फिर वहां से मुंबई जाकर उन्होंने अमेरिका गए थे तो ये पूरा जो फैज है स्वामी जी के जीवन का वो संवेग बिटवीन 89 तू 1893 19 1890 से लेकर के 1893 तक का ये जो ऑलमोस्ट 2 साल का ये जो पीरियड है स्वामी जी के जीवन का प्रति या जी समय उन्होंने की वो उन्होंने कितना सब किया है जिसका की बहुत ही अल्प वर्णन हमारे पास में है देखिए स्वामी जी के जीवन का सही सही वर्णन हम पढ़ेंगे तो मैंने स्वामी जी के क्रोनोलॉजी कंपिल किया है तो मैंने देखा है जबकि हमारे पास प्रॉपर रिकॉर्ड होते हैं तो एक दिन में स्वामी जी ना की तीन-चार लेटर लिख देते हैं दो-तीन प्रवचन दे देते हैं दो-तीन इंटरव्यू दे देते हैं भक्तों का रिमिनेशंस होता है एक दिन का रिकॉर्ड तकरीबन 3 से 40 50 60 पेज तक जाएगा एक-एक दिन में उनका इतना स्पिरिचुअल आउटपुट है तो सोच की दो साल में हमारे पास में सिर्फ ऊपर ऊपर से संक्षिप्त एक आउटलाइन मंत्र अवेलेबल है की हां चलो लिंड में गए वहां तांत्रिक लोगों ने उनको बंदी बनाकर के रखा था कैसे भी करके वहां से बैक के निकाल गए ठाकुर साहब के वो पैलेस में गए उनके साथ में थोड़ा बहुत बात किया फिर वहां से नेकी भगवान वहां से फिर ये पोरबंदर वगैरा जो भी उनका जो जर्नी है वो ऊपर ऊपर से पता चला है की आज यहां गए आज वहां गए किंतु वहां से उन्होंने कितने लोगों के साथ कितना डिस्कस किया होगा एक-एक दिन का 30 से 40 पेज का मटेरियल जो की बाद में हमको अवेलेबल है 1895 1896 897 यह सब समय का वह शुरू के दोनों में 2 साल हमने मिस कर दिए हैं 365 दिन 2 साल के ऑलमोस्ट 600 डेज प्रत्येक दिन का 50 पेज का मटेरियल ठीक करें तो 650 ऑलमोस्ट 3000 पेज का मटेरियल हमने मिस किया है और सोचिए की स्वामी जी का कंप्लीट वर्क पूरा है 5000 होगा तो हम लोग कितना कुछ स्वामी जो है उनके हृदय में से ये जो हमारे प्रति करुणा वास्तव उन्होंने जो वेदांत रूपी आशीर्वाद हमको दिया वो कितना सब कुछ हमने गाव दिया है उसकी तो हम कल्पना भी नहीं कर सकते तो ये सब देख करके स्वामी जी का पीछे का लाइफ देखकर के स्वामी जी ठाकुर के डे रक्षा के बाद में ठाकुर की महादी के बाद में स्वामी जी की लाइफ देखते हैं उसके सामने जब हम देखते हैं की ठाकुर नरेंद्र को इस तरह से नरेंद्र को इतना इंर्पोटेंस देते फिर लगता है ये तो कुछ भी नहीं है ठाकुर को और भी बहुत सारे इंर्पोटेंस देना चाहिए था पहले पढ़ करके लगता है अरे नरेंद्र क्यों कर रहे हो किंतु बाद में स्वामी जी का लाइव पढ़ेंगे तो लगेगा की जो नरेंद्र किया हैं वह भी कम था और भी ज्यादा करना चाहिए था कितना सब कुछ स्वामी जी ने रामकृष्ण संघ की न्यू डालने के लिए कितना सब कुछ उनको कष्ट झेलना पड़ा है फिर से पढ़ना हूं नरेंद्र ठाकुर के पास में ही बैठकर के आहार किया आहार अंते ठाकुर श्री रामकृष्ण तहर घूरेर मजे ते बिछाना कोरिया देते बोली लेने आहार के बाद में ठाकुर ने कहा की फर्श के ऊपर में बिछाना लगा दो नरेंद्र आदि भकतीरा विशेषतः नरेंद्र विश्राम करीबन नरेंद्र और अन्य लड़के विशेषतः नरेंद्र विश्राम करेगा चटाई था उसके ऊपर में एक गाड़ी और उसके ऊपर में एक मालिश अर्थात की सोनी के लिए जो सर के नीचे तकिया रखते हैं वह लगा दिया गया ठाकुरों बालक के न्याय नरेंद्र का 6 विषाणै बिछाने बोशीलेंट ठाकुर भी बच्चे की तरह नरेन के पास में जमीन पे आकर के इस बिस्तर में बैठे अभी देखिए नरेंद्र के साथ में ठाकुर का व्यवहार जो है वो कितना वो पढ़कर के कितना आनंद आता है कितना मधुर व्यवहार है कभी-कभी जैसे की मां अपने पुत्र के प्रति जितना वात्सल्य भाव प्रगति करती है उसे तरह से वात्सल्य भाव प्रकट होता है ठाकुर में तो कभी-कभी छोटा बच्चा रिवर्स बच्चे के मां में मां के प्रति किस तरह से एक नटखट सा एक भाव प्रगति होता है मां बच्चे को कुछ भी बोलते रहेगी की अच्छा यह सब ठीक रखो चिल्लाओ मत हल्ला गला मत करो चीज इधर से उधर मत देखो किंतु फिर भी बच्चा कैसे नटखट हो करके चीज फेंकता है तूफान करता है इधर से उधर दौड़ता है मां को बिल्कुल परेशान करके रख देता है तो इस तरह से बच्चे का एक मधुर भाव ठाकुर के हृदय में प्रकट आपको थे बहू राज्य के राजा इतने सारे भाव उनके हृदय में थे देखिए मैं पहले पहले जब मैं बुद्धिस्म बहुत पड़ता था मेरे पूर्व श्रम की बात कर रहा हूं यहां पे साधु होने से आने के पहले की बात मैं बुद्धिस्म भगवान बुद्ध की बातें मुझे बहुत अच्छी लगती थी और भगवान महावीर की भी क्योंकि इनका जीवन इतना तपस्यमय है इतना कठोर है और उनका जो मेंटल बैलेंस जो है एकदम परफेक्ट बैलेंस है बिल्कुल शांत प्रशांत कबीर समाधि में मगन चेहरे पे कोई भी विद्या संकोच सही आ संदेह या तो भाई का भाव नहीं सब समय जैसे की एक कमल जैसे झलके ऊपर में राहत है और जलजरी कमल की पंखुड़ी के ऊपर में गिरता है तो चिपकता नहीं है वो फटकार के वो नीचे चला जाता है तो इस तरह से वो ये इनके मां का भाव ऐसा है की कोई भी संकट कष्ट दुख या तो संताप शोक आए इनका मां का भाव एकदम शांत और प्रशांत गंभीर रहेगा तो मुझे लगता था की आध्यात्मिक जो लोग होते हैं जो लोग बहुत ही उच्च कक्षा पे गए हैं उन लोगों का मां भी परफेक्टली पीसफुल हो जाता होगा जो ठाकुर को पढ़ के लगता है की देखिए की वो परफेक्ट पीस के बाद में भी एक और एक मुकाम है जैसे ठाकुर कहते हैं ना की नेत्री नेत्री करके हम लोग ऊपर में जाते हैं अर्थात की नियति नेत्री अर्थात की सब कुछ इंद्रिय जनत जो सुख है जो भोग है उसका त्याग करते करते साधना के सोपान सर करते-करते हम लोग ईश्वर प्रताप करते हैं ईश्वर के दर्शन करते हैं या तो आत्मसात कर करते हैं जब आत्मा साक्षात्कार होता है तब सड़क स्वेच्छाचार्य हो जाता है ठाकुर का शब्द है उसे स्वेच्छा कर अर्थात की वो फिर नियम करके की मुझे यह मिठाई नहीं खानी चाहिए उससे मेरी युवा का सुख आता है मुझे यह बढ़िया सा ऐसी में नहीं बैठना चाहिए बढ़िया चाहिए बिस्तर है उसे पर नहीं सोना चाहिए जमीन पर सोना चाहिए पंखा वगैरा नहीं इस्तेमाल करना चाहिए ग्राम पानी से स्नान करना नहीं चाहिए और कामिनी और कंचन की तो बात ही कहां है उसको तो संपूर्ण रूप से त्याग करना चाहिए ऐसा जो मां को दृढ़ निश्चय बना करके बिल पावर को स्ट्रांग करके सड़क जब साधना करता है तो वो जब नेत्री नेत्री करके साधना करता है नेत्री संस्कृत शब्द है ने एन इतनी यह नहीं यह नहीं अर्थात की मेरा सही स्वरूप क्या है तो यह इंद्रिय के सुख भोग भी नहीं है पांच महबुद्ध से बना हुआ मेरा शरीर भी नहीं है यह जो इंद्रिय जनत मेरी ये जो इंद्रियां है वो भी नहीं मां भी नहीं है बुद्धि भी नहीं मां बुद्धि चित अहंकार इसमें से कुछ भी मेरा सही स्वरूप नहीं है ये सब के पैर मेरा सही स्वरूप है आत्मा स्वरूप जो की सचित आनंदमय है और सचित आनंदमय भी एक्चुअली ब्रह्म का तो वर्णन नहीं किया जाता किंतु शब्द से तो उसका वर्णन नहीं होता ठाकुर ने जैसे विद्यासागर को कहा की सब कुछ झूठ नहीं हुआ अर्थात ईश्वर का वर्णन हमने अपने मुंह से कर लिया है मुंह से बोला है ईश्वर का वर्णन चतुर्भुज धारी और यह सब जो विष्णु सहस्त्रनाम इसमें विष्णु के सब गन जो है उनके नाम के साथ में संलग्न करके हमने गए हैं तो मुंह से बोले हैं तो झूठ हो गया विष्णु का स्वरूप किंतु ब्रह्मा का जो स्वरूप है मुंह से बोला नहीं गया ब्रह्मा का स्वरूप झूठ नहीं हुआ ब्रह्म जूता नहीं हुआ मुंह से बोलना पड़ता है फिलासफी लखनी पड़ती है तो सचित आनंद ऐसा कुछ करके हमने बोल दिया है किंतु जब उसे उसका जो की मुंह से नहीं बोला जाता इस स्वरूप को प्राप्त जल सड़क होता है तब वो सड़क नहीं राहत वो सिद्ध हो जाता है और स्वेच्छाचार्य हो जाता है फिर उसको यह कामिनी कंचन से दूर रहना है यह नहीं करना वह नहीं करना वो सब नियम चले जाते हैं मां खुद जब वह वापस आता है यह सब कुछ मेरा ये भी मेरा है इंद्रिय भी मेरी है यह जीव जंतु सामग्र जगत जो है सब कुछ मैं मैं हूं और मैं सब कुछ यदि मैं हूं तो मैं कैसे एक मेरा एक अंग दूसरे अंग के ऊपर में किस तरह से अत्याचार करेगा एक अंग दूसरे अंग का किस तरह से भोग करेगा ये तो संभव ही नहीं है तो इस तरह से मैं मेरा मैं पूरा विश्व व्यापी ब्रह्मांड व्यापी समय और कल की सीमाओं से भी पैर जब चला जाता तब ये जो सुख भोग या तो इंद्रियों के आनंद ये सब कहां चले जाते हैं और वो जो सड़क है या तो सिद्ध जो है वो बालक पाठ हो जाता है उन्माद होता है हो जाता है जड़वत हो जाता है पिशाचवत हो जाता है तो ठाकुर उसे सर्वोच्च अवस्था में स्थित है समाधि के भी पैर की अवस्था समाधि प्राप्त करने के बाद में वापस आए हैं इसलिए कभी-कभी बच्चे के तरह कभी कभी क्या बहुत साड़ी बार वो बच्चे की तरह ही उनका आचरण होता था ठाकुरों बालक के न्याय नरेंद्र ठाकुर भी बच्चे की तरह हंसते-हंसते आकर के नरेंद्र के साथ में बिस्तर पर बैठे भूख तो डर शाहिद विशेषज्ञ नरेंद्र शाहिद नरेंद्र मुख दिए मुख कोरिया हाशिमुखी महा आनंदी कोठा कोहिते चैन भक्तों के साथ में विशेषतः नरेंद्र के साथ में नरेंद्र की सामने देखकर के नरेंद्र की और अपना चेहरा करके नरेंद्र की दिशा में अपना मुख करके महाशिम से मा आनंद में बातें कर रहे हैं चरित्र गोलपो बोले बोलते हैं जैसे की बात भी करते हैं तो नरेंद्र के साथ में सामने देखते हैं चेहरे पे जैसे की बच्चे के चेहरे पे किस तरह से हम हम जब बड़े हो जाते हैं हम लोग जो हंसते हैं तो हमने तो क्या है दुख कष्ट है यह सब संताप अशोक सब कुछ देख लिया है हमारी हंसी भी बहुत समय वह सही है ना वहां पर वह लोग जोर-जोर से हंसते हैं किंतु उनको देखकर के मुझे हंसी आई है वो सही सही हसी थोड़ी ना होता है वह तो अपने चेहरे को चेहरे के जो मसाला जो होते हैं उसको आप एक्सरसाइज करवा रहे हैं इस तरह की हंसी हो गई राहत है एक इस तरह का आनंद जिसमें कई किसी भी तरह की मिलावट नहीं है किसी भी तरह का है किसी भी तरह का उसके पीछे में वह कोई चल बाजी नहीं है किसी भी तरह की इसके पीछे में कोई किसी को हनी करके कुछ प्राप्त कर लेना इस तरह का दुष्ट मनोभाव नहीं है पूरे जिसको जो ये कहा जाता है शुद्ध आनंद वो बच्चे के हादसे के पीछे में राहत है तो ठाकुर के चेहरे का हास्य देखकर के लगे मैन ठीक जैसे छोटे बच्चे की हंसी ठाकुर का एक मित्र और ठाकुर को मिलने के लिए आया कमर कुकर में था ठाकुर के साथ में ठाकुर कहते हैं मैं उसके साथ में बहुत खेलते था सब समय उसके साथ में खेलते राहत था क्योंकि ठाकुर किसी के साथ में मित्रता तभी करेंगे एवं बच्चे भी जब थे श्री हरि उसका नाम मोस्ट प्रोबेबली श्री हरि तो उसको देख कर के मतलब ठाकुर बच्चे थे और श्री हरि के साथ में जब खेलने थे तो वो तो तभी खेलेंगे ना जबकि वो लड़का भी तो शुद्ध होगा तो वो बच्चे थे तब खेलने थे अभी बड़े हो गए ठाकुर दक्षिणेश्वर में है वह लड़का भी बड़ा हो गया उसने वो शादी वगैरा कर ली है छोटी सी दुकान वगैरा भी होगी दक्षिणेश्वर में ठाकुर को मिलने के लिए आया इतने सालों के बाद में आया तो उसको वो ठाकुर को देखकर के क्या बोलना है पता है तुम बचपन में जैसे थे वैसे ही अभी भी हो अर्थात बचपन में जैसे ही तुम्हारा शुद्ध हास्य था शुद्ध आनंद था जिसके पीछे में किसी भी तरह की मिलावट नहीं थी जिसके पीछे में किसी तरह की चल बाजी नहीं थी वैसा ही शुद्ध हास्य तुम्हारा आज भी है और इसको देखकर के ये श्रीहरि को देखकर के ठाकुर क्या कहते हैं की और सामने देखते पे लूना ओके छूट पे लूंगा मैं उसके सामने में देख नहीं सका उसको स्पष्ट नहीं कर सका देखा हूं की पूरा संसार में डब गया है मैंने वो अभी हंसना भी है तो सांसारिक हंसी सांसारिक हंसी मैन इसके पीछे में बहुत सर वो मिक्सअप होता है भेद भेद जिसको कहते हैं वो बहुत साड़ी मिक्सअप होता है तो यहां पर जब ठाकुर ऐसा हास्य वध ने मा आनंद से बात कर रहे हैं तो छोटा बच्चा वैसे ही जब बड़ा हो जाता है तो किस मतलब संसार का कुछ उसने देखा नहीं है उसने जी तरह से छोटे होने के समय में उसकी कोई जवाबदारी नहीं थी मां और पिताजी बड़े भाई बहन जी तरह से उसकी संपूर्ण सर संभल रखते थे उसके लिए सब कुछ कर देते थे तो इस तरह का बच्चा जिसने संसार दिखाई नहीं है वो बड़ा होकर के कैसा एक खूब मैन वह एकदम वह निर्मल हास्य हंसेगा वैसे ही ठाकुर कहां से है और यहां पे यदि प्रश्न होगा की ठाकुर ने संसार नहीं देखा तो ठाकुर की संभल किसने राखी ठाकुर के संभल मैन राखी मैन ही ठाकुर को ठाकुर के जीवन में शोक संताप नहीं आए ऐसा तो नहीं है ठाकुर के पिता जी का देहांत हो गया जब छोटे थे जब बड़े हुए तब बड़े भाई का देहांत हो गया और घर में खाने को नहीं है तो मां के साथ में मां को इतना प्रेम करते थे मां को इतना स्नेहा करते थे वह मां को छोड़कर के कमर कुकर में उनको कोलकाता आना पड़ा नौकरी करने के लिए पैसा कमाने के लिए तो उन्होंने कष्ट नहीं देखा ऐसा तो नहीं है किंतु फिर भी मां के आशीर्वाद से जैसे कमल के पत्र के ऊपर में पानी जब गिरता है तो किस तरह से वो निकाल जाता है बिना उसको लगे हुए तो वैसे ही संसार की जितने शोक संतान ठाकुर को बिना स्पर्श किया चले जाते थे और ठाकुर का भतीजा अक्षय था तो उसके देहांत के समय ठाकुर अभी रो रहे हैं तो अभी हंस रहे हैं अपने मुंह से कहते हैं बाद में कहा था की इस तरह से मुझे कष्ट हुआ जैसे कोई जिला कपड़ा निको कर के उसमें से पानी निकलता है इस तरह से मेरे हृदय को कोई निचोड़ रहा है इस तरह से मुझे कष्ट हुआ था किंतु फिर भी दूसरे क्षण हंसना शुरू कर दीजिए यह देखकर के जन्म मृत्यु चला ही रहेगा अक्षय कितनी बार आगे आया था कितनी बार बाद में आएगा कितने जन्म लगा और जब तक मुक्ति नहीं होगी तब तक यह संसार चक्र चला रहेगा मुक्ति होगी तो फिर तुम कौन मैं कौन वह राजा जनक की अष्टावक्र मनी की सुंदर कहानी है अष्टम वक्र मनी के पिताजी थे भगवान व्यास तो भगवान व्यास ऋषि व्यास तो व्यास ने उनको ब्रह्मज्ञान सिखाया किंतु ऐसा होता है ना लड़के के मां में की मेरे पिताजी मेरे प्रति प्रेम के मेरे पिताजी का तो मेरे ऊपर में इतना प्रेम है तो ठीक-ठीक ब्रह्मा ज्ञान दिया होगा की नहीं क्योंकि सही-सही ब्रह्म ज्ञान प्राप्त होगा तो ये संसार जो है वो स्वप्नवत लिखने लगता है स्वेच्छा कर हो जाता है संबंध जो है सब चले जाते हैं सन्यासी का आचरण हो जाता है तो मेरे पिताजी मुझे प्रेम करते हैं बोलकर के सर्वोच्च ज्ञान नहीं देते क्योंकि देंगे तो फिर मैं पिताजी को पिताजी के रूप में वो गिनूंगा नहीं वो संबंध नहीं रहेगा घर में भी शायद मैं रहूं ना रहूं उनके आश्रम में तो संदेह करते रहते हैं तो भगवान ने कहा देखो तुम मुझमें पर संदेह करते हो तो अभी मेरे अभी मैं तुमको क्या कहूं तुम जो राजा जनक के पास में वो वो तुमको सही सही ब्रह्मा ज्ञान देंगे तो अष्टावक्र मनी राजा जनक के पास आए बोला की आप मुझे ब्रह्मज्ञान दीजिए तो राजा जनक ने कहा की पहले आप दक्षिण दीजिए गुरु दक्षिण बाद में मैं आपको ब्रह्म ज्ञान के बड़े में बताता हूं तो अष्टावक्र मनी कहते अरे ये कौन सी बात हो गई पहले आप ज्ञान दीजिए बाद में दक्षिण प्राप्त कीजिए पहले ही दक्षिण ये कौन सी बात हो गई अब चलिए मैं भाग जाएंगे तो बिना ज्ञान दे ये किस थोड़ी ना चलेगा तो राजा जनक क्या कहते हैं यदि ब्रह्मज्ञान हो जाएगा तो कौन शिष्य कौन गुरु ये सब चला जाएगा इसलिए पहले और दक्षिण दीजिए बाद में वो आप दक्षिण ब्रह्मज्ञान होने के बाद में दक्षिण नहीं देंगे वो मुझे पक्की पक्का पता है तो ऐसे जब ब्रह्मज्ञान होता है तो इस तरह से संपूर्ण रूप से बच्चे का एक स्वभाव हो जाता है संसार की सब जो ये बंधन जो है हमारे मां के ऊपर में इतने सारे बंधन सब टूट जाते हैं चरित्र गोलपो बोले अपने अवस्था अपने जितने भी साधना के समय अनुभव हुए थे उनके मां की क्या-क्या अवस्थाएं हुई थी वो वार्तालाप करते-करते बता रहे हैं श्री राम कृष्णा नरेंद्र आदि भक्ति और प्रति भगवान राम कृष्णा नरेंद्र आदि भक्तों को कहते हैं अमर ईबोचहार पर केवल ईश्वर कथा सोमवार जानना व्याकुलता हो तो मेरी जब यह अवस्था हुई तब सिर्फ ईश्वर की बातें सुनने की व्याकुलता होती थी ये अवस्था यानी की ईश्वर का आवेश वैसे हम लोग आराम से रहते हैं खाता हैं पीते हैं दिन में दो बार शायद मंदिर में जाते होंगे नहीं भी जाते होंगे यह सब इस तरह से वो ठाकुरमार स्वामी जी की बातें करते होंगे आपस आपस में शंकर ते होंगे किंतु जब सही-सही ईश्वर का आवेश हो जाता है तब सर के ऊपर में भूत चड्ढा है जैसे की कोई दानव स्वर हो गया है इस तरह से हमको पागल करके रख देगा सब समय हमारा जब ध्यान चला ही रहेगा ईश्वर का नाम अविरत चला रहेगा आंखों में से आंसू का प्रवाह चला ही रहेगा ठीक है फिर एक बार क्या हुआ की उनको ही ईश्वर का आवेश हो गया तो घर में बैठे हैं ओम ओम कर रहे हैं तो फिर किसने बोला क्या अरे वो पागल हो गया है एक घर में बैठा है सब कम छोड़ दिया है सिर्फ अपने मुंह से ओम ओम कर रहे हैं तो ठाकुर मिलने के लिए गए तो उसने क्या कहा पता है की देखो ये अवस्था में समझ रहा हूं की ईश्वर का जो आवेश हुआ है तो मेरा सब कम छठ गया है पंडित है तो घर चलाना है वो लोगों के वहां जाकर के पाठ व्याख्या वगैरा सब करनी है तो एक कम करो मेरा ये जो रोग है ईश्वर ईश्वर रूपी रोग उसको ठीक कर दो किंतु यह जो मेरा ओंकार है वो उसको ठीक मत करना मैन ओंकार स्वरूप जो ईश्वर उसने प्राप्त किया है वो मेरे पास में रहने देना और इस तरह से अवस्था करना की संसार का सर कम कर सुकून यह माथुर बाबू मथुरा बाबू जाकर के ठाकुर को एक बार बोलते हैं आपको सब यह भाव समाधि वगैरा होता है तो मुझे भी एक बार ऐसा कुछ करवा दो तो ठाकुर ने उनको एक बार भाऊ समाधि करवा दिया तो वो वहां पर बैठे हैं सब कम छठ गया है सिर्फ वही एक ईश्वर का नाम स्मरण उनके मां में चल रहा है फिर वो डर गए की इतना बड़ा वो मैन दक्षिणेश्वर मंदिर का प्रबंध भी तो उनको करना है वो दक्षिणेश्वर मंदिर का ठीक-ठीक है मैनेजमेंट नहीं होगा तो ठाकुर को ही कष्ट होगा फिर ठाकुर को बुलाया पर पकड़े हैं अभी ये सब ईश्वर का भाव दूर कर दो वरना तो ये फिर मैं ये इतना सर बिजनेस इतना व्यापार यह मंदिर का प्रबंध कौन करेगा बोल करके तब ठाकुर ने उनको छुआ उनके मां का भाव ठीक हो गया न इनके साथ में वही नरेंद्र बैठ करके हाजरा के साथ में हंसी मजाक कर रहा है बोलना है ये घाटी भी ईश्वर है यह बाटी भी ईश्वर है क्या पागल जैसी बात कर रहे हैं ठाकुर तो ठाकुर ने जाकर के उनको ऊ दिया तो जैसा छुआ की बस क्या हो गया अपने घर जाते हैं और नरेंद्र खुद वर्णन करता है स्वामी विवेकानंद की मैं का रहा हूं तो पता नहीं चल रहा है की मुझे भूख लगी भी है और नहीं भी लगी है खाता हूं तो भूख मिटटी भी है की नहीं खाता हूं तो का ही रहा हूं मां बोलती अरे कितना खाएगा तो कहानी जा करके अपने से खाना समाप्त करके जाकर के सोया हूं पता ही नहीं चल रहा है मेरे देहात का कोई बहन ही नहीं है रास्ते से जाता हूं वो गाड़ी आई है तो गाड़ी मेरे शरीर के साथ टकराएगी मुझे फेक देगी जीजा होगी मृत्यु भी प्राप्त होगा वो कोई डर नहीं सीधा सीधा खड़ा हूं वहां जाकर के वो जो सलाखें उसके ऊपर में अपना सर पाठक रहा हूं यदि कुछ अनुभूति हो क्योंकि कुछ नहीं सब समय ब्रह्मा ज्ञान की अनुभूति त्रिजा करके ठाकुर को कहते हैं अरे ये सब मेरा छोड़ो मुझे सामान्य स्थिति पे ले आओ वरना संसार कैसे चलेगा हाजरा की भी से बात है हाजरा सॉरी हृदय की से बात है ठाकुर की बहुत सेवा करता था अभी था उसका जडमैन थोड़ा तामसिक भी था किंतु क्या है ठाकुर के प्रति श्रद्धा भक्ति भी बहुत थी तो एक बार कहानी पर उसको भाव हो गया तो जैसे ही भाव हो गया जोर-जोर से चिल्लाने लगा अरे रामकृष्ण चलो हम लोग गांव चलते हैं लोगों को यह मंत्रम महामंत्र और ईश्वर का जो मंत्र है वो बटर है सब में चलो ऐसा करके ऐसा चिल्ला रहा है तो ठाकुर ने कहा बेस्ट साले बेस्ट ठंडा हो जाए मेरे से साथ में तो ऐसा कितना भाव प्रति दिन होता है मैं थोड़ी ना इस तरह से पागल की तरह चिल्लाता हूं फिर वो ठाकुर उसके छाती पे हाथ लगा करके कहते हैं माशाल्लाह के ठंडा को दे मां इस साले को थोड़ा सा ठंडा कर दो और ये भाव का ऊपर श्रम करो भाव का आवेश कम करो तो ईश्वरीय भाव जड़ी हमारे पे होगा तो हमारी तो क्या तोड़-फोड़ जैसे की हाथी एक छोटे से घर में जाता है तो छोटा घर कैसे तोड़-फोड़ कर देता है तो वैसे हमारी अवस्था होगी किंतु ठाकुर का घर तो एक विशाल मैदान की तरह है वहां हजार हाथी इधर-उधर दौड़ते रहे इस विशाल मैदान को कुछ नहीं होने वाला तो इसीलिए ठाकुर कहते हैं अमर स्टार पोर्टेबल ईश्वर कथा सोमवार जन्म व्याकुलता हो तो मेरी जब ईश्वरीय आवेश की यह अवस्था हुई तब सिर्फ ईश्वर की बातें सुनने के लिए मेरी व्याकुलता होती थी महाभारत मुझे बेदतम कहां पर अध्यात्म रामायण का पाठ हो रहा है कहां पर भागवत का पाठ हो रहा है की हम महाभारत का पाठ हो रहा है वह खोजने खोजने घूमता था अर्थात एक जगह का नाम है वहां पे मैं कृष्णा किशोर बोल के पंडित है उसके पास में अध्यात्म रामायण सुनने के लिए जाता था अच्छा तो आज यही तक कल फिर से मिलता है ओम शांति शांति ओम तत्सत श्री राम कृष्णा