Skip to transcript
ClassesSaradakosh

Sri Ramakrishna Kathamrita ·

श्रीरामकृष्ण कथामृत || 9 Dec 1883 - श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ दक्षिणेश्वर में || 4 Apr 2025

प्रार्थना

ओम स्थापकाय धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री रामकृष्ण कथामृत श्रीमद् द्वारा लिखित चैप्टर का नाम है दक्षिणेश्वर में श्री रामकृष्ण भक्तों के साथ में और ठन ठन के सिद्धेश्वरी मंदिर में गमन तृतीय परिच्छेद डेट है नाइंथ दिसंबर 1883 कल हमने देखा कि किस तरह से ठाकुर

चमत्कार और तर्कसंगतता - miracles and rationality

अपने दर्शनों के बारे में अपनी दिव्य आध्यात्मिक अनुभूतियों के बारे में मास्टर महाशय श्री को बता रहे हैं। तो बड़ा ही मास्टर महाशय जैसे कि सैंडविच हो गए उनको जैसे कि धर्म संकट में डाल करके ठाकुर पूछते हैं कि यह सब जो बातें हैं कि भगवान स्वयं भगवान कृष्ण स्वयं सेनापति होकर के सैनिक होकर के अपने भक्त की रक्षा करते हैं। शत्रु शत्रु राजा के सामने युद्ध करके। इस बात पर तुमको विश्वास होता है तो मास्टर महाशय कहते हैं कि भक्त भगवान को पुकारता है। व्याकुल हो करके यह बात पर तो विश्वास होता है। किंतु जो दूसरी बात है कि भगवान स्वयं आकर के भक्त को हेल्प करें। वह बात पर पता नहीं कि वो जिन लोगों ने इस सैनिक को ठीक-ठीक देखा था तो यह बात मुझे विश्वास नहीं आती। ऐसा तो नहीं कहते। कहते हैं कि लोगों ने वो सैनिक को ठीक-ठीक देखा था कि नहीं वो मुझे नहीं पता। तो यह पूरा डायलॉग हमने कल देखा। अ आज एक अभी नया टॉपिक चालू करते हैं। अह महाशय क्या कहते हैं? ठाकुर क्या कहते हैं? देखते हैं। तो आज क्या बात हो सकता है? आज और आज

मास्टर महाशय के जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ (turning point)

का यह जो तृतीय परिच्छेद है और इसके बाद का जो चतुर्थ परिच्छेद है यह दोनों परिच्छेद इस तरह से हमको लगते हैं कि जैसे कि मास्टर महाशय के जीवन में यह एक टर्निंग पॉइंट है। जिस तरह से स्वामी विवेकानंद के जीवन का जो टर्निंग पॉइंट हमने देखा था कि पिताजी के मृत्यु के बाद में ठाकुर के पास में आकर के कहते हैं कि मेरे परिवार के लिए जो बेसिक आवश्यकताएं होती हैं रोटी कपड़ा मकान उसको आपको किसी ना किसी तरह से उसको पूर्ण करना होगा। तो फिर ठाकुर उनको मां काली के पास में भेजते हैं और वह पूरी कहानी तो हमको पता है। तो वह जैसे कि स्वामी जी के जीवन में टर्निंग पॉइंट था कि उन्होंने मां काली को स्वीकार किया है। यहां पे देखिए कि वैसे तो मास्टर महाशय ठाकुर के शरणागत हो ही गए थे। वह जो द्वितीय मुलाकात में ही द्वितीय ना कि तृतीय जो मुलाकात में ही उन्होंने कह दिया था कि बस ठाकुर के साथ में यही एक आखिरी तर्क इसके बाद में उनका तर्क करने का दरवाजा बंद हो गया है। अभी वह कभी तर्क नहीं करेंगे। किंतु फिर जैसे-जैसे हम आध्यात्मिक जीवन में आगे बढ़ते जाते हैं, वैसे-वैसे ही देखिए कि हमारे जीवन में एक टर्निंग पॉइंट सा आता है। यह टर्निंग पॉइंट किस तरह से हमको साधना और आध्यात्मिकता के उच्च आदर्श तक ले जाता है, वह हमको यहां पे देखने को मिलेगा। तो अभी यह मेरा एनालिसिस है। मैं इस तरह के सब टर्निंग पॉइंट है या तो फिर यह क्रिटिकल इवेंट है अपने संघ के साहित्य में वो मैं खोजता रहता हूं। तो देखिए कि यहां पे किस तरह से मास्टर महाशय इस घटना का वर्णन करते हैं। लिखते हैं पोर दिन शोकाले उद्यान पथे दाणया ठाकुर कथा कहते चैन। अभी यह जो कल पूरा बात हुआ था शाम को वह सब मंदिर में शंख और घंटा बज रहा था। आरती समाप्त हो गई थी। इसके बाद में मास्टर महाशय ठाकुर के कमरे में बैठकर के वह भक्तमाल का पाठ कर रहे थे। यह सब तो शाम को हो गया। अभी यह दूसरे दिन सुबह की बात है। उस दिन मास्टर महाशय एक दिन वहां पर ठाकुर के दक्षिणेश्वर में रुके थे ठाकुर के पास में। किंतु वह सिर्फ एक ही रात का मामला था। अभी इसके बाद में हमको पता है कि यह जो पूरा मास्टर महाशय का रिट्रीट है वह रिट्रीट यहां से प्रारंभ हो रहा है। यानी कि जिस तरह से ठाकुर कहते हैं कि मने वने और कोने अर्थात कि अपने मन में अपने घर के किसी कोने में और कहीं जंगल में या तो फिर किसी आश्रम में जाकर के बीच-बीच में रिट्रीट करनी चाहिए। जगत का पूरा यह जो बोझा है अपने सर पर उसको अपने सर से हटा करके ईश्वर में संपूर्ण रूप से मग्न होना चाहिए। तो यह मास्टर महाशय का रिट्रीट यहां से स्टार्ट होता है। क्या कहते हैं मास्टर महाशय? कि दूसरे दिन सुबह को उद्यान पथ के ऊपर में खड़े-खड़े ठाकुर और मास्टर महाशय वार्तालाप कर रहे हैं। और दिन शोकाले उद्यान पथे दाण ठाकुर कथा कहते छ मणि बोलीते छन आमी ताहले एकने ऐसे थकबो मणि कहते हैं कि तो फिर मैं यहां पे आकर के रुकूंगा। अभी देखिए कि मास्टर महाशय भी किस तरह से कि इसी परिच्छेद में आगे तो अपने को मास्टर करके ही परिचय देते हैं। किंतु यहां पर उन्होंने अपना यह जो परिचय है वह उन्होंने बदल दिया। जैसे कि छद्म नाम का आश्रय लेकर के वो कहते हैं कि मणि अपने अपना नामकरण कर दिया है मणि। इसी परिच इसी परिच्छेद में आगे मास्टर कहते हैं अपने को। अभी यहां पर मणि कहते हैं। कहते हैं कि मणि कहते हैं कि तो फिर मैं यहां पर आकर के रुकूंगा। श्री राम अच्छा अभी देखिए यह बड़ा क्रिटिकल टर्निंग पॉइंट मास्टर महाशय के जीवन में आया है। अभी तक तो घर से आते थे और घर से आकर के ठाकुर के दर्शन करते थे। अमृतमय वाणी सुनते थे। फिर चले जाते थे। किंतु अभी घर छोड़कर के यहां पर आकर के कुछ समय तक वो रुकने वाले हैं। यह क्रिसमस की छुट्टी ना की। ऐसा सब पीरियड है यह सब क्रिसमस का तो वैसे ही तो ब्रिटिश एंपायर का कैपिटल था भारत तो ये फिर क्रिसमस के दिनों की लंबी छुट्टी होती थी आजकल जैसे कि दीपावली की है या तो फिर दुर्गा पूजा की या तो फिर यह साउथ इंडिया में जैसे कि यह पोंगल वगैरह ये जो लंबी छुट्टी होती है तो वहां पे भी इस तरह से वो क्रिसमस की लंबी छुट्टी होती थी तो मणि कहते हैं ठाकुर को कि मैं यहां पर आकर के रुकूंगा अभी ही देखिए ठाकुर एक बड़ी ही

आत्मीय या अंतरंग भक्त ही ठाकुर के पास बार बार आते है

इंपॉर्टेंट बात करते हैं। कहते हैं अच्छा एतो जे तोमरा आशो ए माने की अच्छा यह जो तुम इतने आते हो इसका अर्थ क्या है? साधु के लोके एक बार हदो देखे जाए एते एतो आशो ए माने की साधु को देखने के लिए लोग मुश्किल से एक बार आते हैं एक बार हद दो देखे जाए माने एक बार आकर के मुश्किल से मुश्किल से एक बार आकर के देख के चले जाते हैं तोमरा एतो आशो ए माने की तुम लोग जो इतना आते हो मेरे पास में इसका अर्थ क्या है देखिए यह दूसरा कुछ प्रश्न यहां पे ठाकुर मास्टर महाशय को करते हैं कल कल जैसे कि मास्टर महाशय का फेथ टेस्ट करने के लिए पहला प्रश्न किया था कि अच्छा ये भगवान यदि स्वयं सैनिक बन करके आते हैं इस बात पर तुमको विश्वास होता है कि नहीं होता है तो वो देखिए कि मास्टर महाशय उस समय तो जैसे कि एक डिप्लोमेटिक उत्तर देते हैं किंतु यहां पर क्या होता है कि वो कोई उत्तर देते ही नहीं है। मणि अबक ठाकुर निजे ही प्रश्न उत्तर देते छेन मणि ने कुछ बोला ही नहीं मास्टर महाशय क्या उत्तर देंगे इस बात का ठाकुर को ही इस बात का उत्तर देना पड़ा यानी कि देखिए मुझे ऐसा लग रहा है कि ठाकुर जैसे कि इनका कमिटमेंट टेस्ट कर रहे हैं। जैसे कथामृत में ही है ना कि कहां पे है कि वो भगवान कृष्ण और अर्जुन दोनों का वार्तालाप हो रहा है। भगवान ने कुछ बता करके दिखाया कि अच्छा यह देखो तो कोई कौवा ना कि मैं एग्जैक्ट कहानी भूल गया। किंतु ऐसा ही कुछ है कि एक पंखी की ओर दिखा करके कहते यह कौवा है ना कि क्या है? तो अर्जुन ने इमीडिएटली एक्सेप्ट कर लिया कि हां सखे तुम कहते हो तो यह कौवा ही है। फिर वह भगवान कृष्ण ने कहा नहीं यह तो चिड़िया है। तो अगेन अर्जुन एक्सेप्ट कर लेता है कि हां आप कहते हैं तो चिड़िया है। अभी अगेन मैं कहानी का एग्जैक्ट मैं भूल गया। किंतु इसका जो सारांश है, इसका जो यह अर्थ है, वह यह है कि भगवान कृष्ण अर्जुन को जो दिखा रहे हैं, उसी बात को अर्जुन एक्सेप्ट कर दे रहा है। उसकी खुद की नजर जो देखती है, उस नजर पर विश्वास नहीं करके भगवान कृष्ण की आंखों से वह देखते हैं। और यही प्रसंग हमको अपने साहित्य में बड़ा सुंदर रूप से देखने को मिलता है। वही गिरीश घोष विश्वास में सबसे पक्का कौन है अपने संघ में? तो गिरीश घोष तो जब स्वामी जी अमेरिका से लौटे वही विदेशी शिष्याओं को लेकर के दक्षिणेश्वर वगैरह गए थे तो फिर वहां पे गिरीश घोष भी था ठाकुर का जन्मोत्सव चल रहा था उस समय किसी ने गिरीश घोष को पूछा कि अच्छा हमने सुना है कि यह स्वामी विवेकानंद विदेश जाकर के बहुत तरह के उन्होंने दुराचार किए हैं। बहुत तरह के साधु जन साधु लोगों को जो करना चाहिए उसके विरुद्ध कार्य किए हैं। ऐसा कोई गिरीश घोष को पूछ रहा है। तो गिरीश क्या उत्तर देता है? यदि मैं अपनी नजरों से नरेंद्र को कोई दुष्कर्म करता हुआ देखूंगा तो मैं अपनी आंखों को खींच करके काट करके फेंक दूंगा। क्यों? क्योंकि मुझे पक्का विश्वास है कि नरेंद्र कभी भी किसी भी तरह का दुराचार नहीं कर सकता है। मेरी आंखें यदि ऐसा देखती है तो वह आंखों की गलती है। वह नरेंद्र की गलती नहीं है। तो यह जो सोलो आना विश्वास 1101% फेथ जो कि गिरीश घोष में था। तो यहां पर देखिए कि ठाकुर जब यह कहानी अभी यह कहानी ठाकुर ने नहीं कही थी। कल वाली वह तो भक्तमाल में लिखी हुई है। किंतु मास्टर महाशय में यदि उतना विश्वास होता कि हां यदि ठाकुर पूछ रहे हैं और ठाकुर यदि इस कहानी को रिकमेंड कर रहे हैं तो हो सकता है कि उसमें सत्य होगा ही होगा। बस वही बात है कि वो सत्य मुझे समझ में नहीं आ रहा है। रेदर देन दैट कि वो मास्टर महाशिष एक डिप्लोमेटिक उत्तर देते हैं कि वो उन लोगों ने घोड़े को ठीक-ठीक देखा था कि नहीं वो पता नहीं। तो यहां पे भी जब मास्टर ठाकुर पूछते हैं कि तुम लोग यहां पर बार-बार आते हो इसका अर्थ क्या है? क्या लोग साधु को देखने के लिए मुश्किल से एक दो बार आएंगे? किंतु तुम लोग तो इतना रेगुलर आते हो। इसका अर्थ क्या हो सकता है? तो मणि उसका उत्तर देने की वजह अवाक होकर के रह गए। यह देखिए कि मास्टर महाशय के जीवन में इस तरह की निरवता हमेशा उनका साथ देती रही है। वह एक एक प्रसंग है कि सभी लोग यह भजन कीर्तन कर रहे थे और मास्टर महाशय चुपचाप बैठे थे। तो किसी एक भक्त ने ठाकुर को कहा कि महाशय हम सभी लोग हंस रहे हैं, भजन गा रहे हैं, कीर्तन कर रहे हैं। तो मास्टर महाशय एकदम चुप होकर के बैठे हैं। तो ठाकुर क्या कहते हैं कि वो थोड़े से नाराज होकर के थोड़ा सा हंसी मजाक में कि वो लड़कों के सामने दांत दिखाएगा। यहां पर चुपचाप बैठे रहेगा। अर्थात कि मास्टर महाशय तो टीचर थे। बच्चों को पढ़ा करते थे तो बच्चों के सामने तो बोलना पड़ेगा। बोलने के लिए जब बोलेंगे तो आपके दांत दिखेंगे। तो इस अर्थ में ठाकुर इसको एक अलंकारिक भाषा में कहते हैं कि बच्चों के सामने तो दांत दिखाएगा यानी कि बच्चों के सामने तो बात करेगा अपने स्टूडेंट्स के सामने किंतु यहां पर चुपचाप बैठा रहेगा। फिर और भी एक बात कहते हैं जब गिरीश घोष ने ही ऐसा कुछ कहा था कि मास्टर ठाकुर को कि देखिए कि मास्टर महाशय कुछ नहीं बोलते हम लोग इतनी बातें करते जा रहे हैं तब ठाकुर क्या कहते हैं कि लंबा घुमटा वाली स्त्री और ऐसा जलाशय जिसके ऊपर में यह जो कचरे का एक स्तर बैठ गया है। इस तरह के इस इन दोनों के ऊपर में विश्वास नहीं करना है। जो स्त्री बड़ा लंबा घुमटा टानती है, दिखाती है कि बड़ी वो सती सावित्री है। हो सकता है कि उसका चरित्र अच्छा ना हो और समाज में दिखाने के लिए यह सब दिखावट कर रही है। और दूसरा कि जिस इस तरह का जलाशय जिसके ऊपर में पूरा कचरा बैठ गया है वो कचरे को हटा करके आप पानी पिएंगे तो हो सकता है वह पोइजनस होगा। क्योंकि वह वाटर सर्कुलेशन रुक जाता है। जल या तो पानी जहां पे एक जगह पर इकट्ठा हो जाता है। तो फिर वह उसमें यह दुनिया भर के यह बैक्टीरिया है, अलजीस है वगैरह उसमें डेवलप होगा और वह पानी पीना बड़ा डेंजरस है। तो और फिर वो और भी कहते हैं ठाकुर मुख हलसा यानी कि जो बहुत ज्यादा बातें करते हैं। फिर इस तरह का जो कि बिल्कुल बातें नहीं करता है। ऐसे चार चार उदाहरण ठाकुर ने दिए हैं। इन चारों पर विश्वास नहीं करना है। अभी चार में से कौन सा उदाहरण मास्टर महाशय को फिट बैठता है? वह उदाहरण जहां पर एक व्यक्ति कुछ भी बोलता नहीं है। यानी कि उसके मन में क्या है आप समझ नहीं पाएंगे। कपटवृत्ति है कि पापवृत्ति है। आपके प्रति वह अविश्वास है, दुश्मनी है। आप बिल्कुल समझ नहीं पाएंगे। तो पहले तो ठाकुर यह बात करते हैं। किंतु फिर बाद में क्या करते हैं? किंतु उन्हीं खूब भालो। माने मास्टर महाशय वो ठीक है। उनका म भले ही चाहे इसके साथ में मैच हो जाता है किंतु उनके हृदय में अंतःसार है। अभी जैसे कि विद्यासागर को मिलने के लिए ठाकुर और मास्टर महाशय जाते हैं। तो ठाकुर एक लड़के को दिखा के देखिए मास्टर महाशय भी कैसा करते हैं। कौन से लड़के को दिखा के ऐसा कहा नहीं है। किंतु वो ऐसा लिखा है कि एक लड़के को दिखा के ठाकुर विद्यासागर को कहते हैं कि यह लड़का बड़ा अच्छा है। भीतर अंतःसार फलगू नदी यानी कि इसके भीतर में बहुत सारा जैसे कि सोना छुपा हुआ है। फलगू नदी बह रही है। आनंद और ज्ञान की धारा बह रही है। बाहर से भले ही चाहे वह ना दिखता हो। तो हो सकता है मेरा जो अनुमान है ठाकुर यहां पर मास्टर महाशय की ओर ही इंगित कर रहे थे। मास्टर महाशय को दिखाकर ही यह बात कर रहे थे कि इनके भीतर में भले ही ऊपर से इतने शांत दिखते हो किंतु भीतर में अंतःसार फलगू नदी है। तो यह निरवता जो है वह मास्टर महाशय के साथ में वह हमेशा लगी रही है और ठाकुर खुद इसके ऊपर में मोर देन वन टाइम्स कमेंट करते हैं। इसके बाद में भी यदि आप देखिए कि यह विजानंद जी महाराज काली कृष्ण महाराज वह तो मास्टर महाशय के स्कूल में ही पढ़ते थे तो वो कहते हैं कि वह मास्टर महाशय को जब हम देखते थे पहले तो उनको रामकृष्ण के बारे में कैसे पता चला कि वह रामचंद्र दत्त वो काकुड़गाछी वाला ठाकुर का भक्त वो नवघर कीर्तन करता था। फिर शहर की दीवारों पर लिख देता था कि हां इस समय कीर्तन हो रहा है। इस समय उत्सव का पालन हो रहा है। तो वह एडवर्टाइज करता था तो पता चला कि चलो रामचंद्र दत्त ठाकुर के भक्त हैं। तो वो काली कृष्ण महाराज उनके पास में जाते थे उनको मिलने के लिए बातें समझने के लिए। तो वो लिखते हैं कहते हैं कि मुझे पहले तो ऐसा ही लगा कि रामचंद्र दत्त ही वो ठाकुर के असली डिसाइपल है और बाकी जो जिनका हम नाम सुनते हैं नाम भी तो उस समय किसी ने नहीं सुना था ना स्वामी जी उस समय वर्ल्ड फेमस नहीं हुए थे शिकागो पार्लियामेंट ऑफ रिलीजन में तो वो फिर यह कुछ त्यागी संतान वो मिसगाइडेड ये तो गृहस्थ लोग तो वही कहते थे ना कि ये लोग तो मिसगाइडेड है झूठमूठ का घर छोड़कर के आकर के एक जगह पे रह रहे हैं तो फिर इनके उनके बारे में तो काली कृष्ण महाराज को कुछ पता नहीं था। तो वो रामचंद्र दत्त के पास आना जाना करते थे। किंतु उन्होंने एक बात ऑब्जर्व की थी कि उनके जो स्कूल है उसमें एक टीचर ऐसे हैं कि जो कि रिसे होती है कि छुट्टी होती है। तो बाकी सब टीचर के साथ वो इकट्ठा होकर के हल्लागुल्ला करते हैं। गप लगाते हैं। स्टूडेंट्स के साथ में बातें करते हैं। किंतु ये जो ठाकुर है क्या है? क्या लिखा है? मुख बूंदे भीतर हलशा। अच्छा अच्छा अच्छा भीतर बूंदे मुख हलशा। ठीक ठीक ठीक। बिल्कुल आपने ठीक कहा कि जिसका मुंह बंद रहता है वो और जो मुंह बहुत ज्यादा चलाता है वो ये ठाकुर का वो जो बात अच्छा अच्छा तो यहां पे कि काली कृष्ण महाराज कहते हैं कि हमारे एक टीचर ऐसे थे जो कि हल्लागुल्ला करने की बजाय बहुत ज्यादा बातें करने की बजाय वो चुपचाप अपने वो जो स्कूल के टेरेस पे वहां पे एक छोटा सा गार्डन जैसा था वहां पर चले जाते थे और एक किताब खोल के उसमें से कुछ ना कुछ पढ़ते रहते थे या अपनी डायरी में कुछ ना कुछ लिखते रहते थे। तो काली कृष्ण महाराज उनसे इतने प्रभावित हुए कि देखिए कि इनका जो चरित्र है वह बाकी सब टीचरों से बिल्कुल ही भिन्न है। तो फिर उन्होंने उनके साथ में वैसे काली कृष्ण महाराज भी शाय है। वो इतना आसानी से बात नहीं करेंगे और मास्टर महाशय के जीवन में तो नीरवता हमेशा साथ में ही रही है। तो फिर भी है यह काली कृष्ण महाराज ने एक बार साहस करके उनके साथ में बात की तब पता चला कि यह ठाकुर के माने अन्यतम माने अंतरंग डिसाइपल में मास्टर महाशय भी आते थे माने ये वही मास्टर जो कि हमारे मास्टर महाशय श्री म तो वही मास्टर महाशय ठाकुर के अंतरंग शिष्यों में भी आते थे और फिर यही मास्टर महाशय इनको कहते हैं कि देखो हम लोग चाहे जो भी हो हम लोग तो गृहस्थ हैं। तुमको यदि ठाकुर के बारे में ठीक-ठीक जानना है तो त्यागी संतान ही तुमको बता सकते हैं और इसलिए तुम वहां वराह नगर मठ में जाओ। तो मास्टर महाशय ने उनको वराह नगर मठ में भेजा था। किंतु देखिए यहां पे जो ऑपरेटिंग ऑपरेटिव जो पार्ट है इस स्टोरी का वो क्या है कि मास्टर महाशय की नीरवता थी। मास्टर महाशय की अंतर्मुखीता थी। वही है कि जिसने कि काली कृष्ण महाराज को उनके प्रति आकृष्ट किया। तो यह जो निरवता शांत रहना या तो फिर अपने मन की बात सहज रूप से नहीं कर पाना यह उनके साथ में हमेशा लगा ही रहता था। वह जो मास्टर महाशय कहते हैं ना ठाकुर उनको बार-बार पूछते हैं कि अच्छा तुम अपने पिताजी के घर रहने को कब जाओगे? अभी क्या है कि पिताजी है, भाई है वगैरह के साथ में मास्टर महाशय का पट नहीं रहा था। उनके साथ में रिलेशन अच्छा नहीं था तो अपना घर अलग से कर दिया था। तो फिर अभी देखिए कि आपका रिलेशन जब किसी के साथ में बिगड़ता है तो ऐसा भी होता है ना कि वह हमको कुछ कहे और हम उनको उत्तर देने की या तो हमारी इच्छा ना हो या तो हमारी क्षमता ना हो। तो मास्टर महाशय ये चुपचाप सब कुछ सहन करना कोई अपने ऊपर में अत्याचार कर रहे हैं तो अत्याचार सहन करते रहना वह सब कुछ उनका था। ये जो सुसाइड करने को जा रहे थे यह एपोक्रेफल स्टोरी है। एक्चुअली मैंने मास्टर महाशय के खुद के जीवन में मैंने कभी नहीं पाया कि उन्होंने अपने से ऐसा कहा हो। लोग बता रहे हैं तो जो भी है व्हाटएवर तो जो सुसाइड कौन करता है? जबकि वह अपनी सिचुएशन को फाइट नहीं कर सकता है। फेस नहीं कर सकता है। तो एक अंतर्मुखीता नीरवता मास्टर महाशय के जीवन में हमेशा से थी। यदि यही प्रश्न यदि ठाकुर यदि नरेंद्र को पूछते तो नरेंद्र बड़ा लंबा चौड़ा उत्तर ठाकुर को दे देता। किंतु खैर तो यहां पर ठाकुर का प्रश्न है कि अच्छा तुम लोग जो यहां पर इतना बार-बार रेगुलरली आते हो इसके पीछे का रहस्य क्या है? लोगों को यदि साधु को देखना है तो मुश्किल से एक बार आएंगे फिर दूसरी ओर दूसरी बार उस ओर मुड़ेंगे ही नहीं। वो जैसे कि वो कालीवाड़ी में ही दक्षिणेश्वर में ही एक साधु आया। यह हठ योगी था तो वह वैसे तो वहां का खाना नहीं खाएगा। कालीवाड़ी में जो खाना मिलता है वह सिर्फ वो भांग खाए वो दूध खाएगा और दूध के साथ में थोड़ा सा अफीम वगैरह कुछ खाएगा। तो फिर उसने आकर के ठाकुर को कहा कि अच्छा आपके पास में इतने बड़े-बड़े लोग आते हैं। धनी पैसा वाले हैं। तो आप उनको एक काम कीजिए। उनको कहिए कि मेरे लिए दूध का पैसा थोड़ा सा जुगाड़ करें। वरना तो दूध कहां पे मिलेगा? तो ठाकुर बड़े ही सरलता से उत्तर देते हैं। अच्छा ठीक है यहां पर जो लोग आते हैं मैं उनको कहूंगा। तो यह साधु वहां से चला गया। फिर यह जब वो कुछ भक्त आए तो ठाकुर ने कहा कि अच्छा देखो वहां पर पंचवटी में एक साधु रह रहा है तो वह काली मंदिर का खाना खाएगा नहीं किंतु उसको दूध अफीम वगैरह के लिए कुछ पैसा चाहिए तो तुम लोग जुगाड़ कर लो। तो जाकर के उसको मिल के आओ। तो यह भक्तगण गए वहां पर जाकर के उसके साथ में बात किया फिर वापस आ गए तो फिर उनका चेहरा देख के ही ठाकुर समझ गए कि अभी उनको कुछ ऐसा लगा नहीं है कि इसको पैसे देने चाहिए तो फिर जब दूसरी बार वो जो साधु पूछने को आता है कि अच्छा और उस समय ये भक्तगण वहीं पर बैठे थे तो साधु पूछने को आता है कि आपने इन लोगों के साथ बात किया तो ठाकुर कहते हैं मुझे नहीं लगता कि इन लोगों को आपको यह लोग आपको पैसा देंगे फिर वो ठाकुर भक्तों को ही कहते हैं कि लगता है कि तुम लोगों को यह साधु पसंद नहीं आया है। तो देखिए कि जनरली ऐसा ही होता है। ठाकुर जैसे जो कोई होते हैं जो कि साधु संत महात्मा अभी अभी हमको पता है कि वह अवतार है। उस समय तो यह बात इतनी प्रचलित नहीं थी। अंतरंग भक्तों में भी तो डाउट करने वाले सभी थे। नरन ही सबसे पहला उसमें मास्टर महाशय भी देखिए कि इमीडिएटली उत्तर नहीं दे पा रहे हैं। तो वो हम लोग मुश्किल से किसी को एक दो बार देखने के लिए जाएंगे और फिर क्या होता है? बार-बार हम किनको मिलेंगे अपना वो नाती या फिर कास्ट का कोई रिलेशन है। अपनी ज्ञाति के पुरोहित है या अपने कुलगुरु है या मेरी जो जाति है कास्ट है उसके साथ में एसोसिएटेड है तो वह हमको उनके साथ में बार-बार मिलना होगा। किंतु अदरवाइज इन जनरल साधु को बार-बार देखने के लिए कौन जाएगा? तो इसीलिए ठाकुर के जब यह प्रश्न है तो मणि चुपचाप रह गए, निरव रह गए। कोई उत्तर नहीं दिया। इसलिए ठाकुर निजी प्रश्न उत्तर देते छ। ठाकुर अपने से ही अपने प्रश्न का उत्तर दे रहे हैं। क्या कह रहे हैं? अंतरंग ना होले की आशो अंतरंग यदि ना होते तो क्या तुम लोग आते? अंतरंग माने आत्मीय अंतरंग का अर्थ है आत्मीय आपनार लोग अपने खुद के लोग जैमन बाप चेले भाई भगनी जैसे कि पिताजी पुत्र भाई और बहन देखिए यह कितनी बड़ी बात यह जो बादबाद में यह जो डिवीजन होना स्टार्ट हुआ था भक्तों में कि यह अंतरंग है और यह बहिरंग है। तो यह डिवीजन के पीछे में जो ठाकुर का थिंकिंग था वह यहां से ही स्टार्ट हो गया था। यहां से ही ठाकुर ने सबसे पहली कंडीशन रख दी थी कि जो लोग ठाकुर को बार-बार मिलने के लिए आते हैं और जो आते हैं इसके पीछे जो भाव है आत्मीयता का भाव है। यह जो ठाकुर ने आगे कहा ना कि कोई कोई ऐसा जब आता है भक्त मैं फटक करके खड़ा हो जाता हूं। यानी कि क्या है कि देखिए हम अपने घर में बैठे हैं। हमारे चाचा है या कजिन है या तो अपना कोई ऐसा मित्र कि जिसके साथ में अपना बहुत ही अच्छा रिलेशन है तो वह जैसे ही हमारे घर में प्रवेश करेगा तो हम कैसे खड़े होकर के उसको स्वागत करने के लिए आलिंगन करने के लिए हम आगे बढ़ेंगे क्योंकि भीतर से ही वह आता है कि अरे यह तो मेरा परम प्रिय परम आत्मीय मेरा बंधु यहां पर आया है तो भीतर से ही ऑटोमेटिक यह रिएक्शन आएगा तो यहां पे भी ठाकुर कहते हैं कि यदि आत्म आत्मीय ना होते तो क्या यदि आते आप लोग यहां पर बार-बार और फिर मास्टर महाशय के मन में यदि कोई शंका रह जाए कि आत्मीय का अर्थ क्या है इसलिए उन्होंने आत्मीय की विस्तार से व्याख्या भी कर दी आत्मीय कौन है जैसे कि पिताजी है जैसे कि अपना पुत्र है जैसे कि अपना भाई है जैसे कि अपनी बहन है तो बाप चेले भाई भगनी पिताजी पुत्र भाई और बहन इसको हम कहते हैं अपने आत्मीय जनरली मनुष्य के जीवन में देखेंगे कि यह जो चार रिलेशन है इसके बाद में यदि पत्नी को भी ले ले मां को भी ले ले तो यह जो चार पांच रिलेशन है जो कि हमारे सबसे करीबी हम इनको मानते हैं। तो यह इस तरह से करीब का रिश्ता जैसे हमारा आ अपने रिलेटिव्स के साथ में है वही स्नेह का बंधन यदि ठाकुर के साथ में ना होता तो क्या यह लोग सब ठाकुर के पास में बार-बार आते नहीं आते इसके बाद में ठाकुर

ठाकुर अपने भक्तों को सारी बातें नहीं बताते। वे सारे रहस्य नहीं बताते।

किंतु और भी एक बड़ी ही गहन बात करते हैं क्या कहते हैं शोभ कथा बोली ना ताले आशबे केनो मैं सब बात करता नहीं हूं और यदि कर दूंगा ूंगा तो आप लोग क्यों आएंगे? यह जब मैंने पहली बार पढ़ा था तो मुझे सीरियसली एक थोड़ा सा आश्चर्य हुआ था कि ठाकुर ऐसा क्यों कह रहे हैं? ठाकुर देखिए कि जनरली इस तरह की बात कौन करेगा कि मैं जो मेरे पास में आते हैं उनको मैं सब कुछ नहीं सिखाऊंगा। यदि सब कुछ सिखा दूंगा तो फिर मेरे पास में आएंगे नहीं। जनरली इस तरह की बात कौन करते हैं? यह जो जैसे सेुलर सब्जेक्ट के टीचर होते हैं। म्यूजिशियन है, क्रिकेटर है वगैरह-वगैरह। इस तरह के टीचर यदि अपने जो स्टूडेंट है उसको यदि सब कुछ सिखा देंगे तो क्या होगा कि दो चीज होगी। स्टूडेंट शायद आना बंद कर देगा। उसको लगेगा कि मैंने सब कुछ सीख लिया है। या तो फिर यह स्टूडेंट इतना एक्सपर्ट हो जाएगा। वही कला में वही वो कार्य में कि वो टीचर है उससे भी ज्यादा वो फेमस हो जाएगा और टीचर को जो पैसा मिल रहा है वो मिलना बंद हो जाएगा तो ऐसे जैसे पहलवान या रेसलिंग वगैरह कि वो ऐसा हमने सुना है मैं रेसलिंग के बारे में कभी पढ़ रहा था कि वह जो रेसलिंग का टीचर होता है अपने शिष्य को सब दाव नहीं बताता है। एक दाव जो है माने एक जो पर्टिकुलर ट्रिक अपने शत्रु को हराने की वो हमेशा अपने पास में रखता है। क्यों? क्योंकि ऐसा हो सकता है कि शिष्य यदि सभी दाव पेच अपने मास्टर से सीख ले तो फिर वो उस अपने टीचर के ही साथ में युद्ध करके उसको हरा देगा। फिर वो जो उसका जो जितना भी नेटवर्क है वह अपने से हथिया लेगा। यानी कि ऐसा जो लास्ट मोमेंट मौका आ जाए कि अपने ही सिखाए हुए स्टूडेंट के साथ में फाइट करनी पड़े तो यह जो मास्टर रेसलर होते हैं वो आखिरी ट्रिक जो एक होती है अपने पास में रखे रहते हैं और जब वो शिष्य के साथ में युद्ध होता है फाइट होती है शिष्य जीत रहा है वो तो यंग है वो टीचर तो बूढ़ा हो गया है अभी तो आखिरी एक ट्रिक आजमा करके वो अपने शिष्य को हरा देगा जैसे कि उसका खुद का यह सब बना रहे नेटवर्क वगैरह तो इस तरह से तो सोचिए कि ठाकुर इस तरह की बात क्यों करते होंगे कि मैं यदि सब कुछ बता दूंगा तो तुम लोग मेरे पास में आना बंद कर दोगे। यह बड़ा ही क्योंकि ठाकुर के बारे में जो कुछ भी हमने पढ़ा है मां के बारे में स्वामी जी के बारे में देखिए कि इन लोगों का सबसे बड़ा एसेट ही है सिंसियरिटी। सत्य, ऑनेस्टी। यह लोग यदि ऐसा कहना शुरू कर देंगे कि हम आपको सब कुछ नहीं सिखाते हैं। क्यों? क्योंकि फिर आप लोग हमारे पास में आना बंद कर देंगे। यह जो ऑनेस्टी के साथ में सेल्फलेसनेस तो जिन लोगों में 100% सेल्फलेसनेस है। जिनका 100% जीवन जगत कल्याण के लिए उन्होंने न्योछावर कर दिया है। जिनको अपने खुद के लिए कुछ भी नहीं चाहिए। वह लोग ऐसी बातें क्यों करते हैं? तो फिर इसका उत्तर हमको थोड़ा सा देखना होगा। मुझे ऐसा लग रहा है। देखिए इसका बाद का पैराग्राफ हम पढ़ लेते हैं। इसके बाद में थोड़ा सा मैं अपना चिंतन बताता हूं। ठाकुर कहते हैं सुखदेव ब्रह्म ज्ञान जनके काछे गि छिलो। सुखदेव ब्रह्म ज्ञान प्राप्त करने के लिए राजा जनक के पास गए थे। जनक बोलले आगे दक्षिणा दाओ। जनक ने कहा पहले दक्षिणा दो। सुखदेव बोलले आगे उपदेश ना पहलेले केन कोरे दक्षिणा होए सुखदेव ने कहा आगे आप उपदेश उपदेश ना देंगे तो मैं किस तरह से दक्षिणा दूंगा तो जनक हंसते-हंसते बोलले तोमार ब्रह्म ज्ञान होले आर की गुरु शिष्य बोध थाकबे तो जनक ने हंसते-हंसते कहा कि तुमको यदि ब्रह्म ज्ञान हो जाएगा तो क्या गुरु शिष्य बोध रहेगा कि तुम तुम शिष्य हो मैं गुरु हूं यदि ब्रह्म ज्ञान हो गया तो तुम भी ब्रह्मण हो मैं भी ब्रह्म हूं तो फिर यह गुरु शिष्य संबंध किस काम का? यदि गुरु शिष्य संबंध नहीं रहेगा तो दक्षिणा कैसे मिलेगी? ताई आगे दक्षिणा कथा बोलनाम। इसीलिए पहले दक्षिणा की बात कही। देखिए कि यह जो पर्टिकुलर बात ठाकुर करते हैं। इसका भी तो उसी बात के साथ में मैच होता है कि यदि अपने टीचर हमको सब कुछ बता देंगे और हमको संपूर्ण ज्ञान हो ही जाएगा तो फिर हम टीचर के पास में जाएंगे ही क्यों? देखिए हम स्कूल में अपने टीचर के पास में पढ़ाई लिखाई करते थे। अभी स्कूल में से जैसे निकल गए जैसे ही बोर्ड की एग्जाम पास कर ली कॉलेज में चले गए तो फिर वह स्कूल के टीचर को यदि रास्ते में मिलते हैं तो कभी थोड़ा बहुत बात हो जाएगा। वह बहुत बार तो ऐसा भी होता है कि रास्ते में मिलते हैं हम इग्नोर करके चले जाते हैं। अच्छा ठीक है। जब स्कूल में थे तब उनके पास में सीखते थे तब स्कूल में फी भी देते थे। किंतु अभी तो उनके साथ में बात करने की कोई जरूरत नहीं। स्कूल में से ग्रेजुएट होकर के निकल गए हैं। और उसके बाद में जब ग्रेजुएट होकर के निकल जाते हैं। बहुत बार ऐसा होता है टीचर ने हमको जो सिखाया जो उसके हमारे ऊपर में जो ऋण है उसको याद रखने की बजाय कभी उसको हमने डांटा होगा। उस उसने हमको डांटा होगा। कोई हम गड़बड़ कर रहे हैं। होमवर्क नहीं किया। तो वही बात हमको याद रह जाती है कि अरे इसने तो मुझे डांटा था। मैं उसके साथ में क्यों बात करने को जाऊं? वगैरह-वगैरह। तो इस तरह से बिटरनेस भी आ जाती है टीचर के साथ में रिलेशन के साथ। तो फिर यह जो गुरु शिष्य का संबंध है तभी तक बना रहेगा जब तक गुरु शिष्य को गुरु के पास में सब कुछ सीखना है। जैसे ही सब सीख लिया वह गुरु को छोड़ देगा। अभी गुरु यदि ऐसा सोचता है कि यह मुझे छोड़ के चला जाएगा इसलिए मैं सब कुछ नहीं बताऊंगा। तो फिर यह गुरु गुरु किस काम का? राइट? तो यह प्रश्न यहां पर हो सकता है और स्पेसिफिकली यह उदाहरण पढ़कर के तो पक्का लगता है कि ठाकुर के मन में क्या ऐसा ही कुछ था। किंतु अभी जो मेरा इंटरप्रिटेशन है क्योंकि पहले ही देखिए कि इस चीज को हमको एक पूरा ओवरऑल एक लेना होगा। ये पूरे परिच्छेद में ठाकुर ने मास्टर महाशय को दो प्रश्न किए हैं। पहला प्रश्न है कि वो भगवान कृष्ण घोड़े सवार होकर के आते हैं। इस बात पर तुमको विश्वास होता है कि नहीं? दूसरा प्रश्न किया है कि यदि तुम यहां पे बार-बार आते हो इसका अर्थ क्या है? यह दो प्रश्न करने के बाद में ठाकुर ने ऐसा कहा है। अर्थात कि मेरे इंटरप्रिटेशन के अनुसार ठाकुर ऐसी कौन सी बात है कि जो कि छुपा रहे हैं। ठाकुर ऐसा क्या है कि जो कि मास्टर महाशय को अभी नहीं कह रहे हैं या तो फिर उनको लगता है कि मास्टर महाशय उस बात को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। अभी यह साधन भजन या तो फिर साधना के रिलेटेड कि अपने आध्यात्मिक जीवन के रिलेटेड इस तरह की कोई बात नहीं है जो कि ठाकुर छुपा रहे हो। यदि मास्टर महर्षि जप करने को बैठते हैं और जप करने में उनका मन जल्दी से एकाग्र हो जाए। यदि डिस्टरबेंस खड़ा होता है तो डिस्टरबेंस के किस तरह से दूर किया जाए। इस तरह के सीक्रेट ठाकुर कभी नहीं छुपाएंगे। वह इमीडिएटली कह देंगे। नरेंद्र का जो प्रश्न था कि वहां दक्षिणेश्वर में बैठता था जप करने के लिए ध्यान करने के लिए वह बगल की जो मिल थी उसका जो विसल था वो विसल की आवाज से डिस्टरबेंस होता था। तो ठाकुर ने कहा कि उसको विसल की आवाज के ऊपर में ही तुम अपने मन को एकाग्र करो। इमीडिएटली नरेंद्र कहता है कि ऐसा करने से मेरा मन फटाक करके एकाग्र हो गया था। तो यह जो ट्रिक है आध्यात्मिक जीवन की जिससे कि जो छोटे-मोटे अंतराय है वो फटाफट करके दूर हो जाए। तो ठाकुर ऐसा तो कुछ भी नहीं छुपाएंगे। तो क्या छुपाएंगे ऐसा कुछ जो कि जिसके लिए मास्टर महाशय अभी तैयार नहीं है और या फिर ठाकुर स्वयं तैयार नहीं है। यह बताने के लिए यह जो अल्टीमेट सीक्रेट है बताने के लिए और वह जो अल्टीमेट सीक्रेट यदि बाहर आएगा तो ऐसा हो सकता है कि ठाकुर का जीवन काल जीवन कार्य पृथ्वी पर समाप्त हो जाएगा। ऐसा अल्टीमेट सीक्रेट क्या है? तो वह है ठाकुर का अवतारत्व। यदि ठाकुर यह बताना शुरू कर दे कि मैं अवतार हूं और यदि यह जादू चमत्कार अपनी बात को प्रूव करने के लिए करना शुरू कर दे तो फिर होगा क्या पता है दो चीज होगी ठाकुर को तो सिंसियर डिसाइपल चाहिए थे ऐसे डिसाइपल जो कि आकर के साधना करें तो इस तरह के डिसाइसाइपल के मन में एक संदेह खड़ा हो जाएगा जैसे देखिए कि मास्टर महाशय यहां पर स्पष्ट रूप से संदेह करते हैं इसलिए दोनों प्रश्न का उत्तर वो ठीक ठीक-ठीक नहीं दे पाए हैं। तो ऐसे जो इंटीग्रिटी है जिन लोगों में जिन लोगों के सत्य के प्रति निष्ठा है जैसे कि नरेंद्र है जैसे मास्टर महाशय है ऐसे भक्त आना बंद कर देंगे और आएगा कौन कि जिनको सब कुछ मुफ्त में ले लेना है कि चलो ठाकुर के पास जाएंगे हमारा रोग दर्द वगैरह दूर कर देंगे और फिर हम फिर हमारा जो यह सांसारिक जीवन है वह बड़े अच्छे से चलेगा इस तरह के लोग ठाकुर के पास में आना शुरू कर देंगे सिंसियर डिवोटी सिंसियर भक्त है। जिन लोगों की एक भीतर में इंटीग्रिटी है। सत्य रक्षा किसी भी कीमत पर करना चाहते हैं। उन लोगों को यह ग्रेजुअली स्टेप बाय स्टेप रिवील करना होगा। उनकी खुद की जो आध्यात्मिक जर्नी है, उस आध्यात्मिक जर्नी के साथ में ठाकुर को प्रत्येक स्टेप पे उतना ही रिवुलेशन देना है जितना कि यह लोग ग्रहण कर पाए। जो उनके समय से पहले उनको बता दिया कि हां, यह है अल्टीमेट सीक्रेट कि मैं ही हूं अवतार। तो फिर यह शायद ठाकुर को फ्रॉड मानना शुरू कर दें या तो फिर वे लोग ठाकुर के पास से चले ही जाए कि मुझे तो नहीं अभी जैसे नरेंद्र ने ब्राह्म समाज के प्रार्थना पत्र पे साइन किया है कहा है कि मैं मूर्ति पूजा या तो फिर यह सब नहीं करूंगा तो फिर यह नरेंद्र को इमीडिएटली यदि ठाकुर बता दे कि हां मैं ही हूं अवतार तो फिर यह नरेंद्र फिर पहले तो डाउट करता था पहले तो प्रश्न करता था बाद में हो सकता है ठाकुर को फ्रॉड भी गनना शुरू कर दे वी डू नॉट नो राइट तो यह जिसका जो आध्यात्मिक जर्नी है, जिसका जो स्पिरिचुअल ट्रेजेक्टरी है, उस ट्रेजजेक्टरी में एग्जैक्टली एक पार्टिकुलर पॉइंट आता है। जबकि ठाकुर को रिवील करना है अपना सही स्वरूप। तो वह सही स्वरूप यदि ठाकुर प्रीमेच्योरली रिवील कर दे तो हो सकता है कि इन भक्तों का ठाकुर के पास आना बंद हो जाए। वे लोग सोचेंगे कि जिस तरह से कोलकाता में दूसरे हजार फ्रॉड बैठे हुए हैं धर्म का नाम लेकर के लोगों को लूटने वाले ठाकुर भी आखिर में इसमें से ही एक निकले ऐसा बोलकर के वे लोग ठाकुर से दूर चले जाएंगे और ऐसे लोगों का फिर आगमन चालू हो जाएगा जिनको कि साधन भजन के प्रति किसी भी तरह की निष्ठा नहीं है। बस किसी ना किसी तरह का शॉर्टकट आजमा करके अपने जीवन के जो भी समस्याएं हैं उसको उनको समाधान कर लेना है। तो इसलिए ठाकुर यहां पे यह बात करते हैं कहते हैं कि अंतरंग पहले तो उन्होंने यह कह दिया कि तुम लोग हो मेरे आत्मीय और अंतरंग। तो यह आत्मीय की अंतरंग का जो अपना रिलेशन है वह बरकरार रखना है। यह लोग ठाकुर के पास में आते क्यों हैं? इसलिए नहीं कि ठाकुर के पास में उनको कोई शॉर्टकट आजमा करके या तो भीतर में एक आशा है कि ठाकुर अवतार है और हमारा सब कुछ इस जगत तार देंगे हमारा इस बात से नहीं किंतु ठाकुर के प्रति उनका जो एक प्रेम और स्नेह का नाता बन गया है इसलिए यह लोग ठाकुर के पास में आते हैं और इस प्रेम और स्नेह का नाता बंधन ही यदि ठाकुर चाहते तो जिस तरह से अभी जो रामकृष्ण संघ है देखिए कि उसके उसके फाउंडेशन में क्या है? भालो भाषा ही आमा दे मां शारदा देवी ने कहा है वो जो क्वालपाड़ा के जो अध्यक्ष है केदार बाबू वो जाकर के मां को कहते हैं कि मां यह जो मेरे लड़के थे मेरे स्टूडेंट ही थे। यही स्टूडेंट सब आज साधु हुए हैं। अभी साधु होकर के आपके पास में आते हैं। वहां शरद महाराज के पास में जाते हैं उद्बोधन में। आप लोग उसको इन लोगों को प्रेम करके अच्छा खाना खिला करके बंधन में रख देते हैं अपने पास में और यह लड़कों को क्वालपाड़ा आकर के काम नहीं करना है। तो मां आप एक काम कीजिए कि इन लोगों को कहिए कि यहां से आपके पास में से चले जाए। आप ऐसा कहेंगी तो वे लोग क्वालपाड़ा आकर काम करेंगे। वरना क्वालपाड़ा आश्रम में काम करने के लिए मेरे पास में साधु नहीं बचे हैं। तो जैसे ही वह केदार बाबू ने ऐसा कहा मां इतनी नाराज हो गई कहा कि अरे केदार यह सब तुम क्या बोल रहे हो? तुम क्या मेरे मुंह से ऐसा बुलवा लेना चाहते हो कि मैं अपने संतानों को कहूं कि यहां से चले जाए। फिर मां क्या कहती है? भालो भाषा ही आमादे राशन यह प्रेम स्नेह है। वही हमारे लिए असली वस्तु है। वही हमारा फाउंडेशन है। तो यह प्रेम और स्नेह के फाउंडेशन पे ठाकुर अपने ऑर्डर का ऑर्डर बनाना चाहते थे। नहीं कि चमत्कार के फाउंडेशन पे। आज हम लोग जितने भी यहां पर आए हैं कोई ऐसा नहीं कहेगा कि अच्छा ठाकुर ने वो जो एक ब्रेड की बास्केट थी उसमें चार ही ब्रेड थी फिर इतने हजार लोग इकट्ठा हो गए तो उन्होंने कहा कि ये बास्केट चारों ओर ले जाओ इसमें से जितनी ब्रेड निकलेगी निकालना चाहोगे उतनी निकलती रहेगी। इस तरह का चमत्कार किया इसलिए हम लोग यहां पर आए हैं। रेयरली कोई ऐसा बोलेगा कि हां ठाकुर को मां का दर्शन होता था या तो फिर ठाकुर ने स्पर्श करके इतने लोगों को उन्होंने दर्शन दे दिलवा दिया है कल्पतरु दिन को इसलिए हम यहां पर आए हैं कि हमको भी कभी कहीं ना कहीं किसी ना किसी दिन ठाकुर का स्पर्श मिलेगा तो हमको भी दर्शन हो जाएगा। ऐसा सब कहने वाले ऐसा सोचने वालों की संख्या जो अंतरंग भक्त हैं उनमें बहुत कम होगी। हां आप कल्पतरु दिन को वहां पर काशीपुर में जाइए। बहुत बड़ी भीड़ होती है। बहुत सारे लोगों की यह इच्छा होती है कि ठाकुर हमारे ये जो जीवन के भवसागर में जितने भी कष्ट है वो कुछ ना कुछ जादू चमत्कार करके दूर कर दे। किंतु वह तो फिर बहिरंग भक्त हो गए। अंतरंग भक्तों में रेयरली कोई ऐसा चाहेगा कि ठाकुर आकर के दर्शन दे और हमको शॉर्टकट करवा करके ईश्वर का कोई आध्यात्मिक अनुभूति करवा दे। हम लोग जितने भी अंतरंग हैं हम लोग आए हैं यहां पे ठाकुर के प्रेम से बद्ध हो के मां का जो स्नेह आशीर्वाद है उससे आकर्षित होकर के हम यहां पे आए हैं। इसलिए भले ही चाहे हमारी संख्या कितनी ही कम क्यों ना हो हम लोगों में जो ऑनेस्टी और इंटीग्रिटी है इसकी वजह से हम लोगों में फुटफाट पड़ना बड़ा ही मुश्किल है। जैसे कि यही बात ठाकुर ने केशव को कही थी कि तुम देख सुनकर के शिष्य नहीं बनाते हो इसीलिए तुम्हारे शिष्य तुम्हारे से सेपरेट हो जाते हैं और इतना ही नहीं तुम्हारा आधा संघ तोड़ के चले जाते हैं और तुम्हारे शिष्यों को ले जाते हैं ऊपर से तुमको गाली देकर जाते हैं। तो वो जो आंख बंद करके नंबर गेम खेलने के लिए कि हां मेरे इतने सारे शिष्य हैं बोल के जो शिष्य बढ़ा ना ऐसा ठाकुर ने कभी नहीं किया। मां स्वामी जी ने कभी नहीं किया। जो जो अल्प लोग यहां पे आते हैं। देखिए स्वामी जी के जीवन में यह जो तीन विदेशी महिलाएं थी जो जोसेफाइन मैक्लाउड फिर ये जो सारा ओलीब और निवेदिता और फिर जब स्वामी जी की सेकंड विजिट में जो आइडडा अनसेल है या तो फिर यह जो एलिस हेंसब्रो है जो तीन मिड सिस्टर्स थी यह अल्प लोग ही आप देखेंगे कि स्वामी जी के साथ में इतना सारा स्वामी जी घूमे अमेरिका में 4 साल ना 3 साल और इतने लोगों को उन्होंने प्रणव मंत्र में दीक्षा दी स्वामी जी वो न्यू डिस्कवरीज में मेरी लुईस यह सब वर्णन करती है। कहती है कि प्लेटफार्म पर खड़े रह के प्रवचन के दौरान ही स्वामी जी हजारों लोगों को प्रणव मंत्र में दीक्षा देते थे। तो ये हजारों हजारों लोगों में से आखिर में जो स्वामी जी के पास में जो टिके हुए थे वो यही चंद लोग थे और इन लोगों का रेमिनेशंस पढ़िए। ऐसा रेयरली आपको देखने को मिलेगा कि स्वामी जी ने स्पर्श करके हमको कोई अनुभूति दिलवा दी ना कि हमारे जीवन के कोई जो समस्याएं थी उसको सॉल्व कर दिया। यह जोसेफाइन मैक्लाउड और जो उसकी बहन है बेटी लेगेट वो तो बड़ी धनी घर की वो लड़कियां थी। जो निवेदिता है वह तो स्कूल टीचर थी। उसका इतना फायरी नेचर था। इतना स्ट्रांग पर्सनालिटी थी। वो कोई चमत्कार फमत्कार करके इन लोगों को कोई पटा नहीं सकता है। और स्वामी जी के साथ में इनका जो संबंध था वो प्रेम स्नेह आशीर्वाद का संबंध था। तो ठाकुर को इसी स्नेहमय आशीर्वाद के ऊपर में संघ का फाउंडेशन रखना था। तो अभी देखिए कि वह अवतार है। इस बात को रिवील अवश्य करना है। किंतु उसका एक पर्टिकुलर टाइम आना चाहिए। पर्टिकुलर जो भक्तों की ये जो स्पिरिचुअल ट्रेजजेक्टरी है उस ट्रेजेजरी में एक माइलस्टोन रिच होना है। वो पहले उस माइलस्टोन पर पहुंच जाए। इसके बाद में ठाकुर जी यह रिवील करेंगे कि हां कि मैं अवतार हूं। जय राम जय कृष्ण श्री राम कृष्ण किंतु तोर वेदांत दिख दिए ना जो राम है जो कृष्ण है वही राम कृष्ण है। किंतु तुम्हारे वेदांत की दृष्टि से नहीं। यह सब पर्टिकुलर मोमेंट पर रिवील करना है। यदि उसको प्रीमेच्योरली रिवील कर दिया तो यह जो पूरा खेल उन्होंने बना करके रखा है जो पूरा गेम प्लान उनका था कि इन लोगों को स्नेह और प्रेम के पास में इस तरह से आबद्धता कर दो कि इन लोगों के ऊपर इन लोगों की हमारे ऊपर में तीनों के ऊपर में ठाकुर मां स्वामी जी तीनों के ऊपर में हम लोगों की श्रद्धा इतनी बढ़ जाए कि फिर यदि आखिर यह रिवील करते हैं कि हां हम अवतार हैं तो फिर हमको ऐसा कोई यह नहीं होगा शौक नहीं लगेगा क्यों? क्यों? क्योंकि हम सभी में इतना स्ट्रांग इंटीग्रिटी है, इतना स्ट्रांग ऑनेस्टी है कि हम में से कोई भी शॉर्टकट आजमा करके आध्यात्मिक जीवन में विकास नहीं करना चाहता। दैट मींस व्हाट? देखिए कि ठाकुर अपने शिष्यों को कितना रिस्पेक्ट देते हैं। ठाकुर समझते हैं कि इन लोगों को आप जादू चमत्कार करके कि वो ऐसी कोई मधुर बातें करके भुलवाने नहीं सकते हैं। इन लोगों में इतनी इंटीग्रिटी है कि इवन ठाकुर भी यदि गड़बड़ बातें करना शुरू करेंगे तो ठाकुर के मुंह पे सुना देंगे कि यह चातक पक्षी नहीं यह म चातक पक्षी वो स्वाति नक्षत्र का पानी नहीं पीता। वह किसी भी जलाशय का पानी पीता है। बोलने में हम में से कोई भी पीछे नहीं पड़ेगा। वो कोई हो सकता है मन में मन में सोचेगा। कोई मुंह पर बोल देगा किंतु ना सोचे आंख बंद करके विश्वास कर ले ऐसे अंतरंग में ऐसा कोई नहीं होगा तो यह देखिए कि मेरी दृष्टि से यह जो पूरा मामला है इसको उस तरह से नहीं लेना है कि इस तरह का एक स्वार्थी शिक्षक जो कि अपने पास में एक आखिरी ट्रिक बचा करके रखता है जिससे कि उसका शिष्य उसके साथ में लड़ने को आए वाद विवाद करने को आए तो वह हार ना जाए हार जाएगा तो फिर मेरा सब चला जाएगा मेरा शिष्य मेरी मेरी जगह पर बैठ जाएगा, मेरी गद्दी पर बैठ जाएगा। मेरा क्या होगा? इस तरह से स्वार्थपण ठाकुर में नहीं है। इसलिए कोई प्रश्न ही नहीं है। इसलिए फिर यह पूरा एक्सप्लेनेशन इसको मैंने सोचा है। अगेन अभी क्या है कि कथामृत आप जितना पढ़ेंगे रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य में जितना आप गहराई में जाएंगे सभी बातों का इतना गहरा अर्थ देखने को मिलता है कि फिर आज हमको यह अर्थ दिख रहा है। कल हो सकता है इससे भी डीपर कुछ जानने को मिले। परसों और भी कुछ जानने को मिले और उसके बाद में ऐसा हो कि आज का जो अर्थ है उसका पूरा विपरीत अर्थ हमको समझ में आए। सो कथामृत के जो जितने भी यह कूट प्रश्न है यह जो गुढ़ रहस्यमय बातें हैं उनके कितने लेयर्स ऑफ मीनिंग है और उसको अनपैक करने में उसको डिसीफर करने में हमारे लाइफ टाइम्स आफ्टर लाइफ टाइम्स चले जाएंगे। तो यह परिच्छेद यहां पर समाप्त होता है। इसका बाद का परिच्छेद अभी अगले क्लास में ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत राम कृष्णपणमस्तु।

ठाकुर अपना असली स्वरूप तभी प्रकट करेंगे जब उनके शिष्य आध्यात्मिक परिपक्वता तक पहुंचेंगे

यह जो प्रीमेच्योर जैसे ठाकुर कहते हैं ना घाव के ऊपर में वह जो बन जाता है उसको प्रीमेच्योरली आप निकाल देंगे तो फिर ब्लीडिंग होने लगेगा। आपको उसको हील होना होगा। उसके बाद में वह अपने से निकल जाएगा। वो जो एक स्किन का एक लेयर बन जाता है। जैसे वो कोकोनट का उदाहरण दिया। उसके भीतर में वह सेपरेट अपने से ही हो जाएगा। वह जो कोकोनट होता है जब उसका वो मैच्योरिटी का पीरियड आता है। अभी देखिए दो परफेक्ट उदाहरण है अपने सामने। एक अभदानंद जी का है एक शिवनंद जी का है। कंट्रास्टिंग उदाहरण। अभेदानंद जी को प्रीमेच्योरली अद्वैत की ओर ले गए तो पूरा उनका जो एक ट्रेजेक्टरी चल रहा था वो गड़बड़ हो गया। जबकि शिवनंद महाराज देखिए कि उनका एक परफेक्ट ट्रेजेक्टरी चला है। पहले ठाकुर के भक्त ही थे किंतु फिर बाद में कहते हैं कि देखो मैं बहुत दिनों से मैं निराकार भाव में रह रहा हूं। जब वह बहुत बाद की बात है। बिलुरुरमठ बनने की बात की। उसके बाद में मुझे ठाकुर ने आकर के कहा कि अरे जो निराकार है वही साकार है। माने एग्जैक्ट में भूल गया ठाकुर के क्या शब्द थे। किंतु इसी तरह से पॉइंट आउट करवा दिया कि जो निराकार साकार एक ही है। तो फिर वो महापुरुष महाराज कहते फिर से मैं साकार में आ गया। तो वो जो निराकार भाव में चल रहे थे वो स्वतः स्फूर्त था। उसमें कोई किसी ने स्पर्श करके ऐसे वो एक फिफ्थ गियर में गाड़ी चला करके वो नहीं ले गए थे। जो फर्स्ट गियर में जो गाड़ी चल रहा था वही चल रहा था। और फिर आखिर में क्या कहते हैं? ठाकुर ने कहा है कि जो छह ईश्वर कोटि है तो वह ईश्वर कोटि में महापुरुष महाराज तो नहीं आते किंतु महापुरुष महाराज क्या कहते हैं ठाकुर ने हमको ईश्वर कोटि बना दिया है। माने ईश्वर कोटि होकर जन्म नहीं लिए किंतु साधन भजन करके ठाकुर की कृपा से ईश्वर कोटि हो गए हैं। सो देखिए कि कितनी परफेक्ट ट्रेजेक्टरी उनकी जाती है। ऐसा कोई फ्लेशी चमत्कार वगैरह उनके जीवन में नहीं है। वही जो स्लो एंड स्टेडी उनकी गाड़ी चलती है। जब समय आया निराकार का तो निराकार में चले गए। समय आया साकार का तो साकार में चले गए। समय आया ईश्वर कोटि होने का तो वह भी हो गए। तो कंपेयर टू दैट यह जो गाड़ी एकदम पटरी से निकल गई। सो ये पूरा एक ट्रेजेजरी होता है और ठाकुर परफेक्ट समझते थे कि किसको कब किस चीज का डोज़ देना है। वो जो वैक्सीनेशन का वो पीरियड होता है ना आज यह फर्स्ट डोज़ मिलना है। उसके इतने दिनों के बाद दूसरा डोज़ देना है। उसको आगे पीछे करेंगे तो गड़बड़ हो जाएगा। तो वो टाइम देख के ठाकुर वो डोज़ देते थे। वैक्सीन देते थे।

History of Ramakrishna Bhavdhara from 1836 (birth of Sri Ramakrishna) to 1936 (consecration of Ramakrishna Temple in Belur Math)

एक्चुअली क्या है पता है हम लोग यदि इनका लाइफ को होता क्या है ना प्रॉब्लम यहां पे क्या है एक टेक्नोलॉजिकल एक प्रॉब्लम आ जाता है कि आपको पढ़ना है ये 18 लोगों का लाइफ एक साथ में किंतु इस तरह से लिखने को जाएंगे तो समय और वो जो मींस है वह दोनों बड़े कॉम्प्लिकेटेड हो जाते हैं। आपको कितना लंबा लिखना पड़ेगा? कितने वॉल्यूम्स में वह जाएगा तो होता क्या है कि स्वामी जी की बायोग्राफी पढ़ेंगे। सिर्फ स्वामी जी के बारे में लिखा है। ठाकुर के साथ में जो हुआ कुछ दिनों का उल्लेख है। किंतु ठाकुर का खुद का जीवन किस तरह से आप एक्सप्लोर करेंगे या तो फिर ठाकुर का ट्रेजेक्टरी और स्वामी जी का ट्रेजेक्टरी कहां पे मैच होता है, कहां पे डायव डायवर्जेंस होता है वह आप पूरा पढ़ेंगे एक साथ में तब पता चलेगा। फिर मां को ऐड कीजिए। फिर बाकी सब गुरु भाइयों को एक के बाद ऐड करते जाइए। एक सभी 18 लोगों का एक लाइफ है जिसको कि एक सूत्र में बंधा हुआ है। आपको एक पूरा पढ़ना पड़ेगा फ्रॉम 1836 से लेकर के 1936 कि वो ठाकुर के जन्म से लेकर के बेलूर मठ में मेन टेंपल कंस्ट्रक्ट हुआ वहां तक तो आपको ना सभी का एक रोल पता चलेगा। वरना अभी जैसे कि शारदानंद चरित ब्रह्मानंद चरित ये जो दो किताबें प्रभानंद जी महाराज ने लिखी है वेरी गुड बुक्स। किंतु उसको पढ़कर के ना आपको इन लोगों का स्पेशलिटी क्या है या डेप्थ क्या है वह फिर भी समझ में नहीं आएगा। आपको यू विल हैव टू रीड इट इंटरटाइन विद दिस म लार्जर पिक्चर। तो क्या है कि क्योंकि सबका इस मिनिस्ट्री में रोल है इस मिशन में। विदिन दैट रोल दे आर ग्रेट। आप एक अनरेवल करके एक सिंगल थ्रेड लेके देखेंगे कि अच्छा शरद महाराज ने लीला प्रसंग लिखा। शरद महाराज जनरल सेक्रेटरी थे। शरद महाराज मां के सेवक थे। तो प्रश्न होगा कि यह सब करने में कौन सी बढ़ाई है? आजकल के जो आईएएस ऑफिसर होते हैं, वह जो सीईओ होते हैं या तो फिर यह साइंटिस्ट होते हैं, उन लोगों की अटेंडमेंट तो इससे कई गुना ज्यादा है। वरना ईजीली ज्यादा है। तो फिर उन्होंने मां की सेवा करके क्या बड़ा कर दिया है? करना क्या था मां की सेवा में? मां वो जय राम भाटी से वोलक आती जाती थी कि वही तो एक देखना था। मां जब कोलकाता रहती थी तो भक्तों का मैनेजमेंट ही तो करना था। दिस इज़ नॉट अ रॉकेट साइंस। एक्चुअल साइंस इज़ अ रॉकेट साइंस। दिस इज़ नॉट अ रॉकेट साइंस। तो ऐसा एक प्रश्न हो सकता है। बट दिस इज़ हिज़ रोल वाज़ इंटीग्रल टू ए लार्जर मूवमेंट एंड दिस लार्जर मूवमेंट इज़ गोइंग टू हैव अ फार डीपर इंपैक्ट अपॉन द सोसाइटी। तो दैट इज़ व्हाट वी हैव टू अंडरस्टैंड। ये मैं यहां

हमारे कुछ महान साधु जिन्होंने जमीनी स्तर पर नीरवता से कार्य किया

पे यहां पे गया था। एक पास में एक गांव है। वहां भक्त सम्मेलन था। तो मैं जाकर देखा कि इतना बड़ा मंडप बनाया है। 3 4000 लोग आराम से बैठ जाएंगे। मैंने कहा इतना छोटा सा गांव है। इतना बड़ा मंडप क्यों बनाया तुम लोगों ने? बोला महाराज पूरा भर जाएगा। तो मैं तो मुझे तो विश्वास ही नहीं हुआ। जब भक्त सम्मेलन स्टार्ट हुआ पूरा मंडप भर गया। तब मैंने फिर मैंने वो नरेंद्र की तरह इन्वेस्टिगेशन करना शुरू किया। मैंने कहा माजरा क्या क्या है इसके पीछे? इतने छोटे हमने यहां विशाखापटनम आश्रम में तीन-चार लोग दिखते हैं। इतने छोटे से गांव में तीन-चार हजार भक्त हाउ इज दिस पॉसिबल। फिर उन्होंने पूरा वो डिटेल बताया कि वो राजमुंड्री में एक महाराज थे। अभी तो चल बसे हैं। वो महाराज ने गांव-गांव जाकर के बहुत काम किया है। तो यह सब गांव में उनका नाम फैला हुआ है। यहां पे आप एक नाम देंगे रामकृष्ण का और हजार लोग तो वैसे ही खड़े हो जाएंगे। तो मैंने कहा देखिए अभी वो महाराज का मैं नाम भी भूल गया। बोला था वो पूरा हिस्ट्री सुना उनका मैं भूल गया। सो देखिए कि ऐसे कितने लोगों ने इतना काम किया है ग्राउंड लेवल पर जो कि किसी को पता नहीं है। मैं नागपुर में था तो नागपुर का नागपुर के जो एक सबसे प्रसिद्ध महाराज है आज वो भास्करेश्वरानंद जी तो वहां के साधु उनकी कहानियां कहते थे कि महाराज खुद वो साइकिल लेके वो प्रचार करने के लिए जाते थे। वो जो मेगा फोन होता है ना ऐसा करके वो घूमते रहेंगे गली में और बोलते रहेंगे कि आज शाम को एक महाराज जी का प्रवचन है भास्करेश्वरानंद जी का वो सुनने के लिए आई है तो ऐसा नहीं कहेंगे मेरा प्रवचन है वरना तो फिर कौन सुनने को जाएगा जो इस तरह से वो माउथ पीस लेकर बोल बोल रहा है उनका प्रवचन कौन सुनने को जाएगा इसलिए ऐसा कहते हैं भास्करेश्वर राज जी का प्रवचन है आप आइए सुनने को मैं राजकोट में था तो राजकोट में तो भूतेशानंद जी की इतनी सारी कहानियां है। अरे बाप रे वही सब बात देखिए आत्मस्थानंद जी भी थे किंतु आत्मस्थानंद जी के समय में राजकोट आश्रम की अवस्था बड़ी अच्छी हो गई थी या आज का जो मंदिर है वो उन्होंने ही बनाया तो काफी एक म हो गया था ना इवन इवन हम

हमारे साहित्य में कितनी गहराई है!

ठाकुर मां स्वामी जी की ही बात करें उनके जीवन के इतने कितने पहलू है जो कि हमारी नजरों से अज्ञात है या तो फिर उन्होंने हिंट्स दिया है किंतु हम अभी डिसीफर नहीं कर पाए हैं। अनपैक नहीं कर पाए हैं कि इसका यह यह मीनिंग है। कंप्लीट वर्क्स देखिए नाइन वॉल्यूम में है। अभी नाइन वॉल्यूम मैंने एडिट किया है दो बार फिर भी मैं ऐसा दावा कभी नहीं करूंगा कि मुझे स्वामी जी समझ में आया। अभी भी मुझे ऐसा लग रहा है कि बेरली मैंने आई हैव स्क्रैच द सरफेस। बेयरली स्क्रैच द सरफेस। इतना सब कुछ है। तो जैसे स्वामी जी ने कहा कि दूसरा एक विवेकानंद लगेगा। इस विवेकानंद ने क्या किया वो समझने के लिए। ना देखिए देखिए यह हमारे लिए एक अच्छी बात इस तरह से है कि अभी साधन भजन करना जप ध्यान करना वह कैपेसिटी हम में है कितना वो लिमिटेड है किंतु साहित्य अपना इतना डीप है कि इसकी चर्चा करते करते आप आनंद से लाइफ बिता देंगे आप कभी भी बोर नहीं होंगे दैट इज आवर बेनिफिट थोड़ा सा साहित्य होता और दो-तीन साल पढ़ के छोड़ दिया तो फिर वो अभी बाद प्रश्न होगा अभी क्या करेंगे अभी जब ध्यान करना पड़ेगा वो तो हो नहीं रहा है तो अभी क्या करेंगे बेटर है कि साहित्य इतना डीप है कि पूरा लाइफ टाइम चलेगा। 1/4 तो बेनिफिट मिलेगा। आप कंप्लीट वर्ड्स का एक-एक सेंटेंस ले लीजिए। उसमें और फिर भी ठाकुर का क्या है कि हमको विदिन दी स्पिरिचुअल आउटलुक सब कुछ मैनेज करना है। स्वामी जी का है कि आप यदि स्वामी जी को एनालिसिस करने को जाएंगे तो हिस्ट्री है, साइकोलॉजी है, सोशियोलॉजी है, इको इकोनॉमिक्स है, करंट अफेयर्स है। इतना सब कुछ आ जाएगा। क्यों? एनालिसिस करते-करते आपको 101 लाइफ टाइम तो वैसे ही प्राइमरी एनालिसिस में चले जाएंगे। फिर वो जैसे स्वामी जी का कैलिफोर्निया गए थे तो किसी ने कहा स्वामी जी आप बड़ा लंबा-लंबा बोलते हैं। आपका तो पीरियड तो टाइम तो इतना ही दिया है। अच्छा तो स्वामी जी कहते हैं ठीक है तुम एक काम करना वो जब वो एक घंटा ना कि जितना समय समाप्त हो जाए वो मिस्टर एलन को कहते हैं कि मैं प्लेटफार्म पे खड़ा होऊंगा। स्वामी जी तो खुद तो प्लेटफार्म पे खड़े हैं। बोला तुम आखिर में खड़े रहना वो आखिर में और फिर जब टाइम पूरा हो जाए ना तो उस समय तो वो पॉकेट वॉच होती थी ना वो चैन पे लगी हुई। तो ऐसी पॉकेट वॉच निकालना अपने पॉकेट में से और चैन को लगी हुई है तो ऐसा ऐसा करके घुमाना तो मुझे पता चल जाएगा कि ये एक घंटा बीत गया है ना जितना भी टाइम एलोकेटेड है तो वो मिस्टर एलन ऐसा करके वो पीछे में खड़े रह गए स्वामी जी का टाइम पूरा हुआ वो पॉकेट वो लेकर के ऐसा-सा घुमा रहे हैं तो स्वामी जी कहते हैं अच्छा अच्छा चलो अभी तक तो मैं वो इंट्रोडक्शन दे रहा था अभी मुझे प्रवचन चालू करना पड़ेगा तो 10 15 लाइफ टाइम तो आपके इंट्रोडक्शन में ही चले जाएंगे फिर असली बातों बाद में चालू होने वाली है इसलिए

प्रश्न: ठाकुर भी कभी-कभी निराश महसूस कर सकते हैं, क्योंकि उनसे सीखने की हमारी क्षमता बहुत सीमित है।

इसलिए ठाकुर ने बाद बात बाद में क्या कहा था कैंसर सर गले का दर्द चालू हो गया। कहते हैं कि यह केदार है, फिर यह मास्टर है, यह गिरीश है। ऐसे म ठाकुर कहते हैं कि मैंने मां को प्रार्थना की कि यह जो कुछ लोग हैं उनको कुछ शक्ति दो। तो यह लोग जाकर के भक्तों के साथ बात करेंगे। तो जब भक्तों को यह प्रिलिमिनरी बता देंगे। बाद में भक्त लोग मेरे पास आएंगे तो मुझे वो सब जो मेनम चीजें हैं वही बताने की रहेगी। सब कुछ मुझे बोलना नहीं पड़ेगा। ठाकुर खुद ऐसा मां को कहते हैं। मां काली को कहते

प्रश्न: ठाकुर को हमें सिखाते रहने के लिए 100 साल बाद फिरसे वापस आना होगा।

हैं। 100 साल दो साल या तो 100-100 साल किसको पता? ठाकुर का मैथमेटिक्स तो गड़बड़ था। यहां पे ना दूसरी एक बात क्या है? पता है जैसे जैसे कहते हैं ना कि बुद्ध के के आने के बाद में अशोक को आना पड़ा इसलिए क्योंकि वो बुद्ध का मैसेज को प्रोपगेट कर पाए। इट्स नॉट लाइक के बुद्ध को फिर से अपना मैसेज देना था। किंतु उसको वाइड वाइड उसको स्प्रेड करना था। तो समथिंग लाइक दैट माय हैपन कि इस तरह से वो एक म वो एग्जजेक्टली रिलीजियस पर्सन का स्वरूप नहीं लेकर के कोई भी स्वरूप धारण कर सकते हैं। पॉलिटिशियन व्हाटएवर जो कि समाज में उसको वाइड स्प्रेड करें क्योंकि अभी नया मैसेज देने की जरूरत नहीं है। कथामृत में जो है वह अल्टीमेट है। उससे और दूसरा कथामृत पार्ट टू लिखेंगे तो कंफ्यूजन हो जाएगा कि इन्होंने ऐसा कहा, इन्होंने ऐसा कहा। सो कथामृत पार्ट वन जो है अपना वो दैट इज इनफ। बट वही है कि उसको हाउ टू स्प्रेड इट वाइड एंड फार एंड वाइड इन द सोसाइटी। पर हो सकता है उस रोल के लिए शायद वो सेकंड टाइम आए।

प्रश्न: वर्तमान में ठाकुर के संदेश को व्यापक रूप से फैलाने का यह बहुत उपयुक्त समय है। विश्व संकीर्ण मानसिकता वाला होता जा रहा है तथा व्यापार और विचारों के प्रति बंद होता जा रहा है।

यह जो आप हिस्ट्री स्टडी करेंगे ना तो देखेंगे कि प्रत्येक युग में इन एव्री एज एक ऐसा पॉलिटिकल पावर खड़ा होता है कि जो कि पूरे वर्ल्ड में वो पीस एस्टैब्लिश करता है। जनरली युद्ध होते रहते हैं। किंतु जैसे ही युद्ध होगा यह जो कॉमर्स है, साइंटिफिक डेवलपमेंट है वह रुक जाता है। तो किसी एक पावर को मिलिटरीली ना कि कैसे भी करके एक पीस एस्टैब्लिश करना होगा। तो अभी जैसे रिसेंट जो हिस्ट्री है उसमें देखेंगे देयर इज पेक्स रोमाना पेक्स मींस पीस ये रोमन वर्ड है रोमाना मींस रोम पीस ऑफ रोम तो रोम ने इतने जहांजहां पे रोम का साम्राज्य था वो एक ही तरह के रोड एक ही तरह के एक्वाडक्ट एक ही तरह की रेवेन्यू सिस्टम एक ही तरह का एडमिनिस्ट्रेटिव सिस्टम तो भीतर भीतर में इतना जो कॉमर्स वगैरह बढ़ गया था कि इट एक्चुअली गव राइज टू ए गुड कल्चरल फ्लावरिंग तो यह जो क्रिश्चियनिटी इसी में फैला पेक्स रोमाना की वजह से जहां-जहां क्रिश्चियन प्रीचर जाएंगे वह जो कॉइन है एक राज्य का दूसरे राज्य में आराम से चल जाएंगे। एक एक राज्य की सिस्टम दूसरे राज्य में आराम से चल जाएगी। लैंग्वेज कंपैटिबल है। सो इट जो चर्च फैला है दैट इज़ बिकॉज़ ऑफ़ पेक्स रोमाना। उसके बाद में देखिए पेक्स ब्रिटनिका कि ब्रिटेन ने जो पूरे विश्व पे उनका जो आधिपत्य था तो जो जहां पे ये पायरेट वगैरह जो अटैक करते थे जहाज को तो ब्रिटेन ने सभी पायरेटेड पर पायरेट अटैक बंद करवा दिए तो फिर ये कॉमर्स है ट्रेडिंग है मर्चेंडाइज है जो इंडस्ट्रियलाइजेशन है पूरे विश्व में फैला जिसका बेनिफिट हमको कोई नहीं मिला उसके बाद में सेकंड वर्ल्ड वॉर के बाद में देयर वास स्पेक्स अमेरिका यानी कि क्या है कि ब्रिटेन तो सेकंड वर्ल्ड वॉर में डाउन हो गया था। तो अमेरिका ने आज तक शांति बनाए रखी थी। यह जो इंटरनेशनल नॉर्म्स जो होते हैं, स्टैंडर्ड्स जो होते हैं, सिस्टम्स जो होती है, अमेरिका ने बना के रखी थी। बट अगेन नाउ वी सी दैट अमेरिका अभी गड़बड़ कर रहा है। सो व्हाट इज द फ्यूचर? देयर आर टू कंटेंडर्स प्रैक्टिकली रियलिस्टिकली स्पीकिंग। वन इज़ चाइना। सेकंड इज़ इंडिया। तो चाइना यदि अभी इफ देयर इज़ अ पेक्स चाइना विल बी वेरी बैड। बिकॉज़ चाइना का जो इंटेंशन है ना वह बड़े ही डेंजरस है। अभी यह अम पिक्स अमेरिकाना या तो फिर यह पिक्स ब्रिटानी का उन्होंने दूसरों पे अटैक अवश्य किया था क्योंकि पीस बना के रखी थी। वी डू नॉट नो अबाउट दैट अबाउट चाइना। सो देयर शुड बी पीस पैक्स रामकृष्णा। मींस श्री रामकृष्णास आइडिया शुड स्प्रेड दिस अराउंड दिस वर्ल्ड एंड मेंटेन द पीस। दिस टाइम हैस कम कि इंडिया शुड स्टेप आउट ऑफ आवर ट्रेडिशनल बाउंड्रीज एंड ट्रेडिशनल रोल एंड अस्यूम द ग्लोबल लीडरशिप। किंतु ऑफ कोर्स अपना घर आपको ठीक करना पड़ेगा। वो पर कैपिटा आपका यदि 34000 का यदि जीडीपी है तो वह तो हम सब सहारन अफ्रीका के लेवल पे बैठे हुए हैं तो वहां से तो थोड़ा ऊपर आना पड़ेगा। म पोटेंशियल इज देयर बट वी डू नॉट नो कि वह कब यह होगा फ्रुक्टिफाई कब होगा।

प्रश्न: आज कई युवा नौकरी के लिए अमेरिका या यूरोप नहीं जाना चाहते। वे भारत में काम करना चाहते हैं।

किंतु यह दिस इज नॉट नेसेसरीली अ गुड न्यूज़। देखिए वहां पर जाते थे तो वहां की टेक्नोलॉजी समझ करके उन लोगों का एनरिचमेंट होता था। तो इन फ्यूचर वो इंडिया में आकर के कुछ कंट्रीब्यूट कर सकते हैं। टुडे अभी जो परिस्थिति है वहां पे यदि गड़बड़ हो रहा है तो एक डोमेस्टिक लेवल पे कोई गुड न्यूज़ अपने पास में नहीं है। हमारा रेयरली आपको देखने को मिलेगा। ऐसा कोई इंस्टीट्यूशन यह इंडियन इंस्टट्यूट ऑफ़ साइंस, आईआईएससी है वगैरह ऐसा कुछ चंद इंस्टीट्यूशन देखने को मिलेंगे। टीआईएफआर है। कि जहां पर जेन्युइन रिसर्च वगैरह हो रहा है। वरना अभी यह सुंदर पिचाई है ना कि इस तरह के जो लोग हैं आपको पता है कि यह जो एआई के पीछे का जो फंडामेंटल पेपर जो लिखा गया है द अटेंशन इज़ ऑल यू नीड। यह Google की ओर से Google के साइंटिस्टों ने पब्लिश किया था ट्रांसफार्मर। तो ये ट्रांसफार्मर इज़ एट द हार्ट ऑफ़ टुडेेस एआई रिवोल्यूशन। तो उसके पीछे में वन ऑफ़ द ऑथर इज़ इंडियन। दो ऑथर ना एक ऑथर है जो जो कि इंडियन है। अभी वह इंडियन इंडिया में रहता तो क्या ऐसा कुछ पब्लिश कर पाता? उसको जो एक जो एटमॉस्फियर मिला रिसर्च करने के लिए जो एक टीम उसको मिला व्हिच वाज़ पॉसिबल ओनली बाय Google जो कि आंख बंद करके पैसे लगाता था। इंडिया में ऐसा कुछ नहीं है। देयर इज़ नो इक्विवेलेंट टू Google रिसर्च या तो फिर माइक्रोसॉफ्ट रिसर्च वगैरह। सो वहां पे नहीं जा रहे। दिस इज़ नॉट नेसेसरीली अ गुड न्यूज़। फिर टैलेंट वेस्ट

प्रश्न: हमें अपनी values फैलाने की आवश्यकता है। ठाकुर के विचारो को फैलाने की आवश्यकता है.

होगा। ठाकुर मां स्वामी जी तो हमारे द्वारा करवाएंगे ना। हमको अपने को देख के विश्वास नहीं आ रहा है कुछ। तो गिरीश ने

प्रश्न: एक ओर ठाकुर कहते हैं कि साधु को दिन में देखो और रात को देखो तब उस साधु पर विश्वास करो। दूसरी ओर, गिरीश घोष कहते हैं कि अगर मेरी आंखें नरेन को कुछ गलत करते हुए देख लें तो मैं अपनी आंखें निकाल लूंगा। इन दोनों में से क्या सही है?

आकर के ठाकुर का यह ट्रेजेक्टरी वाला कैलकुलेशन पूरा गड़बड़ कर दिया था। ठाकुर सोचते हैं मास्टर महाशय अभी डाउट कर रहे हैं। अभी उनको बताना नहीं है मैं अवतार हूं। किंतु जैसा गिरीश आया वो सब कैलकुलेशन हवा हो गए। गिरीश चिल्ला-चिल्ला करके बोल रहा है ठाकुर अवतार है। ठाकुर अवतार है। वो जो गिरीश को देख के तो ट्रिगर हो गया पूरा मामला। ना मुझे ऐसा नहीं लग रहा है। वो वो जो काली पूजा वाली बात है ना वो देखिए वो अपने शरद महाराज खुद डाउटफुल है। काली पूजा की रात को सब व्यवस्था करवाई पूजा की। किंतु ना ही मूर्ति है ना ही पूजक है। सब वो फूल थाले में फूल सजा के रखा है। एकाएक हुआ ऐसा कि गिरीश ने फूल ले ठाकुर के चरणों में अर्पित किए और साथ-साथ में ही ठाकुर समाधिस्थ हो गए। फिर शरद महाराज लिखते हैं कि हमको बताना मुश्किल है कि कौन सी चीज पहले हुई। हो सकता है मतलब हमारी तरफ हमारा पर्सनल ऐसा मानना है कि गिरीश के विश्वास ने ही ठाकुर को समाधि में जाने से प्रेरित किया होगा। दिस इज़ माय इंटरप्रिटेशन। बट वो जहां तक वो हाई स्पीड कैमरा नहीं लगाएंगे वी डू नॉट नो कि एक्चुअली क्या हुआ था। अर्जुन का उदाहरण आप द्वैत अद्वैत दोनों की दृष्टि से देख सक देख सकते हैं। अद्वैत की दृष्टि से तो यह हो गया। भगवान कृष्ण जो दिखाते हैं वही दिखता है। अद्वैत की दृष्टि से देखिए कि जो टारगेट है अपना आत्मन वही सत्य है जगत मिथ्या है। तो वो द्रोणाचार्य ने पूछा कि वो चिड़िया बैठी हुई है पेड़ पे उसकी आंखों में तीर मारना है। तो तब सबको क्या दिख रहा है? तो कोई किसी को पेड़ दिखता है, किसी को फल दिखता है, किसी को डाली दिखती है। अर्जुन ने क्या उत्तर दिया? पंख की आंख ही दिखती है और कुछ नहीं दिखता। यानी यह उदाहरण अर्जुन का आप दोनों में दे सकते हैं। द्वैत और अद्वैत दोनों में। अच्छा गिरीश का आप इस तरह से दे सकते हैं क्या कि द्वैत और अद्वैत दोनों में द्वैत का तो एकदम पक्का है कि ठाकुर के प्रति म नरेंद्र के प्रति श्रद्धा ऐसी है कि जो नरेंद्र करेगा वही सही। मेरी आंखें गलत। किंतु अद्वैत का उदाहरण इस तरह से दे सकते हैं क्या? देखना पड़ेगा नहीं ना वो तो छोड़ ही दीजिए कि

प्रश्न: स्वामीजी की रेशनालिटी इतनी महान थी कि उन्होंने ठाकुर के अंतिम समय भी उनके अवतारत्व पर प्रश्न उठाया था। दूसरी और गिरीश घोष का विश्वास कितना गहरा था !

ठाकुर के रहते रहते हैं। खुद के जीवन के आखिरी तक वो जो बेलूर मठ की प्रसिद्ध घटना कि जब ठाकुर को एस्टैब्लिश किया वहां पे बेलूर मठ बन गया। बेलूर मठ बनने के बाद में स्वामी जी प्रश्न करते हैं कि ठाकुर यदि यहां पे सही में हुए तो फिर उस समय एक बड़े राजा वहां कोलकाता शहर की मुलाकात के लिए आए थे। बड़े महाराजा कोई किसी स्टेट के तो स्वामी जी सोचते हैं यदि वह महाराजा बेलूर मठ की मुलाकात के लिए आए तो मैं उन्हें मानूंगा कि ठाकुर यहां पे सही विराजमान है। फिर वह स्वामी जी गए कोलकाता किसी काम से तो महाराजा जा रहे थे तो सेवक को भेजा कि जाओ देख के आओ वहां पर कि स्वामी जी है कि नहीं वह खुद गाड़ी में बैठे हैं बाहर वो सेवक ने आकर कहा कि नहीं वह तो बेलूर मठ में नहीं है स्वामी जी वो कहीं कोलकाता में गए हैं तो महाराजा चले गए स्वामी जी वापस आए तो गुरु भाइयों ने कहा वो महाराजा यहां पे आए थे तब स्वामी जी ने आश्चर्यचकित हो गए और अपने गुरु भाइयों को कहा कि देखो मैंने इस तरह से वो सोचा था अपने मन में कि यदि महाराजा आएंगे तो है कि ठाकुर यहां पर सही में विराजमान है तो गुरु भाई लोग भी बड़े खुश हो गए कि चलो यहां पे कि महाराजा आए दैट मींस कि ठाकुर यहां पे सही विराजमान है। उन्होंने यह प्रश्न नहीं किया नरेंद्र को इंटर्न कि भाई तुम्हारा आखिरी दिन चल रहा है। तुम अभी तक क्यों डाउट कर रहे हो? वो जो फुग्गा फोड़ वो जो बलून होता है ना बलून बहुत बढ़ जाता है तो पिन मार के उसको फोड़ देना है। ऐसा वो गिरीश थे। वो जो स्वामी जी जब यह कहानी कह रहा है कि मैं परिवराजक था वो जा रहा था। वो देखा एक आदमी को हुक्का पी रहा है तो मैं बैठकर के उसको पूछा कि मुझे भी हुक्का दो तो उसने कहा मैं तो हूं कैसे आपको हुक्का दूंगा तो स्वामी जी एकदम कहते हैं मेरा संस्कार ऐसा है ना वो खड़े होकर जाना शुरू कर दिए फिर कुछ चलने के बाद में पता चला अरे ये मैं यदि ऐसा सोच रहा हूं कि वो में उच्च जाति का तो कैसे चलेगा वापस गए जोर जबरदस्ती से हुक्का खींच करके हुक्का पीना शुरू किया तो सभी लोग बड़े इंप्रेस हो गए देखिए स्वामी जी कितने महान है वो गिरीश वो बलून में वो ऐसा पिन मारता है कहता है कि तुमको हुक्का कच्चा पीने का हैबिट ऐसा है कि के हाथ से भी खींच करके तुम पी लोगे। तो गिरीश कहता है ना कि नरेंद्र हार गया है मेरे सामने आर्गुमेंट में। तो नरेंद्र कहता है नहीं नहीं उसका विश्वास इतना है कि अभी मुझे आर्गुममेंट नहीं करनी है इसके आगे। वो जो शरदचंद्र चक्रवर्ती का है ना स्वामी जी बैठकर के उसको वेद वेदांत ने उपनिषद सब समझा रहे हैं। तो एकाएक गिरीश घोष आ गए। थोड़ी देर तो सुना नरेंद्र को उड़ने दिया। फिर वह पिन मारा वो उसमें कि अच्छा देखो नरेंद्र तुमको पता है समाज की जो भीषण अवस्था है जो अच्छे घर की बहुओं को भी ऐसी हालत है कि उनको इतने मतलब दुराचार सहन करने पड़ रहे हैं गरीबी है भुखमरी है विधवाओं की अवस्था है अनाथों की अवस्था है तो इसके बारे में तुम्हारा वेदांत क्या कहता है बताओ तो बड़ा इनोसेंटली पूछते हैं तो स्वामी जी की आंखों में आंसू आना शुरू हो गए वहां से खड़े हो के चले गए फिर वो शरद चंद्र कहता है महाशय आपने ये सब अच्छा सा हमारा चर्चा कर चल चल रहा था वेद वेदांत का उसमें आकर के आपने कहां स्वामी जी का मूड बिगाड़ दिया तो फिर गिरीश क्या कहता है देखो तुम्हारे स्वामी जी को मैं इसलिए नहीं मानता कि वो वेदांत के पंडित है इसलिए मानता हूं कि उनका हृदय सागर की तरह विशाल है जो म आत्मीय आत्मीय का क्या अर्थ है

प्रश्न: गिरीश स्वामीजी के स्वभाव को अच्छी तरह से जानता था!

आपके पिताजी आपकी मां यह लोग ऐसे हैं कि जिनके बारे में आपको सब कुछ पता है वो आपसे कोई छुपा नहीं पाएंगे पिताजी या मां या भाई-बहन यदि दुखी है तो आपसे छुपा नहीं पाएंगे पता चल जाएगा कि यह खुश है, दुखी है, क्या है उनके मन के भीतर में? उसको कहते हैं आत्मीय। यह आत्मीयता पे अपना-अपना संघ बना हुआ है। नहीं कि यह लोग टीचर है, हमको सीखना है तो इसके लिए आए हैं या जीवन में शॉर्टकट मार के कुछ कर लेंगे। उसके लिए

प्रश्न: पहले स्वामीजी ने गिरीश को भड़काते हुए कहा कि तुमने कोई शास्त्र क्यों नहीं सीखा। इसीलिए गिरीश ने उन्हें गरीबों की गंभीर स्थिति के बारे में बताया।

नहीं। गिरीश को बदला तो लेना ही [हंसी]

प्रश्न: क्या होता अगर स्वामीजी ने काशीपुर में अभेदानंदजी के बजाय गिरीश घोष को छू लिया होता?

होगा। गिरीश को स्पर्श करने से हो सकता है स्वामी जी को ही करंट लग जाता। किसको? एकदम लाइव वायर फेथ था उनका।