प्रार्थना
ओम स्थापकाय धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय रामकृष्णायते नमः श्री श्री रामकृष्ण कथामृत श्रीमद्
श्रीरामकृष्ण के सान्निध्य में दक्षिणेश्वर के दिव्य-आनंदमय दिन
द्वारा लिपिबद्ध मास्टर महाशय दक्षिणेश्वर में आए हैं रहने के लिए तो उन दिनों की कहानी हम देख रहे हैं 14th दिसंबर से अह फिफ्थ जनवरी तक का रिकॉर्ड हमारे पास में है। 14th दिसंबर 1883 टू फिफ्थ जनवरी 1884। तो इतने दिन मास्टर महाशय वहां पर रहते हैं। एक्चुअली कौन से दिन वो दक्षिणेश्वर उन्होंने त्याग किया छोड़ा इसके बारे में मैं श्योर नहीं हूं। क्योंकि मास्टर महाशय ने ऐसा स्पष्ट रूप से नहीं लिखा कि मैंने इस दिन दक्षिणेश्वर छोड़कर के मैं अपने घर वापस आया। किंतु फिफ्थ जनवरी को जो लास्ट वार्तालाप होता है ठाकुर के साथ में उनका तो ठाकुर उनको कहते हैं कि तुमने तो बहुत कुछ देखा सुना। अभी तुम घर जाओ और घर में जाकर के बीवी बच्चों का संभाल रखो। किंतु देखना कि जैसे वह तुम्हारे अपने नहीं है। अपने तो सिर्फ ईश्वर ही है। ऐसा करके वह आखिरी वार्तालाप है। तो मुझे ऐसा लग रहा है कि यह फिफ्थ जनवरी को यह वार्तालाप हुआ। उसके बाद में मोस्ट प्रोबेबबली मास्टर महाशय सिक्स्थ जनवरी ना कि ऐसा कुछ अपने घर वापस आए होंगे। तो जो भी है यह इतने दिनों का वार्तालाप हम लोग देख रहे हैं और हमने यह भी देखा था कि क्यों मैंने यह पीरियड एक सिलेलेक्ट किया है। क्योंकि क्या है कि देखिए अनफॉर्चूनेटली डायरेक्ट डिसाइपल्स में से किसी ने भी ठाकुर के साथ में जो वार्तालाप हुए हैं उनके उसका कोई डिटेल नोद रखा नहीं है। डिटेल कोई उन्होंने नोट्स नहीं रखा है। तो इसका परिणाम यह है कि जो बाकी भक्तों ने दूसरे भक्तों के सामने गृहस्थों के सामने जो वार्तालाप हुआ था वही सब रिकॉर्डेड है। त्यागी भक्तों के साथ में जो वार्तालाप है स्पेशल वार्तालाप हमको पता है कि लीला प्रसंग में खास करके शरद महाराज कहते हैं कि ठाकुर अपने त्यागी संतानों को जब त्याग की शिक्षा देते थे। जब वैराग्य का उपदेश देते थे तो वह ख्याल रखते थे शोर कर लेते थे कि बाकी सब गृहस्थ भक्त तो वहां पर नहीं है तो और इवन कथामृत में भी हमने देखा कि यह रात हुई है नरेंद्र वगैरह त्यागी संतान ठाकुर के वहां दक्षिणेश्वर में रहने वाले हैं। रात रुकने वाले हैं और ठाकुर फिर ये गृहस्थ भक्तों को कहते हैं कि ठीक है अभी तुम लोग आओ तो ऐसा करके इन लोगों को विदाई कर देते हैं। तो वो जो हम लोगों की दृष्टि से जो सबसे ज्यादा क्रूशियल जो डिस्कशन था ठाकुर का अपने त्यागी संतानों के साथ में उसका बहुत ही अल्प नोद हमारे पास में है। लीला प्रसंग में कहीं-कहीं पर एक दो उल्लेख मिल जाएंगे और प्रत्येक त्यागी संतान ने ठाकुर के साथ में क्या वार्तालाप हुआ उसका कुछ कुछ तो रखा है। जैसे कि प्रथम मुलाकात के समय तुरियनंद जी कि ये ठाकुर इतना सब थाले में इतनी सारी चीजें खा रहे हैं। तो वो देखकर के उनको थोड़ा सा संदेह हुआ था ठाकुर के ऊपर में। सेम चीज ये अपने विज्ञान महाराज की कि ठाकुर इतना सब थाले में इतनी अच्छी-अच्छी चीजें ले खा रहे हैं। तो क्या है कि इन लोगों ने जो थोड़ा बहुत कुछ बताया है वह हमारे पास में है। किंतु जो एकदम हाईएस्ट स्पिरिचुअल उपदेश जो कि ठाकुर ने त्यागी संतानों को दिए हमको उसमें से बहुत कम पता है। फिर बादबाद में स्वामी जी ने अमेरिका जाकर के और भारत आकर के जो प्रवचन दिए हैं, पत्र जो लिखे हैं, आर्टिकल लिखे हैं, उसके माध्यम से ठाकुर की वो जो सीक्रेट टीचिंग्स है, उसका एक अंदाज शायद हमको आ सकता है। किंतु जो भी है मोर और लेस दैट पोर्शन इज लॉस्ट टू अस। तो अभी क्या है कि एक जनरल ठाकुर डिस्कशन करते हैं। वह तो कथामृत में भी और अन्य कुछ-कछ जगह है। देखेंगे आप जैसे कि यह राम रामचंद्र है। यह सुरेश है। ऐसे कुछ-कुछ लोगों ने ठाकुर के उपदेशों का संग्रह उसी समय ठाकुर के रहते-रते ही पब्लिश करना शुरू किया था। यह ठाकुर के रहते-रहते ही यह ब्रह्म समाज के पत्र-पत्रिकाओं में न्यूज़ पेपर्स में वो सब आना शुरू हो गया था। किंतु एक जो एक इंटिमेट जो वार्तालाप होता है, डिस्कशन होता है, वह हमको यहां पर एक जगह पर मिलता है कि चलो एटलीस्ट भले ही चाहे मास्टर महाशय गृहस्थ भक्त है, किंतु जो सबके सामने जो एक जनरल फिलॉसोफिकल डिस्कशन होता है, इसके अलावा ठाकुर स्पेसिफिकली अपने भक्तों को क्या-क्या बताते हैं उनके साथ। ठाकुर जब भक्तगण नहीं रहते हैं तो किस तरह से रहते हैं? ठाकुर का एक डेली लाइफ किस तरह का होता है? वो एक बहुत ही अपनापन जैसा जैसे कि हम अपने खुद के परिवार जनों के साथ में वार्तालाप कर रहे हैं। परिवार जनों को हम किस तरह से इंटिमेटली पहचानते हैं। तो वैसे ही ठाकुर का एक दूसरा तरह का एक हमको परिचय इन सब इन कुछ दिनों में हमको मिलता है। और इसी दिनों में हमने कुछ-कुछ सरप्राइजज़ ऑलरेडी देख ली कि ठाकुर के पास में जब फ्री समय होता है तो यह प्रहलाद चरित है या तो फिर यह भक्तमाल है वगैरह जो धार्मिक ग्रंथ है उसका पाठ करते रहते हैं। सो वि इज वेरी सरप्राइजिंग क्योंकि मैं खुद ऐसा मानता हूं कि ये धार्मिक ग्रंथों का पाठ यह हमारे आध्यात्मिक जीवन में एक बहुत बड़ी साधना के रूप में हम इसको इंक्लूड कर सकते हैं। तो किंतु क्या है देखिए कि यह सब तो हमारे जैसे आम आदमियों के बारे में एक जनरल कैटेगरी के जो साधक हैं उनके बारे में जो स्पेशल कैटेगरी में जो ठाकुर आते हैं वह भी इस तरह से धार्मिक ग्रंथों का श्रवण या तो फिर यह पौराणिक कहानियों का श्रवण करें तो हमको भी थोड़ा सा सध्यारा मिलता है कि खास करके जैसे मैंने एक बार बताया था ट्रेनिंग सेंटर में जब में था बेलूर मठ में तो वहां पे एक रात को जप यज्ञ होता है सैटरडे नाइट को तो सपोजिटली कि संडे को फ्री डे है पांच क्लास वैसे तो होते हैं संडे को पांच क्लास नहीं होते किंतु क्या है वो रूम क्लीनिंग वगैरह करना पड़ता है वो स्पेशल ड्यूटी देते हैं तो वह ऐसे पांच क्लास जैसा ही वो डेली पांच क्लास जो होते हैं वैसे जनरल डेज में तो वैसा ही माने आपको फिजिकल एग्जॉस्ट इतना ही होगा तो एनी एनीवे सपोजिटली संडे फ्री है कोर्ट अनकोट फ्री तो सैटरडे पूरी रात जग करके जप करना है। तो यह जप यज्ञ वहां पे होता है ट्रेनिंग सेंटर में। फिर टीसी के बाद में मेरा पोस्टिंग लिमड़ी हुआ था तो मैंने सोचा कि मैं यह ट्रेडिशन चालू रखूंगा और सैटरडे नाइट बैठकर के पूरा रात जप करूंगा। किंतु वो मेरे ख्याल से मैंने शायद एक ही सैटरडे इस तरह से किया और फिर कभी भी मैंने उस दिन से लेकर के आज दिन तक मैंने कभी भी पूरी रात बैठकर के जप नहीं किया तो क्या है एक गिल्ट फीलिंग बन जाता है कि एक साधु का एक स्टैंडर्ड होना चाहिए साधना का तपस्या का वो मैं मेंटेन क्यों नहीं कर पा रहा हूं जो कि हमने ट्रेनिंग सेंटर में सीखा था वह सब माने जिस तरह से एक आइडियल लाइफ बिल्ड करना है वो क्यों नहीं होता है मेरे से? तो वह एक गिल्ट फीलिंग जैसा तो रहता ही है। हम लोग वह जो एक कष्ट एक तिततीक्षा जो हम वहां पर करते थे उसको अभी यहां पे स्वाध्याय के द्वारा हमने रिप्लेस कर दिया है। कॉपी पेस्ट कर दिया है। ततीक्षा की जगह स्वाध्याय बिठा दिया है। मेरी सबसे बड़ी तपस्या कहो यदि आज के माने एज ऑफ टुडे तो वही है कि मैं यह सब ठाकुर मां स्वामी जी की किताबें पढ़ता रहता हूं और यथाशक्ति जप करता रहता हूं। इसके अलावा और ज्यादा कुछ होता नहीं है। तो क्या है कि यह गिल्ट फीलिंग जब अपने मन में होती है तो यदि हम ठाकुर को स्वयं यह धार्मिक ग्रंथों का श्रवण करते सुनेंगे तो हमको भी थोड़ा सा सध्यारा मिलेगा कि ठाकुर जैसे ठाकुर भी यह सब करते हैं। यानी कि हम बिल्कुल 100% गलत नहीं है। और एक जन्म आएगा जबकि ठाकुर हमको और ज्यादा फिजिकल और मेंटल फिटनेस देंगे और ज्यादा ततीक्षा करेंगे और ज्यादा तपस्या करेंगे। तो वह अगले जन्म के लिए रख करके अभी इस जन्म में फिर ठाकुर का यह जो कथामृत है उसका पाठ आगे बढ़ाते हैं। यहां पर ऑलरेडी हमने देखे कि 15th दिसंबर के दिन यह हम यानी कि 14th दिसंबर को मास्टर महाशय रहने के लिए आए थे। यह 15th दिसंबर है उनका फर्स्ट फुल डे दक्षिणेश्वर में तो उसमें पहला जो पॉइंट ऑलरेडी हमने डिस्कस कर लिया प्रहलाद चरित इसके बाद में दूसरा पॉइंट है किंतु देखिए कि ठाकुर हम लोगों ने यदि यह ठीक किया है कि ततीक्षा 100% निकाल देंगे जीवन में से तो भी तो नहीं चलेगा क्योंकि यहां पे एक और ठाकुर पौराणिक कहानियों का श्रवण तो कर रहा है किंतु दूसरी ही और ठाकुर बड़े ही कठोरता पूर्वक बड़े ही क्रोध पूर्वक कह देते हैं कि यह सांसारिक जो वासनाएं हैं यह इंद्रियों के सुख भोग है उसमें यदि हमारा मन रहेगा और फिर हम यदि ऐसा दावा करेंगे कि मैं आध्यात्मिक मार्ग का पथिक हूं या तो फिर मैं साधु होना चाहता हूं या साधक होना चाहता हूं। ईश्वर प्राप्ति मैं करना चाहता हूं तो यह दोनों चीज एक साथ में कभी भी नहीं चलेगी। तो यह जो पॉइंट है हमने थोड़ा सा पढ़ा था। हम आज पहले से ही इस पॉइंट को पढ़ते हैं। और दूसरी बात कि जिस तरह से हम लोग लेक्चर फ्रॉम कोलंबो टू अल्मोड़ा स्वामी जी का उसका वो जो लेक्चर है माय प्लान ऑफ कैंपेन वो है लेक्चर बहुत लंबा तो मैंने क्या किया है? उसमें पॉइंट्स बना दिए हैं। तो जिससे कि हम पॉइंट बाय पॉइंट जाए तो हमको पढ़ने में भी चिंतन करने में भी एनालिसिस करने में सुविधा रहेगी। तो यहां पर भी कल बैठकर के मैंने यह जो यह के कितने दिन होंगे 13 दिन ना कि 15 दिन जितने भी होते हैं इसमें मैंने पॉइंट्स बना दिए हैं। तो जिससे कि क्या है कि हमको पढ़ने में और एनालिसिस करने में सुविधा रहे। तो यह जो पॉइंट है उसमें ठाकुर इंद्रियों के जो भोग है उसके प्रति अपनी तृष्णा है इसके प्रति जो वासना है इसके प्रति अपना क्रोध व्यतीत कर रहे हैं। अपना एक तरह से कठोर रूप से हमको बता रहे हैं कि यह जो संसार और यह ईश्वर के प्रति प्रेम, संसार के प्रति आसक्ति और ईश्वर के प्रति प्रेम यह दोनों चीजें एक साथ में कभी नहीं जा सकते। हां, ऐसा नहीं कहते ठाकुर कि हम सभी गृहस्थों को गृहस्थ आश्रम त्याग करके सन्यास ले लेना चाहिए। ठाकुर ऐसा कभी नहीं कहते। किंतु ठाकुर अवश्य यह कहते हैं कि यदि एक दो संतान हो जाते हैं तो फिर आपको धीरे-धीरे करके अपने मन को ईश्वर की ओर ले जाना है। और जब ठाकुर यह कहते हैं तब तो हमको पता है कि यह वही बात हुई जो कि अपने सनातन हिंदू धर्म में ऑलरेडी थी कि यह गृहस्थ आश्रम के बाद में 50 साल जब हो जाते हैं उम्र तो वानप्रस्थ आश्रम की ओर और इवेंचुअली सन्यास आश्रम की ओर जाना है। यानी कि त्याग है सबके जीवन का उद्देश्य है अवश्य। किंतु वही बात है कि त्याग की ओर ले जाने का रास्ता जो है वह दो रास्ते हैं। एक तो है कि आप ब्रह्मचर्य आश्रम अर्थात कि विद्यार्थी अवस्था के बाद में सीधा त्याग के रास्ते पर चले जाइए। सन्यास आश्रम में प्रवेश कर लीजिए। और दूसरा है कि ग्रेजुअल रास्ता है। स्लोली एंड ग्रेजुअली सन्यास की ओर जाइए। ब्रह्मचर्या आश्रम अर्थात कि स्टूडेंट डेज वह समाप्त होते हैं। तो गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करके गृहस्थ के जो धर्म है उसका पालन करें और फिर इवेंचुअली वानप्रस्थ आश्रम में जाए। यानी कि घर में ही रहना है किंतु धीरे-धीरे करके रिस्पांसिबिलिटीज को छोड़ते जाना है और फिर इवेंचुअली सन्यास धारण करना है। और ऐसा भी नहीं है कि आजकल तो कि आपको घेरुआ पहन के वगैरह जो एक विधिवत सन्यास है वह लेना है। मन से यदि त्याग किया तो भी चलेगा। ठाकुर ने कहा ना कि यह सब देखिए आप घर में रहकर के साधना करते हैं अच्छी बात है। यह भिक्षा वगैरह की सुविधा होगी। तो इसीलिए दो रास्ते हैं त्याग की ओर ले जाने के लिए। एक तो ब्रह्मचर्य आश्रम से डायरेक्ट सन्यास आश्रम। दूसरा है ब्रह्मचर्य आश्रम से गृहस्थ आश्रम, वानप्रस्थ आश्रम और सन्यास आश्रम। तो फिर ठाकुर यहां पर निंदा क्यों कर रहे हैं? क्रोध क्यों कर रहे हैं? यदि आपने गृहस्थ आश्रम का रास्ता चुना है वो तो धर्म के अनुसार ही है तो फिर ठाकुर क्रोध क्यों कर रहे हैं? तो ठाकुर क्रोध इसलिए कर रहे हैं कि यदि आपने गृहस्थ आश्रम वाला पीरियड जैसे ही समाप्त होता है धीरे-धीरे करके वानप्रस्थ की ओर आपने प्रवेश अग्रसर नहीं होते हैं। उसकी ओर आपकी जर्नी आपकी यात्रा नहीं चलती है। यदि और ज्यादा से ज्यादा संसार में बंधन संसार के बंधन में बंधते ही जाएंगे तो वो बात गलत है। क्योंकि यदि देखिए इस जन्म में नहीं तो अगले जन्म में अगले जन्म में नहीं तो उसके बाद के जन्म में यह जो संसार है यह जो जीवन है हमको इवेंचुअली इतना कष्ट देने ही वाला है कि संसार के भोग और तृष्णा के प्रति अपनी यह जो यह उपरति जो है या तो फिर यह कहेंगे कि उनके प्रति अपना यह जो विष्णा है वह प्रकट होना शुरू हो ही जाएगी तो तो फिर व्हाई कैन व्हाई डोंट वी मेक अ स्मार्ट चॉइस? ये जन्म जन्मांतर की वो मार खा करके आखिर में अकल आए तो व्हाई डू वी टेक दैट डंब पाथ? व्हाई कैन नॉट वी मेक अ स्मार्ट चॉइस कि हां चलो ठाकुर ने कहा है ठाकुर के ऊपर श्रद्धा है तो धीरे-धीरे करके यदि 50 साल हो गई है अपनी एज तो क्यों नहीं धीरे-धीरे करके अभी वो ज्यादा से ज्यादा ईश्वर की ओर मन लगाएं तो क्योंकि मास्टर महाशय गृहस्थ है। ठाकुर उनकी निंदा या तो फिर उनके सामने यह इंद्रियों के सुख की निंदा इसलिए नहीं कर रहे हैं कि वह गृहस्थ है और त्यागी उनको होना चाहिए था। इसके लिए नहीं। ठाकुर को पता है कौन किस रास्ते पर जाने के लिए अधिकारी है। उच्च मंद वैराग्य किसका है? मध्य मध्यम वैराग्य किसका है? यह तीव्र वैराग्य किसका है? तो यह जिसका जितना वैराग्य है उसी के अनुसार उसको उस रास्ते पर जाना है। किंतु यदि जिस रास्ते पर आपने एक बार जाना शुरू कर दिया तो फिर उस रास्ते का जो लॉजिकल कंक्लूजन है वहां तक आपको जाना होगा। संसार में पड़े हैं और जैसे ठाकुर कहते हैं कि वह एक आदमी को देखा वृद्ध हो गया है। फिर भी ताश खेलता है। पत्ते खेलता है। और क्या कहता है कि मैं बिना कुछ किए रह नहीं पाऊंगा। कुछ ना कुछ तो कर्म करना ही पड़ेगा। तो फिर ठाकुर को इस तरह से क्रोध करना पड़ता
काम-वासना में आसक्त लोगों पर श्रीरामकृष्ण का प्रखर आक्रोश
है। क्या कहते हैं ठाकुर लज्जा हो ना छेले होए गए छे आबा स्त्री शंगो लज्जा नहीं होती है क्या लड़के हो गए हैं पुत्र संतान हो गए हैं और फिर स्त्री संग करते हैं घृणा कोना घृणा नहीं करती है क्या पशु देर मतो व्यवहार पशुओं की तरह व्यवहार नाल रक्त मोल मूत्र यही सब घृणा करें नाल रक्त मल और मूत्र इसी को लेकर के इसी से तो देह बना है पंचमहाभूत का और इसी देह के प्रति आकर्षण यह सब करने से क्या घृणा नहीं होती है जे भगवान पादो पदो चिंता कोरे तार परोमा सुंदरी रमणी चितार भस बोले बोध होए जो भगवान के पाद पद्म का चिंतन करता है उसको परम सुंदरी रमणी भी परम सुंदरी स्त्री भी चिता की भस्म जैसी उसको महसूस होती है। उसको इस तरह का बोध होता है। देखिए कि यहां पे अगेन हमको समझना है कि यह इस तरह के उपदेश है जो कि ठाकुर अपने त्यागी संतानों को कहते थे। इस तरह के जो उपदेश जो कि जनरली आपको कथामृत में ज्यादा देखने को नहीं मिलेंगे। कथामृत में आप ज्यादा से ज्यादा यह प्रेम, भक्ति, भाव यही सब आपको देखने को मिलेगा। किंतु यह हार्ड कोर वैराग्य जिसको कहते हैं कोर वेदांत वेदांत का हार्ट क्या है? यही कि दैहिक सुख के प्रति वितृष्णा यही वेदांत का हार्ट है। तो इसीलिए इस तरह की शिक्षा ठाकुर अपने त्यागी संतानों को देते थे। तो फॉर्चूनेटली देखिए कि मास्टर महाशय ने ठाकुर के साथ में जो अंगत उनके जो वन टू वन वार्तालाप हुए उसमें से यह जो कुछ है उसको हमारे लिए नोट करके रखा है। जे शरीर थाकबे ना जार भीतर क्रूमि क्लेद श्लेषमा जतो प्रकार अपवित्र जिनिश से शरीरनी आनंदो लज्जा होई ना जो शरीर रहने वाला नहीं है जो शरीर क्षणभंगुर है जो शरीर जन्म मृत्यु जरा व्याधि के कालचक्र में फंसा हुआ है जिसके भीतर में क्रूमि क्लेद श्लेष्मा सब तरह की अपवित्र चीजें भरी हुई है उस शरीर के भीतर में उस शरीर शरीर को लेकर के आनंद लज्जा नहीं होती है क्या? देखिए ये सन्यास जो ट्रेडिशनल जो सन्यासी थे वो इस तरह से दैहिक आकर्षण के प्रति अपना विराग उत्पन्न करने के लिए इस तरह का चिंतन किया करते थे। दूसरों के देह के प्रति भी इस तरह से विराग उत्पन्न होना चाहिए और अपने खुद के देह के प्रति भी। इसीलिए देखिए कि यह जो तोतापुरी थे वो दिगंबर रहते थे। वह इतना कोई अपने बालों की संभाल नहीं रखते थे। देह की इतनी संभाल नहीं रखते थे। किंतु हमको साथ-साथ में यह भी पता है कि इतना हार्ड कोर वैराग्य तोतापुरी ने सीखा। इसके बावजूद उनको आखिर में यह तो स्वीकार करना ही पड़ा कि देह बना है पंचमहाभूत का और पंचमहाभूत का यह देह आखिर में तो शक्ति के इलाके में ही आता है। यानी कि ठाकुर के जीवन में, ठाकुर की कहानियों में, ठाकुर के उपदेशों में जब भी हम कोई भी एक पर्टिकुलर उपदेश का पाठ करते हैं, श्रवण करते हैं, तो हमेशा यह बात साथ में रखनी है कि इसका एक कॉम्प्लीमेंट्री एस्पेक्ट भी होता है। कभी-कभी हम एक उपदेश पढ़कर के यदि उसका कॉम्प्लीमेंट्री जो है वह नहीं समझते हैं तो फिर हमारे मन में कंफ्यूजन होना शुरू हो जाएगा। एक और तो यहां पर ठाकुर कहते हैं कि लज्जा नहीं होती है। स्त्री पुत्र बच्चे हो गए हैं। इसके बाद में भी स्त्री का संग करते हैं। तो यह कैसी बात हुई? यहां दूसरी ओर ठाकुर कहते हैं कि तुम लोग किले में रहकर के युद्ध करते हो ब्राह्म समाजियों को जिस तरह से ठाकुर ने कहा था वो अच्छी बात है। मैं तो मैं खुले मैदान में युद्ध करके मैं मुझे तो अति व कष्ट सहन करना पड़ा है। किंतु किले में से युद्ध करना सहज है। इस अर्थ में कि दैहिक जो कुछ आवश्यकताएं हैं वह सब जो स्त्री है घर के जो परिवारजन है वह आपको प्रोवाइड करते हैं। इन टर्न आपको उनकी केयर करनी होगी। नो डाउट यह सिंबायोटिक रिलेशनशिप है। यह कोई पैरासिटिक रिलेशन नहीं है कि मैं घर में रहूंगा। साधन भजन करूंगा। बीवी बच्चे अपनी संभाल रखना चाहे तो रखें ना रखना चाहे तो ना रखें। किंतु मेरी सेवा उनको करनी होगी। इस तरह से पैरासिटिक रिलेशन नहीं चलेगा। यदि घर में रहते हैं तो आपको उनकी संभाल भी रखनी होगी। इस अर्थ में कि यह जो अर्थोपार्जन है, पैसा कमाना है, फाइनशियल सिक्योरिटी है, वह सब तो आपको उनको प्रोवाइड करना ही पड़ेगा। तो एक और ठाकुर स्पष्ट रूप से कहते हैं कि संसार में रहकर के यदि बीवी बच्चों की संभाल नहीं रखेंगे बिल्कुल गलत है। दूसरा ठाकुर यह भी कहते हैं संसार में रहना गलत नहीं है। तो एक तरह से यह डिपेंडेंसी टाइप का एक रिलेशनशिप ठाकुर एडवोकेट भी करते हैं। दूसरी ओर यहां पे इतना हार्ड कोर वेदांतिक मैसेज है। ठाकुर अपने वही गृहस्थ भक्त को कहते हैं। त्यागी संतानों को कहते तो प्रश्न नहीं था। किंतु उसी गृहस्थ संतान को ठाकुर यह बात जब कहते हैं तो कभी-कभी हमारे मन में कंफ्यूजन हो सकता है कि मैं घर में भी रहूं। मैं पैसा कमाने के बारे में भी सोचूं और मैं बीवी बच्चों की संभाल भी रखूं और दूसरी ओर है कि यह स्त्री के प्रति किसी भी तरह का आकर्षण ना हो तो यह कैसे हो सकता है? आज के युग में देखेंगे हमारे सामने इस तरह की चैलेंज सब समय आती ही रहेगी। यह ठाकुर तो जब यह बातें कर रहे थे वह तो फिर भी एक कंजर्वेटिव युग था। एक ऑर्थोडॉक्स समय था। आज के युग में आप वर्क प्लेस में जाते हैं। बाहर में घूमते हैं नौकरी करने के लिए, बिजनेस करने के लिए, कॉरपोरेट वर्ल्ड में होते हैं। एकेडेमिक वर्ल्ड में होते हैं। तो कितने हजार तरह के टेंप्टेशन हमारे सामने आते हैं। तो क्या हम उस सब चीजों को छोड़कर के भाग जाए क्या कि ऐसा तो कैसे हो सकता है? तीव्र वैराग्य तो है नहीं मेरे में। मंद वैराग्य है, मध्यम वैराग्य है। तो एक और मैं इसी इस संसार में रहूंगा जहां पे हजार टेंप्टेशन मेरे सामने आते रहते हैं। इसी संसार में रहकर के फिर मुझे इस टेंपटेशन का त्याग करना है। या तो उसके प्रति वितृष्णा या विराग प्रकट करना है। कैसे हो सकता है? सन्यासी को तो फिर भी यह गेरुआ पहना है बोलकर के समाज भी थोड़ा सा एक तरह से हमारे से रिस्पेक्टपूर्ण बातें करता है। इस तरह की जो सिचुएशन होती है आश्रम में रहने से कंटीन्यूसली आश्रम में रहने से यह जो टेंप्टेशन भी यहां पर नहीं आते हैं। समाज भी हमको उसी तरह से ट्रीट करता है। बोल के सन्यास जीवन काफी सेफ लाइफ है। आज यदि खास करके यह जो कामिनी या तो फिर काम माने कि स्त्री का पुरुष के प्रति या तो पुरुष का स्त्री के प्रति जो आकर्षण है काम है इसका जो सबसे बड़ा जो आपको यह सामने आएगा टेंप्टेशन वो गृहस्थ आश्रम में ही आएगा। सन्यासियों के लिए यह मन में ही मन में काम भाव उत्पन्न हो सकता है। उसमें कोई यह तो डीएनए में रहता है तो एक दिन में तो जाने वाला नहीं है। जन्म जन्मांतर की तपस्या है। किंतु एटलीस्ट बाहर से जो आक्रमण होता है इंद्रियों के ऊपर में उससे तो एटलीस्ट हम लोग बच जाते हैं। तो हमारे लिए शायद यह रास्ता थोड़ा सा आसान हो सकता है। तो यहां पे यह सो पढ़कर के प्रश्न होगा ही होगा। उस समय हमको तोतापुरी की घटना को याद करना है कि देखिए इतने बड़े परमहंस अग्रणी थे तोतापुरी ठाकुर के स्वयं के टीचर ठाकुर के गुरु ऐसे तोतापुरी को भी आखिर में शक्ति स्वीकार करनी पड़ी थी। आखिर में शरणागति का रास्ता लेना पड़ा था। यानी कि एक ओर है हार्ड कोर वैराग्य ज्ञान मार्ग जो कि कहता है कि यह शरीर दुनिया भर की अपवित्रताओं से भरपूर है। यह शरीर जितना भी विकृति है, जितनी भी यह करप्शन जितना भी है, उससे भरपूर है, उसका त्याग कीजिए। यह ज्ञान मार्ग जैसे ही हमको ठाकुर सिखाते हैं, वैसे ही ठाकुर के ही चरित्र में ठाकुर की ही यह जब लीला में तोतापुरी का भी उदाहरण है कि यह जो पूर्ण ज्ञान का रास्ता है, वह इनफ नहीं है, सफिशिएंट नहीं है। हम लोगों के तो बात छोड़ ही दीजिए। हम लोग तो कीड़े-मकोड़े हैं आध्यात्मिक जीवन में। यह यह गिरिराज जैसे यह एवरेस्ट पर्वत जैसी जिनकी पर्सनालिटी थी वैसे तोतापुरी को भी साथ-साथ में शरणागति का भक्ति का रास्ता लेना पड़ा था। तो हमारे लिए जो प्रॉपर रास्ता है ज्ञान और भक्ति का समिश्रण। ज्ञान मिश्रा भक्ति या तो भक्ति मिश्रित ज्ञान जो भी आप कहना चाहे इन दोनों कॉम्प्लीमेंट्री साधना को हमको साथ में ले चलना है क्योंकि क्या है कि इस तरह का चिंतन करते-करते ना फिर कहीं पे जो ऑपोजिट जो होता है उनके प्रति घृणा प्रकट हो जाती है। तो घृणा भी कोई काम की नहीं है। स्त्री यदि पुरुष को घृणा करने लगी या तो फिर पुरुष स्त्री को घृणा करने लगे तो फिर इस घृणा में से दूसरे तरह की 10 विकृतियां प्रकट होगी। यानी कि आपने वो स्क्वायर वन पे वापस आ गए। काम का आकर्षण है उसको काटने के लिए आपने और की एक दूसरा विकृति प्रकट किया। तो एक विकृति ने दूसरी विकृति को तो काटा तो सही किंतु वह पहली वाली चली गई तो दूसरे वाली रह गई तो ऐसा ना हो जाए कि एक के बाद एक माने व वर्ष टू वर्स्ट तरह की विकृतियों में हम फंसते जाए ऐसा ना हो इसके लिए सब समय एक बैलेंस थिंकिंग करके चलना है। यह देखिए कि वराह नगर मठ के शुरू शुरू के दिनों में स्त्रियों को वहां पर आने का प्रवेश निषिद्ध था। यहां पे इलाहाबाद की घटना तो मने वो जगह जाहिर है। अपने विज्ञान महाराज वहां पर रहते थे तो राजा महाराज ने एक बार कहा था ओखाने मादा माियो जेते पारेना अर्थात कि यह स्त्री माने एक फीमेल बग है माछी अर्थात कि बग या तो फिर कहेंगे मॉस्किटो तो ये फीमेल मॉस्किटो भी वहां पर मठ में प्रवेश नहीं कर सकता जहां पर यह विज्ञान महाराज रहते हैं। तो क्या है कि एक तरह से पूरा हार्ड कोर थिंकिंग उन लोगों का था। इस तरह का बिहेवियर था। किंतु हमको यह भी पता है कि बेलूर मठ में केवल स्वामी जी के रहते-रहते ही हजारों हजारों स्त्रियां वहां पर आती थी। यह निवेदिता का तो हमको सबको पता है कि वो निवेदिता के साथ में स्वामी जी का इतना सारा वार्तालाप होता था। ठाकुर एक और कहते हैं कि सन्यासी स्त्री की यह मूर्ति भी जो है वो पुतुल अर्थात कि मूर्ति उसको उसके भी सामने नहीं देखेगा। स्त्री के सामने देखना तो छोड़ दीजिए। स्त्री की मूर्ति या स्त्री का आज के आजकल फोटोग्राफ यह स्त्री के फोटोग्राफ के सामने में भी नहीं देखेगा। तो एक और यह उपदेश है। दूसरी ओर हम जितने भी गुरु भाई हैं उसमें से किसी को भी इस तरह की तपस्या करते हुए नहीं देखा। विज्ञान महाराज का था। वह भी शुरू शुरू में बाद में प्रेसिडेंट हुए तो उन्होंने भी हृदय खोल करके सबको दीक्षा दी है। किंतु यह जो स्वामी जी है या तो फिर ऐसे सब जो गुरु भाई है जो कि एक्टिव जो वर्क में वे लोग इनवॉल्व थे उन्होंने तो इस तरह से कभी नहीं किया और यह डायरेक्ट डिसाइपल की भी बात छोड़ दें कि जैसे ही हमने रिलीफ एक्टिविटी प्रारंभ की तो यह दुष्काल जहां पर पड़ रहा है या तो फिर जहां पे अपना दातव्य चिकित्सालय है यानी यह जो चैरिटेबल डिस्पेंसरी है वहां पे तो सन्यासी ही कर कार्य करते थे तो वहां पे स्त्रियों के सामने नहीं देखेंगे। उनके साथ बात नहीं करेंगे। इस तरह के नियम उस समय भी नहीं थे। आज भी नहीं है। तो क्या है कि देखिए ठाकुर ने जो उपदेश दिए हैं बहुत बार हम लोग ऐसा सोचते हैं कि यह उपदेश जो है प्रैक्टिकल नहीं है। इंप्रैक्टिकल है। क्योंकि यदि इस तरह का उपदेश पढ़ के आप हमारे ही साधुओं को देखेंगे और कहेंगे कि अरे यह लोग खुद यदि इस तरह के उपदेश का पालन नहीं करते तो हम लोग गृहस्थ कैसे कर पाएंगे? सो ऑब्वियसली यह प्रश्न होगा। तो अभी देखिए ठाकुर की वाणी के ऊपर में इंटरप्रिटेशन बिठाना वह सब तो महापुरुषों के लिए यह सब बातें हैं। हम लोग जो सामान्य बुद्धि ठाकुर ने दी है मुझे यह बुद्धि लेकर के मैं यह अपना एक इंटरप्रिटेशन इस तरह से बिठाता हूं कि ठाकुर के उपदेशों को ठाकुर मां स्वामी जी के उपदेशों को और उनकी लीला को एक समग्र रूप से हमको देखना है। इनके जितने भी उपदेश है वो मल्टीफेसेटेड उपदेश है। इस पर्टिकुलर सिचुएशन में इस पर्टिकुलर कंडीशन में यह उपदेश अप्लाई करना है। इस पर्टिकुलर सिचुएशन में इस पर्टिकुलर कंडीशन में इस उपदेश को अप्लाई करना है। कभी-कभी यह कंफ्यूजिंग हो जाता है। स्वामी जी के खुद के गुरु भाई, ठाकुर के खुद के त्यागी संतान, स्वामी जी जब यह शिव्ञाने जीवन सेवा का प्रारंभ कर रहे थे। विदेश में जाकर के प्रवचन दे रहे थे। तो यह लोग क्या सोच रहे थे? या तो स्वामी जी नेम एंड फेम में डूब गए हैं। या तो स्त्री संघ में डूब गए हैं। या तो फिर यह पैसा ये जो लोकमान्यता है फेम एंड फॉर्च्यून इसके प्रति उनकी आकर्षण और उनकी आसक्ति आन पड़ी है। उनमें से भी कुछ-कुछ स्वामी जी पर संदेह करने वाले लोग थे। तो क्या है कि आज हम फॉर्चूनेट है। उस समय स्वामी जी का कंप्लीट वर्क्स अवेलेबल नहीं था कि स्वामी जी और इवन ठाकुर का कंप्लीट ये जो कथामृत और लीला प्रसंग है वो अवेलेबल नहीं था। तो एक समग्र पढ़कर के ओवरऑल एक सिचुएशन समझ करके हम अपना जजमेंट दे पाए। उस समय यह संभव नहीं था। क्योंकि त्यागी संतान ठाकुर को जितना सुने थे वह पर्टिकुलर एस्पेक्ट ही तो सुने ऐसा तो किसी के लिए संभव नहीं कि ठाकुर की संपूर्ण शिक्षा कोई एक व्यक्ति ने ग्रहण की हो। स्वामी जी कम्स वेरी नियरर। क्योंकि स्वामी जी को ठाकुर ने अलग से बिठा करके जब उनको कैंसर हुआ था। स्वामी जी को अलग से बिठा करके उन्होंने बहुत कुछ बताया था। बट अदर देन स्वामी जी और मदर मां शारदा इन दोनों को छोड़कर के मुझे ऐसा नहीं लगता कि कोई भी ऐसा हो कि ठाकुर की शिक्षा को मोर देन 20-30% ग्रहण कर पाया हो। तो देखिए कि वह कंफ्यूजन रहेगा ही तो बेटर है आज हमारे पास में यह एक तो है कि पूरा लिटरेचर अवेलेबल है। दूसरा हमारे पास में एआई भी है। तो जैसे मैंने आपके साथ में शेयर किया है वो शारदा कोष उसमें आप क्वेश्चन करके आप रिप्लाई प्राप्त कर सकते हैं। यदि ठाकुर ने एक और हार्ड कोर ज्ञान का उपदेश दिया है गृहस्थ इवन गृहस्थों को तो फिर गृहस्थों को कॉम्प्लीमेंट्री उपदेश साथ-साथ में भक्ति के शरणागति के और क्या-क्या दिए हैं? सो वी हैव ए कॉम्प्लीमेंटरी ये जो मल्टीफेसेटेड पिक्चर जो है मल्टी डाइमेंशनल टीचिंग है ठाकुर मां स्वामी जी के हमारे सामने यह ओपन हो जाते हैं। सो वी कैन मेक अ मच बेटर चॉइस वी कैन लीव आवर स्पिरिचुअल लाइफ विदाउट एनी एक्सेस ऑफ गिल्ट और एनी एक्सेस ऑफ सेल्फ कांग्रेचुलेशन। क्या एक चीज मैंने पढ़ लिया है? यह चीज मैंने कर लिया है। दैट मींस मैं साधना में सिद्धि प्राप्त कर ली है। किंतु ठाकुर तो कहते हैं ना कि और आगे जाओ और आगे जाओ। वो जो उसको कहते हैं जो लकड़ी काटने वाला जो होता है कि और आगे जाओगे तो यह सोने की खान मिलेगी। रूपा की खान मिलेगी, सोने की मिलेगी और फिर आज की लैंग्वेज में कहे तो प्लूटोनियम की खान मिलेगी। माइन और उसके बाद में रेयर अर्थ मेटल्स मिलना शुरू हो जाएंगे। तो यहां पर ठाकुर कहते तारेबाड़ा तारेबाड़ा इस आध्यात्मिक जगत में उससे भी ऊपर है। उससे भी ऊपर है। यहां पर कोई एंड नहीं है। तो अननेसेसरीली अपने को सेल्फ कांग्रेचुलेट नहीं करना है और अननेसेसरी अपने को कोसना नहीं है। एक तरह का गिल्ट फीलिंग भीतर में नहीं बिठा देना है कि अरे यह जो कुछ कहा गया है उसमें से मुश्किल से 1% मैं कर पा रहा हूं। माने आप लोगों की तो बात छोड़ ही दीजिए। हम साधु सन्यासियों में भी यदि हम ठाकुर मा स्वामी जी ने जो कुछ कहा है उसमें से यदि 5% 10% भी हम लोग कर पाएंगे तो भी यह बहुत बड़ी बात है। तो फिर क्या है कि दोनों चीजों से बचना है। अननेसेसरी सेल्फ कांग्रेचुलेशन नहीं होना है। अननेसेसरी गिल्ट फीलिंग नहीं होना है। शरणागति पूर्वक ठाकुर मां स्वामी जी के मैसेज को पढ़कर के जीवन में आगे बढ़ना है।
साधु-संत की डांट हमारी संस्कारशुद्धि करती है
अभी किंतु ठाकुर जब इस तरह से डांट रहे हैं। इस तरह से क्रोध प्रकट कर रहे हैं। अपना रुद्र स्वरूप दिखा रहे हैं। मणि चुप करिया हेंट मुंह खोइया आन मणि अर्थात कि मास्टर महाशय चुप होकर के सर झुका करके बैठे हुए हैं। ठाकुर श्री रामकृष्ण आभार बोलते छ ठाकुर श्री रामकृष्ण और बोल रहे हैं तार प्रेमर एक बिंदु यदि के उपाय कामिनी कांचन अति तुच्छ बोले बोध होए उनके प्रेम का ईश्वरीय प्रेम का एक बिंदु भी यदि किसी को प्राप्त होता है तो काम और कांचन उनको अत्यंत तुच्छ समझ में आते हैं अत्यंत तुच्छ बोध होते हैं मिचरीर पाना पहले चीटे गुड़े पाना तुच्छ होए जाए मिचरी अर्थात कि साकर का यह शरबत मिलता है तो चीटा गुड़ का यह लिक्विड होता है जनरली गायों को खिलाया जाता है इसको तो उसके सामने तुच्छ बोध होगा और होने ही वाला है ताकि व्याकुल होए प्रार्थना को ले तार नाम गुण सर्वदा कीर्तन को ले तार ऊपर भलो भाषा क्रम होए ईश्वर को व्याकुल होकर के प्रार्थना करके उनके नाम गुण सर्वदा कीर्तन करके धीरे-धीरे क्रमशः क्रमे क्रमशः ईश्वर के ऊपर में प्रेम प्रकट होगा। अच्छा यहां पर यह जो एक ठाकुर इस तरह से अपना एक क्रोध एक विराग प्रकट कर रहे हैं। इसके एक दूसरा भी एक कारण होता है। हमने स्वामी जी को भी बहुत बार अपने खुद के गुरु भाइयों पर क्रोध करते हुए देखा है। इसका रीजन हम कभी-कभी स्वामी जी स्वयं यह कहते हैं कि देखो भाई अभी तो आखिरी समय आ गया है। स्वामी जी तो इमोशनल ब्लैकमेलिंग करने में पीछे नहीं हटते थे गुरु भाइयों को कि अभी मैं ही अकेला यह सब कार्य करके मर जाऊंगा। तुम लोग थोड़ा सा भी सहाय नहीं करोगे। मेरे जीवन का आखिरी समय आ गया है। तुम लोग यदि सहाय नहीं करोगे तो ठाकुर का यह कार्य कैसे चलेगा? तो स्वामी जी कहते थे मेरा हेल्थ इस इस सब की वजह से थोड़ा सा नर्वस ए्जायटी आ जाता है तो मैं तुम लोगों को डांट देता हूं। किंतु देखिए कि इसके पीछे में एक फिलॉसोफिकल एक दूसरा भी एस्पेक्ट है कि ठाकुर डांटते हो ना कि स्वामी जी डांटते हो। तो इनकी डांट के पीछे में ना एक आशय यह भी रहता है कि यह जो अपने कर्म है वह कट जाते हैं इससे। अब हमारे ऑर्डर में यह बात बड़ी प्रसिद्ध है। कोई भी सीनियर साधु है वह जूनियर साधु को डांटेगा तो हमको इस अर्थ में लेना है कि हमारे कर्म कट रहे हैं। क्योंकि देखिए कर्म कैसे कटते हैं। कर्म तो एक तो ततीक्षा करके कटते हैं। तपस्या करके कटते हैं। दूसरा कटते हैं कर्मों का भोग करके और तीसरा कटते हैं महापुरुष के आशीर्वाद से। किंतु महापुरुष के आशीर्वाद सब समय यह जो मां जिस तरह से आशीर्वाद देती थी स्नेह करती थी जय राम बाटी जाने से अपने हाथों से खाना बनाकर के खिलाती थी यहां तक कि जब आप आहार कर लिया आहार करने के बाद में यह जो यह जो झूठा पत्ता है उसको उठाने को जाएंगे तो मां कहती थी उसको रहने दो यह सब क्लीन करने के लिए एटा क्लीन क्लीन करने के लिए लोक पांच है अर्थात कि लोग है इसको क्लीन करने के लिए तो अब जैसे आपको ऐसा कोई कहेगा कि इसको क्लीन करने के लिए दूसरे लोग हैं तो हम तो यही अनुमान करेंगे ना कोई काम वाली बाई होगी या फिर और कोई होगा रिलेटिव मां का या फिर यह त्यागी संतान है वह इसको क्लीन करेंगे तो ऐसा बोलकर के हम उठकर के खड़े हो गए कुछ समय के बाद देखा मां स्वयं उसको क्लीन कर रही है तो देखिए कि हम लोग अभिभूत हो जाते हैं जब जय राम भाटी जाकर के मां का प्रेम प्राप्त करते हैं अभी कुछ दिनों पहले वह अमूल्य महाराज भविष्य के स्वामी शंकरानंद जी राजा महाराज के सेक्रेटरी और हमारे संघ के प्रेसिडेंट उनकी हमने कहानी देखी थी खोखा महाराज के साथ में जयराम भाटी गए थे अर्ली मॉर्निंग अर्ली मॉर्निंग यानी सुबह को 3:00 बजे उठकर के वो दामोदर नदी के किनारे जा रहे हैं देखा सामने से दो स्त्रियां आ रही है तो उन इन दोनों साधुओं को देखकर के एक स्त्री और सर के ऊपर में वह बोझा लेकर के आ रही है वो बास्केट है बास्केट में सब चीजें रखी है दोनों के सर पर। तो जैसे ही एक स्त्री ने इन दोनों साधुओं को देखा अपने सर की बास्केट जो है दूसरी स्त्री को देकर के उसके पीछे में जाकर के छुप गए। तो ये साधुओं को उस समय तो ऐसा कुछ लगा नहीं कि जनरली गांव में क्या है? पर पुरुष जो होते हैं उनसे तो थोड़ी सी लज्जा होती ही है। किंतु थोड़ा सा आगे जाने के बाद में शंकरानंद जी को संदेह हुआ। उन्होंने खोका महाराज को पूछा स्वामी सुबोधानंद जी को कि आपने देखा वो स्त्री कौन थी? तो सुबोधनांद जी ने उत्तर दिया एकदम स्पष्ट रूप से देखा कि वह कौन थी वही थी हमारी मां हमारे लिए हमको कष्ट ना हो हमको अच्छे से खाना खिला सके इसलिए आधी रात को दूसरे गांव में जाकर के यह सब्जी वगैरह है तेल मसाला वगैरह है वो खरीद करके हमारे लिए सब आहार प्रस्तुत करती है तो शंकरानंद जी ने इमीडिएटली कहा तो तो फिर यहां पर ज्यादा नहीं रुक सकते मां को हमारे लिए इतना कष्ट होगा। तो देखिए कि इस तरह के आशीर्वाद से तो हमारे कर्म कटते ही है। किंतु यह इन लोगों की डांट सुनकर के भी यह कर्म कट जाते हैं। यह डांट सुनकर के दो तरह के रिएक्शन होने चाहिए। ये जो कि यूजुअल मनुष्य में होते हैं। एक तो आएगा क्रोध कि ये इनकी औकात क्या है कि मुझे डांटे। वो अपने को खुद को कौन सा यह समझ लेते हैं। बोल करके हम लोग क्रोध करेंगे। तो क्रोध करेंगे तो प्रॉब्लम क्या होगा कि और ज्यादा से ज्यादा संस्कार बढ़ते ही जाएंगे। संस्कारों की यह जो बेड़ी है जंजीर है और ज्यादा से आकर के कस करके हमको पकड़ेगी। किंतु जदी एकदम विनम्रता के साथ में चुपचाप यहां जो मास्टर महाशय ने कितना सुंदर लिखा है मणि चुप करिया हेंठ मुंह खोइया आन मणि अर्थात मास्टर महाशय चुप होकर के सर झुका करके बैठे हैं। वह खुद तो बीए एएमए किए हुए हैं। और यहां पे है एक अनपढ़ गरीब ब्राह्मण। वो अनपढ़ गरीब ब्राह्मण एक बीए एएमए किए हुए एक विश्वविद्यालय के छात्र और एक टीचर को किस तरह से डांट सकता है यह स्टेटस फेटस सब बाय दिस टाइम मास्टर महाशय की यह दिनों की जो कहानी है वो सब कहां पर हवा हो गया है श्री रामकृष्ण को ईश्वर के अवतार के रूप में संपूर्ण रूप से स्वीकार कर लिया है और ठाकुर की डांट को चुपचाप सुन रहे हैं और इसके भीतर में जो पश्चाताप है जो ग्लानी है और यह जो वैराग्य है उसका उदय हो रहा है। सो दिस इज अ प्रॉपर रिएक्शन। यदि कोई साधु डांटता है तो ठाकुर की कृपा से मुझे भी डांट पड़ी है और ठाकुर की कृपा से रेयरली मैंने कभी क्रोध किया है सामने में। एटलीस्ट इतना तो मुझे ठाकुर ने आशीर्वाद दिया है। तो देखिए कि किंतु मैंने ऐसे भी लोगों को देखा है कि साधु जब डांटते हैं तो सामने सामने से गुस्सा करते हैं। तो क्या है ये दिस इज नॉट गुड। साधु की डांट या फिर या तो फिर यह हम लोगों का तो यह सद्भाग्य नहीं है कि मां और ठाकुर के स्वयं की डांट सुन पाए। स्वामी जी की डांट सुन पाए। किंतु यदि साधु की डांट सुनते हैं तो इसको अपना एक आशीर्वाद ही समझ के प्रसाद के रूप में ही ग्रहण कर लेना चाहिए और यदि क्रोध नहीं करेंगे सामने सामने गुस्सा नहीं दिखाएंगे सामने यदि और कुछ विकृति अपने मन में नहीं खड़ी होगी सहज सरल रूप से इसको स्वीकार कर लेंगे तो यह इजीली हमारे संस्कार को काट देगा। ऐसा बहुत बार होता है कि हमको इस तरह का काम करने को कहा जाता है। इस तरह के सेंटर में पोस्टिंग होता है जो कि हमारी पसंद का नहीं है। राजकोट से यहां पर मेरा पोस्टिंग हुआ। तो अभी मेरा जो बैकग्राउंड है, मेरी जो टैलेंट है और मेरा जो कल्चरल एक है उसके बिल्कुल आउटसाइड ऑफ दैट जाकर के मुझे यहां पर पोस्ट किया गया। तो मैंने तो कुछ बोला नहीं था। मैं तो चुपचाप यहां पे आ गया। सुहितानंद जी को एक करसी लेटर लिखा था सुितानंद जी के साथ पहले से ही परिचय है बोल के कि महाराज आपको साष्टांग प्रणाम जस्ट फॉर योर इंफॉर्मेशन कि मेरा पोस्टिंग विशाखापट्टनम में हुआ है। तो सुहितानांद जी ने दो ही लाइन लिखा रिप्लाई में कहा कि देखो यह कर्म काटने का सबसे सुनहरा मौका है तुम्हारा। तो मैं बिल्कुल समझ गया कि हां आप जो कहते हैं बिल्कुल ठीक है। बहुत बार ऐसा होता है कि हमको जो परिस्थिति जिस जिस परिस्थिति में रहने को जिस तरह का कार्य करने को हम अभ्यस्त है उससे बाहर निकल कर के यदि कुछ कहा जाता है तो हम रेबेल करते हैं। हम लोग मना कर देंगे कि मैं वहां पर नहीं जाऊंगा, मैं यह काम नहीं करूंगा, मैं वह नहीं करूंगा। सो ऑलवेज बेटर कि ऐसा करने से टेंपरेरी आपको बेनिफिट मिल जाएगा। किंतु लॉन्ग टर्म में फिर क्या है जो कर्म कट जाने वाले थे वो कर्म कटे नहीं। ऊपर से ये रेजिस्ट करके अननेसेसरी 10 कर्म आपने और बिठा दिए। सो ऑलवेज एक्सेप्ट कि ठाकुर हमारे साथ में क्या करते हैं। देखिए इस बात को आप संसार में यदि किस तरह से कन्वर्ट करेंगे। संसार में जैसे ठाकुर ने हमेशा कहा है कि आपको दूसरों को हानि नहीं पहुंचानी है। किंतु यदि कोई दूसरा अपना अहित करने को आता है तो आत्मरक्षा अवश्य करनी है। तो ऑब्वियसली है कि हम संसारियों संसार का और सन्यासियों का यह दो रास्ता है और जो इंटरप्रिटेशन है ठाकुर के उपदेश का थोड़ा सा डिफर हो जाता है। किंतु यहां पे मणि प्रॉपर स्पिरिट में ठाकुर की डांट लेते हैं कि चुप कर के सर मस्तक झुका करके चुपचाप यह डांट सुन ली और इसके बाद में फिर ठाकुर कहते हैं कि देखो थोड़ा सा फिर वो अपना क्रोध जो है उसको सौम्य करके फिर से ठाकुर कहते हैं वही वही शरणागति वाली बात वही भक्ति वाली बात कि यदि ईश्वर के प्रेम का एक बिंदु भी जिसको मिलता है उसके उसके लिए कामिनी कांचन अत्यंत तुच्छ हो जाता है। जिस तरह से उनको व्याकुल होकर के प्रार्थना करना जैसे ही हमने प्रारंभ किया जैसे ही उनके नाम गुणगान कीर्तन करना सर्वदा प्रारंभ किया वैसे ही देखेंगे कि उनके ऊपर में हमारा प्रेम बढ़ता ही जाएगा। ए बोलिया ठाकुर प्रेमत्त होइया घरे मध्य नाचिया बेते लागी लेन ओ गान गाईते लागी लेन ऐसा बोलकर के ठाकुर प्रेमन्मत्त होकर के घर में नृत्य करने लगे और गान गाने लगे सुर धुनर तीरे हरि बोले के बुझी प्रेमदाता निताई ऐसे छे सुर धुन अर्थात कि गंगा सुर धुन के किनारे पे हरि कौन बोल रहा है लग रहा है कि प्रेम दाता निताई आए हैं। निताई नोइले प्राण जुड़ाबे की से यदि निताई नहीं होंगे तो हृदय को सांत्वना कैसे मिलेगी? प्राणों को शांति कैसे मिलेगी?
माँ काली के मंदिर में श्रीरामकृष्ण
अभी यह प्रसंग पूरा समाप्त होता है। प्राय दोष्ठा बाजे ऑलमोस्ट 10 बज गए हैं। श्रीजुक्तो रामलाल काली घरे मां काली नित्य पूजा सांग कोरिया छेन श्रीजुक्तो रामलाल ने काली घर में मां काली की जो नित्य पूजा है उसको समाप्त किया है। ठाकुर मां के दर्शन करब जनो काली घरे जाते छ ठाकुर मां का दर्शन करने के लिए काली घर में अर्थात कि काली के मंदिर में जा रहे हैं मणि शंगे आन मास्टर महाशय भी साथ में है मंदिर प्रविष्ट होइया ठाकुर आसने उपविष्ट हो लेन मंदिर में अर्थात कि गर्भगह में यदि दक्षिणेश्वर का दर्शन करने का सद्भाग्य मिला होगा तो पता होगा कि बाहर में एक नाट मंदिर है जहां पर सभी लोग कीर्तन वगैरह करते हैं, जप ध्यान करते हैं, साधना करते हैं। जहां पर यह अन्नकूट हुआ था महोत्सव ठाकुर का वो नाट मंदिर है और किंतु मां काली का गर्भ मंदिर है। जहां पर मां काली की श्री मूर्ति है। तो वहां पे ठाकुर मां की मूर्ति के सामने साक्षात जननी के सामने आसन के ऊपर में मां के दर्शन करने के लिए आसन के ऊपर में उपविष्ट हुए बैठे। दुई एक्ट फूल मार चरण दिलन एक दो फूल मां के श्री चरणों में अर्पण किए निजेर माथाए फूल दिया ध्यान करते छ अपने खुद के सर पर फूल रख के ध्यान कर रहे हैं ए बार गीत छले मार स्तव करते छ इस बार और अभी गीत के रूप में मां का स्तव कर रहे हैं भवदारा भयो होरा नाम सुने छ तोमार ताई आईते ए बार दिए छ भार तारो तारो ना तारो मा भवदारा भयो हरा तुम्हारा नाम सुना है इसलिए मेरा भार इस संसार का समग्र भार तुमको दिया है तारो तारो ना तारो मा यहां पर तुमको तारण करना ही होगा भवसागर पार करवाना ही होगा इसके बाद का जो पॉइंट है अभी हम नेक्स्ट क्लास में लेंगे ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु
प्रश्न: अब मैं middle age में हूँ। अपनी आध्यात्मिकता को और कैसे विकसित कर सकता हूँ?
देखिए अच्छा क्वेश्चन है। रिसेंटली मेरा एक डिवोटी के साथ में बात हो रहा था। तो अभी एक्चुअली होता क्या है कि एक बार एक सर्टेन एज हो जाती है ना बच्चे बड़े हो जाते हैं घर में सब कुछ सेटल हो जाता है अभी पुरुषों का तो नहीं किंतु एटलीस्ट लेडीज का ऐसा होता है कि हाथ के ऊपर में थोड़ा सा समय रहता है तो फिर किस तरह से इस समय का सदुपयोग करें तो यह जिनके साथ में मेरा बात हो रहा था डिवोटी का उनका कहना था कि काफी समय है वैसे तीन-4 घंटे इससे भी ज्यादा थोड़ा सा तो मुझे क्या करना चाहिए? किस तरह से मुझे अपनी साधना को अरेंज करना चाहिए जिससे कि मैं मैक्सिमम बेनिफिट ले पाऊं। तो पता है एक चीज मैंने जो कहा कि देखिए कि चारप घंटा या तो इससे भी ज्यादा का समय साधना करना वह तो हम साधु लोग भी नहीं करते हैं। मेरे पास में जो भी साधन पद्धति है मैं आपको जो कुछ भी बताऊंगा इट इज 2 घंटा यदि आपने किया दिन में या तो फिर कहेंगे डेढ़ घंटा मॉर्निंग डेढ़ घंटा शाम को ऐसा करके 3 घंटा किया सो दैट विल बी इनफ। इसके बाद में यदि आप ऐसा सोचेंगे कि इससे भी ज्यादा मुझे साधना करनी है तो क्या है पता है एक वो एक रेजिस्टेंस भीतर से आएगा इसके बाद में लॉ ऑफ डिमिनिशिंग रिटर्न स्टार्ट हो जाएगा कि आप 10 1000 जप करते हैं तो 1000 जप जितनी शांति हुई 10,000 जप करते हैं तो 10,000 जप जितनी शांति हुई किंतु 20,000 जप करेंगे तो नॉट नेसेसरी कि आपको 20,000 जप जितनी शांति होगी होगी। हो सकता है 11-1000 जप जितनी ही शांति हो। क्यों? क्योंकि अपना ह्यूमन माइंड जो है स्लोली एंड ग्रेजुअली अनफोल्ड होता है। ब्लोसम होता है। एट वन पॉइंट आप आप जैसे वो रसगुल्ला खाने का उदाहरण फेमस कि एक रसगुल्ला खाऊंगा वो आनंद जो आएगा दो रसगुल्ला खाने से और ज्यादा आनंद आएगा। डबल आनंद आएगा। तीन गुना तीन खाने से तीन गुना आएगा। किंतु चार खाने से फिर पेट बिगड़ेगा। सो लॉ ऑफ डिमिनिशिंग रिटर्न जिस तरह से सांसारिक चीजों में है स्पिरिचुअलिटी में भी है इस अर्थ में कि आप फटाफट करके आगे जाने का स्टार्ट करेंगे अपने संस्कार आगे जाने नहीं देंगे आपको कर्म तो करना ही होगा आप रामकृष्ण मिशन के ही साधुओं को देखिए जिन्होंने घर बार सब कुछ त्याग किया है फिर भी हम सुबह को जो एक डेढ़ घंटा बैठे शाम को आरती के बाद जो एक डेढ़ घंटा बैठे बाकी हमारे लिए तो यही विधान है कि आपको ऑफिस में जाकर के जो भी कार्य किया गया है वह करना है। मैं रांची के खुद में मेरे दिनों की बात बताता हूं। आखिर आखिर में जब यह छोड़ने का प्रश्न आया कि अभी रांची में नहीं रहना है तो शशांकानंद जी ने कहा कि तुम एक काम करो अपना फार्म है थोड़े दिन छुट्टी लेकर के वहां पर रहो। तुम ठीक-ठीक डिसाइड करो। मैंने सोचा था उस समय इनिशियली कि मैं रांची आश्रम छोड़कर के गांव में जाकर के ट्राइबल एरिया में रहूंगा। तो उनका कहना था देखो तुम ये डिसीजन बड़ा ही इंपॉर्टेंट है तुम्हारे लाइफ के लिए थोड़ा सा तुम बैठकर के सोच के ये डिसीजन करो तुम्हें एक महीना अपना जो फार्म है वहां पे वहां पे रहा था अभी ये निर्जन जगह है उस समय क्लासेस भी नहीं चल रहे थे बिल्कुल अकेला पूरे फार्म में 70 एकड़ का फार्म है और जो ये जो गांव-वांव थे वो तो और भी बहुत दूर थे तो इस पूरे फार्म में मैं और वो केयरटेकर वो चौकीदार फौकीदार ऐसे ही दो-तीन लोग रहते थे तो एक महीना में ऐसे रह करके फिर अब जो भी ठाकुर की इच्छा होगी जो भी है फिर से संघ में आना हुआ मैं जब बेलूर मठ वापस आया श्वेतानंद जी के साथ वार्तालाप हो रहा है श्वेतानंद जी ने पूछा तुम क्या-क्या कर रहे थे बताओ कैसे ये डिसीजन लिया उनका साइको एनालिसिस वो करते हैं ये सब तो मैंने बात बाद बात में बताया कि एक महीना में इस तरह से अकेला रहा एकदम वो एकदम चौकन्ने हो गए चौक गए कहा कि अरे ये क्या तुम पागलामी कर रहे थे अकेले रह के तपस्या करना ये तुम्हारे लिए संभव है क्या इस तरह से फिर से कभी मत करना हमेशा लाइफ में कर्म का कॉम्बिनेशन रखना ही रखना है। ज्ञान, भक्ति, राजयोग और कर्म योग चार का कॉम्बिनेशन करके ही चलो। यदि प्योर भक्ति, प्योर ज्ञान ऐसा कुछ करने को जाओगे तुम्हारा माइंड और बॉडी उसको लेगा नहीं। तो उस दिन से और आई कैन क्लियरली सी रंगनाथानंद जी, आत्मस्थानंद जी, भूतेशानंद जी टू टेक एनी ऑफ आवर ग्रेट साधुस कि कर्म का हेल्दी डोज़ उनकी लाइफ में था। सो कर्म तो हमको करना ही करना है। इसके बिना आप रह ही नहीं पाएंगे। क्योंकि यह प्योर स्पिरिचुअलिटी बियों्ड वन पॉइंट लॉ ऑफ डिमिनिशिंग रिटर्न स्टार्ट होगा। विकृति प्रारंभ होगी। उसको स्लोली एंड ग्रेजुअली ही आपको बढ़ाना है कैपेसिटी को। माने यह एक्चुअली ऑपोजिट स्टेटमेंट है। यहां पे जैसे ठाकुर कहते हैं ना कि मैं भार दे रहा हूं। स्वामी जी ने स्पष्ट कहा है। पूरे जगत का भार अपने सर पर ले लो। एकदम स्पष्ट रूप से कहा है। म नॉट मेटाफोरिकली इसमें देयर इज नो कंफ्यूजन स्टेटमेंट टेक द होल रिस्पांसिबिलिटी अपॉन योर शोल्डर्स
प्रश्न: हमें अपने आध्यात्मिक जीवन में क्या करना है, इसका मार्गदर्शन करने के लिए एक गुरु की आवश्यकता है।
ना इसीलिए तो यह कांसेप्ट है ना अपने ऑर्डर में कि शिक्षा गुरु और दीक्षा गुरु दीक्षा गुरु एक ही होना चाहिए तो शिक्षा गुरु तो आप कर ही सकते हैं कि अब जिन लोगों ने स्टडी किया है उनका आप सत्संग करें अभी देखिए सर्वप्रियनंद जी इतने पॉपुलर क्यों है यदि आपने दीक्षा लेकर के गुरु महाराज के पास में सब सीख ही लिया तो सर्वर सर्वप्रियनंद जी के वीडियोस मिलियंस में व्यू क्यों होते हैं? सो दैट इज वेरी कॉमन प्लेस कांसेप्ट कि जैसे मैंने कहा था ना कि मुझे भागवत सुनने की थोड़ी इच्छा हुई तो किंतु एक गुरु करना पड़ता है इस अर्थ में कि 10 लोगों का सुनेंगे तो ही कंफ्लिक्ट हो जाता है। किसी एक को हम फॉलो करते हैं जिसके साथ में अपना माइंडसेट मैच हो जाता है। तो एक इंद्रेश जी बोल के हैं तो उनका मैं सुन रहा हूं। तो मुझे अच्छा लगता है उनका माइंडसेट बोलने का एक्सप्रेशन नॉट नेसेसरी कि आई विल एग्री विद एवरीथिंग व्हाट ही सेस अपना तो एक हेल्दी एक रहना ही चाहिए पर्सनल ओपिनियन बट मोर और लेस आई लाइक हिम सो ऐसा क्या है कि शिक्षा गुरु होते ही है जैसा आपने कहा था कि श्रीश महाराज का वो आपने वो ईशोपनिषद पे आपने सुना यू लाइक इट वेरी मच सो ऐसा कभी होने वाला नहीं कि मान लीजिए रंगनाथानंद जी से आपने दीक्षा ली तो रंगनाथानंद जी के साथ में बैठ के आप ईशोपनिषद पढ़ने वाले हैं इट्स नेवर गोइंग टू बी पॉसिबल हम साधु लोगों के लिए पॉस पॉसिबल नहीं है। सो वी हैव टू फाइंड सम शिक्षा गुरु। हां। जैसे मैंने कहा ना मैं इंद्रेश जी का सुनता हूं। अभी अपने ऑर्डर में ऐसा कोई नहीं जिसका भागवत मुझे अच्छा लगा। सो हां अ सब्जेक्ट मैटर ना। इवन आप आज की बात छोड़ दीजिए। ट्रेनिंग सेंटर में इस तरह से वो प्रोफेसर आकर के सिखाते हैं। जैसे वेस्टर्न फिलॉसोफी है तो एक बहुत अच्छे प्रोफेसर उस टॉपिक के वो आकर सिखाते थे। सो म्यूजिक सिखाने के लिए बाहर से टीचर आते थे। विद्या मंदिर है वहां पर शारदा पीठ का। वहां के एक टीचर आते थे। सो चार पांच टीचर इस तरह से बाहर आते थे। बाहर से आते थे। इंग्लिश ग्रामर सिखाने के लिए आते थे। स्पोकन संस्कृत सिखाने के लिए
प्रश्न: स्वाध्याय के बारे में - आजकल हम पढ़ना पसंद नहीं करते। हम सभी यूट्यूब वीडियो देखते हैं। क्या यह ठीक है?
आते थे। ठाकुर खुद ठाकुर खुद कहां पढ़ते थे? वो सुन ही रहे थे। देखिए हमारे पास में ठाकुर की तरह ऐसे भक्तों को या तो फिर असिस्टेंट तो नहीं है कि इच्छा अनुसार वो किताब खोल के हमको सुनाए। तो हमारे लिए है ऑडियो बुक। ये आजकल ये टेक्स्ट टू टेक्स्ट टू स्पीच इजीली अवेलेबल है। तो मैं तो अभी इवन कथामृत भी है। मैं आज सुबह को वही सुन रहा था। बेंगली में पढ़ता हूं तो बेंगली टेक्स्ट टू स्पीच है। अभी इतना अच्छा प्रोनाउंस नहीं होगा। किंतु फिर भी मेरा काम चल जाता है। और इंग्लिश में यदि पढ़ते हैं तो तो आपके पास में अनंत वो सब है। इंग्लिश जो वॉइस है एआई बेस्ड इंग्लिश वॉइस इतने इफेक्टिव है कि आपको एकदम नेचुरल ही लगेंगे। अभी कथा कंप्लीट वर्क्स है। कंप्लीट वर्क्स कभी-कभी मैं वो 11 ले ऐप है तो उसमें डाल के मैं सुनता हूं। सो उसमें इंग्लिश वॉइस है ना इतना नेचुरल आता है। अभी एक्चुअली उन्होंने क्या है पेड कर दिया। पहले थू फ्री था। अभी पेड कर दिया तो अभी मैं उसको नहीं यूज़ करता। अभी दूसरी यूज़ करता हूं। किंतु सबसे ज्यादा नेचुरल उसमें है। फिर और भी एक है कि Google Chrome है ना उसमें यदि ना Microsoft एज ब्राउज़र जो है ना उसमें आप पीडीएफ खोलेंगे ना तो उसमें नेचुरल साउंडिंग वॉइस बहुत सारे हैं। तो वो फ्री है। तो उसमें डाल करके मैं सुनता हूं। सो टेक्स्ट तो आपको कहीं से भी आजकल मिल जाएगा। सो उसमें आप टेक्स्ट टू स्पीच करके आप सुन सकते हैं। YouTube पर बहुत सारा अभी अवेलेबल है। बंगाली लोगों के लिए तो एकदम इनफाइनाइट मटेरियल है। वो उद्बोधन की वो YouTube चैनल है। उसके ऊपर में मां की गंभीरानंद जी की पूरी लाइफ ऑडियो बुक अवेलेबल है। उसने रिकॉर्ड जिसने किया है। बहुत अच्छा आर्टिस्ट है। मैं गुजराती में ये सब स्टार्ट किया था ऑडियो बुक। ये मां की गंभीरानंद जी की लाइफ जो है उसके चारप चैप्टर मैंने रिकॉर्ड करके रखे हैं। बहुत अच्छा आर्टिस्ट। मुंबई के है आर्टिस्ट। तो म गुजराती है किंतु बंबई स्टूडियो में काम करते हैं। तो हमारे डिवोटी भी है। बहुत अच्छा रिकॉर्डिंग है। किंतु फिर मैं आ गया तो सब बंद हो गया। नहीं इसको कहते हैं मिड
प्रश्न: mid-life crisis से कैसे निपटें?
लाइफ क्राइसिस। इज अ वेल डॉक्यूमेंटेड फिनोमिना और सिर्फ गृहस्थों की लाइफ में ही नहीं हमारे यहां पे भी ऐसा है। देखिए एक एज पे आपको पता चल जाएगा कि आपका प्रमोशन हो रहा है कि नहीं हो रहा। बड़ा ईजीली पता चल जाता है कि आपको हेड ऑफ द सेंटर बनाएंगे कि नहीं बनाएंगे। इससे भी बड़ी रिस्पांसिबिलिटी देंगे कि नहीं देंगे? यदि मिल जाती है इस तरह की रिस्पांसिबिलिटीज तो फिर आपका नेक्स्ट 20-30 इयर्स आपका फिट हो जाता है कि नाउ यू हैव अ बिगर रिस्पांसिबिलिटी। किंतु वो रिस्पांसिबिलिटी नहीं आती है तो फिर क्या है कि अब हेड ऑफ द सेंटर 200 सेंटर है तो 200 ही तो बनेंगे ना और ट्रस्टी 20 है तो 20 ही बनेंगे ना। इससे ज्यादा हमारे साधु है 2000। सो बाकी के लाइफ में एक पॉइंट आ जाता है पता चल जाता है कि हमको बिगर रिस्पांसिबिलिटी नहीं मिलने वाली है। तो जब यंग होते हैं तो एक फोर्स रहता है साधन भजन का एक नया-नया सब कुछ देख रहे हैं। तीन-चार सेंटर में पोस्टिंग हुआ प्रत्येक सेंटर नया दिखता है। किंतु बाय द टाइम 50 पता चल जाता है। हम ना ही आगे बढ़ रहे हैं ना ही अभी तक का वो एंथूजियाज्म है। वह टिका है। सो मिड लाइफ क्राइसिस यहां पे भी आता है। आपके वहां पे भी आता है। लेडीज लोगों को उनके तरह का आता है कि जब तक बच्चे थे यंग तो वो एक पूरा एक रहता था। मैं अपनी मां को देखा है कि हमको लेकर के कितनी वो परेशान रहती थी। वो सब समय कंप्लेन करती है कि अब कंप्लेन करती है कि अभी घर में कोई नहीं है। तो उस समय कंप्लेंट करती है बहुत हल्लागुल्ला हो रहा है। अब कहती है कि बिल्कुल शांत हो गया है। तो लेडीज़ की लाइफ में भी जेंट्स की लाइफ में भी जैसे आपने कहा कि नॉट नेसेसरी कि आपकी यह जो कैरियर ग्राफ है इट विल ऑलवेज बी वर्टिकल। एट वन पॉइंट दो चीज है कि नॉट नेसेसरी कि फाइनेंशियल क्राइसिस या ऐसा कुछ किंतु एक मोनोटोोनी आ ही जाती है कि यंग एज में आपके लिए सब कुछ नया था। अभी आप यदि वेल सेटल भी हो गए तो एक मोनोटोोनी आ जाएगा कि जो करना था कर लिया। अभी नया चैलेंज लेने का ना ही कैपेसिटी है ना ही यह है। सभी तो एक टेक सीईओ की तरह प्रत्येक सप्ताह नया प्रोडक्ट डेवलप करना वो तो सबके बस की बात नहीं। सो दिस मिड लाइफफ़ क्राइसिस बिटवीन अराउंड एज 50 वो आती ही आती है। एंड सॉल्यूशन इज़ नॉट स्पिरिचुअल। दिस वी हैव टू रिमेंबर अ लिटिल कि मैं यदि ज्यादा से ज्यादा टाइम स्पिरिचुअलिटी जिसको कि ट्रेडिशनल स्पिरिचुअल साधना कहते हैं। देयर विल बी अ लॉ ऑफ़ डिमिनिशिंग रिटर्न। सो वी हैव टू रिमेंबर दैट। एट द सेम टाइम ऐसा नहीं है कि भोगवाद में डूब जाए। जैसा आपने कहा ये डम स्क्रोलिंग है, सोशल मीडिया है या तो एडिक्शन है उसमें चले जाए। दैट इज़ आल्सो वेरी डेंजरस। राइट? सो मिडिल पाथ इज कि अपने लिए एक फिर एक प्रोजेक्ट या तो फिर एक इस तरह से ले लें। अभी जैसे मैंने कुछ-कुछ नोवेलिस्ट का मैं बायोग्राफी पढ़ता हूं क्योंकि मैं खुद लिखता हूं तो दूसरे ऑथर्स का बायोग्राफी पढ़ता रहता हूं। आर्टिकल उनके ऊपर मैं पढ़ता रहता हूं। तो कोई-कोई कहते हैं जैसे एक लेडी का मैंने पढ़ा तो वो कहती है कि दो-तीन बच्चे हो गए। अभी बच्चे बड़े हो गए तो घर में टाइम है तो मैं क्या करती हूं? तो मैंने लिखना शुरू कर दिया। भले कोई पढ़े ना पढ़े। एटलीस्ट मैं लिख रही हूं तो इट इट एंगेजेस माय माइंड कि चलो रिसर्च करना होगा वगैरह एक प्रोडक्टिव एंगेजमेंट रहता है। मेरा खुद का है। जैसे मैं ये क्लास कर रहा हूं। तो अभी क्लास को खत्म होने से मुझे स्टडी करना है। फिर इसको एडिट करके YouTube पे अपलोड करना है। मैं खुद किताब लिख रहा हूं। तो मेरे खुद के ये क्या है ना कि एक एक वर्ल्डली लाइफ और प्योर स्पिरिचुअल लाइफ। इसके बीच का ऐसा कुछ खोज करके एक मैं जब ट्रेनिंग सेंटर में था ना तो हमारे एक महाराज थे टीचर थे आशुतोषानंद जी महाराज तो राजू महाराज अभी वो ऑर्डर छोड़ के वहां पर रह रहे हैं साउथ इंडियन थे तो ये रमण महर्षि का है ना अरुणाचलम वहां पे रह रहे हैं बड़े तपस्वी बड़े स्वाध्याय प्रिय है शास्त्र का बड़ा उनका अच्छा अंडरस्टैंडिंग है और तेलुगु जो भी उनका लैंग्वेज होगा उसमें उन्होंने किताबें भी बहुत लिखी अपने ऑर्डर से पब्लिश हुई है फिर अभी अभी अभी वो छोड़ के वहां पर रह रहे हैं। तो वो कहते थे हमको क्लास में कि देखो कि यह रीडिंग का या ऐसा कोई हैबिट तुम पहले से ही एक प्रोजेक्ट के रूप में बना करके रखो जो कि तुम्हारे जब क्योंकि धीरे-धीरे करके जब समय ज्यादा मिलने लगेगा यंग होते हैं तो ड्यूटी बहुत होती है। रिस्पांसिबिलिटी बहुत होता है। एक सीनियर होने के बाद में आपका असिस्टेंट वसिस्टेंट हो जाएगा और फिर हेड ऑफ़ द सेंटर भी आपको इतना ज़्यादा रिस्पांसिबिलिटी देगा नहीं। सो यू विल हैव टाइम। सो हाउ टू बेस्ट यूटिलाइज़ दैट टाइम। आपका फॉल बैकक एक होना चाहिए। माने आसमान से गिरे जमीन पे माने आसमान से गिरे और उसके ऊपर त्रिशंकु जैसा ना हो जाए कि खिजूर पे अटके ऐसा ना हो जाए। बीच में कहीं पे ऐसा होना चाहिए टू व्हिच यू कैन रिट्रीट टू लेस देन स्पिरिचुअल एट द सेम टाइम फार हायर देन वर्ल्डली पर्स्यूड। सो सम प्रोजेक्ट आपका ऐसा होना चाहिए इन व्हिच यू कैन गिव योर टाइम। अभी मैं मेरा खुद का मैं बताता हूं। आई एम नियरली 50 मिड लाइफ क्राइसिस अभी प्रारंभ हो ही गया है। एक तरह से देखें तो मैं राजकोट में जिस तरह से काम करता था सुबह को 7:00 से रात को 7:00 बजे तक वो अभी मेरे ना ही मेरे पास में वो अपॉर्चुनिटी है काम करने के लिए ना ही अभी मेरे पास में वो फिजिकल मेंटल फिटनेस है। इवन यदि राजकोट में भी सेम पोजीशन में आज मेरा पोस्टिंग फिर से हो जाए। आई विल नॉट बी एबल टू डू दैट मच वर्क जो कि मैं उस समय करता था। सो व्हाट इज़ द ऑप्शन फॉर मी कि अभी इस तरह के आउटलेट्स मैंने खोज लिए हैं। ऐसा नहीं है कि मैं जो फ्री टाइम मिलता है आइडियली स्पीकिंग जब ध्यान बढ़ा दिया है। ऐसा नहीं हुआ है क्योंकि ना ही मेरी वो कैपेसिटी है फिजिकल मेंटल स्पिरिचुअल एट द सेम टाइम मुझे यह पता है कि बहुत ज्यादा आउट ऑफ टर्न जाकर के वो सब करने से ना फिर वो विकृति ही प्रारंभ होगी। सो बेटर ऑलवेज टू फाइंड ए प्रोजेक्ट वि इज सेमाई स्पिरिचुअल इन वि यू कैन पुट योर माइंड एंड दैट कैन टेक यू टुवर्ड्स नेक्स्ट स्टेज। मेरे ऐसे बहुत सारे प्रोजेक्ट है ठाकुर की कृपा से। देखिए वीडियो एडिटिंग तो एक है। क्लास करना एक है। मेरी किताब एक है। शारदा कोश एक है। सो बाय द ग्रेस ऑफ ठाकुर मैं बहुत बिजी रहता हूं। बट यह बिजीनेस और वो राजकोट वाली बिजीनेस क्या थी कि वो एक टाइम बाउंड सब कुछ करना होता है कि आज मैगजीन को पब्लिश होना प्रेस में जाना ही है तो अगले दिन मुझे कैसे भी करके उसको खत्म करना है। अभी जो है वो टाइम बाउंड नहीं है। अभी मुझे नींद आ गई तो मैं सो गया। डज नॉट मैटर कि कल ऐसा कोई डेडलाइन नहीं है शारदा कोश का या ऐसा कुछ मेरे लिए उसमें भी देखिए मुझे सब समय इतना स्टडी करने की जरूरत नहीं है। बहुत कुछ तो ऑटो पायलट पे ही चल जाता है।