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Sri Ramakrishna Kathamrita ·

श्रीरामकृष्ण कथामृत || 15 Dec 1883 - श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ दक्षिणेश्वर में || 3 Nov 2025

प्रार्थना

ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री श्री रामकृष्ण कथामृत

बीच-बीच में संसार से हटकर, मन के एकांत में—कभी वन में, कभी घर के कोने में—ईश्वर को पुकारना आवश्यक है

मास्टर महाशय दक्षिणेश्वर में रहने के लिए आए हैं। ठाकुर ने कहा कि बीच-बीच में मने बने और कोण अर्थात कि मन में वन में या मन में यानी कि इन द कॉर्नर ऑफ आवर माइंड वन में अर्थात कि फॉरेस्ट में और कोने में यानी कि इन द कॉर्नर ऑफ आवर होम। समवेयर कहीं पे अपने को आइसोलेट करके हमको रिट्रीट करनी चाहिए। यह बीच-बीच में रिट्रीट करने से ही क्या होगा कि संसार के प्रति जो अपनी आसक्ति है वैसे तो वह 100% नहीं चली जाएगी क्योंकि ठाकुर जैसे कहते हैं कि गंगा में स्नान करने को जाएंगे तो पाप जितने भी है वह पंखी बनकर के वह पेड़ के ऊपर में बैठे रहते हैं और फिर जैसे ही स्नान करके वापस आए तो फिर से वह अपने सर के ऊपर में सवार हो जाते हैं। तो, वह है एक कि संस्कार ईजीली जाते नहीं है। किंतु क्या है कि रिट्रीट का आध्यात्मिक जीवन में बहुत हीेंस है और आजकल तो आप रामकृष्ण मिशन में भी देखिए कि इतनी सारी रिट्रीट्स वगैरह हो रही है और भक्त लोग जो है जाते भी हैं। अभी जस्ट रिसेंटली यहां पर एक डिवोटी आया था। मुझे बता रहा था कि वो मायावती जाकर के आया है। वहां पे वो अपने सुधीर महाराज है शुद्धिंद जी तो उन्होंने वो रिट्रीट कंडक्ट की है। तो वेरी गुड कि इस तरह से आप लोग बीच-बीच में संसार की चिंता छोड़ के अपना पूरा मन जो है वो ईश्वर में लगाएं। अभी जस्ट अभी ही यहां पे एक फैमिली आया है गुजरात से डिवोटी फैमिली है तो वे लोग यहां पे रहे तीन दिन और अभी आज सुबह को ही वे लोग निकले गुजरात जाने के लिए वापस तो तीन दिन यहां पर रुक करके मैंने देखा उनका रूटीन कोईकोई लोग जब आश्रम में जाते हैं विजिट के लिए तो क्या करेंगे कि वहां पर वो जितने भी देखने वाले आसपास के स्थल है वह जितने भी टूरिस्ट अट्रैक्शन है वह सब कवर करना वही एक उनका एक बड़ा टेंशन रहता है। किंतु इन लोगों को मैंने देखा कि लेडीज लोगों को खास करके कि दिन भर मंदिर में बैठकर के कोई पाठ कर रहा है। कोई जप कर रहा है या तो फिर यह आरती है। आरती के बाद के भजन है। एकदम ध्यान देकर के तन्मयता से यह लोग सब पार्टिसिपेट कर रहे हैं। वि इज वेरी गुड। मंदिर में जाते हैं तो आश्रम में रहने को जाते हैं। यदि आपको यह अपॉर्चुनिटी मिला है कि जनरली आश्रम में आपको तीन दिन रहने को देंगे तो तीन दिन यदि आपको रहने को मिलता है कोई भी आश्रम में तो आश्रम का ही बेनिफिट उठाइए। वहां पर फिर टूरिस्ट स्पॉट कौन से हैं? यहां पे यह मंदिर है। वहां पर वह मंदिर है। यह सब नहीं करके आश्रम में रहिए। आश्रम का पवित्र वातावरण आश्रम में साधु संग मंदिर है ठाकुर है मंदिर में बैठकर के चटिंग करना या तो फिर पाठ करना यह सब कितनी अच्छी बातें हैं तो यह रिट्रीट का महिमा हमको ठाकुर ने ही बता दिया है पहले से तो मास्टर महाशय आए हैं रिट्रीट के लिए 1883 यह दिसंबर महीने की बात है 14th दिसंबर को ठाकुर मास्टर महाशय आ चुके हैं। 14th, 15th और 16th ये पहले दो 14th और 15th दिसंबर की हमने ऑलरेडी चर्चा कर ली है। पाठ कर लिया है कथामृत में से। आज 16th

में मुक्त आत्मा हु, में क्यों पिंजरे में बद्ध पंखी की तरह होने को जाऊंगा

दिसंबर 1883 सुबह का जो सीन मास्टर महाशय भी लिखते इतना सुंदर है। एक तो डेट देते हैं। फिर वह सुबह का समय है, दोपहर का है। वह स्पेसिफाई करते हैं। फिर वो कहां पे ठाकुर खड़े हैं। कौन से एंगल पे कौन सी डायरेक्शन में देख रहे हैं। जैसे पूरा सिनेमैटिक सीन खड़ा करते हो कि जिससे कि भविष्य में इसको विजुअलाइज करना हो। माने अपने हृदय में भी और यदि इसके ऊपर में टीवी सीरीज बनानी है, मूवीस बनानी है, एनिमेशंस बनाने है, डॉक्यूमेंट्रीज बनानी है तो उसके लिए इतना सुंदर रूप से अपने को एक परफेक्ट एक रेडीमेड सीन मिल जाता है। तो सुबह के 10:00 बजे का जो एक सीन था 16th दिसंबर का ऑलरेडी हमने देख लिया है कि ठाकुर एक गीत गातेगाते मास्टर महाशय के सामने गीत गातेगाते थोड़े से तो भावापन्न हुए हैं कि तारी ते होबे मां तारा होए छी शरणागतो मां तारा अर्थात कि मां काली माने जो देवी के जो विभिन्न नाम है उसमें से एक नाम है तारा तो तारा तारना होगा तारा तारा अर्थात कि जो भवसागर तारण करवाती है तो इस तरह से देवी का नाम है कि भवसागर को पार करवाना होगा तरवाना होगा तारा मैं हुआ हूं तुम्हारा शरणागत जैसे कि मैं रहा हूं एक पिंजरे के पंखी की तरह होया रहे छी जेनो पिंजरे पाखीर मोतो जैसे कि मैं पिंजरे में बद्ध पंखी की तरह तुम्हारा शरणागत होकर के रहा हूं। तो साथ में ही जैसे ही यह लाइन ठाकुर ने गाया उसके साथ में ही फिर क्या कहते हैं करते क्या है केनो पिंजरे पाखिर मत केनो होते जाो एक थू अर्थात कि क्यों मैं पिंजरे में बद्ध पंखी की तरह होने को क्यों जाऊंगा ऐसा बोलकर के ठाकुर थूकते हैं। अभी देखिए कि जो एक पोलाइट सोसाइटी है उसमें यदि आप ऐसा करके थूकेंगे ना कि ऐसा कुछ करेंगे तो लोग क्या है आपको बड़ा ही शिष्टाचार विहीन व्यक्ति मानेंगे। कहेंगे कि इसको किसी भी तरह का मैनर्स ही नहीं है। किंतु यहां पर यह पूरा हमने डिस्कस किया ही था डिटेल में उस समय कि ठाकुर हमारे माइंड में यह इंप्रिंट कर देना चाहते हैं कि हां भक्ति करनी है। शरणागत होना है किंतु दीनहीन नहीं होना है। हमारी भक्ति उत्साह से उल्लास से आत्मश्रद्धा से भरी होनी चाहिए। जिस भक्ति में आत्मश्रद्धा नहीं है, जिस भक्ति में एक तरह का उल्लास, उत्साह नहीं है, एक तरह का आत्मविश्वास नहीं है, वह भक्ति किसी काम की नहीं। और इस भक्ति या शरणागति के कांसेप्ट को मिस इंटरप्रेट करके ही भारत ने 1000 साल की गुलामी भोगती है। तो यह एक बहुत ही इंपॉर्टेंट टीचिंग स्वामी ठाकुर हमारे मन के ऊपर में जैसे कि इंप्रिंट कर देना चाहते हैं। मान लीजिए कि कोई अब जैसे कि कोई भी घटना होती है तो ऐसी भयानक घटना तो उसके आसपास में हम अब जैसे कि यह अमेरिका में एक आर्टिकल मैंने पढ़ा था वहां पे वहां का एक प्रेसिडेंट था वो कनेडी तो कनेडी का मर्डर हुआ अभी कनेडी का मर्डर हुआ वो प्रेसिडेंट था काफी लोकप्रिय तो बहुत सारे लोग उसको म रिस्पेक्ट भी करते थे। उसके ऊपर में काफी लोगों का एक तरह का विश्वास भी था कि देश को सही डायरेक्शन में ले जा रहा है। अभी जिस क्षण उसका मर्डर हुआ वो इतना डीपली अमेरिकन लोगों के माइंड के ऊपर में इंप्रिंट होकर के रहा है कि सालों सालों बाद में लोग आपस में डिस्कस करते हैं कि अच्छा कैनेडी का मर्डर हुआ। उस समय आप क्या कर रहे थे? तो कोई कहेगा कि हां मैं किचन में था। वह खाना खा रहा था। उस समय मेरे पास में यह न्यूज़ आया। अभी देखिए कि आप अपना पूरा जीवन किचन में खाना खा के बिताते हैं। इवन आपको आज कोई पूछेगा कि तीन दिन पहले या चार दिन पहले इवन कि यस्टरडे गत कल वो आपने का क्या खाना खाया तो आपको इतना याद नहीं होगा। क्यों? क्योंकि यह जो रूटीन मेमोरीज जो होती है वह रिपीटेडली ओवराइट होती जाती है। तो जब तक कोई डीप इंप्रिंट नहीं पड़ता मन के ऊपर में तब तक यह मेमोरी अपने माइंड में लंबे टाइम तक रहती नहीं है। तो बहुत सारे लोग आप पूछेंगे अमेरिका के वह ओल्डर जनरेशन वाले कनेडी का मर्डर हुआ। आप कहां पे थे? तो वे लोग बताएंगे मैं ऑफिस में था ना बेसबॉल खेल रहा था ना किचन में था व्हाटएवर। तो अभी किसी को भी इन जनरल ऑफिस में था वह बात याद नहीं रहेगी। बेसबॉल खेल रहा था वो बात याद नहीं रहेगी। किंतु बिकॉज़ कि यह कैनेडी के डेथ के साथ में एसोसिएटेड मेमोरी है और कैनेडी का डेथ इतना गहरा उन लोगों के ऊपर में एक इंपैक्ट डाला है कि उसके एसोसिएटेड जितनी भी मेमोरीज है वह सब लोगों के माइंड में फिट बैठी हुई है। तो यहां पे भी देखिए कि ठाकुर ऐसा करके थूकते हैं। तो मास्टर महाशय के मन में यह मेमोरी और उसके साथ में एसोसिएटेड जो टीचिंग है इतना गहराई से फिट बैठ जाना चाहिए कि वह कभी भी इस टीचिंग को ना भूले। तो इसलिए ठाकुर को यह सब साइकोलॉजी अच्छे से पता है। तो बोल कर के ठाकुर जब यह कहते हैं कि पिंजरे पाखी मत होते जाबो केनो। मैं पिंजरे के पंखी की तरह होने को क्यों जाऊंगा? हाथ थू ऐसा करके थूकते हैं। हम लोग माने एक प्रश्न कर सकते हैं कि ठाकुर समाधि में भी तो जा सकते थे। यदि किसी के मन पे इंप्रिंट डालना ही है तो मर्डर एक ऐसी भयावह घटना है या तो फिर इतनी एक रेडिकल इवेंट है कि लोगों के माइंड पर इंप्रिंट डाल देगा। तो समाधि भी तो इस तरह की एक रेडिकल एक इवेंट है जो कि लोगों के मन पर गहरी छाप छोड़ेगा। किंतु अनफॉर्चूनेटली प्रॉब्लम यही है कि ठाकुर प्रतिदिन दिन में मल्टीपल टाइम समाधि में भाव में जाते थे। तो वो एक समाधि यह एक समाधि परसों एक समाधि उसमें से कौन सी समाधि के साथ में क्या एसोसिएट था वो हो सकता है कि मास्टर महाशय भूल जाए। किंतु यह थूकना यह एक इस तरह का एक एंटीसोशियल या तो फिर यह अनक्वेंशनल बिहेवियर है और इस तरह से ठाकुर बार-बार करते नहीं है। जस्ट आप लोग कथामृत पढ़कर के देखिए कि समाधि में ठाकुर जाते हैं भाव में चले जाते हैं। जैसे कि भगवान राम भगवान कृष्ण की तरह ही जो चतुर्भुज नारायण स्वरूप मतलब एक्चुअल चतुर्भुज तो नहीं किंतु जैसे कि नारायण स्वरूप धारण करके लोगों के जो मन के जो संदेह है उसका समाधान करते हैं। यह सब तो ठाकुर के जीवन में प्रतिदिन लगा रहता है। उसमें नया कुछ है ही नहीं। किंतु नया क्या है? माने ठाकुर को ऐसा कोई टीचिंग देना है वि इज सो रेडिकल वि इज सो माने अनकन्वेंशनल वि इज सोेंट। तो ठाकुर को ऐसा कुछ करना होगा कि वह समाधि या भाव ना कि उससे भी बड़ा एक इंपैक्ट लोगों के माइंड में डाले। तो इसलिए ठाकुर यहां पर थुकते हैं। सो दिस इज वन मतलब कि इस टीचिंग काेंस क्या है वो समझाने के लिए और फिर यह सब तो हमने देखा सुबह की बात। इसके बाद में दोपहर को 4:00 बजे हैं और यहां पे एक मुख बोल के जनाई के एक डिवोटी आए हुए हैं और इनके साथ में ठाकुर वार्तालाप कर रहे हैं। इस वार्तालाप का एक अंश हमने पाठ किया है। थोड़ा सा बाकी है। तो जो ऑलरेडी पाठ कर लिया है उसमें से जैसे कि एक पॉइंट मैं फिर से एक बार डिस्कस कर लेता हूं। मुख ठाकुर को

जब ब्रह्म ही सब हुए है, तो फिर भगवान राम को घर त्याग कर संन्यास लेने की क्या जरुरत है?

पूछते हैं कि ऐहिक और पारत्रिक में तफावत क्या है? तो ठाकुर कहते हैं कि साधना के समय नेति नेति करके त्याग करना होगा और फिर जब ईश्वर प्राप्ति होते हैं तब समझ में आता है कि ईश्वर या तो आत्मन या तो ब्रह्मन जो कोई भी फिलॉसोफी हम फॉलो कर रहे हैं वही सब कुछ हुए हैं। और ऐसा कह के ठाकुर एक उदाहरण देते हैं कि जब भगवान राम को वैराग्य हुआ तब गुरु वशिष्ठ को बुलाया गया और वशिष्ठ देव ने आकर के भगवान राम को पटाने के लिए उनको जो वैराग्य है उसको ठंडा करने के लिए उनके यह कहा वैराग्य ठंडा करने के लिए ऐसा भी नहीं किंतु अब वह घर त्याग करके ना चले जाए इसके लिए वशिष्ठ इष्ट देव उनको यह वेदांत का सिद्धांत समझा करके कह रहे हैं कि चिंतन करके देखो कि इस जगत में ईश्वर के अलावा है ही क्या? यदि आप यह चाहते हैं कि मुझे ब्रह्म साक्षात्कार करना है और इसके लिए मैं घर छोड़कर के जा रहा हूं तो आप यह तो पूछिए अपने को कि क्या यह घर ब्रह्म छोड़कर के जिस कुर्सी पर आप बैठे हैं जिस सिंहासन के ऊपर में आप बैठे हैं जो राज मुकुट आपने धारण किया है राजा होने की वजह से जो यह सोना जवाहरात यह आभूषण आपने धारण किए हैं यह जो बड़ा सा महल है यह जो आपके यह चौकीदार आपके यह सेनापति आपके यह दरबारी आपकी रानी यह सब क्या वे लोग ब्रह्म छोड़कर के है क्या वह सब कुछ तो ब्रह्म है तो ऐसा क्या है जो कि राजमहल में नहीं है और उसको प्राप्त करने के लिए आप वन में जाना चाहते हैं। तो जब वशिष्ठ देव ने इस तरह से वेदांत की युक्ति लगाई तो भगवान राम शांत हो गए। चुप हो गए। इसका कोई उत्तर न दे पाए और फिर वहीं पर रह गए। अभी देखिए जहां तक यह प्रसंग जाता है वहां तक तो ठाकुर ने सिर्फ इतना ही कहा है किंतु अन्य एक प्रसंग में ठाकुर मास्टर महाशय को त्याग की महिमा सिखा रहे हैं। उस समय मास्टर महाशय एग्जैक्टली यही काउंटर आर्गुममेंट ठाकुर के सामने कहते हैं। ठाकुर जब यह कहते हैं कि कामिनी कांचन त्याग ना करने से कुछ भी होगा नहीं। इसका अर्थ मास्टर महाशय अन्य एक प्रसंग में अन्य एक प्रसंग में ऐसा करते हैं कि ठाकुर उनको घरत्या त्याग करने को कह रहे हैं। तो मास्टर महाशय को थोड़ा सा डर लग गया। अब मास्टर ठाकुर क्या है कि देखिए सबके सामने यह चारा फेंक देते थे। अब जो चारा खाएगा वो खाएगा ना खाएगा ना खाएगा। तो यह जो त्यागी संतान थे ठाकुर के उन लोगों ने यह जो ठाकुर ने जो माया जाल बिछाई थी उसमें फंस गए। मास्टर महाशय फंसना नहीं चाहते हैं। तो फिर मास्टर महाशय सामने काउंटर आर्गुममेंट करके कहते हैं कि आप ही ने तो वशिष्ठ देव का उदाहरण दिया था। आप ही ने तो कहा था कि यदि आप वन में जाना चाहते हैं तो सोच के देख लीजिए। यह महल, यह सिंहासन, यह आभूषण, यह वस्त्र, यह दरबारी, यह जनता, यह रानी, यह राजकुमार यह वगैरह उस समय तो खैर भगवान राम के राजकुमार नहीं थे। वो तो बाद में हुए। किंतु जो भी है यदि आप यह सब कुछ ब्रह्म को छोड़ के यदि है तभी आप वन में जाइए। यदि आप कहते हैं कि सर्वभूत में ब्राह्मण है तो फिर छोड़ के जाने की क्या जरूरत है? बोलकर के जब मास्टर महाशय ठाकुर के सामने यह काउंटर आर्गुममेंट करते हैं तो ठाकुर अब देखिए यह जो काउंटर आर्गुममेंट जो है वो ठाकुर के जो टीचिंग है ठाकुर का जो कहने का आशय था उसको न समझ करके मास्टर महाशय ये काउंटर आर्गुममेंट कर रहे हैं। यहां पे अह ठाकुर ने स्पष्ट रूप से कहा है कि साधना के समय में नेति नेति करके त्याग करना होगा। इस उसके बाद में जब निर्विकल्प समाधि होगी उसी समय आपको पता चलेगा और निर्विकल्प समाधि में से जब आप वापस आएंगे निर्विकल्प समाधि में क्या होगा कि मेरा जो छोटा अहम है स्मॉल आई है वो संपूर्ण रूप से विगलित हो जाएगा। विघटित हो जाएगा। मैं जो यूनिवर्सल कॉस्मिक कॉन्शियसनेस है उसमें मर्ज हो जाऊंगा। सतचित आनंदमय हो जाऊंगा। सतचित आनंद ही हो जाऊंगा। उसके बाद में यह मेरा मैं मेरा नाम है कृष्ण सखानंद। यहां पर मैंने जन्म ग्रहण किया था। यह मेरे मां-पिताजी है। यहां पर मैं साधु होने को आया हूं। इस सेंटर में मेरा पोस्टिंग है। यह मेरी ड्यूटीज है। वगैरह-वगैरह यह मेरे गुरु थे। यह मेरे दीक्षा गुरु थे। यह मेरे ब्रह्मचर्य गुरु थे। यह मेरे सन्यास गुरु। यह सब कुछ कहां विस्मृत हो जाएगा? सब जैसे कि संपूर्ण रूप से विलीन हो जाएगा। यह कृष्ण सखानंद बोलकर के जो एक पर्सन है वो पर्सन ही जैसे मर जाएगा। उसकी वजह रहेगा सिर्फ सतित आनंद। और उसके बाद में इसके बाद का जो स्टेज है बड़े ही अल्प भाग्यवान लोग होते हैं कि जिनको यह संसार में वापस आकर के ईश्वरीय नाम गुणगान कीर्तन लोगों को सुनाने के लिए एक आदेश प्राप्त होता है कि आप पृथ्वी पर वापस आइए और फिर आप लोगों के भीतर में यह ईश्वरीय ज्ञान का प्रचार कीजिए। तो जब यह लोग वापस आते हैं निर्विकल्प समाधि में से तब आप देखेंगे कि फिर से तो एक अहम चाहिए। बिना अहम के तो देह धारण होगा नहीं। अभी अहम तो विलीन हो गया है। तो फिर दूसरा अहम वही अहम को क्या फिर से आप वापस ले पाएंगे? ठाकुर ने जैसे कहा कि यह जो नमक की गुड़िया जो है तो उसको आप यदि समुंदर में डालेंगे तो नमक तो पूरा पिघल करके समुंदर के साथ में एकीकृत हो जाएगा। अभी आप कहेंगे कि मुझे वही गुड़िया वापस दो। आप समुंदर के साथ में जाकर के झगड़ा करेंगे। समुंदर कहां से आपको वही जो नमक के प्रत्येक कण जो है विघटित होकर के यह समुंदर में मिले हैं। कहां वो प्रत्येक कण को आईडी आई आइडेंटिफाई करके आईडी करके आज के लैंग्वेज में प्रत्येक कण को आइडेंटिफाई करके उस गुड़िया का भीतर का यह कण है बोल करके उसको कलेक्ट करके करके करके फिर से आपको वो वही नमक की गुड़िया बना करके देगा। दिस इज नॉट गोइंग टू हैपन। तो फिर यदि आप ज्यादा हर्ट करेंगे और समुंदर को दया आ गई तो समुंदर के भीतर में तो विराट नमक का खजाना है ना वह समुंदर का पानी ही तो साल्ट का बना हुआ है तो उसमें से कहां-कहां से वह साल्ट के कण इकट्ठा करके और एक गुड़िया बना करके आपको दे देगा। अभी यह गुड़िया देखने में, आकार में, शेप में, साइज में उसी गुड़िया की तरह है जो कि आपने उसको ओरिजिनली समुंदर में डूबाया था, समुंदर में डाला था। किंतु उसका प्रत्येक कण जो है, प्रत्येक एटम जो है, प्रत्येक मॉलिक्यूल है वो नया बना हुआ है। वो पुराने एटम्स, पुराने मॉलिक्यूल संपूर्ण रूप से विघटित हो गए। कहां वो आज जो समुंदर का जो अंडर करंट होता है ना इतना स्ट्रांग होता है कि अभी मैं विशाखापट्टनम के बीच पे जाके एक जो नमक की गुड़िया डालूंगा तो विदिन वन आवर ये जो अंडर करंट्स की वजह से वेव्स वगैरह की वजह से कोई एक कण है वह श्रीलंका की ओर जाएगा। दूसरा कण जो है वह अंडमान निकोबार की ओर जाएगा। तीसरा कहां यह बे ऑफ बंगाल की ओर जाएगा। चौथा कहां सिंगापुर की ओर जाएगा। वो विदिन वन आवर वो पूरे पृथ्वी के ओशन में वो फैल जाएगा। कहां से वो वापस होने वाला है? तो फिर दूसरे ही कण दूसरे ही एटम मॉलिक्यूल्स को इकट्ठा करके नमक की नई गुड़िया बनाई और वही गुड़िया हमको वापस समुंदर को यदि दया आ गई तो किंतु देखिए कि यह गुड़िया जो है देखने में वो साइज में शेप में कलर में वही पुरानी गुड़िया जैसी ही है। किंतु प्रत्येक कण जो है उसका वो नया बना हुआ है। तो वैसे ही नेति नेति करने के समय जो हमारा असंस्कृत अहम था निर्विकल्प समाधि में वह सतचित आनंदमय हो गया। जैसे कि परशणि पत्थर जो है वो लोहे को स्पर्श होता है तो कैसा लोहा सोने का बन जाता है। तो वैसे ही हमारा अहम जो है वो विघटित हो गया। और जब वापस आएगा तब वह एक दूसरा ही सोने का अहम लेकर के हम वापस आएंगे जिसका कि सुसंस्कृत अहम को पहले वाले असंस्कृत अहम के साथ में कोई लेना देना नहीं। अभी जब इति इति करके वापस आएंगे तब हम देखेंगे कि हां यह पूरा जगत संसार वही ब्राह्मण का बना है जो कि मैं हूं। अभी देखिए कि भगवान राम के लिए यह उदाहरण काम किया। भगवान राम ऑलरेडी निर्विकल्प समाधि की आध्यात्मिक जीवन की जो सर्वोच्च उपलब्धियां है वो प्राप्त करके बैठे हैं और वो यदि सिर्फ कि स्क्रिप्चर्स कहते हैं शास्त्र कहते हैं कि जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य ईश्वर प्राप्ति है और ईश्वर प्राप्ति का उपाय त्याग है तो शायद शास्त्र वचन को सार्थक करने के लिए भगवान राम यदि वन में जाना चाहते हैं तो उनको को वह सब करने की जरूरत नहीं है क्योंकि ऑलरेडी वह ब्रह्म साक्षात्कार करके बैठे हुए हैं। किंतु यहां पर देखिए मास्टर महाशय जब यह काउंटर आर्गुममेंट ठाकुर के सामने करते हैं कि ठाकुर जब कहते हैं कि यह जब तक कामिनी कांचन त्याग नहीं होगा ईश्वर प्राप्ति नहीं होगी। और उस समय मास्टर महाशय चालाकी करके ठाकुर का वही उदाहरण ठाकुर को सुनाते हैं कि आप ही ने तो कहा था कि भगवान राम को वशिष्ठ देव ने मना किया है वन में जाने के लिए। तो देखिए ठाकुर हो सकता है। माने दैट इज वन ऑप्शन बिफोर ठाकुर कि वो मास्टर महाशय को समझाए कि वो जो भगवान राम का उदाहरण था वो इति इति करके जगत में वापस आए उसके लिए था। और तुम्हारा जो परिस्थिति है कि अभी तो तुमको नेति नेति करके ईश्वर प्राप्ति करनी है। जब तक ईश्वर प्राप्ति नहीं होती है जब तक तुम्हारा मन के भीतर में से सब तरह की कामना वासनाएं अदृश्य नहीं हो जाती है तब तक का ये बोले बोलते रहोगे कि अहम ब्रह्मास्मि या तो फिर सर्वमदम खलमम ब्रह्म ना कि प्रज्ञानम ब्रह्म क्या फर्क पड़ता है ये सब चीजों का वो सब तो बातों की बातें हैं। वो तोता जैसे कि रट लेता है कुछ-कुछ बातें तो वैसे ही तुमने रट ली है तो ऐसा तो थोड़ी ना चलेगा मुंह मुंह से बोलने से यह सब हो जाएगा। मां का एक तोता थांगाराम बोल के और उसको भूख लगती थी ना तो वो बोलता था मां मां करके तो मां वो मां जब वो तोते की आवाज सुनेगी वो बोलेगी हां बेटांगाराम तुमको भूख लगी अच्छा मैं आकर के तुमको कुछ खिलाती हूं तो ऐसा वो तोते की वो वाणी की तरह मैं यदि यह बोलता रहूंगा कि हम ब्रह्मास्म तो थोड़ी ना खुश होने वाला है। मन तो काम कांचन में फंसा हुआ है। तो ठाकुर देखिए कि लॉजिकली इस तरह का उत्तर दे सकते थे। किंतु ठाकुर का ना सब कुछ क्रिएटिव है। सब कुछ अद्भुत है। सब कुछ जैसे कि आउट ऑफ बॉक्स थिंकिंग है। तो ठाकुर उत्तर क्या देते हैं पता है? देखिए वो पैसेज है। क्या लिखा है? मास्टर महाशय खुद लिखते हैं। जब मास्टर महाशय ने ऐसा कहा कि जब वशिष्ठ ने मना किया ठाकुर राम को वन वन में जाने के लिए घर त्याग करने के लिए। ठाकुर उत्तर देते हैं। श्री रामकृष्ण ईशत हास्या श्री रामकृष्ण थोड़ा सा हास्य करके देखिए। वो मूवी में देखते हैं ना वो जो किसी को ये पंच लाइन डिलीवर करनी होती है ना डायलॉग एकदम शार्प डायलॉग डिलीवर करना होता है तो थोड़ा सा हंस के उत्तर देते हैं तो वैसे ही यहां पे ठाकुर भी ऐसे पंच लाइन डिलीवर कर रहे हैं थोड़ा सा हंस के ईशत हास्य करिया उन्हें थोड़ा सा अल्प मात्रा में हास्य करके वैसे वो मूवी में जैसा होता है पंच लाइन डिलीवर कर रहे हैं शे रावण बोधेजुनो वो रावण वध के लिए ताई राम संसारे रोहलेन विबाहु होकर लेन। इसीलिए राम संसार में रहे और विवाह किया। देखिए यहां पर मामला पूरा ठाकुर ने उल्टा दिया है। किस तरह से कहते हैं कि वशिष्ठ ने भगवान राम को कहा कि तुम संसार में ही रहो क्योंकि तुमने निर्विकल्प समाधि कहो ना कि आध्यात्मिक जीवन के जो सर्वोच्च अवस्था कहो वह सब तुमने प्राप्त कर ही लिया है। तुमको अभी अलग से वन में जाने की जरूरत नहीं। अभी देखिए कि यह वशिष्ठ देव तो सही में ही बोलते होंगे। उन लोगों के लेवल के जो लोग होते हैं वह लोगों को भ्रमित करने के लिए ऐसा झूठ-मूठ का उपदेश नहीं देते। वशिष्ठ देव ने जब भगवान राम को यह कहा कि तुमको वन में जाने की जरूरत नहीं। तो यह संपूर्ण रूप से सत्य होना ही चाहिए। वह कभी भी भगवान राम को भगवान राम को नहीं भ्रमित नहीं करेंगे और ऋषि होकर के कभी मिथ्या वचन नहीं करेंगे। इन स्पाइट ऑफ दैट ठाकुर उत्तर क्या देते हैं कि वह रावण वध के लिए और इसीलिए राम संसार में रहे और इसीलिए राम ने विवाह किया। देखिए यह जो ठाकुर का जो सत्य वचन पालन करने का जो एक प्रचंड एक उनका था निष्ठा थी। उनका एक प्रण था कि सत्य वचन के अलावा और कुछ भी नहीं बोलेंगे। तो यह कोई ठाकुर के साथ में यह चालू नहीं हुआ है। यह यह जो अपनी पुरानी ऋषि मुनियों की परंपरा जो चली आ रही है, यह परंपरा में सत्य वचन पालन इतना ही इंपॉर्टेंट था जितना कि ब्रह्मचर्य पालन था। या तो फिर यह एक सांसारिक सुख भोगों के प्रति जो उनका जो एक तरह का त्याग था तो यह तो सनातन हिंदू परंपरा ऋषि मुनियों की चली आ रही है। ठाकुर यदि किसी को इस तरह से भ्रमित ना करें तो हमको ऐसा नहीं लगता। मुझे ऐसा नहीं लगता एटलीस्ट पर्सनली कि वशिष्ठ मुनि जो है वो भगवान राम को भ्रमित करें। यानी कि उन्होंने राम को जो कहा है, भगवान राम को जो कहा है, वह 100% लिटरल सत्य तो है ही है। किंतु देखिए साथ-साथ में ही यह जो लेयर्स ऑफ मीनिंग जो होते हैं, हमारे जीवन में भी, आध्यात्मिक जीवन में भी, प्रैक्टिकल लाइफ में भी किस तरह से लेयर्स ऑफ मीनिंग होते हैं। तो, यहां पे भी कि जब यह कहा कि तुम वन में मत जाओ, घर में ही रहो। तो इसका अर्थ यह भी है एक दूसरा एक हिडन एक अर्थ या तो आशय यह भी है कि भगवान का जन्म ही तो हुआ है रावण वध के लिए यदि मां सीता के साथ में विवाह नहीं करेंगे मां सीता का अपहरण नहीं होगा रावण के द्वारा और भगवान राम रावण के साथ में युद्ध नहीं करेंगे तो रावण का वध कैसे होगा भगवान राम यदि वन में चले गए वो थोड़ी ना वो फिर कोई राक्षस का वध करने को जाने वाले हैं तो इसलिए इसलिए रावण का वध भी करना है और भगवान राम को जो आध्यात्मिक जीवन का सर्वोच्च सत्य है वो भी बताना है। सो सी लेयर्स ऑफ मीनिंग और जो ठाकुर ये जो पंच लाइन डिलीवर करते हैं ईशत हास्या हल्का सा हंस करके सो दिस इज ऑल ब्यूटी ऑफ इंडियन स्क्रिप्चर्स। तो यह एक हो गया और इसके बाद में

उत्तम गुरु श्रीरामकृष्ण भक्तों के मन में आध्यात्मिक उपदेश कैसे दृढ़ता से अंकित कर देते हैं?

और एक ठाकुर कहते हैं कि ब्रह्म जो क्या है वह हम मुंह से नहीं कह पाएंगे। सब चीजें जैसे कि झूठी हो गई है। झूठी हो गई है। यानी कि जितने भी टॉपिक है आध्यात्म जीवन के कि स्पिरिचुअल लाइफ के वेद वेदांत के मुंह से उच्चारित हुए हैं। वाणी में उसको बोला गया है। बोल के मुंह से लगे हैं। बोल के वह झूठे हो गए हैं। किंतु ब्रह्म क्या है? वह कोई अपने मुंह से वाणी से वर्णन नहीं कर पाया है। वह झूठा नहीं हुआ है। और ऐसा करके ठाकुर कहते हैं कि मैंने विद्यासागर को जब यह बात बताई थी तो विद्यासागर बड़ा ही खुश हो गया था। अभी आजकल इसको कहते हैं नेम ड्रॉपिंग। नेम ड्रॉपिंग अर्थात कि आप किसी के साथ में बात कर रहे हैं तो वह क्या कहेगा आपको अपनाेंस दिखाने के लिए कि मेरा उस वीआईपी के साथ में रिलेशन है। मैं उस सेलिब्रिटी के वहां पर बात गया था। उसके घर गया था। मैं उस बड़े व्यक्ति के साथ में बात कर रहा था। अभी जस्ट रिसेंटली कोई मुझे बता रहा था। मैं बेलून मठ गया और जीएस महाराज के साथ में बात कर रहा था। अभी वो जीएस महाराज के साथ में बात कर रहा था। इस बात को उनको मुझे कहने की कोई आवश्यकता नहीं थी। किंतु बात बातबात में ऐसा करके यह बोल दिया कि मुझे लगा अच्छा वह बेलूर मठ जाकर जीएस महाराज को मिल सकते हैं। उतना उनका मतलब येेंस है। वेरी गुड। तो क्या है कि हम सभी लोग अपनाेंस बढ़ाने के लिए इस तरह से नेम ड्रॉपिंग करते हैं कि मैं उस सेलिब्रिटी के साथ में उस बड़े आदमी के साथ में इस तरह से बात कर रहा था। तो यहां पे भी एक एक मैं नाम नहीं बताऊंगा। एक है बड़े साधक है उनके ऑफिस में आप जाएंगे तो एक बहुत ही बड़े पॉलिटिशियन के साथ में उनका फोटो है तो अभी क्या है कि इस तरह के पॉलिटिशियन के साथ के फोटो आप दीवार पे तो नहीं टंगा सकते अच्छा नहीं लगेगा दीवार पे तो ठाकुर महा स्वामी जी के ही फोटो होने चाहिए किंतु यह फोटो को इतना सुंदर रूप से लेमिनेट करके वो अपने टेबल पर रखा है आप यदि कैजुअली जाकर के ऑफिस में देखेंगे तो ऐसा लगेगा कि यह फोटो भी प्रिंट हो के आया है किसी कारण के वजह से टेबल पर रखा है। तो ठीक है। आपने फोटो देखा अभी बड़े वीआईपी के साथ में फोटो है बोल कर के लगा कि यह साधक भी बहुत बड़े होंगे। अच्छा ठीक है चलो। तो इनिशियली ऐसा आपको लगेगा। किंतु मैं जब जितनी भी बार उस ऑफिस में गया हूं उतनी बार देखा है वो फोटो एग्जैक्टली वही जगह पे उसी पोजीशन में रखा है। तब मैं समझ गया कि लोगों को दिखाने के लिए वो एग्जैक्टली उस पोजीशन में रखा है और इतना कैजुअली रखा है कि आपको ऐसा नहीं लगेगा कि यह उनको मतलब ये इसको डिस्प्ले कर रहा है। सो क्या है? हम सभी को इस तरह से नेम ड्रॉपिंग करने की बड़े लोगों के साथ में एसोसिएशन है अपना वो दिखाने की आदत होती है। तो ठाकुर क्या यहां पे नेम ड्रॉपिंग कर रहे हैं क्या? इट्स नॉट लाइक दैट। ऑफ कोर्स ठाकुर ठाकुर है। किंतु देखिए कि यह है ठाकुर का यह जो लोगों के सर के ऊपर में यह इंप्रिंट हो जाए कि हां ऐसा कुछ कहना है माने एक है टीचिंग एक दूसरा है इंपैक्ट टीचिंग एंड इंपैक्ट। एक तो है कि टीचिंग उसके साथ में है उपमा। देखेंगे ठाकुर जब भी कुछ भी कहते हैं ना साथ में 100 उपमाएं देते हैं कि एक बार यदि हमको निर्विकल्प समाधि प्राप्त होती है तो हमारा जो छोटा अहम है विघटित हो जाता है। तो यह कहने के बाद में टीचिंग उसके बाद में दी उपमा क्या उपमा दी कि यदि यह नमक की गुड़िया है उस समुंदर में डालो संपूर्ण रूप से विघटित हो जाएगी। या तो फिर एक दीवाल है। दीवाल के उस पार में आप देखो बहुत ही सुंदर एक दृश्य दिख रहा है। जो लोग दीवाल पर उठे उन्होंने इस दृश्य देखकर के हाहा करके ऐसे अभिभूत हो गए कि सीधा उस साइड जंप लगा दिया। फिर वापस आकर खबर कौन देगा कि वहां पे आप दीवाल के इस साइड में छोड़ो बैठना। वहां पे जाओ मेहनत करके दीवार उठ करके देखो कि इतना आनंद आएगा। वो खबर अभी कौन देगा? तो ठाकुर जब एक टीचिंग देते हैं साथ में एक उपमा देते हैं। तो दिस इज़ अ कॉमन अंडरस्टैंडिंग ऑफ ठाकुर टीचिंग। किंतु थोड़ा सा रीडिंग बिटवीन द लाइन करेंगे साथ-साथ में ही वो समथिंग इंपैक्टफुल कहते हैं। जिससे कि यह टीचिंग और उपमा जैसे कि अपने दिमाग के भीतर में बैठ जाए। तो यहां पर ठाकुर नेम ड्रॉपिंग नहीं कर रहे हैं। वो उसके ऊपर में इंपैक्ट डालने के लिए कि हां विद्यासागर अभी क्या है? जनरल कोई एक आदमी होता है ना सेलिब्रिटीज या वीआईपी के नाम से बड़ा ये इंप्रेस हो जाता है। तो जब उसने यह मैं आशा रख लेता हूं कि यह जनाई का यह जो मुख है जब उसने यह विद्यासागर का नाम सुना होगा तो उसके माइंड पर इंपैक्ट हुआ होगा और फिर इस इंपैक्ट की वजह से यह जो टीचिंग है वो उसके माइंड में थोड़ा सा डीपली गया होगा। तो यहां पर ठाकुर कहते हैं कि यह बात कि जब सब कुछ झूठा हो गया है। ब्रह्म क्या है? झूठा नहीं हुआ। ब्रह्म क्या है? मुंह से नहीं बोला गया। ब्रह्म तत्व झूठा नहीं हुआ। ब्रह्म क्या है? मुझसे बोला नहीं गया। मैंने उसको विद्यासागर को कहा था। तो विद्यासागर सुनकर के बहुत खुश हो गया था। इसके बाद में देखिए रिलेटेड टू दिस एक पैसेज है। ठाकुर का ही कथामृत में से ही मैंने एक कलेक्शन किया है। मैं थोड़ा सा पढ़ लेता हूं इनको इसको। ठाकुर क्या कहते हैं? जतो

जिसे न मन छू सके, न वचन पकड़ सके — वही है ब्रह्म

क्षण मने द्वारा विचार ततो क्षण नित्य ते पहुंचानो जाए ना जब तक मन के द्वारा विचार होता है तब तक आप नित्य में नहीं पहुंच सकते हैं मने द्वारा विचार करते गले ही जगत के छाड़ बार जो ना मन के द्वारा विचार करने से ही जगत को छोड़ने का उपाय नहीं है रूप रस गंध स्पर्शों शब्दों इंद्रिय ई शकुल बिछ विषय के छाड़वार जोन आए रूप रस गंध स्पर्श शब्द इंद्रियों के यह सब विषय को छोड़ने का कोई उपाय नहीं है। छोड़ने की कोई कैपेसिटी नहीं है। क्यों? जब तक हम लोग मन के द्वारा विचार कर रहे हैं। जब तक हम मन के द्वारा विचार कर रहे हैं। जब तक हम नित्य में नहीं पहुंचे हैं, तब तक जब तक यह देह है, जब तक हमारा मन है, तब तक ये इंद्रियों के जो विषय है, जब तक हमारी कर्मेंद्रिय, ज्ञानेंद्रिय है। जब तक हमारे ये जो ये काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह, षड रिपु है। उससे हम छुटकारा नहीं पाएंगे। किंतु जिस क्षण विचार बंद होले तबे ब्रह्म ज्ञान जिस क्षण विचार बंद होगा उसी क्षण प्राप्त होगा ब्रह्म ज्ञान ए मनेर द्वारा आत्मा के जाना जाए ना इस मन के द्वारा आप आत्मन को पहचान नहीं पाएंगे पहचान नहीं पाएंगे शब्द भी गलत साक्षात्कार नहीं कर पाएंगे क्योंकि पहचानना आप किसको पहचानेंगे जो पर पुरुष है, जो अजाना अचेना है, अनजाना कोई व्यक्ति है, उसको पहचानेंगे। आत्मन तो हमारा सही स्वरूप है। यानी कि आत्मन के आत्मन को साक्षात्कार करना है। आत्मन को रियलाइज करना है। नहीं कि आत्मन को पहचानना है। किंतु जैसे अद्वैत वेदांत में हमने भी पहले भी डिस्कस किया था कि शब्द ऐसे अटपटे हो जाते हैं कि फिर क्योंकि जितने भी हमारी यह जो ग्रामर ना लैंग्वेज है ऑब्जेक्ट को डिस्क्राइब करने के लिए वह बनी है। सब्जेक्ट को डिस्क्राइब करने के लिए या सेल्फ एनालिसिस करने के लिए नहीं बनी। सेल्फ एनालिसिस करने के लिए सिर्फ वेदांत ही एकमात्र शब्द भंडो है। वही एकमात्र वोकैबुलरी है। तो एक आम आदमी के साथ में आप वेदांत की वोकैबलरी अवॉइड करके यदि आप वेदांत के गढ़ तत्वों को या तो फिर वेदांत के कोर कांसेप्ट को डिस्कस करने को जाएंगे तो आपको यह जो जनरल वोकैबलरी है ऑब्जेक्ट को डिस्क्राइब करने की वोकैबलरी वही यूज़ करनी है और उस वोकैबलरी से कंफ्यूजन हो ही सकता है। तो यहां पे बिकॉज़ कि एक इस तरह की डिवोटी के साथ ठाकुर बात कर रहे हैं जिसको कि वेदांत के बारे में ज्यादा पता नहीं। बोल करके ठाकुर ने कहा है कि मन के द्वारा आत्मा को जान नहीं सकते। आत्मा द्वारा ही आत्मा के जाना जाए। देखिए कितना सुंदर यह वाक्य प्रयोग है ठाकुर का। आत्मा के द्वारा ही आत्मा को आप पहचान सकते हैं। आत्मन ही आत्मन का साक्षात्कार कर सकता है। शुद्ध मन शुद्ध बुद्धि शुद्ध आत्मा एक शुद्ध मन शुद्ध बुद्धि शुद्ध आत्मा एक ही है। देखो ना जो देखो तो एकटा जीनिस देखते ही कतक गुलो दरकार यदि एक चीज को देखना है तो साथ-साथ में उसको देखने के लिए इतनी इतनी चीजें चाहिए यदि आपको किसी चीज को देखना है तो देखने के लिए आपको क्या चाहिए व्हाट आर द इंस्ट्रूमेंट्स ऑफ विज़ तो क्या है चखु दरकार इंस्ट्रूमेंट्स ऑफ विज़ क्या है तो आंख चाहिए आलो दरकार उजाला चाहिए आबार मोनेर दरकार और साथ-साथ में ही मन चाहिए यदि मेरी आंख आंख नहीं है। यदि उजाला नहीं है और यह जो उजाले के माध्यम से आंख के ऊपर में यह जो सिग्नल आते हैं, यह जो परसेप्शनंस आते हैं, विजुअल कस जो आते हैं, उसको इंटरप्रेट करने के लिए एक प्रोसेसर चाहिए। भीतर में, एक माइंड चाहिए। यदि मन नहीं है तो फिर मन, आंख और उजाला यह तीन चीज नहीं है तब तक आप किसी चीज को आप देख ही नहीं पाएंगे। ए तीन मध्य एकटा बाद दिल तारदर्शन होए ना इस तीनों में से आंख उजाला और मन आई लाइट एंड माइंड इन तीनों में से यदि एक भी एब्सेंट है तो आप उस चीज को नहीं देख पाएंगे ए मोनेर का जतोण चल छे ततोण केन कोरे बोलबे जे जगत नाई की आमी नाई तो जब तक इस मन का कार्य चल रहा है तब तक आप कैसे कहेंगे कि जगत नहीं है या फिर मैं नहीं हूं मनेर नाश होले संकल्प विकल्प चले गले समाधि होए ब्रह्म ज्ञान होए मन का जब नाश होगा संकल्प विकल्प चले जाएंगे तब समाधि होगी और ब्रह्म ज्ञान होगा किंतु स रे गा मा पा धा नी नी ते अनेक क्षण थाका जाए ना किंतु स रे गा मा पा धा नी नी के ऊपर में आप ज्यादा समय नहीं नहीं रह पाएंगे। जो राग और म्यूजिक का प्रैक्टिस करते हैं उनको पता ही होगा नी है वह तीव्र स्वर है। तीव्र स्वर की प्रैक्टिस आप ज्यादा समय नहीं कर पाएंगे। थोड़ा सा आप लंबे समय के लिए आपको कोई भी गीत गाना है तो सा रे गा मा पा धा के ऊपर में ही आपको गाना होगा। नी तक जाते हैं तो इमीडिएटली आपको वापस भी आ जाना होगा। तो यहां पर ठाकुर ठाकुर के ही शब्दों में ठाकुर का यह जो टीचिंग उसका हमने एक अंडरस्टैंडिंग इसके बाद में ठाकुर क्या कहते हैं

यदि मन ज़रा-सा भी कामिनी-कांचन से आकृष्ट है, तो ईश्वर-दर्शन असम्भव है

विषय बुद्धि लेश थाकले ए ब्रह्म ज्ञान होना अभी यह जो 16 दिसंबर को दोपहर के 4:00 बजे हम वापस आ गए हैं वो जनाई का जो मुखज्ज है उसके साथ में ठाकुर का वार्तालाप आगे बढ़ रहा है अभी तक का जो डिस्कशन हमने किया ऑलरेडी हो चुका था अभी आज से यह नया पाठ करते हैं। क्या कहते हैं ठाकुर? विषय बुद्धि का एक लेश मात्र भी न एक लेश मात्र रहने पर भी रहने से ही इस ब्रह्म ज्ञान होगा नहीं। यदि वन परसेंटेज भी हमारे मन में विषय बुद्धि है, कामना वासना है, इंद्रियों के विषयों के प्रति हमारी आसक्ति है, तो हमसे ब्रह्म ज्ञान प्राप्त नहीं होगा। 1% भी नहीं होना चाहिए। 100 रूप से वह चला जाना चाहिए। कामिनी कांचन मने आद थाकब बेना तबे होवेबे कामिनी कांचन मन में संपूर्ण रूप से ना हो तभी होगा आद थाकब बेना एक बार में भी नहीं रहेगा तब होगा तबे होवे गिरिराज के पार्वती बोलले गिरिराज अर्थात कि हिमालय को पार्वती ने कहा बाबा ब्रह्म ज्ञान यदि चाहो ता हले साधु संग करो बाबा यदि ब्रह्म ज्ञान चाहते हो तो साधु संग करो पहले तो गिरिराज को मां पार्वती ने विभिन्न रूपों में आकर के दर्शन दिया। तो आखिर में जब गिरिराज पूछते हैं कि मां अभी मुझे ब्रह्म दर्शन करवाओ। ब्रह्म साक्षात्कार करवाओ। तो फिर मां ने कहा कि यदि ब्रह्म साक्षात्कार करते हैं तो फिर इवन दो कि आपकी बिटिया नारायणी स्वयं है। उसने आप आपको आकर के सभी तरह की देवियों के रूप में दर्शन दिया है। किंतु ब्रह्म ज्ञान एक ऐसा एक है लेवल या तो स्टेटस या तो समिट कि यदि वहां तक आपको पहुंचना है तो आपको साधु संग करना होगा। अर्थात कि आपको यह घर संसार त्याग करके वन में जाकर के आश्रम में रहना होगा। अभी जब ठाकुर ने यह कहा तो उसके सामने में मास्टर महाशय का अपना कोई ना कोई कमेंट्री रहता है। तो तो मास्टर महाशय कहते हैं ठाकुर की बोल छे संसारी लोग बा सन्यासी यदि कामिनी कांचन नहीं थाके ता होले ब्रह्मज्ञान होए ना ठाकुर क्या यह कह [हंसी] रहे हैं कि संसारी लोग या सन्यासी यदि कामिनी कांचन लेकर के रहे तो ब्रह्म ज्ञान नहीं होगा ठाकुर क्या यह कह रहे हैं तो ऑफ कोर्स ठाकुर यही कहते हैं ठाकुर की यह जो म कोर टीचिंग है ये कामिनी कांचन त्याग म पुरुषों को कहेंगे तो कामिनी कांचन और स्त्रियों को यदि कहेंगे तो पुरुष और कांचन बेसिकली कामना वासना त्याग करनी है इसके अलावा आध्यात्मिक जीवन में ज्यादा कुछ होने वाला नहीं देखिए देयर इज़ अ वेरी डेंजरस

श्रीरामकृष्ण का अप्रतिम त्याग: एक सुंदरी स्त्री ठाकुर का ध्यान आकर्षित करने का प्रयास करती है, पर सफल नहीं होती

एग्जांपल वेरी क्रूल एग्जांपल हम लोगों के लिए साधुओं के लिए अह ठाकुर ने सुबोधनंद जी को कहा था खोखा महाराज को उस समय तो वह उम्र में बड़े छोटे थे। ठाकुर के पास में आते थे। तो ठाकुर का अभी जैसे वही इंप्रिंट डालना है तो तो इस तरह से इंप्रिंट डालना है कि वो कभी भूले नहीं। तो बड़े इंपॉर्टेंट देखिए इंप्रिंट डालने के लिए ठाकुर के ये जो सब ट्रिक्स होती थी एक तो थूकते हैं। एक नेम ड्रॉपिंग करते हैं। फिर एक है ठाकुर अपनी आत्म कहानी कहते हैं। अपने अपने जीवन की घटनाएं कहते हैं। उनके जीवन की घटनाएं इतनी इंटरेस्टिंग है। इतनी रस भरी है कि वह आपको याद रह ही जाएगी और जब वह बात आपको याद रह जाएगी तो साथ-साथ में उसके जो एसोसिएटेड टीचिंग है वो भी आपको याद रह जाएंगे। तो ठाकुर ने एक उदाहरण दिया ठाकुर अपने खुद के जीवन की एक कहानी कही सुबोधनांद जी को खोखा महाराज को। बाद में यह खोका महाराज ने यह कहानी हमको कही है। तो खोखा महाराज क्या कहते हैं कि ठाकुर ने मुझे एक दिन कहा कि मैं जब साधना कर रहा था उस दिनों की बात है। साधना ठाकुर कब कर रहे थे तो हमको पता है कि दो फेज में साधना हुई कामार पुकुर जाकर के मां शारदा के साथ में विवाह करने के पहले का फेज और बाद का फेज। तो अभी ठाकुर यह क्लियर नहीं करते हैं कि विवाह के पहले या विवाह के बाद का किंतु जो भी है ठाकुर ने इतना कहा कि मैं जब साधना कर रहा था उस दिनों की बात है। यानी कि हम लोग इस 1854 से लेकर के 1868 के बीच की यह घटना है। क्या कहते हैं ठाकुर कि मैं पंचवटी के नीचे बैठकर के जमीन में से घास निकाल रहा था। अभी देखिए ठाकुर कब किस मूड में होंगे? कब क्या कर रहे हैं? बालक भाव में है ना कि ऋषि भाव में है ना कि परमहंस भाव में है। वो कहना मुश्किल है। तो दिस इज अगेन अ वेरी सुमधुर एक दृश्य कि वहां पर जमीन पर बैठकर के घास निकाल रहे हैं। किस भाव में क्यों ऐसा कर रहे होंगे वो तो कहना मुश्किल है किंतु वो ऐसा कर रहे थे। उस समय एक सुंदर युवती आ करके ठाकुर के पास में खड़ी रह गई। और उसने ठाकुर का ध्यान आकर्षित करने के लिए जैसे कुछ-कुछ सुंदर युवतियों का एक रहता है। ऐसा कुछ करने का प्रयास किया। देखा कि ठाकुर उसके सामने देख भी नहीं रहे हैं। ठाकुर इस तरह से भाव में तन्मय है या तो फिर जमीन में से घास निकालने में इतने तल्लीन है कि इस युवती के सामने वो देख भी नहीं रहे। तो अभी क्या है कि देखिए वि इज ये प्रैक्टिकल हम सबको पता है जिन लोगों ने भी संसार का थोड़ा भी अनुभव है कि यदि आप किसी भी जगह पर जाएंगे गवर्नमेंट ऑफिस है ना कि वेयरवर कोई सुंदर स्त्री वहां पर जाएगी तो उसको सबसे पहले अटेंशन दिया जाएगा। अभी जस्ट रिसेंटली मैंने एक स्टडी पढ़ा एक पेपर स्टडी पब्लिश हुआ है कि कोरोना के समय में यह जो ओरल एग्जामिनेशन होती है ना वाइवा जिसको कहते हैं तो वाइवा के टेस्ट का रिजल्ट कोरोना के दरमियान और बिफोर कोरोना और आफ्टर कोरोना वो कंपेयर किया गया तो एक बड़ा ही इंटरेस्टिंग उनको एक फैक्ट जानने को मिला वेरी इंटरेस्टिंग वाइवा जो होता है फेस टू फेस होता है। किंतु ड्यूरिंग कोरोना बिकॉज़ ऑफ दिस सोशल डिस्टेंसिंग फेस टू फेस नहीं हो के या तो फिर यह ऑनलाइन होता होगा या तो कॉल पे होता होगा और टेलीफोन डिस्कशन के द्वारा होता होगा। फेस टू फेस नहीं हुआ। तो जब फेस टू फेस यह वाइवा नहीं होता था उस समय का और फिर बिफोर कोरोना या आफ्टर कोरोना जो फेस टू फेस वो एग्जाम होता है टेस्ट होता है स्टूडेंट्स का उसमें ये इंटरेस्टिंग फैक्ट कि जो लोग जो लड़कियां जो कि अट्रैक्टिव है उनके मार्क्स जो है वाइवा में वो कोरोना के दरमियान कम हो गए थे और कोरोना के पहले और कोरोना के बाद में वो फिर से बढ़ गए। सो व्हाट इज द रीज़न? कि वो जो प्रोफेसर होते हैं फेस टू फेस कि अट्रैक्टिव जो गर्ल स्टूडेंट होते हैं उनका इंटरव्यू नहीं लेते। बोल कर के उन्होंने जिस तरह से उनका नॉलेज के बेस पे उसको मार्क दिए और जब फेस टू फेस इंटरव्यू होता है तो एक अट्रैक्शन जो होता है स्त्रियों के प्रति तो उसको लेकर के उन्होंने उनको ज्यादा मार्क्स दिए। दिस इज़ एक्चुअल स्टडी। आप थोड़ा सर्च करेंगे तो मिल जाएगा। तो क्या है कि सुंदर स्त्री जहां पर भी जाती है जिसके भी साथ में बात करती है तो एक ह्यूमन नेचर है मेल नेचर है कि उसके प्रति हमारा आकर्षण या तो फिर उसके प्रति अट्रैक्शन होगा ही होगा उसके साथ में बात करने की इच्छा होगी ही होगी किंतु यहां पे यह लड़की जो है ठाकुर के साथ में खड़ी है और ठाकुर उसके ऊपर में थोड़ा सा भी अटेंशन नहीं दे रहा है तो यह लड़की थोड़ी सी आश्चर्यचकित हो गई और फिर उसने ठाकुर को कहा कि अरे देखिए देखिए मैं तो बहुत सारे आश्रमों में गई हूं। बहुत सारे साधुओं को मैं मिली हूं। अभी उसके पीछे उसका क्या आश्रय होगा? वह तो वही जाने। सही-सही जेनुइनली वो धार्मिक जीवन के प्रति आकर्षित हुई है ना कि उसके मन के भीतर में और कोई मिसचीफ है। वह तो अभी भगवान ही जाने। किंतु यह लड़की ठाकुर को कहती है कि मैं बहुत सारे आश्रम में गई हूं। बहुत सारे साधु संतों के साथ में मेरा वार्तालाप हुआ है और जब भी मैं आश्रम में जाती हूं, साधुओं के साथ बात करती हूं, वे सभी लोग मेरे साथ में बात करने के लिए बड़े ही उत्सुक रहते हैं। मुझे बार-बार कहते हैं कि आप यहीं पर रहिए, आश्रम में ही आ जाइए, आश्रम में ही रहिए और जितना समय आप रहना चाहते हैं, रह सकते हैं। तो यह मेरा अभी तक का अनुभव है। यह लड़की ठाकुर को कहती है। तो आप पहले ऐसे साधु मिले जिसको कि मेरे प्रति किसी भी तरह का आकर्षण नहीं। आकर्षण तो छोड़ दीजिए। मेरी ओर नजर उठाके देखने की भी कोई इच्छा नहीं। किस तरह के साधु आप है? किस तरह का त्याग है आपके भीतर में। तो देखिए ये कहानी ठाकुर स्वयं खोखा महाराज को कहते हैं। तो व्हिच इज वेरी इंटरेस्टिंग। देखिए कि अगेन ये कामिनी कांचन त्याग या या तो फिर यह ऑोजिट सेक्स जिसको कहते हैं उसके प्रति यह आकर्षण होता है उसको त्याग करने के लिए ठाकुर कहानी के माध्यम से यह अपने सर पर इंप्रेट करना चाहते हैं। सो, दैट इज़ वन थिंग। किंतु देखिए मैं मैं जब यह पढ़ रहा था, तो मुझे भी लगा कि सी दिस इज़ सच अ क्रूल एग्जांपल फॉर ऑल ऑफ़ अस मॉम्स। साधुओं के लिए खास करके देखेंगे कि सही में किस में हिम्मत है। अपने खुद का एनालिसिस करने की किस तरह का कि ऐसी कोई सुंदरी स्त्री या लड़की आए और उसके साथ में बात करने की इच्छा ना हो। देखिए मैं अपना एनालिसिस कर रहा था। दूसरों की तो मुझे नहीं पता। दूसरों के बारे में बोलना भी उचित नहीं। मैंने अपने बारे में देखा कि खास करके मैंने पिछले एक दो साल में यह महसूस किया है कि जिसको एक चीज कहते हैं ना देखिए हम लोग जब यहां पे आते हैं पहली बार तो भीतर से एक फोर्स रहता है कि आपको ना किसी भी कीमत पे आत्म साक्षात्कार प्राप्त करना है, निर्वाण प्राप्त करना है ना कि कुछ ना कुछ एक लेवल प्राप्त कर लेना है स्पिरिचुअल लाइफ में। भगवान बुद्ध ने 12 साल तपस्या किया उनको निर्वाण प्राप्त हो गया। महावीर ने तपस्या की उनको केवली स्थिति प्राप्त हो गई। ठाकुर ने तपस्या की 12 साल उनको ईश्वर साक्षात्कार, ब्रह्म साक्षात्कार सब कुछ हो गया। ऐसा कुछ करना है अपने जीवन में। करके दिखाना है। वरना तो यहां पे आए क्यों? वरना तो मां-बाप को रुलाया क्यों? वरना तो फिर यह त्याग तपस्या करने का क्या अर्थ है? यदि इस जीवन में कुछ ना कुछ प्राप्त ना हो। तो यह जो फोर्स है ना वो हमको ऑलमोस्ट 45 या 50 तक की हमारी एज होती है ना इस तरह से हमको प्रोपेल करती है कि जैसे कि नजर के सामने और कोई ऑब्जेक्ट दिखता ही नहीं है। हम लोग अपने को मैं मेरी ही बात कर रहा हूं। मैं मैंने अभी तक अपने को इतना बिजी रखा है। सभी चीजों में एंबिशन भी है कुछ प्राप्त करने की और एक धगश भी है कुछ करने की। किंतु विद इन लास्ट वन टू इयर्स मैंने ऑब्ज़र्व किया कि यह जो फ़ था ना ऐसा लग रहा है कि जैसे धीरे-धीरे करके थोड़ा सा कम हो रहा है। अभी माइंड क्या है? ईश्वर साक्षात्कार तो हुआ नहीं। दैट इज वन थिंग। और भीतर में से जो फोर्स थी ईश्वर साक्षात्कार को प्राप्त करने की वो भी थोड़ी सी कम हो गई है। सो अभी माइंड जो है वो एवन्यूस खोजता है। कहां पे उसको लगाया जाए। अभी यह एक एवन्यू यदि एक सामान्य गृहस्थ है तो उसमें मतलब गृहस्थ और साधु में देखिए कि ऐसा कोई बड़ा डिफरेंस नहीं है। यदि आप गृहस्थ हैं तो आपका एक एंबिशन होगा कि मुझे बैंक बैलेंस बना देना है। कैरियर बना देना है। एक लेवल पर पहुंच जाना है। वगैरह-वगैरह वगैरह मेरा बिजनेस यहां तक पहुंच जाना चाहिए। जॉब में मुझे यहां तक प्रमोशन मिल जाना चाहिए। वगैरह किंतु अगेन 45 50 तक आते-आते वो एंबिशन है, फिजिकल स्ट्रेंथ है, मेंटल स्टेमिना है, कम होता जाएगा। अभी गृहस्थ के लिए ना क्या है ना कि एक एवेन्यू है उसके लिए। एंबिशन नहीं है तो फैमिली है। अभी फैमिली को लेकर के वो काफी बिजी रहता है। उसके लड़के हैं, लड़कियां है, वाइफ है, रिलेटिव्स है, फ्रेंड्स है और सोशल फंक्शनंस है, सोशल वो सब डिमांड होती है उसके साथ टाइम पे। मैरिज है तो जाना है। यह यह फंक्शन है तो जाना है। यह कोई यह ऑकेजन आ गया है तो हमको प्रेजेंट रहना है। बोल करके क्या है कि उसका अभी जो फ्री टाइम जो निकलता है वो उसको यूटिलाइज कर सकता है। साधु के जीवन में क्या होता है कि फैमिली तो है नहीं। अभी दूसरा कि साधु समाज है हमारा। वैसे किंतु एक सर्टेन ऐज के बाद में ना फ्रेंड्स जो अपने थे छोटी उम्र में ट्रेनिंग सेंटर में उनके साथ में एक डिस्टेंस बन जाता है। उनका लाइफ एक कंप्लीटली सेपरेट ट्रेजजेक्टरी पे जाता है। हम लोगों मेरा लाइफ एक अलग ट्रेजजेक्टरी पे गया है। तो जब बातें भी करेंगे ना तो ऐसा लगेगा कि जैसे हम जोर जबरदस्ती करके बात कर रहा है। तो ये एक होता है। एक तरह का वैक्यूम खड़ा होता है। तो, इस वैक्यूम को फिल अप करने के लिए हम लोग फिर ऐसा कोई संघ खोजते हैं। किसी डिवोटी के साथ में बात करें, किसी के साथ में बात करें, यह करें, वह करें। समथिंग के वो जो माइंड अभी वह फोर्स कम हो गया है, उसको यूटिलाइज करने के लिए, उसको डालने के लिए कहीं ना कहीं अपने माइंड को लगाएं। उस समय यह खतरा प्रकट होता है कि इस तरह से कोई लड़की या तो कोई स्त्री भक्त आती है तो उसके साथ में बात करना अच्छा लगता है। नॉट बिकॉज़ कि उसके प्रति कोई काम भाव है। बस वही है कि लाइफ का फोर्स अभी कम हो गया है। एंबिशन ईश्वर प्राप्ति की जो इच्छा है वह थोड़ी अभी स्लो हो गई है। तो इसको कहां पे यूटिलाइज करें? तो चलो इनके साथ में गप लगा के करें। चलो उनको प्रसाद दे आए बुलाए बिठाए बात करें गप लगाए उनको थोड़ा सा उपदेश दे उनको हमारे अह व्हाटएवर कोई गिफ्ट में कुछ दे किताब वगैरह दे वि इज वेरी इजी टू फॉल इंटू अभी क्या है गलत कुछ नहीं है भक्तों को अच्छा भी लगता है अब जैसे मैंने कहा यहां पे एक फैमिली आया हुआ था आज सुबह को ही यह लोग गए तो उनके साथ में मैंने एक दिन बात किया गुजरात से आए थे बोल के काफी गप भी लगा है काफी काफी अच्छा भी लगा। किंतु यह बात है कि हमारे भीतर में मैं मेरी ही बात कर रहा हूं। मेरे भीतर में मुझे चाहिए कि यह अवेयरनेस जो है ये काम कांचन त्याग ही सन्यास जीवन का आदर्श है। सन्यास जीवन का फाउंडेशन है। यह कंटिन्यूस ये अवेयरनेस और स्पेशली अभी लेटर एज में यह फर्स्ट हाफ और सेकंड हाफ लाइफ बिफोर 50 और लाइफ आफ्टर 50 यह लाइफ आफ्टर 50 में यह अवेयरनेस और ज्यादा हमको मुझे उसको अलर्ट रहने की जरूरत है। इस अवेयरनेस को और ज्यादा बनाए रखने की जरूरत है। वरना तो फिर यह उदाहरण में ठाकुर कहते हैं कि यह लड़की आश्रम में जाती है तो जितने भी साधु हैं सभी लोग उसको कहते हैं आप यहां पे आइए यहां पर रह जाइए। हम आपको उपदेश देंगे। आप हमारी बातें सुनिए। तो कहीं उस माया जाल में कहीं मैं ना फंस जाऊं। तो यह उदाहरण पढ़कर के मुझे लगा इसके बारे में बात करनी चाहिए और थोड़ा सा सेल्फ एनालिसिस करना चाहिए। बड़े ही अलर्ट होकर के वरना यह जगत जो है माया का है बड़ा ही भयानक। अभी इसके बारे में और भी बातें करेंगे अभी हम आने वाले क्लास में। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु।

प्रश्न: क्या उम्र बढ़ने पर जीवन का उत्साह स्वाभाविक रूप से घटता है?

नहीं एज के साथ में नहीं है अचीवमेंट के साथ में है। देखिए आपको 30 की ऐज पे ही पता चल गया कि अभी लाइफ में ज्यादा प्रोग्रेस नहीं होने वाला है। मैं एक उदाहरण दूं अगेन इट्स अ क्रूल एग्जांपल किंतु फिर भी मैं दे रहा हूं। मैं अपने ही एक स्टाफ को पहचानता हूं। यंग है एज में। अ फिजिकली मेंटली अलर्ट भी है। आप कहेंगे कि माने उसका एक है इंटेलिजेंस सर्टेन इंटेलिजेंस। किंतु क्या है कि उसके भीतर में एक ऐसा भी बैठ गया है कि अभी लाइफ में ज्यादा कुछ होने वाला नहीं। तो उसका इसके बॉडी पर ऐसा असर हुआ है। एक तो मोटा हो गया है। साइज में माने ओबेसिटी हो गई है और मेंटली स्लो हो गया है। तो उसको देखकर के ना आप लिटरली समझ जाएंगे कि उसने जिंदगी से हाथ धो दिया है। यानी अचीवमेंट नहीं होने से ना एक कंटीन्यूअस स्ट्रीम ऑफ अचीवमेंट मनुष्य हार मान लेता है। अब जैसे आप टेक कंपनियों के सीईओ को देखें। अभी कुछ ही दिन पहले मैं जो जसेन हुवांग है यह जो एनवीडिया का सीईओ उसका मैं वो की नोट देख रहा था। तो एडवांस एज हो गई है किंतु सच एंथूजियाज्म अभी क्या है कि उसकी लाइफ में कंटीन्यूअस स्ट्रीम ऑफ अचीवमेंट है। सो ही इज़ एबल टू मेंटेन दिस विम विगर एंड वाइटालिटी। सो इट इज़ रिलेटेड टू अचीवमेंट रेदर देन एज। मुश्किल से 25 के आसपास होगा। मतलब लिटरली उसको देख के आपको लगेगा यह मेंटली फिजिकली स्लो हो गया है। देखिए मैं मैंने ग्रैंडफादर का उदाहरण शायद पहले भी दिया है। वो एक गवर्नमेंट ऑफिस में जॉब करते थे। रिटायर हो गए तो घर में आके कुर्सी पे बैठ गए। वो जितने भी गेस्ट आएंगे ना वो कहेंगे आपके दादा को ना पिछली बार आए थे उसी कुर्सी पे उसी पोस्ट पे बैठे हुए देखा था। आज आए इतने दो-ती महीने के बाद उसी कुर्सी पे उसी पोस्ट पे बैठे हुए देखा है। तो अभी हम उनको कहेंगे कि आप थोड़ा सा सोशल फंक्शन वगैरह कुछ एंगेजमेंट कीजिए। किंतु नहीं वैसे ही तो गवर्नमेंट जॉब की है वो शांति वाली और फिर रिटायर हो के कुर्सी पर बैठ गए लिटरली विद इन टू थ्री इयर्स आफ्टर रिटायरमेंट उनका डेथ हो गया। सो अभी वो चाहते तो अपनी लाइफ को इजीली 20-30 इयर्स एक्सटेंड कर सकते थे। प्रोडक्टिव लाइफ एक सोशली रिस्पांसिबल सिटीजन के रूप में जी सकते थे। बट मेंटली जैसे कि उनको लगा कि बस हो गए रिटायर। तो फिजिकली भी हो गया रिटायर। क्या करें? [हंसी] देखिए यह जो साइकोलॉजिकल स्टडीज आप पढ़ेंगे ना सब लोग एक आवाज में कहते हैं कि फ्रेंडशिप इज वन ऑफ द मोस्ट एसेंशियल साइकोलॉजिकल फाउंडेशन फॉर आवर मेंटल वेल बीइंग। जिसके फ्रेंड्स है वे लोग लंबा जीते हैं और फिजिकली फिट रहते हैं। और जिनका फ्रेंड्स नहीं है वे लोग इतना लोनली फील करते हैं कि लोनलीनेस जैसे कि उनको मार देती है। अब देखिए मैं आपको एक उदाहरण देता हूं। मेरे एक रिलेटिव थे मेरे अंकल थे। तो वैसे थे काफी टैलेंटेड थे और जिसके साथ में चाहे वह बात कर सकेंगे क्योंकि इस तरह के लोगों का सब जगह पर दरवाजा खुल जाता है। इज़ लाइक दैट टाइप ऑफ पर्सन सोशली वेरी एंगेजिंग। आपको अच्छा लगेगा उनके साथ में बात करने के लिए। पर्सनालिटी अच्छा था उनका। बातों का भंडो भी माने इंटरेस्टिंग बातें करने का स्टाइल भी था। किंतु मैं हमेशा देखता था। उनका जो वाइफ या मेरी आंट वह हमेशा कहती थी कि वह जो एक है ना उनके फ्रेंड उसी के घर पर वह बैठे रहता है। वह उसी के घर पे जाएंगे जब भी टाइम फ्री होगा और फिर उसी के साथ में घंटों घंटों भर बातें करेंगे। वो मैं कहूंगी उसको कि मैं आप चलो उसके वहां पे जाइए। वो ज्यादा इंपॉर्टेंट आदमी है। वो ज्यादा इंपॉर्टेंट रिलेटिव है। वो नहीं। वो उसी के फ्रेंड के घर पे बैठे रहता है। क्या पता नहीं बातें करते रहते हैं। मुझे समझ में नहीं आता। किंतु देखिए उस समय मुझे हंसी भी आती थी कि बीइंग सच ए मैग्नेटिक पर्सनालिटी वाला आदमी एक ऐसे फ्रेंड के वहां पे बैठा रहे जिसका कोई पर्सनालिटी नहीं था व्हिच इज सो स्ट्रेंज वो चाहे तो अपने जैसे अपने लेवल के बहुत सारे फ्रेंड बना सकता है किंतु क्या है ना कि एक बार जिसके साथ में मन मेल हो जाता है ना फिर उसके साथ में बात करना गप लगाना इट इज़ अ हीलिंग टच फॉर आवर हार्ट। सो अभी आपके मैग्नेटिक पर्सनालिटी वालों का क्या है ना मरल मर्यूरियल नेचर होता है। आज आपके साथ बात करेंगे। कल दूसरे के माने वो हमेशा एक अपग्रेडेशन सोशल अपग्रेडेशन खोजते रहेंगे। मुझे बेटर से बेटर लोगों के साथ में बात करनी है। वो फिर आपके साथ में टिकेंगे नहीं। कौन सी फ्रेंडशिप टिकेगी कि जहां पे यह पर्सनालिटी, मैग्नेटिक पर्सनालिटी ना कि ऐसा कोई मामला ना हो। अह हार्ट का रिलेशन बैठ गया हो। सो ऐसा अ कॉमन प्लेस जो रिलेशन होते हैं ना वो हमेशा टिक जाते हैं। लंबे समय तक टिक जाते हैं। तो दैट इज उस समय में वो हंसता था उनको देख के कि इस तरह का आदमी ऐसे लोगों के साथ में फ्रेंडशिप करता है। तो टुडे आई फील कि मेरा भी ऐसा एक दो फ्रेंड होने चाहिए जो कि बड़े ही कॉमन प्लेस हो जिसमें कोई पर्सनालिटी ना हो। किंतु एटलीस्ट मैं जाके हृदय की बात कर सकूं उनके साथ। हां यस यस। माइंडसेट मैच होता है तो तो सोने पे सुहाएगा। और अभी तो ये ऑनलाइन ओपोरर्चुनिटीज है। अभी आपको एक जगह पर फिजिकली प्रेजेंट होने की जरूरत नहीं। ये जो ओबेसिटी और लोनलीनेस मुझे लगता है ना कि मॉडर्न एज के दो किलर डिसीज है।

प्रश्न: जब वेदांत हमें आधुनिक युग के अकेलेपन से ही न उबार सके, तो उसका लाभ क्या?

देखिए मैं जब पहली बार रामकृष्ण विवेकानंद लिटरेचर पढ़ना प्रारंभ किया ना बीइंग फ्रॉम ए जैन बैकग्राउंड मेरा एक आदर्श था कि यह भगवान बुद्ध है। भगवान महावीर है कि एकदम शांत होकर के जगत से अलगारी होकर के एक जगह पर ध्यान में बैठे हैं और किसी के साथ में कुछ लेना देना नहीं। एकदम उनका मन स्थिर हो गया है। कोई वासना नहीं है। कोई रिलेशनशिप नहीं है। कुछ नहीं है। परफेक्ट ब्राह्मी स्थिति में स्थित यह एक आइडियल होना चाहिए साधु का। और फिर मैं जब ठाकुर को पढ़ता हूं, स्वामी जी को पढ़ता हूं, वराह नगर मठ की बातें पढ़ता हूं, हंसी, खुशी, हल्ला गुल्ला सब समय कुछ ना कुछ लगा रहता है। वो हाजरा नाराज होकर कहता है कि यह राखाल टाखाल हो करे बेड़ाई माने राखाल टाखाल हो करके घूमते रहते हैं। या कोई ये जप ध्यान नहीं करते हैं। बैठकर के वो ईश्वर चिंतन नहीं करते। गप लगाते हैं। हल्लागुल्ला करते हैं। ये क्या है? इन लोगों के भीतर में सात्व जैसा कुछ है ही नहीं। [हंसी] ठाकुर को भी पढ़ेंगे। इतना उल्लास से, उत्साह से, उदाम वो सबके साथ में गप लगाएंगे। सच जेस्ट इज देयर सच जस्ट फॉर लाइफ। सच म एक लाइवलीनेस है उन लोगों में। वरा नगर के मठ की आप बात देखेंगे हंसी खुशी हल्लागुल्ला एक स्मृति कथा है कि पड़ोसी लोग हैं। वे लोग बोल रहे हैं कि ये लोगों को इतना हंसी खुशी क्यों है भाई? साधु हो के आए हैं। साधु तो उदास रहना चाहिए। उदासीन ना मतलब उदासीन संप्रदाय ही नाम ही है लिटरली इट्स अ उदासीन संप्रदाय इतना हंसीखुशी क्यों कर रहे हैं लग रहा है कि उनको कोई सोना मोहर मिला है खजाना मिला है डटा हुआ वहां पे पुराना घर है ना तो खोदते-खोदते सोना मोहर मिल गई होगी इसलिए ये लोग बड़े आनंदित हो रहे हैं लिटरली वहां के जो पड़ोसी ये सोचते थे सो दिस इज रामकृष्ण ट्रेडिशन तो एक उदासीन होकर के नहीं बैठना है हां ऑफ कोर्स विषयों के प्रति उदासीन होना है किंतु ये जो इंटरपर्सनल रिलेशन है उसमें में उदासीन नहीं होना। वो फेमस घटना कि बलराम बाबू का डेथ हुआ तो उस समय स्वामी जी वहां पे काशी में थे तो वो उनको कहा क्या मित्र क्या नाम उनका वो जो काशी के वो प्रमदादास मित्र तो प्रमदास को कहा कि मैं जा रहा हूं वहां पे मेरे गुरु भाई का मृत्यु हो गया। तो प्रमदादास कहते हैं कि अरे आप किस तरह के साधु हैं? गुरु भाई के प्रति इतनी आसक्ति है। गुरु भाई तो आएंगे जाएंगे तो पार्ट ऑफ माया। तो ठाकुर स्वामी जी क्या उत्तर देंगे? उन्होंने कहा कि ठाकुर ने हमको ऐसे ही स्नेह के बंधन में बांध के गए। मुझे जाना ही पड़ेगा। दैट इज माय ऑब्लिगेशन। सो प्रमदा दास का स्वामी जी पे श्रद्धा है एकदम कम हो गया। यह किस तरह से कि यह साधु है।

प्रश्न: भक्ति योग हमें दीनता और शरणागति सिखाता है, पर इसी कारण हम हज़ार साल गुलाम रहे—ठाकुर दीनता का स्पष्ट विरोध करते हैं। उसी तरह, वेदांत को पलायनवाद समझ लिया गया, जबकि स्वामीजी ने हमें सच्चा वेदांत सिखाया।

यहां पर मैं एक बात कहूंगा कि ऑफ कोर्स ठाकुर और स्वामी जी का यूनिक कंट्रीब्यूशन है। किंतु साथ में यह भी देखना है कि यह लोग किस कॉन्टेक्स्ट में बात कर रहा है। अभी फॉर एग्जांपल शरणागति या दीनता का जो पूरा लिटरेचर है तो वो एक कॉन्टेक्स्ट में बनाया गया है। बाद में हुआ ऐसा कि यह जो गुलाम मानस जो है ना हमारा ऐसा हमारे सर पर बैठ गया कि उसको आउट ऑफ कॉन्टेक्स्ट हम उसको मिस इंटरप्रेट करना शुरू कर दिए। अभी आज ही हमने देखा कि भगवान राम को कहते हैं कि वन में जाने की जरूरत नहीं है। घर में ही रहो। मास्टर महाशय उस कॉन्टेक्स्ट को बिल्कुल घुमा करके काउंटर आर्गुमेंट करते हैं। अभी कहां भगवान राम कहां मास्टर महाशय? राइट? वो भगवान राम को जरूरत नहीं है वन में जाने की नेति करने की। की मास्टर महाशय को तो है नेति करने की जरूरत और ठाकुर भी सामने लगाते हैं कि वो तो रावण वध के लिए है। यानी कि देखिए कि दिस इज कि आउट ऑफ कॉन्टेक्स्ट आप उसको निकाल कर के मिस इंटरप्रेट जो करेंगे तो फिर ठाकुर को एक सा कुछ यूनिक कहना पड़ेगा। अभी स्वामी जी का कर्म योग स्वामी जी का कर्म योग उन्होंने भारत में ही कहा। अमेरिका में नहीं कहा। अमेरिका में वही वो प्योर वेदांत की ही बात कही है जो कि ऋषि मुनियों का था जो कि उपनिषद का था। भारत का करंट कॉन्टेक्स्ट इज कंप्लीटली डिफरेंट। उस समय एक म एक इंडिपेंडेंट सत्य युग में हम लोग जीत जी रहे थे। सुवर्ण युग में जी रहे थे। उस समय मन को रिट्रीट करने की जरूरत थी। आज हम जी ठाकुर कहते हैं कलिते अन्नगतो प्राण। कली में अन्नगत प्राण है तो यह कलयुग में जी रहे हैं। बोल करके अभी हमको एंगेज होने की जरूरत है। सो टेकिंग वन टीचिंग आउट ऑफ कॉन्टेक्स्ट एंड मिसरप्रेजेंटिंग वो एक हो रहा है जिसको स्टॉप करने की जरूरत है। रेदर देन के कहेंगे कि वो टीचिंग गलत था या तो फिर लोअर लेवल का था और इन्होंने एक करेक्शन उस पर बिठाया। ओम