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ओम संस्थाप का यह धर्म स्वरूप राम श्री राम कृष्णा कथा अमृत हमने देखा की किस तरह से ठाकुर अपने उसे दोनों की बात कर रहे हैं जब साधना समाप्त करके उन्होंने सबके साथ में बात करना शुरू किया था और किस तरह से ठाकुर का उसे स्वभाव हो गया और रानी रश्मोनी दोनों को देखा की रानी राजकुमारी ठाकुर का भजन सुन रही है सुनते सुनते उसका मां दूसरी जगह चला गया है ठाकुर ने उसको भी छप्पन मार दिया और जय मुखर वो गंगा किनारे बैठ करके जाप कर रहा है किंतु जपने मां नहीं है तो ठाकुर मार दिया फिर ठाकुर ने मां को रोटी रोटी कहा विनती करते करते कहा मां काली को की मां यह मेरा किस तरह का स्वभाव हो गया है इस तरह का स्वभाव जो है मेरा फिर से मेरे पास मैसेज ले लो क्यों क्योंकि हमने यह देखा की जी तरह से एक उत्तम गुरु होता है एक उत्तम आचार्य होता है तो उत्तम आचार्य की शिक्षा ग्रहण करने के लिए एक उत्तम विद्यार्थी भी चाहिए उत्तम शिष्य भी चाहिए तो यह सब हुई बाद में देखा की ठाकुर और नरेंद्र दोनों मिलकर के कीर्तन ग रहे हैं और आखिर में नरेन ने खुद ने खोल हाथ में ले लिया और नरेन गाने लगा और ठाकुर भी उनके साथ में और नृत्य करने लगे तो यह पूरा जो नृत्य कीर्तन ठाकुर की बातें वो सब दिन भर चला अभी ये दिन समाप्त हुआ है रात होने को आई है श्री मां लिखने हैं मास्टर महाशय लिखने हैं आज ठाकुर के हृदय में प्रेम का उच्च प्रेम का फवारा निकाल पड़ा है तथापि प्रीमन मुक्त हो या एकाकी बरांडे विचारण करेड़ा में विचारण कर रहा है ठाकुर और माझे माझे मार संगे की कोठा कोहित एशिया बीच-बीच में मां के साथ में क्या बात कर रहा है तू मेरा क्या बिगाड़ लगी तो मास्टर महाशय यह बात सुनकर के अपना एक इंटरप्रिटेशन देते हैं कहते हैं मंजर शहर कर माया की कोरी ते पैर एक कोठा की बोलते चल ठाकुर क्या यह कहना चाहते हैं माया शायद ऐसा हुआ होगा की माया ने आकर के ठाकुर को प्रलोभन दिया होगा और ठाकुर ने कहा होगा की तुम क्या बिगड़ लगी तो अभी ऐसा हुआ है ठाकुर के जीवन में और इस तरह से अवतार के भी जीवन में हमने यह चीज देखा है की किस तरह से जब हम लोग साधना करते करते आगे बढ़ते हैं तब एक इस तरह का एक विद्रोह खड़ा होता है एक इस तरह का अंतरराष्ट्रीय खड़ा होता है जो की हमको इस जगत के साथ में इस दुनिया में संसार के साथ में इस माया की जगत के साथ में बंद देना चाहता है हमको पता है की कोई पहले के जमाने में ऐसा पुराण कल में ऐसा होता था की कोई ऋषि मनी तपस्या कर रहे हैं एकाएक देखा की इंद्र का आसन डोलने लगा क्यों क्योंकि यदि ऋषि मनी तपस्या करके तपस्या में सिद्धि प्राप्त कर लेंगे भगवान शिवा या भगवान विष्णु का दर्शन होगा और यदि वरदान में ऐसा मंगल की मुझे इंद्रासन चाहिए तो भगवान इंद्र का इंद्रासन चला जाएगा तो फिर वह क्या करेंगे की जैसे ही कोई ऋषि मनी तपस्या करना शुरू कर देते हैं तपस्या में जैसे ही उनकी सिद्धि तपस्या में उनकी परिपक्वता बढ़नी जाति है वैसे ही इंद्र फिर अप्सराओं को बचता है और ये अप्सराय आएगी और फिर ऋषि मुनियों के सामने नृत्य कीर्तन करके उनका मां को लुभाने का पर्यटन करेगी जैसे ही किसी ऋषि का मां लव गया इन इस तरह के किसी मायाजाल में फस गया वैसे ही उनकी तपस्या भांग हो गई और इंद्र का इंद्रासन बैक गया तो इस तरह की कितनी ही कहानी हम अपने पुराण में पढ़ने हैं भगवान बुद्ध के बड़े में है भगवान बुद्ध जब जी रात को निर्वाण प्राप्त करने वाले थे उसे दिन जैसे बुद्धिस्म में जो इस तरह का जो माया है उसको मारा बोलते हैं मारा मारा अर्थात इस तरह का एक रक्षा जो की हमको इस संसार के शांत में बांधने का पर्यटन करता है और यदि हम जब ध्यान तपस्या करके निर्माण प्रताप करें तो मारा बड़ा नाराज हो जाता है क्यों क्योंकि यह जगत संसार जो है उसकी मुट्ठी में है इस जगत में जितने भी भोगी लोग हैं लोलुप लोग है जो लोग विषय में फैंस हुए लोग हैं इन लोगों के कष्ट से उन लोगों के सफरिन से वो आनंद प्राप्त करता है तो यदि मुझे निर्माण प्राप्त हो गया तो मैं ये कष्ट जनम मृत्यु जरा भी अधिक का ये जो चक्र है उसे समय मुक्त हो जाऊंगा और मैं मारा के हाथ से बैक जाऊंगा तो जी दिन रात को भगवान बुद्ध निर्वाण प्राप्त करने वाले थे तो फर्स्ट रात्रि का प्रथम प्रहार द्वितीय प्रहार तृतीय प्रहार और चतुर्थ प्रहार जी तरह से ये कर प्रहार में रात बाटी हुई है तो मारा सबसे पहले आकर के एक प्रहार में आकर के भगवान बुद्ध को प्रलोभन दिखाने लगा की राज्य पावर प्रेस्टीज फिर वो सोना फिर यह औरतें यह जितने भी प्रलोभन है जो की किसी के मां को वाश करते हैं वह भगवान बुद्ध को दिखाने लगा देखा की भगवान बुद्ध का मां उससे भी चलित नहीं हो रहा है वह ध्यान बैठे हैं तो ध्यान में मैग्ना ही है तो दूसरे प्रहार में आकर के महारा ने उनको भाई दिखाने लगा की किस तरह के विभिन्न वीभत्स रक्षा और भूत पिशाच वगैरा करके यदि वो ध्यान छोड़कर के खड़े नहीं हो जाएंगे तो उनको का जाएंगे किंतु भगवान बुद्ध इससे भी डेयर नहीं प्रलोभन से भी नहीं डेयर भाई से भी नहीं डायरेक्टर और आखिर में जब लास्ट प्रहार आया तो जैसे की जीवन के सामने से जितने भी पूर्व जन्म के उनके मेमोरीज वगैरा थी कर्म थे उनकी नजर के सामने से चलने लगे एक के बाद एक कर्म कट होने लगे और आखिरी कर्म जब समाप्त हो गया तब भगवान बुद्ध को निर्वाण प्राप्त हुआ ठाकुर का भी इसी तरह से एक घटना है ठाकुर पंचवटी में दक्षिणी चोर में पंचवटी के नीचे में बैठे थे और एकाएक देखा की एक गोरा आदमी एक खलासी का स्वरूप धरण करके ठाकुर के सामने प्रकट हुआ है और साथ में दो सुंदर युवतियां हैं और उनके हाथ में थल है बड़ा सा और उसे थल में संदेश है वस्त्र है वगैरा सुंदर चीज सोना मोर है ये सब चीज राखी हुई है और ये जो गोरा खलासी जो है वो ठाकुर को प्रलोभन दिखा रहा है की यदि तुम ये साधना वगैरा छोड़ डॉग ये मां का नाम लेना छोड़ डॉग तो तुम्हारे लिए ये जगत संसार में यह पावर है प्रेस्टीज है विषयों के जितने भी चीज हैं सब तुमको प्राप्त होगी ऐसा करके यह ठाकुर को प्रलोभन दिखा रहा है तो इमीडीएटली ठाकुर मां का नाम पुकारा शुरू कर दिए फिर महा प्रगति हुई मां काली और मां काली ने इन सब का वध कर दिया है तो यह कहानी हमको पता है तो हमारे जीवन में भी शायद हमारे इतना ड्रैमेटिकली इस तरह से हमने प्रलोभन नबी आए की कोई हमारे सामने मारा है ना की ये है गोरखपुर सी हमारे नजर के सामने आकर के हमको प्रलोबान दिखा दे इस तरह से ड्रैमेटिक कोई घटना नाही हो किंतु यह बात सही है मैंने देखा है मेरे खुद के जीवन में भी मैंने अनुभव किया है की जब भी हम ठाकुर का नाम बहुत ही सिंसरराली लेते हैं तब एक इस तरह की एक नेगेटिव शक्ति एक राक्षसी शक्ति आकर के हमको संसार में वापस खींचना चाहती है तो उसे समय हमारा सही सही टेस्ट होता है वैसे मैं हम लोग कुछ नहीं करते चुपचाप शांति से बैठे हैं या दूसरा कोई कम कर रहा है कोई दिक्कत नहीं है किंतु जैसे ही भगवान का नाम लेना शुरू किया जैसे ही अपने हृदय में श्रद्धा भक्ति और एकाग्रता का उदय हुआ जैसे ही ठाकुर के प्रति हमारे मां में एक सही सही एक प्रेम भक्ति उत्पन्न हुई मैं जब ट्रेनिंग सेंटर में था तो हमारे जो सीनरी महाराष्ट्र वो हमारे साथ में हमको बुलेट थे कभी-कभी बात करने के लिए देखने के लिए की हम लोगों का डेवलपमेंट ठीक से चल रहा है की नहीं सब कुछ हमारे साथ में सब कुछ ठीक-ठाक है की नहीं हम लोगों को कोई प्रश्न है तो हम महाराज को कर सकते हैं तो मुझे इस दिल महाराज ने मुझे बुलाया तो बेलूर मठ में आप शायद आपने देखा हो की ना देखा हो वहां पे पुराना जो ट्रेनिंग सेंटर है उसके पास में एक वाटर टैंक है उसे समय की बात कर रहा हूं आज की नहीं उसे समय वहां पर वाटर टैंक के आसपास में सुंदर गार्डन था तो वहां पर गार्डन में टहलते थे महाराज हमको पूछते थे की हां भाई तुम्हारा साधना जो कर रहे हो पढ़ाई लिखी जो कर रहे हो तुम्हारा स्वास्थ्य वगैरा सब ठीक है की नहीं है बाकी तुमको जो ड्यूटी दी गई है वो ड्यूटी में तुमको कोई दिक्कत तो नहीं है रामकृष्ण सॉन्ग में जॉइन करना यह तो एक बहुत बड़ी बात है बहुत बड़ा सौभाग्य है हमको हमारा 100% डेडीकेशन संघ को देना चाहिए और यदि हमारे मां में है दुविधा है संदेह है संशय है तो पहले से ही उसका निराकरण हो जाना चाहिए बाद में ऐसा हो की मैंने तो क्या सोच करके आया था और यहां पे तो दूसरा ही कुछ चल रहा है तो अभी आधे उम्र बीट जान के बाद में हम संसार में भी वापस नहीं जा सकते ठीक से ठीक ठीक से साधु भी नहीं बन पाते हैं तो बटर है की सबसे पहले मां के जितने भी संदेह है उसका निराकरण हो जाए तो महाराज ने मुझे पूछा की क्या तुम्हारे साथ में सब कुछ ठीक चल रहा है सुबह की बात है सुबह को 5:30 बजे हम लोग उसे गार्डन में टहलते थे और महाराज हमको प्रश्न करते थे इस तरह से एक-एक ब्रह्मचारी को बुलेट थे तो उसे दिन मेरे मेरी बड़ी थी महाराज ने पूछा तुम्हारे साथ में सब ठीक चल रहा है तो मैंने उत्तर में महाराज को कहा की हां महाराज मैं अपने को बहुत ही पवित्र बहुत ही संयम में रखना का पर्यटन कर रहा हूं फिर जैसे फिर ठाकुर की तो इतनी इच्छा जो भी इच्छा ठाकुर की जो हो गई जो ठाकुर की इच्छा जो होगी वो होगा किंतु मेरी और से मैं पूरा पर्यटन कर रहा हूं की मेरा जीवन बहुत ही पवित्र और संयमित हो जैसे ही मैंने ऐसा कहा तो महाराज ने कहा की देखो अभी उनका तो इतने सालों का एक्सपीरियंस है प्रतिदिन एक-एक ब्रह्मचारी के साथ बात करते हैं उनको तो अपने ऑर्डर के बड़े में जो लोग किस तरीके साधना करते हैं साधना करते करते क्या होता है सब कुछ उनको तो एक बहुत ही लंबा अनुभव है महाराज की खुद की साधना भी इतनी साड़ी है तो महाराज ने मुझे कहा देखो तुम यदि ऐसा सोचोगे की मैं अपने को बहुत ही पवित्र रखना का पर्यटन कर रहा हूं इसके साथ में क्या होगा पता है जो कोई ब्रह्मचारी कोई साधु बहुत ज्यादा तपस्या करता है तो साथ-साथ में ही उसके मां में एक अहंकार प्रकट होता है की हां मैं तपस्वी हूं और दूसरे लोग तपस्या नहीं करते दूसरे लोग मेरी तरह से संयमित जीवन नहीं जीते दूसरे लोगों में मेरा जितना ओजस शक्ति है वह दूसरे लोगों में नहीं है इस तरह का एक अहंकार प्रकट हो जाएगा और एक अहंकार प्रकट होने के बाद में दूसरों के प्रति तुम्हारा द्वेष बाढ़ जाएगा तो ऐसा ना हो की तुम बहुत ही ध्यान रखना और मैंने देखा मैंने उसे पहले बार ऐसा सुना मुझे आश्चर्य हुआ की ये महाराज क्या का रहा है हम लोग रामकृष्ण सॉन्ग में साधु बने के लिए इसीलिए आए हैं की ठाकुरमार स्वामी जी के पवित्रता के जो उपदेश है उसका पालनपुर करके उनके बीच उनकी दिखाई हुए रास्ते पे चल के हम अपने मां को सही अमित कर सकें इसीलिए तो हम यहां पे आए हैं ना तपस्या करने के लिए ही तो आए हैं त्याग कठोर त्याग का अनुष्ठान करने के लिए ही तो हम साधु हुए हैं वरना क्यों हम घर बार छोड़ते हैं माता-पिता को रुलाते भाई-बहन को रुलाते और फिर यहां पर आते हम लोग यह सब क्यों करते हैं अहंकार ही बढ़ाना था तो फिर घर में ही ठीक थे तपस्या भी नहीं किया सुनकर भी नहीं बड़ा तो वहां पर ऊपर से गृहस्ट आश्रम में ठाकुर के पास और ज्यादा जल्दी चले जा सकते थे तो ऐसा प्रश्न मुझे उसे समय हुआ था मैंने हालांकि महाराज को पूछा नहीं क्योंकि मुझे यह तो पता था की महाराज जो का रहा है मेरे हिट के लिए ही का रहे हैं उन्होंने तो इतना सर अनुभव है उनका खुद की अनुभूति भी है तो इसी में से तो उन्होंने ऐसा कहा होगा तो किंतु मैं यह बात मैंने मन में रखा मेरे मां में रखा की हां ऐसा होने की संभावना है और सही सही मैंने देखा की जब भी मैं ऐसा सोचता हूं की मैं बहुत जब ध्यान कर रहा हूं या मैं बहुत पढ़ाई लिखी कर रहा हूं या तो मेरा जीवन जो है बहुत ही तपस्या से भरपूर है या तो फिर मेरा त्याग जो है बहुत ही कठोर त्याग है जैसे ही यह बात मेरे मां में आई है इम्मीडिएटली दूसरों के प्रति एक पिचकर की भावना आई है एक द्वेष की भावना आई है अरे मैं खाने पीने में संयम कर रहा हूं और देखो उसको यह रसगुल्ला खाए ही जा रहा है साधु हुआ रसगुल्ला खाने को साधु हुआ है ना की संयम करने के लिए साधु हुआ है इमीडीएटली ऐसी बात मेरे मां में ए जाएगी मैं सोचता हूं की मैं अपने धोती और कुर्ता जो है यह कपड़े मेरे में 2 साल चलता हूं और इसको देखो हर 5-6 महीने में नए-नए वस्त्र वो चेंज करता है क्या उसको इतना मैन अच्छे-अच्छे कपड़े पहने की क्या जरूर है ऐसा ही इम्मीडिएटली मेरे मां में भाव ए गया कभी-कभी मैं सोचता हूं की मैंने लीला प्रसंग पढ़ा है मैंने कथामृत पढ़ा है मैंने कंप्लीट वर्क पड़ा है मैं पढ़कर के सब कुछ याद भी रख देता हूं तो जैसे ही मैं ऐसा सोचता हूं तो वैसे ही मतलब दूसरों के बड़े में ऐसा की मैं पढ़ना हूं किंतु वो देखो की पढ़ने के समय संध्या आरती के बाद में नियम है की सब और साधु ब्रह्मचारी अपने रूम में चले जाएंगे पढ़ाई लिखी करेंगे या तो जब ध्यान करेंगे तो यह नहीं करके संध्या आरती के बाद में वो दूसरों के साथ में भक्तों के साथ मैंने क्यों गैप लगता है ये क्या कोई साधु जीवन है तो जैसे मेरे साथ में ऐसा होने लगा जितनी भी बार होता है उतनी भी बाहर मुझे वो महाराज की वह बात याद आई थी की यदि मैं तपस्या करता हूं संयम करता हूं कठोरता करता हूं या तो साधना करता हूं तो साथ-साथ में ही ये अहंकार और ये द्वेष या तो विद्वेष उसके साथ में ए ही जाता है यदि तपस्या नहीं की होती तो ऊपर से मां है की वो अहंकार या ये नहीं बढ़ता वो जो जन्मगत अहंकार है वो तो है किंतु है तपस्वी हुई या मैं सड़क हूं अच्छा या मैं विद्वान हूं इस तरह का अहंकार तो कम से कम नहीं आता तो ये साधना करने के समय ये सब के साथ में होता है की ये जो माया जो है हमको जितनी साधना करेंगे उतना ही हमको जमीन की और इस विषयों की और खींचना का पर्यटन करेगी क्योंकि जैसे ठाकुर कहते हैं ना की घड़ी अर्थात की महाकाली जो है वो लाखो लाखो पतंग उड़ती है पतंग गुजराती शब्द है मुझे यह पता नहीं है अभी उसका हिंदी क्या है तो जो भी है काईट बंगाली में कहते हैं घोड़ी तो महाकाली वो लाखो लाखो पतंग उड़ती है और उसमें से एक दो कैट देती है बाकी सबकी वो जो डोरी जो है रस्सी अपने हाथ में रखती है अर्थात की हम सबकी छोटी मां के हाथ में है विषयों से छटना इस संसार से बचाना या तो फिर ये इंद्रियों के भोग से निकाल आना ये इतना आसन नहीं है क्योंकि जैसे ठाकुर कहते हैं ना की भगवान राम मां सीता और लक्ष्मण तीनों लोग वन में जा रहे हैं अभी लगभग लक्ष्मण को भगवान राम का दर्शन करना है किंतु मार्क सीता बीच में चल रही है तो फिर लक्ष्मण क्या करेगा मां सीता को प्रार्थना करेगा की मां तुम रास्ता छोड़ दो तो मैं भगवान का दर्शन कर पाऊं वैसे ही भगवान के दर्शन के सामने यह माया या तो शक्ति खड़ी है प्रकृति खड़ी है इंद्रियों के भूख खड़े हैं और वो ऐसे ही हमको छोड़ नहीं देंगे हमारे मां में अलंकार का एक बूंद भी रहेगा एक उसका वह एक पार्टिकल भी रहेगा तब तक वह हमको गले से पकड़ करके हमको ये जन्म मृत्यु जरा व्याधि रूप संसार में यह सृष्टि स्थिति प्रलय रूप इस संसार में हमको बार-बार घसीट बार-बार हमको ये जितने भी भोग है हमसे करवाएगी और भक का ये जो नतीजा रोग जो है वो भी हमसे भगत पाएगी तो ये अहंकार को संपूर्ण रूप से नष्ट कर देने के बाद में ही हम माया के राज्य से छठ सकते हैं तो देखिए की यहां पे हमको लगेगा की ठाकुर ने तो सब तरह के अहंकार से मुक्ति पाली है ठाकुर ने तो सभी तरह के विषयों के भोगो से मुक्ति पाली है ठाकुर ने तो निर्विकल्प समाधि स्वयं प्राप्त कर ली है फिर भी फिर इस तरह के प्रश्न ठाकुर के जीवन में क्यों आते हैं तो दो चीज का सकते हैं इसका दो उत्तर हो सकता है सर्वप्रथम तो ठाकुर अवतार है और ठाकुर का पृथ्वी पर आना ठाकुर के साथ में जो कोई भी प्रसंग होता है वह इसलिए होता है की जिससे की हम लोग उसमें से शिक्षा प्राप्त कर सके ये एक चीज है और दूसरी तरह से इसका उत्तर यह हो सकता है की जब तक शरीर धरण है तब तक सत्व राजस्व और तमस तीनों हमारे भीतर में रहेगा ही रहेगा भले ही चाहे तमस और राजस मुश्किल से पॉइंट 01% रहे और 99.99% पर है किंतु फिर भी 100% सत्य होगा तो शरीर धरण नहीं होगा जैसे अपने किताब में लिखा है मैन कहा ना की ठाकुर ने कहा मैं भूल गया अभी मोस्ट प्रोबेबली शायद मैन कहा था की ब्रह्मा ने भगवान सृष्टि की शुरुआत की तो जो कर कुमारन को सनत कुमार यह सब कर कुमारन को सर्वप्रथम उन्होंने रचना की उनको उनकी सृष्टि की अभी यह कर कुमार को पता चला की यह हम लोग यदि शादी करके यह विवाह करके यह जो संतान वगैरा उत्पन्न करेंगे तो यह जो हमारी ब्रह्मा साधना जो है उसमें रुकावट आएगी तो इसीलिए उन्होंने किसी भी तरह के संसार के बंधन में बांधने की बजे तपस्या करना आरंभ कर दिया और तपस्या करके ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर दिए ब्राह्मण ली हो गया तो ये देख करके ब्रह्मा जी सोचते हैं की अरे नहीं ये कर कुमारन से तो सृष्टि की रचना नहीं होगी फिर उन्होंने प्रजापतियों की रचना की फिर प्रजापति ने एक के बाद एक संसार करके परिवार करके सस्ती का आरंभ किया तो इस सृष्टि जो चलती रहे इसके भीतर में यह ब्रह्मा कहो ना की मां कहो की माया कहो इन सब का इसमें एक इंटरेस्ट है की सृष्टि रुकनी नहीं चाहिए किंतु इसी के भीतर में कुछ कुछ लोग ऐसे हो जाते हैं की जिनके मां में एक विवेक प्रकट होता है उनके मां में एक पूर्वजन्म के संस्कार कहो ना की उनके आप पुरुषार्थ और परमार्थ दो चीज कहीं गई है कविता में की हमारे खुद के पुरुषार्थ से इस जन्म की तपस्या नहीं तो पिछले जन्म की तपस्या के परिणाम से हम लोगों को यह विवेक दृष्टि प्राप्त होती है और दूसरा है परमार था अर्थात की ईश्वर की कृपा से हमको ये विवेक दृष्टि प्राप्त होती है तो कैसे भी प्राप्त हो दोनों का कांबिनेशन जनरली होता है तो एक बार यदि विवेक ए गया तो जिन लोगों के भीतर में विवेक प्रकट हुआ है वो चाहे संसारी हो एन की चाहे वो त्यागी सन्यासी हो और जहां पे भी हो धीरे-धीरे करके वो इंद्रियों के सुख भोग का धीरे-धीरे करके त्याग करेंगे और ईश्वर प्रताप के मार्ग पर आगे बढ़ेंगे धीरे-धीरे करके ज्ञान कर्म भक्ति और ध्यान ये कर लोगों के बड़े में ठाकुर स्वामी जी ने बताया है रामकृष्ण मिशन का जो सिंबल है सर्वप्रथम तो वह सर्प है जो की कुंडली का प्रतीक है राजयोग का प्रतीक है फिर वो जो उसके भीतर में वह जो समुद्र के लहरें छल रही है जो की कर्मयोग का प्रतीक है फिर वहां पर एक पदमा है पदमा है भक्तियोग का प्रतीक और फिर है सूर्य तो सूर्य है ज्ञानी योग का प्रतीक और इसके भीतर में एक हंस जो है विचारण कर रहा है तो ये हंस जो है या तो परमहंस जो है हमारी आत्मा का प्रतीक है या तो फिर हमारे जीव आत्मा का प्रतीक है जो की कर लोगों की साधना करके कर्म ज्ञान भक्ति और ध्यान चारों का अनुष्ठान करके माया से मुक्ति प्राप्त करता है और ये एक जनों में तो होना नहीं है इस जन्म में हमने आरंभ किया तो धीरे-धीरे करके यथासंभव यथाशक्ति हम जितना हो सके करते जाएंगे कितने कुछ जनों के बाद में हमको देखेंगे की धीरे-धीरे करके ये तपस्या का जो ओजस है हमारे चेहरे पे दिखने लगता है फिर हमको संसार बांधने को भी आएगा हम बंधेंगे नहीं और फिर कुछ जन्म जाएंगे तो हमको मुक्ति भी मिल जाएगी किंतु साधना हमको आज से ही आरंभ कर देनी है एक चीज और दूसरा की यदि साधना में विघटन भी आए या तो फिर हमको ये ऐसा लगे की मैं जितना साधना करना चाहता हूं इतने इतनी साधना में नहीं कर का रहा हूं मैं इतनी तपस्या नहीं कर का रहा हूं मैं मैंने आज एन नियम किया की चलो मैं प्रतिदिन 2 घंटा जाप करूंगा सुबह को एक घंटा शाम को एक घंटा तो अभी पहले दिन तो बड़े उत्साह से बैठ गया दूसरे दिन ऐसा हुआ की सुबह को आधा घंटा हुआ अभी वो एकदम कमर में दर्द हो रहा है पर में दर्द हो रहा है चाय पीने की इच्छा हो गई मेरे साथ में खास होता है मैं शाम को जब अपने रूम में जाता हूं तो यहां पे जो लड़का है मैं उसको बोल देता हूं की तुम एक कम करना 7:30 को चाय लेकर मेरे रूम पे आना तो यहां पर मैं बैठा भी हूं वैसे अंधेरे में मंदिर में नहीं जाता मैं रूम में ही शाम को बैठता हूं और ठाकुर की कृपा से मेरा रूम मंदिर के बिल्कुल बगल में है तो मंदिर में एक के बाद एक सुंदर भजन कीर्तन वगैरा होते हैं और मैं अपने रूम में लाइट वगैरा बैंड करके खिड़की खुला राहत है वो सब बाहर में एक बहुत ही सुंदर गार्डन है सामने मोंक क्वार्टर है और इस साइड में मंदिर है तो ठाकुर की कृपा से बहुत ही सुंदर रूम है मेरा तो आंख बैंड करके बेटा हूं हमने ऐसा नहीं है की मैंने कोई ध्यान वगैरा कर रहा हूं बस वो एक चिंतन चला राहत है और यहां पे कीर्तन सुनता राहत हूं तो कहां वो इस भाव में वो मगन हो जाना चाहिए ना की वो लड़का वो 7:30 को आता है वो दरवाजा खटखटाता है महाराज चाय तो फिर मैं खड़ा हूं करके चाय लेकर फिर चाय पीने बैठ करके वो चाय पिता हूं तो ये सब हमारी वीकनेस इस रहती है क्या करेंगे की एक घंटा दो घंटा नियमित समय अनुसार हमको बैठना है नहीं भी हो पता है की अरे मैंने तो ऐसा नियम किया है की मैं तो संध्या आरती से लेकर के रात के 10:00 बजे तक 11:00 बजे तक कुछ नहीं करूंगा चुपचाप बैठूंगा यदि मैं जब ध्यान नहीं कर पाऊं तो मैं और कुछ नहीं करूंगा बस मैं बैठ करके ठाकुर का चिंतन करूंगा यह नहीं हो पता है तो भले मैंने यह शुभ संकल्प तो किया इस जन्म में मैंने शुभ संकल्प करके शुरुआत तो की ठाकुर का नाम लेकर के वो शुभ संकल्प ही मेरे लिए बहुत है फिर अभी अगले जन्म में फिर से रामकृष्ण मिशन में साधु को करके आएंगे फिर से ऐसा कोई रूम मिलेगा की मंदिर के बगल में मेरा रूम है फिर मैं वहां पे बैठा हूं उसे पर नेक्स्ट टाइम में वो लड़के को बोल दूंगा की भाई तुम 7:30 को चाय लेकर मत आना मैं जो अंबेडकर के ठाकुर का चिंतन मनन करना चाहता हूं और नेक्स्ट जन्म में ऐसा होगा इस जन्म में मैंने यह संकल्प किया था इत्सेल्फ की मेरे लिए बहुत बड़ी बात है तो ये दो चीज हैं साधना करने की शुरुआत करनी चाहिए वो हमको एक दृढ़ निश्चय कर लेना है एक चीज और दूसरा की साधना करते-करते यदि हमारी वीकनेस जो है यदि बीच में ए जाए तो उससे ज्यादा परेशान नहीं होना है ज्यादा बट फीलिंग नहीं करना है वह ठाकुर की इच्छा से ही हमने साधना करने की शुरुआत की और ठाकुर ने ही हमको चाय पीने की इच्छा हमारे मां में जागृत की जो कर रहे हैं वह ठाकुर कर रहे हैं क्योंकि मैंने शिखा है की मैं यदि ऐसा सोचता हूं की मैं साधना कर रहा हूं मैं जब ध्यान कर रहा हूं मैं अभ्यास कर रहा हूं इम्मीडिएटली वो अहंकार ए जाता है क्या मैं साधना में जब ध्यान कर रहा हूं दूसरे लोग जो है गैप लगा रहे हैं तो इससे बेस्ट सॉल्यूशन है की मैं कुछ नहीं कर रहा ठाकुर मुझे करवा रहा है अजी हो जाता है तो ठाकुर का पुण्य है नहीं हो जाता नहीं होता है तो वो ठाकुर के ऊपर में सब इल्जाम है मुझे कोई दिक्कत नहीं है बीच में मैं शांति से बैठा हूं तो इसीलिए यह जो उसे सुंदर दृश्य है कुछ ही शब्दों में मास्टर महाशय ने जो वर्णन किया है हम सब की आध्यात्मिक जीवन के जो भी अनुभव है वह यहां पर कुछ वाक्य में मास्टर महाशय हमको बताते हैं और ठाकुर ने हमको ऐसा तो नहीं है की ठाकुर के जीवन में माया आई है ठाकुर को बांधने के लिए हमको सीखने के लिए यह सब चला है तो वह दृश्य फिर से ए है की रात के 8:00 बजे है ठाकुर अभी भी प्रोमो मत हो करके बाहर का जो लंबा वरांडा है वहां पे वो टहल रहे हैं द्रुत गति से झड़प से उन्हें ऐसा नहीं है की धीरे-धीरे करके जैसे की किसी के मां में ईश्वर का आवेश हुआ हो की कोई उसके मां में कोई चिंतन चल रहा हो तो उसके आसपास का सराउंडिंग जो है वो उसको किस तरह से वो विस्मृति हो जाता है वैसे ही ठाकुर के मां के ऊपर में मां काली का आवेश हुआ है ठाकुर पता नहीं भाव नेतरास है मैन हमारे मित्र एक दूसरे तरह के होते हैं और वह भवनेत्र या तो साधना करते-करते आध्यात्मिक नेत्र नयन जो एक तीसरा नेत्र जो है ना भगवान शिवा जी का तो एक तीसरा नेत्र ओपन होता है नयन ओपन होता है और उससे हम एक दूसरी ही दुनिया को देखते हैं तो ठाकुर भी इस तरह से पता नहीं कौन जगत में उनका मां कौन से जगत में विचारण कर रहा है उनका शरीर जो है इस वरांडा में वो विचारण कर रहे हैं और विचारण करते-करते टहलते टहलते क्या कहते हैं तो ये हमार की कोर ने भी मैन तू मेरा क्या बिगाड़ लगी तो ठाकुर जब ऐसा कहते हैं अभी ठाकुर ने तो खुद ने तो एक्सप्लेनेशन नहीं दिया ना ही मास्टर महाशय ने ठाकुर को बाद में पूछा है पूछा होता की महाशय आपने ऐसा क्यों कहा तो ठाकुर उसका निश्चय कुछ ना कुछ शायद उत्तर देते हैं किंतु यहां पर मास्टर महाशय ने अपना एक इंटरप्रिटेशन दिया है कहते हैं की क्या ठाकुर के सामने माया प्रकट हुई है क्या माया ठाकुर को प्रलोभन दिखा रही है और क्या ठाकुर माया को का रहे हैं की मां काली स्वयं मेरी सहायक है मां काली स्वयं मेरी शक्ति है तुम मेरा क्या बिगाड़ लगी क्या ठाकुर ऐसा कहते हैं इस तरह से मास्टर मांस है अपना इंटरप्रिटेशन यहां पर देते हैं मास्टर महाशय आगे लिखने हैं नरेंद्र मास्टर प्रयोग रात्रि यह तीन लोग रात को रहेंगे प्रिया कौन था नरेंद्र अपने साथ में अपने एक ब्रह्मा बांधो को लेकर आया था ब्रह्म समाज में नरेंद्र जाता था तो वहां पर उनके साथ में उनका एक मित्र हो गया था प्रिया तो नरेंद्र उनको लेकर आया था नरेंद्र था की बहन ठाकुर सीमा नई नरेंद्र रुकेगा यह बात जब जैसे ही ठाकुर को पता चली नरेंद्र रुकेगा इस बात से ठाकुर के आनंद की सीमा नहीं रही ठाकुर का आनंद जो है वो छल रहा है रात्रिकालीन आहार प्रस्तुतों रात का आहार प्रस्तुत हुआ है और जैसे परिवार में होता है मां अपने बच्चों के लिए खाना बना करके भेजती है रोटी चोला और दाल इत्यादि प्रस्तुतों कोरिया भोगतेरा खाए बहन रोटी और चोला की दाल ये भक्ति लोग खाएंगे ये लड़के लोग खाएंगे ऐसा करके मैन वहां से मोहब्बत में से बना करके ठाकुर का जो कैमरा है वहां पर भेजो है इसके बड़े में भी एक सुंदर कहानी है की नरेंद्र जब पहले पहले बार आया था यहां पर लिखा है ना चोला और दाल रोटी और चोला दाल मैन वो चोला का दाल जो होता है वह उसमें प्रोटीन ज्यादा होता है और गधा भी होता है तो एक पहले बार जब नरेंद्र आया था तो ठाकुर ने मां को कहा की तुम नरेंद्र के लिए खाना बना देना तो मैन खाना बनाकर के भेजो अभी क्या मां को तो हैबिट ठाकुर के लिए खाना बनाने तो ठाकुर के लिए तो क्या है पतली दाल और यह सब चला है ना ठाकुर का डाइजेस्टिव सिस्टम तो बेचारा हमको पता है की बेचारे ठीक से का भी नहीं पाते थे मां जो है सब समय उदुर मुख राहत था तो ठाकुर के लिए सब कुछ पतला पतली दाल वगैरा सब बनाना पड़ता है तो नरेंद्र के लिए भी ये सब पतली दाल और पतला पतला रोटी वो नरेन के लिए भेजो तो अभी नरेंद्र खाया फिर ठाकुर के पास में गया तो ठाकुर ने पूछा कीड़े केमोन खेल मैंने और बताओ की क्या खाया तुमने तो नरेंद्र कहता है खेलन जामुन राज पाथो मैन कोई रोगी जो होता है उसको जो पाठ्य जो देते हैं डायट हर जो देते हैं पतला पतला ऐसा मैंने खाया तो ये बात सुनकर के ठाकुर मां के पास जाते हैं और कहते हैं अरे नरेंद्र के लिए मोटा मोटा रोटी और गधा गधा चोला का दाल बनाना क्योंकि नारायण का डाइजेस्टिव सिस्टम आते थे ना वो मेवा मिठाई लेकर के ठाकुर किसी को नहीं देते यह सिर्फ नरेन अकेला यह सब का लेट इसलिए नरेंद्र यह सब का सकता था तो उसकी उम्र ने उसकी वो क्या है की फिर जगत को भी तो जय करना है वेदांत सीखना है जगत में वेदांत का प्रचार करना है शरीर में यदि शक्ति नहर रहेगी तो कैसे होगा स्वामी जी का शरीर जब बहुत ही छोटी उम्र में खराब हो गया अमेरिका से भारत लौटे थे और इस समय उनको डायबिटीज हो गया था उसे समय उनकी उम्र कितनी होगी 63 में उनका जन्म है 97 में वो भारत लोट है तो 63 से 93 30 साल और पीछे और कुछ चार-पांच साल के लोग 35 के आसपास में उम्र होगी जब भारत में स्वामी जी लौटते थे तो उसे समय ही उनको डायबिटीज हो जाना इसलिए स्वामी जी कहते हैं की अरे यह जो बंगाल का शरीर जो है भारत का का करके अभी ये शरीर ठीक नहीं रहा स्वामी जी कहते हैं यह जो इश्क बंगाल के लोग जो है अभी आज का बांग्लादेश उसे समय का इश्क बंगाल में लोग मछली वगैरा करते हैं ना बहू इसके लिए उनका शरीर जो है डाइजेस्टिव सिस्टम बड़ा अच्छा राहत है स्वामी जी ऐसा कहते हैं अपने एक विषय पर मेरा शरीर बिगड़ गया ये ईस्ट बंगाल की तरह बांग्ला में बोले बंगाल तो उन लोगों की तरह मछली खाता नियमित रूप से तो ऐसा नहीं होता तो जो भी है अभी ये मांसाहार को लेकर के आजकल बड़ा बात करना थोड़ा मुश्किल है बंगाल का ये प्रथम है किंतु गुजरात वगैरा में ये नहीं चला तो हम लोग हमारी किताबें में भी नहीं लिखने जहर में बोलते भी नहीं है तो जो भी है तो यहां पे है इसीलिए अभी मां को पता है की नरेंद्र के लिए किस तरह का आहार प्रस्तुत करना है इसीलिए यहां पे लिखा है रोटी और चोला की दाल नरेंद्र के लिए भक्तों के लिए भेजो और भक्तों ने सब आहार किया और वहां पर आहार प्रस्तुत वहां पर आहार करके वो रात को विश्राम किया भक्ति राम सुरेंद्र भक्ति लोग बीच बीच में रात को रहते हैं तो यह देख करके सुरेंद्र जो है सुरेश मित्रण ठाकुर का रास्ता वो थोड़ा-थोड़ा पैसा देता है जिसमें से सब चीज खरीद करके इन लोगों के लिए आहार की व्यवस्था हो पे तो आज यही तो कल फिर से मिलता है ओम शांति शांति