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Sri Ramakrishna Kathamrita ·

श्रीरामकृष्ण कथामृत || 16 Dec 1883 - श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ दक्षिणेश्वर में || 21 Jan 2026

मङ्गलाचरण

ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते [गाना गाने की आवाज़] नमः कल हम सेल्फ रिफ्लेक्शन के बारे में

Self-Reflection: हमेशा दाता बनें, नहीं की भिक्षुक

कुछ बात कर रहे थे। एक दो चीजें उसी के बारे में सब समय अपने हृदय को ऑब्जर्व करना है। यह साधन पथ में जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते जाएंगे तब की बात कर रहा हूं। प्रारंभिक अवस्था में तो स्वाध्याय है। फिर यह भजन कीर्तन है, तीर्थ दर्शन है। या तो फिर यह मंदिर में आना है, साधु संग है, वही प्रसाद ग्रहण करना है, वही सब रहता है। गुरु ने जो मंत्र जप दिया है वगैरह-वगैरह। किंतु जैसे-जैसे आगे बढ़ते जाएंगे साधना में साथ-साथ में ही अपने हृदय को ऑब्जर्व करना यह एक कार्य हमको प्रारंभ करना है। हृदय के भीतर में कौन बैठा है? सर्वप्रथम तो यह जो सेल्फ रिफ्लेक्शन है यह कभी भी अपने ब्रेन के भीतर में नहीं होना चाहिए। इस अर्थ में कि मेरा अटेंशन जो है यह मेरे माइंड की ओर नहीं होना चाहिए। जैसे यह अनाहत चक्र है, विशुद्ध चक्र है और आज्ञा चक्र है। तो यह आज्ञा चक्र की ओर मेरा सेल्फ रिफ्लेक्शन कभी नहीं होना चाहिए। बड़ा ही डेंजरस। हमेशा सेल्फ रिफ्लेक्शन करना है अनाहत चक्र में हृदय में। तो हृदय को ऑब्जर्व करना है। कौन बैठा है हृदय के भीतर में? एक भिक्षुक बैठा है ना कि एक दाता बैठा है। भिक्षुक जो है वह हमेशा यह सोचता रहता है। मुझे यह प्राप्त्य है। मुझे वह प्राप्त्य है। और यह मुझे नहीं मिला तो मैं निराश हो गया। सम्मान है, अधिकार है, प्रिविलेज है, रिकग्निशन है, प्रज़ है। यह जैसे-जैसे मिलता है यह भिक्षुक जो है उसकी यह जो कामना है कभी खत्म नहीं होती। यह ब्लैक होल की तरह है। उसमें आप डालते ही जाइए, डालते ही जाइए। कभी वह संतुष्ट नहीं होने वाला। और दूसरा है दाता। दाता यह नहीं सोचता कभी कि यह मुझे प्राप्त्य है। यह मुझे क्यों नहीं मिला? कोई रिग्रेट या तो फिर कोई शोक कुछ नहीं होता दाता के भीतर में। दाता हमेशा यह सोचता है कि मैं क्या दे सकता हूं। हाउ मच कैन आई गिव? स्वामी जी कहते हैं ना वो ईस्टर्न एंड वेस्टर्न सिविलाइजेशन के बारे में कि वेस्टर्न सिविलाइजेशन हमेशा यह खोजने का प्रयास करती है व्हाट इज द मैक्सिमम अमाउंट ऑफ मटेरियल अपॉन व्हिच दे कैन लिव एंड इंडियन सिविलाइजेशन है यह खोजने का प्रयास करती है कि मिनिमम अमाउंट ऑफ मटेरियल क्या है जिसके ऊपर में हम सर्वाइव कर पाए तो एक्चुअली मुझे लगता लगता है कि यह सिविलाइजेशन के बारे में भारत ने ऐसा सोचसच करके ही देखिए आखिर में अपनी यह अवनति हुई है। किंतु सिविलाइजेशन के बारे में नहीं सोच के ऐसा इंडिविजुअल के बारे में तो सोच ही सकते हैं। और खास करके मटेरियल पोजेशन के बारे में तो नहीं। अभी ठंड है तो मुझे स्वेटर या जैकेट चाहिए ही चाहिए। वह सब मटेरियल चीजें तो है ही है। बात वह नहीं बात हम आध्यात्मिक प्योर स्पिरिचुअलिटी की कर रहे हैं। मेरी कॉन्शियसनेस या मेरी पर्सनालिटी या मेरा सेंस ऑफ सेल्फ उसके बारे में बात कर रहे हैं। तो मेरा जो सेंस ऑफ सेल्फ है वह अन्नपूर्णा है ना कि विरोचन है। वह देता है ना कि लेता है। मैं हमेशा क्या सोचता रहता हूं? यह मुझे प्राप्त्य है ना कि यह मुझे देना है। यह मैं दे सकता हूं। आप जितना देंगे उतना ही देखेंगे भंडार बढ़ता ही जाएगा। बढ़ता ही जाएगा। आश्चर्यजनक रीति से हमारे पास में यह देने के लिए सहानुभूति है, प्रेम है, प्रेरणा है, एंपैथी है, विज़डम है। यह सब ऑटोमेटिक प्रकट होता रहेगा। देखिए यह मेरा मैं जो यह क्लास कंडक्ट करता हूं मैंने यह अनुभव किया है। वैसे मैं बैठकर के जो सोचता हूं कोई एक टॉपिक के बारे में कि हां यह एक इशू है वेदांत का या तो यह रामकृष्ण विवेकानंद लिटरेचर में यह एक पॉइंट है जिसके बारे में मुझे सोचना है। तो मैं अकेले बैठकर के अपने माइंड में जो सोचता हूं जितना सोचता हूं उसके बारे में जितना मुझे अंडरस्टैंडिंग डेवलप होता है उससे कहीं ज्यादा अंडरस्टैंडिंग या उसके बारे में नॉलेज मुझे ज्यादा मिलता है जब उसी इशू को मैं डिस्कस करता हूं। यानी कि कहते हैं ना कि टीचिंग इज द बेस्ट वे ऑफ लर्निंग। सो यहां पे भी प्राप्त करने का श्रेष्ठ माध्यम है देना। जितना हम देंगे उतना हमारा ग्रोथ होगा। जितना हम लेना चाहेंगे उतने ही हम छोटे होते जाएंगे। उतना ही हमारा वर्ल्ड व्यू है। सेल्फिश से सेल्फिश तर होता जाएगा। तो यह एक मुझे बात करनी थी। और एक पॉइंट मेरे माइंड में आया था। देखिए कि कभी कोई हमारे साथ में दुर्व्यवहार करता है तो हम लोग सोचते हैं कि मैं सामने अब जैसे कि गीता तो सभी ने पढ़ा है अच्छे कर्म का अच्छा फल बुरे कर्म का बुरा फल तो जो आदमी दुर्व्यवहार करता है कुकर्म करता है तो उसको यह कुकर्म का फल क्यों नहीं मिलता उसको यह बुरा फल क्यों नहीं मिलता हमको तो लगता है कि कुकर्म वाले बड़े ही बढ़िया मजे से जी रहे हैं। हम ही लोग हैं कि यह संसार रूपी यह वासना रूपी ना कि यह टेंशन रूपी में पिस रहे हैं। कुकर्म करने वाले हमारे से बुरा बर्ताव करने वाले इतना बढ़िया मजे से क्यों रहते हैं और मुझे ही क्यों सफर करना पड़ता है। तो ये मैं सोच रहा था एकाएक मेरे माइंड में आया कि देखिए जिस क्षण हम उसको क्षमा कर देते हैं ना उसके कुकर्म उसी के पास रहेंगे। किंतु मैं जैसे ही उसके ऊपर में बदला लेने को सोचूंगा। जैसे ही मैं उसके ऊपर में रिवेंज लेने को सोचूंगा। यह रिवेंज जो है ना यह बदला लेने अभी बदला लिया या नहीं लिया किंतु मेरे मन में यह विचार भी यदि आना शुरू हो गया कि मैं ऐसा ऐसा करके रिवेंज लूंगा। यह रिवेंज का जो कांसेप्ट है ना उससे प्रॉब्लम क्या होगा? जैसे ही मैंने उसके ऊपर में रिवेंज लेना चाहा उसके सभी कुकर्म मेरे में आ गए। मेरे जितने भी सत्कर्म थे उसके भीतर में चले गए। यह तो मने यह आईडिया जब मुझे आया विचार जब मुझे आया मुझे लगा एक तो चोरी ऊपर से सीना चोरी अर्थात कि उसने हमारे साथ में कुकर्म भी किया और दूसरा कि उस कुकर्म का जो बुरा फल है वह भी मुझे भुगतना है। यह कैसा डेंजरस है। किंतु देखिए नॉर्मल अह जगत में अह आम व्यवहार में आप देखेंगे तो वह अलग सिद्धांत लगते हैं और यह जैसे-जैसे साधना में हम आगे बढ़ते जाएंगे वैसे-वैसे ही हमारे पर लगने वाले नियम कानून भी जो है वह बदलते जाएंगे। क्योंकि मैं तो जप ध्यान कर रहा हूं तो मन की शुद्धि होती है। ठाकुर और मां का ही देखिए कि जो लोग उनको प्रणाम करते थे, चरण स्पर्श करते थे तो फट करके उनके पाप उनके भीतर में यह भक्त के पाप यह ठाकुर और मां में प्रवेश कर जाते थे। क्यों? क्योंकि उनके भीतर में पाप का लेश मात्र भी नहीं है। यह आपने देखा है? दो कंटेनर आप रखिए। एक कंटेनर में वैक्यूम है और दूसरा कंट अब वैक्यूम क्लीनर का ही कांसेप्ट देखिए। वैक्यूम क्लीनर क्या करता है? वैक्यूम क्लीनर के भीतर में वैक्यूम क्रिएट होता है। अर्थात कि अब जहां पे एयर होती है, हवा होती है, उसके संपर्क में यह वैक्यूम कंटेनर जैसे आया, वैसे ही यह वैक्यूम कंटेनर जो है, हवा को खींचना शुरू कर देता है। इसको वैक्यूम क्लीनर का कांसेप्ट कहते हैं। तो वैसे ही जो जब ध्यान करता है उसका माइंड यह वैक्यूम क्लीनर जैसा हो जाता है। पाप का वैक्यूम क्रिएट होता है और आसपास में जो लोग उसके संपर्क में आते हैं उन सबका पाप वो फटाफट करके ग्रहण करना शुरू कर देता है। अभी जैसे देखिए जैसे एक कंटेनर है जिसमें ऑलरेडी हवा भरी है। उसका आप दरवाजा खोलेंगे उसको तो वह बाहर से हवा खींचेगा नहीं। वह ऑलरेडी हवा से भरा हुआ है। तो वैसे ही जो आदमी ऑलरेडी पाप करके बैठा है, साधना नहीं कर रहा है, उसके भीतर में ऑलरेडी इतना पाप है, ऑलरेडी इतने कुकर्म के फल है कि उसके आसपास में हजार लोग हजार पाप भी करेंगे। उसके भीतर में ज्यादा कुछ प्रवेश नहीं करेगा। किंतु आध्यात्मिक जगत में जैसे ही आप साधन, भजन, जप, ध्यान, उपासना, महावाक्य विचार या तो भाव साधना जो भी आपका है मार्ग वह आप में अपनाएंगे, आगे बढ़ेंगे। साथ-साथ में ही पाप का वैक्यूम, कुकर्म का वैक्यूम क्रिएट होगा। अपने भीतर में आसपास के जितने भी लोग हैं उनके कुकर्म हम खींचना शुरू कर देंगे। तो यह एक बड़ा डेंजर है आध्यात्मिक जगत में कि बात सिर्फ यह नहीं है कि हमको अपने कुकर्म भी काटने हैं। आसपास में जो लोग हमारे संपर्क में आते हैं ऑटोमेटिक हम उनके कुकर्म खा जाते हैं। तो वह भी हमको यह ख्याल में रखना है। इसीलिए देखिए यह रिवेंज का जो कांसेप्ट है जिस क्षण मैंने सोचा कि मुझे इसके ऊपर में बदला लेना है। जिस क्षण मैंने यह सोचा कि इससे मुझे रिवेंज लेना है साथ-साथ में ही उसका पाप जो है वह मेरे भीतर में आ जाएगा। मेरा पुण्य उसके भीतर में चला जाएगा। तो फिर क्या होगा कि उस आदमी ने पाप भी किया। हमारे साथ में बुरा व्यवहार भी किया और ऊपर से उसी बुरे व्यवहार का बुरा फल हम ही को भुगतना पड़ेगा। उसको नहीं। इसलिए यह जो हृदय को दाता बनाना है। हमको दाता बनना है। हमको अन्नपूर्णा होना है। नहीं यह विरोचन रूपी राक्षसों का समूह जो कि यह मटेरियल चीजों के पीछे में दौड़ता रहता है। यह प्रशंसा के पीछे, रिकॉग्निशन के पीछे, प्रज़ के पीछे दौड़ता रहता है। ऐसा नहीं अन्नपूर्णा की तरह होना है। यदि हृदय इस तरह से विस्तृत होता है तो हमारे साथ में जितना ही बुरा व्यवहार भी होगा हमको ना यह जैसे कि स्पर्श नहीं करेगा। अपना हृदय जैसे कि एक इस तरह के एक पावरफुल किले के भीतर में रहेगा कि बाहर से जितने भी शत्रुओं का आक्रमण हो जाए यह किले की दीवार जो है वो कोई भेद नहीं कर पाएंगे। सो यह एक मैं सोच रहा था शेयर करूं। अच्छा

ईश्वर प्राप्ति का उपाय: ज्ञान, भक्ति और योग का समन्वय

अभी हम श्री श्री रामकृष्ण कथामृत की ओर चलते हैं। ऑलरेडी हमने देखा कि मास्टर महाशय आए हैं रिट्रीट के लिए। एक मुख आए हैं। ठाकुर के साथ में वार्तालाप कर रहे हैं। ठाकुर ने कहा कि आत्मा है जैसे कि परमात्मा है जैसे कि एक मैग्नेट और यह आत्मन है जैसे कि मैग्नेट और यह आत्मन का रिफ्लेक्शन हमारे भीतर में जो होता है जीवात्मन वह है जैसे कि एक सुई। सुई ऑटोमेटिक मैग्नेट की ओर अट्रैक्ट होती है और फिर नहीं कब होती जब इस सुई के ऊपर में कादव कीचड़ लग गया है मेला लग गया है तब तो हमारा कार्य है सिर्फ इसको धोना नहीं कि सुई को उठाकर के मैग्नेट की ओर ले जाना वो बहुत ज्यादा श्रम करना पड़ेगा किंतु शिव सुई को सिर्फ धोना ही है तो वो ऑटोमेटिक इतना अब जैसे सूर्य है यहां से कितना म लाखों लाखों किलोमीटर दूर है यहां से पृथ्वी से पृथ्वी पे सूर्य का रिफ्लेक्शन है तो सूर्य के रिफ्लेक्शन के ऊपर में यदि कीचड़ पड़ा है उसको साफ करना आसान है रेदर देन कि इस रिफ्लेक्शन को उठा करके इस घड़े को उठा के सूरज पे ले जाना वो उसके लिए स्पेसशिपिप चाहिए लाखों करोड़ों का खर्चा होगा यह देखिए कि यह जैसे टेस्ला है वगैरह लोग स्पेसशिप बना रहे हैं। अपना इसरो है तो कितना खर्चा होता है। किंतु यदि ऐसा कहे कि यह घड़ा है। घड़े के भीतर में पानी है। पानी पे सूरज का रिफ्लेक्शन है। और बस पानी के ऊपर में थोड़ा सा कचरा पड़ गया है। इस कचरे को साफ कर दो। तो क्या होगा? यह रिफ्लेक्शन जो है वो रिफ्लेक्शन और सूरज का रिफ्लेक्शन ईजीली एकाकार हो जाएगा। या तो ज्यादा से ज्यादा घड़े को भांग देना है। इतना ही तो करना है। रिफ्लेक्शन पड़ा है। घड़े के भीतर में पानी है। उसमें घड़े को ही तोड़ दिया तो पानी बिखर गया। रिफ्लेक्शन ऑटोमेटिक वो सूरज के भीतर में विलीन हो गया। इंस्टेंटली ऐसा एक भी स्पेसशिपिप नहीं जो इतना फास्ट पृथ्वी से सूरज की ओर जा पाए। आपको यदि पता होगा इस यूनिवर्स में मैक्सिमम स्पीड है स्पीड ऑफ लाइट। 3 लाख कि.मी. पर सेकंड। इससे ज्यादा कोई भी स्पेसशिपिप उड़ नहीं सकता। अभी वो साइंस फिक्शन की बात छोड़ दें वो वार ड्राइवर और वार्म होल वगैरह किंतु एक नॉर्मल साइंस की दृष्टि से देखें तो 3 लाख कि.मी. की स्पीड से एक स्पेसशिपिप मैक्सिमम जा सकता है। तो उसको भी पृथ्वी से सूरज की ओर जाने में 8 मिनट लगेगा। उससे ज्यादा स्पीड से कुछ नहीं जा सकता। किंतु 8 मिनट म बेस्ट ऑफ द बेस्ट टेक्नोलॉजी यदि अपने पास में है तो मिनिमम 8 मिनट लगेगा। किंतु ये घड़ा तोड़ दिया और घड़े के भीतर का रिफ्लेक्शन है। उसको सूरज में विलीन हो जाने में कितना टाइम लगेगा? इंस्टंट जिस क्षण घड़ा टूटा है उसी क्षण यह घड़े के भीतर में घड़े के भीतर में रखे हुए पानी के भीतर में सूरज का पड़ रहा प्रतिबिंब उसी क्षण अदृश्य हो जाएगा और असली सूर्य अपनी यह जो ग्लोरी है उसकी भव्यता है उसमें वह प्रकाशित होता रहेगा। तो यहां पर भी ठाकुर कहते हैं कि यह आत्मा या परमात्मा है जैसे कि मैग्नेट और हमारे भीतर में उसका जो रिफ्लेक्शन है जीवात्मा वो है जैसे कि एक सुई। एक सुई को उठा के मैग्नेट की ओर ले जाना वो बड़ा आपको शर्म करना पड़ेगा। किंतु सुई के ऊपर में जो कादव कीचड़ लगा है वह हटा देंगे तो ऑटोमेटिक सुई और मैग्नेट दोनों का प्रॉपर्टी है एक दूसरे की ओर आकर्षित होने का तो ये दोनों एक दूसरे में विलीन हो जाएंगे। तो जब ठाकुर ने ऐसा कहा तो मुखय ने प्रश्न किया कि किस तरह से यह सुई के ऊपर में रहा कीचड़ साफ किया जाए तो ठाकुर जो उत्तर देते हैं इट इज क्लासिक श्री रामकृष्ण कि द्वैत अद्वैत ज्ञान और भक्ति दोनों का जो संगम है यह इस उत्तर में स्पष्ट रूप से हमको दिखता है। यह एक उत्तर के भीतर में जैसे कि अपना यह ज्ञान कर्म भक्ति ध्यान यह जो अपना लोगो जो है वह पूरा इसमें आ जाता है। ठाकुर क्या कहते हैं? ईश्वर के लिए व्याकुल होकर के रोने से यह अश्रु वाली जो झरती है वह सुई के ऊपर में गिरेगी तो सुई के ऊपर का कीचड़ धुल जाएगा। सुई इमीडिएटली चुंबक पत्थर के साथ में मैग्नेट के साथ में जान मिलेगी। वो एक है। दूसरा है कि ठाकुर कहते हैं कि ध्यान सहस्त्रार में शिव है। शिव के ऊपर ध्यान करना है। किंतु देखिए कि इस तरह से शिव के ऊपर में सहस्त्रार में ध्यान नहीं करके मैं हमेशा कहता हूं हृदय पे अनाहत चक्र पे ही ध्यान कीजिए। इसके बाद में अनाहत से विशुद्ध विशुद्ध से आज्ञा आज्ञा से सहस्त्रार वो तो ऑटोमेटिक जाया जाएगा। उसके लिए हमको टेंशन नहीं लेना है। हमको हमेशा हृदय पे ही ध्यान करना है। तो वह एक बात साथ में ठाकुर कहते हैं और फिर ठाकुर आगे कहते हैं

आध्यात्मिक जीवन में साधु-संग का महत्व

किंतु संसारी लोकेर सर्वदाई साधु संगो दरकार संसारी लोगों को हमेशा साधु संग की आवश्यकता है। देखिए कितना बड़ा स्टेटमेंट क्योंकि साधु जो है नित्य नियमित रूप से वह जप ध्यान करता है, साधन भजन करता है, उपासना करता है। देखिए हमको जब रोग होता है, बीमारी होती है तो हम लोग कई मेडिकल की किताबें खोल के उसके बारे में जानने को नहीं चाहते। क्यों? क्योंकि इसके लिए डॉक्टर है। एक डॉक्टर ने अपना पूरा जीवन दिया है। यह शरीर की संरचना का अभ्यास करने के लिए यह अपना डाइजेस्टिव सिस्टम है। यह कार्डियो कार्डियोवस्कुलर सिस्टम है। कार्डियक वैस्कुलर सिस्टम है। फिर यह नर्वस सिस्टम है। फिर यह मसल्स है। अपना स्केलेटन है। यह ब्रेन है। यह अपना यह ब्लड सर्कुलेशन है। यह सब स्टडी करने के लिए एक डॉक्टर ने अपना जीवन दिया है। और फिर उसने सिर्फ किताबें ही नहीं पढ़ी। उसने ट्रीटमेंट करके करके एक्सपीरियंस गैदर किया है। आज एक फ्रेश मेडिकल स्टूडेंट कॉलेज में से बाहर आएगा। उसके सामने एक आदमी बुखार का प्रॉब्लम ले आता है तो वह एक तरह की दवाई प्रिस्राइब करेगा। किंतु फिर उसका बुखार कम ही नहीं हो रहा। तो फिर वह धीरे-धीरे करके एक के बाद एक वो जो टेस्ट होता है ना यह ब्लड टेस्ट, यूरिन टेस्ट, यह टेस्ट वो टेस्ट करवाएगा। आखिर में जो पकड़ में आया उसके ऊपर में दवाई देगा। उससे भी यदि उसका बुखार नहीं कम हो रहा है तो फिर वह 10 लोगों को पूछेगा। उसके कलीग जो है थोड़ा सा मेडिकल जर्नल रेफर करेगा और डिटेल इन्वेस्टिगेशन करेगा। अभी यह फर्स्ट केस के साथ में ऐसा हुआ। सेकंड केस जब उसके सामने बुखार का आता है तब ऑलरेडी उसने यह सब कुछ उसके माइंड में हो चुका है कि क्या-क्या प्रॉब्लम हो सकते हैं किसी के साथ में। पहले से ही वह सब ट्रीटमेंट वह पूरा इस तरह से देना शुरू करेगा। तो डॉक्टर के पास में सिर्फ नॉलेज ही नहीं है। उसके पास में विडम भी है या तो फिर एक्सपीरियंस भी है। तो वैसे ही एक साधु है। साधना में आप आगे बढ़ने के लिए अष्टावक्र संहिता पढ़े, गीता पढ़े, रामकृष्ण कथामृत पढ़े। अच्छा है। पढ़ना ही चाहिए। आजकल बहुत सारे लोग अपने हेल्थ के बारे में अवेयर होते हैं। न्यूज़पेपर में हेल्थ के बारे में आर्टिकल आए दिन आते रहते हैं। मैं न्यूयॉर्क टाइम्स पढ़ता हूं बीच-बीच में। तो न्यूयॉर्क टाइम्स है दुनिया का सबसे ज्यादा प्रेस्टीजियस न्यूज़ पेपर अमेरिका से पब्लिश होता है और एक एंटी गवर्नमेंट उसका एक है तो लोग बहुत ज्यादा उस पर ट्रस्ट करते हैं क्योंकि आप देखेंगे 99% ऑफ न्यूज़ पेपर या तो न्यूज़ ऑर्गेनाइजेशन है वो गवर्नमेंट के पैसों के ऊपर में चलते हैं। यानी कि वे लोग कभी गवर्नमेंट को क्रिटिसाइज नहीं करेंगे। बोल के उन लोगों की ये जो रिपोर्ट है वो हमेशा ऐसा लगेगा कि ये गवर्नमेंट प्रोपेगेंडा चल रहा है। किंतु एक न्यूयॉर्क टाइम्स है जो कि एटलीस्ट मैंने तो देखा है कि उसकी अमेरिका जिस तरह से न्यूयॉर्क टाइम्स में इंडिया की निंदा होती रहती है। तो अमेरिकन गवर्नमेंट की भी उतनी ही वे लोग क्रिटिसाइज करते हैं। सो इक्वल अपॉर्चुनिटी क्रिटिसाइज सबको करता है। वो काफी प्रेस्टीजियस न्यूज़ पेपर है। तो अभी कुछ दिनों पहले मैं उसको पढ़ रहा था देखा कि अदरक के बारे में आर्टिकल आया है कि अदरक का हेल्थ के ऊपर में क्या बेनिफिट है? तो मैंने सोचा कि यह एकाएक जिंजर बेनिफिट ऑफ जिंजर फॉर हेल्थ यह कहां से न्यूयॉर्क टाइम में कहां से आ गया? हालांकि वे लोग हेल्थ के ऊपर आर्टिकल पब्लिश करते रहते हैं। किंतु जिंजर इज ट्रेडिशनली आयुर्वेदिक मेडिसिन है। तो जैसे मैंने आर्टिकल पढ़ना शुरू किया रियली उसमें आयुर्वेद के बारे में ही काफी कुछ मेंशन था। सो व्हिच इज सरप्राइजिंग। किंतु देखिए कोई भी एक आम नागरिक होगा तो वो न्यूज़ पेपर पढ़ता है। यह मैगजीन पढ़ता है, टीवी देखता है। हेल्थ के बारे में यह जो कुछ-कुछ अदरक है जैसे हल्दी है वगैरह-वगैरह जो बेनिफिशियल उसके क्या है बेनिफिट वो जानता है। किंतु यह कोई डॉक्टर का वो सब्स्टट्यूट नहीं है। तो वैसे ही स्पिरिचुअल लाइफ में आप स्टडी करते हैं। करना ही चाहिए। कोई प्रश्न ही नहीं है। किंतु जो एक सही-सही साधक है, एक सही-सही जो उपासक है, जो सही-सही उपासना करता है, उसके पास में जो नॉलेज है, विज़डम है, एक्सपीरियंस है, इट विल बी फार ग्रेटर। क्योंकि उसने अपना जीवन इसको समर्पित किया है। इसीलिए ठाकुर इतना इंपॉर्टेंट स्टेटमेंट देते हैं। संसारी लोगों को सर्वदा साधु संग की आवश्यकता है। शक्ल रेकार माने देखिए ठाकुर जैसे पंच लाइन ठाकुर का सिर्फ यह नहीं है कि सर्व संसारी लोगों को साधु संग जरूरत है। सबको जरूरत है। शकोलेरी दरकार सन्यासीरो द्वकार सन्यासियों को भी जरूरत है। अभी प्रश्न होगा साधु को साधु संग की आवश्यकता यह कैसा कंट्राडिक्शन है किंतु देखिए ठाकुर जो शब्द यूज करते हैं ना यहां पे वि इज वेरी इंपॉर्टेंट सन्यासी का अर्थ है जो कि विधिवत विरजा होम करके जिसने यह गेरुआ वस्त्र पहना है जो कि एक ट्रेडिशनल सन्यासी कहा जाता है। जबकि साधु शब्द जो है ना वह ऐसा सिर्फ यह जो विजा होम करके गेरुआ परिहित लोगों के लिए ही नहीं जो इन जनरल जिनका चरित्र अच्छा है इन जनरल जो उपासना करते हैं सबके लिए साधु शब्द व्यवहार कर सकते हैं। सन्यासी शब्द आप उन्हीं के लिए व्यवहार करेंगे जो कि प्रॉपर फॉर्मल सन्यास वाउज में सन्यास सेरेमोनी में पसार होकर के जो फॉर्मली सन्यासी हुआ है। किंतु साधु शब्द इस तरह से एक्सक्लूसिव शब्द नहीं है। साधुवाद एक शब्द है। साधुवाद देना अर्थात कि कोई अच्छा कार्य कर रहा है तो उसकी प्रशंसा करना। पे प्रशंसा करने के लिए साधुवाद देना ऐसा एक शब्द है। तो साधु शब्द किसी के लिए भी व्यवहार हो सकता है। वह चाहे संसारी भी हो ना चाहे सन्यासी भी हो। प्रश्न है कि वो सतचरित्र होना चाहिए जो कि उपासना करते होना चाहिए। तो देखिए ठाकुर इंटरेस्टिंगली साधु और सन्यासी में डिफरेंस खड़ा करते हैं। सन्यासी कौन है? जिसने कि विधिवत सन्यास ग्रहण किया है। साधु कौन है? सत चरित्र है और उपासना करता है। इसका अर्थ देखिए कि साधु कोई भी हो सकता है। सन्यासी भी साधु हो सकता है। गृहस्थ भी साधु हो सकता है। और इस तरह के उपासक इस तरह के सतचरित्र साधक का संग सिर्फ संसारी को ही नहीं सन्यासियों को भी आवश्यक है। और इसीलिए देखिए यह तो एक उसका एक है पॉइंट। दूसरा एक पॉइंट यहां पे देखिए कि ये जो संघ की रचना क्यों की गई है? क्योंकि संघ की रचना रामकृष्ण संघ है ये बुद्धिस्ट संघ है। जितने भी ये मोनेस्टिक ऑर्गेनाइजेशन है देखेंगे कि इसके भीतर में ये साधु संघ का कांसेप्ट है। ये गुरु भाई शशि महाराज है, शरद महाराज है, राजा महाराज है, महापुरुष महाराज है। साथ में मिलकर के रहते थे। प्रारंभ में भी वराह नगर मठ में भी बाद में आलम बाजार बेलूर मठ में भी क्यों क्योंकि सबको साधु संगत चाहिए इवन जो साधु है इस अर्थ में कि वह साधना कर रहा है उसके मन में भी भरती ओठ आती रहती है एब एंड टाइड आता रहता है तो भरती अर्थात कि यह प्रेरणा और उत्साह का प्रवाह आया तो वह बढ़िया मजे से साधन भजन करेगा फिर कहीं निराशा आ गई। फिर कहीं एक तरह से डिप्रेशन जैसा आ गया। साधना का जगत तो जो है ना बड़ा ही विचित्र है। कब कहां पे क्या होगा कुछ ठीक नहीं बोल सकते। तो जैसे ही यह ओठ आई अपने उत्साह में साधन भजन में तो दूसरे साधु लोग दूसरे सन्यासी क्या कर रहे हैं देख के हमको आनंद आता है। हमको प्रेरणा मिलती है। अब जैसे मैं बेलूर मठ गया था। सो यहां पर वैसे तो मैं विशाखापट्टनम में करता ही रहता हूं। उपासना स्वाध्याय वगैरह किंतु बेलूर मठ में जाकर के एक विशेष बल प्राप्त होता है। क्यों? क्योंकि इतने सारे साधु हैं मोस्ट रिवर्ड प्रेसिडेंट महाराज, रिवर्ड वाइस प्रेसिडेंट महाराज, जनरल सेक्रेटरी महाराज और भी सब सीनियर साधु। मैं हमारे प्रिंसिपल ट्रेनिंग सेंटर के प्रिंसिपल देवराज जी उनको मिलने के लिए मैं गया था। अभी तो वहां वो एक नया अभदानंद कन्वेंशन सेंटर बना है। तो वहां पर फोर्थ फ्लोर पर उनका ऑफिस है। तो एक्चुअली मैं जब बेलूर मठ में था तब उनका ऑफिस था वो मिशन ऑफिस में। आजकल जिसको शारदानंद भवन कहते हैं। हम लोग पुराना नाम उसका है मिशन ऑफिस। सो मिशन ऑफिस में मैं मिलने के लिए सबको प्रणाम कर रहा हूं। तो उनका ऑफिस के सामने जाकर के मैंने देखा वहां पर तो महाराज नहीं बैठे हैं। तो मैंने और किसी महाराज को पूछा बगल में ही खड़े थे। मैंने कहा देवराज जी कहां है? तो उन्होंने कहा कि अरे उनका ऑफिस तो शिफ्ट हो गया है। अभेदानंद कन्वेंशन हॉल में है। मैंने कहा अच्छा अभी वहां पर भीतर में कैसे जाएंगे? कहां जाएंगे? किसको पता? छोड़ो अभी-अभी महाराज को कब बाद में जब इधर-उधर कहीं रास्ते में मिल जाएंगे तो प्रणाम कर लेंगे। ऐसा बोलकर मैं तो चला आया। मीनवाइल हुआ ऐसा जिस महाराज को मैंने पूछा था उस महाराज ने देवराज जी को बोल दिया कि वह शशि आया था आपका दर्शन प्रणाम करना चाहता था किंतु आपका ऑफिस उसको मिला नहीं बोल के चला गया अभी उस दिन रात को मैं खाने के लिए जा रहा हूं एकाएक देवराज जी सामने से आकर बोल रहे अरे शशि तुम मुझे मिलने के लिए आए थे तुम एक काम करना वहां पे आ जाना वेदानंद हॉल में मैंने कहा महाराज मैंने देखा नहीं कहां पे है मैंने बोला चलो मैं बताऊंगा तुमको फोर्थ फ्लोर पे आ जाना लिफ्ट है वहां पे बगल में ही ऑफिस तो सामने से बुलाया तो गया तो एक घंटा बैठा चायवा पिलाया बहुत बातें हुई देवराज जी का ऐसा है इधर-उधर की बातें कभी नहीं करते वो प्रिंसिपल थे हमारे तब से मैं उनको देख रहा हूं उनका जो और सिर्फ मैं मैंने तो बेलूर मठ जाइन किया है प्री प्रोबेशनल ट्रेनिंग सेंटर पीपीटीसी तो तब से मैं उनको देख रहा हूं क्योंकि कभी-कभी स्पेशल क्लासेस होते हैं टीसी में सीनियर ब्रह्मचारी के लिए तो हम जो बच्चे लोग हैं सब पीपीटीसी वाले उनको एक स्पेशल इनविटेशन रहता है और क्या है कि सीनियर्स लोगों का ये बच्चों पे थोड़ा सा एक ममत्व जैसा रहता है ना मातृभाव जैसा तो हमको बुला के बिठा के अच्छे से खिलाते हैं बातें करते हैं ऐसा तो मैं जब बेलूर मठ में पीपीटीसी में था तो तीनचार बार मैं टीसी में जाना हुआ था सीनियर ब्रह्मचारियों से बात होती थी और फिर यह देवराज जी से के साथ में भी एक दो बार बात हुई तो उसी समय उसी समय से मैं उनको पहचानता हूं तो बैठा उनके साथ में बात किया एकद घंटा बात हुई चाय-बाई पिलाई बहुत अच्छा लगा। देखिए देवराजानंद जी का मैंने देखा है बहुत ही सिंसियर साधु लाइफ है। बाहर में बहुत कम लोग उनको पहचानते हैं। किंतु जो लोग रामकृष्ण संघ के जितने भी साधु हैं ऑलमोस्ट आज की जो पूरी पूरी जनरेशन है वो सब उनको एज ए आचार्य के रूप में ट्रेनिंग सेंटर के प्रिंसिपल के रूप में पहचानती है। तो ऑलमोस्ट सभी साधुओं के जो फॉर्मेटिव पीरियड है उनके ऊपर में देवराज जी का बहुत ही एक प्रभाव है। हम लोग सभी लोग उनको यूनिवर्सली रिस्पेक्ट करते हैं। तो इस तरह से एक यूनिवर्सली रिवर्ड फिगर जिनका साधु लाइफ हम ट्रेनिंग सेंटर में आप कुछ छुपा नहीं सकते हैं। और कहीं पे भी आप रहेंगे। आप अपना कमरा बंद करके ऑफिस में अलग से बैठे हैं। आपका लाइफ आपके हाथ में है। आप क्या करते हैं? आप जाने किंतु ट्रेनिंग सेंटर एक ऐसी जगह है वहां पे कुछ छुपा नहीं सकते। आपका लाइफ जैसे 24 आवर ओपन बुक है क्योंकि हर घड़ी आपको एक 40 70 80 ब्रह्मचारी एक साथ में एक बिल्डिंग में रहते हैं। जस्ट इमेजिन कि वो किस तरह का प्रेशर कुकर खड़ा होता है। किस तरह की समस्याएं आती है। किस तरह की जेलसीस है। आपस में ये जो अंडर करंट्स है वो सब चलते रहते हैं। तो प्रिंसिपल महाराज इज़ द फर्स्ट इन द फायरिंग लाइन जिनको कि सब कुछ हैंडल करना है। तो उनकी ऑफिस का ऑफिस और रूम एक ही रहता है। आचार्य प्रिंसिपल महाराज जो है ऑफिस भी वही है रूम भी वही है। और दरवाजा हमेशा खुला ही रहेगा। कोई भी जाकर के महाराज के साथ में कंप्लेन करेगा। कोई भी जाकर के डिमांड लेकर जाएगा। कुछ ना कुछ लगा रहता है। सो उनका लाइफ जो है ओपन बुक रहता है। कोई भी गड़बड़ होने से इंस्टेंटली पता चल जाता है। तो इस तरह के साधु जिन्होंने 12 से 15 कितने साल उन्होंने वहां पर बिताया। इतना साल उनका लाइफ एक ओपन बुक रहा है और एक भी डिफेक्ट किसी को पता नहीं चली। इस तरह के साधु का आप संग करेंगे ना देखेंगे भीतर से एकदम शांत हो जाता है मन। भीतर में से एक ऐसा उत्साह मिलता है लगता है कि हां चलो फिर से अभी विशाखापट्टनम जाकर के फिर से साधन भजन उपासना स्टार्ट कर देते हैं। तो यहां पे भी देखिए ये संघ का यहीेंस है। सबको साधु संघ जरूरत है। ठाकुर स्पष्ट कहते हैं शकोलेरे दरकार सबको जरूरत है। सन्यासी रो दरकार सन्यासी को भी जरूरत है। तबे संसारी देर विशेषत हो किंतु एक बात है कि संसारियों को विशेष रूप से आवश्यकता है साधु संग की रोग ले छे रोग लगा ही हुआ है कामिनी कांचन मध्य शर्बदा थकते हुए कामिनी कांचन के बीच में हमेशा रहना होता है रोग लगा ही रहता है बोल के सन्या संसारियों को साधु संग हमेशा आवश्यक है। देखिए सर्व वही

ईश्वर-प्राप्ति का मार्ग: संपूर्ण शरणागति

जो कीचड़ कैसे साफ किया जाए तो उसका फर्स्ट पॉइंट ठाकुर ने कहा रो-रो करके अश्रुवारी बहा के सुई के ऊपर में से मेला धो देना है। एक दूसरा ध्यान करना है। और तीसरा है साधु संग। और फिर फोर्थ पॉइंट ठाकुर कहते हैं वेरी इंपॉर्टेंट। इसको लेकर के हमने काफी डिस्कस पहले भी किया है और अभी भी करेंगे श्री रामकृष्ण क्या कहते हैं ताके आम मुक्तारी दाओ उनको आम मुक्तारी बकलमा दो अर्थात कि पावर ऑफ एटर्नी दे दो किनको ताकि अर्थात ईश्वर को ईश्वर को पावर ऑफ एटर्नी दे दो अपने जीवन का जो कुछ भी है सब कुछ ईश्वर ईश्वर के चरणों में समर्पित कर दो। मेरी खुद की इच्छा, मेरी खुद की वासना संपूर्ण रूप से मिट जाए। जो हवा में उड़ते हुए पत्ते की तरह हवा का झोंका जहां पे भी ले जाएगा वहां पे यह पत्ता जाएगा। ईस्ट में ले जाना चाहता है। हवा का झोंका ईस्ट में जाएगा। वेस्ट में ले जाना चाहता है। वेस्ट में जाएगा। ठाकुर कहते हैं ना बिल्ली के बच्चे का उदाहरण देकर के कि उसकी मां उसको जहां पर भी रखती है बिल्ली के बच्चे को बच्चा बेचारा शांति से रहता है कभी बिस्तर के ऊपर में रखेगी कभी यह जमीन पर रखेगी कहां पे रखेगी उसकी मां बेचारा बिल्ली का बच्चा म्याऊं म्याऊं करता रहता है और अपनी मां जैसे कराती है वैसा करता है। इंटरेस्टिंगली स्वामी जी का एक कोटेशन है इफ यू सी अ कैट अ मदर कैट लुकिंग लविंगली एट हर किटन देन स्टे एंड प्रज़ द गॉड फॉर दिस बॉन्ड ऑफ मदरहुड गिवन टू दिस किटन। एग्जजेक्टली मैं भूल गया किंतु ऐसा ही कुछ है। एक बिल्ली और उसके बच्चे को प्रेम के बंधन में बंधे हुए आप देखते हैं तो आप खड़े हो जाइए। रास्ते में जाते-जाते देखते हैं। ऐसा और ईश्वर की यह सृष्टि है उसको आप ईश्वर को आप साधुवाद दीजिए। ईश्वर को आप प्रणाम जनाइए। क्यों? क्योंकि यह जो प्रेम का बंधन जो दिया है वही प्रेम और स्नेह का बंधन ही आखिर में त्याग एक है। दूसरा है यह शरणागति। यह शरणागति या प्रेम या भाव जिसको कहते हैं। एक तो है कि भाव को काटने की साधना है। दूसरी है भाव साधना है। तो यह भाव और यह भाव को काटने की साधना। साकार, निराकार, ज्ञान और भक्ति यह दोनों रास्ते हैं। और यहां पर ठाकुर कितना ब्यूटीफुली साकार और निराकार ज्ञान और भक्ति को इंटरवोन करते हैं वो देखिए। तो उनको आम मुक्तारी दो। उनको बकलमा दो। उनको पावर ऑफ एटर्नी दो। किनको? ईश्वर को। जा नहीं कर। जो है वो वो करेंगे। ठाकुर कहते हैं ना छोटा बच्चा है छोटा बच्चा उसका माने जिसके पास में बहुत ज्यादा संपत्ति है किंतु वो उसका मालिक जो है अभी नाबालिक है एडल्ट नहीं हुआ है तो फिर वह एक ट्रस्टी को अपॉइंट करता है ट्रस्टी उसकी संपत्ति चलाता है वह बच्चे के लिए तो वैसे ही वो जो है वह करेंगे जा त कर जो करना है वह करेंगे ईश्वर करेंगे तुम बिडाल छान मत केवल ताके डाकू व्याकुल होए तुम सिर्फ एक बिल्ली के बच्चे की तरह उनको पुकारो व्याकुल होकर के तार मां जे खाने ता के राखे बिल्ली के बच्चे की मां जहां पे भी बिल्ली के बच्चे को रखती है शेकी छु जाने ना बच्चे को कुछ पता नहीं है कखनो बिछाार ऊपर राक्षे कखनो हशाले कभी वह बिछाने के ऊपर रखती है कभी वह हशाले हशाले का अर्थ पता नहीं हो जमीन पे या जहां पे भी हो तो बिल्ली के बच्चे को बिल्ली की मां जहां पे भी रखेगी वो बिल्ली का बच्चा शांत होकर के वहां पर पड़ा रहेगा। म्याऊं म्याऊं करके वह अपनी मां को पुकारेगा। तो इस तरह से बिल्ली के बच्चे की तरह हो जाओ। इस तरह से एक सरल शिशु के तरह हो जाओ। ईश्वर के किचन हैशालय अर्थात किचन। अच्छा है। [हंसी] तो बिल्ली के बच्चे की तरह बिल्कुल हो जाओ जो कि अपनी मां के ऊपर में संपूर्ण रूप से भरोसा करता है। देखिए सच अ ब्यूटीफुल थिंग यदि ध्यान करना है तो आपके भीतर में वह विल पावर चाहिए। बिना विल पावर के आप एक स्टेप भी नहीं आगे बढ़ सकते ध्यान के क्षेत्र में। किंतु शरणागति बिल्ली के बच्चे की तरह होना है। तो जैसे कि विल पावर को भी आपको बहा देना है इस शरणागति के शरणागति रूपी गंगा के भीतर में। तो शरणागति और ये विल पावर दोनों एक ही उत्तर के भीतर में ठाकुर ऐसा इंटरवोन करते हैं। दोनों को इस तरह से मिश्रित करते हैं। वि इज सो इंटरेस्टिंग कि ठाकुर के धरा छोया और बरे अर्थात कि धरा छोया अर्थात कि धरा अर्थात पकड़ना छोया अर्थात स्पर्श करना ठाकुर को आप ना ही स्पर्श कर सकते हैं ना ही पकड़ सकते हैं उनके परे है किस अर्थ में कि यह जो फिलॉसोफी है रामकृष्ण विवेकानंद भाव जो है वो शास्त्र के भीतर में जो कुछ है वही है इससे बाहर का कुछ नहीं किंतु इसका विशेषत्व है कि जिस तरह से हमारे भारतीय परंपरा में हिंदू परंपरा में यह भावों का डेवलपमेंट हुआ है। वह जैसे कि स्ट्रेटिफिकेशन उनका हो गया है। वाटर टाइट कंपार्टमेंट थे कभी-कभी कि ये द्वैत द्वैत वाले द्वैत की ही आराधना करेंगे। उसी रास्ते पर चलेंगे। अद्वैत वाले द्वैत पे ही चलेंगे। हालांकि देखिए बहुत सारे साधु संत आ गए। मैंने रिसेंटली किसने मुझे बताया कि मीराबाई का मैं ट्रेनिंग सेंटर के एक ब्रह्मचारी ने मुझे बताया कि मीराबाई का चरित्र स्टडी कर रहा है। ने कहा अच्छा तो मीराबाई के मैंने तो किया नहीं ऊपर ऊपर से जो पढ़ते हैं दो-तीन पैराग्राफ तो क्या मीराबाई के चरित्र में पढ़ने को आएगा जैसे एक क्यूरियस बाय स्टैंडर्ड क्या सोचेगा कि वही है ना भक्ति की आराधना करती थी तो ये ब्रह्मचारी बोलता है नहीं महाराज वो उसके जो मीराबाई के भजन है उसमें निराकार भाव इतना भरा हुआ है मैंने कहा क्या बात करते हो मैंने तो स्टडी नहीं किया मैं तो सब अनुमान करके कह रहा हूं कि मीरा जब कृष्णा के भजन गाती होगी वो तो भक्ति की पराकाष्ठा है। ये तो जनरल एक अंडरस्टैंडिंग है। तो ये ब्रह्मचारी मुझे कहता है ट्रेनिंग सेंटर जो है अपना वहां पर बहुत अच्छा किताबों का संग्रह है। कोई भी विषय में डीप में जाना चाहे ट्रेनिंग सेंटर इज वन ऑफ द बेस्ट प्लेस फॉर दैट। तो वह बता रहा था कि मीराबाई का चरित्र पढ़कर के कि निराकार भाव इतना भरा हुआ है उसमें जो कि हमको आश्चर्य होगा यदि आप थोड़ा सा डिटेल में जाएंगे तो क्या है कि यह अभी बिकॉज़ कि मनुष्य के मन की क्षमताएं जो है ना बड़ी लिमिटेड है। आज मैं रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य का थोड़ा बहुत विशेष रूप से अभ्यास करने प्रयास कर रहा हूं। इसका परिणाम यह आएगा कि चैतन्य महाप्रभु का भी तो एक विराट लिटरेचर है। यहां पर साउथ में देखेंगे साउथ की ट्रेडिशन प्रत्येक स्टेट की अपनी-अपनी डीप ट्रेडिशन है। मैं नागपुर में था तो यह मराठी ट्रेडिशन सब आध्यात्मिक ट्रेडिशन वो थोड़ा बहुत परिचय हुआ था। बड़े-बड़े ग्रंथ है। उसमें आप जितना डीप में जाना चाहे जा सकते हैं। प्रॉब्लम यही है कि एक लाइफ टाइम में एक ब्रेन के माध्यम से हम थोड़ा सा ही ग्रहण कर पाते हैं। तो ये बिकॉज़ देखिए ये यूरोप है, जापान है, जर्मनी है, इजराइल है, इवन अमेरिका है। ये ये सब कंट्रीज ना उनका इतिहास के ऊपर में बड़ा प्राइड है। अब कि भारत में ऐसा हुआ है ना कि हिंदू इतिहास को जैसे कि हमने तुच्छ बना करके फेंक दिया है। जो चीजें मुझे प्रॉपर्ली स्कूल में स्टडी करनी चाहिए थी कि हां यह मीराबाई है। हां ये नामदेव है। हां ये अलवार है। हां ये बेंगली ट्रेडिशन है। यह गुजराती ट्रेडिशन है। यह मैथिली ट्रेडिशन है। यह ब्रज ट्रेडिशन है। वो कुछ नहीं करके झूठ-मूठ का ये मुस्लिम एक राजा उसके बाद में दूसरा नवाब उसके बाद में तीसरा नवाब क्या सब उल्टा पुल्टा हमको सिखाया गया है। हिंदू हिस्ट्री का पूरा मर्डर कर दिया है हमने अपनी स्कूलों में बोलकर के इट्स अ वेरी अनफॉर्चूनेट सिचुएशन आज एक ऐसी आ गई है कि हम हिंदुओं को अपनी ही आध्यात्मिक ट्रेडिशन के बारे में बड़ा ही ऊपर ऊपर से नॉलेज है। सुपरफिशियल नॉलेज है। बोल के विद दिस सुपरफिशियल नॉलेज हम लोग मान लेते हैं कि हमारे आध्यात्मिक परंपराओं में इस तरह के वाटर टाइट कंपार्टमेंट थे। अभी जितना डिटेल में जाएंगे उतना आपको तो और ज्यादा पता चलेगा किंतु ऊपर ऊपर से बता रहा हूं कि रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य का यह जो एक स्पेशलिटी है और फिर जैसे यह ब्रह्मचारी ने मुझे बताया तब तो मुझे पता चला कि मीराबाई के एक भजनों में, गीतों में निराकार इतना गहराई से छुपा हुआ है। सो मुझे लगता है कि रामकृष्ण, श्री रामकृष्ण, स्वामी विवेकानंद, मां शारदा दे रिप्रेजेंट द सेम ट्रेडिशन कि यह जो भाव सब डेवलप हुए हैं। सभी भावों का एक कॉम्बिनेशन, मिश्रण या तो फ्यूजन जो है सबके जीवन में यदि दिखता है। जिस तरह से दूसरे संत महात्माओं के वैसा ही ठाकुर मास्वामी जी के तो दिस पैसेज इज अ परफेक्ट एग्जांपल कहां यह सहस्त्रार में शिव विशेष रूप से है उनका ध्यान यह पूरा स्वामी विवेकानंद और कहां यह पावर ऑफ एटर्नी देना यह पूरा गिरीश घोष अभी हम लोग सोचते हैं कि ये गिरीश घोष को ठाकुर ने एक रास्ते पर जाने को तैयार किया स्वामी जी को दूसरे रास्ते पर जाने को तैयार किया। यह एक बिल्ली के बच्चे की तरह म्याओ म्या होकर के पुकारना। ठाकुर ने अपने 15 डायरेक्ट डिसाइपल को बोला और यह शिव रूपी महादेव के रूप में यह आत्मज्ञान स्वामी ठाकुर ने सिर्फ स्वामी जी को दिया। यह वन प्लस 15 ऐसा करके हम लोग डायरेक्ट डिसाइपल को देखते हैं। किंतु यह डायरेक्ट डिसाइपल को तो छोड़ ही दीजिए। यह मुख जिसका नाम और कहीं आता नहीं है पूरे कथामृत में पूरे रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य में ही इज ऑलमोस्ट नोबडी एक कंप्लीट मतलब ये कहेंगे कि बाह्य बहिरंग में जो आएगा बाह्य आउटर सर्कल में जो आएगा उसको भी ठाकुर इन दोनों को मिलाकर के कहते हैं। एक ओर कहते हैं सहस्त्रार में शिव है उनका ध्यान करो और दूसरी ओर कहते हैं कि बह पावर ऑफ एटर्नी दो। ये माने हम लोगों की भी अंडरस्टैंडिंग देखिए। भले ही चाहे चलो अब मीराबाई का तो मैंने स्टडी नहीं किया। कबीर का तो स्टडी नहीं किया। इस रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य का तो मैं स्टडी कर रहा हूं। किंतु जितना हम स्टडी करते हैं ना उतना ही हमारे ये जो प्रीकंसीव्ड नोशंस जो होते हैं कि हां ठाकुर ने यह निराकार के लिए सहस्त्रार में शिव पर ध्यान करने के लिए स्वामी जी को तैयार किया यह जो बिल्ली के बच्चे की तरह शरणागत होना बाकी 15 डायरेक्ट डिसाइपल है शशि महाराज शरद महाराज राजा महाराज उनको तैयार किया और तीसरा एक है गिरीश घोष जो कि संपूर्ण रूप से क्या कहेंगे यदि मैं ये शब्द यूज़ करूं नालायक [हंसी] तो किसी भी तरह की उसकी वो खुद कहता है कि किसी भी तरह की मेरी एलिजिबिलिटी नहीं है। वो जो फेमस घटना ठाकुर कहते हैं कि सुबह को एक बार ध्यान करना ना नाम स्मरण करना है। तो वो कहता है कब उठूंगा कब सोऊंगा कुछ ठिकाना नहीं। तो ठाकुर कहते हैं अच्छा ठीक है। खाने से पहले एक बार नाम स्मरण करना है। तो कहता है कि मैं कब खाऊंगा क्या खाऊंगा? एब्सेंट माइंडेड होकर खाऊंगा। कोई कोर्ट केस चल रहा है तो उसकी चिंता करते-करते खाऊंगा। खाने से पहले भी मेरे से नाम स्मरण नहीं होगा। तो ठाकुर कहते हैं अच्छा ठीक है। आखिरी बात अल्टीमेट रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य में मुझे बकल दो। गिव मी द पावर ऑफ एटर्नी। मैं करता हूं तुम हो तुम हो गाड़ी। मैं हूं इंजीनियर। तो जिस तरह से मैं चलाऊं उस तरह से तुमको चालित होना है। लीला प्रसंग में सुंदर वर्णन है। गिरीश घोष कहता है कि अच्छा उस समय तो बड़ा आनंद आया कि मुझे कोई टेंशन लेने की जरूरत नहीं है। मुझे कोई चिंता करने की जरूरत नहीं है। जो ठाकुर कहेंगे वैसा करेंगे। किंतु बाद बात बाद में पता चला यह पावर ऑफ एटर्नी दे देना का अर्थ क्या है? घर में मृत्यु हुआ है। प्रियजन का आंख में से अश्रु बहाने का भी आपको अधिकार नहीं है। सब तरह के अधिकार ठाकुर ले बैठे हैं। उस हद तक आपको आत्मसमर्पण करना है। तो हम लोग तो यही सोचते थे। अच्छा यह आम मुक्तारी देना यह पावर ऑफ एटर्नी देना इट्स फॉर गिरीश घोष। यह एक स्पेशल केस है। तो यहां पे ये बिल्ली के बच्चे की तरह संपूर्ण शरणागत होना। डायरेक्ट डिसाइपल शिव महादेव की तरह ध्यान करना स्वामी विवेकानंद यहां पे यह पावर ऑफ एटर्नी दे देना गिरीश घोष ये सब स्पेशल स्पेशल केसेस है ऐसा जो हम सोचते थे देखिए विदिन वन पैसेज ठाकुर ने ये सब प्रीकंसिव नोशन को तोड़ दिया है यह मुख जो कि कोई आंतरिक हमारा अंतरंग भक्त भी नहीं है वैसे ही एक आया है एक ही पैसेज के भीतर में ठाकुर ने जो भी उनका म टीचिंग िंग समग्र था, उपदेश समग्र था। सब एक ही व्यक्ति को दे दिया। शिव की तरह ध्यान भी करो, बिल्ली के बच्चे की तरह शरणागत भी हो जाओ और ईश्वर को संपूर्ण रूप से पावर ऑफ एटर्नी भी दे दो। बस वही है। ठाकुर ने यह नहीं कहा कि मुझे पावर ऑफ एटर्नी दे दो। क्योंकि देखिए यह बात इसलिए नहीं कि ठाकुर इसको थोड़ा सा बाहर रखना चाहते थे। मुकुद्ज गिरीश घोष में क्या फर्क है? गिरीश घोष को ठाकुर ने कहा मुझे पावर ऑफ एटर्नी दो। इसको ठाकुर कहते हैं ईश्वर को दो। तो क्या इज दिस बिकॉज़ कि गिरीश घोष और मुखजे में कोई डिफरेंस है? नहीं। बात यह है कि ठाकुर के जीवन की अवस्था का परिवर्तन होता जा रहा है। गिरीश के आने के साथ में ही ठाकुर की अंत्य लीला प्रारंभ हो चुकी है। इससे पहले ठाकुर हमेशा कहते हैं अपने को एक तणादपी सुनीचेत अर्थात कि माने एक बिल्कुल ही दीन हीन बना करके रखना चाहते हैं। ठाकुर स्पष्ट कहते हैं गुरु करता बाबा यह तीन बातों से मुझे ऐसा लगता है जैसे कोई मेरे देह में कांटे चुप हो रहा है। तो ठाकुर कभी भी यह पहली जो अवस्था है स्वीकार नहीं करना चाहते कि खुद अवतार है। किंतु जैसे गिरीश का आना हुआ साथ में ही ठाकुर की अंत्य लीला प्रारंभ हो गई और ठाकुर ने धीरे-धीरे यह डिक्लेअ करना शुरू कर दिया कि हां मैं ही हूं। जय राम जय कृष्ण श्री राम कृष्ण जो थे राम जो थे कृष्ण वही है श्री राम कृष्ण इससे पहले ठाकुर हिंट देते हैं मास्टर महाशय ठाकुर का दर्शन करने के लिए आते हैं प्रथम ना द्वितीय दर्शन में ही है द्वितीय तृतीय दर्शन में ही है तृतीय में मोस्ट प्रोबेब्ली ठाकुर पूछते हैं मास्टर महाशय को आमा के तो की रकम बोध हो तुम मुझे किस तरह से देखते हो मेरे बारे में तुम क्या सोचते हो बताओ तो मुझे कितना आना ज्ञान हुआ है आना अर्थात कि उस समय का पैसा आजकल 100 पैसे का ₹1 होता है तो वैसे ही 16 आना का आई थिंक ₹1 होता था जो भी है मुझे कितना आना ज्ञान हुआ है तो मास्टर महाशय उत्तर देते कितना आना यह तो नहीं पता किंतु आपके जैसा प्रेम भक्ति त्याग मैंने और किसी में नहीं देखा तो ठाकुर हंसने लगे माने ठाकुर ऑलरेडी टेस्ट करना शुरू कर देते हैं कि वो उसका स्थान कहां पे है यदि वो ठाकुर को एक आम सामान्य साधक समझता है तो बहिरंग में है और ठाकुर को अवतार के रूप में देखना शुरू कर देता है तो वह अंतरंग में आ जाता है। किंतु ठाकुर अपने से नहीं कहते कि हां मैं ही वही हूं। तो वह जो अंत्य लीला ठाकुर की जब प्रारंभ होती है तब यह ठाकुर जो भी यह भ्रम बना करके रखे थे अपने भक्तों के मन में कि हां वो दीनहीन है वगैरह वो सब तोड़ करके अपना सही स्वरूप प्रकाशित कर देते हैं। सो गिरीश और ये मुखजे में ऐसा कोई डिफरेंस नहीं है। तो हम लोग जो सोचते हैं कि गिरीश को कहा गिरीश इज अ स्पेशल केस। नहीं ठाकुर सबके लिए ये कॉम्बिनेशन देते हैं। [हंसी] सो इट्स वेरी इंटरेस्टिंग। इसके बाद का टॉपिक है जो कि अभी हम नेक्स्ट क्लास में लेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु।