प्रार्थना
ओम स्थापक यज धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः श्री राम कृष्ण कथामृत श्रीम द्वारा कथित चैप्टर का नाम है दक्षिणेश्वर में श्री राम कृष्ण भक्तों के साथ में और ठन ठन में सिद्धेश्वरी मंदिर में गमन द्वितीय परिच्छेद हमारा चल रहा था डेट है नाथ दिसंबर 1883 और द्वितीय परिच्छेद का टाइटल है ठाकुरे तपस्या अर्थात ठाकुर की तपस्या ठाकुर के आत्मीय गण और भविष्य का महातीर्थ जो हमारा टॉपिक चल रहा है उसमें
Sri Ramakrishna and educated middle class: Rationality and sceptiscism
हमने देखा कि किस तरह से मास्टर महाशय कुछ चिंता में निमग्न थे नबत में बैठे थे और गहरी चिंता में टेंशन में डूबे हुए थे हमने देखा कुछ-कुछ मास्टर महाशय का डोमेस्टिक प्रॉब्लम्स वगैरह हमने देखा अभी बाद में फिर मास्टर महाशय अपना खुद का एक परिचय देते हैं तो परिचय में वह लिखते क्या है कि वह केशव वगैरह जो विदेशी एजुकेटेड फॉरेन एजुकेटेड जो स्पीकर्स है फॉरेन फिलोसोफी है फॉरेन सा वेस्टर्न फिलोसोफी वेस्टर्न साइंस यह सब पढ़ना उनको अच्छा लगता है वह खुद अंग्रेजी वगैरह वो एजुकेटेड है और किंतु जब से ठाकुर के पास में आए हैं तब से लेकर के उनको यह यूरोपियन और वेस्टर्न फिलोसोफी वेस्टर्न साइंस या तो वेस्टर्न थिंकर्स जो यहां पर प्रवचन देते थे कलकाता में उनको सुनना उनको अभी उनके ऊपर में से रस उठने लगा है उनको सुनना अच्छा नहीं लगता अभी वह सिर्फ श्री रामकृष्ण देव की वाणी को लेकर के ही रहना चाहते हैं तो कल हमने थोड़ा सा मास्टर महाशय का यह प्रोफाइल भी डिस्कस किया था कि किस तरह से मास्टर महाशय का बैकग्राउंड है वह ज्यादातर डिवोर्स आजकल यहां पर आते हैं रामकृष्ण संघ में उनको किस तरह से अप्लाई होता है हम लोग भी देखिए कि एक तरह से रेशनल माइंड सेट लेकर के आ हैं हम लोगों के मन में भी यह सब है कि क्या यह जो कुछ हम पढ़ते हैं धर्म के बारे में वह सब सही में होता है इस तरह के चमत्कार इस तरह से ईश्वर होते हैं कि नहीं अवतार होते हैं कि नहीं उनकी कृपा हम पर आती है कि नहीं यह सब प्रश्न हमको होते ही है क्या क्योंकि क्या है कि हम लोग न्यूज पेपर वगैरह तो पढ़ते हैं उसमें देखते हैं कि एक के बाद एक स्कैंडल कोई अभी बहुत बड़ा धर्मात्मा था पता चला कि वह पीछे-पीछे सब दुराचार भी करता था तो एक तरह से न्यूज़पेपर में यह पढ़ेंगे और दूसरी ओर पढ़ेंगे कि आजकल का जो मॉडर्न एलीट है उनकी सक्सेस स्टोरीज अभी यह क्रिकेटर है सचिन तेंडुलकर या विराट कोहली म्यूजिशियंस है आर्टिस्ट है एक्टर्स है ये टेक सीईओ है फिर जैसे यह साइंटिस्ट है सबसे सर्वश्रेष्ठ यदि आज के मॉडर्न एलिट्स में कहा जाए कि जिनका सबसे ज्यादा कंट्रीब्यूशन होगा तो वह हो गया आइंस्टाइन ना कि इस तरह के अभी जैसे कि मॉडर्न एआई टेक्नोलॉजी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इसको डेवलप करने वाले इंटरेस्टिंग यह जो एक ग्राउंड ब्रेकिंग पेपर पब्लिश हुआ था एआई टेक्नोलॉजी के पीछे में जो है उस पेपर का टाइटल था अटेंशन इज ऑल यू नीड एक्चुअली एक सॉन्ग है बीटल्स का उसका टाइटल है ऑल यू नीड इज लव तो उसके बेस के ऊपर में उसको बेस करके उन्होंने इस टाइटल को बनाया है अटेंशन इज ऑल यू नीड और इसका जो को ऑथर्स है वन ऑफ द को ऑथर्स इज एन इंडियन तो देखिए कि जो ओरिजिनल ग्राउंड ब्रेकिंग इनोवेशंस डिस्कवरीज जो हो रही है मॉडर्न एज में यह क्वांटम कंप्यूटर्स है आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस है रोबोटिक्स है यह स्पेस एक्सप्लोरेशन है यह सब जब हम न्यूज़पेपर में पढ़ते हैं तो लगता है कभी-कभी का कि यह धर्म का जो जगत है वह जैसे हजारों साल से एक ही तरह का दावा करता आ रहा है किंतु इस दावे को कभी वह शायद एटलीस्ट मेरे जीवन में फुलफिल नहीं कर पाएगा ऐसा मुझे लगता है तो एक हेल्दी स्केप्टिसिजम हम सब में है तो यह होना भी चाहिए यह रेशनल स्केप्टिक म होना भी चाहिए वरना क्या होगा कि जो हजार लोग धर्म का नाम लेकर के हमारे सामने आकर के खड़े हो जाएंगे उसमें से हम एटलीस्ट यह तो रिकॉग्नाइज कर पाएंगे कि हां भाई किसके भीतर में रियल डेप्थ है और कौन शैलो है कौन छिछ रा है कौन हमको मूर्ख बना करके गुजराती में कहावत है लोभ होई त धुता भूखे नो मरे अर्थात कि जहां पर लोभी लोग रहते हैं व वहां पर जो धूत लोग होते हैं वह कभी भूखे नहीं रहते क्यों क्योंकि एक आदमी यदि लोभी होता है कामुख होता है तो वह हमेशा हार्ड वर्क करने की वजह शॉर्टकट करके अपने प्रॉब्लम्स का सॉल्यूशन लाना चाहता है या तो फिर उसको जो चाहिए जीवन में उसको वह प्राप्त करना चाहता है यदि मुझे आज बिलियने होना है और जैसे मैं सब न्यूजपेपर में पढ़ता हूं यह सब सीईओ की तरह तो एक्चुअल करना क्या पड़ेगा कोई अच्छी यूनिवर्सिटी में एडमिशन लेना पड़ेगा हार्ड वर्क करके थीसिस वगैरह प्रोड्यूस करना पड़ेगा उसके बाद में दिन प्रतिदिन की मेहनत है यदि आप अपना खुद का एंटरप्रेन्योरशिप स्टार्ट करते हैं कोई कंपनी फाउंड करते हैं तो किंतु यह सब करने की वजह यदि कोई आ कर के मुझे कहेगा कि यह अंगूठी पहन लो तो अंगूठी पहनने से ही फिर तुम्हारी कंपनी सक्सेसफुल हो जाएगी उसके लिए सुबह को 4:00 बजे उठ कर के रात के 12:00 बजे तक मेहनत करने की जरूरत नहीं है 10 बजे उठोगे तो भी चलेगा जो खाओगे वह चलेगा जिस तरह से एक लाउज लाइफ लीड करोगे व चलेगा तो फिर हमारा मन ऑटोमेटिक ऐसा लगता है कि चलो अंगूठी पहन लेते हैं फिर सब कुछ अपने ही हाथ में है तो अभी इसको कहते हैं लोभ और जिसके मन में लोभ है उसको ठग करके उसके पैसे पढ़ाने वाले धूर्त लोगों की इस संसार में कमी नहीं है तो इसके लिए इस तरह का शॉर्टकट हम ना अपनाएं एक रेशनल स्केप्टिसिजम हो इट इज वेरी गुड किंतु फिर यदि रेशनल है हम में तो हाउ विल वी रिकॉग्नाइज अ रियल मैन ऑफ गॉड अ रियल होली मैन अ रियल चाइल्ड ऑफ गॉड इस ईश्वर के संतान को ईश्वरीय महापुरुष को सही सही संत को हम कैसे पहचानेंगे तो वह पहचानने का उपाय जैसे कि ठाकुर ने योगेंद्र महाराज को कहा था साधु के दिने देख भी साधु के रातें देख भी तो खन साधु ऊपर विश्वास करवे अर्थात कि साधु को दिन में देखो साधु को रात में देखो तब कहीं जाकर के साधु पर भरोसा करो विश्वास करो तो योगन महाराज के मन में यह स्केप्टिसिजम था कि ठाकुर दिन में तो इस तरह की अच्छी अच्छी बातें करते हैं कामिनी कांचन त्याग की किंतु रात को क्या अपने कमरे में से निकल करके नबत में मां शारदा रह रही है उनकी पत्नी क्या उनके पास में जाते हैं तो इतना उनको डर लग गया कि अरे यह सब जो मैं सुन रहा था ढोंगी बाबा जियों के बारे में ठाकुर क्या भी ठाकुर भी क्या उनमें से ही एक निकले तो ऐसा बोलक के वह इन्वेस्टिगेशन करने को जाते हैं वहां नौबत के सामने खड़े रहे पता चला कि ठाकुर झावतला गए थे वहां से वह लौट रहे हैं तब कहीं जाकर के योगेंद्र महाराज के चेह का भाव देख कर के ठाकुर ने यह बात कही कि बेश बेश अच्छा अच्छा और साधु के दिने देख भी रातें देख भी तब साधुर पर भरोसा करवी तो यह साधु को दिन में देखना रात को देखना तब साधु पर कहीं जाकर के भरोसा करना तो योगन महाराज अकेले नहीं थे स्वामी विवेकानंद तो जग जाहिर है कि प्रति पद शेप उन्होंने ठाकुर की परीक्षा की है ठाकुर जब सभी परीक्षाओं में पास हुए हैं तभी कहीं जाकर के नर ने उनको अपने इष्ट के रूप में अपने गुरु के रूप में स्वीकार किया है तो अभी यह रेशन हमारे भीतर में भी हो 1000 ऑप्शन यदि हमारे सामने आते हैं जब हम
Emma Slade: ted talk: My Path To Becoming A Buddhist
वो अपनी कहानी बता रही थी एक पॉडकास्ट में अभी उसका नाम भी ऐसा विचित्र कि मैं याद नहीं रख पाया यह बौद्ध भिक्खू के नाम बड़े ही विचित्र होते हैं याद रखना मुश्किल होता है तो एक्चुअली हर स्टोरी इज वेरी इंस्पायरिंग कि वो एक शी वाज ना फाइनेंस फाइनेंस मैनेजर ना कि ऐसा कुछ थी वो अच्छा कमा लेती थी मने ये जो आजकल के हाईफाई ये जो एग्जीक्यूटिव्स होते हैं हाईली एजुकेटेड हाईली टेक मने हाईली टेक्नोलॉजिकल ओरिएंटेड उनमें से वह एक थी कि एक होटल में रह रही थी कहीं इंडोनेशिया में ना कि कहां पे एकाएक वह जो बरगलर होती है ना लोग लोगों को बंदूक दिखा कर के उनको लूट लेते हैं लोगों को लोगों के पैसे चुरा लेते हैं वैसे ही उसके घर में व जिस होटल में रह रही थी वहां पर बरगलर का ऐसा प्रयास हुआ कोई बंदूक लेकर उसके होटल के कमरे में घुस गया और फिर वह अपने बेड के नीचे में छुप गई है यह लेडी और वह जो आदमी है जो चोर है वह चारों ओर देख रहा है कि कहां से मैं कुछ चुरा पाऊं तो खैर वो तो बच गई उस अटेंप्ट में से उसको कुछ हुआ नहीं पैसा बैसा होगा शायद वोह चला गया होगा किंतु ट एक्सपीरियंस चेंज्ड हर लाइफ वो कहती है कि अरे मतलब यह जीवन कितना क्षण भंगुर है अभी आप एकदम हाईफाई सीईओ होकर के प्लेन में इधर से उधर घूमते हैं एक मीटिंग से दूसरी मीटिंग की ओर दौड़ ते हैं और अभी ऐसा कुछ हो जाता है वह कहती है मैं जब बेड के नीचे छुपी हुई थी और यह जो गुंडा था जो बंदूक लेकर घूम रहा था मेरा हृदय ऐसा कर रहा था दक दक कि जद उसको अभी पता चल गया तो अभी मुझे शूट कर देगा ना कि क्या और कुछ भयानक चीज करेगा पता नहीं सो शी सेज कि मेरी आंखें खुल गई कि मृत्यु है या दुर्घटना है ये कितना नजदीक है ह्यूमन लाइफ से अभी मैं एकदम हाई फ्लाइंग सीईओ हूं हाई फ फ्लाइंग एग्जीक्यूटिव हूं दूसरी ही क्षण अपने बेड के नीचे में छुपी हुई हूं जीवन की रक्षा हो जाए उसके लिए भगवान से प्रार्थना कर रहे हूं सो दैट एक्सपीरियंस चेंज्ड हर लाइफ फिर वह कोई बुद्धिस्ट मोनेस्ट्री में गई वहां पे रही शी बिकम बुद्धिस्ट नन टेट टॉक मेरे ख्याल से टेट टॉक ही था उसमें वह बोल रही थी यह सब सो सी कि जब हम लोग भी एक तरह से हाईली रेशनल है दूसरी ओर इस तरह के कोई इंसिडेंट अपने जीवन में होते हैं हम बहुत ही वल्नरेबल हो जाते हैं उसके बाद में कोई भी हमारे सामने आकर के किसी भी तरह का प्रॉमिस करेगा कि अच्छा ठीक है इस माने इस तरह की विधि कर दो तो दूसरी बार जब इस तरह से कोई ठग बंदूक लेकर के आपके कमरे में घुस आएगा तो यह विधि की वजह से वह ऑटोमेटिक वो खात्मा हो जाएगा उसका ना कि ऐसा कुछ जदी बता देगा तो यह जो हमारी वल्नरेबल जो होती है उसकी वजह से हम स्वीकार कर लेते हैं तो यह जो रेशनल जो है
Limit of rationality: better to have middle path of heartfelt devotion
उसको यदि एक बाउंड से आगे चली जाए माने हाइपर रेशनल िक या तो हाइपर स्केप्टिकल या तो हाइपर अथ हो जाए नास्तिक हो जाए तो यह नास्तिक लोग इतने वल्नरेबल हो जाते हैं कि फिर उसके बाद में जिस जितने भी ठग है वह सब आकर के उनको लूट लेते हैं तो इट ऑलवेज बेटर टू हैव ए मिडल पाथ ऑलवेज टू हैव ए हेल्दी डोज ऑफ डिवोशन भक्ति अदर वाइज क्या होगा कि ऑन वन हैंड मुंह से बोल रहे हैं कि मुझे किसी भी भगवान पर विश्वास नहीं है जितने बाबाज है सब ठग है यह जितने भी मंदिर है सब भ्रष्टाचार होता है ऐसा बोलने वाले लोगों की कमी नहीं है किंतु यही लोग जब वल्नरेबल हो जाएंगे तो जितना भी गहन अंधश्रद्धा होगी सब अंधश्रद्धा आंख बंद करके वह स्वीकार कर लेंगे क्यों क्योंकि फिर उनके जीवन में कोई प्लेटफॉर्म नहीं है रियल डिवोशन रियल स्पिरिचुअलिटी का तो यह लोग दो एक्सट्रीम में झोले खाते हैं एक एक्सट्रीम है कि संपूर्ण रूप से नास्तिकता और दूसरा एक्सट्रीम है कि आंख बंद करके अंधश्रद्धा में डूब जाना तो हम लोग बेटर टू हैव कि हमारे पास में यह रेशनल है हमारे पास में यह स्केप्टिसिजम है तो उसका कुछ सदुपयोग करके इस तरह के एक गुरु को स्वीकार कर ले कि जिसको हमने दिन में देखा है जिसको रात को देखा है जिसके बेड के नीचे में हमने एक सिक्का रख कर के परीक्षा कर ली है कि क्या वह सही में धातु को नहीं स्पर्श कर पाते ना कि सिर्फ दिखाने की बात है कि मुंह से बोलने की बात है यह सब परीक्षाएं हमने कर ली है तब कहीं जाकर के हमने ठाकुर को अपने गुरु के रूप में स्वीकार किया है और यही रेशनल और स्केप्टिसिजम को आधार करके एक हेल्दी आध्यात्मिक साधन पद्धति सीख लेनी है वह साधन पद्धति जो कि हमको इस दोनों एक्सट्रीम से बचाए घनघोर नास्तिकता और घनघोर अंधश्रद्धा ये दोनों से हमको बचाए इस तरह का एक मिडल पाथ हमको सिलेक्ट कर लेना है सो इन दैट वे मास्टर महाशय हियर स्पीक्स फॉर एवरी वन ऑफ अस हम सब आजकल के जो ठाकुर के भक्त है मिडल क्लास एजुकेटेड फैमिली से आते हैं हम सबके रिप्रेजेंटेटिव होकर के मास्टर महाशय यहां पर बैठे हैं और यही मास्टर महाशय को आखिर में अकल आ गई है कि ठाकुर को सुन कर के ठाकुर का दर्शन करके ठाकुर की दिनचर्या देख कर के ठाकुर की सिद्धि और साधना को देख कर के यह यूरोपियन पंडित उनमें अभी कुछ भी रस नहीं रहा है यूरोपियन पंडित फके पड़ गए हैं तो अभी यहां से थोड़ा सा आगे पढ़ते हैं मास्टर महाशय क्या लिखते
ठाकुर की अभयवाणी : साधना करने से ही ईश्वर दर्शन हो सकता है
हैं आजकल तिनी ठाकुरर एकटी कोथा सर्वदा भवन आजकल मणि यानी कि मास्टर महाशय ठाकुर की एक बात हमेशा से उसके ऊपर में चिंतन कर रहे हैं मनन कर रहे हैं कौन सी बात ठाकुर बोले छ साधन कोरले ईश्वर के देखा जाए ठाकुर ने यहां पर दो महामंत्र दि है पहला तो महामंत्र है कि थोड़ी सी साधना करने से ही या तो फिर थोड़ी सी शब्द तो नहीं है यहां पर ठाकुर कहते हैं साधना करने से ही ईश्वर को देख देख सकते हैं ईश्वर ईश्वर को देखा जा सकता है साधन कर लेही ईश्वर के देखा जाए साधना करने से ही ईश्वर को देख सकते हैं आरो बोले छन और भी कहा है ईश्वर दर्शन ही मानुष जीवने उद्देश्य और भी कहा है कि ईश्वर दर्शन ही है मनुष्य जीवन का उद्देश्य देखिए इसको हमने पहले एक बार डिस्कस किया था आयुर्वेद में जो एक तरह का फार्मूला है हेय हेय हेतु हान नो पाय यह चार उसके
योग सूत्र : पतञ्जलि
सूत्र है तो है य क्या है तो है यह है कि यह बुद्धिस्म ने बाद में उठा लिया है इसको तो बुद्धिज्म की उसके भीतर में ही मैं इसको बताता हूं है यह है कि मनुष्य जीवन में समस्या है मनुष्य जीवन में तकलीफ है मनुष्य जीवन में संघर्ष है मनुष्य जीवन में कष्ट है तो यह तो हो गया कि सबसे फंडामेंटल ऑब्जर्वेशन भगवान बुद्ध का आप जीवन चरित्र देखिए जब उनका जन्म हुआ था पिताजी को पता चला कि यह तो बहुत बड़े साधु हो सकते हैं इस तरह की भविष्यवाणी की गई थी तो पिताजी ने क्या किया वह तो राजा थे नेपाल के एक राज्य के उनका लड़का तो फिर तो राजकुमार होगा प्रिंस होगा यदि वह घर छोड़ कर के राजमहल छोड़ कर के साधु हो जाए तो फिर उनका राज्य आगे कौन बढ़ाएगा तो यह चिंता में आकर के उन्होंने अपने राजकुमार को सब तरह की लक्जरी से घेर कर के रखा सुंदर युवान स्त्री पुरुषों से घेर कर के रखा जिन लोगों में बुद्धि है जिन लोगों में जिन लोगों के पास में ऐश्वर्य है जिन लोगों के पास में स्वास्थ्य है इन सब संसार की भोग वासना लालच की आकर्षण की चीजों से अपने राजकुमार को घेर करके रखा किंतु एक बार ऐसा हुआ कि यही राजकुमार गौतम अपने रथ में बैठ कर के नगर भ्रमण के लिए निकले हो सकता है कि उनके पिताजी उस दिन और कहीं पर बाहर गए होंगे तो इस मौके का फायदा उठ लिया होगा तो एनीवे दिस इज माय स्पेक्युलेटिव है ऐसे ही मैं लोगों को देखता आ रहा हूं यह वृद्ध व्यक्ति कौन है इस तरह का चेहरा उसका क्यों हो गया है तो रथ चलाने वाले को पूछा तो रथ चलाने वाले कहा कि सभी मनुष्य इस तरह से वृद्ध होते हैं आप भी वृद्ध होंगे तो राजकुमार तो बड़ा ही आश्चर्य चकित हो गया यह तो कभी उसने देखा ही नहीं था अच्छा थोड़ा सा और आगे गए तो एक बीमार व्यक्ति को देखा मने खांसी आ रही है जुकाम हो रहा है वगैरह वगैरह वह लकड़ी के सहारे झुक कर चल रहा है तो फिर अगेन राजकुमार पूछता है गौतम अपने रथ चलाने वाले को कि अरे यह किस तरह की अवस्था है इस व्यक्ति की इस आदमी की तो व रथ चलाने वाले ने फिर से कहा कि देखिए इस तरह से बीमार तो सभी होते हैं आप भी होंगे एक दिन तो अगेन राजकुमार बड़ा आश्चर्य चकित हो गया कि जगत में बीमारी भी है पता नहीं था और थोड़ा सा आगे गया तो एक मृत देह देखा तो फिर उसने फिर से पूछा कि यह आदमी इस तरह से क्यों लेटा हुआ है लोग उसको उठा कर के क्यों ले जा रहे हैं तो अगेन वही उत्तर मिला कि मृत्यु तो अवश्यंभावी है जगत संसार में सभी का मृत्यु होने वाला है तो अगेन राजकुमार बड़ा ही आश्चर्य चकित हो गया यह जो तीन घटनाएं थी इसको हम जो जिसको कहते हैं संसार चक्र जन्म मृत्यु जरा व्याधि यह सभी के जीवन में है और यह समस्या यदि हम रेको गनाइज नहीं कर पाएंगे कि हां हम सबके सामने आने वाली है तो हम तो फिर वही वह जो युधिष्ठिर को यक्ष ने पूछा कि संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है तो उसने कहा कि जब मृत्यु अवश्यंभावी है तो मनुष्य इस तरह से बिहेव करता है कि वह कभी मरने वाला नहीं है या तो फिर आजकल जैसे होता है मरने का डर या वृद्धावस्था का डर ऐसा घुस जाता है अपने मन में कि सब तरह की रेमेडीज हम अजमा लेते हैं आयुर्वेदिक मॉडर्न यह वह अमेरिका में देखिए कि लॉन्जे विटी ना कि इसके ऊपर में काफी स्टडी हो रहा है मनुष्य का लाइफ स्पान 200 300 साल तक एटलीस्ट किस तरह से एक्सटेंड कर पाए किस तरह से अपनी युवानी को लंबे समय तक टका पाए य एंटी एजिंग फार्मूला लोजे विटी फार्मूला यह सब अभी यह लोग एक्सपेरिमेंट कर रहे हैं रिसर्च कर रहे हैं किंतु देखिए कि जिसका म जन्म है उसका मृत्यु अवश्यंभावी है यह संसार का नियम है इससे आप कितना ही भागे इससे आप जाने वाले नहीं है मुक्त नहीं होने वाले हैं तो पहले कि संसार में यह सब कुछ है जन्म मृत्यु जरा व्याधि तो यह हो गया है अभी दूसरा है कि क्या इसके पीछे में कोई कारण है कि यह सब होते ही रहता है तो हां हेय है तो हेय हेतु है उसके पीछे एक कारण है कारण क्या है कि अज्ञान अज्ञान की वजह से मनुष्य जन्म मृत्यु जरा व्याधि के चक्र में घूमता रहता है तो क्या इसका कोई उपाय है हान अर्थात कि क्या इसका कोई सोल्यूशन है तो सॉल्यूशन है निर्वाण और हान उपाय हान उपाय क्या है निर्वाण कैसे प्राप्त होगा तो निर्वाण प्राप्त होगा अष्टांग मार्ग का अनुसरण करने से तो यह जो चार है हे हे हेतु हान हनो पाय जगत में जन्म मृत्यु जरा व्याधि है इसका इसके पीछे का कारण है अज्ञान अज्ञान को दूर कर सकते हैं निर्वाण से और निर्वाण के पीछे का रास्ता है ये अष्टांग योग तो यहां पर भी ठाकुर कुछ इसी तरह से कहते हैं कहते हैं कि मनुष्य ईश्वर दर्शन ही मनुष्य जीवन का उद्देश्य है और फिर साधन करके ही ईश्वर को देखा जा सकता है हान और नो पाय यहां पर ठाकुर ने हमको बता दिए कि जद हान है ईश्वर दर्शन तो नो पाय है साधन भजन तो यह बात यहां पर मास्टर महाशय कहते हैं कि वह आजकल ठाकुर की एक बात सब समय चिंतन करते हैं कि साधन का दो बात यहां पर यहां पर वैसे मास्टर महाशय ने एक लिखा किंतु यहां पर बात उन्होंने दो बताई है क्याक है बातें कि साधन करके ही ईश्वर को देखा जा सकता है और ईश्वर दर्शन ही मनुष्य जीवन का उद्देश्य है इसके बाद में ठाकुर कहते हैं एक टू कोले क्यों बोल ए अभी देखिए कि पहले की जो हमारा वार्तालाप चल रहा था ठाकुर का और मास्टर महाशय का उसका थ्रेड उसका यह सूत्र यहां पर आता है वह बैकग्राउंड क्या था कि महाशय वहां पर आए हैं दक्षिणेश्वर में बड़ी गहरी चिंता में निमग्न होकर के नबत के रांडे में बैठे हैं और वहां पर ठाकुर गए थे झावतला शौच के लिए वापस आते हैं तो उन्होंने मास्टर महाशय को बड़े टेंशन में देखा तो उसके लिए उनको भरोसा दिलवाने के लिए जो सनातन सत्य है वह सनातन ऋषि श्री रामकृष्ण देव के रूप में आकर के उनको कहते हैं कि पहले तो क्या कहा ठाकुर ने कि वो एक खाने बोसे क्या जी यहां पर बैठे हो फिर कहते हैं वो समझ गए कि यहां पर क्यों बैठे हैं इसके लिए फिर कहते हैं तुम्हार शीघ्र होवे तुम्हारा जल्दी से होगा एक टू कोरले क्यों बोलबे ई ई थोड़ा सा करके ही कोई कहेगा यह यह अर्थात कि थोड़ा सा साधन भजन करके ही गुरु रूपी इष्ट आ कर के कहेंगे और ज्यादा करने के लिए यह यह करो तो यह ठाकुर ने ऑलरेडी कहा था उसके बाद में ठाकुर ने कहा कि तुम्हार समय होए छे पाखी डीम फूटो बार समय ना होले डीम फूटो ना तुम्हारा समय हो गया है आध्यात्मिक जीवन में प्रोग्रेस करने का नेक्स्ट लेवल पर जाने का पंखी का बच्चा जब तक बड़ा नहीं हो जाता है तब तक वह चोंच मार कर के अंडा तोड़ कर के बाहर नहीं आता है जे घोर बोले छी तोमार श घरही बटे और फिर ठाकुर ने मणि को किस तरह की साधना करनी है वह बता दिया था और फिर ठाकुर आगे कहते हैं श कोलेरी ज बेशी तपस्या करते होए तानो मैं पहले का थोड़ा सा रिपीट पढ़ रहा हूं जिससे कि हमको वह सूत्र मिल जाए कि आगे ठाकुर क्या कहते हैं तो ठाकुर कहते हैं सबको ज्यादा तपस्या करनी होती है वह नहीं है अर किंतु बड़ो कोटो करते हुए छलो मुझे किंतु बड़ा कष्ट करना पड़ा था माटी ढिपी माथा दिए पड़े थक ताम ली मिट्टी अपने सर पर रख कर के पड़ा रहता था कोथा दिए दिन चले ज तो कहां पर मेरे दिन चले जाते मां मा बोले डकता कांता मां मा बोल कर के पुकारता और रोता इसके बाद में फिर ठाकुर आगे कहते हैं एकट कोली क्यों बोलबे ई व फिर से वही बात रिपीट करते हैं थोड़ा सा कुछ करोगे तभी कोई आकर के कह देगा यह यह करो उसके बाद
ठाकुर मास्टर महाशय को एकादशी करने को कहते है
में ठाकुर एक एक एक्चुअल एक कुछ कहते हैं साधन भजन करने को जो कि जनरली बाकी जो जो घर ठाकुर ने पहले ही कहा कि तुम्हारा घर क्या है वह तो मैंने तुमको बता दिया है वहां पर तो मास्टर महाशय यह नहीं कहते कि उन्होंने उनके लिए ठाकुर ने मास्टर महाशय के लिए कौन सी साधन पद्धति दर्शित की है किंतु यहां पर एक छोटी सी बात करते हैं जो कि मास्टर महाशय लिखते हैं कहते हैं तुम एकादशी करो ठाकुर मास्टर महाशय को कहते हैं तुम एकादशी करो तुमरा आपना लोक आति हो अच्छा यहां पर जो एकादशी करने की बात है तो वह सात्विक एकादशी करनी है वह जैसे कृष्ण किशोर की एकादशी बड़ी फेमस है ठाकुर ने कहा लुची खे एकादशी अर्थात कि यह पूरी है फिर यह मिठाई वगैरह है वह सब खा कर के भी एकादशी की जाती है यहां पर दूध के भीतर में दो-तीन रोटी भीज रही है भीग रही है फिर वह थोड़ी देर के बाद में वह दूध वाली रोटी भी खा लेंगे तो इस तरह की एकादशी करने से कोई लाभ नहीं सात्विक एकादशी करनी है तोमरा अपनार लोग आति हो
ठाकुर के आत्मीय, अंतरंग शिष्य
तुम लोग मेरे खुद के हो अपनार लोग तुम लोग मेरे स्वजन हो मेरे खुद के लोग हो आत्मीय हो ता ना होले य तो आश बे केनो यदि तुम लोग आत्मीय नहीं होते तो तुम इतना आते क्यों यहां पर दक्षिणेश्वर में कीर्तन सुनते सुनते राखल के देखे छिला ब्रज मंडलर भी रोए छे कीर्तन सुनते सुनते राखल को देखा था कि वह व्रज मंडल में था भगवान कृष्ण जब लीला कर रहे थे तो वह गोप गोपालन बालक बालिकाएं थी जो कि भगवान कृष्ण के सखे थे उनके जो बंधु थे उस बंधुओं में एक गोप बालक था राखल नरेंद्र एर खूब ऊंच घर नरेंद्र का बड़ा ही उच्च घर है आर हीरानंद अच्छा यहां पर देखिए कि घर शब्द का ठाकुर फिर से प्रयोग करते हैं यहां पर ठाकुर आध्यात्मिक अवस्था के रूप में इस घर शब्द का प्रयोग करते हैं नरेंद्र का बड़ा उच्च घर है अर्थात कि नरेंद्र की आध्यात्मिक अवस्था या तो फिर नरेंद्र के संस्कार बड़े ही उच्च है बड़े ही शुद्ध परिशुद्ध है आर हीरानंद और हीरानंद हीरानंद की बात करते हैं तार केमन बालकर भाव उसका कैसा बालक का भाव है भा तार भाटी केमन मधुर उसका भाव कितना मधुर है ताकि व देख बार इच्छा करे उसको भी देखने की इच्छा करती है देखिए कि यहां पर ठाकुर एक के बाद एक अपने जितने भी अंतरंग है उनका एक एक के बाद एक उल्लेख करते हैं और उनका किसका क्या घर है वह बता देते हैं तो यहां पर राखल का घर किस तरह से बताया है कि राखल को मैंने कीर्तन करते-करते देखा था कि वह व्रज मंडल में रह रहा है वहां पर भगवान कृष्ण का सखा था गोप बालक राखल था नरेंद्र का तो बड़ा उच्च घर है उसमें कोई संशय नहीं है यहां पर हीरानंद है देखिए हीरानंद का कैसा बालक का भाव है किस तरह का मधुर भाव है उसको भी देखने की इच्छा कर रही है यानी कि ठाकुर धीरे-धीरे करके अपना जो अंतरंग वर्तुल है अंतरंग सर्कल है उस को धीरे-धीरे करके इकट्ठा कर रहे हैं आपस में एक देखिए कि हमको पता है कि ठाकुर ने रामकृष्ण संघ की स्थापना की तो इसके पीछे में किस तरह का भालो भाषा फाउंडेशन था अर्थात कि स्नेह प्रेम और करुणा मित्रता एक दूसरे को सहाय रूप होने का फाउंडेशन ठाकुर ने इन सभी में डाला था एक सभी को प्रेम के सूत्र में बांध कर के गए थे तो यहां पर मास्टर महाशय उनके प्रति एक तरह की मित्रता का भाव प्रकट करें उनके प्रति आध्यात्मिक रिस्पेक्ट का भाव प्रकट करें उनके प्रति मित्रता मास्टर महाशय की बनी रहे इसके लिए ठाकुर सबके गुणगान गाते हैं तो जि तभी तो अब ठाकुर जिसकी प्रशंसा कर रहे हैं तो निश्चय अभी उसमें तो बहुत सारा आध्यात्मिक सत्व होना ही चाहिए आध्यात्मिक ओजस होना ही चाहिए यह समझ कर के मास्टर महाशय भी उनके साथ में बड़ा ही सहृदय व्यवहार करेंगे तो इसी तरह से ठाकुर क्या करते हैं एक के बाद एक उनके अंतरंग भक्त गण है उनके सबके सामने जाकर के कहते हैं कि अच्छा यह जो लड़का है या तो फिर यह जो भक्त है जो कि यहां पर आता है उसका यह घर है या तो उसकी यह अवस्था है या तो फिर उसका इतना आध्यात्मिक उसके संस्कार अच्छे हैं बोलकर के जो ठाकुर अंतरंग है अपने सबके सामने ने एक दूसरे की प्रशंसा करते हैं इससे क्या होगा कि सभी के भीतर में एक दूसरे के प्रति बड़ा ही दृढ़ मित्रता रिस्पेक्ट सहृदयता और सहानुभूति का भाव प्रकट हो कहीं-कहीं पर मैंने देखा है दो-तीन जगह पर मैं बहुत पहले था मैंने देखा है कि आपस आपस में निंदा चलती रहती है जो आपके जो सुपीरियर होंगे उसके साथ में थोड़ा सा भी बात करेंगे तो आपके जो कली है या दूसरे लोग हैं उनकी निंदा ही ज्यादा करते रहेंगे जिससे क्या होगा कि मैं दूसरे व्यक्ति जिसको पहचानता नहीं हूं जिसके साथ में मेरा किसी तरह का इंटरेक्शन भी नहीं हुआ है उसके प्रति ना मैं पहले से ही प्रेजुड हो जाऊंगा तो यह कॉन्शियसली और सबकॉन्शियसली कुछ-कुछ ऑर्गेनाइजेशन में यह डिवाइड एंड रूल वाला चलता रहता है यह सब आपको पॉलिटिकल जो माहौल जहां पर ज्यादा होता है वहां पर ज्यादा देखने को मिलेगा कि मेरे जितने फॉलोअर्स हैं वो एक एक दूसरे के साथ में उनके भीतर में ध् वेश हो कंपटीशन हो तो उनको डिवाइड करके मैं अपना राज अच्छे से चला पाऊं मैं अपना पावर मेंटेन कर पाऊं वरना तो फिर मेरे जो ये अंडरलिंग्स है मेरे अंडर में जो काम करते हैं वो जद इकट्ठा हो गए तो मेरा ही पावर चला जाएगा वे लोग मेरा ही बहिष्कार कर देंगे मुझे ही सत्ता से हटा देंगे तो इस तरह का भाव जिन लोगों में रहता है वे लोग हमेशा उनके आसपास में फुट फाट पढ़ाने का प्रयास करते हैं डिवाइड एंड कंकर डिवाइड एंड रूल वाला नीति वह लगाते हैं किंतु यहां पे है कि ठाकुर तो ठाकुर है यदि देखिए कि ठाकुर को अवतार की दृष्टि से नहीं देख कर के एक मनुष्य की दृष्टि से देखा जाए मानवीय दृष्टि से ठाकुर का थोड़ा सा अभ्यास किया जाए साइकोलॉजी तो पता चलेगा कि ठाकुर में में जो सेल्फ कॉन्फिडेंस है आत्म श्रद्धा है वह इतनी ग्रेट है कि यदि उनके आसपास वाले सभी इकट्ठा हो सभी प्रेम के बंधन में बंधे तो उनको पुष्टि ही मिलेगी आध्यात्मिक मानसिक संतोष ही मिलेगा उनके मन में कोई दुख नहीं प्रकट होगा कि अरे यह सामने वाले सब इकट्ठा हो जा रहे हैं तो फिर अभी मेरा पावर कम हो जाएगा इस तरह से नहीं होकर के मनुष्य भाव से यदि सिर्फ ठाकुर को देखें तो दूसरों की यूनिटी में दूसरों की सहृदयता दूसरों की एकता में वह अपनी खुद की एकता अपनी खुद का एक कहेंगे कि पावर या तो अपनी खुद की पुष्टि खोजते हैं तो यह जो ग्रेट लीडर होते हैं स्वामी जी नेने क्या कहा जो सिरदार वो सरदार जो कि अपने खुद के जो सेल्फिश इंटरेस्ट है सिरदार का अर्थ यह नहीं कि सर काट के जो दे दे सिरदार का अर्थ है कि जो अपने सेल्फिश इंटरेस्ट होते हैं अपना अहंकार होता है अपना घमंड होता है उसको बलिदान देकर के जो संघ है जिस ऑर्गेनाइजेशन के साथ में यह लीडर जुड़ा हुआ है उसका जो मने उसका लार्ज स्केल पे किस तरह से अच्छा हो जिसका भला किस तरह से हो ऑर्गेनाइजेशन का डेवलपमेंट किस तरह से हो वो वो सोचेगा नहीं कि वो खुद का अपना स्वार्थ सोचेगा जो लीडर अपना स्वार्थ सोचता है जो लीडर घमंडी होता है वह बड़ा ही एरोगेंट होता है वह हमेशा अपने आसपास वालों में फूट फाट पढ़ाए आसपास वालों में द्वेष खड़ा करेगा झगड़ा खड़ा करेगा और जो लीडर आत्म संतुष्ट है आध्यात्मिक है आत्म श्रद्धा से भरपूर है वह हमेशा अपने आसपास वालों में मित्रता और प्रेम का वातावरण खड़ा करेगा तो यह जो हम रेशनल की बात कर रहे हैं ना कि रेशनल मापदंड से हम किसी को मेजर करें तो यह एक यार्ड स्टिक है यह एक मेजरमेंट का यूनिट है कि ऐसा कौन सा साधु इस तरह का कौन सा लीडर जिसमें ग्रेटनेस है तो वो लीडर जो कि दूसरों के सामने दूसरों की प्रशंसा करेगा उसके आसपास में जो कलीग्स है उसके जो अंडरलिंग्स है उसके अंडर में जो काम करते हैं उन सब में एक तरह का टीम स्पिरिट क्रिएट करने का प्रयास करेगा फ्रेंच वर्ड है एक एपिड डी कोर अर्थात कि य स्पिरिट ऑफ दी आर्मी और समथिंग कोर अर्थात की यह आर्मी यूनिट स्पिरिट अर्थात की स्पिरिट तो टीम स्पिरिट यदि उसको ट्रांसलेट करें तो इस तरह से होगा तो यह एपिड डिकोर या तो फिर यह टीम स्पिरिट यह टीम स्पिरिट हम जिस टीम में दिखता है उस टीम का जो लीडर है समझना है कि उसके भीतर में यदि आध्यात्मिक शब्द न भी इस तरह के लीडर में यूज करें तो वे लोग बड़े ही विजडम से भरे हुए हैं एक तरह की साधु से भरे हुए हैं तो यहां पर भी देखिए कि ठाकुर अपने संघ का फाउंडेशन किस तरह से डालते हैं जो कि उनके अंतरंग है सबके सामने जाकर के दूसरे अंतरंग भक्तों की प्रशंसा करते हैं जिससे कि यह सभी एक तरह के प्रेम के सूत्र में बंध जाए और फिर यहां पर राखल की बात की है नरेद की बात की है हीरानंद की बात की है इसी तरह से हम लोग कथामृत में और भी कहीं जगह पर देखेंगे कि यह पलटू के बारे में बता रहे हैं छोटो नरेण के बारे में बता रहे हैं कि कितने सारे भक्तों के बारे में ठाकुर उनकी प्रशंसा कर रहे हैं और ऐसा नहीं है कि ब्लाइंड प्रशंसा करते हैं ठाकुर ऐसा भी नहीं है वह जो नृत्य गोपाल बोलकर के एक था जिसको कि ठाकुर सबके सामने कहते हैं साधु सावधान तो यह भी है कि यदि कोई गलत कर रहा है तो उसको उसकी आंखें खोल कर के उसको सही दिशा निर्देश करना यह भी ठाकुर नहीं चुकते हैं वरना तो क्या होगा कि जैसे कि एक प्रश्न हुआ था ना कि एक मां अपने बच्चे को इतना प्रेम करती है और मां यशोदा है या मां शारदा देवी अपने जो आध्यात्मिक संतान है उनको इतना प्रेम करती है इन दोनों में डिफरेंस क्या है तो मां अपने बच्चे को जो प्रेम करेगी वह मोह से प्रेम होता है बच्चे की गलती भी जदी होगी तो मां शायद उसको इतना डिसिप्लिन करने का प्रयास नहीं करेगी या तो फिर मां का जो प्रेम है अपने बच्चे तक ही सीमित रहेगा अपने पड़ोसियों के बच्चे तक या तो फिर गली में जो भिक्षा मांगते हैं इस तरह के बच्चे तक वह ज्यादा नहीं जाएगा जबकि मां शारदा का मां यशोदा का प्रेम सर्वव्यापी है विश्वव्यापी है बच्चा यदि सही करता है तो प्रशंसा जैसे करेगी तो साथ-साथ में बच्चा यदि गलती करता है तो उसको उसका सही रास्ता दिखाने में भी वह संकोच नहीं करेगी तो यहां पर भी ठाकुर वैसे प्रशंसा ही सबकी करते हैं किंतु गलती होने से गलती दिखा भी देंगे इस तरह से ठाकुर ने अपने संघ का निर्माण किया है आगे ठाकुर कहते हैं गौरांग सांगोपांग देखे लाम गौरांग का सांग उ स अंग उपांग सांगोपांग का अर्थ है स अंग उपांग अर्थात कि उनके जितने भी घनिष्ठ भक्त थे उनका जो दल था तो घनिष्ठ भक्तों के दल को ठाकुर ने देखा था भाबे नोई ई चोखे भाव में नहीं इसी आंखों से अर्थात कि कभी-कभी दर्शन होता है तो ठाकुर भाव समाधि में चले जाते हैं वहां पर दर्शन होता है इस तरह से नहीं वैसे ही बैठे हैं और फिर वह नगर कीर्तन का दल जैसे कि वहां से आ रहा है पंचवटी के नीचे मोस्ट प्रोबेबली बैठे थे देखा कि वह गौरांग महाप्रभु कीर्तन के दल के साथ में वोह पंचवटी के रास्ते से जा रहे हैं तो इसी हमने स्पष्ट दृष्टि से ठाकुर ने गौरांग को देखा था आगे एमन अवस्था छलो ज सादा चोखे सब दर्शन होतो एकन तो भावे होए आगे में मेरी ऐसी अवस्था थी कि यह स्पष्ट दृष्टि से मुझे सब दर्शन होता था अभी मुझे भाव में सब दर्शन होता है सादा चोखे गौरांग सांगोपांग सब देखे छि लाम इसी दृष्टि से मैंने गौरांग के घनिष्ठ दल को देखा था तार मध्य तो मायो जने देखे छी लाम उसके भीतर में मैंने शायद तुमको भी देखा था जैनो अर्थात कि शायद यानी कि ठाकुर 100% कमिट नहीं करना चाहते य अदर वाइज ऐसा लिखते हैं कि तार म तो मायो देखे छि लाम किंतु ऐसा नहीं करके बोलते हैं तार म तो मायो जेनो देखे छि लाम उसके भीतर में तुमको भी शायद देखा था बलराम के व जनो देखे छि लाम बलराम को भी शायद देखा था तो देखिए कि इस तरह से जिनका जिनका दर्शन ठाकुर को हुआ है वह सब या तो फिर जिनको मिलने की व्याकुलता ठाकुर के मन में आ रही है या तो फिर जो आता है ठाकुर के पास में उसको उससे ठाकुर को आनंद प्राप्त होता है वह सब एक के बाद एक ठाकुर के अंतरंग सर्कल में आकर के जुटे हुए हैं काव के देखले तड़ाक करे उठे दाड़ा केनो जानो आत्मीय देर अनेक काल परे देख ले ओई रूप होए किसी को देख कर के मैं फटाक करके खड़ा हो जाता हूं क्यों पता है जो अपना आत्मीय है उसको बहुत दिनों के बाद में देखने से इस तरह का होता है हमारा भी जैसे कि मैं अपना अनुभव बताता हूं अ मेरी मां का घर एक गांव में था अभी भी है तो छोटे थे हम बच्चे लोग सब तो दीपावली की छुट्टी होती है या तो फिर यह समर वेकेशन होता है तो हम लोग सभी गांव में जाते थे तो वहां पे हम लोग जो थे बच्चों ब कच्चो बच्चों का बहुत बड़ा दल था वो कजंस ये मामा का लड़का इसका लड़का उसका ऐसा करके हमारा अच्छा दल था और फिर हमारे मामा वगैरह भी वहां पर रहते थे नानी मां रहती थी नाना रहते थे बहुत अच्छा एक जॉइंट फैमिली था वहां पे तो क्या है कि जब भी गांव में जाएंगे तो अभी क्या है कि साल में दो बार जाना होता था कभी दीपावली में कभी समर वेकेशन में तो फिर ऐसा मैंने लगा है 6 महीने के बाद में मिले हैं किंतु ऐसा लगता था जैसे कि कितने सालों के बाद में सबको मिले हैं इतना खुशी होता था जब भी एक के बाद एक दूसरे को मिलते थे इतना प्रेम से उनके साथ में बात करते थे हृदय के भीतर में इतना एक आनंद आता था कि बिछड़े हुए हमारे साथियों को बिछड़े हुए रिश्तेदारों को आत्मीय को स्वजनों को हम फिर से इतने दिनों के बाद मिल रहे हैं वहां पे समय इस तरह से बीत जाता था पता नहीं चलता था जब बताया जाता था कल शहर में वापस जाना है तो हमको लगता था अरे छुट्टियां इतने ही दिनों में खत्म हो गई शहर में दिन जाते नहीं है एक के बाद एक प्रत्येक दिन स्कूल जाना है होमवर्क करना है यह सब जो अपना रूटीन फॉलो करना है य तो ऐसा लगता था प्रत्येक दिन कितना लंबा है और जबक गांव जाते थे प्रत्येक दिन य लगता है कि अभी तो सुबह हुई अभी रात हो गई अभी एक सप्ताह चला गया अभी दूसरा सप्ताह चला गया अभी वापस जाने का टाइम हो गया तो यह जब हम आत्मीय स्वजन को मित्र को जिनके प्रति हमारा स्नेह है उनके साथ उनको जब मिलते हैं तब कैसा होता है जैसे कि समय छोटा पड़ जाता है तो यहां पर भी ठाकुर कहते हैं मैं जब किसी किसी को देखता हूं तो फटाक करके खड़ा हो जाता हूं क्यों क्योंकि यह जो भीतर का स्नेह का बंधन जन्म जन्मांतर से ठाकुर के सांगोपांग का ठाकुर के अंतरंग भक्तों का ठाकुर के साथ में है जो लोग की प्रत्येक जन्म में प्रत्येक अवतार में ठाकुर के साथ में उनके लीला संगी होकर के घनिष्ठ भक्त होकर के आते हैं उनके साथ में ठाकुर का जन्म जन्मांतर का रिश्ता है और जैसे ही ऐसे किसी को देखा जिसके साथ में पता नहीं कितने जन्मों का उनका नाता है तो देख कर के ही ठाकुर का मन भी हर्ष से भर जाता है ये जो ठाकुर कहते हैं ना कि मैं इनको सिर्फ वो ये जो निरामिष इनको सिर्फ मैं वेजिटेरियन खाना नहीं देता बीच-बीच में मैं मछली से धुला हुआ जल भी इनको थोड़ा सा पिलाता हूं क्यों यानी कि यह जो आनंद है उत्साह है वह सब नहीं करके सिर्फ साधन भजन की बातें करेंगे तो यह लड़के लोग बोर हो जाएंगे बड़ी छोटी अवस्था में कम उम्र में आए हैं तो संसार की अनित्य या तो लाइफ की सीरियसनेस यह सब इतना उनका नहीं है हंसी मजाक चाहिए उनको थोड़ा बहुत आनंद प्रमोद चाहिए आध्यात्मिक आनंद आध्यात्मिक प्रमोध वह सब चाहिए और थोड़ा सा मिल बैठ कर के हंसी मजाक वाला वातावरण चाहिए तभी तो यह यंग लड़के लोग यहां पर टिक पाएंगे तो इसीलिए ठाकुर का इनका जो रिश्ता है वह सिर्फ गुरु शिष्य का नहीं है वो आत्मीय स्वजन का है जन्म जन्मांतर से उनका जो संबंध है वह चला आ रहा है इसीलिए ठाकुर जब उनको देखते हैं पहली बार या तो जितनी भी बार तब ठाकुर के मन में भी हर्ष उत्पन्न होता है और इनके मन में भी अच्छा इसके बाद में ठाकुर अपने पूर्व दिनों के बारे में बताते हैं जिसको कि अभी हम कल देखेंगे आज यही तक ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णर्पण मस्तु
प्रश्न: ठाकुर अपने शिष्यों को देखकर बहुत प्रसन्न होते थे। लेकिन यदि ठाकुर अधिक प्रेम दिखाते तो नरेन क्रोधित हो जाते थे। यह लीला कितनी मधुर है!
एक बार ऐसा हुआ था कि नरेंद को आया नहीं था कुछ दिनों से वहां पर दक्षिणेश्वर में तो ठाकुर खुद चले गए वहां पर वह साधारण ब्राह्मण समाज में उनको देखने के लिए तो नरेंद्र थोड़ा सा नाराज हो गया वहां तो मित्र वगैरा थे तो अभी यहां पर ठाकुर आ गए हैं तो फिर तो तो नरेंद्र ठाकुर पर नाराज हो जाते हैं कि आप मेरे लिए यहां पर इतना दर कर दूर कर दौड़ करके आए हैं यह सब क्या है तो क्या है कि यह यंग लोग जो होते हैं ना यंग माइंड जो होता है इंपेशेंट होता है बड़ा इंस्पिरेशनल माइंड होता है तो अभी ठाकुर धीरे-धीरे करके मिडल एजेस की ओर जा रहे थे 50 के 45 50 की उम्र थी यह सब जो चल रहा था लीला ठाकुर की तो क्या है कि जिस तरह से समय जाता है वैसे ही आत्मीय स्वजन के ऊपर में प्रेम आता जाता है क्योंकि अपने खुद के जीवन की जो एस्पिरेशन होती है वह अभी हमने फुलफिल कर दी है आजकल के लड़कों को भी देखिए कि लड़के हमेशा घर छोड़ कर के जाना चाहेंगे उनकी जो एंबिशन है उसको फुल फिल करना चाहेंगे और जब मां पिता जी बुलाएंगे कि अच्छा थोड़े दिन घर आ कर के रुको तो उनको लगता है कि अरे ये बिना मतलब मैं टाइम वेस्ट कर रहा हूं क्यों क्योंकि युवावस्था में वो इट्स अ टाइम फॉर एंबिशन टाइम फॉर एस्पिरेशन टाइम फॉर अचीवमेंट फिर वृद्ध जब होंगे तब भी बच्चों की आत्मीय स्वजन की चिंता करेंगे तो य कॉमन साइकोलॉजी है वो जनरेशन गैप जिसको कहते हैं उसको ठाकुर और स्वामी जी के जीवन में दिखता है सात्विक एकादशी में
प्रश्न: सात्विक एकादशी क्या है?
देखिए कि देखिए राजसिक और सात्विक या तो तामसिक यह सब अपनी जो कैपेसिटी है उसके ऊपर में है जैसे यदि मान लीजिए कि आप भूखे होकर के नहीं कर सकते एकादशी तो थोड़ा सा खा लिया आपने रोटी है या दूध है वगैरह यदि आप कर सकते हैं भूखे रह कर के और यदि दूध और रोटी खाते तो आपके लिए वह राजसिक हो जाएगा और जद भूखे नहीं रह सकते और दूध रोटी खाया है वो थोड़ा सा जद डाब जल खे नहीं है तो फिर वह सात्विक होगा क्योंकि आपके देह की आवश्यकता अनुसार आप करते हैं बात यह है कि तपस्या करनी है तो तपस्या इस तरह से नहीं करनी कि देह को बहुत ज्यादा कष्ट मिले तपस्या इसलिए करनी है कि जब हमारा मन ईश्वर पर केंद्रित हो अभी फिजिकल ऑस्टेरिटी करते करते ठाकुर को छोड़ कर के अपने देह की ही चिंता करने लगे तो फिर वह ऑस्टेरिटी किसी काम की
प्रश्न: ठाकुर भागवत-भक्त-भगवान के बारे में क्या कहते है?
नहीं भागवत भक्त भगवान एक जगह पर ठाकुर बोले हैं और फिर क्या है कि केशव ने कहा था कि यह सब हम नहीं बोल पाएंगे ना हले
जब ठाकुर ने कहा गुरु-कृष्ण-वैष्णव बोलो - तब केशव सेन ने मना किया था
लोके रामा के गोंडा बोलव अर्थात कि क्या है कि यह एक वैष्णव भाव है जिसमें कि ये ईश्वर है ईश्वर के ग्रंथ है और ईश्वर के भक्त है इन सबको इक्वेट किया गया है जो ईश्वरीय भाव ईश्वर में अपने इष्ट में दिखता है वही ईश्वरीय भाव आपको ग्रंथ में देखना है वही भक्तों में देखना है जैसे महापुरुष महाराज कहते हैं ना कि तीन दया होलो एक गुरु कृष्ण वैष्णव तीन दया होलो एकर दया बिने जीव छारे खारे गेलो अर्थात कि गुरु कृष्णा और वैष्णव तीन की दया हुई य तीन की दया क्यों मांग रहे हैं आध्यात्मिक जीवन में हम गुरु की दया मांग सकते हैं कृष्ण की दया मांग सकते हैं वैष्णव यानी कि जो साधक है उनकी दया क्यों मांगनी है तो वह भी इसलिए क्योंकि जो साधना करता है उनके भीतर में वह आध्यात्मिक शक्ति प्रकट होती है यदि न भजन करना है तो सभी की सभी का आशीर्वाद लेना है तो हमारे से बड़े हो हमारे से जद वृद्ध हो उनका भी आशीर्वाद लेना है तो बोलक के वह कहते हैं कि गुरु कृष्ण वैष्णव तीन की दया हुई किंतु एक की दया के बिना सब नष्ट हो गया तो एक क्या है तो वह है मन तो यह भी हमको ठीक रखना है कि ये गुरु भागवत भक्त भगवान गुरु कृष्ण वैष्णव वगैरह वगैरह सबसे आशीर्वाद लेना है किंतु अपका अपना खुद का मन की तपस्या ही हमारे आध्यात्म जीवन में सबसे बड़ा भाग रोल प्ले करती है देखिए कि रेशनल और शरणागति यह एक लेवल
प्रश्न: आपने रेशनालिटी और शरणागति के बारे में बात की। क्या वे एक साथ चलते हैं, या रेशनालिटी एक पॉइंट पर आकर रुक जाती है और शरणागति शुरू हो जाती है?
तक चलेगा साथ में अब जैसे कि मैं कहता हूं कि स्वामी जी का जीवन देखिए स्वामी जी ने ठाकुर के महासमाधि तक तो ठाकुर की परीक्षा की ही की किंतु देखिए कि काशीपुर में स्वामी जी को निर्विकल्प समाधि प्राप्त हुई इसके बाद में पूरा जगत जय कर लिया अमेरिका में गए थे पति प्रति पद शेप उनको ठाकुर की जो दिव्यता है उसको अनुभूति अनुभूत करने का मौका प्राप्त हुआ था ठाकुर की सहाय के बिना अमेरिका में सक्सेसफुल होना स्वामी जी के लिए शायद संभव नहीं होता तो वहां पर जाकर के उन्होंने फिर से ठाकुर की जो दिव्यता है प्रत्येक क्षण उसका दर्शन किया है इसके बावजूद जब अ स्वामी जी ने बेलूरमठ की रचना स्थापना की उस समय उनके एक कोई एक महाराजा था कोई बड़ा उसका नाम नहीं लिखा गया है तो महाराजा कोलकात्ता की विजिट पर आए थे तो ठाकुर स्वामी जी ने सोचा कि यदि यह महाराजा यदि बेलूरमठ की मुलाकात में आते हैं तब मैं विश्वास करूंगा कि ठाकुर सही सही में यहां पे वो स्थापित हुए हैं अभी देखिए कि ठाकुर ने स्वयं अपने मुंह से कहा था कि तो तोर कांधे बसीए जेखाने आमा की निए जावी शेखाने आमी जाओ अपने कंधे प बिठाकर के तुम मुझे जहां पर ले जाओगे वहां पर मैं जाऊंगा यह बात स्वामी जी ने ठाकुर का जो अस्थिक कलश था अपने कंधे में उठा कर के नीलांबर गार्डन से बेलूरमठ जा रहे थे बेलूरमठ में उसकी स्थापना कर रहे थे उस समय स्वामी जी ने स्वयं यह बात अपने जो शिष्य है शरद चंद्र चक्रवर्ती उसको बताया और शरद चंद्र ने स्वामी शिष्य संवाद में इसको लिखा है यानी कि स्वामी जी के मन में बड़ा स्पष्ट था कि यह जो अपने कंधे पर बिठा करके ठाकुर का कलश बेलूरमठ में स्थापित कर रहे हैं यानी कि ठाकुर यहां पर आकर के विराजमान हुए हैं युग युगांतर तक इस बेलूरमठ से आध्यात्मिक जो प्रवाह बहेगा सबको आपल कर देगा यह सब स्पष्ट डिस्कशन आपको स्वामी शिष्य संवाद में मिलता है उसी दिन का डिस्कशन है उसी क्षण का डिस्कशन है जिस क्षण स्वामी जी अपने कंधे पर यह अस्थिक कलश लेकर जा रहे थे इसके बावजूद स्वामी जी के मन में एक प्रश् प्रश् है कि यदि ठाकुर सही सही में यहां पर विराजमान है तो यह महाराजा बिलुर मठ के दर्शन के लिए आए तो मैं मानूंगा कि हां ठाकुर यहां पर सही में है अभी इस बात को दो-तीन दिन हुए स्वामी जी को किसी काम से कलकत्ता जाना पड़ा उस समय हुआ ऐसा कि यही महाराजा पास में से बेलूरमठ के पास में से ही पसार हो रहे थे और उनकी इच्छा हुई कि स्वामी जी का दर्शन करें अपने एक सेवक को भेजा कि जाओ बेलूरमठ देख के आओ पूछ के आओ कि स्वामी विवेकानंद है कि नहीं अभी उनका यह जो था मैसेंजर गया मठ में सुना कि नहीं स्वामी जी तो कोलकात्ता चले गए हैं तब वह जाकर के मैसेंजर महाराजा के पास आए और महाराजा वहां से ही चले गए अभी स्वामी जी कलकाता से बेलूरमठ वापस आए तब किसी गुरु भाई ने कहा कि अरे तुमको मिलने के लिए वह महाराजा आए थे तुम थे नहीं तो वह भीतर में आए बिना ही बाहर से ही चले गए तब स्वामी जी ने अपने गुरु भाइयों को यह बात बताई देखिए कि मैंने इस तरह से अपने मन में सोचा था कि ठाकुर यदि यहां पर सही सही विराजमान थे है होंगे तो फिर यह महाराजा आएंगे तो यह महाराजा आए उसका अर्थ है कि देखिए ठाकुर सही में यहां पर विराजमान है देखिए कि अपना जीवन का जो महत कार्य है सब पूर्ण हो चुका है निर्विकल्प समाधि प्राप्त हो चुकी है पूरा विश्व जय करके आए हैं बेलूरमठ की स्थापना हो चुकी है अपने खुद के मुह से स्वीकार करते हैं कि मैं अपने कंधे पर ठाकुर को जहां पर जाकर के बिठाऊ ठाकुर विराजमान होंगे उसके बावजूद स्वामी जी इस तरह के प्रश्न खड़े करते हैं इस तरह की ठाकुर की परीक्षाएं करते हैं तो यह लंबे समय तक चलता है किंतु हमको पता है कि जब यह अमरनाथ गुफा में गए थे स्वामी जी के जीवन में जो टर्निंग पॉइंट है कुछ-कुछ मेजर टर्निंग पॉइंट उसमें से एक है कि उनके पिताजी की मृत्यु जबकि उसके बाद में वह ठाकुर के पास में आकर के मां काली को स्वीकार करते हैं वो जो फेमस घटना है कि दूस जो मां काली का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए नरेंद जाता है तीन बार जाता है तीनों बार ज्ञान भक्ति वैराग्य मांग करके आता है उसके बाद में ठाकुर उनके पास में जो भक्त आते हैं दूसरे दिन सबके सामने बड़ा खुश होकर के बोलते हैं नरेण काली मैंने छे नरेण काली मैंने छे नरेद ने मां काली को स्वीकार किया है माना है मां काली को स्वीकार किया है तो वो जो एक टर्निंग पॉइंट था स्वामी जी के जीवन में कि मां काली को स्वीकार किया उसके बाद में काशीपुर में निर्विकल्प समाधि वो एक टर्निंग पॉइंट था उसके बाद में अल्मोड़ा की गुफा में उनकी बहन की मृत्यु का संवाद प्रा प्राप्त करके फिर वह भारत भ्रमण चालू किया वह एक टर्निंग पॉइंट था विदेश में गए वह एक टर्निंग पॉइंट था फिर अमरनाथ गुफा में जो गए दैट वाज अ मेजर टर्निंग पॉइंट कि उनको लगा कि उनके जीवन में उन्होंने जो कुछ किया है यह जो कर्म का भार अपने सर पर लेकर के घूम रहे हैं उसको भी मां खीर भवानी ने आकर के कह दिया कि मैं तुम्हारी रक्षा करूंगी ना कि तुम मेरी रक्षा करोगे यानी कि यह घटना का जो सिग्निफिकेंट है कि स्वामी जी के मन में ये जो कर्म का जो भाव था धीरे-धीरे करके वहां से कम होने लगा यह कर्म सन्यास जद प्रारंभ हुआ है स्वामी जी के जीवन में तो वो खीर भवानी की घटना से हुआ है और उसके बाद में वो फेमस पत्र अमेरिका से सेकंड टाइम अमेरिका गए थे स्वामी जी फेमस पत्र लिखते हैं कि मैं फिर से वही नरेण हो गया हूं जो कि भारत के मैदानों में वन में पहाड़ों में भिक्षुक की तरह घूमता था अपने मन में कोई चिंता नहीं थी संपूर्ण ईश्वर के ऊपर में निर्भर फिर से मैं वही नरेण हो गया हूं कि दक्षिणेश्वर में गंगा के किनारे पंचवटी के नीचे बैठ कर के मंत्र मुगत होकर के ठाकुर की वाणी का श्रवण किया करता था मैं फिर से वही नरेण हो गया हूं तो वो था सही शरणागति उसके बाद में स्वामी जी को परीक्षा करने की जरूरत नहीं रही यानी कि स्वामी जी जैसे स्वामी जी के जीवन में निर्विकल्प समाधि के बाद भी ठाकुर की परीक्षा तो चलती ही रहती है किंतु जीवन में एक क्षण अवश्य आएगा कि जबकि संपूर्ण शरणागति आपके मन पर सवार हो जाएगी किंतु वो क्षण कब आएगा वी कैन नॉट से कोई क्लियर फार्मूला नहीं है कि हमने वो पहले ही आ जाएगा बाद में आएगा कब आएगा दैट वी डू नॉट नो तो यह तो हो गया कि इन दोनों का पैरेलल कि कब वो कहां तक रेशनल चलती है और कहां तक यह शरणागति आती
प्रश्न: हम स्वामीजी या योगानंदजी जैसे ठाकुर की परीक्षा कैसे करते हैं?
है दूसरी बात जो है कि ठाकुर की परीक्षा हम लोग कैसे करेंगे देखिए आपने ठीक ही कहा कि ठाकुर के साथ में तो अभी हम जिंदा नहीं है कि हम खुद जाकर के योगेंद्र महाराज की तरह ठाकुर को दिन में देखें ठाकुर को रात में देखें किंतु फिर भी ठाकुर की परीक्षा है वो क्या है कि जो रेशनल लोग होते हैं उनके जीवन में कुछ ना कुछ प्रश्न होते हैं कुछ ना कुछ दुविधा एं होती है जिसका कि यह लोग समाधान खोजना चाहते हैं मैं अपने खुद के जीवन में कहूं कि मैंने जब मैं जब स्कूल में पढ़ रहा था मैंने देखा कि यह गरीब बच्चे हैं वह मैदान में वैसे ही घूम रहे हैं तो मैंने सोचा कि उनको कुछ सहाई करनी चाहिए उनके लिए मुझे कुछ करना चाहिए तो मैं मेरा वेकेशन में फिर वह जाकर के गरीब बच्चों को पढ़ाया करता था जो खुले में रहते हैं वो इस तरह से जो माइग्रेंट लेबरर है किंतु फिर इससे मुझे संतुष्टि नहीं हुई मैंने यह सोचना शुरू किया कि ये व्हाट इज द रीजन फॉर दे पॉवर्टी वे गरीब क्यों है मतलब समाज में गरीबी है ही क्यों यदि समाज में इतना पैसा है इतनी बड़ी गवर्नमेंट है इतनी एफिशिएंट गवर्नमेंट है तो गरीबी है ही क्यों व्हाट इज द रीजन बहार पॉवर्टी मैंने सर्च कर करना शुरू किया वहां से एक लार्जर क्वेश्चन मिला हिस्ट्री स्टडी करते-करते द राइज एंड फॉल ऑफ सिविलाइजेशंस मनुष्य सभ्यता कहीं पे उत्थान होता है कहीं पे पतन होता है तो अगेन प्रश्न होता है व्हाट इज द रीजन बिहाइंड राइज एंड फॉल ऑफ द सिविलाइजेशन तो वो इंटेलेक्चुअल जर्नी अल्टीमेटली मुझे स्वामी जी के पास में लेक आया तब पता चला कि आध्यात्मिकता है कि वह पावरफुल फोर्स जो कि पूरी सिविलाइजेशन को खड़ा करता है और जब आध्यात्मिकता माइंड लेस सुपरस्टिशन में डूब जाती है तो उस सिविलाइजेशन का पतन होता है तो हम सबकी इस तरह की कोई ना कोई जर्नी होती है उसमें सॉल्यूशन मिलना चाहिए इंटेलेक्चुअल सॉल्यूशन कि जीवन में इस तरह का कोई अनुभूति हो जो कि हमारे जीवन में टर्निंग पॉइंट साबित हो देन वी स्टार्ट बिलीविंग देम तब हमको विश्वास आएगा कि ना यह जो स्वामी जी को मैं फॉलो कर रहा हूं उनकी फिलोसोफी मेरी फ उनकी फिलोसोफी एज इफ इट्स अ सोल्यूशन टू माय क्वेश्चन और फिर मैंने उनको फॉलो करना शुरू किया सो दैट टर्निंग पॉइंट कम्स इन अवर लाइफ जबकि उनका जीवन है उनके प्रसंग है उनकी दया है दे दे गिव अस सम सॉल्यूशन सम कंटेंटमेंट सम सेटिस्फैक्ट्रिली सारी संस्थाएं हैं सभी लोग आपको कुछ ना कुछ प्रॉमिस करती है किंतु यदि मेरा रेशनल माइंड सेट है तो मैं आंख बंद करके किसी को स्वीकार नहीं कर लूंगा मैं पहले तो यह देखूंगा कि मेरी लाइफ के जो क्वेश्चन है मेरी जो दुविधा एं हैं समस्याएं हैं उसमें कहां ना कहां व कुछ सेटिस्फेक्शन दे रहा है कि नहीं दे रहा इफ आई फाइंड सम सोल्यूशन देन आई स्टार्ट फॉलोइंग इट नॉट जस्ट बेस की वह खुद क्या डिक्लेयर करते हैं कि मैं इतना बड़ा हूं या तो फिर उनके चेले क्या डिक्लेयर करते हैं उससे मोहित होकर के मैं नहीं चला जाऊंगा उनके पास वो जो होता है ना देखिए स्पिरिचुअल डिस्कंटेंटमेंट इज गुड स्वामी जी के जीवन में आखिर तक स्पिरिचुअल डिस्कंटेंटमेंट था कि और भी चाहिए और भी चाहिए तो वह हमको आगे लेकर जाएगा सो दैट इज गुड उसमें गलत कुछ नहीं है देखिए जो सही सही कर्मयोगी है वह
प्रश्न: मैं सोचता हूं कि केवल कर्मयोगियों को ही रैशनल होने और बौद्धिक रूप से संघर्ष करने की आवश्यकता होती है। क्योकि वो बहिर्मुखी होते है। यही कारण है कि स्वामीजी ने बौद्धिक संघर्ष किया। लेकिन राजा महाराज भक्ति से भरे थे, इसलिए उन्हें रैशनल होने या संघर्ष करने की आवश्यकता नहीं थी।
अंतर्मुखी और बहिर्मुखी दोनों है क्योंकि कर्म योग दो शब्द है तो सिर्फ कर्म नहीं है जो सिर्फ कर्मी है वह बहिर्मुखी होगा किंतु कर्म योगी है वो अंतर्मुखी प्लस बहिर्मुखी होगा यानी कि सर्व होलिस्टिक डेवलपमेंट ऑफ पर्सनालिटी आजकल की लैंग्वेज में कहेंगे दूसरा कि जहां तक राजा महाराज का प्रश्न है या तो फिर यह जब हाइपोथेसिस है कि यदि मैं कर्मी हूं या तो मैं एक्सटर्नल वर्ल्ड के साथ में लोगों के साथ में कर्म करता हूं कार्य करता हूं तो उनको एक्सप्लेन करने के लिए मुझे अपनी रेशनल चाहिए दिस रेशनल इन टर्न मेक्स मी डाउट माय टीचर तो मुझे लगता है कि इससे बेटर एक हाइपोथेसिस है अपना कर्मा कर्मा अर्थात कि यह जो मेटा फिजिकल कांसेप्ट ऑफ कर्मा और कर्म का फल यदि जहां तक मेरे यह जो कर्म चल रहे हैं तब तक मुझे यह सब डाउट आते रहेंगे अभी राजा महाराज के जीवन में देखिए स्वामी जी यदि इंटेलेक्चुअल क्वेश्चन करते थे तो राजा महाराज के जीवन में किस तरह से यह कर्म का फल अ मेनिफेस्ट होता है तो वोह इस तरह से कि पहले तो ठाकुर के पास में जब वह आना शुरू किए ठाकुर के वोह मानस पुत्र के रूप में वो एस्टेब्लिश हो गए ठाकुर जैसे कि मां अपने बच्चे को स्तनपान करवाती है वैसे ही ठाकुर अपनी गोद में राखल को बिठा कर के वो माइ माइक खावा च अर्थात कि वो स्तनपान करवाते थे यानी ये पूरा एक दिव्य लीला है यह सब तो उस लेवल से फिर किंतु जब बाकी सब अंतरंग शिष्यों का आना प्रारंभ हुआ राखल के मन में एक तरह की ईर्षा प्रकट हुई कि ठाकुर तो मेरे खुद के हैं वो बाकी भक्तों के साथ में इतना प्रेम से इतना हंसी मजा क्यों कर रहे हैं तो वह जो ईर्षा प्रकट हुई यही ईर्षा उनको आखिर में ठाकुर से दूर ले गई जब ठाकुर ने खुद ने कहा कि वो यदि यहां पर होता नाम देक के ठाकुर नहीं कहते किंतु हम अनुमान करके कह सकते हैं कि वो राजा महाराज के बारे में ही कहते होंगे वो यदि यहां पे होता तो बाकी सब भक्तों का यहां पे आना संभव नहीं होता उसकी ईर्षा इतनी थी बाद में जब राजा महाराज वहां पर गए वृंदावन गए बलराम बाबू के साथ में उसके बाद में फिर ठाकुर ने ही उनको अपनी पत्नी के पास में भेज दिया ठाकुर ने कहा थोड़ा सा कर्म बाकी था कर्म का फल तो वह कंप्लीट करके आए फिर उनको संतान भी हुआ फिर कहीं जाकर के संपूर्ण शरणागति आई यह जो दूसरे भक्त है उनके ऊपर में से ईर्षा चली गई जो गह भस्त जो कर्म था वह समाप्त हो गया फिर वह ठाकुर के पास में आए अभी वह संपूर्ण रूप से शरणागत हो गए हैं तो यह जो संपूर्ण शरणागति की हमारी यात्रा है स्वामी जी के जीवन में जैसे कि इंटेलेक्चुअल क्वेश्चनिंग से प्रकट हुई है राजा महाराज के जीवन में यह पर्सनल स्ट्रगल के रूप में सब प्रकट हुई है दैट इट विल मेनिफेस्ट इन वन वे और अनदर किंतु फिर इफ यू आर सिंसियर इनफ कि वो स्टेज आएगा कि फिर संपूर्ण शरणागति आएगी