Invocation
ओम स्थापक यच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः कथामृत का एक नया चैप्टर स्टार्ट कर रहे हैं अभी तक हमने देखा जो दो तीन चैप्टर्स अभी तक हमने देखे हैं उसमें एक में तो विद्यासागर कोट ठाकुर उपदेश देते हैं दूसरे में हमने देखा कि केशव सेन के साथ में ठाकुर क्या वार्तालाप करते हैं अभी विद्यासागर और केशव सेन इन दोनों की आप लाक्षणिक देखेंगे उन दोनों का कैरेक्टर देखेंगे वह दोनों सोशल रिफॉर्मर्स थे और समाज को इंप्रूव करने के बारे में वे लोग सोच रहे थे तो उन दोनों हां हालांकि केशव सेन का ऐसा था कि धीरे-धीरे करके ठाकुर के पास में से आकर के उसने हरि नाम और मां का नाम लेकर के वह कीर्तन भजन करना सीखा आध्यात्मिक जीवन क्या है एक भीतर में एक डेवलपमेंट होना चाहिए यह सब कुछ उसने ठाकुर के पास में सीखा तो विद्यासागर और केशव के बीच में यह एक कंट्रास्ट कह सकते हैं कि विद्यासागर में दया थी कंपेज था जबकि केशव के भीतर में साधना की एक वृत्ति भी थी केशव एक रिफॉर्मर के साथ में कंपेज के साथ में उसके भीतर में मुमुक्षु उव भी था स्पिरिचुअल जिज्ञासा भी थी स्पिरिचुअल क्यूरियोसिटी भी थी तो इसकी वजह से ठाकुर के पास में से उसने बहुत कुछ ग्रहण किया और एक चैप्टर हमने देखा था प्रथम द्वितीय और तृतीय दर्शन कि जिसमें मास्टर महाशय सर्वप्रथम ठाकुर के पास में आते हैं तो उनके मन के भीतर में क्या रिएक्शन आता है उनके मन के भीतर में क्या विचार सरणी चालू होती है और जिस विचार सरणी के आखिर में उसके एज अ रिजल्ट ऑफ दिस ट्रेंड इन हिज माइंड ही स्टार्टेड कमिंग टू ठाकुर रेगुलरली मास्टर महाशय रेगुलरली ठाकुर के पास में आने लगे तो वह मास्टर महाशय के मन की जो पूरी विचार सरणी है वह हमने प्रथम द्वितीय और तृतीय दर्शन में देखी थी अभी यहां पर देखिए कि मास्टर महाशय जो कथामृत को लिपिबद्ध करते हैं कथामृत का लेखन करते हैं तो विद्यासागर और केशव सेन इन दोनों के बीच में जो इन दोनों के साथ में ठाकुर का जो वार्तालाप हुआ था उसके बारे में मास्टर महाशय की भी जिज्ञासा वृत्ति थी यदि मास्टर महाशय विद्यासागर और केशव सेन इन दोनों के मन को अच्छे से पहचानते नहीं अच्छे से यदि समझ ना पाते तो मास्टर महाशय इन दोनों के बीच में जो इन लोगों के साथ में ठाकुर का क्या वार्तालाप हुआ था उसका सिग्निफिकेंट नहीं समझ पाते और उसको डिटेल में लिख नहीं पाते तो मास्टर महाशय की साइकोलॉजी आप देखिए एक और उनके खुद की एक स्पिरिचुअल इंटरनल स्ट्रगल है वह चाहते हैं कि जो संसार के जो दुख दर्द कष्ट तपस्या उनके सर पर आकर के खड़े हुए उससे मुक्ति पाई जाए और साथ में ही यह समाज यह सोसाइटी इसके भीतर में जो प्रॉब्लम्स है इसका सॉल्यूशन कैसे लाया जाए तो मास्टर महाशय का देखिए कि एक अंतर दृष्टि भी थी एक बहिर दृष्टि भी थी यह अंतर्दृष्टि की वजह से वह ठाकुर के आध्यात्मिक उपदेश को ग्रहण करने में सक्षम हुए और बहिर दृष्टि की वजह से विद्यासागर और केशव सेन की जो रि फम मूवमेंट्स थी या तो फिर उनकी इंडिविजुअल विद्यासागर के केस में स्कूल्स और उसके माध्यम से जो समाज सुधारणा करना चाहते थे उसको भी मास्टर महाशय बखूबी समझते थे मास्टर महाशय हेड टू टाइप्स ऑफ विजनस वन वाज स्पिरिचुअल विजन अनदर वाज सोशल रिफॉर्मेशन विजन तो इनकी दोनों की वजह से ही मास्टर महाशय ठाकुर के जो सभी को जो जिस तरह के उपदेश देते हैं सभी तरह के उपदेश को समझने में समर्थ हुए थे बस वही है कि त्याग यानी कि फिर यह ब्रह्मचर्य या तो फिर यह संसार त्याग करके सन्यास आश्रम में प्रवेश करना वो अंतर दृष्टि जो कुछ यंग युवा त्यागी भक्तों के पास में थी ठाकुर के वो उस विजन उस पार्टिकुलर दृष्टि को मास्टर महाशय डेवलप नहीं कर पाए थे बोलकर के ही वह आखिर में सन्यासी नहीं हुए वरना शादीशुदा थे वगैरा तो कोई बंधक नहीं है सन्यास लेने के लिए क्योंकि हमको तो पता है कि राजा महाराज का खुद का एक लड़का भी था और लड़का और अपनी पत्नी दोनों को छोड़ कर के राजा महाराज वराह नगर मठ में आकर के रहना शुरू किया था तो विवाह हुआ है लड़के हुए हैं वह सब कोई सन्यास जीवन में उस समय बाधा नहीं थी अभी तो अभी इस तरह से होने से अपने संघ में प्रवेश नहीं कर सकते किंतु उस समय इस तरह का नहीं था आपका मुमुक्षु उव देखा जाता था ठाकुर के प्रति आपकी क्या श्रद्धा भक्ति है उसको देखा जाता था तो यह था मास्टर महाशय का माइंड सेट या तो फिर कहेंगे मास्टर महाशय की साइकोलॉजी अभी यह साइकोलॉजी आप देखिए कि ठाकुर के पास में जितने भी भक्त आते हैं उन सबके जीवन में एक टर्निंग टनिंग पॉइंट आता है यह टर्निंग पॉइंट क्या है पहले तो एक जनरल मुमुक्षु तोव से प्रेरित होकर के एक स्पिरिचुअल क्यूरियोसिटी से इंस्पायर होकर के सभी लोग ठाकुर के पास आते हैं किंतु ठाकुर की जो वाणी है उसका जो प्रभाव उनके शरीर और मन के ऊपर में पड़ता है ठाकुर जो बार-बार कहते हैं कि तपस्या करने से ईश्वर प्राप्ति होगी ही होगी थोड़ी सी तपस्या करने से ही गुरु आपके सामने आकर के बता देंगे कि तुमको यह यह करना है तो यह वाणी का प्रभाव और ठाकुर के उपदेशों से उनके ऊपर में श्रद्धा भक्ति और निष्ठा रख कर के ऑलमोस्ट उनके पास में जितने भी आते थे अंतरंग भक्तों में से सभी व चाहे गृहस्थ हो ना कि त्यागी हो सब लोगों ने नियमित रूप से जप ध्यान करने की शुरुआत कर दी थी यह जैसे कि यह अपनी गोपाल गोलाप मां है गोलाप मां उनका एक छोटा सा एक उदाहरण है कि अभी क्या है कि जब ठाकुर के पास आते हैं साधन भजन तपस्या की शुरुआत करते हैं तो ऐसा तो नहीं है कि आप अपना स्वभाव जो है सांसारिक स्वभाव वो भूल जाएंगे उससे मुक्त होने के लिए तो काफी समय लगता है बस वही बात है कि ठाकुर के प्रभाव से एक बार आपने साधन भजन प्रारंभ कर दिया तो फिर आपका मन धीरे-धीरे करके कन्वर्ट होने की शुरुआत हो जाती है भले ही फिर वह चाहे जितना भी समय लगे तो उस समय यह मां उद्बोधन में रहती थी और गोलाप मां और योगेन मां यह दोनों मां की सेवा करते थे मां शारदा देवी की उस समय किसी कारण सर योगेन मा को कहीं से कहीं पर बाहर जाना हुआ किसी दूसरे गांव में दूसरे शहर में जाना हुआ अभी यह गोलाप मा को यह पसंद नहीं आया कि योगेन मा क्यों मां को छोड़ कर के मां शारदा देवी को छोड़ कर के और कहीं जा रही है तो उनके मुंह से ऐसा निकल गया ो ई जोगन ज जाए देखी कोटा आछा खाए अर्थात यह जोगें जो जा रही है देखती हूं कि वह कितनी बार गिरती है और कितनी बार उस क्षत विक्षत होती है ऐसा वोह गोलाप मा के मुंह से निकल गया तो अभी वो योगेन मा तो गई कुछ दिनों के बाद में समाचार आया अपनी मां के पास में मां शारदा देवी के पास में कि योगेन मा गिर गई है और गिरने से उनको इतनी इंजरी हुई है कि दो-तीन जगह से उनको खून भी बहने लगा है ब्लीडिंग हो रहा है तो जैसे ही यह न्यूज़ मां के पास में आया मां ने इमीडिएट कहा कि देखो यह गोलाप ने जो कहा था कि वोह योगेन जा रही है तो मैं देखूंगी वो कितनी बार गिरती है तो वो जैसे कि उन उसके वाणी की शब्दों की रक्षा करने के लिए ही जैसे कि योगेन इस तरह से मूर्छित हुई है या तो गिर गई है अभी मां तो इस तरह से कहती है कि गोलाप मा की वाणी की रक्षा करने के लिए योगेन मा ने ऐसा किया किंतु मुझे ऐसा नहीं लगता कोई भी जानबूझ कर के वो गिरेगा और इतना गिरेगा इतना जोर से चोट आएगी कि ब्लीडिंग होना शुरू हो जाएगा मुझे ऐसा लग रहा है कि यह कोई स्टेटिस्टिक्स कुछ होगा किंतु यहां पे मां क्या कहती है पता है कि देखिए कि यह गोलाप है जो इतना जब ध्यान करती है तपस्या करती है तो उसकी वाणी में एक तरह की शक्ति है तो इसीलिए जैसे ही गोलाप मा ने ऐसा कहा योगेन मा के बारे में एक तरह से तो श्राप देना ही तो हुआ तो उसके वाणी वह जो तपस्या करती है उसकी वजह से उसकी वाणी में यह शक्ति आई है कि वह जो बोल रही है वह सही सही में वह होगा वास्तविक जीवन में वह सही ही सही होगा तो देखिए कि योगेन मा है गोलाप मां है गौर दसी है सब मने यह ठाकुर के पुरुष भक्तों के बारे में तो सबको पता है किंतु स्त्री भक्त भी देखिए कि कितना वह गहराई से साधन भजन करती थी यह गौर दसी गौरी गौर मा वो जो ठाकुर के पास में आती थी तो मां कहती है कि यह गौर दसी उस समय सब समय भाव में रहती थी वो आकर के बोलेगी मेरा नित्य गोपाल कहां है मेरा नित्य गोपाल कहां है यानी कि वह ठाकुर को नित्य गोपाल के रूप में देखती थी तो फिर अभी मां भी इन लोगों का कितना झमेला सहन करेगी तो मां थोड़ी कभी-कभी नाराज होकर के बोलती वो देखो मुझे पता नहीं तुम्हारा नित्य कहां है जाओ देखो गंगा के किनारे कहीं पर बैठा होगा तो अभी क्या है कि जो लोग ठाकुर के पास में आते थे मां के पास में आते थे सभी लोग साधन भजन भाव उनके और आध्या आत्मिक अनुभूतियां सबको होती थी तो यह एक जैसे कि टर्निंग पॉइंट था इन सबके जीवन में और फिर इस टर्निंग पॉइंट के बाद में उनका जीवन जैसे कि संपूर्ण रूप से परिवर्तित हो गया तो यह जीवन का परिवर्तन होना किसी के भी साधक के मन में साधक के जीवन में यह परिवर्तन आना व्हिच इज अ टर्निंग पॉइंट अभी स्वामी जी के जीवन का टर्निंग पॉइंट आप देखिए कि कौन सा था स्वामी जी के पिताजी का देहांत हुआ यह स्वामी जी के जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट था इससे पहले भी स्वामी जी आते थे साधन भजन भी करते थे ठाकुर के ऊपर में उनकी आस्था भी थी किंतु अल्टीमेटली ठाकुर के पास में जो लोग आए हैं उनका जीवन संपूर्ण रूप से परिवर्तित हुआ है अंतरंग की बात कर रहा हूं अंतरंग फिर चाहे गृहस्थ हो ना कि सन्यासी हो सभी का जीवन संपूर्ण रूप से परिवर्तित हुआ है और सभी ने आखिर में मिलकर के ठाकुर के यह संघ का गठन किया है यानी कि स्वामी जी के जीवन में वह टर्निंग पॉइंट था पिताजी का मृत्यु पिताजी का मृत्यु होने से पहले स्वामी जी यह सब लॉ एग्जाम वगैरह की तैयारी कर रहे थे हालांकि उनका मुमुक्षु बड़ा स्ट्रांग था वैराग्य बड़ा ही दृढ़ था जब उनके विवाह की बात चलती थी तो ठाकुर खुद जैसे कहते थे कि देखो मां वो जैसे वह कहीं माया में ना पड़े और स्वामी जी की खुद की ऐसी कोई बहुत इच्छा नहीं थी विवाह वगैरह करने की भले ही चाहे उनकी मां है या दादी मां है यह लोग यह सब बातें करती रहती हो तो अभी जैसे कि उनका डेस्टिनी तो एक तरह से तय था किंतु एक जो सामान्य जीवन और यह एक निवेदित जीवन एक संपूर्ण रूप से आहुति प्रदान किया हुआ जीवन यह टर्निंग पॉइंट उनके जीवन में आना है वह सभी के जीवन में आपको देखने को मिलेगा यदि हम इसको थोड़ा सा डिटेल में स्टडी करें तो सभी के जीवन के तो मास्टर महाशय के जीवन में जो टर्निंग पॉइंट मेरी दृष्टि से मेरे एक एनालिसिस के अनुसार जो था वह यह था कि मास्टर महाशय ने ठाकुर के उपदेशों को स्वीकार करके ठाकुर जैसे कहते हैं कि तुम लोग थोड़ी सी तपस्या करो थोड़ा सा जग ध्यान करो देखो कि ईश्वर स्वयं गुरु के रूप में आपके सामने आकर के बता देंगे कि इसके बाद में यह यह करना है तो मास्टर महाशय ने ठीक किया कि वह दक्षिणेश्वर आकर के रहेंगे और ठाकुर के सानिध्य में रहेंगे ठाकुर के पास में से आध्यात्मिक जीवन के जो गहन रहस्य है गुढ रहस्य है उसको वह प्राप्त करेंगे उसको सीखेंगे तो यह जानने के लिए मास्टर महाशय दक्षिणेश्वर आकर के रहे क्रिसमस के दिनों की यह बात है जबकि उनकी स्कूलों में छुट्टी थी इस दिनों का वर्णन इस दो-तीन चैप्टर में हमको मिल ता है और उस चैप्टर का अभी हम पाठ करेंगे देखिए कि मास्टर महाशय ने अपने खुद के बारे में कथामृत में बहुत कम कहा है और स्वामी जी की वह जो प्रसिद्ध वाणी है कि सोक्रेट डायलॉग्स आर प्लेटो ऑल ओवर बट यू हैव केप्ट योरसेल्फ कंपलीटली हिडन अर्थात कि सोक्रेट के डायलॉग जो उसके डिसाइल प्लेटो ने लिखे हमको ऐसा लगता है कि पता नहीं सोक्रेट ने क्या कहा और प्लेटो ने क्या कहा वो ज्यादातर ऐसा लगता है कि प्लेटो के खुद के विचार उसने सोक्रेट के मुंह से कह दिए हो किंतु ठाकुर का कथामृत में मास्टर महाशय ने अपने को सब समय छुपा कर के रखा है उस सब समय छुपा कर के रखने में दो-तीन एक्सेप्शन है उसमें से प्रथम द्वितीय तृतीय दर्शन कि जबक मास्टर महाशय सर्वप्रथम ठाकुर के पास में आते हैं और किस तरह से उनका मन ठाकुर की ओर आकर्षित होता है तो उस चैप्टर्स में कुछ वर्णन है कि मास्टर महाशय अपने खुद के बारे में क्या लिखते हैं उनके खुद के मन की जो क्रियाएं हैं उसका वह किस तरह से हमारे सामने चितार आलेख करते हैं हाउ ही पुट्स हिज ओन मेंटल प्रोसेसेस बिफोर अस और यह दूसरा एक ऐसा पोर्शन है यह क्रिसमस के दिनों की छुट्टी जबकि वह दक्षिणेश्वर में रहे व ये और इसमें भी देखेंगे कि मास्टर महाशय सब कुछ नहीं बताते हैं पाठ करने से ही समझ में आ जाएगा कि ठाकुर के साथ में उनकी बहुत सारी बातें हुई है ठाकुर ने उनको बहुत सारे गुड रहस्य भी बताए हैं जो कि ऑफकोर्स कोई भी इस तरह से हमको नहीं बताएगा शिष्य और गुरु इन दोनों के बीच में जो आध्यात्मिक वार्तालाप होते हैं वह तो सीक्रेट ही होते हैं किंतु विदन दिस बाउंड्री ऑफ सीक्रेट ये सीक्रेट को मेंटेन करके भी जो कुछ वार्तालाप हुए हैं दोनों के बीच में वच आर वेरी इंटरेस्टिंग हमको बहुत कुछ सीखने को मिल मिलता है जैसे कल हमारी बात हो रही थी कि आजकल इस तरह के गुरु मिलना मुश्किल है अभी जैसे आपको क्रिकेट सीखना है संगीत सीखना है तो बहुत अच्छे इंस्ट्रक्टर आपको मिल जाएंगे जो कि आपको आपके ऊपर में पर्सनली फोकस करके आपको स्टेप बाय स्टेप उस विद्या में माहिर बनाएंगे उस विद्या में एक्सपर्ट बनाएंगे दे विल मेक यू एक्सपर्ट इन दैट पार्टिकुलर स्किल किंतु आध्यात्मिक जीवन में इस तरह के गुरु मिलना बड़ा ही मुश्किल है या तो कहेंगे कि हमारी खुद की बहुत सारी तपस्या होनी चाहिए अभी जैसे कि डॉक्टर सरकार के साथ में जो कुछ वार्तालाप हो रहा था उसमें ठाकुर ने कहा कि अभी एक बार डॉक्टर सरकार नरेंद्र की कुछ प्रशंसा करते हैं कि हां वह इतना अच्छा गा सकता है भजन इस तरह से और फिर उसमें इतनी विद्या बुद्धि है और डॉक्टर सरकार ने एक बार नरेंद्र को अपने घर में बुलाया था आहार करवाने के लिए तो नरेद उनके घर गया था और डॉक्टर सरकार के साथ में डायरेक्टली वार्तालाप भी डिस्कशन भी हुआ था तो डॉक्टर सरकार बड़े ही प्रसन्न हो गए थे हालांकि यह वही डॉक्टर सरकार है जो कि ठाकुर के साथ में सब तरह का तर्क किया करते थे सब तरह की आर्गुमेंट किया करते थे किंतु यही डॉक्टर सरकार जो कि उनके कैंसर के ट्रीटमेंट के समय आए थे और यही डॉक्टर सरकार नरेंद्र से इतने प्रभावित हो जाते हैं ठाकुर को कहते हैं कि इस तरह के लड़के आध्यात्मिक जीवन जीने के लिए उत्सुक है तैयार है और इस तरह के लड़के जिसमें कि इतनी मैच्योरिटी है इतना त्याग वैराग्य है यह देख कर के मुझे बड़ा संतोष हुआ अब जैसे डॉक्टर सरकार यह बात करते हैं ठाकुर बड़े खुश हो गए ठाकुर ने एक जगह पे किसी एक व्यक्ति के बारे में कहा था य अभी देखिए ठाकुर लोगों के चरित्र का किस तरह से अंदाज करते हैं वह तो हमने बहुत बार बहुत विभिन्न तरीकों से देखा है उसके हाथ का वजन करेंगे फिर उसके जो फिजिकल फीचर होंगे आंख कैसी है उसका चेहरा कैसा है वगैरह वगैरह देख कर के और फिर ठाकुर की एक अंतर दृष्टि थी कि किसकी क्या साइकोलॉजी है उस साइकोलॉजी की वो ठाकुर एकदम इजली पकड़ लेते थे किंतु ठाकुर का यह जो लोगों का चरित्र एसेस करने का और भी एक क्राइटेरिया था किसी एक व्यक्ति के बारे में ठाकुर ने कहा था कि वह नरेण की प्रशंसा कर रहा था यह व्यक्ति तो ठाकुर ने कहा यह व्यक्ति बिकॉज कि यह नर की प्रशंसा कर रहा है यह बड़ा अच्छा होना ना चाहिए तो यह भी एक ठाकुर का क्राइटेरिया था कि कोई भी व्यक्ति कैसा है नरेद के बारे में उसका क्या ओपिनियन है तो यहां पर भी डॉक्टर सरकार ने जैसे नरेंद्र की प्रशंसा की तो ठाकुर बड़े ही खुश खुश हो गए जैसे कि अपने पुत्र के बारे में प्रशंसा पिता के सामने करेंगे तो पिताजी कैसे खुश हो जाएंगे वैसे ही और फिर ठाकुर एक बड़ा ही इंपोर्टेंट स्टेटमेंट देते हैं क्या कहते हैं कि एखाने जाकी छुआ छ सब और जन्नो अर्थात कि नरेंद्र की जो आध्यात्मिक पिपासा है नर की ये जो नर का जो मक्ष क्व है उसी की वजह से जैसे कि ठाकुर का आगमन हुआ है तो यदि हम सिंसियर एक मुमुक्षु मुमुक्षु तोव होता है हमारे भीतर में हमको उस तरह के टीचर मिल जाएंगे जो कि हमको आध्यात्मिक रास्ते में धीरे-धीरे करके आगे ले जाए तो यह बात है कि अभी हमारे पार्टिकुलर जीवन में जैसे हमारा कल डिस्कशन हो रहा था हमको तो ऐसा कोई टीचर नहीं मिलता है मैं अपने को पर्सनली मानता हूं कि मेरे में मुमुक्षु तोव या तो फिर यह स्पिरिचुअल प्रैक्टिस करने की कैपेसिटी वो मंद नहीं है इतनी खराब भी नहीं है वो मतलब इतना मैं एकदम टॉप पर पे भी नहीं हूं तो मैं इतना बुरा भी नहीं हूं तो फिर मुझे इस तरह के टीचर क्यों नहीं मिलते हैं यह एक प्रश्न हो सकता है किंतु साथ साथ में य देखिए कि यह जो अपना साहित्य है उस साहित्य के भीतर में सब तरह के रहस्य छुपे हुए हैं यह जैसे कि उसके जैसा है कि आपको पता है कि यह डीएनए जो होता है एक डीएनए के भीतर में बच्चा का जब जन्म होता है कंसेप्ट जब बच्चे का होता है तो यह डीएनए सर्वप्रथम फॉर्म होता है फिर यह डीएनए में से ही यह पूरा मनुष्य देह धीरे-धीरे करके डेवलप होता है वो बच्चे की आंखों का कलर कैसा होगा जेनेटिक डिसीज होंगे कि नहीं होंगे इसका फिजिकल फॉर्मेशन कैसा होगा कौन सा जेंडर होगा मतलब सब कुछ आप को व डीएनए के भीतर में कोडिंग किया हुआ मिल जाएगा तो उसी में से फिर पूरा बच्चा जन्म लेता है तो यहां पर भी अपने साहित्य को इस डीएनए के रूप में देखिए और हमको देखिए कि हम इस डीएनए में से सब इंफॉर्मेशन एक्सट्रैक्ट कर सकते हैं अपने खुद के आध्यात्मिक जीवन का गठन कर सकते हैं कर सकते हैं इसके लिए क्योंकि मनुष्य समाज के जितने भी आध्यात्मिक प्रश्न थे है और होने वाले हैं आज के आधुनिक युग में इन सबका उत्तर अपने साहित्य में ऑलरेडी दे दिया गया है बस हमको उसको समझना है उसको एक्सक्सा क्या रिलेवेंट है उसको फिर लेकर के हमको अप्लाई करना है तो यह जो दो-तीन चैप्टर्स है जिसमें कि मास्टर महाशय ठाकुर के साथ में बिताए हुए इंटेंस तपस्या के दिन जैसे कि ये स्पिरिचुअल रिट्रीट मास्टर महाशय की एक हो गई ठाकुर के साथ में स्वयं और हम अनुमान कर सकते हैं कि उनका भाग्य कितना मतलब बलवंत होगा हाउ ग्रेटली फॉर्चूनेटली में जाते हैं तो हमको जो आचार्य मिलते हैं वहां पर वोह कोई बुरे नहीं है कल भी मैंने साधना सदन जो कल मैं एक जगह के बारे में बता रहा था उसका नाम मुझे याद नहीं आ रहा था और ऋषि हरिद्वार में है कनखल में अपना जो आश्रम है उसके बहुत पास में है उस उसका नाम है साधना सदन अब यह साधना सदन वहां पर अब मुझे पता नहीं इसका प्रारंभ कैसे हुआ या हिस्ट्री क्या है किंतु और आजकल की क्या परिस्थिति है वह भी मुझे नहीं पता किंतु सन्यास के बाद में दैट इज 2015 2015 में सन्यास के बाद में इमीडिएट मैं और दो-तीन साधुओं के साथ में वहां पर गया था वहां का स्पेशलिटी क्या है प्रतिदिन शास्त्र के ऊपर में क्लासेस तो चलते ही रहते हैं किंतु साथ-साथ में ही साल में एक बार वे लोग वहां पर ज्ञान सत्र कर करते हैं ये ज्ञान सत्र में क्या होता है कि 40 दिन में आपको पूरा प्रस्थान त्रय पढ़ाएंगे अभी देखिए कि प्रस्थान त्रय अर्थात पता ही है कि यह उपनिषद है ब्रह्मसूत्र है और श्रीमद् भगवत गीता है श्रुति प्रस्थान स्मृति प्रस्थान न्याय प्रस्थान और वह भी उसके ओरिजिनल संस्कृत में संस्कृत में ही ये आचार्य जो है वहां पे वो संस्कृत में ही बात करेंगे संस्कृत में ही क्लास लेंगे और पूरा संस्कृत में आपको पूरा प्रस्थान 40 दिन में पढ़ाएंगे यानी कि ओरिजिनल श्लोक लेकर के उसके ऊपर में थोड़ी-थोड़ी व्याख्या यह लोग करते जाएंगे अब यह क्लासेस किन लोगों के लिए है कि जिन लोगों ने ऑलरेडी प्रस्थानत्रई का एक बार डिटेल में स्टडी कर लिया है और वे लोग अपने माइंड को रिफ्रेश करना चाहते हैं एक इस तरह की एक शास्त्र मय एक जीवन जीना चाहते हैं कि दिन भर शास्त्र की ही चर्चा जहां पे चलती हो तो दिन के 5च घंटे ना 6 घंटे प्रतिदिन क्लास होते थे और सभी लोग लोग जो मने कम लोग आते थे मैंने देखा था आई थिंक 50 के आसपास अटेंडेंस होगा उसमें कुछ साधु थे कुछ गृहस्थ भी थे तो किंतु जो लोग अटेंड करते थे एकदम सीधा बै जमीन पर बैठना है कारपेट लगाया है उसके अलावा और कुछ नहीं है नो कंफर्ट आजकल तो मैंने देखा वहां पर चेयर लगा दिया है ऑडिटोरियम जैसा हो गया है किंतु ये रिसेंट डेवलपमेंट है हम लोग जब थे वहां पे तो सिर्फ वो जमीन पर बैठना होता था कारपेट बिछाया हुआ है तो उसी कारपेट पर बैठ कर के जमीन पर आपको बैठ कर के सीधे बैठ कर के यह लोग पांच पांच छछ घंटा क्लास सुनते थे ऐसे डेडिकेटेड लोग वहां पर आते थे तो ये मुमुक्षु तोव जो लोग क्लास अटेंड करते हैं और जो आचार्य उनकी विद्या एक अद्भूत मेरे मतलब सन्यास के बाद में मैंने जनरली ट्रेडिशनल सन्यास क्या होता है किसी भी ट्रेडिशनल यदि अच्छा आश्रम है मने बहुत ही अच्छा ट्रेडिशनल आश्रम है प्रतिदिन वहां पर शास्त्र चर्चा होगी प्रतिदिन संस्कृत के श्लोकों से संस्कृत के श्लोकों के नाद से हवा जो है पूरा उसका वहां का वह नभ मंडल व गूंजता रहेगा और उसके वो एक शास्त्र पाठ जहां पर होता है व जगह एकदम पवित्र हो जाती है वो अपने संस्कृत के मंत्रों का उच्चारण जहां पर होता है ओमकारेश्वर में एक आश्रम है अ मार्कंडेय अभी यह मार्कंडेय जदिया ओमकारेश्वर गए होंगे तो वहां पर अपनी सफेद कुटिया है रामकृष्ण मिशन की उसके वह नदी के नर्मदा नदी के किनारे के सामने ही है मार्कंडेय आश्रम वो रामानंद सरस्वती बोलकर के एक बड़े सिद्ध महात्मा हो गए शास्त्र के बहुत बड़े एक ज्ञानी हो गए तो उन्होंने इस आश्रम की स्थापना की थी अभी उन्होंने स्थापना की थी कि उनके गुरु का आश्रम है वह तो मुझे नहीं पता और यह किंतु यह रामानंद सरस्वती एक ऐसे साधु थे जिनके पास में अपने मिशन के साधु भी शास्त्र पाठ सुनने के लिए जाते थे तो ऐसा एक आश्रम होना चाहिए अभी तो रामानंद सरस्वती का दे देह चला गया है उन्होंने समाधि ले ली है और मैं जब 2015 में 2014 में वहां पे था ओमकारेश्वर में तब तो वह थे नहीं उनके डिसाइल्स ही आश्रम चला रहे थे किंतु वहां पे प्रतिदिन एक-एक करके सुबह को शाम को दोपहर को ऐसा करके दो से तीन शास्त्र के क्लासेस चलते हैं और उसको सुनने के के लिए पूरे भारत में से कितने ही इस तरह के आध्यात्मिक जिज्ञासु है वे लोग वहां पर आते हैं हमारे मिशन के कुछ साधु नियमित रूप से अटेंड करते हैं मैंने भी प्रयास किया था कुछ अटेंड करने का और मैं तो वहां पर साधना सदन में भी गया था तो इस तरह का एक एटमॉस्फियर सभी सन्यासी जो भी अच्छे साधक है मुमुक्षु है वो सभी लोग चाहते हैं गृहस्थ हो न कि सन्यासी कि हमेशा इस तरह के एक शास्त्रम वातावरण में रहे जहां पर यह संस्कृत के मंत्रों की गुंज सब समय चलती हो और यदि हम अपने भावधारानी साहित्य अपना साहित्य कोई शास्त्र से कम बिल्कुल नहीं है ठाकुर महा स्वामी जी और डायरेक्ट डिसाइल यह जो 18 लोग है उनकी जीवनी वाणी और प्रेरक प्रसंग मेरी दृष्टि से शास्त्र तुल्य ही है और इसका भी यदि नियमित अभ्यास किया जाए तो अपना जीवन धन्य हो जाएगा तो वो एक एटमॉस्फियर मैंने वहां पर पे देखा था साधना सदन में मैं 40 दिन पूरा रुक नहीं पाया था अनफॉर्चूनेटली मैं 20 दिन वहां पे था और फिर बेलर मट से मैसेज आ गया कि मेरा पोस्टिंग कंप्लीट वर्क्स में हुआ है तो इमीडिएट मुझे बेलूरमठ रिपोर्ट करना है अपनी ड्यूटी के लिए तो मुझे अधूरा छोड़ के जाना पड़ा था और फिर ऐसा मौका आया नहीं कि मैं वह अधूरा क्लास कंप्लीट करूं किंतु आजकल साधना सदन के क्लासेस वो लाइव स्ट्रीम होते हैं youtube1 दन करके टाइप करेंगे तो उनकी चैनल मिल जाएगी तो काफी साधु लोग देखते हैं उसको तो सबको सुविधा हो गई है 40 दिन छुट्टी अभी किसको मिलने वाली है कि वहां पर जाकर के आप इस तरह से रिट्रीट करेंगे किंतु प्रतिदिन सुबह को इसी समय नाश्ते के बाद में ना कि उसके पहले 6:00 बजे के आसपास में वो पहला क्लास उनका चालू हो जाता है तो काफी साधू लोग उसको बड़ा इंटरेस्ट से सुनते हैं तो देखिए कि इस तरह का वातावरण हम सभी साधकों को चाहिए कि पवित्र वातावरण हो संस्कृत के मन हो या भगवान श्री राम कृष्ण देव की प्रेरक वाणी और प्रसंग हो इसकी गुंज सब समय हवा में वह फैलती रहे और इससे कि अपना चित्त शुद्ध पवित्र निर्मल होता रहे अभी आज हमारी जो परिस्थिति है हमको ठाकुर की वाणी सुनने के लिए कथामृत जैसी पुस्तकों का आश्रय लेना पड़ता है किंतु मास्टर महाशय कितने फॉर्चूनेटली वो ये था ज्ञान सत्र वैसा ही एक ज्ञान सत्र मास्टर महाशय को ठाकुर के साथ में दक्षिणेश्वर में श्री रामकृष्ण देव ऐसे आचार्य उनको करने का मौका मिला मने जीवन में कितना जप ध्यान तपस्या की होगी या तो फिर पूर्व जन्म के कितने अच्छे संस्कार रहे होंगे कि वह उनको यह मौका इस जन्म में मिला है तो उस दिनों की जो कहानी है वो यह कुछ चैप्टर्स में है मैं उसको पढ़ता हूं आज से इसका प्रारंभ कर देते हैं चैप्टर का नाम है दक्षिणेश्वरी श्री रामकृष्ण भक्तो संगे एवं ठन ठने सिद्धेश्वरी मंदिरे गमन दक्षिणेश्वर में श्री रामकृष्ण भक्तों के साथ में और ठन ठन में सिद्धेश्वरी मंदिर में गमन प्रथम परिच्छेद 1883 9थ दिसंबर नाथ दिसंबर 1883 की ये डेट है देखिए कि क्रिसमस के दिनों के कुछ दिनों के पहले की यह बात है ठाकुर श्री रामकृष्ण दक्षिणेश्वर काली मंदिरे भक्त संगे ठाकुर श्री रामकृष्ण दक्षिणेश्वर में काली मंदिर में भक्तों के साथ में वार्तालाप कर रहे हैं अभी देखिए रविवार नाथ दिसंबर 1883 ख्रिस्त रविवार नाथ दिसंबर 1883 यर अग्र 24 अग्र हायन शुक्ला दशमी तिथि बेला प्राय एकटा दुई होबे 24 अग्र हायन शुक्ला दशमी तिथि है सुबह के दोपहर के एक या दो का समय है ठाकुर श्री रामकृष्ण निजर घरे सेही छोटो खाट तीते बसिया भक्तो देर संगे हरि कथा बोलते छन ठाकुर श्री रामकृष्ण अपने घर में वही छोटे वो खाट के ऊपर में बैठ कर के भक्तों के साथ में हरि कथा बोल रहे हैं अधर मनोम हन ठन ठने शिवचंद्र राखल मास्टर हरिश इत्यादि अनेके बसिया छन हाजरा हो तखन खाने थाके उस समय अधर मनमोहन ठन ठन के शिवचंद्र राखल मास्टर महाशय अरीश हरीश वगैरा बहुत सारे लोग बैठे हुए हैं व हजरा महाशय भी उस समय वहीं पर रहते थे ठाकुर महाप्रभु अवस्था वर्णना करते छन ठाकुर महाप्रभु गौरांग महाप्रभु चैतन्य देव की विभिन्न अवस्थाओं का वर्णन कर रहे हैं श्री रामकृष्ण भक्तो देर प्रति चैतन्य देवे तीन अवस्था होतो श्री राम कृष्ण भक्तों के प्रति चैतन्य देव की तीन अवस्था होती प्रथम बाह्य दशा तखन स्थूल आ सूक्ष्म तार मन थकतो चैतन्य देव की तीन अवस्था होती बाह्य दशा अर्ध बाह्य दशा और अंतर दशा तो इन तीनों दशाओं का वर्णन ठाकुर यहां पर कर रहे हैं उसमें से सबसे पहले बाह्य दशा उस समय स्थूल और सूक्ष्म में उनका मन रहता अर्ध बाह्य दशा तखन कारण शरीरे कारन मेंे मन गिए छे अर्ध बाह्य दशा में कारण शरीर में और कारणात्क महा कारणे मन लोय होतो और अंतर दशा उस समय महा कारण में उनके मन का लय होता देखिए यहां पे बाद में ठ मास्टर महाशय कहते हैं कि यह सब अवस्था और दशाओं का वर्णन करके ठाकुर के अपने खुद की अवस्थाओं का वर्णन कर रहे हैं ठाकुर को भी देखिए कि कभी बाह्य दशा में लोगों के साथ में वार्तालाप करते हैं अंतर दशा में जैसे अर्ध बाह्य दशा में जैसे कि मां के साथ में वार्तालाप करते हैं और फिर अंतर्दशा उसमें जैसे कि उनका मन संपूर्ण रूप से अद्वैत भूमि में विलीन हो जाता है निर्विकल्प समाधि में चला जाता है तो क्या इस तरह से उनका नाम लेकर के और उनके साथ में क्या ठाकुर अपना एक पैरेलल ड्र कर रहे हैं क्या यह बात मास्टर महाशय बाद में कहते हैं अब यह जो तीन दशाएं हैं और इसके साथ में ही अभी इसके बाद में ठाकुर पंचकोष का विवरण देंगे तो यह तीन दशाएं और पंचकोष इसका बहुत डिटेल में हम विस्तार में डिस्कशन करेंगे किंतु आज नहीं क्योंकि आज ऑलरेडी आधा क्लास पूरा हो गया है और नेक्स्ट क्लास जब हमारा होगा कथामृत का तो सबसे पहले यह दो टॉपिक को हम लेंगे कि यहां पर ठाकुर क्या कहना चाहते हैं क्योंकि इसके साथ-साथ में ही हमको स्वामी जी का पैरेलल लाना होगा स्वामी जी का हमने ज्ञान योग और राजयोग दोनों स्टडी किया है एटलीस्ट ज्ञान योग और राजयोग के एक-एक चैप्टर का ज्ञान योग के दो चैप्टर का स्टडी किया है तो उसमें स्वामी जी किस तरह से ज्ञान योग में यह जो बाह्य इंद्रिय है फिर मन बुद्धि चित्त अहंकार है ये किस तरह से कार्य करती है वो बताते हैं और राजयोग में प्राण का क्या कार्य है यह पंचप्राण किस तरह से कार्य करते हैं वह बताते हैं तो यहां पे भी हमको और वो और फिर यह तैत्र उपनिषद में पंचकोष का क्या विवरण है फिर उसके ऊपर में शंकराचार्य की क्या टीका भाष्य है वगैरह वगैरह व एक डिटेल में कंपैरेटिव एनालिसिस और स्टडी करेंगे मैं उसके लिए कुछ मटेरियल जुगाड़ कर रहा हूं मैंने इसके बारे में थोड़ा सा स्टडी करने का प्रयास किया किंतु इमीडिएट मैं समझ गया कि थोड़ा सा ज्यादा समय चाहिए इसके लिए मैं आज यह डिस्क्रिप्शन पढ़ लेता हूं डिस्कशन कथा के नेक्स्ट क्लास में करेंगे आगे में ठाकुर क्या कहते हैं वेदांत पंचकोश संगे एर बेश मिला छ वेदांत के जो पंचकोश का सिद्धांत है उसमें यह जो तीन दशाएं हैं बाह्य दशा अर्ध बाह्य दशा और अंतर दशा इसका बड़ा सुंदर रूप से मेल हो रहा है मैचिंग हो रहा है स्थूल शरीर अर्थात अन्नमैया कोष स्थूल शरीर अर्थात की अन्नमैया कोष सूक्ष्म शरीर अर्थात मनोमय और विज्ञान मय कोष सूक्ष्म शरीर अर्थात की मनोमय और विज्ञान मय कोष कारण शरीर अर्थात आनंदमय कोष कारण शरीर अर्थात आनंदमय कोष महा काणे जखन मोन लीन होतो तखन समाधि महा काण में जब मन लीन होता था तब चैतन्य देव समाधि में चले जाते थे रही नाम निर्विकल्प बा जोड़ो समाधि इसी का नाम है निर्विकल्प जड़ समाधि चैतन्य देवे जखन बाह्य दशा होतो तखन नाम संकीर्तन करतन चैतन्य देव की जब बाह्य दशा होती तब वह नाम संकीर्तन करते अर्ध बाह्य दशा भक्तो संगे नृत्य करते अंतर दश समाधि तो होते अर्ध बाह्य दशा में भक्तों के साथ में नृत्य कीर्तन करते और अंतर दशा में समाधि स्त होते हैं देखिए कि यह अर्ध बाह्य दशा भक्त संग के नृत्य करना वो पाणी हाटी के जो महोत्सव का जो हमने डिस्कशन किया था उसमें कितना परफेक्टली यह मैच हो जा रहा है कि वह पाणी हाटी जा रहे हैं भक्तों के साथ में तो फिर वह पहले तो बोलते हैं कि मैं गले के रोग का सूत्रपात तो हो ही गया है गले में दर्द स्टार्ट हो गया है तो भक्त लोग कहते हैं कि किसी भी तरह के वह कीर्तन वगैरह में आप माता माती मत कीजिएगा अर्थात कि बहुत ज्यादा इवॉल्व मत हो जाइएगा तो ठीक है ठाकुर ये सब डिस्कस करके गए अभी वहां पर मंदिर में जाकर के खड़े हैं और देखा कि यह जो विधि की जो विचित्र होता है कहो कि व्हाट एवर द फेट जज ऑर्डन कि वो वो मंदिर था कि जितने भी कीर्तन के दल आते थे वो उत्सव क्षेत्र में कीर्तन करने के लिए सभी वह उस मंदिर में सबसे पहले जाएंगे और फिर वहां पे भगवान की जो मूर्ति है चैतन्य देव की वगैरह उसके सामने पहले वह पहला कीर्तन गाएंगे फिर वहां से उत्सव क्षेत्र में जाएंगे तो ठाकुर वहां प खड़े हैं वो प्रणाम करने के बाद में सुन रहे हैं देख रहे हैं कि वह किस तरह से कीर्तन चल रहा है अब यह कीर्तन जब स्टार्ट होगा तो ठाकुर का मन तो ऑटोमेटिक उसी में प्रवृत्त होगा ही तो वो तो अपने मन को रोक नहीं पाएंगे तो वो उनका मन धीरे-धीरे करके प्रवृत हो रहा है उसी में वह एक ढोंगी बाबा जी आए वो ढंग करके नृत्य नाटक की करके करने लगे वो देख कर के ठाकुर के मन में पता नहीं एक ऐसा भाव उपस्थित हुआ कि ये जो ढोंगी लोग जो है वो झूठ मुठ का लोगों को लोग तो उनको देख कर के सीखते हैं ना लोग लोगों के सामने जो आदर्श रखा जाएगा उसी में से लोग सीखेंगे अभी वह देखेंगे गोस्वामी इस तरह से नृत्य कर रहे हैं ढंग करके नाटक करके तो यही आदर्श है क्या इस तरह से शायद लोग सोचेंगे तो ठाकुर के मन का जो अवस्था का परिवर्तन हुआ वो हुंकार करके वो कीर्तन के दल में कुद पड़े और ऐसे सिंह विक्रम के साथ में नृत्य कर र हैं कीर्तन कर रहे हैं जैसे कि एक ऐसी जम जमाटो क्षेत्र में ये फैल गया बिजली की तरह कि एक इस तरह के साधु महात्मा परमहंस आए हैं कि जिनके नृत्य कीर्तन में इस तरह की ईश्वरीय शक्ति दिव्य शक्ति विद्यमान है तो जैसे ही बात फैली फिर तो वो भीड़ इकट्ठा होने लगी होने लगी और यह नृत्य कीर्तन करते-करते ठाकुर फिर बीच-बीच में समाधि स्त हो रहे हैं और इसी समाधि अवस्था में एक दूसरे ढोंगी बाबा जी ने उनके मुंह में वो प्रसाद का एक कण डाल दिया था फिर ठाकुर की समाधि भंग हुई और वो थूथू कर के वो प्रसाद उनके मुंह में जिसने रखा था वो फेंक दिया क्यों क्योंकि उसका चरित्र अच्छा नहीं था तो ये देखिए की तीनों दशा यहां पर देखने को मिलती है वो मंदिर में खड़े-खड़े कीर्तन देख रहे हैं वो एक हो गई उनकी बाह्य दशा फिर वो एकदम सिंह विक्रम के साथ में वो नृत्य कीर्तन कर रहे हैं वो अर्ध बाह्य दशा और बीच-बीच में समाधि स्त हो रहे हैं वो अत दशा यानी ठाकुर की तीनों अवस्था तीनों दशा एक साइकल में जैसे कि होती रहती थी तो वो इसके बहुत सारे उदाहरण अपने कथामृत में और भी बहुत सारे हैं तो यहां पे व जैसे मास्टर महाशय इसके बाद में लिखते हैं मास्टर स्वगत मास्टर महाशय जैसे कि अपने मन में सोच रहे हैं ठाकुर की निजर ही समस्त अवस्था रूपे इंगित कोचन ठाकुर क्या अपने खुद की सब अवस्थाएं इस तरह से बता रहे हैं जैसे कि अपना खुद का नाम नहीं लेकर के चैतन्य देव के नाम से बता रहे हैं कि चैतन्य देव की तीन अवस्था होती थी अभी जिसकी आंखें है वह देख ले कि ठाकुर की भी वही अवस्था होती है देखिए कि हमने देखा कि ठाकुर का श मां की की शोड़ी पूजा के बाद में दो पर्व बचे हैं उनके जीवन के साधन पर्व के बाद में एक तो है कि आनंद पर्व और दूसरा है कि आत्मप्रकाश पर्व आनंद पर्व का स्पेशलिटी क्या है कि ठाकुर इस तरह से हिंट देते जाते हैं कि उनका सही स्वरूप क्या है किंतु वो जो भी उस हिंट को लेकर के ठाकुर के बारे में यह सब कुछ बोलने का प्रयास करेगा कि ठाकुर आप तो अवतार है या तो फिर चैतन्य देव स्वयं यहां पर पृथ्वी पर फिर से प्रकट हुए हैं वगैरह वगैरह तो ठाकुर बिल्कुल नाराज हो जाते क्या कहते हैं कि गुरु कर्ता और बाबा यह तीन जो कोई मुझे कहता है तो मैं इससे बड़ा नाराज हो जाता हूं अर्थात कि ठाकुर ये पसंद नहीं करते थे ठाकुर हिंट देते थे कैसी विचित्र होता है ठाकुर हिंट देते थे कि मेरा सही स्वरूप क्या है किंतु हिंट लेकर के जब ठाकुर की प्रशंसा कोई करता था तो वह ठाकुर को पसंद नहीं था ठाकुर क्या चाहते थे कि यह हिंट लेकर के आप अपने साधन राज्य में डूब जाइए आप साधन भजन करके अपने जीवन को परिवर्तित कीजिए दैट व्ट ठाकुर वांट नहीं कि वह आत्म प्रशंसा चाहते थे अभी दो-तीन दिन पहले ही जो मां का वो एक प्रसंग हमने देखा कि कोई एक स्त्री आकर के मां को बता रही है आप तो जगदंबा है आप तो महाशक्ति स्वरूपिणी है आप तो अध्याशक्ति है वगैरा वगैरा तो यह बात सुनकर के मां नाराज हो गई क्यों क्योंकि कोई कोई लोग आकर के मां की प्रशंसा करके कुछ काम निकाल देना चाहते हैं जैसे एक नफर चंद्र कोले बोलकर के एक था वही वो जयराम बाटी के आसपास का बड़ा धनी आदमी था मां जब जयराम बाटी में रहती थी तो मां की तो कभी कोई खबर लेता नहीं था अभी एक दिन ऐसा हुआ कि वो वहां पर उद्बोधन में आकर के रात को एकदम शरत महाराज के पास में बड़ी रोते-रोते विनती करने लगा कि मां का दर्शन करना है मां के पास जाना है तो अब ये लोग बोलेंगे इस रात को आप कहां मां के पास में भेजेंगे किंतु देखा कि उसके वो जो रो रहा है इतना व्याकुल है तो मां के पास में भेजा मां ने पूछा कि क्या हुआ तो उसका लड़का ना कि किसी की बड़ी ही बीमारी हो गई थी तो वो मृत्यु के किनारे पर खड़ था तो मां ने फिर उसको आश्वासन दिया अच्छा ठीक है ठीक हो जाएगा और उसके आश्वासन देने के अलावा और क्या कर सकते हैं फिर जब वोह गया तब मां यह बात कहती है कि पहले तो कभी खबर ली नहीं है अभी उसका खुद का लड़का बीमार हो गया है इसलिए रोते-रोते आया है मेरे पास में फिर उसके बाद में दूसरी बात क्या कहती है पता है कि उसके घर की जो बहू है नफर चंद्र कोले के घर की बहू वो वही जयराम बाटी के आसपास में कहीं प रहती थी मने शादी के पहले और मां को पहचानती थी अभी वो शादी करके उसके घर में गई है उसकी बहू है तो उसी ने उसको बताया होगा कि वहां पर मां शारदा देवी है उसके पास में जाइए वो जदी कुछ कर देगी तो बय आपका लड़का बच जाएगा तो यह मतलब करके वो मां के पास में आते हैं कि घर में बीमारी है वो ठीक हो जाए ना कि जो कुछ भी उनकी समस्याएं हैं तो यहां पे भी यह स्त्री जब मां की प्रशंसा कर रही है आप तो अध्याशक्ति है जगदंबा है इमीडिएट मां नाराज हो गई क्या कहा बेरो खन थे के आमी हैन आमी तेन य सब की माने भागो यहां से मैं यह हूं मैं वो हूं ऐसा सब बोलने की क्या जरूरत है ठाकुर ने दया करके उनके श्री चरणों में स्थान दिया है बोलकर के मैं धन्य हुई हूं अभी मां भी इस तरह से कहती थी ठाकुर भी इस तरह से कि कोई गुरु करता और बाबा मुझे कहेगा तो इससे मुझे ऐसा लगता है जैसे कि मेरे शरीर में कोई कांटे चुभ हो रहा है किंतु यही मां मने वो अध्या शक्ति स्वयं नहीं होती तो जगत के जो अवतार है पूर्ण पुरुष पुरुषोत्तम वो उनकी पूजा करके उनके श्री चरणों में अपनी जपमाला अपने साधन का संपूर्ण फल क्यों अर्पित करते तो उन लोगों का जो सही स्वरूप था वो रिवल किस तरह से करते थे या तो किस कारण से करते थे कि उनके सही स्वरूप को पहचान करके उससे आशीर्वाद और प्रेरणा प्राप्त करके हम साधन भजन करें अपने जीवन को धन्य बनाए नहीं कि फिर वो उनकी प्रशंसा करके वो जैसे ब्राइब होती है ना वो लांच देना कि हां उनकी प्रशंसा कर दी तो वे लोग खुश होकर के हमारा यह हमको मुक्ति दे देंगे तो यह ईश्वर को थोड़ी ना ब्राइव कर सकते हैं ईश्वर की थोड़ी ना प्रशंसा करके उनके पास में से यह सब कर सकते हैं हां उनकी स्तुति करनी है किंतु दैट हैज टू बी जेनुइन यदि हृदय में सही में भक्ति है तो उनकी स्तुति करके लाभ होगा जुट मुठ की प्रशंसा करके मुंह पर बड़े अच्छे शब्द है हृदय में सब खाली है हृदय में विश्वास नहीं है मुंह से बोल रहे हैं तो उससे कोई लाभ नहीं होगा यह फिर एक शॉर्टकट करने जैसा हो गया कि मैं मुंह से उनकी प्रशंसा करूंगा तो लोग लोग मुझे मुक्ति दे देंगी या तो फिर इस जन्म के सब मेरे कर्म है काट देंगे तो ऐसा तो भगवान के साथ में तो होने वाला नहीं है तो यहां पे देखिए कि यह जो आनंद पर्व है उसमें ठाकुर हिंट्स तो सब देते थे किंतु वह हिंट्स को समझ कर के अपने जीवन को परिवर्तित करने वाले कितने थे तो बड़े कम लोग थे और इसके बाद में जब आत्मप्रकाश पर्व जब आया तब ठाकुर ने बड़े ये यही हिंट को और ज्यादा मने खुले देना शुरू कर दिया जैसे कि ठाकुर कहते हैं ना बाजार में मैं हांड़ी भाग करके जाऊंगा अर्थात कि भर भर बाजार के बीच में मैं ये जो ये है सीक्रेट उसको ओपन करके जाऊंगा तो वो काली पूजा के दिन की बात कि ठाकुर ने पहले तो बोल दिया सबको कि तुम लोग काली पूजा की तैयारी करना किंतु फिर इस ये इंस्ट्रक्शन देने के बाद में ठाकुर कुछ नहीं बोल रहे है अपने वो कैंसर ट्रीटमेंट के लिए आए थे वहां पर रह रहे हैं श्यामपुकुर में कुछ बोल नहीं रहे सब लोग पूछ रहे हैं कि अच्छा पुजारी कौन होगा मूर्ति कहां से आएगी किस तरह की पूजा का आयोजन करना है पूजा के भी तो विभिन्न प्रकार होते हैं डिटेल में पूजा करनी है शॉर्ट में करनी है व्हाट एवर तो ठाकुर कोई उत्तर नहीं दे रहे तो फिर इन लोगों ने सोचा कि चलो एक काम करते हैं पूजा के सब उपकरण इकट्ठा करके ठाकुर के व खाट के सामने रख देते हैं हम लोग वहां पर बैठते हैं इसके बाद में यदि ठाकुर कहेंगे कि यहां से मूर्ति ले आओ तो मूर्ति ले आएंगे कहेंगे तुम पूजा करो तो जिसको बोलेंगे वो पूजा करेगा बोलकर के सब उपकरण रख दिए हैं अभी सब लोग वहां पर बैठे हैं ठाकुर के सामने एकाएक अभी यह बात में डिस्प्यूट है कि ठाकुर को पहले समाधि हुई ना कि ठाकुर का परिवर्तन एकदम उनके चेहरे पे ना कि आया ना कि ये गिरीश घोष का पहला यह कदम था व्हाट एवर हमारा मेरा खुद का ऐसा मानना है कि गु गिरीश घोष के मन में यह पहला आया था कि हां ये ठाकुर स्वयं काली है और उन्हीं की पूजा करनी चाहिए काली पूजा को तो वो फूल देकर के ठाकुर के चरणों में अर्पित किए और स्तव स्तुति करने लगा जैसे ही ये फूल अर्पित किए इन अ फ्लेश इंस्टेंट जैसे कि ठाकुर के चेहरे का शरीर का भाव का परिवर्तन हुआ उच्च समाधि में चले गए आध्यात्मिक भाव फैलना शुरू हुआ वहां पे जितने भी भक्त उपस्थित थे सबके हृदय में किसी ना किसी तरह की आध्यात्मिक अनुभूति हुई कोई पागल की तरह चिल्ला रहा है कोई स्तव स्तुति कर रहा है क्या-क्या सब हो रहा है तो वो जो इन अ फ्लेश जैसे कि ठाकुर ने अपना सही स्वरूप रिवल किया तो दैट वाज इन आत्मप्रकाश पर्व कि उनका सही स्वरूप क्या है वह सबके सामने वह बता कर के जाते हैं और जिसका कि अल्टीमेट कल्मिनेशन वह कल्पतरु के दिन में हुआ था तो यह जो सब अवस्थाओं का वर्णन ठाकुर कर रहे हैं तो मास्टर महाशय बिल्कुल पहले से ही किंतु उनका आईडिया क्लियर है कि हां ठाकुर जब चैतन्य देव की इन सब अवस्थाओं का वर्णन करते हैं उसका अर्थ है कि व ही इज ड्रॉइंग ए पैरेलल ऑफ हिम विथ चैतन्य न देव चैतन्य देव के साथ में अपनी अवस्था का एक वो इस तरह से बता रहे हैं कि देखो चैतन्य देव का ऐसा ऐसा होता था पहले बाह्य दशा अर्ध बाह्य दशा फिर अंतर दशा अभी जिसकी आंखें है जिसमें थोड़ी सी भी अकल है वे लोग समझ जाएंगे कि अरे ठाकुर की भी तो यही दशाएं हो रही है अर्थात कि चैतन्य चैतन्य को आप जद अवतार मानते हैं तो क्या ठाकुर भी अवतार है यह प्रश्न होना चाहिए अभी यह एक प्रश्न है कि मास्टर महाशय जो कथामृत लिखते हैं तो यह जो उनके मन का यह जो विचार है कि क्या ठाकुर स्वयं अवतार है चैतन्य देव के साथ में अपनी अवस्थाओं को मैच करा रहे हैं तो ठाकुर भी क्या चैतन्य देव जैसे ही है यह विचार उनके मन में कब आया उसी समय आया था जबक यह प्रसंग चल रहा था ना कि यह प्रसंग को समाप्त होने के 30 साल ना 20 साल के बाद में जब मास्टर महाशय कथामृत लिख रहे थे उस समय उनके मन में यह विचार आया था कि हां उस समय जब ठाकुर यह तीन अवस्था का वर्णन कर रहे थे तो वो क्या अपने खुद के साथ में पैरेलल ड्र कर रहे थे क्या तो ये एक सोचने वाली बात है अ कि यह विचार उनके मन में कब आया था यदि उसी समय आया होता तो वह तो सच में बड़ा धन्यता की बात है बड़ी अच्छी बात है कि उसी समय मास्ट महाशय ने ठाकुर को समझ लिया था तो वी डू नॉट नो मुझे ऐसा नहीं लगता कि मास्टर महाशय हमारे साथ में कोई छल करेंगे या झूठ मूठ की बातें करेंगे जो उनके मन में नहीं है वो हमको बताने का प्रयास करेंगे मुझे ऐसा नहीं लग रहा है तो मेरा अभी यहां पर यही अनुमान है कि उसी समय मास्टर महाशय ने यह सोचा होगा कि हां यह चैतन्य देव के साथ में ठाकुर की अवस्था का बिल्कुल परफेक्ट मैचिंग चल रहा है श्री राम कृष्ण आगे कहते हैं चैतन्य भक्ति अवतार जीव के भक्ति सिखाते ऐसे छिले चैतन्य देव भक्ति के अवतार थे जीव को अर्थात कि हम आम आदमियों को भक्ति खाने के लिए आए थे तार ऊपर भक्ति होलो तो सबई होलो हठ जोगर किछु दरकार नाई ईश्वर के ऊपर में भक्ति हुई तो सब हो गया हठ योग्य की कोई जरूरत नहीं है वही आत्मप्रकाश पर्व में ठाकुर ने कहा था कि तुम लोगों को सिर्फ इतना ही जानने की जरूरत है कि मैं कौन हूं और मेरे साथ में तुम लोगों का क्या संपर्क है यदि यह दो चीजें जान लोगे तो फिर बहुत ज्यादा साधन भजन करने की कोई आवश्यकता नहीं तो देखिए कि यहां पर वही बात जो कि आत्मप्रकाश पर्व में खुलेआम ठाकुर ने कहना शुरू कर दी थी यहां पर ठाकुर इंगित के रूप में इशारों के रूप में कह रहे हैं कि चैतन्य देव भक्ति के अवतार थे वो भक्ति जद हो गई तो हठ योग्य की दरकार नहीं अर्थात की ये आपको वो बहुत ज्यादा शरीर को कष्ट करके तपस्या करके साधन भजन करके ईश्वर प्राप्ति की जरूरत नहीं चैतन्य देव का क्या स्वरूप था और चैतन्य देव के साथ में आपका क्या संपर्क है इतना जानने से ही आपका काम हो जाएगा तो सेम चीज ठाकुर यहां पर बाद में अपने बारे में कहेंगे वही है कि आनंद पर्व में उन्होंने इस तरह से सब इशारों इशारों में कहा था और आत्मप्रकाश पर्व में उन्होंने खुलेआम कहना शुरू किया था अच्छा अभी आज यहीं तक इसके बाद का कथामृत के नेक्स्ट क्लास में देखेंगे ओ शांति शांति शांति हरि ओम तसत श्री राम कृष्णर्पण
प्रश्न : रिट्रीट और भक्त सम्मेलन में फर्क क्या है
मस्तु किस तरह से उसको ऑर्गेनाइज करते हैं उसके ऊपर है मैं जद कहूंगा कि यदि आपको ठीक ठीक रिट्रीट करना है ना तो आपको एक एकांत में बैठ कर के साधना करने की फैसिलिटी होनी चाहिए बहुत बार यह कॉन्फ्रेंस वगैरह में क्या होता है कि आपको इतने सारे लोगों के साथ में गप लगा के ही आपका टाइम चला जाता है तो सही सही जो ठाकुर ने कहा मने वने और कोण इन तीन जगह पर जाकर जब ध्यान करना है तो ठीक ठीक रिट्रीट वही होगी जैसे ये मास्टर महाशय के जो दक्षिणेश्वर के दिनों में हम पढ़ेंगे व वहां पर पंचवटी में बैठे जब ध्यान कर रहे हैं कभी वह बेलतला में बैठे हैं कभी वह पंचवटी के नीचे वह कुटिया जहां पर ठाकुर को निर्विकल्प समाधि प्रथम प्राप्त हुई थी तो इस तरह से एकांत और साधन भजन करने की फैसिलिटी होनी चाहिए तभी वह ठीक ठीक रिट्रीट होगी देखु उखाने की हो हम तो जानी ना किंतु रिट्रीट माने ठाकुर ठाकुर जिस तरह से रिट्रीट का बताते हैं मन में वन में और कोने में वहां पर आपको एकांत होना चाहिए साधन भजन करने की फैसिलिटी होनी चाहिए क्लास वगैरह हो जैसे मैं ये ज्ञान सत्र में ज्ञान सत्र में जैसे ही हम लोग अपने आश्रम में वापस आ गए मैं किसी के साथ बात नहीं करता था वह दिन भर इतना सब कुछ सीखा है तो फिर मैं क्या करता था वहां पास में ही एक नील गंगा बोल के हैं गंगा की ही एक ट्रिब्यूटरी है उसका और वहां पर इतना सुंदर जगह है इतना वीरान और विशाल पट है गंगा का और सामने में वो पहाड़ वगैरह है तो मैं अकेला वहां पर जाकर बैठा रहता था फिर वहां प क्या होता था चाय का एक लारी था तो मुझे चाय पीने की बड़ी हैबिट है तो वहां से मैं दो-तीन कप चाय लेकर के वो फिर वहां गंगा के किनारे चला जाता था और वहां पर बैठे-बैठे वो चाय पीता रहूंगा और बस बैठा रहूंगा ऐसा नहीं कि जब ध्यान करना ऐसा कुछ किंतु वो जो एकांत जगह है वहां पर अपना मन ऑटोमेटिक अंतर्मुखी फिर ये सब ज्ञान सत्र सुन कर के आए हैं वह सब मन के भीतर में चलता रहता है साथ-साथ में चाय पी रहे हैं वो जो आनंद था दैट वाज यूनिक तो ऐसा होना चाहिए जब भी आप रिट्रीट करते हैं या कॉन्फ्रेंस में जाते हैं उसके बाद में ना थोड़ा समय एकांत में बिताए इवन अपने क्लास के बाद में भी यदि हो सके 15-20 मिनट बैठ कर के यह सब चीजों के बारे में सोचिए क्योंकि इससे क्या होगा कि ये धारणा दृढ़ होगी या बेटर डाइजेशन होगा भीतर में और डीप में जाएगा कि हमने क्या ठाकुर महा स्वामी जी के बारे में सुना पढ़ा सोचा सो दैट इज वन सजेशन देखिए मैं आरती के बाद में ना आश्रम में जब आरती होती है फिर मैं क्या ऑब्जर्व करता हूं कुछ-कुछ डिवोटा मंदिर में से बाहर आकर के मने ग्रुप में बैठ कर के गप लगाना शुरू करते हैं और कुछ डिवोटा है एकदम अकेले चले जाएंगे भले आश्रम में रहेंगे तो आरती होने के बाद में संध्या आरती के बाद में यह खंडन वगैरह पूरा होने के बाद में वहीं पर बैठे रहेंगे मंदिर में थोड़ा सा जब ध्यान करने का प्रयास करेंगे या तो फिर सीधा घर चले जाएंगे अकेले में रहेंगे तो यह दोनों बिहेवियर आपको दिखेगा अभी यह गप लगाना कोई बुरा नहीं है आध्यात्मिक सत्संग भी अच्छी बात है किंतु जस्ट आप थोड़ा सा देख दोनों ट्राई करके देख लीजिए संध्या आरती समाप्त होती है खंडन वगैरह आपने सुना भजन भजन सुना उसके बाद में थोड़ा सा समय अकेले बिताए देखिए कि वह जो आनंद होगा ना वह एक यूनिक होगा यह जो आपने कहा ना कि हमारे यहां पर
प्रश्न: रामकृष्ण मिशन में हृदय परिवर्तन पर बहुत भार दिया जाता हैं। अन्य संगठनों में दूसरों को कन्वर्ट करने पर अधिक ध्यान केंद्रित करते हैं।
प्रोपेगेशन की वजह लाइफ ट्रांसफॉर्मेशन तो सबसे बड़े सबसे फेमस उदाहरण है शशि महाराज और शरद महाराज दोनों कजीन थे पता नहीं है कि ठाकुर के पास में जा रहे हैं वहीं पे पहले पता चला एक दूसरे को देख के अरे ये भी यहां पे आ रहा है और फिर दोनों ने मने दोनों ने फिर संघ में कितना बड़ा योगदान दिया स्वामी जी ने सबको अद्वैत नाम दिए हैं किंतु इन दोनों को शारदानंद और राम कृष्णानंद यह नाम दिए और दोनों ने कितना बड़ा काम किया मने लोगों को कन्वर्ट करने में क्षमता नहीं थी ऐसा नहीं था वह पूरा साउथ कन्वर्ट कर दिया यहां पर पूरा जनरल सेक्रेटरी पूरे ऑर्डर को चला रहे है किंतु जब जा रहे थे अपने कजिन को भी नहीं बताते कि मैं जा रहा हूं मने आप आज की बात कर रहे उसी समय
प्रश्न: कभी-कभी हमें लगता है कि दूसरों की तुलना में रामकृष्ण मिशन में अधिक भक्त नहीं आते हैं?
ठाकुर ने कहा कि यह लाटू काउंट कर रहा है कि ब्रह्मो समाज में इतनी घोड़ा गाड़ी खड़ी है अपने यहां पर इतनी खड़ी है आज ब्रह्मो समाज के बारे में लोगों को इसलिए पता है क्योंकि हमारे लिटरेचर में उसका नाम है यह
प्रश्न: गिरीश घोष की भक्ति के बारे में?
शरत महाराज इस तरह से कहते हैं कि यह इतना इन फ्लेश हो गया कि कोई बता नहीं पाता है कि एक्जेक्टली पहले क्या हुआ गिरीश ने देखा ठाकुर को समाधि में जाते हुए कि गिरीश ने जो पुष्पा आर् प्रण किए उससे ठाकुर समाधि में गए इट हैपन इन सच फ्लेश की डिफिकल्ट टू डिटरमाइंड किंतु फिर हम लोगों की थिरी बड़ी क्लियर है कि भाई गिरीश के पुष्पा प्रण की वजह से ही ऐसा हुआ होगा माने यह पूरा ठाकुर का चाल ही था एक तरह से कि सब ये पूरा मैंने बना करके रखा था फ्रेमवर्क कि कोई ना इसमें क्या है ना कि ये देखिए कि ठाकुर भी ना यह सब इनको रिवल होने देते हैं कि आपका क्या चरित्र है आप बताइए क्योंकि ठाकुर की जैसे आपने कहा ना कि हम लोग जोर जबरदस्ती कन्वर्ट नहीं करते ठाकुर भी नहीं करते थे ठाकुर हिंट दे देते थे कि हां हां यह चैतन्य देव की ऐसी अवस्था होती थी अभी आपकी अकल है तो समझ लीजिए कि ठाकुर की भी वही अवस्था हो रही है और नहीं है तो नहीं समझिए ठाकुर डजन ठाकुर को ये मैटर नहीं करता ठाकुर हिंट दे देते थे फिर ही विल लेट अस एक्सप्लोर स्वामी जी का पूरा जीवन देखिए कि स्वामी जी को हिंट बहुत सारी दे दी है बट स्वामी जी हैड टू जर्नी ऑफ सेल्फ डिस्कवरी जिसको कहते हैं ना कि वोह स्वामी जी को पूरा करना पड़ा था यह जो ठाकुर वुड लेट अस एक्सप्लोर कि आप लोग देखिए कि किस तरह से आप जाएंगे सो दैट इज समथिंग ये जो आप कह रहे हैं कि जबरदस्ती नहीं करना बिगिन वि ठाकुर हिमसेल्फ आत्मा प्रकाश पर्व में भी आनंद पर्व में भी इनफ हिंट दी हुई है किंतु फिर हमको देखना है कि हम उस हिंट को किस तरह से मैनेज करते हैं और फिर जद कोई पकड़ लेगा तो बोलेंगे साला धरे फले से मैंने साले ने पकड़ लिया मुझे ना यहां पर भी देखिए कि अभी यही
प्रश्न: यह कहने के बजाय कि मैंने यह देखा है, ठाकुर कहते हैं कि माँ काली ने मुझे यह दिखाया है।
कांसेप्ट है ना अभी आप जगदंबा को भी अप्लाई कर सकते हैं कि किसी को जोर जबरदस्ती कन्वर्ट नहीं कर वो हिंट दे देती है कि ये ये साधन पद्धतियां है अभी लेट अस सी कि कौन कितना करता है जो जितना जाएगा मां उसको इतना वो हेल्प करेगी मैंने आप पांच डग आप आगे जाइए फाइव स्टेप तो मां भी आपके सामने पांच स्टेप चलके आएगी सो इट सीम्स लाइक की मां भी ऐसा कोई फेवरेटिज्म नहीं करती आपके संस्कार के अनुसार आप जितना जाएंगे उतना फिर आपको सपोर्ट करती जाएगी ना उसका रीजन क्या है कि वो चाहते
प्रश्न: एक ओर ठाकुर कहते हैं कि मुझे यह पसंद नहीं कि लोग मुझे गुरु कहें, दूसरी ओर वे कहते हैं कि जो राम और कृष्ण थे, वे आज रामकृष्ण हैं। इन दोनों में सामंजस्य कैसे स्थापित किया जाए?
नहीं थी कि लोग झूठ मूट के यहां पर इकट्ठा हो ठाकुर ने कहा ना अभी चमत्कार जद यहां पर अभी जैसे कि साधन भजन करते करते ठाकुर के वर्ण का रूप रंग जो है और रूप जो है बड़ा खिल उठा था अभी ये कामर पुकुर जा रहे हैं और स्नान करने के लिए वो गमछा पहन कर के सिर्फ तो सब स्त्रियां पुरुष बच्चे खड़े हो गए उनका रूप देखने के लिए तो ठाकुर ने हृदय को कहा कि तुम जल्दी से एक कपड़ा लाओ मेरा चेहरा ढक दो वरना मैं यहीं पर नंगा होता हूं तो हम खानी नांग हो तो वो हृदय बोलता है ना ना बाबा ने मामा एक खाने टा हो ना यहां पे नंगे मत होइए लोग वरना फिर स्त्रियां भग जाएगी ना वो तो नेचुरल है कि स्त्रियों को भगाने के लिए क्या करोगे तो फिर हृदय ने लाकर के एक वस्त्र से उनका चेहरा ढक दिया तब कहीं जाकर वो स्नान करने को जाते हैं सो फिर ठाकुर ने कहा कि अमी य देह के चापड़ा पड़े मैंने इसको मार मार करके मैंने बार-बार कहा यह जो रूप है भीतर में चला जा भीतर में चला जा तो कहीं जाकर के अभी वो बाहर से कुछ नहीं दिखता है तो ठाकुर क्या कहते ऐसा यदि होता ना यहां पर ताल डिस्पेंसरी जैसा कुछ हो जाता है यहां पर लोग वो दवाई लेने के लिए रोग भगाने के लिए इकट्ठा हो जाते वो तो ठाकुर चाहते नहीं थे ठाकुर चाहते हैं कि हम लोग साधन भजन करें तो अब यह किस तरह से एक इस एक फाइन बैलेंस मेंटेन करना है ना इतना रिवील करना है कि जैसे साधन भजन करने में हमको प्रेरणा मिले अभी कुछ नहीं मिलने वाला है बोलक के जद कौन साधन भजन करेगा कौन ब्रह्मचार्य का पालन करेगा कौन ऐसा मूर्ख है किंतु ऐसे कुछ हिंट दे देना है कि आप ब्र बर्य का पालन कीजिए आज नहीं ना कल कल नहीं ना परसों 10 साल 20 साल 10 जन्म 15 जन्म 100 जन्म हज जन्म बाद में कुछ मिलेगा तो एक पेशेंस मेंटेन करना है वो पेशेंस तो तभी मेंटेन होगा ना कि जबकि हमको कुछ भरोसा है कि कुछ मिलने वाला है जैसे अपने ऑर्डर में ना बहुत बार ऐसा आपने देखा होगा कि जो पहली बार जो आता है ना उसको कुछ अनुभूति हो गई उसके बाद में फिर अभी साधन भजन करो अभी ये अनुभूति लॉक हो गई है अभी आपको साधन भजन करने से खुलेगी अनलक होगी तो यह पहली ही अनुभूति कृपा के माध्यम से यदि हमारे पास में नहीं आएगी तो कौन साधन भजन करके इस आशा में कि आखिर में यह हमारी खुद की मेहनत से अनलॉक होगी यह भगवान बुद्ध का भी जब यंग थे तो एक अनुभूति हुई थी फिर जब वोह एडल्ट हुए देखा कि यह सब वो डेड बॉडी देखा वगैरह तो उनको याद आया कि हां वो मुझे एक अनुभूति हुई थी लेट मी ट्राई टू हैव इट इन परमानेंट बेसिस देन ही विल स्टार्ट डूइंग तपस्या मने इतना रिवील करना है इतनी अनुभूति देनी है कि जिससे कि वह हमको एक टेस्ट लग जाए कि हां यह चाहिए अभी इतना भी रिवील नहीं कर देना है कि हम यह भरोसे बैठे रहे कि उनके पास में आ गए तो सब हो जाएगा खुद को साधन भजन करने की जरूरत नहीं स्वामी जी का फेमस है ठाकुर ने कहा यह तुम्हारी निर्विकल्प समाधि अभी चाला लगा दिया है चाबी मेरे पास में है यानी देखिए कि ठाकुर के भक्तों में किस तरह से डिवीजन होता है पहले तो बहिरंग अंतरंग हो गए अंतरंग यानी कि उनके ऊपर में संपूर्ण भरोसा है उनको कैंसर भी हो ग गया तब भी छोड़ने वाले नहीं तो वह एक अंतरंग हो गए अंतरंग में फिर त्यागी गृहस्थ त्यागी यानी कि पूरा से भले ही चाहे उन पर पूरा भरोसा है किंतु सेल्फ एफर्ट लगाना है और वह गृहस्थ है कि भरोसा पूरा है किंतु अभी सेल्फ एपर्ट लगाने की क्षमता इतनी नहीं या टेंडेंसी नहीं है हा मने रामचंद्र दत्त तो कम नहीं थे ना वो तो एकदम कथामृत में जो वर्णन आता है जहां कहीं पर भी उत्सव होगा ठाकुर को बुला कर के आयोजन तो रामचंद्र को ही करना है उनको यह लोग कांट्रैक्ट दे देते सुपारी दे देते थे आप कीजिए आयोजन पैसा हम दे देंगे देखिए कि यहां पर
प्रश्न: पंचकोश को शुद्ध कैसे करें?
जो ठाकुर के कथामृत का जो पाठ कर रहे हैं या तो फिर यह मां स्वामी जी के जो प्रसंग का पाठ है व वोह हमको बहुत आगे तक ले जाएगा कि यह पाठ करके उसका बारे में सोच करके स्मरण करके हमारी चित्त शुद्धि होना शुरू हो जाएगा उसके बाद में यदि अपने पास में क्षमता है तो फिर यह मंत्र दिक्षा लेकर के नियमित रूप से जप करना चाहिए और फिर और भी बहुत कुछ है कर्म योग ज्ञान योग भक्ति योग राज योग वगैरह जो अपने चार योगों का संयम यह है कॉमिनेशन किंतु यह दो चीज यदि हम करेंगे कि अपने साहित्य का नियमित रूप से पाठ कीजिए और फिर यह मंत्र दीक्षा लेकर नियमित रूप से जप कीजिए तो उसमें बहुत कुछ हमारा हो जाए जाएगा य पंचकोष शुद्धि जो आप कहते हैं इससे हो
प्रश्न: ठाकुर आध्यात्मिक विचारों को बहुत आसान भाषा में समझाते हैं। स्वामीजी बौद्धिक भाषा का उपयोग करके समझाते हैं। यही कारण है कि बौद्धिक लोग स्वामीजी को पढ़ना पसंद करते हैं और ठाकुर की प्रतिभा समझ नहीं पाते।
जाएगी किंतु डॉक्टर सरकार यह भी कहते हैं जब ठाकुर के साथ में आर्गुमेंट करते हैं तो ठाकुर पूछते हैं कि तो फिर तुम यहां पर क्यों आते हो तो डॉक्टर सरकार कहते हैं कि आपको समझ में नहीं आता मैं घंटों के भर घंटों यहां पर बैठा रहता हूं मेरा बिजनेस वहां पर सफर हो रहा है मैं पेशेंट को विजिट करने के लिए नहीं जा पा रहा हूं दूसरे दिन जाना पड़ता है फिर जब सामने से जाऊंगा तो पैसा मैं कैसे लूंगा तो यहां पर मुझे एक्चुअल नुकसान हो रहा है व मैं आठ घंटे यहां पर बैठकर आपके साथ बात कर रहा हूं आपको समझ में नहीं आता मेरे मन की क्या भाव है ये लोग इंटेलेक्चुअली कन्वेंस नहीं होते होंगे किंतु ये जो भाव के राज्य में ठाकुर सबको कैप्चर कर लेते हैं उसमें कोई प्रश्न नहीं हां फिर हृदय खुद जब बंद हो आपका तो फिर कोई कुछ नहीं कर सकता व माने बुद्धि ही बंद हो वो बात नहीं हृदय भी बंद होना चाहिए व्हिच इज वेरी स्ट्रेंज कि विद्यासागर के भीतर में इतनी दया थी लोगों के प्रति और नरेंद्र खुद उनकी प्रशंसा करता है तो ठाकुर की महत्ता क्यों नहीं समझ पाए व्हिच इज वेरी स्ट्रेंज बट व्हाट एवर मतलब हमारे लेवल पे तो बहुत सारे लोगों को देखिए कि ठाकुर ने जैसे प्रेम के बंधन में ही बांध दिया था ये निवेदिता का देखिए निवेदिता वाज हाईली इंटेलेक्चुअल और स्वामी जी के साथ में डिबेट भी बहुत करती थी किंतु जब मां के पास में आती है तो बिल्कुल वो बच्ची की तरह वो बिहेव करना शुरू कर देती है तो इफ यू आर ए गुड साधक यू विल हैव बोथ मने इंटेलेक्चुअल एस्पेक्ट भी आपने होगा और यह हार्ट भी आपका बड़ा वाट होगा जोक हार्ट अंडरस्टैंड्स द लैंग्वेज ऑफ हार्ट जद आप लैंग्वेज ऑफ हार्ट नहीं समझेंगे तो आप आध्यात्मिक जीवन में सिर्फ बेस्ड ऑन इंटेलेक्ट बहुत ज्यादा आगे नहीं जा पाएंगे यह स्वामी जी अमेरिका गए तो इनिशियली तो सबको इंटेलेक्चुअली ही उन्होंने अट्रैक्ट किया है किंतु बाद बाद में जैसे यह मिसेस हेंस ब्रो ये मिड सिस्टर उसकी जो मिसेस हेंस ब्रो थी तो वह कहती है कि मुझे अलास्का कुछ समय जाने के लिए हुआ एक आना इस तरह का एक अपॉर्चुनिटी आया या तो फिर इस तरह का सिचुएशन आया अभी अलास्का यानी वो जद आपने देखा होगा वो पूरा एक बर्फीला जगत है वहां पर पॉपुलेशन जैसा कुछ नहीं है पूरा एक मने इस डेजर्ट ऑफ स्नो तो वहां पर वो कहती है कि स्वामी जी की किताब लेकर गई और इतना अच्छा लगा स्वामी जी का वो पढ़ कर के एंड व्हेन शी रिटर्न तो पता चला कि स्वामी जी हैज अगेन रिटर्न टू अमेरिका एंड ही इज स्पीकिंग इन लॉस एंजलिस तो ये लोग गए मिलने के लिए तो अभी जब स्वामी जी को सुन रहे हैं किताब पढ़ रहे हैं राजयोग वगैरह श प्योर इंटेलेक्चुअल लेवल पर है किंतु फिर उसने कहा कि आप हमारे घर आक रहिए और स्वामी जी उनके घर जाकर रहते हैं आफ्टर वर्ड शी राइट्स हर रेमसंस वो पूरा एकदम हृदय का संपर्क है जैसे कि स्वामी जी दिन में किस तरह से क्या करते हैं क्या खाते हैं क्या कपड़े पहनते हैं क्या गप लगाते हैं वो पूरा इस तरह का वर्णन है बाद में ये इंटेलेक्चुअल वर्णन कहीं पर नहीं आता कि स्वामी जी का यह आईडिया मैंने सुना यह आईडिया अच्छा लगा वो है ही नहीं कहीं पे इंटेलेक्चुअली लोगों को अट्रैक्ट करते हैं किंतु यदि लाइफ ट्रांसफॉर्म होना है तो हार्ट अंडर लैंग्वेज ऑफ हार्ट हैज टू बी अंडरस्टूड
प्रश्न: आखिर में शंकराचार्य ने भी भक्ति गीत लिखे थे
शंकराचार्य के बारे में कहना थोड़ा मुश्किल है क्योंकि अभी बहुत सारे लोग कहते हैं कि यह जो भाष्य है उपनिषद का ब्रह्मसूत्र का वो आदि शंकराचार्य ने इतना ही लिखा है फिर आनंद लरी है चरपट पंजरी का स्तोत्र है वो लिखने वाले दूसरे लोग है सो मने बाकी के आचार्य है जो कि शंकरा र्य की पीठ पर बैठे हैं सो डिफिकल्ट टू से एनीथिंग किंतु हिंदू धर्म में इस तरह का स्प्लिट नहीं है यह जैसे हमने कल कल परसों डिस्कस किया था ना कि ये आदि अपना जो वैदिक युग है उसमें यह स्प्लिट नहीं था जन साधारण का धर्म और एलिट लोगों का धर्म जो कि इंटेंस साधना करते हैं वो एक स्मूथ ट्रांजिशन था कभी आप इस मूड में है कभी इस मूड में है कभी इस साधना के वो एलिजिबल है कभी इस साधना के और रामकृष्ण विवेकानंद लिटरेचर में आपको ये स्मूथ सेलिंग मिलेगा फ्रॉम वन स्पेक्ट्रम वन एंड ऑफ द स्पेक्ट्रम अब सेकंड एंड ऑफ द स्पेक्ट्रम इजली जा सकते हैं किंतु वो जो ध्व अद्वैत का वो जो स्प्लिट था शंकराचार्य इस तरह की बात करते हैं व रामानुजाचार्य मधुवा चार्य इस तरह की बातें करते हैं सो बेस्ड ऑन दैट स्प्लिट मुझे पर्सनली ऐसा लगता है कि इस डाउटफुल कि शंकराचार्य ने स्वयं उन सब स्त्रों की रचना की हो वी डू नॉट नो बट दैट इज व्हाट आई अदर वाइज वो इस तरह का एकदम हार्डकोर वेदांत या हार्डकोर ज्ञान योग इस तरह की बातें क्यों करते ऐसा क्यों स्पष्ट नहीं कहते कि भक्ति इट सेल्फ इज मींस ऑफ मने सेम वही आप ब्रह्मण तक भक्ति भी ले जाएगी जो कि आपको ज्ञान ले जाता है
प्रश्न: हो सकता है कि व्यक्तिगत स्तर पर शंकराचार्य ज्ञानी भी थे और भक्त भी
माने बाद बाद में जो डेवलप हुआ है उसके साथ में वो मैच नहीं होता अभी जैसे बुद्ध भगवान बुद्ध का ही देखिए ना बुद्ध ने ऐसा कहां कहा कि भगवान नहीं है आत्मन नहीं है किंतु बात का जो बुद्धिज्म जिस तरह से डेवलप हुआ है दे हैव रिजेक्टेड बोथ परमात्मा और आत्मा दोनों को रिजेक्ट कर दिया है तो तो अभी प्रश्न होगा कि यह रिजेक्शन क्या बुद्ध ने खुद ने किया था आप हजार मैंने रैंडम उदाहरण दे दीजिए कि ना यहां पर तो भगवान बुद्ध ने ऐसा नहीं कहा वहां तो नहीं कहा बट हु नोज अल्टीमेटली बाद में इस तरह का इतना एक्सट्रीम डेवलपमेंट क्यों हो गया अपने अभेदानंद जी ही अभेदानंद जी आखिर आखिर तक कहते हैं ना मैं तो बेलूरमठ का ही पार्ट हूं बेलूरमठ में तो वो ट्रस्टी भी थे आखिर तक वो बेलूरमठ में ही मेरी चिता भी जलेगी किंतु द डे ही डाइड उनके डिसाइल ने जाकर काशीपुर में उनको अग्नि द दे दिया तो नाउ हु कैन से कि यह उनकी इच्छा कहां तक थी और उनके डिसाइल की इच्छा कहां तक थी विज्ञान महाराज के साथ में तो ऐसा नहीं हुआ अपने अखंडानंद जी के साथ में तो ऐसा नहीं हुआ सारगामा ज्यादातर जीवन उन्होंने बिताया कहां उनके डिसाइल ने ले जाकर के काशीपुर तो उनकी चिता नहीं जला दी ऐसा तो हुआ नहीं सो अभी ये जैसे ये गिरीश घोष का ना गिरीश घोष ने प्रथम पुष्पांजलि दी कि ठाकुर को पहले समाधि हु हुई ना आजकल के वो जो रेस होती है ओलंपिक वगैरह की रेस वह फिनिशिंग लाइन प वो जो एकदम स्लो स्पीड वाला कैमरा रखते हैं क्योंकि वो स्प्लिट सेकंड में वो दो-तीन एथलेट पहुंच जाते हैं तो उसी स्लो स्पीड से देखने से पता चलता है किसने पहले फिनिशिंग लाइन क्रॉस की अदर वाइज