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Sri Ramakrishna Kathamrita ·

श्रीरामकृष्ण कथामृत || 15 Dec 1883 - श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ दक्षिणेश्वर में || 28 Aug 2025

प्रार्थना

ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिने अवतार वरिष्ठाय रामकृष्णायते नमः श्री श्री रामकृष्ण कथामृत श्रीमद् द्वारा लिपिबद्ध कल हमारा जो डिस्कशन हुआ कर्म योग वगैरह को लेकर के अभी आज

दक्षिणेश्वर में, एकांत की नीरवता में, अपने निकट शिष्य के साथ श्रीरामकृष्ण का दैनिक जीवन

उसी इसी दिन की घटना थोड़ी सी आगे बढ़ती है। सुबह के 10:00 बजे थे। सुबह को 10:00 बजे ठाकुर मंदिर में प्रणाम करके वो वापस आए थे। काली घर से प्रणाम करके अभी वैष्णव चरण कीर्तन्या आशिया छन वैष्णव चरण कीर्तन करने वाला आया है। तनी सुबोल मिलन कीर्तन सुनाई लेन उन्होंने सुबोल मिलन कीर्तन सुनाया। किियत खण पर श्रीजू तो रामलाल थालाई कोरिया ठाकुर जोनो प्रसाद अन्यादिन कुछ समय के बाद में श्रीजू तो रामलाल रामलाल थे ठाकुर के नेफ्यू उनके बड़े भाई थे उनके पुत्र उन्होंने एक थाले में करके ठाकुर के लिए प्रसाद लेकर के आए शेबार पोर ठाकुर किंचित विश्राम कर ले थोड़ा सा नाश्ता करने के बाद में प्रसाद ग्रहण करने के बाद में ठाकुर ने थोड़ा विश्राम किया। रात्रे मणि नबते शयन को लेन रात को मणि अर्थात कि मास्टर महाशय ने नौबत में शयन किया। देखिए ऑलरेडी हमने डिस्कस किया था कि ठाकुर ने मास्टर महाशय को कहा था कि वहां पंचवटी के नीचे जो कुटिया है वहां पर रहना। तो उस दिन रात को मणि अर्थात मास्टर महाशय उस कुटिया में गए तो थे किंतु देखा कि ठाकुर का अन्य एक संतान अन्य एक भक्त वहां पर कहां हो दादा मधुसूदन ऐसा करके पुकार रहा था तो मणि चुपचाप इसको देख रहे थे अभी इसके बाद में किंतु मास्टर महाशय कुटिया में नहीं रह के पंचवटी वाली यहीं नहबत में ही रहे और हमने यह भी डिस्कस डिस्कस किया था कि यदि मेरे पास में ऐसा चॉइस होता कि भले ही चाहे ठाकुर कहे कि तुम पंचवटी की कुटिया में रहो मैं तो ठाकुर की आज्ञा का उल्लंघन करके वहीं नहबत में ही रहता यदि रहने का चांस मिलता तो क्यों क्योंकि श्री मां जखन दक्षिणेश्वर मंदिर ठाकुर सेजन आशीतेन तखन ए नबते बास करते श्री मां मां जब दक्षिणेश्वर मंदिर में ठाकुर की सेवा के लिए आगमन करती तब इसी नहबत में ही निवास करती और मां का जीवन पढ़कर के हमने तो देखा है कि किस तरह से मां की तपस्या मां का जो तप है मां का जो एक आध्यात्मिक तन मात्राएं हैं किस तरह से इस नहबत में फैली हुई है। तो मुझे लगता है कि नहबत में रहना यदि हमारे नसीब में होता तो वही जय राम बाटी में रहने का जो पुण्य हमको प्राप्त होता वही पुण्य हमको नहबत में रहकर के भी प्राप्त होता कई एक मास होइलो त कामार पुकुरे शुभगमन करिया छे कुछ महीने हुए हैं उन्होंने कामार पुकुर पदार्पण किए हैं दक्षिणेश्वर से कामार पुकुर की यात्रा की है और इस तरह से मां क्यों आना जाना करती थी इसके बारे में भी हमने देखा था इसके बारे में भी हमने सोचा था रीजन यही है क्योंकि दक्षिणेश्वर में जो गंगा की हवा है उसकी वजह से एक तो उनको कभी-कभी डजेंटरी हो जाती थी और कभी जयराम बाटी जाती तो वहां पर खाने का तकलीफ है तो बेचारी कभी जयराम बाटी कभी कामर पुकुर कभी यहां दक्षिणेश्वर इस तरह से सतत मां को यात्रा करती रहनी पड़ती थी। ऊपर में से भी ठाकुर का भी पागलापन कम नहीं है। हे बृहस्पतिवार बारबेलाई यात्रा क्यों की है? अशुभ मुहूर्त में यात्रा क्यों की है? ऐसा कह के मां को कहते हैं कि यात्रा बदल करके आओ वगैरह-वगैरह तो ठाकुर का था ही था। तो इसीलिए मां कभी दक्षिणेश्वर में कभी जयराम बाटी में तो कभी कामारपुर में। अच्छा यह पॉइंट वैसे तो आज का दिन यहां पे समझ समाप्त हो जाता है। 15th दिसंबर इसके बाद में प्रारंभ होता है 16th दिसंबर नेक्स्ट डे। किंतु यहां पर जैसे हमने ऑलरेडी डिस्कस किया कि ठाकुर का इस तरह का जीवन हमको देखने को मिलता है कि उस समय और कोई भक्त वगैरह ठाकुर के साथ में नहीं रहते थे। जनरली क्या होता था कि छुट्टी के दिन सभी को आने का अवसर मिलता था। तो भले ही चाहे मास्टर महाशय हो यह अधर सेन हो ना कि यह बलराम बाबू हो ना कि यह रामबाबू सुरेश बाबू जितने भी ठाकुर के भक्त थे रविवार के दिन ही संडे को ही उनको ज्यादा अवसर प्राप्त होता था ठाकुर के दर्शन करने का। तो उस समय वीक डेज जिसको हम कहते हैं अन्य दिन सोम से शुक्र या शनि ठाकुर के पास में ज्यादा भक्त नहीं आते थे और इसीलिए ठाकुर कभी-कभी क्या करते थे कि अपने ये जो त्यागी संतान है उनको अन्य दिन आने को कहते थे संडे को छोड़कर के संडे भले आए किंतु अन्य दिन भी आए जिससे कि क्या होगा कि ठाकुर उनके साथ में एक अलग से वार्तालाप कर सके। त्याग और ततीक्षा की जो शिक्षा देनी थी उनको वह ठाकुर उनको दे पाए अलग से। और भक्त यदि बैठे होंगे अलग दूसरे भक्त तो फिर वे लोग प्रश्न करेंगे कि महाशय आपने यह त्याग की बात करते हैं। इंद्रिय सुख के त्याग की बात करते हैं। तो फिर हम लोगों का क्या हम लोग तो गृहस्थ हैं। तो फिर ठाकुर को उसको अलग से समझाना पड़ेगा कि हां संसार में रह के भी तो होगा। क्यों नहीं होगा? बीच-बीच में यह मन में, वन में और कोने में जाकर के रिट्रीट करनी होगी। तो अननेसेसरी यह डिस्ट्रैक्शन ना खड़ा हो। डायरेक्ट त्यागी भक्तों के साथ में सीधी वार्तालाप ठाकुर कर सके। सीधा वार्तालाप ठाकुर कर सके। इसलिए उनको अन्य दिन आने को कहते थे। अभी किंतु यहां पर मास्टर महाशय है। संडे को छोड़कर के अन्य दिन भी ठाकुर के साथ में रह रहे हैं। बोल के हमको यह ठाकुर की यह जो दिनचर्या है डेली लाइफ डे टू डे लाइफ दक्षिणेश्वर में इसका हमको एक सुमधुर एक आकलन देखने को मिलता है। इसीलिए देखिए कि यहां पे सुबह को क्या होता है? तो ठाकुर वहां से आए काली मंदिर से प्रणाम करके फिर यहां पर राखाल कुछ पढ़ रहा है उसको सुना थोड़ा बात थोड़ी बहुत वार्तालाप हुआ इसके बाद में यह वैष्णव चरण कीर्तन्या आए सुबोल मिलन कीर्तन सुना उसके बाद में रामलाल ठाकुर के लिए सुबह का जो मां काली का भोग प्रसाद था वह ले आए तो उस वो थोड़ा ग्रहण किया उसके बाद में थोड़ा सा विश्राम किया देखिए ठाकुर सुबह को 10:00 बजे के बाद में थोड़ा विश्राम करते हैं। तो अभी क्या है कि रात को तो सोते ही नहीं तो दिन में हो सकता है थोड़ा सा इस तरह से अल्प विश्राम बीच-बीच में ठाकुर कर ले। उसके बाद में रात को मणि नहबत में शयन करते हैं। अब यदि मास्टर महाशय संध्या का कुछ आलेखन करते कि संध्या के समय ठाकुर ने उस दिन क्या किया था तो बहुत अच्छा रहता। देखिए वैसे तो डिस्क्रिप्शन जो है 15th दिसंबर का काफी लें्थी है। हमको कंप्लेन करने के लिए ऐसा कुछ है नहीं किंतु फिर भी हमको हमारे मन को तृप्ति नहीं होते हैं। तो तो हमको लगता है कि मास्टर महाशय और ज्यादा लिखते और ज्यादा लिखते तो ठाकुर के दिन हमको कितना सुंदर रूप से देखने को मिलता। बहुत बार

सिद्ध पुरुषों के नित्य प्रसंगों और सामान्य वार्तालाप का चिंतन हमारे लिए सहज साधना है

ऐसा होता है। देखिए हमने कल भी डिस्कस किया था कि यह त्याग तपस्या यह जो काम कांचन त्याग है। फिर यह कर्म योग, भक्ति योग, राजयोग, ज्ञान योग वगैरह वगैरह यह करने के लिए हमको शक्ति चाहिए। साधना करने के लिए शक्ति चाहिए। मन के ऊपर में संयम चाहिए। यदि मन के ऊपर में संयम ना हो तो हम बहुत ज्यादा साधना में आगे नहीं बढ़ सकते हैं। किंतु इस तरह का संयम इस जगत में बहुत ही अल्प लोगों के पास ही होता है। तो फिर ज्यादातर लोगों के लिए क्या? तो ज्यादातर लोगों के लिए है भक्ति का रास्ता। अपने किसी एक इष्ट को चुन लें और फिर इस इष्ट की जो कार्यकलाप है, उनकी यह दिनचर्या है, उनके जीवन के जो प्रसंग है, उनका यह जो डे टू डे लाइफ है, उनकी यह जो उपदेश है, उसी के ऊपर में मन को केंद्रित करें और बहुत बार ऐसा होगा कि इष्ट के द्वारा या अवतार के द्वारा या तो अपने गुरुदेव के द्वारा कही हुई बातों का हम बहुत ज्यादा पालन नहीं कर सकते हैं। वह जो उनके उपदेश है उस उपदेश को हम बहुत ज्यादा अप्लाई नहीं कर सकते हैं। तो फिर उस केस में क्या करना है? यह गुरु या इष्ट या तो फिर अवतार इनके जो दैनिक जो जीवन है, उनके यह जो छोटे-छोटे प्रसंग है, स्मृति कथाएं हैं, उसी का पाठ करते रहे, श्रवण करते रहे, उसी का आनंद उपभोग करते रहे और इसी से हमारे हृदय के सब जितने भी यह कचरा है वह धुल जाएगा। मैं राजकोट में था। अभी आप सबको तो पता ही है कि राजकोट इतना पुराना आश्रम है। बहुत सारे सीनियर साधु अपने संघ के प्रतिष्ठित साधु वहां पर रह चुके हैं। उनमें दो का नाम तो जग जाहिर है। दो साधुओं का आत्मस्थानंद जी महाराज और उनके पहले भूतेशानंद जी महाराज। इसके अलावा इन दोनों के अलावा भी मुमुक्षानंद जी महाराज वहां पर थे और सुबोध महाराज एक थे। उनका नाम वैसे कुछ है नहीं। वह तो बाद में रिटायर हो गए थे। किंतु वहां के भक्तों में उनका काफी नाम प्रचलित है। तो फिर क्या करेंगे? जो पुराने भक्त आएंगे वह आकर के बोलेंगे कि महाराज हम उस महाराज के साथ में गाड़ी में जा रहे थे। फिर गाड़ी में जाते-जाते कहां पर प्रवचन देने के लिए उस समय तो क्या था? राजकोट ही एक अकेला सेंटर था। और तो कोई गुजरात में सेंटर था नहीं। भाव प्रचार के सेंटर थे बस। बाकी तो ऐसा कोई सेंटर था नहीं। तो फिर क्या है कि हम महाराज के साथ में जा रहे थे। फिर जातेजाते कहीं दूसरे शहर में प्रवचन करने के लिए रास्ते में गाड़ी रुका। फिर उसके घर गए। उसके घर खाना खाया। उनके साथ में यह बात हुई। उसके बाद में फिर से गाड़ी में बैठे। फिर से वहां पर गए। फिर कोई भक्त ऐसा कहेगा। अब जैसे प्राइवेट सेंटर के जितने भी वह थे सब वॉलंटियर उनके साथ में वार्तालाप होगा तो वे लोग कहेंगे कि हां आत्मस्थानंद जी हमारे यहां पर आए थे और हमारे साथ में बैठकर के खाना खाया था हंसी मजाक किए थे मेरे पुत्र के साथ में मेरी पुत्री के साथ में उन्होंने बात किया था उनको एनकरेज किया था स्टडी करने में वगैरह-वगैरह तो मैं कभी-कभी सोचता था मैं बिल्कुल शुरूशुर में वहां पर गया था तो मुझे लगता था कि यह भक्त लोक भी कैसे हैं? कहां ठाकुर मां स्वामी जी की किताब पढ़कर के उनके कहे हुए उपदेश के अनुसार अपने को जप ध्यान तपस्या में डूबा देना है। कहां अपने मन को चित्त को निर्मल कर कर लेना है। कहां वो एक साधन भजन का प्रवाह बहा देना है। वह सब नहीं करके पुराने भक्तों के साथ में यही एक है कि वह महाराज के साथ यह बात हुआ। यह महाराज के साथ में यह बात हुआ। उन महाराज को यह इस तरह का खाना अच्छा लगता था। इन महाराज को इस तरह का खाना अच्छा नहीं लगता था। इन महाराज के साथ में हम वहां पर कार में जा रहे थे। तो इस तरह की घटना हुई थी। मैंने कहा यह सब क्या है कि साधु चरित्र लेकर के अपना समय अननेसेसरी वेस्ट करना ऑलवेज बेटर है कि उनके उपदेश के अनुसार जीवन का गठन करें। तो कहां मैं इनमें से किसी को देखता कभी पूछता था अच्छा आप कितना जप करते हैं इतने समय से आप संघ के साथ जुड़े हैं आप जप कितना करते हैं एक घंटा दो घंटा जप हो जाता है क्या डेली मंत्र दीक्षा तो आपने ली है तो कितना जप करते हैं तो फिर यह लोग कहेंगे कि महाराज कहां इतना जप कहां होता है थोड़ा बहुत सुबह शाम बैठकर के जो मिनिमम होता है 108 वो कर लिया तो कर लिया कभी-कभी वो भी नहीं होता है तो फिर मैं कहता था कि अभी बहुत सारी चीजें तो आप लोगों के मुंह पर तो नहीं कह सकते हैं ना किंतु मन में मैं हमेशा सोचता था कि ये साधुओं के कार्यकलाप साधुओं की बातें साधुओं का चरित्र यह सब सुनना इसके बारे में बात करना इसके बारे में आपका चिंतन करना यह सब क्या है यह सब करने से क्या लाभ होगा जब तक हम ठाकुर मां स्वामी जी के उपदेश अनुसार शिव ज्ञान जीव सेवा है काम कांचन त्याग मां के कहा अनुसार एटलीस्ट 10,000 नहीं तो 1000 जप डेली कर ले। जब तक यह नहीं करेंगे तब तक हमारे जीवन में तो ज्यादा कुछ परिवर्तन आने वाला नहीं है। इस तरह मैं उस समय सोचा करता था। किंतु अभी धीरे-धीरे मुझे लग रहा है कि देखिए यह भी एक साधना है। भले ही चाहे उनके कहे हुए उपदेश के अनुसार आप अपने जीवन को परिवर्तित ना कर पाए क्योंकि जीवन को ट्रांसफॉर्म करने की यह लाइफ ट्रांसफॉर्मेशन जो शक्ति है पावर है बहुत कम लोगों के पास में होती है। ज्यादातर लोगों को तो क्या करना है? इस तरह से साधु चरित्र है या तो फिर अवतार चरित्र है उसी को लेकर के रहना है। उसी के बारे में वार्तालाप करना है। उसी का चिंतन करना है। जिससे कि क्या होगा इन सब कहानियों को बोल के सुनकर के चिंतन करके चित्त जो है अपना पवित्र होता जाएगा। जिसके चित्त में कोई भी महाराज या कोई भी अवतार या कोई भी गुरु या इष्ट विराजमान है उनके चित्त में इस तरह की जो नेगेटिव भावनाएं हैं उनको आने में बहुत बड़ा रेजिस्टेंस फेस करना पड़ेगा। यह जो ठाकुर कहते हैं ना हल्दी लगा के अपने देह के ऊपर में आप यदि यह तालाब होता है उसमें आप प्रवेश करेंगे तो यह मगरमच्छ जो है वह आपसे दूर रहेगा। अदरवाइज वैसे ही आप तालाब में तैरने को जाएंगे तो हो सकता है मगरमच्छ आकर के आपको पकड़ ले। वही शंकराचार्य की फेमस घटना कि उनको मगरमच्छ ने पकड़ लिया था। फिर उनकी मां बेचारी चिल्ला रही है। तो शंकराचार्य कहते हैं कि बालक शंकराचार्य कि मां तुम मुझे सन्यास लेने का परमिशन दो क्योंकि वैसे ही तो मेरा मृत्यु नजदीक आ चुका है। तो मैं सन्यासी होकर के मरना चाहता हूं। वैसे तो उनकी मां परमिशन नहीं देती थी। किंतु वैसे ही अपना पुत्र मरता रहे माने मृत्यु के कतार पर खड़ा है तो फिर क्यों नहीं परमिशन दे दे? तो मां ने कहा ठीक है बेटा मैं तुमको सन्यास की परमिशन देती हूं। तो जैसे ही मां ने ऐसा कहा तो ऐसा चमत्कार हुआ कि वह जो मगरमच्छ था क्रोकोडाइल वो शंकराचार्य को छोड़कर के चला गया। तो वैसे ही यहां पर क्या है? यह साधु चरित्र है। यह जो दिन प्रतिदिन की घटनाएं हैं। आपको लगेगा कि इसमें है क्या ऐसा कि यहां पर वह रामलाल है। ठाकुर के लिए एक थाले में प्रसाद ले आया है। ठाकुर ने प्रसाद ग्रहण करने के बाद में थोड़ा सा विश्राम किया है। उसके बाद में यहां पर ठाकुर काली मंदिर में जा रहे हैं। काल मां काली के सामने में बैठकर के कभी मां काली के चरणों में पुष्प अर्पण करते हैं। कभी अपने सर पे पुष्प पुष्प अर्पण करते हैं और कभी यहां पे यह सुबोल मिलन कीर्तन है वह सुन रहे हैं। यहां पे उपदेश जैसा तो कुछ है नहीं। तो मास्टर महाशय ने यह सब पोर्शन है उसको कट करके जो इसके बाद का जो दिन है हां ये तो हमने 15 दिसंबर की बात की। यह 16 दिसंबर को सॉलिड फिलॉसोफिकल डिस्कशन होने वाला है। तो यह मास्टर महाशयनी 15th दिसंबर में यह जो छोटी-मोटी घटनाएं है उसको कट ही कर देते। यह 16 दिसंबर का जो सॉलिड फिलॉसोफिकल डिस्कशन है उसी को रखे रहते हैं। ऐसा कभी-कभी अपने मन में हो सकता है। अभी देखिए मेरा तो मत है। बिल्कुल चेंज हो गया है। अभी यह सब फिलॉसोफिकल डिस्कशन तो बहुत सुन लिया। बहुत पढ़ भी लिया और हमको यह पता भी चल गया है कि इसके अनुसार लाइफ ट्रांसफॉर्म अपना ज्यादा होने वाला नहीं है। जब आध्यात्मिक जीवन की साधक जीवन की शुरुआत करते हैं, प्रारंभ करते हैं तो एक बहुत बड़ा उत्साह लेकर के हम आते हैं कि हां ठाकुर कहते हैं तो कि 12 साल में साधन भजन तपस्या करके ईश्वर प्राप्ति कर लेंगे। तो ईश्वर प्राप्ति नहीं तो ठाकुर की तरह एकाद दो दर्शन भी यदि हो जाए मां सीता का मां काली का मां शारदा का एकाध दर्शन भी यदि हो जाए तो उसी से हम संतुष्ट हो जाएंगे किंतु जब इसमें से कुछ नहीं होता है तब अपनी जो एक्सपेक्टेशन है धीरे-धीरे करके मॉडरेट होती जाती है। तब हमको पता चलता है कि यह जो विवेक चूड़ामणि पढ़ेंगे या तो पंचदशी पढ़ेंगे या तो फिर वेदांत सार पढ़ेंगे या तो फिर उपनिषद पढ़ेंगे उनके ऊपर में शंकराचार्य का भाष्य पढ़ेंगे। अभी वह जो सॉलिड फिलॉसोफी है वो फिलॉसोफी में जिस तरह से लाइफ को ट्रांसफॉर्म करने के बारे में कहा गया है समाधि षटक संपत्ति शम दम ततीक्षा श्रद्धा उपरति समाधान या तो फिर यह यम और नियम यह यह जो है या तो फिर यह चित्त प्रसाद है या तो फिर यह अष्टपाश से मुक्ति प्राप्त करनी है। पंचक्लेश से मुक्ति प्राप्त करनी है। उसके बाद में धारणा ध्यान समाधि यह जो सब लिखा गया है ये नित्यानित्य वस्तु विवेक है यह अमूत्र फल भोग विराग है यह जो सब लिखा गया है वेदांत और योग शास्त्र में उसका पालन करने की अपनी क्षमता जो है बहुत ही सीवियरली लिमिटेड है और फिर क्या होता है पता है मैंने कुछ-कुछ लोगों को देखा है वेदांत का इनडाइजेशन हो जाता है किस तरह से पता है भक्ति शास्त्र के प्रति मन के भीतर में एक तरह का प्रजुडाइस बैठ गया है कि मैं क्यों किसी महापुरुष की वार्ताओं का श्रवण करूंगा। यह तो उन लोगों के लिए है जो लोगों में अकल बिल्कुल भी है नहीं। जिन लोगों में बिल्कुल किसी भी तरह की क्षमता नहीं है। जो लोग कि स्पिरिचुअली जुनाइल है उन लोगों के लिए यह भक्ति शास्त्र है। यह आध्यात्मिक कथा काहिनी वार्ता वगैरह है। मेरे लिए तो यह वेदांत है। क्यों? क्योंकि मेरे मैं तो इंटेलेक्चुअल हूं और मेरे पास में इस सब हायर फिलॉसोफल थिंकिंग करने की कैपेसिटी है। तो ऐसा बोलकर के भक्ति शास्त्र के प्रति एक तरह का प्रजुडाइज और एक इंटेलेक्चुअल स्ट्रगल भीतर में सब समय चलती रहती है कि अच्छा हां यहां पर ब्राह्मण का इस तरह से स्वरूप वर्णन है। वहां पर इस तरह से है तो किस तरह से रिकंसाइल किया जाए। कौन सी फिलोसोफिकल स्ट्रीम है? यह कश्मीर शैविज्म है। उसमें क्या कहा गया है? यह विद्या्य ने क्या कहा है? यह शंकराचार्य के भाष्य में क्या है? शंकराचार्य को यदि रामानुजाचार्य से कंपेयर करें तो कौन सा बेटर है? बुद्धिज्म का अद्वैत वेदांत का कहां पे मिलन है? वगैरह-वगैरह लेकर के वो प्रवृत्त तो बहुत रहेंगे। इंटेलेक्चुअली, फिलॉसोफिकली। किंतु देखिए कि इन सब चीजों को लेकर के लाइफ ट्रांसफॉर्म करने की जब बात है वेदांत में भी आप देखेंगे यह अमूत्र फल भोग विराग नित्यानित्य वस्तु विवेक समाधि षटक संपत्ति यह जो सब प्रीलिमिनरी जो प्रैक्टिसेस है उसमें से कुछ भी करने की क्षमता नहीं है। या तो फिर क्षमता जो है वो बहुत ही लिमिटेड है। तो फिर क्या है कि इस तरह से आप हायर फिलॉसोफिकल थिंकिंग तो करते हैं किंतु लाइफ ट्रांसफॉर्म नहीं करेंगे तो वह वेदांत वेदांतिक होना वेदांत स्टडी करना यह संस्कृत ग्रामर को लेकर के यह खंडन मंडन करना तर्क वितर्क करना उत्तर पक्ष पूर्व पक्ष को लेकर के सर घुमा देना यह सब चीजों से ज्यादा कोई लाभ नहीं है। मैं इन सब चीजों को माने आजकल की लैंग्वेज में इन सब चीजों को लग्जरी बिलीफ कहा जाता है। ये जो अमेरिका में ये जो रिच किड्स जो होते हैं ना बड़े बाप की बिगड़ी औलाद हिंदी में जिसको हम कहते हैं कि पिताजी के पास बहुत पैसा है और ये इकोनॉमिक सिस्टम भी कंट्री का बहुत अच्छा काम कर रहा है। तो फिर यह जेंडर आईडियोलॉजी है वगैरह-वगैरह एक किम भूत किमाकार तरह की आईडियोलॉजी लेकर के वहां के लड़के लड़कियां हैं कॉलेज के वे लोग व्यस्त रहते हैं। क्यों? क्योंकि उनको ना ही अपने एशिया में जो बच्चे हैं, अफ्रीका के जो बच्चे हैं उनको जिस तरह से संघर्ष करके दो रोटी प्राप्त करनी है, ऐसा तो करना नहीं है। इकोनॉमिक हेल्थ इतनी अच्छी है पर कैपिटा जीडीपी है वहां पे मोर ऑलमोस्ट $900 इंडिया का है $3000 तो इंडिया में एक लड़का यदि बड़ा होता है जन्म लेता है तो उसको तो सबसे बड़ी फिक्र यही है कि दो रोटी का माने वो व्यवस्था कैसे करें वहां तो वो ऑन एवरेज $900 पर कैपिटा इनकम है तो पैसों की रोटी की खाने की ऐसी कोई व्यवस्था उसकी चिंता नहीं है उसको फिर यह सब लग्जरी बिलीफ लेकर के रहेगा कि हां ये कितने टाइप का जेंडर है 10 है ना 20 है ना 30 है ना 40 है ना 50 है तो यह सब चीजों को वे लोग क्या कहते हैं लग्जरी बिलीफ अर्थात कि जब जीवन में संघर्ष नहीं करना होता है जीवन में सब कुछ ठीक-ठाक बैठा हुआ है तो फिर यह झूठमठ का यह सब पॉइंट उठा के यह लोग अपना समय व्यतीत करेंगे। कभी-कभी ना मैं वेदांत को भी इस तरह की लग्जरी बिलीफ कहता हूं। क्यों? क्योंकि यदि आप बहुत ही सिंसियर है। बहुत ही आपको यह एक है कि नहीं मुझे आध्यात्मिक जीवन में कुछ तो उपलब्धि करनी है तो फिर आप भक्ति शास्त्र से ना आप दूर नहीं हो सकते। भले ही चाहे आप वेदांत को पकड़ के रखिए। ऐसा कोई प्रश्न ही नहीं है अपना रामकृष्ण संघ का तो जग जाहिर है ज्ञान मिश्रित भक्ति या तो फिर भक्ति मिश्रित ज्ञान तो भले ही चाहे आप वेदांत को पकड़ करके रखिए किंतु वेदांत के अनुसार यह समाधि षटक संपत्ति वगैरह के अनुसार ये जीवन ट्रांसफॉर्म आपका इजीली होने वाला नहीं है। उस तरह का विल पावर उस तरह की जो ज्ञान की शक्ति उस तरह की इंद्रियों के विषयों के प्रति जो संपूर्ण विराग है वह प्रकट इजीली होने वाला नहीं है। तो यदि हम बहुत ही सिंसियर है भारत में जन्म लिया है एक रिक्शा वाले के घर में तो मुझे मेहनत करके एसएससी एचएससी पास करना ही होगा। तभी मेरा फ्यूचर है। अमेरिका में वह बड़े धनपति के घर पर जन्म लिया है तो मैं आराम से अपना जीवन उटपटांग आईडियोलॉजी को लेकर के बिता दूंगा। कोई फर्क नहीं पड़ता। हार्ड हार्डशिप करने की कोई आवश्यकता नहीं। तो इफ यू आर वेरी सिंसियर इन योर स्पिरिचुअल लाइफ तो भारत में रिक्शा वाले के घर पे आपने जन्म लिया है। यू कैन नॉट अफोर्ड टू हैव एनी लग्जरी बिलीफ। आपको जो प्रैक्टिकल है, जो काम करता है, उसको आपको ग्रहण करना ही पड़ेगा। मैं वेदांती हूं। भक्ति शास्त्र के प्रति मेरा प्रजुडाइज है। या तो फिर चलो इवन भक्ति शास्त्र के भीतर में भी फिलॉसोफी बहुत है। उसमें यह ईश्वर है या इष्ट है या अवतार है। उनके यह दिन प्रतिदिन के कार्यकलापों को लेकर के मुझे ऐसा क्या बहुत ज्यादा अनपढ़ी है? इसमें भी भगवान कृष्ण को ही पढ़ रहे हैं। तो गीता ही तो पढ़नी है। वो फिर ये रास लीला है, गोपियों के साथ में लीला है। यह पढ़ने की क्या जरूरत है? ठाकुर कहते हैं ना कि वो उत्तर में यह लोग मथुरा के कृष्ण को तो लेते हैं किंतु यह वृंदावन के कृष्ण को नहीं लेते। कहते हैं कि यह सब इंटरपोलेशन है। बात बाद बात में यह सब घुसा दिया गया है। और तो देखिए कि इस तरह की लग्जरी बिलीफ हम यदि आध्यात्मिक जीवन में सिंसियर है तो नहीं चलेगी। मेरा तो कहना है कि यह दिन प्रतिदिन की छोटी-छोटी जो घटनाएं है उसको जितना हम पढ़ते रहेंगे उतना ही चित्त भीतर से निर्मल होता जाएगा। अच्छा तो यह

दक्षिणेश्वर तीर्थ पर ध्यान कैसे करे

दिन तो हुआ समाप्त। रात को मणि ने नहबत में शयन किया था। अभी हो गया 16th दिसंबर ठाकुर श्री रामकृष्ण मणि शंगे पश्चिमेर गोल बारंडाए बश्या आय ठाकुर श्री रामकृष्ण मास्टर मणि के साथ में मास्टर महाशय के साथ में पश्चिम का जो गोल वरांडा है वहां पर बैठे हुए थे। यह पश्चिम पश्चिम का यह जो गोल वरांडा है वह कौन सा जो गंगा नदी के सामने जो आता है वह वाला सम्मुख है दक्षिण वाहिनी भागीरथी सामने ही है दक्षिण वाहिनी भागीरथी अर्थात गंगा नदी काछी कोरबी बेल जुई गोला कृष्ण चूड़ा प्रवृति नाना कुसुम विभूषितो पुष्प वृक्षो और पास में ही है करबी बेल जुई गोला कृष्ण चूड़ा वगैरह विभिन्न पुष्पों से विभूषित पुष्प वृक्ष बेला दष्टा होइबे सुबह के 10 बजे होंगे। देखिए कितना सुंदर यह आलेखन है। दो-तीन सेंटेंस में ही जैसे कि मास्टर महाशय ने हमको ध्यान करने के लिए टॉपिक दे दिया है। हम भी इमेजिन करें एक बार दक्षिणेश्वर जाकर के देख के सब कुछ माइंड में फिट करके आना है कि कौन सा कमरा कहां पे है। कौन सी डायरेक्शन कहां पे है। और यदि नहीं भी जाते हैं तब भी यह डिस्क्रिप्शन इज कलरफुल इनफ। माने डिस्क्रिप्शन इज विजुअल इनफ कि अपने माइंड में हम इजीली इसको देख सकते हैं। उसके बाद में मास्टर महाशय की जगह अपने को ही बिठा देना है ठाकुर के साथ में। सुंदर सुबह का समय और यह तो आजकल की तरह नॉइज़ पोल्यूशन, एयर पोल्यूशन वगैरह तो था नहीं। सुंदर माने शांति थी। हवा पानी भी शुद्ध था और यह देखिए कितना वर्णन भी ऐसा है कि कल कल करती गंगा सामने से बह रही है और यह पुष्प वृक्ष है विभिन्न तरह के जुई गुलाब कृष्ण चूड़ा करबी बेल तो उनकी यह जो सुगंध भी सौरभ भी इतनी सुंदर आती होगी और विजुअली और सब तरह से कितना एक एस्थेटिकली प्लीजिंग एक नजारा एक विजुअल बनता है तो इसको उसको अपने मन में बिठा करके सुबह को जब जप करते हैं, ध्यान करते हैं तो थोड़ा सा इसको विजुअलाइज कर दिया कि इसी तरह से मैं भी ठाकुर के साथ में बैठा हूं और कभी-कभी वार्तालाप करने की आवश्यकता है तो वार्तालाप कर सकते हैं। वरना सिर्फ जैसे वैसे ही आप बैठकर के गंगा दर्शन कर रहे हैं। वैसे ही और ठाकुर के पूत सानिध्य का एक लाभ उठा रहे हैं। पूत उनकी यह जो तन मात्राएं हैं उसमें हम नहा रहे हैं और सामने यह सुंदर दृश्य है उसका अवलोकन कर रहे हैं। बस इतना करने से भी हो जाएगा। तो इतने में ही देखिए ध्यान करने का एक सुंदर टॉपिक

आत्मश्रद्धा: यह संसार है आनंद की कुटिया

आज रविवार अग्रहायण कृष्णा द्वितीया 16 दिसंबर 1883 ख्रिस्ताब् आज रविवार है अग्रहायण कृष्णा द्वितीया तिथि है 16 दिसंबर 1883 का दिन है ठाकुर मणि के देखीते छेन ओ गान गायते छे ठाकुर मणि को देख रहे हैं मणि की ओर देखतेदेखते गान गा रहे हैं तारी ते होबे मां तारा होए छ शरणागत तारना होगा मां तारा यह भवसागर है वह तुमको तेरा देना होगा मां तारा मैं हुआ हूं तुम्हारा शरणागत होइया रहे छ जेनो पिंजरे पाखिर मतो होके रहा हूं जैसे कि मैं पिंजरे में बद्ध पंखी की तरह असंखो अपराधी आमी ज्ञान शून्यो मिे ब्रमी असंख्य अपराध मैंने मैंने किए हैं ज्ञान शून्य होकर के चारों ओर बिना मतलब भटक रहा हूं। माया ते मोहित होए व्सहारा गाभीर मतो माया से मोहित होकर के वत्सहारा गाभ अर्थात कि बछड़ा जिसका बिखर बिछड़ गया है। इस तरह की गाय की तरह मैं हूं। देखिए अभी यह जो ज्ञान का जो भाव है यह भाव क्या कहता है कि मैं बड़ा ही दीनहीन हूं। संपूर्ण रूप से तुम्हारी शरणागत में आया हूं। तुम्हारे शरण में आया हूं और कैसे भी करके तुमको मुझे तार देना होगा। तो यह गान ठाकुर गाते तो हैं किंतु साथ में ही उनका रिएक्शन देखिए बाद में क्या कहते हैं केनो पिंजरे पाखीर मत हो जा पाखीर मत होते जाो केनो हाथ थू अर्थात कि ठाकुर कहते हैं क्यों पिंजरे में बद्ध पंखी की तरह होने को जाऊंगा क्यों थू ऐसा करके वो थूकते हैं अर्थात कि देखिए कि यह दीन हीन भाव है उसके ऊपर में ठाकुर अपना अपना क्रोध, अपना विराग, अपनी नाराजगी व्यक्त करते हैं। क्यों इस तरह से करते हैं? क्योंकि वही जो फेमस वो जो आजू गोसाई और यह राम प्रसाद का युद्ध ये हमने देखा था तो राम प्रसाद कहता है कि ये संसार है वो माने जैसे कि संसार में कष्ट ही कष्ट है धोकार टाटी वो सामने आजू गोसाई क्या कहता है ए संसार मजार कुटी आमी खाई दाई मजा लूटी यह संसार है मजे की कुटिया मैं खाता हूं पीता हूं और आनंद करता हूं तो यह जो संगीतमय जो वाद विवाद इन लोगों का चला था उसमें हमको पता है कि इतने दिनों तक तो हम यही सोच रहे थे कि आमी खाईदाई मजा लुटी संसार मजार कुटी यह हो सकता है कि ठाकुर ने ही इस छड़ा को बना दिया होगा। इस पद को हो सकता है ठाकुर ने ही ऐड कर दिया होगा। किंतु बाद में हमको पता चला कि यह आजू गोसाई का प्रताप है। तो देखिए कि यहां पे भी दीन हीन भाव क्यों कि मेरे भीतर में किसी भी तरह का सार नहीं है। मैं बिल्कुल निस्तेज हूं। निसार हूं। असार हूं। मेरे से कुछ नहीं होने वाला है। इस तरह का भाव नहीं रख के क्यों नहीं हम यह कहें कि हम भी है मां के वीर संतान। देखिए आत्मश्रद्धा स्वामी जी जो कहते हैं हमको कि भारत में आत्मश्रद्धा का जो प्रचंड अभाव हमेशा से रहा है। इसी वजह से हम लोग आध्यात्मिक जीवन में माने जागतिक जीवन में तो ज्यादा कुछ हमारा प्रोग्रेस नहीं ही हो रहा था। पॉलिटिकली इकोनॉमिकली मिलिटरीली सिविलाइजेशनली तो हम मार खा ही रहे थे। किंतु जो भारत का जो मूल मंत्र है आध्यात्मिकता इस आध्यात्मिकता में भी धीरे-धीरे करके दुनिया भर का करप्शन प्रवेश कर रहा था। यदि आध्यात्मिकता हमारे हाथ से चली गई तो तो हिंदू के हाथ से सब चला जाएगा। वैसे ही तो यह पॉलिटिकल पावर नहीं है। वैसे भी तो नेशनल स्ट्रेंथ नहीं है। वैसे भी तो इंटरनेशनल लेवल पर अपनी कोई आवाज नहीं है। वैसे ही तो ट्रेड मर्चेंडाइज ये जो रिसर्च एंड डेवलपमेंट, साइंस, टेक्नोलॉजी वगैरह वैसे भी तो कुछ नहीं है। वैसे ही तो गड्ढे में गिरे हैं। एक एक चीज मात्र बची है आध्यात्मिकता। उसको ले रह रहे हैं। यदि आध्यात्मिकता भी अपने हाथ से गई तो हिंदू के हाथ में क्या रहेगा? तो यहां पर देखिए हम लोग जो हमेशा से सोचते रहते हैं कि आत्मश्रद्धा का उपदेश स्वामी जी का स्पेशलिटी है या तो फिर यूनिक टू विवेकानंद और इसको लेकर के बहुत सारे लोग कहते भी हैं कि कहां शरणागति की शिक्षा देनी है। कहां यह आपको दीनहीन होकर के रहना है। कहां अपने अहंकार को संपूर्ण रूप से निर्विशेष कर देना है। वह नहीं करके स्वामी जी लोगों को उल्टे पाठ पढ़ा रहे हैं। कहते हैं आत्मश्रद्धा डेवलप करो। कहते हैं शिव ज्ञाने जीव सेवा करो। तो ठाकुर के उपदेशों का बिल्कुल माने आप कहेंगे कि ऑोजिट जो है वह स्वामी जी सिखा रहे हैं। तो इस तरह से चिंतन इस तरह की बातें बड़ी फेमस है। बहुत सारे लोग करते हैं। किंतु देखिए कथामृत पढ़कर के ठाकुर के जीवन का थोड़ा सा भी आप अच्छे से अध्ययन करेंगे तो देखेंगे कि ठाकुर भी इसी तरह की आत्मश्रद्धा कहते हैं। यहां पर जब कवि यह कहता है कि मुझे तारना होगा मां तारा मैं तुम्हारा शरणागत हुआ हूं। मैं जैसे कि पिंजरे में बद्ध पंखी की तरह हूं। मैं असंख्य अपराध मैंने किए हैं। असंख्य अपराधों का अपराधी हूं। ज्ञान शून्य हूं। बिना मतलब में भटकता रहता हूं। अंधेरे में इस संसार में माया से मोहित होकर के वत्सहारा गाभ की तरह मैं हूं। तो साथ में ही ठाकुर मुंह से थूकते हैं। माने इतना कंटेंप्ट प्रकट करते हैं। कंटेंप्ट सिर्फ बातों में ही प्रकट नहीं करते। देखिए इस तरह का जो थूकना वगैरह क्या है? जो देखेगा, जो सुनेगा, जो पाठ करेगा, श्रवण करेगा, उसके माइंड में यह दृढ़ रूप से बैठ जाएगा कि ये कंटेंप्ट का भी तो डिग्री होता है ना। हम कहते हैं कि अच्छा यह बात गलत है। कभी-कभी हमको और ज्यादा गलत लगता है तो चिल्ला करके कहे उठते हैं। अरे यह तो बिल्कुल गलत है। और उससे भी यदि ज्यादा गलत लगता है तो थूकेंगे थू करके कि यह तो बिल्कुल ही माने खराब चीज है। यानी कि ठाकुर यह कंटेंप्ट का डिग्री दिखा रहे हैं। थूक करके कि मैं क्यों पिंजरे में बद्ध पंख की तरह होने को जाऊं। तो ये दीन हीन भाव देखिए यह जो बहुत सारा डिस्कशन अपना यहां पर हुआ है कि शरणागति और आत्मश्रद्धा ये दोनों के भीतर में आपको एक बैलेंस करके चलना है या तो फिर जैसे कि हमने देखा था एक ही सिक्के के दो पहलू है। जैसे कि स्वामी जी कहते हैं क्रूल्टी एंड स्लेवरी। क्रूरता और दासत्व एक ही सिक्के के दो पहलू है। यदि मैं अपने भाइयों के प्रति क्रूरता प्रकट करूंगा, प्रदर्शित करूंगा तो बाहर वाले हमलावर आकर के जब मेरी पिटाई करेंगे, मुझे गुलाम बना देंगे तो मेरा कोई मोरल ऑथॉरिटी भी नहीं रहेगा कि आप मेरे साथ में ऐसा क्यों कर रहे हैं? दूसरा कि जिन भाइयों के प्रति मैंने क्रूरता प्रदर्शित की है, वे लोग खड़े-खड़े ताली बजाएंगे और सिर्फ ताली ही नहीं बजाएंगे। वे लोग जो बाहर के आक्रमणकारी के साथ में इकट्ठा होकर के हमारा दमन करने में वह लग जाएंगे। यानी कि क्रूरता और दासत्व, स्लेवरी एंड क्रुअल्टी एक ही सिक्के के दो पहलू है। वैसे ही शरणागति और आत्मश्रद्धा एक ही सिक्के के दो पहलू है। अभी हमने डिस्कस किया कि वेदांत की तरह वेदांत का उपदेश सुनकर के यह जो अह तपस्या है एक के बाद एक समाधि षटक संपत्ति ये यम नियम वगैरह वो पालन करने की अपनी क्षमता कहां पर है? किंतु अपनी क्षमता नहीं है बोलकर के हम भक्ति शास्त्र में आए हैं। तो भक्ति शास्त्र में आकर के उसका बिल्कुल ऑपोजिट ना हो जाए। जैसे कि उन लोगों का ये लग्जरी बिलीफ वालों का एक जैसे कि है कि एक प्रजुडाइस धर्मशा भक्ति शास्त्र के प्रति भक्ति रूपी साधनाओं के प्रति यहां पे वो जो एक वार्निंग था कि बहुत ज्यादा वेदांत बहुत ज्यादा फिलॉसोफी बहुत ज्यादा ज्ञान चर्चा ज्ञान योग्य की बातें करते हैं। उनके प्रति एक जो एक वार्निंग था यहां पर उसका ऑपोजिट वार्निंग यहां पर इफेक्ट में आ गया है कि यदि हम भक्ति शास्त्र में प्रवेश करते हैं यदि ठाकुर मां स्वामी जी की कहानियां वो हमको बहुत पसंद आती है अच्छी लगती है मैंने उस साधु के साथ में इस तरह से बात की ऐसा जो साधु चरित्र का हम गुणगान गाते रहते हैं तो साथ में यह वार्निंग इफेक्ट में है कि मुझे फिर दीन हीन नहीं हो जाना है। अदरवाइज क्या होगा कि माया मिलन राम वहां पर वह जो ज्ञान शास्त्र है उसमें जो थोड़ा बहुत फिलॉसोफिकल स्ट्रेंथ मिलता था वह तो गवा ही दिया और दीनहीन हो गए तो फिर आध्यात्मिक लाभ भी ज्यादा नहीं हुआ। यानी कि प्योर भक्ति या तो कहेंगे कि भक्ति में भी एक तरह का जो नेगेटिविटी है विकार है उसको काटना है। यहां जो ज्ञान में जो एक विकार आता है उसको काटना है। वह एंटीबायोटिक और एंटेसिड यह दोनों आपको साथ में लेनी है। जिससे क्या होगा? एक का विकार दूसरा काट देगा। दूसरे का विकार पहला वाला काट देगा। यह दोनों कॉम्प्लीमेंट्री साधनाएं हैं। इस तरह से इनको लेना है। ज्ञान योग की चर्चा करतेकरते एक तरह का आत्मविश्वास तो चाहिए ही भीतर में। अदरवाइज आपके आपके वो जो एक इंटेलेक्चुअल डिस्कशन करने की इंटेलेक्चुअल कैपेसिटी है हायर कांसेप्ट्स को समझने की वह रहेगी नहीं। और दूसरा कि भक्ति शास्त्र में संपूर्ण रूप से शरणागत होने को जाएंगे तो यह कातरता ना आ जाए, दीन हीन भाव ना आ जाए, इनफीरियोरिटी कॉम्प्लेक्स ना घुस जाए। तो यहां पे इनफीरियोरिटी कॉम्प्लेक्स यहां पे सुपीरियरिटी कॉम्प्लेक्स जैसे हमने वो अस्मिता का जो डिस्कशन किया था उस समय देखा था। यह दोनों को काटना होगा। इंफीरियरिटी कॉम्प्लेक्स और सुपीरियरिटी कॉम्प्लेक्स दोनों जैसे कि एक सिक्के की दो पहलुएं हैं। एक आएगा तो दूसरा आता ही आता है। उसके साथ-साथ में इसके लिए दोनों को हमको परित्याग करना होगा।

व्याकुलता: राम-मय जीविता सीता का आदर्श

कथा कहते कहते भाबा बिष्टो बात करते करते ठाकुर भाव से आविष्ट हो गए हैं। शरीर मन सब स्थिर और चोखे धारा शरीर और मन स्थिर हो गया है और आंखों से अश्रुधारा बह रही है। नयनों से अश्रुधारा बह रही है। कित खण पर बोलीते छ मां सितार मत करे दा कुछ क्षण के बाद में कहते हैं मां सीता की तरह कर दो एक के बारे सब भूल सब कुछ संपूर्ण रूप से भूल गई है एक ही साथ में सब भूल गए हैं देह भूल योनि हाथ पास तन कोनो दिखे हुश नाई देह भूल गई है योनि हाथ पास तन सब कुछ किसी भी तरह उनकी हश नहीं है होश नहीं है केवल एक चिंता को थाए राम सिर्फ एक चिंता कहां पे राम है की रूप व्याकुल होले ईश्वर लाभ होए मणि के एटी सिखाई जन की ठाकुर सीता उद्दीपन होो किस तरह की व्याकुलता होकर के ईश्वर लाभ हो मणि को क्या यह सिखाने के लिए ही ठाकुर में सीता का उद्दीपन हुआ सीता राम मोय जीविता राम चिंता करे उन्मादिनी देो जेन प्रिय तहा भूले गए छ सीता है राममय जीविता राम चिंता करके उन्मादिनी देह जो कि इतना प्रिय है उसको भी भूल गई देखिए यदि हमारे भीतर में बहुत ज्यादा ज्ञान चर्चा करके एक तरह का रूखा सूखापन ना आ जाए यह जैसे कि एक वार्निंग है तो वैसे ही यह भक्ति में बहुत ज्यादा ज्यादा जाकर के दीन हीन कातरता न आ जाए। यह एक वार्निंग है। दोनों के हेल्दी पॉइंट को एक्सेप्ट करना है। तो उसके बाद में आगे कैसे बढ़ना है? तो आगे बढ़ना है व्याकुलता से मुमुक्षुत्व से। व्याकुलता ही एक ऐसा एक पावर है अपने हाथ में। एक ऐसा शस्त्र है अपने हाथ में जो कि अपने सामने का सब कुछ काट लेगा। जैसे हमने यह देखा कि लग्जरी बिलीफ इस तरह की बिलीफ कि जिससे हमको लाभ कुछ नहीं होता किंतु हमको लाभ चाहिए भी नहीं क्योंकि अपना पिताजी जो है इतने धनी है कि मैं यह स्तर उटपटांग सब भावों को लेकर के रहता रहूंगा भी जीवन में तो ज्यादा मुझे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला नुकसान नहीं होने वाला किंतु इंडिया में एक रिक्शा वाला है एक भिखारी है ना कि एक कोई एक कारकून है क्लार्क है उसका लड़का या लड़की उसके भीतर में एक तीव्र आकांक्षा होती है कि कैसे भी करके एसएससी एचएससी में हायर नंबर लाए जाए अच्छे परसेंटेज लाए जाए तो हमको अच्छा एडमिशन मिलेगा अच्छा एडमिशन मिलेगा तो कैरियर बनेगा अदरवाइज वैसे जैसे मेरे पिताजी भिक्षा मांग रहे हैं वो रिक्शा चला रहे हैं जैसे मेरी मां दूसरों के घर में जाकर काम कर रही है सब्जी बेच रही है तो मुझे भी वही करना होगा तो मुझे तो ऐसा नहीं करना आई वांट अ बेटर लाइफ फॉर माइसेल्फ तो जो प्रचंड जीजीविषा जिसमें होती है, प्रचंड मुमुक्षत्व जिसमें होता है, प्रचंड व्याकुलता जिसमें होती है, उन लोगों के लिए फिर यह लग्जरी बिलीफ में इंडल्ज करना थोड़ा सा भी संभव नहीं है। जो काम करता है उसको अपनाना है। जैसे ठाकुर वहां पर कामरारपुर जा रहे थे। रास्ता वो पालखी में बैठकर के रास्ते में वह डकैत आ गए। तो ठाकुर ने सबका नाम सभी भगवान का नाम लेना शुरू कर दिया। काली राम महावीर जे खाटे जो काम करें तो यहां पे भी हमको सभी तरह की जो भाव है उसका जो सार है उसको ग्रहण करके अप्लाई कर लेना है जो काम करें कैसे भी काम करें कैसे भी करके काम करके अपना काम निकलवा लेना है यह प्रचंड जीजी विषा चाहिए तो क्या होगा कि यह जो कोई भी भाव की नेगेटिविटी है हम इमीडिएटली समझ जाएंगे बहुत बार क्या होता है यह लग्जरी बिलीफ दोनों तरह से काम करती है। भक्ति वाले भी ऐसा कहते हैं कि भक्ति छोड़कर के और किसी में जाना की जाने की जरूरत ही नहीं है। यह शाक्त है, वैष्णव है। सभी लोग कहेंगे हमारा ही धर्म सही है। हमारा ही भाव सही है। अभी ऐसा करने के बाद में ऐसा कहने के बाद में यह लोग करेंगे क्या कि अपने भाव में अपनी जो साधन पद्धति में स्पष्ट रूप से जो यह डेफिशिएंसी उनको दिखाई दे रही है, उसको भी नजरअंदाज कर देंगे। उसको भी एक्सक्यूज करके उसको उसके ऊपर में 10 तरह के एक्सक्यूज बना देंगे। जैसे यह मां होती है कोईकोई मां ये अपने बच्चों के जितनी भी कंप्लेन लोग करके आए तो मां क्या करेगी कि उसके ऊपर में एक्सक्यूज बिठाना शुरू कर देगी। अपने बच्चे को डिसिप्लिन नहीं करेगी। वो बहाने बनाएगी। अरे वह तो छोटा है। अरे वह तो नादान है। अरे वह तो अभी तक उसमें अकल ही नहीं आई है। ऐसा करके करके ही बच्चे बिगड़ते हैं भविष्य में। जिस मां में जो थोड़ी बहुत भी एक शक्ति होती है अपने बच्चों का भविष्य देखने की वो इमीडिएटली जब बच्चा कोई भी शरारत करता है कोई भी हरकत करता है इस तरह की जो कि उसको नहीं करनी चाहिए इमीडिएटली उसको मार करके डिसिप्लिन करके ठिकाने पर लाएगी तभी तो बच्चे का भविष्य अच्छा होगा वरना यह जितने लोग बिगड़ते हैं बड़े होकर के उनके पेरेंट्स ने उनको डिसिप्लिन ही नहीं किया है सब समय जितनी भी कंप्लेन आती है वे लोग एक्सक्यूज खोज करके उस कंप्लेन को हटा देंगे। तो यहां पे भी यह लग्जरी बिलीफ कि भक्ति ही सही है, ज्ञान ही सही है। ऐसे लोग फिर क्या करेंगे? भक्ति में जो डेफिशिएंसी दिखती है भक्ति शास्त्र की नहीं। भक्ति की जो प्रैक्टिस करते हैं वे लोग उसमें तो उसको भी 10 तरह के बहाने बना करके छुपा देंगे। तो इससे होगा क्या कि भारतीय धर्म शास्त्र में ये जो रिच मेन्यू जो है ये रिचनेस जो है ये इतने सारे विविध ऑप्शन है उसका लाभ उठाकर के आपके जीवन में आध्यात्मिक प्रगति हो वो स्कोप जो है जो चांस जो है उसको आप मिस कर देते हैं। तो इसीलिए यह व्याकुलता है। यह प्रचंड व्याकुलता प्रचंड मुमुक्षुत्व चाहिए जिसकी वजह से बस मुझे 12थ पास करना ही करना है। मुझे आईआईटी जी क्लियर करना ही करना है। एम्स में एडमिशन प्राप्त करना ही करना है। मुझे यह सब्जी बेचना, मेरी मां की तरह लोगों के घर में जाकर के काम करना यह सब नहीं ही करना है। तो फिर इस व्याकुलता जब आएगी तब मुझे जो ठीक लगेगा इमीडिएटली मैं ले लूंगा। जो ठीक नहीं लगेगा उसको मैं इमीडिएटली छोड़ दूंगा। अदरवाइज मैं लग्जरी बिलीफ लेकर के बैठा रहूंगा। जितनी भी डेफिशिएंसी है उसको मैं एक के बाद एक्सक्यूज से ढकता रहूंगा। तो इसीलिए यहां पर ठाकुर यह शरीर मन सब कुछ जैसे कि ईश्वर को अर्पण करके प्रचंड एक व्याकुलता के साथ में ईश्वर प्राप्ति की ओर कैसे आगे बढ़ा जाए तो मां सीता का उदाहरण देकर के कहते हैं। इसके बाद में अभी के जो तीन टॉपिक है वह फुल फिलोसोफिकल टॉपिक है। इसको कि अभी हम नेक्स्ट क्लास से प्रारंभ करेंगे। हां जी। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु

प्रश्न: अक्सर हम यह नहीं समझ पाते कि ठाकुर कितनी बार आध्यात्मिक परम्पराओं को उलट कर नई दिशा प्रदान करते हैं

यह जो ठाकुर के बारे में जो इस तरह की जो बातें जो फैलती है ना जनरल जन समाज में जो कि ठाकुर का अभ्यास नहीं किया है। रीज़न क्या है पता है? यह जो सब मूवीस है ना ठाकुर के बारे में रोते-रोते मां काली के सामने कातर होकर के प्रार्थना कर रहे हैं। तो मुझे इतना बेकार लगता है। मैं ठाकुर के बारे में एक भी मूवी कभी नहीं देखा है। ना ही कभी मैं देखने वाला हूं। क्योंकि ठाकुर का जो भाव है ना 1% भी वो कैप्चर नहीं करते हैं। ऐसा ठाकुर रोते हैं और प्रार्थना का। ये कोई ठाकुर थोड़ी ना है। यह किसी संत को एक जो ये होता है ना मोल्ड स्टैंडर्ड मोल्ड उसके भीतर में ठाकुर को बिठा दिया है और इस तरह से प्रोजेक्ट कर रहा है। वि इज कंप्लीटली रोंग। वो एक चीज है। दूसरा क्या है पता है ये सिर्फ ये गीत बहुत सारे इस तरह से ठाकुर कहते हैं ना कि तो बनत बनत बन जाए। ऐसा वो गीत गाते हैं। और फिर कहते हैं यह क्या है? बनत बनत बन जाई। ये भाव मुझे थोड़ा सा भी पसंद नहीं है। बनते बनते बन जाएगा। धीमे तेताला धीरे-धीरे करके सब होगा। जैसे कि जीवन में प्राण शक्ति ही नहीं है। ऐसा करके कातर बन के बैठे हो। ठाकुर गीत भी गाते हैं और साथ में उसकी निंदा भी करते हैं। सो एज इफ के वो पूरा एक कॉम्प्रहेंसिव अंडरस्टैंडिंग हमको देते हैं। दूसरा क्या है पता है? ये जो है ना कि मैं सिर्फ भक्ति मार्ग को फॉलो करूंगा। सिर्फ ज्ञान मार्ग को फॉलो करूंगा। ये ऐसा कहने की तरह है कि मैं सिर्फ न्यूटन के फिजिक्स को ही लूंगा। आइंस्टाइन के फिजिक्स को नहीं लूंगा। या तो आइंस्टाइन के फिजिक्स को लूंगा या क्वांटम डायनेमिक्स को नहीं लूंगा। व्हाट इज दैट? आप स्टडी करते हैं तो सब कुछ स्टडी कर लेते हैं। आइंस्टाइन की कुछ गलतियां थी जो कि क्वांटम डायनेमिक्स को नहीं स्वीकार कर रहा था तो उसको छोड़ दिया। उसका रिलेटिविटी ले लिया और क्वांटम डायनेमिक्स को ले लिया। जो काम करता है उसको लेना है। ये एंपेरिकल साइंस है। फिजिक्स ये जो मॉडर्न साइंस है इस एंपेरिकल साइंस। इट्स नॉट अ थ्योरिटिकल साइंस। प्रूव किया है, एक्सपेरिमेंट किया है, सक्सेस हुआ है, बोल के लिया है। तो स्पिरिचुअलिटी इज द मोस्ट एररिकल ऑफ ऑल साइंसेस। यहां पर जो काम नहीं करता है, फट करके फेंक दो। जो काम करता है फट करके अपना लो। इसमें मेरी जो लॉयल्टी इस पंथ के प्रति है। मेरी जो ये डिवोशन है, इस इस संत के प्रति है वो सब क्या है? हां, इष्ट निष्ठा होनी चाहिए। उसमें कोई प्रश्न नहीं। किंतु इष्ट को भी तो फिर ऐसे ही तो पसंद करना है ना जो कि सफिशिएंटली ब्रॉड माइंडेड हो लार्ज हार्टेड हो जिनको फॉलो करके यू कैन रीच सम लॉजिकल कंक्लूजन ठाकुर के खुद के कितने गुरु थे अब दूसरों की तो क्या बात करते हैं ठाकुर ने कहा ना कि ओगोमी सुने छत जिसने कहा आपने तो पढ़ाई लिखाई की नहीं है ठाकुर कहते हैं मैंने सुना कितना है

लीला-चिंतन का माहात्म्य

मैंने मैंने बताया था ना हमारे राजू महाराज के बारे में आशुतोषानंद जी वो हमेशा कहते कहते रहते हैं। एक फॉल बैकक आपका एक होना चाहिए। ऐसा कभी मत सोचिए कि थ्रू आउट योर लाइफ हम साधुओं को कहते हैं यह बात। ब्रह्मचार्यों को माने हाउसहोल्डर की तो छोड़ ही दीजिए। साधुओं को कहते हैं कि ऐसा कभी मत सोचिए कि थ्रूउ योर लाइफ एक एक प्रवाह में आपका साधन पजन चलता रहेगा। यू नीड टू हैव समथिंग टू फॉल बैक अपॉन। क्योंकि यह फॉल बैक आज सुनकर के आपको हंसी आती है। कल जाकर के एक बार डिसेंट होना शुरू हुआ ना तो सीधा वह मतलब भयानक गड्ढे में जाकर के गिरेंगे। यदि आपको बीच में कुछ रोकने वाला नहीं है तो सो आई टूक हिज एडवाइस वेरी सीरियसली। मेरे यह जो इतने सारे प्रोजेक्ट चलते रहते हैं दे आर ऑल फॉलिंग बैक कि ऐसा तो म उस समय पता नहीं चलता था। अब जैसे उम्र बढ़ती है पता चलता है कि भाई अपनी कैपेसिटी जो है बहुत लिमिटेड है। तो फिर ये नहीं करेंगे जो अपना कुछ ना कुछ लिखाई पढ़ाई तो फिर क्या करेंगे? तो फिर तो घोर संसारी हम ही लोग बन जाएंगे। देखिए दो चीजें हैं कि पहली बात तो कि ठाकुर के साथ में जो लोग रहते थे उसमें हम लोग मास्टर महाशय बलराम बाबू स्वामी जी राजा महाराज इनको देखकर के अपनी आंखें जो है ना ऐसी चकाचौंध हो गई है कि ये जो काली मंदिर का वो जो माली है वहां का वो जो ये गेटमैन है चौकीदार है वो जो दासी है वृंदा इन लोगों के जीवन में जो ट्रांसफॉर्मेशन हुआ है। हमको दिखता ही नहीं है। ट्रांसफॉर्मेशन हुआ है। किंतु बस वही बात है कि कहां स्वामी जी और कहां यह लोग तो लगता है कि कुछ नहीं हुआ है कंपेयर टू देम। तो जो जहां पे है वहां से अनेक स्टेप वो आगे बढ़ गया है। भले ही चाहे वह वृंदा जी वृंदा दासी की स्वामी जी की तरह नहीं हुई होगी। किंतु अदरवाइज उसके जीवन में जो होना था उससे तो वह कहां ऊपर आकर आ गई है। वही जो वह रसिक मेथड जो है वो ठाकुर के साथ में नहीं रहता और उसकी जो अवस्था होती उससे तो वो कितना ऊपर आ गया है। तो देखिए कि इनके जीवन में तो सॉलिड ट्रांसफॉर्मेशन हुआ है। और दे माइट बी सेटिस्फाइड विद दैट ओनली कि हां चलो जीवन के आखिर में ठाकुर ने आकर के दर्शन दिया। तो फिर और क्या चाहिए जीवन में? राइट? तो उनकी एंबिशन वहीं तक थी और उन्होंने ट्रांसफॉर्मेशन भी वहीं तक हुआ। स्वामी जी वगैरह के साथ में प्रॉब्लम कहां पर आता है कि सिर्फ अपने को ट्रांसफॉर्म नहीं करना है। पूरे जगत को ट्रांसफॉर्म करना है। वहां से तो सब प्रॉब्लम स्टार्ट होता है। सही बात है। क्योंकि देखिए दो बात है। देखिए यदि मुक्ति मिल ही गई है तो बात खत्म हो गई है। फिर तो जन्म मरण का ये फेरा ही घुच गया। मतलब घुचे गए छ बांग्ला ते बोले म जन्म मरण का ही ये जो चक्र है वही टूट गया है। वहीं पे बात खत्म हो गई है। फिर होते हैं पार्षद जो कि जन्म जन्मांतर से इनके साथ में आते हैं। तो अब जैसे मास्टर महाशय बलराम बासु शशि महाराज शरद महाराज ये ठाकुर के पार्षद है। जन्म जन्मांतर से उनके साथ में आएंगे ही आएंगे। ठाकुर ने कहा ना कलमीर दल एकटा के टान ले शबाई टेने आश ये जो कीचड़ में यह जो कमल उगता है तो एक को खींचेंगे सब आ जाएंगे क्योंकि रूट जो है रूट का पूरा नेटवर्क है तो लक्ष्मी दीदी कहती है कि नेक्स्ट टाइम आना नहीं है ठाकुर कहते हैं जाओगी कहां आना ही पड़ेगा तो वो एक लोगों का दल है और एक दल है कि ठाकुर के पास आए मुक्ति मिल गई और बात खत्म हो गई सो कोई भी दल में हो सकता है रंगनाथानंद जी कहते थे कि मुझे मुक्ति चाहिए ही नहीं बार-बार आऊंगा बार-बार संघ में ज्वॉइ करूंगा साधु बनूंगा बार-बार संघ की सेवा करूंगा तो ऐसे लोग भी है कि जो कि एस सच ठाकुर के पार्षद नहीं है बट दे चूज़ टू कम अगेन एंड अगेन विद ठाकुर तो उन्होंने क्या चॉइस की होगी कि ठाकुर के साथ में आना ही है हर बार आगे पीछे जो भी है या फिर मुक्ति ले चले जाना है स्वधाम में किसको पता [हंसी] म किसी के पास तो चॉइस होता ही नहीं है। आना ही पड़ेगा और रंगनाथनंद जी जैसे कि चॉइस किया है कि आएंगे।

ठाकुर रात में सोते नहीं थे। यह कैसे सम्भव था?

एक्चुअली देखिए साइंटिफिकली इंपॉसिबल नहीं है। साइंस की दृष्टि से देखेंगे कि ये जो स्ट्रेस है ना अपने जीवन का वो अपने ऑक्सीजन में ये नाइट्रोजन वगैरह कार्बन डाइऑक्साइड वगैरह कुछ प्रोड्यूस करता है। अभी मैं एग्जैक्ट वो भूल गया। किंतु मैं एक समय में पढ़ा था यह सब अपने सेल्स में अपने ब्लड स्ट्रीम में इस तरह के कुछ एलिमेंट प्रोड्यूस करता है जो कि हमको टायर्डनेस देते हैं। तो दिस इज अ बॉडी सिग्नल कि आपको रेस्ट करने की जरूरत है। स्लीप क्या है? इस तरह के एंजाइम को रिलीज करती है जो कि यह सब नाइट्रोजन कार्बन वगैरह जो भी नेगेटिव एलिमेंट है उसको खा जाती है। तो आप जब उठेंगे नींद से तो फिर क्या है कि आपका बॉडी फिर से रेप्लनिश हो जाएगा। रेस्टेड हो जाएगा। तो मेडिटेशन ऑलरेडी इज बेटर देन स्लीप इन दैट वे कि यह जो एलिमेंट प्रोड्यूस होते हैं जो कि हमको टायर्डनेस का अनुभव करवाते हैं उसको वह वाश आउट कर देता है मेडिटेशन। दैट वे यू डू नॉट नीड टू स्लीप दैट मच। क्योंकि स्लीप क्यों होती है उसका साइंटिफिक रीजन है। यदि वही जो रीजन है वो मेडिटेशन फुलफिल कर लेता है देन वी नीड नॉट स्लीप। हां हां बट किंतु एक बार आनंद की प्राप्ति आनी शुरू हो जाएगी। देन एवरीथिंग विल बी रेप्लनिश्ड। अब जैसे आप बैटरी यूज करते हैं वह रिचार्जजेबल तो आप जब तक यूज करते रहते हैं तब तक बैटरी एग्जॉस्ट होती रहती है। किंतु जैसे ही रिचार्ज करेंगे तो वैसे ही वह म फिर से वह काम करने के लिए रेडी हो गई। तो नो डाउट साधना मे बी एग्जॉस्टिंग बट जो साधना का यह जो फल है आनंद इट रिप्लनिशेस आवर बैटरी। ओम