प्रार्थना
ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णायते नमः इस सप्ताह रामकृष्ण कथामृत इसका पाठ करेंगे। पिछली बार हमने देखा था कि किस तरह से एक पैसेज जो पिछली बार का है एक बार पढ़ लेता हूं मैं। क्या कहते हैं ठाकुर 16th दिसंबर 1883 का दिन है। एक मुख बोलकर के एक आए हैं। ठाकुर के पास में बैठकर के वार्तालाप कर रहे हैं। तो यह जो वार्तालाप हुआ उसमें ठाकुर पहले तो मुखजे को कहते हैं कि देखिए कि आपके पास में पैसा भी है और इसके बावजूद आप ईश्वर को पुकारते हैं। यह बहुत अच्छी बात है। यदि पिछले जन्म में योगी होते योग भ्रष्ट हुए होते तो आज आप भगवान के एक धनी के घर में या तो धनी होकर जन्म ग्रहण करेंगे। तो ठाकुर ने ऐसा कहा तो यह मुख ने अपने मित्र को कहा कि वही गीता का वह श्लोक है सुचिनाम श्रीमताम गेह योग भ्रष्टो भी जायत तो यह एक बात हुआ इसके बाद में ठाकुर कहते हैं कि ईश्वर यदि मां काली यदि इच्छा करेगी तो ज्ञानी को संसार में भी रख सकती है। मां की इच्छा से जीव जगत हुए हैं। वह इच्छामई है। तो जैसे ही ठाकुर ने ऐसा कहा तो मुख ने ठाकुर को सामने प्रश्न किया कि उनकी इच्छा यह बात कैसी हो गई? ईश्वर को तो क्या कोई अभाव है? क्योंकि अभाव होने से ही तो इच्छा प्रकट होगी। यदि सब कुछ अह प्राप्त है किसको? वह किसी तरह की इच्छा नहीं करेगा। तो ठाकुर ने साथ में ही कहा कि उसमें दोष क्या है? जल स्थिर रहने पर भी जल है, तरंग होने पर भी जल है। और यह जो ठाकुर की बात है, इसको लेकर के हमने काफी विस्तार से चर्चा की थी कि किस तरह से ठाकुर का यह लीला का जो कांसेप्ट है, अद्वैत वेदांत का माया का कांसेप्ट है और ठाकुर का यह लीला का कांसेप्ट है। तो, यह किस तरह से यह ठाकुर का कांसेप्ट हमने वो काफी डिटेल में डिस्कशन किया था। अभी ठाकुर बाद में यह उदाहरण भी देते हैं कि सांप जब चुप करके कुंडली बनाकर के पड़ा हुआ है तो भी सांप है और वह जब सर्पाकार गति से गति करता है तो भी सांप है। बाबू जब चुपचाप बैठे हुए हैं तब भी वह वही बाबू है और जब कार्य कर रहे हैं तब भी वही बाबू है। और फिर कहते हैं ठाकुर कि जीव और जगत को बाद दे देंगे तो फिर किस तरह से यह आप आप यदि ब्रह्मन का डेफिनेशन या तो ब्रह्म की व्याख्या करेंगे उसमें से जीव और जगत को बाद दे देंगे तो कैसे चलेगा ऐसा करने से तो वजन में कम पड़ जाएगा अर्थात वजन में कम होने का क्या अर्थ है एक बेल फल है बेल फल का भीतर का पल्प है भीतर का मावा है जो कि खाद्य पदार्थ है किंतु ऊपर का जो हार्ड शेल जो है वह जो सख्त आवरण जो है उसको तो हम खा नहीं सकते। फिर बेल का जो मावा जो है पल्प जो है उसके भीतर में जो सीड्स जो होंगे बीज होंगे उसको भी नहीं खा सकते। तो खाने के लिए अवेलेबल है सिर्फ यह पल्प। तो पल्प को सेपरेट कर दिया। फिर यह शेल और सीड्स को सेपरेट कर दिया। तो ठाकुर कहते हैं ऐसा करने से वजन में कम हो जाएगा। तो फिर और एक उदाहरण देते हैं। ब्रह्म निर्लिप्त है। वायु में सुगंध और दुर्गंध दोनों मिलता है। किंतु वायु निर्लिप्त है। ब्रह्म और शक्ति अभेद वही आध्या शक्ति से जीव जगत हुआ। तो यह जो पूरा डिस्कशन हमने किया था तो मैंने किया क्या कि मैं तो यह वीडियो को YouTube पर अपलोड करता हूं। तो यह YouTube का लिंक मैंने नोटबुक एलएम में बिठाया और फिर वहां पर मैंने इसको कहा कि इसके ऊपर में एक स्लाइड शो बनाओ। तो देखिए इसने यह स्लाइड शो बनाया है। मैं आपके साथ में यह शेयर कर रहा हूं। स्लाइड शो इट इज वेरी इंटरेस्टिंग एक्चुअली।
Slide 1: टाइटल पेज पे दक्षिणेश्वर का चित्र
हां, यह आप देख रहे हैं। राइट? देखिए कि किस तरह से है कि पहले तो देखिए कि यह दक्षिणेश्वर का चित्र दिया है। फर्स्ट स्लाइड 15 स्लाइड है यहां पे। पहली स्लाइड में देखिए कि उसने टाइटल बनाया है अनफोल्डिंग रिवुलेशन अ डिस्कोर्स ऑन वेल्थ विडम एंड रियलिटी। आई इनाइट्स फ्रॉम श्री रामकृष्ण 16th दिसंबर 1883। यह है टाइटल बहुत ही सुंदर बनाया है। किंतु थोड़ा सा आप देखेंगे इसके साथ में प्रॉब्लम क्या है। देखिए कि यह जो है ना यह एक्चुअली यहां पर देखिए वैसे तो आपको पहली दृष्टि से ऐसा दिख रहा है कि यह गंगा का दृश्य है। गंगा के किनारे दक्षिणेश्वर मंदिर बनाया है। किंतु देखिए कि ये शिव हमको तो पता है। गंगा के किनारे से हमको यह शिव मंदिर दिखते हैं। जो द्वादश शिव मंदिर है वही दिखते हैं। तो यहां पर उसने तीन ही शिव मंदिर दिखाए हैं। बाकी का यह जो पार्ट जो दिखाया है एक्चुअली यह मंदिर के पीछे का पार्ट है। काली मंदिर के पीछे में वो जो गाजी पुकुर है वहां पे इस तरह का डिजाइन है। तो इसने किया क्या है? यह तीन शिव मंदिर रख दिए हैं। फिर यह जो पीछे का पार्ट है उसको ले लिया है। फिर इसको गंगा के साथ में मर्ज कर दिया है। यानी कि देखिए कि यह बनाता है तो सब चित्र वैसे बहुत अच्छा है। किंतु इसमें यह छोटी-छोटी गड़बड़ रह जाती है। तो एनीवे यहां पर
Slide 2: जो लोग योगभ्रष्ट है, वे भक्त बन धनि परिवारों में जन्म लेते हैं
देखिए कि सबसे पहले तो यह योग भ्रष्ट के बारे में ठाकुर कहते हैं और ये स्लाइड बहुत सुंदर बनाया है। क्या कहते हैं? द फॉर्चूनेट फॉल यानी योग भ्रष्ट द सीन इज़ सेट एट दक्षिणेश्वर दिसंबर 16 श्री रामकृष्ण एड्रेसेस ह डिवोटीज विथ सरप्राइजिंग कॉम्प्लीमेंट यू हैव वेल्थ एंड लग्जरी एंड येट यू कॉल अपॉन गॉड दिस इज़ एक्सीलेंट ये ठाकुर एक सरप्राइजिंग कॉम्प्लीमेंट देते हैं सी सरप्राइज कॉम्प्लीमेंट देना यह शब्द इट इज़ वेरी यूनिक माने इसने सोचा है इट्स अ वेरी सरप्राइजिंग ही कनेक्ट्स दिस रेयर कॉम्बिनेशन टू द कांसेप्ट इन इन द गीता ऑफ द योग भ्रष्ट गीता में योग भ्रष्ट का कांसेप्ट है। उसके साथ में ठाकुर इसको कनेक्ट करते हैं। अ सोल हु हैज़ फोलन फ्रॉम द पाथ ऑफ योगा इन पास्ट लाइफ एंड इज़ रिबोर्न इनू प्रोस्पेरस एंड पायस होम टू कंटिन्यू देयर जर्नी। योग भ्रष्ट कौन है? जो पहले जन्म में तो काफी उसने यह प्रगति की है योग में। किंतु फिर कहीं ना कहीं उसने कुछ गड़बड़ कर दी। फिर उसका मृत्यु हुआ तो एक धनी के घर में उसने जन्म लिया। धनी और भक्त दोनों तो यहां पर देखिए यह धनी और भक्त ये दोनों का कॉम्बिनेशन दिखाने के लिए उसने इमेज भी कैसा यूज किया है। देखिए इसका अकल कैसे चलता है। भक्ति का सिंबल है माला और धन का सिंबल है यह सोने की अंगूठी। यह मैंने जब थोड़ा सा ध्यान से पहले मैंने देखा कि अच्छा ठीक है कि एक इमेज दे दिया है माला वाले का माले माला जप का क्योंकि तो योग योगी को दिखाना है कि थोड़ा सा ध्यान से देखेंगे देखा तो मैंने देखा कि ये सोने की अंगूठी भी पहनाई है। यानी कि क्या है कि ये धनी के घर में भक्त होकर के जन्मा है। तो दोनों दिखाना है। वेल्थ भी दिखानी है और डिवोशन भी दिखाना है। तो इतना परफेक्ट उसने यह पिक्चर बनाया है। अच्छा अभी इस बात को लेकर के मैंने एक
Slide 3: जो लोग योगभ्रष्ट है, वे भक्त बन धनि परिवारों में जन्म लेते हैं, नहीं की "बड़े बाप की बिगड़ी औलाद" हो कर के
डिस्कशन किया था। उसमें इस तरह से मैंने डिस्टिंशन दिया था कि भले ही यदि योग भ्रष्ट है धनी के घर में जन्म ग्रहण करता है। किंतु देखिए कि धनी के घर में सिर्फ जन्म ग्रहण करने से ही नहीं होगा। उसके भीतर में भक्ति भी होनी चाहिए। वरना तो फिर हमने यह मूवीज वगैरह में देखा है। तो बड़े बाप की बिगड़ी औलाद ऐसा हमने काफी देखा है। पिताजी के पास में पैसे बहुत है और फिर उसका लड़का है। वह इस तरह का वह गुंडा बदमाश होकर के घूमता है कि सबको परेशान करता है। तो यह जो मैंने बात कही थी तो इसने इसके ऊपर में यह स्लाइड बनाया है। अ क्रिटिकल डिस्टिंशन द स्पिरिचुअल हेयर क्रिटिकल डिस्टिंशन है कि ये जो धनी के घर में जो जन्म ग्रहण करता है भक्त होकर के नहीं कि दुष्ट होकर के तो यह की इनसाइड श्री रामकृष्ण एड्स अ क्रूशियल क्वालिफायर द सोल इज रिबर्न एज अ डिवोटी इन अ वेल्थदी होम दिस इज द की धनी के घर में भक्त होकर के जन्म ग्रहण करता है ठाकुर यह बात स्पेसिफिकली बताते हैं। फिर यहां पे देखिए द कॉमन ट्रॉप द स्पोइल्ड हेयर एक जनरली एक माना जाता है कि यदि ब जिसके पिता के पास में बहुत पैसा है पॉलिटिकल पावर है उसका लड़के का दिमाग ये पैसे और पावर की वजह से शायद करप्ट हो गया है। सोसाइटी इज फमिलियर विद दी बड़े बाप की बिगड़ी औलाद। यह सीधा उसने हिंदी में रख दिया। इसको ट्रांसलेट करने का भी क्योंकि इसका ट्रांसलेशन होगा नहीं तो एज इट इज़ हिंदी में रख दिया है कि सोसाइटी फमिलियर है। अनडिसिप्लिंड सेल्फिश एंड अनेबल टू एप्रिशिएट देयर प्रिविलेज। दिस पैटर्न इज कॉमन। ये केओटिक पैटर्न ये जनरली जिनके पास में पैसा है, पावर है उनके लड़कों में यह दिखता है। किंतु अ क्रिटिकल डिस्टिंशन यह देखिए बीच में एक डिवीजन बनाया है। यहां पे क्या कहता है? द रेयर फिनोमिनन द स्पिरिचुअल हेयर किंतु रेयरली ऐसा होता है कि जिसके पास में पैसा है, धन है, वैभव है, प्रेस्टीज है और उसका जो संतान है, उसके जो लड़के लड़कियां हैं हाईली स्पिरिचुअल होते हैं। वेल्थदी येट हंबल पैसा है किंतु विनम्र है। पावरफुल येट डिवोटेड पावर भी है किंतु डिवोट डिवोशन भी है। दिस इज एक्सेप्शनली रेयर। यह बड़ा ही रेयर है। हिस्ट्री ऑफर्स एग्जांपल्स लाइक ध्रुव और मीराबाई कंज्यूम्ड बाय डिवाइन लव फ्रॉम चाइल्डहुड। इतिहास में देखेंगे ध्रुव या मीराबाई का उदाहरण कि बचपन से ही राजा के घर में जन्म ग्रहण करने के बावजूद इनके पास उनके हृदय में ईश्वर के प्रति भक्ति थी। तो देखिए यह मीराबाई का एक सिंबॉलिक उसने ड्राइंग किया है। वि इज वेरी गुड। एक्चुअली मैं थोड़ा ध्यान से देखा। यह ड्राइंग बहुत ही सुंदर बनाई इसने। अच्छा द रियलाइज सोल इन द
Slide 4: आत्मज्ञानी संसार में रहते है वासना-मुक्त हो कर
वर्ल्ड। यह जो जिसके पास में आत्मज्ञान प्राप्त हो गया है वो कैसे रहेगा? इफ द डिवाइन मदर विश शी कैन कीप इवन ए ज्ञानी इन द वर्ल्ड। ठाकुर कहते हैं यह जो हमने देखा ना कि मां की यदि इच्छा है तो मां ज्ञानी को भी जगत में संसार में रख सकती है। और फिर हमने जो उसका डिस्कशन किया था तो यहां पे उसका एक सार उसने दे दिया है। द अल्टीमेट टेस्ट ऑफ रियलाइजेशन इज नॉट एस्केपिंग द वर्ल्ड बट रिमेनिंग अनटच्ड बाय इट। यह जगत ये जो रियलाइजेशन अर्थात कि आत्म साक्षात्कार का यह असली यह टेस्ट क्या है कि जगत में रहकर के भी वह आध्यात्मिक हो सकता है। माने मां मां मां का बेस्ट उदाहरण है कि ठाकुर की महासमाधि के बाद में मां ने सोचा था कि अभी देह रहे कि जाए कुछ फर्क नहीं पड़ता। किंतु देखिए कि मां ने फिर ठाकुर ने ही आकर के मां को बार-बार दर्शन दिए थे और फिर यह राधु की माया लगा दी थी मां को बोलकर के मां फिर देखिए कि उसने 1920 तक देह धारण करके इतने सारे भक्तों को इतना आध्यात्मिक ज्ञान बांटा था। तो यहां पर प्राइम एग्जांपल के रूप में मैंने ठाकुर की ही जो बात की थी कि श्री रामकृष्णास ओन लाइफ इज द ग्रेटेस्ट एविडेंस आफ्टर अटेनिंग द हाईएस्ट स्टेट ऑफ निर्विकल्प समाधि ही लिव्ड इन द वर्ल्ड एंड वाज़ मैरिड। दिस वाज़ नॉट अ कंप्रोमाइज बट अ पाथ सेंशंड बाय हिज ओन गुरु तोतापुरी हु सो इट एस द अल्टीमेट टेस्ट ऑफ ह अटेनमेंट। आत्म साक्षात्कार के बाद में निर्विकल्प समाधि के बाद में उन्होंने अपनी पत्नी के साथ में मां शारदा के साथ में रहना प्रारंभ किया था। क्योंकि मां जब 1872 में 1872 में जब दक्षिणेश्वर आई ठाकुर के साथ में रहने के लिए बाय दैट टाइम ठाकुर ने निर्विकल्प समाधि वगैरह जो भी साधनाएं हैं वह संपूर्ण कर दी थी। और यह जो हम डिस्कशन कर रहे थे कि किस तरह से ठाकुर और मां साथ में रहते थे। तो ठाकुर ने गंभीरानंद जी ने उस समय हमको तोतापुरी का साथ में जो वार्तालाप हुआ था वह बताया था कि तोतापुरी ने ठाकुर को कहा कि शादी नहीं करना अकेले रहना वह तो आसान है किंतु यदि सिद्धि प्राप्त होने के बाद में यदि पत्नी के साथ में रह सकते हो तो वही तुम्हारा अल्टीमेट टेस्ट और अल्टीमेट सक्सेस होगा। तो यह बात जो कि गंभीरानंद जी ने कही थी जो कि हमने डिस्कस की थी तो उसने यहां पर लिखी है और यह पिक्चर भी बड़ा सुंदर बनाया है। कीचड़ के भीतर में कमल खिला है। यह अकल भी उसने कहां से ली म इनसाइट काफी अच्छा है कि संसार के भीतर में देखिए कि कमल रूपी आध्यात्मिक सिद्धि प्राप्त करके ठाकुर और या तो कोई भी सिद्ध पुरुष रह सकता है। फिर
Slide 5: "नेति नेति" या "इति इति"
देखिए कि द पाथ ऑफ निगेशन वर् वर्सेस द स्टेट ऑफ़ेशन नेति नेति और इति इति इसका जो हमने डिस्कशन किया था तो यह डिस्कशन को यह दो चित्र बना के रिप्रेजेंट करता है। नेति नेति का जो रास्ता है वह क्या है कि जगत में जो कुछ भी है वह सब माया है। सब भ्रम है। सब क्षण भ्र क्षण भंगुर है। सब प्रपंच है। सबको त्याग करके जो अल्टीमेट ब्रह्म ज्ञान है आत्म साक्षात्कार है उसको प्राप्त करना है। तो ये अल्टीमेट साक्षात्कार के रूप में ये स्टार बताया है और यह जो साधना है नीति नेति की इसको साधन के रास्ते के बारे रूप में बताया है। इतना सिंपल ड्राइंग में इतना डीप कांसेप्ट यह बताता है। किंतु जो ज्ञानी है उसके लिए इति इति जो कुछ भी है इस जगत में जीव जगत ईश्वर पेड़ पौधे पशु पंखी सब कुछ वही है जिसको कि मैंने अपने हृदय में साक्षात्कार किया ठाकुर की फेमस कहानी कि यह सीढ़ी चढ़ते-चढ़ते हम जा ऊपर जाते हैं कहते हैं कि यह सीढ़ी भी वह नहीं है। फिर यह जो ईंट, रेती, पत्थर वह कुछ भी यह सत्य नहीं है। बोल कर के छत पे जाते हैं। छत पे जाकर देखते हैं कि जिस चीज का यह ईश्वर तो या तो ब्रह्मण है, वही चीज का सब कुछ बना हुआ है। फिर वो इति इति करके नीचे आता है। तो यह इति इति के पाथ को सूर्य के रूप में दिखाया है। सो इट्स वेरी गुड। एक्चुअली डिजाइन बहुत अच्छी है। अच्छा देखिए
Slide 6: ईश्वर की इच्छा से जिव-जगत हुए है. परन्तु जो पूर्ण-काम है वो इच्छा करेंगे ही क्यों?
पैराडॉक्स ऑफ डिवाइन विल फिर वह जो मुखज्ज ने ठाकुर को पूछा था देखिए यह जो सर्कल है ना छोटा वाला सर्कल उसमें वो डिवोटी ने वो मुख ठाकुर को क्या पूछता है वह बताया है कि मुखर्जी मुखर्जी एंगेजिंग वि श्री रामकृष्ण स्टेटमेंट अबाउट द डिवाइन मदर्स विल पोज़ेस अ पॉइंटेड फिलॉसोफिकल क्वेश्चन कि डिवोटिस चैलेंज कि हाउ कैन द डिवाइन मदर हैव ए विल और डिजायर तो वेदांतिक लॉजिक कि डिजायर स्टेम्स फ्रॉम ए सेंस ऑफ लेक और इनकंप्लीटनेस द एब्सोल्यूट इज बाय डेफिनेशन होल कंप्लीट एंड लेक्स नथिंग देयर फॉर इट कैन नॉट डिजायर और विल एनीथिंग इट इज डायरेक्ट चैलेंज टू द आइडिया ऑफ एन एक्टिव क्रिएटिव गॉड हेड तो यहां पे प्रश्न किया है कि जो ईश्वर है जो लीलामय है लीला पति है माने लीलाधीश्वर है। वह लीला क्यों करते हैं? तो दिस क्वेश्चन और फिर यहां पे जो ठाकुर ने
Slide 7: ईश्वर इच्छा करते है तो उसमे गलत क्या है: जब वो स्थिर हो कर रहते है तब ब्रह्म, जब कार्य करते है तब शक्ति
जितने भी उदाहरण दिए थे सब कि जो जल स्थिर है वह भी जल है। तरंगायित जो है वह भी जल है। कोई फर्क नहीं पड़ता। जो सांप है कुंडली बनाकर के बैठा है वह भी सांप है और जो तिर्यक गति से चलता है वह भी सांप है। एक आदमी है चुपचाप बैठा है वही वही आदमी है और वह जो उठकर के कार्य करता है वह भी वही आदमी है। ठाकुर ने यह जो ब्रह्म और शक्ति यह जो हमको बताया उसके तीन उदाहरण हमको यहां पर दिखते देखने को मिलते हैं। और यह लाइन ड्राइंग से ही बनाया है। व्हिच इज वेरी ब्यूटीफुल। और फिर स्टिलनेस इन द
Slide 8: ब्रह्म और शक्ति अभेद
डांस। ब्रह्मन एंड शक्ति आर नॉन डिफरेंट। ब्रह्मन है एब्सोल्यूट। और उसमें अनचेंजिंग, अनमूविंग, स्टैटिक बिय्ड ऑल एक्टिविटी। दिस इज द कॉम वाटर एंड कोइल्ड स्नेक। और यह शक्ति यह जो तरंग है द इनहेरेंट क्रिएटिव पावर ऑफ द एब्सोल्यूट द डायनेमिक एक्टिव प्रिंसिपल दैट मैनिफेस्ट एस द एंटायर यूनिवर्स ऑफ बीइंग्स एंड वर्ल्ड्स दिस इज द वेव्स ऑन द वेटर वाटर द मूविंग स्नेक और फिर देखिए कि कर्म का अह
Slide 9: कर्म और लीला
रास्ता और यह लीला एक्शन फ्रॉम लेक वर्सेस प्ले फ्रॉम फुलनेस कर्म यह सिंबल भी कितना सुंदर है कि अभाव होता है तो अभाव के मारे हम कार्य करते हैं। किंतु जब मन भाव से भरा हुआ है तो फिर जो कार्य होता है वह कार्य नहीं होता वह लीला होती है। क्यों? क्योंकि कर्म करने से कर्म का बंधन जो है वह आकर के लगता है। जबकि लीला करने से कोई भी कर्म का बंधन नहीं लगता। कर्म के बारे में क्या लिखा है? ड्रिवन बाय नीड डिजायर एंड अ सेंस ऑफ लेक अभाव। वी एक्ट टू फुलफिल अ पपस टू गेट समथिंग वी डोंट हैव। दिस टाइप ऑफ एक्शन क्रिएट्स बॉन्डेज। और लीला क्या है? डिवाइन प्ले अराइज़ेस फ्रॉम एब्सोल्यूटफुलनेस। जॉय एंड कंप्लीटनेस। इट इज स्पॉनटेनियस, पर्पसलेस एंड फ्री। द डिवाइन क्रिएशन इज लीला। और फिर ठाकुर की यह जो एनालॉजी है कि एक मधुमक्खी है जब तक वह मधु की सर्च करती करती मधु की खोज करती करती घूमती है तब तक वह भन-भन करके आवाज करती है। किंतु फिर जब एक बार फूल पर बैठ जाती है। मधपान प्रारंभ कर देती है तो कंप्लीट साइलेंट हो जाती है। और किंतु जब मधपान करके पेट भर गया है। संतुष्ट चित्त हो गया है तब वह लेटी-लेेटी गुनगुन करके गान करती है। तो यह लीला जो है भरे पेट संतुष्ट मन से स्पॉनटेनियस जो क्रिया होती है वह है लीला और कर्म क्या है कि पेट में भूख है अभाव है तृष्णा है उसको पूर्ण करने के लिए कोई चीज को प्राप्त करनी है। यह करने से यह देखिए कर्म करने से कर्म का फल जो है पत्थर को ऊपर धकेलेंगे तो कभी-कभी अपना हाथ छूट जाएगा वो पत्थर आकर सिर सीधा अपने सर पर टकराएगा तो ये कर्म का सिंबल सुंदर किया है और यह जो गार्डन है वो ये लड़की गार्डन में खेल रही है इस अ कंप्लीटली फ्री जॉयफुलनेस और फुलफिलमेंट का माने संतुष्टि का प्रतीक वेरी गुड डिजाइन और फिर यह बेल
Slide 10: जीव, जगत, और ईश्वर मिल के ही पूर्ण होता है
फल का जो उदाहरण ठाकुर ठाकुर ने दिया कि बेल फल है तो बेल फल में दो चीज होती है। एक तो उसका पल्प होता है। यह कटोरी में पल्प निकाल करके रखा है और बाहर में यह शेल है और बीज रख दिया है। और फिर ठाकुर कहते हैं कि सिर्फ यह जो पल्प है उसका वेट करेंगे तो वह वजन में कम हो जाएगा। यह बेल फल का वजन और यह पल्प का वजन दोनों को यह त्राजवे में यह जो स्केल वेइंग स्केल जो है त्राजू उसमें रखेंगे। एक ओर बेल फल दूसरी ओर उसका पल्प तो क्या है कि वह पल्प जो है वजन में कम हो जाएगा। यानी ठाकुर कहते हैं कि जीव और जगत को छोड़कर के आप ब्राह्मण की कल्पना नहीं कर सकते हैं। सो डिजाइन देखिए कितना सुंदर बनाया है और फिर
Slide 11: द्वैत, अद्वैत, और श्रीरामकृष्ण वेदान्त
हमने तीन जो डिस्टिंक्ट आइडियाज है उसको देखा था कि डिवालिज्म यानी कि द्वैत क्या है कि एक ईश्वर है एक जगत है। फिर अद्वैत के बारे में हमने देखा था सिर्फ ब्रह्मन ही है और यह माया है। माया का अपना कोई अस्तित्व नहीं। 100% ब्रह्मन ही है। किंतु ठाकुर का जो विज़न है ब्रह्मन और शक्ति यह दोनों कहेंगे कि यह एसेंशियल पार्ट ऑफ द रियलिटी। यह अद्वैत वेदांत में जिसको माया कह के या तो फिर अविद्या कह के उड़ा दिया है जिसको उसी को ठाकुर शक्ति कह के उसकी आराधना करते हैं। सो दिस इज ये डिफरेंट टाइप ऑफ वेदांतिक फिलॉसोफी और फिर ठाकुर
Slide 12: धुंआ आकाश को काला नहीं करता
का वही जो उदाहरण कि जब धुआं जो है धुआं दीवाल को लगता है तो दीवाल पर काली मां लग जाती है। किंतु आकाश में जब धुआं फैलता है तो आकाश काला नहीं होता। सो यह डिज़ाइन भी देखिए कितना परफेक्ट बनाया है। और वन इज
Slide 13: जब स्थिर है तब ब्रह्म, जब कार्य करते है तब शक्ति
स्टिल एंड द वन डांससेस। यह ब्रह्म और शक्ति कि ब्रह्म स्थिर है, अचल, अटल, निष्क्रिय है। और शक्ति जो है वह क्रिया करती है, कर्म करती है। देखिए यह जो शक्ति की जो पैटर्न बनाई है उसमें यह डीएनए भी बनाया है और यह पेड़ भी बनाया है। यह फूल भी रखे हैं और यह वेव्स वगैरह भी रखे हैं। सो वेरी ब्यूटीफुल डिजाइन। और फिर कोर
Slide 14: core insights
इंसाइट। यह जो पूरा डिस्कशन हुआ उसमें से कोर इनसाइट क्या है? द यह जो स्पिरिचुअल फॉर्च्यून कैन एकिस्ट अलोंग साइड वर्ल्डली प्रोस्पेरिटी। द की इज एन इनेट डिवोशनल नेचर। पैसा भी है और भक्ति भी है। यह दोनों हो सकता है। देखिए एक ओर तो डायमंड रखा है। दूसरी ओर जपमाला रखी है। बड़ा ही सुंदर डिजाइन। आईडिया देखिए इसका। तो यह दोनों जपमाला और यह हीरा डायमंड दोनों एक साथ में रह सकते हैं। यदि हमारा जो बेसिक नेचर है वह यदि डिवोशनल या तो तपस एक योगी का नेचर हो। फिर और एक क्या है? एब्सोल्यूट एंड क्रिएटिव पावर। ब्रह्मन और शक्ति दोनों अभेद है। एक ही है। जब कर्म करता है तो शक्ति है, स्थिर है तो ब्रह्मन है। फिर अल्टीमेट रियलाइजेशन इज नॉट अबाउट एस्केपिंग द वर्ल्ड बट ट्रांसेंडिंग इट्स इनफ्लुएंस व्हाइल लिविंग विद इन इट। अल्टीमेट रियलाइजेशन। जगत छोड़कर के भाग नहीं जाना है। जगत को ही ब्राह्मण के रूप में देखकर के। जगत की यह जो लिमिटेशन है जगत के साथ में इंद्रिय सुख का जो हमारा संबंध है उस संबंध को ट्रांसफॉर्म करके ट्रांसेंड करके जगत को ब्रह्म के रूप में ही देख के उसमें रहना है और फिर क्रिएशन इज नॉट अ वर्क ऑफ नेसेसिटी और डिजायर बट अ स्पॉनटेनियस जॉयफुल प्ले यह जब हम संसार में रहेंगे संसार को ब्राह्मण के ही एक माने अह ब्रह्मण और शक्ति यह शक्ति के खेल के रूप में ही जब हम देखेंगे तब जब कर्म करेंगे वह जैसे कि संतुष्टि प्राप्त करने के बाद में मधुमक्खी जिस तरह से गान करती है इस तरह का कर्म होगा नहीं कि अभाव के मारे इंद्रियों के सुख को प्राप्त करने के लिए इंद्रियों के विषय को प्राप्त करने के लिए जो कर्म करते हैं जिससे कि हम बंधन में बंधते हैं वह नहीं आनंद से जो कर्म कर्म होता है वही कर्म होगा और उसमें किसी भी तरह का बंधन नहीं होगा।
Slide 15: Conclusion
सो दी आर द फोर कोर इनसाइट्स और फिर ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु ये जो मैं आखिर में जो करता हूं ना वो शांति शांति मैं दिस बी एन ऑफरिंग टू श्री रामकृष्ण देखिए दिस इज वेरी इंटरेस्टिंग इसकी लिमिटेशन भी है। लिमिटेशन यही है। यह हमने एक देखा कि दक्षिणेश्वर का जो चित्र बनाया है वैसे यह है बड़ा ही सुंदर। पहली दृष्टि से मैं बहुत खुश हो गया था कि इतना सुंदर उसने बनाया है। किंतु देखिए कि यह छोटी-छोटी गलतियां उसमें रह जाती है। तो दिस इज व्हाट एआई इज कि हेल्पफुल भी है और उसका लिमिटेशन भी हमको समझना है। सो एनीवे सो अभी तो आज का जो सब्जेक्ट है अभी उसकी ओर चलते हैं। ऑलरेडी हमने पिछली बार का समरी तो देख ही लिया। अभी देखिए कि इस बार ठाकुर कहां से प्रारंभ करते हैं। अभी यह
कामिनी-कांचन ही माया है — बस ये दो मन से हटाइए, योग अपने-आप होगा
पिछली बार हमने योग भ्रष्ट की बात देखी थी। ठाकुर ने मुख जी को कहा कि आप योग भ्रष्ट होंगे। पिछले जन्म में शायद इसलिए धनी के घर में वैभवशाली के घर में जन्म ग्रहण किया है। या तो फिर आपने मेहनत करके धन उपार्जन किया है जो भी है। किंतु साथ में ही भक्त का नेचर है आपका। तो यह जब ठाकुर ने कहा तो मुख सामने प्रश्न करते हैं कि केनो योग भ्रष्ट होए योग भ्रष्ट क्यों होता है कोई भी तो ठाकुर क्या कहते हैं गर्भ छिलाम जोगे छिलाम भूमे पड़े खेला माटी जब तक मैं गर्भ में था मैं योग में था भूमि में आकर के मिट्टी खानी पड़ी ओरे धात्री ते केटे छे नाड़ी माया बेड़ी किसे काटी ये जो नाड़ी जो है वह तो धात्री काट देती है। किंतु यह जो माया का बंधन है उसको मैं कैसे काटूं? तो यह एक गीत है एक्चुअली तो ठाकुर उसकी एक कड़ी गाते हैं। किंतु साथ में ही उत्तर देते हैं। कामिनी कांचन ही माया मन थेके ओई दुटी गले ही जोग कामिनी और कांचन ही माया है। जैसे ही मन में से वह चला जाएगा साथ में ही योग हो जाएगा। देखिए वह जो योग सूत्र का जो फेमस सूत्र है कि पानी तो बह ही रहा है वो किसान को क्या करना है? पानी को सिर्फ चैनलाइज कर देना है जिससे कि उसके खेत में पानी आना शुरू कर दे। तो यह जो कांसेप्ट है कि ईश्वर की कृपा वही ठाकुर का वही जो दूसरा उदाहरण कि कृपा रूपी पवन तो है वह तो बह ही रहा है। आपको वह जो आपका सेल है सड़ है उसको आपको खोल देना है। जैसे ही आपने सेल खोल दिया वैसे ही नौका पवन में बहना शुरू कर दी। तो यहां पर भी देखिए कि मन के भीतर में इंद्रियों के रस के जो भी विषय है उनके प्रति एक प्रचंड आकर्षण होता है। तो यदि इस आकर्षण को काट दे तो साथ-साथ में ही हजार साल का अंधेरा कमरा है। उसमें जैसे ही बत्ती जलाया तो साथ में ही प्रकाश फैल गया तो ऐसा होगा। यानी कि देखिए कि आध्यात्मिक यात्रा अपनी बात यह नहीं है कि अध्यात्म को प्राप्त करना है। अध्यात्म को प्राप्त करना है। किंतु क्या है कि आध्यात्मिक सिद्धि जो है ईश्वर का जो ईश्वर की कृपा करुणा है यदि हम द्वैत वेदांत को फॉलो करते हैं और यदि अद्वैत को फॉलो करते हैं तो ब्रह्म ज्ञान या तो आत्म साक्षात्कार है वह अपने हृदय में ऑलरेडी बैठा हुआ है। हमको तो सिर्फ उसको रियलाइज करना है। जब तक हम उसको रियलाइज नहीं करेंगे तब तक हमको ऐसा ही लगेगा कि अरे मैं अज्ञानी हूं। अरे मैं पापी हूं। और फिर ये देखिए बहुत बार क्या होता है ना कि आप किसी को बार-बार खोजते रहते हैं। तुम पापी हो, तुम अज्ञानी हो, तुम मूर्ख हो, तुम दुष्ट हो, तुम किसी काम के नहीं। तो फिर ऐसे लोगों के मन में ना एक बात ऐसी बैठ जाती है कि चलो मैं पापी ही हूं। मैं दुष्ट ही हूं, मैं निकम्मा ही हूं तो फिर इस जगत को भोग लेते हैं। फिर यह हम क्यों माने यदि मेरे पास में ईश्वर प्राप्ति के लिए कोई उपाय ही नहीं है। तो एटलीस्ट ईश्वर नहीं मिला तो हम माया का तो आनंद उठा लें। ईश्वर नहीं मिलेगा। नहीं ही मिलने वाला है। यह सब कुछ ठीक करके बैठे हैं। तो फिर क्या होगा कि आप और गहराई में पाप की और गहराई में पाप रूपी गहरे गड्ढे में और ज्यादा डीप में जाकर गिरेंगे। तो इसलिए क्या है कि वह जो स्वामी जी अमेरिका गए थे देखा वो स्वामी जी ने वहां पर देखा ठाकुर ने यहां पर देखा था वो ठाकुर ने कहा कि कोई एक क्रिश्चियन लोगों की एक किताब लाकर के पढ़ रहा है उसमें देखा सिर्फ पाप और पाप पाप ही है उसमें जैसे कि ये स्वामी जी जब अमेरिका गए थे तो वही उन्होंने देखा कि यह जो अमृतस्य पुत्रा वयं हमने जब वी आर द इनहेरिटर र्स ऑफ दिस डिवाइन लिगसी जब इस तरह की बातें उन्होंने करना शुरू किया तब वे लोग कितना आकर्षित हो गए थे स्वामी जी से और स्वामी जी के अद्वैत वेदांत से तो देखिए कि जब हम यह कहते हैं कि मैं पापी हूं मेरे भीतर में अंधेरा है। अंधेरे को बाहर से कहीं किसी चीज से लाकर के मुझे पूर्ण करना है तो कभी-कभी हम डिसरेज हो जाएंगे। किंतु यह तो पॉजिटिव फिलॉसोफी है। तो वेदांत वेदांत कहता है कि उजाला हमारे भीतर में ही है। बस हमको अंधेरा जो है उसको हटा देना है। ये अंधेरा क्या है? तो वह है यह काम और कांचन के प्रति हमारा आकर्षण। तो देखिए यह बात दोनों ओर से चलती है। प्रश्न यह होगा कि काम और कांचन के प्रति जो आकर्षण है उसको कैसे हटाएं? तो उसको उजाला ला के यानी कि कमरा अंधेरा है तो अंधेरे को तो हम हटा नहीं सकते। कमरे में तो हमको उजाला लाना है। लाइट का स्विच ऑन करना है। अंधेरे का अपना कोई अस्तित्व नहीं है। अंधेरे के साथ में फाइट करने से जो छोटा बच्चा होता है ना अपनी परछाई से डरता है। तो अपनी परछाई के साथ में आप फाइट करेंगे क्या? उसके म श टू बॉक्स विथ आवर शैडोस। इंग्लिश में कहते हैं अपने अपने ही परछाई के साथ में फाइट करना। तो काम कांचन को मन में से निकालना वो इसी तरह का है जैसे कि अपनी परछाई के साथ में फाइट करना। वो कभी हम इसमें जीतेंगे नहीं। हम परेशान ही होंगे और हमारा हाथ ही टूटेगा। क्योंकि दीवार के साथ में आप फाइट करेंगे। अंधेरा तो परछाई तो दीवार पे ही गिरती है। दीवार को आप ये पंच करेंगे बॉक्सिंग करेंगे तो अपना ही हाथ टूटने वाला है। उससे तो कुछ मिलने वाला नहीं। यानी कि यह बात स्पष्ट रूप से ख्याल में रखनी है कि मन में से काम कांचन हटाना है। किंतु साथ में ही यह बात भी स्पष्ट रूप से ख्याल में रखनी है कि रास्ता है यह चार योग का समन्वय कर्म ज्ञान भक्ति और ध्यान चार का समन्वय करें ना कि एक या दो का करें या सिर्फ एक दो या तीन का करें ना कि सिर्फ एक ही योग उसको हम प्रैक्टिस करें। किंतु योग का प्रैक्टिस जो है वह रास्ता है और साथ में ही माने देखिए अह दो इतना हमको क्या-क्या ख्याल में रखना है। सर्वप्रथम तो आप काम कांचन को डायरेक्ट नहीं भगा सकते हैं। वह अपनी परछाई की तरह है। काम कांचन से युद्ध करना यानी अपने इंद्रियों के विषयों के प्रति आकर्षण है। उसके साथ में फाइट करना यानी कि पत्थर की दीवार पे सर पटकने के बराबर है। यह कार्य कभी सफल नहीं होगा। तो यह एक कोर टीचिंग है। नंबर वन नंबर टू है कि योग के माध्यम से उपासना, साधना, स्पिरिचुअल प्रैक्टिस उसी के माध्यम से हम लोग काम और कांचन के प्रति अपने आकर्षण से मुक्त हो पाएंगे। ठाकुर जैसा कहते हैं जितना हम सूर्य की ओर जाएंगे उतना ही हम पृथ्वी से दूर होते जाएंगे। तो सूर्य की ओर जाने की साधना है नहीं कि पृथ्वी से दूर होने की साधना वो इस तरह का कार्य हम कभी भी सफल नहीं हो पाएंगे। तो वह एक दूसरा टीचिंग है और तीसरा इंपॉर्टेंट है जो भी उपासना करते हैं याद रखिए कि उपासना के माध्यम से कभी ईश्वर प्राप्ति नहीं होने वाली है। उपासना के माध्यम से तो सिर्फ चित्त शुद्धि ही होगी। अल्टीमेटली ईश्वर की इच्छा पे ही यह डिपेंडेंट है। वह हमने वह मां की कहानी देखी थी कि वह ब्रह्मवादीन महाशय वो वहां काशी में रहते हैं। तो यह मां के एक सेवक काशी से कोलकाता आ रहे थे त्यागी संतान तो उनको इन्होंने कहा कि आप मां को जाकर पूछिएगा कि मैं पूरी रात भर जब ध्यान करता हूं कठोर तपस्या करता हूं तो मुझे अभी और ईश्वर साक्षात्कार में और कितनी देरी है तो यह मां ने मां के त्यागी संतान ने आकर के मां को उद्बोधन में यह बात बताई तो जैसे ही उन्होंने यह प्रश्न किया कि उनको अभी और कितना दिन है ईश्वर साक्षात् कार प्राप्त करने में तो मां साथ में ही गंभीर हो गई और मां ने कहा तुमने थोड़ा बहुत जप ध्यान तपस्या कर लिया है बोलकर के यह मत सोचो कि भगवान तुम्हारे लिए आकर के खड़े हो गए हैं तुमको मुक्ति देने के लिए उनकी जब इच्छा होगी वह तब तुमको मुक्ति देंगे हमारा कर्म है तपस्या करना योग साधना करना वह कि हमको करना है मुक्ति कब मिलेगी वह ईश्वर के हाथ में है। यानी कि देखिए कि यह कोर टीचिंग्स है। पहले तो काम कांचन त्याग ही आध्यात्मिक जीवन का फाउंडेशन है। एक बात दूसरा कि काम कांचन त्याग योग की प्रैक्टिस से ही होगा। योग साधना से ही होगा। नहीं कि काम कांचन के साथ में फाइट करके वह फाइट हम कभी जीतने वाले नहीं है। वो विदेश में यह मैनेजमेंट वाले जो होते हैं ना वे लोग कहते हैं कि रेट रेस रेट रेस अर्थात कि ये चूहों की दौड़ चूहों की रेस कम कोई भी एक कंपनी होती है। उसमें प्रमोशन प्राप्त करने के लिए लोग यह सब 10 तरह के दो नंबरी काम करते हैं। क्योंकि क्या है मेहनत करके तो प्रमोशन मिलता नहीं है हर समय तो फिर आपका जो बॉस है उसकी चमचागिरी करके ना कि चीटिंग करके यह जो रिपोर्ट है उसमें कुछ चीटिंग करके ना कि ऐसा कुछ करके प्रमोशन लिया जाता है तो वहां पे यह रेट रेस होती है प्रमोशन प्राप्त करने की तो यह मैनेजमेंट वाले कहेंगे यह रेट रेस का प्रॉब्लम क्या है पता है कि आप यदि हार गए ना तो आपको यह एक आपके मन में बैठ जाएगा कि मैं एक चूहे से हार गया क्योंकि रेड रेस से सब लोग चूहे हैं। मैं भी उस रेड रेस में दौड़ रहा हूं। मैं हार गया तो मैं किससे हारूंगा? एक चूहे से हार गया। यह एक बैठ जाएगा अपने मन में। और यदि जीत गए ना तो भी प्रॉब्लम है। हम सबसे बड़े चूहे हो जाएंगे। यानी कि आइदर और हारेंगे तो हमारे मन में एक तरह का एक क्या कहेंगे कि डिप्रेशन आ जाएगा। जीतेंगे तो हम अपना आत्मसम्मान खो बैठेंगे। तो बोले रेड रेस में कभी जाना नहीं है। ऐसा ही लोगों के साथ में जब झगड़ा होता है तो यह लोग कहते हैं कि कुत्ते के सामने भौंकने से कोई लाभ नहीं है। इस अर्थ में कि जो आदमी झगड़ा है जो आदमी झगड़ा करने के लिए आया है उसके साथ में झगड़ा करने से कोई लाभ नहीं। क्यों? वो कहते हैं कि कुत्ते के सामने भौकने से कोई लाभ नहीं। यदि हार गए तो हमको यह लगेगा कि कुत्ते से हार गया यह डिप्रेशन में चले जाएंगे और जीत जाएंगे तो कुत्ते वो सामने वाले कुत्ते से भी मैं बड़ा कुत्ता हो जाऊंगा यानी कि मैं अपना आत्मसम्मान खो बैठूंगा तो ये लोग इस तरह से ये सब समझाते हैं तो यहां पे भी यह माया के साथ में लड़ना वो उससे हमको ये कुत्ते के सामने भोंकने के बराबर है वो हार ही जाएंगे कोई प्रश्न ही नहीं है तो डिप्रेशन में चले जाएंगे कि अरे मैं माया से हार गया और जीत गए तो माया से भी बड़ी माया भीतर में आ जाएगी कहीं से। सो व्हिच इज वेरी डेंजरस। सो माया से लड़ने से कोई लाभ नहीं है। योग साधना करनी है। जैसे ही योग साधना करेंगे साथ-साथ में ही माया का जो अंधेरा है वो चता चलता जाएगा। अपने हृदय में से वो चलता जाएगा। वो निकल जाएगा। तो एक हो गया। और फिर है कि देखिए कि योग साधना कर रहे हैं। यह कोई हमने पहले भी इसको देखा था कि ₹50 देकर के 1 किलो आलू खरीद के ले आया मैं दुकान से इस तरह का नहीं है। मैं साधना करना मेरा कर्तव्य है। कर्मणवा ही धिकारस्ते मा फलेशु कदाचनम। साधना करना मेरा कर्म है। किंतु साधना के फल के रूप में काम कांचन से मुक्ति कब होगी? वह ईश्वर के हाथ में है। तो यह सब कोर कांसेप्ट है साधना के। यहां पर इसीलिए ठाकुर कहते हैं कि कामिनी कांचन ही माया है। मुख ने जब प्रश्न किया कि कोई भी व्यक्ति योग भ्रष्ट क्यों होता है? तो काम कांचन में पैर पड़ने से ही वो योग भ्रष्ट होगा। जैसे ही मन में यह दो चले गए, साथ में ही योग हो जाएगा। और फिर ठाकुर एक सुंदर उदाहरण देकर के यह बात समझाते हैं। क्या कहते हैं? आत्मा परमात्मा जैसे कि चुंबक पाथर है। यह आत्मा या परमात्मा जैसे कि एक मैग्नेट है। ठाकुर देखिए वो मॉडर्न उदाहरण देते हैं। कभी तो वो वो पुराने-पुराने उदाहरण देते हैं। अभी ये मॉडर्न उदाहरण देते हैं कि आत्मा या परमात्मा है जैसे कि एक मैग्नेट है और जीवात्मा है जैसे कि एक जीवात्मा जेनो एक्ट छूच जीवात्मा जैसे कि एक सुई की तरह है। तीन तीन टेने नीलेई जो कि जिस जैसे आप एक सुई है। सुई और यह मैग्नेट है। अह सुई को मैग्नेट के सामने रखेंगे। साथ में ही मैग्नेट जो है वह सुई को आकर्षण कर लेगा। नीडल क्यों? क्योंकि वह मेटल की बनी है और मैग्नेट जो है मेटल को अट्रैक्ट करता है। तो यह ऑटोमेटिक प्रोसेस है। आपको कुछ नहीं करना है। ऐसा नहीं है कि मेहनत करके सुई को उठा के मैं ईश्वर के पास मुझे अपने को ईश्वर के पास में ले जाना है। ईश्वर के प्रति जीवात्मा का जो आकर्षण है वो नेचुरल है। मेरी नेचुरल उर्ध्व गति है। आप पानी में गिरेंगे तो ऑटोमेटिक आप ऊपर में ही आएंगे। मैं जब मुझे याद है मैं स्विमिंग सीख रहा था 10थ का वेकेशन में तो हमारे घर के पीछे में एक बड़ा ही एक ओलंपिक साइज का स्विमिंग पूल है। तो वहां पे क्या है कि आपको स्विमिंग करने के लिए किंतु स्विमर का लाइसेंस चाहिए। तो जब तक स्विमर का लाइसेंस नहीं मिलेगा तो यह स्विमिंग पूल है ना उसका जो बॉटम जो है ना वह इस तरह से स्लोपिंग बॉटम था। यानी कि एक ओर आप जाएंगे ना तो पानी मुश्किल से आपके घुटने तक आएगा। किंतु जैसे थोड़ा-थोड़ा आप दूर जाते जाएंगे ना तो वैसे ही वह जो बॉटम है ना सीधा एकदम डीप में चला जाएगा। यानी कि वहां पे 10 फुट ना 20 फुट जितना पानी है। तो एक्चुअली वहां पे तैरने में आनंद आता है। जो जहां पे आपके घुटने तक ही पानी है वहां पे तैरने का कोई फायदा नहीं है। तो किंतु प्रॉब्लम यह है कि वो जो डीप एंड जो है स्विमिंग पूल का वहां पे तैरने के लिए आपको स्विमिंग लाइस स्विमर लाइसेंस चाहिए। तो और जब आप पहले आप एंटर होंगे आपने पहली बार आपने मेंबरशिप ले स्विमिंग पूल में गए तो आपको लर्नर्स लाइसेंस मिलेगा। फिर लर्नर्स लाइसेंस वहां पे आप एक इंस्ट्रक्टर थे। वो हमको स्विमिंग सिखाएंगे। आप स्विमिंग सीख करके आप उसका टेस्ट दीजिए। फिर आपको वो स्विमर्स लाइसेंस मिलेगा। तो मैंने वो टेस्ट दिया था। दो-ती महीना सीखा और उसके बाद में टेस्ट दिया था। अभी देखिए कि स्विमिंग सीखना उसमें कोई मुझे डर नहीं लगता था। किंतु यह जो टेस्ट देना था ना टेस्ट में एक टेस्ट ऐसा था कि वहां पे वो हाई राइज एक यह था प्लेटफार्म वहां से जंप लगाना था। यानी कि टेस्ट में सब कुछ आपको कर लेना है। आपको एक पूरा लेंथ भी आपको लगाना आना चाहिए और फिर ऊपर में से जंप लगाना भी आना चाहिए। सब कुछ आपको आएगा तभी आपको यह स्विमर्स लाइसेंस मिलेगा। तो मुझे तैरना तो आ गया था किंतु जंप लगाने में ना मुझे बड़ा डर लगता था। तो मैं उसको अवॉइड करता था टेस्ट देना। तो वो जो हमारे इंस्ट्रक्टर थे मुझे गुस्सा करके मुझे कहते अरे तुमने तैरना तो सीख लिया है। तो अभी तुम स्विमर का लाइसेंस दे दो ना और स्विमर का वो टेस्ट दे दो ना। तुम लाइसेंस ले लो। अभी तुम लर्नर में क्यों पड़े हुए हो? तो मैंने कहा मुझे ना ऊपर में से जंप लगाने में डर लगता है। मैं यदि पानी में डूब गया तो क्या होगा? तो उन्होंने कहा अरे तुम चिंता मत करो। हमारे मनुष्य के भीतर में तो हवा होती है ना तो हवा भरी है बोलकर के क्या है कि जैसे हम पानी में जंप लगाते हैं ना साथ में ही हमारा शरीर है ऑटोमेटिक ऊपर आ जाता है तुमको और कुछ नहीं करना है तुम बिना मतलब हाथ पैर मत मारना शांति से पड़े रहना देखना तुम ऑटोमेटिक ऊपर आ जाते हो मैंने कहा यदि आदमी ऑटोमेटिक ऊपर आ जाता है तो हम ये सब क्यों देखते हैं कि यह पानी में गिर कर के मर गया तो वो क्या कहते हैं देखो प्रॉब्लम क्या है कि यदि एक बार तो हम पानी में गिरे तो ऊपर आ जाएंगे। किंतु फिर क्या है ना साथ-साथ में ही हम तैर करके किनारे तक नहीं पहुंच गए और पानी में पानी में ही पड़े रहेंगे ना तो धीरे-धीरे करके हम थक जाएंगे। थकेंगे और फिर पानी में होगा क्या कि हम पानी पीना शुरू कर देंगे क्योंकि वह तो एक बहुत सीरियस प्रॉब्लम है हम जिसको तैरना नहीं आता थोड़ा बहुत तो नीचे में जाएगा ही जाएगा और जैसा नीचे गया वैसे ही वह पानी पीना शुरू कर देगा इनवोलंटियरली पानी उसके पेट में जाएगा ही और जैसे भीतर में हवा की वजह पानी भर गया यानी कि उसका जो वेट है वो पानी का जो विस्कोसिटी है उससे ज्यादा हो गया बोलकर के वह डूबेगा यानी जब तक तुम पानी पानी नहीं पीते हो तब तक तुमको डरने की जरूरत नहीं। तो मैंने कहा थ्यरी तो बड़ी अच्छी लग रही है किंतु एक बार जंप लगाने के बाद में यदि ऊपर नहीं आया तो क्या होगा? तो एनीवे मुझे जंप लगाना पड़ा था सिमर्स लाइसेंस लेने के लिए। किंतु अपनी लाइफ में एक ही बार मैंने इस तरह से पानी में ऊपर से जंप लगाया। उसके बाद में कभी नहीं लगाया। मैं बहुत साल तक वो स्विमिंग करने को जाता था किंतु जंप कभी नहीं लगाया फिर से। तो यहां पर भी देखिए कि यह आत्मा या परमात्मा जो है वह मैग्नेट की तरह है और हम लोग जो है वह जीवात्मा एक सुई की तरह है। जीवात्मा की सहज गति ही मैग्नेट की ओर है। आप उसको पकड़ के रखेंगे तभी वह दूर रहेगा वह ईश्वर से। जैसे ही आपने छोड़ दिया वैसे ही वह ईश्वर के साथ में मिलन होने को चला जाएगा। यह ऐसा है। जैसे पानी में जंप लगाया तो सहज उर्ध्वगति ही है। एक बार हमने पानी पीना शुरू कर दिया तो फिर जाकर डूबेंगे। अदरवाइज हम नहीं डूबेंगे। तो सहज गति जो है मनुष्य की वह उर्ध्व गति ही है। बस वही बात है। क्या प्रॉब्लम है? किंतु छूचे यदि माटी माखा थाके चुंबके टाने ना। यह जो सुई जो है उसमें जो मिट्टी लग गई है, कीचड़ लग गया है तो फिर क्या है कि जो मैग्नेट है वह फिर उस सुई को नहीं खींच पाएगा। यह एक बार पानी पीना शुरू कर दिया तो फिर ऊपर में आप सतह नहीं आएंगे। फिर हमारा डूब करके मरना निश्चित है। तो यहां पे भी जब तक ये मिट्टी लग गई है ये सुई के ऊपर में नीडल के ऊपर में तो फिर क्या है कि मैग्नेट जो है अट्रैक्ट नहीं कर पाएगा। माटी साफ करे दिले आबटा ने। किंतु जैसे ही यह मिट्टी को हमने क्लीन कर दिया सुई के ऊपर में से फट करके वह मैग्नेटिक फील्ड जो है उसमें पकड़ आ जाएगी। पकड़ा जाएगी और फट करके मैग्नेट की ओर चली जाएगी। कामिनी कांचन माटी परिष्कार करते हो। कामिनी कांचन रूपी यह जो कीचड़ है मिट्टी है उसको हमको क्लीन करना होगा। परिष्कार करना होगा। यह बहुत ही पावरफुल कांसेप्ट है। बहुत बार हम सोचते हैं कि इस जन्म में तो ज्यादा कुछ होगा ही नहीं। क्योंकि मुझे कितनी तपस्या करनी पड़ेगी ईश्वर के पास जाने के लिए। एक्चुअली तपस्या करनी है चित्त शुद्धि के लिए। नहीं कि ईश्वर के पास जाने के लिए। ईश्वर के साथ में योग जो है नित्य मिलन यह जो कुंज में राधा और कृष्ण का जैसे नित्य मिलन होता है तो वैसे ही यहां पे अपने हृदय में ईश्वर के साथ में अपना जो जीवात्मन है या तो जिसको मैं स्मॉल आई है और यह जो कॉस्मिक आई है इन दोनों का नित्य मिलन नित्य उत्सव हृदय में लगा ही रहता है। बस वही बात है कि हमारी आंखों के सामने यह जो एक पर्दा जो आ गया है पर्दे को हटाना है और फिर यह जो नित्य मिलनोत्सव है उसका हम दर्शन कर पाएंगे। उसका आनंद उठा पाएंगे। इसके बाद जो है वह भी हम नेक्स्ट क्लास में देखेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु
प्रश्न: एक ओर साधना के बिना आध्यात्मिक जीवन में प्रगति संभव नहीं है, और दूसरी ओर साधना करने से भी ईश्वर-प्राप्ति की कोई गारंटी नहीं है — तो इन दोनों विरोधी प्रतीत होने वाले सत्यों का समन्वय कैसे किया जाए?
मान लीजिए अब थोड़ा सा मॉडर्न मेथड में कहते हैं स्टाइल में कृपा किसी पे भी हो सकती है। आप जब ध्यान साधन भजन करें कि ना करें। किंतु ये कैसा है पता है? पृथ्वी पर 700 करोड़ लोग हैं। उसमें से मान लीजिए कि 7 करोड़ साधन भजन करते हैं और बाकी के जितने भी हैं 6 करोड़ 693 करोड़ वे लोग साधन भजन नहीं करते हैं। तो अभी क्या है? दोनों कैटेगरी में 1010% पे कृपा होगी। तो यहां पर आप यदि 693 करोड़ वाली कैटेगरी में है उसमें जो 10% तो क्या है कि आपका चांस जो बड़ा कम हो जाता है। वो जो 7 करोड़ वाली कैटेगरी पे आप है उसमें 10% तो आपका चांस बढ़ जाता है। अभी रिसेंटली ना एक महाराज आए थे तो तिरुपति गए थे। तो अभी यहां पर साउथ इंडिया में क्या है? टिकट का सिस्टम है सब मंदिर में। तो आप यदि बिना टिकट के खड़े रहेंगे तो आपका दर्शन तो हो जाएगा किंतु फिर वो 24 घंटा ना 48 आवर्स में ऐसा सब खड़ा रहना पड़ेगा। लंबी-लंबी लाइन लगती है। टिकट लेकर के भी लाइन तो है क्योंकि इतने सारे लोग पैसा देकर के खड़े रहते हैं। किंतु आपका दो-ती घंटे में नंबर आ जाएगा। ठाकुर कहते हैं मां सभी को खाना देती है। किंतु किसी को टाइम पर खाना मिल जाता है। किसी को शाम तक इंतजार करना पड़ता है।
श्री रामकृष्ण का समन्वय : योग समन्वय और वेदान्त समन्वय
लास्ट टाइम हमने जो डिस्कस किया था ना ठाकुर ने यह फिलॉसोफी का समन्वयकरण नहीं किया है इस अर्थ में कि द्वैत वेदांत में सगुण ब्रह्म है और यहां पर निर्गुण ब्रह्म है तो आप कैसे रिकंसाइल करेंगे? बहुत बार लोग कहते हैं कि यह आपका अधिकारीवाद है तो जब तक आप निम्न अधिकारी है तब तक सगुण ब्रह्म को मानिए फिर जब उच्चक अधिकारी हो जाते हैं तो निर्गुण ब्रह्म को मानिए। ठाकुर को पढ़ के मुझे ऐसा लगता ही नहीं है। वो डायरेक्ट निर्गुण ब्रह्म और शक्ति उसी की डायरेक्ट बात करते हैं। ठाकुर ने जो रिकंसिलिएशन किया योग का किया है। साधन पद्धति का किया है। वो जो सगुण ब्रह्म को प्राप्त करने के लिए जो भक्ति मार्ग था उसको ठाकुर ने एज इट इज यहां पे उठा लिया है। आपको भक्ति साधना करने के लिए द्वैतवादी होने की कोई जरूरत नहीं। दिस इज ठाकुर ग्रेटेस्ट कंट्रीब्यूशन। ज्ञान साधना करनी है तो आपको शंकराचार्य के फॉलोवर होने की कोई जरूरत नहीं है। सो साधन पद्धति को उन्होंने फिलॉसोफी से सेपरेट करके अपनी उनकी जो खुद की जो फिलॉसोफी है कि ब्रह्म शक्ति अभेद ये जो ठाकुर की खुद की फिलॉसोफी और साथ में फिर रेदर देन कि यह कहना कि ठाकुर की फिलॉसोफी मैं कहूंगा ठाकुर का इंटरप्रिटेशन ऑफ वेदांत। तो यह ठाकुर का इंटरप्रिटेशन हो गया और जितनी भी साधन पद्धतियां थी वह चाहे एक्सक्लूसिवली उन्होंने पकड़ के रखा था अद्वैत वेदांतियों ने कि ज्ञान तो हमारी ही पद्धति है। वो द्वैत वालों ने पकड़ के रखा था भक्ति हमारी पद्धति है। यह कर्म वाले जो गीता के फॉलोअ है। यह योग के जो फॉलोअ है। तो वहां से वो पद्धतियां उठा के उसमें सीमलेस एक यूनाइटेड होल बना दिया। दैट इज ठाकुर ग्रेटेस्ट कंट्रीब्यूशन। देखिए ठाकुर की दृष्टि से ना यह सब चीजें इतनी सहज थी वही फेमस उदाहरण कि तोतापुरी जब पहली बार दक्षिणेश्वर आए चांदनी घाट पे वो जैसे नौका से उतरे चांदनी की बकुलतला जहां पे भी है तो जैसे ही वह घाट के ऊपर में आए तो देखा कि ठाकुर वहां पर बैठे हैं। अभी ठाकुर का जो चेहरा है ना वो इस तरह से चमक रहा है शुद्धता पवित्रता और आनंद से उन्होंने देखकर के ही पहचान लिया कि यह वेदांत साधना का उच्च अधिकारी है। तो उन्होंने ठाकुर को कहा कि तुम यदि वेदांत साधना करना चाहते हो मैं तुमको सिखाऊंगा। तो ठाकुर कहते हैं अच्छा ठीक है मैं मां से परमिशन लेकर आता हूं। तो वह तोतापुरी वहां पे ये सोच के बैठे हैं कि अपनी वो जन्मदात्री मां के पास में गए परमिशन लेने के लिए। ठाकुर ठाकुर गए हैं मां काली के पास परमिशन लेने के लिए। नाउ अभी देखिए कि कोई भी आपका ट्रेडिशनल थ्यरी में फिट नहीं बैठता। यदि द्वैत को फॉलो करते हैं भगवान कृष्ण के पास जाएंगे कहेंगे मुझे अद्वैत साधना करनी है आप परमिशन देंगे कि नहीं देंगे भगवान कृष्ण थोड़ी ना आपको परमिशन देने वाले हैं कंप्लीट और यदि अद्वैत फॉलो करते हैं बोलेंगे मैं भगवान के पास परमिशन मांगने अरे भगवान इटसेल्फ इज अ प्रोडक्ट ऑफ माया क्या परमिशन मांगोगे माने भगवान की परमिशन लेकर के भगवान को काटना इट इज समथिंग सो यूनिक और देखिए तोतापुरी का तोतापुरी पहली बार जिस तरह से आश्चर्यचकित हुए थे कि वह मां की परमिशन लेकर के दैट इज मां काली की परमिशन लेकर के वो अद्वैत साधना कर रहे हैं। किंतु तोतापुरी बाद में भी ये जो कटाक्ष जो है वो हमेशा चालू रखते हैं कि ये जो ठाकुर जब ताली बजा के भगवान का नाम लेते हैं तो कहते ताली ठोक रहे हो क्या? म रोटी ठोक रहे हो क्या? उल्टा हो गया। उल्टा हो गया। आखिर में उन्हीं को शक्ति स्वीकार करनी पड़ी ना। किंतु यहां पे देखिए कि ठाकुर की दृष्टि से ना यह द्वैत और अद्वैत में कोई डिस्टिंशन ही नहीं है। फॉर हिम एवरीथिंग इज सो क्रिस्टल क्लियर। अभी तोतापूर्ण ना बेचारे ऐसे पहले से ही कंफ्यूजन कंफ्यूजन में चलते हैं कि वो अद्वैत साधना के लिए मां काली के पास में कैसे परमिशन मांग सकते हो? अद्वैत साधना में तो मां काली को काट देना है। राइट? सो पहली बात तो है कि मां काली है ही नहीं। दूसरी बात है यदि है भी सही बाय सम चांस तो व्हाई वुड शी गिव परमिशन? कि मुझे ही काटने की परमिशन मैं क्यों दूंगा?
प्रश्न: औपचारिक शिक्षा का अभाव ठाकुर के लिए अत्यंत सहायक सिद्ध हुआ; इसी कारण वे दूसरों के विचारों के बोझ से मुक्त होकर स्वतंत्र रूप से चिंतन कर सके।
यह आपने बिल्कुल ठीक कहा। एग्जैक्टली मास्टर महाशय का यही साथ में वही हुआ ना कि पहली मीटिंग में ही वो पहले साथ पहली बार ठाकुर के साथ में जो वार्तालाप कर रहा है पहली बार ठाकुर के कमरे में जो जा रहे हैं तो वृंदा दासी को पूछते हैं कि वो तो उन्होंने बहुत सारा कुछ पढ़ाई लिखाई करके रखा होगा। तो वो कहती है अरे पढ़ाई लिखाई क्या है? सब कुछ उनके मुंह में है। तो जिह्हावा पे सब कुछ सवार है। तो मास्टर महाशय खुद तो एमए करके आए हैं। बोल रहे हैं कि जिसने पढ़ाई लिखाई नहीं की वो इतनी अच्छी बातें कैसे कर सकता है? तो वो पहली मुलाकात में द्वितीय मुलाकात में जब ठाकुर कहते हैं कि वो जो साकार है, निराकार है, क्या है? वही अपने से वो सब आपको बता देंगे। मूर्ति की पूजा हम कहां कर रहे हैं। पत्थर की मूर्ति की थोड़ी ना कर रहे। तू चिन्मय मूर्ति की पूजा कर रहा है। तो मास्टर महाज कहते हैं कि तो फिर हमको सबको समझा देना उचित है कि यह मिट्टी की मूर्ति की पूजा नहीं कर रहा है। तो साथ-साथ में ही ठाकुर डांटते हैं कि तुम लोगों को कलकथा के लोगों का यही एक है। उसको उपदेश दे देना। उसको समझा देना। खुद को कौन समझाए ये ठीक नहीं। तो पढ़ाई लिखाई करके आगे आएंगे तो यही सब कंफ्यूजन होगा।
प्रश्न: मास्टर महाशय इतने सत्यनिष्ठ हैं कि बिना किसी कटुता के यह भी लिखते हैं कि ठाकुर ने उनका अपमान कैसे किया
नहीं दूसरी बात क्या है? पता है देखिए हमको ना पढ़कर के ऐसा नहीं लगता कि उनको ऐसा किसी ने इंसल्ट किया हो। अब इंसल्ट करने का बहुत हजार तरीके हमने देखे हैं जगत में। राइट कंपेयर टू दैट तो ठाकुर कुछ नहीं करते। तो हमको ऐसा लगता भी नहीं है कि यह इंसल्ट है। म एस सच आपका बहुत सेंसिटिविटी ज्यादा होगा तो आपको इंसल्ट लगेगा। वरना ज्यादातर संसारियों का चमड़ी इतना मोटा हो गया है कि ये छोटी-मोटी चीजें इंसल्ट फील ही नहीं होगा उनको। ना म उनकी दृष्टि से ठीक ही है। उन्होंने जो अपनी दृष्टि से जो लिखा वो ठीक ही है। मैं एक सांसारिक पॉइंट ऑफ व्यू से बता रहा हूं। एस सच ठाकुर किसी का इंसल्ट नहीं करते। इस अर्थ में कि इंसल्ट करना ही है तो देयर आर वर्स्ट वेज़ ऑफ इंसल्टिंग। आपको लगेगा इंसल्ट है। किंतु ठाकुर इस तरह से बिहेव नहीं करेंगे। और फिर ठाकुर ने तो ये दर्शन देख ही लिया था ना। ठाकुर ने खुद मास्टर महाशय को कहा कि पंचवटी से लेकर के यहां तक मैंने कीर्तन समूह विराट मूर्ति देखी। कि अभी विराट मूर्ति किसी व्यक्ति सिंगल व्यक्ति की कीर्तन समूह पता नहीं किंतु देखा ऐसा फिर साथ में ही कहा कि ये चैतन्य के कीर्तन के दल में बलराम को देखा था आरजेनो तोमा देखे जिला और जैसे कि शायद मैंने तुमको भी देखा था तो वो पहले से ही पता था कि यह लोग आने वाले हैं ओम