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Sri Ramakrishna Kathamrita ·

श्रीरामकृष्ण कथामृत || 16 Dec 1883 - श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ दक्षिणेश्वर में || 4 Mar 2026

मङ्गलाचरण

ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूप अवतार वरिष्ठाय रामकृष्णायते नमः श्री श्री रामकृष्ण कथामृत 16th दिसंबर 1883 दोपहर के 4 बजे हैं। जनाई के एक मुख आए

स्थिर जल या बहता जल — है दोनों एक

थे। उनके साथ में ठाकुर वार्तालाप कर रहे थे। अभी इनका जाने का समय हुआ। वह विदाई लेने के लिए ठाकुर को प्रणाम करके खड़े हुए। तो जैसे ही यह मुख खड़े हुए ठाकुर भी साथ में ही खड़े हुए उनको सम्मान देने के लिए और कल जैसे हमारा थोड़ा सा डिस्कशन हुआ था कि किस तरह से वैसे तो शिष्टाचार जो है यदि समाज में रहना है तो थोड़ा सा तो शिष्टाचार हमको पालन करना ही होगा। किंतु शिष्टाचार ही सब कुछ ना हो जाए और भीतर में असत है। हिंदी में कहावत है ना मुख में राम बगल में छुरी। मुंह में तो राम का नाम ले रहे हैं और फिर बगल में छुरी रखी हुई है। ठाकुर की वह जो कहानी है कि एक आदमी वह सोना बना सोने का गहना बनाने के लिए जाता है तो वो वो वो सब आपस में बात करते हैं केशव केशव ऐसा करके तो क्या है कि बना रहे हैं तो गहने और लोगों को दिखा तो रहे हैं कि हम लोग इतने धार्मिक हैं तो ऐसा धर्म की बात सुनकर के लोग ऐसा मान लेंगे कि अच्छा बड़े अच्छे आदमी है तो चलो इनके पास में सोना बनाए। यहां पर सोने की चोरी होने का कोई भय नहीं है। सोने का गहना बनाए। जिनके पास में सोने की चोरी होने का कोई डर नहीं है। किंतु देखिए कि इन लोगों के मन में कितना कपट था जो सोने के गहने बनाने वाले थे। तो इसको इंग्लिश में कहते हैं हाइपोक्रेसी। अर्थात कि हमारे मन में तो असत्य है। हमारे मन में जो है झूठ या तो फिर एक तरह की बदमाशी बैठी हुई है। किंतु मुंह पर हम लोग शराफत दिखाते हैं। तो ऐसा नहीं हो जाना चाहिए। और इसीलिए यहां पर ठाकुर जो थोड़ा बहुत तो शिष्टाचार का पालन करते हैं सब समय नहीं कर पाते। वह कमर पर धोती भी नहीं रहती। वो देवेंद्रनाथ टैगोर जैसे उस समय के ख्यात नाम व्यक्ति को मिलने को जाते हैं। वह शर्ट भी नहीं पहना था। तो एनीवे ठाकुर यह सब शिष्टाचार से परे हैं। तो मुख को यह बात पता है। तो इसीलिए उन्होंने कहा कि आप आपनारा उठा बोशा कि आप आपको फिर यह उठना और बैठना आपको भी क्या यह उठना बैठना क्या जरूरत है आपको? तो ठाकुर इसके उत्तर में जो कहते हैं वो वि इज वेरी इसके भीतर में हम थोड़ा सा डिटेल में जाएंगे आज। इतना जो सहज प्रश्न और उसका एक सहज उत्तर किंतु इस सहज उत्तर के भीतर में ठाकुर ने जैसे कि सीड फॉर्म में अपनी पूरी फिलॉसोफी है वह हमारे सामने रख दी है। क्या कहते हैं ठाकुर आभार उठा बोबा खोती की उठने बैठने में भी फिर क्षति क्या है? नुकसान क्या है? यदि थोड़ा बहुत शिष्टाचार का पालन कर लेते हैं तो उसमें नुकसान क्या है? जोल स्थिर होले वो जल आर हेल्ले दुल पानी स्थिर रहने पर भी पानी है और हलन चलन करता है तब भी वही पानी ही है जोड़े एंटो पाता हवाते जेदी के लोए जाए अर्थात कि यह झड़ होती है ना झड़ अर्थात कि तूफान जब आता है उसमें एक पतराल जिसको कहते हैं हम जिसमें खाना खाते हैं पत्ते का जो बर्तन होता है उसको पतराल या फिर यह एंटोपाता इसको कहते हैं। तो जैसे ही यह हवा का झोंका आता है, तूफान आता है तो यह कैसा हवा में उड़ता है तो यह झड़ में यह एंटोपाता जो है वो हवा में उड़ता है हवा जयदी के लोए जाए। हवा उसको जिस ओर ले जाती है। आमी जंत्रो तनी जंत्री मैं यंत्र हूं वह यंत्री है। देखिए कथामृत पढ़ेंगे पूरा कथामृत में तो यह जो ठाकुर का कांसेप्ट है हमको बार-बार और अति सरल रूप में सुनने को मिलेगा। किंतु समथिंग वेरी सरप्राइजिंग कि इतने सहज सरल शब्दों के भीतर में दो कांसेप्ट यहां पर ठाकुर ने रखे हैं। उठने बैठने में भी क्या क्षति क्या है? नुकसान क्या है? इसके बाद में दो कांसेप्ट ठाकुर रखते हैं। जल स्थिर होने पर भी जल है। हलनचलन करने पर भी जल है। यह हो गया कांसेप्ट नंबर वन। और कांसेप्ट नंबर टू क्या है? तूफान में जैसे कि यह पतराल है। जो एंठा पत्ता है यह पत्ता। हवा जिस ओर उसको ले जाती है उस ओर वह जाता है। मैं यंत्र हूं और वह यंत्री है। यह दो कांसेप्ट यहां पर ठाकुर हमारे सामने रखते हैं। देखिए दोनों कांसेप्ट का अर्थ क्या है? सबसे पहले तो

वेदान्त को प्रैक्टिकल बनाना ही होगा

दो बेसिकली एस्पेक्ट होते हैं हमारे नॉलेज के। एक तो थ्योरेटिकल एस्पेक्ट होता है। दूसरा प्रैक्टिकल एस्पेक्ट होता है। थ्योरेटिकल एस्पेक्ट को यूजुअली हम साइंस कहते हैं कि यह फिजिक्स है। फिजिक्स कहता है E = MC² एनर्जी इक्व मैटर * दी स्क्वायर ऑफ स्पीड ऑफ लाइट। या तो फिर कहेंगे कि PV = NRT प्रेशर * वॉल्यूम इक्व टेंपरेचर। तो अभी यह थ्यरी तो हमने खोज निकाला किंतु फिर इस थ्यरी का प्रैक्टिकल कैसे करेंगे? यह PV इक्व NRT ये जो इक्वेशन है इस इक्वेशन पे तो बना है। ये क्या कहेंगे? अपना प्रेशर कुकर। तो यह देखिए कि यहां पर जो थ्योरिटिकल एस्पेक्ट है उसको प्रैक्टिकल जब तक नहीं करते हैं तब तक वो थ्यरी हमारे ज्यादा काम की नहीं है। तो एक हो गया साइंस दूसरा हो गया टेक्नोलॉजी। साइंस हमको बताता है जगत कैसे कार्य करता है और टेक्नोलॉजी हमको बताता है कि यह जो हमारी अंडरस्टैंडिंग डेवलप हुई है जगत कैसे कार्य करता है। इस अंडरस्टैंडिंग का प्रैक्टिकल एप्लीकेशन कहां पे किया जाए? भारत के साथ में एक बहुत बड़ा प्रॉब्लम हो गया था पिछले कुछ 12000 साल में कि हमारे पास में थ्योरिटिकल नॉलेज तो गजब का है किंतु उसका जो प्रैक्टिकल एप्लीकेशन है वो माने समाज में जो फैलना चाहिए वो हो ही नहीं रहा था। अब देखिए यह आजकल का एआई टेक्नोलॉजी है। एक समय था 1950 में आज से ऑलमोस्ट 70 80 साल पहले की बात यह एआई का को ये कंप्यूटर का कांसेप्ट जब पहली बार डेवलप होना शुरू हुआ तब यह लोग कहते थे कि एक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस हम डेवलप कर सकते हैं। किंतु जब लोग यह एआई को इमेजिन करते थे तो कैसा करते थे? एक बहुत बड़ा कंप्यूटर है। इस कंप्यूटर का एक्सेस सबसे ज्यादा धनी लोग हैं या गवर्नमेंट है। उन्हीं के पास में है और यह लोग इस कंप्यूटर का इस्तेमाल करके लोगों का या तो शोषण करेंगे बुरा आदमी है और यदि अच्छा आदमी है तो लोगों को हेल्प करेगा। तो एक तरह का यह कांसेप्ट था। किंतु आज देखिए यह जो पिछले दो-ती साल में हमने देखा कि एi टेक्नोलॉजी इज एक्सेसिबल टू एवरीवन इन देयर मोबाइल फोन इटसेल्फ। ऐसा नहीं है कि मुझे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से काम करवाना है तो मुझे करोड़ों-करोड़ों का इन्वेस्टमेंट करके मुझे अपना खुद का डाटा सेंटर खड़ा करना होगा। फिर उसमें मुझे लाखों की सैलरी दे के एआई साइंटिस्ट को अपॉइंट करना होगा। फिर यह लोग मेरे लिए काम करेंगे। ऐसा नहीं है। ये टेक्नोलॉजी का डेमोक्रेटाइजेशन इस तरह से हुआ है कि एनीवन थोड़ा सा भी अकल है आपके भीतर में। आप एआई टेक्नोलॉजी का काफी अच्छे से यूज़ कर सकते हैं। तो क्या है कि यह सब बातें हैं। एक तो है साइंस जो कि हमको थ्यरी समझाता है और है टेक्नोलॉजी या तो फिर इंजीनियरिंग जो कि उसको प्रैक्टिकल डे टू डे लाइफ में अप्लाई करता है। यहां पे आध्यात्मिक जगत में देखें तो वेदांत है वो थ्योरिटिकल एस्पेक्ट जो कि हमको समझाता है कि जगत क्या है? जगत के ऊपर में परे कौन सी एक सत्ता है? मेरा स्वरूप क्या है? यह विश्व का या तो फिर यह जो अल्टीमेट रियलिटी है उसका स्वरूप क्या है? जीव, जगत, ईश्वर और फिर यह ब्राह्मण इस तरह से हम लोग देख सकते हैं कि जगत के जो बेसिक कंस्टिट्यूएंट्स है उनका स्वरूप क्या है? और उनका इंटररिलेशनशिप क्या है? तो वह हो गया वेदांत। और फिर आता है योग। योग क्या है? प्रैक्टिकल एप्लीकेशन ऑफ वेदांत। जिस थ्यरी को हमने समझा है कि हां ईश्वर का स्वरूप यह है। ब्रह्म का स्वरूप यह है। जीव और जगत इस तरह से क्रिएट हुए हैं। और यदि जीव को मुक्ति चाहिए ईश्वर साक्षात्कार या ईश्वर दर्शन या तो ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति ब्रह्म साक्षात्कार जो भी यह चाहिए उसको माने इस तरह से इंटररिलेशनशिप पहले दिखा देते हैं। तो वह हो गया वेदांत एस्पेक्ट फिलॉसोफिकल एस्पेक्ट और फिर साथ में ही है योग। योग क्या है? प्रैक्टिकल एप्लीकेशन कि हां एक बार मुझे समझ में आया कि जीव क्या है? जगत क्या है? ईश्वर क्या है? और ईश्वर के परे भी क्या कोई अल्टीमेट रियलिटी है कि नहीं? तो वो एक बार मुझे थ्यरी समझ में आई। तो फिर यह मेरी यात्रा जो है जीव से लेकर के ईश्वर या तो फिर ईश्वर से भी परे जो अल्टीमेट रियलिटी है वहां तक पहुंचने की यह मेरी यात्रा किस तरह से मैं करूं वह योग शास्त्र बताता है। यूजुअली हमको पता है कि योग कितने प्रकार के हैं क्या है। किंतु देखिए कि अभी

श्रीरामकृष्ण वेदान्त के बारे में क्या कहते है?

हमारे पास में आज तक जो भी थरी डेवलप हुई है उसके साथ में ठाकुर की जो फिलॉसोफी है और ठाकुर की जो साधन पद्धति है वह क्या नए तरह से कुछ ठाकुर ने किया है ना कि जो ऑलरेडी था उसी को ठाकुर फॉलो कर रहे हैं और फिर उनका नयापन सिर्फ इतना ही है कि आज के युग की भाषा में उन्होंने उसको प्रकाशित किया है। अभी वेदांत का इतना मुश्किल कांसेप्ट है कि जीव यह जो जगत है जगत मिथ्या है और इसके परे जो ईश्वर या ब्राह्मण है उसके ऊपर में हमारा पूरा मन होना चाहिए। तो अभी यह डिफिकल्ट कांसेप्ट है। किस तरह से जगत से मुंह मोड़ के ईश्वर की ओर जाए। तो इस कांसेप्ट को डिफिकल्ट कांसेप्ट को ठाकुर समझाते हैं बहुत ही सहज उदाहरण देकर के कि देखिए दांत में दर्द होता है और आप पूरा दिन भर अपना कार्य करते रहते हैं। अब जैसे मास्टर महाशय टीचर थे तो दांत का दर्द हो रहा है। इसके बावजूद स्कूल में तो जाना ही होगा। बच्चों को पढ़ाना ही होगा। वह विद्यासागर उनके वह जो मालिक थे तो यदि कोई रिपोर्ट वगैरह देना है तो वह तो उनको देना ही होगा। तो यह कार्य तो करना ही है। किंतु सब समय उनका मन जो है वह दांत के दर्द के ऊपर में लगा है। तो यह देखिए कि इतना सहज उदाहरण देकर के ठाकुर ने यह जो बड़े ही गहन कांसेप्ट है वह समझा दिए हैं। तो ठाकुर हमारे पास में क्या कुछ नया ले आए हैं कि वही पुरानी बातों को ही उन्होंने नए शब्दों में व्यक्त की है। यह एक डिबेट जो है वो काफी चलता है। बहुत सारे लोग कहते हैं ठाकुर तो अद्वैत ही है। कोई कहते हैं कि ठाकुर शाद्वैत है। अभी कोई कहता है कोई कुछ कोई कुछ नई-नई किताबें भी पब्लिश होती है ठाकुर की फिलॉसोफी को लेकर के। मेरा जो रीडिंग है रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य का इसके हिसाब से मैं आपके सामने यह बात रखता हूं। देखिए कि फिलोसोफिकल डेवलपमेंट जो है जगत में

धर्म की उत्पत्ति और विकास की कहानी

आध्यात्मिक फिलॉसफी आध्यात्मिक दर्शन शास्त्र किस तरह से हुआ है जब हम आदिम काल में जीते थे हम लोग जब जंगल में वन में ट्राइब्स में जीते थे एक ट्राइबल लेवल पर हमारा एग्जिस्टेंस था तब हम देखते थे कि देखिए यह जगत इतना विशाल है कभी भी यह जड़ वृष्टि हो सकता है। कभी भी यह सुनामी आ सकती है। कभी भी फ्लड आ सकता है। कभी भी यह वाइल्ड फायर स्टार्ट हो सकता है। कभी भी कुछ भी हो सकता है। पेंडेमिक हो सकता है। अर्थात कि यह जो विश्व की ये जो बड़ी-बड़ी फोर्सेस है वह क्या है? मुझे समझ में नहीं आती। तो फिर इस फोर्स जो है फोर्स ऑफ नेचर मेरा अहित ना करें। मेरा नुकसान ना करें। इसके लिए मुझे उनको कुछ ना कुछ ऑफरिंग देना होगा। यूजुअली ह्यूमन लेवल पर तो हम वही देखते हैं। एक पावरफुल कोई सरदार है या ट्राइबल लीडर है। वह हमारा अहित ना करें। हमारे पीछे ना लगे। इसके लिए हमको कुछ ना कुछ ऑफरिंग उनको देना है। उनको शांत रखना है। टैक्स देना है। या तो फिर हमारे घर के भीतर में जो अच्छी चीजें हैं वह उसको लाकर देना है। जिससे कि वह हमें को परेशान ना करें। ये हमने ह्यूमन सोसाइटी में जो देखा है कि पावरफुल व्यक्ति को शांत रखना है। वो जो ठाकुर की कहानी है ना उपमा जो है कि शब्द साधना जब हम करते हैं तो क्या होता है कि जो फ्रेशली एक जो फ्रेश डेड बॉडी है डेड बॉडी के बारे में फ्रेश शब्द किंतु म जो रिसेंटली डिसीज्ड पर्सन है उसका डेड बॉडी श्मशान में रखा होता है। उसके ऊपर में बैठकर के आपको जप करना है। किंतु क्या है? बीच-बीच में यह जो शब्द जो है एकाएक आपको डराने को आएगा। वो मुंह खोल कर के कुछ ना कुछ विकट चित्कार करेगा। भयावह आवाज करेगा। तो इस समय आपको क्या करना है? ये मूंग वगैरह कुछ खाने के जो स्नेक होते हैं वो पास में रखने हैं और जैसे ही यह शब मुंह खोल करके आपको डराने को आए तो उसके भीतर में रख देने हैं तो वह शब जो है उसको खाएगा और खाते-खाते इतना तल्लीन हो जाएगा कि फिर आपको परेशान नहीं करेगा कुछ देर तक एटलीस्ट तो प्लेकेट करना है उसको तो यहां पे भी हमने यह सीखा कि ये जो भयानक शक्तियां है विराट शक्तियां ियां है उसको आपको प्लेकेट करना है। उसको आपको खुश रखना है। उसको आपको ऑफरिंग करना है। तो यहां से अपना एक जर्नी जो है स्टार्ट होता है कि हां इस जगत के भी परे यह ट्राइबल लीडर है। वह निश्चय पावरफुल व्यक्ति है। वह शेर है जो कि मुझे खाने को आता है। वह भी पावरफुल है। किंतु इन सबसे परे और कुछ एक पावरफुल सत्ता है जो कि सब कुछ कंट्रोल करता है। यह फ्लड को भी कंट्रोल करता है। लाइटनिंग जो है, बिजली है उसको भी कंट्रोल करता है। हवा जो बह रही है उसको भी कंट्रोल करता है। पानी को भी कंट्रोल करता है। यानी कि एक अल्टीमेट रियलिटी के बारे में हमने सोचना शुरू किया। यह हो गया एक थ्योरिटिकल एस्पेक्ट। और फिर इस अल्टीमेट रियलिटी को शांत कैसे रखा जाए जिसकी वजह से कि वह हमारे पीछे ना लगे। हमको परेशान ना करें। हमारी हत्या करने को ना आए तो वह है कि उनको प्लेकेट करना है। उनको कुछ ना कुछ ऑफरिंग करना है। तो यह हो गया योग एस्पेक्ट। यहां पे फिलॉसोफिकल एस्पेक्ट यह प्रैक्टिकल एस्पेक्ट। किंतु जैसे-जैसे ईश्वर के बारे में हमारी अंडर ये अल्टीमेट रियलिटी मैं ईश्वर शब्द नहीं यूज करूंगा। मैं यूज करूंगा अल्टीमेट रियलिटी। क्योंकि अल्टीमेट रियलिटी इन डिफरेंट डिफरेंट ब्रांचेस दे आर डिफरेंट। कोई भी एक शब्द ले लेंगे ईश्वर तो फिर हम बंध जाएंगे कि हां हम लोग भक्ति शास्त्र की बात कर रहे हैं। इसलिए ब्रह्म तो फिर ज्ञान शास्त्र की बात कर रहे हैं। तो ईश्वर या ब्रह्म यह शब्द नहीं यूज़ करके कहेंगे अल्टीमेट रियलिटी। तो यह अल्टीमेट रियलिटी तो यहां से हमारा एक जर्नी जो है प्रारंभ होता है। एक बहुत ही पावरफुल सत्ता है जो कि इस जगत को नियमन करता है। कर सृष्टि स्थिति प्रलय कर सकता है। जगत के भीतर में जो भी प्राकृतिक शक्तियां है, फोर्सेस ऑफ नेचर है, सब उसके कंट्रोल में है। तो यह हो गया एक अल्टीमेट रियलिटी का कांसेप्ट और इससे भी थोड़ा सा हम ज्यादा प्रारंभ में देखें तो क्या था कि डिफरेंट-डिफरेंट गॉड्स थे। यह जो देवता है वह बिजली के देवता है। यह जो देवता है पानी के देवता है। जल के देवता है। यह जो देवता है हवा के पवन के देवता है। तो क्या है कि इस तरह से डिफरेंट-डिफरेंट देवताओं को खोज सोचा हमने। किंतु फिर अल्टीमेटली जैसा जैसा अंडरस्टैंडिंग या तो फिर जैसे-जैसे एक फिलॉसोफिकल डिसर्नमेंट है विवेक जो है या तो फिर कहेंगे कि सूक्ष्मता है हमारी डेवलप होती गई। हमने सोचा डिफरेंट-डिफरेंट देवताओं की क्या जरूरत है? एक ही ईश्वर एक ही देवता को रखिए। एक ही ईश्वर को रखिए जो कि सब कुछ कंट्रोल करता है। तो इस तरह से हमारा अंडरस्टैंडिंग डेवलप होता है। देखिए यह जो अंडरस्टैंडिंग है कि एक अल्टीमेट रियलिटी जिसको कि हम फिलहाल नाम दें ईश्वर तो वह कहीं बादलों में बस रही है, कहीं वैुंठ में रह रही है, कहीं स्वर्ग में रह रही है। और इस अल्टीमेट रियलिटी को यदि हमको प्लेकेट करना है, उसको शांत करना है जिससे कि वह हमारा नुकसान ना पहुंचाए, हमको परेशान ना करें तो उनके शरणागत होना है। उनको ऑफरिंग्स देने हैं। तो यह हो गया कि एकदम प्रिमिटिव अवधारणा कि ईश्वर है समवेयर आउटसाइड और इस ईश्वर को आपको प्लेकेट करने हैं। किंतु जैसे-जैसे यह

भयावह देवता का प्रेममय ईश्वर में रूपांतरण: वैष्णव धर्म और भाव साधना

हमारा आध्यात्मिक जर्नी बढ़ता गया। जैसे-जैसे ह्यूमन सिविलाइजेशन एडवांस होता गया। साथ-साथ में ही हमारी ईश्वर के बारे में जो अंडरस्टैंडिंग है, वह भी डीपर एंड डीपर एंड मोर एडवांस मोर सोफिस्टिकेटेड होती गई। इसके बाद में हमने यह सोचना शुरू किया कि ईश्वर को हम एक भयावह देवता के रूप में क्यों सोचते हैं? यदि इस जगत में ईवल है तो वह इवल जो होगा यह जो हमको नुकसान करने वाली शक्तियां जो होगी हम हमारा अहित करने वाली शक्तियां जो होगी वो एक डिफरेंट टाइप की शक्ति है और ईश्वर जो है वो हमको स्नेह करते हैं। हमारे पे करुणा बरसाते हैं। ही इज़ अ बेनेवोलेंट फोर्स। और यह जो मेलेवोलेंट फ़ है दैट इज़ समथिंग डिफरेंट। हियर इज गॉड एंड हियर इज इवल। यह गॉड और इवल या तो फिर कहेंगे कि अच्छाई और बुराई यह देवता देव देव और असुर यह जो देवासुर युद्ध जो है भारतीय परंपरा में हम पढ़ते हैं पुराणों में हमेशा एक इवल या तो राक्षसी शक्ति है जो कि हमारा अहित करना चाहती है और यह एक अच्छी शक्ति है। एक करुणामय शक्ति है जो कि हमको आशीर्वाद देती है। हमको स्नेह करती है। तो जब से यह करुणामय ईश्वर के बारे में सोचना शुरू किया तब से लेकर के हमारा उनके साथ में रिलेशन जो है वह भी बदलता गया। हमको सिर्फ उनके सामने शरणागत नहीं होना है। हमको साथ में ही उनके साथ में एक संबंध स्थापित करना है। जिसको कि हम लोग कहते हैं भाव साधना। तो फिर ईश्वर को जैसे कि हम यदि अपने बंधु के रूप में देखते हैं तो है सख्य भाव। यदि हम ईश्वर को अपने छोटे से शिशु के रूप में देखते हैं तो हो गया मातृ भाव। यदि ईश्वर को हम मां के रूप में देखते हैं तो उनके प्रति हो गया हमारा संतान भाव। और यदि ईश्वर को प्रियतम के रूप में देखते हैं तो हो गया हमारा उनके प्रति मधुर भाव। और सभी भावों का संगम करें तो वह हो गया महाभाव। यह जो करुणामय ईश्वर, प्रेममय ईश्वर, आशीर्वाद देने वाले ईश्वर यह जो पूरा थरी और उसका प्रैक्टिकल जो भाव साधना इसका जो अल्टीमेट कलमिनेशन हमको दो तरह की दो फिलॉसोफी में दिखता है। एक तो है द्वैत वेदांत दूसरा है कि विशिष्ट अद्वैत वेदांत। मधवाचार्य और रामानुजाचार्य का यह द्वैत और विशिष्ट अद्वैत दोनों में यह जो सगुण ब्राह्मण या तो ईश्वर है वो किस तरह से उनका स्वरूप है यह सृष्टि की रचना किस तरह से हुई है यह जो मनुष्य है इंसान है इसका ईश्वर के साथ में क्या रिलेशन है और कौन सी साधन पद्धति है जिसके माध्यम से मनुष्य ईश्वर साक्षात्कार ईश्वर प्राप्ति कर सकता है। यह फिलॉसोफिकली द्वैत और विशिष्ट अद्वैत में भारतीय शास्त्रों की जहां तक बात करूं तो भारतीय शास्त्रों में यह द्वैत और विशिष्ट अद्वैत में काफी डिटेल में डिस्कशन है। फिलॉसोफिकल भी और प्रैक्टिकल योगिक एस्पेक्ट के बारे में भी। और फिर इसी में से यह चैतन्य महाप्रभु की जो मूवमेंट है यह जो नॉर्थ इंडिया में पुष्टि मार्ग है हित तरवंश महाप्रभु की तो यह जो वैष्णव साधनाएं वैष्णव मूवमेंट यह भक्ति परंपरा जो भारत में विकसित हुई है और इस भक्ति परंपरा के एक के बाद एक अनमोल रत्न जैसे संत महापुरुषों का भारत की भूमि पर अवतरण हुआ है। भारत की भूमि पर उन्होंने विचरण किया है। यह वैष्णव साधना वैष्णव परंपरा एक विराट एक अवदान है भारतीय आध्यात्मिकता का इस जगत को। तो यह हो गया कि एक स्नेहमय करुणामय ईश्वर जिसको कि हम भयभीत नजरों से जो देखते थे इस तरह से नहीं देख के दास्य भाव की भी साधना जो हमको करनी है तो भी वह उनके प्रति स्नेह रख के महावीर हनुमान का दास्य भाव जो कि प्रचंड आत्मविश्वास से भरा हुआ है। एक डरा हुआ एक सहमा हुआ एक दीनहीन दास्य भाव नहीं महावीर हनुमान का दास्य भाव महावीर हनुमान को क्या कोई डरपोक कह सकता है उनको क्या कोई कावड़ कह सकता है नहीं प्रचंड आत्मविश्वास है साथ में ही यह दास्य भाव है तो क्या है कि ईश्वर का स्वरूप ही ऐसा है अपनी मां के सामने क्या आप डर करके रहेंगे नहीं मां के साथ में झगड़ा भी कर सकते हैं भले ही मां मारे भी सही यदि आपको डिसिप ्न करने के लिए। किंतु अल्टीमेटली तो देखिए कि हमारा पक्का विश्वास है कि हमारे प्रति मां के मन में स्नेह भाव ही है। मां हमारा कल्याण ही चाहती है। भले ही चाहे बीच-बीच में हम मिसचीफ करें कोई ना गड़बड़ करें तो मार खानी पड़े किंतु अल्टीमेटली मां हमारा कल्याण ही करती है। तो यह जो ईश्वर पे भरोसा है, ईश्वर हमारा कल्याण ही करेंगे। ईश्वर का स्वरूप ही है कल्याणकारी। अमंगल जो कुछ भी है अकल्याणकारी जो कुछ भी है वह समवेयर आउटसाइड है ईश्वर के ईश्वर के भीतर में नहीं है तो वह हो गया कि एक भावधारा जो कि वैष्णव भावधारा भारत में चली आई है। अभी

सांख्य और योग का अवदान : युक्ति और विज्ञान के आधार पे आध्यात्मिकता

देखिए साथ में ही किंतु एक दूसरी भावधारा का भी भारत में प्रारंभ हुआ है। हमने जैसे-जैसे हमारी मेधा शक्ति का उदय हुआ, या तो फिर मेधा शक्ति या तो फिर यह बुद्धि शक्ति अपनी जैसे-जैसे डेवलप होती गई, साथ-साथ में ही हमने जगत का एनालिसिस करना शुरू किया कि क्या है इस जगत में? किस चीज का जगत बना है? एनुमरेशन करना शुरू किया, काउंट करना शुरू किया। यह पंचमहाभूत है। पहले तो जगत के जितने भी एलिमेंट्स है उसको फाइव कंस्टीटुएंट एलिमेंट्स में हमने फिल्टर कर दिया। ये पंच महाभूत यह है पंचमहाभूत का पूरा भौतिक जगत बना है। यह पंचतन मात्रा है। पंचमहाभूत है। पंचवायु है। इसका यह जगत बना है। मन मनुष्य के शरीर को आप यदि देखें तो मनुष्य का शरीर के भीतर में क्या है? तो हमारे देह के भीतर में पंच ज्ञानेंद्रिय है, पंचकर्मेंद्रिय है। फिर इसके भी परे यदि आप जाए तो आप देखेंगे कि मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार है। तो क्या है? हमने एनुमरेशन स्टार्ट किया। काउंट करना स्टार्ट किया कि क्या है इस जगत के बेसिक कंस्टीटुएंट एलिमेंट्स। मकान जो बनता है तो ईंट का बनता है ना। ईंट जो होती है उसी की तो सब दीवारें सब कुछ बना है। फिर ईंट को आप फिक्स करने के लिए जो सीमेंट रेती का वो मिक्सचर यूज करें तो वो एक हो गया। तो ये सीमेंट रेती और फिर ये ईंट इसी का तो यह मकान बना है। फिर यह दरवाजा खिड़की है लकड़ी का बना है। छत यदि बनी है तो उसमें वो जो मेटल के ये जो पाइप्स डाले जाते हैं जिससे कि यह जो आरसीसी का स्लेप जो है वह गिर ना जाए। तो गोल घुमा करके मकान बनने में क्या-क्या लगेगा? ये मेटल बीम लगेंगे, लकड़ी के दरवाजे, खिड़की लगेंगे और ये ईंट और ये फिर ये रेती और सीमेंट यही तो पत्थर वगैरह लगेंगे। यही तो इसी का तो मकान बना है। रहता है। इतना 50 मंजिला मकान है। अल्टीमेटली देखिए ग्लास आजकल यूज़ होता है कंस्ट्रक्शन में ज्यादा। खिड़की दरवाजे ग्लास के बने हैं। तो इतनी ही तो चीजें हैं। अल्टीमेटली इतना एक मंजिला मकान हो ना कि 100 मंजिला मकान हो। सो अल्टीमेटली देखिए कि यहां पे भी ये सृष्टि भयानक वैविध्य है सृष्टि का। करोड़ों-करोड़ों जीव है। किंतु यह सब विशाल विराट वैविध्य को आप यदि एनालाइज करना शुरू करें, एनुमरेट करना शुरू करें तो यही कुछ कंस्टीट एलिमेंट्स में आप उसको ब्रेकडाउन कर सकते हैं। तो यह एनुमरेशन प्रोसेस और यह अल्टीमेटली दो पदार्थ के ऊपर में आ जाना कि एक तो चेतन तत्व है, एक जड़ तत्व है। चेतन तत्व हमारे भीतर में है। हमारा सही स्वरूप है और जड़ तत्व जो है जड़ तत्व से पूरा विश्व बना है। तो इसको कहेंगे सांख्य। सांख्य शब्द का ही यही अर्थ है एनमरेशन काउंट करना कैलकुलेट करना। तो देखिए कि ये जो एक इस तरह का फिलॉसोफी जहां पे मेधा शक्ति जो है हमारी इसको यूज करके हमने यह प्रूव किया कि आपको ईश्वर की कोई जरूरत नहीं है। आपके भीतर में चेतन तत्व है। वही एक अल्टीमेट सत्ता है और बाहर में प्रकृति में जो कुछ भी देख रहे हैं सब कुछ जड़ है। जड़ से चेतन की ओर की हमारी यात्रा ही हमारी आध्यात्मिक यात्रा है। तमसो मा ज्योतिर गमय अंधेरे से उजाले की ओर की यह यात्रा बस यही है। ईश्वर है फिर ईश्वर हमारे पर करुणा करेंगे, कृपा करेंगे। वह सब करने की हमको जरूरत ही नहीं है। मेधा शक्ति के माध्यम से हमने ईश्वर है। इस तरह का कोई आवश्यकता ही नहीं। बस जड़ और चेतन पुरुष और प्रकृति इन दोनों के भीतर में आप पूरे विश्व को बांट सकते हैं। या तो फिर कहेंगे इन दोनों तत्वों के माध्यम से ही पूरी इतना वैविध्य की रचना हुई है। तो यह एक ब्रांच जो है निरीश्वरवाद जहां पे कि ईश्वर ये भी सही अभी देखिए सांख्य फिलॉसोफी जो है उसका प्रैक्टिकल एस्पेक्ट है योग। अभी योग में ईश्वर है। योग में ईश्वर की कल्पना है। तो आप कहेंगे कि सांख्य फिलॉसोफी है और उसका प्रैक्टिकल एस्पेक्ट योग है। तो योग में ईश्वर है तो सांख्य को क्या आप बिना ईश्वर का दर्शन कह सकते हैं? इट इज डिबेटेबल। अभी आपको कहना है तो कह भी सकते हैं, नहीं कहना है तो नहीं भी कह सकते हैं। किंतु अल्टीमेटली वह बात है सांख्य योग यह जो कंबाइंड फिलॉसोफिकल ट्रेडिशन है इसमें ईश्वर के ऊपर में भरोसा करके बैठने की जरूरत नहीं है। आपकी खुद की एथिक्स और मोरालिटी और आपकी यह जो संकल्प शक्ति है मन को एकाग्र करने की यम नियम और एकाग्रता ये सत्य अहिंसा अस्तेय अपरिग्रह ब्रह्मचर्य तप शोच संतोष स्वाध्याय ईश्वर प्रणिधान ये जो 10 यम नियम है अर्थात कि एथिक्स और मोरालिटी और फिर यह जो धारणा ध्यान समाधि आपके मन को एकाग्र करने की क्षमता इसी के सहारे आप भवसागर पार कर सकते हैं। इसी के सहारे आप अल्टीमेट आध्यात्मिक तत्व जो है उसको प्राप्त कर सकते हैं और वह है हमारे भीतर में रहा चैतन्य। तो यह एक बिल्कुल ही डिफरेंट टाइप का थिंकिंग स्टार्ट होता है कि यहां पर जो है त्याग का प्राधान्य है क्योंकि आपको इंद्रियों के जो विषय है उससे अपने मुंह को मोड़ लेना है। जगत जो है जगत में यह जो इंद्रियों के विषय पड़े हैं वह तो सब जड़ है। इसमें जितना ही आप इनवॉल्व होंगे उतना ही आप देखेंगे कि धीरे-धीरे करके आपका मन जो है वो स्कैटर हो जा वो बिखर जाता है और मन को बिखरने नहीं देना है। स्कैटर नहीं होने देना है। उसको एकाग्र करना है। एकाग्रता के लिए ब्रह्मचर्य इज ए मस्ट साधना। बिना ब्रह्मचर्य के मन को एकाग्र करने को जाएंगे। आप कर सकते हैं 10 मिनट, 15 मिनट, 20 मिनट असंभव नहीं है। किंतु जैसे-जैसे एकाग्रता के हायर रियल तक आप पहुंचना शुरू करें। जैसे-जैसे ही आप धारणा से ध्यान की ओर, ध्यान से समाधि की ओर जाए। आप देखेंगे कि ठाकुर की वह जो उपमा है वो स्क्विरल स्क्विरल दीवार के ऊपर में चढ़ना चाहती है। किंतु उसकी पूंछ के साथ में कुछ बदमाश लड़कों ने एक पत्थर को बांध दिया है। तो यह स्क्विरल जो बेचारी है वो जितना ऊपर में थोड़ा सा तो उठेगी किंतु और ज्यादा उठने को जाएगी तो पूंछ पे यह जो पत्थर बांधा है उसका वेट जो है उसको खींच करके फिर से जमीन पे पटक देगा। फिर से यह बेचारी स्क्विरल दीवार पर उठना जाएगी तो फिर से थोड़ा सा तो उठेगी किंतु यह पत्थर फिर से खींच के ले जाएगा। तो यानी कि एकाग्रता का प्रैक्टिस जो है उसके पीछे में यह जो यम नियम का पालन अत्यंत आवश्यक है। यदि यम नियम का पालन नहीं किया। खास करके सत्य और ब्रह्मचर्य ठाकुर ने कहा कली की तपस्या तो यह सत्य और ब्रह्मचर्य का पालन नहीं किया तो एकाग्रता के विश्व में एकाग्रता की साधना में ज्यादा आगे नहीं बढ़ सकते तो यह क्या है कि आपको कोई ईश्वर पर भरोसा रख के बैठने नहीं है कि ईश्वर मेरे पर कृपा करेंगे तो मेरा मन एकाग्र होगा। नहीं आपको यह मेथड दे दी गई है कि यम और नियम का पालन करो और इस इक्वेशन के दूसरे ही पार्ट में आपको एकाग्रता दिखाई देगी। ये जो पी वी = nrt है e = mc² है जो कि मोस्ट फेमस इक्वेशन है फिजिक्स के तो यहां पे भी आप देखिए m * नियम इक्वल्स एकाग्रता। ऐसा आप सीधा-सीधी इक्वेशन बना सकते हैं। यहां पे ईश्वर की कोई आवश्यकता नहीं। हालांकि ईश्वर प्रणिधान इज वन ऑफ द साधना इन यम नियम। किंतु इट्स जस्ट वन ऑफ देम ये कोई ओवर आर्चिंग ऑल इंपॉर्टेंट नहीं है। भक्ति मार्ग में ईश्वर जहां पर स्वीकृत है वहां पे ईश्वर के प्रति शरणागति और ईश्वर के साथ में जो एक भाव का संबंध बांधना है वहां पर ईश्वर का अस्तित्व और ईश्वर के साथ में संबंध जो है वह पैरामाउंट है। वही अल्टीमेट साधना है। हां आप जैसे-जैसे भाव राज्य में आगे बढ़ना जाएंगे वैसे-वैसे आपको पता चलेगा कि ब्रह्मचर्य की आवश्यकता है। इंद्रियों के विषयों से आपको विमुख होना होगा। किंतु वो जो है उसके बारे में आपको ज्यादा टेंशन नहीं लेना है। भाव साधना करते जाइए। देखेंगे धीरे-धीरे इंद्रिय संयम अपने से होता है। जबकि यहां पर है इंद्रिय संयम जो है वह फंडामेंटल है। उसके बिना आप एकाग्रता के विश्व में ज्यादा आगे नहीं बढ़ सकते। यानी कि यहां पे है कि भाव साधना का प्राधान्य। इंद्रिय संयम होगा। साथ-साथ में अपने से होगा। और यहां पे है इंद्रिय संयम ही प्राधान्य है। बाकी जो है ऑटोमेटिक होगा। साथ-साथ में होगा। एकाग्रता ऑटोमेटिक होना शुरू हो जाएगा। जैसे-जैसे ब्रह्मचर्य की शक्ति जो है, ब्रह्मचर्य का पालन है, जितना आपका डीप होता जाएगा, वैसे-वैसे ही देखेंगे मैं यहां पर बैठा हूं और एकाएक मेरा मन संपूर्ण रूप से शांत हो गया है। योग चित्तवृत्ति निरोध यह चित्त की जितनी वृत्तियां है सबका निरोध हो गया है। मेरा मन वैसे ही शांत हो गया है। नहीं कोई मुझे जोर जबरदस्ती करके विचारों को इधर से उधर खींच के लाने की जरूरत नहीं है। तो यहां पे जो है कि ब्रह्मचर्य ऑटोमेटिक होगा यदि आप भाव साधना ठीक-ठीक करते हैं और यहां पे है कि एकाग्रता ऑटोमेटिक होगी यदि आप ब्रह्मचर्य का पालन ठीक-ठीक करते हैं। सो यह देखिए एक भक्ति शरणागति भाव का रास्ता है। और यहां पर देखिए कि त्याग संयम और ज्ञान का रास्ता है। यह सांख्य जो

सांख्य के युक्ति-वाद के आधार पे बने बौद्ध धर्म और गौड़पादाचार्य का अजाति वाद

फाउंडेशन डला है कि ईश्वर कोई आवश्यकता नहीं है आपको जगत को समझने के लिए। इस फाउंडेशन के ऊपर में बुद्धिज्म भी बना। वहां पर भी आप देखेंगे कि ईश्वर है नहीं है। उसको ले आपको टेंशन नहीं लेना है। आपको संयम का पालन करना है। त्याग का पालन करना है। मन जो है ऑटोमेटिक ध्यान में एकाग्र होता जाएगा और ध्यान से एकीकृत जो मन है उसमें ऑटोमेटिक भीतर से आपको पता चलना शुरू हो जाएगा। मेरा नेक्स्ट स्टेप क्या है? इसके बाद का नेक्स्ट स्टेप क्या है? जो अल्टीमेट रियलिटी है उसका नेचर क्या है? ठाकुर ने कहा ना कोई कोई कहते हैं कि भगवान बुद्ध ईश्वर में विश्वास नहीं करते तो ठाकुर ने कहा नहीं ऐसा नहीं है। उन्होंने ईश्वर के बारे में बोला नहीं है। क्यों? क्यों नहीं बोला है? क्योंकि वो अल्टीमेट रियलिटी क्या है? वो ऑटोमेटिक आपको पता चलना शुरू हो जाएगा। एक बार आप त्याग, संयम, ब्रह्मचर्य का पालन करना शुरू करेंगे तो। तो यह हो गया सांख्य का फाउंडेशन के ऊपर में बुद्धिज्म बना है। और एक फिलॉसोफी है। वह है अजातिवाद। यह जो मांडूक्य उपनिषद की यह जो मांडूक्यकारिका है, दैट इज़ वन ऑफ़ द मोस्ट पावरफुल फिलॉसोफी। या तो कहेंगे कि एक एक्सट्रीम फिलॉसोफी है आध्यात्मिक जगत की कि यह जो ब्रह ब्राह्मण है वही एकमात्र सत्ता है या तो फिर और साथ में ये जो जगत आप देख रहे हैं उसका अस्तित्व ही नहीं है। यह स्वप्न मात्र है। यह जो चार स्टेजेस कहे गए हैं मांडूक्य उपनिषद में कि स्वप्न जागृत सुशुप्ति और तुरिय जगत क्या है? यह जो हम सपने में जो नींद में जो सपना देखते हैं वही जिस माने उपमा देकर के कहते हैं जिस तरह से नींद में हम सपना देखते हैं और जैसे ही नींद टूट जाती है तो स्वप्न भंग हो जाता है। हम कभी यह इंक्वायरी नहीं करते कि यह स्वप्न आया कहां से? उसके कंस्टीटुएंट एलिमेंट्स क्या है? उसके पीछे का साइंस क्या है? इस स्वप्न के भीतर में ईश्वर था कि नहीं? स्वप्न के भीतर में जो जगत दिख रहा है वहां पर यह ग्रेविटी के नियम काम करते हैं कि नहीं वह सब कुछ प्रश्न करने की जरूरत नहीं क्योंकि स्वप्न सिर्फ और सिर्फ स्वप्न है वह असत है। उसका कोई अस्तित्व ही नहीं है। तो सिमिलरली यह जगत जो है जगत के बारे में कोई भी इंक्वायरी करने की कोई आवश्यकता नहीं। जब फॉर्म भरते हैं ना तो वहां पर आपको पूछते हैं आपका नाम क्या है? आपका सिटी क्या है? फिर पूछते हैं आपका एक्सपीरियंस क्या है? ये वगैरह-वगैरह और वहां पे जहां पे आपको कोई जहां पे जो बॉक्स है उस बॉक्स को भरने की आपको कोई आवश्यकता नहीं तो वहां पे लिखते हैं एनए नॉन एप्लीकेबल। तो अब जैसे कि साधुओं को पूछा जाए कि आपका मेरिटल स्टेटस क्या है? मैरिड है कि अनमैरिड? तो हमको लिखना होगा नॉट एप्लीकेबल। क्यों? क्योंकि हमारे साथ में ना ही मैरिड का कांसेप्ट है ना ही अनमैरिड का कांसेप्ट है। हमारे साथ में यह कांसेप्ट नॉट एप्लीकेबल है। यहां पे भी यह देखिए कि ये जगत जो है जगत किस तरह से प्रकट होता है? उसके पीछे के कंस्टीटुएंट एलिमेंट्स क्या है? कौन-कौन से ग्रेविटी के नियम से चलता है कि नहीं चलता है। ऑल ऑफ दैट इज एन नॉट एप्लीकेबल। क्योंकि यह तो स्वप्न है। स्वप्न में कुछ भी हो सकता है। वह कोई किसी नियम के अंडर में नहीं है। तो क्या है? अल्टीमेटली आपको तुरीय अवस्था प्राप्त करनी है। दैट इज द एक्सट्रीम मोस्ट फिलॉसोफी विद इन हिंदू सिस्टम। हिंदू फिलॉसोफिकल सिस्टम अजातिवाद। ये जगत का जन्म ही नहीं हुआ। अनबोर्न अजात अर्थात कि अनबोन जिसका जन्म ही नहीं हुआ है। ऐसा यह अजातवाद। तो दैट इज यह सांख्य के फाउंडेशन पर यह बुद्धिज्म है या तो फिर यह अजातवाद है। यह दोनों इसके फाउंडेशन पर बने हैं कि जगत को पूरा हमने अपनी बुद्धि शक्ति से नाप लिया और नाप करके हमको पता चला कि ना ही ईश्वर है ना ही उसकी टेंशन लेने की जरूरत है। ना ही यह जगत जो है कैसे बना क्या हुआ उसको लेकर के ज्यादा चिंता करने की जरूरत है। हमको यदि अल्टीमेट रियलिटी है उसको प्राप्त करना है तो जगत की ओर से अपने को अपना मुंह जो है वह मोड़ देना है। जगत से अपना नाता तोड़ देना है। त्याग संयम ब्रह्मचर्य के रास्ते पर आगे बढ़ना है। और जैसे-जैसे हमारा संयम है, त्याग है, ब्रह्मचर्य है, उसमें हम दृढ़ प्रतिष्ठित होते जाएंगे, साथ-साथ में ही यह जो अल्टीमेट रियलिटी है, हमारी नजर के सामने आ जाएगी। तो देखिए

शंकराचार्य का अद्वैत भक्ति मार्ग के ईश्वर तथा गौड़पादाचार्य के अजातिवाद के निर्गुण ब्रह्म का सामंजस्य कैसे करता है?

कि यहां पर त्याग का प्राधान्य है और यहां पे है भाव या शरणागति या भक्ति का प्राधान्य। त्याग और ज्ञान और यह है भक्ति और भाव। यह दो रास्ते हमारे चले आ रहे हैं। यहां [गला साफ़ करने की आवाज़] पे भक्ति और भाव में एक सगुण ब्रह्म कहो कि ईश्वर कहो। एक इस तरह की अल्टीमेट रियलिटी है जो कि हमारे पर करुणा बरसाती है। जिसके मन में हमारे प्रति स्नेह भाव है जो कि हमारा कल्याण चाहती है। और यह त्याग और ज्ञान का रास्ता है। वह कहता है कि अल्टीमेट रियलिटी इज माय ओन नेचर। मैं खुद अहम ब्रह्मास्म। मैं ही हूं वही अल्टीमेट रियलिटी। मुझे वैलिडेशन के लिए कोई ईश्वर के पास नहीं जाना है। ईश्वर के पास में करुणा प्राप्त करने की कोई जरूरत नहीं। मेरे भीतर में वो प्रचंड आत्मश्रद्धा है। मेरे भीतर में यह प्रचंड ज्ञाना अग्नि प्रज्वलित है। मेरे भीतर में यह प्रचंड त्याग की शक्ति वर्तमान है। मुझे क्या क्यों किसी से करुणा प्राप्त करने की जरूरत है? एक कमजोर व्यक्ति जो होता है जिसका विल पावर खत्म हो गया है। वह व्यक्ति किसी के पास जाकर करुणा की भिक्षा मांगेगा। मुझे ये सब भिक्षा-भिक्षा की कोई जरूरत नहीं है। यह जो स्वामी जी ठाकुर के पास पहली बार जाते हैं तो दूसरी बार पहली बार तो वो सुरेश मित्र के घर पे ना कहीं पे ठाकुर के साथ में मुलाकात हुई थी। स्वामी जी ने भजन गाया था। ठाकुर को बड़ा अच्छा लगा। इसके बाद में जब ये दक्षिणेश्वर पहली बार जाते हैं स्वामी जी ठाकुर उनको स्पर्श करते हैं और स्वामी जी चिल्ला उठते हैं। अरे की वर्ष की कोश हमारे मां आज बाबा आज आप क्या कर रहे हैं? क्या कर रहे हैं? मेरे मां है, पिताजी है। तो उसके बाद में किंतु स्वामी जी डर गए थे कि वो कहते हैं स्वामी जी वो लीला प्रसंग में वर्णन है। स्वामी जी कहते हैं कि मैं आश्चर्यचकित हो गया। मैं मानता था कि मेरी संकल्प शक्ति है। मेरी आत्मश्रद्धा है। मेरा विल पावर है। इतना स्ट्रांग है कि एक व्यक्ति मेरे पे इस तरह से अधिकार जमा बैठे। मेरे मन के ऊपर में मिट्टी के एक इस मिट्टी की तरह जो गीली मिट्टी से कुम्हार जो है वो जिस तरह से बर्तन वगैरह बनता है तो वैसे ही मेरे मन को गीली मिट्टी की तरह पूरा वो अपने वश में ले आए। यह कैसे हो सकता है? मैं तो यही मानता था कि हिप्नोटिज्म उन्हीं पर सक्सेसफुल है जिनका कि विल पावर है बड़ा ही कमजोर है। जिनकी संकल्प शक्ति बड़ी ही कमजोर है। आई यूज्ड टू बी प्राउड ऑफ मायसेल्फ। मुझे इतना गर्व था कि मेरी संकल्प शक्ति मेरा विल पावर इतना स्ट्रांग है। तो मेरी जैसे संकल्प शक्ति के साथ में ठाकुर इस तरह से मुझे हिप्नोटाइज कर दे। बिल्कुल जैसे कि मेरी जो सत्ता है माने मेरा जो इंडिपेंडेंट थिंकिंग है उस पे अपना कंट्रोल जमा बैठे ये इस बात को देखकर के मैं आश्चर्यचकित हो गया था। स्वामी जी ऐसा कहते हैं तो क्या है यहां पे आत्मश्रद्धा तो ये जो आत्मश्रद्धा संकल्प शक्ति त्याग की शक्ति ब्रह्मचर्य की शक्ति यह हो गया आपका त्याग मार्ग ज्ञान मार्ग और यहां पे जो अल्टीमेट रियलिटी है वो है निर्गुण निराकार ब्रह्मा तो यह दो फिलॉसोफी है यहां पे अद्वैत वेदांत कहां पे आता है देखिए इंटरेस्टिंगली हम लोग अद्वैत वेदांत को बहुत बार अजातिवाद है उसके साथ में इक्वेट कर देते हैं। अजातिवाद क्या कहता है? जगत असत है। अर्थात कि जगत का अस्तित्व ही नहीं है। वो एक इल्ल्यूजन मात्र है। स्वप्न मात्र है। जैसे ही स्वप्न टूट गया तो वैसे ही स्वप्न का जगत जो अदृश्य हो गया तो साथ में ही जैसे ही तुरीय अवस्था प्राप्त की तो जागृत अवस्था में हमको जो कुछ दिखता है उसका अस्तित्व ही मिट गया। क्योंकि वह स्वप्न मात्र था। उसके अलावा उसका कोई एग्जिस्टेंस नहीं था। तो यह जो अजातिवाद है वि इज नॉट एक्चुअली अद्वैत वेदांत। अद्वैत वेता वैसे तो हम लोग मानते हैं कि एक बड़ा ही म कहेंगे कि एक्सट्रीम फिलॉसोफी है। किंतु यदि सभी फिलॉसोफी को आप कंपैरेटिव एनालिस एनालिसिस करने को जाएंगे तो अद्वैत वेदांत कोई एक्सट्रीम फिलॉसोफी नहीं है। वो एक्सट्रीम फिलॉसोफी का वो जो ताज जो है वो जो किताब जो है वो मिलता है अजातिवाद को। अद्वैत वेदांत क्या कहता है? देखिए इंटरेस्टिंगली सम हाउ अद्वैत वेदांत दोनों मार्ग एक मिडल मार्ग एक करना चाहता है। हालांकि आप अद्वैत वेदांत के साथ में एक मध्यम पंथा शब्द जोड़ेंगे तो लोगों को हंसी आएगी किंतु फिर भी लेट मी ट्राई हियर। देखिए अद्वैत वेदांत कहता है ईश्वर का अस्तित्व नहीं है। ऐसा नहीं। एक ओर तो निर्गुण निराकार ब्रह्म है। यह तो बात पक्की है। दूसरा है कि जगत में निर्गुण निराकार ब्रह्म के अलावा और कुछ नहीं है। यह बात भी पक्की है। यहां तक तो वह अजातिवाद के साथ में गौडपाद के साथ में शंकराचार्य का वो चलता है पैरेलल। किंतु जब यह बात आती है कि तो फिर जगत क्या है? गडपादाचार्य जिस तरह से अजातिवाद के जो मांडूक्यकारिका के लेखक वह जिस तरह से जगत को बिल्कुल नकार ही देते थे। जगत के बारे में कहते हैं जगत असत है। जगत स्वप्न मात्र है। शंकराचार्य ऐसा नहीं कहते। वो ऐसा नहीं कहते कि जगत असत है। वो कहते हैं जगत मिथ्या है। किस हिसाब से? तो अब यहां पर जैसे गड़पादाचार्य का यह जो स्वप्न का उपमा है जैसे ही नींद से जगे स्वप्न कहां विलीन हो गया पता ही नहीं चला। शंकराचार्य कहते हैं ऐसा नहीं। आप रास्ते पर जा रहे हैं। अंधेरे रास्ते में सांप दिखा सांप दिखा। आपका हृदय एकदम धक-धकग कर रहा है। फॉर दैट पर्टिकुलर मोमेंट ये रास्ते में सर्प जो है वह है आपके लिए सत माने एक रियलिटी। किंतु जैसे ही आपने टॉर्च का प्रकाश उस पर डाला पता चला कि यह सर्प नहीं है। रज्जू है। एक रस्सी पड़ी हुई है। तो जैसे ही यह ज्ञान हुआ वैसे ही यह जो सर्प है अदृश्य हो गया और सिर्फ रज्जू ही वहां पर रह गया। इसके बाद में जो टॉर्च आप बंद भी कर दें। पॉकेट में भी रख दें और फिर देखें कि अंधेरे में तो मुझे सर्प जैसा ही दिखता है। किंतु मुझे भय नहीं रहेगा। क्यों? क्योंकि अभी मुझे ज्ञान हो चुका है कि भले ही चाहे सर्प जैसा दिखता है किंतु है तो रज्जु ही है तो रस्सी ही रस्सी सांप की तरह दिखती है यानी कि आपकी साधना के तीन स्टेजेस है। एक तो है कि डर का स्टेज कि यह जगत है। जगत रियल है। उसमें मुझे पेन मिलता है। मुझे सफरिंग मिलता है। वह सब रियल है। किंतु साधना करते जाइए। एक क्षण आपको ब्रह्म ज्ञान होगा पता चलेगा जगत ब्राह्मण के अलावा और कुछ नहीं है नाम रूप का मुखौटा पहना है ठाकुर की जो कहानी एक आदमी शेर का मुखौटा पहन करके लोगों को डराने को जाता है कुछ-कुछ लोग डर भी जाते हैं किंतु बाकी लोगों ने खोज निकाला अरे यह तो आमादे हो रहे हैं वो हरे बोल के एक लड़का है वही है शेर का मुखौटा शेर के कपड़े पहन के डरा रहा है तो जैसे ही पता चला तो वैसे ही भले ही चाहे अभी शेर का मुखौटा शेर के कपड़े पहने हो हमको डर नहीं लगता क्योंकि हमको पता है कि यह तो हमारा मित्र हरे ही है। तो यहां पे भी एक बार ज्ञान हो गया उसके बाद में यह जो निर्विकल्प समाधि हो गई निर्विकल्प समाधि में ब्रह्म ज्ञान हो गया। इसके बाद में निर्विकल्प समाधि से यदि वापस भी आते हैं जीवन मुक्त होकर के जब रहेंगे जगत दिखेगा हमको किंतु जगत का भय नहीं रहेगा। जगत का सफरिंग नहीं रहेगा। भीतर में से यह आत्म ज्योति जो है, आत्म प्रकाश जो है ऐसा ज्वलजल कर रहा है कि यह जैसे कि हमारे मन को शांति और स्निग्धता से भरपूर कर रहा है। तो टॉर्च बंद कर देने के बाद में फिर से यदि हमको सर्प दिखता भी है तो वह सर्प नहीं है। पक्का पता है कि वह रस्सी ही है। तो यहां पे देखिए कि एक और तो है कि ब्रह्म ज्ञान या तो फिर ब्रह्मन ही एकमात्र अस्तित्व है। यह बात जहां तक जाती है शंकराचार्य गडपादाचार्य को फॉलो करते हैं। किंतु इसके बाद में गडपादाचार्य जिस तरह से ईश्वर के अस्तित्व को संपूर्ण रूप से जैसे कि इररिलेवेंट कर देते हैं। शंकराचार्य ऐसा नहीं करते। वो कहते हैं ईश्वर क्या है? तो एक माया का आवरण है। इस माया जैसे कि माया का व्हेल ये जो ये कहते हैं ना व्हेल यानी घुमटा टानना तो घुमटा पहना हुआ है। एक व्हेल लगाया हुआ है ब्राह्मण ने माया का। अब आप देखेंगे बाहर से आप देखेंगे तो आपको तो एक दूसरा ही टाइप का दिखेगा। ये जो घूम ये जो ये कहते हैं ना घुमटा टानी हुई कोई स्त्री यदि रास्ते से जाती है तो हमको ठीक-ठीक नहीं देखेगा उसका चेहरा लगेगा कि स्त्री है किंतु चेहरा किसका है वह पता नहीं जब घुमटा उठाएगी तभी पता चलेगा किसका चेहरा है तो यह ब्राह्मण ने माया रूपी एक व्हेल जो है एक आवरण है अपने ऊपर में रखा है ब्राह्मण करता नहीं है कोई एक्शन नहीं लेते तो ब्रह्मण ने रखा है यह शब्द ही गलत वाक्य प्रयोग ही गलत है। किंतु एनीवे यह अध्यारोप है। तो अध्यारोप को और किस तरह से समझाएं? क्योंकि जितने भी शब्द यूज़ करेंगे यहां पे वो सब शब्द जो है वो कहीं ना कहीं वो कोई किसी ना किसी प्रॉब्लम में आ जाएंगे। तो एनीवे टेक्निकल शब्द है अध्यारोप। ब्रह्मन के ऊपर में माया का अध्यारोप होता है। माया का आवरण होता है। माया रूपी एक व्हेल उसके ऊपर में आ जाती है। फिर हम जब ब्रह्मन को देखते हैं तब हमको ईश्वर दिखते हैं। यानी कि ईश्वर कौन है? ब्रह्म प्लस माया इक्वल्स ईश्वर। अभी ये ईश्वर जो है वह सृष्टि स्थिति प्रलय करते हैं। जैसे कि यह जो भक्ति साधना या तो यह जो द्वैत अद्वैत वेदांत जिस तरह से ईश्वर को चलाते हैं वही ईश्वर फिर यहां पर आ जाता है। किंतु विद दिस क्लेरिटी कि ईश्वर अपने आप में माया की प्रोडक्ट है। है ब्रह्मन ही किंतु ब्राह्मण प्लस माया वो ईश्वर है। यानी कि अल्टीमेट रियलिटी को यदि आप स्टेप बाय स्टेप देखें तो अल्टीमेट नहीं है ईश्वर। इट इज वन स्टेप बिलो। तो यह देखिए कि यहां पर शंकराचार्य का अद्वैत वेदांत इन अ वे जो दो फिलॉसोफीस है एक फिलॉसोफी है जो कि संपूर्ण रूप से ईश्वर सेंट्रिक है वहां पर भाव और भक्ति ही प्रधान साधना है और दूसरी जो फिलॉसोफिकल स्ट्रीम है जो कि ईश्वर सेंट्रिक नहीं है जो कि आत्मसेंट्रिक है और वहां पर त्याग और ब्रह्मचर्य और एकाग्रता और यह संकल्प शक्ति वही प्रधान साधनाएं हैं। इन दोनों का एक तरह से संयम संगम कहे एक तरह का कॉम्बिनेशन कहे तो शंकराचार्य के अद्वैत वेदांत में हमको देखने को मिलता है। एक ओर देखें तो अल्टीमेट रियलिटी निर्गुण निराकार ब्रह्मण भी है। दूसरी ओर देखें तो सृष्टि स्थिति प्रलय के कर्ता ईश्वर भी है। और दोनों को ईश्वर और ब्राह्मण को शंकराचार्य ने साथ-साथ में बिठाया है। बट वि वन अंडरस्टैंडिंग कि ब्रह्मन प्लस माया इक्वल्स ईश्वर। तो यहां पर आप देखेंगे कि यदि अद्वैत वेदांत का एक लिबरल इंटरप्रिटेशन करें तो वहां पर त्याग, संयम, ब्रह्मचर्य, एकाग्रता, आत्मश्रद्धा, संकल्प शक्ति वो जो साधनाएं हैं वह भी यहां पर बैठ सकती है। और यह जो भक्ति मार्ग की साधना है, शरणागति और भाव साधना यह भी अद्वैत वेदांत में आप जेन्युइनली फॉलो कर सकते हैं। एक जो नैरो अह इंटरप्रिटेशन था शंकराचार्य का उसके अनुसार यह भक्ति मार्ग शंकराचार्य के अद्वैत मार्ग के साथ में जुड़ा हुआ नहीं है। किंतु लिबरल इंटरप्रिटेशन करें तो दोनों मार्ग भक्ति मार्ग और ज्ञान मार्ग शरणागति और त्याग दोनों को अद्वैत वेदांत में समावेश है। तो यह हो गया अद्वैत वेदांत। किंतु फिर ठाकुर कहां पे आते हैं? सो यह टाइम हो गया है आज कल हम देखेंगे कि यह जो आपने ट्रायंगल जो बनाया वहां पर फिर ठाकुर का कहां पे अंडरस्टैंडिंग आता है वह अभी हम कल देखते हैं। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु।

प्रश्न: आपने धर्म के विकास का एक अत्यंत रोचक इतिहास प्रस्तुत किया। वह काल निश्चित ही तीव्र संघर्ष और टकराव का समय रहा होगा।

मैं इस तरह से नहीं देखूंगा। मैं कहूंगा कि यह बादबाद में जो चेले चपाटो ने ये सब झमेला करके रखा है जो ओरिजिनल जो है अब जैसे देखिए अभी रिसेंट हिस्ट्री की बात करें आइंस्टाइन का ये जो जनरल थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी और ये जो क्वांटम डायनेमिक्स ये जो कोपन हेगन स्कूल ऑफ इंटरप्रिटेशन ये नेल्स बोर वगैरह तो इन लोगों में दोनों में प्रचंड एक फिलॉसोफिकल एक कन्फ्लिक्ट था। तो बट द होल कॉन्फ्लिक्ट इज़ सो इंटेलेक्चुअल। भले ही चाहे एक दूसरे की बात के साथ में बिल्कुल असहमत होते थे। उन लोगों का जो डिस्कशन था व्हाट वाज़ इंटेंसली इंटरेस्टिंग और बेस्ड ऑन दिस डिस्कशन आज का प्योर मॉडर्न फिजिक्स आज का जो है इसी दो रिलेटिविटी और क्वांटम डायनेमिक्स के क्फ्लिक्ट से स्टार्ट हुआ है। किंतु दोज़ हु वेयर एट दैट टाइम आइंस्टाइन ऑन वन हैंड और यह जो कोपन हेगन स्कूल ऑन द अदर हैंड दे वेरी कोडियल रिलेशन। राइट? तो यह बात बातबात का यह चेले चपाटों का बहुत सारा चमत्कार रहता है कि यह बस हम लोग इसी को फॉलो करना है। उसको नहीं करना है। अदरवाइज ओरिजिन ओरिजिनेटर्स जो होते हैं दे आर क्वाइट लार्ज हार्टेड। और माने इट वुड हैव बीन अ ग्रेट टाइम टू लिव कि ग्रेटेस्ट माइंड जो है सम ऑफ़ द ग्रेटेस्ट माइंड इन हिस्ट्री ऑफ़ ह्यूमैनिटी। वे लोग डिबेट करते हैं ऑन द मेरिट्स एंड डिमेरिट्स ऑफ़ वेरियस फिलॉसोफी। उस समय प्रेजेंट रहना। इट वुड हैव बीन एन इंटेलेक्चुअल फेस्ट कि मतलब कितना हम लोग सीखते कितना हमारा एक बिल्ड अप हो जाता ये बात बाद बात बाद में क्या है बौद्धिक सब लिमिटेशन आ जाती है ना फिर वो डिबेट नहीं करके फिर जुनून स्टार्ट होता है

प्रश्न: उदाहरण के लिए शंकराचार्य और मंडन मिश्र का ऐतिहासिक शास्त्रार्थ, जहाँ मंडन मिश्र की पत्नी ने निष्पक्ष निर्णायक बनकर अपने पति को पराजित घोषित किया।

और उसको विधवा होना है राइट उसका जो निर्णय है उसके बेस पर उसको विधवा होना है हां वो तो मंडोनिश्रा यदि सन्यासी हो जाएंगे वो तो शास्त्रीय मृत्यु हो गया है ना ओरिजिन ओरिजिनेटर्स जितने भी होते हैं ना लार्ज हार्टेड और सुप्रीमली कॉन्फिडेंट होते हैं। उनको यह सब समस्या नहीं है कि जो मैं कहता हूं वही सही है। आप मुझे प्रूव करके दिखाइए कि मैं गलत हूं।

प्रश्न: अजातवाद तो पूरा रुखा सुखा है, नहीं?

नहीं नहीं ऐसा नहीं कहेंगे। सूखा है। प्रॉब्लम क्या है कि उसमें प्रवेश करने की अपनी एलिजिबिलिटी नहीं। 100% ब्रह्मचर्य वाज़ अ स्टार्टिंग पॉइंट। तो वो रेयरली किसी का होता है। बोलकर के हमको रुखा-सखा लगता है। वरना आप उस लेवल पर यदि पहुंच जाते हैं तो एक शांति जो है ना म यू कैन एक्चुअली मटेरियली यू कैन फील इट। आज जो मन की शांति के लिए लोग पूरा जगत में दौड़ादौड़ी करते हैं। मन की शांति मन की शांति उस लेवल पे जाके ना मन की शांति समथिंग यू कैन टच यू कैन फील। म इतना सॉलिड हो जाती है प्रॉब्लम के वी आर रेयरली इफ एनीवन एनी इज देयर कि वह उस लेवल पर एलिजिबल है। स्वामी जी जैसे स्वामी जी ठाकुर जैसे ठाकुर उन लोगों ने भी प्योर अजातवाद नहीं चलाया है। उस लेवल पर पहुंचे हैं तो प्रोपगेट नहीं किया है।

प्रश्न: एक ज़बरदस्त समुद्रमंथन चल रहा है और लगातार नए-नए विचार उत्पन्न हो रहे हैं। इनमें सबसे नवीनतम हैं श्री रामकृष्ण।

देखिए मैं ऐसा माने अब जो प्योरिस्ट होंगे ना वो इस बात से वो ऑब्जेक्शन करेंगे। हाउ कैन फिलॉसोफी कीप इंप्रूविंग? जब कि यह ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या इज़ अल्टीमेटली खोजा जा चुका है। तो मैं कहूंगा बिकॉज़ आई आल्सो बिलीव इन सेम थिंग कि इवोल्यूशन इज अ वे ऑफ़ लाइफ। आप कभी भी किसी भी थिंकिंग, किसी भी प्रोसेस को फिक्स नहीं कर सकते फॉर ऑल टाइम। इवोल्यूशन यदि होता भी है माने मान लीजिए अब जैसे कि आप मान लीजिए कि आइंस्टाइन न्यूटन ने जो लॉ ऑफ ग्रेविटी खोजा। राइट? उसके ऊपर में आइंस्टाइन ने बहुत सारा कुछ ऐड किया। किंतु न्यूटन का लॉ ऑफ ग्रेविटी फॉल्सिफाई नहीं हो जाता है। उसके पैराटर्स लिमिटेड हो जाते हैं। पहले हम सोचते थे कि यूनिवर्सली एप्लीकेबल है। नाउ वी अंडरस्टैंड कि यूनिवर्सली एप्लीकेबल नहीं है। विद इन दिस पैरामीटर वो एप्लीकेबल है। फिर पैरामीटर्स चेंज होते हैं देन रिलेटिविटी कम्स इंटू द प्ले। तो सिमिलरली एक अल्टीमेट रियलिटी है उसको देखने अब जैसे हाथी अह एक अंधे आदमी हाथी को कोई देखता है उसके कान पकड़ कर के कहता है उसका यह स्वरूप है। कोई पैर पकड़ कर के कहता है यह स्वरूप है। पूंछ पकड़ कर के कहता है ऐसा है। अभी आप मॉडर्न एनालॉजी ले लीजिए कि वो पिक्चर वो एलएलएम के भीतर में सब बिठाते जाइए। फिर एलएलएम आपको एक कंप्लीट पिक्चर देगा तो पता चलेगा। अच्छा ये हाथी है। सो आवर अंडरस्टैंडिंग इज इवॉल्विंग। यह ओरिजिनेटर्स जितने भी है ना वह सब लार्ज हार्टेड लिबरल उनका एक म एक विज़न था। हम लोगों का प्रॉब्लम क्या है कि हमारी बुद्धि शक्ति और अपनी साधन शक्ति इतनी लिमिटेड है कि हम इसके परे कुछ देख नहीं पाते। और यदि कोई डिबेट करने को आता है तो वी लेश आउट कि नहीं ऐसा गलत है बिल्कुल सोचना। और अभी भी यह जो प्यरिस्ट है शंकराचार्य कि उन्होंने सिर्फ ज्ञान मार्ग ही दिखाया है। वि इज नॉट राइट। माने वो लोग कहेंगे कि शंकराचार्य की ये जो स्तोत्र वगैरह है इंटरपोलेशन है और आदि शंकराचार्य ने नहीं रचित किए। बात के शंकराचार्य ने किए। ओके चलो। किंतु ये तो एक नैरो इंटरप्रिटेशन हो गया। यू स्टडी अद्वैत इन ऑन इट्स ओन मेरिट। ईश्वर है। सृष्टि स्थिति प्रलय करते हैं। राइट? अह क्यों शंकराचार्य को गडपादाचार्य से सेपरेट होना पड़ा? व्हाई? यदि आप प्योर ज्ञान मार्ग पे ही चलते तो जो गड़पादाचार्य कहते हैं कि जगत स्वप्न है। जैसे ही नींद खुली स्वप्नदृश्य हो गया वैसे ही तुरिय अवस्था में पहुंच गए। जागृत अवस्था का जो कुछ भी है स्वप्नवत दिखेगा। ये इंटरप्रिटेशन के बाद में आपको क्यों फिर यह ईश्वर को लाना पड़ा? राइट? सो शंकराचार्य सरप्राइजिंगली इज अ समन्वयाचार्य जो कि कोई आजकल कहेगा नहीं वो कहेंगे अद्वैत वेदांत इज वन एक्सट्रीम और ये अद्वैत वेदांत इज अनदर एक्सट्रीम नो अद्वैत वेदांत इज अ मिडल अजतिवाद इज अनदर एक्सट्रीम

प्रश्न: अद्वैत के छत्र तले समस्त दर्शन आश्रय पा सकते हैं। केवल द्वैत को ही अद्वैत से आपत्ति है — कि आपने हमारे ईश्वर को ब्रह्म के मुकाबले दूसरे स्टेप पर क्यों रखा?

ना अद्वैतवादी क्यों प्रॉब्लम खड़ा करेंगे ईश्वर को सेकंड रंग पे बिठाया है सेकंड स्टेप पे बिठाया है मतलब हमारे जो सृष्टि स्थिति करता ईश्वर जो है सेकंड स्टेप पर क्यों बिठाया वो उनको और यदि स्पइलर अलर्ट दे दूं तो यही प्रॉब्लम को ठाकुर ने सॉल्व किया है। [हंसी] ये जो द्वैत वालों का जो ऑब्जेक्शन है उसी प्रॉब्लम को ठाकुर ने सॉल्व किया है। सो [हंसी] मैंने है ना एक बड़ा सा चार्ट बनाया है। कल मैं यह सब रिसर्च कर रहा था तो एक बहुत बड़ा चार्ट बनाया है कि नेचर ऑफ अल्टीमेट रियलिटी फिर क्रिएशन ऑफ द वर्ल्ड नेचर ऑफ द वर्ल्ड वर्ल्ड कैसे क्रिएट होता है इंडिविजुअल का स्वरूप साधना का स्वरूप मुक्ति का स्वरूप ऐसा करके लिस्ट ऑफ कांसेप्ट है और फिर यह फिलॉसोफी है द्वैत अद्वैत विशिष्टद्वैत अजातवाद सांख्य ठाकुर बुद्धिज्म तो ऐसा करके पूरा टेबल बनाया है और और फिर रेफरेंस है सबके साथ में। सो वो टेबल मैं आपके साथ में शेयर करूंगा। अभी मैं थोड़ा रिफाइन कर रहा हूं। मैं टेक्निकल सब्जेक्ट ले नहीं बोलना चाहता था। अभी ये आपका परिणामवाद क्या है? विवर्तवाद क्या है? फिर ये जो निमित्त कारण क्या है? उपादान कारण क्या है? तो क्या बहुत टेक्निकल हो जाता। सो वो टेबल मैंने रखा है मेरी अंडरस्टैंडिंग के लिए। बट दैट आई विल शेयर विद यू। तो आपको एक बहुत ही क्लियर आईडिया आ जाएगा कि यह कंपेरेटिव फिलॉसोफी एस फार एस द फंडामेंटल क्वेश्चंस ऑफ स्पिरिचुअलिटी आर कंसर्न हाउ दे सॉल्व दोज़ पर्टिकुलर क्वेश्चंस हाउ इट टाइ डाउन टू एवरीथिंग यस यस बट टेबल में आपको एकदम क्लियर दिख जाएगा। आपको यदि थोड़ा बैकग्राउंड है टेक्निकल नॉलेज मतलब टेक्निकल वर्ड्स थोड़े पता है तो टेबल देख के आपको विद इन वन ग्लास सब पता चल जाएगा। तो किंतु मैं उस टेक्निकल वर्ड्स का उपयोग नहीं करता इस क्लास में। टेबल बनाया है मैंने। आई विल शेयर विद यू।

प्रश्न: हर किसी को लगा कि ठाकुर हमारे अपने हैं। वैष्णवों, ब्रह्म समाजियों—सभी ने यही सोचा

देखिए यहां पे देखिए एक तो एक्सट्रीम फिलॉसोफी है ईश्वरवाद और यहां पे एक्सट्रीम फिलॉसोफी है कि निरश्वरवाद कि अजातवाद या तो फिर सांख्य या तो बुद्धिज्म जहां पे ईश्वर की जरूरत नहीं है। और त्याग और भक्ति समन्वय करना है त्याग और भक्ति का। किंतु शंकराचार्य का जो समन्वय है वहां पे ईश्वर इज वन स्टेप बिलो। जिसके साथ में अब अजातवाद वाले वैसे तो स्वीकार ही नहीं करेंगे ईश्वर को किंतु फिर भी चलो एटलीस्ट वह सेटिस्फाइड है कि निर्गुण निराकार ब्रह्म फर्स्ट स्टेप पे है। किंतु इन लोगों को प्रॉब्लम यह है कि हमारे ईश्वर सेकंड स्टेप पे क्यों है? सो दैट इशू इज सोल्वड बाय ठाकुर और कोई स्पॉइलर एरर यदि दे दे तो ब्रह्म शक्ति अभेद नहीं स्वामी जी विल कम। ये जो ठाकुर को डिस्कस करेंगे स्वामी जी और मदर दोनों कम। अच्छा क्योंकि ठाकुर मास्वामी जी एक तीन तीन एक ये हमारा महावाक्य है तो वो तो आने ही आने हैं। निष्काम कर्म कहां आता है? मां का मातृभाव कहां आता है? ऑल ऑफ दिस विल बी डिस्कस विद ठाकुर। उन्हें प्रश्न ही नहीं है।