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Sri Ramakrishna Kathamrita ·

श्रीरामकृष्ण कथामृत || 16 Dec 1883 - श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ दक्षिणेश्वर में || 10 Dec 2025

प्रार्थना

ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री श्री रामकृष्ण कथामृत 16th दिसंबर 1883 यह वाला हमारा चैप्टर चल रहा था मुखजे एक

जहाँ साधना को दिशा और आधार मिले—वह आश्रय है रामकृष्ण मिशन

जनाई के आए हुए हैं। उनके साथ में ठाकुर का वार्तालाप हो रहा है। ठाकुर मुखजे को कहते हैं कि आप धनी भी है और फिर भी ईश्वर में आपका मन है। यह बड़े सौभाग्य की बात है। और फिर जब पूर्व जन्म में योगी थे होंगे और कहीं-कहीं पर आपका पथ भ्रष्ट हो गया था तो बोलकर के इस जन्म में धनी के घर में भक्त होकर के जन्म प्राप्त करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। इसका इसका बेनिफिट यही है कि यदि गरीब के घर में जन्म लेते और यदि भक्त होते तो भक्ति के पाथ में बहुत सारी बाधाएं आती। किंतु धनी होकर के जन्मे हैं तो इसका अर्थ है कि भक्ति मार्ग आपका सहज हो गया है। अभी आपके रास्ते में रुकावट डालने वाला कोई नहीं। ठाकुर कहते हैं ना कि जो भक्त होता है ईश्वर की ईश्वर दर्शन का अभिलाषी जो होता है उसको कहीं ना कहीं कुछ ना कुछ सुविधाएं भगवान कर देते हैं। हो सकता है कि बड़ा भाई है जिसने कि घर का जिम्मा ले लिया है तो आपके सर पर अभी ज्यादा टेंशन नहीं है। अभी ठाकुर जब यह उदाहरण देते हैं तो देखिए कि किस तरह से ठाकुर के साथ में ही यह उदाहरण एकदम फिट बैठ जाता है। हालांकि छोटी उम्र में ठाकुर के पिताजी का देहावसान अवश्य हुआ था। किंतु उनके जो बड़े भाई थे रामकुमार उन्होंने फिर घर चलाने का जिम्मा ले लिया था। बोलकर के बालक गदाधर अपनी मां की स्नेह आश्रय में कामार पुकुर में इतना लंबा समय आनंद से दिन बिता पाया था। और फिर जब साधना की बारी आई तो फिर जैसे कि मां काली ने ही स्वयं ठाकुर कोलकाता अपने मंदिर में अपने पास में बुला दिया। तो वो कुछ ना कुछ सुविधाएं जो है इस तरह की भगवान कर देते हैं। आजकल के युग में देखिए कि रामकृष्ण मिशन है। आपको यदि ईश्वर प्राप्ति या तो फिर आत्म साक्षात्कार की व्याकुलता मुमुक्षुत्व इतना तीव्र है तो आप रामकृष्ण संघ में साधु होकर के ज्वॉइ कर सकते हैं। यहां पे आपके पास में संपूर्ण सुविधा है। आपका पूरा जीवन ही जैसे कि साधना में परिणत हो जाता है। जो कुछ भी करते हैं, कर्म करते हैं, पूजा करते हैं, स्वाध्याय करते हैं, सत्संग करते हैं, जो कुछ भी है सब कुछ यहां पर साधना है। तो ठाकुर ने अपने लिए और फिर पहले तो और भी एक ठाकुर कहते हैं कि कोई धनी व्यक्ति का आश्रय मिल गया तो वह सब चीजें आपकी संभाल रखता है। तो ठाकुर के पास में भी ऐसे रसददार थे। तो ठाकुर ने हमारे लिए यह रामकृष्ण संघ रूपी एक रसददार का निर्माण करके गए हैं। यहां पर रहकर के जो शारीरिक जो सब आवश्यकताएं हैं सब पूर्ण होती है। जिससे कि हमारा मन संपूर्ण रूप से ईश्वर आराधना में लगे।

कर्मयोग में self reflection (आत्म-निरीक्षण) का महत्व

बहुत बार हम लोग सोचते हैं कि अरे यह ड्यूटी है, वह ड्यूटी है, यह सब करने से मुझे समय कैसे मिलेगा? तो देखिए कि यहां पर जो कर्म भी करते हैं तो कर्म को भी तो आपको साधना में परिणत कर देना है। जो कार्य मैं करता हूं इसके पीछे ना ही विद्वेष रहना चाहिए ना ही वैर भाव रहना चाहिए ना ही यह सुपीरियरिटी या तो फिर इनफीरियरिटी कॉम्प्लेक्स होना चाहिए ना ही कोई कोई होता है कर्म करके फिर उनके मन में घमंड प्रकट हो जाता है कि मैं ही हूं काम करने वाला बाकी सब निकम्मे है तो फिर आपने कर्म योग क्या किया यदि कर्म करके तथाकथित कर्म योग करके आपके मन में घमंड और फिर द्वेष ही प्रकट होना था। तो आपने कर्म योग किया ही मतलब आपने कर्म योग किया ही नहीं है। बहुत बार ऐसा एक चित्र विचित्र सब बातें फैलती है कि यदि मुझे साधना करनी है तो मुझे आश्रम छोड़कर के और कहीं जाकर के साधना करनी होगी। क्योंकि वहां पर ट्रेडिशनल यह जो सब ट्रेडिशनल सब जगह हैं जहां पर यह यह सब होता है आपका हो सकता है कि वहां पर पूजा पाठ होता हो स्वाध्याय प्रवर्चन होते हो वहां पर कुछ सत्संग होता हो वहां पर एकांत में रहने को मिलता हो तो हम लोग कभी-कभी सोच लेते हैं कि हां यही सब ट्रेडिशनल साधनाएं हैं जो कि मुझे कभी-कभी करके करनी चाहिए जाकर के और यहां पर रामकृष्ण मिशन में जो कर्म योग है वह मेरे लिए बंधन का कारण ही मात्र है। तो बंधन का कारण तो इसको हम बनाते हैं ना। हम ही तो कर्म करके द्वेष में फंसते हैं। हम ही तो कर्म करके निराशा में पड़ जाते हैं। हम ही तो कर्म करके अहंकार का शिकार हो जाते हैं। ये कर्म योग करते क्यों हैं? कर्म और कर्म योग दोनों में डिफरेंस क्या है? कर्म है कि आप फल प्राप्ति के लिए कर्म करते हैं और कर्म योग है कि आपके मन को रीइजीनियर करने के लिए आप कर्म योग करते हैं। यहां पर सिर्फ बात यह नहीं है कि मैं एक्सटर्नल क्या एक्टिविटी कर रहा हूं। मैं अपने रांची के दिनों की बात बताता हूं। वहां पर मैं प्रतिदिन मुझे ट्राइबल एरिया में जाना होता था। मैं जाता था। अपने मन से जाता था। कोई मुझे कहता नहीं था। मैं अपने मन से जाता था। क्योंकि काम इतना था और मुझे यह सब काम अच्छा भी लगता था। तो प्रतिदिन सुबह को निकल जाते पूरा एक टीम लेकर के वॉलंटियर्स और स्टाफ का रिसोर्स पर्सन का और फिर एक रूट पक्का कर लेते। उस रूट पे जाना है। वहां पर छह से सात गांव आएंगे। तो सब गांव को कवर करना है। तो प्रतिदिन का मेरा यह एक रूटीन था। अभी देखिए कि इस तरह का हेक्टिक वर्क आप जब करते हैं तो आपके मन के ऊपर में चारों ओर से आघात होते हैं। आघात और प्रत्याघात। इसकी यह जो परंपरा है वह प्रारंभ हो जाती है। सक्सेस मिलने से हमारे मन में घमंड प्रकट हो जाता है कि हां देखो कि मैं इतना अच्छा कार्य कर रहा हूं। फिर एंबिशन प्रकट होती है कि आज मैं चार गांव कवर करता हूं तो कल मुझे 40 गांव कवर करने हैं। मेरी एंबिशन का अंत ही नहीं। वहां पर 70 विलेजेस को हमने अडॉप किया है। तो अभी 150 विलेजेस अडॉप कर लेते हैं। फिर यह 400 गांव में हमारा सर्व शिक्षा अभियान चल रहा है तो और 400 गांव को कवर कर लेते हैं। काम बढ़ाते ही जाते हैं। काम बढ़ाना अच्छा है। किंतु भीतर में जो घात प्रत्याघात क्रिया और प्रतिक्रिया वह जो होती थी उससे मैं उस समय ही अलर्ट हो गया था। क्योंकि मेरा एक थोड़ा हैबिट था साइकोलॉजी स्टडी करने का। तो मैं अपने माइंड को स्टडी करता रहता था। मेरे जीवन में मेरे साधक जीवन में यह एक बहुत बड़ा एसेट के रूप में इसने मुझे बेनिफिट दिया है कि मैं जो कुछ भी करता हूं, मैं कर्म को तो एनालाइज करता हूं। साथ में अपने माइंड को भी एनालाइज करते रहता हूं। मैं यह जो कार्य करता हूं, उसको कैसे इंप्रूव किया जाए। अभी यह सर्व शिक्षा अभियान है तो 400 गांव में हमारा सर्व शिक्षा अभियान चल रहा है तो इसको किस तरह से बेटर और बेटर बनाया जाए सर्व शिक्षा अभियान का कोई भी एक सेंटर है तो उसका सक्सेस का क्राइटेरिया क्या है सर्व शिक्षा अभियान प्रारंभ क्यों किया गया है क्योंकि वहां पर प्राइमरी स्कूल नहीं है इसलिए तो कोई भी एक सर्व शिक्षा का सेंटर होगा उसका अल्टीमेट एम है कि वहां पे इतने स्टूडेंट आए कि अल्टीमेटली यह एक प्राइमरी स्कूल के रूप में गवर्नमेंट प्राइमरी स्कूल के रूप में वो ऑथोराइज्ड हो जाए। तो मैंने मेरे रहते-रहते ऑलमोस्ट फोर टू फाइव चार से पांच सेंटर्स को मैंने इतना अच्छे से वो एक्टिव हुए थे कि वो प्राइमरी स्कूल के रूप में वो रिकॉग्नाइज्ड हुए थे। तो फिर मैं हमेशा यह मेथोडोलॉजी को स्टडी करूंगा कि यहां पर ज्यादा बच्चे किस तरह से आए। घर-घर जाकर के प्रचार करना है, कहना है कि आपके बच्चों को यहां पे भेजिए। फिर हमारे यहां से यह स्टडी मटेरियल मिलता है। टीचर का क्वालिटी है। टीचर का वह जो टीचिंग एफिशिएंसी है वह सब इंप्रूव करना है। तो जितना सीरियसली मैं यह वर्किंग मेथोडोलॉजी स्टडी करता था उसको इंप्रूव करने का प्रयास करता था। कंटीन्यूअस गांव में जाकर के पेरेंट्स से, टीचर से, स्टूडेंट से उनका फीडबैक लेता था। और यहां पे जो सर्व शिक्षा अभियान जो गवर्नमेंट एजेंसी चलाती थी तो उनके पास में से वो डाइट डिस्ट्रिक्ट इंस्टट्यूट ऑफ एजुकेशन ट्रेनिंग तो उन लोगों के अंडर में सब कुछ था। तो उनके जो ऑफिसर्स होते हैं उनके साथ में कोऑर्डिनेट करके वो कैसे बेटर किया जाए? तो जितना मैं टाइम यह मेथोडोलॉजी स्टडी करने में इंप्रूव करने में बिताता था। इतना ही टाइम में अपने माइंड को स्टडी करने में इंप्रूव करने में बिताता था। देखिए यह स्टडी ऑफ माइंड यह स्टडी ऑफ आवर ओन कॉन्शियसनेस यह आध्यात्मिक जगत का एक बहुत ही इंपॉर्टेंट एस्पेक्ट है। यदि हम अपने को खुद को स्टडी नहीं कर पाएंगे। यदि हम अपना खुद के मन में क्या हो रहा है? घात प्रतिघात क्रिया प्रतिक्रिया यह इमोशंस या तो भाव का यह द्वंद जो है यह क्या कर रहा है अपने मन में यह नहीं समझेंगे तो आध्यात्मिक जीवन में हम बहुत ज्यादा आगे नहीं बढ़ पाएंगे। एक हीरा जो होता है जमीन में से जब निकालते हैं उसको तो वह कोयले की तरह ही होता है। उसको तो फिर शेप देकर के पॉलिश करके आपको उसको हीरा बनाना है। तो अपना ये जो कॉन्शियसनेस है वह एक जमीन में से निकाला हुआ एक पत्थर मात्र है। इसको आप कंटीन्यूसली शेप करके पॉलिश करके डायमंड में कन्वर्ट करना है। कि असंस्कृत मन जो है उसको सुसंस्कृत करना है। जितनी भी साधन पद्धतियां है वह सब मन को सुसंस्कृत करने के लिए ही है। अल्टीमेटली कर्म और कर्म योग यह कोई भी कार्य या साधना देखिए कि साधना और कार्य में फर्क क्या है? प्रत्येक मनुष्य कार्य करता है। कोई भी मनुष्य बिना कार्य के क्षण भर नहीं रह सकता। सांस लेना कार्य है, आहार करना कार्य है। सोना निद्रा जो है वह कार्य है। जगना कार्य है। बिना कार्य के आप एक क्षण नहीं रह सकते। किंतु कार्य एक सिंपल वर्क वो क्या है? वर्क है। उसको कहते हैं कि जिसका एम्स एंड ऑब्जेक्टिव आउटसाइड वर्ल्ड में हो कि हां आज मैं स्टडी कर रहा हूं। तो फिर स्टडी का उद्देश्य है ज्यादा मार्क्स लेके पास करना। आज मैं हाउसवाइफ हूं तो मेरे जीवन का उद्देश्य है कि मेरे जो लड़के लड़कियां हैं अच्छे से पढ़े उनको अच्छे से शादी हो उनका करियर अच्छे से बने यदि मैं फादर हूं तो घर के लिए जो पैसा कमाना है बच्चों की संभाल रखनी है यह सब होता है कॉर्पोरेट वर्ल्ड में होता हूं क्रिकेटर होता हूं पॉलिटिशियन होता हूं तो उस तरह के सब टारगेट होते हैं तो क्या है कि जीवन एक सिंपल वर्क या कार्य का डेफिनेशन यही है कि उसका टारगेट आउटसाइड रहता है। उसके यह जितने भी डायनेमिक्स होते हैं आउटसाइड वर्ल्ड के साथ में रिलेटेड होते हैं। कम्युनिटी लेवल पे या तो सिविलाइजेशनल लेवल पे उसका सब काम चलता है। जबकि हम कार्य को साधना क्या है? साधना का अर्थ है आप सब कुछ करते ही हैं। ऐसा नहीं कि आप अलग से कुछ करते हैं। अलग से कीजिए। किंतु उसका जो स्टडी या तो उसका टारगेट जो है वह रिवर्स हो जाता है। वह अंतर्मुख हो जाता है। वह होता है स्टडी ऑफ कॉन्शियसनेस। सब समय अपने को स्टडी एनालाइज करने का कैपेसिटी होना चाहिए। आज मैं पूजा भी करता हूं तो पूजा करने के समय मेरे मन में क्या चल रहा है? मैं यहां पर आरती कर रहा हूं तो मेरी नजर कहां पे है? जिस ईश्वर की मैं आरती कर रहा हूं उनके ऊपर है ना कि वहां पर भक्त लोग बैठकर के सोच रहे हैं कि अच्छा देखिए यह कितना सुंदर आरती करते हैं। वो उसके ऊपर में मेरी नजर है। कल ही हमने देखा क्रंदन योग के बारे में। ठाकुर कहते हैं कि व्याकुल होकर के रो तो इस अश्रुवारी जो है अश्रुवारी से हमारे हृदय का जो मेला है वह धुल जाएगा। तो फिर इसके सामने जो हमारा प्रश्नोत्तरी चला था कि इस तरह से रोते हुए तो बहुत लोगों को देखा है। उनके जीवन में क्यों परिवर्तन नहीं आता? खास करके यह नृत्य गोपाल जो उसका उदाहरण ठाकुर उसको कहते हैं साधु सावधान। ठाकुर कहते हैं कि इसकी परमहंस अवस्था है। इसके बावजूद इसको क्यों कहते हैं सावधान होने को? मास्टर महाशय इस तरह से कथामृत में लिखते भी है और हमको यह भी पता है कि बाद में उसका पतन भी हुआ था। तो यहां पर क्या है कि आप साधना के लिए सब कुछ करते हैं किंतु आपका जो नजर है ना वह बाह्य जगत की ओर है। आप यह नहीं सोचते कि यह रो के प्रार्थना करके जप ध्यान करके कर्म योग करके यह ट्राइबल एरिया में जाकर के सेवा करके मेरे हृदय में क्या हो रहा है? क्या परिवर्तन आ रहा है वह नहीं सोचते और सोचते हैं कि लोग मेरी प्रशंसा करते हैं कि नहीं करते। मैंने अपना सोशल कैपिटल बनाया कि नहीं बनाया। मैंने अपना बैंक अकाउंट बनाया कि नहीं बनाया। मैंने मौका देखकर के अच्छे पात्र के साथ में शादी कर दी कि नहीं कर दी। वह सब एक्सटर्नल एक अपनी दृष्टि होती है। भूल करके हम जो कुछ भी करेंगे उसका ज्यादा कोई आध्यात्मिक जगत में परिणाम नहीं होगा। जबकि हम इवन देखिए स्वामी जी का इतना रेडिकल आईडिया है दरिद्र नारायण सेवा स्वामी जी के गुरु भाई खुद आश्चर्यचकित हो गए थे कहां यह जप ध्यान कहां यह शास्त्रार्थ कहां यह मेडिटेशन यह जो सब पद्धतियां है विचित्र विचित्र चित्रविचित्र पद्धतियां उसका इस्तेमाल करके कहीं ना कहीं आत्म साक्षात्कार करना है ना कि कह रहा है कि गांव-गांव जाकर के गरीबों की मदद करो। तो यह किस तरह की विचित्र बातें कर रहा है। किंतु देखिए कि यदि आप ट्राइबल एरिया में भी जाएंगे, सर्व शिक्षा अभियान भी चलाते हैं। आपका पूरा कंसंट्रेशन इस बात के ऊपर में है कि यह जो सर्व शिक्षा सेंटर है, यहां पे 10 लड़के आते हैं। तो प्राइमरी स्कूल के रूप में अडॉप होने के लिए वो समथिंग लाइक 1 कि ऐसा कुछ था। नंबर मैं आज भूल गया। तो इतना लड़के यहां पर होने आवश्यक है। तो फिर इतने कम संख्या से इतनी अधिक संख्या के बच्चों को किस तरह से लाया जाए? किस तरह से फिजिकल इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा किया जाए। किस तरह के गांव के ये जो एल्डर्स हैं उनको पटाया जाए कि आपके बच्चे को खेत में नहीं भेज के यहां पे सेंटर में भेजिए। किस तरह से टीचर फांकीबाजी ना करें। मैं पहले पहले जब गांव में इंस्पेक्शन के लिए जाता था तो जैसे ही मैं स्कूल में पास में जाता था देखता था कुछ-कुछ टीचर लोगों को देखा खास करके जोर-जोर से चिल्ला-चिल्ला करके पढ़ा रहे हैं तो मैंने सोचा कि इतना चिल्ला करके पढ़ाने की क्या जरूरत है? फिर मैंने किसी को पूछा तो बोला कि महाराज वो तो वैसे ही फालतू का बैठा था। चेयर के ऊपर में बैठा-बठा सो रहा था। आपके गाड़ी के आने की आवाज सुनी ना तो वह अभी खड़ा होकर के नींद से अभी चिल्ला चिल्ला करके बात कर रहा है। तो मैंने कहा अच्छा तो ठीक है इसका सॉल्यूशन लाते हैं। मैं दूसरी बार गया उस गांव में तो गाड़ी को बाहर में रख दिया दूर कहीं और फिर पैदल चल के गांव में गया। गांव में तो और कोई व्हीकल है नहीं। हमारा गाड़ी एक आता जाता है। यानी कि गाड़ी की आवाज सुनी तो वह समझ जाएगा कि अभी यह महाराज जी आ रहा है। तो अब मैं पैदल गया जाकर के और खिड़की में से देख रहा हूं बाहर खड़े-खड़े तो सब टीचर को देखा कुर्सी पर लिटरली सो रहा था और स्टूडेंट थे बेचारे सिंसियरली स्टडी कर रहे थे। तो स्टूडेंट ने जैसे ही मेरे सामने देखा तो वहां पे जो था कि महाराज कोई आते हैं साधु तो सब स्टूडेंट खड़े हो जाएंगे। उनका अभिवादन करेंगे। तो वो जैसे खड़े होने का प्रयास करें। मैंने कहा चुपचाप ऐसा करके मैंने कहा बैठो बैठो बैठो एकदम चुप हो के बैठो मैं देख रहा हूं टीचर को तो वे लोग भी समझ गए कि टीचर सो रहा है उन्होंने देख लिया अभी उसकी बारी आएगी तो वो काफी में 5 मिनट तक खड़ा रहा देखा वो सो रहा है कुर्सी पे सो रहा है तो सो ही रहा है फिर एकाएक पता नहीं उसको लगा होगा भीतर से कुछ गड़बड़ हो रहा है तो फट करके आंख खोल के जैसे ही देखा मैं खिड़की में खड़ा हूं उसको तो मैंने उसी टाइम फायर कर दिया तो देखिए कि आप यह सब कुछ कर रहे हैं। किंतु साथ में ही आपकी एक अंतर्दृष्टि है। आप अपने मन को एनालाइज कर रहे हैं। मन में क्या क्रियाएं प्रतिक्रियाएं चल रही है? किस तरह के विचार उत्पन्न हो रहे हैं। वह सब कुछ आप स्टडी कर रहे हैं। तो वह साधना में परिणत हो जाएगा। क्यों? क्योंकि जीवन का साधक जीवन का अल्टीमेट उद्देश्य क्या है? तो यह डरिपु को नष्ट करके षडरिपु का नाश करके यह जो चित्त प्रसाद है यम नियम है इसकी ओर जाना है। नेगेटिव इमोशंस से पॉजिटिव इमोशन की ओर जाना है। मन में यदि क्रोध आता है तो मुझे समझ में आना चाहिए कि मेरे मन में क्रोध आ रहा है। अभी मैं बाहर का अच्छा भी कार्य कर रहा हूं। भीतर में क्रोध प्रकट हो रहा है। तो मुझे तो सबसे पहले क्रोध को रिइजीनियर करना होगा। कैसे भी करके मेरे मन को मुझे समझाना होगा कि तुम यह जो क्रोध कर रहे हो यह जो टीचर उसी की बात मैं इतना जी जान लगा के कहां मैं गुजरात में रहने वाला। कहां मैं झारखंड आकर के अकेला रह रहा हूं। आश्रम में साधु हो करके इतना कष्ट करके मैं सिटी से गांव में आता हूं। हूं ट्राइबल एरिया में और मैं इतना मेहनत कर रहा हूं और यह गांव का ही एक आदमी जिसको कि हमने पैसा देकर के रखा है और हम आशा रखते हैं कि बच्चों को सिखाएगा। वो कुर्सी पर बैठकर सो रहा है तो मुझे तो नेचुरली गुस्सा आएगा। किंतु यहीं पर बात है। मैं कर्म कर रहा हूं। मैं यदि स्कूल को इंप्रूव कर रहा हूं तो फिर मैं यही देखूंगा कि टीचर को पनिश करना है। फिर भीतर में गुस्सा आता है नहीं आता है। दैट डज नॉट मैटर। आएगा ही आएगा और आना ही चाहिए। किंतु वह सिर्फ यदि कर्म करता हूं तो कर्म योग करता हूं तो टीचर को तो फायर करना ही करना है। किंतु साथ में हृदय में क्रोध भी नहीं आना चाहिए। क्योंकि कामम क्रोधम मोहम च काम क्रोध लोभ मोह मत्सर यह जो सब डरिपु है उसी का तो विनाश करना है बाहर में कर्म भी उस टीचर को भी डांटना है कि क्यों तुमको शर्म नहीं आती पैसा ले तुम तुम सो रहे हो डांटना भी है हृदय में क्रोध भी नहीं प्रकट होने देना है और फिर जब ये प्राइमरी सेंटर यदि एक प्राइमरी स्कूल के सर्व शिक्षा सेंटर प्राइमरी स्कूल के रूप में जब एक्सेप्ट हो जाता है तो जब वो प्रशंसा प्राप्त होगी तो प्रशंसा से भीतर में यह गर्व भी नहीं होना चाहिए। यानी कि बाहर में कर्म करते हैं उसके ऊपर जितना तीक्ष्ण नजर अपना रहना है उतना ही तीक्ष्ण नजर अब हमको अपने हृदय में रखना है कि किस तरह से कौन से भाव उत्पन्न हो रहे हैं। पॉजिटिव भाव उत्पन्न हो रहे हैं कि नेगेटिव भाव। यदि पॉजिटिव है तो तो बहुत अच्छा है। उसको मैग्नीिफाई करना है। ईश्वर के प्रति शरणागति आती है तो बहुत अच्छा है। यदि अपने भाई-बहन जिनको मैं जिनके साथ में मैं कार्य कर रहा हूं इनके प्रति यदि करुणा उत्पन्न होती है तो बहुत अच्छा है। यदि किंतु जो लोग ठीक से काम नहीं करते जितनी कि मुझे उनसे अपेक्षा थी वह नहीं करेंगे तो उनके ऊपर क्रोध नहीं आना चाहिए। यहां पर एक बहुत बड़ा एक एक क्या कहेंगे कि फिलॉसोफिकल ना कि ये साइकोलॉजिकल क्वेश्चन खड़ा होता है। जब किसी को कहेंगे ना कि क्रोध मत करो, अहंकार मत करो, अभिमान मत करो,त्वाकांक्षा एंबिशन मत रखो तो वे लोग कहेंगे कि महाराज तो फिर हम काम ही कैसे कर पाएंगे? क्रोध नहीं करेंगे तो हमारे साथ में कोई भी आकर अन्याय कर लेगा। अभी यह टीचर की ही बात। मैं यदि क्रोध नहीं करूंगा। अभी मान लीजिए मैं गवर्नमेंट इंस्पेक्टर हूं और यदि इस तरह से टीचर को अपनी जॉब पर कुर्सी पर बैठे हुए सोते देखता हूं तो यदि मैं गुस्सा नहीं करूंगा तो फिर तो मैं अपना कार्य ठीक से नहीं कर पाऊंगा। यदि मैं गुस्सा क्रोध नहीं करूंगा तो टीचर को डांट नहीं पाऊंगा कि क्यों तुम पैसा लेकर के बच्चों को पढ़ाते नहीं हो। मैं क्रोध नहीं करूंगा तो मैं काम कैसे करूंगा। यहां पे बात है कि क्रोध नहीं करना है और एफिशिएंटली काम करना है। यह जो एक क्लियर आइड अंडरस्टैंडिंग है वह कर्म योग का पार्ट है। बहुत साधकों को भी मैंने देखा है। बहुत बाहर के जगत में तो देखा ही है। बहुत सारे साधकों को भी देखा है। उनको लगता है कि क्रोध करना, किसी को डांटना, मन के भीतर में विद्वेष प्रकट होने देना। यह सब पार्ट एंड पार्सल ऑफ कर्म योग। यह नहीं करेंगे तो मैं ठीक से काम ही नहीं कर पाऊंगा। और खास करके जो साधक होता है ना उसकी एक बड़ी सूक्ष्म दृष्टि होती है। सभी चीजों को वह एफिशिएंटली चलाना चाहता है। और जब वह यह देखेगा कि मैं कार्य कर रहा हूं, मेहनत कर रहा हूं, सामने वाला नहीं कर रहा तो बड़ा ही उसके भीतर में यह विद्वेष भाव प्रकट होगा। यह मैंने रांची में बहुत बार देखा था कि मेरा एक अपेक्षा था लोगों से कि इतना परफेक्शन जितना मैं लाने का प्रयास करता हूं। जितना सैक्रिफाइस मैंने किया है। जितना परफेक्शन मैं लाने का प्रयास करता हूं। उसका 50% तो आप कीजिए। आप लोग यहां के लोकल निवासी हैं। आपको तो पैसा मिलता है। गवर्नमेंट की योजना का आप लाभ उठा रहे हैं। आपको घर बैठकर के सब सुविधाएं हम रांची में से आकर के आपको दे रहे हैं। तो फिर इतना भी आपका जो कर्तव्य है वह नहीं करेंगे तो फिर कैसे चलेगा? तो काम को अच्छे से करने के लिए क्रोध होता था मेरे मन में। किंतु उसी समय बिकॉज़ कि यह साइकोलॉजी स्टडी करने का मेरा हैबिट बिल्कुल पहले से था कि मैं यह भी देखता था कि बाहर का कार्य मैं जितना एफिशिएंटली करने का प्रयास करता हूं, इतना ही एफिशिएंटली मुझे अपने माइंड को इंजीनियर करना होगा। इतना ही एफिशिएंटली मुझे अपने माइंड को मैनेज करना होगा। यदि मैं यह मैनेज नहीं कर पाऊंगा तो होगा क्या कि कर्म करतेकरते यह कर्म का जो प्रवाह है कर्म के जो बंधन है सब आकर के मेरे सर के ऊपर में बैठ जाएंगे। सब मेरे पैरों में फिर वही जंजीर बना देंगे जिस जंजीर से छूटने के लिए हम यहां पे आए हैं। तो यह देखिए और सिर्फ यह कर्म योग के बारे में नहीं पूजा पाठ भी करेंगे तो गुस्सा आकर के कोई-कोई पूजा करता पूजा करते-करते क्रोध करता है। पूजा करते-करते अहंकार प्रकट हो जाता है। तो देखिए कि बाहर का कोई भी कार्य आप करते हो यदि आपकी एक अंतर्दृष्टि नहीं है। आपको यह समझ में नहीं आता कि मेरे मन में क्रोध प्रकट हो रहा है। मेरे मन में यह विकार प्रकट हो रहे हैं। मेरे मन में वासनाएं प्रकट हो रही है। मेरे मन में यह गर्व घमंड प्रकट हो रहा है। और प्रकट हो रहा है तो साथ-साथ में ही कैसे भी करके मुझे उसको काटना है। यह एक विज़डम नहीं होगा। तो बाहर में आप चाहे कुछ भी कर लीजिए। बड़े से बड़ा कर्म योग कर लीजिए। 400 सेंटर को 400 सेंटर को मैं यदि प्राइमरी स्कूल में कन्वर्ट भी कर देता हूं और मेरी अंतर्दृष्टि नहीं है तो मुझे आध्यात्मिक कोई लाभ नहीं होगा स्टूडेंट्स को बेनिफिट होगा किंतु मुझे कोई स्पिरिचुअल बेनिफिट नहीं होगा मैं पूजा पाठ जप ध्यान वेदांत का अध्ययन हजार चीजें कर रहा हूं किंतु यदि साथ में ही यह सब करके सक्सेस मिलती है प्रशंसा प्राप्त होती है और जब गर्व गुमान घमंड प्रकट होता है उसको मैं यदि यदि मैनेज नहीं कर पाऊंगा तो वह हजार पूजा हजार शास्त्रार्थ हजार आपका जप ध्यान मेडिटेशन किसी काम का नहीं है। कोईकोई लोग मंदिर में भी जाते हैं तो चिल्लाचिल्ला करके आरती का गान करेंगे और नजर यह रहेगी कि लोग सुने कि मैं कितना अच्छे से बोलता हूं, चेंटिंग करता हूं या गाता हूं। तो इस बात का कोई अर्थ नहीं। अब यदि ईश्वर को ही सुनाना चाहते हैं तो बहुत चल ज्यादा चिल्ला करके नहीं भी गाएंगे तो भी चल जाएगा। ईश्वर को तो पता है ना कि जो चींटी होती है चींटी के पैर में जो नपुर होता है उसकी भी आवाज वो ईश्वर सुनते हैं। तो आपको भगवान के सामने बैठकर के चिल्ला के गान करने की कोई जरूरत नहीं है। तो यह देखिए कि हम जो कर्म करते हैं बाह्य जगत में साथ में ही हमारी एक अंतर्दृष्टि होनी चाहिए। यह अंतर्दृष्टि नहीं होगी तो बाहर का कितना ही साधना के रूप में किया हुआ कर्म हमको आध्यात्मिक जगत में बहुत ज्यादा फायदा नहीं पहुंचाएगा। तो देखिए कि यह जो कि यह अश्रुवारी है ये क्रंदन योग है। अल्टीमेटली क्या है कि हम अपनी दृष्टि को अंतर्मुख बनाते हैं। यह जो यम नियम आसन प्राणायाम प्रत्याहार यह जो प्रत्याहार स्टेप जो है वो प्रति आहार इंद्रियों का जो आहार है वह बाहर जाने का है। उनको प्रति आहार खिलाना है। आंख जो बाहर देखती है उसको भीतर में उसको हृदय को दिखाना है कि भीतर में क्या इमोशन चल रही है उसको देखो कान का आहार है श्रवण उसका प्रति आहार है भीतर में क्या सब घोंघाट चल रहा है नॉइस चल रहा है उसको सुनो तो इंद्रियों के आहार को रिवर्स करना है प्रति आहार देना है यह एक इंपॉर्टेंट स्टेप है उसके बाद में अंतरंग योग स्टार्ट होते हैं बहिरंग योग और अंतर अंतरंग योग बहिरंग में यम नियम आसन और प्राणायाम और प्रत्याहार प्रत्याहार एक मिडिल वाला स्टेज है और उसके बाद में अंतरंग योग है धरणा ध्यान समाधि यह प्रारंभ होते हैं तो एक बार यदि आपको ध्यान के लेवल पर जाना है तो फिर आपको अपने मन को अंतर्मुख करना होगा मन के भीतर में क्या चल रहा है उसका एनालिसिस करने का सेल्फ एनालिसिस या तो सेल्फ असेसमेंट, सेल्फ डायग्नोसिस यह करना हमको आना चाहिए। और इसीलिए ठाकुर कहते हैं कि किस तरह से यह मन का मेला है वह साफ हो। ठाकुर कहते हैं ईश्वर के लिए व्याकुल होकर के रो। और फिर कहते हैं कि रोते-रोते दर्शन होता है। समाधि होती है। योग में सिद्ध होने से ही समाधि क्रंदन करने से कुंभक अपने आप होता है और उसके बाद में होती है समाधि। तो इतना हमने कल देखा। आज देखिए और एक इंपॉर्टेंट बात ठाकुर कहते

ध्यान से ब्रह्मज्ञान प्राप्ति

हैं और एक आ ध्यान और एक है वो है ध्यान। देखिए पहले तो क्रंदन योग के बारे में बताया और फिर अभी बताते हैं ध्यान के बारे में। और यह जो दो चीज बताते हैं ठाकुर के खुद के जीवन में देखिए कि सर्वप्रथम मां काली का दर्शन हुआ था। वो क्रंदन करते-करते ही रोते-रोते ही व्याकुल होकर के प्रार्थना करके ही ठाकुर को दर्शन हुआ था। किंतु फिर जब विवाह करके कोलकाता वापस आए ठाकुर और फिर एक के बाद एक यह जो भैरवी ब्राह्मणी वगैरह जो शिक्षकों का उनके गुरुओं का आगमन हुआ तो उन्होंने ठाकुर को विधिवत रूप से उन्होंने साधन पद्धति सिखाया। तो यह विधिवत पहले तो वह हृदय की व्याकुलता से रो के पुकारने की बात कर रहे हैं और फिर विधिवत क्या करना है वह बताते हैं और एक है ध्यान सहस्त्रारे शिव विशेष रूपे आचे यह सहस्त्रार चक्र जो है वहां पे भगवान शिव विराजमान है। तार ध्यान उनका ध्यान करना है। अभी देखिए यहां पे सहस्त्रार पे शिव है तो शिव का ध्यान यहां पे कभी नहीं करना है। मैं यहां पे ध्यान सिखाता हूं अपने आश्रम में एक मेड मेडिटेशन का क्लास में करता हूं। तो किंतु मैं सब समय स्पष्ट रूप से कहता हूं कि ध्यान करना है हमेशा हृदय में। कभी भी हृदय छोड़कर के अपना यह जो आज्ञा चक्र है वहां पर बिल्कुल ध्यान नहीं करना है। बड़ा ही डेंजरस आज्ञा चक्र सहस्त्रार यह अनाहत विशुद्ध और आज्ञा और यह सहस्त्रार तो यह जो चार ऊपर के जो मुकाम है यह कुंडलिनी के यात्रा के उसमें ध्यान हमेशा करना है सह यह जो अनाहत चक्र के ऊपर में ह्रदय के ऊपर में इससे ऊपर में विशुद्ध आज्ञा या सहस्त्रार कभी ध्यान नहीं करना। बड़ा ही डेंजरस है। भले ही चाहे ठाकुर ने यहां पर कहा हो क्योंकि जो लोग रामकृष्ण संग में थोड़ा बहुत भी जब ध्यान साधन भजन करते हैं हमारे गुरु महाराज भी जो सिखाते हैं स्पष्ट रूप से कहते हैं ध्यान हमेशा हृदय पर करना है। हृदय को छोड़ के और कहीं नहीं करना। फिर जो स्वाभाविक जो कुंडलिनी की उर्ध्वगति है वह आपको अनाहत से विशुद्ध विशुद्ध से आज्ञा आज्ञा से सहस्त्रार ले जाए वो अलग बात है। किंतु सीधा यह सहस्त्रार के ऊपर में ना कि आज्ञा के ऊपर में ना कि विशुद्ध चक्र के ऊपर में ध्यान किया तो बड़े ही भयानक परिणाम आएंगे। वह सब कब है पता है? ठाकुर ने यहां पर यह सक्सेशन बताया है। एक बार रो-रो करके हृदय का मल जो है हृदय का मेला साफ होगा। कामिनी कांचन से अपना मन स्वच्छ हो जाएगा। उसके बाद में यह सहस्त्रार पर आप ध्यान कर सकते हैं। देखिए ठाकुर की बात को स्पष्ट रूप से पढ़ना है। पहले क्रंदन योग और उसके बाद में सहस्त्रार में शिव है। उनके ऊपर ध्यान हमने काम कांचन रूपी मेला जो है वो तो हमने साफ किया ही नहीं है। ऊपर से सीधा सहस्त्रार पे ध्यान करने का प्रयास किया तो भयानक परिणाम वह जो फेमस कहानी बार-बार वह मैं कहानी बताता हूं सबको कि वीरानंद जी महाराज काली कृष्ण महाराज उस समय के ब्रह्मचारी अपने भ्रू मध्य पे ध्यान करते थे। फिर सर दर्द होने लगा। मां शारदा को जाकर कहते हैं कि मां मैं इस तरह से ध्यान करता हूं तो फिर मुझे बहुत सर दर्द होता है। मां ने कहा बेटा तुम क्या कर रहे थे? इस तरह का कभी मत करो। हृदय हमेशा ध्यान हमेशा हृदय पर ही करो। उसके बाद में जो है कि यदि ईश्वर की इच्छा होगी काम कांचन रूपी मेला जब चला जाएगा और फिर एक जो स्वाभाविक उर्ध्वगति है कुंडलिनी की वो होगी वो अलग बात है। उसके बाद में से अनाहत से विशुद्ध आएगी। विशुद्ध से आज्ञा पे आएगी। आज्ञा से सहस्र पे जाएगी। वो सब बाद की बातें हैं। वो सहज रूप से जो होता है उसको होने देना है। किंतु प्रारंभ यदि हमको करना है हमेशा अनाहत चक्र हमेशा हृदय पे ही ध्यान करना है। तो एक बड़ा ही क्लेरिटी यहां पे देना है। भले ही चाहे ठाकुर ने कहा कि सहसार में शिव विशेष रूप विराजमान है। उनका ध्यान करना है। किंतु याद रखिए कि यदि रो-रो करके क्रंदन करके करके जब हृदय का मेला परिष्कार हो जाएगा उसके बाद की बात ठाकुर कह रहे हैं उसके पहले की नहीं तो यह एक बहुत विशेष रूप से वार्निंग शरीर स्वरा मन बुद्धि जल शरीर जैसे कि एक पात्र है और मन और बुद्धि इस पात्र में रखे हुए जल की तरह है ए जो ले सच्चिदानंद सूरजे प्रतिबिंबो पड़े इस जल में ही वही सच्चिदानंद सूर्य का प्रतिबिंब पड़ता है। से प्रतिबिंब सूरजे ध्यान करतेकरते सत्य सूर्य जो तार कृपाए दर्शन होय यही प्रतिबिंब सूर्य का ध्यान करतेकरते सत्य सूर्य जो है उसका उनकी कृपा से देखिए तार कृपाएं उनकी कृपा से दर्शन होगा। ठाकुर ने ऐसा नहीं कहा कि ध्यान करते-करते सत्य सूर्य का दर्शन होता है। कहते हैं ध्यान करतेकरते सत्य सूर्य उनकी कृपा से दर्शन होता है। सो दिस इज अ वेरी इंपॉर्टेंट डिस्टिंशन। मां की भी वह जो कहानी हमने देखी थी मां ने भी स्पष्ट रूप से कहा कि वह जो ब्रह्मवादीन महाशय इतनी तपस्या करते हैं तो उनको कब अभी ईश्वर दर्शन होगा? तो मां ने कहा कि कह दो उसको कि वह कहीं इतना कठोर परिश्रम करता है, तपस्या करता है। बोल के भगवान को कोई ऑब्लिगेशन में नहीं है कि फटाकर फट करके आकर के उसको ध्यान दर्शन दे दे। भगवान को जब दर्शन देना होगा तब वह दर्शन देंगे। जब उनकी कृपा होगी तब दर्शन देंगे। और देखिए ये कृपा कोई ऐसा कोई मिस्टिकल चीज नहीं है। ठाकुर ने तो स्पष्ट कहा है कि ईश्वर तो वैसे ही कृपा करने के लिए आतुर होकर के बैठे हैं। इसलिए तो भगवान चुंबक है ना। हम मैग्नेट नहीं है। भगवान मैग्नेट है। भगवान हमको अपनी ओर खींचने के लिए तरस रहे हैं। माने हमारी ये कोई ऐसे एक सुई को आप हवा में रख देंगे तो सुई कहीं इधर-उधर नहीं जाएगी। किंतु मैग्नेट को रखेंगे तो मैग्नेट आसपास में जितनी भी सुई है सब अपने पास में खींच लेगा। यह जो मां और बच्चा मां का जो बच्चे पे जितना स्नेह ज्यादा होता है। देखिए सिचुएशन कैसी है? बच्चे को मां की जरूरत है। क्योंकि देखिए बिना मां बच्चे के मां आराम से रह लेगी। वह तो इतने साल तो रह ही रही थी। तो उसको खाने-पीने की काम करने की जो कुछ भी है मां तो अपना आराम से कर लेगी। बच्चा जो होता है खास करके शिशु वह अपनी मां पर संपूर्ण निर्भर है। यदि मां उसको खिलाएगी नहीं तो खा नहीं पाएगा। भूखा रहेगा भूख से मर जाएगा। मां उसको वस्त्र अच्छे नहीं पहनाएगी तो ठंडी गर्मी से वह मर जाएगा। उसका जीवन धारण है मां के ऊपर में संपूर्ण रूप से निर्भर। किंतु स्नेह यदि देखें तो देखिए कि मां का स्नेह बच्चे पे ज्यादा है। बच्चे का मां पे स्नेह होगा ही होगा। किंतु मां का अपने बच्चे पर स्नेह है वह ज्यादा है। तो कैसा रिवर्स सिचुएशन है? बच्चे को मां की ज्यादा आवश्यकता है। जबकि मां का बच्चे पे स्नेह ज्यादा है। बिल्कुल रिवर्स सिचुएशन है। हमारे यहां पे भी ईश्वर के साथ में वैसा ही है। देखिए ईश्वर बिना हमारे आराम से रह लेंगे। उनको कोई आपत्ति नहीं है। शेष शैया पे शायित है। मां लक्ष्मी उनका चरण सेवा कर रही है। हम होंगे नहीं होंगे उनको कोई फर्क नहीं पड़ता। किंतु हम बिना ईश्वर के नहीं रह पाएंगे। हमको ईश्वर की आवश्यकता है। किंतु जहां तक स्नेह का प्रश्न है, हमारा ईश्वर पे जितना स्नेह या श्रद्धा या भक्ति है, उससे कहीं ज्यादा कहीं ज्यादा स्नेह और यह जो प्रेम है वह ईश्वर का हमारे ऊपर में ज्यादा है। यह कंप्लीटली रिवर्स सिचुएशन है। इसलिए तो ईश्वर को मैग्नेट कहा है। हमको मैग्नेट नहीं कहा। यदि ईश्वर यदि निराकार, निर्गुण, अकर्ता, अव्यवहार्य होके बैठे रहते तो फिर हमारा यह जिम्मा हो जाता कि कैसे भी करके ब्रह्म साक्षात्कार करना है। किंतु ऐसा नहीं वो मैग्नेट की तरह हमको आकर्षित कर रहे हैं। हमको ज्यादा कुछ नहीं करना। यह जो काम कांचन रूपी कीचड़ जो है उसको साफ कर देना है। तो जैसे ही यह साफ हुआ वैसे ही हम उनकी ओर उड़कर के जैसे कि मां की गोद में जाकर बैठ जाएंगे। तो यह जो उनकी कृपा उनकी कृपा यह जो बार-बार हम पढ़ रहे हैं यह एक इंटेलेक्चुअल एक्सप्रेशन है। उसको बड़े ही बेसिक जो एनालिसिस कर सकते करने को जाएंगे तो वह सिंपल ही है कि अपने मन में से जितना भी मेला है उसको धो दो। तो फटाक करके ठाकुर कल ही हमने देखा कि ईश्वर का कृपा पवन जो है वह तो बह ही रहा है। हमको तो बस अपना पाल खोल देना है। अपना जो सेल है उसको खोल देना है। तो वैसे ही सेल में हवा जाएगी अपनी नौका आराम से पानी में तैरना शुरू कर देगी। तो यह देखिए इंटरेस्टिंगली अभी रिसेंटली मैं एक देख रहा था। अभी आजकल तो यह बड़े-बड़े जहाज होते हैं। वह तो इलेक्ट्रिसिटी पर चलते हैं। यह कोल पावर पर चलते हैं। और अमेरिका के जो ये जो जहाज है युद्ध के जहाज वो तो न्यूक्लियर रिएक्टर पे चलते हैं। किंतु रिसेंटली अभी यह एक ऐसा इन्वेंशन किया है कि मेटल के सेल बनाए हैं। तो यह मेटल खास करके यह कमर्शियल शिप होता है ना बड़े-बड़े टैंकर होते हैं जिसमें कि 1000 कार की कि 1 लाख टेलीविजन वगैरह सब कोरिया से जापान से अमेरिका जाएगा तो इस तरह के बड़े-बड़े कार्गो शिप जो होते हैं ना उसमें मेटल के सेल बनाए हैं। तो मेटल के सेल विराट होते हैं और उसको खोल करके इधर-उधर घुमाते रहेंगे ना तो उससे जो फ्यूल कंजमशन है ऑलमोस्ट 80% कम हो जाता है। तो माने इवन आज के युग में भी न्यूक्लियर रिएक्टर पे यह इलेक्ट्रिसिटी पे, कोयले पे, डीज़ल पे, पेट्रोल पे जहाज तलते हैं। किंतु फिर भी आज के युग में भी सेल का इतनाेंस है। सो, यह देखिए कि यदि अ उनकी कृपा से उनका दर्शन होगा। यह बात बड़ी क्लियर है और यदि यह कृपा का क्या अर्थ है वह समझने को जाएंगे तो वह है मन के ऊपर में से काम कांचन रूपी कीचड़ को हटाना तो यह एक हो गया और फिर यहां पर देखिए ठाकुर एक बड़ा ही इंटरेस्टिंग उदाहरण देते हैं। शरीर जैसे कि एक पात्र है। पात्र में जल भरा है। जल के भीतर में सूर्य का प्रतिबिंब दिखता है। और यह प्रतिबिंब पे ध्यान करेंगे तो असली सूर्य का दर्शन होगा। अभी यह प्रतिबिंब तो हमको पता ही है कि हृदय में यह जीवात्मा रूपी यह चेतन तत्व है। इस चेतन तत्व वेदांत जिस तरह से हमको समझाता है कि यह है ब्रह्म। ब्रह्म के ऊपर में समष्टि अज्ञान का जब आवरण आता है तो फिर यह प्रकट होते हैं ईश्वर। और फिर यदि यह व्यष्टि अज्ञान का आवरण आता है अध्यारोप होता है तो फिर प्रकट होता है यह इंडिविजुअल जीव या तो फिर यह हम इंडिविजुअल व्यक्ति तो फिर हम सबके भीतर में देखें आप ईश्वर पर ध्यान करें ना कि फिर अपने हृदय पर ध्यान करें। अल्टीमेटली तो आप प्रतिबिंब के ऊपर में ही ध्यान कर रहे हैं। आप असली जो चेतन तत्व है उसके ऊपर ध्यान नहीं कर रहे हैं। तो यह एक बहुत इंपॉर्टेंट बात ख्याल में रखनी है कि वह चाहे द्वैत का ध्यान हो जहां पर मैं ईश्वर की पूजा आराधना करता हूं। ईश्वर को अपने हृदय में बिठा के ध्यान करता हूं। ना कि फिर मैं यह जो निराकार या फिर यह जो इस तरह का ध्यान करने का प्रयास करता हूं कि जबकि मैं ईश्वर या तो फिर यह चेतन तत्व को अपने हृदय में निहारता हूं। यह दोनों ध्यान यह चाहे मैं बाह्य भगवान का ध्यान करना है या हृदय में चेतन तत्व का ध्यान दोनों रिफ्लेक्टेड प्रतिबिंब है और यह रिफ्लेक्शन को धर करके आप असली सूर्य का दर्शन होगा। ध्यान करतेकरते जैसे यह अध्यारोप जो हुआ है वह अपवाद में परिणत होगा। यह अज्ञान या माया का जो आवरण है वो धीरे-धीरे करके क्षीण से क्षीणतर होता जाएगा। तो फिर इसके भीतर की जो असली ज्योति है वह ज्यादा से ज्यादा स्पष्ट रूप से प्रकट होना शुरू हो जाएगी। तो यह ठाकुर का बड़ा ही एक ग्राफिकल उन्होंने यह उदाहरण देकर के कहा है कि यह शरीर है जैसे कि एक पात्र और इसके भीतर में यह मन और बुद्धि रूपी जल है। उस जल में यह सच्चिदानंद सूर्य का प्रतिबिंब प्रकट होता है और इस प्रतिबिंब पे ध्यान करते-करते अल्टीमेटली असली सच्चिदानंद जो है उनका दर्शन होगा साक्षात्कार होगा और यह करना है हमेशा हृदय में मन बुद्धि चित्त अहंकार या तो फिर इसके ऊपर में ध्यान जो कुछ भी हमको करना है सब हृदय में करना है। इस बार में यह जो मेडिटेशन का क्लास ले रहा था तो मैंने कहा था उस समय अ कि मान लीजिए कि आप ध्यान कर रहे हैं तो ध्यान तो आप हृदय में ही करते हैं। किंतु देखेंगे कि आपका यह जो ब्रेन है ब्रेन में से सतत नए-नए विचार प्रकट होते रहते हैं। आप यदि अपने ब्रेन को स्विच ऑफ करना नहीं सीखेंगे तो फिर प्रॉब्लम क्या होगा कि आप अपने हृदय पे ज्यादा देर तक ध्यान नहीं कर पाएंगे। ब्रेन को समझ लीजिए कि यह है पाकिस्तान। और यह पाकिस्तान किस तरह से टेररिस्ट को भेजता रहता है हमारे यहां पे ट्रबल खड़ी करने के लिए। वैसे ही यह अपना ब्रेन जो है यह सतत दुनिया भर के विचार जो है वह अपने मन में फेंकता रहता है। हमको अशांत करने के लिए हमको डिस्ट्रेस करने के लिए तो फिर यदि इस पाकिस्तान से छुटकारा पाना है तो बॉर्डर को सील कर देनी है। वैसे ही यह जो गले के ऊपर का यह जो मस्तिष्क है उसको पूरा स्विच ऑफ कर देना है और फिर आपका जो पूरा कंसंट्रेशन है यहां पर हृदय में होना चाहिए। तो ये एक बात कही थी और फिर देखिए कि आपको ध्यान करना है तो एक उपमा मैंने कहा कि मान लीजिए कि आपका यह जो मन है ना वो गधे की तरह है। गधे के पास में काम करवाना अर्थात कि ध्यान करवाना बड़ा ही मुश्किल है। तो आपको अभी जैसे वो एक ट्रेडिशनल मेथड है। गधे के ऊपर में आप भार रख के बोझा रख के उसको कहीं पर ले जाना है तो आपको दो मेथड का इस्तेमाल करना होगा। स्टिक एंड कैरोट। अभी कैरोट क्या है कि गधे के सामने आपने वो कैरोट यानी कि गाजर को टांग दिया। एक लकड़ी के ऊपर में रस्सी बांध करके गाजर टांग दिया। अभी वह गाजर खाने के लोभ में कैरट खाने के लोभ में यह गधा जो है आगे-आगे जाता जाएगा। और जितना आगे जाएगा इतना ही आप आप लकड़ी से या रस्सी को दूर करते जाइए। कैरोट भी उसके उतना दूर होता जाएगा। तो लोभ के मारे यह पीछेछे जाएगा कैरोट के और आखिर में जब डेस्टिनेशन आ गया तब आप वो कैरोट को उसको खिला दीजिए। वो खा लेगा। वह आपका काम हो गया। कैरोट के लोभ के मारे। अभी कोईकोई गधे होते हैं। इतने निकम्मे होते हैं कि वह कैरोट खाने के लोभ में आधा तक जाएंगे। फिर वहां पर रुक जाएंगे। तो फिर आपको स्टिक वाला अप्रोच लेना पड़ेगा। लकड़ी से उसको मारना पड़ेगा। तो ये म स्टिक और कैरोट पहले तो प्रलोभन देना है। प्रलोभन से जितना काम करे सो करे। नहीं करेगा तो लकड़ी से मारना है। सो ये स्टिक एंड कैरोट वाला एप्रोच गधे के पास में काम करवाने के लिए करना है। मन के भीतर में भी ऐसा है। यदि आप ध्यान करने का प्रयास करते हैं तो स्टिक एंड कैरोट। कैरोट क्या है? प्रलोभन देना है। प्रलोभन क्या है? एक इस तरह का ऑब्जेक्ट इसके ऊपर में हमको ध्यान करना है जो कि बड़ा ही लोभनीय हो जो कि बड़ा ही मनपसंद हो मन को जैसे कि यह मैं यहां पे सुबह को मॉर्निंग वॉक के लिए जाता हूं। समुंदर के किनारे रेती पर बैठकर के जो उगते हुआ सूर्य है सुबह का पहलापला उसका दर्शन करता हूं। वो वातावरण इतना सुंदर है और यह जो बीच रोड है वह गवर्नमेंट सुबह को बंद कर देती है। म्युनिसिपालिटी ब्लॉक कर देती है मॉर्निंग वॉक के लिए। यानी कि पूरा शांत वातावरण कोई व्हीकल नहीं कुछ नहीं और ज्यादातर लोग जो वॉकिंग के लिए आते हैं रोड पर वॉक करना पसंद करते हैं रेती में नहीं। तो मैं रेती में जहां पे बीच के ऊपर बैठा हूं आसपास में जनरली कोई नहीं रहता। तो इतना सुंदर सुबह का वातावरण सनराइज हो रहा है। मैं बीच पर अकेला बैठा हूं। सो लेट दिस बी एन ऑब्जेक्ट ऑफ मेडिटेशन। लेट दिस बी द केरोड। इतना सुंदर तुमको मैं दे रहा हूं आहार करने का तो तुम उसको आहार करो। तो मन जो है प्रलोभित होकर के उस पर केंद्रित होगा। किंतु देखिए कि कुछ क्षण के बाद में मन यदि इधर-उधर भटकना शुरू भी करता है तो फिर यह स्टिक वाला अप्रोच संकल्प शक्ति विल पावर को हमको यूज करना होगा। विल पावर को दृढ़ करके मन को चाबुक मारनी होगी। डांटना होगा। कंट्रोल में लाना होगा। यदि यह विल पावर स्ट्रांग नहीं करेंगे। सिर्फ ये कैरोट के सहारे मन को लुभाने का प्रयास करेंगे तो वही गधे की तरह आलसी गधे की तरह 50% तो जाएगा किंतु फिर वहीं पर रुक जाएगा। तो यह स्टिक एंड केयर मन को जो हृदय पे ध्यान करने का विषय जो एक देना है बड़ा ही प्रलोभनीय होना चाहिए। वही दक्षिणेश्वर में ठाकुर का कमरा ठाकुर वह बड़ी खाट पर बैठे हैं। छोटी खाट पे मां बैठी है। फिर वहां के जमीन पे यहां पे राजा महाराज है। यहां पे स्वामी जी है। और मैंने अपनी जगह फिक्स करके रखी है। वो जो गंगा की और जो दरवाजा खुलता है एग्जजेक्टली वहां पर मैं बैठता हूं। तो यहां पर ठाकुर मां स्वामी जी राजा महाराज ये गुरु भाइयों का भी दर्शन होगा और थोड़ा बाहर में नजर डालूंगा तो यह सुंदर बागान है और यह कल कल बहती हुई गंगा है उसका दर्शन होगा तो यह एक सीन जो है मैंने बना दिया है उसके ऊपर में ध्यान करना है तो एक प्रलोभन दिया कि देखो इतना सुंदर तुमको ध्यान का एक ऑब्जेक्ट मैंने तुमको दिया है मन को कहते हैं तुम इस पर ध्यान करो और यदि मन इससे भी यदि नहीं मानेगा तो फिर विल पावर डेवलप करना है। इधरउधर के जो कोई भी विचार आता है, यह पाकिस्तान से टेररिस्ट आते हैं, तो सबको फिर आपको चाबुक मार के ना कि AK-47 से उड़ा देना है। तो यह सैनिक की तरह आपके भीतर में यह करेज भी चाहिए, साहस भी चाहिए, विल पावर भी चाहिए, दृढ़ पराक्रम शक्ति भी चाहिए। और यहां पे रुजुता है मृदुता है ध्यान की यह शरणागति की यह स्त्री सुलभ भाव और यह पुरुष सुलभ भाव दोनों का समिश्रण होगा तब आप ध्यान कर पाएंगे अर्धनारीश्वर शिव मुझे यह जो यह कल्पना है माने यह जो कांसेप्ट है बहुत अच्छा लगता है क्योंकि ध्यान करने के समय शरणागति यह जो स्नेह प्रेम यह जो कोमल भाव है मातृभाव है संतान भाव है। उसको वन हैंड हमको जैसे डेवलप करना है। साथ में ही यह जब डिस्ट्रक्टिव विचार आते हैं तो शिव की तरह रौद्र रूप भी धारण करना है। यह रौद्र रूप धारण करना नहीं सीखे तो यह विचारों का यह जो यह पूरा एक प्रपंच है हमको खा जाएगा। तो वह भी एक रुद्र स्वरूप भी धारण करना आना चाहिए और यह जो सौम्य शांत स्नेहमय ममत्वमय स्वरूप भी धारण करना आना चाहिए। यह स्टिक एंड केरोट दोनों इस्तेमाल करेंगे तभी हम ठीक-ठीक ध्यान कर पाएंगे। तो अभी इसके बाद में स्वामी जी ने ध्यान के बारे में कुछ कुछ इसी तरह कुंडलिनी के बारे में जो स्वामी जी ने कुछ आइडियाज बताए हैं कंप्लीट वर्क्स में से वगैरह से उसका एक कंपाइलेशन मैंने किया है जो कि अभी हम नेक्स्ट क्लास में देखेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु

प्रश्न: हम सब जानते हैं कि क्या सही है और क्या गलत, फिर भी सही को करने की संकल्पशक्ति हमारे भीतर नहीं होती. ज्ञान है, विवेक है, फिर भी आचरण में अभाव रह जाता है. इस संकल्पशक्ति को कैसे बढ़ाया जाए?

इसके लिए देखिए उसका पावर कहां से आता है मन का? मन के साथ में हमने अपने को आइडेंटिफाई कर दिया है। हम सबकी ये एक्सटर्नल दृष्टि होती है। बाह्य दृष्टि तो हम भीतर में देखते ही नहीं है। भीतर में जो कुछ है सब मैं हूं। ऐसा एक मान लेते हैं। इसके लिए जो सेल्फ एनालिसिस है बहुत ही इंपॉर्टेंट है। विल पावर इज अ सेकंड स्टेप। फर्स्ट स्टेप है सेल्फ एनालिसिस। तभी तो आप अपने को अपने ये जो कचरा है उससे सेपरेट कर पाएंगे ना। मैं ना ही मन हूं ना ही बुद्धि हूं ना ही चित्त हूं ना ही अहंकार हूं। और फिर मन बुद्धि चित्त अहंकार मुझसे जो करवाना चाहते हैं मैं चाबुक मार के उनको ठीक कर दूंगा। किंतु मैं उनसे अलग हूं। ये कांसेप्ट भी तो सबसे पहले डेवलप होना चाहिए। यह मैंने यह मेरा जो सेल्फ एनालिसिस का एक एक है हैबिट ये उसने मुझे इतना हेल्प किया है कि अब जैसे देखिए एज ऑफ टुडे मैं यह नहीं कहूंगा कि मेरा कोई विल पावर बहुत बड़ा हो गया है। किंतु ना मुझे यह स्पष्ट रूप से समझ में आता है कि मेरे मन में यह क्रोध प्रकट हो रहा है। मेरे मन में यह घमंड प्रकट हो रहा है। मेरे मन में यह विकार प्रकट हो रहे हैं। यह मुझे स्पष्ट दिखता है। और यह भी स्पष्ट दिखता है कि मैं उससे सेपरेट हूं। आई एम नॉट दैट। तो वो फर्स्ट स्टेप तो मैंने अचीव कर लिया है। नेक्स्ट स्टेप के लिए कब ये होगा किंतु दिस इज द फर्स्ट स्टेप सेल्फ एनालिसिस। सेल्फ रिफ्लेक्शन। देखिए पावर कम होगी कि नहीं मैं ऐसा कोई श्योर नहीं कहूंगा। किंतु यह पक्का कहूंगा कि ये आपको यह ज्ञान हो जाता कि यू आर सेपरेट। पावर आई डोंट नो कि मेरा यह घमंड को कम करने का पावर कितना कम हुआ है। किंतु एटलीस्ट मुझे यह इतना मैं दावा करके कह सकता हूं कि मुझे यह पक्का पता है कि यह मैं नहीं हूं। मैं अपने को क्लियरली सेपरेट रूप से देख पाता हूं। फ्रॉम हियर ऑन वर्ड्स से अभी सेकंड साधना स्टार्ट होगी कि वो AK-47 डेवलप करना है। जब भी यह चालू होते हैं टेररिस्ट वो वो उस उसमें घुसना बॉर्डर के पास तो फिर उसको शूट करना शुरू करें।

प्रश्न: विपश्यना कहती है कि यदि क्रोध को उसके उठते ही पहचान लिया जाए, तो उस पर विजय पाई जा सकती है; पर यदि पहचान में देर हो जाए, तो वह तेजी से बढ़ता है और फिर उसे नियंत्रित करना अत्यंत कठिन हो जाता है। This matches with your concept of self analysis

ये जो मैंने रांची की ये जो घटना कही ना कि मैं खिड़की से उसको देख रहा हूं। सोया हुआ है। ये मुझे पर्टिकुलरली याद क्यों है? क्योंकि ऑन वन हैंड आप मुझे देखिए। इतना घर छोड़कर के साधु हो के कष्ट करके मैं वहां पर काम करने को जाता हूं। वो वहां का उसके बगल में ही घर है। फिर भी वह सोता है। तो जो क्रोध मेरे मन में आया था तो साथ-साथ में ही यह मेरे मन में सेल्फ एनालिसिस चल रहा है कि यह क्रोध गलत है। ये घटना पर्टिकुलरली आई रिमेंबर कि दोनों साथ में चल रहा है। एक ओर उस आदमी पे भयानक गुस्सा आ रहा है। दूसरी ही और मुझे यह समझ में आ रहा है कि ये गुस्सा बड़ा ही मेरे लिए खतरनाक है। तो यह ठाकुर की कृपा से अह सम हाउ बिल्कुल पहले से ही मैं कर पा रहा हूं कि मैं सेल्फ एनालिसिस कर पा रहा हूं। मन में घमंड होता है तो मैं समझ पा रहा हूं कि मेरे मन में घमंड हो रहा है। बाहर में अपने को चेंज करूं ना करूं वो दैट इज अनदर मैटर। यह भीतर में क्या हो रहा है? मैं समझ पा रहा हूं। भीतर में विकार प्रकट हो रहे हैं। मैं समझ पा रहा हूं। क्रोध प्रकट हो रहा है। मैं समझ पा रहा हूं। सो लॉन्ग प्रैक्टिस की सेल्फ एनालिसिस

प्रश्न: अष्टांग योग के अनुसार हम अभ्यास और वैराग्य से भी तो मन का नियमन कर सकते है

हां अभ्यास वैराग्याभ्याम त निरोध तो सूत्र छे योग शास्त्र मा कि अभ्यास वैराग्य के द्वारा ही आप अपने मन को कंट्रोल कर सकते हैं। सो ऑफकोर्स ये तो वेरी इंपॉर्टेंट है। यस यस हां कर सकते हैं। किंतु अभ्यास और वैराग्य कैसे लाना वो एक फिर बहुत लंबा टॉपिक हो जाएगा।

प्रश्न: रांची के उस शिक्षक के साथ आपका अनुभव हमें एक महत्वपूर्ण शिक्षा देता है—आध्यात्मिक जीवन में शिथिलता का कोई स्थान नहीं है। इतना सब त्याग करने के बाद भी आपको क्रोध से सावधान रहना पड़ता था

देखिए मैं एक और एग्जांपल बताता हूं। वहां पर रांची में किसान मेला होता था। तो किसान मेला यानी कि बहुत सारे किसान हजारों किसान आएंगे। सब अपना प्रोड्यूस डिस्प्ले करेंगे। वो ना इट्स अ वन ऑफ द वंडरफुल वो म एक प्रोग्राम होता था। अभी मैं जिस साल मैं वहां पर आया ना प्रॉब्लम यह हुआ कि उस समय कुछ-कुछ जो ऑर्गेनाइजर थे ना उन लोगों का हमारे साथ में कुछ किसी चीज को लेकर के यह विध्वेष खड़ा हो गया तो उन्होंने किसान मेले का बहिष्कार किया। बोला कि हम लोग पार्टिसिपेट नहीं करेंगे। किसान मेला फेल कर देंगे। आपके वो वीआईपीओ को लेके आते हैं ना आप सिटी में से वो एग्रीकल्चर मिनिस्टर ये वो सेक्रेटरी सेक्रेटरी आईएएस, आईपीएस देखेंगे उन सबके सामने कोई खाली पूरा मैदान दिखेगा। तो बड़े महाराज शशांकानंद जी ने कहा तुम करो उसको ऑर्गेनाइज। मैंने कहा वैसे मैं गांव में डेली जाता हूं किंतु किसान मेला इतना बड़ा काम है कि बड़े महाराज डायरेक्ट ऑर्गेनाइज करते थे और बाकी सब सीनियर साधुओं को लेके जो कि मैंने कभी नहीं किया। मैंने कहा यार कैसे होगा इतना बड़ा और फिर जो काम करने वाले सब ने बहिष्कार किया हुआ है। तो फिर मैंने मेरा जो ग्रास रूट लेवल नेटवर्क था जो कि इसमें इन्वॉल्व नहीं था। वह बेचारे बिल्कुल ग्रास रूट लेवल के ही वर्कर थे। उनको लेकर के दिन रात मेहनत करके किसान मेला किया और इतना ही सक्सेस हुआ कि जितना वो पहले वाला था। तो मुझे याद है शशांक आनंद जी सब वो जितने वीआईपी को लेकर आए सबको स्टेज पर बिठाया फिर मुझे बुलाया ऐ इधर आओ इधर आओ और मैं तो कोई ऑर्डर का साधु नहीं हूं ना मैं तो वैसे प्राइवेट साधु हूं वो वॉलंटियर ही हूं बस साधु के कपड़े पहनता था ब्रह्मचारी के तो मुझे सबके सामने स्टेज पर बुलाया और मेरी प्रशंसा कर रहे प्रशंसा कर रहे हैं सबके सामने ये है बोल के ही सब हुआ मैं प्रशंसा सुन भी रहा हूं और अगेन ये मेरे मन में ये अवेयरनेस है कि ये घमंड प्रकट हो रहा है घमंड को मैं दूर नहीं कर पा रहा। इतना मेरा स्ट्रेंथ नहीं डेवलप हुआ। उस समय भी नहीं था, आज भी नहीं है। किंतु इतना मेरे में स्ट्रेंथ हुआ है। इतना तो विज़डम आया है कि मैं देख पा रहा हूं कि यह प्रकट हो रहा है।

प्रश्न: आप इतने लंबे समय से आत्म-निरीक्षण का अभ्यास कर रहे हैं। क्या साधना के साथ-साथ यह आत्म-निरीक्षण भी improve होता जाता है?

हां हां मैं ये कह सकता हूं कि इंप्रूव होता है। पहले मैं बैठकर के अब काम खत्म हो गया तो अब जब ध्यान के समय वो इंट्रोस्पेक्शन होता था करता था। अभी मैं म लाइव इंट्रोस्पेक्शन कर सकता हूं। यह बाहर में काम भी कर सकता हूं। साथ में इंट्रोस्पेक्शन भी कर सकता हूं। माने वो दोनों पैरेलल कर सकता हूं। अभी दिन में घमंड प्रकट हुआ या क्रोध हुआ तो रात को पता चला कि ये ये ठीक नहीं था। अभी मैं एटलीस्ट लाइव देख सकता हूं कि यह हो रहा है। वो डिटर नहीं कर पा रहा हूं अभी भी किंतु देख पा रहा हूं एटलीस्ट।

प्रश्न: साधक में कर्म के प्रति पूर्णता (perfection) का आग्रह स्वाभाविक रूप से होता है। जब यह अपेक्षा पूरी नहीं होती, तो सहज ही क्रोध प्रकट हो जाता है। वास्तव में, कर्म में पूर्णता भी बनाए रखना और मन में किसी प्रकार का विकार उत्पन्न न होने देना—यह अत्यन्त कठिन है।

रियली डिफिकल्ट वो स्वामी जी की फेमस कहानी कि वो बेलूर मठ में वो गंगा का घाट बन रहा है। इनको जिम्मा दिया है अपने विज्ञान महाराज को और अकाउंटिंग देख रहे हैं अपने राजा महाराज और कुछ दिनों के बाद पता चला जितना खर्च होना था उससे 10 गुना हो गया है। तो फिर स्वामी जी ने फिर राजा महाराज को जो डांटा है जो डांटा है कच्चा पोछा होता उसका हार्ट फेल हो जाता। राजा महाराज बेचारे सब सुन लिए और फिर अपने कमरे में जाकर के लेट गए। फिर एकाएक स्वामी जी को अकल आई कि अरे मैंने यह क्या कर दिया? ये तो ठाकुर का मानस पुत्र मेरा स्नेह का भाई मैंने उसको इतना बुरी तरह डांटा तो फिर उन्होंने विज्ञान महाराज को भेजा जाओ जाओ देखो राजा क्या कर रहा है? तो विज्ञान महाराज गए। राजा महाराज का दरवाजा खटखटाया। महाराज दरवाजा ही नहीं खोल रहे हैं। तो फिर आए स्वामी जी के पास। स्वामी जी इतने टेंशन में आ गए कि राजा क्या कर लेगा पता नहीं। दौड़े-दौड़े गए जोर-जोर से दरवाजा खटखटाया। चिल्लाए तब राजा महाराज ने जब दरवाजा खोला तो स्वामी जी उनको आलिंगनबद्ध करके रोना शुरू कर दिए और इतना रो रहे हैं इतना रो रहे हैं आंखों की अश्रुओं का अंत नहीं आ रहा है राजा महाराज उनको समझा रहे अरे भाई तुमने डांटा तो क्या हुआ तुम बड़ा भाई हो तुम्हारा अधिकार है मुझे डांटने का तो स्वामी जी बाद में कहते भाई कि ये जो अभी ये बीमारी सहन कर करके करके ना मेरा टेंपर एकदम शॉर्ट हो गया है मैं अपने को और फिर इतना बड़ा गोल नजर के सामने है कि ये म धर्मचक्र प्रवर्तन करना है ठाकुर का मैसेज इस युग में फैलाना है। तो मैं इतना नर्वस और इतना यह इंपेशेंट हो जाता हूं कि अपने टपर को कंट्रोल नहीं कर पा रहा हूं। तो प्लीज मुझे क्षमा कर दो। सो ऑब्वियसली स्वामी जी जैसा योगी और कौन होने वाला है? स्वामी जी जैसे स्वामी जी एक काम का परफेक्शन हो उसके लिए इतना एशियस हो जाते थे। इतना इंपेशेंट हो जाते थे। तो हम लोग किस खेत की मूली है? किंतु स्वामी जी का था कि साथ में ही ऐसा रो के क्षमा मांग लेते हैं जो कि क्षमता अपने में नहीं है। किसी पे क्रोध किया

प्रश्न: क्या यह आत्म-निरीक्षण ही साक्षी-भाव है?

साक्षी भाव कह सकते हैं। हां कह सकते हैं। साक्षी भाव कह सकते हैं। यस यस यस हां हां कह सकते हैं। किंतु यहां पे क्या है? यदि सही-सही साक्षी भाव आपने यह किया है ना डेवलप तो अल्टीमेटली आपके मन के भीतर में जो काम और विकार आते हैं ना उसको कंट्रोल करने का भी एक साथ में शक्ति खड़ा होगा तो वि इज मने अनदर लेवल पे है वो एक साक्षी भाव यदि ठीक ठीक कहेंगे तो मन में विकार प्रकट होते हैं देख भी सकते हैं और उसको कंट्रोल भी कर सकते हैं जो कि मेरे में अभी इतना नहीं है म 50% कह सकते हैं। हां किंतु विल पावर फिर डिप्लॉय करना कब डिप्लॉय करना कैसे करना वो भी तो साक्षी भाव का ही एक फंक्शन है। ये ये कैसा है पता है साक्षी भाव देखिए आप क्लास रूम में आप टीचर चला जाता है तो देखिए बच्चे हल्लागुल्ला करना शुरू कर देंगे चीखेंगे चिल्लाएंगे सब करेंगे किंतु जैसे ही टीचर आ जाएंगे तो सब शांत हो जाएगा। अब ये टीचर है अपना साक्षी भाव। ये साक्षी भाव है तो आप बच्चों ऑटोमेटिक कंट्रोल में आएंगे। किंतु देखिए टीचर भी दो तरह के होते हैं। कोई-कोई टीचर का पर्सनालिटी ऐसा होता है ना अपनी प्रेजेंस मात्रा से सब बच्चे शांत हो जाएंगे और कोई-कोई टीचर इतने वीक पर्सनालिटी होती है। उनकी नजर के सामने बच्चे चिल्लाएंगे कोई टीचर बेचारा कुछ नहीं कर पाएगा। तो टीचर बेचारा देख रहा है कि बच्चे हल्ला कर रहे हैं। किंतु वो पर्सनालिटी नहीं उनको कंट्रोल करने की। मेरा भी यह परिस्थिति है।

प्रश्न: मुंबई के एक काफ़ी पढ़े-लिखे व्यक्ति ने मुझसे कहा कि उसे उपनिषद् समझ में नहीं आते थे। बाद में उसने सेवा-कार्य किया; तब शास्त्र उसे अच्छी तरह समझ में आने लगे।

ये देखिए ये ठाकुर का क्रंदन योग है। सो सेम थ्यरी स्वामी जी का यह सेवा योग ठाकुर का यह क्रंदन योग वर्किंग ऑन द सेम थ्यरी वो आपका एक ट्रेडिशनल एप्रोच है। यह स्वामी जी का एक आज के युग के अनुसार का एप्रोच है। हृदय के ऊपर में से मेला साफ करना होगा। दैट इज़ उसके बिना आपका कोई भी साधना आपकी जमेगी नहीं। देखिए इसके बाद में ही इसके बाद में ही ठाकुर कहेंगे कि सत्संग सत्संग का बड़ा ही महत्म है। तो देखिए कि एक और आप हृदय के चित्त का जो कचरा है उसको साफ कीजिए और नियमित रूप से सत्संग करते जाइए। सो दिस टू आर इनफ। माने एक जनरल पर्सन के लिए जो कि अपनी लाइफ में बिजी है, समय नहीं निकाल पा रहा है। तो फॉर हिम और हर दिस इज इनफ। फिर आप यदि एडवांस जाना चाहते हैं तो फिर बहुत कुछ है। बट उन्हें बेसिक लेवल पे यह दोनों आर इनफ। कि कैसे भी करके चित्त शुद्धि कीजिए और कैसे भी करके सत्संग को पकड़ के रखिए। तो कल मां की तिथि पूजा आज से ही सबको मां के पास में प्रार्थना सबके लिए और मेरी प्रार्थना वही है आपको पता है सबको कि मां और ठाकुर और स्वामी जी की कहानियों में सबका एक श्रद्धा और प्रेम प्रकट हो सभी मिलेंगे फ्राइडे को जय महादेव ओम