Transcript
यहां पर सुबह से वृष्टि हो रही तो सेटिंग्स और कनेक्शन थोड़ा सा गड़बड़ हो गया मुझे की बोल आवाज ओ अच्छा अच्छा टे जा अच्छा ताले द तो सेटिंग ठीक कर नहीं देखे जो चेंज अच्छा इतना अच्छा इतना जोरों से बारिश हो रहा है ना य पर कि अच्छा अच्छा मेरे ख्याल से अभी ठीक हो जाना चाहिए थोड़ा सा तो चेंज करके देखा है मैंने जो भी है चलिए शुरू करते हैं अच्छा तो कल हमने देख हां की बोल र अब अब सुन अब अच्छा अच्छा अभी कुछ चेंज हुआ क्या अभी कुछ हु अच्छा अच्छा ओ अच्छा ठीक है अभी जैसा भी है अभी आज क्या करेंगे व जद मैंने ठाकुर की ही जो राइट सुबह से बारिश हो रही है यहां पर तो ज भी तो अच्छा अच्छा अच्छा अच्छा अच्छा तो कल हमने देखा कि किस तरह से मास्टर महाशय एक क्यूरियोसिटी होती है कि कहां श्री राम कृष्ण की पूरे भारतीय परंपरा में बड़े हुए हैं विदेशी सभ्यता विदेशी संस्कृति या तो फिर विदेशी एजुकेशन लर्निंग उसके साथ में उनका कोई लेना देना नहीं वहां कहीं वो लाहा बाबू की वो पाठशाला में पढ़ते थे वो भी पढ़ते थे इच्छा होती थी तो जाते थे और इच्छा होती थी तो वहां पर वो जो आम्र कानंद में जाकर के माणिक राजा के आम्र कान आम्र कानन अर्थात की आम का बगीचा आम के पेड़ों का बगीचा वहां पर जाकर के अपने मित्रों के साथ में वो पुराणिक नाटक का अभिनय करते थे कहां वो श्री राम कृष्ण और कहां केशव सेन कि जिसको कि हम कहेंगे कि आधुनिक सभ्यता का भारत में जो पदार्पण हुआ उसमें से जो एक एक ऐसी एक जनरेशन तैयार हुई उनको ऐसा लगने लगा कि भारतीय परंपरा या तो फिर भारतीय संस्कृति यह जो कुछ भी है इसके भीतर में सार तत्व है कि नहीं यह प्रश्न इन लोगों के मन में खड़ा होने लगा यह स्वामी विवेकानंद है वो भी यही एक जनरेशन से आद हैं आज की हमारी जनरेशन को देखिए हां हम लोग पश्चिमी संस्कृति से विदेशी सभ्यता से काफी कुछ प्रभावित है किंतु आज हमको यह भी पता है कि यदि हम चाहे तो वही विदेशी संस्कृति का अनुकरण करके उनसे भी ज्यादा श्रेष्ठ हो सकते हैं आज ये माइक्रोसॉफ्ट है यह ग है यह जो सब इंटरनेशनल सबसे बड़ी से बड़ी टेक कंपनीज है इसके सीईओ आज इंडियन है तो वो जो पूरा एक सिस्टम विदेशी लोगों ने बनाया है उस सिस्टम में रह कर के उस सिस्टम में किस तरह से मास्टरी हासिल की जाए इतना तो हमको आता है आज सुबह को ही मैं एक न्यूज पढ़ रहा था इंटरनेशनल मैथमेटिक्स ओलंपिक ओलंपियाड अभी यह अना इंडियन लोगों का है कि अपना मेंटल कैपेसिटी बड़ा स्ट्रांग रहता है फिजिकल इतना नहीं रहता तो यह जो अभी पेरिस में ओलंपिक होने वाली है उसमें से जद ज पाच 10 गोल्ड मेडल भी मिल जाए तो बहुत बड़ी बात हो जाएगी चाइना को देखिए अमेरिका या रशिया ये लोग 50-50 6060 गोल्ड मेडन लेकर के आ जाएंगे टोटल नंबर ऑफ मेडल्स गोल्ड कितने है सिल्वर कितने उतना डिटेल नहीं पता है मुझको किंतु मैं सब समय देखता हूं कि मेडल का जो टैली होता है तो सबसे ऊपर में अमेरिका रशिया चाइना यह सब लोग रहते हैं और बिल्कुल आखिरी आखिर में अपने इंडिया को द तो किंतु वो हो गया फिजिकल स्किल में अभी जहां तक मेंटल स्किल की बात है ये इंटरनेशनल मैथमेटिक्स ओलंपियाड भारत का इसमें फोर्थ नंबर आया था चतुर्थ नंबर अमेरिका नो डाउट फर्स्ट आया है किंतु फोर्थ नंबर पे इंडिया है तो देखिए कि आज हमको पता है कि हम चाहे तो विदेशियों ने यह जो सिस्टम खड़ा किया है उसी सिस्टम में जाकर के वी कैन एक्सेल एंड वी कैन इवन डू बेटर देन देम यह जो अपने चेस के ग्रांड मास्टर्स से अपना इसरो का हमको प है कि ये जो चंद्रयान वगैरह भेजते हैं तो उसका जो बजट होता है वह जो हॉलीवुड की मूवीज उससे भी कम बजट में हम लोग यह स्पेसशिप आकाश में बेज सकते हैं तो वो कैपेसिटी हमने अर्जन कर लिया है किंतु वो एक समय था कि हमारी दुविधा हमारी यह जो एक डाउट है संशय संशय अपने चर्म पर था कि यह विदेशी संस्कृति इतनी शक्तिशाली है इतनी मजबूत है इतनी पावरफुल है कि कि हम लोग किस तरह से इनके सामने टिक करके रहेंगे स्वामी जी ने जब योकोहामा जाकर के जापान का एक पोर्ट है वहां पर जाकर के स्वामी जी जब पहली बार अमेरिका जा रहे थे तो बंबई से निकले बंबई से ये सिलोन यानी कि आज का श्रीलंका फिर यह सिंगापुर ये वोप सब पार करके ये यहां पर चाइना में हंग कोंग ये देखा वो सब पोर्ट एक के बाद एक उस समय तो ये आज की तरह एरोप्लेन थ कि 24 घंटे में यहां से अमेरिका तो यह सब पोर्ट एक के बाद एक क्रॉस करके इंडियन ओशन से पेसिफिक ओशन से कनाडा में पहुंचे कनाडा का पोर्ट वैंकूवर फिर वैंकूवर में जहाज से निकल कर के ट्रेन के माध्यम से पूरा जो जर्नी है ईस्ट कोस्ट से वेस्ट कोस्ट का अमेरिका में तो ट्रेन में बैठ कर के वो कनाडा के वैंकूवर जो कि वहां के वेस्ट कोस्ट पे है शिकागो जो कि ऑलमोस्ट ईस्ट कोस्ट पे है अमेरिका के वहां तक पहुंचे थे जो यह पूरा जर्नी था स्वामी जी ने पहली बार भारत से निकल कर के ये विदेशी सभ्यताओं को देखा तो उन्होंने यह तो देखा कि अमेरिका किस तरह से प्रगति कर रहा है यूरोप या ब्रिटेन प्रगति कर रहे हैं वो तो इंडिया में रह कर के भी सबको दिखता है कि हमारे पर राज कर रहे हैं जो चाहे वह कर सकते है कश्मीर में हमको जमीन दिया वहां के राजा ने कि चलो अपना एक मठ बनेगा ट्रेडिशनल भारतीय परंपरा ने तो वहां पर वो जो रेसिडेंट ब्रिटिश ऑफिसर था वो नाराज हो गया उसने राजा को मना कर दिया कि यह मट फट वगैरह कुछ होगा नहीं यह जमीन वापस ले लो तो बेचारा राजा ने चुपचाप जमीन वापस ले ली तो यह थे अपने सो कॉल्ड उस समय के राजा वो ब्रिटिश रेसिडेंट और जहां जहां पर रेसिडेंट होगा तो जो रेसिडेंट बोलेंगे वो करना पड़ेगा और जहां पर उनका डायरेक्ट रूल है जैसे कि मद्रास प्रेसिडेंसी ना कि बम्बे प्रेसिडेंसी ना कि बंगोल प्रेसिडेंसी वहां पर तो उनका डायरेक्ट रूल चलता था तो यूरोप और ब्रिटेन वो अपने आगे बढ़ गए हैं टेक्नोलॉजी की में सभ्यता की रेस में वह तो स्वामी जी को इंडिया में भी दिखता था किंतु यह जापान है जो कि अपना एशियन कंट्री है व भी धीरे-धीरे करके किस तरह से विदेशी सभ्यता को अपनाकर और अपना जो इंजीनियस कल्चर है जो अपना नेटिव संस्कृति है उसको ना छोड़ कर के उसको बनाए रख कर के किस तरह से विदेशी सभ्यता के पॉजिटिव पॉइंट से वो लेकर के इंडस्ट्रियल इजेशन है टेक्नोलॉजिकल एडवांसमेंट है फिर ये मॉडर्न यूनिवर्सिटीज है ये मॉडर्न सिस्टम ऑफ गवर्नर्स है यह सब किस तरह से जापान एस्टेब्लिश कर रहा है वो स्वामी जी ने जब जा कर के देखा तो योकोहामा में जो कि जापान का एक सिटी है पोर्ट सिटी तो उन्होंने अपने जो डिसाइल थे ये आला सिंगा बेरू मल मद्रास में उनको कितना सुंदर लेटर लिखा सी हाउ द नेशंस आर ऑन द मार्च ये देखो कि ये जो सब एक के बाद एक देश है वो जो देशों की जो रेस है देशों की जो एक कंपटीशन है उसमें से कैसे वो आगे कदम कर रहे हैं हाउ दे आर ऑन द मार्च तो भारत को भी उस समय बड़ा ही एक सीरियस संदेह था कि क्या यह देशों की यह जो कंपटीशन है यह जो रेस है क्या हम इसमें हार गए हैं क्या क्या इसमें हमारा कुछ डेवलपमेंट वगैरह होने वाला है कि नहीं यह उस समय की घटना है कि यह विदेशी संस्कृति से प्रभावित होकर के जैसे कल हमने डिस्कस किया पिछले लास्ट क्लास में कि अभी वो जो मिनिमम मैरिज एज है उन लोगों ने सोच के रखा कि जद अमेरिका या यूरोप की तरह डेवलपमेंट करना होगा तो यह सब सोशल रिफॉर्म करने होंगे अच्छा ठीक है चलो सोशल रिफॉर्म कि है सोशल रिफॉर्म कर कर के शायद हो सकता है कि हम बाकी सब चीजों में जो कि मैटर करता है सोसाइटी सबका अपना अपना है जापान का कितना सुंदर एक कॉमिनेशन था सोशल स्ट्रक्चर अपना रखा क्योंकि ये इंडस्ट्रियल है टेक्नोलॉजी और साइंस है ये मॉडर्न यूनिवर्सिटीज है मॉडर्न मेथड ऑफ गवर्नेंस है वो सब विदेश से ले लिया तो यहां पर हम लोग उल्टा करने को गए साइंस टेक्नोलॉजी इंडस्ट्रियल इजेशन वो सब की बात दूर है पहले सोशल रिफॉर्म करो पहले तो हिंदू समाज ने यह हजारों सालों से जो एक पूरा एक सोशल स्ट्रक्चर खड़ा किया है पहले तो इसको तोड़ दो फिर क्रिश्चियनिटी को अपना लो या तो फिर क्रिश्चियनिटी का एक वर्ण शंकर स्वरूप जैसे कि यह ब्राहमम समाज तो एक वर्ण शंकर क्रिश्चियनिटी का स्वरूप उसको अपना लो क्रिश्चियन नोमेन क्लेचर को इंडियन नोमेनक्लेच्योर सोसाइटी करते थे और फिर गॉड्स एंड गॉडेस तो क्रिश्चियनिटी में नहीं होते है सेंट्स एंड वो सब होता है एंजल्स एंड सेंट्स तो वो गॉड्स एंड गॉडेस होते पोलि जम में और क्रिश्चियनिटी मोनोथेस्ट रिलीजन तो जो भी है तो इस तरह से उन्होंने जो बनाया है उसको एज इट इज अपना लो तब कहीं जाकर के अपना कुछ भला होगा ऐसा सोचने वाले लोगों में यह एक थे ये केशव चंद्र सेन तो ये केशव जोक इस तरह की विचारधारा रखते थे कि भारतीय समाज में भारतीय सोसाइटी में बहुत सारी अंधश्रद्धा है जब तक सोसाइटी को रिफॉर्म नहीं करेंगे रिलीजन को रिफॉर्म नहीं करेंगे क्रिश्चियनिटी का एक वर्ण शंकर स्वरूप भारत में नहीं लाएंगे तब तक हमारा कोई धार ही नहीं है ऐसे लोग किस तरह से श्री राम कृष्ण की सम्मोहन जाल में फस गए ऐसे लोग किस तरह से श्री राम कृष्ण से प्रभावित होकर के चुपचाप उनके सामने बैठ कर के उनके उद्देश सतत श्रवण कर रहे हैं यहां तक कि जब केशव सेन ठाकुर के पास आते थे और उनके सामने चुपचाप बैठ कर के ठाकुर बोलते जाते हैं बोलते जाते हैं वो सुनते जाते देख करर के केशव के शिष्य वो टेंशन में आ गए वो उन्होंने कहा परामर्श दिया कि महाशय उन वही सब कुछ बोलते हैं परमहंस महाशय आप भी तो कुछ बोलिए आप तो यह टाउन हॉल में विदेश में सब जगह पर लेक्चर देते हैं वो अनपढ गरीब ब्राह्मण काली का पुजारी अंधश्रद्धा लू का पता नहीं किस तरह की उस कम का माइंड सेट है उनके सामने चुपचाप बैठ कर के सब सुन लेते हैं आप सामने कुछ तो बोलिए तो केशव सर ने कहा कि उनके सामने बोलने से कोई लाभ नहीं है यह तो इस तरह से है कि जहां पर लोहार जहां पर कार्य करता है वहां पर आप सोई बेचने को जाएंगे अभी यह जो सोई है या कोई भी मेटल की चीज वो बनती है या वहार शाला में माने कि जहां पर वो जो ये स्मिथ जिसको बोलते हैं वहां पे वो तो फिर वहां पर जाकर के आप जो जो चीज बेचता है वहां पर वही चीज जाकर के बेचने को जाएंगे डेरी में जाकर के आप दूध बेचने को जाएंगे उसके जैसा ये हो गया तो इसीलिए केशव इतना प्रभावित क्यों था ठाकुर से यह जानने के लिए मास्टर महाशय जैसे बहुत सारे लोग एक एक उनके भीतर में यह उत्कंठा थी क्यूरियोसिटी थी अभी मास्टर महाशय आगे लिखते हैं श्री रामकृष्ण कथामृत में कि ठाकुर निराकार वादी बटन किंतु आबार साकार वादी ठाकुर निराकार वादी थे वो ठीक है किंतु फिर साकार वादी भी थे ब्रह्मे चिंता कोरे आभार देव देवी प्रतिमा सम्मुख फूल चंदन दिया पूजा और प्रेम मातो वारा कोया नृत्य गीत करे एक और ब्रह्म चिंतन करते हैं दूसरी ओर देव और देवियों की प्रतिमा के सामने फूल चंदन देकर के पूजा करते हैं और प्रेम से मतवारे होकर के नृत्य गीत करते हैं आठ बिछाना बोसे लाल पेड़े कापड़ी परे एक खटिया प रहते हैं म उनका जो खाट और बिछाने पर बैठते हैं बहुत सारे लोग ज से बेलूर मठ में एक डिवटी गई लेडी डिवटी जा कर के देखा तो महापुरु महापुरुष महाराज के बारे में काफी कुछ सुना होगा शायद उन्होंने तो दे सोचा होगा कि जाकर के दर्शन करते हैं तो जाके देखा कि महापुरुष महाराज इस तरह से वो चेयर में बैठे हैं चेयर पे ना कि अपने बेड पे चेयर पे ही बैठे होंगे शायद जब दर्शन दे रहे हैं तो और सब कुछ जो कि एक मॉडर्न फैसिलिटी का आ जाए बेलूर मठ में सब कुछ है तो वो देख कर के आश्चर्य चकित हो कर के बोलती है कि अरे हमने सुना है कि महापुरुष तो गाछ ताक है माने जो महापुरुष होते हैं वो तो पेड़ प रहते हैं आप ही कमरे में रहते हैं फिर ये चेयर है ये बेड है ये सब कुछ है बढ़िया सा सब फर्नीचर ये सब क्या है माने वो जो एक थिंकिंग होगा ट्रेडिशनल थिंकिंग की महापुरुष एक की जो होगा वो पेड़ पर रहेगा तो ये आधुनिक महापुरुष इस तरह से जो रहते हैं वो थोड़ा सा एक आश्चर्य जनक कि परमहंस कैसे रहेंगे वो दिगंबर रहेंगे पाल सब जटा पक गई होगी बालों में वो एक विपत जैसा शायद स्वरूप होगा पता नहीं आखिर में कब स्नान किया होगा कि नहीं किया होगा बड़ी सी दाढ़ी होगी फिर दाढ़ी प सब वो सब लगाया मने वो खाते खाते वो जो सब गिरता है ना वो सब दाढ़ी पर लग गया होगा कपड़ मने एक ऐसा एक जो कि पिशाच वत एक जिसका आचरण रहता है काली मंदिर में एक पिशाच वत एक एक साधु आया था इस तरह से बहुत बड़ा साधक माने दिगंबर है चटा बटा पक गई है दाढ़ी के बाल बड़े हुए हैं और उसका बिहेवियर भी इस तरह से मने भयावह बिहेवियर जहां पर वो कुत्ते वो खाना खा रहे हैं वहां पर जाकर के उनके साथ में बैठ के वो जो खाना फेंका गया है उ लोगों ने कहा कि अरे काली मंदिर में जाइए वहां पे सब जो भी भिक्षुक है या साधु सन्यासी है उन लोगों के लिए आहार की व्यवस्था है तो वो नहीं जहां पे कुत्ते खाना खा रहे हैं जहां पे ठा पड़ा हुआ है वहां पर जाकर के उनके साथ में बैठ के खाना खाने लगे और कुत्ते लोगों ने उनको भगाया भी नहीं मने इस तरह से और जब काली मंदिर में जाकर के स्तव करने लगे तो ऐसा प्रचंड उनकी आवाज ऐसी उनकी जो तपस्या की है मने ऊर्जा कि पूरा काली मंदिर वो धुज नहीं लगा तो ठाकुर तो बेचारे बड़े टेंशन में आ गए कि क्या मेरी भी ऐसी हालत होगी क्या साधना में सिद्धि प्राप्त करके तो फिर खर तो मैंने क्या है कि ये ट्रेडिशनल चित्र है कि महापुरुष कहो ना कि ये परमहंस कहो कैसे रहेंगे जिन्होंने ईश्वर प्राप्ति कर ली है या ईश्वर में संपूर्ण मग्न हो गए हैं तो इस तरह से नहीं यह केशव सेन को सामने भी यहां पर तो केशव सेन इस तरह से प्रश्न नहीं करता किंतु जब ठाकुर विद्यासागर को मिलने के लिए गए थे उस समय विद्यासागर ने पूछा था मास्टर महाश प आमंत्रण स्वीकार करने से पहले आमंत्रण तो क्या मतलब ठाकुर ने कहा था कि मैं आपका दर्शन करने के लिए आना चाहता हूं दर्शन तो नहीं मुलाकात मैं आपकी आपके साथ में मुलाकात करने के लिए आना चाहता हूं तो हां कहने से पहले विद्यासागर ने सिर्फ एक बार महाशय को पूछा था कि किस तरह के परमहंस है तब मास्टर महाशय ने कहा था कि वो जूते भी पहनते हैं और वो धोती पहनते हैं और वस्त्र भी पहनते हैं और उनका जो एक बेड है बेड के ऊपर में सोते हैं उसके ऊपर में एक मच्छर दानी भी टालते हैं मॉस्किटो नेट यहां तक उन्होंने मेंशन किया था ये देखिए कि मने ही इस तरह से रहते हैं जैसे कि लगेगा नहीं कि ये कोई सिद्ध महापुरुष है उ एक ट्रेडिशनल कल्पना दी कि एक भैरव की तरह है े ना कि अघोरी की तरह रहेंगे इस तरह से नहीं बड़े सौम्य स्वभाव है सब कुछ उनका वैसे तो नॉर्मल दिखता है किंतु भाव हो जाएगा फिर वो वस्त्र वस्त्र वो चले जाएंगे फिर वो नृत्य कीर्तन करना शुरू कर देंगे तो वो बात की बात अलग है किंतु जब पहली बार तो जब उपस्थित होते हैं आपके सामने तो तो एक बड़े सभ्य दिखते हैं तो इसीलिए यहां पर मास्टर महाशय लिखते हैं अच्छा इसके आगे का जो सेंटेंस है उसके बारे में थोड़ा सा डिटेल डिस्कशन करना होगा ब्रह्मे चिंता को कोर निराकार वादी और साकार वादी किंतु पहले ये पैराग्राफ समाप्त कर लेते हैं प्रेम में मतवारा होकर के नृत्य खाट बिछाना बोसेन मने खटिया प बैठते हैं या अपना बेड है या बिछाना है ये उसके ऊपर में बैठते हैं लाल पेड़े कापड़ी जो धोती है उसका जो किनारी है वो लाल कलर की पहनते हैं तो वो लाल कलर की किनारी वाला कपड़ा पहन के जामा अर्थात की ये जो शर्ट होता है इसको जामा कहते हैं मोजा मोजा पेर में जो मोजा पहनना है जूता अर्थात की चप्पल वगैरा सब कुछ पर पहनते हैं किंतु संसार कोरेना देखिए ये एक क्रिटिकल डिफरेंस है बाहर से आप अपना बेश पूष कैसा भी कर लीजिए किंतु आखिर में तो है ब्रह्मचर्य ही सन्यास जीवन का साधक जीवन का प्राण है यदि ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं तो बाह्य रूप से आप कैसे भी का प भी रह सकते हैं किंतु यदि ब्रह्मचर्य नहीं है तो बाहर में आपने जितना भी वो वेश वगैरह वेश भूषा जो कुछ भी करके रखा है उन सब चीजों का कोई लाभ नहीं है वो पीतांबरी पहन के वो तिलक टपका पहन के माला पहन के वो एक वो मने जप माला जपते रहना वो सब दिखावा के अलावा और कुछ नहीं है असली साधक जीवन जो है वो है एक ही शब्द में वर्णित कर सकते हैं और वो है ब्रह्मचर्य तो बाहर से तो बिल्कुल स्वस्थ मने स्वाभाविक दिखते हैं किंतु भीतर में सब कुछ सोने का हो गया है अंतर मन जो है वो पीतल या लोहे की वजह सोने का हो गया है गोल्डन हो गया है ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं इसीलिए कहते हैं कि संसार को रेना भाव समस्त सन्यासी ताई न के परमहंश बोले इनका जो भाव है पूरा सन्यासी का है इसीलिए लोग इन को परमहंस कहते हैं िक यहां पे केशव निराकार वादी स्त्री पुत्र लैया संसार करेन अंग्रेजी ते लेक्चर देन संवाद पत्र लेखे और विषय पत्र विषय कर्म करे यहां पर केशव है जो कि निराकार वादी है इस निराकार वादी और साकार वादी पर एक लंबा डिस्कशन करना पड़ेगा किंतु इसको फॉर द मोमेंट स्किप करके बाकी के पॉइंट ले लेते हैं क्या कहते हैं साथ में कि स्त्री और पुत्र को लेकर के संसार करते हैं यानी कि आध्यात्मिक जीवन या तो आत्मिक जीवन का जो प्राण है ब्रह्मचर्य ब्रह्मचर्य में उन्होंने अभी तक प्रवेश नहीं किया है हालांकि उन्होंने सिद्धि अवश्य प्राप्त की है क्योंकि ठाकुर ने खुद कहा था कि जोड़ा सा को ब्रह्म समाज में जब गए थे केशव को देखा कि वेदी के ऊपर में बैठ कर के ध्यान कर रहा है तब देखा कि जैसे जो मोर है अपने वो जो यह जो है उसके फदर्स सीदर प्रसार करके किस तरह से बैठा हुआ है इस तरह से उसके चेहरे पर ओजस भी दिखता था तो जब पहली बार ठाकुर ने केशव को देखा था तब उस समय तो हालांकि केशव के साथ बात नहीं हुई थी किंतु जब ठाकुर केशव को प्रथम बार मिलने के लिए गए केशव के साथ बात हुई तब ठाकुर ने कहा कि एर लेस्टा नछ मने मने लेटा शरे गस अर्थात कि इसकी पछ जो है वो कट गई है तो जैसे ही ठाकुर ने ऐसा कहा जो ब्राह्मण समाजी थे अभी इसके पीछे भी स्टोरी बताए ना ठाकुर ने हृदय को कहा कि चलो ये केशव का नाम बड़ा सुना है और ठाकुर जब निर्विकल्प समाधि में थे तब उनको आदेश मिला था कि त भाव मुखे धाक भाव मुख अर्थात की कोशिस सुपरकॉन्शियस की ये बाउंड्री पे क चाहे तो नॉर्मल लेवल पे रह सकते हैं ठाकुर कहते थे मां को की चीनी होते चाई ना मान चीनी खेते चाय अर्थात की निर्विकल्प समाधि प मगना होकर के ब्रह्म के साथ में एकाकार नहीं हो जाना चाहता भक्त और भगवान के बीच में जो दूरी है थोड़ी सी एक दूरी है ब्रह्म भाव की कंपेयर में एक अंगुल जो डिफरेंस है एक उंगली जितना वो दूरी बना कर के रखनी है जिससे कि मातृ प्रेम का मैं आस्वादन ले सकूं भक्तों के साथ में मा मां का गुणगान कर सकूं तो वो ठाकुर जब इस तरह से नॉर्मल भाव में रहने लगे तब कहीं जाकर के उनके मन में यह इच्छा हुई कि जो कि साधु है भक्त है साधक है उनके साथ में बात करें जैसे ठाकुर ने कहा ना कि एक जो गांजा खोर होता है वो दूसरे गांजा फोर को खोजता है जो एक नशा करने वाला होता है वो दूसरे नशा करने वाले को खोजता है दूसरा जो सामान्य आदमी उसके साथ में बात करना उसको अच्छा नहीं लगता तो साधक एक दूसरे साधक को हमेशा खोजता रहता है गप लगाने के लिए बात करने के लिए सत्संग करने के लिए तो ठाकुर अपने से चल कर के केशव के पास आए थे और जब पहली बार केशव को देखा तो कहा कि तुम्हारी पूछ कट गई है तो यह देख सुनकर के केशव के जो सब सांगोपांग जिसको कहते हैं ना कि वो साथी लोग वो थोड़े से नाराज हो गए इतने विश्व विख्यात केशव को ये गरीब ब्राह्मण अनपढ ग्रामीण ऐसा अपमान कर दिया पहली मुलाकात में पहले ही सेंटर्स में तब केशव ने थोड़ा शांति से कहा कि पहले तो सुनो उनको कि वह क्या कहना चाहते है तब ठाकुर ने कहा कि जब मेंढक होता है जोटेड पोल अवस्था में हो है तो सिर्फ पानी में रहेगा किंतु जब उसकी पोंछ चली जाएगी और वोह जो पूरा मेंडक पुक्त वही का एडल्ट मेंडक फ्रॉक बन जाएगा तब वह पानी पे और जमीन पे दोनों जगह पर रह पाएगा तो वैसे ही केशव का है केशव उस लेवल प तो पहुंच गए हैं कि सन्यास कहो ना कि संसार कहो या तो फिर कहेंगे कि संसार में रह कर के भी व्यवस्थित रूप से ईश्वर चिंतन कर पाएंगे तो ये ठाकुर का एनालिसिस था किंतु देखिए कि संसार में रहकर के ईश्वर चिंतन करने की कैपेसिटी होना वो एक चीज है और सीरियसली साधना में समग्र अपना जितनी भी कामना वासना सब साधन रूपी आहुति में आहु देकर के संपूर्ण रूप से साधन राज्य में डूब जाना साधन जगत में संपूर्ण रूप से अपने को मग्न कर देना वो दूसरा चीज है वो बिना ब्रह्मचर्य के होगा नहीं तो यहां पर मास्टर महाशय दोनों को कंपेयर एंड कंट्रास्ट करते हैं कि ठाकुर है वैसे तो बाहर में से ये जो लाल किनारी वाली धोती अभी बंगोल में लाल किनारी वाली धोती काली किनारी वाली धोती ये सबका एक कल्चरल सिग्निफिकेंट होता है लाल किना किनारी वाली धोती पहनेंगे तो बोलेंगे थोड़ा सा फेस्टिव मूड में है वगैरह मने वो शुभ चिन्ह शुभ उसको लक्षण कहा जाता है तो इस तरह के कपड़े भी पहनते हैं मोजा भी पहनते हैं जूते भी पहनते हैं खाट के ऊपर में भी बैठते हैं किंतु एक ब्रह्मचारी यहां पे केशव जो है अंग्रेजी में लेक्चर देते हैं संवाद पत्र में लिखते हैं किंतु साथ-साथ में ही स्त्री और पुत्र को लेकर के संसार करते हैं और विषय कर्म करते हैं यानी कि दोन चीज जिसको कि ठाकुर ने कहा कि जो सही सही साधक है उसको त्याग करना है यथाशक्ति एक तो कामिनी और कांचन यह दोनों चीजें मास्टर महाशय ने यहां पर लिखा है कि केशव के भीतर में अभी भी एक संपूर्ण रूप से त्याग हुआ नहीं है तो यह हो गया केशव और ठाकुर के बीच में एक कंट्रास्ट किंतु यह तो एक बाह्य कंट्रास्ट हो गया फिलोसॉफिकल जो कंट्रास्ट है वो एक बड़ा ही सीरियस कंट्रास्ट है यहां पर मास्टर महाशय कहते हैं कि ठाकुर वैसे है निराकार वादी किंतु फिर देव देवियों की मूर्ति के सामने पुष्प अर्पित करके पूजा भी करते हैं और यहां पर केशव है वह है पूरे निराकार वादी किंतु फिर स्त्री पुत्र रखते हैं वगैरा तो ये निराकार और साकार क्या है सर्वप्रथम तो ठाकुर को निराकार वादी कहना एक गलती हो जाएगी ठाकुर को हम कहेंगे अद्वित वादी या तो फिर अद्वैत मां की भाषा में मां ने पत्र में लिखा था एक शिष्य को कि ठाकुर अद्वैत थे तुम लोग भी ठाकुर के संतान होने की वजह से अद्वैत वादी ही हो अद्वैत ही हो तो ठाकुर अद्वैत स्वरूप थे यानी कि संपूर्ण रूप से ब्रह्म के भीतर में एकही पुत हो जाना अभी देखिए कि निराकार और अद्वैत में डिफरेंस क्या है साकार निराकार में जो डिफरेंस है य वो तो बड़ा ही स्पष्ट है साकार अर्थात कि आप एक ऐसे ईश्वर की पूजा करते हैं जिनको कि आप अपने से भिन्न समझते हैं जैसे कि मैं भगवान कृष्ण की पूजा करूंगा तो मैं भगवान कृष्ण का भत हं कोई भी एक भाव लेकर के पूजा करूंगा या तो मैं यशो मां यशोदा का मातृ भाव अपने पर आरोपित करूंगा या तो फिर सुदामा की तरह सख्य भाव आरोपित करूंगा या तो फिर गोपियों की तरह धूर भाव से साधन करूंगा तो किसी भी तरह से ऋषि मुनियों की तरह शांत भाव से साधन करूंगा महावीर हनुमान की तरह दस्य भाव से साधना करूंगा कोई भी एक भाव लेकर के ईश्वर के साथ में एक संबंध बनाना एक रिलेशनशिप बनाना वो हो गया भाव साधना या तो फिर कहेंगे कि साकार साधना ये निराकार साधना क्या है चकि निराकार का एक सामान्य डेफिनेशन दिया जाए तो ये क्रिश्चियनिटी कहो कि ये बाकी जो सब मोनोथेस्ट रिलीजन है या तो फिर अब्राहम रिलीजन है उनको हम निराकार वादी कहेंगे निराकार वादी अर्थात कि ईश्वर के साथ में आपका रिलेशन फिर भी है वही तरह से हालांकि जिस तरह से जो वैविध्य है वैष्णव शास्त्र में वैष्णव भाव साधना में जो भावों का वैविध्य है मातृ भाव है बालक भाव है दास भाव है सख्य भाव है वो सब नहीं हो कर के सिर्फ एक भक्ति भाव से ईश्वर की आराधना करना वो एक भाव की एक सा लिमिटेशन है वहां पर दूसरा कि आप एक व्यक्ति के रूप में ईश्वर को नहीं देखते एक निराकार रूप में ईश्वर को देखते हैं जैसे कि ये सूर्योदय होता है तो कैसा एक मन जैसे मैं यहां पर सुबह को यहां पे तो समुंदर के किनारे प ही है अपना आश्रम तो सुबह को मैं मॉर्निंग व करने के लिए जाता अभी तीन चार दिनों से नहीं जा पा रहा हूं क्योंकि सतत बारिश हो रही है किंतु जो भी है वो जब मैं म ंग व करने के लिए जाता हूं तो समुंदर के किनारे आधा पौना घंटा वॉकिंग करके फिर मैं रेती में बैठ जाता हूं रेत पे और फिर थोड़ा सा आत्मचिंतन करता हूं आधा एक घंटा तो कितना सुंदर दृश्य दिखता है पूरा विराट समुंदर है उसकी लहरें पूरी चारों ओर से वो लहरें उसके ऊपर में खेल रही है फिर अ समुंदर के उस पार सूर्योदय हो रहा है आकाश में वो बादलों का कलर धीरे-धीरे करके चेंज होता है ना वो कभी गोल्डन होता है कभी रेड होता है धीरे-धीरे करके वो ब्लू होने लगता है ब्लू एंड वाइट मॉर्निंग स्काई में कलर देखेंगे आकाश का कलर ब्लू होता है और बादल का कलर सफेद होता है किंतु अर्ली मॉर्निंग होता है तो बाद आकाश का कलर डार्क होता है क्योंकि रात तो अभी भी है रात धीरे-धीरे जा रही है और बादलों का कलर क्योंकि वो सूरज के जो किरण है वो स्लेटेड किरण मने वो साइड ऊपर से बादलों के ऊपर गिरते हैं तो उसका कलर गोल्डन रेड हो जाता है तो बादन का कलर किस तरह से परिवर्तित होता है तो ये प्रकृति का यह जो प्रभाव है अपने मन पर सवार हो कर के अपने मन को अभिभूत कर दगा अभी यदि इस प्रकृति के इस जो नजार के भीतर में मैं ईश्वर को खोजना चाहता हूं तो वो निराकार ईश्वर हो गए इसका कोई स्वरूप नहीं है उनका कोई मानवीय स्वरूप नहीं है किंतु एक एक ऐसी विराट सुता है जो कि पूरे प्रकृति में छाए हुए है जैसे कहते हैं ना कि ईश्वर कण कण में विराजमान है तो ईश्वर कोई शारीरिक स्वरूप धारण करके नहीं किंतु पूरे पूरे जगत में सर्वव्यापी है इस तरह के ईश्वर की जद मैं आराधना करता हूं तो व निराकार वादी आराधना होर किंतु ठाकुर सिर्फ यहां पर सिर्फ निराकार वादी नहीं है ठाकुर अहित वादी या तो फिर कहेंगे कि अद्वैत स्वरूप स्वयं है तो निराकार और अद्वैत में डिफरेंस क्या है डिफरेंस बहुत बड़ा है अद्वैत कहता है कि जो ईश्वर को यदि साकार ईश्वर में आपका विश्वास है तो किसी अवतार है जैसे भगवान राम या भगवान कृष्ण या तो कोई देवी देवता है जैसे मां काली मां दुर्गा या भगवान शिव तुम किसी देवी देवता या अवतार या मंदिर के किसी प्रतिमा में नहीं पूछ करके ईश्वर समझ लीजिए जान लीजिए कि ईश्वर अपने हृदय में ही विराजमान है एक्चुअली हम ही ईश्वर है हम ही ब्रह्मण है बस वही बात है कि माया का एक जो आवरण माया भी नहीं शब्द यूज किया जाएगा अविद्या का आवरण अविद्या कि मुझे पता नहीं है कि मैं कौन जिस क्षण सिद्ध गुरु सिद्ध गुरु सिद्ध शिष्य को उ एक जद वाक्य बता देगा तत्व मसी श्वेत के तो तुम भी हो वही ब्राह्मण है श्वेत केतु उसी क्षण श्वेत केतु को अपना असली स्वरूप उसकी व वो रियलाइफ स्वरूप में वो डूब जाएगा तो किंतु हालांकि सिद्ध होने के लिए जन्म जन्मांतर के संस्कार काटने पड़ते हैं वो एक पूरी साधना है वो जो चार योग कर्म योग ज्ञान योग भक्ति योग और राज योग य चारों योगों से सभी संस्कारों को काटो तब कहीं जाकर के उस एलिजिबिलिटी के लेवल पर पहुंच जाएंगे जब एक बीज सब अपने सिद्ध गुरु जब आरोपित कर देते है इस भूमि में इमीडिएट मने ब्रह्मज्ञान रूपी पौधा वो उसमें से निकल आएगा तो ये डिफरेंस है कि अधत और यह निराकार के बीच में तो ठाकुर यह जो जिसको कि हम दर्शन शास्त्र कीय जो सीडिया कहते हैं ना दर्शन शास्त्र के जो सोपान कहते हैं उसमें सबसे जो कि सहज में समझ में आने वाला सोपान है यह पहला कि आप ईश्वर को एक इस तरह से इमेजिन कीजिए आकाश में बैठे हुए हैं या तो मंदिर में बैठे हुए हैं और आप जाकर के कहीं उनको प्रार्थना कर रहे हैं कि मुझे यह सिद्धि चाहिए वो चाहिए सफलता चाहिए यह चीज चाहिए और उस चीजों के लिए प्रार्थना कीजिए सामने कुछ ऑफि कीजिए कुछ भोग लेकर के जाइए कुछ पैसा डोनेशन में दीजिए यह सब कुछ दीजिए तो सामने कुछ मिलेगा यह लेनदेन का जो रिश्ता है वो सबसे एक सहज समझ में आने वाला ईश्वर का स्वरूप है किंतु थोड़ा सा सिविलाइजेशन डेवलप होगा साधक धीरे-धीरे साधना में आगे कदम बढ़ाएगा तब उसको पता चलेगा कि ईश्वर से कुछ भी मांगना बेकार है क्योंकि जितना मांगेंगे उतना ही कर्म के बंधन में फसते जाएंगे अपने जीवन का उद्देश्य है कर्म के बंधन से मुक्ति और ईश्वर के प्रति प्रेम ईश्वर को शरणागत होना तो ईश्वर के साथ में यह जो वैष्णव शास्त्र जो छह भाव बताता है शांत दास स फिर ये मधुर इस वात्सल्य भाव इस तरह से भाव का संबंध बना कर के जैसे मां यशोदा अपने संतान बाल कृष्ण से कुछ भी मांगेगी नहीं वो तो उसकी केयर करना चाहती है उसकी संभाल रखना चाहती है उससे तो मांगना कुछ नहीं है देना ही है सिर्फ प्रेम देना भाव देना पूरा अपने को समर्पण कर देना वो हो गया एक हायर स्टेज ऑफ सिविलाइजेशनल प्रोग्रेस इससे भी आगे जाएंगे तब पता चलेगा कि भाव साधना करके मन इतना स्वच्छ निर्मल हो गया है कि भगवान कृष्ण जिनको कि हम वृंदावन में ये जो मृत्य लीला है ये जो ये उसमें जो दर्शन कर रहे थे वहां से वो अपने भीतर में प्रवेश होकर के हमारे साथ में एकही भूत हो गए मैं ही हूं वो कृष्णा जैसे कि वो ठाकुर कहते हैं ना कि जब वो गोपियों को लीला में वो जो है वृंदावन लीला में जब उनको समाधि हो गई तो रास लीला में रास लीला में जब उनको समाधि हो गई तो इस तरह से वो जैसे अपने को ही कृष्ण मान कर के वो बिहेव कर रही है तो मैं ही हूं कृष्ण वो उससे भी एक हायर स्टेज है और फिर सर्वोच्च स्टेज है कि किसी एक व्यक्ति विशेष या तो एक पर्सनालिटी को लेकर के ईश्वर के स्वरूप की क्यों कल्पना करें ब्रह्मण तो वो है जो कि इस प्रकृति की जितनी भी लिमिटेशंस है स्पेस टाइम मैटर एनर्जी इन सबके परे जो सर्वोच्च एक्जिस्टेंस जो है जिसमें से उसी ब्रह्मण में से ही तो ये बिग बैंग होकर के विश्व ब्रह्मांड है कॉस्मस का प्रारंभ हुआ यहीं पर सृष्टि स्थिति प्रलय होकर के फिर आखिर में वी ब्रह्मण के भीतर में यह ब्रह्मांड विलीन हो जाएगा वो मन ही में वही मेरा असली स्वरूप है सो दैट इज द हाईएस्ट स्टेज ऑफ स्पिरिचुअल जर्नी तो यहां पे देखिए कि केशव सेन और ठाकुर के बीच में सिर्फ ये ईट और वेस्ट का डिफरेंस नहीं है कि वेस्टर्न आइडियाज को लेकर के केशव सेन रहता है और ठाकुर ईस्टर्न आइडियाज या तो इंडियन संस्कृति के अनुसार रहते हैं यदि फिलोसॉफिकली देखा जाए दर्शन शास्त्र की दृष्टि से देखा जाए तो भी केशव और ठाकुर के बीच में आसमान जमीन का अंतर है केशव फिलो फो फिकल दर्शन शास्त्र की जो प्रथम सोपान है कि ईश्वर को या तो फिर द्वितीय सोपान कहेंगे चलो ईश्वर को एक निराकार के रूप में देखते हैं और उनको प्रार्थना करते हैं वहां से तो अद्वैत वेदांत की जिन में ठाकुर ने महारत हसिल की थी कि जिसमें ठाकुर ने सिद्धि प्राप्त की थी वो कितना दूर प है जो स्पेक्ट्रम जद कहा जाएगा यह फिलोसॉफिकल स्पेक्ट्रम तो केशव सेन स्पेक्ट्रम के इस कॉर्नर में है आप वो दूसरी कॉर्नर पे तो ये है कि बस सिर्फ कल्चरल डिफरेंस नहीं है फिलोसॉफिकल डिफरेंस भी इन दोनों में बहुत बड़ा है पूरा जगत भर का दोनों के बीच में डिफरेंस है और इसी डिफरेंस मास्टर महाशय धीरे-धीरे यह सब समझ रहे पहली बार जब ठाकुर के पास में आए तो विदेशी भाव में आकर के वो बोलना शुरू कर दिया कि उनकी बीवी तो अज्ञानी है अज्ञानी क्यों है क्योंकि पढ़ाई लिखाई नहीं की है और ुद बड़े ज्ञानी है क्योंकि एमए पास करके आए हैं तो ये सब उलट पुलट उनके मन में जो सब भरा हुआ था तो ठाकुर ने गाली दे कर के डाट करके अच्छे से वो सब तुम पहली मुलाकात में बगा दिया था किंतु फिर जब आप वर खाली करते हैं तो ऐसा तो नहीं है कि जो नया सामान जो है वो फटाफट करके आना शुरू हो जाएगा तो आप जाएंगे दुकान में जाकर के परचेस करेंगे पैसा देंगे वो गाड़ी में लेकर के ले आएंगे समय लगेगा नया फर्नीचर लाने के लिए और वैसे जो पुराना जो सब था कचरा वह तो निकल गया किंतु यह भारतीय वेदांत भारतीय शास्त्र भारतीय परंपरा भारतीय आध्यात्मिकता क्या है वो मास्टर महाशय धीरे-धीरे करके समझ रहे हैं और यह जो अंडरस्टैंडिंग होता है यह अंडरस्टैंडिंग आजकल का यह जो न्यायशास्त्र या लॉजिक वगैरह की दृष्टि से किसी भी चीज को समझना है तो कंपेयर और कंट्रास्ट करना है मुझे यह चीज समझनी है जैसे कि मुझे मान लीजिए पार्टिकुलर थिरी समझनी है वो वो थिरी यदि समझते समझने अच्छा क्या होगा कि इसके अपोजिट वाली थिरी में उसके साथ में कंपेयर करके देखो यदि मुझे वेदांत समझना है तो मान लीजिए कि मैं चलिए कि भक्ति शास्त्र के साथ में इसको कंपेयर करके देखता है या तो फिर बुद्धिज्म के साथ में वो बेटर कंपैरिजन रहेगा कि बुद्धिज्म में और वेदांत में क्या डिफरेंस है स्वामी जी ने इस तरह से कंपेयर कंट्रास्ट बहुत किया है बार-बार स्वामी जी बुद्धिज्म को ले आते हैं क्योंकि ये बुद्धिज्म और वेदांत में जैसे मेजर डिफरेंस नहीं है कर्म कर्म का सिद्धांत जो है पुनर्जन्म का सिद्धांत जो है वो दोनों स्वीकार करते हैं वो ईश्वर साकार जो ईश्वर है उससे ऊपर जाना है यह भी स्वीकार करते हैं किंतु बुद्धिज्म जब आखिरी घड़ी तक पहुंच जाता है निर्माण प्राप्त हो जाता है तब वो कहते हैं हम लोग शून्य में विलीन हो जाते हैं हमारा जो आत्म ज्ञान जो है मैं मेरा जो मैंने जो अज्ञान जो है मैं अपने को मैं मानता हूं मेरा एक नाम है मेरा एक एक पूरा एक हिस्ट्री है मैं यहां पर मेरा जन्म हुआ था मैंने ये ये पढ़ाई की ये जो मैं अपने को मैं मानता हूं छोटा में एगोस्टिक आई एगोइस्ट सेल्फ और एगोइस्ट सेल्फ डिसोल्व तो हो जाता है किंतु उसके बाद में क्या तो फिर उसके बाद का उत्तर बुद्धिज्म के पास नहीं है या तो फिर भगवान बुद्ध ने उसका वर्णन नहीं किया किंतु वहां से वेदांत स्टार्ट होता है कहता है कि ये जो छोटा में या तो ये एगोस्टिक आई ये जब विलीन हो जाता है तो वो ब्रह्मण में विलीन हो जाता है और ब्रह्मण का स्वरूप है सत् चित आनंद तो ये एक ही स्टेप का डिफरेंस है बाकी बहुत कुछ सिमिलर है तो इसीलिए वो शंकराचार्य को काफी लोग प्रच्छन्न बौद्ध कहते थे हालांकि ये फिलोसॉफिकल डिस्कशन बड़ उने डिटेल में चला जाएगा क्यों कहते थे वगैरह किंतु ये एक है कि बुद्धिज्म वेदांत में क्रिटिकल डिफरेंस है किंतु ऊपर ऊपर से आपको एक जैसा लगेगा तो यदि वेदांत को ठीक समझना है तो स्वामी जी जिस तरह से बार-बार बुद्धिज्म का एग्जांपल देते हैं कंपेयर करके और कंट्रास्ट करके तो यहां पर भी मास्टर महाशय कॉन्शियसली सबकॉन्शियसली ठाकुर को समझने के लिए ठाकुर को केशव के साथ में कंपेयर और कंट्रास्ट कर रहे है कि केशव जद आज का ख्यात नाम धार्मिक नेता है आध्यात्मिक अध्यात्मिक तो नहीं कहेंगे कि वो धार्मिक रिफॉर्म लीडर है रिफॉर्म करने वाला तो उसकी कंपेयर में ठाकुर कहां पर व दिखते हैं किस लेवल पर ठाकुर दिखते हैं कंपेयर करके कंट्रास्ट करके तो इसीलिए वो केशव सन स्तर मास्टर महाशय इतना सारा विवरण हमको दिया कि ठाकुर और केशव में क्या डिफरेंस है केशव है कि वैसे तो निराकार पूजा करता निराकार में विश्वास करता है किंतु साथ-साथ में संसार भी करता है तो निराकार में विश्वास करके प्रवचन तो पूरा दुनिया भरता देगा किंतु साथ-साथ में संसार करता है और यहां पर ठाकुर है वैसे प्रवचन प्रवचन करते नहीं है हालांकि ठाकुर भी बड़े प्रैक्टिकल है हमको लगेगा कि ठाकुर कहते हैं प्रवचन नहीं करना किंतु सबके घर जाकर के पूरा दो तीन घंटे का वो लेक्चर देके आते हैं तो वो क्या है मैंने कहेंगे कि ठाकुर तो ईश्वर से चालित होकर के जाते हैं वो अपने खुद तो यह सब भाव लेकर नहीं जाते कि हां मैं जाकर के प्रवचन दूंगा वो तो इस भाव को लेकर के जाते हैं इस एटीट्यूड से जाते हैं कि मुझे दूसरे साधक के साथ में मुलाकात करनी है उसके साथ में ईश्वरीय वार्तालाप करना है किंतु इस भाव के साथ में जाते तो है किंतु यह पूरा चैप्टर जो च उसमें देखेंगे कि केशव मुश्किल से एक दो सेंडल्स बोलते हैं बाकी जो 10 15 पेजेस के जो पूरा चैप्टर है ठाकुर ही बोलते रहते हैं और बीच-बीच में मास्टर महाशय का थोड़ा सा विवरण आता है तो वैसे ठाकुर कहते तो है प्रवचन नहीं देना है किंतु इन प्रैक्टिस वो प्रवचन ही देकर के आते हैं किंतु खैर एटीट्यूड पूरा आसमान जमीन का डिफरेंस है बाहर बाहर से सेम सेम लगता है तो जो भी है तो यह कंपेयरिंग कंट्रास्ट हो गया ठाकुर का है कि वो साका वादी निराकार वादी अवाद जितने भी वाद है सबको खा गए सब में सिद्धि प्राप्त कर दी है और साथ साथ में ही आध्यात्मिक जीवन का सबसे क्रिटिकल पॉइंट है व है ब्रह्मचर्य और ब्रह्मचर्य में भी वो दृढ़ प्रतिष्ठित है तो यह केशव और ठाकुर का कंपेयर एंड कंट्रास्ट हो गया इसके बाद में जो होता है उसके बाद में हम कल देखेंगे एक बारिश स्वास्थ्य को सही रखना है क्योंकि बीमारी का यह सीजन है थोड़ा सा गरम चाय कॉफी पीते रहना है मैं जब राजकोट में था तो मेरा एक स्पेशल वो एक हर्बल टी बनाता था अभी यहां पर तो सब जुगाड़ करना पड़ेगा उ को बनाने के लिए किंतु जब तक वो मैं पीता था तब तक कोई प्रॉब्लम नहीं होता था बारिश के सीजन में हबन टी के भीतर में अदरक डालना है तुलसी डालनी है फिर फुदीना का पत्ता डालना है थोड़ा सा ये ब्लैक पेपर जिसको कहते हैं ना मरी वो डालना है संचर लिंबू और ये लेमन ग्रास इतना डाल कर के वो फिर वो जो ये एक वो आता है ना लिकर हां ब्लैक पेपर उसके बाद में ये लेमन ग्रास लेमन ग्रास लेमन ग्रास और फिर वो जो लिकर टी का वो पत्ती आता है ना वो उसका लिपटन का आता है लिपटन का अच्छा आता है लेमन निकर डी का इतना सब कुछ डालना है गर्म पानी के भीतर में पानी पहले ही गर्म करके बाद में यह सब कुछ डाल देना है पा मिनट रहने दे है फिर छाक करके उसको पीना है इतना बढ़िया लगेगा व मैं बारिश के सीजन में मैं पीता था वो ठाकुर की कृपा से कभी सर्दी नहीं हुई उस समय राजकोट में व वहां पर वॉलेटर आते थे पुराने वॉलेटर मंसूब साहिब उनका नाम पब्लिकेशन में बहुत सालो उन्होंने काम किया प्रिंसिपल रिटायर्ड प्रिंसिपल तो उनका ये फार्मूला है वो सब समय बना कर के पीते थे और हम सबको बना कर के पिलाते थे अनफॉर्चूनेटली कोरोना में उनका देहांत हो गया क्या करेंगे किंतु वहां पर वहां पर डिफरेंस देखिए कि अरूपानंद जी ने जो मां को पूछा कि ठाकुर को आप किस दृष्टि से देखते हैं तो माने कहा कि वह पूर्ण ब्रह्म सनातन मेरे लिए मेरे पूर्ण ब्रह्म सनातन तो अरूपानंद जी ने सामने पूछा कि पत्नी के लिए तो अपना पति ईश्वर के समान ही दिखेगा उस तरह से नहीं पूछ रहा हो वैसे ठाकुर को आप क्या मानती है तो ना तो माने कहा पति रूप से भी और वैसे भी तो जसे अरूपानंद जी का एमनी स्वामी मने पति के रू में तो पूर्ण ब्रह्म सनातन है मेरे नहीं क्योंकि मां को पता था कि अरूपानंद जी चालाकी कर रहे चालाकी किस तरह से एक बार जद मा स्वीकार कर ले की ठाकुर पूर्ण ब्रह्म सनातन है तो मां तो भगवती हो जाएगी जोक व अपने मु से स्वीकार नहीं करना चाहती थी तो चाला की कर अचानक करके मां से स्वीकार करवाना चाहते है इसीलिए मां समझ गई मां भी तो प्रैक्टिकल है ना ठाकुर जैसे प्रैक्टिकल दे लक्ष्मी को वैसे तो गंगा में डाल दिया फिर हृदय में आक रहना तो वैसे ही प्रैक्टिकल मां भी [हंसी] है मा को मां को कहते हैं कि मैं तुमको आप नहीं बोल पाया तुमको तुम ही बोलूंगा तो मां कहती है कि यह बड़ा अपना अपनी भाव य अपना अपना अपना भाव हैली हां मैंने जितना भी मैंने ये बंगाली स्मृति कथा तो मैं पढ़ कर के तो बड़ा हुआ हूं ना तो मतलब बड़ा हुआ ऑर्डर में आके जॉइन करने के बाद पहले तो नहीं आता था बंगाली तो सब समय मां को तुम ही बोलते हैं भक्त लोग जितने भी आता है फ मैं जब गुजरात में मेरा पोस्टिंग हुआ पब्लिकेशन में तो देख रहा सब जगह पे मां को प प करके बुलाते हैं तो पढ़ना वैसा विचित्र लगता है मैंने कहा अरे आप आप हटाओ सबको तुम कर दो तो सब लोग बड़ा ऑब्जेक्शन लेने लगे अरे मा को तुम करके बुलाओगे क्या पागल हो गए हो क्या मां तो भगवती स्वयं आध्या शक्ति जगदंबा मैंने कहा अरे वो सब ठीक है किंतु वो तो अपनी मां भी है आद्या शक्ति जगदंबा भी है अपनी मां भी है और यदि तुम करके नहीं बुलाओगे तो वो रिलेशन नहीं बनेगा किंतु अभी सब लोगों ने इतना विरोध किया इसलिए फिर मैं भी कुछ बोला नहीं अभी भी गुजराती किताबों में स्मृति कथा होगी मां का जीवन होगा तो सब जगह पर मां को आप करके बुलाता है किंतु इससे ना असली भाव नहीं आता कि वो जो सही सही किंतु यहां पर साथ में ही देखिए कि मां है बहुत ज्यादा वो क्लोज भी पसंद नहीं करती देखिए मातृभासा साधक है एक मां कहीं पर मां जब जयराम बाटी थी जयराम पाटी से कलकाता आई तो एक अभी इस तरह से त्यागी ब्रह्मचारी सन्यासी जाकर के मां को बोलने लगा कि मां आपसे इतने दिनों तक आपका दर्शन नहीं हुआ था बड़ा बेचैन रहता था बड़ा मन में यह था मतलब दुख था वगैरह वगैरह तो मां बड़ी नाराज हो गई मां ने कहा कि अरे ये सब समय तुम मेरे साथ में रहोगे यहां पे तो मैं लड़कियों को लेकर के रहती हूं ये राधू है मापू है वो पागली मामी है सब लोग है गोलाप मां है योगेन मां है तुम लड़के लोग बार-बार मेरे पास में आओगे मां तो फर्स्ट फ्लोर पे रहती थी ना उद्बोधन में और लड़के लोग ग्राउंड फ्लोर पे रहते थे तो यहां पे बार-बार फर्स्ट फ्लोर पे आना मेरे साथ में बात करना ये तुमको शर्म नहीं आती क्या लज्जा नहीं आती कि यहां पे इतनी सारी औरतें हैं ऐसा करके मां इस तरह से भी डांट देती थी थी माने मां का ये जो प्रैक्टिकल सेल्स भी कितना श्रेय है सब तरह से देखिए कि इन लोगों का कि भाव और भक्ति के वैसे तो राजा है किंतु साथ-साथ में ही यह जगत में कैसे रहना है इस बात का इनको बड़ा पक्का नॉलेज है वह क्लासिकल एग्जांपल मैं सब समय देता रहता हूं मास्टर महाशय अपना छाता पंचवटी में भूल के आ गए तो ठाकुर ने क्या कहा मैं जब भाव में आ जाता हूं तो मेरी धोती का भी मेरा ठिकाना नहीं रहता किंतु फिर भी मैं छाता भूल के नहीं आऊंगा इन दोनों और से य भी परफेक्ट है गिरीश घोष एक बार कहता है ठाकुर के साथ में वो कथा ऐसा वो जो ये करता है ना हंसी मजाक करते हैं तो गिरीश घोष कहता है कि ठाकुर को कहता है कि मैं हसी मजाक में भी आपसे हार गया य सब चीजों में आध्यात्मिक जगत वगैरा तो दूर की बात है हसी मजाक में भी मैं आपसे हार गया मैंने दोनों और से एक्चुअली ज्ञानी का क्या अर्थ है कि जो कि संसार को असार समझ कर के संपूर्ण रूप से उसका त्याग कर दिया है वह है ज्ञान और भक्त का क्या अर्थ है भक्त सोचता है कि मैंने ईश्वर पर संपूर्ण शरणागति करके अपने अहम को ईश्वर को समर्पित कर दिया है वैसे यह दोनों लगता तो एक ही है कि एक में मैंने अपने अहं को संपूर्ण रूप से खत्म कर दिया है डिस्ट्रॉय कर दिया है ज्ञान में और भक्ति में अपने अहं को ईश्वर को समर्पित कर दिया है सुन कर के सेम लगता है किंतु एक्चुअली सेम नहीं ज्ञानी का अपना जो घमंड कहो ना कि अहम कहो संपूर्ण रूप से दध बीज हो गया है जबकि भक्त का जो अहम कहो ना कि इगो इजम कहो वो है ईश्वर के कार्य के लिए लगाया तो ये एक बहुत बड़ा डिफरेंस है तो ज्ञानी जनी ठाकुर भीतर से ज्ञानी है अर्थात की उनका अहम संपूर्ण रूप से चला गया है कुछ भी बचा नहीं संपूर्ण रूप से उन्होंने वो विलीन हो चुके हैं ब्रह्मण के भीतर में किंतु बाहर से भक्त का आवरण लेकर के रहते हैं ठाकुर कहते हैं ना ये जो आपने कहा कि बाहर से ज्ञानी भीतर से भक्त या भीतर से भक्त बाहर से ज्ञानी ऐसा ही वो एगजैक्टली इसी तरह का स्टेटमेंट ठाकुर का है कि मैं चीनी खाना चाहता हूं चीनी होना नहीं चाहता तो ये है डिफरेंस कि भक्त है अर्थात कि चीनी एक डिफरेंस है चीनी खाते हैं ज्ञानी है चीनी हो गए तो ज्ञानी भीतर से ट मीस के भीतर में से अहम संपूर्ण रूप से चला गया है किंतु बाहर से जैसे शंकराचार्य की शुकदेव की तरह विद्या या भक्ति का अहम रखा है जगत में जगत में जगत का कल्याण करने जबकि स्वामी जी का उल्टा है भीतर से भक्त है थट मीस की अहम है थोड़ा सा ईश्वर के कार्य के लिए लगाया किंतु बाहर से ज्ञानी है अर्थात की वेदांत का प्रचार कर देखिए असली किताबें है ना अपने और डर की तीन किताबें है एक तो मां का जीवनी गंभीरानंद जी द्वारा रचित दूसरा है स्वामी जी का जीवन गंभीरानंद जी द्वारा रचित युग नायक स्वामी जीहा गंभीरानंद जी द्वारा रचित स्वामी जी का युग नायक युग नायक विवेकानंद और तीसरी किताब है ठाकुर की श्री श्री राम कृष्ण लीला प्रसन्न स्वामी शारदानंद जी द्वारा रचित ये तीन किताबों को जद थोड़ स्टडी करें तब कहीं जाकर के हमारे भीतर में यह जाना शुरू होगा कि ठाकुर मा स्वामी जी का महात्म क्या उनका अर्थ क्या है तात्पर्य क्या है उसमें से एक किताब हमने शुरू की है लीला प्रसंग में करना चाहता हूं किंतु उसके पहले थोड़ा सा कथामृत का एक व्यवस्थित थोड़ा सा स्टडी हो जाए ऐसा जाता और युग नाय में जाना चाहता हूं किंतु इससे पहले चारों योगों के अभी जैसे ज्ञान योग के हमने दो क्रिटिकल लेक्चर ले लिए माइक्रो कजम मैक्रो कजम तो वैसे ही यह राजयोग के तीन क्रिटिकल लेक्चर ले लेंगे प्राण जो कॉस्मिक प्राण वगैरह और फिर भक्ति के एक दो ले लेंगे और कर्मयोग के एक दो ले लेंगे इतना करने के बाद कहीं जाकर के हम और फिर लेक्चर फ्रॉम कोलम टू अल्मोड़ा का एक ले लेंगे और एक दो लेटर ले फिर कहीं जाकर के युग नायक में जाएंगे यदि तब तक हम जिंदा रहेंगे तो किंतु जब तक हम वो युग नायक में लीला प्रसंग में नहीं जाएंगे तब तक अभी अभी हम ऊपर से ही रह रहे हैं ये तीनों जो बायोग्राफी है अद्भुत है इतना डिटेल में उसका जो फिलोसोफी कल वर्णन किया गया है सही में वो पढ़ कर के हमको बहुत ही भीतर में से सुकून भी मिलेगा आत्म वो ठीक है देखिए जितने भी ग्रंथ है ठकुर मा स्वामी जी के जितने भी अपने ऑर्डर में 200 से ज्यादा बेसिक किताबें है जितनी भी आप किताबें पढ़िए यह सब किताबें जो तीन किताबें जो मैंने कही अभी उसमें प्रवेश करने के प्रवेश दवार जब तक ये तीन किताबों का प्रॉपर स्टडी नहीं होगा तब तक हम ठाकुर महा स्वामी जी के जीवन में भीर रूप से हमने ये लपकी नहीं लगाई तब तक हम ऊपर ऊपर से ही रहे