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Sri Ramakrishna Kathamrita ·

श्रीरामकृष्ण कथामृत || 9 Dec 1883 - श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ दक्षिणेश्वर में || 3 Mar 2025

प्रार्थना

ओम स्थापक य च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपे अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः श्री राम कृष्ण

Retreat with Sri Ramakrishna: गुरु शिष्य संवाद

कथामृत इस सप्ताह पाठ करेंगे और जो चैप्टर हम पाठ कर रहे हैं उसका टाइटल है दक्षिणेश्वर में श्री राम कृष्ण भक्तो सोंगे एवं ठन ठने सिद्धेश्वरी मंदिरे गमन दक्षिणेश्वर में भगवान श्री रामकृष्ण भक्तों के साथ में और ठन ठन में सिद्धेश्वरी देवी के मंदिर में ठाकुर गमन करते हैं प्रणाम करने के लिए दर्शन करने के लिए जाते हैं और डेट है नाथ दिसंबर 1883 अभी यह चैप्टर और इसके बाद के जो कुछ चैप्टर है हमने सिलेक्ट इसलिए किए हैं क्योंकि हमको पता है कि इसी 1883 की जो क्रिसमस की छुट्टियां थी इसी छुट्टियों के दरमियान मास्टर महाशय दक्षिणेश्वर में रहने के लिए जाते हैं कुछ समय के लिए और जिस तरह से होता है कि ठाकुर ने ज्यादातर जो उपदेश हम देखते हैं कथामृत में एटलीस्ट जो नॉटेड डाउन किए गए हैं उसमें से देखते हैं कि जो कुछ-कुछ गेस्ट डिवोटा आते हैं उन्हीं के साथ में ठाकुर ज्यादातर वार्तालाप करते हैं और या तो फिर कोई यूनिक पर्सन होगा यूनिक पर्सनालिटी होगी जैसे विद्यासागर है या फिर तो अपने यह है केशव सेन है वगैरह और कोई ना कोई किसी डिवोटा के वहां पर गए तो कोई एक डिवटी उनको प्रश्न कर रहा है कोई ब्रह्म भक्त प्रश्न कर रहा है किंतु अपने जो नियमित अंतरंग भक्त है उनके साथ में ठाकुर ने सस्टेंड रूप से लंबे समय तक जो कोई वार्तालाप किया हो उस तरह का ऐसा कोई खास चित्रण इस तरह का कोई खास हमको अ प्रसंग कथामृत में नहीं दिखता है तो उसमें से जो कुछ कुछ एक्सेप्शन है वह एक्सेप्शन है यह मास्टर महाशय के साथ में यह जो कुछ दिनों तक ठाकुर का वार्तालाप आश्चर्य की बात है कि अ जैसे कि कोई भी डायरेक्ट डिसाइल है ठाकुर का अभी नरेण है या तो फिर राजा महाराज है या तो फिर निरंजन महाराज है या तो फिर बाबूराम महाराज है यह लोग जब ठाकुर के पास में आए तो प्रथम दर्शन तो उन्होंने अपने ही जो द्वारा जो व्यक्त किया है बाबूराम महाराज कहेंगे कि हां ठाकुर के साथ में पहली पहली बार जब जा रहा था तो ऐसा हुआ नरेण अर्थात कि भविष्य के स्वामी विवेकानंद उनका जो ठाकुर में ठाकुर के साथ में जो वार्तालाप हुआ था उसका लि वर्णन नरेद खुद करता है या तो फिर राजा महाराज उ उनका जो ठाकुर के साथ में जो वार्तालाप है उसका वर्णन राजा म स्वयं करते हैं रेयरली ऐसा कहीं देखने को मिलता है कि कथामृत में यह सब प्रसंगों का वर्णन हो कि अपने किसी त्यागी संतानों के साथ में ठाकुर का वार्तालाप है नहीं है ऐसा नहीं है नरेद्र के साथ में बहुत सारे प्रसंग है जैसे प्रथम द्वितीय तृतीय दर्शन के दौरान ही हमको नरेण वहां पर देखने को मिलता है व कथामृत में ही किंतु फिर भी जो एक सस्टेन लेवल पर होना चाहिए कि अपने डायरेक्ट डिसाइल को अंतरंग डिसाइल को ठाकुर किस तरह से उपदेश देते हैं तो वह कथामृत में ज्यादा नहीं मिलता है उसका रीजन यह हो सकता है जैसे कि मेरा अनुमान है कि गुरु शिष्य जो संबंध है वह बड़ा ही प्राइवेट है उसको सबके सामने किसी के सामने अभी जैसे कि मैं ठाकुर के पास में जाता हूं तो मेरे जीवन में जो इंडिविजुअल लेवल पर प्रगति करने के लिए आध्यात्मिक जीवन में मुझे क्या चाहिए वह जो ठाकुर मुझे बताते हैं दैट विल बी माय कस्टमाइज्ड इंस्ट्रक्शंस माय इंडिविजुअल इंस्ट्रक्शंस वह इंस्ट्रक्शन हो सकता है कि जनरल पब्लिक के लिए ना हो तो कथामृत में ज्यादातर प्रसंग उसी तरह के हैं जो कि जनरल पब्लिक को अप्लाई होते हैं जो वन टू वन गुरु शिष्य जो परंपरागत जो टीचिंग दिया जाता है जो आध्यात्मिकता का आध्यात्मिक जीवन गठन करने के लिए जो उपदेश दिए जाते हैं जो इंस्ट्रक्शन दी जाती है मैनुअल हम कहेंगे स्पिरिचुअल मैनुअल फॉर डे टू डे लाइफ कस्टमाइज फॉर इंडिविजुअल एस्पायरेंट्स या तो इंडिविजुअल डिवोटा या तो इंडिविजुअल साधक वो कथामृत में नहीं है तो यह कथामृत में क्या मिलेगा कि जो कथामृत के लेखक की खुद की जो ठाकुर के साथ में जो वार्तालाप हुआ है वही हमको देखने को मिलेगा वन टू वन इंडिविजुअल लेवल पे और उसमें भी जो गुड वार्तालाप है या तो फिर जो गुड दिशा निर्देश डीपर सीक्रेट जो इंस्ट्रक्शंस ठाकुर ने मास्टर महाशय को दी होगी वह तो इवन यहां पे भी नहीं मिलेगी तो जो भी है हमारे पास में जो है उसके साथ में हमको कंसोल करना है उसके साथ से हमको संतोष मानना है अभी अपने ऑर्डर में मैं जब राजकोट में था तो एक स्पेशल इशू एवरी ईयर हम लोग पब्लिश करते हैं तो जो लास्ट स्पेशल इशू जो मैंने प्लान किया था जो कि मैं नहीं फुलफिल कर पाया क्योंकि मेरी ट्रांसफर होगी बाय द टाइम किंतु जो मैंने प्लान किया था वह ऐसा था कि रिट्रीट्स विच श्री रामकृष्णा ऐसा मैंने टाइटल देना चाहा था और मैंने देखा कि ऐसे कौन-कौन से समय है देखिए कि स्वामी जी हो ना कि ठाकुर हो पब्लिक में जो कहते हैं व एक चीज हो गया एक जनरलाइज्ड इ इंस्ट्रक्शन हो गया किंतु जो गुरु शिष्य जो अपनी जो परंपराएं हैं उसके अनुसार शिष्य गुरु के पास जाता है गुरु के पास में से आध्यात्मिक मार्गदर्शन मांगता है और फिर गुरु जो उनको सिखाता है वो यूनिक इंस्ट्रक्शन का एक अलग ही महत्व है तो जैसे कि रिट्रीट कि आप स्वामी जी के साथ में ना कि ठाकुर के साथ में कहीं पर अकेले रह रहे हैं और कुछ समय तक यानी कि एक बार गए वार्तालाप हो गया फिर वापस आ गए इस तरह से नहीं कुछ लंबे समय तक सप्ताह दो सप्ताह 10 दिन 15 दिन समथिंग लाइक दैट आप ठाकुर या स्वामी जी के साथ में रहते हैं और फिर उनके पास में से यह आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्राप्त करते हैं और साथ-साथ में ही उनकी नजरों के नीचे उनके अ उनके सुपरविजन के नीचे में हम लोग उसका प्रैक्टिस भी करते हैं यानी जो प्रॉपर रिट्रीट होना चाहिए अभी आप देखेंगे कि इस तरह की रिट्रीट्स बहुत सारी जगह पे होती है आजकल कुछ-कुछ रिट्रीट्स बड़ी महंगी भी होती है ऐसा मैंने सुना है -1 लाख रप देकर के भी इस तरह की रिट्रीट में जो कि फेमस जो लोग इस तरह के स्पिरिचुअल टीचर्स हैं उनकी रिट्रीट्स में जाने के लिए लोग लाख-लाख रुपया तक दे देते हैं यहां तक मैंने सुना है आई डू नॉट नो कि उसमें सच कितना है नहीं है किंतु इवन रामकृष्ण मिशन की भी आजकल जैसे कि हमको पता है कि अद्वैत आश्रम में मायावती में एनुअली एक बार रिट्रीट होती है तो उसमें भी कितने डिवटी जाते हैं क्यों क्योंकि रिट्रीट का महत्व क्या है कि एक सस्टेन लेवल पे आपको अपने टीचर के साथ में वार्तालाप करने का मौका मिलता है एक पूरा होली एटमॉस्फियर खड़ा होता है जहां पे कि कि आप अपने जीवन के दिन प्रतिदिन की यह जो समस्याएं हैं वह भूल जाते हैं फॉर दैट पीरियड ऑफ टाइम एक सप्ताह दो सप्ताह जितना भी समय रिट्रीट चला हो और आप वहां पर सिर्फ उपदेश ही ग्रहण नहीं करते किंतु साथ-साथ में साधना भी करने का प्रयास करते हैं एक सबसे पहले रिट्रीट का बेनिफिट क्या है एक तो गुरु के साथ में हमको समय मिलता है वार्तालाप करने का गुरु हमको इंडिविजुअल इंस्ट्रक्शन दे सकते हैं यह एक बेनिफिट है सेकंड कि गुरु के मार्गदर्शन हेठ हम साधना कर सकते हैं वी कैन प्रैक्टिस व्हाट द गुरु इज टीचिंग सो वो दूसरा एक बेनिफिट है तीसरा है कि होली कंपनी सिर्फ गुरु ही नहीं जो कुछ चुनिंदा लोग उस रिट्रीट में आए हैं वह सभी तो एक तरह से सिलेक्टेड एक होते हैं एस्पायरेंट्स साधक तो उनके साथ में वार्तालाप करने का एक दूसरा ही आनंद है और चौथा है कि एक होली एटमॉस्फियर वहां पर खड़ा होता है तो क्या चार मेजर बेनिफिट हम कहेंगे कि किसी भी रिट्रीट के होने चाहिए एक तो कंपट गुरु होना चाहिए जिसके साथ में हम इंडिविजुअल लेवल पर वार्तालाप कर सके सेकंड है कि वहां पर हम गुरु के मार्गदर्शन के नीचे में साधना कर सके तीसरा है कि होली कंपनी मिले चौथा है कि होली एटमॉस्फियर मिले तो यह चार क्राइटेरिया यदि आप रिट्रीट के रखते हैं तो देखिए कि अपने ऑर्डर में इस तरह की रिट्रीट कितनी बार हुई है हम ठाकुर और स्वामी जी के साथ में बात करें तो ठाकुर के साथ में यह मास्टर महाशय की यह एक रिट्रीट थी कि यह कुछ दिन वह मास्टर ठाकुर के साथ में रहते हैं और चारों क्राइटेरिया फुलफिल होते हैं ठाकुर के जैसा कंपट हैंट टीचर और कोई मिलना मुश्किल है मुश्किल क्या असंभव है आज के युग में पहले के युग में यदि जन्म लिया होता तो सुदामा की तरह सांदीपनी ऋषि के आश्रम में सखा कृष्णा का व प्राप्त हुआ होता हमको बंधुत्व किंतु वो जो अपना गुड फॉर्च्यून नहीं है तो इस युग में श्री राम कृष्ण जैसे टीचर है हमारे तो एक कंपट गुरु है दूसरा है कि मास्टर महाशय खुद वहां पर रह कर के साधना करते हैं तीसरा है होली कंपनी कोई प्रश्न ही नहीं है कि उस समय ठाकुर के पास में जितने भी लोग आते थे बड़े ही उच्च कक्षा के आध्यात्मिक साधक थे और चौथा है होली एटमॉस्फियर तो वो जहां पर ये महाशय रह रहे थे पहले तो कुछ दिन नबत में रहे जहां पर मां शारदा देवी स्वयं रहती थी और फिर कुछ दिन वहां पर पंचवटी में वह नीचे में कुटिया है वहां पर रहे जहां पर कि ठाकुर ने खुद ने तपस्या की थी तो इससे बड़ा होली एटमॉस्फियर और क्या हो सकता है सो दिस इज अ परफेक्ट क्राइटेरिया फॉर रिट्रीट इसके बाद में देखें कि ठाकुर के जीवन में तो अभी काशीपुर इसको आप एक रिट्रीट के रूप में ले सकते हैं क्राइटेरिया सभी फुलफिल करता है कि सभी अंतरंग भक्त ठाकुर के पास में आन मिले थे ठाकुर ने अपने जीवन की जो आखिरी इंस्ट्रक्शन देनी थी वह देना शुरू कर दिया था वहीं पर सभी लोगों ने साधना भी शुरू कर दी थी और वहां पर जो होली कंपनी होली एटमॉस्फियर था वह तो बेजोड़ था इट वाज परफेक्ट तो उसमें कोई प्रश्न नहीं है इसके बाद में देखिए कि थाउजेंड आइलैंड पार्क में स्वामी जी अपने कुछ चुनिंदा शिष्यों को लेकर के गए थे तो अभी देखिए कि उन दिनों का बड़ा ही सुंदर वर्णन हमारे पास में सारा एलन ल्डो बोलक के स्वामी जी की जो डिसाइल थी उसने वह इंस्पायर्ड टॉक बोलकर के किताब पब्लिश की है उसमें हमको बड़ा सुंदर रूप से वह वर्णन मिल जाता है उसके बाद में यदि एक रिट्रीट देखें तो वह हमको मिलता है रिजली मैनर में स्वामी जी जब सेकंड टाइम अमेरिका जाते हैं तो वह रिजली मैनर जाते हैं क्यों क्योंकि व उनका स्वास्थ्य उस समय इतना अच्छा नहीं था और मतलब ऐसा कोई यह भी नहीं था स्वामी जी तो प्लान करके कुछ करते नहीं थे तो अमेरिका जाएंगे तो फिर अमेरिका में कहां पर उपदेश देंगे प्रवचन देंगे क्या करेंगे वह तो सब कुछ अनिश्चित था सब जैसे कि ठाकुर के ऊपर में छोड़ कर के स्वामी जी अमेरिका आए थे और सेकंड विजिट के पीछे में यह भी तो दो-तीन जो कारण थे कि निवेदिता आई थी इसके लिए क्योंकि वह स्कूल चलाने के लिए फंड थोड़ा सा डोनेशन कलेक्ट करना चाहती थी तुर्या अंद जी आए थे इसलिए क्योंकि स्वामी जी चाहते थे कि वह व जद स्वामी जी स्वयं वापस आ जाए स्वामी विवेकानंद जब भारत वापस आ जाए तो स्वामी तुर्या जी महाराज वहां पर रह कर के वेदांत का प्रोपेगेशन आगे बढ़ाते रहे तो वह एक था जिससे वह स्वामी जी के साथ में तुर आनंद जी आए थे जिससे कि क्या हो कि उनको फैमिलियरिटी हो जाए वेस्टर्न डिसाइल्स वेस्टर्न जो मित्र मंडल है स्वामी जी का उन के साथ में और तीसरा जो था कि स्वामी जी की खुद की सेहत स्वामी विवेकानंद का जो हेल्थ है वो धीरे-धीरे करके डिटेरिटोरियलाइजेशन तो उस समय जैसे ही अमेरिका में पैर रखा सेकंड टाइम 18990 लगेट और बेटी लगेट की सिस्टर जोसेफाइन मैक्लाउड यह तीनों स्वामी जी को रिजली मैनर ले गए और इस पीरियड को जोसेफाइन मैक्लाउड नाम देती है द ग्रेट समर भव्य ग्रीष्मा ज जिस समय स्वामी जी वहां पर रह कर के अपने कुछ चुनिंदा डिसाइल्स के साथ में बेटी लगेट ने उसी लोगों को इकट्ठा किया था जो लोग स्वामी जी के साथ में जिनके साथ में स्वामी जी को कोई स्ट्रेस ना हो उनके साथ में वार्तालाप करके जो कि स्वामी जी के बड़े ही घनिष्ठ हो स्वामी जी के प्रति बड़े ही निष्ठावान हो तो ऐसे कुछ शिष्यों को इकट्ठा किया था वहां पर तो स्वामी जी ने वहां पर जो वार्तालाप किया इसका बड़ा ही सुंदर वर्णन हमको न्यू डिस्कवरीज फिफ्थ वॉल्यूम में मिलता है चैप्टर का नाम है द ग्रेट समर इसके बाद का जो रिट ट है फिफ्थ रिट्रीट जहां तक मैं समझता हूं मेरा कैलकुलेशन जाता है यह फिफ्थ रिट्रीट है कि स्वामी जी जब अभी देखिए कि सेकंड टाइम स्वामी जी अभी वहां पर रिजली मैनर में थे ड्यूरिंग दिस ग्रेट समर उस समय एकाएक समाचार आया कि जोसेफाइन मैक्लाउड का भाई कैलिफोर्निया में है बीमार है तो अभी तो उसको जाना ही पड़ेगा किंतु हृदय बेचारी का तो पड़ा है स्वामी जी के पास में किंतु फिर भी वह मन मक्कम करके जा रही है उस समय जब वह कैलिफोर्निया जा रही है स्वामी जी ने निवेदिता को कह दिया कि अच्छा तुम वहां पर कुछ क्लास का ऑर्गेनाइज करो तो हो सकता है मैं वहां पर आऊ तो निवेदिता कैलिफोर्निया आ करके क्लासेस का ऑर्गेनाइज क्लासेस ऑर्गेनाइज करती है स्वामी जी को बुलाती है स्वामी जी कैलिफोर्निया आते हैं और यहां से सेकंड विजिट का जो सबसे इंपॉर्टेंट कार्य है कैलिफोर्निया में वेदांत प्रचार वह कार्य यहां पर आरंभ होता है तो यह कैलिफोर्निया में कार्य प्र वेदांत प्रचार वेदा त और योग का प्रचार जब समाप्त हो गया जब जाने की बारी आई उस समय अगेन स्वामी जी का सेहत धीरे-धीरे करके डिटेरिटोरियलाइजेशन कैम ये टेंट लगाए गए एक टेंट में स्वामी जी रह रहे हैं और कुछ टेंट्स में स्वामी जी के डिसाइल रह रहे हैं उसमें यह एलिस हेंस ब्रो थी आइड अनसेल थी यह दोनों मोस्ट प्रोमिन डिसाइल थे और तीन-चार डिसाइल थे सभी लेडी डिसाइल तो वो लोग कुछ अलग-अलग टेंट्स में रह रहे थे और फिर वहां पर खाना भी खुले में पकाते थे फिर रात को धुनि जला कर के उसके आसपास में बैठ कर के ध्यान करते थे तो वो कैम टेलर के दिनों का वर्णन यह जो आइड अनसेल ने किया है और कुछ-कुछ यह एलिस हेंस ब्रो ने किया है तो अगेन इसका वर्णन हमको न्यू डिस्कवरी सिक्स्थ वॉल्यूम में मिल जाता है तो यह पांच रिट्रीट है देखिए कि अपने ऑर्डर में डिसाइल्स को गुरु के साथ में रह कर के कंपट गुरु के साथ में रह कर के उनके पास में से इंस्ट्रक्शन स्पिरिचुअल इंस्ट्रक्शंस ग्रहण करने का मौका मिला कंपट गुरु के मार्ग मार्गदर्शन के अंडर सुपरविजन में उनको साधना करने का मौका मिला एक होली कंपनी प्राप्त हुई क्योंकि रिट्रीट में जितने भी थे सभी लोग उच्च कक्षा के साधक थे और चौथा कि होली एटमॉस्फेयर मिला तो यह चार क्राइटेरिया में यह पांच रिट्रीट होती है सबसे पहली तो यह वाली जो क्रिसमस के दिनों में मास्टर महाशय ठाकुर के साथ रहते हैं फिर काशीपुर वाली कि जब ठाकुर ने अपने अंतरंग शिष्यों को इकट्ठा करके अपने संघ की स्थापना की तीसरी वह थाउ आइलैंड पार्क वाली चौथी यह ग्रेट समर के न यहां पे रिजली मैनर में और पांचवा कैंप टेलर कैलिफोर्निया में तो मैं जब वहां पर राजकोट में था तो मैंने एक इशू इस तरह से प्लान किया था स्पेशल इशू कि जितनी भी रिट्रीट ये पांच तो बाय दैट टाइम मैंने खोज निकाली थी और भी होगी थोड़ा सा और स्टडी करना पड़ेगा किंतु यह पांच तो खोज निकाली थी मैटर इकट्ठा करना शुरू कर दिया था जितने भी रेमसंस है जितने भी रिकॉर्ड्स है उन पांच रिट्रीट्स के जितना भी कन्वर्सेशन मिलता है हमको जितने भी लेटर्स वहां से लिखे गए हैं जैसे कि स्वामी जी थाउज आइलैंड पार्क से भी लेटर लिखते हैं थाउज आइलैंड पार्क से लिखे हैं कि नहीं मुझे देखना पड़ेगा किंतु यहां से तो पक्का लिखे हैं रिजली मैनर से तो उन दिनों के दौरान उनके लेटर में उनका किस तरह का व्यक्तित्व दिन प्रतिदिन का वो प्रस्फुटित होता है वो एक देखना फिर उन दिनों के रेमसंस फिर उनके डिसाइल्स के द्वारा उनके द्वारा कहे हुए टीचिंग्स का कलेक्शन यह सब मैटर मैंने इकट्ठा करना शुरू किया था अनफॉर्चूनेटली वो इशू हुआ नहीं किंतु अभी यहां पर जो हम कथामृत में इस जो कुछ चैप्टर्स मैंने सिलेक्ट किए हैं इस चैप्टर्स के पीछे में वही है कि यह मास्टर महाशय ठाकुर के पास में स्पिरिचुअल रिट्रीट के लिए आते हैं अभी यह मैं रिट्रीट शब्द यूज कर रहा हूं किंतु देखिए कि यह शब्द मतलब जो वहां पर हुआ है उसके सामने यह शब्द बड़ा छोटा पड़ जाता है एक्चुअली यह लोग जब ठाकुर के साथ में मास्टर महाशय रहे हैं या तो फिर काशीपुर में यह डायरेक्ट डिसाइल रहे थे या तो फिर थाउज आइलैंड पार्क या तो रिजली मैनर या तो फिर यह कैंप टेलर वहां पे जो लोग रहे थे उनका जीवन संपूर्ण रूप से परिवर्तित हो गया था आध्यात्मिक जीवन में वह शुरू में कहां पे थे और आखिर में कहां तक पहुंच गए यानी कि वोह वर्ल्ड ट्रांसफॉर्मिंग इवेंट्स जिनके लिए रिट्रीट तो एक बड़ा ही छोटा सा शब्द है किंतु बिकॉज कि यह पॉपुलर वर्ड है अभी आजकल इसके लिए मैंने इस इशू का टाइटल ऐसा देना चाहा था कि स्पिरिचुअल रिट्रीट्स विद श्री रामकृष्णा स्वामी विवेकानंद व्हाट एवर तो अभी यहां पे यह

प्रथम परिच्छेद: चैतन्य देव और श्री रामकृष्ण रामकृष्ण की तीन अवस्थाए

चैप्टर का प्रारंभ हमने ऑलरेडी कर दिया है एक क्लास हमारा हो गया है प्रथम परिच्छेद में मास्टर महाशय क्या लिखते हैं ठाकुर श्री रामकृष्ण दक्षिणेश्वर काली मंदिर में भक्त संगे और यहां पर पहला जो हमने अभी तक पाठ किया उसमें ठाकुर कहते हैं कि चैतन्य देव की तीन अवस्था होती थी बाह्य दशा अर्ध बाह्य दशा अंतर दशा और फिर ठाकुर कहते हैं कि वेदांत के जो पंचकोष है इसके साथ में एकदम इसका मैचिंग हो जाता है स्थूल शरीर अर्थात कि अन्नमैया कोष सूक्ष्म शरीर अर्थात मनोमय विज्ञान मय कोष कारण शरीर अर्थात आनंदमय कोष महा काण में जब मन लीन होता है तब वह चैतन्य देव समाधि स्त होते हैं इसी का नाम है निर्विकल्प या जड़ समाधि तो यह सब कुछ जब ठाकुर कहते हैं तो मास्टर महाशय अपने मन में सोचते हैं कि देखिए कि चैतन्य देव की अवस्था का नाम देकर के क्या ठाकुर अपनी ओर इंगित कर रहे हैं अपनी ओर इशारा कर रहे हैं क्योंकि ठाकुर की भी तो यही अवस्थाएं होती थी बाह्य दशा में वह भक्तों के साथ में वो वार्तालाप करते थे और बाह्य दशा में वह मत्त होकर के भाव में मत्त होकर के नृत्य कीर्तन करते थे अंतर दशा में वह समाधि स्थ हो जाते थे तो यह तीन दशाएं तो मास्टर महाशय कहते हैं कि हमने ठाकुर में भी देखी है तो ठाकुर क्या यहां पर इशारा करके ऐसा कहना चाहते हैं कि वह भी चैतन्य देव की तरह अवतार ही है देखिए कि यह सब विचारों का जो एक सीड है वह ठाकुर अपने भक्तों के मन में एक के बाद एक रोप दे रहे हैं प्लांट कर दे रहे हैं जिससे कि ठाकुर के जीवन का अंतिम समय जब आए तब तक सभी अंतरंग भक्त समझ जाए एटलीस्ट ठाकुर ने यह बीज चारों ओर फैलाए हैं अभी दो-तीन दिन पहले मैं एक वीडियो देख रहा था एक प्लांट अ एक बोटेनिकल बोटेनिकल वीडियो था उसमें विभिन्न तरह की प्लांट्स का वर्णन था किस तरह का प्लांट है यह किस तरह का प्लांट है उसमें एक प्लांट ऐसा है कि जब वह उसका जो सिं होती है ना सिं तरह उसका यह फल होता है और जब उसका वह बीज छोड़ने का समय आता है तो उसमें वह फल में विस्फोट होता है और चारों ओर उसके जो बीज है सीड वो चारों ओर फैल जाते हैं इसका रीजन क्या है कि जितना दूर यह सीड्स फेंके यह पौधा उतना ही व्यापक इसका यह होगा वो उसका जो नए पौधे होंगे उसका उतना ही व्यापक दूर-दूर तक यह पौधा फैले क्योंकि क्या है कि ये जो सर्वाइवल का जो रूल है आखिरी जो हम लोग जो पृथ्वी के ऊपर में प्रथम ऑर्गेनिस्ट म आज से लगभग न बिलियन इयर्स अगो आई थिंक कि 100 करोड़ साल पहले ना कि 1000 करोड़ व्हाट एवर 1 बिलियन का कितना होता है तो इतने सालों पहले सर्वप्रथम लिविंग ऑर्गेनिस्ट सम प्रकट हुआ था पृथ्वी के ऊपर में पृथ्वी का खुद का आयु है 4 बिलियन इयर्स तो यह 1 बिलियन इयर्स अगो यह फर्स्ट लिविंग ऑर्गेनिस्ट म आया है तब से लेकर के आज तक का जो इवोल्यूशन हुआ है इवोल्यूशन के पीछे एक ही सबसे बड़ा सिद्धांत है सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट अर्थात कि अपने सर्वाइवल के लिए अपनी प्रोजेनी को जितना बढ़ाना चाहते हो बढ़ाते रहो यानी सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट सिर्फ इंडिविजुअल लेवल पे नहीं स्पीशक्राफ्ट ने बीज जितना व्यापक रूप से जितना वाइडर एरिया में स्प्रेड हो इतना करें जिससे कि एक पौधा यहां पर मर जाए दूसरा वहां पर मर जाए तो दूसरे 1015 पौधा जीवित रहे तो वह ठाकुर ने भी उनके पास में जितने भी भक्त आते थे उनके मन में यह सब बीजारोपण कर दिया था इंगित करके इशारा करके कि वही ठाकुर ही अवतार है किंतु जब कैंसर हुआ तब दो डिवीजन हो गए जो लोग यह इशारा समझ गए वह ठाकुर के अंतरंग भक्त हो गए और जो समझ कर के भी ना समझ रह गए समझ कर के भी नादान जैसे रह गए तो वे लोग हो गए बहिरंग अभी एक

ठाकुर ने खुद को अवतार घोषित किया

बड़ा सुंदर इंसिडेंट है ठाकुर एक दिन भक्तों को कहते हैं कि मने यह तो मने यहां पे तो इशारों इशारों में कह रहे हैं कभी-कभी तो ठाकुर एकदम स्पष्ट भाषा में कह देते हैं क्या कहते हैं ठाकुर कहते हैं कि अब यहां पर सिर्फ तुम ही लोग हो तुम तो मेरे अपने हो इसलिए यह बात मैं तुमको कहता हूं एक दिन मैं यहां पर कमरे में बैठा था देखा कि खोलता खोलता छेड़े बेरिए लो अर्थ क्या होता है खोल अर्थात कि शरीर खोलता छेड़े बेरिए लो अर्थात कि शरीर में से बाहर निकल के आया शरीर में से बाहर निकल के क्या आता है आत्मा नही तो आती है कॉन्शसनेस आती है तो ठाकुर कहते हैं सच्चिदानंद बेरि यलो अर्थात कि मेरे भीतर की जो चेतन शक्ति है सच्चिदानंद स्वयं वो मेरे शरीर में से बाहर आ गया और फिर मेरी ओर देखे कहता है कि आमी जुगे जुगे अवतार मैं ही हूं युग युग में अवतार तो ठाकुर कहते हैं कि पहले तो मैंने सोचा यह मेरी दृष्टि का भ्रम है इसलिए मैं चुपचाप बैठा रहा फिर इस सच्चिदानंद ने जो कि उनके देह में से बाहर निकला था उसने कहा कि शक्ति की आराधना तो चैतन्य देव ने भी की थी अर्थात कि यहां पे यह जो शक्ति की आराधना कितने लेवल पर इसका मीनिंग होता है मने यूनिवर्सल लेवल पर कहा जाए तो तो हमको तो पता है ठाकुर कहते हैं कि यह ब्रह्मा और शक्ति अभेद अर्थात कि चैतन्य हमारे भीतर में है और फिर यह पूरा जीव जगत ब्रह्म ईश्वर सब कुछ है वो सब कुछ ब्रह्मण का ही बना हुआ है तो इस तरह से कह सकते हैं कि शक्ति की आराधना दूसरी तरह से कह सकते हैं कि मां शारदा देवी की पूजा करके शोड़ी पूजा करके ठाकुर ने कलकत्ता में अपने संदेश का प्रचार करना शुरू किया था या तो फिर प्रॉपर वर्डिक होगा देखिए अद्वैत वेदांत की जब भी बात करते हैं ना तो हमारे शब्द कम पड़ जाते हैं शब्द छोटे पड़ जाते हैं यहां पर भी ठाकुर जो कुछ करते हैं उसके बारे में बोलने से शब्द हमारे गड़बड़ हो जाते हैं प्रॉपर वर्डिक इस तरह से होगा कि मां काली ने ठाकुर के पास में से मां शारदा की आराधना करवाई और इसके बाद में मां शारदा की शक्ति से शक्तिमान होकर के ठाकुर के पास में से उन्होंने पूरे कलकत्ता में प्रचार प्रसार करवाया व्हिच विल बी अ प्रॉपर वर्डिक तो यह भी एक मीनिंग हो सकता है तीसरा एक यह है मीनिंग मेरी दृष्टि से पर्सनली कि ठाकुर भविष्य में अंतरंग भक्तों को अलग से लेकर के यह जो मने ये जो भक्तो बादशाही यानी कि अंतरंग और बहिरंग ये जो डिवीजन होने वाले थे तो उसमें अंतरंग क्या सिर्फ नाम के है कि हां उन्होंने सिर्फ ठाकुर को अवतार के रूप में ग्रहण किया सिर्फ इतना नहीं यह अंतरंग लोग मिलकर के एक संघ की स्थापना करने वाले थे एक इंस्टिट्यूट फॉर्म करने वाले थे अभी प्रश्न होगा कि अभी यह यह प्रश्न बार-बार स्वामी जी के गुरु भाइयों के मन में प्रकट हुआ है योगेन खासकर के बाबूराम महाराज है योगन महाराज है वो पूछते हैं स्वामी जी को कि हमने ठाकुर को अलग तरीके से कार्य करते देखा है तो उन्होंने कभी ये ऑर्गेनाइजेशन की चिंता नहीं की कभी यह चिंता नहीं की कि मेरे नाम का प्रोपेगेशन हो कभी यह नहीं कहा बार-बार कहा है कि कर्मनाशा नदी में डूब लगाए तो मेरे सब कर्म खत्म हो जाए तो यह सब कुछ हमने ठाकुर को कहते हुए सुना है और यहां पे स्वामी जी उसके बिल्कुल विपरीत कर रहे हैं ऑर्गेनाइजेशन की स्थापना कर रहे हैं सिस्टमिक रूप में ठाकुर के नाम का प्रचार करना चाहते हैं कर्म में लोगों को साधुओं को कर्म में डुबाना चाहते हैं तो यह तो बिल्कुल ठाकुर की दृष्टि से विपरीत नहीं है क्या तो ये ऑर्गेनाइजेशन को शक्ति के इलाके में लेकर के हम कह सकते हैं कि चैतन्य देव ने भी शक्ति की आराधना की थी यानी कि चैतन्य देव के नाम पर भी भक्त मंडलिया बनी थी तो यहां पर भी ठाकुर के नाम से भक्त मंडली बनेगी तो कितने लेवल पे है और भी जितना हम सोचते जाएंगे इतना उसका डीपर डीपर यंस के लेवल्स की तरह लेयर्स की तरह उसके मीनिंग हमको मिलते जाएंगे तो यहां पर देखिए कि ठाकुर कहीं-कहीं पर इंगी में कहते हैं इशारों में कहते हैं कि हां मैं अवतार हूं कहीं-कहीं पे तो स्पष्ट रूप से कह देते हैं इससे ज्यादा स्पष्ट और क्या चाहिए जबकि ठाकुर कहते हैं कि मेरे भीतर में से सच्चिदानंद ने बाहर आकर के कहा कि मैं ही हूं युग युग में अवतार इससे ज्यादा स्पष्ट और क्या चाहिए हमको तो यह सब कुछ चलता गया और फिर आखिर में काशीपुर में ठाकुर ने यह जो अपना जो संपूर्ण शक्ति है अपने संघ के भीतर में ट्रांसफर कर दी ट्रांसफॉर्म कर दी तो यहां पे भी जब ठाकुर मास्टर महाशय स्वगत अपने आप को तो कहते रहते हैं कि क्या ठाकुर का यह मीनिंग है तो यह बीज रूप में ठाकुर ने जो चारों ओर फैलाया था वह बीज फलीभूत हुआ उसमें से पुष्प का वृक्ष पुष्प का पौधा प्रकट हुआ काशीपुर में तो यहां पर यह सब कुछ हमने देख लिया था अभी आज का हम थोड़ा सा आगे

हठयोग vs राजयोग

पढ़ते हैं तो ठाकुर क्या कहते हैं अ चैतन्य भक्ति अवतार जीव के भक्ति शिख ते ऐसे लेन चैतन्य देव भक्ति के अवतार थे जीव को अर्थात कि आम साधकों को आम आदमी को भक्ति सिखाने के लिए आए थे तार ऊपर भक्ति होलो तो सबई होलो हट जोगर किछु दरकार नहीं ईश्वर के ऊपर में भक्ति हो गई तो सब हो गया हठ योग की जरूरत नहीं है तो एक भक्त प्रश्न करता है कि आज्ञा हठयोग की रूप एक भक्त कह पूछता है कि अच्छा यह हठ योग क्या है तो ठाकुर उत्तर देते हैं हठ योगे शरीर रूपर बेशी मनोयोग दते होए हठ योग में शरीर के ऊपर में ज्यादा ध्यान देना होता है भीतर प्र कालन करबे बोले बा शेर नले गुजदार रखा कोरे भीतर में अर्थात की पेट में प्रक्षालन करेंगे तो इसके लिए जो अपना जो शौच का द्वार है वह उसको को उसको बंद कर देना होगा बा शेर नोलें कर देना होगा लिंग दिए दूध घी टा ने लिंग से दूध और घी भीतर में टान हैं खींचते हैं जिह्वा सिद्धि अभ्यास कोरे जिह्वा सिद्धि यानी कि अभी इसके बारे में ठाकुर बाद में कहेंगे कि जिवा सिद्धि क्या है एक जादूगर व उसकी जिवा उलट गई तो स जड़ समाधि में चला गया फिर हजार साल के बाद में वो जब वो फिर से होश में आया और तो मने जिहा सिद्धि हो ग जीवा यानी कि जीभ टंग वो सीधी हो गई तो फिर से वह कहने लगा लाग भेल की लाग भेल की अर्थात कि वह जादूगर था जादूगर यानी एक छोटी बुद्धि का एक व्यक्ति छोटी बुद्धि इस अर्थ में कि वो एक नैरो दृष्टि होती है अपने पेट की ओ दृष्टि होती है पेट भरने के लिए वह इस तरह का नाटक और यह हाथ चालाकी करके लोगों को भ्रमित करता है और उससे जो इनकम होती है उससे अपना पेट भरता है यानी कि एक बड़ा ही स्वार्थी बड़ा ही नैरो माइंडेड बड़ा ही एक तरह का स्टुपिड व्यक्ति कहा जाएगा तो ठाकुर कहते हैं कि जिह्वा सिद्धि के माध्यम से यदि उसको समाधि हो गई 1000 साल समाधि में रहा फिर वह वापस आया तो वोह जितना स्टुपिड पहले था उतना स्टुपिड बाद में ही रहेगा अदर वाइज यदि कोई व्यक्ति समाधि में जाता है तो मनुष्य समाधि में जाता है किंतु समाधि में से वापस तो देवता आते हैं फिर वह मनुष्य वापस नहीं आता वो देवता होकर के ही वापस आता है किंतु जिवा सिद्धि से हठ योग में हठ समाधि में जड़ समाधि में जाएंगे तो जो मूर्ख आदमी भीतर में जाता है जड़ समाधि में वह मूर्ख का मूर्ख ही बाहर आएगा व ऐसा बाद में ठाकुर कहेंगे और कहते हैं आसन करे शून्य कखन कखन उठे आसन करके थोड़ा हवा में उठने का प्रयास करता है व सब बायुर कार्ज वह सब वायु का कार्य है अच्छा अभी

अपने साहित्य में हठयोग प्रसंग

यह प्रसंग चालू करने से पहले इतना थोड़ा सा हम देख लेते हैं कि ठाकुर हड्डियों के माध्यम उसे क्या कहना चाहते हैं देखिए अपने ऑर्डर में जो प्रसिद्ध कहानी है पहारी बाबा की जब स्वामी जी अलाहाबाद में थे तब उन्होंने सुना कि गाजीपुर में एक पहारी बाबा है तो वह पहारी बाबा को का दर्शन करने के लिए वहां पर गए थे और उन्होंने ऐसा सोचा था कि देखिए इस यह तो मैं बंगाली शरीर लेकर के आया हूं बार-बार बीमार हो जाता हूं और मुझे तो साधना भी बहुत करनी है और फिर कार्य भी तो बहुत करना है तो क्यों नहीं ही थोड़ा बहुत हर्ट योग करके मैं शरीर को थोड़ा सा मजबूत कर दूं तो वह फिर पहार बाबा के पास में बार-बार जाते हैं और काफी इंप्रेस भी हो जाते हैं पहारी बाबा का बा पहारी बाबा की बात सुन कर के उनकी पर्सनालिटी से कहते हैं कि सही में सिद्ध महात्मा है वगैरह वगैरह किंतु जब वह पहारी बाबा के पास में से अनुष्ठा निक रूप में हठ योग सीखने का प्रारंभ करने ही वाले थे हमको पता है अगेन वोह वर्ल्ड फेमस घटना कि स्वामी जी रात को सोए हुए थे ठाकुर ने उनके सामने प्रकट होकर के बड़े ही करुण दृष्टि से उनके सामने स्वामी जी के सामने देखते रहे तो स्वामी जी ने पहले सोचा कि मेरे मन का भ्रम है ना कि क्या है तो उस दिन तो कुछ बोले नहीं फिर दूसरे दिन रात को सिर्फ सेम घटना रिपीट हुई वह लेटे हुए थे सोने के लिए फिर से ठाकुर प्रकट हुए फिर से बड़े ही सकून दृष्टि से स्वामी जी के सामने देख रहे हैं तो ऐसा जब कुछ दिनों तक हुआ तब स्वामी जी समझ गए स्वामी विवेकानंद समझ गए कि ठाकुर की इच्छा नहीं है कि मैं हठ योग सीखूं तो फिर वह वहां से चले गए थे तो वह हठ योग की कहानी अपने ऑर्डर में यहीं पर समाप्त हो जाती है और यहां पर जो सब लिखा हुआ है कि किस-किस तरह से हट योग में करना चाहिए उसमें हमको कोई डिटेल में जाने की जरूरत नहीं है क्योंकि यह प्रक्षालन है और लिंग के द्वारा दूध घी खींचना है जीहा सिद्धि अभ्यास करना है आसन का अभ्यास करना है यह सब कुछ हमारे ऑर्डर में कभी हुआ नहीं है देखिए कि इंटरेस्टिंग ठाकुर खुद हठयोग का अभ्यास करते थे किए थे उन्होंने किंतु उसके बारे में ठाकुर ने ज्यादा कुछ बोला नहीं है हमको सिर्फ एक ही घटना पता है कि जब ठाकुर हठयोग करते-करते ज एक घटना ऐसी हुई थी कि उनके बड़े भाई ठाकुर के बड़े भाई रामकुमार तो उनको वह जब रामकुमार बीमार थे तब वैद्य ने कहा था कि आपको पानी नहीं पीना है तो यह रामकुमार के छोटे भाई होने की वजह से ठाकुर बड़े अलर्ट रहते थे कि वह कहीं पानी ना पी ले तो एक बार ऐसा ही कुछ हुआ कि वह पानी पीना चाहते थे अभी प्यास तो बड़ी लगेगी आप आयुर्वेदिक दवा ले रहे हैं डॉक्टर कहता है पानी नहीं पीना तो प्यास तो बड़ी लगेगी तो पानी पीना चाहते थे ठाकुर ने उनके हाथ में से पानी का गिलास खींच लिया तब वह क्रोधित होकर के रामकुमार ने कह दिया कि तोर मुख देखे तोर मुख थे के रक्तो उठव रक्तो बेरो वे तो अर्थात कि तुम्हारे मुंह में से खून निकलेगा रक्त निकलेगा तो ठाकुर तो बड़े ही दुखित हो गए कहा कि बड़े भाई मैं तो तुम्हारे अच्छे के लिए ही तुम्हारे हाथ में से मैंने यह पानी का गिलास छीना है आप मेरे साथ मुझे इस तरह का श्राप क्यों दिए तो फिर रामकुमार बेचारा बड़ा ही दुखित हो गया कि अरे देखो क्रोध में आकर के मेरे मुंह से यह निकल गया तो जो भी है तो अभी वो तो घटना समाप्त हुई उसके बाद में कुछ दिनों के बाद में ठाकुर अपने कमरे में बैठे थे एकाएक देखा कि मुंह में से रक्त निकल रहा है एकदम गाढ़ा रक्त काले रंग का ब्लैक एंड वेरी डेंस वो ब्लड उनके मुंह से निकल रहा है तो ठाकुर तो बड़े ही डर गए और फिर रामकुमार भी दौड़े-दौड़े आए बड़े ही राम कुमार था ना कि हलधार थे भूल गया मैं एगजैक्टली देखना पड़ेगा जो भी है वो दौड़े-दौड़े आए बड़े दुखित हो गए कि अरे मेरे श्राप की वजह से ऐसा हो रहा है जो भी है उस कुछ समय के बाद में हलधार था मोस्ट प्रोबेबली क्योंकि बाय दैट टाइम तो रामकुमार का मृत्यु हो चुका था जो भी है तो उस समय एक हठयोगी वहां पर पंचवटी के नीचे में रह रहा था वह वहां पर आया और आकर के जैसे थोड़ा सा एग्जामिनेशन किया और करके ठाकुर को कहा कि देखिए कि आप जो है हठ योग का अभ्यास कर रहे थे हठ योग के अभ्यास के बाद में आपको जड़ समाधि लगने वाली थी और इस जड़ समाधि में आपका मृत्यु होने की पूरी संभावना थी तो वह जो आपकी यह जो कुंडलिनी शक्ति है जो कुंडलिनी यह जो अपनी जो स्पाइनल कोर्ड होती है उसमें जो छह चक्र है उसको भेद करके सहस्त्रार यानी कि क अपने मस्तिष्क के ऊपर में उठने वाली थी वहां पर जड़ समाधि होने वाली थी तो ऐसा नहीं होकर के आपके मुंह में रक्त के माध्यम से वह निकल गई यानी कि अभी आपको जड़ समाधि नहीं होगी और ऐसा ऐसा होने के पीछे का एक ऐसा कारण मुझे लग रहा है यह साधु महाराज ये स्वयं ठाकुर को कहते हैं कि आपको जड़ समाधि नहीं हुई उसकी वजह से मुंह में रक्त के माध्यम से यह निकल गई एनर्जी ऊर्ध्वगामी उसके पीछे में एक रहस्य मुझे ऐसा लग रहा है कि मां जगदंबा को आपके द्वारा महत कार्य करवाना है इसके लिए आपके शरीर की रक्षा करने के लिए आपके मुंह में रक्त के माध्यम से इस शक्तियों को निकाल दिया उन्होंने तो यह बात ठाकुर की साधन अवस्था के दौरान यह सब घटनाएं हुई थी तो यह कुछ कुछ घटना है अपने ऑर्डर में हठयोग के बारे में और ज्यादा कुछ जहां तक मेरा जा रहा है नॉलेज इतनी कोई यह नहीं है स्वामी जी राजयोग के बारे में बात तो बहुत करते हैं किंतु देखिए कि यह जो क्लासिकल हठ योग है कि यह प्रक्षालन फिर ये जिहुआ सिद्धि वगैरह उसके बारे में स्वामी जी इतना कुछ नहीं कहते वो प्राण की शक्तियों के बारे में बहुत कुछ कहते हैं बट ये पूरा डिफरेंट एक हो जाता है और ये हठयोग एक दूसरा हो जाता है यहां पर ठाकुर कहते हैं कि शरीर के ऊपर में बहुत ज्यादा आपको फोकस करना होता है तो यह शरीर के ऊपर में फोकस करने वाली बात इतनी सारी स्वामी जी ने राजयोग में भी नहीं कही वहां पे प्राण का विज्ञान उन्होंने सिखाया है किंतु प्राण के विज्ञान को प्राणायाम से संबंध है शरीर के साथ में इतना संबंध नहीं है ऐसा मेरा खुद का मानना है तो जो भी है यह तो हुआ हठ योग के बारे में अभी ठाकुरी य जिह्वा

जिह्वा सिद्धि की कहानी

सिद्धि के बारे में यह प्रसंग हमको कहते हैं कहते हैं कि एक जन बाजी दिखाते दिखाते तालुर भीतर जिवा प्रवेश करे दिए चीलो एक व्यक्ति बाजी यानी कि जादू दिखाते दिखाते उसकी जो जीभ है टंग है वह जो अपना तालबा जो होता है अपने मुंह में ऊपर वाला हिस्सा उसके भीतर में उसकी टंग उसकी जिवा प्रवेश कर गई थी अमनी तार शरीर स्थिर होए गलो वैसे ही उसका शरीर स्थिर हो गया लोके मने करले मोरे गछ तो लोगों ने सोचा कि आदमी मर गया है अनेक बसर से गोर देवा रही लो बहुत साल तक वो कबर में टा हुआ रहा बहु कालेर परे सेही गोर कोनो सूत्र भें गीय छीलो बहुत समय बहुत सालों के बाद में वो कबर किसी कारण टूट गई शई लोक टार तखन हटात चैतन्य होलो तो इस आदमी को एकाएक चैतन्य हुआ चैतन्य होबार परई से चेचा लागलो लाग भेल की लाग भेल की और जैसे ही उसको चैतन्य हुआ अर्थात कि वह आध्यात्मिक चैतन्य नहीं वह कॉन्शियस हुआ होश में आया बेहोश था उसमें से और जैसे ही होश में आया वैसे ही चिल्लाने लगा लाग भेल की लाग भेल की अर्थात कि ये जादूगर लोग इस तरह का कोई नारा चिल्लाते हैं जिससे कि लोगों को लगता है कि यह जादू चल रहा है तो जैसे ही ठाकुर ने कहा तो सभी लोग हंसना शुरू कर दिए श कोलेर हस्य ठाकुर कहते हैं ईश बायुर कार्ज यह सब वायु का कार्य है अभी देखिए कि यहां पर जो बात को ठाकुर वायु का कार्य के रूप में कहते हैं उसी बात को स्वामी जी हमको पूरा प्राणायाम के सिद्धांत के माध्यम से बताते हैं स्वामी जी ने खुद ने कहा है राजयुग में बड़ा ही स्पष्ट रूप से कहा है कि हमारे शरीर में जो पंचप्राण है उसके ऊपर में हम यदि कंट्रोल करना सीख ले तो हम जो चाहे अपने शरीर के साथ में कर सकते हैं हम अपने हृदय का धपरा बंद कर सकते हैं हम अपने शरीर को फ्रीज कर के सालों सालों तक जिंदा भी रह सकते हैं अपने शरीर के जितने भी अवयव हैं उन सबको हम अपने कंट्रोल में ला सकते हैं जो प्राण के विज्ञान में स्वामी जी ने यह सब बातें स्पष्ट रूप से कही है यानी कि देखिए कि यहां पर ठाकुर का भी पैरेलल हमको मिलता है कि प्राणायाम के विज्ञान से यह सब कुछ संभव है मैं जब पहली पहली बार प्राणायाम वाला जो चैप्टर पढ़ रहा था आध्यात्मिक प्राण स्पिरिचुअल प्राण वाला जो चैप्टर उस समय मुझे थोड़ा सा आश्चर्य होता था कि यह ठाकुर ने तो ऐसा कुछ कहा नहीं है स्वामी जी यह सब बातें कहां से लेकर आते हैं किंतु देखिए कि यहां पर जो स्वामी जी ने कहा है उसका एग्जैक्ट पैरेलल ठाकुर ने ऑलमोस्ट उसी शब्दों के माध्यम से कहा है किया है कहते हैं कि यह सब वायु का कार्य है यानी कि प्राणायाम से यह सब कुछ संभव है किंतु जैसे कि देखिए कि ठाकुर और स्वामी जी दोनों इस बात को स्पष्ट रूप से कहते हैं कि जितना हम अपने शरीर की ओर ध्यान देंगे उतना ही हम रा मन आध्यात्मिक रास्ते से भटक जाएगा तो अभी आगे में ठाकुर कहते हैं हठयोग वेदांत बादी रा माने ना जो लोग वेदांती है वे लोग हथियों को स्वीकार नहीं करते यानी कि प्राण के माध्यम से यह सब शक्तियां प्रकट हो सकती है हमारे भीतर में यह बात वेदांत वादी स्वीकार नहीं करते इस अर्थ में नहीं कि यह सब कुछ असंभव है इस अर्थ में कि यह सब में जाने से हम हम अपना जो जीवन का सही उद्देश्य है ईश्वर प्राप्ति आत्म दर्शन आत्म साक्षात्कार उस उद्देश्य को हम भूल जाएंगे इस अर्थ में यह लोग स्वीकार नहीं

ठाकुर की दृष्टि से राजयोग

करते आगे में ठाकुर बड़ा इंटरेस्टिंग बात करते हैं कहते हैं कि हठ योग और राज योग राज योगे मनेर द्वारा जोग होए भक्ति द्वारा विचारे द्वारा योग होई ओई जो गई भालो हठ योग भालो नोई कलिते अनगतला हठ योग और राज योग राज योग में मन के द्वारा योग होता है भक्ति के द्वारा विचार के द्वारा योग होता है वही योग अच्छा है हठ योग अच्छा नहीं कलिते अनगतला में अनगतला है यह बड़ा ही डीप सेंटेंस है हठयोग और राजयोग अभी हमको पता है कि राजयोग पुस्तक में जो प्राण के बारे में स्वामी जी कहते हैं वह जैसे कि पुस्तक का ही एक भाग के रूप में हमने स्वीकार कर लिया है किंतु हमको साथ-साथ में यह भी पता है कि जिसको की पतंजलि का अष्टांग योग कहा जाता है यम नियम आसन प्राणायाम प्रत्याहार धारणा ध्यान समाधि उसमें से जो पहले पांच स्टेप है यम नियम आसन प्राणायाम प्रत्याहार उनको बहिरंग योग कहते हैं और धारणा ध्यान समाधि को कहते हैं अंतरंग योग और त्रय एकत्र त्रय एकत्र संयम संयम यह जो तीन है धारणा ध्यान समाधि तीनों को इकट्ठा करके संयम शब्द उसको दिया गया है तो यह क्या है कि यहां पर जब ठाकुर कहते हैं राजयोग और हठयोग अलग-अलग तो हठयोग में वह आसन और प्राणायाम को लेते हैं और राजयोग शब्द का अर्थ एक्सक्लूसिवली वह करते हैं धारणा ध्यान और समाधि तो ये डेफिनेशन को थोड़ा सा क्लियर रखना है वरना तो हम लोग कंफ्यूज हो जाए कि वहां पर स्वामी जी ने राजयुग के भीतर में ही प्राणायाम का वर्णन किया है यहां पर ठाकुर कहते हैं कि हठयोग तो यानी य वायु का कार्य प्राणायाम वगैरह तो हठयोग का पाठ है राजयोग अलग है तो ऐसा कंफ्यूजन ना हो इसके लिए यहां पर स्वामी जी कहते हैं फिर ठाकुर आगे कहते हैं कि राज्य के माध्यम से मन का योग होता है भक्ति के द्वारा विचार के द्वारा योग होता है तो हमको यह प्रश्न एक हो सकता है कि राज्यों के भीतर में भक्ति और विचार को कैसे लेकर आए स्वामी जी का जो डेफिनेशन है जिस तरह से स्वामी जी डिस्क्राइब करते हैं राज्यों के भीतर में यह पतंजलि का अष्टांग योग है भक्ति के भीतर में यह जो भागवत या तो नारद भक्ति सूत्र या तो फिर चैतन्य महाप्रभु वाली वैष्णव परंपरा वह भक्ति योग का पार्ट है शंकराचार्य का जो वेदांत परंपरा है ज्ञान योग का भाग है जो कि विचार कहते हैं विचार के माध्यम से योग तो यह राज्यों के भीतर में भक्ति और विचार कैसे आ गए तो यहां पर ठाकुर का राज्य का डेफिनेशन एकदम विशाल है यहां पर ठाकुर जिस तरह से कहते हैं कि जो शरीर और प्राण के द्वारा जो होता है वह हो गया हठ योग और राजयोग अर्थात की जिसको हम भक्ति के माध्यम से आध्यात्मिक विकास या तो फिर विचार के माध्यम से आध्यात्मिक विकास या तो ध्यान और एकाग्रता के माध्यम से आध्यात्मिक विकास इन सबको ठाकुर मानसिक जो योग है उन सबको वह राजयोग के भीतर में ले ले रहे हैं तो इसीलिए कहते हैं कि राज योग ही अच्छा है हठ योग अच्छा नहीं है और फिर एक बहुत बड़ा स्टेटमेंट कि कलिते अनगतला कली में अनगतला है अर्थात कि यह इसको हम दो-तीन तरह से ले सकते हैं अनगतला का यदि लिटरल मीनिंग करें तो यह जो ऊपर में पंचकोष के बारे में जो कहा गया है अनमय प्राणम मनोमय विज्ञान मय और आनंदमय उसमें यह जो अन्नमैया कोष इसको ठाकुर स्थूल शरीर के साथ में इक्वेट करते हैं उसके साथ में व समानांतर लेते हैं तो स्थूल शरीर के ऊपर में ही जब हमारा शरी मन वैसे ही पड़ा है और ऊपर में से स्थूल देह की आराधना करना शुरू किया तो हम मटेरियल जम में इतना डूब जाएंगे कि फिर यह मनोमय यह जो फिर यह आनंदमय कोष है विज्ञान मय कोष है मनोमय कोश है उस जो डीपर लेवल पे हम उठ ही नहीं पाएंगे वैसे ही हम राजसिक है और ऊपर में से हमारे पास में यह पावर सब आ जाए अभी मान लीजिए कि हमको पता है कि वैदिक युग में ऋषि मुनियों के पास में चमत्कारिक शक्तियां थी किंतु उसके बावजूद यह ऋषि मुनि ज्यादातर समय अपना साधन भजन में ही बिताते थे क्यों क्योंकि उनका मन जो है ऑलरेडी आध्यात्मिक जगत में बड़ा ही फॉर्मली फिक्स हो गया था आध्यात्मिकता ही जीवन का एकमात्र उद्देश्य है इस बात में उनका मन बिल्कुल ठीक हो गया था तो ये मिरेकल अस पावर आते भी थे तो ज्यादा उसके साथ में कुछ नहीं करते थे जो वशिष्ठ की कहानी है कि विश्वामित्र जब उनके आश्रम पर हल्ला बुला आक्रमण करके उनके 100 पुत्रों का वध किया उस समय ये उनकी जो कामधेनु चुराली उस समय यह वशिष्ठ ऋषि ब्रह्म दंड हाथ में लेकर के बैठे रहे थे तो भी प्रश्न होगा कि जिनके पास में ब्रह्म दंड है वशिष्ठ जिसने त पस्या है तो एक राजा का संहार नहीं कर सकते कर सकते थे किंतु क्या है कि उनको स्पष्ट रूप से पता था कि आध्यात्मिकता ही जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य है ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या जगत में जितना जाएंगे उतना ही हम लोग दुखित ही होंगे उसके ज्यादा और कुछ नहीं होगा जबकि कलयुग में क्या है कि हम लोग इतना यह जो बाह्य जगत अपना स्थूल देह जो विषय की भोग वासना है इन सबके प्रति इतना प्रबल आकर्षण है और मुंह से लिप सर्विस तो दे कहते रहते हैं मुंह से कहते तो रहते हैं कि हां ईश्वर की आराधना करनी है मंदिर में जाना है भगवान की पूजा करनी है किंतु कोई सही सही कन्वे नहीं होता है तो इस युग में जबकि वैसे ही वासनाओं के प्रति आकर्षण है वैसे ही स्थूल देह के प्रति इतना प्रेम है वैसे ही मन रजस से भरा हुआ है उसमें फिर आप चमत्कारिक शक्तियां दे दो तो फिर क्या होगा यह एटम बम हम हमसे संभाला नहीं जा रहा है और यह ब्रह्मास्त्र पाशुपत अस्त्र लेकर बैठ जाएंगे मैंने कहा था ना कुछ दिन पहले कि वह हरि महाराज के पास में एक लड़का आया कहता है मुझे पाशुपत अस्त्र चाहिए तो हरि महाराज हंस के कहते हैं तुम पाशुपत अस्त्र का क्या करोगे तो यह सब पाशुपत अस्त्र ना कि ब्रह्मास्त्र न कि पुष्पक विमान न कि ऐसा कुछ लेकर के बैठ जाएंगे तो फिर आध्यात्मिकता तो चली ही जाएगी इस जगत में हम ऐसा विनाश लाएंगे कि यह जगत भी हमारे हाथ से जाएगा जैसे कहते हैं माया मिली ना राम नहीं भगवान राम मिले इस जगत में माया मिली दोनों हमारे हाथ से जाएंगे तो इसीलिए ठाकुर कहते हैं हठयोग भालो नई हठयोग अच्छा नहीं है कलिते अनगतला अनगतला यानी कि मन में रजस है स्थूल देह के प्रति प्रेम है और विषय वासनाओं का प्रचंड आकर्षण है इसके साथ में हठयोग के माध्यम से यदि कोई शक्तियां अपने पास आ जाए जिस तरह की शक्तियों का वर्णन स्वामी जी राजयोग में करते हैं तो आप सोच के देखिए कि उसका इतना भयानक दुरुपयोग होगा कि फिर उसका कोई अंत नहीं है तो यह परिच्छेद यहां पर समाप्त होता है अभी इसके बाद वाला कल देखते हैं ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णर्पण मस्तु मैं बोलने वाला था आखिर में रह गया

प्रश्न: इस जादूगर की कहानी के साथ उस एकाउंटेंट की कहानी को कंपेर कर के बताएंगे?

इसमें जो ठाकुर कहना चाहते हैं जो साधक होता है मान लीजिए उसको समाधि प्राप्त होती है तो साधना के समय तो वो ठाकुर मतलब वह साधन भजन ही करता रहेगा ना तो जब सिद्धि प्राप्त होने के बाद में जब वापस आता है तब भी तो वह जप करता ही रहेगा ऐसा नहीं है कि वह जब करना छोड़ देगा ज उदाहरण के रूप में अपनी इनकी बात है अघोर मणि देवी गोपाल की मां तो अघोर मणि देवी बहुत जप किया करती थी फिर ठाकुर के पास में जब आई तो ठाकुर ने कहा कि अरे तुमने तो गोपाल का दर्शन कर लिया है मेरा दर्शन कर लिया है अब इतना जप करने की क्या जरूरत है तो घरमणि देवी कहती है अच्छा ठीक है ठाकुर कहते हैं तो फिर नहीं जप करते हैं किंतु कुछ समय के बाद में उन्होंने सोचा कि देखो मैं सब कुछ कर रही हूं जीवन धारण करने के लिए खाना भी खाना ये सब कुछ करना है तो फिर बैठे-बैठे जब भी कर लिया करूं क्या है उसमें ठाकुर के नाम पर जप करूंगी मैं ठाकुर को अर्पण ठाकुर की स्वास्थ्य रक्षा के लिए जप करना तो फिर जप करना फिर से चालू कर देती है पहले तो वो जपमाला गंगा में विसर्जित कर दी ना कि ऐसा कुछ किया फिर दूसरी जपमाला लेकर फिर से जप करना शुरू कर दिया यानी कि जिसने पूरा जीवन भर साधन भजन ही किया है तो वह सिद्धि प्राप्त होने के बाद में फिर वह क्या करेगा माने वो ध धय करके नाचेगा जो किरानी है अकाउंटेंट व जेल में जाता है जेल में से बाहर आएगा तो हंसते-हंसते नाचता हुआ घूमेगा कि फिर से वही वह अपना कार्य चालू कर देगा क्या उसके पास में और तो कुछ है नहीं करने के लिए पहली बार तो होता है कि वह अपने खुद की ईश्वर प्राप्ति के लिए करता है बाद में करता है जगत कल्याण के लिए करता है सब तो मिल गया है अभी और क्या है नाव जो ठाकुर ठाकुर कहते हैं ना चैतन्य

प्रश्न: हमारे एक शिक्षक थे जो कहते थे कि योग करने से जादुई शक्तियां प्राप्त होती हैं।

देव के बारे में चैतन्य देव क्या कहते थे मागर माछ झोल जुबी मेयर कोल बोल हरि बोल अर्थात कि मागर नाम की मछली का झोल युवती मेय का मने युवती यंग लड़की पहले तो इन दोनों का नाम ले लेंगे और फिर कहेंगे कि बोल हरि बोल साथ-साथ में ही माने वो मछली खाने के लोभ में य एक लड़की के लोभ में वो आएगा पहले फिर वो हरि बोल उससे करवा लेंगे ना इंटरेस्ट क्यों चला जाएगा एक बार हरि में इंटरेस्ट आ गया तो वह तो जाने वाला नहीं है नहीं भी जाएगा देखिए यदि नहीं भी जाता है जो लोग इतने विषय में डूबे ही है तो भले ना अभी जो आदमी सिर्फ विषय में डूबा रहने वाला था तो कहीं एक बार तो उसने हरि नाम ले लिया माने जो बिल्कुल पत्थर होकर के रहने वाला था उसमें थोड़ा बहुत तो उसके ऊपर में पानी डाल दिया स्वामी जी

प्रश्न: स्वामीजी कहते हैं कि यदि हममें आत्मविश्वास नहीं है तो ईश्वर पर विश्वास करने से भी हमें कोई लाभ नहीं है. इसका अर्थ क्या है?

कहते हैं कि जो जिसमें आत्म श्रद्धा नहीं है तो फिर वह ईश्वर प 33 कोटि देवताओं पर श्रद्धा रखने से कोई लाभ नहीं है तो वह नचिकेता की कहानी है ही है आत्म श्रद्धा के बारे में कि नचिकेता यम लोक में जाता है यम के पास में जाकर के तीन वरदान लेकर के आता है तो वह उसमें मृत्यु के बाद क्या होता है वह भी नचिकेता ने वहां पर सीखा तो एक्चुअली देखिए कि एक छोटा सा लड़का इतना साहस करके यम के साथ में वार्तालाप करता है यह आत्म श्रद्धा थी बोलकर के हमारा जो वैदिक युग था वह इतना स व चल स्पिरिचुअली कल्चरल पॉलिटिकली इकोनॉमिकली मिलिटर इतना बेस्ट था बाद बाद में जो हमारी आत्म श्रद्धा जो बिल्कुल

प्रश्न: विश्वास से असंभव संभव होता है किन्तु अविश्वास से विनाश होता है. इसका अर्थ?

खत्म हो गई तो देवता तो हमने 33 कोटि कर लिए हैं किंतु भारत में जो शत्रु आता है हमारी पिटाई करके जाता है यानी कि खुद की हमने खुद के ऊपर में से आत्म श्रद्धा खो दी इसके लिए यह जो पूरा 1000 साल की गुलामी हमको देखनी पड़ी वो स्वामी जी ने जो भारत घूम कर के जो तमस देखा इस के लिए वो यह बात कह रहे हैं कि जिसको अपने पर श्रद्धा नहीं वह 33 कोटि देवताओं पर श्रद्धा रख के क्या करेगा अच्छा उसमें साथ में एक ही बात एक और जोड़ देता हूं महापुरुष महाराज ने कही है कि गुरु कृष्ण वैष्णव तीन दया होलो एकर दया बिने जीव चारे खारे गेलो अर्थात कि गुरु कृष्णा वैष्णव तीन की दया हुई किंतु एक की दया बिना हमारा सत्यानाश हो गया तो यह एक कौन तो हमारा मन हमारे मन को जद संयम में ना ला पाए तो यह गुरु कृष्ण वैष्णव की दया से कोई लाभ नहीं जो आधु तो क्यारे करा है

प्रश्न: खेचरी मुद्रा कैसे करते है?

खेचरी मुद्रा वगैरा कि आपनी पासे खूब सारा गुरु हो तो करे नितर मुश्किल से बधू बहुत अच्छे टीचर के पास में से सीख कर के यह सब कुछ करना है और वैसे तो ठाकुर ने मना ही कर दिया है कि मंत्र जप कीजिए और भक्ति और विचार के माध्यम से आध्यात्मिक जीवन में आगे बढ़ वोह ज्यादा बेटर है रदर देन की हठयोग के माध्यम

प्रश्न: ठाकुर में विनम्रता के साथ-साथ आत्म-श्रद्धा भी थी। इन दोनों में सामंजस्य कैसे स्थापित किया जाए?

से यह जो आप कहते हैं ना दीनता अच्छा पहली बात तो है कि आत्म श्रद्धा अलग है घमंड अलग है एरोगेंस इज डिफरेंट एंड सेल्फ कॉन्फिडेंस इज डिफरेंट घमंड क्या है कि मुझे अपना जो यह जो भौतिक शक्ति है उसके ऊपर में बड़ा एक नाज है बड़ा है कि मेरे पिताजी बहुत धनवान है मेरे पास में बहुत सारा पावर है मैं पावर से दूसरों का शोषण करूंगा वो हो गया घमंड या तो फिर एरोगेंस जो कि नहीं होना चाहिए जिसका जो अपोजिट है ह्यूमिडिटी या तो फिर दीनता वो होना चाहिए किंतु दीनता फिर कहीं तमस में ना ले जाए कि फिर मैं कुछ भी करने को असमर्थ हो जाऊ मेरे पर आक्रमण होता है मैं उत्तर ही नहीं दे पा रहा हूं तो फिर क्या काम का है तो घमंड है रजस का प्रतीक और दीनता है मने दूसरे इस टाइप की जो दीनता होती है वो तमस का प्रतीक है उसका दोनों का काउंटर है कि शरणागति शरणागति सात्विक शरणागति में वो आत्म श्रद्धा भी है और घमंड भी नहीं है सो दिस इज द डेफिनेशन ऑफ शरणागति सत्व है आत्म श्रद्धा है घमंड नहीं है दैट इज शरणागति आत्म श्रद्धा इस

प्रश्न: आत्म-श्रद्धा और शरणागति किस प्रकार रिलेटेड हैं?

तरह से कि जद देखिए कि अभी जैसे ठाकुर का खुद का है कि भयानक साधना करनी उन्होंने शुरू की अभी उस समय जितने भी लोग थे सब तो आपको यही कहेंगे कि मथुर बाबू है रास मणि है उनके प्रति आप बड़ा ही विनम्र रूप से व्यवहार कीजिए तब कहीं जाकर के आपको यहां पर रहने देंगे अभी देखिए कि ठाकुर को काली मंदिर में रहना एसेंशियल था वहां पर उनको पूरा एक होली एटमॉस्फियर है सब तरह का जो यह सिचुएशन उनको बेनिफिशियल था मथुर बाबू सेवा करते थे रोटी कपड़ा मकान की चिंता नहीं थी तो वह चिंता किंतु ठाकुर ने कभी नहीं की आध्यात्मिक साधना करने के लिए मुझे दक्षिणेश्वर में रहना पड़ेगा बाहर कहीं जाऊंगा तो मुश्किल होगा खुद को तो कामर पुकुर से चले आना पड़ा क्यों कामर पुकुर में रह के साधना नहीं की घर से शिव का संसार था तो बोलकर के ही तो कामर पुकुर छोड़ के जयराम दक्षिणेश्वर आए हैं यदि इतना ही मतलब भीतर में यह था तो वहीं पर रहते कामर पुकुर में मां के पास में मां सेवा करती मां खाना खिलाती वहां पर बैठकर साधन भजन करते व घर में खाने को नहीं है बोलकर ज दक्षिणेश्वर आए हैं अभी दक्षिणेश्वर का जो मालिक है उसी को चाटा मार दिया मुंह प तो थोड़ा सा भी कॉमन सेंस नहीं है तो ये आत्म श्रद्धा थी कि कि वो ईश्वर की आराधना करते करते रास मणी मथुर बाबू डज नॉट मैटर यदि ईश्वर की कृपा होगी तो वे लोग भी लाइन प आ जाएंगे वो ठाकुर को मनाने जाने की जरूरत नहीं है तो ईश्वर के प्रति जो शरणागति है उसमें से ही आत्म श्रद्धा प्रकट होती है कि रास माणी को चाटा मारने की आत्म श्रद्धा हां मने शरणागति 100% हो तभी होगा

प्रश्न: सही शरणागती ही आत्म-श्रद्धा देती है

आप अपने बोस को चाटा मारने को कभी नहीं जाएंगे क्योंकि आप कभी नहीं सोचेंगे कि मैं उसको चाटा मारूंगा तो भगवान आ के बचा लेंगे ऐसा हम लोग सपने में नहीं सोचेंगे हां ठाकुर ने खुद कहा ना कि मैं भक्तों का राजा होना चाहता था अभी यह कौन बोलेगा आप या मैं तो ऐसा दावा नहीं करने वाले हैं कि मैं भक्तों का राजा होना चाहता हूं स्वामी जी कितना बड़ा स्टेटमेंट दे देते हैं द बुद्ध हैड अ मैसेज फॉर द ईस्ट द वे आई हैव अ मैसेज फॉर द वेस्ट बुद्ध के पास मैंने खुद को बुद्ध के लेवल पर रख दिया उस समय ये ह्यूमिडिटी यह सब वो सब भूल गए उस समय

प्रश्न: शरणागती और आत्म-श्रद्धा को एक साथ समझना मुश्किल है

किंतु देखिए कि एक है तो दूसरा संभव है जब स्वामी जी यह कहते हैं कि ठाकुर चाहे तो मेरे जैसे लाखों लाखों विवेकानंद खड़े कर सकते हैं वही स्वामी जी अपने को बुद्ध के साथ में कंपेयर करते हैं वो कब कर सकते हैं कि ठाकुर की शक्ति से शक्तिमान होकर के अपने को बुद्ध के साथ में कंपेयर करते हैं ठाकुर भी यह मां काली की शक्ति या मां शारदा की शक्ति से शक्तिमान होकर के यह विद्यासागर है वगैरह के मुंह पर जाकर के बात करना वरना एक गरीब पुजारी क्या ऐसे बड़े लोगों के साथ में आज हमको ही देख लीजिए अपने सिटी के जो धनी व्यक्ति है यह पॉलिटिशियन है एमपी वगैरह उनके साथ में बात करने से हमको कितना डर लगता है वो तो बिल्कुल गरीब थे मतलब एक तरह से देखा जाए तो फिर भी एकदम बढ़िया मजे से उनके मुंह पर जाकर के बात कर देते थे वो वहां पर जतिन बोल करना कि कोई एक था उसको जाकर ठाकुर ने कह दिया तो मा के राजा टाा बोलते पवना उने ब्रिटिश गवर्नमेंट ने राजा का खिताब दिया होगा अब ये तो बिना मतलब का खिताब है ना राजा की तरह ना ही मर्दानगी है ना ही वह वचन पालन की क्षमता है ब्रिटिश लोगों की चमचागिरी करके राजा का खिताब ले लिया है तो ठाकुर ने मुंह पर जाकर बोल दिया तुमको राजा टाा नहीं बोल पाऊंगा मैं ना बिल्कुल ठीक बात है यह भी अच्छी बात जो अनुभूति हुई है कि मैं बुद्ध की तरह हूं तभी स्वामी जी ने बोला अपने को बुद्ध के साथ कंपेयर किया बिल्कुल ठीक है देखिए एक प्रसंग है कि ठाकुर की

प्रश्न: माँ और ठाकुर एक हैं। दूसरी ओर, माँ कहती है कि ठाकुर उनके ईश्वर है। इन दोनों बातो का अर्थ क्या है?

महासमाधि के बाद में मां वृंदावन व तीर्थ यात्रा पर जा रही है तो एकाएक मां के ऊपर में एक भाव का आवेश हुआ और वह पान खा रही है तो वहां पर योगेन मा थी तो योगेन मा ने देखा कि मां एक्जेक्टली उसी स्टाइल से पान खा रही है जिस स्टाइल से ठाकुर खा रहे हैं पान तो योगेन मां को संदेह हुआ कि ठाकुर मां के ऊपर में ठाकुर का आवेश हुआ है तो उन्होंने योगेन माने मां को दो-तीन प्रश्न किए तो मां ने उसका उत्तर एगजैक्टली उसी तरह दिया जैसे कि ठाकुर देंगे प्रश्न का उत्तर तो मां के ऊपर में ठाकुर का आवेश होता था या तो फिर मां और ठाकुर एकाकार थे इस बात में कोई संदेह नहीं है दूसरी और इस तरह की भी एक घटना है उद्बोधन की ना कि कहीं की कि कोई एक स्त्री आकर के मां को कहती है कि तुम जगदंबा हो तुम आद्याशक्ति हो वगैरह वगैरह इस तरह से प्रशंसा इसलिए कर रही थी कि उसको कुछ काम निकालना था मां के पास में से तो मां इमीडिएट समझ गई कि यह जो स्त्री भक्त है वो सिंसियर नहीं है अपना कुछ काम निकालने के लिए झुठ मुठ के मेरी प्रशंसा कर रही है तो इमीडिएट मां ने कह दिया कि बेरो खंत है के भागो यहां से वो ठाकुर ने अपने चरणों में मुझे स्थान दिया है बोलकर के मेरा जीवन में जो कुछ है कहां वो मुझे आद्याशक्ति कहां जगदंबा में जो निकलो यहां से तो क्या है कि यह लोग जब देखते हैं कि योगिन मा जैसे कोई एकदम निष्ठावान भक्त होंगे तो अपना स्वरूप प्रकट करेंगे किंतु कोई बिना मतलब प्रशंसा करके उनके पास में से कोई काम निकाल लेने को आएगा तो उनके पास में ही अपना स्वरूप संवरण करेंगे ना यहां पे ठाकुर ने खुद कहा ना कि तीन अवस्थाएं होती थी बाह्य दशा अर्ध बाह्य दशा अंतर दशा तो जिस तरह की दशा है जिस तरह के भक्तों के साथ में बैठे उस तरह का उनका बिहेवियर होता था बंगाली में एक किताब है ठाकुरे रंगर गाम ठाकुर के रंग का वो यह गाम माने यह क्या कहे बाल्टी ठाकुर के रंग की बाल्टी किताब है बंगला में महाराज ने एक लिखी है