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Sri Ramakrishna Kathamrita ·

श्रीरामकृष्ण कथामृत 27 Oct 1882 केशव सेन के साथ ठाकुर का नौका विहार 30 july 2024

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ओ स्थापक च धर्मस्य सर्व स्वरूप अवतार षय कणा श्री राम कृष्ण देव श्री श्री राम कृष्ण कथामृत ठाकुर के उपदेशों का बहुत ही सुंदर संग्रह मास्टर महाशय श्री महेंद्रनाथ गुप्त द्वारा लिपिबद्ध किया गया इसका हम पाठ कर रहे हैं और अध्याय है केशव सेन के साथ में नौका विहार ब्रह्म भक्तों को लेकर के केशव सेन आते हैं दक्षिणेश्वर और ठाकुर को अपने जहाज में लेकर के गंगा की ओर गंगा के ऊपर में सफर करते हैं गंगा की ऊपर में नौ का विहार करते हैं और साथ में ही ठाकुर के अमृतम उपदेशों का श्रवण करते हैं इसी सिलसिले में आगे हम पढ़ते हैं मास्टर महाशय क्या लिखते हैं सब सबसे पहले तो ठाकुर सर्वधर्म समन्वय की बात कर रहे हैं किंतु यहां पर देखना है कि धर्म समन्वय अर्थात कि वो नहीं कि किस अवतार ने क्या सिखाया अवतार की शिक्षा की वजह हिंदू धर्म में जो विभिन्न रास्ते हैं ईश्वर प्राप्ति के साधन मार्ग जिसको कहते हैं योग एक साधन मार्ग है सांख्य दर्शन एक है एक वेदांत दर्शन है एक वैष्णव दर्शन है तो विभिन्न दर्शन मार्गों से किस तरह से ईश्वर को प्राप्त किया जाए विभिन्न दर्शन मार्ग ईश्वर की अवधारणा किस तरह से करते हैं ज्ञानी कहेंगे कि ईश्वर तो आत्मन है जो कि मेरे हृदय में मेरे सीने में विराजमान है जिका जद मैं साक्षात्कार कर लू मैं यदि अपना सही स्वरूप धारण कर लू अपना सही स्वरूप प्राप्त कर लू तो मेरे जीवन का अंतिम जो छोर है अंतिम डेस्टिनेशन उस तक में पहुंच जाऊंगा भक्त कहेगा कि जो एक ईश्वर है और ईश्वर का दर्शन प्राप्त करना ईश्वर का आशीर्वाद प्राप्त करना यही मेरे जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य है सर्वोच्च लक्ष्य है तो ज्ञानी कहो ना कि फिर यह भक्त कहो ना कि ये सांख्या दर्शन वाले कहते हैं कि पुरुष और प्रकृति से पूरा जगत बना हुआ है प्रकृति को त्याग करके हमारे भीतर में पुरुष है पुरुष का साक्षात्कार करना है वह उनका एक मत है जो भी मत को आप फॉलो करते हो सभी मत अल्टीमेटली आखिर में तो एक ही अंतिम सत्ता तक आपको ले जाएंगे तो ये जो समन्वय है गीता में भगवान कृष्ण ने जिस तरह से विभिन्न मतों का विभिन्न संप्रदायों का विभिन्न दर्शन शास्त्रों का समन्वय किया था वही समन्वय आज श्री राम कृष्ण फिर से कर रहे हैं इसीलिए उन्होंने कहा कि जिस तरह से ज्ञानी ईश्वर आत्मन की चिंता करते हैं वह कहते हैं कि यह जगत जो है यह सब कुछ सपनावत है सपन को त्याग करके ईश्वर आत्मन को प्राप्त कीजिए और भक्त कहता कि जो जगत है वो भी ईश्वर का ही बना हुआ है जीव जगत ईश्वर सब कुछ मिलाकर के एक ही सत्ता है तो उसको प्राप्त करना है तो इसके कहने के बाद किंतु हमको ऐसा लगता है कि ठाकुर भक्ति की महिमा ज्यादा शायद कर रहे हैं क्या कहते हैं भक्ते भाव की रूप जानो भक्त का भाव किस तरह का है जानते हो हे भगवान तुम्ही प्रभु आमी तुम्हार दास हे भगवान तुम प्रभु हो मैं तुम्हारा दास है तुही मां अमी तुम्हार संतान तुम मां हो मैं तुम्हारा संतान हूं अबार फिर से कहते हैं तुम हमार पिता बा माता तुम मेरे पिता हो या माता हो तुही पूर्ण आमी तुम्हार अंश तुम पूर्ण हो मैं तुम्हारा अंश हू भक्तो एमन कथा बोलते इच्छा करे ना ज आमी ब्रह्म भक्त यह क ने का प्रयास नहीं करेगा यह कहना नहीं चाहेगा कि मैं ब्रह्मण है भक्त हमेशा चाहता है कि ईश्वर के साथ में एक मधुर संबंध बना कर के रहे यह जो संबंध कहते हैं यह जो भाव कहते हैं भाव का उच्छवास भाव का माधुर्य भाव रूपी लीला यही भक्त लेकर के रहना चाहता है वृंदावन में देखिए कि सभी लोगों ने भगवान कृष्णा के साथ में बाल गोपाल के साथ में एक ना एक भाव से संबंध बांधा था बलराम थे वह सोचते थे कि वह कृष्ण के दास है कभी वह सब समय कृष्ण की देखभाल किया करते थे कृष्ण के अपने को कृष्ण के प्रोटेक्टर समझते थे मां यशोदा उनका भगवान कृष्ण के प्रति मातृ भाव था योगियों गोपियों का मधुर भाव था तो एक के बाद एक आप देखिए कि इन सबकी भगवान कृष्ण के प्रति कोई नाना कोई एक भाव का संबंध लेकर के भगवान कृष्ण के प्रति इन लोगों की निष्ठा और श्रद्धा थी तो यह भाव संबंध होना भगवान कृष्ण के साथ में यह भागवत और या तो फिर यह वैष्णव परंपरा है या तो फिर यह भक्ति परंपरा है अपने भारत देश में उसका यह आधार है यह भाव साम्राज्य भाव का संबंध तो भक्त चाहता है कि ईश्वर के साथ में कोई ना कोई भाव लेकर के मैं रहूं ज्ञानी क्या चाहेगा ज्ञानी जैसे कि ऋषि मुनियों का मत है हिमालय में गंगा के किनारे बैठ कर के एक के बाद एक वेद की रचाओ का पाठ करते जाते हैं कहते हैं कि इस यह शरीर यह मन यह प्राण यह बुद्धि यह विश्व यह यूनिवर्स यह कॉस्मस यह स्टार्स ये प्लेनेट कुछ भी कुछ भी नहीं है इन सबके परे देर इज वन अल्टीमे मेड रियलिटी बियोंड स्पेस टाइम मैटर एंड एनर्जी बियोंड एवरीथिंग दैट वी कैन सी ट वी कैन सेंस विथ अवर पंच ज्ञानेंद्रिय पंच कर्मेंद्रिय पांच ज्ञानेंद्रिय कर्मेंद्रिय से जो भी हम अनुभूत कर सकते हैं जो भी हम ग्राह्य कर सकते हैं उससे परे जो अंतिम सत्य है वह है ब्रह्मण तो ज्ञानी का है ऐसा भाव भक्त का है ऐसा भाव ठाकुर को कभी-कभी ऐसा लगेगा कि भक्ति की महिमा का ज्यादा गान करते हैं मास्टर महाशय ने खुद ने इसी कथामृत में कहीं कहीं पर लिखा है श्री राम कृष्ण देव का विशिष्ट अद्वैत भाव ऐसा करके उन्होंने इसका वर्णन किया है किंतु जहां तक रामकृष्ण संघ का प्रश्न है हम लोग मानते हैं कि ठाकुर ने सभी भावों को सही सामान्य एक ही रूप से महत्ता दी है एक ही रूप से सभी भावों की एक रूप से उन्होंने गुणगान किया है अभी देखिए इसके बारे में मैंने पहले भी एक दो बार कहा था कि एक ब्रम एक साधु के साथ में मेरा काफी डिबेट हुआ था इसको लेकर के कि ठाकुर का सही भाव क्या है उसका कहना है कि विज्ञान वाद अर्थात कि यह जो आखिर में विज्ञान वाद अर्थात की यह जो ठाकुर कहते है ना कि जो कुछ भी है जीव जगत ये जो पेड़ पौधे पशु पक्षी जितने भी मनुष्य है यह सब कुछ मिलाकर के ईश्वर है ये इसको कहेंगे कि विज्ञान वाद कि अल्टीमेट आप जद देखेंगे तो सब कुछ ईश्वर मय है यह एक उसका मैं एक पॉइंट है दूसरा पॉइंट है कि ठाकुर कभी भी ऐसा नहीं कहे कि यह भाव बड़ा है और यह भाव छोटा तो उसको मैंने यह प्रश्न किया कि देखो कि ठाकुर खुद कहते हैं कि पहले नेती नेती करके ऊपर जाओ फिर इती इती करके नीचे आओ तो यह जो इती इती करना जो है कि यह जीव जगत सब कुछ जो है ये पशु पक्षी पेड़ पौधे मकान ये जो सीढ़ी ये सब कुछ जो बना हुआ है सब कुछ यदि ईश्वर है यह तो नीचे आने वाली बात है ऊपर जाने के लिए तो ठाकुर इति इति कहते हैं कि इति इति कह के ऊपर जाना है ने नेति नेति करके यानी कि मैं जीव नहीं हूं जगत नहीं हूं यह पंच महाभूत का बना हुआ देह नहीं हूं पंच ज्ञानेंद्रिय नहीं पंच कर्मेंद्रिय नहीं यह मन बुद्धि चित्त अहंकार नहीं यह नेति नेति करते-करते यह जो ड़ रिपु है वो मैं नहीं पंच क्लेश है वो मैं नहीं ऐसा करते-करते हमको सब कुछ त्याग करके पहले तो ब्राह्मण को प्राप्त करना है उसके बाद में इति इति करते हैं कि यह पंच महाभूत का बना हुआ देह भी ईश्वर का बना हुआ है यह पंच ज्ञानेंद्रिय पंच कर्मेंद्रिय यहां तय ड़ रीप यहां तक किय पंच क्लेश सब कुछ ईश्वर का ही एक प्रकार से एक प्रकाश के ईश्वरीय प्रकाश की एक एक किरण मात्र है इसका त्याग नहीं इन सबको एंब्रेस करना है काम जद करना है क्रोध जद करना है लोभ जद करना है तो ईश्वर के लिए करना है जब जो परमहंस होता है जिसने अद्वैत अवस्था प्राप्त कर ली है उसके लिए यह सब कुछ स्वपना वत होते हुए भी जगत में इस तरह से रहता है जैसे कि सब कुछ को वह अपने साथ में लेकर चलता है ठाकुर जैसे कि भक्तों के घर-घर जाते हैं ईश्वरीय वाणी सुनाते हैं यदि ठाकुर ऐसा कहते कि नहीं यह जगत स्वप्नवउम समाज यह जहाज सब कुछ मिथ्या है तो मैं क्यों इस मिथ्या जहाज प उठकर के यह मिथ्या व्यक्तियों को यह मिथ्या उपदेश देता रहूंगा मैं सब क्यों करूंगा मैं क्यों नहीं समाधि में मगना होकर के अपने दिन पसार करूंगा ठाकुर तो ऐसा भी कह सकते हैं किंतु जब इति इति करके उच अद्वैत अनुभूति रूपी शिखर से जब नीचे आए तब उन्होंने पूरे जगत को ईश्वरीय प्रकाश की एक एक किरण समझ कर के इसको ग्रहण किया इसको अपना लिया हृदय के भीतर में मैत्री करुणा मुदिता और उपेक्षा जिसको कि चित्त प्रसाद कहते हैं योग शस्त्र में उसका एक झरना बहना शरू हुआ सभी के प्रति सहानुभूति सभी के प्रति मित्रता सभी के प्रति करुणा और सभी को हेल्प करने की ईश्वर की ओर ले जाने की एक इच्छा उनके मन में प्रकट हुई वो इच्छा भी तो ईश्वर ने ही दी है इच्छा भी तो उनको जब वो अद्वैत अवस्था में थे निर्विकल्प समाधि में थे तो ईश्वरीय वाणी ही उनको सुनाई दी कि तू भाव मुख्य था अर्थात कि भाव मुख कॉन्शियस सुपरकॉन्शियस की इस बाउंड्री पर रहो तुम बॉर्डर लाइन पर रहो तो ठाकुर अभी जब यह सब कह रहे हैं कि यह भक्त का भाव किस तरह का है हे भगवान ही प्रभु आमी तुम्हार दास ही मां आमी तुम्हार संतान यह जो इसका जो गुणगान जो कर रहे हैं वो तो ती ईती करके नीचे आने के बाद की बात है यह जो आप जब नेती नेती करके ऊपर जाएंगे तब तो आपको त्याग करना ही पड़ पड़ेगा तो अभी जो मैं इसके साथ में डिस्कस कर रहा था इस साधु के साथ में कि ठाकुर का जो सर्वोच्च उपदेश है वो है विज्ञान वाद कि सब कुछ ईश्वर है तो मैंने कहा कि यदि ठाकुर ऐसा कहते कि सब कुछ जद ईश्वर है तो उन्होंने ऐसा कहा ही क्यों कि नेती नेती करके ऊपर जाना है फिर नीती ती ईती करके नीचे आना है जद ये तो नीचे आना हो गया ना ऊपर जाना नहीं हुआ तो अभी उसका इसके पास में अपने हिसाब से उसने उसका काउंटर किया किंतु देखिए कि मेरा जो सोल्यूशन है मैं कहता हूं कि अद्वैतवाद है हाईएस्ट यदि आप हाईएस्ट शब्द यूज करना चाहते हैं ठाकुर के बारे में तो अद्वैतवाद है हाईएस्ट किंतु जो अल्टीमेट है वो है यह विज्ञान तो हाईएस्ट और अल्टीमेट ये दोनों में मैं डिफरेंशिएबल की वो है अद्वैत उपलब्धि निर्विकल्प समाधि किंतु अंतिम उपलब्धि क्या है निर्विकल्प समाधि के बाद में मनुष्य करेगा क्या तो निर्विकल्प समाधि के बाद में दो चीज हो सकती है एक तो है कि 21 दिन में शरीर त्याग हो जाएगा यदि आप सतत समाधि में रहते हैं 21 दिन के बाद में शरीर का त्याग हो जाएगा ठाकुर खुद कहते हैं कि मेरी ऐसी अवस्था हो गई कि मुंह के भीतर में जब ठाकुर निर्विकल्प समाधि में रहते थे छ महीना तोतापुरी के आगमन से तोतापुरी की शिक्षा से जो कि ठाकुर के अद्वैत वेदांत के गुरु थे उनकी शिक्षा से उनके प्रयास से ठाकुर ने निर्व पव समाधि एक बार तो प्राप्त कर ली उसके बाद में जब वो तोतापुरी ने फिर से उनको बाह्य जगत में लेकर आए उनके साथ में वार्तालाप करने के लिए यह जानने के लिए कि भाई यह हुआ क्या है यह कौन सी देवी माया है व तोतापरी खुद आश्चर्य चकित हो गए थे ठाकुर की निर्विकल्प समाधि देख कर के तो जो भी है वो ठाकुर जब वाप आए पहले तो एक बार वापस आए तोतापुरी के साथ में वार्तालाप किया क्योंकि ठाकुर के जो गुरु थे उनको भी तो पूर्णता प्राप्त करनी है ठाकुर के गुरु का ठाकुर के साथ में जो संबंध है बड़ा ही अद्भुत है वे लोग जैसे कि भैरवी ब्राह्मणी है ना कि तोतापुरी है जो कि ठाकुर के दो सर्व सबसे ज्यादा जानेमाने गुरु के रूप में कहे जाएंगे जिन्होंने ठाकुर के साथ में सबसे ज्यादा समय बिताया है ठाकुर के साथ में ठाकुर ने सबसे ज्यादा इन दोनों के बारे में बात की है तो इन दोनों को पूर्णता भी तो प्राप्त करवानी थी ठाकुर को बात सिर्फ यह नहीं है कि उन्होंने भैरवी ब्राह्मणी ने ठाकुर को तंत्र साधना सिखाई और फिर तोतापुरी ने ठाकुर को वेदांत साधना सिखाई उन दोनों की जो कमियां थी इन दोनों में जो अपूर्णता थी वो भी तो ठाकुर को संपूर्ण करनी थी भैरवी ब्राह्मणी उसके हृदय में ठाकुर के प्रति एक कोमल भाव का संचार हुआ था ठाकुर को वो अपने संतान के रूप में देखना शुरू कर दी थी और उसने इस तरह के बातें फैलाना शुरू कर दिया कि ठाकुर की आज की जो सिद्धियां है वह सब मेरे ही प्रयास से हुई है वरना ठाकुर यदि अकेले होते तो व क्या कुछ भी नहीं कर पाते जैसे ठाकुर ने नरेंद्र के बारे में कहा ना कि नरेंद्र यहां पे आया है तो उसकी सभी शक्तियों का पूर्ण विकास हुआ है यदि नहीं आता तो केशव सेन की तरह एक दलपति होकर के रह जाता तो भैरवी ब्राह्मणी ने भी ठाकुर के बारे में ऐसी बात करना शुरू कर दी कि उनकी जो कुछ भी प्राप्ति है जो कुछ भी उपलब्धिया है वह सब मेरी ही वजह से है और ठाकुर के प्रति एक ऐसा एक क्या कहेंगे कि सांसारिक जैसे कि मां का अपने संतान के प्रति जो संबंध होता है ना उसमें एक सांसारिक का तो नहीं कहेंगे किंतु क्या कहेंगे कि स्वार्थ वृत्ति भी नहीं कहेंगे किंतु क्या कहेंगे कि एक तरह से एक जो कि संपूर्ण रूप से सेल्फलेस नहीं है जो कि संपूर्ण रूप से स्पिरिचुअल नहीं है एक नॉन स्पिरिचुअल तरह का एक संबंध जो कि मां और संतान का होता है इस तरह का इनका हो गया था तो ये जो अट्रैक्शन था जो यह संबंध था इसको तोड़ना आवश्यक था तभी कहीं जाकर के भैरवी ब्राह्मणी आखिर अंतिम साधना करके पूर्णता को प्राप्त करती तो वो ठाकुर को करना पड़ा तोतापुरी का था कि वो वेदांत मत को ही स्वीकृत करते थे ये जो मां का अस्तित्व है जगत जननी उसका अस्तित्व स्वीकार नहीं करते थे किंतु ठाकुर का कहना था जब तक हम पंच महाभूत के इस जगत में रहते हैं तब तक आपको महामाया को स्वीकार करना होगा क्योंकि महामाया के राज्य में रहते हैं तो वो उन्होंने म तोतापुरी के पास स्वीकृत करवाया तो दोनों तरह से था कि तोतापुरी और भैरवी ब्राह्मणी दोनों को पूर्णता ठाकुर को दिल वानी थी किंतु वो पूर्णता देने के बाद में ठाकुर फिर से निर्विकल्प समाधि में चले गए और इस बार छ महीने तक सतत निर्विकल्प समाधि में रहे उस समय एक साधु कहां से आ गया उसके हृदय में शायद यह एक बात प्रकट हुई कि हां ठाकुर का जीवन धारण करना समाज के लिए मानव जात के लिए बहुत ही आवश्यक है क्योंकि इस देह से बहुत सारे पवित्र अच्छे कार्य लोक कल्याण के होने वाले हैं उस समय इस साधु ने ठाकुर जब निर्विकल्प समाधि में सतत मग्न रहते थे ज पक गई थी मुंह के भीतर में मक्खियां घुस जाती थी मुंह और नाक के भीतर में पंखी आकर के उनके सर में बैठ कर के वो माला बना दिया करते थे अपना घोसला बना दिया करते थे ठाकुर को पता नहीं रहता था धूल मिट्टी से शरीर पूरा भर गया था उस समय इस साधु ने आ करके ठाकुर को बीच-बीच में कैसे भी करके जोर करके समाधि में से नीचे लेकर आते हैं मारते भी सही मार मार करके ठाकुर को कैसे भी करके बाकी होश दिलवा और ठाकुर जदी थोड़े से होश में आते तो जोर करके उनके मुंह में थोड़ा बहुत खाना घुसा देते तो ऐसा ऐसा करके ठाकुर का शरीर धारण शरीर रक्षा हुई थी छ महीने के लिए तो ये उस इसीलिए पॉसिबल हुआ कि मां की खुद की इच्छा थी जगत जननी महामाया की स्वयं इच्छा थी कि ठाकुर शरीर धारण करके रहे विद्या का अहम या तो फिर लोक शिक्षा का अहम ना कि एक बालक का अहम ठाकुर का अहम कैसा है एक बालक का अहम है एक बालक चाहता है कि हमेशा वह अपनी मां के साथ में कैसे भी करके आनंद करके रहे तो यह जो ठाकुर जो यह बताते हैं यहां पर भक्ति के बारे में जो कुछ भी बातें करते हैं भक्ति दो तरह की है दो स्टेज में हम लोग कहेंगे भक्ति कहो ना कि ये जो रस माधुर्य है भाव माधुर्य है दो स्टेजेस में है एक तो है कि जब हम जगत का जब हम साधक है जब हमको ईश्वर प्राप्ति नहीं हुई है जब हम ईश्वर प्राप्ति के लिए प्रयास कर रहे हैं जब हम अपना सब कुछ ईश्वर को समर्पित कर दे रहे हैं ईश्वर को प्रार्थना करते हैं कि हे ईश्वर तुम्हारे अलावा मेरे जीवन में और कुछ भी नहीं है और सब चीजों का त्याग करते हैं देखिए कि जब हम साधक है ज्ञानी ज्ञान पथ की ज्ञान पथ का त्याग और भक्ति पथ का शरणागति त्याग और शरणा गति दोनों जद हमारे में होते हैं होने ही चाहिए तभी कहीं जाकर के हम संपूर्णता प्राप्त कर सकते हैं साधना में सिद्धि प्राप्त कर सकते हैं भले ही चाहे ज्ञानी लोग इस त्याग ये शरणागति को ऐसे करके पुकारे कि मैं चलो त्याग का शरणागति को वो लोग त्याग का ही एक पार्ट समझते हैं अपने अहम का त्याग करना सब कुछ त्याग करना है काम क्रोध मध लोभ मोह भी त्याग करना है तो साथ में अहंकार को भी त्याग करना है काम कांचन को भी त्याग करना है सब कुछ त्याग करना है तो वे लोग अहम के त्याग को त्याग का ही नाम देते हैं जबकि यह जो भक्त है वे लोग अहम त्याग को शरणागति कहते हैं कि मैं अपने अहम को ईश्वर के चरणों में समर्पित कर देता तो आप नाम कुछ भी दे दोनों के भीतर में नेति नेति है ही है यदि चाहे भक्त ऐसा भी कहे कि मैं ज्ञानी का रास्ता नहीं फॉलो करता मैं नेती नेती का रास्ता नहीं फॉलो करता किंतु यदि आप अपने अहम का त्याग नहीं करेंगे तब तक ईश्वर प्राप्ति नहीं होगी अपने अहम को शरणागत नहीं करेंगे अपने अहम की बलि नहीं चढ़ाएंगे ईश्वर को तब तक आपको ईश्वर प्राप्ति कभी नहीं होगी रंगनाथ आनंद जी का एक बहुत ही सुंदर एक छोटा सा उदाहरण है रंगनाथ आनंद जी एक तो पता है कि भारत के भारत देश की ओर से भारत सरकार की ओर से कल्चरल एंबेसेडर बना कर के उनको अपने धर्म संस्कृति सनातन वैल्यूज का प्रचार करने के लिए तो एक बार इस तरह से विदेश से आकर के रंगनाथन जी कुछ सदों के साथ में बात कर रहे थे अपने अनुभवों का वर्णन कर रहे थे कि विदेश में जाकर के उन्होंने क्या किया क्या कहा वगैरह वगैरह तो बात करते-करते उन्होंने ऐसा कहा कि हां मैं वहां पे गया मैंने ऐसा किया मैंने इस तरह से इंटरव्यू दिया मैंने उस तरह से जर्नलिस्ट के साथ बात किया उस तरह से डिवोर्स के साथ बात किया तो एक साधु वहां पर बैठा था वह सोच रहा है कि महाराज बार-बार मैंने ऐसा किया मैंने ऐसा किया ऐसा क्यों कह रहे हैं आखिर में तो करवाने वाले तो ठाकुर ही है रामकृष्ण संघ में आए हैं तो बोलक के इनकी महत्ता है तो बार-बार मैं मैं मैंने ऐसा किया ऐसा कर रहे हैं तो क्या ये अहंकार का प्रदर्शन नहीं है तो अभी यह साधु का था थोड़ा सा महाराज के साथ में अच्छा एक रेपो था अच्छा एक रिलेशन था तो बोल्डली पूछ ही दिया महाराज को कि महाराज ये क्या अहंकार का प्रदर्शन नहीं है तो महाराज ने इमीडिएट रंगनाथ जी ने इमीडिएट उत्तर दिया कि मेक योर इगो एज हाई एज स्काई इंक्रीज योर इगो स्काई हाई एंड थेंस सैक्रिफाइस इट टू द ल्टर ऑफ श्री राम कृष्णा अपने हमको आकाश की तरह आकाश जितना बड़ा बनाओ आखिर में श्री राम कृष्ण के श्री चरणों में इसकी बलि दे दो तो ये अहंकार की बलि देना इसके बिना भक्त कुछ भी कर नहीं पाएगा तो त्यागी ऐसा कहेगा कि मैं अपने अहंकार का त्याग कर रहा हूं भक्त ऐसा कहेगा कि मैं अपने अहंकार को श्री चरणों में श्री प्रभु के श्री चरणों में शरणागत दे रहा हूं सैक्रिफाइस कर रहा हूं किंतु बात एक ही है अहंकार का त्याग करना ही पड़ेगा और त्याग करते करते जब ईश्वर प्राप्ति भक्त बोलेगा कि मुझे ईश्वर दर्शन हुआ है ज्ञानी कहेगा कि मुझे आत्मज्ञान प्राप्त हुआ है इसके बाद में जब नीचे आते हैं तब आप देखेंगे कि ये यदि मां चाहती है कि शरीर रहे निर्विकल्प समाधि या सविकल्पा समाधि के बाद में वापस आना जीवन मुक्त होक के रहना वो तो मां की इच्छा के बिना होगा नहीं या तो फिर एक हायर एक जो सत्ता है उसकी डिजायर के बिना तो होगा नहीं उसके भीतर में डिजायर होता नहीं है कंट्रक्शन है मने अल्टीमेट ट्रुथ जो है उसके बारे में जितना ही बात करेंगे उतना ही हम शब्दों की माया जल में फंसते जाएंगे तो जो भी है तो जदी वापस आते हैं चच एवर फॉर वच एवर रीजन तो फिर ये जो जो जीवन मुक्त है वो सब कुछ को एक ही ईश्वर मने वही समझेगा जैसे कि यदि ज्ञानी है तो कहेगा कि एक ही आत्मा सभी के भीतर है भक्त है तो जद वही कहेगा कि एक ही ईश्वर सभी के भीतर है उसको फिर यह मेहनत करके त्याग करने की जरूरत नहीं पड़ेगी त्याग अहम त्याग उसके लिए सहज हो जाएगा एक बात और दूसरा कि ईश्वर के साथ में यदि भक्त है तो ईश्वर के साथ में एक मधुर संबंध बनेगा और यदि ज्ञानी है तो ज्ञानी का हृदय जैसे कि भगवान बुद्ध है देखिए कि भगवान बुद्ध ज्ञान के स मने सर्वश्रेष्ठ उदाहरण उनके हृदय में करुणा किस तरह से जागृत हुई कि जितने भी हिंसक पशु थे वो गाय बकरी के साथ में बैठ कर के भगवान बुद्ध के साथ में भगवान महावीर के बारे में भी जब आप महावीर के चित्र देखेंगे जैन महावीर नहीं कि अपने हनुमान महावीर तो ये भगवान जैन महावीर के जब चित्र देखेंगे देखेंगे कि एक शेर है उनके साथ भगवान खुद मने ध्यान मुद्रा में बैठे हुए हैं उनके सामने एक शेर है और एक बकरी है तो ये शेर और बकरी या तो फिर गाय है ये दोनों भगवान महावीर या तो फिर भगवान बुद्ध के बारे में भी इनके सामने इस तरह से बैठे हैं अपनी पशुवैद्यकीय महावीर ज्ञान के सर्वश्रेष्ठ एक तरह से उदाहरण है और यदि भक्ति के सर्वश्रेष्ठ उदाहरण कहे जाए तो यह तुलसीदास है यह मीराबाई है यह चैतन्य महाप्रभु है देखिए कि आप भले ही चाहे किस तरह की फिलोसोफी को फॉलो करते हैं प्रॉब्लम क्या है हमको लगता है कि यह ज्ञान और भक्ति कितना डिफरेंट डिफरेंट है बात वो नहीं है कि ये डिफरेंट है एक्चुअली बेसिक प्रिंसिपल तो सेम ही है वही बात है अभी जैसे जसे कि न्यूक्लियर फिजिक्स है न्यूक्लियर फिजिक्स आप अमेरिका में स्टडी करेंगे तो आपको बोलेंगे एटम है यह न्यूक्लि है यह प्रोटॉन है ये इलेक्ट्रॉन है और वही चीज को आप यदि भारत में स्टडी करेंगे जैसे मैं गुजरात में स्टडी करता था फिजिक्स का तो उसी एटम को बोलते थे अणु है और यह सब एटॉमिक पार्टिकल को बोलते थे परमाणु है तो इस तरह से गुजराती नाम दे दिए इसको भी नाम चाहे आप अंग्रेजी दो ना कि नाम चाहे आप गुजराती दो बेसिक रिया तो एक ही है ऐसा नहीं है कि अमेरिका के एटम और ये सब एटॉमिक पार्टिकल और भारत के एटम सब एटॉमिक पार्टिकल से डिफरेंट है एटम प्रोटॉन इलेक्ट्रॉन ये जो सब जो बेसिक रियलिटी है इस जगत की वो तो वही है तो ईश्वर कहां डिफरेंट होने वाले हैं ज्ञानियों का ईश्वर अलग भक्त का ईश्वर अलग या कि बौद्ध का अलग ना कि क्रिश्चन का अलग ये जो अल्टीमेट रियालिटी तो एक ही है प्रॉब्लम यह है कि उसको समझाने के लिए वाणी छोटी पड़ जाती है हमारी हमारी भाषा हमारे शब्द वहां तक पहुंच नहीं पाते थोड़ा सा आगे जाकर के रुक जाते हैं तो अल्टीमेट सत्ता का निरूपण करने के लिए जो चीज बनी नहीं है मैथमेटिक्स को देखिए मैथमेटिक्स कितना परफेक्टली फिजिकल फिनोमिना को रिप्रेजेंट करते हैं यदि मैथमेटिक्स यह कहेगा कि यहां पर आप 1 लीटर पेट्रोल डालिए तो आपका गाड़ी जो है 20 किलोमीटर ना 25 किलोमीटर चलेगा जितना भी आपका इंजन माइलेज देता है तो एक्जेक्टली वही होगा 1 लीटर पेट्रोल डालने से यदि आपकी गाड़ी का माइलेज 30 किलोमीटर है तो 30 ही किलोमीटर चलेगा वो 40 किलोमीटर ना कि 10 किलोमीटर नहीं चलेगा तो क्या है कि जो फिजिकल फिनोमिना है मैथमेटिक्स उसको परफेक्टली रिप्रेजेंट करता है मैथमेटिक्स के थ्रू आप ये जो बड़े-बड़े जो स्काई राइज बिल्डिंग बनते हैं ये बड़े-बड़े सुपर कंप्यूटर बनते हैं ये आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस बनता है आज हम मार्स के ऊपर में रॉकेट भेज रहे हैं मंगलयान तो भारत ने भी भेज दिया तो यह जो ऑर्बिटल करेक्शन यह थ्रस्ट वेक्टर और यह जो एस्केप वेलोसिटी यह जो सब जो फिजिकल फिनोमिना है उसको आप मैथमेटिक्स से परफेक्टली मैनेज कर सकते हैं टू द टू द थाउज ऑफ पॉइंट ऑफ डेसीमल पॉइंट यहां तक आप इसको परफेक्टली मैनेज कर सकते हैं तो मैथमेटिक्स जो है वो फिजिकल वर्ल्ड को डिस्क्राइब करने की परफेक्ट लैंग्वेज है किंतु ये जो हमारी वाणी जो है हमारे जो शब्द है वो ईश्वर को डिस्क्राइब करने के लिए सफिशिएंट नहीं है इसीलिए जब विभिन्न लोग ईश्वर के बारे में बात करते हैं तो उन्होंने यह विभिन्न दर्शन प्रणालियों का निर्माण किया है अभी हम भक्त या तो फिर वैष्णव ग्रंथ पढ़े तो हमको लगेगा कि अरे वेदांत के साथ में तो इनका कहीं पर भी मेल नहीं है किंतु यदि शब्दों की माया जात के परे जाए यद ये जो एक्चुअल फिजिकल फिनोमिना है जो एक्चुअल रियलिटी जो एक्चुअल डायनेमिक्स है जो एक्चुअल साइंस है वो तो सेम ही दिखेगा आपको वो क्रिश्चियनिटी के भीतर में भी व बुद्धिज्म के भीतर में भी वैष्णव शास्त्र के भीतर में भी योगशास्त्र के भीतर में भी अल्टीमेट साइंस तो एक ही है सर्वप्रथम आपको त्याग करते करते ईश्वर को प्राप्त करना है और यदि उस सर्वोच्च स्थिति पर पहुंच गए एक बार कैसे भी करके और यदि वापस भी आ गए वो वापस आने के लिए कौन सा डायनामिक्स है कौन सा मैथमेटिकल फर्मूला है वो सब तो अभी शब्द से वर्णन करेंगे किंतु वो कोई हमको परफेक्ट वर्णन तो होगा नहीं मान लीजिए कि कैसे भी रीजन से हम वापस आ गए तो जीवन मुक्त होकर के जब वापस आते हैं तो हमारा हृदय खुल जाता है भक्त भगवान के साथ में एक सुमधुर भाव स्थापित करके रहता है और ज्ञानी अपना हृदय के भीतर में दया और करुणा का एक अनंत प्रवाह बहते हुए देखता है तो यह हृदय खुल जाना सर्वप्रथम तो त्याग करते करते ईश्वर को प्राप्त करना या तो फिर समाधि प्राप्त करना और यदि वहां से वापस आ गए तो हृदय खोल कर के पूरे विश्व को अपनी बाहों में उसको धारण करना पूरे विश्व के प्रति प्रेम समादार आदर श्रद्धा सहानुभूति और करुणा का भाव रखना यह है बेसिक सायंस इस साइंस को आप कोई भी शब्द से कहे कोई भी आप किसी भी तरह की डिस्क्रिप्शन आपको दे किंतु यही एक अंतिम सत्य है और इस सत्य को समझ कर के अभी ठाकुर का आप यह पैसेज जो है इसको पढ़िए यहां पे ठाकुर भक्ति के बारे में नहीं कहते भक्ति एसे साधना के बारे में नहीं कहते यहां पे ठाकुर जीवन मुक्त का लक्षण वर्णित करते हैं यानी कि आप यदि कहेंगे कि ठाकुर तो कहते हैं कि भक्ति ही में भक्त होना चाहता हूं मां का संतान होना चाहता हूं त्यागी या ज्ञानी नहीं होना चाहता इसका अर्थ यह है क्या कि ठाकुर भक्ति योग का ज्यादा महिमा गुणगान करते हैं नहीं वो भक्ति योग अलग हो गया जबकि आप साधना के लिए उसका इस्तेमाल करते थे और यह अलग है जबकि आपका हृदय खुल जाता है पूरा विश्व आपको वही ईश्वर का प्रकाश या तो फिर वही ईश्वर ही दिखता है ये बात ही अलग है देखिए कि ये नई अंडरस्टैंडिंग के साथ में ये नई इंसाइट के साथ में इसी पैसेज को फिर से पढ़िए यह जीवन मुक्त मुक्ति प्राप्त होने के बाद का वर्णन है यह सिर्फ भक्ति मार्ग का वर्णन नहीं है देखिए भले ही ठाकुर चाहे शब्द कोई भी यूज करते हो जैसे मैं कहा कि वो शब्द अपने कम पड़ जाते हैं वहां वो सब चीजों को डिस्क्राइब करने के लिए ठाकुर कहते हैं भक्ते और भाव की रूप जानो भक्त का भाव किस तरह का है पता है हे भगवान तुम्ही प्रभु हम तुम्हार दास हे प्र भगवान तुम प्रभु हो मैं तुम्हारा दास हूं तुम मां आमी तुम्हार संतान तुम मां हो मैं तुम्हारा संतान हूं अबार तुम हमार पिता बा माता तुम ही मेरे पिता और माता हो तुम ही पूर्ण हो आही तुम्हार अंशो तुम पूर्ण हो मैं तुम्हारा अंश हूं भक्तो एमन कथा बोलते इच्छा करे ना ज आमी ब्रह्मा भक्त यह कहने की इच्छा नहीं करेगा कि मैं ब्राह्मण हूं क्योंकि यदि मैं ब्राह्मण हूं कहते कहते शायद अहंकार आ पड़े यह मुक्ति के बाद की बात है जबकि हृदय इस तरह से उसका खुल गया है कि यह जगत जो है सब कुछ उसको अपना प्रतीत होता है ईश्वर जो है ईश्वर एक इस तरह की सत्ता है जिसके साथ में उसका एक माधुर्य मय संबंध है वह कभी भी इस सत्ता से परे जाना नहीं चाहता तो यह जो वर्णन है वो सिर्फ भक्ति मार्ग का वर्णन नहीं है ये मुक्त होने के बाद का जो जीवन है उसका वर्णन है इसके बाद में ठाकुर क्या कहते हैं योगी व परमात्मा के साक्षात्कार परते चेष्टा करें योगी भी परमात्मा को साक्षात्कार करने की चेष्टा करता है उद्देश्य जीवात्मा और परमात्मा योग जीवात्मा और परमात्मा का योग योगी विषय थे के मन ड़ लय और परमात्मा के मन स्थिर करते चेष्टा करे योगी विषय अर्थात की इंद्रियों के जितने भी विषय है उस सबसे अपने मन को वापस खींच लेता है और परमात्मा पर मन को एकाग्र करने का प्रयास करता है ताई प्रथम अस्थाई निर्जन स्थिर आसने अनन्य मोन होए ध्यान चिंता करे इसीलिए वह प्रथम अवस्था में निर्जन में स्थिर आसन पर बैठ कर के आसन पे आसन के ऊपर में स्थिर होकर के बैठ कर के अनन्य मन से एकाग्रता से एकाग्र मन से ध्यान चिंता करता है अभी यहां पर देखिए कि जो कीवर्ड है क्या है ठाकुर ने कहा है प्रथम अवस्था है अर्थात कि ईश्वर को प्राप्त करने का जो रास्ता है प्रथम प्रथम आप जब साधना करते हैं साधन भजन करते हैं ईश्वर को अभी प्राप्त नहीं किया है ईश्वर तक आप अभी जा रहे हैं उस अवस्था तक चलते चलते जब यह योगी है सब कुछ त्याग करेगा यह बहुत बड़ी बात यहां ठाकुर ने कही है कि ये प्रथम अवस्था है ये जो त्याग करना है ना मन को सभी चीजों से खींच के ले आना है यह तो साधकों के लिए है भ ये जो सिद्ध है जो कि जीवन मुक्त है उसका मन इस तरह से खुल जाता है इंद्रियों के विषयों के आकर्षण संपूर्ण रूप से दगद बीज हो जाते हैं कि फिर उसको मैं त्याग करता हूं बोलकर के जरूरत नहीं पड़ती यह जो सब आप रियास करते हैं यह जो बड़े-बड़े संगीतज्ञ है ये जो भी है मुझे इतना संगीत के बारे में इतना ज्ञान नहीं है किंतु मैंने पढ़ा है कुछ कुछ के जो लोग जब रियाज करते हैं तो इस तरह से रियाज करते हैं घंटों के घंटों जब वह विद्यार्थी अवस्था में होते हैं जब वह शिष्य की अवस्था में होते हैं तब किंतु जब वो सिद्धि प्राप्त कर लेते हैं उसके बाद में भले ही चाहे वो रियास कंटिन्यू रखे किंतु जब भी वो बासुरी है ना कि तबला है ना कि शहनाई है उसके उसका जो उसके ऊपर में राग जब छेड़ तब वो इतना सुमधुर रूप से प्रकट होगा फिर उनको जद प्रैक्टिस बंद भी कर दे वो करेंगे नहीं हालांकि तो बंद भी करते तो फिर उनके जो राग रागिणी उनकी यह जो सिद्धि है संगीत में उसमें कभी भी कोई भी कमी नहीं आएगी तो यहां पे देखिए कि जब आप साधना करते हैं तब मेहनत करके त्याग करना है किंतु जब सिद्धि प्राप्त हो गई तो आप त्याग स्वरूप हो जाते हैं वैशक जितने भी सब पदार्थ है वैशक जितने भी चीजें हैं आपके मन से ऐसे चली जाएगी जैसे ठाकुर कहते हैं ना बच्चा जब होता है तो खिलौनों के साथ में खेलता है अभी उसके हाथ में से खिलौना खींच लोगे तो बच्चा जोर-जोर से रोएगा किंतु जब ये बच्चा बड़ा हो जाएगा और यह कंप्यूटर वगैरह गैजेट्स उसके हाथ में आ जाएंगे तो वो खिलौने है वो गुड़िया है ना कि वो जो ट्रेन है ना कि वो जो बच्चों के जो खिलौने होते वो कहां चले जाएंगे उसके माइंड से वो पता नहीं चलेगा तो वैसे ही फिर दूसरे खिलौने आ जाए दूसरी सब बैड हैबिट्स आ जाएगी किंतु एटलीस्ट व खिलौने से तो छूट ही जाएगा तो यहां पर भी यह जो विषय के जो प्रलोभन की ये जो चीजें है उसके ऊ पर में से उसका मन इस तरह से चला जाएगा कि फिर उसको कॉन्शियसली त्याग करने की जरूरत नहीं पड़ेगी उसके बाद में उसका मन ऐसे एक उच्च जगत में विचरण करेगा कि जहां पर वह है और ईश्वर है और यदि वो दूसरों को देखता भी है तो उनके प्रति वह सहानुभूति करुणा और प्रेम का संबध रखता है तो यहां पर देखिए कि ठाकुर वैसे योगी का नाम लेकर के त्याग के बारे में कहते हैं कि योगी भी परमात्मा को प्राप्त करने की चेष्टा करता है योगी भी जो है एक स्थिर आसन पर बैठ कर के एक एकाग्र मन से ईश्वर पर मन को केंद्रित करता है किंतु यह सब प्रथम अवस्था में है ठाकुर ने बिल्कुल सुंदर शब्द यूज किया है प्रथम अवस्थाए पहले पहले जब आप नेति नेती करके ईश्वर प्राप्ति कर रहे होते हैं उस समय की यह बात है किंतु एकही वस्तु किंतु एक ही चीज है नाम भेद मात्र नाम सिर्फ अलग है योगी कहेंगे कि पुरुष वेदांती कहेंगे कि आत्मन या ब्रह्मण भक्त कहेगा कि ईश्वर बात एक ही है जिनी ब्रह्मण तिनी आत्मा तिनी भगवान जो ब्रह्मण है वही आत्मा है वही भगवान है ब्रह्म ज्ञानी ब्रह्म जोगी परमात्मा भक्ते भगवान ब्रह्म ज्ञानी का ब्रह्म है योगी का परमात्मा है भक्त का भगवान तो आज यही तक कल फिर से प परी कृ देखिए यह प्रश्न यह प्रश्न मुझे भी हुआ था कि एक साधु के आगमन की आवश्यकता क्यों पड़ी हृदय तो था ठाकुर की सेवा करने के लिए किंतु क्या था ना कि एक निर्विकल्प निर्विकल्प समाधि या यह समाधि सब ऐसी सब बातें है ना कि हृदय की बुद्धि वहां पर काम नहीं करती ठाकुर ने ही शायद हृदय को पहले से ही निरस्त कर दिया हो कि भाई तुम इस अवस्था में ज्यादा कुछ मत देखना करना तो एक संभावना है मेरे मन में भी यह प्रश्न आया था और इसका भी कोई इजी सोल्यूशन नहीं कि उस समय हृदय क्या कर रहा था क्योंकि हृदय अपने मामा को ऐसी अवस्था में देखता और कुछ ना करता यह तो सोचना यह मानना मुश्किल है ऑफकोर्स ये मानना मुश्किल है किंतु अभी कोई रेकॉर्ड नहीं है उन दिनों का इतना डिटेल ठाकुर ने खुद ने कभी ऐसा कहा नहीं कि मैं निर्विकल्प समाधि में था तब हृदय यह कर रहा था वो कर रहा था ठाकुर ने सिर्फ ये साधु के बारे में ही कहा है और इस साधु का नाम भी उन्होंने कहीं पर नहीं किया ठाकुर के साथ में ऐसा व कि हटात एका अभी देखिए कि मां के रहते रहते मने हृदय के रहते रहते यह साधु आकर के ठाकुर की सेवा करता था वो तो हृदय तो एक चीज है मां के रहते रहते ऐसा हुआ था जब मां वो एक समय था ना कि मां बीच-बीच में जयराम बाटी से दक्षिणेश्वर आती थी और दक्षिणेश्वर से वापस जयराम बाटी जाती थी इस पीरियड का हमने काफी विषद रूप से डिस्कशन किया है वर्णन किया है जब हम मां की जीवनी का पाठ कर रहे थे उस समय तो एक समय ऐसा था कि हमने यह पढ़ा भी था उस समय कि मां को गंगा के किनारे रह कर के वहां का ये जो ह्यूमिड एटमॉस्फियर गंगा का उसकी वजह से बार-बार ड जेंट्री हो जाती थी तो उस समय ठाकुर के ये जो कैप्टन बोलकर के एक जो डिवटी था उसने क्या किया कि मां के लिए घर बनाने के लिए कुछ लकड़ियों का जुगाड़ किया और दक्षिणेश्वर गांव में गंगा किनारे से दूर मां के लिए घर बनाया था और एक घर में मां रहती थी साथ में ही हृदय की पत्नी भी रहती थी और ठाकुर बीच-बीच में वहां पर जाते भी थे ठाकुर ने खुद कहा जैसे य कालीवाड़ा ह्मण अपने घर जाते हैं वैसे ही मैं भी अपने घर आता हूं यहां पे और एक बार तो ठाकुर आए थे बारिश ऐसी हो रही कि ठाकुर उस दिन रात को दक्षिणेश्वर नहीं जा पाए थे तो उसी घर में मां के साथ में रुक गए थे तो यह सुंदर वर्णन है उस समय ठाकुर को भी डा जेंट्री हो गई बार-बार शोच जाना पड़ता है और यहां तक कि जो शौच द्वार है वो पूरा मतलब कि वहां पर पे बड़ी ही जलन होने लगी थी उस समय ठाकुर की सेवा करने के लिए कहां से एक साधिका आई एक महिला आई और फिर वह क्या करती थी जो दिया होता है दिए के ऊपर में अपनी उंगली रख कर के फिर जो शौच द्वार होता है जहां पर बड़ा जलन हो रहा था वहां पर वो मसाज करती थी जिससे कि ठाकुर को आराम हो और य तो प्रश्न यह है कि ठाकुर की जब ऐसी परिस्थिति थी कि मतलब वो बिल्कुल ही असहाय हो गए मां उस समय उस घर में रह रही थी वही दक्षिणेश्वर में ही पासी के घर में और फिर इस महिला ने जाकर के एक दिन मां को कहा कि मां ठाकुर की ऐसी परिस्थिति है और तुम यहां पर अकेली रह रही हो ठाकुर से अलग यह तो ठीक नहीं है तो मां ने उस समय एक एक्सक्यूज भी दिया था कि अरे हृदय की भी पत्नी यहां प है मैं जद यहां से चली जाऊंगी तो इसकी इसको कौन देखेगा तो फिर यह महिला ने कहा कि नहीं नहीं यह लोग हृदय की पत्नी की संभाल रखने के लिए और किसी को पॉइंट कर देंगे आप चली आइए और फिर वही मां का हाथ पकड़ कर के मां को दक्षिणेश्वर मंदिर में वापस लेकर आई थी तो बात ऐसी है कि कोई पार्टिकुलर सेवा की जब जरूरत होती है तो उसी तरह के लोग ठाकुर के पास आ जाते थे जिस तरह से ठाकुर को कोई पार्टिकुलर साधना करनी है वैष्णव साधना करनी है तो उस तरह के वो गुरु वहां पर आ गए फिर वो विदान साधना करनी है तो उस तरह के गुरु आ गए तो वैसे ही जिस तरह की सेवा की आवश्यकता थी उसी तरह की सेवा करने के लिए लोग भी ठाकुर के पास आ जाते थे तो व हृदय और यह साधु का सिर्फ अकेला मामला नहीं यह मां का भी ऐसा ही साथ में ऐसा हुआ था यहां पर कैसा है पता है मान लीजिए कि हमको यह प्रिविलेज मिलता तो क्या हम उसको यूटिलाइज कर पाते मैं मेरा पोस्टिंग हुआ था नागपुर को जब मैं जवाइन किया था उसके बाद में इमीडिएट नागपुर में मुझे भेजा गया तो वहां पर अपने ऑर्डर के संस्कृत के सबसे श्रेष्ठ जानकार लोगों में से एक साधु वहां पर थे तो उन्होंने कहा कि मैं तुमको संस्कृत सिखाऊंगा तुम प्रतिदिन मैं तुम्हारा एक क्लास लूंगा तुम प्रतिदिन आना मेरी ऑफिस में तो मैंने कहा अरे महाराज दोपहर को क्लास करना यह सब क्या है और मेरा संस्कृत सीखने का ऐसा कोई कोई इच्छा नहीं है क्या आप मुझे यहां पर बिना मतलब आप परेशान कर रहे हैं किंतु उनकी बड़ी इच्छा थी वो तो संस्कृत के पंडित थे और इच्छा भी कि चलो ये नया नया ब्रह्मचारी है इसको भारतीय शास्त्र में यदि प्रवेश करना है तो बिना संस्कृत के नहीं कर पाएगा भले राम कृष्ण विवेकानंद लिटरेचर पढ़ ले वो तो इंग्लिश बंगोली है क्योंकि कोई बहुत बड़ी बात नहीं है यह सब लैंग्वेज सीखने किंतु यदि उपनिषद गीता भागवत वगैरह में जाना है तो बिना संस्कृत के नहीं जा पाएगा तो मुझे बड़ा समझाया अरे भाई देखो तुमको जद साधक जीवन में उन्नति प्राप्त करनी है तो शास्त्र पाठ करना ही होगा संस्कृत पढ़ना ही होगा प्रतिदिन मेरे पीछे लगे छ महीने तक और छ महीने तक में मैंने शायद छह क्लास किए होंगे उनके आखिर में वो परेशान हो करर के मुझे छोड़ छोड़ दिए तो देखिए कि यह जो प्रिविलेज अपने ऑर्डर के सर्वश्रेष्ठ संस्कृत पंडित खुद मुझे सिखाना चाहते मैंने नहीं सिखा तो प्रिविलेज मिलने से भी हम कोई उसका बेनिफिट लेंगे वो कोई ठीक नहीं है हम लोगों के साथ में प्रॉब्लम यही है कि प्रिविलेज आ भी जाए तो भी कुछ होने अभी स्वामी जी की तरह हम ठाकुर के पास जाते चलिए तो फिर ठाकुर ने जिस तरह से स्वामी जी के पास साधना करवाई वो जो फेमस उदाहरण है ना गिरीश घोष और स्वामी जी दोनों स्वामी जी नरेंद्र वहां पर पं बेलतला के नीचे में बैठ कर के ध्यान कर रहे हैं गिरीश घोष मच्छर की वजह से मच्छर की परेशानी की वजह से ध्यान नहीं कर पा रहा आंख खोल के देखा कि नरेंद्र के पूरे शरीर पर इस तरह से मच्छर बैठे हुए जैसे काले कंबल से अपना देह उसने ढक करके रखा है वो टेंशन में आ गया नरेंद्र को धक्का मारा जोर-जोर से चिल्लाया नरेद उठो काष्ठ वत हो गया था पत्थर की तरह जिस मुद्रा में बैठे थे उसी मुद्रा में गिर तो ऐसी साधना जब स्वामी जी ने की है हमको यदि ठाकुर स्वयं गुरु के रूप में मिल जाते क्या हम इस तरह की साधना करते हैं ना कि ठाकुर के पास जाकर के लिप सर्विस दे कर के फिर वो हंसी मजा करके वापस चले आते हैं वो भी तो एक देखने वाली बात है यहां पर सबसे पहले तो अधिकारी भेद समझना है वो जो सर्वोच्च अधिकारी होते हैं भगवान बुद्ध भगवान राम कृष्ण भगवान बुद्ध ने राज्य वगैरह छोड़ करर के जन वन में जाकर के तपस्या की यहां तक कि अपने गुरुओं को भी एक समय छोड़ दिया था और भयानक कठोर तपस्या कर रहे थे कठोर तपस्या करके निर्वाण प्राप्त हुआ तब उन्होंने सोचा कि क्या मैं शरीर त्याग कर दूं जीवन का जो अंतिम उद्देश्य है वह तो प्राप्त हो चुका है तब वह बधे वृक्ष के नीचे में वो एक मतलब वो चलते चलते टहलते टहलते यह सोच रहे है वो उनके जो पद चिन अभी भी वहां पर वो है बोध गया जाएंगे आखिर में उनको लगा कि नहीं ऐसे बहुत सारे लोग हैं कि जो कि निर्वाण प्राप्ति के लिए प्र कर रहे हैं तो मैं उनको मार्गदर्शन दे सकता हूं तो वो जो नेती नेती करके सब त्याग करके सर्वोच्च निर्माण प्राप्त किया फिर इती इती करके वो साधक जो कि निर्वाण प्राप्ति के लिए प्रचेता कर रहे हैं उनके कल्याण के लिए जगत में वापस आए ठाकुर का भी देखिए कि नेती नेती करके जब साधन भजन कर रहे थे पूरे जगत से उनका कोई नाता नहीं था किंतु जब वोह सिद्धि प्राप्त कर ली तब खुद कहीं जाकर के वो जो मथुर बाबू जिस मकान पर रहते थे कोठी वहां उसकी छत प जाकर के पुकारते हैं कि अरे भक्तो तुम कहां पे हो आओ यह सब तो ये ये उच्च साधक जो होते हैं उनके जीवन में नेती नेती फिर सर्वोच्च सिद्धि और फिर इति इति यह आपको बड़ा स्पष्ट दिखता है जीसस के भी आप लाइफ में देखिए कि मरुभूमि में रण प्रदेश में चले गए थे एकांत में तपस्या की थी फिर जब सिद्धि प्राप्त की तो फिर से वह शहर में गांव में वापस आए अभी हम लोग जो है हम लोग या तो निम्न या तो फिर मध्यम कक्षा के साधक है हम लोगों के लिए नेति नेति करके त्याग करना तो संभव ही नहीं आप त्याग करके क्या करेंगे जंगल में चले जाएंगे क्या बिल्कुल अकेले प्रचंड तपस्या से हम मेरे मैं नहीं रह पाऊंगा मुझे तो सब समय कुछ ना कुछ ये रजस का कुछ चाहिए राजसिक या लोगों के साथ में बात करनी है कर्म है जो हमारे भीतर में कर्म तो करना पड़ेगा वरना तो हम पागल हो जाएंगे मैं खुद देखता हूं कि यदि मेरी ऐसी अवस्था आई कि मुझे बिना कर्म के कहीं पर रहना पड़े तपस्या तो मुझे नहीं लगता कि मैं 30 दिन से ज्यादा रह पाऊंगा मैंने ये प्रयास करके देखा है 30 दिन मैक्सिमम हो गया उसके बाद में तो मुझे कुछ ना कुछ कार्य करना ही पड़ेगा िस में बैठ कर के कुछ ना कुछ तो अपना यह कर्म प्रवण मन है कर्म का त्याग हम इजली नहीं कर पाएंगे तो क्या करना है कर्म को सात्विक बना देना है कर्मों को ईश्वर की ओर मोड़ देना है जो कुछ भी कर्म करे उस सभी कर्मों में कैसे ना कैसे ईश्वर की उपासना छुपी चाहे वो हम स्वाध्याय करें ना कि हम साधन भजन करें नाही ही कि हम भजन कीर्तन करे मंदिर में जाए उत्सव में भाग ले सेवा कार्य करें जो कुछ भी करें जो कर्म है कर्म का त्याग हम नहीं कर पाएंगे जो लोग कर्म का त्याग करके साधना करते हैं उन लोगों की कैटेगरी ही अलग है हम लोग जो कि कर्म का त्याग नहीं कर पाएंगे हम लोगों के लिए जो रास्ता है कि कर्म को सुसंस्कृत कर दे फिर इवेंचर आएगी कि हम कर्म का त्याग कर पाएंगे जब हम कर्म का त्याग कर पाएंगे तब तो हम सही सही साधक अवस्था में पदार्पण करेंगे तब तो हम कहीं कहीं एक्चुअल साधना प्रारंभ करेंगे तो यह दो स्टेजेस है जब तक हम कर्म के क्षेत्र में है ये महामाया कामिनी कांचन यह सब शब्दों को फिलहाल भूल जाए हम लोगों का सबसे बड़ा इवन जो आदमी बहुत बड़ा त्यागी भी है वो कर्म का त्याग नहीं कर पाएगा कर्मा एक ऐसा बंधन है कि आप जितने भी लोग इस युग में सभी को पकड़ करके रखा है ये ठाकुर कहते हैं ना अनगतला कलित अनगतला इसका अर्थ क्या है कि हम सभी लोग अन्न और अन्न से उत्पन्न होते हुए कर्म के बंधन में है इसके बिना हम नहीं रह पाएंगे तो जब तक कर्म है तब तक कर्म को सुसंस्कृत करें और जब कर्म का बंधन थोड़ा बहुत शिथिल हो जाए तब कहीं जाकर के एक्चुअल साधना नेति नेति की साधना प्रारंभ आप वहां पर गए थे तो आप वहां पर कितने दिन रह पाते हैं आप सोच के देखिए मायावती में व जो एक एक राजा ने साधु को कहा साधु बोलता है राजा को चलो मेरे साथ में वन में जाकर तपस्या करो तो राजा बोलता है यदि मैं वन में आऊंगा तो वहां पर एक दूसरा राज्य खड़ा हो जाएगा भगवान कृष्ण अर्जुन को कहते हैं कि तुम्हारी हड्डियां तुमसे युद्ध करवाएगी कर्म जब तक अपनी हड्डियों में है तब तक साधना प्रारंभ ही नहीं होगी पहले कर्म को सुसंस्कृत करके उससे पीछा छोड़ आओ बाद में असली साधना प्रारंभ होगी कर्मों को सुसंस्कृत करके इसके अलावा कोई उपाय नहीं है कि जो कर्म करते हैं उसी को धीरे-धीरे करके ईश्वर की ओर मोड़ दो जो हमारे भीतर में जितनी भी कामना वासना है ईश्वर की ओर मोड़ दो क्योंकि इसके त्याग त्याग तो नहीं कर पाएंगे त्याग जद हम बोलेंगे कि मैं करता हूं तो वो त्याग है ना तमस में जाकर डुबा देगा हमको वो रजस से हमको सत्व में तो बिल्कुल नहीं ले जाएगा सीधा तमस में ही फेंक देगा तो जो भी कर्म करते हैं उसको अभी जैसे कि देखिए कि हम लोग यहां पर सेवा कार्य करते हैं तो आप लोगों के लिए है कि दान दक्षिणा देना जो भी है मतलब अपने हिसाब से देख लेना है मैं सेवा करता हूं या तो फिर सेवा नहीं हो पाता तो फिर कर्म का जो एक हिस्सा है उसको मैं समाज को है समाज के उद्धार के लिए मैं उसका इस्तेमाल करता हूं जो भी है बहुत सारे लोग क्या करते हैं कि वो लोग ठीक करके रखते हैं कि 10 पर अपना जो होता है आए उसको मैं मंदिर में दूंगा या ऐसा कुछ तो उसको कैसे भी करके सुसंस्कृत करना है कर्म को वो अपने हिसाब से देख लेना है कि मैं शक्ति मेरी कितनी है कितना मैं कर पाता हूं क्योंकि फिर वो घर भी तो है और जब तक प्रचंड वैरा के नहीं आता तब तक घर छोड़ देना घर के परिवारों की चिंता छोड़ देना वो तो ठीक नहीं है फिर वो ठाकुर के पास में वो ठाकुर ने खुद भी कहा था ना व प्रताप का भई आया था यहां पे तो उसके घर के जो पति पत्नी उसके जो पत्नी हो और उसके बच्चे हैं क्या पड़ोसी लोग उसको देखेंगे क्या मैंने उसको डांट करके वापस भेजा जाओ पहले उनकी संभाल रखो फिर यहां पे आओ तो ठाकुर ऐसा नहीं है कि त्याग को डिस्कस करते हैं ठाकुर तमस को डिस्कस करते हैं मन के भीतर में वास मतलब कर्म का प्रवाह बह रहा है आप जोर जबरदस्ती करके छोड़ के यहां पे आते हैं तमस में ही डूब जाएंगे ऐसी भयानक विकृति आ जाएगी कि वो डेंजरस है तो यह जो बड़ा ही सेंसिटिव मतलब यह पूरा रास्ता है त्याग आप कैसे करें फट करके त्याग कर दिया तो सीधा विकृति के रास्ते प धीरे-धीरे करके स्टेप बाय स्टेप स्टेप बाय स्टेप अपनी यथाशक्ति अपने जो कर्म है उसको या तो फिर सेवा कीजिए या तो फिर दान दक्षिणा दीजिए और वहां से शुरू करके धीरे-धीरे करके परिवार जन है तो फिर कर्मा है उससे धीरे-धीरे करके मुक्ति पाइए देर इज नो अदर वे अभी देखिए मैं एक उदाहरण देता हूं भाई को मैं पहचानता हूं वो वैसे अपने अपने साथ में जुड़े हुए नहीं है जैन है और अपने समाज में उनका बड़ा नाम है तो जहां पे भी वो जाते हैं ना समाज का सब भी काम करेंगे वो उनके जो समाज के प्रमुख वगैरह जो होते हैं वो भी रह चुके हैं और जब प्रमुख थे अभी तो नहीं है जब थे तब सभी लोग कहते थे कि अरे भाई वो जब प्रमुख थे ना तब हमारी ब सब लोगों को सामने से फोन करके पूछेंगे कि भाई तुम कैसे हो कहां पे हो क्या कर रहे हो तो सभी लोग उनकी प्रशंसा करते थे कि ऐसा प्रमुख हम ने समाज का नहीं देखा कि सामने से फोन करके हमारी चिंता करें ऐसा उन्होंने सुनाम बना दिया था अभी उनकी उम्र काफी बड़ी हो चुकी है तो अभी वो घर में शांति से रहते हैं और उनके साथ बात करके मुझे भी आनंद आया कि हां चलो ये मन शांत है इनका तो देखिए कि एक समय जब था युवावस्था थी कर्म का जब रजस का प्राम था तो उन्होंने उसका सदुपयोग कर लिया लोगों को स पूछा सहानुभूति से भाई कोई मदद की जरूरत है तो बोलो छोटी-छोटी चीजें होती है ना अभी जिसके घर घर में सिर्फ महिलाएं हैं पुरुष नहीं है तो बोला कि चलो दवाई लेकर आनी है तो मैं तुम्हारे लिए ले आता हूं छोटी छोटी चीजें वो लाइट का बिल भरना है तो चलो भर देता हूं अभी तो सब ऑनलाइन हो गया है पहले तो ऐसा कुछ नहीं था तो ऐसी उन्होंने बहुत लोगों को बहुत मदद की थी तो अभी मैं उनके साथ में बात करके देखता हूं मन शांत है रिटायर हो गए हैं ऑलमोस्ट रिटायर होने के वाले हैं तो देखिए कि जब रजस का प्राम होता है तब उसको इस तरह से उसको यूज कर लेना है सत्कार्य के लिए फिर जब आप रिटायर होंगे अभी इस एक जन्म की तो साधना नहीं है जन्म जन्मांतर की है तो धीरे धीरे करके देखेंगे कि आपका मन शांत हो जाएगा उस समय आप जब बैठे ही है ना कुछ भी नहीं कर र है सिर्फ बैठे है वो जो राजा महाराज का फेमस चित्र है ना कि वो आराम चेयर प वो जो इजी चेयर पर बैठे बैठे हुक्का पी रहा है तो वो कर कुछ नहीं रहे सिर्फ हुक्का पी रहे है किंतु जो पिक्चर है उससे पिक्चर देख कर के लगता है कि उनका मन विचरण कर रहा है ब्रह्म भाव में मेरा सद नसीब था कि उस चेयर को क्लीन कर ने का मुझे मौका मिला था वो बेलून वट में ड्यूटी देते हैं ना सब ब्रह्मचारी को तो राजा महाराज का जो समाधि मंदिर है उसके फर्स्ट फ्लोर पर वो चेयर रखी हुई है तो दो महीने के लिए मुझे राजा महाराज समाधि मंदिर में वो सेवा करने का मौका मिला था तो चेयर को में प्रतिदिन क्लीन करता था और प्रतिदिन में विजुलाइज करता था कि राजा महाराज इसके ऊपर बैठ कर के हुक्का पी रहे हैं और मन क ही वो ब्रह्म भाव में विचरण कर रहा है तो वो आपको फिर वो मेहनत करके वो नहीं करना पड़ेगा कि मन मेरा ब्रह्म भाव में जाए ईश्वर के पास आप शांत हो कर के बैठेंगे वैसे ही मन एकाग्र होना शुरू हो जाएगा आपको मेहनत करके ठाकुर की तरह ठाकुर को मन को नीचे लाने के लिए कहते हैं मैं हुक्का पिऊंगा ऐसा कोई कामना वासना करनी पड़ती थी ऐ सब उल्टा हो जाएगा फिर व सीधा रॉकेट की तरह ईश्वर की ओर जाना शुरू कर देगा इसीलिए वो मायावती में रिट्रीट रखते हैं हर साल ठीक है क म बैक