Transcript
और हमको पता है की ठाकुर के महासमाधि के बाद में यह जो यंग लड़के लोगों ने ये जो भरा नगर मत शुरू किया और वहां पर तपस्या करने की शुरुआत की तो बहुत लोग उनको कुछ भी रहे द की अरे मतलब रामचंद्र दत्त जैसे लोग जो ठाकुर के गुरु ही भक्त द उन्होंने कहा भी सही की ठाकुर ने तो हमको सब कुछ देती है स्पर्श करके हमको वो जो है सब वो आध्यात्मिक अनुभूति भी दे दी है कल pataruddin को तो अभी ये सब बिना मतलब की तपस्या आप लोग क्यों करते हैं घर चले जाइए माता पिता की सेवा कीजिए नौकरी वगैरा कीजिए जो भी है एक अच्छा सा grohat लाइव लीड कीजिए संन्यास जो है वह सब चीजों में मत जाइए किंतु उसे समय किसी ने राजा महाराज को पूछा था की आप इस तरह से तपस्या क्यों कर रहे तो राजा महाराजा ने उत्तर दिया था बेटा बंगाली में कहा था की इसको मेरा अपना कर लेने के लिए अर्थात ठाकुर ने जो अनुभूति दी है ठाकुर के आशीर्वाद से प्राप्त हुई है किंतु मैं यदि अपने से स्वैप प्रयत्न करूंगा तो वो उसे अनुभूति उसे atyatmik ऊंचाई पे मैं अपने आप जब भी इच्छा होगी मैं उसके ऊपर में जाके विराजमान हो पाऊंगा तो इसलिए जो ठाकुर जो है ये ऐसा नहीं है की जो भी उनके पास आया तो एकदम ही बहुत ही ऊपर उसको लेवल पे उसको उठा देंगे देखेंगे इनकी इसका लेवल इतना है तो वहां से एक स्टेप दो स्टेप तीन स्टेप इतना उसको उठेंगे बाद में जो है उसकी खुद की साधना उसकी तपस्या कितनी है उसके अनुसार वो आगे बढ़ेगा इसलिए जो है ठाकुर सबको इस तरह से टेस्ट भी करते हैं उनको उनका जो अहंकार है इस तरह से उनको धक्का पी देते हैं जिससे की वो हिल जाए और ऐवेंंचुअली टूट जाए है तो ठाकुर ने कल कहा था की तुम्हारा सरकार पर विश्वास है या निराकार पे तो हमने देखा की किस तरह से सरकार निराकार यह सब जो डिबेट है उसे समय के ब्रह्म कोलकाता के मद्रास समाज में वो ये सब डिबेट हुआ करती थी कोई कहता था की ये जो मूर्ति पूजा है ये मूर्ति पूजा का ही मूर्ति पूजा ही एक रीजन है जिसने की भारत में इतनी andhshrad था इतना ये जो भारत का जो सामाजिक और आर्थिक पाटन हुआ है उसके पीछे यह जो धार्मिक अंदर श्रद्धा है जैसे की सती प्रथा बलिया विवाह प्रथा ये सब जो है वो भारत के धार्मिक सामाजिक राजनैतिक और आर्थिक पाटन के लिए जिम्मेवार है और यह जो अंधश्रद्धा है उसके पीछे का कारण क्या है तो पीछे का कारण है की ये मूर्ति पूजा तो मूर्ति पूजा को छोड़ो यह जो दो हाथ वाले या चार हाथ वाले ये जो देवी-देवता है उनको भी छोड़ दो एक जो निराकार ईश्वर है जिसकी कल्पना खास करके जो क्रिश्चियनिटी में या तो फिर इस्लाम में की गई है अल्लाह को अल्लाह का वैसा कोई मूर्ति वगैरा नहीं होता ये उसे आइडियल एजेंट उसे सिमिलरली एक जीसस का तो आप मूर्ति वगैरा बनाएंगे किंतु ये जो फादर इन हेमंत है उनका कोई इस तरह से कोई शॉप नहीं है ही इसे unship फॉर्मलेस आइडिया तो इस तरह से हिंदू धर्म में भी निराकार ईश्वर को हमको चालू करना चाहिए उनकी पूजा वगैरा जिससे क्या होगा पूजा तो नहीं किंतु हम साधना का सकते हैं वह तो उससे क्या होगा की ये जो मूर्ति पूजा चली जाएगी तो हमारी अंदर श्रद्धा भी जाएगी अंदर श्रद्धा जाएगी तो हो सकता है आर्थिक राजनीतिक हमारी उन्नति हो तो ये सब डिबेट चल रही थी तो इसीलिए ठाकुर ने मास्टर महाशय को पूछा की सागर पे विश्वास है की निराकार पर विश्वास है तो मास्टर है की अभी तो मेरा विश्वास निराकार पे है तो ठाकुर ने क्या कहा की अच्छा यदि तुमको निराकार पर भी विश्वास हो तो कोई दिक्कत नहीं है किंतु यह जो रास्ता तुमने चुना है उसको निष्ठा के शाहिद पकड़ कर रखना क्योंकि हम लोग यदि सहकार ईश्वर की आराधना करते हैं या तो फिर निराकार ईश्वर की हुई मतलब साधना करते हैं इंपॉर्टेंट चीज क्या है की निष्ठा इस सत्य और ब्रह्मचर्य अहिंसा असते परिवार यह जो सब यह नियम जो बताए गए हैं हमारे धर्म में वह है और फाउंडेशन और सिर्फ हमारे धर्म में भी नहीं यह जो वेद होप चैरिटी जिसको बोलते हैं क्रिश्चियनिटी का या तो फिर ये जो माध्यम मार्ग है बुद्धिस्म का या तो फिर ये क्रिश्चियन इस्लाम में भी ये जो साधना जो है उसका फाउंडेशन हमेशा होता है यह जो सदाचार सद्गुण यही साधना के आधार स्तंभ होते हैं तो जब तक हम सदाचार सद्गुणों को पकड़ के आगे वर्ड बढ़ेंगे यह जो वैल्यूज जो है उसका हम अपने जीवन में उसका हम इंप्लीमेंटेशन करेंगे तब तक जो है की हमारी आराधना ठीक थक चलेगी इसलिए ठाकुर कहते हैं की भले तुम चाहे निराकार में भी विश्वास करो रिजल्ट मैटर किंतु निष्ठा के सही वो करना अच्छा अभी जब ठाकुर ने ये कहा की दोनों सत्य है यह सुनकर के मास्टर महाशय थोड़े से चकित हो गए अभी इसका रीजन भी है की मास्टर महाशय है की उसे समय का यह जो फिलोसॉफिकल लिए जो इतिहास वगैरा है सब लोग यही कहते हैं की मैं जो कहता हूं वो सत्य है बाकी सब गलत है यदि आपके श्री क्रिश्चियन पादरी को मिलेंगे वो कहेंगे की जल्दी साल्वेशन चाहिए तो जीसस क्राइस्ट के थ्रू ही जाना होगा मुस्लिम को मिलेंगे तो वो कहेंगे की जो पैगंबर जो है उन्हें के थ्रू आपको मुक्ति मिलेगी हिंदू धर्म में जनरली ऐसा नहीं है किंतु फिर भी उसे समय यह जो वैष्णव शास्त्र इन लोगों में थोड़ा बहुत चलता रहता था वैसे हम लोग कहते द की यह जो भागवत सागर पार करने के लिए आपको जो यह है मतलब जो कंडारी अर्थात वो जो क्या बोलेंगे और वो आपको बहुत सागर में एक छोड़ से दूसरे छोड़ लेख बोलेंगे ही वो कृष्ण पर रख दिया है अपने नौकर के रूप में वो जो मैन भगवती की आराधना करेंगे उनको कृष्ण जो है वो यहां से वहां ले जाएंगे तो ऐसा वैष्णव शास्त्र में ठाकुर की मतलब उदाहरण है ठाकुर उदाहरण देते हैं तो इस तरह से शर्तें वैष्णो में भी थोड़ा बहुत चलता रहता है किंतु हम लोग जो है हिंदू जो हिंदू धर्म के जितने ही चाहिए ब्रांचेस को जितने भी स्कूल को हम इतने फोनेटिक कभी नहीं होते हैं एक बहुत सुंदर कहानी है ये जो द्वीप अद्वैत में कभी-कभी ये ढूंढ होता रहता है तो एक कोई बोलेगा की athvahit यानी की जो है ईश्वर जो है निराकार नहीं किंतु ईश्वर मेरे हृदय में मेरा जो यह प्राणशक्ति है मेरी यह जो चेतना है वही ईश्वर सब है वही जो आत्मन ही है या तो ब्राह्मण है वही सर्वोच्च सत्य है और ध्वनि क्या कहेंगे की मैं यदि अपने को भगवान कहना शुरू कर दूंगा में तो घर भ्रष्टाचार में डूब जाऊंगा इसके लिए भगवान बाहर कहीं आकाश में स्वर्ग में वैकुंठ में विराजमान है और मैं यहां पे पृथ्वी पे उनका भक्त हूं और मैं उनकी उनकी पूजा करता हूं तो ये जो अद्वैत वाले हैं वो कहेंगे की जब भी भगवान आकाश में रहते हैं तो फिर क्या होगा की आप सही सही कभी भी ईश्वर प्राप्ति नहीं कर पाएंगे क्योंकि इस देश में अब स्वर्ग में नहीं जा सकते मृत्यु के बचाना होगा तो ये सब उन लोगों पे भीतर में झगड़ा चलता रहता है तो एक बहुत अच्छी सी कहानी है वेदांत हमारे शास्त्र में इस तरह से जो समन्वय जो लोग करते हैं वो इस तरह से सब कहानियां बनाते हैं तो एक मंदिर था एक गांव में हमको पता है की पुराने समय में क्या होता था यह जो साधु है सन्यासी है साधक है vilupti यात्रा किया करते द तो तीर्थ यात्रा के मार्ग में जितने भी ये जो गांव वगैरा आते द उनमें गांव के बाहर एक मंदिर या इस तरह से कुछ बना के रखते द जहां भी ये उसे संत लोग जो है थोड़ा विश्राम कर सके और वह गांव में से भिक्षा कर सके ठाकुर के बारे में यह है की वो जो कमरपुकुर के बाहर में एक इस तरह से जगह पे कुछ सतुल आए द तो बालक गधा धर ठाकुर बच्चे द उनका नाम था दादा धन बीच-बीच में जाकर के उनकी वो जो है थोड़ी बहुत सेवा किया करता था उनका जो छोटा मोटा कम है वो किया करता था क्योंकि गदाधर के भीतर में सन्या से या तो ईश्वर मैं जो जीवन है उसके लिए इतनी आत्म मतलब श्रद्धा भक्ति थी तो किसी दिन किसी साधु ने गदर को वो जो है कोपेन पहना दिया और गेरुआ वस्त्र पहना दिया तो ये सोच कर के की बहुत सुंदर लगता है गेरुआ कपड़े ही दिए पलक गदाधर का शरीर का वर्णन भी था एकदम गोरा था तो एकदम गेरुआ कपड़ा पहनने से लगता है जैसे की उनका जो हृदय है उसमें से वो जो हम लोग तपस्या की अपनी है वो prasfunit हो रही है इतना सुंदर दिखते द वह बच्चे के रूप में तो दौड़ के गए मैन के पास देखो मार दोनों साथ उन्होंने मुझे गेरुआ पहनाया उन्होंने ये सब भजन वगैरा सिखाया मैन चंद्रमणि देवी एकदम बेचारी दर गई अरे साधु लोग मेरे बच्चे को उठाकर चले जाएंगे तो क्या होगा और माना कर दिया की फिर से वहां पर मत जाना वर्ण मार्ग खाएगा तो फिर जब साधुओं को पता चला तो उन्होंने आकर के चंद्रमणि देवी को कहा की नहीं हम लोग बच्चों को नहीं उठाते हैं आपका बच्चा बहुत ही सुंदर है और बहुत ही धार्मिक प्रकृति वैन इसलिए हम उसको हम थोड़ी बहुत अच्छी-अच्छी चीज सीखते हैं तो मैन चंद्रमणि देवी ने फिर उससे आश्वस्त होकर के गदधर को परमिशन दे देगी भाई ठीक है तुम जाओ उनके साथ बात वगैरा करना तो इस तरह से हमारे जितने गांव वगैरा द वहां पर गांव वालों की आस्था भक्ति श्रद्धा इतनी थी की साधुओं की सेवा के लिए इस तरह से कोई कुटीर वगैरा बना कर रख देते द तो एक गांव में एक कुटीर में दो साधु इकट्ठा हुए एक दिन रात को अभी एक साधु है वह advaitpanthi है और दूसरा साधु है वह द्वित पढ़ी है तो अद्वैत वाला साधु जो है है उसने अपनी कुटीर की दीवार पर लिख दिया सब कुछ लिखते हैं स्तोत्र लिखते हैं कुछ जैसे की साधना करने में उनको मतलब उद्दीपन मिले हमने पहले कुछ दिनों पहले ही डिस्कस किया था की हमारा जो वराह नगर मठ सर्वप्रथम मठ वहां पर गुरु भाइयों ने दीवार पर लिखा था की यहां से तुम्हें अर्थात यह जो भगवान बुद्ध ने जो आखिरी रात को जिस दिन उनको ये जो निर्वाण प्राप्त होने वाला था उसे दिन उन्होंने प्राण किया था की इस आसान पे में विराजित होगा और मेरे शरीर की हड्डियां हैं मेरे शरीर की ये जो अस्थि मजा है वो गल के चली थी क्यों नहीं जाए मैं अस्थि चर्म सर भी क्यों ना हो जाऊं इस आसान से में तब तक नहीं उठूंगा जब तक मैं निर्वाण प्राप्त ना कर लो तो इस तरह से वो उनका यह जो यह है भगवान बुद्ध का यह बच्चा ललित विस्तार में है बहुत ही सुंदर श्लोक है मेरा बहुत फेवरेट है तो यह गुरु भाइयों ने यह जो वराह और मटकी दीवार पर लिख दिया था तो इस तरह से साधु सन्यासी लोग कभी कुटीर में रहते हैं मंदिर में रहते हैं आश्रम में रहते हैं मठ में रहते हैं तो इस तरह से साधना को uddipit करने वाले सूत्र कहीं पे दीवार पे लागू किसी ये जो अद्वैत वाले साधु द महात्मा जी उन्होंने लिख दिया की शिव वो हम अभी ये जो शिवोहम है वो athvahit साधना का एक बहुत ही एक मतलब इंपॉर्टेंट मंत्र है कहते हैं की मैं ही शिव हो शिव हम अर्थात में ही शिव हूं अभी ये देख करके ये जो dhuhit वाले हैं वो लोग बड़े नाराज हो जाते हैं अरे तुम खुद अपने को शुरू करना शुरू कर दोगे तो अभी तुम भ्रष्टाचार कब से शुरू करोगे किसको पता ये कहो की मैं शिव का दास हूं फिर चली तुम का तुम्हारा जो हम जब खत्म हो जाए तब कहीं जाकर के तुम जो है की आध्यात्मिक जीवन में आगे बढ़ोगे पहले दिन से क्या शिवम शिवम माने यह सब दोनों का डिस्प्यूट हम डिटेल में नहीं जाता किंतु वाले साधु ने वो जो कोयला से वह लोग लिखते हैं वह शिव हम के आगे में एस लिख दिया सदा तो उसका अर्थ क्या हुआ क्या था उसका शिवोहम ना सोहम नहीं अर्थात ईश्वर जो अर्थात आत्मा या तो फिर ब्राह्मण वो ब्राह्मण जो है वो में हो सह हम सोहम ऐसा वो साधु ने अद्वैत वाले साधु ने लिख दिया था हम लोग ये शो हम मंत्र जो है बहुत सारी जगह पे देखते भी होंगे बहुत सारी कंपनियों जो है वो कॉर्पोरेट अपना सोहम नाम भी रखती है जैसे की ये कोई बड़ा कॉमन नाम हो तो जो भी है सो हम लिख दिया उन्होंने उसके आगे लिख दिया उन्होंने लिखा था सोहम अर्थात मैन है या तो ब्राह्मण है मैं वही हूं हम अर्थात में तो उन्होंने ये जो खेत वाले भक्ति पंथ वाले जो महात्मा जी द उन्होंने एस के आगे दा लिख दिया मैंने वो दिखाने के लिए भैया जो dhwahit वाला जो है वो तुम्हारे से बड़ा हमने भक्ति मार्ग जो है वो ज्ञान मार्ग से ज्यादा बेहतर है तो दा लिख दिया वो सोहम के आगे तो क्या होगा उसका अर्थ दासो हम में दास हूं मैं वो नहीं हूं मैं ईश्वर नहीं हूं मैं ईश्वर का दास हूं तो ऐसा दसों हम लिख करके वो सो गए भाई दूसरे दिन उठकर के ये जो द्वित वाले महाराज जीत होते द gyanpanth वाले उन्होंने देखा की दसों हम लिखा है तो बड़े नाराज हो गए अरे मैं तो मैं स्वयं ही शिव हूं मैं स्वयं आत्मा हूं यहां पर ऐसा क्यों लिखा है किसी का दास थोड़ी ना हूं मेरे भीतर में जो गांड में तपस्या आदमी जो प्रज्वलित हो रहा है वह मेरा अहंकार को संपूर्ण रूप से विलीन कर दे रहा है मुझे यह कहने की जरूरत नहीं है की मैं ईश्वर का दास हूं मैं यह बिल्कुल अपने dradhman से का सकता हूं की मैं जो हूं मैं ईश्वर स्वयं हूं तो उन्होंने क्या किया वो जो कोयला था वो डाके आगे फिर से एस लिख दिया कभी इसका अर्थ क्या होगा सदा सदा सोहम अर्थात में हमेशा के लिए वही हूं मैं हमें पहले लिखा था सोहम फिर लिखा था दसों हम फुल का सदा सोहम में हमेशा के लिए ईश्वर ही हूं अभी यह देखकर के वो जो भक्ति मार्ग वाले महाराज जी द वो नाराज हो गए और उन्होंने सब के आगे डाल लिख दिया तो दासो हम मैं सिर्फ 10 ईश्वर का दास नहीं हूं मैं ईश्वर के दास का दास हूं तो यह देख करके वह जो अद्वैत वाले महात्मा जी उन्होंने आगे फिर से शादी किया सदा सदा सुहागन में हमेशा के लिए ईश्वर ही हूं अभी यह दोनों का यह झगड़ा चल रहा है जैसे वो दा लिखते हैं तो यह है मुद्दा फिर से लिख दिया वह भक्ति मार्ग वाले महाराज जी ने तो क्या हो गया दास दसों में दास के दास का दास हूं फिर उन्होंने उनके सामने एस लिख दिया सदा सदा सोहम में हमेशा हमेशा के लिए ईश्वर ही हूं फिर उसके सामने डाल लिख दिया तो दास दास दास मैं दास के दास के दास अब और इन्होंने फिर से सर लिख दिया तो सदा सदा सोहम में हमेशा हमेशा के लिए ईश्वर ही हूं तो ये जो झगड़ा जो है हमारे हिंदू धर्म में वो झगड़ा हमेशा के लिए या तो है की फिलासफी है या तो दर्शन है या तो फिर इस तरह से डिबेट है या तो फिर यह किताबें लिख करके इस तरह से व्यक्त होता है नहीं किए जो क्रिश्चियनिटी और इस्लाम में तलवार लेकर के आएंगे या तो बंदूक लेकर आएंगे कहेंगे हमारा धर्म अपनाओ या तो फिर हम तुमको मार डालेंगे तो इस तरह का झगड़ा हमें कभी नहीं होता हमारा जो झगड़ा भी होता है वो हमेशा साधना को लेकर के को लेकर के होता है और इसीलिए हम लोग जो है हमारी यह जो जितने भी ब्रांचेस हैं हिंदू धर्म की हम उसे सैम ब्रांचेस में जो है की समन्वय अच्छे से हम साध सके हैं गीता जो है वो समन्वय शास्त्र ही है ज्ञान कर्म भक्ति और ध्यान इस सबका समन्वय हमको गीता में मिलता है और इसीलिए श्री राम कृष्ण जो हिंदू धर्म में ही अवतरित हुए जिससे की विश्व के जितने भी धर्म है सबके भीतर में सदाचार का एक रूप है जितने भी धर्म है उसे सब धर्म के भीतर में जो सत्व गुण है वो सबके भीतर में जो सदाचार का एक गुण है उसको देखकर के सभी धर्म का वो समन्वय कर सके तो इसीलिए हिंदू धर्म में जो है हमेशा हमेशा ऐसा होता रहा की डायवर्जेंस भी होता रहा है और यूनिफिकेशन भी होता रहा है हम में इतने फ्रीडम है की हमारे यहां पे चारबाग भी है चारबाग पंथी क्या कहते हैं वो जो रिणाम कृत्वा कम पी वे माने अर्थात ये जो हमारा जीवन है उसमें जो भौतिक सुखी सर वो परी है तो अब यदि ऋण भी करना पड़े आपको यदि लोन भी लेना पड़े तो पैसा लेकर के भी इस तरह से रेन करके भी आप घी खाई फिर आप मार जाएंगे तो ऋण कौन देगा उसका आपको चिंता नहीं है क्योंकि यह जीवन जो है वो भोग के लिए ही बना है तो ऐसे लोग भी चार वाक्य समाज के द्वारा मनुष्य जाती के द्वारा सुमन काइंड या तो फिर ह्यूमन सिविलाइजेशन का जो हाईएस्ट फिलासफी है अद्वैत वो भी हमने ही आविष्कार किया है तो हमारे हिंदू धर्म में हम जितने ही चाहे हम ये जो है ब्रांचेस है स्कूल से वो हम स्टार्ट कर सकते हैं और बीच बीच में इस तरह से samnvayacharya आते हैं जैसे भगवान कृष्ण द भगवान राम कृष्ण द उन्होंने जितनी भी ब्रांचेस ऑफ स्पिरिचुअलिटी जितनी भी स्कूल्स ऑफ फिलोस होती है सबको इकट्ठा हो करके उनका समन्वय भी किया तो मास्टर महाशय जो द वो ब्राह्मण समाज के वहां पे जाते द और वहां पर बार-बार सुनते द की जो मूर्ति पूजा जो है वो गलत है जो मूर्ति पूजा करता है वो अंदर श्रद्धालु है और वही जो है हमारे पाटन का कारण है तो मास्टर मास्टर ठीक करके रखा था की मैं निराकार वादी हूं मैं सकरवादी नहीं हूं मैं पूर्ति पूजा नहीं करूंगा ऐसा उन्होंने ठीक करके रखा था किंतु जब ठाकुर यह कहते हैं की अच्छा तुम को यदि निराकार पे भी श्रद्धा हो तो डीओईएसएन'टी मैटर भले अच्छा है एक पंथ जो तुमने पकड़ के रखा है nishthapurvak यदि उसका पालन करोगे तो तुमको अवश्य उसमें सिद्धि प्राप्त होगी तो ही मास्टर महफिल यह बात जब सुनते हैं की सरकार भी ठीक है निराकार भी ठीक है तो उनको इतना बड़ा आश्चर्य होता है क्योंकि ब्रह्मा समाज जो है वो ये विदेशी इतिहास पर बना हुआ था हम यह सही है बाकी सब गलत है तो निराकार साधना ही सही है सरकार साधना मूर्ति पूजा सब गलत है तो यह सब सुनकर के उनके माइंड में भी यह माटी भ्रम हो गया था तब ठाकुर ने हमारे सनातन हिंदू धर्म का मूल सिद्धांत जब कहा की सभी मार्ग जो है सभी मार्ग से हम ईश्वर को प्राप्त कर सकते हैं प्रोवाइडेड की हम लोग सिंसियर है हम लोग अपने जो मार्ग है अपने साधना में हम लोग nishthapurvak उसका पालन करते हैं तो यह सुनकर के मास्टर महाशय के मैन में एक बहुत ही बड़ा आश्चर्य हुआ उन्होंने सोचा की क्या ऐसा भी संभव है की जो दूध सफेद है तो कभी कला हो सकता है जो चीज ये एक चीज कभी दूसरी चीज हो सकती है यह सब वह जो उनके मैन में संदेह उत्पन्न होने लगे तो अभी उन्होंने क्या कहा मास्टर महाशय ने की अच्छा यदि ईश्वर सरकार है यह विश्वास मानो हुआ पर मिट्टी की या पत्थर की मूर्ति तो ईश्वर नहीं है मैन लीजिए की मैं निराकरण में मुझे विश्वास है और ऐसा तो मैंने कभी सुना नहीं ब्रह्मो समाज में या तो क्रिश्चियन missionaryyon को यह कहते हुए की ईश्वर की मूर्ति पूजा भी सही है और यह जो निराकार ईश्वर या तो फिर आप जो है बिना मूर्ति के उनकी आर यज्ञ वगैरा करके आराधना करते हैं वह भी सही है जब तक आप अपने मैन में जो है nishkalan है तो ऐसा विश्वास मैंने जूम कर लिया की जो है मूर्ति पूजा जो है मतलब ईश्वर सरकार है वो ठीक है किंतु यह जो सरकार ईश्वर के रूप में अब यह जो मूर्ति पूजा करते हैं मिट्टी की प्रतिमा बना करके की पत्थर के प्रतिमा बना करके यह तो ठीक नहीं है अब तो मूर्ति पूजा करते हैं वह तो पत्थर है पत्थर की पूजा करने से आपको क्या लाभ मिलने वाला है ऐसा करके मास्टर महाशय ने पूछ लिया की मिट्टी की या पत्थर की मूर्ति तो वह नहीं है तो श्री राम कृष्ण क्या कहते हैं मिट्टी की मूर्ति को क्यों होने लगे पत्थर या मिट्टी नहीं चिन्मयी मूर्ति अर्थात पत्थर या तो मिट्टी की यह जो मूर्ति बनी हुई है या तो हमारे मंदिर में आप जाएंगे ज्यादातर मार्बल के श्री रामकृष्ण की मूर्ति मिलेगी तो यह नहीं है की हम यह मार्बल की पूजा कर रहे हैं या तो फिर हमारे मंदिर में जैसे की मिट्टी की या पत्थर की मूर्तियां होती है पत्थर का एक शिवलिंग होता है ऐसा नहीं है की पत्थर रुपीस शिवलिंग की पूजा कर रही वो एक सिंबल है जिसके ऊपर में हम अपनी भक्ति आराधना साधना एक का एकत्रित करते हैं कंसंट्रेट करते हैं और फिर जो है उसे कंसंट्रेटेड मैन से हम वहीं ईश्वर की आराधना करता है मैं जो मार्बल की ये जो इमेज है ठाकुर के हमारे मंदिर में तो मैं रोज सुबह को जाकर के मंगल आरती के समय में मूर्ति के सामने बेटा हूं और यह जो मार्बल की इमेज है उसको हम वास यह पहनते हैं जो ठंडी पहनते हैं शॉल भी पहनते हैं फिर जो गर्मी के दिन होते ठाकुर को शीतल भी देते हैं अर्थात दोपहर को शरबत देते हैं यह जो नारियल का पानी देते हैं क्योंकि ठंडी के दिनों में ये सब हम लोग पीते तो हम ठाकुर क्यों नहीं देंगे फिर ये जो वहां पे वो पंखा लगाया हुआ है जिससे की गर्मी के दिनों में ठाकुर को वो जो गर्म ना लगे तो क्या हम ये मार्बल मार्बल के लिए ये सब मैंने ये तो सोचने की बात है की ये जो मार्बल की मूर्ति है उसको नाइट ठंडी लगती है ना ही गर्मी लगती है नहीं भूख लगती है नहीं प्यास लगती है तो इनके सामने हम यह जो नैवेद्य है शरबत जो है या तो फिर यह जो भी कुछ हम उनके सामने प्रदान कर रहे हैं उनको ऑफर कर रहा है मार्बल की मूर्ति को क्या जरूरत है किंतु एक्चुअली हम मार्बल की मूर्ति की पूजा नहीं कर रहे हम श्री रामकृष्ण की पूजा कर रहे हैं हमारी पूजा को एक आग्रह होने के लिए कंसंट्रेट होने के लिए एक है तो सिंबल फ्रॉम डेट सिंबल विज तू डी रियल रियलिटी यह जो है प्रतीक है प्रतीक को पकड़ करके हम जो सही वास्तविक सत्ता है वहां पे हम जाते हैं तो इसलिए ठाकुर कहते हैं की चिन्मय प्रतिमा ब्रह्मा प्रतिमा नहीं मिट्टी की बनी हुई प्रतिमा नहीं किंतु चेतन वांट प्रतिमा ऐसा नहीं सोचना की ये मार्बल के ए ठाकुर बैठे हुए हैं सही सही ठाकुर बैठे हुए हैं हम उनकी पूजा आराधना कर रहे हैं यह थोड़ा सा मतलब हिंदू लोगों में तो यह मतलब सहज जन्मजात यह पूर्ण होते हैं की मंदिर में जाते हैं तो हमेशा कभी नहीं सोचते की पत्थर के भगवान खड़े हमेशा ही सोचते हैं की सही भगवान का एक यहां पे प्रकाश है उनकी प्रकाश का किरण यहां पे है या तो फिर मतलब सही भगवान इन भगवान को हम यदि कुछ कहेंगे तो सही भगवान के पास पहुंच जाएगा वह जो इंटरकॉम होता है ना बाहर के ऑफिस से कोई कुछ बोलता है तो भीतर में सुनाई देता है मोबाइल का एक कनेक्शन यहां पर है टावर और वहां पर दूसरा कनेक्शन ठाकुर के पास में तो हम हिंदुओं को यह सब चीज पता होती है किंतु यह मशरूम महाशय वगैरा क्या द उसे समय के क्रिश्चियन धर्म की यह जो मतलब क्रिश्चियन मिशनरी के प्रभाव में आकर के अभी भी आजकल भी ऐसा बहुत लोग बोलते हैं की यह जो मंदिर में जाना यह डैन दक्षिण करना साथ उनकी सेवा करना ये सब भ्रम है यह सब जो है व्यभिचार है यह सब मत करो ऐसा बोलने वाले अभी भी बहुत है उन लोगों का जो ब्रेनवाश है इस हद तक पहुंच चुका है की को समझने से भी समझते नहीं इसलिए यह सब चीज थोड़ी जो है बचपन में होनी चाहिए तो ठाकुर ने जब यह कहा की मिट्टी की मूर्ति वो क्यों होने लगे वो पत्थर या मिट्टी की मूर्ति है वो सही सही भगवान की ही वो रिप्रेजेंटेटिव है वो मोबाइल का एक कनेक्शन है और वहां पर जो है स्वर्ग में या जहां पे भी बोलो मोबाइल का दूसरा टावर है और यहां पे बोलना है वहां पे सुनाई देता है अच्छा इसके बाद का कन्वर्सेशन हम कल रखेंगे ओम शांति शांति