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ओम स्थापा का धर्म स्वरूप अभी हमने देखा ऑलरेडी किस तरह से ठाकुर इनको मिलने के लिए गए थे विद्यासागर को और उनके साथ में क्या-क्या बात हुआ अभी आज जो है परीक्षेद नो दक्षिणेश्वर में भक्तों के साथ श्री रामकृष्ण मास्टर महाशय लिखने हैं श्री राम कृष्णा दक्षिणेश्वर मंदिर में भक्तों के साथ विराजमान है दिन बृहस्पतिवार है सावन शुक्ला दशमी 24 अगस्त 1882 काली मंदिर में पूजा करते हैं मास्टर ने आकर देखा की उत्तर पूर्व के लंबे बरामदे में श्री रामकृष्ण हाजरा के पास खड़े हुए बात कर रहे हैं मास्टर ने भूमिष्ट होकर के श्री राम कृष्णा की चरण वंदना की यह देखिए की जब भी हम कथामृत पढ़ने हैं तो किस तरह से मैनरेटिव को एक इंटरेस्टिंग बनाया जाए यदि सीधे-सीधा यदि जैसे की रामचंद्र डेट ने किया था की ठाकुर के उपदेशों का संग्रह पब्लिश किया था नंबर देकर के ये नंबर वन ठाकुर यह कहते हैं नंबर तू ये दूसरे टॉपिक पे ठाकुर ऐसा कहते हैं यदि ऐसा सीधा सती करते तो बहुत सर ठाकुर का वो जो टीचिंग है वो मास्टर महाशय कलेक्ट करते हैं किंतु फिर इस तरह के किताब पढ़ने में लोगों को इतना इंटरेस्ट नहीं आता तो इसीलिए नरेशन को किस तरह से इंटरेस्टिंग बनाया जाए इस दृष्टि से मास्टर वहां से सिर्फ उद्देश्य नहीं देते जैसे कहानी कहते जैसे ठाकुर तथा अमृत में कहते हैं ना की एक पंडित ने आकर के एक श्लोक सुनाया की जब वह इतिहास और दर्शन शास्त्र की बात हो रही है तो किसी को इतना इंटरेस्ट नहीं आता किंतु फिर जो पुराण वगैरा है ये सब कहानी जो है वो कहानी कहना शुरू कर देते हैं लोग तो फिर लोग जैसे वो कथाकार होते हैं वो कहानी कहेंगे तो लोग बड़े इंटरेस्ट से सुनेंगे अभी उसके बाद में जल्दी देखेंगे की पास में से एक सुंदरी युवती जा रही है तो फिर वो कहानी के ऊपर से भी वो जो है मां जाकर के उसके उसे युवती के ऊपर में चला जाएगा और फिर किंतु यदि भूख लगती है तो वो युवती भी भूल जाएंगे और सबसे पहले अपने एशिया जाएगा अपने पेट की और वो कहते हैं अन्ना चिंता चमत्कार रहा तो ये एक साइकोलॉजी है ठाकुर बखूबी समझते थे वो मास्टर महाशय भी समझते थे सिर्फ उपदेश देना यह बात नहीं है उपदेश को इंटरेस्टिंग बनाना है अभी अभी कथामृत में वह युवती और खाना वगैरा तो नहीं आएगा किंतु वह जो दर्शनशास्त्र से एक स्टेप आगे तो हम जा सकते हैं इस तरह से कहानी का सकते हैं की जिससे की ठाकुर के इंटरेस्ट ठाकुर के जो उपदेश जो है वो हमारे लिए इंटरेस्टिंग हो हम उसको बार-बार पढ़ें मैं पीटीसी में बेलूर मठ में मैंने जॉइन किया था तो वहां पे वो एक बड़ा रूम होता है पांच छह बड़े-बड़े रूम से प्रत्येक रूप में कर पांच ब्रह्मचारी रहते थे तो अभी ऐसा होता था रात को हमारा नियम था की जब संध्या के बाद में मंदिर में आरती जब समाप्त हो जाए उसके बाद में हम लोग गंगा के किनारे वो स्वामी जी का जो मंदिर था समाधि मंदिर उसके पहले जो फर्स्ट फ्लोर पे बैठ करके हम लोग जब किया करते थे गंगा की और सामने उसे देखकर के और उसे समय क्या था की चारों और अंधेरा राहत था और एकदम शांत बैलून का नियम तो आपको शायद पता होगा की आरती से शुरू होती है सब देवोतियों को फिर कहा जाता है की आप सब जितने भी साइट टेंपल है गंगा का किनारे है वहां से निकाल कर के आप लोग सब अभी मैं टेंपल में ए जाइए आरटेंट कीजिए और आरती अटेंड करने के बाद सीधा वहां से मठ से बाहर चले जाइए वो गंगा के किनारे फिर नहीं जाना है तो गंगा का किनारा आरती समाप्त होने के बाद जैसा एक स्वर्ग जैसा हो जाता था हम लोग सिर्फ साधु ब्रह्मचारी वहां पर रहते थे और एक के बाद एक मंदिर में प्रणाम करेंगे वहां पे वो जो स्वामी जी का जो समाधि मंदिर है वह हमारे लिए जो नए आए हुए ब्रह्मचारियों के लिए वो रिजर्व था वहां पे फर्स्ट फ्लोर पे जाकर के गंगा को फेस करके वो वराडे में बैठ करके हम लोग जब ध्यान किया करते थे तो उसे समय इतना एक सुंदर एक स्वर्ग जैसा वातावरण होता था और फिर वहां से नियम था की फिर कुछ बात नहीं करनी है यदि खाने के लिए भजन का समय होता था रात को 9:00 बजे का तो यदि आपके पास में समय है ध्यान करने के बाद में तो अपने कमरे में जाना है हमारा जो ट्रेनिंग सेंटर था बिल्कुल शांति साइलेंट में साइलेंस मेंटेन करना है यहां तक की लाइट भी नहीं करनी है आपकी जो डिस्क्लेम जो है आपकी टेबल पे जो डिस्क्लेम जो रखा जाता है इस के प्रकाश में आपको जो भी किताब पढ़नी है वो पढ़नी है और कोई बात नहीं करनी कोई हल्ला गला एक दम साइलेंट तो आरती के बाद का वो जो साइलेंस वह जो जाप किया है गंगा के किनारे बैठ करके वो एक एक उत्साह एक जैसा एक पवित्र दिव्या भगत है वो लेकर के फिर हम लोग आए हमारे ट्रेनिंग सेंटर में और फिर वहां पे ये कटहनुत पढ़ने थे तो इस तरह से स्टोरी के रूप में जब पढ़ने थे सभी ब्रह्मचारी प्राइस नए आए हुए ब्रह्मचारी तो कथामृति जनरली ज्यादा पढ़ने थे तो इस तरह से लगता था जैसे की हम लोग बचपन में वो जो कहानी कितने इंटरेस्ट से पढ़ने हैं वो कॉमिक बुक है फिर वो हॉरर स्टोरी वगैरा है तो फिर वह जो गुजराती में एक नया खुशी बोल करके है तब बट और मिया उसके बड़ी पॉपुलर थी बच्चों में तो हम लोग इस तरह से जो कहानी पढ़ने थे कितना पढ़ने थे तो यह कथामृत पढ़कर के सिम से ऐसा ही फीलिंग होता था की इतना इंटरेस्टिंग कहानी पद रहा है की उपदेश दे रहे हैं या उपदेश पढ़ रहे हैं ऐसा कभी नहीं लगता था जैसे बच्चा जैसे बड़े इंटरेस्ट के साथ में कोई कॉमिक बुक पढ़ना है तो कैसे उसको आनंद आता है वैसा ही आनंद हमको यह कथामृत पढ़कर आता था तो अब देखिए की किस तरह से सुंदर रूप से शुरुआत करते हैं पूरा जिसको की पूर्व भूमिका है जैसे उपदेश की शुरुआत होती है उससे पहले पुरी पूर्व भूमि का मानते हैं की कौन सा दिन है किस तरह से नक्षत्र है फिर कालीबाड़ी का सुंदर वर्णन करते हैं तो क्या है की हम लोग मेंटली वहां पर जा सके और यह वर्णन भी इस तरह से भी इंपॉर्टेंट है की यदि हम नीला चिंतन करते हैं लीला ध्यान करते हैं तो उसे समय जब हम लोग इस तरह से सोचते हैं की मैं भी चलो दक्षिणी ईश्वर चला गया हूं नौका में बैठ करके आप कोलकाता से नोखा में जाएंगे तो देखेंगे की सबसे पहले तो वह आदर्श शिवा मंदिर है वह एक के बाद एक दिखाई देते हैं फिर जो है की वह चांदनी का घाट आता है फिर वहां पे नौका लगेगी फिर आप जो है चांदनी के घाट से बहुत भीतर में प्रवेश करेंगे काली मंदिर में देखेंगे सबसे पहले ही वो बड़ा सा काली मंदिर है महाकाली का मंदिर इसके एक साइड में है नाथ मंदिर और एक साइड में है विष्णु घर राधाकांत का मंदिर और फिर वहां से यदि हम लोग जो है लेफ्ट साइड में जाएंगे तो वहां पे ठाकुर का कैमरा है ठाकुर के कमरे के बाद में पंचवटी है यह मोहब्बत है पहले तो जहां पर मार रहा करती थी फिर पंचवटी है फिर उसके भीतर में हंस कुकर है आगे जाएंगे तो फिर आगे जाएंगे तो बेलतला है जहां पर ठाकुर ने तंत्र साधना की थी तो मास्टर महाशय क्या करते हैं पहले तो इस तरह से पुरी पूर्व भूमिका बंधेंगे जिससे की हमको वो क्या कहते हैं बाद में वो सुनने में ऑटोमेटिक इंटरेस्ट ए जाए तो यह मैन मास्टर वहां से बाज नोट जस्ट फिलॉस्फर बट है वज अलसो ए मास्टर स्टोरी टेलर जैसे की भगवान व्यास ने अच्छी है की उन्होंने क्या किया की पहले तो वेदों का कर भाग किया फिर उन्होंने 18 पुराण लिखे मैन वेद का जो मनीसिस किया वेदों के ऊपर में जो कम किया वो उनकी दर्शन जो दर्शन शास्त्र के ऊपर में उनकी जो महारत थी वो दिखता है और जब पुराण जब उन्होंने लिखे तो वो भी दिखता है की दर्शन शास्त्र को लोक भोग्य बनाने के लिए किस तरह से उसको इंटरेस्टिंग वे में उसको रखा जाए सो दोनों जी तरह से भगवान वेद व्यास को समझ में आता था वही बात देखेंगे की मास्टर महाशय से सीधे वेद व्यास के अवतार है हम ऐसा समझ सकते हैं उनको ये भी पता है की फिलासफी ठाकुर की क्या है बहुत सुंदर तरीके से जैसे हमने देखा की आपने जो है विद्यासागर को कितना सुंदर रूप से उन्होंने ब्रह्मा सत्य जगत मिथ्या यह पूरा उन्होंने सुंदर रूप से समझाया तो यह तो समझा ही सकते हैं साथ-साथ में उसको इंटरेस्टिंग भी बना सकते हैं यह दोनों स्किल है फिलोसॉफिकल स्किल और स्टोरी टेलिंग स्किल बोथ मास्टर महाशय इस कॉल्ड मास्टर आए और उन्होंने भूमिष्ट होकर के श्री राम कृष्णा की चरण वंदना की श्री राम कृष्णा का मुख सहस्य मास्टर से खाने लगे विद्यासागर से और भी दो मिलन चाहिए चित्रकार पहले नक्शा खींच लेट है फिर उसे पर रंग चढ़ता राहत है प्रतिमा पर पहले दो-तीन बार मिट्टी चढ़ाई जाति है फिर सफेद रंग चढ़ाया जाता है फिर वह ढंग से रंग की जाति है विद्यासागर का सब कुछ ठीक है सिर्फ ऊपर कुछ मिट्टी पड़ी हुई है कुछ अच्छे कम करता है परंतु हृदय में क्या है उसकी खबर नहीं हृदय में सोना ढाबा पड़ा है हृदय में ईश्वर है यह समझना पर सब कुछ छोड़कर व्याकुल हो उसे पुकारने की इच्छा होती है अच्छा देखिए अभी जैसे जी तरह से स्टोरी टेलिंग स्किल जो है इन लोगों में साइकोलॉजी भी इतनी ही अच्छे से समझ में आई है विद्यासागर को तो पहले जैसे ठाकुर कहते हैं किसी का ब्रेनवाश कैसे किया जाए तो चित्रकार का उदाहरण देते हैं पहले तो एक आउटलाइन कर दो और उसके बाद में एक के बाद एक आंख है आंख है कान है यह सब डिटेल भारते रहो तो वैसे ही जब किसी का ब्रेनवाश करना है रिलिजियस स्पिरिचुअल ब्रेनवाश वो दूसरे वाला नहीं तो क्या करना है पहले तो उनको इस तरह से बात करो की जैसे वो उसको मां में एक उत्सुकता जागृत होकर अच्छा इतनी सुंदर बातें जो करते हैं उनका उनका खुद का जीवन कैसा होगा उनकी उपलब्धियां कैसी होगी उनकी ये जो लाइफ स्टाइल है वो कैसी होगी मतलब यदि किसी के मुंह से इतने सुंदर विचार प्रकट होते हैं तो उनकी उपलब्धि कितनी गहन होगी ये सुनने के लिए जन के लिए फिर उत्सुकता बढ़नी है फिर और ज्यादा फिर आप लोग जो है हम लोग हैं उनके पास में जाते हैं जैसे मास्टर महाशय खुद ठाकुर कहते हैं ना मास्टर के बड़े में पहले दिन आए प्रथम दर्शन द्वितीय दर्शन तृतीय दर्शन फिर जब चतुर्थ दर्शन के लिए आए तो ठाकुर ने क्या कहा की एक मोर को 4:00 बजे अफीम मिला दिया था अभी क्या हुआ दूसरे दिन ठीक 4:00 बजे वह मोर उपस्थित हो गया है वह एक बार ठाकुर को मिला देते हैं फिर वह खाने के लिए इस समय हम लोग जो है नियमित ठाकुर के सामने उपस्थित हो जाएंगे हालांकि ये एक बात है की विद्यासागर के बड़े में की उसको बेचारे को समझ में नहीं आया की ईश्वर के अवतार स्वयं चल करके बिना बुलाए उसके घर उपस्थित हुए हैं उसका कितना बड़ा सद्भाग्य है देखिए हमारे जैसे सड़क जन्म जन्मांतर तक ठाकुर को पुकारते रहेंगे जब ध्यान करते रहेंगे घर वगैरा छोड़कर के हम यहां पे पड़े हैं दिन रात उनका कम कर रहे हैं फिर भी शायद हो सकता है की किसी दिन ठाकुर ने सपना में दर्शन दे दिया या तो फिर ऐसा कोई अनुभूति हुआ की चलो ठाकुर हमको मार्गदर्शन दे रहे हैं इतना ही होगा हमारे जीवन में किंतु विद्यासागर में कुछ नहीं किया फिर भी जो है ठाकुर स्वयं उनके घर पर उपस्थित हुए उनको उपदेश दिए जो उनके सामने यह जो मां काली के जो भजन है वह भी गए और समाधि में भी चले गए तो इतना जो का वह जो ग्रेट गुड फॉर्चून वो विद्यासागर शायद खुद नहीं समझ पे होंगे की वो कितने नसीब डर है आज यदि हम लोग विद्यासागर को पहचानते हैं तो इसीलिए क्योंकि कथामृत में उनका नाम लिखा है ये जो केशव चंद्रसेन है ये गिरीश होश है ये विद्यासागर है ये लोग क्या थे की उनके समय के बंगाल के बड़े-बड़े महारथी हस्ती थे खेत नाम लोग थे किंतु इतिहास में आजकल बंगाल के बाहर जो लोग रहते हैं हम लोगों को इनके बड़े में क्यों पता है क्योंकि हमने ठाकुर की किताब में उनके बड़े में पढ़ा है इसलिए तो देखिए की उनकी उसे समय की वो लोग सोचते होंगे हम लोग इतने महान हैं हम लोग इतने छाता नाम है बोलकर की ये काली का गरीब पुजारी गरीब ब्राह्मण काली का पुजारी हमको मिलने के लिए आया है ऐसा कुछ समय सोचते होंगे समझ में भी नहीं आता होगा उनको की कितना ग्रेट गुड फॉर्चून है ईश्वर स्वयं जो है उनके घर पधारे हैं और जैसे गौरांग महाप्रभु थे वो जो है नगर कीर्तन करते थे प्रत्येक लोगों के घर के सामने से पसार होते थे ये परिणाम मिलने थे तो वह श्री कृष्णा चैतन्य थे और ये है हमारे ठाकुर श्री राम कृष्णा मां का नाम बांटना समाधि क्या है सही-सही आध्यात्मिक जीवन क्या है वो भक्तों को सीखना वो कृष्णा चाहिए रिसेंट है और बाद में किंतु विद्यासागर कभी ठाकुर के पास वापस आए हो मैंने तो कहानी नहीं पढ़ा है हो सकता है किंतु मैंने कभी नहीं पढ़ा है वो उसका मिस अपॉर्चुनिटी है क्या करेंगे विद्यासागर का सब कुछ ठीक है सिर्फ ऊपर कुछ मिट्टी पड़ी हुई है कुछ अच्छे कम करता है परंतु हृदय में क्या है उसकी खबर नहीं हृदय में सोना ढाबा पड़ा है हृदय में ईश्वर है यह समझना पर सब कुछ छोड़कर व्याकुल हो उससे पुकारने की इच्छा होती है मैं जब 12th में पढ़ाई करता था 10th में तब मैं जब अपने स्कूल में जाता था तो वहां पे बहुत बड़ा एक मेड था तो मैदान में मैं देखा था की यह जो माइग्रेंट लेबर जो है लेबर वर्कर्स वो क्या है ना की ये जो माइग्रेंट लेबर का पता है ना की जब वो बारिश का सीजन होता है पहले तो अभी गुजरात में इतना वो जो नर्मदा का पानी नहीं आता था तो साल में जब बारिश होगा तभी वो क्रॉप होता था और खेती होती थी तो बारिश के दोनों में वो गांव में चले जाएंगे खेत में कम करेंगे फिर जब जी समय खेती नहीं हो रही है तो फिर शहर में जाकर के वे लोग कंस्ट्रक्शन में कम करेंगे वो जहां पर कंस्ट्रक्शन वगैरा हो रहा है तो अभी उन लोगों के पास में ग्रैंड लेबर के पास में वर्कर के पास में तो रहने को घर भी नहीं यहां तक की झोपड़ी भी नहीं तो वे लोग टेंट में रहा करते थे वो जो जी मैदान के पास में से मैं गुजरा था स्कूल जान के लिए तो उनके लड़कों को मैं देखा था मैं सोचता था की अरे इतने छोटे-छोटे बच्चे हैं पांच साल का 3 साल का बच्चा 1 साल का बच्चा वैसे ही मिट्टी में खेल रहे हैं मूव भी इस तरह से धूल से गंदा हुआ कपड़े भी फटे हुए बाल भी इस तरह से इनको कोई केयर करने वाला नहीं है मां-बाप तो कम करने के लिए आए हैं वो तो चले जाएंगे वो साइट के साइट पे कंस्ट्रक्शन साइट पे एक दो बुरी औरत ही रहेगी वो अभी बेचारी अपने को संभाले के बच्चों को संभाले तो एक बार मैंने सोचा की चलो जाकर के उनको मैं थोड़ा बहुत बड़ा पढ़ना लिखना सीखना हूं तो मैं पहले बार उनके पास में गया एक दिन शाम को मुझे पता था बच्चों के साथ तो बात करने से कोई लाभ नहीं वो बुद्धि अम्मा के साथ में भी बात करने से कोई लाभ नहीं जब ये बड़े लोग ए जाएंगे शाम को मैं थोड़ा ऑब्जर्व किया जी के आसपास आते थे तो जाके उनसे बात करो तो 7:00 बजे के बाद गया बोला की मैं इस तरह से स्कूल में पढ़ना हूं मेरा वेकेशन है 10th का तो मैं चाहता हूं की यहां पे आकर के मैं बच्चों को पढ़ना तो पहले तो वो लोग सोच लिए की क्या हमारे बच्चों को चोरी करके ले जाएगा की क्या है उनको तो ऐसा ही पहले तो एक संशय होगा ना की क्यों भाई इस तरह से सामने से हमारे पास सर है तो पहले तो बोल दिया चले जो यहां से ये वो एकदम गली वाली दे करके तो मेरे साथ में और एक मैंने मेरा क्लासमेट है उसको मैं खींच के ले गया था चलो चलो हम दोनों पढ़ाएंगे तो उन दोनों ने वो जो वर्कर्स लोगों ने इस तरह से बिहेव किया तो मेरा मित्र तो भाग गया बोला हम फिर से नहीं आते हो तो मैंने कहा ठीक है तुम जो फिर दूसरे दिन में अकेला गया मैंने कहा ठीक है देखो मेरे पे विश्वास नहीं है मेरा तो घर यही पे चलो दिखा देता हूं मेरे माताजी पिताजी भी यही पे रहते हैं मेरे मां में ऐसा कुछ नहीं है तो मैंने देखा की आपके बच्चे इस तरह से रहते हैं तो थोड़ा सा मुझे लगा की टाइम है मेरे पास तो थोड़ा सदुपयोग किया जाए तो ऐसा दूसरे दिन भी थोड़ा मतलब इतना फिर गुस्सा नहीं किया उन्होंने सोचना शुरू किया की सही में ऐसा हो सकता है फिर मेरा घर वगैरा देखा बाहर से दिखाए तो फिर एक दो सत्ता के बाद में उनको लगा की ठीक है मतलब बिल्कुल वो मतलब वो बच्चे चुराने वाला भी नहीं है ये तो फिर एक दिन जाकर के देखा मैं सभी जितने भी बच्चे हैं 15-20 बच्चे थे उनका मुंह वगैरा साफ करके हाथ वगैरा क्लीन करके कपड़े थोड़े ठीक-ठाक करके बालों में वो थोड़ा सा वो ठीक करके वो बच्चों को पूरा बिठा दिया था वो बुद्धि अम्मा ने और पीछे में वो बैठी थी बोला आप इसको सिखाए बच्चों को और वो तूफान मस्ती करेंगे तो मैं उनको मारूंगी क्योंकि ये इतने तूफानी बच्चे आप उनको डिसिप्लिन नहीं कर पाएंगे तो उसके लिए मैं बेटी हूं हम बैठे हैं आप उसको सिखाए तो मैं एक जितने दिन वेकेशन था उतने दिन तो मैं जाता था फिर भी पढ़ाई-लिखाई स्टार्ट हो जान के बाद मैं नहीं जा पाया किंतु उसे समय मैं जाता था तो मुझे लगता था की यही मेरे लिए असली जीवन है मुझे करियर नहीं बनानी मुझे वो वीडियो है अपना मतलब बिजनेस रहे नौकरी नहीं करनी मैं इस तब सेवा का कम करूंगा किंतु बाद में जब मैं इस तरह से बाहर निकाला भी सही सेवा का कम करने के लिए किंतु धीरे-धीरे मुझे समझ में आया की यदि साथ-साथ में आध्यात्मिक डेप्थ नहीं है तो ये जो सर्विस का जो विथ जो है ये जो ब्रीड्स जो है उसका जो विशाल हृदय होना है वो हृदय विशाल नहीं हो पाएगा वो धीरे-धीरे करके संकुचित हो जाएगा और स्वार्थपन जो है इसमें ए जाएगा मैंने उसे डॉक्टर की बात की थी उसे दिन रांची में मैं था हमारे कवि के रांची आश्रम में शशांक का नानजी उसे समय हेड थे और मैं वहां पे ऐसे वॉलिंटियर था वॉलिंटियर सन्यासी के रूप में और वहां पे मैं कम करता था तो डेली मुझे गांव में जाना पड़ता था ट्रबल एरिया में तो एक दिन देखा मैं एक जगह पे जाकर के बैठा था एक वो वहां का वो जो ब्लॉक डेवलपमेंट ऑफिसर है उसकी ऑफिस में जाकर बेटा था तो एक डॉक्टर ए करके मेरे साथ में बहुत अच्छे से बात करने लगा पूछने लगा की वो सूरज कैसे हैं वह महाराज कैसे मैंने कहा आप तो इतने अच्छे से जानते हैं हमारे आश्रम में सबको आप कभी आई प्रसाद लीजिए मंदिर में वो उत्सव होता है या पार्टिसिपेट कीजिए बोला की मैंने आपके वहां पे 10 साल जब किया है फिर मुझे लगा की नहीं आपका तो सैलरी बहुत कम होता है तो मेरा कुछ उससे निकालने वाला नहीं है इसलिए मैं इस गो में ए गया हूं अभी गो में क्या होता है की जो गवर्नमेंट देती है वो राजीव गांधी ने कहा था ना की एक रुपया देते हैं तो 10 पैसा वो गरीब लोग तक पहुंचता है तो गो वाले 50% तो अपना एडमिन एक्सपेंड करके निकाल लेंगे बाकी का 50% होगा उसमें तड़ा करके 34% निकलेंगे हो सकता है 15 20% जो है वो गरीब लोगों के पास जाएगा तो उसका ये डायरेक्टर था उसे गो का महीने में ना की 1 लाख ऐसा कुछ सैलरी था उसका तो मैंने सोचा की है रे देखिए वो इतनी बड़ी बड़ी वो आदर्श की बात करके वो मुंह से मुझे बताया की मैं रामकृष्ण मिशन में क्यों आया था वो चाहता तो वो डॉक्टर बड़ा अच्छे से वो मतलब वो जो है अपना कम कर सकता है बड़ा पैसा कलकत्ता में यदि वो मेडिकल प्रैक्टिस करता वो लखपति हो सकता था किंतु मेरे मां में एक आदर्श था की मैं गांव में जाकर कम करूंगा तो मैं गांव में कम करने के लिए 10 साल कम किया किंतु अभी लगता है की इससे मेरा नहीं होगा मेरे बीबी है बच्चे हैं तो उनका भी मुझे फिक्र करना होगा इसलिए मैं गो में ए गया हूं मैंने कहा देखो ये तो कैसी बात होगी माया मिली ना राम निज़ादी मैंने कलकत्ता में यदि मेडिकल प्रैक्टिस करता तो लखपति भी होता और फिर हो सकता है थोड़ा बहुत रुपया वो डोनेशन में दे देता तो उसका धनुषुद्धि हो जाता और या तो फिर मिशन में पूरा टाइम र जाता तो फिर वो जो है उसका आध्यात्मिक उन्नति होता अभी उसने करियर छोड़कर के मिशन में आया 10 साल बेचे फिर मिशन को गली देकर के चला गया अभी वो गो में गो में ना ही उसको कोई मेडिकल प्रैक्टिस करनी है ना ही कुछ करना है रामकृष्ण मिशन में 10 साल रहने के बाद में जो एक प्रेस्टीज खड़ी होती है उसे प्रेस्टीज का सहारा लेकर के गांव वालों को जाकर के वो बिना मतलब की स्क्रीन उसके सर पे डालता है तो मैंने उसको नहीं यह मिली ना राम मिला तो सेवा करते समय यदि हमारे मां में ईश्वर के प्रति श्रद्धा भक्ति नहीं रहेंगे तो एक दिन ऐसा होगा की ये विशाल महासागर जैसा अपना दया का और ये जो कंपैशन का जो सागर है वो कहानी कोई सुख करके फिर एक छोटा सा वो एक उसके तादादो कीचड़ की मैं वो परिवर्तित हो जाएगा तो मैं जब इस तरह से कम करता था मुझे लगा था की नहीं यदि सेवा करनी है तो ठाकुरमार स्वामी जी को साथ में रखना है एक हाथ में सेवा दूसरे हाथ में ठाकुरमार स्वामी जी आसमानों मोक्ष और हम जगत हटाया जनत दोनों साथ में नहीं करेंगे जो आसमान नहीं होगा तो जगत हितायाचा हम नहीं कर पाएंगे इसलिए ठाकुर यहां पर कहते हैं की विद्यासागर का सब कुछ ठीक है सेवा का कम बहुत अच्छे से करता है किंतु उसको पता नहीं है की हृदय में सोना ढाबा हुआ है यह जो ईश्वर के प्रति हमारा आत्मसमर्पण है भक्ति वैराग्य यह सब गन है मैंने सन्यास और सांसद दोनों के लिए यथाशक्ति ज्ञान भक्ति वैराग्य हम सब में होना चाहिए चाहे कोई सन्यासी हो नाती चाहे संसार ये के लिए भी ये जो ब्रह्मचर्य श्रम फिर बृहस्थ आश्रम फिर सन्यासराम तो सबके लिए आखिर में त्याग तो करना ही है आज नहीं ना कल कल नहीं ना परसों परसों नहीं तो नर्स हो या तो होना ही है इस जन्म में नहीं तो अगले जन्म में उसे जन्म में नहीं तो उसके अगले जन्म में किंतु त्याग ही है जो की हमको ईश्वर की और ले जाएगा और त्याग का आचरण आज से ही करना है यथाशक्ति मैन ऐसा कोई टेंशन नहीं ले लेना है की मैं यह नहीं छोड़ पाऊंगा वो नहीं छोड़ पाऊंगा वो जितना हो सकता है उतना चेक करो जितना हो सकता है ईश्वर का नाम गुणगान कीर्तन करो तभी वो आज से ही हमारा आध्यात्मिक जर्नी आरंभ हो जाएगा श्री राम कृष्णा मास्टर के साथ खड़े खड़े वार्तालाप कर रहे हैं कभी बरामदे में टहल रहे हैं श्री रामकृष्ण कहते हैं हृदय में क्या है इसका ज्ञान प्राप्त करने के लिए कुछ साधना आवश्यक है मास्टर महाशय पूछते हैं की साधना क्या बराबर करते ही जाना चाहिए श्री राम कृष्णा कहते हैं नहीं पहले कुछ कमर कसकर करनी चाहिए फिर ज्यादा मेहनत नहीं उठानी पड़ती जब तक तरंग आंधी तूफान और नदी की मोड से नौका जाति है तभी तक मल्ला को मजबूती से पटवार पकाने पड़ती है उतने से पर हो जान पर फिर नहीं जब वह मोड से बाहर हो गया और अनुकूल हवा चली तब वह आराम से बैठा राहत है पटवार में हाथ भर लगता राहत है फिर तो पाल टांगने का बंदोबस्त करके आराम से चिलम भरत है कामिनी और कंचन की आंधी तूफान से निकाल जान पर शांति अभी यह जो आंधी तूफान जो है हमारी इंद्रियों का जो यह भोग है इंद्रियों के जो विषय है यह जो रस है जिसको की हम जो है उसका अस्वधन करना चाहते हैं तो अभी सभी लोग कहेंगे की 100% त्याग कैसे संभव है एवं हमसे भी संभव नहीं हम लोग तो क्या है की अध्यात्म मार्ग के ये पति है ऐसा नहीं सोचना है जैसे ठाकुर ने एक बार कहा था की मैं तैरना सिख जाऊंगा बाद में मैं पानी में गिरूंगा कभी जब तक पानी में नहीं गिरेंगे तब तक आप तैरना नहीं सीखेंगे और तैरना नहीं सीखेंगे तो पानी में नहीं गिरेंगे तो तैरना कभी होगा ही नहीं तो इस तरह से की मैं त्याग कर लूं पहले पूरा त्याग कर लो फिर सोचूंगा इस तरह से नहीं यथाशक्ति जितना भी है आज से आराम कर दें फिर तो जो है ठाकुर हमारे कान पड़कर के ले जाएंगे बेटा उसे रास्ते पे नहीं इस रास्ते पे चलना है ठाकुर को किंतु पहले एक बार इन्वोक कर लेना है ठाकुर कहते हैं ना की दो बच्चे होते हैं की एक बच्चा जो है पिताजी का हाथ पकड़ के चला है अभी उसकी ग्रिप तो वीक होती है वह छठ जाएगा तो गिर सकता है तब बे राहत है दूसरा बच्चा है उसका हाथ पिताजी खुद पकड़ के चलते हैं तभी पिताजी जो है हाथ पकड़े इस तरह से पकड़े की कभी छुटने वाला नहीं भाई तीसरा बच्चा भी होता है वो इस तरह का होता है की वो जेबी पिताजी जो है वो पता है की बड़ा तूफानी है किंतु फिर उसके हृदय में सोना ढाबा हुआ है बड़ा तूफानी है किंतु जैसे वो नरेंद्र की तरह बिल्कुल जुमदार है उसमें बहुत ही उत्साह और जो है की ऐंठूसियाज्म है लगता है बाहर से की मैंने वो पूरा गुंडा जैसा होगा तामसिक होगा किंतु भीतर में सोना पड़ा हुआ है जब ईश्वर जो है यह बात समझ जाते हैं फिर ऐसे लोगों को कान पड़कर खेल जाते हैं तो हम लोग जैसे वो ठाकुर कहते हैं ना की शिवा और राम शिवा के गुरु राम राम के गुरु शिवा इन दोनों के बीच में झगड़ा भी हुआ और सुलभ भी हो गए संदीप भी हो गए किंतु यह जो शिवा के केले है भूत और राम के केले है बंदर इन दोनों के बीच का जो झगड़ा रहा है तो हम किस तरह से राम के बंदर और शिवा के भूत है हमने ठाकुर को संपूर्ण रूप से उनके श्री चरणों में अपना जीवन समर्पित कर दिया ठाकुर हमारा कान पड़कर के ठीक ले जाएंगे अभी वो हाथ पकड़ने से भी ऊपर वाली कैटिगरी है ठाकुर कहते हैं ना की उत्तम वैद्य एक वैद्य है आकर के बोलना है बड़े अच्छे से शब्दों में अरे भैया तुम औषध है का लेना दूसरा वैद्य है वो बैठ करके बड़ा सीरियसली समझता है मध्य वैद्य जो होता है की अच्छा तुम्हारे लिए मेडिसिन खाना अच्छा है भले का लो तुम मेडिसिन खाओगे तो मैं तुमको एक चॉकलेट दूंगा इस तरह से वो प्रूफ बैंड देता है तीसरा है उत्तम वैद्य यदि हम दवाई नहीं खाएंगे तो हमको धक्का मार के जमीन पे गिराएंगे हमारी छाती पे पर रखेंगे जबरदस्ती मुंह खोल के दवाई मिला दे तो ठाकुर भी इस तरह से उत्तम विद्या है किंतु हमको ठाकुर को इन्वोक करना है वैसे ही ठाकुर सभी का कान पड़कर सभी के छाती पर चढ़कर के गली नहीं खिलाएंगे उसके लिए हमको ठाकुर को कहना है की यदि आप उत्तम विद्या हो सकते है तो मैं दर्दी भी हो सकता हूं उत्तम पेशेंट भी हो सकता हूं तो यदि हम इस तरह से ठाकुर को इन्वोक करेंगे फिर ठाकुर हमको पकड़ने फिर जैसे वह ठाकुर के बड़े में किसी ने कहा था ना किसी के घर गए थे तो ठाकुर को देखकर के ये पहले की बात है मैन ये केशव सेन वगैरा आने के पहले की बात है किसी के घर गए वो मथुरा बाबू के साथ में तो मैं भूल गया किसके घर गए थे तो वो ठाकुर को देख करके देता है अरे आप रे भूत जैसे आदमी को पकड़ता है वैसे मैन इसको पड़ा है जैसे आवेश होता है इनके ऊपर में मां का आवेश होता है तो किंतु देखिए ठाकुर ने पहले तो सिद्ध किया की वह उत्तम भक्ति है उत्तम शिष्य है वो बन सकते हैं बाद में कहानी जाकर के उनके सर पर मां का आवेश होगा तो हमको यह पहले प्रूफ करना है की ठाकुर हमारा जो कुछ भी है जीवन सर्वस्व आपके श्री चरणों में हमने अर्पित किया अभी आप जो चाहे करें तो इसे ठाकुर के ऊपर छोड़ देने से फिर जो है ठाकुर हमारा पूरा जो है वो जो रिस्पांसिबिलिटी वो अवश्य स्वीकार करेंगे