Transcript
तो आज क्यों श्री रामकृष्ण कथामृत कल हमने देखा की किस तरह से ठाकुर में नरेन आए हैं और ठाकुर किस तरह से महा आनंद में है और आज का यह जो पूरा चैप्टर है उसमें ठाकुर अपने पूर्व पुराने दोनों की बातें अपने हमको बता रहे हैं अपनी स्मृति जो है उसे दोनों की जब वो साधना करते थे और एक के बाद एक छोटी-छोटी घटनाएं जो की फिलोसॉफिकल शायद ऐसा नहीं लगेगा की इसमें कोई फिलोसॉफिकल टीचिंग है किंतु फिर भी प्रत्येक घटना ठाकुर के साथ में ठाकुर के जीवन से जुड़ी हुई इतनी सुंदर और सुमधुर होती है की वो सब कुछ पढ़ने के लिए हमारा मां ललाट होता है एक्चुअली कई बार तो ऐसा होता है की हमको लगता है की फिलासफी इसमें जितना कम हो और दिन प्रतिदिन की घटनाएं जितनी ज्यादा हो उतना हमको पढ़ने में कभी आनंद आता है तो इसी तरह से ठाकुर के जीवन की ठाकुर के खुद के शब्दों में एक छोटी-छोटी घटनाएं ठाकुर ने कहा कल हमने देखा था की नरेंद्र को बिताया वहां पर जमीन के ऊपर में वह बिस्तर बिछाया एक चटाई के ऊपर में एक बाली स रखा सर के नीचे में रखना के लिए विश्राम करने के लिए किंतु विश्राम करने की तो बात दूर रही नरेंद्र और अन्य अंतरंग भक्ति जो बैठे हुए हैं ठाकुर भी उनके साथ में जाकर के इस बिस्तर पे बैठ गए और गाल को बोले घर को बोले बंगाली शब्द यहां पे उसे किया है अर्थात बटन बटन में अपने पुराने दोनों की बात जो है स्मृतियां जो है हमको बता रहे हैं तो ठाकुर ने क्या कहा महाभारत कुंजे बेदतम कृष्णा किशोरी कच्चे अध्यात्म सुनते चेतन मेरी जब यह अवस्था हुई तब मेरे मां में सिर्फ धार्मिक ग्रंथ जो है जी तरह से अध्यात्म रामायण है या तो महाभारत है या तो भागवत है इन सब का पाठ कहां पर हो रहा है वो मैं खोजने खोजने चारों और घूमता था और अंडे था बोलकर के एक जगह है वहां पे कृष्णा किशोर करके एक पंडित राहत है उसके पास में मैं जाता था और ठाकुर के ठाकुर ने जब कहा की मेरी यह अवस्था तो कल हमने विस्तारपूर्वक देखा की ठाकुर के सर के ऊपर में जब यह भाव स्वर हो जाता है तो क्या होता था बिल्कुल बालक अभी पहले बार जब यह अवस्था हुई हम लोग क्या है की हमारे मां में लज्जा घृणा और भाई यह तीन सांसारिक बंधन सब समय रहते हैं मैं अपने मां की सब बात लोगों के सामने नहीं बोल दूंगा मुझे ग जाति है क्यों क्योंकि मेरे मां के जो विचार है वो बहुत बार ऐसे विचार होते हैं जो की मैं सबके साथ में शेर नहीं कर सकता हूं उसको बता देना अर्थात मेरे मां की सब बात बिल्कुल बच्चा जैसा अपनी मां को सब बता देता है ऐसे बता देना उससे हमको बहुत लज्जा आई है घृणा ऐसा बहुत सर कम है जिसको करने के लिए हमको घृणा उत्पन्न होती है और भाई बहुत सर ऐसा जैसे की हमको मृत्यु भाई है यदि टीचर के पास गए टीचर ने कहा की होमवर्क करके लाना तो हम होमवर्क करना भूल गए तो अभी जाकर के टीचर को तैसा नहीं कहेंगे की भूल गए हैं या तो नहीं आता या ऐसा कुछ कुछ बहन बना देंगे की मेरे घर में ही है ये कम ए गया था मुझे शादी भी हमें जाना पड़ा था या तो मेरी मां को और कुछ कम था या घर में कोई बीमा था ऐसा करके कुछ ना कुछ बहन बता देंगे सत्य घटना नहीं बताएंगे की नहीं मुझे मैंने ये नहीं किया ना की फिर मुझे इच्छा नहीं थी कम करने की तो मैंने होमवर्क नहीं किया ऐसा तो हम नहीं कहेंगे तो ये एक भाई राहत है साथ-साथ में तो ये लज्जा घृणा भट्ट ठाकुर कहते हैं तीन थकते नहीं ये जब तीन साहब के मां में रहते हैं तब तक जो है हम ईश्वर का दर्शन नहीं का सकते तो इसीलिए ठाकुर कहते हैं की जब मेरी यह अवस्था सबसे पहले बार हुई थी तो जैसे सामान्य आदमी के मां में ये जो लज्जा घृणा और भाई राहत है यह ठाकुर के मां से संपूर्ण रूप से चला गया था तो भाई रहित जिसका मां राहत है तो कालीबाड़ी में रश्मानी आई है और ठाकुर को बोला ठाकुर नए-नए यंग है अभी तो बात बाद में हम तो कथामृत में देखते हैं की 45 50 प्लस उनकी उम्र हो गई है किंतु उसे समय तो यंग थे उनका बर्थ था 36 में 1836 में और 18556 में तो वो काली मंदिर में कम करते थे तो फिर आ उसे समय तो बहुत ही अंत है 20 साल से भी कम की उम्र होगी 36 तो 46 तो 56 तो हमने 20 से भी कम शायद उनकी उम्र होगी तो उसे समय काली मंदिर में रानी रश्मोनी आई है और ठाकुर को कहा की भट्टाचार्य जो माशा है आप थोड़ा सा गण गई तो ठाकुर यहां पे गण ग रहा है मां का गण सुंदर रूप से और यहां पे रस मनी वो फूल चुन रही है चुनते-चुनते वो कहानी पे वो अन्य मनुष्य मां उसका और कहानी पे चला गया पुरानी तो बहुत उसका बड़ा कार्य भर था कहानी पे कोर्ट कैसे चल रहा है कहानी पे जमींदारी का मामला है कहां कुछ तो मां उसमें चला गया तो ठाकुर ने देखा की वो मेरी मतलब वो उसे ठाकुर की बात पर नहीं ठाकुर के गंद के ऊपर नहीं ठाकुर तो इस तरह का उनका मां में नहीं रहेगा की मेरा गण नहीं सुन रही ऐश्वर्या गण हो रहा है ईश्वर का ज्ञान हो रहा है और वो नहीं सुन रहे शुद्ध करके ठाकुर ने सीधा उसके मुंह पे चांटा मार दिया तो इस तरह का साहस होना कोई यंग एम्पलाई आजकल अपने जो बस होते हैं अपने उनके जो ये होते हैं एंपलॉयर क्या उनको चांटा करने का साहस करेगा भले ही चाहे उनसे कितना ही नाराज क्यों ना हो किंतु अभी ये बात सिर्फ ये नहीं है की चांटा मारा इसके लिए साहस चाहिए आपको कंप्लीट सेल्फलेसनेस चाहिए संपूर्ण रूप से निस्वार्थ तथा संपूर्ण रूप से अपने अहंकार का विस्मृतिकरण अपने अहंकार का संपूर्ण रूप से तिलांजलि में यदि जब तक मेरे मां में यह भाव है की मैं गंगा रहा हूं मां का भजन ग रहा हूं और सामने वाला नहीं सुन रहा तो फिर क्या है की वह जो है अहंकार सामने वाले को दिखाई देता है और वो हमको पनिश करेगा सामने उसने अहंकार के मारे किया क्योंकि वह यह सब सब कॉन्शियस कम्युनिकेशन हम लोग भले ही चाहे एन समझ पे किंतु समय चलते रहते हैं किंतु जिसका मां संपूर्ण रूप से अहंकार रहित थे तो सामने वाला रश्मानी इमीडियाटली समझ गई की हां नहीं वो जो ठाकुर ने जो किया है ठीक किया है अपने खुद के अहंकार वर्षित नहीं की मेरा गण नहीं मेरा भजन नहीं सुन रही मां का भजन नहीं सुन रही और वो तो खुद ने तो रानी रसमणि में इतनी भक्ति थी मां के प्रति मां काली के प्रति इसीलिए तो काली मंदिर का निर्माण किया तो ये काली मंदिर का निर्माण किया बोल करके वो भक्ति थी बोलकर के समझ भी गई की ठाकुर ने तो मेरे ही अच्छे के लिए मेरे भले के लिए मुझे इस तरह से मैं मैन एक्सट्रीम रूप से मेरी दृष्टि इस पर्टिकुलर इंसिडेंट की और आकर्षित की है तो अभी रानी रश्मोनी भी उनको पनिश नहीं करेगी या तो उनके ऊपर में गुस्सा नहीं होगी तो अभी इसलिए जो ठाकुर कहते हैं मेरी यह अवस्था हुई अर्थात की उनका अहंकार संपूर्ण रूप से चला गया ईश्वर जो है संपूर्ण रूप से उनके मां के ऊपर स्वर हो गए ना भाई कम क्रोध मैड लोग मोहमद सर ये सब जो विद्या अस्मिता हा देश अभी निवेश यह जो पांच क्लेश है या तो कहो की हमारी ये दुर्गुण है या तो फिर कहो की जन्म जन्म अंतर से चले ए रहे यह जो कर्मों का ये जो संपूर्ण जो है वो संपूर्ण रूप से धीरे-धीरे करके वो इस्मत होने लगा और महाकाली ने ठाकुर के हृदय में प्रवेश किया तो ठाकुर कहते हैं ये अवस्था जब हुई तब से मेरे मां में अब ये सांसारिक बटन के प्रति मां बिल्कुल उठ गया और कहां पे ये धार्मिक ग का पाठ हो रहा है कहां पे साधु संत इकट्ठा होते हैं उनका सत्संग करूं धर्म ग का पाठ सुनो वो देखने के लिए खोजने खोजने मैं चारों और घूमता था कृष्णा किशोरी के पास में जाता था तो अभी ठाकुर खुद जीत का सत्संग करने के लिए सामने से जाते होंगे उसका विश्वास उसकी भक्ति उसकी साधना की क्षमता संकल्प शक्ति त्याग जैसा होगा इसके बड़े में हमको भी थोड़ा सोच करके आश्चर्य होता है ठाकुर बताते हैं कृष्णा किशोरी कुंवर कचेज यह देखें एक जान धनिए रहे थे एक्वा मिल गया तो केन के पास में जाकर के देखा की एक आदमी वहां पे खड़ा है जिज्ञासा को रेट से बोले आमीन नीचे जाति अपनी ब्राह्मण केमोन कोर अपना जल तुले दे वो तो अभी प्यास लगी है कुआं भी मिल गया वृंदावन में है देखा की पास में एक आदमी खड़ा है तो आदमी को पूछा की भाई तुम कौन हो तो उसे आदमी ने कहा बड़े ही संकोच के साथ में की मैं तो नीचे जाति का हूं आप प्रवीण है मैं किस तरह से आपके लिए पानी निकाल डन केन में सिर्फ कृष्णा किशोर ने कहा तुम बोलो शिवा भगवान शिवा का नाम लो शिवा शिवा बोलते ही तुम शुद्ध हो जाओगे ले उसे आदमी ने शिवा शिवा इस भगवान शिवा का नाम लिया और पानी खींच दिया केन में से ओमान आचार्य ब्राह्मण श्री जल खेल इतना अचार निष्ठावान ब्राह्मण था उसने वो पानी पिया की विश्वास क्या विश्वास अभी देखो ये घटना जब हम आज सुनते हैं तो हमको यह कृष्णा किशोर के ऊपर में कोई श्रद्धा नहीं होती हम हमारा आज का जो अंडरस्टैंडिंग है आज का जो हमारा क्या कहेंगे की एक मन व्यू है एक फिलोसॉफिकल अंडरस्टैंडिंग है भारतवर्ष में इतना हमारे डीएनए में कहो ना की हमारी हड्डियों में कहो ऐसा घुस गया था की यह उच्च जाति और नीचे जाति का जो भेदभाव है वो इतना बाढ़ गया था की इसीलिए बाहर से जब आक्रमण होने लगे या मुसलमान लोग आए ना फिर ईस्ट इंडिया कंपनी आई एन की बाद में ब्रिटिश लोग आए वो मतलब ब्रिटिश अंपायर आया तो उन लोगों ने क्या किया नीचे जाति वालों को सैनिक बनाकर के उन्हें के पास से ये उच्च जातियां के ऊपर में अत्याचार करवाएं थे तो ये तो हमारी ही गलती है की हमने उनको नाथ बाहर कर दिया नीचे जाति बोल करके हमने ही उनके ऊपर में इतना अत्याचार करना शुरू कर दिया था की ये मुस्लिम क्या तो फिर ये ब्रिटिश लोग आए तो उनको तो जान में जान आई की चलो भाई हमारी बात भी तो सुनने वाला कोई है यह बात आजकल हम सोचते हैं और इसीलिए यहां पे जब कृष्णा किशोर कहता है की तुम शिवा बोलो तो तुम शुद्ध हो जाओगे तो यह सुनकर के उसके ऊपर श्रद्धा कुछ नहीं आता यह तो लगता है की यह तो कोई नाटक कर रहा है अपने खुद को प्यास लगी है वो पता है की यह नाथ जैसा कुछ है नहीं वो सब उन्होंने ब्राह्मण लोगों ने या तो फिर जिसको हम कहते हैं वर्णों वालों ने अपनी सत्ता संभालने के लिए नीचे जाति जो है उन लोगों को इस तरह से वो जानबूझकर के ऐसा सब खड़ा किया है और जब अपने को स्वार्थ होता है तो शिवा का नाम बुलाकर के उसको 5 से पानी भी पी लिया अभी ऐसा आजकल जो एक सामने वादी विचार जो है वो सबके जैसे मैं खुद में जब स्टूडेंट था मेरे मन में भी यह सब साम्यवादी कम्युनिस्ट विचार बहुत सारे थे अपनी भारतीय संस्कृति हमारी ट्रेडीशन हमारी धरोहर हमारे पुराण हमारे संत हमारा यह जो गौरवमई इतिहास ये सबके ऊपर में मेरा एक एक क्या कहेंगे तो छठ दृष्टि था मैं इस तरह से यह सामने वाली किताबें पढ़ पढ़ करके ऐसा सोचना शुरू कर दिया था की जैसे यह जो क्लास और फिर जो होता है ना वो सोवियत यूनियन में और चीन में ये सब चला तो ऐसा ही इंडिया में एक है की उच्च जाति वहां पर क्लास है गरीब आदमी है जो धनी जमींदार है वह गरीब लोगों का शोषण करते हैं इस तरह से वहां का थ्योरी है और इंडिया के लिए थ्योरी क्या है यह उच्च वर्णों वाले जो है और नीचे वर्ण वाले जो है इन दोनों के बीच बीच में ये जो क्लास हो रही है कहो ना की कष्टबर चल रहा है आजकल भी बहुत सारे लोग इस तरह से हमको सीखने हैं किंतु हमको यह बात याद रखती है की देखो की ऐसा की सभी उच्च वर्णों वाले शुद्ध पवित्र थे और जोश बोलते थे उसे बात में विश्वास करते थे ऐसा तो नहीं है किंतु इससे बहुत सारे शुद्ध निष्ठावान आचार्य ब्राह्मण थे जो लोग सही सही विश्वास करते थे की हम लोगों का कर्म जो है हमारी यह जो विचारधारा जो है हम लोगों का कर्म अर्थात की दो तरह से उसका डेफिनेशन है कर्म अर्थात की मैं क्या कर रहा हूं मैं किसान हूं ना की मैं लोहार हूं ना की मैं राजा हूं ना की मैं सैनिक हूं ना की मैं सेनापति हूं मैं जो कार्य कर रहा हूं उसको भी कर्म कहते हैं और कर्मिक का फल जो संचित होते-होते अनेक जनों से और इसी जन्म का फल भी मैंने जो सत्कर्म किया एन की दुष्कर्म किया उसका जो फल संचित होता है उसको भी हम कर्मकार के पुकारते हैं तो मेरा जो कर्म है दोनों अर्थ में में क्या कार्य करता हूं और मैंने जो सतर्कता या तो दुष्कर्म जो किया हैं उसका जो फल है वो मेरे चरित्र के ऊपर में वो अपनी रेखा पाठ वो करते हैं मेरे चरित्र के ऊपर में वो अंकित रहते हैं और यदि मेरा जो मेरा जीवन का उद्देश्य ईश्वर प्रताप है तो मैंने जो दुष्कर्म करके यह जो नेगेटिव कर्म अर्जित किया हैं उसको मुझे साधना करके उसको शुद्ध करना पड़ेगा उसको दो देना पड़ेगा अभी जो ब्राह्मण होता है वह क्या कहता है की जिसने इस तरह से दुष्कर्म किया हैं उसके पास से यदि कोई चीज ग्रहण की जाए तो उसके दुष्कर्म का एक हिस्सा मुझे ग्रहण करना होगा क्योंकि हमारी हिंदू परंपरा में है की यदि कोई शुद्ध पवित्र आदमी जो की जिसने कोई मालिन कर्म किया है दुष्कर्म किया है उसके पास से कोई चीज ग्रहण करेगा तो उसके जो दुष्कर्म है वो धूल जाएंगे और जो शुद्ध आदमी है जिसने शुद्ध कर्म किया हैं जो सड़क है उसको वो दुष्कर्म उसके शरीर के ऊपर में ए जाएंगे उसके शरीर के ऊपर में वो भोग होगा जैसे की ठाकुर ने ठाकुर बाबू की पत्नी जगदंबा दासी वो बहुत बीमा हो गई तो था माथुर बाबू ने ठाकुर को कहा की देखिए मेरी पत्नी का मृत्यु होगा तो क्या होगा की एक्चुअली तो रसमणि की लड़की तो मेरी पत्नी है मैं तो उनका लड़का नहीं हूं मैं तो उनका रस मनी का जमाई हूं जमाई हूं तो सनी लियोन तो अभी चली मेरी पत्नी का मृत्यु हुआ तो रसमणि की संपत्ति के ऊपर में मेरा जो अधिकार है वह चला जाएगा मैं जो तो गरीब आदमी था मैं फिर से वो गरीब हो जाऊंगा मेरे तो सदगुण देख कर के रश्मानी ने अपनी लड़की के साथ में मेरी शादी करवाई थी तो जब तक रश्मानी की लड़की के साथ में मेरा विवाह है तब तक रश्मानी की संपत्ति के ऊपर में मेरा अधिकार है वो नहीं रहेगी तो मेरा अधिकार का क्या होगा ऐसा बोलकर के माथुर बाबू ने ठाकुर को कहा की देखिए मैं फिर मैं तो गरीब था फिर से गरीब हो जाऊंगा उससे कोई दिक्कत नहीं है किंतु यह काली मंदिर का विवाद जो है कार्य भर जो है वो मेरे हाथ से चला जाएगा तो आपकी सेवा कौन करेगा इतने में जो इतने मां प्राण देकर के आपकी सेवा करता हूं और किसी के हाथ में कालीबाड़ी चला जाएगा तो आप की सेवा कौन करेगा तो आप किसी भी तरह से मेरी पत्नी को इतनी बीमा है उसको ठीक कर दीजिए तो यह सुनकर के ठाकुर ने क्या किया उनका भक्ति जो था उनकी बात मां ली और जगदंबा दासी का जो रॉक था अपने शरीर के ऊपर में ले लिया ठाकुर को 6 महीने तक रोग से जरूर ना पड़ा था ठाकुर को जो कैंसर हुआ वह भी यही है की पूरे समस्त जगत संसार का जो पाप है उन्होंने अपने शरीर पे धरण कर लिया था बोल करके उनको कैंसर हुआ वरना तो शुद्ध पवित्र देहात को इस तरह से बीमा होने का तो कोई प्रश्न ही नहीं आता तो इसलिए अभी आप देखेंगे की जो इस तरह से ब्राह्मण जो होते हैं आचार्य ब्राह्मी वो कभी ऐसा नहीं कहते की हम लोग इसका शोषण कर रहे हैं बहुत सारे कैसे में देखेंगे की जैसे खुदीराम थे खुदीराम सबका अन्य ग्रहण नहीं करते थे जैसे अखंडानंद जी की कहानी हमने दो-तीन दिन पहले सनी थी अखंडानंद जी कोई मतलब नीचे जाति ब्राह्मण में भी उच्च नीचे होता है तो कोई मैन कैटिगरी में जो कम है ऐसे ब्राह्मण भी जल्दी बुलेट थे बाकी वर्ण की तो बात ही अलग है हो गई इस तरह के ब्राह्मण जो की उच्च कैटिगरी में नहीं आते हैं उनसे भी वह अन्य ग्रहण नहीं करते थे तो यह लोग जो सही सही आचार्य होते हैं उनके पास नहीं धन होता है ना ही संपत्ति होती है नहीं पावर होता है नहीं पोजीशन होती है विलुप्त इतने गरीब होते हैं और उनकी एकमात्र इच्छा होती है ईश्वर प्रताप के लिए जीवन सर्वस्व दे देना और ईश्वर प्रताप के लिए जो बड़ा रूप है जिन लोगों का ऐसे लोगों को सस्पेंस में आना जिनके संस्कार मालिन है तो उनसे दूर रहना वे लोग ऐसा नहीं कहते की हम लोग दूसरों के संपत्ति हड़प कर लेंगे जैसे की यूरोप में यूरोप में हुआ था जो लोग धनी है जिनके पास पावर है वो लोग दूसरों की संपत्ति ले लेते हैं और ये धनी लोगों से अपनी संपत्ति वापस लेने के लिए यह रिवॉल्यूशन होता है किंतु इंडिया में तो क्या करेंगे अब ब्राह्मण के साथ में ब्राह्मण के पास में नहीं पैसा है नहीं उसके पास में पोजीशन है नहीं उसके पास में धन के ना की वैभव है आप रिवॉल्यूशन ला करके ब्राह्मण के पास से क्या ले लेंगे ब्राह्मण के पास में महाभारत की पंक्ति है क्या वो ले लेंगे उससे छन लेंगे अच्छा है छन लो पढ़ो उसको आप ही का कल्याण होगा ब्राह्मण के पास में वो जो दिन रात जब ध्यान करता है वो उससे खींच लेंगे ले लो थोड़ा जब ध्यान करोगे तो हम अभी का कल्याण भ्रमण के पास में वह छोटी सी भगवान की मूर्ति है वह क्या उससे खींच लेंगे वह भी ले लो वह भगवान की मूर्ति की पूजा करेंगे तो अभी आप ही का कल्याण है तो ये भारत में यह साम्यवादी विचार जो है वो फिट नहीं होता जैसे की मैंने कहा ऐसे दुर्बुद्धि वाले लोग भी है जिन्होंने नीची जाति इस तरह से चला करके बहुत लोगों का शोषण भी किया है किंतु जो लोग सही ईश्वर के भक्ति हैं ईश्वर के सड़क है और वो जब इस तरह से अचार निष्ठा का पालनपुर करते हैं इसके पीछे यह नहीं है की मैं दूसरों का शोषण करना चाहता हूं इसके पीछे यह है की जो अविराम जब तब साधना तपस्या का जो प्रवाह उनके जीवन में बा रहा है उसमें कोई व्यथा कोई बढ़ाना खड़ी हो उसमें कोई विराम ना ए जाए उसमें कोई इस तरह से कोई डिस्टरबेंस ना ए जाए की ईश्वर के प्रति उनका जो एक गति जो है ईश्वर के प्रति उनकी यात्रा जो है वो रुक जाए है इसलिए यह लोग यह सब नाथ जाट इसमें मानते थे नाथ अर्थात ऐसा नहीं की उसने इस नात में जन्म लिया है नात अर्थात की जिसका संस्कार कैसा है अभी कृष्णा किशोर उसने देखा की उसका संस्कार तो शुद्ध है भले ही वो नीचे जाति में उसका जन्म ग्रहण किया होगा तो उसने कहा की शिवा का नाम लो और शुद्ध हो जाओगे तो बस हो गया मामला खत्म अभी ठाकुर ने एक बार ठाकुर के कहानी है की एक बार अपने दक्षिण अपने कमरे के सामने खड़े थे देखा दक्षिणेश्वर में की बाहर से एक आदमी ए रहा है और एक बहुत बड़ी घोड़ा के गाड़ी में बैठ करके तो अभी वो आया तो उसको देखकर के ही ठाकुर अपने कमरे में चले गए वापस क्यों उन्होंने देखा की उसके उसे धनिया आदमी है वैभवी आदमी है पावर है उसके पास में बड़ा राजा सिख है बड़ा ही उसके पास में सत्ता है किंतु उसके सर के ऊपर में तमस के बादल जो है वो घूम रहे हैं उसके सर के ऊपर में तमस के बादल छाई हुए हैं तो उसको देखकर के ठाकुर डर के मारे अपने कमरे चले गए और किसी को बोल दिया की यदि वह मेरे बड़े में पूछता है तो बोल देना की ठाकुर परमहंस महाशय यहां पे नहीं है वो बाहर गए हैं बाद में आना ऐसा करके देखिए जिनका संस्कार अच्छा नहीं है उसके पास में यदि धन संपत्ति भी है तो ये लोग उससे दूर रहते हैं की छोटी जाति में जन्म ग्रहण किया है इसलिए उससे दूर रहना वरना ये जो माली जो है या तो फिर जो रसिक मेहता जिसका टॉयलेट ठाकुर ने अपने बालों से क्लीन किया था साफ किया था इन लोगों से तो ठाकुर ऐसे दूर नहीं रहते बुला बुलाकर के उपदेश देते हैं महाकाली का प्रसाद भी देते हैं सब कुछ करते हैं तो ऐसा नहीं है की नाथ जाट या तो धन वैभव देख कर के ठाकुर उसको पास में बुलेट हैं या तो दूर करते हैं यह जो सब कुछ होता है संस्कार के मामले पर होता है हां हालांकि हमारी यह जो एकदम क्या कहेंगे की उच्च फिलासफी वेदांत जिसके द्वारा हमने यह सामाजिक नियम बनाए थे सामाजिक परिस्थितियों खड़ी की थी उसमें बात-बात में जब विदेशी आक्रमण होने से इतना एक बहुत बड़ा डिस्टरबेंस ए गया की संस्कार के बेस पर जो होना था आदमी का क्लासिफिकेशन कोई आदमी बड़ा है या छोटा है उसे संस्कार के बेस पर होना था उसकी बजे धन संपत्ति के बेस पर होने लगा और इसीलिए जब यह ब्रिटिश लोग भारत में आए तो उन्होंने देखा एक वॉइस क्या नाम था मैं उसका भूल गया भूल गया तो जो भी है उसने देखा की उसके ऑफिस में जो कम कर रहे हैं एक गरीब ब्राह्मण चपरासी है और एक नीचे जाति का वो बड़ा ऑफिसर है तो ब्राह्मण गरीब आदमी है चपरासी है किंतु जो ऑफिसर है वो उसके पर को ऊ करके प्रणाम करता है तो वो पूछता है की वो सोचता है क्या अरे ये क्या है उल्टा हो रहा है यूरोप में तो जिसके पास धन है उसके पास में ही सब कुछ है लोग उसके सामने झुकते हैं यहां पे ये गरीब आदमी गरीब ब्राह्मण चपरासी के सामने ये ऑफिशल झुक रहा है तब उसने खोज खबर लेकर उसने जाना की बात ये नहीं है की धन संपत्ति किसके पास में है और गरीब कौन है इसके बेस पर आदमी की पहचान होती है उसकी जाट के ऊपर आदमी के पहचान होती है अभी जाट जाट नहीं है जाट के संस्कार कर्म जिसको की हमको समझना है पहले हम सोचते थे की कर्मों के आधार पर ये सब बता हुआ है यह सूत्र है यह छतरी है यह ब्राह्मण है एक्चुअली कर्म अर्थात की संस्कार यह नहीं की मैं क्या कर रहा हूं वह जड़भारत राजा ओ उसकी पालकी उठाकर के चल रहा है बोल रहा है की आप जो है वही मैं हूं हमारे भीतर में वही आत्ममन है तो देख कर के राजा भी आश्चर्यचकित हो गया पालकी में से नीचे उतार करके उसने उसके पर छुए ये शंकराचार्य शंकराचार्य गंगा में स्नान करके वो घाट के ऊपर चल रहे हैं वो चांडाल को ऊ लिया तो उसने वो शंकराचार्य बड़े नाराज हो गए अरे तुमने मुझे ऊ लिया मैं अभी गंगा स्नान करके आया हूं तो चांडाल ने बोल दिया अरे महाराज आपके भीतर में जो आगमन है वही मेरे भीतर में है वो आत्महत्या की है फिर शरीर को लेकर के आपको इतना क्या मतलब दुविधा है तो देख कर के शंकराचार्य जैसे शंकराचार्य को ज्ञान हो गया तो हमारी परंपरा में ऐसा कभी नहीं है की किसी आदमी धन है वैभव है या नहीं उसके ऊपर में या तो फिर किस जाट में उसने ग्रहण किया है जन्म ग्रहण किया उसके ऊपर उसका क्लासिफिकेशन हो उसके संस्कार के ऊपर होता है के हम बात नहीं यह विदेशी आक्रमणों की वजह से हमारी पुरी समाज व्यवस्था बर भी खेर हो गई अभी भी आज भारत के पास समय है की संस्कार के आधार पर मनुष्य की पहचान हो यदि कोई गरीब भी है किंतु उसके संस्कार अच्छे हैं तो समाज में उसको श्रेष्ठ स्थान मिलन चाहिए और कोई अमीर है किंतु उसके मां में घमंड फिर डीआरपी फिर ये लोगों का शोषण करने की प्रवृत्ति यह सब होती है तो हमको समझ में आना चाहिए की इस आदमी के भीतर तमस है और उसके ऊपर में हमारा श्रद्धा भक्ति बिल्कुल नहीं होना चाहिए जिसके भीतर में मैत्री करुणा मुदिता अपेक्षा ईश्वर के प्रति श्रद्धा भक्ति ज्ञान यह सब सदगुण है उसके प्रति हमारा रिस्पेक्ट होना चाहिए यह इस तरह से समाज की रचना हनी चाहिए नहीं की कौन किस जाट में जन्म ग्रहण करता है या तो किसके पास में कितना रुपया है कितना बैंक बैलेंस है कितना पावर है तो अभी इस दृष्टि से यदि हम इस कहानी को पढ़ने हैं तब हमको पता चलेगा की कृष्णा किशोर का विश्वास सही-सही में कितना बड़ा था कितना धड़ था वो ब्राह्मण था सड़क था लोगों के संस्कार को देखा था देखा की ये आदमी सामाजिक व्यवस्था के अनुसार भले नीचे जाति में उसने ग्रहण जन्म ग्रहण किया किंतु उसके सांस संस्कार तो शुद्ध है तो वो यदि उसके मां में कोई दुविधा होगी की हां मैं नीचे जाति में जन्म ग्रहण किया है तो मैं किस तरह से ब्राह्मण को पानी दे डन तो उन्होंने कृष्णा किशोर ने समाधान कर दिया भगवान शिवा का नाम लो सब ठीक हो जाएगा तुम्हारा छोटी जाति में जन्म लेना या तुम्हारा ये जो संकोच सब दूर हो जाएगा शिवा का नाम मंत्र लेने से तो संस्कार को देखकर के ये लोग रहते थे तो यह जो कहा ना की क्या विश्वास है अंतर्दृष्टि होने से इस तरह का विश्वास आता है ठाकुर आगे कहते हैं मुझे पता नहीं मैं कभी गया नहीं किंतु मैं अनुमान करके का सकता हूं की दक्षिणेश्वर में आसपास में ही होगी क्योंकि ठाकुर तो कहते हैं की मैं वो एडा के कृष्णा किशोर के पास जाता था तो वहां पर पास में ही होगी मैं अनुमान करके का रहा हूं एडिटर घाटे 31अधू से शीलो अंडे धाम में भी गंगा नदी थी गंगा नदी का घाट था घाट के ऊपर में एक साधु आया था अमर एक दिन देखते जब वह बबलू हमने एक बार एक दिन ठीक किया की इस साधु को देखने के लिए जाएंगे अमराहम अर्थात कौन तो ठाकुर और कृष्णा किशोर और ई साधु देखते जंबो मैंने कालीबाड़ी में हलधारी को ठाकुर कहते हैं मैंने कालीबाड़ी में हलधारी को कहा की हमने और कृष्णा किशोर साधु को देखने के लिए जा रहा है हलधारी कौन था ठाकुर का रिलेटिव था ईटीसी रिलेशन नंबर मुझे याद नहीं ए रहा है किंतु यह वही हलधारी जो की वाक्य सिद्ध था और कोई तांत्रिक सब साधना में लिपट था जिसमें पर स्त्री को लेकर के साधना करनी होती थी और लोग इसके बड़े में पीछे-पीछे बात कर रहे थे किंतु हलधारी के मुंह पर किसी को बोलने का साहस नहीं होता था क्योंकि वह ठाकुर ने जाकर उसको बोल दिया की अरे तुम यह क्या कर रहे हो तो हलधारी ने ठाकुर को श्राप दे दिया की तुम्हारे मुंह से खून निकलेगा और सही सही ठाकुर के मुंह से खून निकाल रहा था किंतु फिर वो वहां पे एक दूसरे साधु भी आए हुए थे दक्षिणेश्वर में उन्होंने ठाकुर को का दिया की सांत्वना देखिए आप जड़ है योग के साधना कर रहे थे तो बोल कर के आपकी कुंडली नहीं सर के ऊपर में सहस्रनर चक्र की और जा रही थी वहां यदि पहुंच जाति तो आपको जड़ समाधि होती है और आपका शरीर त्याग हो जाता किंतु मां काली को मां जगदंबा को आपसे कोई विशेष कार्य करवाना है इसीलिए मुंह के खून के द्वारा ये कुंडली जो है या तो फिर ये ओजस शक्ति जो है वो थोड़ी कम हो गई है तो आपका जो शरीर जो है वो अभी भी धरण होगा तो वही खरीदारी ये ठाकुर ने कहा की मैं और कृष्णा किशोर वहां पर साधु को देखने के लिए जा रहे हैं तुम ही जावे तुम भी हमारे साथ के आओगे तो हलधारी बोल ले एकता मातिर कंचा देखते की यह की हो गया हालदार ने कहा की एक माटिका पिंजर इस शरीर तो जो है वो हल्दरी क्या है भागवत रामायण पढ़ना था ना तो इसके भीतर में आगमन है वो सोचना है नहीं की ये शरीर तो एक मिट्टी का एक पिंजरा मंत्र है तो वो साधु के साधु कौन है तो साधु तो मिट्टी का पिंजरा है तो उसको देखने के लिए क्यों जाएंगे उसको देखकर के क्या लाभ होगा उसके भीतर आत्मा है किंतु आत्मा को तो सर्वव्यापी है तो वो तो मैं यही पे भी हवा हवा में उसका दर्शन कर लूंगा वो मिट्टी का जो पिंजरा है उसको देखने के लिए मैं क्यों जाऊं तो पड़े की ना हलधारी गीता वेदांत पढ़ना है तो ताई साधु के बोलने मटर खान चाय इसलिए साधु को कहा मिट्टी का पिंजरा अब ये क्या है की वेदांत का वह अपचय वेदांत का इनडाइजेशन होने से इस तरह की सब बातें होती है की मैं तो शरीर नहीं हूं मैं तो ये इंद्रिय नहीं हूं मैं तो इसके भीतर की आत्मा हूं किंतु सिर्फ मुंह से बोलने तो नहीं होगा आपके अपने संस्कारों को शुद्ध परिषद करना होगा आपके जितने भी दुर्गुण है उसको संपूर्ण रूप से तेज देना होगा छोड़ देना होगा सदगुण जो है उसको अपनाना होगा स्वामी जी की एक सुंदर कहानी है की अमेरिका में वो लेक्चर दे रहे थे तो बात-बात में वह बोल रहे हैं सब समय की एवरीथिंग इस ब्रह्मांड एवरीथिंग जितना भी देख रहे हो सब कुछ ब्राह्मण है तो उनका एक अनुयाई था शिष्य था एक आदमी तो ऑडियंस में थोड़ा उसको हंसी मजाक करने का बड़ा उसको शौक होता था स्वामी जी का बड़ा अच्छा शिष्य था तो स्वामी जी भी उसके साथ में हंसी मजाक कर लिया करते थे तो यह आदमी स्वामी जी को पूछता है की स्वामी आप बार-बार का रहे हैं की एवरीथिंग एवरीथिंग इस भ्रमण एवरीथिंग इस भ्रमण तो व्हाट इसे डी डिफरेंस बिटवीन एन ह्यूमन और कैबेज ये जो आलू को भी है वो और एक इंसान जो है इसके भीतर में डिफरेंस क्या है क्या फर्क है यदि सब कुछ ब्राह्मण है तो स्वामी जी भी समझ गए वो मजाक करके ही ऐसा का रहा है तो स्वामी जी ने क्या उत्तर दिया स्टिक एन नाइस इन योर लेग और यू बिल फाइंड आउट व्हाट इस डी डिफरेंस अपने पर में एक चाकू मारो अभी पता चल जाएगा की क्या डिफरेंस है पत्ता को भी कुछ चाकू मारोगे उसको खाने के लिए उसे चाकू मार करके उसको वह जो सब्जी बनाते हो पत्ता गोभी को फूल को भी कष्ट नहीं होता किंतु हमारे पर में चाकू मारेंगे तो इतना जोर जोर से चिल्लाना शुरू कर देंगे तो सब कुछ ब्राह्मण कब आएगी जब हमारे संस्कार शुद्ध हो जाएंगे तब तो अभी हलधारी जो है मुंह से तो बोलना राहत है की मैं अध्यात्म रामायण में जो लिखा है सर्वम रिदम ब्रा सो हम तत्वमसि प्रज्ञान जो है वो मुंह से तो बोलना राहत है किंतु संस्कार इतने शुद्ध नहीं हुए हैं उसका अहंकार कहानी इतना संपूर्ण रूप से चला नहीं गया है की वो इस बात की अनुभूति कर सके इसका साक्षात्कार से मुंह से मुंह से सब कुछ बोल रहा है ठाकुर के अनेक ठाकुर ने कहा की नहीं वो नहीं शायद नहीं कहा किंतु हम लोगों में जो लोग वेदांत का अभ्यास करते हैं उन लोगों में कहानी प्रसिद्ध है एक इसको पंजाबी वेदांत कहते हैं की पंजाबी लोगों का अपमान करने का उद्देश्य नहीं है किंतु यह कहानी चली ए रही है तो पंजाबी वेदांत नहीं करके हम लोग कहेंगे की उन्होंने वेदांत का मैन मिसअंडरस्टैंडिंग कैसे होता है एक साधु ने एक महिला के साथ में कुछ अनाचार किया दुष्कर्म किया तो लोगों ने इस साधु को पड़कर के कोर्ट में ले आए जज के पास में पुलिस ने पकड़ लिया जज के पास में ले आए तो जज ने पूछा साधु को की अरे तुमको शर्म नहीं आई तुम साधु हो करके महिला के साथ में इसका इस दुष्कृत्य करते हो दुष्कर्म करते हो गेरुआ पहन के घूमते हो इस तरह का तुम्हारा व्यवहार है तुमको शर्म आनी चाहिए तो साधु क्या कहता है की महाशय मैंने तो कुछ किया नहीं है मेरे शरीर ने किया है ये दुष्कर्म मैं तो आत्मा हूं शुद्ध पवित्र मेरा तो नहीं जन्म है ना ही मृत्यु है तीनों कल में मेरा कोई अस्तित्व ही नहीं है मैं तो सब समय कल आ अवकाश सबसे पैर हूं मैंने तो इस तरह का कोई दुष्कर्म नहीं किया ये शरीर जो है जो शरीर जो समय और कल की सीमाओं में बांध हुआ है ये जो पोजीशन जो है यह घटना चक्र उससे बांदा हुआ है कर्म से बांदा हुआ है ये शरीर ने दुष्कर्म किया है तो ऐसा करके अपने को बचाव कर रहा है तो जज भी बड़े अच्छे उन्होंने वेदांत पढ़कर के रखा था तो वो हंसते-हंसते खाने लगे अच्छा ठीक है मैं तुमको छोड़ देता हूं तुम्हारे शरीर को फैंसी दे देता हूं जल्दी होता है तो इस तरह की बेकार की बातें अपने मुंह पे आई है तो ये हलधारी का भी ऐसा था वो समझ में वेदांत की जो शुद्ध पवित्र उसका वह जो संकल्पना है उसको लेने की बजे अपने संस्कारों को साधना के द्वारा शुद्ध करने की बजे ऐसा मुंह से सब बोलना राहत था तो बोलना है की साधु को देखने को क्यों जाएंगे वो तो मिट्टी का पिंजरा मंत्र है कृष्णा किशोर के लिए ई कोठा बोलना ठाकुर कहते हैं मैंने जाकर के कृष्णा को बोला की वो हलधारी ऐसा बोल रहा है की साधु को देखने को क्यों जाएंगे वो तो मिट्टी का पिंजरा है क्षेमहरे के लोग कृष्णा किशोर बड़ा ही नाराज हो गया बड़ा ही गुस्सा हो गया और बोल ले और उसने कहा की उधारी ईमान को था बोले छे क्या हलधारी ने ऐसी बात कहीं जय ईश्वर चिंता करें जय राम चिंता करें आर शाहिद जो ईश्वर चिंता कर रहा है जो राम की चिंता कर रहा है और भगवान राम के लिए ईश्वर चिंता करने के लिए ईश्वर साक्षात्कार करने के लिए जिसने सर वह कुछ सर्वस्व त्याग किया है उसका शरीर क्या मिट्टी का पिंजरा मंत्र है ऐसा उसने कहा नहीं मैं बता रहा हूं से जान ना जब भुक्तर देखो चिन्मय देखो कितनी बड़ी बात का दी उसको पता नहीं है की भक्ति का देहद चिन्मय है ठाकुर ने वो मस्त-मस्ते ठाकुर के पास आए थे तो इस इसी तरह की बात हुई थी मास्टर महाशय के मां में यह सब विदेशी विचार जब में जब छोटा था मेरे मां में ये सब विदेशी विचार साम्यवादी विचार घूमते रहते थे मास्टर महाशय का भी ऐसा था की लोग पत्थर की मूर्ति की पूजा करते हैं तो उनको बता देना चाहिए ठाकुर ने कहा ना की पत्थर की मूर्ति के भीतर में तो हमको चिन्मय अर्थात की पवित्र ईश्वर की मूर्ति देखनी है जीवित ईश्वर की जीवंत ईश्वर को देखना है पत्थर की मूर्ति के भीतर में तो मास्टर महाशय खाने लगे की अरे तो तो फिर हमको लोगों को बताना चाहिए की पत्थर की मूर्ति पत्थर नहीं है इसके भीतर में जीवंत देवता को देखो जो ठाकुर बड़े ही नाराज हो गए क्या बोला तो मदर कोलकाता के लोगों का वही एक है लेक्चर लेक्चर दे दो लोगों को लोगों को समझा दो किंतु खुद को कौन समझे उसका कुछ ठीक नहीं है तो यहां पर मतलब वह मिट्टी का पिंजरा जो भक्ति ईश्वर की चिंता करता है उसका डे भी इंद्रियां भी पवित्र हो जाति है गिरीश घोष ने कहा था की जिसको मैंने अवतार के रूप में जीना है और वो की गुगोद हो मां है जिसकी मैंने जिसको अवतार के रूप में स्वीकार किया है ठाकुर को उनकी विष्ठा जो है क्या मुझे विष्ठा के रूप में दिखाई देगी वो भी महा पवित्र है तो जो ईश्वर की चिंता करता है उसका डेम मां इंद्रिय शुद्ध पवित्र हो जाता है एत राज इतना गुस्सा किया उसने कृष्णा किशोर ने हलधारी के ऊपर में कालीबाड़ी आज तो हलधारी संगे देखा होल मुक्फिरी नहीं तो कथा कई बिना कालीबाड़ी में फूल चुन्नी के लिए आता था तो हलधारी के सामने जब मुलाकात होती थी चेहरा घुमा लेट था हलधारी के सामने देखेगा नहीं उसे उतना कृष्णा किशोर को गुस्सा ए जाता था ए गया था हालांकि हमको यह भी पता है की सड़क का जो गुस्सा होता है वो जैसे पानी के ऊपर में खींची हुई लकीर अभी दो दिन गुस्सा हुआ है फिर दो दिन के बाद में फिर मित्रता हो गए जिनका मां राघव द्वेष से भारत होता है वे लोग गुस्से को अपने मां में रख लेते हैं फिर सोचते हैं की मैं बदला लूंगा किंतु जो सड़क होता है उसका मां शुद्ध पवित्र निर्मल होता है तो गुस्सा अभी किया क्षणभर में और क्षण भर में गुस्सा भी कहां चला गया ईश्वर के पास में तो कितनी सुंदर सुंदर छोटी छोटी कहानी है ठाकुर के जीवन में तो आज यही पर कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णा