Transcript
ठाकुर कहते हैं कामिनी और कंचन योग के वाइन है वास्तु विचार करना चाहिए स्त्रियों के शरीर में क्या है रक्त मांस आंट कृषि मूत्र विस्ता यही सब उसे शरीर पर प्यार क्यों त्याग के लिए मैंने अपने में राजस्व भाव भरत था शायद हुई थी की जारी की पोशाक पहनूंगा अंगूठी पहनूंगा लंबी नाली वाले हल्के में तंबाकू पिंगा जारी की पोशाक पहनी ये लोग अर्थात की रानी रसमणि के दामाद माथुर बाबू इत्यादि ले आए थे कुछ डर बाद मां से कहा यही साल है यही अंगूठी है यही ओके में तंबाकू पीना है सब फेक दिया तब से फिर मां नहीं चला देखिए यहां पर बहुत ही इंपॉर्टेंट कॉन्सेप्ट आपको डिस्कस करते हैं की यदि हमारे मां में कोई इच्छा उत्पन्न होती है तो उसे इच्छा का समाधान कर लो उसे वासना का समाधान कर लो भोग कर लो जिससे की हम उससे ऊपर संपूर्ण रूप से जो है त्याग हो जाए एक मराठी संत के बड़े में मैं उनका नाम भूल गया उनके बड़े में मैंने पहले भी एक बार बताया था एक भरने तीन-चार बार बताया था किंतु बहुत ही सुंदर कहानी है एक गांव में गए तो क्या था की वो गांव-गांव में जाकर के वो कीर्तन किया करते थे तो एक गांव में गए तो वो भक्तों का तो ऐसा होता है ना की चलो इतने अच्छे संत आए हैं तो हम उनको हमारे घर पे इनवाइट करें आमंत्रण करें और उनको अच्छे से खाना खिलाएं तो एक बार एक गांव में गए तो एक परिवार ने एक भक्ति परिवार ने उनको नहीं होता दिया तो उनके घर गए तो अभी वहां की जो वो ये थी एक औरत एक महिला बड़ी ही भक्तिमति थी तो उसने बड़ा ही वो बहुत ही मेहनत करके बहुत ही अच्छे से एक पेयर्स बनाया पेज अर्थात खीर बनाया अभी ये जो संत थे उन्होंने खीर खाया तो अभी बहुत अच्छा लगा अभी वह जहां पर वह ठहरे थे वह भजन समाप्त करके अपने वापस गए और फिर अपने मां में सोने लगे अरे मुझे तुमसे बहुत अच्छा लगा ऐसा खीर मुझे कल भी मिलेगा फिर से तो कितना अच्छा होगा हमें उनको बोलूंगा की मुझे कल फिर से इनवाइट करें और फिर से वही खीर बनाए ऐसा सोच रहे थे और सुद्दनली उनके मां में विचार आया की अरे वो तो उन्होंने तो सब कुछ त्याग कर दिया है वो जहां वो गांव घूमते हैं हरि नाम संकीर्तन करते-करते हरि नाम बुलाते बिलेट हैं ना ही उनका कोई ठिकाना है ना ही उनका कोई इस तरह से कोई इच्छा या वासना उनके मां में हनी चाहिए तो सडनली खीर के प्रति उनके मां में यह वासना प्रकट हो गई तो यह तो ठीक नहीं है तो अभी क्या करें किस तरह से इस इच्छा से मुक्त होय जाए तो उन्होंने एक प्लेन किया आपने मां में एक उन्होंने एक टेक्निक जो की बड़े लंबे समय से भारत में चल रही है उन्होंने उसे महिला को बुलाया भक्ति महिला को और कहा की कल मेरे लिए फिर से खीर बनाना किंतु मैं अभी एक बाटी खेर नहीं खाऊंगा पूरा वो मतलब वो टेपला भर कर के बड़ी जो बड़ा साइज बर्तन भर के खीर बनाना ये पूरा का जाऊंगा तो वो महिला बेचारी बड़ी खुश हो गई की चलो इतने बड़े संत थे उनको उसने बड़े इतने श्रद्धा भक्ति पूर्वक खीर बनाया तो अभी इतना अच्छा लगा की इतना सर खीर खाने को बोल रहा है तो उसने वो बड़े मतलब से वो केयर करके बड़ी श्रद्धा भक्ति पूर्वक खीर बनाई और ये संत को फिर से इनवाइट किया अभी संत ने क्या किया की वो जो पूरा वो तपेली भर के खीर थी वो खाली अभी ये तो हमारा ह्यूमन शरीर है वासना के साथ में क्या होता है जो ये मटेरियल जो कोई भी चीज होती है जब ध्यान के साथ में यदि आपको एक शो जब करके 108 जाप करके जो आनंद आएगा आपको 1008 जाप करके उससे भी ज्यादा आनंद आएगा आप यदि 1008 जाप करते हैं तो उससे भी ज्यादा वो 10 गुना ज्यादा आनंद आएगा ₹1 जाप करते हैं तो उससे भी 10 गुना ज्यादा आनंद आएगा तुमने जितना जाप करते जाते हैं जितना जबकि मंत्र बढ़ते हैं उतनी ही आनंद की मंत्र बढ़नी जाति है क्योंकि यह आध्यात्मिक आनंद है किंतु यह जो इंद्रियों का आनंद है उसके साथ में ऐसा नहीं होता मैन जितना भी अब भजन ग्रहण करें एक रसगुल्ला खाया तो आपको जो आनंद आएगा वो 10 दो रसगुल्ला खाने से शायद वो आनंद दुगुना होगा किंतु तीन कर पांच ऐसा करके खाएंगे तो फिर क्या है शरीर खराब हो जाएगा तो ये जो मटेरियल आनंद जो है इंद्रिय जनत आनंद उसकी हमेशा एक सीमा रहती है मैन नेचर ने ही इस तरह से इंद्रिय जनत आनंद को बनाया है की उसके ऊपर में आपको मैन ते नाट्य ना गंजे था मैन उसको त्याग करके उसे आनंद करना है वो त्याग जो है वो हमारे इंद्रिय जनत अनन्या उसके डीएनए में ही लिखा हुआ है उसके जो कंप्यूटर की लैंग्वेज में कहेंगे है तो उसके भीतर में हार्ड वायर है वह मैन एक लिमिट से ज्यादा आप उसको भोग नहीं कर सकते तो उन्होंने पूरा वो एक तपेली भरकर के वो खीर का लिया खीर खाने से क्या हुआ इतना सर तो पेट में तो वो जाएगा नहीं डाइजेस्ट नहीं होगा तो इम्मीडिएटली उनको वोमित हो गया और वोमित होने के साथ-साथ में ही पूरा की बाहर निकाल गया और उसका जो टेस्ट था वो टेस्ट भी साथ-साथ में चला गया की वो खीर खाने के बाद नहीं इतना खराब जड़ी अवस्था होती है तो वो शरीर ही उसको रिजेक्ट कर देता है तो ऐसा करके देखिए की जो जी खीर के प्रति आसक्ति थी उसका इस तरह से उन्होंने त्याग कर दिया तो यहां पे ठाकुर भी ऐसा कहते हैं की ऐसा वो बच्चे वोट हैं ना वो जब छोटे वो कमरपुकुर में थे तो ये सब देखते थे जो बड़ा आदमी होता है तो कैसे राहत है वहां बाबू थे वगैरा वो जारी के कपड़े पहना हैं वो जो बड़े से अच्छे से वो सोनी का जिसमें यह होता है नल उसे तरह के हल्के में वो पान करते हैं बढ़िया सा वह जो तकिया होता है बढ़िया सा गाड़ी होता है उसके ऊपर में बैठे हैं पूरे सेट हो करके तो ठाकुर ने भी सोचा स्टूडेंट ने अभी वह बच्चे जैसा है तो मां में ऐसा वो एकदम संकल्प ए गया की मैं भी इस तरह से वो जारी के कपड़े पहनूंगा हुक्का में रोज धूम्रपान करूंगा और इस तरह से टक पर वो किसान देकर के बैठो जा तो ठाकुर ने तो अभी मथुरा बाबू वगैरा तो ठाकुर की आजा का पालनपुर करने के लिए हमेशा तत्पर रहते थे तो जैसे ही ठाकुर ने कहा की मेरे लिए ये सब जुगाड़ कर दो तो इमीडीएटली माथुर बाबू ने उनके लिए सब कुछ लाकर रख दिया तभी ठाकुर ने क्या किया वो जारी के कपड़े पहने हैं वो जो जिसका वो सिल्वर का वह जो जिसमें ये राहत है वो पाइप उसे तरह का वो हल्के में वो धूम्रपान किया वो हुक्का किया और वो बढ़िया सा वो तकिया पे बैठ है और जैसे ही कुछ क्षण तक ऐसा किया भीतर से इमीडीएटली वैराग्य की भावना फिर से प्रकट हुई और उन्होंने सब कुछ फेक दिया और फेंकते हुए कहा की देखो मां यह सब जो मैंने किया जो तुम्हारी इच्छा थी मैंने कर लिया अभी तुम भी खुश मतलब तुम भी शांत हो जो मैं भी उसको त्याग करता हूं तो अभी इफेक्ट ठाकुर कहते हैं यहां पे नहीं कहते किंतु और कहानी पे कहते हैं की छोटे-छोटे जो भोग होते हैं उसको भोग करके उसका त्याग करता हूं किंतु यहां पे हमारे मां में एक बात आई है की यदि बड़े-बड़े भोग जो होते हैं कामिनी और कंचन के तो उसको भी क्या इस तरह से त्याग किया जाता है खासकर के यह जो ओशो बीच में बहुत चला था अभी भी बहुत चला है तो इन लोगों की फिलासफी ऐसी है की जैसे वो छोटी-छोटी चीजों का अब इस तरह से भोग करके ऑटोमेटिक बाद में त्याग आता है ऐसी बड़ी-बड़ी जो बड़े जो प्रलोभन होते हैं छोटे-छोटे प्रलोभन इस तरह से क्या हो जाएंगे तो बड़े प्रॉब्लम जो है कामिनी और कंचन के उसमें भी ऐसा है की आप उसको भोग कीजिए इतना भोग कीजिए की भीतर में से स्वयं ही उसके प्रति घृणा प्रकट हो ऑटोमेटिक त्याग हो जाए किंतु ठाकुर कहते हैं यह जो लॉजिक है बिल्कुल गलत है बड़े-बड़े जो भोग होते हैं उसको तो संकल्प करके बिल पावर से ही त्याग करना चाहिए उसको इस तरह से जागी में भोग करके करूंगा ऐसा इस सब चीजों के साथ में नहीं होगा और इसीलिए गीता में कहा गया है की जो की अग्नि है होम का अग्नि है उसको होम के अग्नि में जनरली अपने जिन्होंने होम देखा होगा यज्ञ ना देखा होगा आपने देखा होगा की उसमें गी डाला जाता है जिससे की होम जो है ज्यादा प्रज्वलित हो और फिर जब होम को जब विधि समाप्त हो जाति है और होममेग्नी जो है उसको मित देना होता है तो वो जो वो दही और वगैरा से वो जो एक मिश्रण बंता है वह उसके ऊपर में डाला जाता है जिससे की होम आदमी जो है वो बुझ जाति है तो अभी गीता में कहा गया है की यदि हम होमग में गी डालेंगे उसको बैंड करने के लिए तो यह तो उल्टा हो गया गी डालने से तो होम अग्नि और ज्यादा प्रज्वलित होगा वो बूझेगा नहीं तो वैसे ही जो बड़े-बड़े भोग है उसको भोग करके त्याग करने की यदि बड़े में सोचेंगे तो ये भूख तो बढ़ते ही जाएगी जितना भोग करेंगे जितना बढ़ेंगे इसका त्याग नहीं है भोग करके इसका त्याग नहीं है धन संपत्ति प्राप्त करने की मेरी लालसा तो मैंने मेरे पास मुझे यदि ₹1000 है तो मैं सोचूंगा नहीं मुझे 10000 चाहिए 10000 ए गया तो मुझे ₹1 लाख चाहिए ₹1 लाख ए गया तो 10 लाख चाहिए तो ये तो कहानी पे रुकने वाला नहीं है तो वैसे ही कम की इच्छा जो है कम वो भी इस तरह से जितना भोग करेंगे जितना ही ये दावानल जो है ये हमगनी जो है वो बढ़ता ही जाएगा भोग करके इसका त्याग नहीं होगा तो हम लोगों कई बार सोचते हैं ठाकुर का इस तरह का उदाहरण या तो फिर जैसी ये मराठी संत कहा ऐसे कई उदाहरण हमारे में शास्त्रों में हमारी जो धार्मिक कथाओ में उम्मीद महापुरुष को देखा हमने तो इस संत को देखा हमने तो इस अवतार को देखा की उन्होंने खुद भोग करके त्याग करने का पर्यटन किया है और सक्सेसफुल भी हुए हैं तो हम भी ऐसा क्यों ना करें तो किंतु याद रखिए की भोग दो तरह के होते हैं इच्छाएं दो तरह की होती है वासनाएं दो तरह की होती है एक तो एक तरह की वासनाए जो की भोग करके बाद वो स्वयं ही उसका त्याग हो जाता है छोटी-छोटी वासना है और वो जो है जो हमको जन्म वो जो बहुत सागर है बहुत समुद्र है उसमें हमको लेकर के डूबा देगी जो की हमारे जो पैरों में कर्म की जंजीर खड़ी करेगी ऐसी बड़ी-बड़ी वासना है कामिनी और कंचन तो वो वासनाओं का भोग करके त्याग नहीं किया जाता उसको अपना बिल पावर अपनी संकल्प शक्ति मजबूत करके एक के बार में उसका त्याग किया जाता है जैसे अभी हम लोग सोचते हैं की ठाकुर की एक कहानी है भावनात्मक पता है भावनात्मक और नरेंद्र दोनों ठाकुर के पास आते थे तो ठाकुर उन दोनों को देखकर के बड़े खुश होते थे कहते थे देखो नरेंद्र का जो है की पुरुष है और भावनात्मक प्रकृति भाव है इन दोनों की जोड़ी है दोनों साथ में आते थे ठाकुर के पास तो अभी एक बार क्या हुआ की नरेंद्र ए करके ठाकुर को कहा की भावना जो है उसने मछली और पान का त्याग किया है अभी मछली और पान अब का सकते हैं की वो भोग की जनी से मतलब वो भोग्य वस्तुएं हैं इंद्रिय सुख बढ़नी है तो अभी जैसे धीरे-धीरे करके चलो सब कुछ त्याग करते हैं मैं सन्यास जीवन में सड़क जीवन में आगे बढ़ाना चाहता हूं तो मेरे लिए ये सब चीज वर्ज्य है क्योंकि जितने भी धर्म शास्त्र खासकर के यह वैष्णव शास्त्र है वहां पर आप देखेंगे की बार-बार कहा गया है की यह जो नॉनवेज खाना ठीक नहीं है फिर यह जो कोई मतलब मिठाई खाना मतलब जीवा के जो भी सुख है वह जिव्हा के सुखों को त्याग करो ऐसा करके वह बोलते हैं अभी अपने यहां तक की अपने हरि महाराज भी कहते हैं की जीव और उपस्थित ये दोनों के भोग को त्याग करना चाहिए तो ये जो हुआ के जो भी हमारे सुख है उसको त्याग करो बोल करके मछली भी छोड़ दिया और पान भी छोड़ दिया तो नरेंद्र जा करके वो ठाकुर को कहता है की इसने वो जो है मछली और पान छोड़ दिया है तो ठाकुर कहते हैं अरे मैच पान त्याग कर ले की हो गए कामिनी कंचन त्यागी मछली और पान ये दोनों का त्याग करने से कोई त्याग थोड़ी ना हुआ कामिनी और कंचन का त्याग गीत त्याग है और देखिए की ठाकुर की ये भविष्यवाणी कितनी ठीक है मतलब कोई ठाकुर एक बार अखंडानंद जी महाराज गंगाधर महाराज आए थे और बच्चे थे वो 16 17 साल के थे तो ठाकुर ने उनको पूछा की अच्छा तुमने मुझे क्या कहानी पहले देखा है तो अखंडानंद जी कहते हैं हां महाशय में जब छोटा था तब आपको वो किसी के घर पे देखा था तो ठाकुर हंसने लगे और रामलाल को बुलाया अरे ये देखो ये बोलना है की मैं जब छोटा था तब देखा था मां और अमर छोटो हो| मैन ऑलरेडी वो 16-17 साल के बच्चे हैं और ठाकुर तुम लोग उसे समय 40 45 तो मिनिमम होंगे ही तो वो मतलब मजाक करके बोलते हैं की बच्चा बोलना है की मैं जब बच्चा था तब आपको देखा था तो इस तरह से अखंडानंद जी के साथ बड़ी मतलब गंगाधर महाराज के साथ में अच्छी सी बातें हुई फिर कहते हैं की देखो कोलकाता में नरेंद्र है तुम जाकर के उससे मिलो वो 105 खाता है किंतु उसके जो चक्षु है उसके जो नयन है वो इस तरह से योगिया के नयन है उसके उसकी आंखें योगिया की आंखें हैं संसार में चला है रास्ते पे चला है किंतु रास्ते पर नजर नहीं है सब समय मां जो है वो अंतर मुख राहत है देखिए ठाकुर ने किस तरह से नरेंद्र को इंट्रोड्यूस किया 10 खाता खाता है किंतु नजर जो है वो रास्ते पे नहीं है नजर जो है ईश्वर की और है तो मैन ठाकुर एकदम ठीक-ठीक समझते थे की यह जो है छोटी-छोटी चीज जो है यदि आप और फिर भावना का क्या हुआ देखिए की भावना ने मछली और पान का तो त्याग किया किंतु उसके बाद में उसने शादी भी कर ली और फिर ठाकुर जब वहां पे थे काशीपुर में वो तो उनको कैंसर हो गया था और सभी जितने भी लड़के थे वो अपने ठीक किया की घर वगैरा छोड़कर के वहां पे आएंगे काशीपुर में र करके ठाकुर की सेवा करेंगे इस तरह से ये लोग र रहे थे तो अभी एक वहां तो उनके साथ में तो भावना आया ही नहीं बट अकाल की सेवा करने की तो बात ही छोड़ दो किंतु एक दिन आया था ठाकुर को खबर पूछने के लिए कैसे है ठाकुर आप तो ठाकुर बोल रहे हैं की भोलेनाथ की उसने शादी किया है ना तो क की तरह हो सर्च करके वह आया था और पूछ रहा था की किस फोटो मतलब ऐसा नहीं की वो जाकर के ठाकुर की सेवा करें वो वैसे ही मुंह से खबर लेने के लिए आया था तो जिसने मछली और पान का त्याग किया उसने शादी कर ली और जो नरेंद्र जयसवाल दिन में सोपान खाता है ज्योति वो निकले सन्यासी श्रेष्ठ तो इसके लिए जो छोटी-छोटी चीज होती है हमारे जीवन में हम अच्छा इसका त्याग करना वो मैन अच्छा है बड़ा कुछ नहीं है खासकर के ये जैन धर्म वगैरा है वैष्णव धर्म है की ये सब चीजों ये सब धर्म में यहां पे बहुत भाग दिया जाता है की आपको किस तरह का खाना खाना है मैंने आलू नहीं खाना है प्याज नहीं खाना है रसूल नहीं खाना है मैंने लहसुन यानी की गार्लिक गार्लिक जिंजर पोटैटो ये सब नहीं खाना है ऐसा कभी बहुत कुछ नियम बना देते हैं खाने-पीने| किंतु ठाकुर का देखिए की ठाकुर हां हालांकि ठाकुर वो जो है नॉनवेज ग्रहण नहीं करते थे आखिर आखिर किंतु उन्होंने यह सब नहीं खाना इस तरह से निषेध नहीं किया क्योंकि हम खाना पीना हमारे मां पे असर करता है किंतु वो सब जो असर है वो छोटी-मोटी असर है उससे कहानी ज्यादा असर होती है हमारे मां के ऊपर में हमारी संकल्प शक्ति की जो संकल्प शक्ति है यदि उसको हम ठीक रख पे तो ये सब छोटा-मोटा कितना ही आएगा कितना ही जाएगा मैंने तो बचपन में जैन साधु देखें थे तो वह तो दिगंबर जैन साधु तो निर्वस्त्र रहते हैं दिशाओं के कपड़े जो पहना हैं उनको दिखे अंबर दिखे अर्थात दिशा अंबर अर्थात वस्त्र जो की दिशाओं के वस्त्र पहना हैं उनको दिगंबर कहते हैं दिशाओं अर्थात की वो शून्य दिशा तो शून्य है मैन जिनके वेस्टर्न नहीं रहते उनको दिगंबर कहते हैं तो ऐसे दिगंबर साधुओं को मैंने बचपन में देखा था उतना पोस्टेरिटी इतना मतलब उन लोगों में त्याग और भयानक मतलब आप सोचिए की आप दिगंबर हो करके कितना कठिन है मां के भीतर में जो कुछ भी चल रहा है सबको पता चल जाएगा मैन कितना भयानक त्याग जो होगा तब कहानी जाकर के आप दिगंबर साधु हो पाएंगे तो मैंने तो इस तरह से मेरे मन में था की साधुओं के मां में मतलब साधु है तो अर्थात सही-सही साधु वही है जो की 100% ट्रांसफर है उसका मां आप देख सकते हैं उसकी जो भी मतलब उसकी ऑस्टेरिटी इतनी हनी चाहिए की यदि कोई आपको प्रणाम करने के लिए आता है तो बिल्कुल भी आपका मां जो है विचलित नहीं होना चाहिए मैंने ऐसा कितने दिगंबर साधुओं को देखा है की वो वहां पे बैठे हैं और एक के बाद एक जो फैमिली वाले सब ए करके वो मनी उनको मनी महाराज कहते हैं तो मनी महाराज को प्रणाम करते हैं और मतलब औरतें आई है वो सब आते हैं और मनी महाराज एकदम तटस्थ होकर के बैठे हैं और जो कोई भी प्रश्न करता है उसको उतना ही उत्तर देते हैं तो मतलब उनको देखकर के हमारे मां में कितना रिस्पेक्ट होता है और मैं पहले बार रामकृष्ण मिशन में था तो मैंने देखा की यहां पर बड़ी-बड़ी गाड़ियां पड़ी है और पुलिस गाड़ी पड़ी थी अभी टाटा पुलिस उसे समय बड़ी ही महंगी थी और बड़ी ही मतलब लग्जरियस गाड़ी कहीं जाति थी और खाना पीना तो देखिए तो इतना मतलब जैसे की आपको फाइव स्टार होटल में ए रहा है इस तरह का खाना पीना बिल्कुल पहले दिन और साधु लोगों को देखा हालांकि ऐसा नहीं है की साडो के जीवन में ऐसा कोई भोग विलास जैसा है किंतु वो जी तरह से यहां पे भी हमारे पब्लिकेशन ऑफिस में आएंगे देखेंगे की ऑफिस पुरी कांच की बनी हुई है यहां पे सब तरह की फैसिलिटी है और खाने-पीने में कोई आपको आपत्ती नहीं है गाड़ी बांग्ला मतलब जैसे वो गृहस्ती सोचता है ना बेलूर मठ में जयरामबाती से कुछ औरत से बेलूर मठ का दर्शन करने के लिए गई वहां गौशाला में देखा की बड़ी बड़ी गे है तो वो औरत फिर वो उद्बोधन आकर के मां के पास में जाकर के बैठी अभी वो तो सब सहेलियां है मां के साथ में छोटी थी तब से ही थी तो मां के साथ में बड़ा अब वो एकदम अपना जैसा भाव बात कर रही है तो मैन प्रश्न किया थे तो क्या देखा देखा वहां पे वो राजा मतलब राखल मंत्र ही कहेंगे राजा महाराजा को उनके पुत्र समाज है देखा राजा वहां रखा हुआ है उसका त्याग देखा उसकी विधिवत अच्छी कितने अच्छे-अच्छे सन्यासी है वो देखिए कितना झीज ध्यान से ठाकुर का कम कर रहे हैं वहां पे ठाकुर का मंदिर है गंगा का किनारा है क्या ये सब देखा तुम लोगों ने तो वो औरत कहते हैं की हां हां अभी ठीक है वो सब तो देखा बड़ा मंदिर है और वह राजा महाराज है किंतु वहां की गे हमने अच्छी इतनी बड़ी बड़ी गे हमने और कहानी नहीं अच्छी तो मां बोलती अरे गे तो ठीक है किंतु गंगा का किनारा आपने देखा जहां पे स्वामी जी का वो बेडरूम है स्वामी जी का कैमरा है जहां पर स्वामी जी का देहांत हुआ था मा समाधि हुई थी क्या वो देखा की फिर देखा कितना सुंदर शान परिवेश है वहां पर जान से ऑटोमेटिक जो ने अपना मां जो है ईश्वर भाव में एकाग्राथ केंद्रित हो जाता है जैसे की यह जो संसार की यह जितनी भी ये छोटी-मोटी चीज हैं वहां सिर्फ कहानी उर्दू ऊपर में उठ जाता है तो ये सब अनुभव किया तो वो औरत कहती है हां हां वो सब तो देखा अच्छा अच्छा वो बेलूर मठ बड़ी सुंदर जगह किंतु इतनी बड़ी-बड़ी गे और कहानी नहीं अच्छी तो मांगी सोचती है अरे है रे कल ये मैंने कहा वो झेराम बाटी से आई है बेलूर मठ का दर्शन करेंगे कहानी वो आध्यात्मिकता ग्रहण करेंगे वो नहीं देख करके वो बड़ी गे देखकर के ही वे लोग वही एक इंप्रेशन लेकर के घर जाएंगे की हां इतनी बड़ी गे वहां पे थी तो देखिए है की हम लोग जब यहां पर आते हैं रामकृष्ण मिशन में तो एक शौक जैसा कभी लगता होगा की इतना धन वैभव जो है वह रूप से वो दिखे रहा है तो क्या यह सब सन्यासियों के लिए सही है की नहीं है यदि ठाकुर त्याग की प्रतिमूर्ति थे उनको तो फिर यहां पे हमको इतने बड़े-बड़े जैसे की एवं हमारे हम हम लोगों में ही आपस में कभी-कभी डिबेट होती है की हमको क्या फिक्स डिपॉजिट रखना है की नहीं रखना है हमको क्या बैंक बैलेंस बढ़ाना ही की बाढ़ नहीं बढ़ाना ये इन्वेस्टमेंट करना है की नहीं करना है आइडियल स्पीकिंग तो ऐसा होना चाहिए ना जब जी कार्य हम कर रहे हैं उसे कार्य करने के लिए आप डोनेशन इकट्ठा कीजिए और उसे कार्य में उसको व्य कर दीजिए फिर वो पैसा बच्चा के रखना वो सैया सी के लिए क्या बात हुई अभी वहां उत्तराखंड में वो क्लाउड बर्स्ट हुआ और हमको रिलीफ करनी है इमीडीएटली हमने अपने डिवोर्स को बताया की चलो हमको कुछ पैसा दे दीजिए तो हम कहानी जाकर के रिलीफ करेंगे है इस तरह से वह त्याग का भाव भिक्षा मांगने का वह जो भाव है वह बना रहेगा यदि आपने बैंक बैलेंस इतना बड़ा करके रख दिया है की आपको किसी भी किसी से कुछ मांगने की जरूर नहीं है तो भीतर भीतर में घमंड ए जाएगा की हर हमारे पास में इतना वो धन है अपने इतना फंड है की इतना इन्वेस्टमेंट है की हमको किसी से कुछ मांगने की जरूर नहीं तो वो जो निर्भरता का जो भाव है वो जो भिक्षा मांगने से एक जो अहंकार जो हमारा वो जो उसकी निवृत्ति होती है एक विनम्रता आई है ईश्वर के प्रति एक निर्भरता आई है वो चली जाएगी तो हमको इन्वेस्टमेंट करने की क्या जरूर है हां चलो हमने इतनी बड़ी स्कूल बनाई यहां पे देखेंगे हमारी जो डिस्पेंसरी है इतनी अत्यधिक डिस्पेंसरी है मतलब करोड़ रुपए के जो मतलब मशीन जो होते हैं मेडिकल इंस्ट्रूमेंट वो यहां पे पड़े हैं और बेस्ट ऑफ डी बेस्ट ट्रीटमेंट होती है तो वो तो आपको रोगियों की करने के लिए आपको यह सब करना होगा किंतु फिर क्या आपको इतना फिर वो फंड क्रिएट करने की जरूर है की जिससे की हमारा जो ईश्वर निर्भरता का भाव ही चला जाए और फंड के ऊपर में ही भरोसा करके हम बैठे रहे ये सब डिबेट हमारे भीतर में भी चलती है किंतु देखिए ये जितनी भी डिबेट चले डिबेट होना अच्छा है वो मतलब चिंतन मनन स्मरण होता रहेगा तो कहानी गलती होने की संभावना कम हो जाएगी आप आपको भी प्रश्न करना उचित है हमको भी प्रश्न करना उचित है की हमारी जो लाइफस्टाइल है हम लोग जी तरह से जीते हैं सही है या गलत है कोर्स कलेक्शन की जरूर है की नहीं यह तो होना ही चाहिए सब समय इन एवरी आगे मॉनेस्टिक इंस्टीट्यूशंस है उसके ऊपर में प्रश्न होने ही चाहिए प्रश्नों के उत्तर जो है उसके ऊपर में चिंतन होना ही चाहिए किंतु साथ-साथ में हमको यह बात याद रखना है की रामकृष्ण सॉन्ग रामकृष्ण भावधारा जो ठाकुर के जी आदर्श पर बनी है ठाकुर का आदर्श यह है की यह जो छोटी-मोटी चीज हैं मेन नहीं करती क्या अपने आज 10 रसगुल्ला का लिया या तो आपने आइसक्रीम का लिया गर्मी हो रही है बड़ा ही वो टेंपरेचर बड़ा ही आई है वो समर सीजन है तो दो-तीन दिन अपना आइसक्रीम का लिया ये सब चीजों से आपके त्याग के ऊपर में कोई फर्क नहीं पढ़ने वाला है हो सकता है की ज्यादा इस फिल्म खाली है ज्यादा रसगुल्ला का लिया तो आपका पेट दो-तीन दिन के लिए खराब होगा और हो सकता है की आपका मां जो है इतने दोनों तक चंचल रहेगा किंतु ये सब चीज जो है वो कोई आपके लिए आध्यात्मिक राज्य में आध्यात्मिक सफर के लिए बंधन स्वरूप नहीं है आध्यात्मिक राज्य में या तो फिर ये जो हमारी ये जो जर्नी जो साधना की ये यात्रा है उसमें चाहिए क्या वो चाहिए जो ज्ञान भक्ति वैराग्य और स्वामी जी ने कहा था ना की ठाकुर के पास आए बार-बार का रहे हैं की आप मेरे परिवार के लिए कुछ करके लीजिए तो मैन पिताजी का देहांत हो गया है माताजी और भाइयों के लिए कुछ नहीं है खाने पीने के लिए तो ठाकुर उनको मां काली के पास भेज है और बाहर क्या वक्त है ज्ञान भक्ति वैराग्य ज्ञान दो भक्ति दो वैराग्य दो और कुछ नहीं चाहिए तो ये ज्ञान भक्ति और वैराग्य ये जो संकल्प शक्ति है ये जो सदगुण है उसको मां में दृढ़ करना है फिर आप कहानी जाकर के वो बड़ी सी वो पुलिस गाड़ी में एन की वो बड़ी सी वो जो सव ना की क्या बोलते हैं वो सब में बैठ करके आप कहानी तीर्थ यात्रा करके भी आए तो भी वो कोई हक के वो त्याग और उसकी साधना के ऊपर में कोई बड़ी असर नहीं होने वाली है 10 15 देवोटिक के पास जाकर के उन्होंने आपको बुलाया अच्छे से निमंत्रण दिया श्रद्धा भक्ति से खाना खिलाया आपने भी उनको उपदेश हो सके मैन दे दिए तो ये सब चीज कोई भोग विलास के भीतर में नहीं आई नहीं करें तो अच्छा है करें तो भी कोई दिक्कत नहीं है असली चीज है भीतर में से वो जो एक उमैग्नी की तरह हो तो वह सब जैसे ठाकुर कहते हैं की हो मछली और पान छोड़ने से क्या हुआ तुम मछली और पान खाया तो भी क्या यदि वो त्यागरू की होम आदमी नहीं है और मछली और पान नहीं खाया तो भी क्या और खाया तो भी क्या ये सब चीजों से कोई फर्क नहीं पढ़ने वाला तो इसीलिए उसे ठाकुर कहते हैं फिर से मैं एक बार पढ़ लेट ठाकुर कहते हैं त्याग के लिए मैं अपने में राजसिक भाव भरत था साथ हुई थी देखिए से वही जो मराठी संत की बातें की साथ हुई थी की जारी की पोशाक पहनूंगा अंगूठी पहनूंगा लंबी नाली वाले हल्के में तंबाकू पिंगा तो ठाकुर ने मधुर बाबू को कहा तो सब कुछ जुगाड़ भी हो गया जारी की पोशाक पहनी कुछ डर बाद किंतु जारी की पोशाक पहन ली भूखे वैसे वो धूम्रपान कर लिया सब कुछ कर लिया किंतु कुछ डर बाद मां से कहा यही साल है यही अंगूठी है यही हल्के में तंबाकू पीना है इसके बाद में सब कुछ फेक दिया तब से फिर मां नहीं चला अभी ठाकुर यहां पे नहीं बोलते हैं किंतु लीला प्रश्न में इस घटना का बहुत ही सुंदर वर्णन है झाड़ी का इतना महंगा पोशाक वो जो मैंने वो जो ये होता है पिलो वगैरा उनके लिए ले थे तो ठाकुर ने सिर्फ उसका त्याग नहीं किया उसको निकाल के उसके ऊपर में जोर-जोर से अपने पर मारे पैरों से आघात गया और बोला की ये हो गया मेरा भोग ये झा हुई है मैन वो मथुरा बाबू देख रहा है किंतु दूसरे लोग बड़े नाराज हो गए अरे इतने महंगे कपड़े हैं इतना मतलब अच्छी चीज ठाकुर को दी और ठाकुर उसको पैरों के तले उसको ये कर रहे हैं उसको पैरों से मार रहे हैं बार-बार वो तो नष्ट हो जाएगा किंतु मशहूर बाबू को पता है की ठाकुर के मां की अवस्था क्या है किस तरह से ईश्वर भाव में भट हो करके वो जो कुछ भी करते हैं वो मतलब वो मां के साथ में वो डायरेक्ट वो हॉटलाइन होती है ना तो मां के साथ में कांटेक्ट करके इस सब कुछ करते हैं तो जो भी उनका कार्य है वो सब दिव्या कार्यकलाप पे उसमें हमेशा हमको उनके प्रति श्रद्धा भक्ति ही रखती चाहिए और एक बार वो कहानी शिवा मंदिर में खड़े हो करके आपको प्रणाम करने के लिए गए थे सुद्दनली भाव हो गया तो एकदम चोर जोर से वो ये जो मंत्र है शिवा का वो उसका पाठ करते-करते सदानंद होम में ए गए और रन लगे और रॉक करके वह भगवान शिवा के साथ में बात कर रहे हैं ऐसा सब कर रहे हैं तो एकदम भीड़ इकट्ठा हो गई बोला की ये छोटे भट्टाचार्य हो तो ठाकुर को बड़े भट्टाचार्य अर्थात की वो ठाकुर के बड़े भाई और रामकुमार जो की वहां पर कुछ जारी थी और छोटे भट्टाचार्य अर्थात की ठाकुर तो अभी वो नाम ऐसा हो गया था तो फिर वो बड़े भाई के धन के बाद में भी सब लोग उनको छोटे भट्टाचार्य के रूप से ही नाम से ही पहचानते थे बाद में वो परमहंस बाद में ठाकुर ये सब हुआ किंतु उसे समय छोटे भट्टाचार्य ऐसा कहते थे तो बात एकदम फेल गई की छोटे भट्टाचार्य का माता खराब हो गया है वहां पे रो रहे हैं और क्या सब नाटक कर रहे हैं वो शिवा मंदिर में तो जो जो पकड़ कर के उनको उनके रूम में बिठा दो उसको थोड़ा माता ठंडा होगा तो वही मथुरा बाबू को पता चला है अभी मथुरा बाबू कोलकाता में रहते थे किंतु बीच-बीच में वहां पे आते थे और दक्षिण मंदिर में आते थे दक्षिणेश्वर में तो उसे समय वो वहीं पर थे उनकी वो ठीक बोल कर के मकान है वहां पर रहते थे तो उनको जैसे ही पता चला तो वैसे ही वो दौड़ करके आए देखा की सब लोग इकट्ठा हो गए और ऐसा सोच रहे की इनको पकड़ करके रूम में ले जाए ना की ऐसा कुछ सोच रहे हैं तो मथुरा बाबू ने सीधा तलवार निकाला और बोला की खबरदार जिसने एक भी पर और कुर्की और बढ़ाया उसका मैं सर कैट दूंगा देखिए की माथुर बाबू का ठाकुर के ऊपर में इतना संपूर्ण रूप से भक्ति विश्वास था तो फिर ठाकुर ने इतने महंगे कपड़े जो है उसको जमीन पे फेंका पैरों से रख डोला जो भी किया किंतु ठाकुर ने जो है सब कुछ जो है ईश्वर की लीला मां कर के उसको ग्रहण कर ले तो आज यही तक हरि ओम