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Sri Ramakrishna Kathamrita ·

श्रीरामकृष्ण कथामृत || 16 Dec 1883 - श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ दक्षिणेश्वर में || 3 Mar 2026

मङ्गलाचरण

स्वामी जी की वह घटना फेमस घटना अमेरिका गए हैं। कैलिफोर्निया की घटना है। एक लेडी डिवोटी के साथ में आचार खरीदने को गए हैं। तो एडीथैलन लेडी डिवोटी का नाम तो एडीथैलन के साथ में आचार खरीदने को गए तो आचार खरीदा तो जिस पात्र में आचार स्वामी जी ने वह सामने किया इस पात्र में दे दीजिए। तो दुकान वाले ने वह जो होगा वह जो कप वगैरह उसमें से उस पात्र में आचार ढाला तो साथ

शास्त्र पढ़ना पर्याप्त नहीं — ईश्वर का साक्षात्कार करो

में जो तेल होता है ना अचार का तो कुछ तेल स्वामी जी की उंगलियों पर गिरा तो ठीक है अब जनरली सभ्यता के म एक शिष्टाचार के हिसाब से क्या होना चाहिए वो लेडी एक खड़ी है वहां पर अमेरिका में शिष्टाचार का बड़ाेंस है तो तो लेडीज खड़ी है तो होना क्या चाहिए अपने हाथ साफ कर दीजिए तो तो ऐसा नहीं करके स्वामी जी बड़े बड़े ही आनंदित होकर के उंगलियों को चाटने लगे। तेल गिराता था। तो एडी थैलन कहती है वो बड़ी शॉक हो गई। वो है स्वामी जी ये किस तरह का वो अशिष्ट व्यवहार कर रहे हैं। तो स्वामी जी कहते हैं आप लोगों का यही एक है दिखावा दिखावा। यह शिष्टता वह दिखावा नहीं है। ये आपके हृदय के भीतर में जानी चाहिए। एथिक्स एंड मोरालिटी जो है जीवन की पलपल में आपके बिहेवियर में छलकनी चाहिए। यह उंगलियों को नहीं चूसना। उसके ऊपर में वह आचार का तेल गिरा है तो आचार को नष्ट कर देना। वो म उसको वेस्ट जाने देना, हाथ धो देना क्योंकि लेडीज खड़ी है। यह सब क्या दिखावा है? दिखावा है। असली यदि शिष्टाचार है तो वह हृदय की स्वच्छता है। तो देखिए वो बहुत सारे बार हम लोग ये शिष्टाचार के रूप में या ऐसा करके यह बाह्य जो कुछ चीजें हैं ना उसी कोेंस देते हैं। हृदय कोेंस नहीं देते। ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार [गाना गाने की आवाज़] वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री श्री रामकृष्ण कथामृत श्रीमद् द्वारा लिपिबद्ध जनाई के एक मुख आए हैं। उसके साथ में ठाकुर का वार्तालाप हो रहा है। कल हमने देखा कि मुख ठाकुर को कहते हैं कि गीता वगैरह शास्त्र पढ़ना अच्छा है तो अच्छा ही है नो डाउट हम लोग भी बेलूर मठ में हमारा ट्रेनिंग सेंटर है वहां पर गीता उपनिषद वेदांत रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य इसका स्टडी किया है। किंतु देखिए कि ठाकुर कहते हैं कि हम कहीं इस स्टडी में ही ना उलझ जाएं। हम कहीं यह जो स्वामी जी अपने बेंगली लेटर में एक बात कहते हैं। अह शंख चक्र गदा पद्म पद्म चक्र शंख गदा अर्थात कि यह जो शास्त्र क्या है? शास्त्र के विभिन्न दार्शनिक मत है। कोई अद्वैत वेदांत आपको एक बात कहेगा। विशिष्ट अद्वैत दूसरी बात कहेगा। द्वैत तीसरी बात कहेगा। द्वैताध्वैत है वह चौथी बात कहेगा। और फिर इसके बाद में शक्ति साधना है। जैन दर्शन है। बौद्ध दर्शन है। भारत में देखिए कि फिलॉसोफी की कोई कमी नहीं है। तो कहीं हमने अभ्यास करना शुरू किया। गीता पढ़ना शुरू किया। फिर गीता के ऊपर में शंकराचार्य का भाष्य पढ़ा। फिर रामानुजाचार्य का भाष्य पढ़ा। अभी यदि दोनों भाष्य में हमको विरोधाभास दिखते हैं तो वहीं पर उलझ गए कि कौन सा भाष्य सही कौन सा गलत गीता के इस श्लोक की व्याख्या शंकराचार्य के अनुसार होनी चाहिए ना कि रामानुजाचार्य के अनुसार होनी चाहिए। बस उसी में उलझ गए और गीता का जो सार तत्व है ठाकुर ने क्या कहा? 10 बार गीता बोलने से जो होता है वह है गीता का सार तत्व गीता गीता गीता गीता तागी तागी अर्थात कि त्याग त्यागी त्याग तो देखिए कि त्याग करना वो है गीता का पाठ करने का परिणाम यदि हम गीता जैसा श्रीमद्भगवत गीता जैसे शास्त्र का पाठ करके त्याग ना करें और बस बस व्याख्याओं में ही उलझ जाए तो किस काम का है गीता अध्ययन? ठाकुर कहते हैं ना बागान में जाते हैं तो फिर आप कितने पेड़ है, कितनी ब्रांचेस है, कितनी ब्रांचेस पर कितने फल है यह सब गुनने को जाएंगे ना कि फिर वहां से वह आम तोड़ के आम खा के रुष्ट पुष्ट होंगे। आपकी नजर के सामने दूध का गिलास पड़ा है तो दूध का केमिकल कंपोजशन क्या है? उसके न्यूट्रिएंट एलिमेंट्स क्या है? वगैरह सब स्टडी करने को जाएंगे ना कि दूध पीकर के रुष्ट पुष्ट होंगे। देखिए केमिकल एनालिसिस कीजिए। यदि आपकी नजर के सामने एक गिलास में दूध रखा हो, एक गिलास में जहर रखा हो, तो फिर यह बौद्धिक क्षमता हमको हेल्प करती है डिस्क्रिमिनेशन करने

कहानी: श्रद्धा का चमत्कार - विज्ञानानन्दजी रोग की दवाई देते है

में। डिसर्नमेंट रेदर देन डिस्क्रिमिनेशन विवेक का इंग्लिश क्या होगा? ट्रांसलेशन। तो सर्वप्रियनंद जी का एक मैं लेक्चर सुन रहा था। तो वह कहते हैं कि देखिए डिस्क्रिमिनेशन शब्द जो है विवेक के बारे में मत यूज कीजिए क्योंकि आजकल के युग में डिस्क्रिमिनेशन शब्द का अर्थ है कि आप किसी व्यक्ति को फेवर कर रहे हैं और किसी को आप प्रजुडाइस के सहित किसी के साथ में व्यवहार कर रहे हैं। तो जिसके साथ में प्रजुडाइज हो रहा है, जिसके साथ में अन्याय हो रहा है, या तो फिर जिसका शोषण हो रहा है, उसके साथ में उसके अगेंस्ट में डिस्क्रिमिनेशन हो रहा है। फिर यह डिस्क्रिमिनेशन के अगेंस्ट में वह लॉ सूट भी वह स्टार्ट कर सकता है। माने कोर्ट में जाकर केस भी कर सकता है। तो, यह डिस्क्रिमिनेशन शब्द आजकल बड़ा नेगेटिव हो गया है। इससे बेटर ट्रांसलेशन है डिसर्नमेंट। अर्थात कि यह ठीक देखने की प्रक्रिया कि क्या सही है, क्या गलत है। तो एनीवे द यह जो विवेक है, विवेक हमारे भीतर में जागृत हो कि यह दूध है, यह जहर है। इसके लिए थोड़ा बहुत केमिकल कंपोजशन क्या है? डिफरेंट-डिफरेंट एलिमेंट्स का, डिफरेंट-डिफरेंट लिक्विड्स का, उनका क्या केमिकल प्रॉपर्टी है? वो थोड़ा यदि जान लिया तो हानि नहीं है। 10 तरह के ग्लास पड़े हैं। 10ों के भीतर में सफेद कलर का लिक्विड है तो किसी के भीतर में सफेद कलर का फिनाइल भी हो सकता है। किसी के भीतर में यह दूध भी हो सकता है। इंटरेस्टिंगली इलाहाबाद की घटना है। विज्ञान महाराज स्वामी विज्ञानानंद जी ठाकुर के डायरेक्ट डिसाइपल सन्यासी शिष्य और रामकृष्ण संघ के चतुर्थ प्रेसिडेंट तो उस समय इलाहाबाद में थे। वहां पे कोई होपथिक चिकित्सालय चल रहा था और डॉक्टर वहां पर एक थे जो कि गरीब रोगियों को औषध देते थे। हुआ ऐसा कि यह डॉक्टर को किसी कारणवश वहां से जाना पड़ा। तो अभी पेशेंट तो आ रहे हैं। तो क्या किया जाए? कौन सी दवाई दी जाए? रेदर देन कि डिस्पेंसरी बंद करने के विज्ञान महाराज ने अपने से दवाई देना शुरू कर दिया। ठाकुर का नाम लेंगे और दवाई देंगे। तो ऐसा करके और माने लोगों को उनके ऊपर में ऐसा भरोसा हो गया कि ये साधु महाराज है। वो हमको दवाई देते हैं, औषध देते हैं तो हम लोग फटाफट ठीक हो जाएंगे। माने रेदर देन कि मेडिकल की केमिकल प्रॉपर्टी हमारे पर असर करे। कोई भी मेडिसिन बनती है तो उसकी केमिकल प्रॉपर्टीज होती है जो कि हमारे पर पॉजिटिव असर करती है। तो केमिकल प्रॉपर्टीज की वजह विज्ञान महाराज पे इन पेशेंट्स का जो श्रद्धा था, भक्ति था उसी की वजह से यह लोग क्योर होना शुरू हो गए। इसी की वजह से इनका रोग मिटना शुरू हो गया। अब जब डॉक्टर वापस आया तो डॉक्टर तो आश्चर्यचकित हो गया। यह मेडिसिन कैबिनेट देखकर खोल के सब जो भी दवाई है सब गायब हो गई है। तो पूछा महाराज को महाराज यह दवाई वगैरह कहां गई? तो विज्ञान महाराज बड़े शांति से उत्तर देते थे कि वो जो पेशेंट आए सबको मैंने दवाई दे दी। तो डॉक्टर तो इतना घबरा गया। बोला कि महाराज आपको पता है कौन से औषध की को कौन सी कौन से रोग की कौन सी दवाई है? तो विज्ञान महाराज कहते हैं मैं तो ठाकुर का नाम ले जो हाथ में आया दे देता था। वो डॉक्टर बेचारा सोचा अरे पेशेंट कोई मर गया तो अभी पता नहीं उस समय कोर्ट केस का कितना था। आजकल यदि कोई भी डॉक्टर आपको दवाई दे और इसका उसका साइड रिएक्शन आ जाए या प्रॉपर क्योर ना होने की वजह दूसरा यदि प्रॉब्लम हो तो आप सीधा कोर्ट में जाकर केस कर सकते हैं और कोर्ट वाले देखेंगे कि माने जो जज है वह देखेगा कि आपके पास में क्या कोई मेडिकल सर्टिफिकेट है दवाई देने का आप डॉक्टर हैं एमबीबीएस है वगैरह ना कि विदाउट क्वालिफिकेशन यदि आपने दवाई दी और यदि पेशेंट को कुछ खराब हो गया नुकसान हो गया तो सीधा माल प्रैक्टिस के अंडर में आपका डिस्पेंसरी तो बंद कर ही देंगे आपको सीधा जेल में बिठा देंगे तो खैर लॉ ऐसा है इस कानून का कितना पालन होता है हम सबको पता ही है इंडिया में कितने कानूनों का कितना पालन होता है किंतु एटलीस्ट कानून है इस तरह का उस समय इतना स्ट्रिक्ट कानून था कि नहीं पता नहीं बहुत सारे लोग ऐसा भी कहते है कि ब्रिटिश लोगों के युग में इवन ज्यादा स्ट्रिक्ट पालन होता था इंडिपेंडेंट इंडिया से। तो जो भी है डॉक्टर बेचारा घबरा गया। महाराज आपने यह क्या कर दिया? बिना सोचे समझे बिना जाने सुने आपने दवाई भी दे दी और पता नहीं रोगियों के साथ में क्या हुआ होगा। तो महाराज बड़े सरल चित्त से कहते हैं। नहीं नहीं वे लोग तो कहते हैं कि महाराज जी आपसे दवाई लेते हैं तो हम बहुत ही जल्दी क्योर हो जाते हैं। बहुत ही जल्दी हमारा आरोग्य हो जाता है। आप ही हमको दवाई दीजिए। तो देखिए कि यह श्रद्धा भक्ति होना श्रद्धा भक्ति होना यदि इतना बढ़ जाए कि यदि इतना बढ़ जाए कि फिर वो मेडिकल का फिर वो मेडिकल का प्रॉपर मेडिसिन का प्रॉपर मेडिसिन का प्रॉपर्टी भी प्रॉपर्टी भी अपना शरीर जो है उसको ग्रहण ना करें। श्रद्धा से ही अपने को क्योर कर दे। दैट इज अनदर मैटर। किंतु इन जनरल है कि थोड़ा बहुत तो विवेक हमको चाहिए। तो देखिए कि यह बहुत तो विवेक हमको चाहिए। थोड़ा बहुत तो डिसमेंट हमको चाहिए कि हमारे सामने जो रखा है वह खाद्य है ना कि अखाद्य है। खाने लायक है ना कि खाने लायक नहीं है। इतना तो डिसनमेंट चाहिए और इतना विवेक जागृत हो जाता है। फिर जो खाने योग्य है जो कि हमको बल प्रदान करता है उसको खाना है और जो खाने योग्य नहीं है। आजकल के डॉक्टरों को 40 के बाद में आप बात करेंगे। 40 की उम्र हो गई। उसके बाद में डॉक्टर के साथ बात करेंगे तो बताएंगे महाराज अभी साल्ट कम कर दीजिए। शुगर कम कर दीजिए। ऑयल कम कर दीजिए। अदरवाइज फिर आपको दवाई लेनी पड़ेगी और वेट कम कीजिए। चार चीज ये लोग कहते हैं। साल्ट, शुगर और फिर यह ऑयल और वेट ये चारों को आपको कम करना है। यदि बढ़ते

आज के युग का महावाक्य: ईश्वर के दर्शन हो सकते है

रहेंगे तो फिर मुश्किल ही है। तो क्या है कि डॉक्टर के पास में से ऐसा मिनिमम जान लेना है और फिर उसके अनुसार रहना है। तो यह जो ठाकुर कहते हैं कि गीता यह जो मुख गीता वगैरह शास्त्र पढ़ना अच्छा है। तो ठाकुर कहते हैं कि देखो सिर्फ पढ़ने से क्या होगा? पढ़ना नहीं है ऐसा नहीं कहते ठाकुर बी वेरी क्लियर। बहुत बार लोग ऐसा सोचते हैं कि ठाकुर खुद तो निरक्षर थे और हमको भी निरक्षर रखना चाहते थे। नहीं यह बात नहीं। ठाकुर कहते हैं पढ़ो किंतु सिर्फ पढ़ने से क्या होगा? जान लो कि कौन से रोग की कौन सी दवाई है। किंतु फिर जानकर के क्या होगा? आपको फिर भवर रोग की यह जो योग वेदांत रूपी दवाई है उसको ग्रहण तो करना होगा। यह जो कल हमने देखा था क्रंदन योग है, शरणागति योग है, सत्संग योग है, ध्यान योग है। ठाकुर ने जो चार योग हमको बताए चार योग का पालन तो करना होगा। वरना तो फिर इसी संसार चक्र में पड़तेपड़ते पड़े रह के संसार चक्की में पड़कर पड़े रह के हमारी भी चक्की पीस जाएगी। तो इसलिए ठाकुर कहते हैं मत पढ़ो ऐसा नहीं पढ़ो। किंतु सिर्फ पढ़कर के क्या होगा? किसी ने दूध के बारे में सुना है। किसी ने दूध को देखा है तो किसी ने दूध को खाया है। दूध को खाना है। सिर्फ उसके बारे में पढ़कर के सिर्फ यह जानकर के यह दूध है। पौष्टिक आहार है और यह जहर है। हमारे शरीर के लिए नुकसान देह है। यह सिर्फ पढ़कर के होगा नहीं। उसको फिर खाना है दूध को। ईश्वर के दर्शन करा जाए। ईश्वर के दर्शन कर सकते हैं। देखिए आज के युग का सबसे बड़ा महावाक्य यही है। आभार तार शंगे आलाप करा जाए और फिर उनके साथ में वार्तालाप भी कर सकते हैं। हम लोग जो आज के जनरेशन के हैं यह जो स्केप्टिसिज्म कहो ना कि नास्तिकता कहो। हमारे भीतर में इतना गहराई तक चला गया है कि मैं खुद 20 साल हुए मुझे रामकृष्ण संघ में 20 साल से भी ज्यादा 2003 से स्टार्ट करके 2026 ये 20 इयर्स प्लस मेरा यह जर्नी है साधु के रूप में अभी भीतर से वो कन्विक्शन नहीं है कि हां ठाकुर मास्वामी जी है चलो यह तो स्वीकार कर लिया वे लोग तो हिस्टोरिकल कैरेक्टर्स थे ना माने जय राम भाटी कामार पुकुर में जन्म हुआ था दक्षिणेश्वर में लीला की थी श्याम पुकुर में लीला अवसान प्रकट लीला अवसान हुआ था फिर भक्तों के हृदय में लीला प्रारंभ हुई मां स्वामी जी उनके व्यवहार उन्होंने जो व्यवहृत उनकी जो चीजें हैं वह सब हमारे म्यूजियम में पड़ी है मां की चूड़ियां अभी तो चोरी हो गई पता नहीं क्या एनीवे मां की चूड़ियां थी। स्वामी जी का ड्रेस है। स्वामी जी के जूते हैं। तो दे वेर हिस्टोरिकल कैरेक्टर्स। तो चलो वो है वह तो मान लिया। वह हमारे उनके कहे अनुसार जीवन को ट्रांसफॉर्म करना है। वह आशीर्वाद देते हैं। वह सब मान लिया। किंतु यह लोग स्वयं जिस देवता या जो अल्टीमेट रियलिटी में विश्वास करते थे ईश्वर या ब्राह्मण वह है वह हमने सिर्फ सुनकर के रखा है। यह जो संपूर्ण विश्वास अभी भी नहीं हो रहा। कल हमने जो देखा था यह इतने सारे उपाय ठाकुर ने बताए सहस्त्रार में शिव है उनका ध्यान करो। अब सहस्त्रार में शिव का ध्यान करने को जाएंगे। 5 मिनट में सर दर्द हो जाएगा ना कि 10 मिनट के बाद में कमर में दर्द हो जाएगा। 20 मिनट के बाद में पैरों में दर्द हो जाएगा। 30 मिनट के बाद में खड़े हो जाना पड़ेगा। तो कंटीन्यूस एक घंटा देखिए काली पूजा जो होती है इंटरेस्टिंगली रामकृष्ण संघ में तो वह एक सही में आपको देखने को मिलता है। कौन है जिन्होंने ठीक-ठीक तपस्या की है। काली पूजा एक ही आसन पर बैठकर के आपको पूरी रात बितानी है। अर्थ काली पूजा तो पूरी रात चलेगी। शिवरात्रि की जो पूजा है भगवान शिव की पूजा वो तो पूरी रात चलेगी कंटीन्यूअस चलेगी तो दो तरह के मैंने साधकों भक्तों साधुओं को देखा है एक तरह के है कि आधा घंटा हुआ क्या भजन का वो ये होता है भजन एक जो गायक है भजन करेंगे तो आधा घंटा एक घंटा भजन किया फिर वह तो थक जाएंगे ना गातेगाते तो गायक चेंज होंगे तो गायक चेंज होंगे उसमें छोटा सा एक इंटरमिशन जैसा आएगा और मुझे बाकी सब सेंटरों का पता नहीं बेलूर मठ में मैंने पूरी रात काली पूजा देखी है राजकोट मठ में मैंने पूरी रात काली पूजा देखी है और कहीं तो मैंने नहीं देखी तो बेलूर मठ की तो बात छोड़ दीजिए वह तो एकदम हाईएस्ट स्टैंडर्ड पे है। राजकोट मठ में ऐसा है कि आपको उस दिन रात को रिफ्रेशमेंट की व्यवस्था होगी। बेलूर मठ में रिफ्रेशमेंट कब आप भूल ही जाइए। राजकोट में है कि रात को काली पूजा है, महाशिवरात्रि की पूजा है। रात को रिफ्रेशमेंट की व्यवस्था रहेगी। अभी क्या है? बहुत सारे लोग उपवास करते हैं। तो उपवास है तो फिर वो खाना जनरल नहीं। किंतु यह जो चाय है, लिकर टी है, समटाइ्स कॉफी है वगैरह-वगैरह वो आश्रम में रहता है व्यवस्था। तो दो तरह के लोगों को मैंने देखा है काली पूजा की रात को भी महाशिवरात्रि की रात को भी कि जैसे ही वह इंटरमिशन होता है ना इंटरवल होता है एक गायक चेंज होकर के दूसरे गायक महाराज जो है वह भी स्टार्ट करेंगे उसके बीच में वो सभी लोग खड़े हो जाकर के जहां पर रिफ्रेशमेंट रखा है वहां पर चले जाएंगे खड़े रह के गप लगाते लगाते चाय-बाई का पान करेंगे थोड़ा सा पैर रिलैक्स हो गए कमर भी थोड़ी सीधी हो गई। फिर आकर के मंदिर में बैठेंगे और दूसरी साइकिल पूरी करेंगे। भजन की गातेगाते। बेलूर मठ में भी मैंने देखा मैं खास करके मैं मंदिर में थोड़ा समय बैठूंगा और फिर उसके बाद में आधा घंटा एक घंटा हुआ तो मैं सीधा गंगा के किनारे चला जाऊंगा। कोई नहीं होता है उस समय। इवन डिवोटी मंदिर में ही रहते हैं। गंगा के किनारे जाने की अनुमति साधुओं के अलावा किसी को नहीं है। तो फिर गंगा के किनारे बैठे-बैठे जप करना है, ध्यान करना है। वो सब वही करना है। किंतु कहने का आशय क्या है? आधा घंटा, एक घंटा, डेढ़ घंटा मैक्सिमम हुआ। खड़े होकर के पैरों को कमर को रिलैक्स करने के लिए एक चक्कर तो लगाते हैं। यह एक तरह के साधु या भक्त देखें। दूसरे तरह के साधु और भक्त दोनों हां मैं सिर्फ साधुओं के बारे में नहीं दोनों दूसरे तरह के साधु या भक्त है एक बार जो बैठ गए 9:00 बजे से तो सीधा मंगल आरती होती है बेलूर मठ में मंगल आरती होती है 4:00 बजे और राजकोट मठ में मंगल आरती होती है 5:00 बजे वह जो टाइम डिफरेंस है सूर्योदय के हिसाब से तो जब तक मंगल आरती नहीं होती तब तक यह लोग खड़े नहीं होंगे। होंगे सीधा होल नाइट एक ही आसन में बैठे रहना तो काली पूजा या महाशिवरात्रि की रात को आपको पता चलेगा किसकी कितनी तपस्या है तो यहां पे भी देखिए ठाकुर कहते तो है वैसे ध्यान योग करना किंतु ध्यान योग करने के लिए आपको पूरी रात यदि बैठ पाए तभी तो ध्यान नहीं एक घंटे के बाद में तो ध्यान प्रारंभ होता है। एक घंटा ध्यान नहीं वो तो सेटलमेंट का पीरियड है। एक एक घंटा आप बैठे आपका माइंड बॉडी सेटल होता है पहले घंटे में उसके बाद में तो असली ध्यान प्रारंभ होता है। राजा महाराज कहते हैं ना कि समाधि के बाद में तो स्पिरिचुअल लाइफ स्टार्ट होता है। तो यहां पे भी है यदि हम यह सोचे एक घंटा बैठ लिया माने बहुत बड़ी तोप मार दी। कुछ नहीं है। एक घंटा बैठना है माइंड और बॉडी को सेटल करने के लिए। उसके बाद में तो ठीक-ठीक ध्यान प्रारंभ होगा। देखा है ऐसे साधुओं को मैं राजकोट की ही बात करता हूं। बापा महाराज जो लिमड़ी के महाराज थे उनकी उम्र उस समय 80 प्लस थी। 85 प्लस थी क्योंकि वहां पर आए थे ना 75 प्लस थी उनकी उम्र। सुहितानंद जी आए थे लिमड़ी तो बापा महाराज और सुहितानंद जी दोनों बातें कर रहे हैं। सुहितानंद जी ने पूछा आपकी उम्र कितनी है? तो पापा ने कहा 75 तो महाराज कहते मेरी भी 75 सो मुझे याद है तो 75 प्लस उनकी ऐज थी मैं जब वो राजकोट आते थे मैंने देखा था एक आसन पे बैठ के पूरी रात बिताएंगे कुर्सी पर बैठेंगे किंतु इस उम्र पे आपको कुर्सी पर भी पूरी रात बैठकर के बिताना वह भी बीच-बीच में झोंका खाना ऐसा नहीं थोड़ी नींद आ गई तो थोड़ा नींद ले लेते हैं ऐसा नहीं पूरा अलर्ट हो करके बैठेंगे सो दैट इज व्हाट किंतु क्या है ना पूरी लाइफ टाइम की तपस्या होती है तब कहीं जाके ऐसा होता है। अदरवाइज ध्यान योग भी कठिन है। सत्संग योग हमने देखा मुश्किल है। अपने हाथ में नहीं है। सत्संग हुआ तो हुआ ठाकुर की कृपा से। नहीं होता है तो नहीं होता है। हम कुछ कर नहीं सकते हैं। शरणागति भी कठिन है। वो बकलमा दे देना हमने कल देखा था। किंतु यह जो है क्रंदन योग रोते-रोते ईश्वर को पुकारना वो अपने हाथ में है तो किंतु जो अपने हाथ में है जो सहज है जो सहज लभ्य है बीच में क्या आता है लज्जा घृणा भय यानी कि लोग क्या कहेंगे उसकी लज्जा होती है मैं रोऊंगा क्या मैं तो मर्दानगी का प्रतीक हूं आत्मश्रद्धा मेरे भीतर में है तो घृणा होती है भय होता है कि कहीं लोग मुझे पागल ना ठहरा दे। तो यह लज्जा, घृणा, भय, जाति, कुल, शील, मान, अभिमान यह जो अष्टपाश है वो क्रंदन योग के बीच में खड़े हैं। तो देखिए कि यह अभी जो पंचक्लेश है उसको हटाना बहुत मुश्किल है। अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश इसको हटाना यह पंचक्लेश दगध बीज कब होंगे? जब हमको समाधि प्राप्त होगी। इसके पहले यह पंचक्लेश जाएंगे नहीं। किंतु यह जो अष्टपाश है वह तो अपनी एक कंडीशनिंग ही है। हमने आ बेल मुझे मार। हिंदी में कहावत है ना कि वो सांड जा रहा है रास्ते में दौड़ा हुआ। हम लोग सामने से झूठ-मुठ जाकर खड़े रह जाते हैं कि आओ मुझे मारो। तो आ बेल मुझे मार। ऐसी कहावत है जो लोग सामने से मुसीबत को आमंत्रण देते हैं इन लोगों के बारे में तो यह अष्टपाश है वह तो हमने आ बेल मुझे मार जैसी बात है हमने खड़े किए हैं अपने माइंड में उसको हटाना ऐसा चुटकी भर का काम है मेरे मन में भय है कि लोग मेरे बारे में क्या कहेंगे यदि मैं रोते-रोते ईश्वर को पुकारता हूं तो यह भय से मुक्त होना मेरे लिए कितने एक सेकंड दो सेकंड ठाकुर कहते हैं ना हजार साल का जो कमरा है अंधेरा कमरा उसमें आप लाइट ऑन करेंगे तो कितना सेकंड लगेगा उजाला जाने में कमरे के चारों ओर सेकंड का थाउजेंड ऑफ पार्ट लाइट स्पीड है 3 लाख किमी पर सेकंड का 1 सेकंड में आप लाइट का स्विच ऑन करेंगे तो 1 सेकंड में 3 लाख किमी लाइट ट्रैवल कर लेगा तो एक कमरा जो है 10/10 का उसको इलुमिन िनेट करने में लाइट को कितना टाइम लगेगा? सेकंड का एक तीन लाखवा पार्ट तो देखिए कि इतना इंस्टेंटली वो यदि ज्ञान होने से ईश्वर प्राप्ति होने से अविद्या भाग जाती है। इतना ही इंस्टेंटली यह जो जाति कूल शील, मान, अभिमान, लज्जा, घृणा, भय इससे मुक्त होने के बराबर है। कोई तपस्या फपस्या करने की जरूरत नहीं है। बस अभी से एक्शन लेना स्टार्ट कीजिए। बात खत्म हो गया। कौन मुझे भय दिखाता है? मैं किससे लज्जित होऊंगा? क्यों मैं किसी चीज पर घृणा करूंगा? घृणा से मुक्त होने के लिए क्या करना है? जिस चीज पे जिस कार्य पे घृणा है उस कार्य को कर दीजिए। बात खत्म कीजिए। ठाकुर ने अपने बालों से रसिक मेहतर जो था जो कि लोगों का टॉयलेट क्लीन किया करता था। उस समय दक्षिणेश्वर में उसके टॉयलेट अपने बालों से क्लीन किए। उसके लिए क्या कोई बहुत बड़ी साधना करनी पड़ी? उसके लिए जो महावीर हनुमान की तरह ठाकुर जो भाव में रहते थे दास्य भक्ति के और उनकी यह जो करोड़ रज्जू है वहां पर पूंछ की तरह करोड़ रज्जू बढ़ना शुरू हो गई थी। उस लेवल की तपस्या करनी पड़ी थी। नहीं बस स्वीकार कर लिया कि जो घृणा है मेरे मन में मैं ब्राह्मी हूं। इस बात का अभिमान मैं ब्राह्मी हूं। यह जाति कूल शील अभिमान इससे मैं जो बंधा हूं इससे मुक्त होने के लिए क्या करना है? तो जिसको तथाकथित उस समय की परिभाषा में ब्राह्मण से बिल्कुल डायमेट्रिकली ऑोजिट है टॉयलेट क्लीन करने वाला उसके घर जाऊंगा। उसका टॉयलेट अपने बालों से क्लीन करूंगा। तो जितना भी जाति का [गला साफ़ करने की आवाज़] अभिमान था, कुल का अभिमान था, शील का अभिमान था और अभिमान एस सच जो था वह सब चला गया। एक ही एक्शन से तो एक्शन करने में क्या वो दास्य भाव की जो प्रचंड साधना की ऐसा कुछ करना था। नहीं अपने को कन्विंस कर देना है कि मुझे ऐसा करना है। जाति कुल शील से मुझे मुक्ति प्राप्त करनी है। जैसे ही मैंने यह बात को स्वीकार कर लिया। मामला खत्म हो गया। अष्टपाश क्या है? वो कंडीशनिंग है कि जो कि हमने अपने ऊपर में बिठा दी है। जबकि यह पंचक्लेश है। वह क्या है कि जन्म जन्मांतर का वो हमारे भीतर में है। अविद्या से मुक्त होना राग द्वेष से मुक्त होना वैसे कठिन है। खास करके अविद्या से मुक्त होना। किंतु ये जो अष्टपाश है वो सिर्फ कंडीशनिंग है। उसके अलावा और कुछ नहीं। तो हमारा जो इशू था टॉपिक था कि यह जो महावाक्य है ठाकुर का कि ईश्वर को दर्शन कर सकते हैं। ईश्वर के साथ में वार्तालाप कर सकते हैं। इसके बीच में यही तो यह अष्टपाश आते हैं और इसका रास्ता क्या है? रोते-रोते ईश्वर को पुकारो। अभी देखिए कि जो कि विश्व का सर्वोच्च गिफ्ट है उसको प्राप्त करने के लिए मुझे सिर्फ रोना ही है। जगत का कोई भी व्यक्ति रो सकता है। छोटे बच्चे रो सकते हैं। इनफैक्ट छोटे बच्चे ही रोते हैं। आजकल बड़े लोग रेयरली रोते हैं। तो जो छोटा बच्चा प्राप्त कर सकता है। इतनी बड़ी गिफ्ट को प्राप्त करने के लिए, इतने बड़ी संपद को प्राप्त करने के लिए, इतना सहज उपाय जो हमारे सामने है, हम क्यों नहीं अपनाते? क्योंकि भीतर में इस बात के ऊपर में विश्वास नहीं है। आप सब की बात छोड़ दीजिए। मैंने खुद ने कभी ऐसा प्रयास नहीं किया है। सो जब दूसरों की ओर एक उंगली करते हैं कि तुम ऐसे हो तो पता है ना कि और तीन उंगलियां हमारी ओर रहती है। अर्थात कि दूसरों का दोषारोप दोष दर्शन करने के समय देखना है कि हम लोग क्या करते हैं। मैंने भी कभी ऐसा ट्राई नहीं किया क्योंकि क्या है ये जड़ जो बंद करके बैठ गया है कि ईश्वर दर्शन पता नहीं होंगे कि नहीं होंगे तो पता नहीं कितने जन्मों के बाद होंगे होंगे तो माने इज इट वर्थ इट कि मैं अपना ये जो एक डिग्निटी है साधु का उसको मैं बलिदान कर दूं भोग दे दूं सिर्फ मुझे ईश्वर दर्शन हो इसलिए तो देखिए कि यह सब डाउट मेरे मन में भी है अभी भी है किंतु देखिए देखिए दिस इज सो स्ट्रेंज। आज मैं डॉक्टर बनूंगा तो मेरे पास में एक बड़ा मकान होगा। एक बड़ी गाड़ी होगी। एक अच्छी लड़की के या तो फिर लड़की है तो अच्छे लड़के के साथ में शादी होगी। एक अच्छा परिवार बनेगा। इसके लिए जो लोग जो मेहनत करते हैं डॉक्टरी की परीक्षा पास करने के लिए हाई स्कूल से ही आपको मेहनत करना स्टार्ट कर देना है। वो कोटा राजस्थान का है ना वहां पे ये जो वो सब ये कॉम्पिटिटिव एग्जाम की ये जो सब लगी रहती है क्लासेस देखिए वहां पे किस तरह के प्रेशर में यह लड़के जीते हैं। कोई कोई सुसाइड भी कर देता है। तो वह जो पूरा जो ग्रेंडिंग है दे विल गो थ्रू दैट तो क्यों आईएएस ऑफिसर हो जाएंगे डॉक्टर हो जाएंगे सीए हो जाएंगे चार्टर्ड अकाउंटेंट वगैरह कॉम्पिटिटिव एग्जाम पास करेंगे इसके लिए यह लोग इतना करने को तैयार है किंतु इन सबसे परे मायाधीश जो है जगत के सृष्टि स्थिति संहार के कर्ता स्वयं है उनके साथ में मुलाकात हो उनके साथ में वार्तालाप हो उनके साथ में संबंध बने दास्य भाव सख्य भाव वात्सल्य भाव संतान भाव मधुर भाव शांत भाव वो उसके माने इट इज द ग्रेटेस्ट गिफ्ट इन अ ह्यूमंस लाइफ और उसके लिए करना क्या है व्याकुल होकर रोना है तो इतना बड़ा गिफ्ट और उसको प्राप्त करने का इतना सहज तरीका क्यों जगत के सभी लोग रोना धोना नहीं शुरू कर देते। सिर्फ ठाकुर अकेले तो नहीं है जिन्होंने कहा है कि प्रेयर जो है इतना पावरफुल उपाय है। जितने भी संत हुए इस विश्व के जितनी भी भावधारा के संत हैं वो चाहे फिर वो हिंदू धर्म की ही हजार ब्रांच के हजार संत हो ना कि फिर यह जो इंटरनेशनल लेवल पर जितने धर्म है उनके संत हो। सभी ने तो कहा है कि प्रेयर है सहज सरल उप एक प्रार्थना है हृदय के भीतर से ईश्वर को करना है और दैट इज द बेस्ट वे फॉर गॉड रियलाइजेशन। ये जगत का रेयरली कोई सिटी ऐसा होगा। जगत का कोई देश ऐसा नहीं होगा कि जहां के इतिहास में इस तरह के संत महापुरुषों का आगमन हुआ और उन्होंने एक ही उपदेश हजार भाषाओं में हजार अलग तरीकों से वहां के नागरिकों को ना कहा हो। इतना सुनने के बाद में भी क्यों नहीं सभी लोग मिलकर प्रेयर करना शुरू कर देते? क्यों हम लोग यह ड्रोन है, न्यूक्लियर वेपन है। इसमें इतना इन्वेस्टमेंट करते हैं? प्रेयर में क्यों नहीं करते? क्रंदन योग में क्यों नहीं इन्वेस्टमेंट करते हैं? तो देखिए कि क्यों नहीं करते? उसका सहज उत्तर यही है कि यह जो फंडामेंटल बिलीफ जो है कि ईश्वर के दर्शन कर सकते हैं। उनके साथ में वार्तालाप कर सकते हैं। यह ये श्रद्धा ही हम लोग गवा बैठे हैं। मुझे यह श्रद्धा है कि बाल मंदिर से प्रारंभ करके 12th स्टैंडर्ड तक तो यह 12th स्टैंडर्ड के 12 साल बाल मंदिर के अपर लोअर करके दो गिन लीजिए। तो 14 साल स्कूल में और फिर चार साल ग्रेजुएशन के 18 साल और पोस्ट ग्रेजुएशन किया दो-तीन और ऐड कर दीजिए। 20 इयर्स बचपन से ही लेकर के मैं स्टडी करूंगा 20 साल तो मेरा भविष्य सुधरने वाला है। यह श्रद्धा हमको है कि 20 साल जन्म से कुछ ही म तीन-चार साल की उम्र से ही मुझे यह स्टार्ट करना है। हार्ड वर्क करना है, अध्ययन करना है, ग्रेजुएट होना है, पोस्ट ग्रेजुएट होना है, अच्छा डिग्री लेना है तो मेरा लाइफ सुधर जाएगा। यह विश्वास हमको है। वरना तो लोग कहते हैं ना जब तक मैंने अनुभव नहीं किया कैसे विश्वास कर लूं तो ये चार साल का पांच साल का बच्चा जो बाल मंदिर में जाता है सीनियर जूनियर केजी में जाता है क्या उसको पता है ना कि मैं ऐसा करने से मेरे पास में बड़ा गाड़ी होगा बड़ा गाड़ी क्या है अच्छा फैमिली क्या है उसका कांसेप्ट ही नहीं है बच्चे को इसके बावजूद वह जाता है इसके बावजूद उसके मां-बाप उसको भेजते हैं तो ऐसा नहीं है कि डायरेक्ट जो अनुभव किया उसी पर विश्वास हो आज का समाज जो वैल्यूज हमको सिखा दिखाता है यह सेुलर वैल्यूस कि हां बैंक बैलेंस होना चाहिए। एक सोशल कैपिटल होना चाहिए। सोशल प्रेस्टीज स्टेटस होना चाहिए। आपका एक कलीग्स का सर्कल होना चाहिए। एक फ्रेंड सर्कल होना चाहिए। आपके सोशल इंटरेस्ट होने चाहिए। और फिर आप यदि एक रिस्पांसिबल सिटीजन है तो आपके एक रिस्पांसिबल सिटीजन के हिसाब से एक क्लीनलीनेस है। यह जो पॉलिटिकल जो वर्च्यूस है कि अच्छे पॉलिटिशियन को वोट देना है वगैरह-वगैरह प्रोटेस्ट में आपको जाना है यदि आपका पॉलिटिकल इतना ही एडवांस है तो। तो ये सब वैल्यूस सेकुलर वैल्यूस हम लोग अच्छे से सीख लिए हैं। किंतु स्पिरिचुअल वैल्यूस है वो पूरी अंधश्रद्धा में डूबी हुई है। स्पिरिचुअल वैल्यूस के नाम पर अंगूठी पहन लिया। यह होम हवन करवा दिया। पूजा पाठ करवा दिया पैसा देकर के जिससे कि ग्रह शांति हो जाए। नक्षत्र शांति हो जाए। जैसे कि मेरे अशुभ जो कर्मों का जो फल होगा इस जन्म का पिछले जन्म का वह कट जाए। मंदिर में चले जाएंगे। वो माने जितनी भी अंधश्रद्धाएं हैं यह वास्तु शास्त्र है। अभी मैं वास्तु शास्त्र ज्योतिष को अंधश्रद्धा नहीं कहूंगा। इसके पीछे भी एक साइंस है। प्रॉब्लम यही है कि उसका जो प्रैक्टिशनर जो है वो ज्यादातर धुतारे होते हैं। तो एनीवे ज्यादातर सभी लोग नहीं। सो बी वेरी क्लियर ऑन दिस पॉइंट कि क्या है कि ये सब चीजें उसमें चले जाना एक और है कि फुल सेुलर वैल्यू्यूज अपने में है और यहां पे रिलीजियस या स्पिरिचुअल वैल्यूस के नाम पर सब ऐसी तरह की सब बिलीफ हमने पाल के रखी है जो कि हमारे जीवन में कोई भी आध्यात्मिक उन्नति नहीं करने वाली करवाने वाली तो रेदर देन दैट यह जो सहज सरल ठाकुर का महावाक्य है ईश्वर के दर्शन कर सकते हैं और उनके साथ में वार्तालाप भी कर सकते हैं और उसके लिए उपाय जो है सहज सरल उपाय है क्रंदन योग तो वह हम क्यों नहीं करते हैं वि इज वो जो यक्ष प्रश्न यक्ष ने युधिष्ठिर को पूछा ना जगत का सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है तो युधिष्ठिर क्या कहता है कि मृत्यु अवश्यभावी है इसके बावजूद मनुष्य इस तरह तरह से बिहेव करता है कि वह कभी मरने वाला नहीं। तो यहां पर अपने इन जनरल आज के युग का यक्ष प्रश्न कोई यदि मुझे पूछे कि क्या है जगत का सबसे बड़ा आश्चर्य तो मैं तो यही कहूंगा कि जितने भी देश है जितनी भी भाषाएं हैं सभी

साधना के सोपान: प्रवर्तक - साधक - सिद्ध

देश में सभी भाषाओं में महापुरुष ने आकर के वह एक ही संदेश दिया है कि ईश्वर है और प्रार्थना के माध्यम से ईश्वर प्राप्त हो सकते हैं। इसके बावजूद ये पूरी पृथ्वी क्यों एक तरह के नास्तिक भाव में डूबी हुई है वो पता नहीं। यह है इस युग का सबसे बड़ा आश्चर्य। यह कहना कि पूरी पृथ्वी डूब गई है नास्तिकता में। ऑफ कोर्स यह तो सत्य नहीं है। आज भी आप देखेंगे जैसे मैंने कहा काली पूजा या महाशिवरात्रि की रात को आपको पता चल ही जाएगा कि एक आसन पर बैठकर के भजन गातेगाते जप करतेकरते होम पूजा देख के जो समय बिताते हैं ऐसे भक्त साधु भी है। वो है किंतु इन लोगों की संख्या इतनी अल्प है। सो दैट इज द थिंग कि मेजरिटी जो है वो हिडन नास्तिकता मैं कहता हूं हिडन स्केप्टिसिज्म अदृश्य नास्तिकता यानी चेहरे पे मुंह पे दिखा हुआ है पूरा भगवान का भगवान में विश्वास करते हैं मंदिर में जाते हैं तीर्थ यात्रा करते हैं किंतु भीतर में इतना विश्वास नहीं कि वह ईश्वर को प्राप्त करने के लिए लाइफस्ट चेंज करें। जीवन परिवर्तन करें। ट्रांसफॉर्मेशन नहीं करना है। योग साधना नहीं करनी। बस वह शॉर्टकट में जो हो जाए वह कर लेना है। सो दिस इज़ व्हाट ठाकुर कहते हैं कि ईश्वर का दर्शन कर सकते हैं और उनके साथ में वार्तालाप भी कर सकते हैं। गीता वगैरह शास्त्र पढ़कर के बैठे रहना इससे कोई लाभ नहीं। इसके बाद में पढ़कर के इसके भीतर में जो उपदेश दिए हैं उसके अनुसार अपने जीवन को परिवर्तित करना है। फिर क्या कहा था ठाकुर ने? पहले जब साधना प्रारंभ करते हैं तो कौन-कौन सी अवस्थाएं आती है? प्रथमे प्रवर्तक पहले प्रवर्तक यह प्रवर्तक कैसा कि वह काली पूजा चल रही है आधा घंटा बैठा एक घंटा बैठा फिर वह चाय पीने के लिए वह चला जाता है फिर वह आएगा आधा घंटे के बाद में वापस आएगा फिर से वह काली पूजा देखेगा इसको कहेंगे प्रवर्तक से पढ़े सुने वो पढ़ता है सुनता है तार पर साधक इसके बाद में आता है साधक ताके डाक छे ध्यान चिंता कर छे नाम गुण कीर्तन को छे ईश्वर को पुकारता है, ध्यान चिंतन करता है, नाम गुण कीर्तन करता है। काली पूजा की रात को एक ही आसन पर बैठने का पूरा प्रयास करता है। जो प्रवर्तक है उसको तो पता ही है कि भाई यह प्रयास ही मुझे नहीं करना। बैठे रहने का एक आसन पे मैंने ठीक करके रखा ही है कि आधा घंटा या एक घंटा जैसा ही हुआ। मुझे जाना ही है चाय पीने के लिए। वो फिर इससे ज्यादा टेंशन लेने की जरूरत नहीं। उसके लिए वही बात है कि जो करोड़ों-करोड़ों लोग अपने घर में बैठे-बैठे फालतू की चीजें YouTube पर देखते हैं या तो फिर सोशल मीडिया ना कि और जो कुछ भी करते होंगे उससे तो यह आदमी बेटर है कि मंदिर में आकर के काली पूजा की रात को बैठा है। सो वो प्रवर्तक के लेवल पर आ गया है। ज्यादातर लोग जो अंधेरे में डूबे हुए हैं वहां से तो वह एक लेवल ऊपर आ गया है। तो यह हो गया प्रवर्तक किंतु फिर प्रवर्तक से भी बड़ा है साधक। उसने ठीक करके रखा है कि अभी मैं 3- 4 साल से तो काली पूजा अटेंड कर रहा हूं। अभी मैं ट्राई करता हूं कि मैं पूरी रात एक ही आसन में बैठकर के बिताऊं। देखता हूं कि होता है कि नहीं। तो आधा घंटा हुआ पैरों में दर्द स्टार्ट हो गया कमर में दर्द स्टार्ट हो गया एक घंटा हुआ दर्द बढ़ता ही जाता है दो घंटा हुआ घुटनों में दर्द स्टार्ट हो गया 3 घंटा हुआ तो रात को 9:00 बजे से सुबह के 5:00 बजे आप सोच लीजिए चार या पांच जितने भी तो लंबा समय है तो 3 घंटे के बाद में किंतु फिर यह बेचारा कहता है कि अभी नहीं होगा अभी तो एक चक्कर तो लगाना होगा तो क्या है साधना प्रारंभ कर दी है कष्ट कष्ट कर रहा है, तपस्या कर रहा है। किंतु तपस्या में सिद्धि प्राप्त नहीं हुई। प्रवर्तक है। एक घंटे में बाद में उसने ठीक ही कर लिया है कि मुझे खड़े होना ही है। चाय पीनी ही है। साधक है उसने ठीक करके रखा है कि मैं पूरी रात बैठूंगा। किंतु दो-ती घंटे के बाद में शरीर ने जवाब दे दिया। शरीर अभी साथ नहीं दे रहा है। किंतु फिर है सिद्ध। कौन है सिद्ध? ता के बोधे बोध करे छे दर्शन करे छे ईश्वर को बोधे बोध कर किया है अर्थात ईश्वर है यह पक्का विश्वास हो

क्या श्री रामकृष्ण असभ्य है? सही शिष्टाचार क्या है?

चुका है उनके दर्शन कर लिए है सिद्ध अर्थात कि पूरी रात काली पूजा में एक आसन पर बैठे हैं और थोड़ा सा भी खड़े होने का तो प्रश्न ही नहीं आता हिलना दुलना इधरउधर देखना वह सब भी नहीं भजन चल रहे हैं तो एकाग्र चित्त से भजन सुन रहे हैं और पूजा देख रहे हैं। बीच-बीच में आंख बंद करके जप कर रहे हैं। तो वह हो गए सिद्ध के सिद्ध। वह हो गए सिद्ध। किंतु इसके बाद में है सिद्धेर सिद्धो। सिद्धों के भी सिद्ध। जैसे कि चैतन्य देव की अवस्था कभी वात्सल्य कभी मधुर भाव। यह सिद्ध के सिद्ध ऐसे हैं कि उनको कोई कष्ट नहीं है एक एक आसन पर बैठकर के काली पूजा देखने का। एक आसन पर बैठकर काली पूजा देखते भी हैं और मां काली का साक्षात दर्शन करते हैं। वह सिर्फ ऐसा नहीं देखते कि मूर्ति की पूजा हो रही है। उनको मां काली का साक्षात दर्शन हो रहा है। मां काली की साक्षात पूजा देख रहे हैं। तो ठाकुर कहते हैं साधना स्टार्ट करने के बाद में यह चार अवस्था होती है। मैं अभी साधक अवस्था में पहुंचा हूं। सिद्ध अवस्था में नहीं पहुंचा। इस अर्थ में कि मैंने कभी एक आसन पर बैठकर के पूरी रात काली पूजा नहीं बिताई है। दो-तीन घंटा बैठने का प्रयास म प्रयास करता हूं कि पूरी रात बैठ पाऊं। किंतु दो-तीन घंटा हुआ फिर मुझे लगता है कि नहीं चलो अभी तो एक चक्कर मार देना पड़ेगा। तो फिर मैं जाकर के चाय-वाई पी के फिर से वापस आता हूं। तो साधक अवस्था में हूं मैं। देखिए इस इस जन्म में कहां तक पहुंचते हैं। इसके बाद में अह मणि राखाल योगिन लाटू प्रभुति भक्तरा एल देव दुर्लभ तत्व कथा अबबाकया सुनीते क्या लिखते हैं मास्टर महाशय मणि अर्थात मास्टर महाशय स्वयं राखाल राजा महाराज योगिन योगेन महाराज लाटू अद्भुतानंद जी वगैरह भक्त यह सब देव दुर्लभ तत्व कथा अवाक होकर के सुन रहे हैं। यदि हम लोग भी ठाकुर के सामने बैठे होते तो यह सब साधना में सिद्धि है। सिद्ध होना सिद्धों के सिद्ध होना ऑटोमेटिक हो जाता। ठाकुर बात कर रहे हैं। किसको इच्छा होगी? खड़े होकर के वहां से जाए। हिप्नोटाइज होकर के हम सुनते हैं। ए बार मुखेरा विदाई ले। इस समय मुख जो थे वो विदाई लेंगे। मुखजरा अर्थात सिर्फ मुखज नहीं उनके साथ में जो लोग आए थे वह पूरा ग्रुप अभी यहां से विदाई लेगा तारा प्रणाम करिया दाड़ाई लेन उन्होंने प्रणाम करके वह खड़े हुए ठाकुर जनो ता देर तादेर सनाार्थे उठिया दाड़ाई लेन उनको सम्मान देने जैसे कि उनको सम्मान देने के लिए ठाकुर भी उठ खड़े हुए मुखजे सोहास्य मुख साहस्य पूछते हैं आप बार उठा बोशा आपका फिर उठना और बैठना मुख तो भक्त है तो ठाकुर उनके स्मानार्थ जाने के लिए खड़े हुए तो पूछते हैं कि आपको फिर क्या उठना और बैठना आप उस लेवल पर है आध्यात्मिकता के कि आपको यह सब जो शिष्टाचार है उसकी जरूरत नहीं है। विद्यासागर का विद्यासागर के साथ में मुलाकात करने के लिए ठाकुर गए तो घर में प्रवेश कर रहे हैं। ठाकुर मास्टर महाशय को पूछते हैं यह जो शर्ट है जो पहना है उन्होंने उसका बटन एक बटन खुला था। लेकिन शायद सभी बटन खुले होंगे। तो ठाकुर ने कहा मैं बटन बंद कर दूं क्या? तो क्यों नेचुरली है किसी के घर जाएंगे और यह जो पहना हुआ है आपने वस्त्र बटन खुले रहेंगे तो कैसा लगेगा तो मास्टर महाशय पूछते हैं कि बटन बंद कर दूं क्या तो नट ठाकुर पूछते हैं मास्टर महाशय को बटन बंद कर दूं क्या तो मास्टर महाशय कहते हैं दरकार नहीं जरूरत नहीं है आपको जरूरत नहीं है देखिए शर्ट पहना है मैं श- शर्ट शब्द यूज किया है किंतु शर्ट में क्या होता है। पूरे सभी बटन रहते हैं और सभी बटन खुले रहने से शर्ट पूरा खुल जाता है। ऐसा नहीं। यह जो मैंने पहना है इसको जामा कहते हैं बांग्ला में। तो जामा में क्या होता है कि जब्बा या सदो गुजराती में कहते हैं। ऊपर में तीन-चार बटन रहते हैं। वह खुले रहने से आपका छाती थोड़ा सा दिखेगा। किंतु बस वहीं तक। अदरवाइज तो पूरा देह जो है ढका है। ठाकुर को आपने दर्शन वह जो कल्पतरु मुद्रा में खड़े हैं ना तो किस तरह का वह जो उन्होंने पहना है जामा तो उस तरह से तो बटन खुले थे तो मास्टर महाशय कहते हैं आपको इसकी जरूरत नहीं है। यह शिष्टाचार शिष्टाचार उन लोगों के लिए जो कि संसारी है। आप तो संसार से कहीं ज्यादा ऊपर उठ गए हैं। तो यह तो चलो विद्यासागर को मिलने के लिए गए थे बोल के ठाकुर ने यह सब पूछा। अदरवाइज ये जो डिवोटी दक्षिणेश्वर में आते थे तो उनके सामने तो भाव में वो पूरे दिगंबर ही हो जाते थे और फिर वो काशीपुर की घटना है आखरी आखिरी दिनों की ठाकुर इस तरह से भाव में रहते थे कि धोती वगैरह संभाल करके भी नहीं रख पाते थे दिगंबर हो जाते थे तो हीरालाल जो है वो वो हीरानंद हीरानंद वहां पर बैठा है तो सिंधु देश से जो आया है तो ठाकुर कहते हैं देखो और उसके साथ में दो-तीन ब्राह्म भक्त थे। ब्राह्म उसके फ्रेंड थे। तो ठाकुर कहते हैं देखो मैं मुझे कितना जोर जबरदस्ती करके अपने

कहानी : विवेकानंद उंगली से आचार चाटते है : सही शिष्टाचार क्या है

देह को धोती से आवरत करके रखना पड़ता है। वरना हीरानंद को कहते हैं तुम्हारी ये जो फ्रेंड है ना ब्राह्मण फ्रेंड वे लोग बोलेंगे कि असभ्यता होती है। तो ठाकुर को कैसे भी करके अपने को ढक करके रखना है। और देवेंद्र देवेंद्रनाथ टैगोर को मिलने के लिए ठाकुर गए। तो उस समय यह जामा भी नहीं पहना था। ऊपर में पूरा देह जो था वो वैसे ही वो अपने मंदिर में ठाकुर का जो मूर्ति है ना जो फोटोग्राफ है कैसा ठाकुर ने जामा नहीं पहना ऊपर का देह जो है अनावृत है धोती पहनी है सिर्फ और धोती का वो जो एक यहां पे गले पर डाल के रखा है तो ठाकुर इस तरह से गए देवेंद्र नाथ टैगोर को मिलने के लिए अभी देवेंद्र नाथ कहता है कि ठीक है चलो यहां पर आप आए हैं वो सो देह यदि अनावृत्त है छाती अनावृत्त है वह तो ठीक है किंतु किंतु फिर जब ये ब्राह्म समाज में आने के लिए ठाकुर को इनवाइट करते हैं देवेंद्रनाथ तो कहते हैं कि आप शर्ट जामा वगैरह पहन करके आइएगा वरना क्या है असभ्यता होगी तो असभ्यता हम लोगों को हो उसका मुझे इतना डर नहीं किंतु आपको इस तरह से देखकर के कोई आपकी निंदा करे यह मेरे से सहन नहीं होगा यानी कि बड़ा पॉलिटिकली कहा कि इस तरह से मत आइए वो जामा पहन करके आइए ज्वा पहन करके आइए तो जब यह वो तो कुछ दिनों के बाद में उसने लेटर लिखा मथुर बाबू को कि एक काम कीजिएगा ठाकुर को आप ब्राह्म समाज में लेकर मत आइएगा वो हमारे मंदिर में क्योंकि वो बिना जामा के आएंगे बिना शर्ट पहने हुए असभ्यता होगी इसके लिए उनको मत लाइएगा तो क्या है कि यह सभ्य समाज का है वस्त्र वगैरह ठीक पहन के रखना वगैरह वगैरह किंतु ठाकुर है कि यह सब जो झूठमठ की सभ्यता थी इससे कहां वो ऊपर उठ चुके थे स्वामी जी की वो घटना फेमस घटना अमेरिका गए हैं। कैलिफोर्निया की घटना है। एक लेडी डिवोटी के साथ में आचार खरीदने को गए हैं। तो एडथैलन लेडी डिवोटी का नाम तो एडीथैलन के साथ में आचार खरीदने को गए। तो आचार खरीदा तो जिस पात्र में आचार स्वामी जी ने वह सामने किया इस पात्र में दे दीजिए। तो दुकान वाले ने वह जो होगा वह जो कप वगैरह उसमें से उस पात्र में आचार ढाला तो साथ में जो तेल होता है ना अचार का तो कुछ तेल स्वामी जी की उंगलियों पर गिरा तो ठीक है अब जनरली सभ्यता के म एक शिष्टाचार के हिसाब से क्या होना चाहिए वो लेडी एक खड़ी है वहां पर अमेरिका में शिष्टाचार का बड़ाेंस है तो तो लेडीज खड़ी है तो होना क्या चाहिए अपने हाथ साफ कर दीजिए तो तो ऐसा नहीं करके स्वामी जी बड़े बड़े ही आनंदित होकर के उंगलियों को चाटने लगे। तेल गिराता था। तो एडी थेलन कहती है वो बड़ी शॉक हो गई। वो है स्वामी जी ये किस तरह का वो अशिष्ट व्यवहार कर रहे हैं। तो स्वामी जी कहते हैं आप लोगों का यही एक है दिखावा दिखावा। यह शिष्टता वह दिखावा नहीं है। ये आपके हृदय के भीतर में जानी चाहिए। एथिक्स एंड मोरालिटी जो है जीवन की पलपल में आपके बिहेवियर में छलकनी चाहिए। ये

प्रश्न: हमारे भीतर तीन प्रकार के अविश्वास होते हैं

उंगलियों को नहीं चूसना। उसके ऊपर में वो आचार का तेल गिरा है तो आचार को नष्ट कर देना। वो म उसको वेस्ट जाने देना हाथ धो देना क्योंकि लेडीज खड़ी है। ये सब क्या दिखावा है? दिखावा है। असली यदि शिष्टाचार है तो वह हृदय की स्वच्छता है। तो देखिए वो बहुत सारे बार हम लोग ये शिष्टाचार के रूप में या ऐसा करके ये बाह्य जो कुछ चीजें हैं ना उसी कोेंस देते हैं। हृदय कोेंस नहीं देते। तो इसलिए जब ठाकुर खड़े हुए तो मुख जी हंसते-हंसते कहते हैं कि हम हम अपने घर में क्या होता है? यूजुअली मेहमान कोई आए हैं और मेहमान विदाई ले रहे हैं तो इन शिष्टाचार के लिए एक तरह का सभ्य व्यवहार करने के लिए हम लोग भी खड़े होंगे। इट्स अ कॉमन करसी। तो जैसे ही मुख खड़े हुए ठाकुर भी खड़े हुए। तो मुख हंसते-हंसते कहते हैं आपको उठना बैठना यह सब क्या है? आप तो यह शिष्टाचार जो कि बाह्य दिखावा मात्र है उससे तो कहीं उर्ध्व आप उठ गए हैं। तो देखिए इसका जो ठाकुर उत्तर देते हैं भयानक उत्तर है। यह उत्तर के भीतर में ठाकुर का पूरा फिलॉसोफी आ जाता है। और किस प्रश्न के उत्तर में ठाकुर ने अपना पूरा फिलॉसोफी कहा है। इस सिंपल प्रश्न के उत्तर में आपको उठने और बैठने की क्या जरूरत है? तो अभी यह उत्तर जो है ठाकुर का उनका पूरा फिलोसोफी यह दो-तीन सेंटेंस में वह अभी हम कल देखते हैं। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु देखिए मुझे ऑलमोस्ट 20 इयर्स प्लस हो गए संघ में उसमें से 10 साल राजकोट पांच छ सात साल बेलूरमठ में बिताए हैं सात साल मिनिमम यानी कि तीन ही साल ऐसे हैं जो कि मैंने बेलूरमठ या राजकोट के बाहर बिताए लिमड़ी में दो साल यहां पे एक साल तो ये क्यों कैलकुलेशन इस तरह का लिमड़ी में भी पूरी रात काली पूजा नहीं होती थी। यहां पे भी नहीं होती। तो जो तीन साल यहां पर बीता है मैंने पूरी रात काली पूजा अटेंड नहीं की। किंतु राजकोट और बेलूर मठ जब तक था एटलीस्ट 17 इयर्स मैंने फुल होल नाइट काली पूजा अटेंड की है। तो पहले ही दिन से मेरा यह लक्ष्य था कि एक आसन पर बैठना है। तो अनफॉर्चूनेटली 17 साल काली पूजा अटेंड

प्रश्न: विश्वास का जिम्मा किसका है? हमें अपने से विश्वास करना पड़ेगा न ईश्वर हमें विश्वास करवाएंगे?

करने के बाद में भी मैं एक आसन पर नहीं बैठ पाया और मुझे नहीं लगता कि नाउ गोइंग फॉरवर्ड यह होने वाला है। यदि यंग अवस्था में शरीर साथ नहीं दिया तो फिर वृद्धावस्था में कहां से देगा? फिजिकल फिटनेस भी तो यहां पे इतना हीेंस है। तो देखिए कि यह आशा अभी मेरी प्रैक्टिकली छूट गई है। दूसरा कि इस तरह के सेंटर में फिर से पोस्टिंग हो कि जहां पे फिर से फुल नाइट काली पूजा हो वह भी तो अभी अनिश्चित ही है। सो ऑल इन ऑल कि अभी मैंने आशा छोड़

प्रश्न: स्कूल में पढ़ाई एक सिस्टम के अनुसार चलती है—टीचर, एग्ज़ाम, रिज़ल्ट, प्रमोशन सब कुछ स्पष्ट होता है। लेकिन आध्यात्मिक जीवन में आगे कैसे बढ़ रहे हैं, इसका कोई इतना स्पष्ट सिस्टम दिखाई नहीं देता। इसका क्या उपाय है?

दी है कि होगा ऐसा। अभी ये जैसे शिवरात्रि गई तो मैं सोच ही रहा था। अपने कमरे में ही था। बैठे-बैठे सोच रहा था कि बेलूर मठ है वहां पे देखिए पूरी रात वो नृत्य कीर्तन होगा वो सब बहुत कुछ सुंदर आप YouTube चैनल पर देख सकते हैं या तो मौका मिला तो वहां पे भी जाते देख सकते हैं सो आई डू नॉट नो कि मुझे वो मौका कब मिलेगा और फिर से मैं यह संकल्प ले बैठ पाऊंगा कि नहीं किंतु द थिंग इज कि मैंने संकल्प छोड़ा नहीं है इन अ वे आशा चली गई है संकल्प नहीं गया राइट तो आध्यात्मिक जीवन में भी ऐसा ही है कि संकल्प लेकर आगे बढ़ना है चाहे संकल्प सिद्ध हो ना कि ना हो संकल्प को नहीं छोड़ना है। दैट इज द ओनली थिंग वी हैव। सो मां ने कहा रोज 10,000 जप करो। अब मुझे पता है कि 10,000 जप नहीं हो रहा है। किंतु संकल्प तो लेना है कि मुझे 10,000 जप करना है। वो संकल्प ही महत्वपूर्ण है। हमारी एबिलिटी पूरी रात बैठने की 10,000 जप करने की, सहस्त्रार में शिव है। उस पे ध्यान करने की, आम मुक्तारी यानी बकलमा देने की एबिलिटी नहीं है। मुझे भी दिख रही है। जैसे आपने कहा मुझे पक्का पता है कि मेरे से नहीं होने वाला। पक्का पता है इस जन्म में नहीं होने वाला। ईश्वर है कि नहीं वह भी पता नहीं किंतु मैंने संकल्प तो लिया है। राइट? सो दैट इज व्हाट अल्टीमेटली भवसागर को तार देगा। देखिए दुनिया में 700 करोड़ लोग हैं। 700 करोड़ में कितने जेनुइन आध्यात्मिक लोग होंगे? 10% होंगे। तो ईश्वर की यदि रिस्पांसिबिलिटी होती तो 700 करोड़ को ही तो आध्यात्मिक रास्ते पर ले आते। उनके लिए क्या कौन सी बड़ी बात है? 10% की ही है मुश्किल से तो उसका अर्थ है कि हमारा भी तो एक जिम्मा है। देखिए ये जो मॉडर्न एजुकेशन सिस्टम है ना इट इज अ रिसेंट डेवलपमेंट। इवन अप टू 500 ईयर 100 200 साल पहले आज का जो स्ट्रक्चर था वो नहीं था। आज का स्ट्रक्चर डेवलप कैसे हुआ? दो-तीन फंडामेंटल डेवलपमेंट हुई है। रेनेसा के समय में जो भी थियोलॉजी थी वह साइंस में कन्वर्ट हुई। इस अर्थ में कि जो बिलीफ सिस्टम है ऐसा करने से ऐसा होगा। जो दो पदार्थ है एक तोप का गोला है। दूसरा पंखी का पंख है। दोनों एक साथ में फेंकेंगे तो तोप का गोला पहले जमीन पर गिरेगा और पंखी का पंख बाद में गिरेगा। यह तो यह सब सोच के रखा है। किंतु फिर प्रैक्टिकल एक्सपेरिमेंट क्या पता चला? नहीं तोप का गोला हो ना कि पंखी का पंख हो एक ही स्पीड से गिरता है। प्रॉब्लम है हवा की वजह से वो पंखी का पंख इधर-उधर हो जाता है। तो जो मान्यताएं थी उसको साइंस में कन्वर्ट की गई। साइंस को यूनिवर्सली एक्सेप्ट किया गया और फिर यूनिवर्सली एक्सेप्टेड साइंस को एजुकेशन सिस्टम में डाला गया। राइट? तीन मेजर स्टेप्स लिए गए हैं। मान्यताएं या तो जो बिलीफ है उसको प्रॉपर साइंस में एक्सपेरिमेंट के द्वारा कन्वर्ट किया गया। जो लोग ग्रेटेस्ट साइंटिस्ट जो है न्यूटन कहो आइंस्टाइन कहो ना कि प्लांक कहो रूथरफोर्ड हु एवर पर एक जनरेशन ऑफ ग्रेट साइंटिस्ट आई जिन्होंने बिलीफ को साइंस में परिणत किया। सो दैट इज वन थिंग। सेकंड कि उस साइंस को पूरे विश्व में एक्सपेरिमेंट करके फैक्ट के रूप में स्वीकारा गया। तो यूनिवर्सल एक्सेप्टेंस हुआ। दैट इज सेकंड। एंड थर्ड कि जनरेशन ऑफ एजुकेटर्स आई जिन्होंने इस फैक्ट को बाइट साइज में आजकल कहते हैं ना बाइट साइज में आपको देना है। फुल दे देंगे तो इनडाइजेशन बाइट साइज में कन्वर्ट करके फर्स्ट स्टैंडर्ड, सेकंड स्टैंडर्ड ऐसा कन्वर्शन किया। आध्यात्मिकता को भी ऐसा होना है कि यह जो बिलीफ सिस्टम है उसको पहले तो साइंस में कन्वर्ट करना है। साइंस को यूनिवर्सली वेरीफाई करना है। सो पहले हो गए जो होंगे वो ग्रेट साइंटिस्ट हो जाएंगे। बिलीफ को साइंस में कन्वर्ट करते हैं। दूसरे होंगे कि ग्रेट एक्सपेरिमेंटर होते हैं कि जो कि इस साइंस को यूनिवर्सली वेरीफाई करते हैं। तीसरे होते हैं ग्रेट एजुकेटर्स होते हैं जो कि इस फैक्ट को फिर बाइट साइज में स्टेप बाय स्टेप एजुकेशन सिस्टम में कन्वर्ट करेंगे। हमारा प्रॉब्लम यहां पहले स्टेज में ही है कि बिलीफ सिस्टम को अभी

प्रश्न: इतिहास में समय-समय पर आदि शंकराचार्य जैसे महान आचार्य अवतरित हुए हैं। उन्होंने धर्म और अध्यात्म को नई दिशा दी, लेकिन उनके बाद वैसी ही आध्यात्मिक ऊँचाई वाला व्यक्तित्व फिर बहुत कम दिखाई देता है।

साइंस के रूप में निकाला ही नहीं गया है। एक्चुअली देखिए तो योग शास्त्र सपोज टू बी साइंस। राइट योग सूत्र जो है सूत्र फॉर्म में जिस तरह से e = mc² तो यहां पर भी कि अथ योगानुशासनम योगित्तवृत्ति निरोध ऐसा करके वो जो इक्वेशन तो हमने बना दिए हैं। बट प्रॉब्लम इस के जो अंधकार युग जो आया उसमें यह सब बह गया। सो अगेन वी हैव टू ठाकुर मास्वामी जी को आप ग्रेट साइंटिस्ट की उपमा दें कि उन्होंने आइंस्टाइन और न्यूटन की तरह ग्रेटेस्ट फैक्ट ऑफ लाइफ खोज के निकाला है। देन टू जो बाकी के फज़ है कि ग्रेट एक्सपेरिमेंटर्स जो कि इस फैक्ट को अपने लाइफ में वेरीफाई करें और थर्ड जो है कि ग्रेट एजुकेटर्स जो कि इस पूरी सिस्टम को बाइट साइज स्मॉलस्मॉल चंक्स में कन्वर्ट करके कि इतना ही आपको देंगे जैसे आपने कहा कि क्लियर मेज़मेंट है यहां पे क्लियर माइलस्टोन है। क्लियर सक्सेस फेलियर आपका ये है, यूनिट्स है। तो इस तरह से क्लियर करके बाइट साइज में कन्वर्ट करके एजुकेशन सिस्टम में कन्वर्ट करके सो दैट रिमेंस टू बी डन। एक समय था वैदिक युग में कि इसमें से बहुत कुछ हुआ था। किंतु अनफॉर्चूनेटली वो वैदिक युग चला गया। सो आज के युग में इसीलिए स्वामी जी कहते हैं ना कि एजुकेशन के साथ में साइंस को और एजुकेशन सिस्टम के भीतर में साइंस एंड स्पिरिचुअलिटी दोनों को कंबाइन करना है। अपने जूनियर केजी सीनियर केजी से ही जिस तरह से आप लैंग्वेज सिखाते हैं, जिस तरह से नंबर सिखाते हैं, तो साथ में ही यह योग और वेदांत भी सिखाना शुरू कर दीजिए। बट बिफोर दैट वो हो यह मेजर स्टेप्स बाकी है अभी भी। ना म दूसरी टाइप का होना चाहिए ना शंकराचार्य के लेवल के लोग आते गए वो तो हो गया चलिए शंकराचार्य आ गए दूसरे शंकराचार्य से क्या काम है हमको तो इस तरह का व्यक्ति चाहिए जो कि उसको सिस्टेटाइज करें राइट हमारा प्रॉब्लम कहां पे आता है कि जिस तरह से ग्रेट फैराडे इज अ ग्रेट एक्सपेरिमेंटर न्यूटन है कि ग्रेटेस्ट साइंटिस्ट तो फैराडे इज वन ऑफ द ग्रेट एक्सपेरिमेंटर टॉमस अलवा एडिसन वन ऑफ द ग्रेटेस्ट एक्सपेरिमेंटर कि जो आपने फिलॉसोफी या फैक्ट्स को खोज के निकाला है उसको प्रैक्टिकली वेरीफाई करते हैं कि हां यह जो कहते हैं यह शक्य है। आइंस्टाइन का देखिए ना विथ इन अ वेरी शॉर्ट पीरियड ऑफ टाइम वो कहां एक पेटेंट ऑफिस का क्लार्क था। कहां वो वर्ल्ड वाइड फेमस हो गया। उसने प्रेडिक्ट किया कि प्रकाश की किरण ग्रेविटी में बेंड होती है। अब कौन इस तरह का एक्सपेरिमेंट करेगा कि प्रकाश की किरण ग्रेविटी में बेंड होती है। आपको स्पेस में जाना पड़ेगा ये खोजने के लिए। इज इट इवन पॉसिबल? किंतु एक एक्सपेरिमेंट देखिए

प्रश्न: विश्वास के बारे में सुना तो बहोत है किन्तु यह समझ नहीं आता की विश्वास आए कैसे?

कि उसी दो-ती साल के बाद में ही कि वो टोटल एक्लिप्स थी। तो एक्लिप्स का अर्थ क्या है? कि आपको सूरज के पीछे में जो तारा दिखाई देता है यदि एक्लिप्स होती है तो आप देखेंगे कि रात को तारे का जो पोजीशन है और दिन में सूरज के साथ में वो तारा जो दिखता है वो पोजीशन चेंज होगा क्योंकि रात में सूरज नहीं है तो तारा आपको यहां पे दिखता है। दिन में आपको सूरज है तो तारा आपको थोड़ा सा बेंड होता दिखेगा क्योंकि प्रकाश की किरण ग्रेविटी के प्रेजेंस में बेंड होती है। किंतु जब तक सूरज इतना पावरफुल है कि सूरज के पीछे आप तारा नहीं देख सकते। इसका अर्थ है कि इक्लिप्स जब होता है और इसके पीछे का तारा आप देखते हैं स्पष्ट दिखता है। रात को इसका पोजीशन यहां पे है। एक्लिप्स के समय पोजीशन यहां है। तो ये एक्सपेरिमेंट जिसने सोचा होगा जस्ट इमेजिन कि ये कितना ग्रेटनेस है। यह सोचना कि प्रकाश की किरण ग्रेविटी के साथ में बेंड होती है। ये जितना ग्रेट है ये ग्रेट एक्सपेरिमेंट जिसने खोज निकाला वो इक्वली ग्रेट। और वो पूरा एक्सपिडिशन गया। उस समय अफ्रीका में एक्लिप्स दिखना था। अमेरिका यूरोप में तो दिखता ही नहीं था। पूरा एक एक्सपिडिशन गया। इसको मेजर करने के लिए मेजरमेंट किया। सही में पता चला कि रात को जो तारे का पोजीशन है और एक्लिप्स के समय सूरज के पीछे उसका पोजीशन है। देयर इज अ चेंज इन दैट। और विद इन वन नाइट आइंस्टाइन बिकम वर्ल्ड फेमस। राइट? [हंसी] सो हम लोगों का प्रॉब्लम कहां पे आता है कि आइंस्टाइन की भरमार लगी है। किंतु ये जो एक्सपेरिमेंट करने वाले हैं वो लोग हमको मिल नहीं रहे हैं। [हंसी] एजुकेटर्स जो है मिल नहीं रहे हैं। अब आप मत आइए आप और किसी को भेजिए बीच-बीच

प्रश्न: धार्मिक विद्यालय अक्सर उपदेशक, प्रचारक तो तैयार कर देते हैं, लेकिन गहरे आध्यात्मिक साधक बहुत कम निकल पाते हैं।

में। वो भी तो एक है। [हंसी] आपके दूत को भेजिए बीच-बीच में। ना एक्चुअली देखिए फ्रॉम बाल मंदिर से ही यदि हम यह सब सीखना शुरू कर दे ना तो फिर अविश्वास जैसा कुछ रहेगा ही नहीं गुजराती में कहिए ना कि पाका घड़े काठा ना चढ़े माने वो घड़ा पक्का हो जाता है वो अग्नि में पक्का करके फिर उसको आप यह नहीं कर सकते उसका शेप नहीं दे सकते घड़ा जब मिट्टी के रूप में कच्चा है तब तक आप उसको शेप कर सकते हैं तो हम लोगों के साथ में वही है कि पक्का घड़ा हो गया है। अभी इसमें आप शेप नहीं दे सकते। बचपन में जब कि माइंड 100% फ्लेक्सिबल होता है। उस समय यह सब चीजें चली जाने से वह हो जाएगा। किंतु वो एजुकेशन सिस्टम में यह सब जाए उसके लिए जो क्रूशियल स्टेप है वही हमारे यहां मिसिंग है और सिर्फ इंडिया के साथ में नहीं ना ऑल ओवर वर्ल्ड आप देखिए कि जितनी भी अब जैसे अमेरिका में है कैथोलिक स्कूल्स है किंतु क्या है कि वो एक्सक्लूसिव जो उस स्कूल सिस्टम वो जो पंथ है विश्वास करते हैं वही लोग अपने बच्चे को वहां पे भेजेंगे। अदरवाइज ज्यादातर पेरेंट्स उनको पब्लिक स्कूल में ही भेजेंगे। अपने यहां पे भी यह जो यह जो आरएसएस की जो स्कूलें चल रही है बहुत सारी जगह पे आप देखेंगे कि रिलीजियस एजुकेशन बचपन से मददसा है जैसे कि मुस्लिम लोगों की या तो क्रिश्चियन सेमिनरीज है। बचपन से धर्म सिखाते हैं। ऐसा नहीं है कि नहीं सीखते हैं। किंतु जो सिखाते हैं ना दैट इज नॉट प्रॉपर एक्सपेरिमेंटल लेवल पे वो म आपको वो हो। राइट? तो दैट इज साइंटिफिक लेवल पे नहीं है। वह नॉन साइंटिफिक बेसिस पे सिखाते हैं। दैट इज वन प्रॉब्लम। दूसरा कि पब्लिक स्कूल जो है जनरली जो कि होता है उसमें तो यह है ही नहीं। सो बोथ दिस प्रॉब्लम्स आर देयर। किंतु देखिए यह जो फंडामेंटल प्रॉब्लम है ना कि स्पिरिचुअलिटी को प्रैक्टिकल क्यों नहीं किया गया साइंटिफिक बेसिस पे? व्हिच इज समथिंग रियली टू बी वरिड अबाउट क्योंकि देखिए साइंस तो फिर भी बहुत बाद में आया। स्पिरिचुअलिटी समथिंग वि अस फॉर एवर। हमेशा से हमारे साथ में स्पिरिचुअलिटी रही है। स्पिरिचुअलिटी के बेसिस पे ही हमने इवोल्यूशन किया है। आज कहते हैं कि टूल यूज़ करना दैट इज अ साइन ऑफ इवोल्यूशन। आज ये बंदर है। एकाएक देखा लकड़ी से वे लोग मिट्टी में गड्ढा करते हैं। ऐसा टूल यूज़ करना स्टार्ट करते हैं। तो आप जैसे इवोल्यूशन या एंथ्रोपोलॉजी स्टडी करेंगे आर्कियोलॉजी हिस्ट्री स्टडी करेंगे तो टूल्स आपको मिलना शुरू हो जाएंगे। पत्थर के टूल है, लकड़ी के टूल है। और अभी-अभी आजकल यह जो बंदर एप्स के साथ में जो एक्सपेरिमेंट होता है, तो देखा कि एप्स भी टूल यूज़ करते हैं। मतलब दे आर मोर एडवांस दैट वे। एक घोड़ा है, गाय है उससे वो ज्यादा एडवांस है क्योंकि वे लोग टूल यूज नहीं करते। सो हम लोग कहते हैं कि यह जो टूल यूज करना एक अंडरस्टैंडिंग होना कि ये सूरज की गति से माने सूरज म डे एंड नाइट जो है वो डे के बाद में नाइट आएगा। नाइट के बाद में डे आएगा। ये अंडरस्टैंडिंग होना। राइट? सो ऑल ऑफ दिस यह हमारे इवोल्यूशन का प्रतीक है। ऐसा वो हम मानते हैं। किंतु इवन मोर देन दैट स्पिरिचुअल इवोल्यूशन म स्पिरिचुअल डेवलपमेंट इज दी मोस्ट फंडामेंटल रीजन इन इवोल्यूशन। क्योंकि ये सोशल स्ट्रक्चर है। प्रेम के ऊपर बना है। देखिए ये मैं बहुत साल पहले मैंने एक रिपोर्ट पढ़ा था। हम लोग सोचते थे कि सिविलाइजेशन स्टार्ट कहां से हुई और सिविलाइजेशन के मेजरमेंट यूनिट्स क्या है? तो पता चला आज से कितने हजारों साल पहले एक डेड बॉडी पाई गई। माने वो जो आर्कियोलॉजिकल एक्सकेवेशन में एक वृद्ध व्यक्ति है जिसको कि दफन किया गया है। अभी यह देखकर के ही पूरा एकदम हल्ला मच गया। ये इतने हजार साल पहले एक वृद्ध व्यक्ति को दफन किया गया। क्या अर्थ क्या है इसका? वृद्ध व्यक्ति को दफन करना देयर इज नथिंग मिरेकुलस कुछ नहीं है। किंतु यह लोग क्या कहते हैं? देखिए कि यह व्यक्ति की किसी भी मनुष्य की कीमत कब तक है? जब तक कि वो एक्टिव मेंबर है ट्राइब का। जब तक वो शिकार करता है। जब तक वो कुछ ना कुछ इकोनॉमिक या अदरवाइज कंट्रीब्यूट करता है। यह व्यक्ति वृद्ध हो जाता है तो उसकी कोई कीमत नहीं रहती। किंतु यह वृद्ध व्यक्ति को फिर खिलाना, उनकी केयर करना और फिर जब उनका मृत्यु होता है तो एक डिग्निफाइड वे में उनको दफन करना माने क्रिमेट करना, दफन करना, व्हाटएवर। दैट इज अ साइन ऑफ कंपैशन। और एक

प्रश्न: विश्वास के सहारे सब है अभी

कंपैशन स्टार्ट हुआ फ्रॉम देयर सिविलाइजेशन स्टार्टेड। इससे पहले हम पशुवत ही है। यह जब तक शिकार कर रहा है, तब तक उसकी वैल्यू है। जैसे बूढ़ा हो गया, शिकार करना बंद कर दिया। आप जंगल में जाकर देखिए इस तरह के पशुओं की केयर करने वाला कोई नहीं। एक किनारे पर बैठे-बैठे बेचारे मर जाते हैं। यहां पे वृद्ध हुआ है। इकोनॉमिक कंट्रीब्यूशन नहीं कर पाता है। इंस्पाइट ऑफ दैट उसकी केयर की गई है और फिर मृत्यु पे उसको डिग्निफाइड रूप से दफन किया गया है। दैट मींस के उस समय से कंपैशन स्टार्ट हो गया है। राइट? सो दिस इज़ ये कंपैशन होना, आपस में मित्रता होनी, कोऑपरेशन होना, दिस आर फंडामेंटल स्पिरिचुअल वैल्यूज़। तो टूल यूज़ इज नॉट द ओनली थिंग। इवन आज का जो एंथ्रोपोलॉजी एक्सकेवेशन जो लोग करते हैं आर्कियोलॉजिस्ट सभी लोग ये बात को स्वीकार करते हैं। टूल यूज़ इज़ नॉट द ओनली वे टू यू कैन डिनोट इवोल्यूशन। ये कंपैशन है, कोऑपरेशन है, सोशल कोहजन है। दैट इज़ दैट आर इवन ग्रेटर साइंस ऑफ इवोल्यूशन ह्यूमन सिविलाइजेशन का। राइट? सो यह तो हमारे साथ में आदिकाल से है। टूल यूज करना शुरू किया उससे पहले कि यह सब है। सो प्रॉब्लम इज दैट कि स्पिरिचुअलिटी को हम अभी तक साइंटिफिक बेसिस पे ला नहीं पाए। ये रिलेटिविटी सीखनी है। इक्वल एमसी स्क्वायर जैसा ही आपने कहा वो पूरा यूनिवर्स जापानीज है, चाइनीस है, अमेरिकन है, इंडियन है, एवरीवन एग्रीज़ अपॉन दैट। आज आध्यात्मिक जीवन का रेयरली कुछ ऐसा होगा कि मुस्लिम है, हिंदू है, क्रिश्चियन है, सभी लोग एग्री हो जाएंगे। है कुछ-कुछ त्याग है, वैराग्य है, कंपैशन है, करुणा है, प्रेयर है। लोग एग्री होंगे। बट विद सो मेनी काव्याट्स, सो मेनी कंडीशंस कि हमारे यहां पे प्रेयर ऐसे होती है, आपके वहां पर प्रेयर ऐसे होती है। हम लोग इनको प्रे करते हैं। आप लोग उनको प्रे करते हैं। यानी एक यूनिवर्सल फार्मूला अभी तक हम नहीं खोज पाए हैं। ना इसीलिए मैंने कहा ना संकल्प मुझे पता है कि इस जन्म में अभी पूरी रात काली पूजा बैठना नहीं होने वाला है। मां काली का दर्शन शायद हो सकता है। दैट इज फुल पॉसिबिलिटी किंतु शरीर अभी यहां से ज्यादा साथ नहीं देने वाला। किंतु मैंने संकल्प नहीं छोड़ा। [हंसी]