Skip to transcript
ClassesSaradakosh

Sri Ramakrishna Kathamrita ·

श्रीरामकृष्ण कथामृत || 9 Dec 1883 - श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ दक्षिणेश्वर में || 28 Apr 2025

प्रार्थना

ओम स्थापकाय धर्मस्य सर्वधर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री रामकृष्ण कथामृत का पाठ करेंगे। ऑलरेडी हमने देख लिया। चैप्टर का नाम है दक्षिणेश्वर में श्री रामकृष्ण भक्तों के साथ में और ठन ठन में सिद्धेश्वरी मंदिर में गमन। अभी इस बार हम चतुर्थ परिच्छेद का पाठ करेंगे। डेट है 9th दिसंबर 1883। हमने ऑलरेडी देखा कि किस तरह से

पूर्वभूमिका: मास्टर महाशय ने दक्षिणेश्वर में ठाकुर के सान्निध्य में साधना करने का निर्णय लिया

मास्टर महाशय ठाकुर के ठाकुर का दर्शन करने के लिए दक्षिणेश्वर में आए हैं और ठाकुर के साथ में वार्तालाप हुआ। उस समय जबकि वह पंचवटी के नीचे में बैठे थे। उस समय ठाकुर वहां झाऊतला जा रहे थे। वहां से उस समय ठाकुर के साथ में वार्तालाप हुआ। ठाकुर ने कहा कि देखा कि मास्टर महाशय बड़ी गहरी चिंता में निमग्न होकर के बैठे हैं। तो फिर ठाकुर ने कह दिया कि एक टू किु कोरले के ऐसे बोले देवे ए थोड़ा सा कुछ करेंगे तभी कोई आकर के कह देगा यह यह अर्थात कि थोड़ी सी साधना करने से इमीडिएटली हमको गुरु का दर्शन होगा। गुरु आशीर्वाद देंगे। हमारा मार्गदर्शन करेंगे। तो यह मास्टर महाशय के हृदय को सध्यारा मिला। उसके बाद में सब पूरा वार्तालाप हुआ और फिर उसी दिन मास्टर महाशय ठाकुर के यहां पे दक्षिणेश्वर में रात रुके थे। और फिर वहां जैसे हमने देखा कि वह भक्तमाल में से राजा जयमल का प्रसंग वो मास्टर महाशय पाठ कर रहे थे। उसके बाद में जो दूसरा वार्तालाप हुआ ठाकुर के साथ में वह सब हमने अभी तक देखा। अभी देखिए हमको पता है कि यह यह जो प्रसंग है मास्टर महाशय के जीवन का टर्निंग पॉइंट है। ठाकुर ने कहा कि एक तो यह कहा कि थोड़ा सा कुछ करने से ही गुरु आकर के आगे का आगे का रास्ता किस तरह से काटना है। आगे किस तरह से साधना करनी है वह मार्गदर्शन देंगे। वह तो एक बात है। दूसरा ही ठाकुर ने यह भी कहा था कि बीच-बीच में मने वने और कोने मन में वन में और कोने में अर्थात कि किसी कॉर्नर में जाकर के तपस्या करनी चाहिए। भले ही चाहे हम संसार में भी रहे किंतु बीच-बीच में इस तरह से रिट्रीट में जाकर के तपस्या करनी है। तो मास्टर महाशय ने सोचा कि वह भी यहां पर दक्षिणेश्वर आकर के रहेंगे और ठाकुर के मार्गदर्शन में साधना करेंगे। तो वह जो बड़ा ही महत्वपूर्ण डिसीजन जो था उनके जीवन का उन्होंने नाइंथ दिसंबर को लिया था 1883 को और फिर 14th दिसंबर को वह वहां पर रहने के लिए आए थे तो ठाकुर ने कहा कि आज बड़ा शुभ दिन है तुम अच्छा किया आज के दिन आए तो वह अभी पंचम परिच्छेद में यानी कि यह जो परिच्छेद है इसके बाद के परिच्छेद में 14th दिसंबर को मास्टर महाशय दक्षिणेश्वर में रहने के लिए जो आएंगे वो हमको देखने को मिलेगा। किंतु यह जो परिच्छेद है सेवक हृदय अर्थात कि सेवक हृदय में मास्टर महाशय अपने खुद के मन में क्या वार्तालाप चल रहा है? मास्टर महाशय खुद क्या सोच रहे हैं? इसका बड़ा ही सुंदर चित्रंकन उन्होंने इस परिच्छेद में किया है। नाइंथ दिसंबर का यह आखिरी परिच्छेद है। यह आखिरी उनका लिपिबद्ध है। उस दिन की यह नोट आखिरी लिपिबद्ध हुई है। तो फिर मास्टर महाशय और यह बड़ा ही सुंदर परिच्छेद है। देखिए मास्टर महाशय बहुत अच्छे यह भी थे। उनको साहित्य का बड़ा अच्छा उनका ज्ञान था और दार्शनिक और साहित्यक दोनों मास्टर महाशय थे। ही वाज़ अ मैन ऑफ लेटर्स एज वेल एज मैन ऑफ फिलॉसोफी। तो दर्शन शास्त्र भी उन्होंने पढ़े थे और बंगाली साहित्य का भी अच्छे से अभ्यास किया था। यह बोलकर के यह जो उनके खुद के मन की यह बात है वह कितनी सुंदर रूप से उन्होंने आलेखित की है। यह है तो वैसे चार ही पैराग्राफ यहां पर नजर के सामने दिखेंगे इस परिच्छेद में किंतु इन चार पैराग्राफ में बिल्कुल कम शब्दों का इस्तेमाल करके भी एक एक साधक होता है। साधक के मन की व्यथा होती है। साधक के मन का दर्द होता है। साधक के मन की आकांक्षा होती है। होप्स एंड एस्पिरेशंस जो होती है। उन्होंने बड़े ही सुंदर रूप से इस परिच्छेद में लिखा है। क्या लिखते

सेवक हृदय में: मास्टर महाशय ठाकुर के बारे में क्या सोच रहे है

हैं? शुक्ल पक्ष चांद उठिया छ शुक्ल पक्ष है। चांद उठा है। मास्टर महाशय इस दिन रात को वहां पे दक्षिणेश्वर में रुकने वाले थे। तो इसीलिए अभी यह रात का समय है। इसके पहले जो संध्या का समय था उस समय उन्होंने ठाकुर के कमरे में बैठकर के भक्तमाल का पाठ किया था। यह भक्तमाल के पाठ के बाद में ठाकुर ने जो उनको वो प्रश्न किया था उनको टेस्ट करने के लिए कि अच्छा यह राजा है जो श्यामल सुंदर है वो राजा का वेश धारण करके क्या अपने भक्त की रक्षा करने के लिए वो युद्ध मैदान में जाकर के युद्ध कर सकते हैं कि नहीं तो मास्टर महाशय ने बड़ा डिप्लोमेटिकली उत्तर दिया था कि वह भक्त उनको व्याकुल होकर के भगवान को पुकारता है। यह बात तो समझ में आती है। किंतु भक्त स्वयं भक्त भगवान स्वयं भक्त की रक्षा करने के लिए पृथ्वी पर आते हैं। यह मुझे समझ में नहीं आता। पता नहीं सैनिकों ने उस घोड़ेसवार को ठीक-ठीक देखा होगा कि भी नहीं। बोल के मास्टर महाशय इस बात को घुमा लेते हैं। फिर वो ठाकुर भी फिर वो एक बड़ा ही सुंदर बात करते हैं कि मैं अपने भक्तों को सब कुछ नहीं सिखाता। यदि सिखा दूंगा तो फिर वह यहां पर आएंगे क्यों? ऐसा बोलकर के वह जनक राजा की बात करते हैं। तो यह जो ठाकुर का जो यह पर्टिकुलर स्टेटमेंट है उसके बारे में हमने बड़ा डिटेल में देखा था। हमको आश्चर्य हो सकता है कि एक सामान्य टीचर की तरह ठाकुर क्या इन लोगों को अपने ऊपर में डिपेंडेंट करके रखना चाहते हैं? इसके लिए क्या वह आखिरी जो एक विद्या होती है, वह नहीं सिखाएंगे। किंतु ऐसा नहीं है। हमने इसके बारे में भी विस्तृत चर्चा की थी। तो वह संध्या का समय समाप्त हो गया। अभी रात का समय है। शुक्ल पक्ष चांद उठा है। मणि कालीबाड़ी उद्यान पथ पादण करीते छेन। मणि अर्थात मास्टर महाशय स्वयं कालीवाड़ी का काली मंदिर का उद्यान पथ है। वहां पे वो टहल रहे हैं। पाद चारण करते छ टहल रहे हैं। पथेर एक धारे ठाकुर श्री रामकृष्ण घर नौबत खाना बकुल तला ओ पंचवटी अपरधारे भागीरथी ज्योतनामई यह ध्यान पथ है। उसकी एक साइड में है ठाकुर का कमरा। उसके बाद में थोड़ा सा आगे जाएंगे तो नहबत खाना। जहां पर मां शारदा देवी रहा करती थी। उस समय तो मां नहीं थी वहां पे। किंतु जब मां जब भी दक्षिणेश्वर आती थी तो वही नौबत में रहती थी। उसके बाद में बकुल तला अर्थात कि बकुल नाम का जो पेड़ है उसके नीचे का भाग तला अर्थात कि उसका जमीन और पंचवटी अपरधारे भागीरथी ज्योतनामई यह तो एक साइड यह है और दूसरी ओर है भागीरथी ज्योतनामई देखिए कितना सुंदर पोएटिक वर्णन गंगा नदी चांद के आलोक से चांद के प्रकाश से प्रकाशित ित हुई बह रही है तो ज्योतनामई भागीरथी ज्योतना चांद के प्रकाश से उज्ज्वलित गंगा नदी अपना अपनीपनी की बोली ते छ अपने आप से क्या वार्तालाप कर रहे हैं मास्टर महाशय इस उद्यान पथ पर टहल रहे हैं और अपने आप से वार्तालाप कर रहे हैं। क्या अभी देखिए कि यह नसीब होना कि दक्षिणेश्वर में उसी जहां पे ठाकुर तपस्या किए हैं ठाकुर स्वयं उस समय विराजमान थे उस समय इतना सुंदर निर्मल पवित्र वातावरण में संध्या के रात के समय टहलना वो भी कितना बड़ा नसीब है। आप और कोई तपस्या ना कीजिए। सिर्फ वहां पे रहेंगे भी तो रहते-रहते ही हमारी तो मुक्ति हो जाएगी। ये जो कालीवाड़ी के जो चौकीदार थे वहां के जो खाना बनाने वाले थे वहां का जो भंडारी खजानची ये लोग थे वो जो पुजारी थे वे लोग कितने नसीबदार होंगे कि इसी पंचवटी के नीचे में इसी बकुल तला पे वे लोग टहल सकते थे यहां पर कार्य कर सकते थे जब चाहे ठाकुर के साथ में वार्तालाप कर सकते थे उन लोगों को पता नहीं कि उन लोगों की मुक्ति निश्चित हो चुकी है हम लोग है कि अभी उसी नहबत यदि उसी ठाकुर का कमरा वही ज्योतनामई भागीरथी वहीं पर यदि हमको टहलना है तो हमको अपनी कल्पना की सहाय लेनी पड़ेगी। उन लोगों के लिए यह सब कुछ वास्तव था। तो यहां पे इस तरह के स्वर्ग में दक्षिणेश्वर रूपी स्वर्ग में टहलते टहलते मास्टर महाशय अपने खुद के साथ में क्या वार्तालाप कर रहे हैं। शत शत की ईश्वर दर्शन करा जाए। सत्य सत्य का ईश्वर का दर्शन कर सकते हैं। सही-सही में ईश्वर दर्शन होता है। हम लोग तो यह सब स्कूल में सुनते आ रहे हैं कि हां स्कूल के बच्चे थे तभी से वह जो प्रार्थना करते हैं स्कूल में उसी समय हमको बताया जाता है कि हां ईश्वर है। ईश्वर के पास में प्रार्थना करनी चाहिए। प्रार्थना सुनने से ईश्वर खुश होंगे। हमको आशीर्वाद देंगे। यह तो जैसे कि स्कूल की बाकी सब चीजें हमने छोड़ दी। बड़े होकर के संसार किया या पूरी जवाबदारी अपने सर के ऊपर में आ गई तो स्कूल का जैसे बाकी सब भूल गए। यह सब प्रार्थनाएं भी हम

कहानी: लुटेरों का हमला होने से ठाकुर सभी देवी देवताओं को पुकारने लगते है

भूल गए। यदि कोई कहता है कि हां ईश्वर है तो हम तभी स्वीकार करेंगे यदि हमको कोई कष्ट आ गया है। कष्ट से निकलने का और कोई रास्ता नहीं दिख रहा है तो फिर जबरन और कोई उपाय नहीं है। बोलकर के चलो अभी ईश्वर को भी नाम ले लेते हैं। वह ठाकुर की कहानी है कि वह कामार पुकुर जा रहे थे पालकी में बैठकर के तो देखा चारों ओर वो लुटेरे आ गए। वो तो फिर ठाकुर ने क्या किया? जितने भी देवता है सभी देवी देवताओं का नाम लेना शुरू कर दिया। वो काली, दुर्गा, हनुमान, महावीर, शिव जितने भी देव देवी देवता है जो काम करें जे खाटे ठाकुर कहते हैं जो जो देवी देवता आकर के गुंडों को मारे लुटेरों को मारे तो सभी का नाम एक साथ में ले लिया। तो जीवन में जब तकलीफ आती है तो हम लोग सब कुछ कर लेते हैं। वह मंत्र वाली अंगूठी भी पहन लेते हैं। वह तावीज भी पहन लेते हैं। कोई कहता है यह क्रिया कर दो तो वह क्रिया भी कर लेते हैं। कोई कहते हैं उस मंदिर में जाकर के प्रार्थना करो। श्रीफल वहां पर ऑफर करो। तो वो उस मंदिर में जाकर के श्रीफल भी ऑफर कर लेते हैं। तो यह सब हम क्यों करते हैं? क्या सही-सही पर ईश्वर पर विश्वास है? इसलिए करते हैं कि फिर जीवन की समस्या का और कोई समाधान नहीं मिल रहा है। नासी पास हो गए हैं। जीवन से हार चुके हैं। बोलकर के एक आखिरी सहाय के रूप में ईश्वर के पास आए हैं। तो यह बात यहां पर मास्टर महाशय अपने मन में सोच रहे हैं। ठाकुर के दर्शनों को देखा, ठाकुर की दिव्य अवस्था को देखा, ठाकुर का भाव देखा, देखा कि ठाकुर सही में आशीर्वाद देते हैं तो अंतर्मन में तृप्ति होती है। तो ठाकुर को तो हम लोग स्वीकार कर सकते हैं कि चलिए वह महापुरुष है, सिद्ध है, संत है, तो उनके आशीर्वाद मेरे जीवन में फलीभूत होंगे। किंतु ठाकुर जो मां काली के साथ में वार्तालाप करते हैं वह वार्तालाप सही है कि फिर उनके मन की कल्पना है। मास्टर महाशय देखिए मास्टर महाशय ये केशव सेन या तो फिर यह नरेंद्र स्वामी विवेकानंद यह सबका एक रैशन माइंडसेट था। ठाकुर को देखकर के ठाकुर के प्रति तो उनकी श्रद्धा हो गई है। किंतु ठाकुर जिस काली के साथ में वार्तालाप करते हैं उस काली के ऊपर में विश्वास होना थोड़ा सा मुश्किल है। नरेंद्र की पूरी जर्नी देखी प्रथम मुलाकात में ही प्रथम दर्शन में ही जैसे कि उन्होंने अपने को ठाकुर को समर्पित कर दिया था ठाकुर के पास में इसीलिए तो वह बार-बार आते वरना तो क्यों आते नरेंद्र जैसा एक मेधावी बालक एक मेधावी युवा जिसके इतने सारे मित्र हो वह अपने मित्र या तो फिर अपना जो भी कार्यक्रम है अपने जितने भी उसके हॉबीज है उसके जितने भी शोक है उसमें से समय निकाल करके क्या वो एक दक्षिणेश्वर में एक पागल ब्राह्मण रहता है उसके पास में थोड़ी ना बार-बार जाएगा आजकल के हम कॉलेज के लड़के लड़कियों को देखते हैं उनके पास में क्या टाइम होता है अपने सर्कल में जो वार्तालाप जो उनके प्रोजेक्ट चलते रहते हैं उसमें से अपने रिलेटिव्स के लिए टाइम निकालना किसी मंदिर में जाना ये कॉलेज के लड़के लड़कियों को थोड़ी ना टाइम होता है क्योंकि उनका लाइफ इतना जो टीनएजर्स होते हैं इतना फास्ट पेस लाइफ होता है तो यह सब चीजें कि किसी साधु बाबा के पास जाए तो क्यों जाएंगे तो एक जनरल एक जो कॉलेज का स्टूडेंट है उसके पास में टाइम नहीं होता है और स्वामी जी तो पॉपुलर स्टूडेंट है तो जो पॉपुलर थे, लीडर थे अपने ग्रुप के, मित्रों के, ग्रुप के और फिर धनी भी थे। पिताजी तो वकील थे। तो इनके पास में समय निकालना और ठाकुर के पास जाना यही सूचित करता है कि ठाकुर के प्रति उनकी श्रद्धा थी। किंतु ठाकुर को स्वीकार करना एक चीज है और मां काली को स्वीकार करना। यानी कि यह जो हमारे देवी देवताएं हैं, सनातन हिंदू धर्म है, उसको स्वीकार करना दैट इज समथिंग कंप्लीटली डिफरेंट। तो इसीलिए यहां पर मास्टर महाशय का देखिए कि ठाकुर पर तो बड़ा विश्वास है किंतु यह प्रश्न मन में प्रकट होता है। क्या सहीसही में ईश्वर का दर्शन होता है? शतो शत ही की ईश्वर दर्शन करा जाए। ठाकुर श्री रामकृष्ण तो बलिते छ ठाकुर तो राम ठाकुर रामकृष्ण तो कहते हैं कि ईश्वर का दर्शन हो सकता है तो क्या सही में हो सकता है? बोलले एकू किु कोरले के ऐसे बोले दे बे ए ठाकुर ने तो कहा है थोड़ा सा कुछ करने से ही कोई आकर के कह देगा यह यह थोड़ी सी साधना करने से ही गुरु आकर के आगे की साधना कैसे करनी है आगे की मंजिलों को किस तरह से पार करना है कौन से रास्ते से यात्रा करनी है वह गुरु आकर के कह देंगे कि ऐसे ऐसे यहां यहां यहां जाकर के यहां यहां से जाना है। अर्थात एकू साधने कथा बोल लेन अर्थात कि थोड़ी सी साधन की कथा कह देंगे। अच्छा विवाह हो छेले पुले हुए छे ए की ताते लाभ करा जाए। अभी मास्टर महाशय साथ-साथ में ही सोचते हैं कि ठाकुर तो त्यागी है और खुद का क्या है? तो विवाह तो हुआ है। लड़के और पुत्र पुत्रियां भी हुई है। तो फिर क्या इससे भी उनको प्राप्त कर सकते हैं? उनको यानी कि ईश्वर को शादी करके फिर बच्चे भी

क्या विवाह और पुत्र प्राप्ति के बाद भी ईश्वर प्राप्ति हो सकती है?

हुए हैं। फिर भी क्या ईश्वर प्राप्ति कर सकते हैं। तो इसका उत्तर है हां। स्पष्ट हमको पता है कि राजा महाराज की स्वामी ब्रह्मानंद जी की ठाकुर के मानस पुत्र स्वयं की यही सिचुएशन थी। शादी भी हुई थी। एक पुत्र संतान का जन्म भी हुआ था। किंतु फिर भी आध्यात्मिकता में देखिए कि स्वामी विवेकानंद स्वयं कहते हैं कि अमारचे आध्यात्मिकताएं राजा अमारचे आध्यात्मिकताएं बढ़ो। आध्यात्मिकता में राजा मेरे से भी बड़ा है। यह स्वामी विवेकानंद ने स्वयं कहा था। अभी यह उनकी उदार हृदयता है कि दिस इज अ स्टेटमेंट ऑफ फैक्ट। उसके बारे में तो अभी हम सबका स्पेकुलेशन ही होगा। किंतु यह उन्होंने स्टेटमेंट दिया था। वह बात पक्की है। और यह स्टेटमेंट उन्होंने और किसी के बारे में नहीं दिया। ऐसा नहीं कहा कि लाटू मेरे से आध्यात्मिकता में बड़ा है ना कि ये ये शशि मेरे से बड़ा है कि शरद बड़ा है। उन लोगों के बारे में ऐसा नहीं कहा। राजा महाराज के बारे में ही कहा है। सो देयर मस्ट बी सम सब्सटेंशियल ट्रुथ इन दिस स्टेटमेंट। तो इसलिए मास्टर महाशय जो सोच रहे हैं कि अच्छा विवाह हुआ है, पुत्र हुए हैं इससे भी क्या उनको प्राप्त कर सकते हैं? एक टू चिंतार पर थोड़ी चिंता करने के बाद में वो फिर से सोचते हैं अवश्य करा जाए। अवश्य कर सकते हैं। ता ना होले ठाकुर बोल छेन केनो यदि ऐसा नहीं होता तो ठाकुर क्यों कह रहे हैं? ठाकुर झूठमठ का भरोसा क्यों किसी को देंगे? झूठ-मूठ की ऐसी बात क्यों करेंगे कि हां अभी तुम्हारा तुम्हारा यदि संत विवाह हुआ है फिर भी ईश्वर प्राप्ति हो सकती है। इस तरह का झूठा भरोसा क्यों दिलवाएंगे? अदरवाइज तो यदि ठाकुर इस तरह से मिथ्या कथा कहेंगे अपने मन में तो एक बात है कि हां बिना ब्रह्मचर्य के ईश्वर प्राप्ति नहीं हो सकती। किंतु मुंह पर दूसरी बात है कि हां ठीक है चलो ब्रह्मचर्य नहीं है विवाह हुआ है फिर भी आप ईश्वर प्राप्ति कर सकते हैं इस तरह की दो दोगली बातें ठाकुर क्यों करेंगे मुंह में एक फिर हृदय में एक इस तरह की बात ठाकुर थोड़ी ना करेंगे तार कृपा होले केनु ना होवे उनकी कृपा नहीं होने से क्यों नहीं होगा देखिए पूरा सेंटेंस फिर से पढ़ता हूं अच्छा बीबा हो छले पुले होए छ ए की ताते लाभ करा जाए अच्छा विवाह हुआ है लड़के पुत्र भी हुए हैं इससे भी क्या उनको प्राप्त कर सकते हैं ईश्वर को प्राप्त कर सकते हैं एक टू चिंतार पर थोड़ा सा सोच करके अवश्य करा जाए ता ना होले ठाकुर बोल छे केनो अवश्य कर सकते हैं यदि ऐसा नहीं होता तो ठाकुर क्यों कहते तार कृपा होले केनो ना होबे ईश्वर की कृपा ठाकुर की कृपा होगी तो क्यों नहीं होगा देखिए देखिए यह हम सबके लिए कितना बड़ा भरोसा है जो हम लोग बीच-बीच में बातें करते हैं कि अच्छा हम लोग तो साधन करते हैं, जप करते हैं, प्रार्थना भी करते हैं। इस तरह से वो सत्संग भी करते हैं। फिर भी हमारे मन में क्यों कुछ फर्क नहीं पड़ रहा है? क्यों हमारा मन हमको ऐसा नहीं लग रहा है कि दिव्यता से भर गया हो। या तो फिर क्यों नहीं यह एटलीस्ट सविकल्प समाधि प्राप्त हो जाती? निर्विकल्प समाधि ना मिले तो नहीं। एटलीस्ट सविकल्प समाधि भी क्यों नहीं मिल रही है? तो फिर यह जो सब प्रश्न है प्रश्नों का यदि एक बात में उत्तर दिया जाए तो वह है धैर्य। देखिए धैर्य पेशेंस और इंपेशेंस यह दोनों होना चाहिए जीवन में। धैर्य भी होना चाहिए, मुमुक्षुत्व भी होना चाहिए। आपाततः आप यदि देखेंगे ऊपर ऊपर से तो धैर्य और मुमुक्षुत्व यह दोनों ऑोजिंग क्वालिटी हमको दिखती है क्योंकि मुमुक्षुत्व है कि ईश्वर प्राप्ति के लिए तीव्र आकांक्षा यदि यह तीव्र आकांक्षा नहीं होती तो ठाकुर ने मां काली के हद से खड़ग उठा के छीन करके अपना गला काटने का प्रयास नहीं किया होता। ठाकुर कहते हैं ना धीमे ते ताला बनत बनत होई जाई माने एक गीत है बनते बनते हो जाएगा ठाकुर कहते हैं कि मुझे यह बात बिल्कुल पसंद नहीं है यह गीत मुझे बिल्कुल पसंद नहीं है कि बनते बनते हो जाएगा बनते बनते बन जाएगा क्या अर्थ है इसका हमको सही सही में महाकाली के हाथ से खड़ग छीन करके अपने गले में मारना होगा माने लिटरली नहीं तो मेटाफोरिकली सतत एक अपने मन में एक तरह की आकांक्षा होनी चाहिए। सर के ऊपर में आग लगी है और हम पानी खोज रहे हैं अपना सर डूबाने के लिए। आग को ठंडा करने के लिए इस तरह से भीतर में से तीव्र वासना होनी चाहिए। तभी तो ईश्वर प्राप्ति होगी। किंतु साथ-साथ में ही देखिए कि यह धैर्य का कार्य है। ऐसा ना हो जाए। देखिए दो

व्याकुलता और धैर्य : ईश्वर प्राप्ति के लिए दोनों का संतुलन होना चाहिए

एक्सट्रीम है। बहुत ज्यादा अपने मन में यह डिजायर जागृत हो जाए कि नहीं ईश्वर प्राप्ति करनी ही है और फिर मैं एक सप्ताह बैठकर के दिन रात जप कर लेता हूं। किंतु फिर यदि साथ में धैर्य नहीं होगा ना तो फिर भीतर में से एक तरह का क्रोध प्रकट होगा कि अरे ईश्वर प्राप्ति तो हो नहीं रही है। इसका अर्थ है कि मेरे गुरु ने जो बताया सब गलत है। ईश्वर है ही नहीं। सब झूठ है, सब मिथ्या है। मैं यह कार्य अभी समाप्त कर लेता हूं। और माने इस तरह से बहुत ज्यादा आकांक्षा बढ़ जाने से यह मस्तिष्क में विकृति आ सकती है। दिमाग बिगड़ सकता है। पागलपन आ सकता है। दूसरी ओर बहुत ज्यादा धैर्य बढ़ जाने से हम लोग कहेंगे अच्छा ठीक है। यह जन्म में तो हमको अच्छा मिल गया है। घर अच्छा करियर मिल गया है और कोई ज्यादा बड़ी समस्या भी नहीं है। तो यह जन्म निकाल देते हैं। नेक्स्ट जन्म में देखा जाएगा। या तो फिर बीच-बीच में मंदिर जाएंगे। बीच-बीच में थोड़ा बहुत जप कर लेंगे, थोड़ा स्वाध्याय कर लेंगे। उसी से हो जाएगा और ज्यादा कुछ करने की जरूरत नहीं। यह दोनों एक्सट्रीम है। दोनों एक्सट्रीम से बचना है। एक ओर हम तमस में चले जाएंगे। दूसरी ओर हम पागलपन में चले जाएंगे। यह पागलपन का एक उदाहरण है कि एक

कहानी: माँ सारदा के पास एक पागल भक्त आता है

भक्त मां के पास में आया जय राम बाटी में। तो थोड़ा सा उसका स्वभाव जो सन्यासी महाराज मां के जो त्यागी संतान है वह यह रेमिनेशंस लिख रहे हैं। उन्होंने लिखा है कि पहले से ही हमको लगा कि उसका विचित्र तरह का उसका वर्तन है। उसका बातें करने का जो ढंग है थोड़ा सा अस्वाभाविक है। तो फिर भी अभी मां को दर्शन करने के लिए आया है तो मां के पास में भेजा। तो अभी वह मां के पास में जाकर के यह भक्त कहता है कि मां आप ठाकुर का दर्शन करवा दीजिए। आपके हाथ में सब कुछ है। फिर भी आप दर्शन क्यों नहीं करवाती? देखिए मेरे मन की व्याकुलता इतनी है। ठाकुर की तरह ही मेरे मन में व्याकुलता है। इमीडिएटली आप मुझे दर्शन करवा दीजिए। वरना तो फिर मैं अपना प्राण त्याग कर दूंगा। ठाकुर ने कैसे वो मां काली का खड़ग अपने गले में मारना चाहा था। ऐसा मैं कर दूंगा। तो मां कहती है अच्छा बेटा ठीक है। ठीक है। तुमको ईश्वर दर्शन होगा। चिंता मत करो। अभी थोड़ा सा प्रसाद लेकर के थोड़ा विश्राम करो। तो यह भक्त का तो और भी ज्यादा बढ़ने लगा। वह कहता है कि मां ठाकुर ने जैसे कपड़े वगैरह निकाल दिए थे वह दिगंबर हो गए थे। मैं भी इस तरह से दिगंबर होना चाहता हूं। तो मां फिर से उसको भरोसा देती है। अच्छा ठीक है। ठीक है। वह स्वाभाविक रूप से होगा। तुमको मेहनत करके यदि ठाकुर के जैसे वस्त्र निकल जाते थे तो वह तो कोई ठाकुर की प्लान करके नहीं करते थे। यह तो स्वाभाविक रूप से होता था। दिगंबर होना यानी कि अष्टपाश। यह जितना भी लज्जा, घृणा, भय वगैरह है उनसे मुक्ति। तो वह मुक्ति जब होगी तब वस्त्र अपने से निकल जाएंगे। तुम इसके बारे में ज्यादा चिंता मत करो। फिर भी यह भक्त कहता है कि ना मां मैं चाहता हूं कि वस्त्र सब निकाल ही दूं। बोल कर के उसने वस्त्र निकालना शुरू किया। तो यह सब लोगों ने उसको पकड़ा कि यह मां के सामने क्या पागलपन कर रहा है। ऐसा करके उसको वहां से खींच के ले गए। इसके बाद में यह जो भक्त था उसका पागलपन बढ़ने ही लगा। थोड़ मां के पास में खाने को बैठा। अभी कैसे भी करके इन लोगों ने संभाला उसको तो खाने को बैठा है। मां को कहता है मां खाना बिल्कुल अच्छा नहीं हुआ है। मैं तो सोचता था कि यहां पे आऊंगा तुम्हारे हाथ का खाना खाऊंगा। इतना बेकार खाना है। कैसा तुमने खाना मुझे खिलाया? तो मां कहती है कि देखो बेटा यहां पे तो कोई अच्छी चीजें मिलती नहीं है। छोटा सा गांव है। तुम जैसा है वैसा खा लो। इसके बाद में उद्बोधन में आना। उद्बोधन में और अच्छा खाना खिलाओगे। तो उस समय वह जो केदार बाबू थे वो कोवालपाड़ा के अध्यक्ष उनकी मां वहां पर थी। तो उनकी मां ने तो एकदम उसको सुना दिया कि अच्छा बेटा तुम एक काम करना तुम लोग जब घर जाओगे तो मां को अच्छी-अच्छी चीजें भेजना खाने की। तो फिर बाकी भक्त लोग भी अच्छा खाना खा पाएंगे। तो यह भक्त के कान में वह बात गई ही नहीं। वो कौन दक्षिणा देने वाला है? कौन प्रणामी देने वाला है? कौन अच्छी चीजें भेजने वाला है? यह तो माथा खराब है इसका। इसके बाद में यह भक्त घर गया और फिर घर जाकर के फिर वह मां को पत्र लिखता है माने गुस्से गुस्से से भर के कि मां ईश्वर दर्शन नहीं हो रहा है। क्या हो रहा है? मैं तुम मेरे पर दया नहीं कर रहे हो वगैरह-वगैरह वो जो जप की माला थी वो माला उसने फेंक दी। उद्बोधन में जाकर के धमाल कर रहा है। फिर एक दिन साधुओं ने कि बाकी भक्तों ने मिलकर के उसकी अच्छे से पिटाई की। उसके बाद में थोड़ा सा उसका दिमाग ठंडा हुआ। तो देखिए कि एक तो उत्सुकता है या तो तीव्र आकांक्षा है, मुमुक्षत्व है वह सब होना चाहिए। वरना तो फिर आप ईश्वर दर्शन इस जगत में कर ही इस एटलीस्ट इस समय में कुछ बर्थ में कुछ जन्म में नहीं कर पाएंगे। किंतु फिर इसके साथ में ना एक थोड़ा सा धैर्य मिलावट नहीं होगा तो फिर क्या है कि पागलपन आ सकता है। यह जो एकदम म दोनों को बैलेंस करके चलना है। भीतर में व्याकुलता भी है साथ-साथ में धैर्य भी है। ये दोनों यदि मिक्स होगा। उसका संयम ये होगा संगम होगा। तब कहीं जाकर के ये गंगा और सरस्वती दोनों का जब संगम होगा तब वो महाकुंभ होगा। तो ऐसा ही देखिए कि यहां पे है कि मास्टर महाशय कहते हैं कि ता ना होले ठाकुर बोल छे केनो ईश्वर लाभ हो सकता है कि नहीं अवश्य हो सकता है भले ही चाहे विवाह किया हो भले ही चाहे बच्चे हुए हो ईश्वर दर्शन हो सकता है अदरवाइज ठाकुर ऐसा कहते क्यों ता और फिर साथ में कितना बड़ा स्टेटमेंट तार कृपा होले केनो ना होबे यदि उनकी कृपा कृपा होगी तो कैसे नहीं होगा? देखिए ठाकुर की कृपा होगी, ईश्वर की कृपा होगी तो ईश्वर दर्शन होगा। बस हमको संभल करके चलना है। एक पागलपन माने एक एक्सट्रीम कि वहां पर जो मुमुक्षुत्व है इतना बढ़ गया कि सर के ऊपर में से कंट्रोल ही चला गया। ऐसा ना हो और दूसरा एक्सट्रीम कि इतने तमस में डूब गए कि फिर साल में एक बार ठाकुर का नाम लेंगे। तो ऐसा भी नहीं होना चाहिए। मध्यम पंथा अवलंबन करके स्लो एंड स्टेडी आध्यात्मिक रास्ते पर चलना चाहिए। देखिए ईश्वर दर्शन क्यों नहीं होंगे। यह ठाकुर की हमको गारंटी है। ए जगत

इस अद्भुत विश्व का रचयिता कौन है?

सामने यह जगत नजर के सामने है। सूरजो चंद्रों नक्षत्रों जीव चतुर्बिन शति तत्व सूर्य चंद्र नक्षत्र जीव ये 24 तत्व ये सब क्यों रूपे हो लोग यह सब किस तरह से हुआ ए कोरताई बा के आर आमी आर के ये ना जान ले बृथाई जीवन इसका कर्ता कौन है और फिर मैं मैं इस कर्ता का कौन हूं यह ना जानने से ये जीवन ही वृथा चला गया। जीवन ही अपना बेकार चला गया। देखिए कि यह जगत नजर के सामने है। जो कुछ भी इतना सौंदर्य देख रहे हैं। नदी है, जंगल है, वन है, पर्वत है। यह हिमालय है। नजर के सामने सूर्य, चंद्र, नक्षत्र है। यह 24 तत्व है। ये जो अभी ये म दक्षिणेश्वर स्वयं दक्षिणेश्वर का ये सुमधुर उद्यान पथ और ज्योत्सनामई भागीरथी चंद्र के किरणों से प्रकाशित गंगा नदी कलकल करके बह रही है। सामने पंचवटी है। यहां पर मां काली का मंदिर है। यह जो सौंदर्य है इस जगत का इस जगत की जो भव्यता है, इसका कर्ता कौन है? यह एक प्रश्न दूसरा कि इस कर्ता के साथ में मेरा संबंध क्या है? यह दोनों प्रश्न का यदि उत्तर ना मिला तो यह जीवन बेकार ही गया। जीवन वृथा ही गया। ठाकुर श्री रामकृष्ण पुरुष श्रेष्ठ हो। ठाकुर श्री रामकृष्ण पुरुषों में श्रेष्ठ है। पुरुषोत्तम है। ए रूप महापुरुष ए परज तो ए जीवन देखी नहीं। इस तरह के महापुरुष इस अभी तक इस जीवन में मैंने देखे नहीं है। इन्हीं अबश्योई से ईश्वर के देखे छ उन्होंने अवश्य उसी ईश्वर का दर्शन किया है। उसी ईश्वर के आशीर्वाद प्राप्त किए हैं। ता ना होले मां मां बोले मां मां कोरे कार शंगे रात दिन को था कौन यदि ऐसा ना होता उस ईश्वर का दर्शन ना हुआ होता तो फिर मां मां बोलकर के दिन रात किसके साथ में वार्तालाप कर रहे हैं क्या उसी भक्त की तरह जो कि मां के पास में आया था उसकी तरह ठाकुर का भी दिमाग बिगड़ गया है नहीं ठाकुर के साथ में आप दो सेकंड भी बैठेंगे 2 मिनट भी बैठेंगे पता चल जाएगा कि ठाकुर के भीतर में कितनी दिव्यता है, कितना आनंद है और हमारे प्रति कितनी करुणा है। जिसका दिमाग बिगड़ा हो उसके हृदय के भीतर में इस तरह की करुणा, इस तरह की शांति, इस तरह का आनंद, इस तरह का बचपना, इनोसेंस कभी भी नहीं हो सकता है। इसीलिए यदि ईश्वर ना होते ईश्वर का दर्शन ना किया होता तो ठाकुर किसके साथ में दिन रात मां मां बोलकर के वार्तालाप कर रहे हैं आर ता ना होले ईश्वर ऊपर और ये तो भालू भाषा के मन करे होलो और यदि ईश्वर दर्शन ना हुआ होता तो फिर ईश्वर के ऊपर में उनका इतना प्रेम ईश्वर के ऊपर में उनकी इतनी श्रद्धा किस तरह से होती किस तरह से होगी देखिए कि हम बचपन में मां के साथ में बड़े हुए हैं। पिताजी के साथ में बड़े हुए हैं। बोलकर के हमारा मां पिताजी पे इतना प्रेम है। इतनी श्रद्धा है। किंतु देखिए कि यहां पे जैसे यहां विशाखापटनम में ही एक ऑर्फनेज है। अभी यह हमारा समर कैंप चालू हो रहा है। तो यह ऑर्फनेज के बच्चे हमारे यहां समर कैंप में आने वाले हैं। अभी उनको देखेंगे। देखिए हमको इतनी दया आएगी कि हम लोग तो एक स्वस्थ परिवार में जन्म ग्रहण किए हैं। बचपन में मां-पिताजी का इतना प्रेम मिला है। इन बच्चों को देखिए कि मां-पिताजी का प्रेम नहीं मिला। किसी ना किसी के घर में या तो किसी संस्था में यह लोग बड़े हुए हैं। अभी इन बच्चों को मां-पिताजी अपने खुद के मां-पिताजी पे कैसे प्रेम होगा? हो सकता है उनका फोटो देखा है। हो सकता है कि उनके बारे में सुना है। हो सकता है कि उनको पहले कभी छोटे-छोटे थे देखा होगा। बाद में उनका मृत्यु हुआ होगा कि जो भी हुआ होगा किंतु उनका जो मेजॉरिटी ऑफ लाइफ है उसमें तो उन्होंने मां-पिताजी को देखा नहीं है। तो फिर उनके ऊपर में प्रेम होगा कैसे बच्चों का? जिनको आपने देखा नहीं है, जिनके साथ में आप रहे नहीं है, जिनका प्रेम और स्नेह आपने प्राप्त नहीं किया है, उनके प्रति आपका स्नेह और प्रेम कैसे जागृत हो सकता है? यह आध्यात्मिक जीवन में सबसे बड़ा जो कोन ड्रम जिसको कहते हैं इंग्लिश में सबसे बड़ा क्वेश्चन यह यही है। ईश्वर के प्रति श्रद्धा रखो। सब लोग कहते हैं ईश्वर के प्रति प्रेम रखो। अच्छा अच्छी बात है किंतु ईश्वर को कभी देखा नहीं है। पता नहीं है कि ईश्वर दयामय है ना कि पागल है। ईश्वर की हमारे प्रति करुणा है कि हमारे प्रति धिक्कार है। हमको तो कुछ पता नहीं। तो किस तरह से इस तरह के ईश्वर जो कि अनजान है अननोन है कंप्लीटली जिसको कि हम किसी तरह की पहचान नहीं है उस तरह के ईश्वर पे हमारी श्रद्धा भक्ति कैसे हो सकती है किंतु देखिए यदि हमको इस ईश्वर को जानकर के इनको प्रेम करना हो तो इसीलिए ईश्वर अवतार धारण करते हैं। मनुष्य देह धारण करके पृथ्वी पर अवतरित होते हैं। ईश्वर को तो हमने नहीं देखा। मां काली को तो हमने कभी देखा नहीं। कभी सुना नहीं उनके बारे में कुछ। किंतु मां शारदा देवी का तो एटलीस्ट उनके जीवन चरित्र का हमने अभ्यास किया है। हमारी ही तरह संसार में रहकर के संसार के सभी दुख कष्ट झंझवात में से पसार होकर के उन्होंने हमको प्रेम किया है। मां मां शारदा देवी के मन में भी हमारे प्रति धिक्कार हो सकता था। मां कह सकती थी कि वह ठाकुर तो मां मां करके मां काली का नाम लेते लेते पागल हो गए। मेरे लिए तो कुछ रखा नहीं। मेरे खानेपीने की कुछ व्यवस्था की नहीं। जो जो भी अपने वो नहबत में आता था वह तो सब भक्तों को बांट देते थे। तो अभी मैं क्या मेरे लिए कुछ छोड़ के नहीं गए तो फिर क्या मैं इस ये किस तरह के मेरे पति है वो उद्बोधन की एक कहानी है ये वो मां एक बार प्रसाद जैसे

एक लोभी भक्त की कहानी

आता है मां के पास में ठाकुर का तो पूजा करने के बाद में तो फिर मां क्या करेगी सब भाग करके रख देगी डिवीजन करके रख देगी कि यह प्रसाद इसके लिए यह प्रसाद इसके लिए यह प्रसाद इसके लिए बोल करके तो अभी एक दिन हुआ ऐसा कि एक प्रसाद एक कटोरी में रखा था थोड़ा सा यह बोल के कि यह नीचे में सब साधु लोग रहते हैं। त्यागी संतान रहते हैं। मां के शरद महाराज है और बाकी सब साधु ये उन लोगों के लिए ऐसा बोलकर के एक कटोरी में प्रसाद रख दिया। फिर मां वहां थोड़ी सी बाहर गई। तो वापस आकर देखा तो एक महिला भक्त वो कटोरी खोल कर के उसमें से प्रसाद खा रही है और खाते-खाते कहती है कि सब उसके लड़कों के लिए रख देती है। हमको कुछ नहीं मिलता। ऐसा कैसे चलेगा? हम क्या उनके पराए हैं? हम भी प्रसाद खाएंगे। ऐसा बोल रही है और प्रसाद खा रही है। तो मां तो थोड़ी चिंता में पड़ गई। बाकी लोग हंस रहे हैं। मां किंतु चिंता में पड़ गई कि अरे ये लड़कों के लिए तो प्रसाद रखा था। अभी प्रसाद नहीं है तो क्या होगा? ऐसा बोल के मां सोच रही है। फिर वो किचन में वो जो खाना पकाने वाला था उसको बुलाया कहा कि किचन में कुछ पड़ा है क्या रसोई में? तो बोला थोड़ा सा भात ऐसा कुछ पड़ा होगा। तो मां ने कहा लेके आओ। फिर लाए। फिर मां ने थोड़ा सा भात अपने मुंह में डाला। यानी कि प्रसाद हो गया तो फिर वह रख दिया बच्चों के लिए। तो देखिए मां भी तो इस तरह से कंप्लेन कर सकती है कि ठाकुर ने अपने भक्तों में सब बांट दिया। मेरे लिए कुछ नहीं रखा। तो ऐसा भी मां कह सकती थी किंतु ऐसा नहीं कह के देखिए कि मां के हृदय में भक्तों के लिए अनंत प्रेम है। तो यह हमने जब नजरों से तो देखा नहीं एटलीस्ट किंतु कानों से सुना तो है। किताबों में पढ़ा तो है। तो यह देखकर के मां के ऊपर में अपनी श्रद्धा भक्ति हो सकती है। मां काली के ऊपर में डायरेक्ट नहीं होगी। किंतु मां शारदा देवी के ऊपर में तो होगी ही। फिर फिर मां शारदा देवी फिर वो हॉट लाइन लगा देगी वहां से कि यहां से जैसे ही मां के ऊपर में श्रद्धा भक्ति आई फिर मां ही वो श्रद्धा भक्ति को मां काली के प्रति वो डायरेक्ट कर देगी रीडायरेक्ट कर देगी एक दिन ऐसा पता चलेगा कि मां शारदा देवी ही मां काली है। फिर एक दिन ऐसा पता चलेगा कि हमारे ही भीतर में मां शारदा देवी मां काली सभी एक साथ में विराजमान है। अहम ब्रह्मास्मि मैं ही हूं वही ब्रह्मन जो कि समय और अवकाश की सीमाओं से परे है। सत चित आनंदमय है। तो वो जो पूरी यात्रा है आध्यात्मिक यात्रा उसका प्रारंभ कहां से होगा कि जो श्रद्धा के पात्र है उनके प्रति हमारी श्रद्धा हो तो वह ईश्वर में डायरेक्ट ना हो सकती है। किंतु अवतार के ऊपर में तो हो ही सकती है। तो इसीलिए मैं फिर से पूरा आगे से पढ़ता हूं। ठाकुर श्री रामकृष्ण पुरुष श्रेष्ठो ठाकुर श्री रामकृष्ण पुरुष श्रेष्ठ है। पुरुषोत्तम है। ए रूप महापुरुष ए परंतु ए जीवन देखी नहीं। इस तरह के महापुरुष अभी तक इस जीवन में देखे नहीं है। इन्ही अवश्य से ईश्वर के देखे छ ता ना होले मां मां कोरे कारंगे रात दिन कथा कौन उन्होंने अवश्य उस ईश्वर का दर्शन किया है देखा है यदि ऐसा नहीं होता तो मां मां करतेकरते रात दिन किसके साथ में वार्तालाप करते आरता ना होले ईश्वर ऊपर और ए तो भालो भाषा के मन करे होलो और यदि दर्शन ना होता तो ईश्वर के ऊपर में उनका इतना प्रेम किस तरह से हुआ यह तो भो भाषा जे भाव शून्य होए जाए इतना प्रेम कि वह भाव शून्य हो जाते हैं समाधि में चले जाते हैं समाधिस्थो जड़े न्याय होए जान समाधस्थ जड़ की तरह हो जाते हैं आ कखोबा प्रेमे उन्मत्त होए हासेन कादेन नाचेन गान और कभी-कभी उन्मत्त होकर के हंसते रोते हैं, नाचते हैं और गाते हैं। जो वह ठाकुर ने कहा ना कि चैतन्य देव की तीन अवस्था होती थी। बाह्य बाह्य अवस्था जिसमें कि भक्तों के साथ वार्तालाप करते थे। अर्धबाह्य अवस्था जिसमें कि वह मत्त होकर के नृत्य कीर्तन गान भजन करते थे और अंतर्दशा जहां पे वो ईश्वर में मग्न हो जाते थे। समाधस्थ हो जाते थे। तो यदि ईश्वर का दर्शन जिन्होंने ना किया हो उनके साथ में क्या इस तरह से हो सकता है? कभी नहीं हो सकता। तो यदि यही ठाकुर कहते हैं कि हां भले ही चाहे संसार किया हो भले ही चाहे लड़के हुए हो भले ही चाहे हम लोग गृहस्थ हो किंतु फिर भी ईश्वर दर्शन हो सकता है। यदि ना होता तो ठाकुर इस तरह की झूठमठ की बातें कभी नहीं करते और यदि ठाकुर का आशीर्वाद होगा तो फिर यह क्यों नहीं होगा तार कृपा होले केनो ना होवे यदि उनकी कृपा होगी तो क्यों नहीं

मास्टर महाशय दक्षिणेश्वर में ठाकुर के सान्निध्य में रहने के लिए आते है

होगा तो यह चतुर्थ परिच्छेद समाप्त अभी पंचम परिच्छेद 14th दिसंबर 1883 मास्टर महाशय कह रहने के लिए दक्षिणेश्वर में आते हैं। अग्रहायण पूर्णिमा और संक्रांति अग्रहायण पूर्णिमा और संक्रांति है। बड़ा शुभ दिन है। शुक्रवार 14 दिसंबर 1883 ख्रिस्ताब् शुक्रवार 14th दिसंबर 1883 बेला प्राय नोएटा होइबे सुबह के लगभग 9:00 बजे है ठाकुर श्री रामकृष्ण तार घरे द्वारे का छे दक्षिण पूर्व बारंदाए दाडिया आन ठाकुर श्री रामकृष्ण उनके घर के सामने जो दरवाजा है उसके सामने दक्षिण पूर्व वरांडा जो है वहां पे खड़े खड़े हैं रामलाल काछे दाड़ाइया आन रामलाल पास में खड़े हैं राखाल लाटू निकटे एदिक वैदिक छिलेन राखाल और लाटू आसपास में ही इधरउधर थे मणि आशिया भूमिष् होया प्रणाम कर लेन मणि ने आकर के भूमिष् होकर के ठाकुर को प्रणाम किए मणि यानी कि यही मास्टर महाशय ठाकुर बोलीले ठाकुर ने कहा ऐसे हो तो आज बेश दिन आए हो तो आज बड़ा शुभ दिन है तनी ठाकुर काचे किछु दिन थाकीबेन साधन करबेन मणि अर्थात कि मास्टर महाशय ठाकुर के साथ में कुछ दिन रहेंगे साधन भजन करेंगे क्रिसमस की छुट्टी है वह तो उस समय तो ब्रिटिश साम्राज्य था तो 24 दिसंबर को क्रिसमस होता है तो आजकल जैसे कि दीपावली या दुर्गा पूजा की लंबी छुट्टी होती है तो उसी उसी तरह से मास्टर महाशय जिस स्कूल में काम कर रहे थे वहां एक लंबा वेकेशन था तो इसलिए उनके पास में समय है बोल के ठाकुर के पास में आए हैं ठाकुर बोलिया छ किसु कोले के बोले देवे ए ठाकुर ने कहा है कि थोड़ा सा कुछ करने से ही कोई आकर के कह देगा यह यह तो इसी बात पर भरोसा रखकर के मास्टर महाशय आए हैं

धर्म रक्षा के लिए तत्पर श्री रामकृष्ण: जिस उद्देश्य के लिए पैसा दान किया गया है, उसी के लिए खर्च करें

ठाकुर बुलिया दिया छ ए खाने अतिथि शालार अनो तुम रोज खावा बाबा उचित नो है। ठाकुर ने कहा है यहां पे अतिथिशाला में अन्न तुमको रोज खाना उचित नहीं है। साधु कांगाले जन और रहे छे साधु और कंगाली लोगों के लिए भिखारी लोगों के लिए वो है तुम तो रब जनो एक्ट लोक आबे तुम तुम्हारे लिए खाना पकाने के लिए किसी को साथ में ले आना ताई शंगे एक्ट लोक ऐसे छ तो इसीलिए साथ में किसी को खाना पकाने वाले को लेके आए हैं देखिए यह जो पैसेज है बड़ा ही इंपॉर्टेंट है ठाकुर किस प्रयोजन के लिए पैसा खर्च किया गया है। उस प्रयोजन के लिए ही पैसा व्यय हो। इन्वेस्ट किया गया है। उसी प्रयोजन में वह पैसा खर्च हो। यह बड़े ही पक्के थे। वो एक बार ऐसा हुआ कि वहां पर काली मंदिर में से तो प्रतिदिन ठाकुर के लिए प्रसाद आता था। एक दिन ठाकुर के लिए प्रसाद नहीं आया। तो ठाकुर तो थोड़े चिंता में मग्न हो गए। अधीर होकर के इधरउधर टहल रहे हैं। बोल रहे हैं कि अरे प्रसाद का आने का समय हो गया मंदिर से। अभी तक प्रसाद क्यों नहीं आया? तो उस समय वह योगेंद्र महाराज थे। वह सावर्ण चौधरी के पुत्र यानी कि एक तो जाति का एक बड़ा अभिमान था। तो और यह जो जो पंडित वगैरह जो ये काली मंदिर के पुजारी या तो भंडारी खजानची इन लोगों को तो मनुष्य के रूप में देखते ही नहीं थे। इतना बड़ा उनका घमंड था। तो ठाकुर जब बोल रहे हैं कि अरे प्रसाद नहीं आया। मैं एक काम करता हूं। ऑफिस में जा करके मैं पूछता हूं कि क्यों प्रसाद नहीं आया। ऐसा बोलकर के ऑफिस की ओर जा रहे हैं। तो योगानंद जी महाराज उस समय के योगेन महाराज वह सोचते हैं आखिर में तो वही चाल कोला बाधा बामुन इसीलिए प्रसाद के लिए इतनी चिंता कर रहे हैं। अर्थात कि यह चाल कोला ये चावल और केला यानी फल यह यदि कोई ब्राह्मण कोई पंडित किसी के घर में पूजा करने को जाते हैं तो सामने उनको यह सीधा प्राप्त होता है। यानी कि खाने की सामग्री प्राप्त होती है। तो ज्यादातर ज्यादातर तो नहीं कोई कोई-कोई लोग होते हैं इस तरह के कि पूजा करने को तो जाएंगे किंतु नजर इसी चीज के ऊपर में है कि सामने बख्शीश ये प्रणामी हमको कितनी मिलती है दक्षिणा कितनी मिलती है तो दक्षिणा के ऊपर में ही नजर ठाकुर कहते हैं ना कि वह पंडित है विद्वान है भले ही चाहे कितना ही ऊपर हवा में उड़े किंतु गिद्ध की तरह जमीन पर कहां कूड़ा कचरा पड़ा हुआ है उसी के ऊपर में उसकी नजर तो ये योगेंद्र महाराज सोच रहे हैं कि ठाकुर भले ही चाहे चाहे इतने सिद्ध हुए हो भले ही चाहे मां काली का दर्शन हुआ हो निर्विकल्प समाधि प्राप्त की हो तंत्र वेदांत योग वैष्णव भाव साधना सभी में सिद्ध हो गए हो क्रिश्चियनिटी इस्लाम सभी में किंतु फिर भी आखिर में तो वह जो दक्षिणा लेकर के पूजा करने वाले ब्राह्मण ही है कि वह इतना ऊपर में उठकर के भी नजर है उसी के सामने कि आज का प्रसाद क्यों नहीं आया ऐसा ऐसा सोच रहे हैं उसके बाद में जब ठाकुर वापस आए उनके चेहरे का भाव देखा था तो जैसे उस समय पकड़ लिया था वो आधी रात को ठाकुर वो झाऊला गए हैं तो योगेंद्र महाराज को लगा कि अरे ये ठाकुर निश्चय ही वो मां के कमरे में गए हैं नबत में तो वो नौबत के सामने खड़े रह के कैसा एक टेंशन में आ गए थे कि यदि ठाकुर रात को अपनी पत्नी के पास में आते हैं सोने के लिए और दिन में कामिनी कांचन त्याग का उपदेश देते हैं जो ठाकुर पे कैसे भरोसा कर सकते हैं ऐसा वो सोच रहे हैं चेहरे पे जो भाव है ठाकुर जैसे ही झाऊला से वापस आए उनके चेहरे का भाव देख लिया| और कहा कि बेश बेश साधु के दिन देखवी साधु के रातें देखवी तब साधु ऊपर भरोसा करवी अच्छा अच्छा साधु को दिन में देखो साधु को रात में देखो तब साधु पर विश्वास करो तो यहां पे भी ठाकुर जब वापस आए योगेंद्र महाराज के चेहरे का जो भाव देखा साथ-साथ में उन्होंने कह दिया कि देखो कि रास मणि ने इस कालीवाड़ी में जो पैसा इन्वेस्ट किया है पैसा रखा है इसका उद्देश्य यह है कि साधु और कंगाली लोगों को यहां यहां पे भरपेट प्रसाद आने को मिले और यदि इन लोगों को ना मिले तो फिर यह वाले लोग क्या करेंगे कि यह जो काली मंदिर के जो कुछ-कुछ जो वहां के वो जो ऑफिसर्स थे वो जो वहां पर काम करने वाले कर्मचारी वे लोग यही प्रसाद अपने घर में ले जाएंगे। किसी किसी की तो वो अधार्मिक वो प्रवृत्तियां है। दूसरी स्त्रियों के साथ में संबंध है तो उनके जा उनके भीतर में जाकर के बांट देंगे। यहां पे अर्थात कि ठाकुर कहते हैं मेरे पास में जो प्रसाद आता है एटलीस्ट वो तो मैं भक्तों को खिलाता हूं। यानी कि रास मणि ने जो पैसा यहां पे दिया है उसका सदुपयोग कहीं पर तो होता है। बोलकर के मैं प्रसाद के लिए इतना अधीर हूं। तो या योगिन महाराज देख सोचते हैं कि देखिए ठाकुर की यह जो एकाउंटिंग सेंस है कि स्वामी जी ने रामकृष्ण संघ की स्थापना करके जो नियमावली बनाई है उसमें एक नियम स्पष्ट है माछेर कोड़ी शाके जाबे ना शाके कोड़ी माछे जावेना अर्थात कि जो पैसा भक्तों ने हमको दिया है वो यदि ऐसा कह के दिया हो कि यह पैसा आपको सब्जी खरीदने के लिए दिया तो उस पैसे से आपको मछली नहीं खरीदनी है सब्जी ही खरीदनी है। और जो पैसा भक्तों ने यह कह के दिया कि महाराज जी इस पैसे में से आप मछली खरीदिएगा। ठाकुर को भोग दीजिएगा। तो मछली खरीदने वाले पैसों को हम लोग उस पैसों से सब्जी नहीं खरीदेंगे। जिस पर्पस के लिए पैसा आया है उसी पर्पस में वह पैसा खर्च होना चाहिए। यह जो पक्का अकाउंटिंग सेंस था स्वामी जी का तो यह ठाकुर से चला आ रहा है कि जो प्रसाद की व्यवस्था की गई है, खाने की व्यवस्था की गई है वो साधु और कंगालियों के लिए की गई है। यदि भक्तों को प्रसाद दे सकते हैं। उसमें कोई यह नहीं है। किंतु मास्टर महाशय तो रहने वाले हैं ना। वह तो रीति माने वह तो माने दिन तीन चार बार तो एटलीस्ट भोजन करेंगे, आहार करेंगे। तो, यह तो प्रसाद से तो होगा नहीं। उनको तो सब्सटेंशियल कुछ चाहिए। तो यह सब यदि करना है तो काली मंदिर के जो प्रसाद से काली मंदिर के खर्च से नहीं होना चाहिए। उनको अपने लिए अलग से व्यवस्था करनी पड़ेगी। तो यह अपने ऑर्डर में यह जो पूरा पक्का एक सेंस ऑफ अ एकाउंटिंग है वो ठाकुर के समय से चला आ रहा है। ताई शंगे एक्ट लोग ऐसे छे इसीलिए मास्टर महाशय अपने साथ में उनके एक खाना पकाने वाले को लेके आए हैं। तहार कोथाई राइबे वह खाना कहां पे पकाएगा जो व्यक्ति साथ में आया है तनी दूध खबे ठाकुर रामलाल के गोयाला देर काछे बंदोबस्त कोरिया दीते बोलीलेन मास्टर महाशय दूध खाएंगे तो ठाकुर ने रामलाल को कहा कि जो गोपाल है जो लोग गाय की रक्षा करते हैं उनके पास में बंदोबस्त कर देने को कहा उनके पास में व्यवस्था कर देने को कहा ठीक है इसके बाद का जो पॉइंट पॉइंट है। अभी थोड़ा लंबा है। अभी हम नेक्स्ट क्लास में देखेंगे। आज यही तक ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु।

प्रश्न: साधन चतुष्टय एक अच्छा आधार है, जिसे आप व्याकुलता और धैर्य के बीच संतुलन कहते हैं.

यह है ना देखिए यह सर्कल है इस अर्थ में कि यदि मुमुक्षत्व नहीं रहेगा तो आप विवेक वैराग्य ले मतलब उस डायरेक्शन में अपना मन ही क्यों जाएगा जो जो आदमी संसार में ही पड़ा है जिसके भीतर में ईश्वर प्राप्ति या आत्मदर्शन या निर्वाण के लिए यदि कोई आकांक्षा ही नहीं है वो इस मार्ग पे आगे ही क्यों बढ़ेगा यानी कि बिगिनिंग इज ऑलवेज वि मुमुक्षत्व देन अदर थिंग्स कम बट दिस इज़ साइकिल आज 1% % मुमुक्षुत्व है तो 1% हमने थोड़ा बहुत जो फाउंडेशन डालना है जैसे आपने कहा कि विवेक वैराग्य फिर यह समाधि षडक संपत्ति ये फिर चित्त प्रसाद है यम नियम है वो सब का फाउंडेशन हमने डालना शुरू किया फिर फाउंडेशन की वजह से श्रद्ध ये जो मुमुक्षत्व है 2% हुआ तो साथ में वो भी टू पर यानी कि इट्स अ फीडबैक बोथ फीड्स अपॉन ईच अदर ऐसा कभी नहीं होगा कि पहले मैं फाउंडेशन डाल दूं फिर वो मुमुक्षत्व आएगा या दैट्स अ बिट मतलब

प्रश्न: धैर्य सहित मुमुक्षुत्व और धैर्य रहित मुमुक्षुत्व में क्या अंतर है?

अनरियलिस्टिक। देखिए वैराग्य इज मस्ट उसमें कोई प्रश्न ही नहीं है। जैसे कि यह भक्त की बात कही उसके मन में कोई कामना अभी जैसे वो मां के मां को सीधा कहता है कि मां तुमने अच्छा खाना नहीं खिलाया। मन के भीतर में वैराग्य होता तो वह कहता कि मां तुम्हारे लिए मैं कुछ अच्छी चीजें ले आऊंगा। देखा कि तुम्हारे संसार में अभाव है तो तुम बच्चों को नहीं खिला पा रही हो। मैं तुमको लाकर के कुछ दूंगा। तो वह त्याग और वैराग्य की भाव नहीं है। जब वो केदार बाबू की मां ने कहा कि अच्छा तुम अच्छी चीजें ला के देना मां तुमको अच्छा खाना पका के देंगे तो वो देगी तो वो वो सुनता भी नहीं है उसके सामने कान भी नहीं डालता है। यानी कि भीतर में वासना है और फिर यह सब उछल म उछल कूद कर रहा है। सो त्याग एंड मुमुक्षुत्व यदि दोनों साथ में आएगा तो दैट विल द गाड़ी सही पटरे पे चलेगी। किंतु देयर इज नो सच ए शोर फायर फार्मूला कि पहले वैराग्य आ जाए फिर हम मुमुक्षुक्षत्व के रास्ते पर जाए। बोथ हैज़ टू फीड अपॉन ईच अदर। अब ठाकुर का वैराग ठाकुर का मुमुक्षुत्व अति तीव्र था तो ठाकुर का वैराग्य भी अति तीव्र था। सो बोथ कैन बैलेंस ईच अदर। हमारा त्याग इतना स्ट्रांग नहीं है तो हम यदि एक्सेसिव मुमुक्षुत्व में चले जाएंगे। एक्सेसिवली ईश्वर के लिए यह करना शुरू करेंगे तो पागलपन में चले जाएंगे। तो त्याग और मुमुक्षत्व ये दोनों जैसे मेरे पास में 1% त्याग है तो 1% मुमुक्षत्व मेरे पास में होना चाहिए। 10% है तो 10% होना चाहिए। 100% त्याग है तो 100% होना चाहिए। सो बोथ शुड फीड अप ऑन ईच अदर। देखिए मेरा एक शॉर्टकट मैं बताता हूं

प्रश्न: मुझे लगता है कि स्वामीजी के चार योगों का समन्वय आपके व्याकुलता और धैर्य के बीच संतुलन के उत्तर से मेल खाता है।

आपको कि रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य क्योंकि देखिए कर्म ज्ञान भक्ति ध्यान ये सब करने का समय प्रयोजन सामर्थ्य अपॉर्चुनिटी अभी कितने लोगों के पास में है तो ये ठाकुरमा स्वामी जी का साहित्य यदि हम नियमित रूप से पाठ करें म यह जन्म हम बहुत दूर तक चले जाएंगे ये मेरा पर्सनल विश्वास है इवन देखिए कि हम लोग साधु लोग दूसरे की नहीं मैं अपनी बात कर रहा हूं मैं कोई ना ही राजयोग का कोई ऐसा करता हूं ना ही कर्म योग कुछ ऐसा बड़ा कर लेता हूं ऑफिस में जाकर बैठते हैं जो काम है वो करते हैं अभी इसको आप कर्म योग गिने कि जो भी गिने राजयोग तो भूल ही गए हैं। ज्ञान योग तो भूल ही जाइए। वह सब बड़ी ऊपर की बातें हैं। तो फिर हमारी साधना क्या है? गुरु महाराज ने प्रेसिडेंट महाराज से जो मंत्र मिला है वो 10-15 मिनट 20-25 मिनट वो कर दिया और फिर ठाकुर की किताबें पढ़ ली। मेरे ख्याल से यदि इतना भी करें तो बाकी का सेटल होता जाएगा अपने से। धीरे-धीरे करके ठाकुर सब ओपोरर्चुनिटीज खड़ी कर देंगे।

प्रश्न: ठाकुर का कथामृत पढ़ना रुई के गट्ठे में चिंगारी फेंकने जैसा है। एक चिंगारी पूरी रुई को जला देगी।

ये जो सेवक हृदय यह पैसेज में मास्टर महाशय कितनी सारी सुंदर बातें करते हैं कि देखिए कि संसार किया है सब कुछ है। अब हम लोग भी तो यह तो एक आश्रम एक उस तरह का संसार ही है। हम ही लोग भी तो यह सब दिन रात यही सब सोचते हैं। अकाउंट है, ये मेंटेनेंस है, यह इंटरपर्सनल रिलेशनशिप है वगैरह-वगैरह। किंतु देखिए ठाकुर ने भरोसा दिया है कि ईश्वर दर्शन होगा। थोड़ा सा कुछ करने से आगे का रास्ता दिखाने वाले गुरु हमको अवश्य मिलेंगे। इवेंचुअली ईश्वर दर्शन अवश्य होगा। तो थोड़ा सा कुछ कर लेना है। बिल्कुल खाली नहीं छोड़ना है। कुछ नहीं किया फिर ठाकुर को कोसने लगे कि मैंने तो तुमने तो भरोसा दिया था कुछ हुआ नहीं। ठाकुर ने तो प्री कंडीशन लगा दिया है कि एकटा किु कोरते होवे। थोड़ा सा कुछ करना होगा। तो वो थोड़ा सा कुछ कर लेना है। ठाकुर की किताबों को पढ़ के। यानी ठाकुर की बात भी रख ली और ठाकुर को फिर जाकर के बोल भी सकते हैं कि किताबें पढ़ी क्यों नहीं कुछ हो रहा है? आपने जितनी शक्ति दी है मैंने उतना कर लिया। अभी आपके हाथ में है। शक्ति को बढ़ाइए या तो सीधा दर्शन दे दीजिए। व्हाटएवर करना है आपके हाथ में है। मैं तो कहता हूं अभी का अभी सब कर दीजिए। शक्ति कितना बढ़ाते रहेंगे। अभी कितने जन्म और आप चक्कर खिलाएंगे। किंतु रंगनाथानंद जी कहते थे कि मुक्ति नहीं चाहिए। ठाकुर के साथ में हर बार आना है तो फिर आप देखिए कि आपका क्या चॉइस है ना मेरा चॉइस अभी मैं सोच रहा हूं आखिर में डिसीजन लेंगे अभी से नहीं लेना है एक बार वार्तालाप तो हो उनके साथ में बात की बात है ना सब कुछ मुफ्त में दे देंगे सामने कुछ नहीं मिलेगा ऐसा थोड़ी ना चलेगा

प्रश्न: हम संसार के दुखों के बारे में कभी गहराई से नहीं सोचते। अगर हम सोचेंगे तो हमें समाधान अवश्य मिलेगा। हमें इस व्यावहारिक आत्म-परीक्षण की आवश्यकता है।

बट नॉट नॉट नेसेसरी के संसार में दुख होंगे तो हम ईश्वर के रास्ते की ओर जाएंगे ही देखिए ठाकुर ने खुद कहा है जो ऊंट है वो कैमल वो जो कांटे कांटे वाला घास खा रहा है तो खा रहा है। मुंह में से वो खून बह रहा है किंतु फिर भी वह खाने की लालसा नहीं छोड़ता। तो संसार में कष्ट आने से नॉट नेसेसरी कि हम ईश्वर के पास आएंगे और दूसरा एक डेंजर क्या है कि कुछ-कुछ लोगों को मैंने देखा कि वो अंधश्रद्धा में चले जाते हैं। वो कोई विधि कर दो, कोई तांत्रिक को मिल दो। आप दक्षिणेश्वर आप दर्शन करने के लिए जाइए। वो जितने भी तांत्रिक हैं कोलकाता के सबका बड़ा-बड़ा होर्डिंग रखा है वहां पे। आपके अपने शत्रुओं पे आपको उनको यह करना है तो हमारे पास में आइए। इतने रुपए में आपके शत्रुओं का हम विनाश कर देंगे। आपको यह शादी नहीं हो रही। यह आपके घर में बीमारी है। सबका इलाज है। अरे भाई सबका इलाज आपके पास में तो आप खुद का इलाज कीजिए ना। तो वो अंधश्रद्धा माने धर्म के नाम पर अंधश्रद्धा वो इतना अभी परवेसिव हो गया है तो एक शुद्ध सात्विक भक्ति उसमें आना बिना किसी अपेक्षा किए दैट इज वो सुकृति के बिना नहीं होगा क्योंकि यदि ईश्वर के रास्ते पर सही में आगे बढ़ना है तो भले ही चाहे जैसे मास्टर महाशय संसार के दुख से प्रेरित होकर के तो आए हैं कि तू ठाकुर शुद्ध निर्मल भक्ति हो गई सो वो म एक जिसको कहते हैं कि मतलब एक एक ऐसी अवस्था कि मैंने त्याग भी है मतलब संसार के दुख भी देखे हैं साथ में ही ईश्वर के ऊपर में भक्ति वि इज वेरी डिफिकल्ट टू एटेन ना देखिए इवन इवन ठाकुर और स्वामी जी

प्रश्न: हममें से अधिकतर लोग जीवन में संकट आने पर अध्यात्म की ओर आते हैं।

दोनों जीवन के जो मेजर टर्निंग पॉइंट आए हैं दोनों के केस में सेम कि पिताजी के मृत्यु से भले ही चाहे स्वामी जी ठाकुर के पास में आते हो किंतु मां काली को स्वीकार किया उसके पीछे में जो मेजर जो एक यह था स्टिमुलेंट दैट इज फादर्स डेथ ठाकुर का खुद खुद का लीला प्रसंग में स्पष्ट रूप से लिखा है जब से खुदराम का मृत्यु हुआ बालक गदाधर का मन अंतर्मुख होने लगा फिर वह भूतिर खाल वगैरह जो श्मशान वगैरह वहां जाकर के लंबे समय तक साधना करता था यानी कि संसार का कष्ट तो सबको भुगतना है वह ठाकुर होने कि स्वामी जी हो हम लोगों की तो छोड़ ही दीजिए। तो टर्निंग पॉइंट तो तभी आता है। देखिए बचपन में हम सभी लोग मंदिर में जाते हैं। ऐसा नहीं है मां पिताजी ले जाते हैं। तो वो तो हो गया है। किंतु फिर भीतर में से एक आना दैट रिक्वायर्स सम सॉर्ट ऑफ संसार में किसी ने धोखा दिया है। धक्का मारा है तभी वो टर्निंग पॉइंट आता है। सुकृति होनी चाहिए। सुकृति होनी

प्रश्न: सब कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि हम संकट का सामना कैसे करते हैं

चाहिए। माने एक माने अच्छे कर्म होने चाहिए। अच्छा संस्कार होना चाहिए क्योंकि देखिए स्वामी जी के पास में ऑप्शन थे युगनायक पढ़ेंगे गंभीरानंद जी का स्पष्ट लिखा है स्वामी जी के पास में ऑप्शन थे उनके कुछ मित्र थे हुआ ऐसा जैसे ही स्वामी जी के पिताजी का मृत्यु हुआ तो भवनाथ जो कि स्वामी जी का इतना अच्छा मित्र था वो आकर के ठाकुर के पास में कह रहा है कि देखिए महाशय हम लोग तो इतने दुखी हो गए नरन अभी वह बुरे लोगों की संगत में पड़ा है तो ठाकुर ने उसको डांट दिया कि खबरदार मेरे सामने इस तरह की कोई बातें करना तो देखिए कि इस तरह के मित्र उसकी निंदा कर रहे हैं। जबकि वह मित्र स्वामी जी स्वयं अपने मुंह से बोलते हैं शरद महाराज लिखते हैं स्वामी जी कहते हैं कि ऐसे मित्र जो कि बुरे संग में फंस गए थे वही लोग थे मेरे प्रति सबसे ज्यादा सिंपथी दिखाने वाले क्योंकि उन्होंने संसार की मार खाई है उनको पता है कि पिताजी का मृत्यु होता है। घर में खाने को कुछ नहीं है तो लड़के की क्या हालत होगी। वे लोगों ने आकर के मेरे साथ में सहानुभूति जताई और वही लोग मेरे सच्चे संगीत है तो वह तो ऑप्शन था। फिर वे लोगों के साथ में स्वामी जी वो एक वहां पर जाते भी हैं। एक स्त्री के साथ में भी वार्तालाप करते हैं जिसका चरित्र अच्छा नहीं था। किंतु स्वामी जी कहते हैं उसके प्रति मेरा एक तरह से क्या कहेंगे कि करुणा का ही एक उदय हुआ। और वह लड़की भी स्वामी जी से एकदम वो प्रभावित हो गई। उनकी श्रद्धा करने लगी। तो वहां तक स्वामी जी चले गए थे। किंतु जो सुकृति है या तो वो फिर कहेंगे कि शुभ उनके संस्कार है वो आखिर में खींच के ठाकुर के पास में ले ही

प्रश्न: जैसा कि ठाकुर ने स्वामीजी से कहा, हम कब तक प्रश्न करते रहेंगे? एक समय ऐसा आएगा जब हमें विश्वास करना ही होगा।

आए। मास्टर महाशय एग्जैक्टली वही बात कहते हैं। करते हैं कहते हैं कि देखिए वह जो जर्मन फिलॉसोफर शोपेनोवर वगैरह वे लोग विचार करते-करते कि यह जगत में क्या रियलिटी है बोलकर के आखिर में आत्महत्या करने तक की बारी उनकी आ गई थी। तो इस तरह से मैं सब समय संदेह संशय ही रखता रहूंगा अपने जीवन में तो मुझे भी सुसाइड करना पड़ेगा। बेटर है कि ठाकुर के ऊपर में कहीं से तो विश्वास का प्रारंभ करना है। ठाकुर के ऊपर में विश्वास करके मैं फिर इस आध्यात्मिक जीवन का प्रारंभ करता हूं। किंतु एक बात है कि देखिए कि साधु का स्वांग रचकर के 10 लोग आकर के खड़े होते हैं। तो उसमें सभी लोग तो साधु होते नहीं है। तो असली साधु कौन और असाधु कौन? वह समझने के लिए विचार करने की आवश्यकता है। स्वामी जी ने ठाकुर का जिस तरह से परीक्षा किया था जीवन भर परीक्षा करते रहे तो वो तो हमको देखिए अगेन अपनी अपने अपने ऊपर है। कोई-कोई लोग स्वामी जी की तरह निवेदिता की तरह कैपेसिटी इतनी है कि वे लोग परीक्षा करेंगे और कोई-कोई लोग हैं जैसे राजा महाराज है, लाटू महाराज है, खोखा महाराज है, अद्वैतानंद जी है कि आ करके ही ठाकुर के ऊपर में इतनी श्रद्धा कि फिर वो उन्होंने कभी इस तरह से परीक्षा नहीं की। सो अपना रास्ता अपने को खोजना है कि इस स्पेक्ट्रम में कहां पर आते हैं। लाटू महाराज की तरह संपूर्ण श्रद्धा भक्ति फ्रॉम द डे वन ऑन वंस एंड और स्पेक्ट्रम का एक एंड और दूसरा एक्सट्रीम एंड आ गया स्वामी जी कि जीवन के आखिरी घड़ी तक परीक्षा करते रहे। सो वेयर वी आर ऑन दिस स्पेक्ट्रम वो हमको ठीक करना है। इतना बात सही है किंतु सिर्फ दुख आने

प्रश्न: जैसा कि किसी ने कहा है, दुख छिपे हुए आशीर्वाद के समान हैं

से चलेगा नहीं साथ में वो शुभ संस्कार भी चाहिए। अदरवाइज वो देखिए क्रिमिनल नहीं सी सुसाइड नहीं क्रिमिनल अब जैसे मैंने कहा ना मैंने वो दाऊद इब्राहिम का वो बायोग्राफी पढ़ा था डोंगरी से दुबई तक वो फ्रॉम डोंगरी टू दुबई दुबई उसका बायो मतलब उसकी बायोग्राफी का नाम है हमने अच्छे एक ऑथर ने लिखा है तो देखा उसका बायोग्राफी पढ़ करके कि एक हवलदार के घर में जन्म लिया है किंतु फिर देखिए कष्ट तो आने हैं किंतु उसका जो संस्कार था इतने बुरे संस्कार थे कि वो क्राइम में चला गया राइट अपने देश के हानि करने के लिए उसने यह सब किया तो फिर सिर्फ दुख आने से चलेगा नहीं वो आप क्रिमिनल भी हो सकते हैं गुंडे डाकू बदमाश ये भी हो सकते हैं देखिए ना ये बड़े-बड़े जो ऑफिसर होते हैं इतना सब कुछ भगवान ने दिया है फिर भी वह करप्शन करते हैं। गवर्नमेंट का पैसा अपनी पॉकेट में डालते हैं। जो जो कल्याण के लिए सब योजना चालू की गई है वह अपने पॉकेट में डालते हैं। तो फिर आपने जीवन देखकर के करप्शन करना ही सीखा तो फिर क्या किया? सो वह संस्कार एक बड़ा इंपॉर्टेंट है। और शुभ संस्कार होने से जैसे देखिए स्वामी जी ने आना तो शुरू कर दिया था ठाकुर के पास। जैसे आपने कहा कि सब कुछ सुविधा थी घर में तो ठाकुर के पास आना तो शुरू कर ही दिए थे। सो नॉट नेसेसरी के दुख के मारे ही आप यहां पे आए। शुरुआत तो कर सकते हैं संस्कार के माध्यम से। हां ऐसा परफेक्ट परफेक्ट।

प्रश्न: क्या हम कह सकते हैं कि संस्कार बीज हैं और दुःख उपजाऊ भूमि है?

परफेक्ट

प्रश्न: हम सभी में संस्कार हैं, अब हमें दुख के लिए प्रार्थना करनी चाहिए!

ये जो नलिनी और मां को ये सब एक दिन डिबेट कर रहा है बात कर रहा है कि ईश्वर के पास में क्या मांगना चाहिए तो मां को पूछते हैं कि मां ईश्वर के पास में क्या मांगना चाहिए तो मां ने पूछा कि अच्छा तुम बोलो तो किसी ने कहा भक्ति मांगनी चाहिए किसी ने बोला वैराग्य मांगना चाहिए तो मां कहती है देखिए एक कोथाई बोल ले निर्वासना चाहते हो यदि एक बात में कहते एक बात मैं कहूं तो निर्वासना मांगनी चाहिए। तो ठाकुर को यही प्रार्थना कि जो भी देना हो तो वह निर्वासना देना और बाकी सब अपने पास में रखना। ये निर्वासना आ गई तो हम अपना काम अपने से कर लेंगे।