Transcript
ओम स्थापक यच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः श्री राम कृष्ण देव का कथामृत हम लोग पढ़ रहे थे जो चैप्टर केशव सेन के साथ में नौका विहार कतो कथन और आनंद इस चैप्टर का अंत आ चुका है ठाकुर केशव के साथ में नौका में विचरण करने के लिए गए थे तो वहां से वापस आ गए हैं कलकत्ता और कल जो डिस्कशन हमारा हुआ था नवम परिच्छेद उसमें वही जो आखिरी फिलोसॉफिकल डिस्कशन था वह कल हो गया इस चैप्टर का जिसमें कि एक ब्रह्म भक्त ठाकुर को प्रश्न करता है कि यदि हम संसार में रहते हैं तो हमारे लिए क्या विषय कर्म करना उचित है कि नहीं है क्योंकि सबसे पहले तो ठाकुर कहते हैं कि जगत का कल्याण करने वाले आखिर में तुम हो कौन और जगत क्या इतना सा है क्यों क्योंकि यह केशव सेन ने ब्रह्म समाज की जो स्थापना की केशव सेन ने नहीं की थी हालांकि केशव सेन उसका लीडर था स्थापक थे आई थिंक देवेंद्रनाथ टैगोर वगैरह तो अभी केशव उसका जो लीडर था और जो टाउन हॉल वगैरह पे जगह पर जाकर के वह जो लेक्चर वगैरह दिया करता था उसमें इस एक्चुअली उस समय की जो रिफॉर्म सोसाइटीज थी 18th सेंचुरी की उन सबका यही एक उद्देश्य था कि हां विदेशी आक्रमण भारत पर आ गए हैं आक्रमणकारी यह ब्रिटिश राज जो भारत पर चल रहा है तो इसका अर्थ यही है कि मैंने भारत गुलाम क्यों हुआ अल्टीमेटली क्योंकि हमारी हिंदू परंपरा हमारी हिंदू संस्कृति हमारी हिंदू सभ्यता हमारे हिंदू शास्त्र हमारे हिंदू ऋषि मुनि इन सब में कहीं ना कहीं एक फेटल फ्लो रह गया है कहीं ना कहीं एक इस तरह की एक कहेंगे कि वीकनेस रह गई है जिसकी वजह से ब्रिटिश लोग हम पर राज कर रहे हैं तो आइए भारत का उत्थान करते हैं और भारत का उत्थान कैसे करेंगे तो यह ब्रिटिश लोगों के जो बेस्ट एलिमेंट है माने जो सब कुछ वहां से हमको कॉपी पेस्ट करके ले लेना है विदाउट एनी रिगार्ड टू अवर इंडिजिनियस कल्चर और हेरिटेज हमारी जो भारतीय संस्कृति और हमारा भारतीय वारसा है उसकी चिंता किए बिना ब्रिटेन में जो कुछ भी है सब आंख बंद करके उठा लो तो यह क्रिश्चियन धर्म है जिसमें कि कहते तो हैं कि हम लोग मूर्ति पूजा नहीं चाहते तो भारत में जो माहाकाली की मूर्ति की ठाकुर पूजा कर रहे थे तो वह पौत निक है माने कि मूर्ति पूजक है मूर्ति पूजा बंद करो वो एलिमेंट वहां से ले लिया फिर यह सोशल रिफॉर्म एलिमेंट कि कन्या की मिनिमम एजज ऑफ कंसेंट होनी चाहिए मिनिमम एज ऑफ मैरिज होनी चाहिए विधवा का पुनः विवाह किया जाना चाहिए वगैरह वगैरह जो भी ब्रिटेन में उस समय चल रहा था वे लोग सब लेने का प्रयास कर रहे थे तो इसलिए ठाकुर उनको कहते हैं कि क्या जगत क्या इतना सा है कि तुम उसका कल्याण करोगे दूसरा कि ज तुम होते कौन हो तो अभी देखिए कि यह प्रश्न हो सकता है कि स्वामी विवेकानंद ने भी यही एक सपना देखा था कि भारत का नवनिर्माण करें और ठाकुर ने ही उनको आशीर्वाद दिया था ठाकुर ने ही अपनी शक्ति स्वामी जी को दी थी तो स्वामी विवेकानंद और केशव सेन इन दोनों में ऐसा तो कौन सा डिफरेंस है कि स्वामी जी सक्सेसफुल हुए और केशव सेन सक्सेसफुल नहीं हुआ और हालांकि भले ही चाहे ठाकुर ने नरेण को कहा हो जब नरेण ने काशीपुर में नरेण भविष्य के स्वामी विवेकानंद ठाकुर को कैंसर हो गया था वो काशीपुर में थे उस समय नर ने भले ये वार्तालाप हुआ है इन दोनों के बीच में कि नरेण कहता है कि मैं तो चाहता हूं सब समय समाधि में मग्न होकर के रहूं समाधि में बुंद होकर के रहू बुंद हो कर के रहना यानी मग्न होकर रहना ये बंगोली शब्द है तो अभी नरन ऐसा क्यों कहता है क्योंकि ठाकुर का जो सबसे इसी जो नाइंथ परिच्छेद जो हमने कल पाठ किया ठाकुर स्पष्ट रूप से कहते हैं कि तुम लोग कालीबाड़ी गए हो काली घाट गए हो कलकत्ता का फेमस काली मंदिर काली घाट तो वहां पर तुम लोग गए हो तो तुम्हारा सबसे प्रथम कर्तव्य क्या है बाहर में जो भिक्षुक बैठे हैं उनको दक्षिणा देना दान देना कि कैसे भी करके धक्का मुखी करके भी हो तो पहले मां काली का दर्शन कर लेना और उसके बाद में बाहर आकर के यदि इच्छा है तो भिक्षु को दक्षिणा दीजिए नहीं इच्छा है तो मत दीजिए तो यह ठाकुर के ही उपदेश यही उपदेश ठाकुर ने नरेण और केशव सेन दोनों को मैंने जितने भी ठाकुर के सर्कल में थे अंतरंग बहिरंग उन सबको ईश्वर प्राप्ति ही जीवन का सर्वश्रेष्ठ उद्देश्य है यह बात ठाकुर ने कही थी बस वही है कि अधिकारी भेद के अनुसार जिसकी जितनी क्षमता है साधन भजन की तो केशव सेन गृहस्थ था उसके लिए भक्ति मार्ग जैसे कल हमने देखा कि ठाकुर ने कहा कि फिर यही केशव सेन यहां से ही मां का नाम संकीर्तन लेकर के गया अर्थात कि केशव ठाकुर के पास में आता था रेगुलरली आता था बड़ा ही श्रद्धा भक्ति करता था ठाकुर को और ठाकुर जिस तरह से भाव में मत्त होकर के नृत्य कीर्तन करते थे तो वही ठाकुर के भावों को लेकर के ब्राह्मण समाज के जो कवि थे उन्होंने वही ठाकुर के भाव को लेकर के गीत बांधने की शरुआत की थी और उन्हीं गीतों के ऊपर में ठाकुर भी नृत्य कीर्तन करते थे और ब्रह्म समाजी भी वो नृत्य कीर्तन करते थे तो यह सब कुछ तो केशव ने वहां से सीखा किंतु यह नृत्य कीर्तन भाव भक्ति यह सबके लिए केशव ठीक है क्योंकि वह गृहस्थ था जबकि नरेण भविष्य के स्वामी विवेकानंद उनके भीतर में ज्ञान और त्याग त्याग भक्ति और वैराग्य तीनों की ज्वाला इतनी प्रबल थी कि नरेण अद्वैत वेदांत का अधिकारी था तो ठाकुर ने उसको अद्वैत वेदांत सिखाया तो चाहे नरेद हो न कि चाहे केशव सेन हो अल्टीमेटली तो दोनों को वही कहा गया है एक ही उपदेश दिया गया है कि आत्मज्ञान या तो ईश्वर दर्शन सबसे पहले प्राप्त करो बाकी सब कुछ बाद में तो हालांकि वो वार्तालाप है काशीपुर में जब कि ठाकुर नरेण को कहते हैं जैसे हमने डिस्कस किया कि नरेण ठाकुर को कहता है कि मैं चाहता हूं कि मैं समाधि में बुंद होकर के रहूं सब समय बीच-बीच में थोड़ा सा आंखें खोल कर के आहार वगैरह जो कोई शारीरिक कर्म करना है शरीर टिकाने के लिए वह कर करता रहूंगा तो ठाकुर कहते हैं तुम कैसी हीन बुद्धि की बातें करते हो तुम्हारे मैंने तो सोचा था तुम एक बड़े वटवृक्ष बनोगे जिसकी शीतल छाया में कितने ही पथिक आश्रय ग्रहण करेंगे सांत्वना प्राप्त करेंगे तो अभी यहां पर ठाकुर स्पष्ट रूप से कहते हैं कि समाधि के बाद की भी एक उच्च अवस्था है ठाकुर यह नहीं कहते कि तुम समाधि को स्किप कर दो या तो फिर ईश्वर ज्ञान ईश्वर प्राप्ति को स्किप करके उसको बायपास करके सीधे तुम लोक कल्याण लोक सेवा या तो लोगों के भीतर में ईश्वर का दर्शन करो यह बात ठाकुर नहीं कहते ठाकुर कहते हैं समाधि के बाद में भी एक उच्च अवस्था है ठाकुर यह नहीं कहते कि समाधि को छोड़ो उसकी जगह दूसरी उच्च अवस्था है उसके पीछे जाओ तो ये हमको बड़ा स्पष्ट समझना है कि ठाकुर जैसे कि एक रास्ते के ऊपर में खड़े हैं और अंगुली निर्देश करके अपना हाथ दिखा कर के बताते हैं कि वह समिट है पर्वत की जैसे कि वह एवरेस्ट है जैसे कि वह कैलाश शिखर है वहां पर कैलाश मानसरोवर इस रास्ते से जाया जाएगा अभी जिसमें जितनी क्षमता है उतना वह चलेगा वो केशव सेन ब्राह्मण समाजी ठाकुर के अन्य अंतरंग गृहस्थ त्यागी भक्त और फिर आखिर में नरेण मास्टर महाशय बलराम बसु सबको ठाकुर ने यही कहा कि सबसे पहले कैलाश शिखर की यात्रा करो उसके बाद में कैलाश क्रॉस करके यदि तिबेट में जाना है तो जाना सीधा जैसे ब्रह्म समाज का था कि कैलाश नहीं जाएंगे कैलाश को बाईपास करके सीधा तिबेट में प्रवेश ने का प्रयास करेंगे यानी कि ईश्वर को छोड़ कर के समाज सुधारणा का काम सर्वप्रथम करेंगे तो इसके सामने ठाकुर का ऑब्जेक्शन था ठाकुर कहते हैं पहले कैलाश मानसरोवर की यात्रा कर दो फिर तिबेट जाकर के जितना घूमना है घूमना नहीं घूमना है कैलाश पर ही पड़े रहना है तो भी कोई दिक्कत नहीं है कैलाश से भारत में भी वापस आ गए तो भी कोई चिंता नहीं है एक बार हृदय सोने का हो जाए तो फिर वह सोने के हृदय को लेकर के आप जहां पे भी जाए आप सबके लिए आशीर्वाद मय हो जाएगा जिस भूमि पर आप रहते हैं वह भूमि धन्य धन्य हो जाएगी तो यह ठाकुर की सर्वोच्च उपदेश था सर्वोच्च शिक्षा थी कि कैसे भी करके कैलाश मानसरोवर की यात्रा कर लो उसके बाद में तिबेट जाना है तो तिबेट जाओ भारत में वापस आना है तो भारत में वापस आओ कैलाश पर ही पड़े रहना है वहीं पर प्राण त्याग करना है तो वह भी कर लो किंतु कैलाश की यात्रा करो ईश्वर प्राप्ति सर्वप्रथम करो तो अभी देखिए कि नरेण और केशव दोनों के बीच में कंट्रास्ट क्या है कंपैरिजन बड़ी क्लियर है कि दोनों को वही कैलाश मानसरोवर की यात्रा करने को ही ठाकुर ने कहा है दोनों को ठाकुर ने यही कहा है ईश्वर प्राप्ति आत्मज्ञान करलो प्राप्त वही है कि केशव बहुत ज्यादा दूर नहीं जा पाया वहीं पे हरिद्वार से ही वह वापस लौट आया या तो हरिद्वार जाकर के ही अटक गया उसके बाद की जो कठिन यात्रा है हिमालय के एक के बाद एक खाई है पहाड़ है पर्वत है शिखर है उसको सर करके आखिर में कैलाश मानसरोवर पहुंचना वो आखिरी यात्रा नरेद ने की है और जब नरेद ने कैलाश शिखर सर कर लिया उसके बाद में वह तिबेट जाकर के वो वहां पर रहने लगा अर्थात कि नरेण ने ईश्वर प्राप्ति की और जैसे कि ठाकुर ने कहा कि ईश्वर प्राप्ति या निर्विकल्प समाधि के बाद में भी एक उच्चतर मकाम है एक उच्चतर मंजिल है तो वह कौन सी है तो सभी मनुष्य के भीतर में शिव का दर्शन करना तो वह कैलाश से तिबेट की सफर नर ने अकेले की यानी कि हम यदि ऐसा सोचते हैं कि अच्छा यह केशव सेन को ठाकुर ने कहा कि पहले काली मंदिर में जाओ तो फिर वहां पर सबसे पहले मां काली का दर्शन कर लो बाकी जितनी दान दक्षिणा देनी है देना और स्वामी जी जब हमको कहते हैं कि यह दोनों पैरेलल करना चाहिए कि एक रूप से तुम एक काम करो कि सभी के भीतर में ईश्वर का दर्शन करो और फिर साथ-साथ में ही ईश्वर प्राप्ति की ट्रेडिशनल साधना है वह भी करो तो इन दोनों के बीच में कंट्रास्ट क्यों तो नरेद ने जो नया रास्ता हमको बताया है कैलाश मानसरोवर की यात्रा करके बाद में तिबेट जाकर के नरन हमको ऐसा कहता हुआ सा दिखाई देता है कि यह जो तिबेट की यात्रा बाद में जो आपने करनी थी उसको पहले ले लीजिए यानी कि पूरा तिबेट को उठा कर के चाइना में से इंडिया में ले आइए पहले तिबेट के माध्यम से आप कैलाश मानसरोवर जाइए ऐसा कुछ कहता हुआ दिखाई देता है नरेण हमको स्वामी जी ऐसा कुछ कहते हुए दिखाई से देते हैं तो इसके पीछे का राज क्या है एक्चुअली यदि देखिए कि हमने देखा था कल भी कि हमारी ट्रेडिशनल स्पिरिचुअलिटी दो भाग में बटी हुई है एक तो है कि फॉर दोज हु आर हाईली एलिजिबल जो उच्च अधिकारी है उनके लिए एक साधना है और मध्यम और निम्न अधिकारी है उनके लिए एक साधना है उच्च अधिकारियों की साधना को आप देखिए कि किस तरह से वैदिक युग से बुद्धिस्ट युग से लेकर के शंकराचार्य और ठाकुर के युग तक यह ऋषि शि मुनियों की उच्च आध्यात्मिक साधकों की साधना का प्रोग्रेशन हुआ है उपनिषद की एज में देखेंगे तो हमारे पास में उपनिषद है व्हिच इज द हाईएस्ट इन द ह्यूमन स्पिरिचुअल एंडेवोर उसके बाद में बुद्धिज्म को देखिए तो भगवान बुद्ध वही निर्वाण की बात करते हैं जिसको कि उपनिषद में आत्मज्ञान के रूप से चिह्नित किया गया है और फिर यदि शंकराचार्य के युग में आएंगे तो वही उपनिषद का ही आत्मज्ञान जिसको कि शंकराचार्य ने अद्वैत वेदांत के रूप में फॉर्मुले किया और जैसे कि शंकराचार्य को कुछ-कुछ लोग प्रच्छन्न बौद्ध भी कहते हैं क्यों क्योंकि बुद्धिज्म के भी कुछ-कुछ एलिमेंट जो बेस्ट एलिमेंट है वह तथाकथित रूप से शंकराचार्य ने ले लिए हैं अपने कार्य में अभी इसके पीछे की सत्य असत्य होता वह तो तभी पता चलेगी जबकि हम बुद्धिज्म और शंकराचार्य दोनों को बड़ा ही एक्सटेंसिवली स्टडी करें तो खैर और उसके बाद में ठाकुर को देखिए ठाकुर के जीवन में भी इतना इंटेंस उपासना का प्रवाह बहा है वह साधन पर्व में कि सब कुछ छोड़ कर के खाना पीना वस्त्र जनेह सब फेंक कर के ठाकुर ईश्वर की साधना करते थे एक के बाद एक अ पहले तो अपनी मन से ही मां काली को पुकारना शुरू किया फिर मां काली का दर्शन हुआ इसके बाद में जितनी भी ट्रेडिशनल साधन पद्धति है उन सबके आचार्य एक के बाद एक ठाकुर के पास में आते गए भिन्न-भिन्न साधना हों में ठाकुर को दीक्षित करते गए और जिसमें कि ठाकुर सिद्धि प्राप्त करते गए तो यह पूरा यह ऋषि मुनियों का धर्म या तो फिर यह उच्च अधिकारियों की साधना का एक इवोल्यूशन हिस्टोरिकल प्रोग्रेशन हमको दिखता है वैदिक उपनिषद की युग से लेकर के बुद्धिस्ट युग तक उसके बाद में शंकराचार्य और आखिर में श्री राम कृष्ण तक किंतु इसका एक दूसरा भी एस्पेक्ट है वह है एक पॉपुलर रिलीजन अभी यह उपनिषदों का जो धर्म है ज्यादातर वैदिक युग में जो लोग रहते थे उनके लिए वह इतना वोह फिट नहीं था कौन इस तरह से त्याग सन्यास और फिर यह आत्मज्ञान की साधना करेगा तो सामान्य जनता के लिए सबके लिए एकएक ड्यूटी बांध दी गई थी उनको अपना अपना एक धर्म दे दिया गया था यह विद्यार्थी का धर्म है यह शिक्षक का धर्म है यह सैनिक का धर्म है यह राजा का धर्म है यह ब्राह्मण का धर्म है यह किसान का धर्म है यह वाणिज्य व्यापारी जो है उसका धर्म है समाज में जितने भी लोग थे उन सबके लिए एक एक धर्म बांध दिया गया था उस धर्म का निष्ठा पूर्वक अनुष्ठान करने से आखिर में आपको कितने जन्म जन्मांतर के बाद में ईश्वर प्राप्ति होगी तो वह एक पॉपुलर रिलीजन का थ्रेड एक ट्रेस हम ट्रेस कर पाते हैं उपनिषद की एज में ऐसा था बुद्धिस्ट एज में किंतु एक ऐसा गड़बड़ खड़ा हुआ कि जो ऋषि मुनियों का धर्म था जो उच्च अधिकारियों का धर्म था उसी को सबके गले में पहना देने का प्रयास किया गया सबको कहा गया कि भिक्खू भिक्खू निया हो जाइए निर्वाण प्राप्त के लिए प्रयास कीजिए तो इसकी वजह से यह माय प्लान ऑफ कैंपेन प्रवचन में स्वामी जी इसका कुछ ना कुछ एनालिसिस करते हैं हम उसमें पढ़ेंगे तो उसकी वजह से भारतीय समाज की जो अधोगति हुई और फिर उसमें से अभी आज धीरे-धीरे करके हम निकल पा रहे हैं इसके बाद में शंकराचार्य की युग में देखिए कि शंकराचार्य ने भले ही चाहे यह ऋषि मुनियों के धर्म को इवॉल्व किया हो उसको रिफाइन किया हो उस युग की आवश्यकता अनुसार साथ-साथ में ही यह भक्ति मूवमेंट है रामानुजाचार्य मधुवा चार्य इन लोगों की वजह से जो भक्ति मूवमेंट स्टार्ट हुआ बंगाल में जैसे कि चैतन्य महाप्रभु भारत में हर जगह पे यहां गुजरात में नरसिंह मेहता राजस्थान में मीराबाई साउथ इंडिया में सब जगह पर जो भक्ति मूवमेंट एक चला है तो वहां पर फिर से हिंदू धर्म का रेस्टोरेशन हुआ हुआ हिंदू धर्म का रेस्टोरेशन सिर्फ शंकराचार्य ने अद्वैत वेदांत को डेवलप करके नहीं किया यदि इतना ही होता तो फिर वह एलीट साधकों के लिए वह बन कर के रह जाता अद्वैत वेदांत ज्यादातर भारतीयों के लिए कोई ऑप्शन नहीं रहता तो यदि धर्म का इवोल्यूशन होना है या तो फिर धर्म को युग प्रयोजन अनुसार रिफाइन करना है युग प्रयोजन अनुसार धर्म को प्रेजेंट करना है तो सभी धर्म के दो एस्पेक्ट होने ही चाहिए एक है कि एलीट साधकों के लिए जो कि उच्च कक्षा के साधक है जिनमें अपने मन को एकाग्र करने की और अपने मन को कामना वासनाओं से खींच के ले आने की एक कठिन साधन पद्धतियां फॉलो करने की एक क्षमता होती है और फिर उसका एक दूसरा एस्पेक्ट है कि जन साधारण के लिए जिन लोगों के पास में त्याग वैराग्य निष्ठा ब्रह्मचर्य सत्य इन सबका अनुष्ठान करने की क्षमता इतनी ज्यादा नहीं है थोड़ी बहुत ही है मंद वैराग्य है मंद अधिकारी है तो उनके लिए एक जनसाधारण का एक धर्म होना चाहिए एक पॉपुलर एक्सप्रेशन एक होना चाहिए रिलीजन का तो शंकराचार्य के युग में भी इस तरह से एलिट साधकों के लिए था अद्वैत वेदांत और जनसाधारण के लिए था यह भक्ति मार्ग और अभी ठाकुर के युग में देखिए कि ठाकुर को सबसे पहले उच्च साधकों के लिए धर्म की स्थापना कर देनी थी क्योंकि यदि ठाकुर वह कार्य नहीं करेंगे तो फिर वह कार्य और कोई नहीं कर पाएगा इसकी वजह से ठाकुर ने अपने जीवन के दरमियान एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य को नजर के सामने रखा कि जो उच्च साधक है जो उनके अंतरंग होने का सामर्थ्य रखते हैं जिनका वैराग्य दृढ़ है जिनका वैराग्य तीव्र है उनको एक बार ईश्वर प्राप्ति की आत्मज्ञान की साधना करवा दे उसके बाद में जो धर्म का पॉपुलर एक्सप्रेशन है जनसाधारण के लिए क्या होना चाहिए वो ठाकुर ने स्वामी जी के ऊपर में छोड़ा स्वामी जी ने जब ईश्वर प्राप्ति की तब कहीं जाकर के उन्होंने कहा कि अच्छा जन साधारण का धर्म जो कि वैदिक युग में विभिन्न ड्यूटीज के माध्यम से प्रकाश हुआ था प्रकाशित हुआ था बुद्धिज्म के दौरान जिसमें कि एक रास हुआ एक तरह की उसमें अवनति हुई यह शंकराचार्य के युग के दरमियान बाकी सब आचार्यों ने जिस तरह से भक्ति मूवमेंट के माध्यम से जनसाधारण के धर्म को पुनः जीवित किया वही जनसाधारण के धर्म को एक नया एस्पेक्ट एक नया आयाम स्वामी जी शिव ज्ञाने जीव सेवा के माध्यम से देते हैं देखिए स्वामी जी या ठाकुर ऐसा नहीं कहते कि शंकराचार्य के युग की जो भक्ति मूवमेंट है उसको हम छोड़ देते हैं या तो फिर वैदिक युग में जो धर्म थे विद्यार्थी धर्म आचार्य धर्म सती धर्म वगैरह उसको हम छोड़ देते हैं स्वामी जी कहते हैं कि वैदिक युग के धर्म शंकराचार्य के युग की भक्ति मूवमेंट इन दोनों के ऊपर में यह बिल्ड अप होता है जैसे कि हमको एक नया मंजिल बनाना है एक नया फ्लोर कंस्ट्रक्ट करना है तो क्या हम लोग नीचे वाले फ्लोर को तोड़ देते हैं जैसे दो मंजिला मकान है तीसरी उसमें ऐड करना है मंजिल तो तीसरी मंजिल ऐड करते हैं ऐसा नहीं है कि पहली दो मंजिल को तोड़ कर के फिर पूरा तीन मंजिला मकान फिर से बनाए ऐसा तो हम करते नहीं है जब तक पहली दो मंजिल ठीक-ठीक वो कार्य कर रही है अपनी तब तक तो उसको डिमोलिश करने का कोई प्रयास करना उचित नहीं है अ व्यर्थ है तो यहां पर भी वह वैदिक युग के धर्म और यह भक्ति मूवमेंट शंकराचार्य के युग की वह दोनों परफेक्टली कार्य कर रही है उसको डिमोलिश करने का कोई प्रश्न ही नहीं आता बस उसके ऊपर में एक तीसरी मंजिल स्वामी जी ने बना दी शिव ज्ञाने जीव सेवा तो अभी आप देखिए कि यह केशव सेन और स्वामी जी के जो एप्रोच है उसमें कंट्रास्ट क्या है केशव सेन ने भी ऐसा कुछ करने का प्रयास किया कि समाज के कल्याण के लिए कुछ किया जाए किंतु वह तो ज्यादातर अपने खुद के ईगो की पुष्टि करता था और एक छुपा हुआ कंपेज दया भाव था यहां पर स्वामी जी ने जो किया है वह युग धर्म प्रस्थापित किया है जनसाधारण के लिए जिसके माध्यम से जिसको फॉलो करके आप ईश्वर प्राप्ति कर सकते हैं यानी कि वह आपका एक इंडिविजुअल कंपेज पर निर्भर है यहां पर यह युग धर्म है तो यह दो ग्रेट कंट्रास्ट ब्रह्म समाज और रामकृष्ण मिशन जिसकी स्थापना स्वामी विवेकानंद ने की है इन दोनों के बीच में यह बहुत बड़ा डिफरेंस है तो अभी आप देखिए कि स्वामी जी और ठाकुर इन दोनों का कार्य किस तरह से कंप्लीमेंट है ठाकुर वो धर्म की स्थापना करते हैं जो कि एलिट लोगों के लिए है जो कि उच्च अधिकारियों के लिए है जो कि तीव्र वैराग्य जिनका है उन लोगों के लिए है कि कैसे भी करके ईश्वर को प्राप्त कीजिए बाकी सब छोड़ दीजिए काली घाट गए हैं तो धक्का-मुक्की करके सर्वप्रथम मां काली का दर्शन कर लीजिए उसके बाद में यदि इच्छा है तो बाहर आकर के दान दक्षिणा करना हो तो कीजिए नहीं करेंगे तो भी चलेगा जबकि स्वामी जी इसका कंप्लीमेंट पॉपुलर एस्पेक्ट डेवलप करते हैं कि 99 पर जो कि मंद अधिकारी है जो कि मंद वैराग्य है साधन भजन करने की क्षमता बड़ी ही मॉडरेट है सेडेंटरी लाइफस्टाइल है जिनकी और फिर गृहस्थ यदि संसार है तो संसार की भी जवाबदारी है तो उसमें से समय निकाल कर के थोड़ा बहुत कुछ करना है तो उनके लिए क्या रास्ता है तो उनके लिए रास्ता है शिव ज्ञान जीव सेवा और साथ-साथ में बाकी के जो दूसरे जो ओल्डर पाथ जो थे पुराने जो रास्ते थे भक्ति तो है ही है ड्यूटीज जो कि समाज में हमको करनी है वह तो है ही है किंतु साथ में एक एड ऑन एस्पेक्ट है कि शिव ज्ञाने जीव सेवा तो यह दोनों के कंप्लीमेंट्री पाथ हमको देखने को मिलते हैं व्हिच इज द यूनिकनेक्ट विवेकानंद मूवमेंट जद कोई भी धर्म है उसको यदि आपको युग धर्म का नाम देना है यदि आपको जिसको कि वर्ल्ड रिलीजन की आख्या देनी है तो उस धर्म में क्या होना चाहिए दो एस्पेक्ट पक्के होने चाहिए जो कि उच्च कक्षा के साधक है उनके हृदय को सेटिस्फाई करने के लिए आपके पास में उच्च साधन पद्धति होनी चाहिए वरना तो फिर जैसे देखिए ब्रह्मो समाज भी तो अपने को एक क्वाज रिलीजियस मूवमेंट के रूप में प्रोजेक्ट करता था थियोसोफिकल सोसाइटी है या कि आर्य समाज है या तो फिर अमेरिका में इसी तरह से क्रिश्चियन साइंटिस्ट है या तो फिर स्वामी जी जब अमेरिका गए थे तो होम ऑफ ट्रुथ बोल कर के एक था तो यह सब जो सो कॉल्ड रिलीजियस मूवमेंट है उसका एक बहुत बड़ा फेटल फ्लो क्या है जिसकी वजह से यह रिलीजियस मूवमेंट वर्ल्ड रिलीजन या तो फिर युग धर्म में परिणत नहीं हुई क्योंकि यहां पर उच्च साधकों के लिए कुछ नहीं है यहां पर जनरल साधकों के लिए सब कुछ आपको मिल जाएगा कि हां मुझे एक मॉडरेट क्यूरियोसिटी है कि क्या है यह सब तो यह अभी नाम देने की जरूरत नहीं है खैर ऐसे तीन-चार लोगों को आपने सुन लिया youtube1 समय के बाद में एक मुकाम के बाद में उसको आगे का रास्ता नहीं दिखता है अच्छा तो यह सब रिलीजियस क्वाज रिलीजियस मूवमेंट में ये एक फेटल फ्लो है तो कुछ-कुछ रिलीजियस मूवमेंट ऐसी भी हुई है जहां पर सिर्फ उच्च अधिकारी के लिए स्थान है किंतु जनसाधारण में इसका प्रचार इतना नहीं हो पाया है क्योंकि जनसाधारण वहां पर जाकर क्या करेंगे तो यह इस तरह की दो रिलीजियस मूवमेंट भारत में थी अभी भी है वैसे जैनिज्म और बुद्धिज्म बुद्धिज्म में बात-बात में कुछ-कुछ पॉपुलर एस्पेक्ट प्रवे प्र वेश करवाने का प्रयास किया जो कि भारत में सफल नहीं हुआ किंतु फिर बाकी ईस्ट एशियन कंट्रीज में वह सफल हुआ है जैसे कि चाइना है जैसे कि म्यानमार है वगैरह जितने भी ईस्ट एशियन साउथ ईस्ट एशियन कंट्रीज है वहां पे बुद्धिज्म का एक पॉपुलर एस्पेक्ट एंटर करवाने का प्रयास हुआ है तो बुद्धिज्म इज वेरी गुड फॉर उच्च साधक जो कि सीधा निर्वाण प्राप्ति करना चाहते हैं जिनके भीतर में जबरदस्त सामर्थ्य है कि इहा सने शिष्य तुम शरी रम इस आसन पे में स्थान ग्रहण करूंगा तोव अगस्थी मासम प्रलय चया तु और फिर तब तक नहीं खड़ा होंगा जब तक मैं निर्वाण प्राप्त ना कर लूं भले ही चाहे मेरी हड्डियां मेरा मांस मेरा शरीर पूरा पिघल जाए किंतु निर्वाण प्राप्ति के बिना इस आसन से मैं खड़ा नहीं होंगा तो वो दृढ़ संकल्प जिन लोगों में है इन लोगों के लिए बुद्धिज्म एंड जैनिज्म आर परफेक्ट आपको सीधा निर्वाण या तो मुक्ति या तो कैवली स्थिति तक पहुंचा देगा कोई आपको संशय नहीं है उसमें किंतु जनसाधारण जद वहां पर जाएंगे जैनिज्म को देखिए कि जैनिज्म में एक के बाद एक ऐसे संत आते गए जिनका कि चरित्र अद्भुत है और महावीर भगवान जो है उनकी जो कैवल स्थिति प्राप्त करने की कहानी है इट्स एक्सट्रीमली इंस्पायरिंग किंतु इसके बावजूद भारत में जनसाधारण में इसका इतना प्रचार नहीं हुआ क्योंकि इसका जो नैतिकता के ऊपर में कठोरता के ऊपर में तपस्या के ऊपर में जो भार था जैनिज्म का 90 पर लोग इसमें से कुछ भी नहीं कर पाएंगे तो दो तरह के जो रिलीजियस मूवमेंट्स होती है वो युग धर्म या तो फिर वर्ल्ड रिलीजन में कन्वर्ट होने से नहीं हो पाएगी कन्वर्ट होने के पहले उनमें कुछ डिफेक्ट्स रह जाती है तो आजकल की यह जो कुछ पॉपुलर मूवमेंट्स है उसमें है कि उच्च साधकों के लिए कुछ नहीं है यदि आपको रिट्रीट के लिए जाना है एक सप्ताह का रिट्रीट है 50 600 हज ₹ लाख दे दीजिए बहुत सुंदर कैंपस है वहां पर बिठा करके आपको रिट्रीट करवाएंगे एक अठवाड़ा 10 दिन आपको बहुत अच्छा लगेगा किंतु जैसे ही घर वापस आए सब कुछ हवा हो जाएगा इससे आगे ना ही वे लोग कुछ ऑफर कर पाते हैं ना ही हम लोगों में इतनी क्षमता होती है कि लेट मी गो बियोंड दिस वीकली रिट्रीट इसके बाद में क्या है इसके ऊपर क्या है वो ना ही हमारी क्षमता होती है वहां तक जाने की ना ही उनकी क्षमता होती है हमको कुछ ऑफर करने की तो वह हो गया कि जनसाधारण तक लिमिट रहता है जनसाधारण में फैले कुछ समय तक किंतु जिसमें की डेप्थ नहीं है उसकी वजह से एट वन पॉइंट वह रुक जाएगा वह युग धर्म या तो वर्ल्ड रिलीजन की कैटेगरी में कभी भी नहीं जा पाएगा और फिर यहां पे यह बुद्धिज्म और जैनिज्म जैसे हैं बुद्धिज्म यानी कि ट्रेडिशनल बुद्धिज्म न कि नहीं कि ईस्ट एशियन मॉडर्न बुद्धिज्म तो अपना ट्रेडिशनल इंडियन बुद्धिज्म और जैनिज्म इन दोनों में वह जो एक था डिफेक्ट कि जनसाधारण में उन्होंने ऐसा कोई मूवमेंट नहीं खड़ा किया कि पूरे युग धर्म में युग प्रयोजन में वह कन्वर्ट हो जाए तो आज देखिए कि वैदिक युग के बाद में सर्वप्रथम मूवमेंट भारत में यह एक प्रकट हुई है रामकृष्ण विवेकानंद मूवमेंट जिसमें कि दोनों एस्पेक्ट है कि एलीट साधकों के लिए जिन लोग में प्रचंड क्षमता है डेप्थ में जाने की इंटेंस स्टडी करने की इंटेंस तपस्या करने की उन लोगों के लिए प्रशस्त राजपथ है सीधा कैलाश मानसरोवर चले जाइए वहां पर रास्ते में कहीं पर कुछ बाधा नहीं है ठाकुर महास्वामी जी खड़े हैं आपको गाइड करने के लिए तो वह सीधा कैलाश मानसरोवर जाने का प्रशस्त राजपथ है यहां पे ऑन द अदर हैंड जो कि जनसाधारण है कि भाई चलो मेरे पास में सप्ताह में दो-तीन घंटे होते हैं वीकेंड में तो मैं क्या करूं तो आप अपने आश्रम में आइए थोड़ा बहुत वॉलंटिज्म से दक्ष दीक्षा ले लीजिए और जितना हो सके कथामृत का पाठ कीजिए ऑनलाइन लेक्चर वगैरा होते रहते हैं उत्सव में पार्टिसिपेट कीजिए बीच-बीच में हमारी यह रिट्रीट हमारे यहां पर भी होती है सो पार्टिसिपेट इन ट यह जो ज्यादातर लोगों के लिए 90 पर लोगों के लिए यह रास्ता भी है और वह प्रशस्त राजमार्ग भी है तो आई थिंक मुझे ऐसा लग रहा है कि वैदिक युग के बाद में यदि एक मूवमेंट ऐसी हो कि जिसमें यह दोनों एस्पेक्ट फ्यूज हुए हैं दोनों एस्पेक्ट इकट्ठा हुए हैं यह प्रशस्त राजमार्ग उच्च साधकों के लिए और जनसाधारण के लिए एक बड़ा ही लेजिटीमेट रास्ता शिव ज्ञान जीव सेवा साधारण लोगों के लिए ऐसी पावरफुल तपस्या है ऐसी उच्च मने इतनी सुंदर सा ना है कि बहुत ही अच्छे से बहुत ही मने स्पीडली शीघ्र गति से आपके जो जितने भी कर्म है फटाफट करके कट जाएंगे तो यह दोनों का जो कॉमिनेशन है वैदिक युग के बाद में भारत में यह प्रथम हुआ है मुझे ऐसा लग रहा है कि जनसाधारण प्लस उच्च साधक दोनों के लिए लेजिटीमेट साधन पद्धति इस मूवमेंट में इकट्ठा हुई है तो इसीलिए हिंदू धर्म ट्रेडिशनल हिंदू धर्म जो था अभी देखिए शंकराचार्य के युग में दोनों इकट्ठा हुए थे किंतु दोनों में एक स्प्लिट था ज्ञान मार्ग है और भक्ति मार्ग है तो जो भक्ति मार्गी थे वे लोग ज्ञान मार्गी हों की निंदा किया करते थे ज्ञान मार्गी जो है वह भक्ति मार्गी हों की निंदा किया करते थे सर्व प्रियानंदनसेक्स शहर में वह धर्मशाला जैसा होता है ना गांव-गांव में जबकि वह पथिक जो होते हैं यात्रालू होते हैं वहां पर रात को रहते हैं जैसे कि वह कामर पुकुर में थी इस तरह की धर्मशाला तो फिर वह गदाई वहां पर जाया करता था साधु संग किया करता था फिर एक बार साधुओं ने गदाई को कौपीन और भिक्षु के वस्त्र पहना दिए तो मां चंद्रा मणि देवी बेचारी बड़ी ये डर गई थी और गदाई को वहां पर भेजना बंद कर दिया था फिर वहां से वो साधु लोग आए पूछा कि मैया आपका बच्चा क्यों नहीं आ रहा है कुछ दिनों से वह आता है तो हमको बड़ा आनंद प्रदान करता है बच्चे में बड़े ही धार्मिक गुण है तो मां ने अपना डर बताया कि मुझे ऐसा डर है कि आप कहीं बच्चे को उठा कर के आपके साथ में ना ले जाए तो फिर साधुओं ने भरोसा दिलवाया नहीं नहीं ऐसा हमारा कोई इंटेंशन नहीं तो इस तरह से गांव-गांव इस तरह की धर्मशाला हुआ करती थी कि जहां पर इस तरह के यात्रालू साधु साधक रहते थे तो इस तरह से एक गांव में एक दिन रात को दो साधक इकट्ठा हो गए एक तो थे द्वैत मार्गी और दूसरे थे अद्वैत मार्गी तो अभी रात को बैठना है साधना करनी है रात तो सोने के लिए नहीं है तो जैसे वराह नगर मठ में वो दीवाल के ऊपर में यही भगवान बुद्ध का सूत्र लिख दिया गया था इहा सने शिष्य तुमहे शरी रम इस आसन के ऊपर में मैं बैठूंगा वगैरा वगैरा तो यहां पर भी जो अद्वैत मार्गी साधक था उसने दीवाल पर लिख दिया सोहम ऐसा बोल कर के बैठ कर के साधना कर रहा है तो अभी यह लिखा सोहम यानी कि वही शिव ही मैं हूं वही ईश्वर ही मैं हूं ऐसा तो एक तरह से हो जाएगा तो यह जो ध्व मार्गी भक्त था वह बड़ा नाराज हो गया बोला कि तुम किस मुंह से अपने को ईश्वर या तो किस मुंह से मैं आत्मन हूं ऐसी बातें करते हो पता नहीं तुम्हारे भीतर में इतना तमस है इतना काम क्रोध मद लोभ मोह वगैरह है कामिनी कांचन के प्रति इतनी आसक्ति है इतने छोटे अहंग से तुम अपने को ब एक प्रूव करना चाहते हो नाराज होकर के यह धवादी ने वो सोहम लिखा था उसके आगे दा लिख दिया तो क्या होगा दासो हम तो यह अद्वैतवाद नाराज हो गया बोलता है कि मैं वही संपूर्ण प्रकाशमान आत्मन हूं मेरे प्रकाश से ही तो यह ब्रह्मांड प्रकाशित है मैं दासो मैं दास हूं ऐसा मैं देखूंगा मेरी नजर के सामने साधना करने के समय मूर्ख कहीं के फिर उसने वह चौक लेकर के वो दा के सामने स लिख दिया तो क्या हुआ सदा सोहम पहले तो था सोहम अभी हो गया सदा सोहम मैं हमेशा वही ईश्वर हूं मैं वही ब्रह्मण हूं अहम ब्रह्मास्मि तो यह देख कर के धत वाला नाराज हो गया उसने वो सा के सामने दा लिख दिया तो क्या हो गया दास दासो हम अर्थात कि मैं सिर्फ दास नहीं हूं मैं दासो का दास हूं तो फिर ये अद्वैत वाले ने फिर से स लिख दिया सदा सदा सोहम हमेशा हमेशा के लिए मैं वही ब्राह्मण हूं तो यह दा लिख रहा है वह सा लिख रहा है सदा सदा सदा सो हम दास दास दास दासो हम ऐसा तो क्या है कि इस तरह के वोह हमारे यहां पर वायलेंट कंफ्लेक्स तरह से यह कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट में युद्ध होता है शिया सुन्नी में युद्ध होता है इस तरह से ज्ञान और भक्ति यह दो मार्गों में कभी भी युद्ध नहीं हुआ वही है कि इस तरह के मीठे झगड़ चलते रहते थे भीतर भीतर से तो सबको पता है कि यदि आप दास है न कि आप सोहम है आपको वही एक ही जगह पर जाना है अल्टीमेटली किंतु थे यह स्प्लिट एक तरह से था यह भक्ति मार्गी ज्ञान मार्गी हों की निंदा करते थे ज्ञान मार्गी भक्ति मार्गी हों की निंदा करते थे यदि आप उच्च अधिकारी है भक्ति मार्ग में पहुंच गए हैं तो हो सकता है कि बियोंड वन पॉइंट आप ना जा पाए हालांकि ठाकुर तो स्पष्ट कहते हैं कि शुद्ध भक्ति शुद्ध ज्ञान आपको एक ही जगह पर ले जाता है उसमें कोई प्रश्न ही नहीं है किंतु हो सकता है कि आपके हृदय को शायद पूरा सेटिस्फेक्शन ना मिले यदि आप में त्याग और वैराग्य की मात्रा बहुत ज्यादा है तो बेटर है कि आप अद्वैत में शिफ्ट कर दीजिए अद्वैत में पहुंच गए हैं आपके फैमिली कनेक्शन से या कैसे भी करके और वहां पर लगेगा कि अरे ये तो बहुत ही ज्यादा कठिन है मेरे लिए यहां पर कोई उपाय नहीं है तो फिर चलो धत में शिफ्ट कर दो तो वह शिफ्ट करना थोड़ा मुश्किल हो जाता था किसी किसी के लिए तो एक तरह का स्प्लिट था किंतु वो स्प्लिट आप देखिए कि रामकृष्ण संघ में यदि आप द्वैत भाव को भी फॉलो करना चाहते हैं अद्वैत भाव को भी फॉलो करना चाहते हैं उच्च अधिकारी भी है मंद वैराग्य भी है डज नॉट मैटर पूरा स्पेक्ट्रम आपके लिए खुला है यू कैन सीमलेसली ट्रांजिट फ्रॉम वन पॉइंट टू अनदर फ्रॉम वन एस्पेक्ट इन द स्पेक्ट्रम टू दी अनदर शेड यह पूरा स्पेक्ट्रम आपके लिए ओपन है तो यह जो कंप्रिहेंसिव सॉल्यूशन जिसको कहते हैं आजकल यह कंप्रिहेंसिव सोल्यूशन वैदिक युग के बाद में हम लोग पहली बार ऑफर कर रहे हैं रामकृष्ण विवेकानंद भावधारानी सॉल्यूशन को लोगों के सामने प्रस्तुत कर रहा है हां पर वेद में आप देखेंगे कि वही वेद में एक शतपथ ब्राह्मण है वही वेद में एक संहिता पोर्शन है वही वेद में आरण्यक भी है और उसी वेद में उपनिषद भी है और कहीं पर ऐसा नहीं कहा गया कि यह जो संहिता पोर्शन को फॉलो करते हैं उनको उपनिषद पोर्शन फॉलो करने के ऊपर में पाबंदी है या जो लोग उपनिषद पोर्शन फॉलो करते हैं वे लोग संहिता वालों को तुच्छ दृष्टि से देखते हैं ऐसा कभी भी कहीं पर नहीं है तो सिमिलरली इन राम कृष्ण विवेकानंद भावधारानी जीव सेवा करते हैं यदि आप भक्ति योग को फॉलो करते हैं कर्म योग करते हैं राज योग करते हैं ज्ञान योग करते हैं कोई ऐसा नहीं कहेगा कि आप गलत कर रहे हैं मैं सही कर रहा हूं आपके लिए आपके सामने एक इंटीग्रेटेड फिलोसॉफिकल फ्रेमवर्क अवेलेबल है जिसका कि सहारा लेकर के सीमलेस लिए आप अपना इवोल्यूशन कर सकते हैं हो सकता है कि मैंने कर्म योग से प्रारंभ किया आगे जाते-जाते भक्ति योग में मेरा इंटरेस्ट बढा उसके बाद में मैं ज्ञान योग और राजयोग तक जाऊंगा तो जैसे-जैसे मेरा इवोल्यूशन होता है एज ए साधक वैसे-वैसे ही मैं अपनी साधन पद्धतियों को भी अपग्रेड कर सकता हूं किंतु यदि एक जगह पर फस गए जैसे कि वह शंकराचार्य के युग में ऐसा हुआ था कभी-कभी कि साधक एक प्रणाली में एक बार चला गया तो वहां पर जो फंस गया तो फिर खुद का भी जद इवोल्यूशन होता है अपनी साधन प्रणाली को वह अपग्रेड नहीं कर पाता है और उसका डेवलपमेंट स्टंटेड हो जाता है उसका ग्रोथ रुक जाता है तो वो एक जो संभावना वो एक डर था शंकराचार्य के युग में मिडिल एजेस में वो युग वो भय वो डर आज हमारी फ्रेमवर्क में नहीं है यू कैन बिगिन फ्रॉम एनी पॉइंट कोई सोचता है मैं बड़ा उच्च साधक हूं ठीक है चलो ज्ञान योग से शुरुआत की किंतु कुछ ही दिनों में अकल ठिकाने आ गई कि भाई यह दिस इज नॉट अवर कप ऑफ टी यह अपने बस की बात नहीं है तो चले आओ भक्ति योग के ऊपर में वहां पे वह आप फंस गए हैं ज्ञान योग लेकर के अभी क्या करूं आगे फ्रस्ट्रेशन हो गया है इस तरह का कुछ यहां पर नहीं है अपनी क्षमता के अनुसार सीमलेसली यू कैन चेंज द लेन वो हाईवे में जाते हैं तो वह स्लो लेन होती है फास्ट लेन होती है कभी-कभी आप 3040 पे गाड़ी चलाएंगे कभी 70800 पे चलाएंगे यू कैन इजली चेंज द लेन इफ यू हैव दैट टाइप ऑफ कार अवेलेबल विथ यू एंड दैट टाइप ऑफ ड्राइविंग स्किल विथ यू तो यहां पे भी यदि हम में क्षमता है इच्छा है मुमुक्षु तोव है तो इजली हम लेन चेंज कर सकते हैं जहां इच्छा जा सकते हैं सो आई थिंक कि आफ्टर वेदास रामकृष्ण विवेकानंद लिटरेचर इज द फर्स्ट ऑफर इन इंडिया कि जो कि एक कंप्रिहेंसिव सोल्यूशन प्रदान करता है उच्च अधिकारी निम्न अधिकारी दोनों के लिए मध्यम अधिकारी सभी के लिए इंटीग्रेटेड फ्रेमवर्क प्रोवाइड करता है अच्छा तो अभी यह जो लास्ट परिच्छेद है इस चैप्टर का उसको हम पढ़ लेते हैं दशम परिच्छेद डेट है 27 अक्टूबर मास्टर महाशय क्या लिखते हैं जहाज कोयला घटे ई बार फिरिया आशी लो जहाज कोयला घाट वो एक जगह होगी कलकाता में वहां पर वापस आ गया श कोले नामी बार उद्योग करते लागले सभी लोग जहाज में से उतरने का उद्योग कर रहे हैं घरेर बाहर आशिया देखे कोजा घरेर पूर्णचंद्र हसते छ भागीरथी बख कौमुदी लीला भूमि होईया छ कितना सुंदर पोएट वर्णन है वो केबिन में जो लोग बैठे थे ठाकुर का कथामृत पान कर रहे थे उस केबिन में से बाहर आकर के देखा आकाश में कोजागरी का पूर्ण चंद्र हंस रहा है यह कोजागरी पूर्णिमा जिसको कहते हैं तो कोजागरी का पूर्णचंद्र हसते छन हस रहा है भागीरथी बख कौमुदी लीला भूमि होया छे भागीरथी बखोल का सीना थ का सीना जैसे कि यह चंद्र की किरण है उसकी लीला भूमि हुई है उसके सीने पर भागीरथी के ऊपर में चंद्र की किरणें खेल रही है ठाकुर श्री रामकृष्ण जननो गाड़ी आनी ते देवा होलो श्री राम कृष्ण के लिए गाड़ी मंगवाई गई अभी आज की लैंग्वेज में हम जिसको गाड़ी कहते हैं वह नहीं उस समय थी घोड़ा गाड़ी अच्छा मां मोटर गाड़ी पर बैठी थी और ऐसा हुआ था कि मां जिस मोटर गाड़ी गाड़ी में बैठ कर के जा रही थी उसके नीचे में एक कुत्ता आ गया और कुत्ते की मौत हो गई उसके बाद में मां को बड़ा डर लग गया और थोड़ा सा नाराज भी हो गई मोटर गाड़ी पे तो मां कभी बैठती नहीं थी फिर एक दिन ऐसा हुआ कि एक भक्त के घर गए हैं रात को बड़ा देरी हो गया है तो अभी क्या करें यदि वापस उद्बोधन जाना है जल्दी-जल्दी तो मोटर गाड़ी में तो बैठना ही होगा घोड़ा गाड़ी को बुलाना फिर उसके लिए वो सब झंझट रहता है मोटर गाड़ी इजली अवेलेबल है वो फटाक करके ले जाए तो पहले तो मां ना ना करती रही कि मोटर गाड़ी में नहीं बैठूंगी उसके नीचे कुत्ता आ गया कुत्ता मर गया वगैरह वगैरह फिर भक्तों ने समझाया कि जद टाइम प पहुंचना है उद्बोधन दूसरे दिन सुबह को फिर मंगल आरती भी है ठाकुर को सुबह का भोग भी देना है तो मां ही तो सब करेगी ना तो ऐसा करके जब समझाया तो मां ने कहा अच्छा ठीक है तो फिर से मां वो मोटर गाड़ी में बैठी थी यानी कि एटलीस्ट दो इंस्टेंस से अपने पास में मां मोटर गाड़ी में बैठी है उसके किंतु ठाकुर के समय तो व थी नहीं मोटर गाड़ी तो वही घोड़ा गाड़ी मंगवाई गई उनके लिए और कित खण परे मास्टर आ दुई एकटी भक्ते सही ठाकुर गाड़ी ते उठी लेन कुछ क्षण के बाद में मास्टर महाशय और दो एक भक्तों के साथ में ठाकुर घोड़ा गाड़ी में उठे केशव भ्रात पुत्र नंदलाल व गाड़ी ते उठले ठाकुर संगे खानि टा जाबेन केशव के भाई का पुत्र नंदलाल वो भी गाड़ी में उठा ठाकुर के साथ में थोड़ी देर थोड़ी दूर तक जाएगा एक जो सन्मान देने की बात है प्रोटोकॉल देने की बात है जो लोग सम्माननीय होते हैं उन लोगों के लिए गाड़ी ते सकले बसले पर ठाकुर जिज्ञासा कररी लेन कोई तीनी कोई गाड़ी में सब लोग बैठ गए उसके बाद में ठाकुर ने पूछा कहां है वह कहां है अर्थात केशव कोई अर्थात की केशव कहां है देखीते देखीते केशव एका की आशिया उपस्थित देखते ही देखते केशव अकेले आकर के उपस्थित हुए मुख हासी चेहरे पर हस्य है आशिया जिज्ञासा कोरी लेन के के एर संगे जाब आकर के पूछा इनके साथ में अर्थात की ठाकुर के साथ में कौन-कौन जाएगा सकले गाड़ी ते बोसले परोर केशव भूमि होया ठाकुरे पद धुली ग्रहण करी लेन सभी लोग एक बार गाड़ी में बैठ गए उसके बाद में केशव ने भूमि होक के ठाकुर के चरणों की पद धुली ग्रहण की ठाकुरो सस्नेह संभाषण को या विदाई ले लेन विदाई द लेन ठाकुर ने भी सस्नेह केशव के साथ में वार्तालाप करके केशव को विदाई दी गाड़ी चली ते लागी लो गाड़ी चलने लगी अंग्रेज टोला अर्थात कि अंग्रेज लोगों का निवास स्थान होता है जहां पे उसको कहते हैं अंग्रेज टोला अंग्रेज लोगों का निवास स्थान है यहां पे सुंदर राजपथ सुंदर राजपथ है अंग्रेज लोग रहेंगे तो नेचरली वो रास्ता वो वगैरह तो एकदम एकम ठीक ठाक ही होगा पथर दुई दि के सुंदर सुंदर अट्टालिका रास्ते के दोनों साइड में सुंदर सुंदर मकाने है अट्टालिका है पूर्ण चंद्र उठिया छ अट्टालिका गुली जेनो विमल शीतल चंद्र किरणें विश्राम करते छे पूर्ण चंद्र उठा है और यह अट्टालिका जैसे कि विमल शीतल चंद्र किरण में विश्राम कर रही है कितना सुंदर पोएटिक डिस्क्रिप्शन द्वार देश वाष्प दीप कख मध्य दीपमाला स्थाने स्थाने हारमोनियम पियानो संजोग अंग्रेज महिला रा गान कोरीते छ द्वार देश अर्थात की यह सुंदर अट्टालिका है सुंदर रहने के घर है उसके दरवाजे पर बापी दीप यानी कि गैस लैंप जल रहे हैं उस समय कलकाता में गैस लैंप आ चुके थे तो गैस लैंप जल रहे हैं और कख मध्य दीपमाला और कमरे के भीतर में बाहर से जैसे खिड़की में से दिखाई देगा तो बाहर से दिखाई देता है कि कमरे के भीतर में बहुत सारी यह ज्योति जल रही है वह दीपमाला वह चाहे कैंडल होगी ना कि यह गैस लैंप होंगे जो भी है बहुत सारी दीपमाला जल रही है और स्थाने स्थाने हारमोनियम पियानो संयोग अंग्रेज महिला रा गान कोरीते छ जगह जगह हार्मोनियम या पियानो के साथ में अंग्रेज महिलाएं गान कर रही है ठाकुर आनंदे हस्य कोरीते कोरीते जाते छ ठाकुर आनंद में आकर के हस्य करते करते जा रहे हैं हटात बोली लेन एकाएक बोल उठे अर झोल तृष्णा पाछे की होबे मुझे प्यास लगी है अभी क्या करें की कोरा जाए अभी क्या कर सकते हैं नंदलाल इंडिया क्लब निकट गाड़ी थामैया ऊपरे जल आ ते गलन नंदलाल अर्थात की केशव के भाई का पुत्र उसने इंडिया क्लब य इस तरह का कोई होगा वहां पर क्लब उसके सामने गाड़ी थमाई और फिर वहां पर ऊपर में जाकर के एक गिलास में पानी लेने के लिए गए काचर ग्लास कोरिया झोल आनी लेन काच के ग्लास में वो पानी लेके आए ठाकुर सहा से जिज्ञासा कोरी लेन ग्लास टी धोया तो ठाकुर ने हंसते हंसते पूछा सहस्य पूछा ग्लास क्या धोया हुआ है तो नंदलाल बोलले हां नंदलाल ने कहा हां ठाकुर सेही ग्ला से जलपान कोलन जैसे ही नंदलाल ने हां कहा ठाकुर ने उसी गिलास में से जल पान किया अभी इसके साथ में वह कहानी हम कंपेयर करें कि एक भक्त के वहां ठाकुर गए थे पीने का पानी मंगवाया और वही उसी घर मालिक जो भक्त जिसने ठाकुर को इनवाइट किया था उनके बड़े भाई एक वो वही वो धर्मा लिंग धारी माने विभिन्न तरह के धर्म के जो लिंग है सर के ऊपर में तिलक है गले में माला है शरीर पर पीतांबरी है इस तरह के धर्मा लिंग धारी पानी लेकर आए ठाकुर वह पानी नहीं पी पाए क्यों क्योंकि नर ने इन्वेस्टिगेशन करके बाद में खोज निकाला कि यह धर्मांग धारी का चरित्र अच्छा नहीं था तो यहां पर भी देखिए कि जब ठाकुर ने पानी मंगवाया नंदलाल पानी लेकर आए और ठाकुर ने आनंद उसका पान किया इसका अर्थ है कि नंद नंदलाल को कैरेक्टर सर्टिफिकेट ठाकुर की ओर से मिल गया उसका चरित्र अच्छा था इसी वजह से ठाकुर उसके हाथ का पानी पी पाए बालक स्वभाव बच्चे का स्वभाव है ठाकुर का गाड़ी चलाया दिले ठाकुर मुख बड़ाया लोक जन गाड़ी घोड़ा चांद आलो देखीते छन शकोल ताते आनंदो जब गाड़ी चलने लगी तो ठाकुर गाड़ी में से मुंह निकालकर के इधर उधर देख रहे हैं रास्ते में लोग चल रहे हैं गाड़ी घोड़ा चल रहे हैं चांद का प्रकाश चांद का उजाला है यह सब देख रहे हैं और देखते देखते आनंद कर रहे हैं नंदलाल कलू टोला नामी लेन कल उटोला बोलकर के एक जगह वहां पर नंदलाल उतर गए जो ठाकुर को प्रोटोकॉल के अनुसार कुछ दोर देर कुछ दूरी तक छोड़ने के लिए जाना था तो वहां पर वह उतर गए ठाकुरर गाड़ी शिमुलिया स्ट्रीट श्री जुक्तो सुरेश मित्रे बाड़ी ते आशीते लागलो ठाकुर की गाड़ी सिमुलिया स्ट्रीट में श्रीयुत सुरेश मित्र के घर की ओर जाने लगी यह वही सिमुलिया स्ट्रीट जहां पर नरेंद्र रहा करता था तो वहां पर ठाकुर की गाड़ी गई ठाकुर तहा के सुरेंद्र बोली तेन सुरेंद्र ठाकुरर परम भक्त ठाकुर इस सुरेश मित्र को सुरेंद्र के नाम से पुकारते सुरेंद्र ठाकुर का परम भक्त है किंतु सुरेंद्र बाड़ी ते नहीं किंतु घर जाकर देखा कि सुरेंद्र घर पर नहीं है तहा देर नूतन बागान गया छन उन लोगों के नए बागान में नए बगीचे में गए हैं बाड़ी लोकेरा बोसते नीचे घोर खुलिया दिले बाड़ी के घर के जो लोग थे उन्होंने ठाकुर को बैठने के लिए अपने घर में ग्राउंड फ्लोर का दरवाजा खोल दिया गाड़ी भाड़ा दते होबे के दबे अभी गाड़ी का भाड़ा देना होगा तो कौन देगा अभी वो केशव ने वहां से भेजा तो उसको देना चाहिए था तो अभी उसने दिया नहीं ठाकुर ने मांगा नहीं जो भी है अभी गाड़ी वाले को रास्ता देना है तो अभी क्या किया जाए सुरेंद्र थाकी ले सेही द तो सुरेंद्र जद रहता तो वही दे देता ठाकुर एक जन भक्तो के बोली लेन भाड़ा टा मेदर का चने ना रा की जाने ना ओदर भातरा जाया से स कोलेर हस जद सुरेंद्र रहता तो सुरेंद्र गाड़ी भाड़ा दे देता किंतु सुरेंद्र तो है नहीं तो ठाकुर ने एक भक्त को कहा कि ये गाड़ी का भाड़ा स्त्रियों के पास में से मांग लो ना उनको पता नहीं है क्या कि उनके पति वहां पर अर्थात की दक्षिणेश्वर आना जाना करते हैं तो जैसे ही ठाकुर ने ऐसा कहा सभी लोग हसने लगे नरेंद्र पाड़ा ते था केन नरेंद्र उसी गली में ही रहता था ठाकुर नरेंद्र के डाकी ते पठाई लेन ठाकुर ने नरेंद्र को पुकारा बुलाने के लिए किसी को भेजा ईद के बाड़ी लोकेरा दो तला घोरे ठाकुर के बसाई लेन यहां पर घर के लोगों ने ठाकुर को बैठने के लिए दूसरी मंजिल पर दरवाजा खोल दिया घरेर में जेते चादर पाता दई चारट ताकि तार ऊपर कख प्राचीर सुरेंद्र विशेष जतन प्रस्तुत छबी जहा ते केशव के ठाकुर देखते न हिंदू मुसलमान क्रिस्टा बौद्ध सकल धर्मर समन बय आर्क वैष्णव क्तो शैव इत्यादि सकल संप्रदाय समन्वय वही वो पहली मन अच्छा अब यह थोड़ा सा लंबा है डिस्क्रिप्शन एक काम करते हैं इस डिस्क्रिप्शन को अभी कल ही देखते हैं आज यहीं तक और उस और उस ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णर्पण मस्तु देखिए कि यह एक अच्छा पॉइंट है कि यदि हम कर्म ज्ञान भक्ति ध्यान को अधिकारी भेद के के अनुसार डिवाइड करें तो रामकृष्ण संघ में बड़ा ही स्पष्ट कहा गया है कि ईवन मंदक अधिकारी हो कि उच्च अधिकारी हो चारों योग का कॉमिनेशन करने से उनको बहुत फायदा होगा तो दिस इज इन ट्यून विथ अवर वेदिक साधनास क्योंकि वेद में आप देखेंगे खास करके उपनिषद उपनिषदों को प्रोपेगेटर किया वह सभी क्षत्रिय थे राम हो कृष्ण हो बुद्ध हो महावीर हो सभी के सभी क्षत्रिय थे राज्य चलाना बड़ा अच्छे से जानते थे और जैसे कि बुद्धिज्म और जैनिज्म की तो बात हम जैसे छोड़ दे फिलहाल तो राम और कृष्णा वो दोनों तो मने ऑथेंटिक राजा थे व कृष्ण ने तो पूरा युद्ध को मैंने गाइड किया था यानी कि ये कर्म अलग भक्ति अलग ज्ञान अलग इस तरह का कांसेप्ट अपने वैदिक युग में था ही नहीं वही है कि उसका अनुष्ठान आपको यथाशक्ति करना है अभी जैसे विदुर जिस तरह से ज्ञान भक्ति कर्म राजयोग का अनुष्ठान करेगा कृष्ण जिस तरह से करेंगे कर्ण जिस तरह से करेगा अर्जुन भीम जिस तरह से करेंगे वो अपनी अपनी कैपेसिटी के अनुसार अलग-अलग होगा किंतु कहीं पे ऐसा नहीं है कि सिर्फ ज्ञान सिर्फ भक्ति सिर्फ राजयोग इस तरह से मने वाटर टाइट कंपार्टमेंट कहीं प नहीं डाले गए गीता अपने रामायण महाभारत उपनिषद वेद सबको पढ़ के यही समझ में आता है तो सेम थिंग अपने यहां पर एज इट इज ले लिया गया है कि कर्म ज्ञान भक्ति ध्यान ऊपर ऊपर से लगेगा कि आपकी कैपेसिटी अनुसार आप कीजिए यहां पर मंद अधिकारी मध्यम अधिकारी है तो कर्म भक्ति बेटर है उच्च अधिकारी है तो ज्ञान और राजयोग बेटर है किंतु साथ-साथ में यह स्पष्ट है कि उच्च अधिकारी हो कि मंद मध्यम अधिकारी है चारों योग का एक साथ में अनुष्ठान कीजिए वही है कि अपनी कैपेसिटी के अनुसार कीजिए व्हिच विल गिव यू फार बेटर रिजल्ट माने ऐसा भी नहीं कहा गया जैसे राजयोग का जो स्टार्टिंग का वो जो स्वामी जी का वो है ना सूत्र कि विद द कॉमिनेशन ऑफ वन मोर देन वन और एनी ऑफ देम यू कैन अटन आत्म ज्ञाना तो एक कीजिए एक से ज्यादा कीजिए एनी टाइप ऑफ कॉमिनेशन कीजिए ट विल टेक यू टू अल्टीमेट सो रदर देन डिवाइडिंग कर्म ज्ञान भक्ति दन अमंग ईच अदर बेटर बी की चारों का एक साथ अनुष्ठान कीजिए यथाशक्ति कीजिए यह जो अपना रिलीजियस हिस्ट्री को यदि चार युग में बांट दे वो वैदिक उपनिषद एज है फिर यह बुद्धिज्म बुद्धिस्ट एज है शंकराचार्य का युग है और आज का मॉडर्न युग है तो फर्स्ट और लास्ट युग में यह कॉमिनेशन यह आइडियाज यह फ्रेमवर्क बड़ा ही क्लियर था वैदिक उपनिषद एज में भी रामकृष्ण विवेकानंद लिटरेचर में भी वही है कि बुद्धि उस समय सिर्फ एलिट लोगों के लिए प्रयास किया गया था और शंकराचार्य के समय में हालांकि दोनों प्रयास थे दोनों प्रयास के बीच में स्प्लिट था जो लोग रामानुज को फॉलो कर रहे हैं शंकराचार्य की निंदा करेंगे शंकराचार्य वाले उनकी निंदा करेंगे सो सम हाउ दे डिस्टॉर्शन वाज देर इन मिडिल टू एजेस किंतु अपने अपनी फ्रेमवर्क में ऐसा नहीं है दैट वे वी आर रियल फॉलोअर्स ऑफ उपनिषद एक वैदिक युग कोई भी एक दूसरे के सामने नीच दृष्टि से नहीं देखेगा कोई भी एक दूसरे की निंदा नहीं करेगा जिसमें ज्यादा क्षमता है उसको सम्मान मिलेगा जिसमें कम क्षमता है उनके प्रति करुणा रखी जाएगी ये इंटीग्रेशन ऑफ सोसाइटी है वो इंटीग्रेटेड सोसाइटी उस समय था आज से है इसीलिए राम कृष्ण विवेकानंद लिटरेचर और रामकृष्ण भावधारानी होने के लिए सक्षम है बाकी जितने भी वर्ल्ड रिलीजन है जैसे कि इस्टेशन बुद्धिज्म फिर इस्लाम और क्रिश्चियनिटी तीन को हम वर्ल्ड रिलीजन के कैटेगरी में रख सकते हैं तीनों में देखिए कि वो दोनों तरह के साधकों के लिए इंटीग्रेटेड व्यवस्था है जो उच्च साधक है उनके लिए भी है जनरल साधक है उनके लिए यह भी है दैट इंटीग्रेशन इज व्हाट मेक्स देम वर्ल्ड रिलीजन आज यह जो क्रिश्चियनिटी या इस्लाम सब जगह पर फैला है आप ऐसा नहीं कह सकते स्वामी जी ने खुद कहा है कि तलवार के जोर पे या डरा करके धमका करके गन बोट डिप्लोमेसी से यह फैला है ऐसा आप नहीं कह सकते लोगों को आप बहुत ज्यादा समय मूर्ख नहीं बना सकते यू कैन मेक ए फूल ऑफ सम पीपल फॉर सम टाइम नॉट ऑल द पीपल ऑल द टाइम ऐसा जो कहते हैं तो वर्ल्ड रिलीजन होने के लिए डरा धमका के काम नहीं चलेगा यू विल जननली नी सम स्ट्रेंथ इनसाइड यू जो तुमने इफ यू आर इंटरेस्टेड इन दैट इद्रीस शाह का सूफिज्म बोलकर के एक किताब है उसको आप पढ़िए इंडिया में जो इस्लाम का जो पार्टिकुलर जो यह था उसका वह सूफिज्म ज्यादा फैला है अपने साउथ एशिया में तो य और सूफिज्म के ऊपर में बहुत अच्छी किताब है ये इड्राप किताब लिखने के बाद में ड्रश क्या कहता है पता है कि मुझे पता है कि वेदांत के साथ में इसका बड़ा मने मैच हो रहा है क्योंकि इसका रीजन मैं बताता हूं कि वेदांत ने हम में से कॉपी किया है और ठाकुर के बारे में पता है ना वो विज्ञान महाराज की बहन कि ऐसा ही किसी ने कहा था वो वहां पर गए दक्षिणेश्वर में वो गंगा का किनारे पर वो कपड़े वगैरा धोते हैं ना तो आपस में बातें कर रहे हैं तो किसी ने सुन लिया वो वो एक लेडी बोल रही है कि यही साधु है जिसने की कलकाता के 100 लड़कों का दिमाग बिगाड़ दिया है वो इनके पिताजी थे ना त्रिगुणा तीता अंद जी के तो ठाकुर का जब वैसे वो त्रिगुणा तीता नंद जी के ठाकुर के पास जाने के बहुत विरोधी थे तो ठाकुर का जब डेथ हुआ तो हंसते हंसते कहते हैं मैंने कालीघाट के कहीं पर जाकर के जप किया ना इसलिए वोह मर गया वो शशि महाराज के पिताजी वरा नगर आते हैं मास्टर महाशय को बोलते तुम लोग तो बड़े अच्छे हो बड़े सयाने हो यहां पर भी आते हो घर पर भी जाते हो तो वह भी मेरा लड़का भी ऐसा करे ना बिना मतलब का यहां पर क्यों परमानेंट रह रहा है शशि महाराज के पिताजी एक केदार है आप कथामृत पढ़ेंगे तो केदार के बारे में बहुत कुछ आता है यहां तक कि केदार तो डेप्युटी मैजिस्ट्रेट था उसको ना कि वह मुसिपालिटी का वाइस चेयरमैन ना कि ऐसा कुछ होना था तो ठाकुर वह शंभू मलिक ना किसी को जाकर के बोलते हैं कि केदार का कुछ करवा दो ना उसको बेचारे को बड़ी इच्छा है वहां पर जाने की उस पोस्ट पाने की तो किंतु खैर केदार का तो डेथ हो गया था ठाकुर के रहते रहते ही तो अधर अधर सॉरी हां अधर सेन अधर अधर अधर ठीक बोल रहे हैं अदर हां अदर ही ना अदर ही हां वही जो कि डेप्युटी था और फिर जिसका डेथ हो गया था हां वही हां हां हां वही वही वही हां व देखना पड़ेगा कंफर्म करना पड़ेगा दो में से एक है तो वो भी एक था एक बात है जैसे देखिए कि कथामृत के बारे में जो कुछ कुछ लोगों का है कि वे लोग कहते हैं कि देखिए कि जो गृहस्थ भक्तों को उपदेश दिए गए उसी को मास्टर महाशय रिकॉर्ड करते हैं जो त्यागी भक्तों को ठाकुर अलग से बुला करके सीक्रेट सब बताते थे सो दैट इज नॉट रिकॉर्डेड सो एक यह हमको ख्याल में रखना है कि वो ठाकुर जिस तरह से टाइम देते थे दैट वाज वेरी प्रोपोर्शनल टू व्हाट दे फ्यूचर प्रोस्पेक्ट वेर ओनली थिंग इज कि कथामृत इज लिमिटेड इन दैट रिकॉर्ड कि तो मास्टर महाशय वीकेंड में ही जाते थे गृहस्थ लोगों के साथ में बैठते थे यहां तक कि मास्टर महाशय जो क्रिसमस की छुट्टी में वहां रहे थे उसमें जो ठाकुर के साथ में इन डेप्थ उनका जो डिस्कशन हुआ था वह मास्टर महाशय इतना सब कुछ लिखते नहीं है कि वह किस तरह से सेटिस्फाई होकर के वापस आए फिर किस तरह से उन्होंने ठाकुर को जीवन समर्पित किया बहुत सारी घटनाएं मास्टर महाशय के जीवन में होगी जो कि उन्होंने लिपिबद्ध नहीं किया है सो दैट वी हैव टू अंडरस्टैंड कि कथामृत वेरी लिमिटेड रिकॉर्ड ऑफ ए डिस्कशन विथ वेरी लिमिटेड पीपल रात को क्या होता था पता नहीं सबको भगा कर के ठाकुर कमरे का दरवाजा बंद करके क्या-क्या बोलते थे देखिए पूरे धर्म के इतिहास में सबसे इंपोर्टेंट डिस्कशन जो होगा वह ठाकुर ने अपने अंतिम समय में काशीपुर में नरेण के साथ में जो किया है दैट मस्ट बी वन ऑफ द मोस्ट मतलब अर्थ शटरिंग डिस्कशन इन द हिस्ट्री ऑफ रिलीजियस थॉट कि जिसके बारे में हमको एब्सलूट कुछ नहीं पता है हम अनुमान करते हैं अब स्वामी जी ने शिव ज्ञाने जीव सेवा प्रारंभ की स्वामी जी बिल्कुल शुरू से ही मां के प्रति इतने आस्थावान थे तो अभी हम गैस वर्क करके कहते हैं यह सब ठाकुर की इंस्ट्रक्शन का पार्ट होंगे बट इन फैक्ट इन प्रैक्टिस वी डू नॉट नो एनीथिंग हां ना इट इज पॉसिबल कि आप वो पता है ना वो प्रकाश की किरण जो है प्रकाश की किरण 3 लाख किलोमीटर की गति से ट्रेवल करती है तो आज से आप यदि 3 लाख किलोमीटर चले जाए तो एक सेकंड पहले का हिस्ट्री देख पाएंगे तो कैलकुलेट करके देख लीजिए आज से 200 साल पहले की प्रकाश की किरण कहां तक पहुंची होगी तो इतने दूर टाइम मशीन में चले जाइए वहां से टेलिस्कोप रख करके देख लीजिए कि क्या हो रहा है इट इ एटर थियोरेटिकल इट इ पॉसिबल इन प्रैक्टिस वी डू नॉट [हंसी] नो ना वो तो आपको वो टेलिस्कोप से वो पता चल जाएगा मने वो देर आर इनफ पॉसिबिलिटीज वो लेजर मॉडले टेक्नोलॉजी इ एसिस्टिंग अवेलेबल थियोरेटिकली एवरीथिंग इ पॉसिबल और और एक जो ऑप्शन है जैसे कि वह नरसिंह मेहता ने रासलीला का दर्शन किया था भाव चखू है मने भाव की दृष्टि से ठाकुर ने जैसे कि चैतन्य लीला का दर्शन किया था कि चैतन्य लीला नगर कीर्तन चल रहा है चैतन्य देव का तो मास्टर महाशय बलराम बसु को उसमें देखा था सो अभी वो एक साधक भविष्य में आ जाए वह भाव नेत्र डेवलप कर दे वह संजय की दृष्टि तो वो फिर क्या हो रहा है सब निकाल लेगा ना उसकी कहानी है ना वो उसका जो आखिरी आखिर में उसकी मां वो पूर्ण को ठाकुर ने कहा था तुम विवाह मत करना तो उसकी मां ने जोर जबरजस्त की उसका विवाह करवाया अभी यह ठाकुर तो चले गए मां उद्बोधन में रह रही है तो पूर्ण की मां बार-बार मां के पास में प्रतिदिन आती है और जैसे ही वो आएगी ना मां वो नाराज होकर के कहेगी देखो यह आ गई और आकर के मां के सामने रोना शुरू करेगी कि मेरा पूर्ण बीमार है आप उसको बचा लीजिए अभी उसके मुंह पर थोड़ी ना मां कहेगी कि ठाकुर ने मना किया शादी करना ने को करवाने को क्यों शादी करवाई इसकी ऐ मुंह पर तो नहीं बोलेगी मां शांतोना देगी अच्छा अच्छा ठीक है ठीक हो जाएगा फिर वह चली जाएगी फिर दूसरे दिन फिर से रोती रोती आएगी मां मने मां उससे बड़ी नाराज थी किंतु अभी किसी के मुंह पर तो ऐसा बोलती नहीं थी मां बोल कर के सो आखिरी दिनों की इस तरह की कहानी हमको पता है व पूर्ण जब व बेलूरमठ वगैरह में जाता उनका बड़ा सन्मान होता था एवरीवन न्यू के उनका कैटेगरी क्या है सो अभी देखिए कि सिर्फ शादी हुई इसके लिए म इट नॉ सरी अभी शादी तो योगेंद्र महाराज की भी करवा दी गई थी झुठ मुठ का उनको फिर वह ठाकुर को बुलाना पड़ा कि उसको बोलिए पैसा दे दिया है तो मेरा पैसा वापस देना है तो बड़े नाराज हो गए कि अरे मैं थोड़ी ना उनका पैसा रखने वाला हूं फिर गए ठाकुर के पास में पैसा लौटाने के लिए तो ठाकुर ने पैसा बैसा की बात छोड़ दी और बाकी सब बातें करने लगे सिर्फ शादी हुई है दैट इज नॉट की मिसफॉर्चून इतना ग्रेट मिसफॉर्चून नहीं है राजा महाराज को तो ठाकुर ने अपने से घर भेजा था जाओ कुछ आखिरी कर्म बाकी है पूरे करके आओ सो दैट इज नॉट मिसफॉर्चून इनफ लगता है कि कर्म चंद्र का पूर्ण का और फिर कुछ होगा कर्मा इसको काटना होगा हां माने हां मने साधु के रूप में पुनर्जन्म हो सकता है वी डू नॉट नो इंटरेस्टिंग यह पता है ना रंग नाथा आनंद जी ऐसा कहा करते थे मैं गुडविन का अवतार हूं तो हा कुछ कुछ लोगों को उन्होंने कहा था तो क्योंकि वो तो लेक्चर इतना सुंदर देते थे स्वामी जी के भाव के अनुसार और हमको पता है कि गुडविन की बहुत सारी नोट मिस हो गई है व उसको पब्लिश नहीं हुआ है सो जैसे कि उसी का उद्धार करने के लिए रंगनाथ हजन जी के रूप में आए हैं हा हा कुछ कुछ अंतरंग को बताया था