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Sri Ramakrishna Kathamrita ·

श्रीरामकृष्ण कथामृत 27 Oct 1882 केशव सेन के साथ ठाकुर का नौका विहार 30 aug 2024

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ओम स्थापक य च धर्मस्य सर्व धर्मा स्वरूप अवतार षय कृष्णाय श्री राम कृष्ण कथामृत का पाठ हम कर रहे थे कल हमने देखा कि किस तरह से ठाकुर कहते हैं कि मां काली पतंग उड़ाती है और फिर यह पूरी उपमा देकर के पूरी गान के माध्यम से कहते हैं कि आशा वायु के जीवन में आशा होती है तो हमारा जीवन चलता है यह हमेशा देखेंगे कि कोई भी हम लोग जीवन के किसी भी स्टेज में हो आशा हमेशा हमारी बनी रहती है इसी आशा की मदद से ही आशा की आशा का सहारा लेकर के ही हमारा यह संसार चक्र चलता है आज हमको लगता है कि मेरे सामने में यह समस्या है वह समस्या है या तो फिर यह क्राइसिस है तो किंतु यह एक अच्छे दिन की आशा एक आकांक्षा एक होप जिसको इंग्लिश में कहते हैं वह हमेशा हमारे सामने रहता है कि हां भले आज मैं चाहे कितना ही मुसीबत में हूं कल मैं टुमारो विल बी अ बेटर डे जैसा इंग्लिश में कहते हैं कल एक अच्छा दिन आए आएगा कल नहीं तो परसों तो आएगा ही आएगा इस आशा के माध्यम से इस आशा को पकड़ करके हम लोग इस संसार में बने रहते हैं लोगों को वैराग्य क्यों नहीं होता एक प्रश्न होता है कि थोड़ा सा भी अभी जैसे भगवान बुद्ध को देखिए कि वह राजकुमार थे उनको इतना लग्जरी कंफर्ट में रखा था उनके पिताजी ने किंतु फिर भी उन्होंने जो दो तीन तीन एक विपत स दृश्य देखे उन्होंने एक तो बीमारी देखी एक तो एक बुढ़ापा देखा और मृत्यु देखा तो जैसे ही देखा तो वैसे ही उनको वैराग्य हो गया तो यह प्रश्न होता है कि यह जो कल प्रश्न हुआ था कि हम लोग तो इतना सब कुछ देख लेते हैं इतने सारे डेड बॉडीज देख लेते हैं इतनी सारी बीमारी देख लेते हैं इतना सारा वृद्धावस्था देख लेते हैं फिर भी हमको यह ज्ञान क्यों नहीं होता कि यह जन्म मृत्यु जरा व्याधि के चक्र से बाहर निकलने का एक ही माध्यम है श्री प्रभु के श्री चरणों में शरणागति ये ज्ञान हमको होता क्यों नहीं है यह संसार चक्र चलता ही रहता है चलता ही रहता है उसका रीजन है यह आशा आशा हमेशा हमको यह भरोसा दिलवा है कि हां आज भले ही चाहे हमारे साथ में कुछ भी हो रहा हो कल का दिन एक ऐसा आएगा कल का दिन टुमारो विल बी ए बेटर डे कल मैं इस सब मुसीबत को पार करके मेरा घर भी बहुत अच्छा चलेगा सब कुछ अच्छा चलेगा तो इस आशा रूपी जो पवन है आशा रूपी वायु है उसके के ऊपर में हमारा ये जीवन चक्र हमारी पतंग वो उड़ती रहती है और इस पतंग को जमीन से किस तरह से बांध दिया है मां ने तो यह माया रूपी धागे से मां ने इसको बांध करके रखा है यह जो विषय वासना एं हैं यह सब ऐसी है कि वो हमको ऊपर में उठने नहीं देती तो इस धागे से माने इस पतंग को बांध के रखा है और फिर जब मां की इच्छा होगी तब एक दो पतंग को काट देगी यह पतंग फिर मुक्त होकर के गगन में विचरण करेगी और मां तब हाथ ताली देते देते ताली बजाते बजाते वो हंसेगी और आनंद प्रकाश करेगी तो अभी ये जद मां काली का ऐसा स्वरूप है इच्छा मई तारा तुही तो तुम यदि इच्छा करने से ही किसी को मुक्ति दोगी इच्छा करने से ही किसी को बंधन में रखो गी तो यह प्रश्न होता है कि जो ऋषि मुनि हजारों साल तक तपस्या करते रहे अपने खुद के ऑर्डर में आप देखिए कि ठाकुर की महासमाधि के बाद में दो विचारधाराएं बन गई थी एक तो रामचंद्र दत्त वगैरा जो ठाकुर के जो गृही शिष्य थे गृहस्थ शिष्य उन्होंने कहा कि हमने तो भगवान श्री राम कृष्ण के चरण कमलों को स्पर्श किया है कल्पतरु दिन अर्थात की फर्स्ट जनुअरी 18864 चैतन्य होक अर्थात कि तुम लोगों को चैतन्य प्राप्ति हो और जिनको जिनको ठाकुर ने स्पर्श किया था उन सबको उसी समय किसी ना किसी दिव्य अनुभूति हुई थी किसी को ईश्वर का दर्शन हुआ था किसी को अपने इष्ट देवता का दर्शन हुआ था किसी को कुछ ना कुछ इस तरह से कोई ना कोई दिव्य अनुभूति हुई थी तो कल्पतरु के दिन यह रामचंद्र दत्त वहां पर थे उनको भी यह आशीर्वाद मिला था चैतन्य हो तुम को इस तरह से तो वह कहते हैं कि जब युगा वतार ने हमको जब आशीर्वाद दिया है तो हमको फिर यह सब साधन भजन तपस्या करने की क्या जरूरत है वो तो वो लोग करेंगे जिनके पास में कुछ नहीं है वो जिनका बैंक बैलेंस बिल्कुल जीरो है वे लोग साधन भजन तपस्या करेंगे हमारा बैंक बैलेंस फुल हो चुका है तो इसलिए हमको अभी बस आनंद में नृत्य कीर्तन करना है वह सुबह को नगर कीर्तन करते थे जैसे कि चैतन्य महाप्रभु नगर कीर्तन करते थे अपने सब भक्तों की टोली को लेकर के प्रभु का गुणगान करते-करते पूरे नगर में वो घूमेंगे वो फेरी प्रभात फेरी जैसा कुछ करते-करते तो इसी तरह से ये रामचंद्र दत्त कहते हैं कि हम लोग नगर कीर्तन करेंगे आनंद से रहेंगे ऑन द अदर हैंड ये जो त्यागी संतान थे ठाकुर के नरेंद्र था फिर ये राजा महाराज थे ये बाबूराम महाराज थे योगेंद्र महाराज थे 16 डायरेक्ट डिसाइल थे ठाकुर के त्यागी संतान उसमें से कुछ-कुछ उस समय नहीं आए थे जैसे कि विज्ञान नंद जी महाराज है उन्होंने बहुत बाद में जवाइन किया था आलम बाजार मठ में जॉइन किया था किंतु ज्यादातर जो ठाकुर के जो त्यागी संतान थे वह बराह नगर मठ में आकर के मिले थे तो वे लोग कहते हैं कि नहीं ठाकुर ने हमको कहा है कि तुमको जब ध्यान तपस्या कठोर तपस्या करनी ही पड़ेगी और इसके हिसाब से उन्होंने जो कठोरता जो एक कठोर तपस्या राह नगर मठ में प्रारंभ की उसको देख कर के किसी के भी मन में संदेह होगा कि अरे यह तो फिर ये इतना विरोधाभासी जो है रामचंद्र है वह पूरे गृहस्थ है पूरे आनंद से रहते हैं अपने परिवार जनों के साथ में और यहां पे है कि इतनी कठोरता इतनी कठोरता उन लोगों के पास में खाने के लिए खाना नहीं होता था कभी-कभी पहनने के लिए वस्त्र नहीं होते थे जिस घर में रहते थे बड़े सस्ते के बड़े सस्ते में वो भाड़े प लिया था सस्ते में क्यों मिला था क्योंकि वो कहा जाता था कि वो भूत का घर उस घर में भूत रहते हैं वो भूतड़े बाड़ी बांगला दे बोले तो वो भूत वाले घर में वो वहां पे इस तरह की माना जाता था बोलकर के उस घर में कोई रहने को तैयार नहीं था तो उसका जो मकान मालिक होगा उसने कहा कि चलो यह बिना मतलब खंडहर की तरह पड़ा रहता है उसकी बजाय थोड़ा बहुत मिनिमल रेंट तो मुझे मिलेगा भाड़ा तो मिलेगा इसका बोल कर के मिनिमल वो भाड़े प उसको दे दिया था महीने पे तो इस तरह से एक भूत भूतिया घर में ये लोग लोग रहते थे वहां पर वो पहली बार ये विज्ञान विरजानंद जी महाराज ने काली कृष्ण महाराज तो वो तो स्टूडेंट है उस समय तो पहली बार जब जाते हैं तो बड़ा ही सुंदर वर्णन किया है कि किस तरह की जगह है नीचे में जाकर के देखे ग्राउंड फ्लोर पूरा वो वहां धूल मिट्टी और वो पेड़ पौधे निकल गए हैं इस तरह का है वो सही में लगता है कि खंडरई है ग्राउंड फ्लोर फर्स्ट फ्लोर प थोड़ा बहुत कुछ रहने की व्यवस्था है वह एक होल घर है फर्नीचर जैसा कुछ है नहीं चटाई बिछा करके ये लोग सब बैठे हुए थे त्यागी संतान ठाकुर के तो इस तरह की परिस्थिति में ये लोग रहते थे तो ये इतना बड़ा विरोधाभास तो विरोधाभास का कुछ तो लॉजिक होना चाहिए कि एक्चुअली ठाकुर का क्या कहना है कि जयदिश को मन समर्पण कर दिया तो फिर बस आप आनंद से रहिए क्योंकि ईश्वर की इच्छा पे है अभी कि आपको मुक्ति देनी की नहीं देनी आप कुछ भी करें कुछ ना करें कुछ मिलने वाला उससे कुछ होने वाला नहीं ईश्वर क्या कोई आलू टमाटर है कि बाजार में जाएंगे कहे कि भैया इतना रुपया लो एक किलो आलू दे दो एक किलो टमाटर दे दो तो मैंने इतनी तपस्या क्या इतना जप किया तो मुझे इतना ईश्वर का दर्शन दे दो या तो फिर मेरी यह मनोवांछित रीजन है तपस्या करने का दूसरा है कि लोक कल्याण के लिए सन्यासी तपस्या करता है जिस क्षण उसने सन्यास धारण किया विरजा होम किया उसी क्षण उसके ये जितने भी कर्मों का फेरा है वो मिट गया और फिर उसके बाद में जो तपस्या करता है वह लोक कल्याण के लिए करता है तो यहां पर ठाकुर ने किस हिसाब से किस लॉजिक लगा कर के इन दोनों ग्रुप को बनाया था और बात ऐसी है कि ठाकुर खुद तो वैसे ग्रुप बनाने वाले नहीं थे ठाकुर खुद तो ऐसा कहने वाले नहीं थे कि तुम लोग इस तरह से रहो उस तरह से रहो किंतु न द अदर हैंड ठाकुर के पास से यदि कोई ना कोई हिंट ना मिली होती तो ये लोग ऐसा करते ही क्यों कोई कोई कोई गृहस्थ भक्तों का भक्त मालिका में है कि कोई कोई गृहस्थ भक्तों को ठाकुर कहते हैं कि अभी तुम्हारे लिए त्याग का रास्ता नहीं है तुम्हारे लिए कीर्तन का रास्ता है तुम लोग कीर्तन करो नियमित रूप से करो साधुओं की साधकों की सेवा करो ये साधु और साधकों की सेवा और नृत्य कीर्तन यह है तुम्हारा रास्ता तो इस तरह से ठाकुर ने इस तरह से दोनों प्रकार के शिष्य है उनके भक्त है उनको इनकरेज किया था उनको उन्होंने इस तरह से ट्रेन किया था उनको इस तरह से उन्होंने गाइड किया था तो दोनों रास्ते हमारे सामने है तो फिर हमको प्रश्न होता है कि हमारे लिए कौन सा रास्ता है कि क्या हम ईश्वर के ऊपर में संपूर्ण शरणागत होकर के बैठे रहे कि हां ईश्वर अभी तुम जो करोगे वही होगा या तो फिर मैं साधन भजन तपस्या करना प्रारंभ करूंगा तो इसमें ऐसा है ना कि अपना हृदय ही बता देता है कि क्या करना है क्या नहीं करना है जैसे कि यह आशा क्यों संसार चक्र से हम मुक्त नहीं होते क्यों हमको वैराग्य नहीं होता हमेशा के लिए कल की एक आशा बनी रहती है जिस दिन यह आशा मिट गई उसी दिन हम लोग वैराग्य के रास्ते पर जाना शुरू कर दिए ये जो एक कहते हैं ना कि आशा परमम दुखम नैराश्य ही परमम सुखम अर्थात कि आशा ही है परम दुख जितने दिन तक हम आशा बनाए रखेंगे आश रख के बैठेंगे कि आने वाला कल अच्छा होने वाला है तब तक हमको क्योंकि आने वाला कल अच्छा ना भी हो तो जब तक ना हो अच्छा तब तक की आशा की बद वजह से हम लोगों के मन में सब समय कुठाराघात होता रहेगा सब समय एक ना एक आघात मिलता रहेगा कि अभी देखिए कि मैं ही मेरी ही बात बताता हूं यदि मुझे कोई काम करना है यहां पर अभी पब्लिकेशन की बात है कि यह आर्टिकल है मुझे यह कंप्लीट करना है तो मैं हमेशा एक आशा रख के बैठता हूं कि कल मुझे थोड़ा सा टाइम मिलेगा कल में ये आर्टिकल समाप्त कर दूंगा किंतु दूसरे दिन समय नहीं मिला आर्टिकल पूरा नहीं हुआ आर्टिकल पब्लिश करने का वो जो डेडलाइन है वो भी पास में आ जा रहा है अभी जब तक आशा रख के बैठता हूं कि हां मुझे आर्टिकल लिखना है कल मुझे समय मिलेगा कल मैं आर्टिकल लिखूंगा तब तक जितने दिन मुझे आर्टिकल लिखने का समय नहीं मिलता वह नैराश्य यानी कि ये दुखी में होता रहूंगा फिर एक दिन मैंने छोड़ दिया आर्टिकल लिखना ही नहीं है जाने दो नहीं लिखना जभी समय मिलेगा तब लिखा जाएगा यह डेडलाइन को छोड़ दो ये आने वाले इशू को छोड़ दो तो राश्य अभी पूरी आशा छोड़ दी है अभी मैं शांति से रहता हूं तभी एका एक एक दिन समय मिल गया और मैंने आर्टिकल लिख भी दिया वो कोई भी प्लान नहीं था उसके बारे में तो इस तरह से कि ये आशा ही परमम दुखम जितने दिन आशा रखते हैं तब तक आशा पूर्ण नहीं होने तक दुख में जाते रहेंगे नैराश्य ही परमम सुखम जिस दिन हमने इस जगत में सुख प्राप्ति की आशा को छोड़ दिया तभी से हम परम सुख में चले जाएंगे क्योंकि ईश्वर के रास्ते पर त्याग वैराग्य के रास्ते पर चलना शुरू किया है अभी त्याग वैराग्य का अर्थ यह नहीं है कि चलो सन्यासी हो जाओ रजा हो करके गृहस्थाश्रम में रह कर के भी मन से धीरे-धीरे करके त्याग होना प्रारंभ होता है जब तक यह पूरी हम लोग प्लान करते रहते हैं कल यह करूंगा परसों वो करूंगा उस रिलेटिव के साथ में यह काम है उस रिलेटिव के वहां पर जाना है वो सब धीरे-धीरे छोड़ते रहना है मन के भीतर में से इस तरह से रहना है कि हां ईश्वर जो सामने लाएंगे वह कर्म में करूंगा ईश्वर जो अपॉर्चुनिटी सामने लाएंगे उस अपॉर्चुनिटी का फायदा उठाऊंगा किंतु मैं सामने से प्रोएक्टिवली कुछ प्लान नहीं करूंगा कि हां मुझे यह करना है अभी नहीं हुआ तो उसके लिए मैं दुखित हो गया ऐसा नहीं बस एक ईश्वर के ऊपर में छोड़ दो ईश्वर जिस तरह से रखेंगे उस तरह से रहेंगे अभी यहां पे दूसरा भी एक डर है वैसे जब हम ये कहेंगे कि राश्य ही परमम सुखम तो जब आदमी ज्यादातर हम लोग देखते हैं कि आदमी जब निराश हो जाता है तो वो डिप्रेशन में चला जाता है तमस में चला जाता है तो ऐसा नहीं है कि नैराश्य होने से ही सब कुछ हो गया नैराश्य होने के बाद में यह जगत का प्लानिंग करने के बाद में किंतु आध्यात्मिक हमको एक रूटीन एक फ्रेमवर्क जीवन का बनाना पड़ेगा एक नियम बनाना पड़ेगा कि इस समय हमको सत्संग करना ही है इस समय हमको मंदिर में जाना ही है इस समय पाठ या स्वाध्याय करना ही है इस समय बैठ कर के इतना जब ध्यान करना ही है वह फ्रेमवर्क होना चाहिए वरना तो जब आशा छोड़ दी तो सीधा हम तमस या तो फिर प्रेशन में उदासीनता में जाकर के डूब जाएंगे तो एक्चुअली आशा छोड़ कर के हमको सत्व में जाना है रजस आशा रखने और आशा के लिए प्लानिंग करना वो सब रजस का राज्य का खेल है तो यह सत्व रजस तमस सत्व है कि मन की शांत अवस्था रजस है कि ये आशा रखना और आशा मिटाने के लिए सब सब कार्य करते जाना वो और तमस है नैराश्य डिप्रेशन की अवस्था जिस दिन हम आशा और कर्मा दोनों त्याग करेंगे उस दिन 99 पर पॉसिबिलिटी है कि हम तमस में जाकर डूबे तो वो नहीं होने देना है आशा त्याग भी स्टेप बाय स्टेप करनी है साथ-साथ में सत्व को बिल्ड अप करते रहना है आध्यात्मिक जीवन की रूटीन जो है फ्रेमवर्क उसको बिल्ड अप करते रहना है तब कहीं जाकर के धीरे-धीरे करके ये आशा त्याग करनी है वरना बोला कि चलो आशा त्याग कर दो तो कर द त्याग तो सीधा जाकर के और बड़ डीपर गड्ढे में जाकर के गिरेंगे तो वो यह सब थोड़ा सा सोच समझ कर के करना होता है आध्यात्मिक जीवन जैसे कि वो तलवार की धार के ऊपर में चलने के बराबर है एक और है कर्म दूसरी ओर है डिप्रेशन या तो फिर कहो निराशा या तो फिर उदासीनता ये आपने यदि बहुत ज्यादा कर्म कर दिया तो रजस में चले जाएंगे कर्म को कम करने का प्रयास करेंगे तो निराशा में डूब जाएंगे डिप्रेशन में चले जाएंगे हताशा में डूब जाएंगे तो ये हताशा से भी अपने को निकालना है और कर्म के वो जो चक्र है जो कि हमको फसा ही जाता है फसा ही जाता है अपने वह वो काल विष चक्र में उससे भी बचना है एक तो यह दोनों से बचने के लिए क्या करना है एक स्पिरिचुअल फ्रेमवर्क चाहिए अपने जीवन में नियमित सत्संग नियमित मंदिर का दर्शन कोई भी मंदिर में जाकर के नियमित रूप से स्वाध्याय नियमित रूप से जप यह सब कुछ करते रहना है तब कहीं जाकर के हम लोग कर्म का चक्र और हताशा और निराशा का यह गड्ढा इन दोनों से हम लोग बच पाएंगे तो ये था कि किंतु फिर भी ये बेसिक क्वेश्चन तो रहता ही है कि मां की इच्छा ना कि हमारी तपस्या बेटर है कि जब तक हमको इसका कोई उत्तर नहीं मिलता और इस संसार में सभी प्रश्नों का उत्तर मिलता भी नहीं है दोनों करते जाओ पर मां के ऊपर में भी भरोसा करके बैठो और साथ-साथ में साधन भजन तपस्या भी करते जाओ साधन भजन तपस्या किस तरह से करनी है यह सोच कर के कि एक तो है कि मां के ऊपर में शरणागति जो कुछ भी होगा मां के हाथ में है यह तो एक हो गया अपना मन का भाव दूसरा भाव हो गया कि साधन भजन तपस्या करते ही जाना है किंतु बिना किसी आकांक्षा के बिना किसी आशा के कि मैं मैंने वो एक सुंदर कहानी है ना ठाकुर ने कहा है कि दो साधु थे दो साधक थे एक पेड़ के नीचे में बैठ कर के जप कर रहे थे ध्यान कर रहे थे तो वहां से नारद मुनि पसार हो रहे हैं तो दोनों ने कहा कि हम लोग बहुत सालों से तपस्या कर रहे हैं कुछ मिल नहीं रहा है आप तो बैकुंठ लोक में जा रहे हैं वहां पर जाकर के भगवान को पूछेगा कि हमको मुक्ति कब मिलने वाली है तो अच्छा ठीक है नारद मुनि ने कहा वैकुंठ से वापस आकर के उन्होंने कहा कि भगवान का कहना है कि यह जो जिस पेड़ के नीचे में बैठ कर के तुम लोग तपस्या कर रहे हो इस पेड़ के ऊपर में जितने भी पत्ते हैं इतने सहस्त्र साल बीतें तब मुक्ति मिलेगी तो एक तो पूरा निशा निराशा में ही डूब गया अरे बाप रे ऑलरेडी इतने साल तपस्या की की है अभी और इतने साल तपस्या कब इसका अंत आएगा कब मुझे कुछ मिलेगा दूसरा है कि खड़ा होकर के नृत्य करना शुरू कर दिया आनंद में तो नारद मुनि पूछते हैं क्यों रे तुमको ये बात सुन कर के तुमको हताशा नहीं हुई कि इतने सालों के बाद तुमको तब मिलेगी मुक्ति तो वो जो साधक है जो बड़ा ही आनंदित हो गया था वो कहता है कि अरे महाशय इतने दिनों के बाद मुक्ति मिलेगी तो सही ना वरना तो पहले तो सोच के रखा था कुछ भी नहीं मिलने वाला तपस्या करके किंतु एटलीस्ट मिलेगा भले ही चाहे उसके लिए दिन चला जाए तो देखिए ये दो व्यू पॉइंट है वो कहते हैं ना कि आधा गिलास भरा हुआ है पानी का तो आपका व्यू पॉइंट क्या है नेगेटिव व्यू पॉइंट है कि पॉजिटिव जिसका पॉजिटिव व्यू पॉइंट है वो कहेगा ग्लास आधा भरा हुआ है और जिसका नेगेटिव माइंड सेट होगा वो कहेगा गिलास आधा खाली है अभी गिलास एक ही है व वो आधा पानी 50 पर पानी है 50 पर हवा है दोनों का व्यू पॉइंट देखिए एटीट्यूड देखिए तो इस तरह से कि साधना करते हैं तो फिर यह सोच कर के यहां प वो एक दूसरी आशा बना कर के नहीं बैठ जाना है वहां पर मैं संसार में मैं इतना मेहनत करता हूं तो मुझे इतना रुपया तो मिलना चाहिए वो एक आशा थी जिसकी वजह से हम निराशा में डूब जाते थे यहां पर वही आशा लेकर के आए साधन भजन में कि हां मैं 10 दिन में यदि 1000 जप करता हूं मान लीजिए तो मुझे इतना दिन के बाद में शांति तो मिलनी ही चाहिए यह घटना होगी मेरे साथ में तो मेरा मन तो एकदम स्थिर होना ही चाहिए कोई मुझे कुछ कह दे तो मेरे मन में किसी भी तरह का रिएक्शन नहीं होना चाहिए किसी भी तरह का मेरे सामने प्रलोभन आ जाए तो मैं एकदम निर्लिप्त रहूंगा किंतु कहां यह सब तो हो नहीं रहा है जैसे ही प्रलोभन आ गया वैसे ही मन विचलित हो गया जैसे ही किसी ने कुछ कहा या कुछ ऐसी घटना हुई जो कि मुझे पसंद नहीं है वैसे ही मेरा मन अशांत हो गया तो कहां मैं तो इतना जप कर रहा हूं इतना ध्यान कर रहा हूं इतना सत्संग कर रहा हूं इतना स्वाध्याय कर रहा हूं फिर भी मेरे मन में कोई फर्क नहीं पड़ रहा ऐसा क्यों हो रहा है तो सेम थिंग जो संसार में आशा रख कर के हम बैठे थे कि मैं इतनी मेहनत करूंगा तो यह प्रमोशन मिलेगा यह बेनिफिट मिलेगा इतना रुपया मिलेगा तो कहां मुझे कुछ नहीं मिला वही आशा से निराश होकर के हम लोग यहां पर आए हैं यहां पर वही आशा लेकर के बैठे है कि वो मैं इतना जब ध्यान करने से इतना मिलेगा इस आशा का त्याग करके आशा ही परमम दुखम जितने दिन हम इस अपेक्षा लेकर के बैठेंगे कि मैं इतना करने से मुझे इतना मिलना ही चाहिए भले वो चाहे संसार में हो ना कि चाहे आध्यात्मिक रास्ते पर हो साधन राज्य में हो कि संसार राज्य में हो जितने दिन हम लोग आकांक्षा ये एक्सपेक्टेशन रख के बैठेंगे उतने ही दिन हमारे हाथ में ये निराशा के अलावा और कुछ आने वाला नहीं तो आशा त्याग करके कर्म करना है यदि संसार में भी रहते हैं तो संसार की जो हमारी ड्यूटीज है संसार का जो धर्म है उसको निभाना है कि हां मैं पितृ धर्म जैसे है मातृ धर्म जैसे है संतान धर्म है विद्यार्थी धर्म है जो जिस जगह पर है उसका एक एक धर्म रहता है उसकी एक एक ड्यूटी रहती है उसको बिना किसी आकांक्षा रखे हुए बिना किसी एक्सपेक्टेशन के अपनी ड्यूटी को निभाना है और यहां पर भी साधक को भी वही चीज चाहिए कि जब ध्यान तपस्या करने का उसका ड्यूटी है साधन राज्य में यदि साधन पथ पर चल रहे हो और साधना नहीं करोगे तो साधक किस काम के तो साधना करने का उसका धर्म है बिना किसी आशा के बिना किसी एक्सपेक्टेशन के बिना किसी परिणाम के उसको करते जाना है कि हां सुबह को उठ कर के मैंने जद ठीक किया है कि 15 मिनट 20 मिनट मैंने जो मंत्र लिया है मेरे गुरु महाराज जी ने जो मुझे मंत्र दिया है उसका मुझे जप करना है वोह चाहे 108 हो ना कि एकज आठ हो न कि कोई कोई लोग तो लाखों जप कर लेते हैं मां के बारे में कि मां प्र दिन एक एक लाख जप करती थी जब भी देखोगे मां के होठ चलते रहते हैं अर्थात कि वो जप करती रहती है ये ठाकुर इसके बारे में कहते थे राजा महाराज के बारे में राजा महाराज के दिखा कर के उनकी ओर इशारा करके ठाकुर के देखो कि उसके होठ चल रहे है सब समय उसके अर्थात कि वो मन में ही मन में जप करता रहता है सतत जप करता रहता है तो इस तरह से एक सतत जप चलता रहे या तो फिर यह बैठ कर के विधिवत हम जप करें ये कैसे भी हो ये जप करना फिर यह स्वाध्याय अर्थात कि यह कथामृत जैसे धार्मिक ग्रंथों का पाठ कथामृत है भागवत है या फिर यह वाल्मीकि रामायण है कोई भी है सत ग्रंथों का पाठ करना मंदिर में किसी भी मंदिर जो अपने पास में हो अपने घर के वहां पर नियमित जाना साधुओं का कोई अच्छा सत्संग करना यह सब नियमित रूप से चलता रहे किंतु बिना किसी अपेक्षा के जिस दिन हमने यह अपेक्षा रख ली कि इतना करने के बाद में भी मेरे मन में शांति क्यों नहीं आ रही है उसी दिन हम उसी गलती करेंगे जो गलती हमने संसार के रास्ते पर चलते हुए की थी कि आशा रख कर के कार्य किया है और सामने निराशा आ रही है और अभी हम हताश हो गए बिना किसी आशा के जब तक हम कर्म करेंगे देखेंगे कि धीरे-धीरे करके शांति अपने आप में अपने हृदय में प्रकट होगी यह जो एक निर्लिप्त है एक मन का एक हल्का पन है एक छोटी मोटी चीजों में विचलित नहीं होना है एक स्थिर ता है अपने हृदय की अपने मन की शांति है यह सब ऑटोमेटिक प्रकट होगा और इतना ही नहीं दूसरे लोग नोटिस करेंगे दूसरे लोग देखेंगे कि हां इनके भीतर में शांति कितनी है जाकर के उनके पास में दो घड़ी बैठते हैं जिससे कि हमारे मन को भी थोड़ा सा सुकून मिले इस तरह से यह आध्यात्मिक गुण राजी आध्यात्मिक गुणावती अपने आप में यह प्रकट होगी यह शं एक बड़ा ही सुंदर वेदांत का ग्रंथ है मणि रत्न माला तो अर्थात कि ये रत्नों की माला इतने सुंदर सुंदर उपदेश दिए हैं प्रत्येक उपदेश एक रत्न के बराबर है तो ये रत्न रूपी गुण राजी हमारे पास में भले ही चाहे बैंक में वो सेफ डिपॉजिट में गहने वगैरह ज्यादा नहीं हो किंतु ये जो गुण है ये मन की शांति मन की स्थिरता मन की अविचल मन का आनंद ये किसी बैंक के सेफ डिपॉजिट में रखे हुए गहनों से लाखों गुना कीमती है इसी को देख कर के लोग आपके प्रति आकर्षित होंगे आपका संग करने के लिए वे लोग लालायित रहेंगे तो यह गुणराज कैसे प्रकट होगी कब प्रकट होगी तो यह बिना किसी आशा रख करके संसार का और साधना का कर्म कार्य करना तो अभी थोड़ा सा आगे बढ़ते हैं अभी एक ब्रह्मा भक्त है वह ठाकुर को प्रश्न करते हैं अभी य ने कहा ना कि तीनी लीला मय य संसार तार लीला अर्थात की मां काली लीला मय है वो लीला वो करती है संसार उनकी लीला है तिनी इच्छामृत्यु लोग है उसम से 10 15 लोगों को मुक्ति दे देगी यदि लाख में एक इस तरह से जद य स्टेटिस्टिक्स चला है तो करोड़ में 10 इस तरह से वो करोड़ों करोड़ों की जो संख्या है 700 करोड़ की उसमें कितने होंगे इतने लोगों को मुक्ति देगी मा तो एक ब्रह्मा भक्त पूछता है कि महाशय तीनी तो मने करले सकल के मुक्त करते पारेन महाशय मा जद इच्छा मय है भक्ति मुक्ति और बंधन की चाबी उनके हाथ में है तो वो तो इच्छा करके सभी को मुक्त कर दे सकती है तबी केनो अमाद संसारे बुधु कोरे रेखे चन यदि सबको मुक्त कर देने की शक्ति उनके पास में है तो हम सबको संसार में बद्ध करके उन्होंने क्यों रखा है और बड़ मने इस बड़ा ही लेजिटीमेट क्वेश्चन है भाई कि यदि आपके पास में यह पावर है सभी को मुक्ति देने का तो सबको आप मुक्त क्यों नहीं कर देती है यह तो ऐसा हो गया एक कंपनी में आप नौकरी कर रहे हैं कंपनी का रेवेन्यू है बड़ा ही लिमिटेड है तो जिसको सैलरी मिलता है उसके एंप्लॉयज को वो भी बड़ी ही लिमिटेड मिलती है किंतु मान लीजिए कंपनी का रेवेन्यू अनलिमिटेड है किंतु अनलिमिटेड रेवेन्यू होने के बाद में भी अपने एंप्लॉयज को सैलरी बढ़ाते नहीं है तो यह किस तरह की कंपनी है भाई यदि आपके पास में अनलिमिटेड रेवेन्यू है आपका प्रॉफिट इतना है कि वो जोहे आसमान को छूता हो तो आप एंप्लॉई का सैलरी बढ़ाइए उनके प्रति भी थोड़ा सा दया कीजिए इतना ूर हृदय क्यों रखते हैं इतना प्रॉफिट पीछे आपके क्यों दौड़ते हैं तो यहां पर भी ऐसा प्रश्न हो सकता है मां के पास में मुक्ति का आनंद का अनंत खजाना है तो वो मुक्त हस्त उसका वितरण क्यों नहीं करती क्यों वो क्रूर होक के क्यों वो एक कठोर हृदय रख कर के हमको तड़पाती है इस संसार में यह तो बड़ा ही वाज क्वेश्चन है तो ठाकुर क्या कहते हैं तार इच्छा मां की इच्छा है तार इच्छा ज तीनी शब निए खेला कोरेन मां की इच्छा है कि वो यह सब मुक्ति और बंधन लेकर के खेल खेलती रहे बूढ़ी के आगे थाक छूले दौड़ा दौड़ी करते होए ना यह बूढ़ी को छूना अर्थात की ये एक खेल है बच्चों का उसमें एक एक लकड़े की पोस्ट जैसा कुछ रखते हैं सबको उसको छूना होता है स्पर्श करना होता है उसको स्पर्श कर दिया तो आप उस खेल में से मुक्त हो गए व आप पास हो गए और जब तक आप उसको स्पर्श नहीं करते तब तक आपको दौड़ते रहना पड़ेगा खेलना खेलते रहना पड़ेगा तो वैसे ही यह ठाकुर इस खेल की उपमा देकर के कहते हैं कि यदि आप इस मूढ़ी को जद पहले से ही स्पर्श कर देंगे तो खेल ही रुक जाएगा खेल किस काम का बच्चे लोग खेलते क्यों है आनंद पाने के लिए अभी यह तो जद यह तो अभी मैं थोड़ा सा पॉपुलर एग्जांपल दे कर के कहूं क्रिकेट का क्रिकेट में यदि पहली ही ओवर में सभी लोग आउट हो जाए तो क्रिकेट किस काम का वो 50 ओवर्स का या 20 ओवर आजकल तो 20 ओवर फॉर्मेट बड़ा ही पॉपुलर है तो 20 ओवर्स तो एटलीस्ट खेलने चाहिए तभी तो ये लोग लाखों लाखों लोग आपको पैसा देकर के स्टेडियम में देखने के लिए आते हैं यह टेलीकास्ट ब्रॉडकास्टिंग के राइट जो है आईपीएल के राइट आजकल देखिए करोड़ों करोड़ों में वो बिकते हैं तो जद पहली ही ओवर में आपने सबको आउट कर दिया तो फिर यह करोड़ों रुपए का ये जो बिजनेस है वही बंद हो जाएगा फिर 20 ओवर्स या 50 इतना तो आपको खेलना ही पड़ेगा तब तो लोगर के लोग खेल देखेंगे लोग पैसा देंगे आपका रेवेन्यू चलेगा तो यहां पर भी यदि आप खेल ही समाप्त कर देंगे पहले में ही तो लोग दौड़ा दौड़ी करना किस बात का खेल किस चीज का सकले जद छुए फेले खेला केमन कोरे होय जद सभी लोग इस बूढ़ी को छू लेते हैं स्पर्श कर लेते हैं तो यह खेल किस तरह से चलेगा यदि पहली ही ओवर में सभी लोग हो जाते हैं तो क्रिकेट किस काम का शकोल छुए फेले बूढ़ी असंतुष्ट होए ये बढ़ सभी लोग जद ये छू लेंगे तो यह असंतुष्ट हो जाएगी खेला चोले बीर अलाद ये जब तक खेल चलता रहेगा तब तक बूढ़ी का आनंद बना रहेगा ताई लखे टो एकटा काटे हेश दाव मा आत चापड़ी इसीलिए लाखों में से एक दो को काट कर के हंसते हंसते मां देती रहे हाथ ताली यह जो गाना था उसके भीतर का यह एक पद है शपले आनंद ठाकुर का यह एक्सप्लेनेशन सुन कर के सभी लोगों को आनंद हुआ है अभी ठाकुर आगे कहते हैं तीनी मन के आखी ठेरे इशारा कोरे बोले दिए छ माने मन को इशारा करके बता दिया है जा एकन संसार कोगे जा जाओ तुम जाकर के अभी संसार करो मनर की दोष मन का इसमें क्या दोष है तीनी जदार दया कर मन के फिरिए देन ता होले विषय बुद्धिर हाथ के मुक्ति हो यदि माने मन को इशारा करके कह दिया है इशारों इशारों में समझा दिया है कि जाओ तुम अभी जाकर के संसार करो संसार की चीजों को लेकर के रहो उसी में डूबे रहो उसी में दौड़ते रहो तो इसमें फिर बेचारे मन का क्या दोष है कि वह संसार में डूबा रहता है यदि मां की इच्छा होगी तो वो संसार समाप्त करके अपने पास में सबको खींच लेगी तखन आबार तार पाद पद्य मन होए जदी मां की इच्छा होग तभी उनके पाद कमलों में कमल रूपी पद्म में उनके चरणों में हमारा मन फिर से जाएगा ठाकुर संसारी भावे मार काछ अभिमान कोरी ते छन ठाकुर संसारी का भाव अपने पर आरोप करके मां के पास में अभिमान करके गा रहे हैं आमी ई खेद खेद कोरी तुम माता थकले आमार जागा घोरे चूरी मैं उसी बात से असंतुष्ट हूं कि तुम मेरी रखवाल ने तुम रक्षक हो फिर भी मेरे घर में चोरी हुई है मने करी तुम्हारा नाम की करी किंतु समय पासरी किंतु मैं चाहता हूं कि तुम्हारा नाम करू किंतु समय के अनुसार वह हो नहीं पा रहा है तो यह पूरा गाना है इसको थोड़ा सा स्किप कर लेते हैं इसके बाद में ठाकुर क्या कहते हैं तार माया ते भुले ठाकुर संसारी हुए छे उसी की माया में भूल करर के मन संसारी हुआ है मनुष्य संसारी हुआ है प्रसाद बोले मोन दिए छे मनेरी आंखी ठठारी प्रसाद कहता है कि मन दे दिया है और उसी के इशारे से मन इस संसार में कार्य कर रहा है अभी इसके बारे में एक ब्रह्म भक्त कहता है कि महाशय सब त्याग ना करले ईश्वर के पा जावे ना महाशय क्या सब त्याग नहीं करेंगे तब तक क्या ईश्वर को प्राप्त नहीं कर पाएंगे श्री राम कृष्ण सहस्य ठाकुर हस्य पूर्वक कहते हैं नागो अरे नहीं भाई तुमा दे शोभ त्याग करते होबे केनो तुम लोगों को सब त्याग करना होगा क्यों तुमरा रोसे बोसे बेश आछो तुम लोग द चीज लेकर के आनंद में अच्छे से हो सारे माते शक हस्य अभी सारे गामा वो मतलब वो जो है उसमें वो ठाकुर कहते हैं ना कि सारे गामा पदानी नी पर ज्यादा रह नहीं सकते आपको नीचे में आ जाना पड़ेगा नी बड़ा ही तीव्र सर है तो व सारे गा वगैरह मृदु सर है वहां पर आप ज्यादा समय रह सकते हो तुमरा बेश आछो तुम लोग अच्छे हो नक्श खेला जानो अभी नक्श बोल कर के और एक दूसरा गेम है एक खेल है जिसके बारे में ठाकुर बता रहे है आमी ब काट जले गछ मैं ज्यादा काट कर के मैं ल जल गया हूं यानी कि अभी जैसे ठाकुर ने कहा कि बहुत ज्यादा साधना करने से ठाकुर कहते हैं कि अभी यह जल गया हूं यह ठाकुर देखिए उन लोगों के सामने कह रहे हैं हमारे लिए यह सब इस बात का कोई अर्थ नहीं है कि बहुत ज्यादा साधना करने से मैं एक तरह से मुझे उसके कंसक भुगतने पड़ रहे हैं तो यह बात हम लोगों के लिए नहीं है ये जो घोर संसारी जो लोग होते हैं उन लोगों को किसी भी तरह का एक एक्सक्यूज चाहिए कि संसार में रहने के लिए तो उनको डराना नहीं है अच्छा ठीक है तुम लोग संसार में रह कर के भी यह सब कर सकते हो किंतु हम लोग जो साधक है हमको पता है कि संसार हो ना कि सन्यास हो वैराग्य का रास्ता तो सबके लिए एक समान है संसार में रह कर के भी आप मन से धीरे-धीरे चीजों को आशाओं को त्याग कर सकते हैं और सन्यास के रास्ते पर तो कोई प्रॉब्लम ही नहीं है तो बहुत जदा जदा खेल करके बहुत ज्यादा साधना करके मैं जल गया हूं ठाकुर ने यह जो कहा उसको हमको इस बात को ज्यादा लेने की जरूरत नहीं है ठाकुर ने यह ज्यादा तपस्या की है बोलकर के ही तो हमको इस रास्ते पर चलने की प्रेरणा मिली है अदर वाइज हमारे भीतर में सद वृत्ति होती भी तो हमको गाइड कौन करता हमको रास्ता कौन दिखाता कि हां यह पूरा साहित्य है राम कृष्ण विवेकानंद साहित्य एक संघ है राम कृष्ण विवेकानंद संघ इस रास्ते प आओ और तुमको दिखाएंगे वो हमको कौन दिखाएगा इसलिए व ठाकुर जब कहते हैं कि ज्यादा ज्यादा साधन भजन करके मैं जल गया हूं तो इस बात को हमको लेने की आवश्यकता नहीं तोमरा खुब सेयाना तुम लोग बड़े मजे में हो क्यों क्यों दोष आछो क्यों छो आछो क्यों पाचे आछो यह सब खेल जो है नक्स उसके सब रेफरेंस है अर्थात कि तुम लोग कुछ ना कुछ लेकर के बड़े आनंद से रह रहे हो बेसी काटा हो नहीं ताई आर मते चले जाओ नहीं बहुत ज्यादा साधन भजन इस रास्ते में नहीं गए हो इसलिए तुमको बहुत ज्यादा तकलीफ नहीं है खेला चोलचे ये तो बेश यह खेल जब तक चल रहा है तब तक सब लोग आनंद में हो यह वही बात हो गई कि पहली ही ओवर में आउट हो जाना सर जद सं त्याग का रास्ता कैसा है कि यह खेल जो है यह गेम जो है व क्रिकेट इसको बंद कर दो तो हम लोग तपस्या करें किंतु जद क्रिकेट का गेम ही बंद कर दिया तो यह पूरा इसके ऊपर में जो ये रेवेन्यू है सब पूरा बिजनेस है वो कैसे चलेगा इसलिए क्रिकेट का अभी यह 20 ओवर के बाद में ना 50 ओवर के बाद में सब लोग आउट हो वो ठीक है तो यहां पर भी जैसे ये ब्रह्मचर्य आश्रम है फिर गृहस्थ आश्रम है 25 25 साल का ब्रह्मचर्य आश्रम फिर 25 साल का गृहस्थ आश्रम फिर 25 साल का वाण प्रस्थ आश्रम फिर 25 साल का सन्यास आश्रम तो यह ब्रह्मचर्य आश्रम अर्थात की अपनी विद्यार्थी अवस्था गृहस्थ आश्रम यानी कि संसार अवस्था और यह वानप्रस्थाश्रम अर्थात कि रिटायरमेंट यह सब लोग भुगत ये उसके भीतर में से जाकर के आनंद कर लो तब कहीं जाकर के तुम संसार संन्यास आश्रम में आना यह ब्रह्मचर्य आश्रम में से अर्थात की विद्यार्थी अवस्था में से सीधा सन्यास आश्रम ऐसा करने की कोई आवश्यकता नहीं वो वही लोग करेंगे जिसके लिए वे लोग एलिजिबल है जिसके लिए उन लोगों का जन्म जन्मांतर के संचित कर्म उनके इकट्ठा इतने हो गए हैं पुण्य कर्म कि वो अभी सीधे ब्रह्मचर्य आश्रम में से सन्यास आश्रम में जा सकते हैं उनको गृहस्थाश्रम या तो फिर वान प्रस्ता संशय जाने की आवश्यकता नहीं तो ठाकुर कहते हैं कि मैं सीधे ही ब्रह्मचर्य आश्रम से सन्यास आश्रम में चला गया हूं तो मैं मुझे बहुत ज्यादा इससे तकलीफ हुई है तुम तुम लोग बड़े मजे से हो तुम लोग अभी गृहस्थाश्रम में भी हो तुम लोग ये वानप्रस्थाश्रम में भी हो संसार का भी जो भी धर्म है उसका पालन करते हो रिटायरमेंट लाइफ है उसका भी अच्छे से एंजॉयमेंट करते हो बाद में तुम लोग धीरे-धीरे करके इस सन्यास आश्रम की ओर आना पहले से ही आपने यह खेल मिटा दिया गृहस्थ आश्रम का वानप्रस्थ आश्रम का तो यह संसार चक्र कैसे चलेगा यह संसार किस तरह से चलेगा सतो बोल छी ठाकुर कहते हैं कि मैं सत्य कह रहा हूं सच कह रहा हूं तुमरा संसार करछ ते दोष ना तुम लोग संसार कर रहे हो इसमें कोई भी दोष नहीं है तबे श् दिके मोन रखते होवे किंतु एक बात है कि ईश्वर की ओर मन को रखना होगा ता ना होले होबेना ईश्वर की ओर मन नहीं रहेगा तो चलेगा नहीं संसार आश्रम चलेगा नहीं एक हाथे कर्म करो और एक हाथ है ईश्वर के धरे था को एक हाथ से कर्म करो और एक हाथ से ईश्वर को पकड़ के रहो कर्म शेष होले दुई हाते ईश्वर के धरब कर्म जब शेष हो जाएगा समाप्त हो जाएगा दोनों हाथ से ईश्वर को पकड़ लेना अर्थात कि ब्रह्मचर्य आश्रम में तो थोड़ा बहुत हम साधन भजन करते ही हैं अभी आजकल की व्यवस्था में होता नहीं पहले जब गुरु गुरुप वास करते थे और फिर ये गुरुकुल में रहने की प्रथा थी तो गुरु वही वो साधन भजन करवा ही लेते थे एक्चुअली ये जो योग है वो विद्यार्थियों मने जो विद्याभ्यासम अंग था ये योग योगिक साधनाए आजकल चल हमने ये सब सेकुलरिज्म के चक्कर में पढ़ कर के योगिक साधनाएं ये आसन प्राणायाम फिर यह प्रत्याहार ध्यान वगैरा ये सब चीजों को हमने यह पूरा तेज दिया है अभी आजकल फिर से फिर से यह अमेरिका के देखा देखी अमेरिका वाले कहते हैं कि मेडिटेशन करने से हेल्थ भी अच्छा रहता है बुद्धि भी तीव्र होती है और फिर यह फिजिकली भी स्ट्रांग होते हैं तो वो लोग मेडिटेशन कर रहे हैं तो व अरे वाह विदेशी लोग कर रहे तो हमको भी करना चाहिए राजा महाराज अर्थात की स्वामी ब्रह्मानंद उनके पिता जीी जमींदार थे तो जमींदार के वहां पर वो जो खेत मजदूर रहते है ना तो बीच-बीच में उनको भोजन एक समारोह रखा जाता था वहां पर सभी लोग आकर के भोजन करते थे एक साथ में तो जमींदार लोग अर्थात कि ये दूसरे जो जमींदार होते हैं आपके मित्र वो भी आते थे ये खेत मजदूर भी आते थे तो अब ये खेत मजदूर सब खाना खाने के लिए बैठे हैं कोई उनको आचार परोस रहा है अभी किसी ने आचार देखा नहीं था ये कौन सी चीज है गरीब लोग है आचार देखा नहीं कभी तो पूछा कि भैया ये है क्या परस ने वाले को पूछा तो बोला ये आचार है तो वो प ये लोग सोच रहे कि आचार खाना है कि नहीं खाना है क्या करें किस तरह की ये चीज होगी तो और किसी ने पूछा दूसरे खेत मजदूर ने क्या ये बाबू लोग अर्थात कि ये जो जमींदार लोग है उसने क्या इसको खाया है तो बोला हां उन्होंने खाया है तो वो कहता है तो फिर दे दो जब उन लोगों ने खाया है दूसरे जमींदारों ने तो तो अच्छा ही होगा वे लोग अच्छी चीजें ही खाते हैं तो उन्होंने खाया तो अच्छा ही होगा दे दो तो फिर अपने यहां प भी अमेरिका वाले करते हैं तो ये अच्छा ही होगा स्वामी जीी जी को कहा गया कि स्वामी जी आप पूरे भारत में भ्रमण कर लीजिए कुछ भी कर लीजिए आपको इतना कोई प्रसिद्धि नामना कोई आपको रिकॉग्निशन नहीं मिलेगा विदेश में जाइए विदेश में यदि रिकग्निशन मिलेगा तो सभी इंडियन लोग बड़े दोनों हाथ बड़ा फैला कर के आपको अपना लेंगे हां यदि विदेशी लोगों ने इनको सम्मान दिया है तो इसके भीतर में सही सही कुछ है तो ये विदेश में अब ये योगा और मेडिटेशन का वो चला है तो बोल कर के हम लोग बोल रहे हैं कि ना ना अभी तो योगा मेडिटेशन स्कूल में भी करने चाहिए तो इस तरह से यह अभी है तो किंतु ठाकुर क्या कहते हैं कि ये विद्यार्थी या तो फिर यह ब्रह्मचर्य आश्रम और सन्यास आश्रम इन दोनों आश्रमों में तो आप ईश्वर को दोनों हाथ से पकड़ के रखते ही है विद्याभ्यासम तो सरस्वती का ही ये एक प्रकाश का किरण है तो विद्याभ्यासम में कोई प्रश्न ही नहीं है किंतु जब आप गृहस्थाश्रम में है या वाण प्रस्था आश्रम में है तो एक हाथ से तो अंततः को पकड़ करके रखिए यदि आप दोनों हाथों से संसार का कर्म करना शुरू कर दिया तो कब पैर फिसले का कब गिरेंगे कब सर पर चोट लगेगी उसका कोई ठिकाना नहीं है तो गृहस्थाश्रम में और वानप्रस्थाश्रम में एक हाथ से तो ईश्वर को पकड़ के रखिए और एक हाथ से संसार का कार्य कीजिए तब कहीं जाकर के संसार आश्रम सफल होगा कर्म शेष होले द्वि हाते ईश्वर के धर्बे जब संसार आश्रम समा सप्त हो जाएगा तब कहीं जाकर के आप संन्यास आश्रम में प्रवेश अभी सन्यास आश्रम में प्रवेश करना यह नहीं कि आप फिर यह गिरवा धारण करके ये मन से अब धीरे-धीरे करके विरक्त हो जाइए सभी चीजों से मन से वो 10 चीजें आती है कि यह करना वो करना उस सबसे धीरे-धीरे मुक्त हो जाएंगे कार्य करना है कार्य जितने दिन अभी यहां पर भी राम कृष्ण मिशन में भी देखिए अपने यहां पर रिटायरमेंट का कांसेप्ट वैसे है ही नहीं वैसे एक आरोग्य भवन है साधु लोग रिटायर होकर के रहते हैं वो एक है किंतु कोई भी साधु को देखेंगे मरते दम तक जब तक हाथ पैर चलते हैं वह कुछ ना कुछ कर्म तो करता ही रहेगा करते ही रहेंगे मैं मैं मेरा एक अनुभव कहता हूं ट्रेनिंग सेंटर में आपको पता होगा कि सन्यासी लोगों को ट्रेनिंग सेंटर में दो साल बिताने होते हैं वहां पर शास्त्र अभ्यास होता है साधन भजन के बारे में एक सिस्टमिक इंफॉर्मेशन ट्रेनिंग दी जाती है तो वहां पर आचार्य महाराज होते हैं तो अी यह जो ट्रेनिंग सेंटर के आचार्य होना वो बड़े भाग्य की बात है बड़े ही सिलेक्टेड लोग बड़े हाईली स्पिरिचुअल हाईली विद्वान जो होते हैं उन लोगों को ट्रेनिंग सेंटर में आचार्य होने का यह मौका मिलता है अपॉर्चुनिटी मिलती है तो वहां पे एक राम महाराज करके थे बहुत साल आचार्य थे और उनका जो शास्त्र का अंडरस्टैंडिंग था शास्त्र का नॉलेज था वो मतलब ही वन ऑफ द बेस्ट इन आवर ऑर्डर इन द इंडिया इन द वर्ल्ड इतना सुंदर शास्त्र का उन्होंने अभ्यास किया था अभी ये महाराज अभी उनका जो जैसे-जैसे उम्र होता गया बीमारी आती गई वो बिल्कुल ही इतने फिर धीरे-धीरे करके वह आरोग्य भवन बेलूर मठ में ही एक आरोग्य भवन है गंगा के किनारे वहां पे जो आप रिटायर हो जाएंगे आप वहां पे जाके रहेंगे आपके ट्रीटमेंट की व्यवस्था होगी जो पथ्य जिसको कहा जाता है डाट सभी को तो अलग-अलग तरह का डाइट चाहिए किसी को डायबिटीज है किसी को हार्ट डिसीज है किसको क्या है तो उस प्रकार के स्पेशल डाइट की व्यवस्था उस तरह के मेडिसिन और डॉक्टर की व्यवस्था वहां पे है तो यह महाराज भी आरोग्य भवन में उस समय रहते थे जो हम लोग ट्रेनिंग सेंटर में ब्रह्मचारी थे उन लोगों को ड्यूटी दिया जाता था दो-दो महीने का कि राम महाराज की जाकर के सेवा करें तो मुझे भी इस तरह से राम महाराज की सेवा करने का मौका मिला एक अपॉर्चुनिटी मिली मुझे आशीर्वाद मिला अभी किंतु मैं जिस समय गया था राम महाराज का आखिरी समय था मेरे दो महीने की ड्यूटी समाप्त हो गई सेवा समाप्त हो गई उसके 1015 दिन के बाद में ही उनकी समाधि हो गई थी महासमाधि हो गई थी वो मृत्यु मृत्यु पाम गए थे तो अभी देखिए कि अर्थात इसका अर्थ यही हुआ कि मैंने जो दो महीने उनकी सेवा की है वो ऑलमोस्ट उनका आखिरी समय था प्राय उनका आखिरी समय ही था तो उस समय देखिए कि मैं उनके कमरे में ऐसा था कि एक घंटा सेवा करनी है दोपहर को चार से पाच ना कि ऐसा कुछ समय था 4:30 से 5:30 का तो एक घंटा जाकर के उनके घर में जाकर के थोड़ा बहुत झाड़ू पोंछा लगाना है वो धूल मिट्टी वगैरह साफ करना है फिर महाराज को पूछना है महाराज आपको और कोई काम है कि नहीं वगैरह वगैरह महाराज कुछ छोटा मोट कुछ कहेंगे कि यह ले आओ वो ले आओ तो वो ले आना है यह टेबल ठीक कर दो ये चीज यहां से यहां रख दो तो वो सब करना है कपड़े वगैरह धोने के लिए तो वहां का स्टाफ था किंतु यह कमरे की साफ सफाई वगैरह हम लोग करते थे तो किंतु महाराज का नियम था कि आपको सेवा करनी है सिर्फ आधा घंटा फिर आधा घंटा बैठ कर के तुम कुर्सी पर बैठो मेरे सामने मैं तुमको वेदांत सुनाता हूं और तुमको यदि वेदांत के बारे में कोई प्रश्न है तो तुम करो तो यह कितना बड़ा सौभाग्य है कि अपने ऑर्डर के जो वन ऑफ द बेस्ट जो शास्त्रज्ञ पंडित है वो आधा घंटा बिठा कर के वन टू वन आपको यह सब वेदांत की बातें करते हैं और आपके मन की जो भी दुविधा है वेदांत के बारे में शास्त्र के बारे में राम कृष्ण विवेकानंद लिटरेचर के बारे में आप उनको प्रश्न कीजिए इस उम्र में भी मृत्यु के दरवाजे पर खड़े रहते हुए भी उनकी मेम इतनी शार्प थी कि जितने भी श्लोक उन्होंने मुख स्त किए थे ये जितने भी कोटेशन अभी तो मैं धीरे मैं इस उम्र में सब भूल जाता हूं मैंने कल क्या पढ़ा है आज मुझे तकलीफ होती है याद करने में कभी-कभी वो उल्टा भी हो जाता है वो इसका नाम देने की बजाय उसका नाम ले लेता हूं किंतु महाराज का 90 प्लस एज था 95 प्लस होगा ज बिस्तर पर लेटे हुए हैं वो खड़े नहीं हो पाते थे दिन भर उनको लेटा ही रहना पड़ता था उस अवस्था में किंतु मेमोरी इतनी शार्प की कहां पर शास्त्र का क्या रेफरेंस है रामकृष्ण विवेकानंद लिटरेचर में क्या कहा है एकदम डिट्टो टू डिटो आपको एज इट इज वो बता देंगे तो देखिए कि महाराज मृत्यु के दिन तक वो संघ की सेवा करते रहे हैं जो भी ब्रह्मचारी जो कि नौ सिखिया ब्रह्मचारी है जिसको कि आध्यात्मिक रास्ते पर अपना जीवन ग गठित करना है उसको गाइड गाइडेंस देने के लिए उसको गाइड करने के लिए महाराज जी मृत्यु के दिन तक वो तत्पर थे तो यहां पे भी यह साधक जीवन में कोई रिटायरमेंट का कांसेप्ट ही नहीं होता है जब तक आप जीवित है तब तक आप साधना और सेवा करते जाइए यह मां का जो फेमस कि ठाकुर क्या रसगुल्ला खाने के लिए आए थे मृत्यु के मुंह पे मां खड़ी है और एक लड़का कह रहा है कि मां का दर्शन करना है सब लोग बोल रहे हैं मां की जो अवस्था है बीमार है मृत्यु का दिन नजदीक आ रहा है क्या तुम मां को प्रणाम करोगे नहीं जाने देंगे उस समय वह हल्ला मचा रहा है मां अपने बिस्तर में सो लेटी हुई थी बैठ गई और कहा कि बुलाओ उसको मैं उसको उपदेश दूंगी ठाकुर क्या रसगुल्ला खाने के लिए आए थे अर्थात कि क्या ठाकुर जगत में यह भोग आनंद करने के लिए आए थे ठाकुर ने खुद ने आखिरी घड़ी तक लोगों को उपदेश दिया था तो यह रिटायरमेंट का कांसेप्ट पूरा भूल जाना है जितने दिन तक है कार्य करते जाना है जो भी अपना ड्यूटी है करते जाना है जिस दिन आप बैठ गए मैंने देखा है ऐसे लोगों को देखा है कि रिटायर हो गए हैं फिर एक जगह पर बैठ गए हैं जो जिस दिन बैठ गए हैं बिना काम धाम किए वैसे ही उनका फिजिकल और मेंटल डिटेरेड जो स्टार्ट हुआ है कुछ ही सालों के बाद में सीधे वो बेचारे भगवान के पास में चले गए हैं तो मैं रिटायर हो गया हूं मुझे कुछ करना नहीं है ऐसा बोल कर के बैठ जाएंगे तो फिजिकल मेंटली दोनों डिटेट होना स्टार्ट हो जाएगा मरते दम तक कार्य करते रहना है एक तरह से नहीं तो दूसरे तरह से पहले की तरह नहीं तो अभी एक नई तरह से कुछ ना कुछ खोज लेना है किंतु इस सेवा और य साधना दोनों आखिरी घड़ी तक चलने चाहिए तो आज यही तक िकल फिर से अच्छा कल तो सैटरडे है और मिलेंगे मंडे ा अ स रामा कणा सो अकॉर्डिंग शु शर्टन ल दिस आश्रमा आल्सो जैसे पहले 25 साल 25 साल का था तो 100 साल का आयु था अभी देखेंगे आयु थोड़ा कम होकर के 70 80 हो गया है तो उसके अनुसार यह देखिए रिटायरमेंट तो हम सभी लोग लेते ही है कभी ना कभी एक्टिव ड्यूटी से तो फिर जैसे ही रिटायरमेंट स्टार्ट हुआ वैसे ही और ज्यादा सीरियसली ठाकुर का साधन भजन करना स्टार्ट कर दिया यानी अभी नॉट टेकिंग दिस आश्रमा ज वेरी यू कैन से वेरी क्लियर कट व्हेन एवर यू फाइंड टाइम स्टार्ट डूइंग टेकिंग द नेम ऑफ गड सो डोंट वेट दैट आई विल एंटर इनटू वानप्रस्थाश्रम और आई विल एंटर इन टू सन्यास आश्रम एंड देन आई विल स्टार्ट टेकिंग गॉड्स नेम देन आई विल स्टार्ट डूइंग साधन भजन तपस्या नो द मोमेंट यू फाइंड द मोमेंट यू अकन द मोमेंट यू रिलाइज ट ने दिस लाइफ आई वांट टू डेडिकेटेड टू द गॉड द सेम मोमेंट यू स्टार्ट डूइंग तपस्या एज मच एज इज पॉसिबल गुजराती में कहावत है जागिया रथी सवार जिस क्षण अपने नींद से उठ गए उसी दिन सुबह हो गई तो अभी अभी सुबह सुबह को 6:00 बजे होती है 7:00 बजे होती है और मैं तो जग गया हूं 3:00 बजे तो अभी मैं क्या करू ऐसा नहीं 3:00 बजे जग गए तो सुबह हो ही गई उसी समय बैठ कर के जब ध्यान चालू कर दीजिए