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Sri Ramakrishna Kathamrita ·

श्रीरामकृष्ण कथामृत || 9 Dec 1883 - श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ दक्षिणेश्वर में || 31 Mar 2025

प्रार्थना

ओम स्थापकायच धर्मस्य सर्वधर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः इस सप्ताह श्री रामकृष्ण कथामृत का पाठ करेंगे और जिस चैप्टर का हम पाठ कर रहे हैं उसका नाम है दक्षिणेश्वर में श्री रामकृष्ण भक्तों के साथ में और ठन में सिद्धेश्वरी मंदिर में गमन। इसका द्वितीय परिच्छेद चल रहा है। डेट है 9th दिसंबर 1883। इसमें ऑलरेडी हमने अभी तक देख लिया कि किस तरह से मास्टर महाशय गंगा के किनारे बैठे हुए हैं नबत में और पता नहीं क्या चिंतन कर रहे हैं। गंभीर चिंता मग्न ऐसा लिखा

Sri Ramakrishna and educated middle class: Rationality and sceptiscism

है। बहुत ही गहरी चिंता में मग्न है। उस समय एकाएक ठाकुर वहां पर आन खड़े हुए और उस उनको पूछा कि क्या क्या यहां पर बैठे हो? किगो एकने बोशे क्या जी यहां पर बैठे हो? तो फिर मास्टर महाशय आश्चर्यचकित हो गए और फिर ठाकुर तो अंतर्यामी है तो ठाकुर ने उनके मन की बात समझ ली और साथ-साथ में ही कह दिया कि एकटा एकू किु कोर ले क्यों ऐसे बोले देबे ए ए अर्थात कि मास्टर महाशय चिंतन कर रहे थे कि वह तो गृहस्थ है बीवी बच्चे भी हैं नौकरी भी कर रहे हैं और यहां पर ठाकुर बार-बार कहते हैं कि जीवन का एकमात्र उद्देश्य है ईश्वर प्राप्ति ईश्वर लाभ तो फिर किस तरह से ये दोनों चीजों का मेल होगा वो गृहस्थ होकर के भी क्या हम ईश्वर प्राप्ति कर सकते हैं? खास करके पहली ही मुलाकात के दरमियान ठाकुर ने उनको कहा था कि अरे तुम्हारे बच्चे भी हो गए हैं। ऐसा करके द्वितीय मुलाकात के दरमियान ठाकुर ने उनका तिरस्कार किया था। तो इसलिए मास्टर महाशय गंभीर चिंता में मग्न है। उसी समय ठाकुर ने आकर के उनको सांत्वना देकर के कहा कि थोड़ा सा कुछ करने से ही कोई आकर कह देगा यह यह। और यह ठाकुर की क्रिप्टोग्राफिकल लैंग्वेज में ठाकुर कहना चाहते हैं कि थोड़ी सी साधना हमको करनी पड़ेगी। तभी कोई गुरु आकर के हमको कहेगा कि ऐसा ऐसा करो। देखिए लोगों को आजकल क्या है कि इंस्टेंट सब सॉल्यूशन चाहिए। कोई आकर के ऐसा हुआ है मेरे साथ में। कोई आकर के मुझे पूछेगा अच्छा इस प्रॉब्लम है तो इसका क्या सॉल्यूशन होना चाहिए? तो अभी मेरे पास में तो कोई इंस्टेंट सॉल्यूशन है नहीं। आपको इंस्टेंट सॉल्यूशन ऑफर करने वाले लोगों की कमी नहीं है इस जगत में। और मैं यह नहीं कहना चाहता कि रामकृष्ण संघ में या तो रामकृष्ण विवेकानंद लिटरेचर में इंस्टेंट सॉल्यूशन नहीं है। मैं यह भी नहीं कहना चाहता। मैं तो सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि मेरे पास में वो इंस्टेंट सॉल्यूशन नहीं है। मेरे पास में एक ही सॉल्यूशन है कि लंबे समय तक देखिए सन्यास लेना नहीं लेना वह तो एक दूसरा प्रश्न है। किंतु जो एक चीज हमारे हाथ में है वो है कि जीवन भर रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य का पाठ उसका चिंतन स्मरण मनन और फिर यदि हो सके यदि अपनी इतनी निष्ठा है तो रामकृष्ण संघ के अपने जो परम पूजनीय प्रेसिडेंट महाराज हैं उनके पास में से दीक्षा लेकर के नियमित मंत्र का जप इतना मैं बता सकता हूं कि यदि जीवन की कोई भी समस्या है तो इतना हमको करना चाहिए। यह जो है कि थोड़ा सा ही कुछ करने से किंतु यहां पे देखिए ठाकुर भी ऐसा कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि अपने प्रॉब्लम का सॉल्यूशन कोई इमीडिएटली आ जा सकता है। पहले तो है कि हमको थोड़ी सी साधना करनी पड़ेगी। थोड़ा सा मेहनत करना पड़ेगा। उसके बाद में गुरु कहां से भी हमको आन मिलेंगे। वह दीक्षा गुरु हो ना कि शिक्षा गुरु हो। कोई पुस्तक में लिखी सलाह के माध्यम से हो ना कि और किसी के माध्यम से। वह ठाकुर ने कहा है ना कि मां किसी बालक के मुंह से, किसी पागल के मुंह से बोलती है। तो इसी तरह से कोई भी आकर के हमको हठात एकाएक कुछ ऐसा कुछ बता देगा कि जैसे हमको लगेगा कि हमारे दिमाग के सभी दरवाजे खुल गए हैं और नेक्स्ट साधना का जो पथ है उसका हमको एक तरह से जो रास्ता जो है हमको दिखाई देने लगता है। यहां पर ठाकुर दो देखिए ठाकुर क्या कहते हैं और ठाकुर क्या नहीं कहते। थोड़ा सा कुछ करने से कोई आकर के कह देगा यह यह। यानी कि सर्वप्रथम तो दो चीजें हैं। सर्वप्रथम ठाकुर कहते हैं कि थोड़ा सा तो कुछ करना पड़ेगा। उसके बाद में गुरु आकर के बता देंगे कि इसके बाद में और थोड़ा सा क्या किया जाए? देखिए यह दोनों जो पार्ट है एक एडवाइस के यह दोनों जैसे कि पुरुषार्थ और परमार्थ हमारी खुद की जो तपस्या है वह और गुरु का आशीर्वाद इन दोनों को ब्लेंड तो करती है। यह दोनों हमको कहती तो है किंतु साथ-साथ में ही ठाकुर हमको क्या नहीं कहते? ठाकुर हमको यह नहीं कहते कि थोड़ा सा कुछ करने से तुम्हारा हो जाएगा काम। यानी कि देखिए कि यहां पर कोई फ्री मिल नहीं है। यहां पर आपको कुछ ना कुछ मेहनत तो करनी ही पड़ेगी। तो इस तरह से ठाकुर ने एडवाइस दी। इसके बाद में मास्टर महाशय अपने खुद के बारे में थोड़ा सा बताते हैं। कहते हैं कि इंग्लिश में पढ़ाई लिखाई की है। केशव सेन वगैरह जो विदेशी संस्कृति से खास करके यूरोपियन संस्कृति से प्रभावित पंडित लोग हैं। उनका प्रवचन सुनना उनको अच्छा लगता है। यानी कि एक इंटेलेक्चुअल बेंट ऑफ माइंड है। किंतु जब से ठाकुर के पास में आना शुरू किया है, जब से ठाकुर को सुनना शुरू किया है, तब से वह सब उनको नीरस लगता है। जो यूरोपियन पंडित या तो फिर यूरोप की भावधारा से प्रभावित जो लोग आकर के यह सब कहते हैं, वह सब उनको नीरस लगने लगा है। क्योंकि ठाकुर के भीतर में देखिए कि एक रियलाइजेशन था। अदरवाइज आप फिलॉसोफी तो कितनी ही बड़ी-बड़ी लगा दीजिए। जब तक आपके पास में रियलाइजेशन नहीं होता है तब तक उस फिलॉसोफी का ऐसे कोई फर्क नहीं पड़ता है। मैं चाहे अभी ठाकुर कहते हैं ना कि वो यह है पंचांग है। पंचांग में लिखा है कि आज इतने बजे आज इस दिन को इतना पानी गिरेगा। इतना बारिश गिरेगा। हां ठीक है। अच्छी बात है। किंतु आप पंचांग को थोड़ा सा इसको प्रेस करके देखिए। उसको स्क्वीज करके देखिए। देखिए कि एक बूंद भी पानी पंचांग में से नहीं गिरने वाला है। यानी कि वह सब बातों की बातें ही है। एक्चुअल जो बारिश गिरने वाली है वह तो भक्त के हृदय में गिरती है और वह तब गिरती है जब कि भक्त चाहता है कि उसको ईश्वर दर्शन हो और ईश्वर दर्शन के लिए वह कटिबद्ध होकर के मेहनत करके प्रयास करने का प्रारंभ करें। तो यह सब बैकग्राउंड है अभी तक का जो हमने देखा था वहां तक का। इसके बाद में फिर ठाकुर अपनी पूर्व कथा कहने की प्रारंभ करते हैं। कहते हैं कि उनको कौन-कौन से दर्शन हुए थे और उन्होंने क्या-क्या सब उनके साथ में हुआ था। तो उन्होंने कहा सबसे पहले तो कि गौरांग के जो सांगोपांग है अर्थात कि गौरांग महाप्रभु के जो सब शिष्य गण है जो नगर कीर्तन में वह दल बनाकर के निकलते थे उसमें जैसे कि उन्होंने मास्टर महाशय को देखा था और जैसे कि बलराम को देखा था। तो यह एक बात हुई। उसके बाद में ठाकुर कहते हैं कि यदि मैं किसी को देखता हूं तो मैं तड़ाक करके फड़ाक करके खड़ा हो जाता हूं। क्यों ऐसा होता है? क्योंकि यदि हम किसी आत्मीय को बहुत लंबे समय के बाद में मिलते हैं। बहुत लंबे समय के बाद में उनसे यदि मुलाकात होती है जो तो हम आत्मीय हम किसको कहते हैं? जिसके साथ में हमारा स्नेह का संबंध है। तो जिनके साथ में स्नेह का संबंध हो उनको यदि लंबे समय के बाद में मिलेंगे तो निश्चय है कि अपने हृदय के भीतर में वह स्नेह जो जागृत हो जाएगा। तो यहां पर ठाकुर कहते हैं कि यह जो भक्तगण है जो ठाकुर के पास में आते हैं इनके साथ में जैसे कि ठाकुर का जन्म जन्मांतर का संबंध है। देखिए कि इसी जो जो चैप्टर के प्रारंभ में ठाकुर ने कहा था कि गौरांग महाप्रभु की तीन अवस्था होती है। एक तो बाह्य दशा फिर अंतर अर्धबाह्य दशा और फिर अंतर्दशा। तो फिर मास्टर महाशय का जो निरीक्षण शक्ति था उसी से उन्होंने पकड़ लिया कि यदि ठाकुर क्या गौरांग महाप्रभु का नाम करके क्या अपनी खुद की अवस्थाओं का वर्णन करते हैं क्योंकि ठाकुर के जीवन में भी यह सब अवस्थाएं होती थी। तीनों अवस्थाएं होती थी कि बाह्य दशा में भक्तों के साथ बात करेंगे। अर्धबाह्य दशा में उन्मत्त होकर के कीर्तन करेंगे और अंतरर्दशा में संपूर्ण रूप से समाधस्थ हो जाएंगे। तो यह तीनों दशाओं का दर्शन तो मास्टर महाशय ने ठाकुर के जीवन में किया ही था। तो क्या यहां पर ठाकुर यह कहना चाहते हैं कि चैतन्य महाप्रभु का नाम उनकी अवस्थाओं का वर्णन करके अपने खुद की ओर क्या वह इशारा कर रहे हैं? अर्थात कि दूसरे शब्द में क्या वह यह कहना चाहते हैं कि वह भी चैतन्य महाप्रभु की लीनिएज से उनका जन्म हुआ है या तो फिर उनके अवतार हैं या तो फिर जिस सनातन पुरुष के अवतार इस पृथ्वी पर बार-बार जन्म ग्रहण कर रहे हैं उनमें से यदि एक अवतार चैतन्य महाप्रभु थे तो उन्हीं के दूसरे एक अवतार है श्री रामकृष्ण और यह भी हमने हमने काफी डिटेल में डिस्कस किया था कि ठाकुर के जीवन में देखिए कि कैंसर के पहले और कैंसर के बाद कैंसर के पहले उन्होंने अपना जो देवत्व है अपना जो अवतारत्व है उसके बारे में उन्होंने इशारा अवश्य किया था। उन्होंने यह गुढ़ अर्थ में या तो फिर अपनी एक क्रिप्टोग्राफिकल लैंग्वेज में उन्होंने सब बताया तो था कि हां इनके भीतर में जो है वह एक विशेष है। वह कोई आम साधक नहीं है। तो क्यों क्योंकि क्या है कि ठाकुर चाहते थे कि यदि वह अपने अवतारत्व का बहुत ज्यादा प्रचार यदि चालू हो गया तो वहां पर एक डिस्पेंसरी जैसा कुछ बन जाएगा। लोग आकर के उनको विनती करेंगे कि आप हमारा यह रोग मिटा दीजिए और वह रोग मिटा दीजिए। यानी कि यह देखिए कि समाधि और ईश्वर दर्शन और भाव का ऐश्वर्य ठाकुर में अवश्य था। जहांजहां पर भी ठाकुर जाते थे। खास करके यह अभी देखिए कि कोलकाता के यह जो भक्तगण है उनके घर जाकर के कीर्तन वगैरह करते थे। वह तो ठीक ही है। किंतु पानीहाटी जैसा जो पब्लिक महोत्सव है वहां पर भी ठाकुर नियमित रूप से जाते थे और सबके सामने कीर्तन में मुम्मत्त हो जाते थे और भावमग्न हो जाते थे और समाधस्थ हो जाते थे। अर्थात कि ठाकुर का यह जो आध्यात्मिक ऐश्वर्य है वह ठाकुर ने कभी छुपाया नहीं। किंतु इस आध्यात्मिक ऐश्वर्य का दर्शन करके जो कोई यह लॉजिकल कंक्लूजन तक आएगा कि इस तरह का कि मुरमु भाव और समाधि होना मुरमु यह जो है अंतर्दशा होना या तो फिर जिनका जीवन संपूर्ण रूप से शुद्ध पवित्र है। ब्रह्मचर्य कठोर ब्रह्मचर्य का पालन जो कर रहे हैं वह ऐसा हमने और किसको देखा है? तो ऐसा एक किसी को देखा है वह है

Limit of rationality: better to have middle path of heartfelt devotion

चैतन्य महाप्रभु। तो क्या चैतन्य महाप्रभु ही फिर से पृथ्वी पर अवतरित हुए हैं? तो यह जो लॉजिकल कंक्लूजन तक यदि कोई पहुंचता या तो फिर इस तरह का कोई क्लेम करता जैसे कि यह रामबाबू है या तो फिर यह गिरीश घोष है। इन लोगों ने यह जो क्लेम करना शुरू किया था तो ठाकुर उनसे कभी-कभी नाराज भी हो जाते थे और कहते थे कि यह सब बात बंद करो। किंतु हमको यह भी पता है कि कैंसर होने के बाद में ठाकुर ने अपना यह जो अवतारत्व है उसको छुपाने का प्रयास नहीं किया। क्योंकि उनकी जो सदेह लीला है जो अपने सशरीर से पंचमहाभूत का बना हुआ शरीर से वह जो लीला कर रहे थे पृथ्वी पर उसका तो अभी अंत आने वाला था। तो अभी ठाकुर को जाकर के भक्तों के हृदय में रहना था। तो यह जो फेज चेंज या तो जो एक सेकंड फेज जो प्रारंभ होना था ठाकुर के जीवन में उस समय फिर ठाकुर ने यह विरोध करना बंद कर दिया था कि तुम मेरा अवतार बोल के प्रचार मत करो और दूसरा कि वह एक्चुअली एक्टिवली लोगों को बताते थे जैसे कि वह नरेंद्र को बताया था कि तुम जो जिनको जय राम जय कृष्ण श्री राम कृष्ण जो राम थे जो कृष्ण थे वही राम कृष्ण है। गिरीश घोष उसने कल्पतरुद्दीन को जब यह कहा कि व्यास वाल्मीकि जिसकी गुणगान गाते-गाते थक जाते हैं गुणगान का अंत नहीं कर पाते उनके बारे में मैं क्या कहूंगा तो इमीडिएटली ठाकुर अर्धबाह्य दशा में जाकर के सबको स्पर्श करके चैतन्य हो ऐसा करके स्पर्श करने लगे यानी कि ठाकुर ने अपना जो आध्यात्मिक ऐश्वर्य जैसे कि पहले फेज में नहीं छुपाया वैसे ही अपना यह जो अवतारत्व है वह सेकंड फेज में नहीं छुपाया किंतु यह जो चैप्टर चल रहा है वह तो 189 1883 का है। इस समय तो ठाकुर अपने अवतारत्व के बारे में इतना कोई खुलेआम यह बातें नहीं करते थे। वह सब इशारोंइशारों में कह देते थे जो कि मास्टर महाशय जैसे जो अंतरंग भक्तगण हैं उन्होंने अपने हृदय में उसको अनुभव करना शुरू किया था। तो इस चैप्टर के प्रारंभ में ही देखिए कि ठाकुर जब चैतन्य महाप्रभु की तीन अवस्थाओं का वर्णन करते हैं तो साथ-साथ में ही मास्टर महाशय यह समझ करके यह लिखते हैं कि क्या चैतन्य महाप्रभु की अवस्था का वर्णन करके ठाकुर अपनी अवस्था का वर्णन करना चाहते हैं क्या ठाकुर ही चैतन्य महाप्रभु क्या चैतन्य महाप्रभु ही फिर से ठाकुर होकर के अवतरित हुए हैं वगैरह जो मास्टर महाशय सोच रहे हैं अभी इस सेंटेंस में बाद में ही इसे द्वितीय परिच्छेद में ठाकुर कहते हैं कि मैंने तुमको अर्थात कि मास्टर महाशय को और बलराम बाबू को चैतन्य के दल में देखा था। यानी कि अभी यहां पर 1 + 1 2 इस तरह का मैथमेटिकल हम यदि प्रूव करें।

ठाकुर की अभयवाणी : साधना करने से ही ईश्वर दर्शन हो सकता है

मैथमेटिक्स इस्तेमाल करके यदि हम देखें लॉजिकल कंक्लूजन तक क्या पहुंचेंगे हम कि जिस तरह से चैतन्य महाप्रभु थे और उनका दल था यह नित्यानंद फिर यह अद्वैत गोस्वामी वगैरह-वगैरह तो महाप्रभु और उनका दल तो यहां पे भी देखिए कि ठाकुर और इनका दल इस दल में है। यही है मास्टर महाशय और यही बलराम बसु है। यही नरेंद्र है। वही लाटू है। वही वो यह योगेन मां फिर गोलाप मां वही मां शारदा यह जो जन्म जन्मांतर से ठाकुर के साथ में जो अवतरित होते हैं वह इस जन्म में भी अवतरित हुए हैं। अभी इस पश्चात भूमिका के साथ में ठाकुर का यह सेंटेंस फिर से पढ़ते हैं। ठाकुर क्या कहते हैं? कारू के देखले तड़ाक करे उठे दाणाई। कैनो जानो मैं किसी को देखता हूं तो फटाक करके खड़ा हो जाता हूं। क्यों पता है आत्मीय देर अनेक काल परे देख ले ओ रूप होए जो आत्मीय है उनको बहुत लंबे समय के बाद में फिर से यदि देखते हैं तो ऐसा होता है तो निश्चय हमको यह प्रश्न होगा कि यहां पर ऐसा क्यों कहा है ठाकुर ने कि बहुत लंबे समय के बाद में देखा मास्टर महाशय या तो फिर जितने भी अंतरंग शिष्य ठाकुर के पास में आते थे तो ठाकुर के हृदय में इस तरह का उत्साह का वर्धन होता था। ठाकुर इस तरह से फटाक करके उनको स्वीकार करने के लिए आवकार देने के लिए तैयार हो जाते थे। तो तो यहां पर ठाकुर ऐसा कह ही सकते हैं कि जो मेरे अंतरंग है उनको देखकर के मेरे मन में इस तरह से होता है। मैं फटाक करके खड़ा हो जाता हूं। ऐसा नहीं कह के ठाकुर ने कहा कि आत्मीय अंतरंग शब्द नहीं यूज किया है। किया है शब्द यूज आत्मीय और आत्मीय कौन होता है? जो ऑलरेडी हमारा संबंधी है ही है जिसको कि हम पिछले कुछ समय से नहीं मिले और अभी फिर से मिल रहे हैं। तो यदि इस जन्म में इनका कोई नाता नहीं था। ज्यादातर अंतरंग भक्त वह अभी जैसे कि गौर दासी है ना कि लाटू महाराज है। यह सब तो ठाकुर को जब पहली बार मिले तो उनका तो पहले भूतकाल में ऐसा कोई रिलेशन नहीं था। बस एक योगेंद्र महाराज का एक एक्सेप्शन यदि कहे योगेंद्र महाराज वहीं पर आसपास में ही रहते थे तो हो सकता है कि बचपन में शायद उन्होंने देखा होगा। तो वह एक एक्सेप्शन यदि छोड़ दे और इधर-उधर किसी को देख लिया होगा बचपन में तो ज्यादातर भक्त जब ठाकुर के पास में आए हैं तो जैसे कि ठाकुर को बिल्कुल पहली ही बार मिल रहे हैं तो उनको अंतरंग नहीं कह के ठाकुर कहते हैं आत्मीय बहुत पहले भी उनके साथ में संबंध था ठाकुर का और अभी फिर से भी है तो इसका क्या अर्थ है कि चैतन्य महाप्रभु के वेश में ठाकुर जब आए थे तो यही सब जो भक्तगण है उनके साथ में उस समय आए थे और उस समय जब बिछड़ना हुआ मृत्यु की वजह से तो फिर से अभी मुलाकात हुई और फिर से यदि मुलाकात होती है ठाकुर को याद आ गया है कि यह लोग मेरे साथ में उस समय भी आए थे और इन लोगों को अंतरंग भक्तों को शायद यह न याद हो क्योंकि जन्मांतर की बात तो सबको याद नहीं होती है किंतु उनका हृदय जिस तरह से ठाकुर के प्रति आकर्ष ित होता है। पहले ही बार में देखकर के ठाकुर के प्रति एक श्रद्धा एक स्नेह का एक जो भाव व्यक्त होता है उनके मन में तो वे लोग इंस्टिंक्टिवली तो समझ जाते हैं कि जैसे कि ठाकुर के साथ में जन्म जन्मांतर का नाता है। अभी एक्चुअल मैकेनिज्म क्या है इसके पीछे का वह तो जब ठाकुर बताएंगे तभी इनको पता चलेगा। किंतु एटलीस्ट यह एस्टैब्लिश हो जाता है रिलेशनशिप। तो यह जो सेंटेंस है उसका बड़ा ही गढ़ अर्थ है कि जब किसी को ठाकुर देखते हैं जो कि उनके आत्मीय है तो ठाकुर के हृदय में भी उत्साह भर जाता है और इन भक्तों के हृदय में भी शरणागति का भाव प्रकट होता है और क्यों? क्योंकि जन्म जन्मांतर से यह लोग ठाकुर के साथ में पृथ्वी पर अवतरित होते रहे हैं। इसके बाद में ठाकुर आगे क्या कहते हैं? मां के कैदे कैदे बोलता मां को मैं रोते-रोते कहता मां यानी कि मां जगदंबा मां काली मां काली को ठाकुर रोते रहते कहते क्या कहते मां भक्तों देर जोने हमार प्राण जाए तादेर शीघ्र आमाय एने दे मां भक्तों के लिए मेरे प्राण जा रहे हैं उनको शीघ्र ही मेरे पास में ले आओ देखिए यह कितना इंपॉर्टेंट सेंटेंस है जो हमने वो वो एक सबसे फेमस घटना है जो वो हमने पढ़ा था पढ़ी है कि वहां पर कुठीवाड़ी यानी कि जब मथुर बाबू काली मंदिर में आते हैं दक्षिणेश्वर में उस समय जहां पे रहते थे जिस बंगलो में जिस मकान में उसको कुठीवाड़ी कहते हैं और उसकी छत पर जाकर के ठाकुर पुकार करके कहते थे कि अरे भक्तगण तुम कहां पे हो आओ। तो यहां पर भी देखिए कि ठाकुर मां को रोते-रोते कहते हैं कि भक्त भक्तों दे भक्तों के लिए मेरे प्राण जा रहे हैं। तुम उनको कैसे भी करके शीघ्र मेरे पास में ले आओ। जा मोने करता ताई हो तो ये सेकंड सेंटेंस में देखिए किंतु ठाकुर कहते हैं कि मैं जो मन में करता वही हो जाता। यानी कि भक्तों को भी ठाकुर को ठाकुर के पास में मां ने भेज दिया था। अभी यहां पर किंतु देखिए एक इंटरेस्टिंग घटना है। यह जो ठाकुर ने यह मां ने ठाकुर को दर्शन दिया था। अभी एग्जैक्ट क्रोनोलॉजी उसके बारे में मैं श्योर नहीं हूं कि कौन सी घटना कब हुई है। ठाकुर ने कुठीवाड़ी के ऊपर में जाकर के छत के ऊपर में जाकर के भक्तों को पुकारा। वो घटना पहले हुई है कि मां ने ठाकुर को दर्शन देकर कहा था कि तुम्हारे बहुत सारे भक्त आएंगे। यह घटना पहले हुई है। मैं इसके बारे में श्योर नहीं हूं। किंतु जब मां ने ठाकुर को दर्शन दिया था उस समय मथुर बाबू जीवित थे। और हम ठाकुर का मथुर बाबू के साथ में एक संवाद भी है। अभी यह जैसे ठाकुर ने यहां पर कहा ना कि जा मोने करता ताई हो तो जो जो मैं मन में करता वही होता। इसका भी एक बड़ा अर्थ है। ठाकुर को पहले से ही पता था कि मां उनको जो दर्शन देती है वह गलत कभी नहीं होंगे। यदि नरेंद्र जैसा नरेंद्र यदि उस दर्शन में यदि कोई कंफ्यूजन खड़ा करेगा दर्शन के बारे में ठाकुर के मन में तो ठाकुर उनसे भी नाराज हो जाते थे। वो जो फेमस घटना है चातक पंखी की तो ठाकुर कहते हैं चातक पंखी जो है वह सिर्फ स्वाति नक्षत्र का ही पानी पीता है। जलपान करता है। तो नरेंद्र कहता है वह तो बुद्धि माने वो जो वेस्टर्न लॉजिकल सिस्टम पे वह तो पला बड़ा था। तो वो कहता है कि अरे नहीं वह तो सब तरह का पानी पिएगा। इस तरह का पंखी कभी हमने और क्या है कि दूसरा क्या है देखिए कि ये जो मॉडर्न बोटेनी है ना कि फिर ये मॉडर्न जो ऑर्नोथोलॉजी ना कि ऐसा कुछ पंखियों के पंखियों के बारे में स्टडी करने का एक साइंस है ऑर्नोथोलॉजी ना कि ऐसा कुछ बोलते हैं। व्हाटएवर आज का जो मॉडर्न साइंस है उसमें कहीं पे भी इस तरह का वर्णन नहीं है कि यह पार्टिकुलर पक्षी इसी पार्टिकुलर पानी का वो पान करता है। पार्टिकुलर जल का पान करता है। एटलीस्ट मैंने तो कभी नहीं पढ़ा ना ही इस तरह का रिसर्च मेरे ध्यान में आया है। यह होता है कि ये बर्ड्स जो है पंखी माइग्रेट करते हैं। सीजनल माइग्रेशन वे लोग करते हैं कि जहां पे वो गर्म से ठंडे प्रदेश में ठंडे से गर्म प्रदेश में वहां पे वो माइग्रेशन होता है। किंतु एक ही पार्टिकुलर टाइप का इसी नक्षत्र का पानी पिएगा। इस तरह का ऑब्जरर्वेशन मॉडर्न साइंस में कहीं पे नहीं है। तो उसी समय यह सब ऑब्जरवेशन साइंटिफिक सब नियम के अनुसार वो बनने शुरू हो गए थे। तो यहां पे है कि देखिए चलिए नरेंद्र ने कहा कि अरे ऐसा तो मैंने कभी सुना नहीं है। न भूतो न भविष्यति किस तरह से ठाकुर इस तरह की बातें करते हैं। तो ठाकुर बड़े ही दुखी होकर के मंदिर में जाकर के मां काली के सामने रोने लगे। मां तुमने यह दर्शन जो मुझे दिए वो सब क्या गलत हो गए? और यहां पर क्या है ना जैसे मास्टर महाशय कथामृत में वह कथामृत की भूमिका में ही कहते हैं ना कथामृत लिखने के समय ही मास्टर महाशय कहते हैं कि एक तो क्या है ऑथेंटिसिटी बनी रहनी चाहिए तो क्योंकि अभी भी तो हमारा मूवमेंट मुश्किल से 150 200 साल पुराना है अभी यदि 2000 साल के बाद में पता नहीं किस-किस तरह के डाउट अपने साहित्य पे अपने ये सब अपने आइडियाज के ऊपर में खड़े हो पता नहीं जिस तरह से मास्टर महाशय ने ये जो वेस्टर्न जो लिटरेचर पढ़ा था उसमें तो है कि बाइबल पर बहुत सारे डाउट खड़े किए गए हैं। तो इस तरह से कथामृत पर ना हो इसके लिए मास्टर महाशय कोर्ट रूम में जाकर के बैठते थे। जो साक्षी देने वाला व्यक्ति है उसको वह देखते थे कि जज कब उसकी साक्षी को उसकी एज ए विटनेस जो होता है व्यक्ति उसकी यह जो यह होता है उसकी जुबानी या जो भी उसको बोले उसका जो स्टेटमेंट वो कब वह उसको मान्य रखते हैं कब किसी विटनेस को ऑथेंटिक माना जाता है जबकि वह सही सभी प्रश्नों का सही उत्तर दें। यदि यह विटनेस बॉक्स में खड़े रहकर के कोई आदमी 10 सच बात बताता है, एक झूठ बोलता है तो इमीडिएटली कानून के वह जो जिस तरह का माइंडसेट है उसके अनुसार वो बाकी एक यदि बात गलत है तो बाकी 10 बातें भी गलत है कि नहीं किसको पता ऐसा करके डाउट आ जाएगा। हालांकि 10 बातें सही बोली है। एक बात सिर्फ गलत बोला है। किंतु फिर भी इस तरह का डाउट उसके माइंड में आएगा। तो मास्टर महाशय ने यह सब कोर्ट हाउस में जाकर कोर्ट रूम में जाकर के ऑब्जर्व किया था। यदि पूरा कथामृत वह ठीक-ठीक लिखे और एक बात में भी यदि कोई संशय संदेह हो जाए तो लोग पूरे कथामृत के ऊपर में यह आक्षेप डालना शुरू कर देंगे कि एक गलत लिखा है तो 10 गलत नहीं लिखा होगा किसको पता तो यहां पे क्या है कि मास्टर महाशय बड़े केयरफुल थे कथामृत लिखने के बारे में तो यहां पे भी ठाकुर को भी वही संदेह हो गया यदि नरेंद्र एक दर्शन के बारे में प्रश्न खड़ा करता है और यदि यह

ठाकुर मास्टर महाशय को एकादशी करने को कहते है

बात सही प्रूफ हो जाती है कि सही में चातक पक्षी कोई भी जल सामान्य पक्षी की तरह ही किसी भी जलाशय में से पानी पी सकता है। तो बाकी सब दर्शन भी गलत हो जाएंगे। क्या पता मां ने ठाकुर के साथ में क्या मजाक किया है क्या? किसको पता? तो वो ठाकुर जाकर के मां के पास में रोते हैं। कहते हैं कि मां देखो नरन ऐसा कह रहा है। तब मां ने मां काली ने प्रकट होकर के ठाकुर को कहा कि वह तो बच्चा है। उसको क्या पता। तो फिर ठाकुर आकर के फिर कुछ दिनों के बाद में देखा कि एक चमगादड़ ठाकुर के रूम में उड़ रहा है। चमगादड़ यानी कि बेड। तो यह बेड उड़ रहा है। तो यह नरेंद्र ने का देख उसकी ओर इशारा करके कहा अरे देखो यह चातक पक्षी है। तो ठाकुर जोर से हंस उठे। अरे यह चातक थोड़ी ना यह तो चमगादड़ है। यानी कि नरेंद्र वो चमगादड़ को चातक समझ करके वह कह रहा है कि वह किसी भी जलाशय का पानी पिएगा। फिर ठाकुर नाराज होकर नरेंद्र को कहते हैं कि अभी तुम्हारी एक भी बात मानूंगा नहीं स्वीकार नहीं करूंगा। तो यहां पे भी देखिए कि मां ने ठाकुर को यह दर्शन दिया था। कहा था कि तुम्हारे पास में यह सब भक्तगण आएंगे। किंतु जब ठाकुर यह बात उस समय मथुर बाबू जीवित थे तो

ठाकुर के आत्मीय, अंतरंग शिष्य

ठाकुर जब मथुर बाबू के साथ में यह बात करते हैं कि मां ने मुझे इस तरह का दर्शन दिया है तो फिर मथुर बाबू ने कहा अच्छी बात है चलो सब भक्तगण आपके पास में आएंगे उस समय मथुर बाबू ही तो थे मथुर बाबू और हृदय वो जो ठाकुर की सेवा करते थे और फिर इधर-उधर किसी कोई कोई जो वहां पर स्थानिक लोग थे वे लोग ठाकुर को वैसे मानते तो थे किंतु ठाकुर को एज ए गुरु या इष्ट के रूप में स्वीकार करके बात बाद बात बाद बात बाद बात बाद बात बाद बात बाद बात बाद बात बाद बात बाद बात बाद बातबाद बाद में जो भक्तगणों का आगमन शुरू हुआ वह तो हुआ नहीं था तो अभी जो भी है और होगा भी कैसे होगा भी कैसे हमको यह पता है कि शोडशी पूजा मां की शोडशी पूजा करने के बाद में ही जब शक्ति की आराधना ठाकुर ने की उसके बाद में ही भक्तगणों का आगमन शुरू हुआ है। यानी कि देखिए और यह बात हमको पक्की पता है कि मथुर बाबू के साथ में यदि यह बात हुई कि मां ने मुझे दर्शन दिया है और भक्तगण आएंगे उस समय मथुर बाबू जीवित थे क्योंकि मथुर बाबू के साथ में यह बात हुई तो हमको यह बात भी पक्की पता है कि मां शारदा देवी जब दक्षिणेश्वर में आई थी बाय दैट टाइम मथुर बाबू का अवसान हो चुका था। मथुर बाबू का देहत्याग हो चुका था। तो देखिए कि उस समय जो कुछ गैप हुआ यह दर्शन में और फिर मां के आगमन के बाद में शोशी पूजा के बाद में तो इस समय हालांकि दर्शन हो चुका है। भक्तगण आ नहीं रहे हैं तो ठाकुर थोड़े से तो दुखी हो गए थे। थोड़े से तो विमर्श हो गए थे। उस समय मथुर बाबू ठाकुर को सध्यारा देकर के कहते हैं कि बाबा आपको यह सब चिंता करने की क्या जरूरत है? मैं ही तो हूं अकेला आपके 100 भक्तों के समान मैं और हृदय नंदी भ्रुंगी की तरह आपकी सेवा करेंगे। तो अभी जिस मथुर बाबू और ठाकुर का भी ऐसा रिलेशन था ना कि जो आध्यात्मिक या तो पर जगत की बात है वहां पर ठाकुर की जो सर्वोच्च सत्ता है उसको मथुर बाबू बिना किसी डाउट के स्वीकार कर लेते थे। किंतु यह जो व्यवहारिक जगत है, यह जो प्रेजेंट वर्ल्ड है, उसके बारे में ठाकुर बिल्कुल बच्चे की तरह थे। उस जगत में तो वह मथुर बाबू इस व्यवहारिक जगत में ठाकुर को बिल्कुल एक बच्चे की तरह ही एक प्रोटेक्ट करते थे। जैसे कि अपना लाडला संतान हो। उसी तरह से ठाकुर को प्रोटेक्ट किया करते थे। तो ठाकुर को किसी बात का दुख ना लगे। कोई आकर के ठाकुर को कहीं कुछ बोल ना दे। ठाकुर को कोई उनको कोई ये ना करें, आहत ना करें। यह सब चीजों के बारे में मथुर बड़ा ही सावधान रहता था। तो जैसे ही उसने देखा कि ठाकुर बड़े ही विमर्श हो गए हैं कि मां ने दर्शन तो दिया है किंतु फिर भी भक्तगण आ नहीं रहे हैं। तब मथुर बाबू ने ठाकुर को सांत्वना देने के लिए ऐसा कहा कि आप चिंता क्यों करते हैं? मैं ही आप अकेला आपके 100 भक्तों के समान हूं। तो ठाकुर ने सोचा कि चलो मां का ऐसा भी अभी किस तरह से ठाकुर कहेंगे कि यह बात सही है कि नहीं है। मां ने जो दर्शन दिया कि इतने सारे भक्त आएंगे तो क्या यह हो गया इसका अर्थ कि इतने सारे भक्तों के रूप में मथुर बाबू अकेले हैं। वही मथुर बाबू अकेले यह सब संभाल लेंगे। क्या किसको पता इसके बारे में एक इंटरेस्टिंग स्टोरी है। चेतनानंद जी वो पता है ना कि ठाकुर ने कहा 100 साल के बाद मैं फिर से आऊंगा। तो उस समय चेतनानंद जी अमेरिका में थे तो एक अमेरिकन लेडी तो उसने सोचा कि अच्छा ठाकुर तो आएंगे। ठाकुर का मृत्यु कब हुआ? तो 1886 में यानी कि 1986 में उनके 100 साल समाप्त हो गए हैं। तो ठाकुर ने क्या कहा था कि वह जो वर्धमान के रास्ते में वो जो बाउल लोगों का मेला जो है वहां पर बाउल सज के मैं आऊंगा। तो यह लेडी थोड़ी ज्यादा एंथूजियास्टिक थी। यह अमेरिकन लोग जिस चीज को पकड़ते हैं, बड़ा एकदम पक्का पकड़ लेते हैं। हमारी तरह नहीं। अच्छा ठीक है स्वीकार किया है ठाकुर यह सब बोल रहे हैं तो बातों की बातें हैं। हम लोग ज्यादा इसको सीरियसली नहीं लेते कि ठाकुर 100 साल के बाद में आएंगे कि 200 साल के बाद में किंतु यह अमेरिकन लोगों का है। थोड़ा सा लिटरली ले लेते हैं और थोड़ा सा एकदम वो पकड़ करके ले लेते हैं। तो ये अमेरिकन लेडी आई भारत में और वो सोच रही थी कि वो भारत में आएगी। वर्धमान में जाएगी। बा लोगों का मेला है एनुअल जो भी है इवेंट वहां पे जाकर के ठाकुर का इंतजार करेंगी। जब ठाकुर आएंगे तो सबसे पहला दर्शन वही करेगी। ऐसा बोलकर के इसका कुछ प्लान लेकर चेतनानंद जी के पास में गई। तो चेतनानंद जी ने सोचा हम इंडियन लोग थोड़े प्रैक्टिकल है रिलीजन के मामले में। यह अमेरिकन लोग ज्यादा ही बचपना उन लोगों में आ जाता है। तो उसको ठंडा करने के लिए उसको डिसअपॉइंटमेंट ना हो इसलिए वो चेतनानंद जी कहते हैं कि देखिए कि ठाकुर ने कहा क्या कहा जो कहा है 100 साल इसका अर्थ क्या है वो थोड़ा सा समझ करके देखिए। ठाकुर का मैथमेटिक्स तो इतना अच्छा नहीं था। तो ठाकुर ने जो 100 साल कहा है ये 100 साल का क्या अर्थ हो सकता है? ऐसा भी हो सकता है 100-100 सालों के बाद में आऊंगा यानी कितने 100 साल वो तो पता नहीं माने एक साल एक बार 100 साल दो बार दो साल यानी 200 साल ना 300 साल यानी कि ठाकुर इस तरह से महिला भक्त को वहां पे जाने में रोकते हैं तो यहां पे भी हम इस तरह से कह सकते हैं कि ठाकुर का मैथमेटिक्स तो गड़बड़ था और मां काली को यह सब पता था तो ठाकुर के साथ में मजा करने के लिए कहा कि तुम्हारे बहुत सारे भक्त आएंगे और किंतु एक्चुअली भक्त एक ही है वह है मथुर बाबू वही मथुर बाबू के भीतर में ही सब भक्त समाए हुए हैं और ठाकुर का मैथमेटिक्स सब कच्चा है। इसलिए इस तरह से गोल घुमा करके बोल दिया होगा। व्हाटएवर। अभी यहां पे देखिए यह भी एक बड़ी इंटरेस्टिंग बात है कि एक्चुअल भक्तों का आगमन तो मां के आने के बाद में ही हुआ। तो यह जो है किस तरह से इन दोनों घटनाओं को बिठाएंगे? भक्तगण आएंगे। यानी कि इसका अर्थ क्या है? एक्चुअली ठाकुर का साधन समय जो है वह समाप्त हो चुका है। अभी यह जो वर्ल्ड मिशन है ठाकुर का वो प्रारंभ होने वाला है। किंतु वो प्रारंभ होगा कब? ठाकुर को इंगित मिल गया है। मां काली ने आकर के दर्शन देकर कह तो दिया है कि तुम्हारे बहुत सारे भक्त आएंगे। किंतु यह प्रारंभ होगा कब? यह प्रारंभ करना ना ही ठाकुर के हाथ में है ना ही मां काली के हाथ में है। यह प्रारंभ तभी होगा जब मां शारदा देवी दक्षिणेश्वर में आएगी। और मां दक्षिणेश्वर कब आई है? इसके बारे में ना ही ठाकुर का कोई हाथ है। ना ही ठाकुर ने कोई पत्र लिख करके या ऐसा करके नहीं कहा कि तुम यहां पर आओ। मेरी सेवा की आवश्यकता है। मुझे सेवक की आवश्यकता है। मेरी सेवा ठीक नहीं हो रही। तुम यहां पर आओ। मेरी सेवा करो। तो ऐसा बोलकर के तो ठाकुर ने कोई पत्र नहीं लिखा है। वो तो बाद में लिखा था। जब हृदय उनको छोड़ के चला मतलब हृदय को जब भगा दिया गया था तब तो ठाकुर को सेवा की जब तकलीफ होने लगी तो अपने स्वार्थ से प्रारंभ उन्हें प्रेरित होकर के ठाकुर ने लिखा था। यह सब हंसी मजाक की बातें हैं। ठाकुर के भीतर में स्वार्थ है नहीं किंतु जस्ट बातों की बातें तो व्हाटएवर बाद में ठाकुर ने इस तरह से पत्र लिखा था कि तुम आओ मेरी सेवा में तकलीफ हो रही है करके किंतु पहले तो हृदय था मथुर बाबू खुद जीवित थे और उस समय मां का वहां पे आना नहीं आना इसके बारे में ठाकुर थे संपूर्ण उदासी। अह गंभीरानंद जी ने इसके बारे में थोड़ा बहुत लिखा भी है। चिंतन भी किया है कि ठाकुर क्यों इस तरह से मां के वहां पर आगमन के बारे में उदासित थे। तो फिर ठीक है चलो अभी कंक्लूजन इस तरह से हम निकाल सकते हैं कि इन दोनों का संबंध इतना दिव्य है। यह जो व्यवहारिक जगत के इतना परे है और दोनों के बीच में फिर टेलीपथी भी था। तो फिर दोनों के बीच में क्या कम्युनिकेशन होता होगा? वी डू नॉट नो। और फिर मां काली थी बीच में मध्यस्था करने वाली। तो फिर वो ठाकुर मां काली को क्या कहते होंगे? काली मां काली उनको क्या मैसेज पहुंचाती होंगी? वो जो अपने वो आजकल वो आजकल तो वो टपाली होते नहीं है। टपाली यानी कि आपने वो जो ये जो होता है ना लेटर बॉक्स उसमें जब लेटर डाले तो वो जो एक आता है वो क्या बोलेंगे उसको? टपाली शब्द मुझे पता है। आई थिंक ये गुजराती शब्द है जो भी है वो जो पोस्टमैन इसको कहते हैं पोस्टमैन। तो पोस्टमैन आकर के वो लेटर एक जगह से लेकर के उसका जो एड्रेस है वहां पे जाकर के डाल देगा। तो यह पोस्टमैन का काम करने वाली थी तो मां काली थी इन दोनों के बीच में तो क्या कम्युनिकेशन हो होता होगा यह जो ट्रायंगुलर रिलेशनशिप है वी डू नॉट नो किंतु जब यह दर्शन हुआ था उस समय ठाकुर के हाथ में नहीं था या तो फिर ठाकुर इस तरह से कोई अनुमान नहीं कर पाए थे कि मां कब आएगी जब मां आएगी दक्षिणेश्वर मां शारदा देवी तब कहीं जाकर के ठाकुर उनकी शोडशी पूजा करेंगे या तो फिर ठाकुर उनके भीतर में जगन मातृत का आवाहन करेंगे। शक्ति की आराधना करेंगे और इस शक्ति से शक्तिमान होकर के ठाकुर अपना यह जो जगत में जो अपना जो मिशन है रामकृष्ण मिशन उसका प्रचार प्रारंभ करेंगे। उस पर वह आगे बढ़ेंगे। तो उनको इंगित तो पहले मिल गया था। मथुर बाबू जीवित थे। उसी समय इंगित तो मिल गया था। किंतु यह कार्य प्रारंभ हुआ। एक्चुअली जो प्रारंभ हुआ मथुर बाबू के देहावसान के बाद में मां शारदा देवी के दक्षिणेश्वर में आने के बाद में वो जो मां जब आई थी दक्षिणेश्वर तो पहला ही बात ठाकुर ने उनको क्या कहा था कि मेरा मथुर अब थोड़ी ना है जो कि तुम्हारी सेवा करेगा मेरा जो दाहिना अंग है वह जैसे कि टूट गया है यानी कि मथुर बाबू ठाकुर की इतनी सेवा करते थे और अब जो उनके जाने के बाद में जो उनका पुत्र है वह त्रैलोक्य वगैरह इन लोगों के भीतर में ठाकुर के प्रति इतनी श्रद्धा नहीं थी तो मां की जो सेवा होनी चाहिए उनके स्टेटस के अनुसार वह होगी कि नहीं उसके बारे में ठाकुर को डाउट था तो यह है पूरा क्रोनोलॉजी तो जब ठाकुर यहां पर कहते हैं कि जा मोने कोताम ताई हो तो पूरा सेंटेंस मैं फिर से पढ़ता हूं मां के कहदे कैदे बोलताम मां को मैं मां काली को रोते-रोते कहता मां भक्तों दे जोने अमार प्राण जाए ता देर शीघ्र आमा एने दे मां मां भक्तों के लिए मेरे प्राण जाते हैं। उनको शीघ्र मेरे पास में ले आओ। और फिर जा ठाकुर कहते हैं जा मोने करता ताई हो तो जो जो मैं मन में करता वही होता। किंतु जो एक क्रूशियल मिसिंग पीस ऑफ इंफॉर्मेशन है इस सेंटेंस में वह क्या है कि वह यह है कि जब तक मां शारदा देवी दक्षिणेश्वर नहीं आती है जब तक शक्ति की आराधना नहीं होती है तब तक ठाकुर हजार रोल कोई फर्क नहीं पड़ने वाला भक्तगण आने वाले नहीं थे। सो दैट इज वन क्रूशियल पीस ऑफ इंफॉर्मेशन कि यहां पर ठाकुर हमको नहीं बताते हैं। ओके इसके बाद मास्टर महाश ठाकुर क्या कहते हैं? पंचवटी ते तुलसी कानन कोरे छिलाम जब ध्यान करो बोले पंचवटी में तुलसी कानन किया था जब ध्यान करूंगा यह सोच के बेकारीर बेड़ा देब जन बो इच्छा हो लो ये बेकारीर बेड़ा क्या है पता नहीं वो एक तरह का बैरियर वो जिसको खड़ा करते हैं वह पता है ना कि वह जो पौधा छोटा होता है तो उसके आसपास में एक बैरियर खड़ा करते हैं कुछ उसके प्रोटेक्शन के है तो उसके आसपास में प्रोटेक्शन देने के लिए उनको इच्छा हुई तार पर देखी जोया रे कतगुलो कतक गुली बेकारी आटी खानिकटा दौड़ी ठीक पंचवटी सामने ऐसे पड़े छ और ऐसी इच्छा जैसे हुई उसके कुछ ही दिनों के बाद में देखा कि यह बैरियर बनाने के लिए प्रोटेक्शन देने के लिए जो सब चीजें चाहिए दड़ी अर्थात कि रस्सी वगैरह-वगैरह वह सब गंगा में बहती बहती पंचवटी के सामने आकर के पड़ी हुई है। ठाकुर बाड़ी एक जन भारी छिलो से नाचते नाचते ऐसे खबर दिल ठाकुर वाड़ी का एक कोई कर्मी होगा उसने नाचते नाचते आकर के ठाकुर को समाचार दिया वो इतना खुश हो गया कि ठाकुर के मन की यह इच्छा जब हुई है और जैसी ही इच्छा हुई साथ-साथ में ही यह सब चीजें प्रस्तुत भी हो गई तो यह कैसा एक दैवी इंगित है इसके भीतर में तो उसने इतने हर्ष के मारे हर्ष से भरपूर होकर के हरख के मारे हमारे ठाकुर के पास में नाचते नाचते आकर के यह समाचार दिया जोखन ए अवस्था होो पूजा आर कोरते पारलामना जब मेरी यह अवस्था हुई तब मैं पूजा कर नहीं कर पाया नेचुरली है कि पूजा करने के लिए जो आपको रूटीन फॉलो करना पड़ेगा नियम कानून के अनुसार जो विधि विधान है मंत्रो उच्चारण करके पूजा करनी होगी वह सब तो नहीं होगा ठाकुर हम अनुमान करके करके देख अपनी एक कल्पना की दृष्टि से देख सकते हैं कि ठाकुर ने वह तैयार होकर के मंदिर में गए होंगे। जैसे ही पहला मंत्र उच्चारित किया होगा उसी में वह समाधस्त हो गए होंगे या भाव में आकर के नृत्य कीर्तन करना शुरू कर दिया होगा। हु कैन से तो ठाकुर कहते हैं कि पूजा जो विधिवत पूजा करनी होती है वो अभी मैं नहीं कर पाया। देखिए कि जो वैधि पूजा है और जो भाव पूजा है भाव पूजा अभी जैसे समाज की रीति है मंदिर है उसको अनुष्ठानिक रूप में यदि उसकी अनु हुई है स्थापना हुई है तो अनुष्ठानिक पूजा भी होनी चाहिए यह तो शास्त्र का विधान है और यहां पे ऐसा नहीं है कि ठाकुर मां की पूजा नहीं कर सकते हैं। बात वही है कि ठाकुर वाज़ ओवर क्वालिफाइड। मैं एक जगह पर था एक सेंटर में वहां पर एक लड़का रहता था तो वो मैं जब भी उसको पूछता हूं क्या कर रहे हो वो पूछता है कि मैं एमए की परीक्षा दे रहा हूं अभी था ऐसा कि उसने तीन-चार सब्जेक्ट में एमए कर लिया था डबल ट्रिपल एमए था वो फिर वो एक दिन आकर के मुझे कहता है कि मैंने गवर्नमेंट जॉब के लिए अप्लाई किया था वो रिजेक्ट हो गया तो और मैंने कहा क्यों रिजेक्ट हो गया तुम तो डबल ट्रिपल एमए हो तो छोटी बात नहीं है और यह तो सिर्फ कारकुन जॉब है। छोटी जॉब के लिए इतना हाईली क्वालिफाइड हो। क्यों ऐसा हो गया? तो उसने कहा कि मेरे फॉर्म में ऐसा लिख के आया है कि ओवर क्वालिफाइड। रिजेक्ट क्यों हो गया? बिकॉज़ ही इज़ ओवर क्वालिफाइड। तो यहां पे भी ठाकुर क्या है कि ही इज़ अ ओवर क्वालिफाइड। बस जो एक वैध पूजा जो करनी है वह तो कोई भी एक ब्राह्मण कर सकता है। कोई भी एक पंडित कर सकता है। ठाकुर की जो पूजा थी वह वैधि पूजा को छोड़कर के भावमय पूजा के रूप में परिणत हो गई थी। तो ठाकुर जिस तरह से पूजा करते थे उसको शायद अनुष्ठानिक रूप से मंदिर की स्थापना हुई है। उसमें वह नहीं चलेगी। तो इसीलिए ठाकुर कहते हैं कि पूजा आर करते पारलामना पूजा में नहीं कर पाया। बोल मां आमाई के देखवे। मैंने मां को कहा मां मुझे कौन देखेगा? अर्थात कि मेरी केयर कौन करेगा? क्योंकि क्या है कि जैसे अभी हमने देखा कि आध्यात्मिक विषय में ठाकुर जैसे कि भाव राज्य के राजा है तो यह व्यवहारू जगत में ठाकुर बिल्कुल बालक जैसे हैं। उनको किस तरह से अपनी केयर करनी कि खाना पीना वगैरह जो एक रूटीन फॉलो करना वो खुद कर ही नहीं पाएंगे। कब वह भाव में आ जाएंगे। भाव में पड़े रहेंगे और यदि उनकी संभाल रखने वाला कोई नहीं होगा तो फिर क्या है कि उनका स्वास्थ्य धीरे-धीरे बिगड़ता जाएगा। हमको पता है मां का जीवन पढ़कर के हमने देखा है कि मां जिस तरह से ठाकुर की जो डाइजेशन शक्ति थी उसके अनुसार समझ करके ठाकुर के लिए खाना बनाती थी और आवश्यकता आन पड़ने पर झूठ बोलकर के भी उनको ज्यादा ज्यादा करके दूध पिलाती थी। बोलकर के ठाकुर का स्वास्थ्य अच्छा रहता था। तो अभी मां है और फिर मां के पहले यह जो सब थे हृदय था और मथुर थे उन्होंने ठाकुर की जो केयर की उसी की वजह से तो उनका स्वास्थ्य टिका रहा। वरना जिस तरह की प्रचंड साधना वो करते थे और अपने देह के बारे में जो संपूर्ण रूप से जैसे कि वह उदासीन थे। उनका स्वास्थ्य मेंटेन होता कि नहीं हु कैन से। इसीलिए यहां पर ठाकुर कहते हैं जब वह होश में होंगे एकाएक उनको याद आया होगा कि ठाकुर मां मेरी कौन रक्षा करेगा कौन मुझे देखेगा तो मां आमाार ऐन शक्ति नाई जे निजे भार निजे लोई मां को कहते हैं ठाकुर कि मां मेरी ऐसी शक्ति नहीं है कि मैं अपना जिम्मा अपने से ले पाऊं मैं अपना भार अपने से ले पाऊं आर तोमार कथा सुनते इच्छा को रे भक्तों देर खावाते इच्छा कोरे कारू के सामने पड़ले किु दीते इच्छा को रे और फिर साथ-साथ में ही तुम्हारी बात सुनने की इच्छा होती है। भक्तों को खा खिलाने की इच्छा होती है। कोई यदि सामने आन पड़ता है तो कुछ देने की इच्छा होती है। अर्थात कि इस तरह का वहां पर भजन कीर्तन लगा रहे जिससे कि और फिर यह कथा होती है तो कथा चलती रहे कि जिससे कि ठाकुर मां के नाम गुणगान का श्रवण कर पाए। यदि कोई सामने आ जाता है भक्त लोग वगैरह तो उनको खिलाने की इच्छा होती है। यदि कोई भिक्षुक वगैरह आ जाए, कोई साधु सन्यासी आ जाए तो उनको कुछ देने की इच्छा होती है। क्या देने की? तो यह कमंडलु है। फिर वह जो तंबाकू खाते हैं तो वह तंबाकू है, दूध है, खाना है, भिक्षा वह सब भिक्षा देने की इच्छा होती है। साधु सेवा करने की इच्छा होती है। जैसे कि ठाकुर देखिए ठाकुर के जीवन में साधु सेवा का कितना एक प्रभाव है। जब वह कामार पुकुर में थे। तभी से वह जो चोटी अर्थात कि वहां की धर्मशाला में जो साधु सन्यासी वगैरह आते थे। गंगासागर या जगन्नाथ पुरी की यात्रा करते-करते वहां पर आकर जो रुकते थे तो तभी से ठाकुर बच्चे थे तभी से साधुओं की सेवा किया करते थे तो

प्रश्न: ठाकुर अपने शिष्यों को देखकर बहुत प्रसन्न होते थे। लेकिन यदि ठाकुर अधिक प्रेम दिखाते तो नरेन क्रोधित हो जाते थे। यह लीला कितनी मधुर है!

अभी बड़े होकर के भी ठाकुर कहते हैं कि यदि कोई सामने आ जाता है इस तरह का साधु साधक तो उनको कुछ दान दक्षिणा भिक्षा देने की इच्छा होती है ए शभ मा के मन कोरे होए यह सब मां कैसे होगा पहले तो मैं खुद की संभाल नहीं ले पाता हूं तो मेरी संभाल कौन लेगा दूसरा कि भक्तों को खिलाने की इच्छा है, साधु संतों को दक्षिणा देने की इच्छा है। तो वह सब कैसे होगा? मां तुम ही एक जोन बड़ो मानुष पहचने दा मां तुम एक बड़ा आदमी मुझे दे दो। मेरे पास में दे दो। ताई तो सेजो बाबू ये है तो सेवा कोर ले। इसीलिए तो सेजो बाबू अर्थात कि सेजो अर्थात कि मध्यम वो मध्यम पुत्री के जो जामाई थे तो इसलिए उनको सेजो बाबू कहते हैं। मथुर बाबू ने उनकी इतनी सेवा की। सेजो यानी कि मध्यम ना कि छोटा देखना पड़ेगा व्हाटएवर। तो इस तरह देखिए कि यहां पे सबसे एक इंपॉर्टेंट चीज है। देखिए कि ठाकुर ने खुद ने इस तरह से मांगा है मां के पास में कि इस तरह से कोई एक बड़ा आदमी आकर के उनकी सेवा करें। अभी देखिए कि हमको इस तरह से कि पैराडॉक्स नहीं लगता क्या? ठाकुर को पैसे नहीं चाहिए। किंतु ठाकुर को पैसे वाला चाहिए। यह किस तरह का पैराडॉक्स है? पैसा अपने पास में नहीं रखेंगे। धन का संचय करना तो महापाप है। इस तरह से उसको वो छोड़ देंगे। किंतु यदि एक धनशाली व्यक्ति है। यदि एक धनवान व्यक्ति है तो

प्रश्न: सात्विक एकादशी क्या है?

वह रहकर के ठाकुर की सेवा करें। इसके बारे में इस तरह का माइंडसेट क्यों है? मतलब देखिए कि यदि कोई एक धनवान व्यक्ति है। अच्छा सेजो मींस थर्ड वन। अच्छा अच्छा तो अच्छा तो इस तरह का माइंडसेट क्यों है ठाकुर का किस तरह से यह लॉजिक काम करता है? पहली बात तो है कि इस तरह का लॉजिक समझने की अपनी जो सामान्य बुद्धि है उसकी कोई क्षमता होती नहीं है। किंतु फिर भी एक सामान्य बुद्धि का इस्तेमाल करके थोड़ा सा यदि लॉजिक लगाएं कि पैसा नहीं चाहिए। पैसे वाला चाहिए। हाउ डस दिस वर्क? यानी कि यदि पैसा होगा तो पैसे की चिंता भी होगी। पैसे का भार भी मेरे सर पर रहेगा। पैसे का एक जिम्मा भी रहेगा। उसको लेकर के दिन रात व्यस्त रहूंगा। किंतु जैसे कि यह ठाकुर को जब पहली पहली बार मथुर बाबू चाहते थे कि ठाकुर मां काली की पूजा करें। मां काली ना

प्रश्न: ठाकुर भागवत-भक्त-भगवान के बारे में क्या कहते है?

कि वो राधाकांत की राधाकांत की शायद शुरू हुए में ठाकुर वहां से ही प्रारंभ किया। तो जो भी है रामकुमार उस समय जीवित थे। ठाकुर के बड़े भाई और मथुर बाबू ने ऑलरेडी

जब ठाकुर ने कहा गुरु-कृष्ण-वैष्णव बोलो - तब केशव सेन ने मना किया था

रामकुमार के सामने यह प्रस्ताव रखा था कि आपके जो छोटे भाई हैं उनको हम पुजारी का पद देना चाहते हैं। तो उस समय ठाकुर को यह जब रामकुमार ने बताया कि तुमको पूजा करनी होगी तो उस समय ठाकुर बालक गदाई उस समय का बालक तो नहीं युवान गदाई तो वो गदाई था। वो मथुर बाबू से दूर ही रहता था। क्यों? क्योंकि उनकी इच्छा नहीं थी कि वह मना करके उनके मन में दुख प्रकट करें। क्योंकि ठाकुर के मन में ऐसा था यदि पूजा करनी होगी तो गहनों की जिम्मेदारी भी लेनी होगी। अभी पूजा करना तो ठीक है। चलो वैधि पूजा करनी है तो शुरू शुरू में जब ठाकुर को तो कामार पुकुर से रामकुमार इसीलिए कोलकाता ले आए थे ना कि वो झामापुकुर में उनकी जो पाठशाला चतुष पाठी वहां पे वो जब रामकुमार यदि चतुष्पाठी चलाएंगे यानी कि वो जो संस्कृत पाठशाला चलाएंगे तो जो यजमान के रूप में लोगों के घर जाकर के जो पूजा करनी है वह कार्य उनका छोटा भाई गदाधर करेगा तो बोलकर के ही ठाकुर को लाए हैं और ठाकुर तो जाते भी थे। उस समय जामापुकुर में रहते रहते लोगों के घर जाकर पूजा करते भी थे। अभी वे लोग कितने धन्य होंगे कि जिनके घर आकर के नारायण स्वयं अपनी खुद की पूजा करते हैं। नारायण आकर के नारायण की पूजा करते हैं। वे लोग भी कितने धन्य होंगे। तो ठाकुर उस समय वैध पूजा तो करते ही थे। किंतु जब मथुर बाबू ने काली मंदिर में पूजा करने को कहा। उस समय ठाकुर के मन में यह एक था कि गहनों की जवाबदारी नहीं लेनी है। अभी ठाकुर मां को गहनों से

प्रश्न: आपने रेशनालिटी और शरणागति के बारे में बात की। क्या वे एक साथ चलते हैं, या रेशनालिटी एक पॉइंट पर आकर रुक जाती है और शरणागति शुरू हो जाती है?

सजा सजी हुई देखकर के या तो उनको आनंद तो होता था किंतु ये जिम्मा कौन अपने सर पे लेगा? वो अननेसेसरी एक बर्डन बन के रह जाएगा। मुक्त मन से जो ईश्वर में मन लगना चाहिए। उसकी वजह एट द बैक ऑफ आवर माइंड हमेशा यह बना रहेगा कि अरे वह गहने चोरी तो नहीं हो गए? और हकीकत में एक बार वह राधाकांत के मंदिर से गहने चोरी हो भी गए थे। और मथुर बाबू पागल की तरह राधाकांत के सामने खड़े रहकर कहता है कि आप किस तरह के भगवान है अपने खुद के गहनों की रक्षा नहीं कर पाए तो ठाकुर ने क्या कहा कि यह गहने तुम्हारे लिए ही गहने हैं जो तीनों भुवन के त्रिभुवन के स्वामी है उनके लिए तो ये ईंट मीट ईंट पत्थर के बराबर है तो ठाकुर को यह जिम्मा नहीं लेना था तो फिर ठाकुर ने हृदय को कहा कि तुम यदि गहनों का जिम्मा लेते हो तो फिर मैं पूजा करने के लिए तैयार हूं तो फिर मथुर बाबू को यह बात प्रपोज की गई और मथुर बाबू ने स्वीकार भी कर ली। सो दिस इज हाउ ठाकुर स्टार्टेड ह फर्स्ट पूजा इन दक्षिणेश्वर। दक्षिणेश्वर में पहली पूजा ठाकुर ने इस तरह से प्रारंभ की। तो यहां पे भी पैसा नहीं चाहिए क्योंकि पैसा रहेगा तो सब समय अपने सर पे एक ओर बना रहेगा उसका भार। फिर आप मुक्त मन से आप ईश्वर की पूजा नहीं कर पाएंगे। और तो पैसा वाला है तो क्या है कि पैसों की जिम्मा उसी का है। जब चाहे वह निकाल करके दे दे। दूसरा ही क्या है पता है? अभी यह थोड़ा फार फच हो जाता है। किंतु फिर भी अब थोड़ा एसोसिएशन कर ही देता हूं। वो जो वाल्मीकि की कहानी है वो वालियो लुटारो यानी कि वो वालियो नाम का एक लुटारू था। माने एक वो दस था। लुटेरा था। तो क्या करता था? लोगों को लूटता था। तो यहां पे वो नारद मुनि को लूटने को आया। तो नारद मुनि ने उनको पूछा कि अच्छा तुम बताओ तो तुम किनके लिए यह सब लूटमार वगैरह कर रहे हो? तो ये लुटेरे ने कहा कि मैं अपने मां-पिताजी के लिए कर रहा हूं। तो फिर उन्होंने कहा कि देखो तुम तो लूटमार करके पाप के भागीदार हो रहे हो। तो तो तुम जिनके लिए यह सब कर रहे हो वे लोग क्या तुम्हारे पाप के साथ में हिस्सेदार होंगे? वे लोग तुम्हारा पाप शेयर करेंगे। तो वो लुटेरे ने कहा कि करना ही चाहिए ना। मैं तो पाप तो उन्हीं के लिए कर रहा हूं। तो किंतु फिर भी अभी जब संदेह खड़ा हो गया है तो घर जाकर मां पिताजी को पूछा कि अच्छा मैं तो पाप करके आपको खिला रहा हूं। तो आप मेरे पाप के आप आप जिस तरह से मेरा धन मैं आपके साथ में शेयर कर रहा हूं। क्या मेरे पाप भी आप मेरे साथ में शेयर करेंगे? मतलब मेरा पाप भी आप लेंगे क्या? शेयर करेंगे मेरे साथ में। तो उन्होंने स्पष्ट मना कर दिया कि हमको खिलाने का तुम्हारा जिम्मा है। यह तुम सत रास्ते से करो ना कि असत रास्ते से करो। वो पुण्य भी तुम्हारा पाप भी तुम्हारा। तो यह सुनकर के वो जो लुटा रहा था उसकी अकल आ गई। ठिकाने और उसने कहा कि यह छोड़ो मैं किन के लिए यह सब कर रहा था। फिर नारद मुनि के पास में जाकर के मरा मंत्र का वो जप प्रारंभ करता है उनके पास में सीख करके तो मरा मरा मरा मरा करते राम राम राम हो गया तो यहां पे भी देखिए कि यदि कोई भी कार्य करते हैं तो उसके साथ में पाप पुण्य लगा रहता है तो यह पाप पुण्य किसका है तो जो कार्य वह करता है उसका है नहीं कि उस कार्य का बेनिफिट जो जिसके साथ में शेयर करता है उसका हमको पता है कि मथुर बाबू ने कुछ ना कुछ अवैधिक तरीकों से कुछ ना कुछ धन इकट्ठा किया था। यह जो जमींदार होते हैं तो इललीगल काम तो उनको करना ही पड़ता है। तो उसका पाप का फल क्या ठाकुर वो लेंगे वो मुझे ऐसा नहीं लगता कि इस तरह से वह पाप का फल ट्रांसमिट होगा। हालांकि जब मथुर बाबू कोई कोर्ट केस में पड़ जाते थे और ठाकुर को आकर के कहते थे कि मां काली को अर्घ्य दीजिए जिससे कि मैं यह कोर्ट केस से बच जाऊं तो ठाकुर उनको गालागाली तो अवश्य देते थे। क्या सब ये गड़बड़ कर रहे हो? किंतु फिर उदार मन से अर्घ्य दे भी देते थे। फोर ठाकुर कहते भी थे बड़े खुश होकर के कि देखो उसको यह विश्वास है कि मैं अर्घ्य दूंगा तो यह काम हो जाएगा। यानी कि ये सब कॉम्प्लिकेशंस कितने हैं इन सब रिलेशंस के भीतर में। तो यहां तक आज यहां तक पढ़ते हैं। अभी इससे आगे कल। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु इसको इसका कोई रेजोल्यूशन नहीं है। गीता में कहा है गहना कर्मणो गति ये जो कर्म की गति है वो इतनी गहन है कि पंडित लोग वो इधर उनका दिमाग चक्कर में पड़ जाता है। तो दूसरी बात है कि वह एक्चुअली वाल्मीकि का पाप उनके पिताजी को लगा कि नहीं दैट वी डू नॉट नो। उन्होंने तो सिर्फ इतना कहा है कि हम तुम्हारा पाप शेयर नहीं करना चाहते हैं। किंतु वो चाहते हैं कि नहीं चाहते हैं वो एक चीज है और शेयर हो गया होगा जो कि नियम के अनुसार वो हो गया होगा। मींस ये दो अलग चीजें हैं। वह हमको समझना चाहिए कि पाप शेयर हुआ है कि नहीं। वो एक हो गया। वो पाप ग्रहण नहीं करना चाहते हैं। दैट इज अनदर थिंग। वो नहीं चाहने पर भी हो गया होगा। वी डू नॉट नो। यहां पर क्या है कि दो तरह के भक्तों की बात की गई है। एक तो है कि जो कि मुक्ति को प्राप्त करेंगे। दूसरा है कि जो कि अंतरंग है जन्म जन्मांतर से उनके साथ में आते रहेंगे। उनकी मुक्ति नहीं है। एकदम स्पष्ट रूप से कहा गया है कि जो अंतरंग है उनकी मुक्ति नहीं है। ठाकुर के साथ में आना ही है उनको हर बार। तो रंगनाथानंद जी का भी रंगनाथानंद जी को किसी ने पूछा था आपका आखिरी जन्म होगा शायद। तो उन्होंने कहा कि नहीं हर बार मैं ठाकुर के साथ में आना चाहता हूं और ठाकुर के साथ में यदि ना हो पाए तो ठाकुर का जो बादबा बाद में जो उनके जो भक्त होते हैं तो ऐसा भक्त होकर के आना चाहता हूं। सो भक्तों में भी दो कैटेगरी होती है। तो यह जो कि अवतार का अंतरंग होना मास्टर महाशय ने किसी एक जन्म में ठीक किया होगा। अपने से यह सिलेक्शन किया होगा कि मैं उनके प्रति इतना समर्पित हूं कि मैं हर बार उनके साथ में आना चाहता हूं। तो अभी देखिए कि जन्म ग्रहण करके ही पंचमहाभूत फांदे ब्रह्म पड़े का तो वो आपको यदि पंचमहाभूत का देह लिया है तो रोना तो पड़ेगा ही वो मां सीता के लिए भगवान राम रोए थे तो फिर मास्टर महाशय कौन खेत की मूली है तो उन्होंने सिलेलेक्ट किया है कि मैं उनके साथ में हर बार आऊंगा बोलकर और यह कष्ट वरण किया है सामने से हमको भी कि हमारे पास में भी ऑप्शन है कि हम ठाकुर के साथ में साथ में नहीं तो बाद में भी हर बार आना चाहते हैं कि बस हमको मुक्ति मिल जाए और फिर यह हमेशा के लिए छूट जाए। दैट ऑप्शन वी हैव वी ऑल हैव कहना मुश्किल है क्योंकि अल्टीमेटली देखिए कि एक बार आपको यदि मुक्ति मिल गई तो आपका इंडिविजुअल अस्तित्व तो रहने नहीं वाला है। आप उसी एक सनातन परम पुरुष में मिलित हो जाने वाले हैं जिनकी एक-एक किरण से यह अवतार खुद स्वयं प्रकट होते हैं। तो उस लेवल पे जाकर के कि आप मिलित हो गए और

प्रश्न: हम स्वामीजी या योगानंदजी जैसे ठाकुर की परीक्षा कैसे करते हैं?

कोई है कि उसके एक स्टेप नीचे रह के ठाकुर जी ऐसे कहते हैं चीनी होते चाहिए ना मां चीनी खेते चाहिए। आइडियली स्पीकिंग शुगर हो जाना बेटर है। निर्विकल्प समाधि यदि अद्वैत वेदांत कहता है कि निर्विकल्प समाधि प्राप्त करके ईश्वर में या तो ब्रह्मण में संपूर्ण रूप से एकीत हो जाना यह आध्यात्मिक जीवन का सर्वोच्च आदर्श है। किंतु ठाकुर आश्चर्य से सरप्राइजिंगली कहते हैं कि मुझे वह सर्वोच्च आदर्श नहीं चाहिए। मैं शुगर होना नहीं चाहता। शुगर खाना चाहता हूं। यानी कि ईश्वर के साथ में थोड़ा सा दूरी बनी रहे। भक्त भगवान का संबंध बना रहा है और यह जो रसास्वादन है माने शांत भाव दास्य भाव वात्सल्य भाव मधुर भाव महाभाव इसका भाव का आस्वादन होता रहे यह ठाकुर चाहते हैं। सो हाउ कैन वी से कि हमारे शास्त्रों में एक और लिखा गया है कि निर्विकल्प समाधि आत्म साक्षात्कार ब्रह्मानुभूति सर्वोच्च है। और दूसरी ओर है कि आज के युगावतार कहते हैं कि मुझे वह नहीं चाहिए। हां ऐसा नहीं है कि वह नहीं चाहिए। वो प्राप्त करने के बाद में एक स्टेप नीचे रहना चाहता हूं। सा रे गा मा पा धा नी नी तक पहुंच गए। फिर नी से एक स्टेप आकर के रहना चाहता हूं। सो दिस इज इवन हायर। ये जो जैसा अपना वो आयन महाराज कहते हैं वो ज्ञान से भी बड़ा विज्ञान है। म जिसको कहते हैं पोस्ट निर्विकल्प समाधि लाइफ बड़ा ही कंट्राडिक्टरी था। मतलब बड़ा ही ऑोजिट डायरेक्शन में जाता था। किंतु देखिए कि ठाकुर और स्वामी जी का क्रूशियल डिफरेंस क्या है कि ठाकुर ने वंटियरली उसको छोड़ा था। या तो फिर वलंटियरली एक स्टेप नीचे आकर रहे थे। जबकि स्वामी जी के केस में था कि ठाकुर ने कहा कि मैं चाबी मार दे ताला मार दे रहा हूं। चाबी मेरे पास रहेगी। जब तुम्हारे जीवन का अंतिम समय आएगा फिर यह ताला फिर से खुलेगा। तो लेफ्ट टू स्वामी जीसस ओन डिवाइस। यदि स्वामी जी का खुद के पास में ये चॉइस रहता तो अभी स्वामी जी ने खुद के मुंह से कहा है कि मैं तो निर्विकल्प समाधि में ही मग्न रह के रहना चाहता हूं। बीच-बीच में शरीर धारण करके लिए आकर के थोड़ा बहुत खाना वगैरह खा लूंगा। तब ठाकुर तिरस्कार करके कहते हैं कि मैंने तो सोचा था तुम ऐसे बड़े वटवृक्ष बनोगे जिसकी छांव में कितने लोग आश्रय ग्रहण करेंगे। सो स्वामी जी के खुद के हाथ में यदि होता तो वी डू नॉट नो व्हाट माइट हैव हैपन। वह अल्मोड़ा में गए थे। अल्मोड़ा की गुफा में बैठे थे। चाहते थे कि निर्विकल्प समाधि में ही बस अभी पूरा समय बीत जाए। किंतु अगेन जो चाबी ठाकुर के पास में थी तो उनकी बहन की जो अपघात मृत्यु का जो संवाद आया तो फिर से स्वामी जी को नीचे आना पड़ा। सो स्वामी जी प्रयास तो करते हैं वैसे निर्विकल्प समाधि की ओर जाने का किंतु ठाकुर है उनको खींच के ले आते हैं। यहां पे एक बात क्या है पता है? जिस तरह से शास्त्र हमको कहते हैं जब हम मुक्ति के बिल्कुल नजदीक पहुंच जाते हैं तो यह जो इंडिविजुअलिटी रहती है वह ऑलमोस्ट वो ड मतलब डिॉल्व हो जाती है। फिर ईश्वर या तो फिर आत्मन या ब्राह्मण उसके साथ में हम इतने एकाकार हो जाती है। जगत ना हमको कीड़ी मकोड़ों का बना हुआ सा दिखता है। उसके बारे में हमारी किसी भी तरह की स्प्रुहा नहीं रहती। उस लेवल पर जाकर के वापस आना। दैट इज इट रिक्वायर्स ट्रूली एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी पावर। मुझे ऐसा नहीं

प्रश्न: मैं सोचता हूं कि केवल कर्मयोगियों को ही रैशनल होने और बौद्धिक रूप से संघर्ष करने की आवश्यकता होती है। क्योकि वो बहिर्मुखी होते है। यही कारण है कि स्वामीजी ने बौद्धिक संघर्ष किया। लेकिन राजा महाराज भक्ति से भरे थे, इसलिए उन्हें रैशनल होने या संघर्ष करने की आवश्यकता नहीं थी।

लगता कि स्वामी जी के पास में यदि उस लेवल पर पहुंच जाने के बाद उनका खुद का यह पावर होता कि उसको वो रेजिस्ट कर पाते। मतलब फाइनल जो मर्जिंग है उसको वो रेजिस्ट कर पाते व्हिच इज टू मी इट इज अ बिट डाउटफुल। यह पावर ठाकुर के पास में था और मां के पास में अल्टीमेटली ऑफ कोर्स। किंतु ठाकुर के पास में तो था। ठाकुर उसको रेजिस्ट करके वापस चले आए निर्विकल्प समाधि में से और स्वामी जी जो आए हैं वो ठाकुर के बलबूते पे आए। दिस इज माय पर्सनल बिलीफ। अगेन उस लेवल पर क्या होता है वी डू नॉट नो। और जितने भी स्टेटमेंट आपने कहे वह स्वामी जी ने जागृत अवस्था में दिए हैं। जबकि उनका हृदय इन लोगों के लिए रो रहा था। व्हिच इज वेरी ऑब्वियस टू म समझ सकते हैं कि जब इनके विशाल हृदय उनके जितने विशाल हृदय वाला कोई इसको सफरिंग को देखेगा तो वह तो कहेगा कि हां मैं मुक्ति को त्याग करने के लिए तैयार हूं। हजार नरक भुगतने के लिए तैयार हूं। हमको कहते हैं खुद तो जो कहते हैं करते हैं वह हमको कहते हैं कि भक्ति मुक्ति सब कुछ भूल जाओ फॉर द नेक्स्ट 100 ईयर लेट इंडिया बी योर गॉड यह जो लोगों की सेवा है इसको ही अपना धर्म समझो तो वो कहते तो हैं बट उस लेवल पर जाने के बाद में वो पावर रहेगा इंडिविजुअल जो एक रहेगा उनका इंडिविजुअलिटी बना रहेगा कि मैं विवेकानंद हूं और मैं इन लोगों के लिए रोता हूं दैट इटसेल्फ विल बिगिन टू गो अवे तो फिर उस समय वो वापस आ पाएंगे कि नहीं हु नोस जबकि ठाकुर इज अ कंप्लीटली डिफरेंट कैटेगरी ऑल टुगेदर कि वह तोर वेदांत दृष्टि से नहीं वो वेदांत से ऊपर परे हो गए हैं तो उनके पास में वो शक्ति है उन्होंने वो कहा ना कि जो राम जो कृष्ण वही राम कृष्ण किंतु तुम्हारी वेदांत की दृष्टि से नहीं तो वो वेदांत से परे हो गए हैं बोलकर के उनके पास में वो शक्ति है कि वो वेदांत की सर्वोच्च भूम समाधि भूमि से वो वापस आ सकते हैं। बट वी डू नॉट नो अबाउट दैट अबाउट स्वामी जी। मां वो थी। मां वो थी कि जिन्होंने ठाकुर को वो कहा था तू ही बाबू मुखे थाक ना बियों्ड एवरीथिंग बियों्ड ऑल मां मां का क्या रोल था वही आपने पूछा ना तो देखिए कि ठाकुर जब निर्विकल्प समाधि में प्रवेश कर चुके थे तब उन्होंने क्या कहा वि जो कहा व्हिच इज कॉन्ट्रारी टू एवरीथिंग वि फॉर वि वेदांत स्टैंड्स ठाकुर ने कहा कि मुझे मां ने मां का आदेश मिला कि तू भाव मुखे था। तो अभी देखिए कि वेदांत इस बात को कोई किसी तरह से उस मतलब किस लॉजिक के साथ बताएगा कि मां वहां पर है। हमको यदि वेदांत पढ़ेंगे तो ब्राह्मण के ऊपर में माया का एक आवरण लगता है। तो समष्टि माया जब होती है समष्टि अज्ञान तो उसमें से ईश्वर प्रकट होते हैं। ईश्वर यानी कि मां या तो शक्ति और जो व्यष्टि अज्ञान का जब आवरण होता है तो जीव और जगत प्रकट होते हैं। तो जब यह अज्ञान रूपी आवरण जब हट जाएगा तब तो ना ही ईश्वर रहेगा ना ही जीव जगत रहेंगे तो ब्रह्मण ही सब कुछ है तो जब आप ब्रह्म में भीतर में जब प्रविष्ट हो गए हैं तो वहां पर मां आ करके आपको कैसे बताएगी कि तू ये भाव मुख्य था व्हिच इज कंट्रारी टू एव्री वेदांतिक कांसेप्ट जहां तक मैं समझता हूं वेदांत को तो यदि प्रश्न होगा कि वह मां कौन है हमारी तो वो वो है कि ब्रह्ममई ब्रह्म से भी ऊपर में है और ठाकुर को आदेश देती है कि तू ही भाव मुख्यता। आप देखिए कि जहां आप नेति नेति कर रहे हैं उस समय मां है क्योंकि नेति नेति आप कब कर रहे हैं आपको अज्ञान से परे जाना है बोल के आप नेति कर रहे हैं तो आप अज्ञान के इलाके में है और मां वहां पर उपस्थित है और जब आप इति इति करके वापस आते हैं तो फिर भी अगेन आप अज्ञान के इलाके में आ जाता है। हालांकि वह सात्विक अज्ञान है। सात्विक माया है किंतु फिर भी माया स्वीकार की है आपने तो आप फिर से जब इति इति करके वापस आ गए तब आपको फिर से वह मां दिखाई देगी। बट और और ऐसा प्रूफ भी है हमारे पास में जबकि वह सर्वप्रथम वह जब निर्विकल्प समाधि में ठाकुर जब जा रहे थे तब वह जितनी भी बार आंख बंद करते हैं मां का दृश्य सामने आ जाता है। तो अपने खुद पर नाराज हो जाते हैं। फिर तोतापुरी क्या करते हैं कि उनके कपाल में भ्रू मध्य पे वो कांच का टुकड़ा मार देते हैं। फिर वो कहते हैं जो दर्द हो रहा है, पीड़ा हो रही है उस पे मन को फोकस करो। अब वो मन को फोकस करते हैं। उसके बाद में जब मां आ जाती है तो मां को ज्ञान रूपी खड़ग से काट देते हैं। जैसे ही मां को ज्ञान रूपी खड़क से काट दिया हू हू करके निर्विकल्प समाधि में चले गए तो फिर निर्विकल्प समाधि में मां वापस कैसे आ गई? हाउ इज दैट इवन पॉसिबल? किंतु आप जो कहते हैं ना वह कब है कि आप वन स्टेप नीचे होकर के आप यह कह सकते हैं कि ब्रह्म शक्ति अभेद क्योंकि शक्ति जो है ठाकुर खुद क्या कहते हैं जब स्थिर है तो ब्रह्म कहता हूं जब कार्य करती है तो शक्ति कहता हूं तो माने स्टैटिक एंड डायनेमिक अभी ये डायनेमिक एस्पेक्ट वन स्टेज नीचे आपको देखने को मिलेगा नेति नेति करके लास्ट तक जब पहुंच गए तब तक आपको शक्ति है अल्टीमेट जब हाइट पे पहुंच जाते हैं सिर्फ ब्रह्म ब्रह्मन ही स्थिर है। वहां पर शक्ति है ही नहीं। ठाकुर खुद कहते हैं स्थिर है तो ब्रह्म, चलित है तो शक्ति। फिर जब इति इति करके जैसे ही आपने एक स्टेप नीचे उतरा वैसे ही ब्रह्मन फिर कार्यरत हो गया। फिर से शक्ति का इलाका चालू हो गया। बट इन द स्टेज ऑफ निर्विकल्प समाधि इटसेल्फ देयर इज नो शक्ति। देयर इज़ ओनली ब्रह्म। क्योंकि ब्रह्म स्थिर है। अभी अगेन अभी यह जैसे कि पहले ही दूसरे ही दिन जब मास्टर महाशेखर ठाकुर के साथ में वार्तालाप हो रहा था कि जो सफेद दूध है क्या वो काला हो सकता है कि काला दूध सफेद हो सकता है? तो ठाकुर ने कहा कि वह द्वैत अद्वैत और भी पता नहीं क्या-क्या हो सकते हैं। तो आजकल के क्वांटम डायनेमिक्स में इसको सुपरपजीशन कहते हैं। कोई भी इलेक्ट्रॉन होता है तो कोई कहेंगे कि इलेक्ट्रॉन का जो है स्टेटस वो या तो फिर क्वांटम कंप्यूटर के बारे में कहे कि वो ज़ीरो और वन ये जो होता है ना ट्रांजिस्टर उसकी दो पोजीशन होती है बाइनरी लैंग्वेज की कि ज़ीरो है और वन है। तो ये ज़ीरो वन की लैंग्वेज पे पूरा सब कुछ बना है। यह डिजिटल कंप्यूटर साइंस किंतु यह जो कंप्यूटर साइंस जो क्वांटम कंप्यूटर है, वह कहते हैं कि यह जो अह जो होते हैं ज़ीरो और वन ये सुपरपज़िशन में होते हैं। यानी कि ज़ीरो और वन दोनों एक साथ में है। दिस इज़ अ एस्टैब्लिश्ड साइंस। क्वांटम डायनामिक्स में ये कहते हैं कि ये सुपरपजीशनिंग हो सकता है। यानी जीरो और वन दोनों एक साथ में हो सकते हैं। इलेक्ट्रॉन का अप स्पिन डाउन स्पिन दोनों एक साथ में हो सकता है। जबकि क्लासिकल साइंस कहता है कि या तो अप होगा या तो डाउन होगा या ज़ीरो होगा या वन होगा। सुपरपजीशन नहीं होगा। तो यहां पे जब अल्टीमेट जब पहुंच जाते हैं तो वेदांत कहता है ट्रेडिशनल वेदांत कि देयर इज़ ओनली वन दैट इज ब्रह्मन। जब आप एक स्टेप नीचे आएंगे तब शक्ति होगा या आप नेति नेति करके वह तो फिर इति इति करके किंतु वन स्टेप नीचे शक्ति होगा। किंतु जो मॉडर्न डायनेमिक्स जो है कंप्यूटर क्वांटम डायनेमिक्स और बाकी का ठाकुर का जो जितना भी चिंतन है अभी ऐसा हम कह सकते हैं स्पेककुलेशन करके कि जो अल्टीमेट जो पोजीशन है दैट इज नॉट जस्ट ब्रह्मन बट ब्रह्म एंड शक्ति इन सुपरपजीशन। अल्टीमेट जो निर्विकल्प समाधि है वहां पर ब्रह्मन और शक्ति सुपरपजीशन में है। वी कैन नॉट से वेदर इट इज एग्जैक्टली ब्रह्मन और इट इज शक्ति। ये दोनों सुपरपजीशन में है। जब एक स्टेप नीचे आएंगे तो यह सुपरपजीशन टूट जाएगा। एक इलेक्ट्रॉन है वह पृथ्वी पर ही हो सकता है। एक ही है तो किंतु क्वांटम डायनेमिक्स कहता है वह एक साथ में 100 जगह पर हो सकता है। प्रोबेबिलिटी क्लाउड इसको कहते हैं। और यदि आप उसको मेजर करेंगे तो फिर एक ही जगह पे हो जाएगा। पृथ्वी पे है तो पृथ्वी पे हो जाएगा। तो इस चीज को कहते हैं कोलेप्स ऑफ वेव फंक्शन। ये थोड़ा सा डिफिकल्ट है समझना। किंतु साइंस इटसेल्फ यह कहता है कि दिस इज पॉसिबल। और इसी के बेस पे आज का पूरा मॉडर्न साइंस बना हुआ है। यानी ये हवाहवा में स्पेककुलेशन नहीं है। इनफ माने थाउजेंड्स ऑफ एक्सपेरिमेंट हो चुके हैं। इसको नोबेल प्राइज मिल चुका है। सब कुछ हो चुका है। एस्टैब्लिश पार्ट ऑफ आवर साइंस। सो यदि इस विज़डम को या तो इस आईडिया को हम यहां पे लेके आए तो ट्रेडिशनल व्यू है कि एक स्टेप नीचे में वह शक्ति है। अल्टीमेट लेवल पे वह ब्राह्मण है। अभी इसको थोड़ा सा रिफाइन करें। ठाकुर का विज़डम यदि यहां पे ले आए तो एक स्टेप नीचे शक्ति है। माने ब्राह्मण की ही शक्ति है। नो डाउट अबाउट दैट। बट अल्टीमेट लेवल पे इट इज नॉट जस्ट ब्रह्मन। इट इज ब्रह्म शक्ति सुपरपजीशन। दोनों है वहां पे। इसीलिए ठाकुर को मां का दर्शन हुआ और मां ने निर्विकल्प समाधि में आकर के कहा कि तू भाव मुख्य था। अदरवाइज इट वाज़ माने कोई भी ऐसा थ्यरी नहीं है कि जो कि इसको जस्टिफाई कर पाए। हाउ इज दिस इवन पॉसिबल कि निर्विकल्प समाधि में ईश्वर आकर दर्शन दे? ना आता है इसको छुपाना ऐसा कोई जरूरी नहीं है। ऐसा देखिए ठाकुर के खुद के कीर्तन वगैरह का वर्णन पढ़िए कि जब भाव में आकर के ठाकुर मत्त होकर के सिंह विक्रम में जो शब्द यूज़ किया है मास्टर महाशय ने सिंह विक्रम में आकर के वो नृत्य करते हैं। यानी कितना पावरफुल माने देखिए कि नृत्य किस तरह का होता है। एकधुर्यमय नृत्य होता है और एक भगवान शिव का तांडव नृत्य होता है। तो ठाकुर के भीतर में वह जो तांडव नृत्य का जो प्रताप था वह भी था और यह माधुर्यमय नृत्य का जो यह जो सब एक माधुर्य था दोनों था। सो इट्स अ पार्ट ऑफ दिस स्पिरिचुअल एक्सपीरियंस। किंतु मैं कहूंगा कि इस तरह के वीडियो शेयर नहीं करना उचित है। भाव को भाव को दबा करके नहीं रखना है। किंतु एटलीस्ट इस सब प्रदर्शन भी नहीं करना है। यह सब देखिए आध्यात्मिक जीवन जितना ही वह हृदय में रहे उतना अच्छा है। माने भाव को दबा करके नहीं रखना है। किंतु एटलिस्ट छुपा के रखना।