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Sri Ramakrishna Kathamrita ·

श्रीरामकृष्ण कथामृत || 27 Oct 1882 - केशव सेन के साथ ठाकुर का नौका विहार || 3 Feb 2025

Invocation

ओम स्थापक यज धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः आज से श्री राम कृष्ण कथामृत हम जो पाठ कर रहे थे उस चैप्टर का नाम है श्री जुक्तो केशव चंद्र सेनेर सहीत ठाकुर श्री राम कृष्णेर नौका बिहार आनंद और कथ कथन केशव सेन के साथ में श्री रामकृष्ण देव का नौका विहार आनंद और वार्तालाप अभी हम आए हैं नवम परिच्छेद नाइंथ पॉइंट की ओर अभी हम आए हैं अभी तक हमने देखा कि केशव सेन ठाकुर को लेने के लिए दक्षिणेश्वर आता है रिक्वेस्ट करता है कि आप भी आइए हमारे साथ में हम लोग जहाज लेकर के आए हैं जहाज पर हम लोग घूमेंगे ट्रिप पर जाएंगे गंगा पे विचरण करेंगे और फिर वापस कलकाता लौट आएंगे और इस बहाने जितने भी ब्राह्मण भक्त हैं उन लोगों को श्री रामकृष्ण देव की अमृतवाणी श्रवण करने का एक सौभाग्य मिलेगा बेनिफिट मिलेगा तो इस तरह से ठाकुर भी केशव सेन के साथ में नौका में भ्रमण कर रहे हैं गंगा के ऊपर में और जो वार्तालाप हो रहा है व तो हमने अभी तक जो देखा अभी नाइंथ चैप्टर नाइंथ पॉइंट यहां पर हम आए हैं इस जो चैप्टर है टोटल चैप्टर इसमें 10 पॉइंट है 10 पॉइंट्स आर देयर उसमें से यह नाइंथ पॉइंट अभी फिलोसॉफिकल पॉइंट अभी यहीं पर समाप्त हो जाते हैं इसके बाद वाला जो आखिरी पॉइंट है उसमें तो हम इतना ही देखेंगे कि फिर ठाकुर सुरेंद्र मित्र के वहां पर गए हैं और फिर नरेंद्र को लाते हैं और वहां पर थोड़ा बहुत गप लगाते हैं किंतु फिलोसॉफिकल जो टॉपिक जितने भी है इस चैप्टर के वह सभी टॉपिक इसी पॉइंट के साथ में इसी परिच्छेद के साथ में समाप्त हो जाते हैं तो इसको अभी हम देखते हैं ठाकुर क्या कहते हैं केशवा आदी ब्रह्मो द गर ब्रह कर्म जोग संबंध उपदेश ठाकुर केशव वगैरह ब्राह्मण भक्तों को कर्मयोग के रिलेटेड उपदेश देते हैं कर्मयोग के बारे में सिखाते हैं समझाते हैं क्या श्री राम कृष्ण केशवा दी भक्ते प्रति केशव वगैरह भक्तों के प्रति श्री राम कृष्ण कहते हैं तोमरा बोलो जगत उपकार कोरा तुम लोग कहते हो जगत का उपकार करना है जगत की य तो टुक जगत क्या इतना सा है चुटकी भर का है कि तुम लोग जगत का उपकार कर दोगे वो चीटी होती है तो बहुत सारे लोग चीटी चीटियों का यह बनाते हैं एक्जीबिशन जैसा कुछ अभी इंडिया में तो इतना ही होता किंतु विदेश में ऐसा होता है ग्लास एक होगा ग्लास का एक कंटेनर उसके भीतर में चिटियों के लिए वो घर जैसा बनाया होता है वोह वहां पर जाएगी वह थोड़े बहुत शुगर के दाने डाल दिए हैं वो चींटियां खाएगी वोह एक्वेरियम जैसा बनाते हैं वो एक ग्लास वो कंटेनर होता है उसमें पानी भर देते हैं फिर वह मछलियां रख देते हैं मछलियों के खाने के लिए कुछ ना कुछ उसमें छोड़ देते हैं तो यह मछलियों का ग्लास कंटेनर में भरी हुई है उसका आप कल्याण कर सकते हैं वह आप देख सकते हैं कि उनको समय-समय पर खाना मिलता रहे और बीच-बीच में पानी बदलता रहे यह जगत का यह एक्वेरियम जैसा है ना कि यह एंट फार्म के तरह है कि तुम लोग उसका उपकार कर दोगे दूसरी बात है कि मनुष्य की नीड्स एंड नेसेसिटीज जो होती है वह बड़ी ही खाने के लिए ले जा रहा था अभी वह गाय को ले जा रहा है गाय जाना नहीं चाहती है कि उसको पता है कि कसाई खाने जाएंगे तो मेरी कत्ल कर देगा यह लोग तो फिर गाय भी रेजिस्ट कर रही है तो यह आदमी गाय को खींचते खींचते थक गया फिर उसने देखा कि रास्ते में किसी का श्राद्ध चल रहा है तो श्राद्ध के श्राद्ध का भोजन होता है तो सभी वह लोगों को आमंत्रण दिया जाता है कि सभी लोग आइए भोजन कीजिए जो कि बहुत अच्छी बात है कि लोगों को भोजन कराना लोगों को खाना खिलाना अन्न सत्र जो बहुत जगह पर चलते हैं तो अभी यह आदमी गया खाना खाने के लिए खाना खाके उसके शरीर में बल आया शक्ति आई और फिर इसी शक्ति के साथ में वह गाय को और ज्यादा जोर से खींच कर के कसाई खाने ले गया वहां पर गाय का कत्ल कर दिया अभी यह गाय का जो कत्ल हुआ गाय की जो हत्या हुई गो हत्या उसका पाप किसके सर पर जाएगा तो वो जो आदमी जो लोगों को खाना खिला रहा था उसके सर पे यानी देखिए कि यह कर्म का चक्र कितना विचित्र है आप लोग सोचते हैं कि मैं लोगों को खाना खिला करके जगत का भला कर रहा हूं जगत का कल्याण कर रहा हूं किंतु ऐसा करते-करते ही गौ हत्या का पाप लग गया तो इसीलिए ठाकुर कहते हैं कि जगत क्या इतना सा है यह तो एक जगत छोटा नहीं है जगत बहुत बड़ा है और जगत बहुत बड़ा यह बोलने के साथ-साथ में जो ठाकुर समझाना साथ चाहते हैं साथ-साथ में कि यह जो ह्यूमन लाइफ जो है व हमारे कर्मों का प्रवाह है उसका कॉम्प्लेक्शन के माध्यम से यह सब चीजों को आप ठीक नहीं कर पाएंगे अभी जैसे कि देखिए फिजिक्स में एक पैराडॉक्स है कि आपको आपके पास में टाइम मशीन आ जाए अभी यह टाइम मशीन पता है ना कि आप समय में यात्रा कर सकते हैं आप आप भूतकाल में जा सकते हैं भविष्य में जा सकते हैं तो अभी आपको बताया गया कि आपके पास में मान लीजिए टाइम मशीन आ गया और अभी आपको बताया गया कि देखिए कि यह जो सेकंड वर्ल्ड वॉर हुआ था उसको चालू करने वाला सबसे बड़ा हाथ था एडोल्फ हिटलर का आज के जगत में मॉडर्न आधुनिक युग में एडोल्फ हिटलर जैसा और बड़ा राक्षस देखने को नहीं मिलता हां अभी आज के आधुनिक युग में बहुत सारे राक्षस है वैसे जोसेफ स्टालिन भी कम नहीं था माओ झे दोंग था उसने भी 1015 करोड़ अपने ही देश बांधव को मार दिया था तो खैर राक्षसों की कमी नहीं है 20th सेंचुरी में किंतु एडोल्फ हिटलर का अपना एक यूनिक स्थान है अभी आपको कहा जाए कि आप एक काम कीजिए आपके पास में टाइम मशीन है आप भूतकाल में जाइए और हिटलर को हिटलर जब छोटा बच्चा था उस समय जाकर के उसको मार दीजिए उसकी कत्ल कर दीजिए इससे क्या होगा कि जब हिटलर बड़ा होगा और इतने सारे लोगों की हत्या करेगा वह सब हत्याएं रुक जाएगी तो आप भूतकाल में जाकर के जद एक छोटे बच्चे का वध करते हैं तो भविष्य में यही छोटा बच्चा बड़ा होकर के इतना बड़ा नर भक्षक राक्षस बना उससे पूरा जगत बच जाएगा आपके ऊपर में जगत को बचाने का पुण्य प्राप्त होगा तो प्रश्न है यह सब फिजिक्स में य इस तरह की बातें चलती है यह जो एथिकल पैराडॉक्स जिसको कहते हैं मोरल पैराडॉक्स अर्थात कि जिसको हम एथिक्स या मोरालिटी कहते हैं जिसको हम सत व्यवहार कहते हैं सत व्यवहार करते-करते किस तरह की यह सब कॉम्प्लेक्शन में बहुत बड़े पाप के रूप में दिखाया गया है तो यदि आपको कहा जाए कि आप भ्रूण हत्या कीजिए भूतकाल में जाकर के क्योंकि वही बच्चा जो छोटा सा है जो या तो फिर अपनी मां के गर्भ में है वह बड़ बड़ा होकर के बहुत बड़ा राक्षस होगा तो इतने सारे लोगों को मारेगा तो अभी यह चॉइस हमको दिया जाए तो हम कौन सा रास्ता इस्तेमाल करेंगे एक तो है कि आप बड़ा होकर के इतना बड़ा राक्षस होगा इतने लोगों की हत्या करेगा तो इतने लोगों की जान बचाने का जो पुण्य प्राप्त होता है वह एक है दूसरी ओर भ्रूण हत्या यदि हम करते हैं बाल हत्या जदिया इस बच्चे को हमने मार दिया तो और कोई बच्चा इतना बड़ा राक्षस नहीं हो जाएगा क्या इसके बारे में हम श्यर है क्योंकि यह सेकंड वर्ल्ड वॉर है ये अपना इंडियन फ्रीडम मूवमेंट है या तो फिर यह कम्युनिस्ट रेवोल्यूशन है इस तरह की जो लार्ज स्केल मूवमेंट्स है उन सबके पीछे में बहुत सारे कॉम्प्लेक्शन मूवमेंट्स यह पॉवर्टी फिर यह जो गैप बिटवीन रिच एंड पुअर कंसंट्रेशन ऑफ वेल्थ एक्सप्लोइटेशन ऑफ पीपल बाय द रूलिंग क्लास यह सब इतने सारे फैक्टर्स काम करते हैं किसी भी सिविलाइजेशन का उसकी दिशा निर्देश के लिए उसका जो भविष्य का जो पाथ है उसको ठीक करने के लिए आप ऐसा कभी नहीं कह पाएंगे कि मैं यदि एक बच्चे की हत्या करूं तो व बच्चा बड़ा होकर ऐसा राक्षस नहीं होगा उस समय की जर्मनी की जो परिस्थिति थी फर्स्ट वर्ल्ड वॉर के बाद में कि इस तरह से एक तो जर्मनी के ऊपर में इतना बड़ा ऋण लगा दिया था रिपरेशन बोल कर के कि फर्स्ट वर्ल्ड वॉर के स्टार्ट होने के पीछे जर्मनी का हाथ था तो जो डिस्ट्रक्शन हुआ है फ्रांस में बेल्जियम में वगैरह में तो उसके लिए जर्मनी को पैसा देना पड़ेगा रिपरेशन इसको कहते हैं तो रिपरेशन इतना बड़ा जर्मनी के सर पर डाल दिया कि जर्मनी पूरा देश बैकर हो गया वहां का मिडिल क्लास पूरा बैंकर हो गया अभी यह मिडिल क्लास कोई ना कोई रास्ता खोज रहा था कि ऐसा कौन सा सेवियर है जो कि यह ब्रिटेन है फ्रांस है जिन लोगों ने हमारे ऊपर में इतना बड़ा ऋण डाल दिया है उनसे मुक्ति पाए तो यह लोग खोज रहे थे तो उसमें एक हिटलर निकल कर के आया किंतु यह जो 1930 का यह जो पीरियड है 1920 1930 अर्ली 1930 उस समय हिटलर जैसे और भी बहुत सारे रेवोल्यूशन थे जो कि जर्मन प्रजा को भड़का थे कि अरे जो ब्रिटेन ने जिस फ्रांस ने हमारे पर हमारे ऊपर में इतना अत्याचार कर रहे हैं आओ चलो उनके साथ में दूसरा वर्ड वर कर देते हैं ऐसा करके जर्मनी को उकसाने वाले लोगों की कमी नहीं थी वही है कि हिटलर में ज्यादा अकल थी तो अपने दुश्मनों को परास्त करके उसने सत्ता हथिया ली अभी यदि यही हिटलर का बचपन में हम हत्या कर देते हैं टाइम मशीन के द्वारा भूतकाल में जाकर के तो हिटलर के जो दूसरे प्रतिद्वंदी थे जिनका इसी तरह का मत था उसमें से यदि कोई जर्मनी का चांसलर हो जाता उसने यदि दूसरी वर्ल्ड वॉर स्टार्ट कर दी होती तो क्या है कि आप कभी भी ठीक-ठीक नहीं कह पाएंगे कि यह व्यक्ति यह घटना के लिए कारण भूत था या तो फिर इस घटना के पीछे इस घटना का हाथ है अभी बहुत बार अ एक एक डिवोटा था वह कभी-कभी मुझे कहता है कि अभी मेरे घर की परिस्थिति ऐसी नहीं थी कि जिसकी वजह से मैं अच्छे से स्टडी कर पाऊं तो अभी प्रश्न होगा कि घर की परिस्थिति क्यों ऐसी थी तो यह यह कारण थे अभी यू कैन नेवर टेल कि इस कारण की वजह से घर की परिस्थिति अच्छी नहीं थी और परिस्थिति अच्छी नहीं थी बोलके वह स्टडी नहीं कर पाया आज वो उसकी फाइनेंशियल कंडीशन अच्छी नहीं है इसके इस जगत में ऐसे करोड़ों करोड़ों लोग हैं कि जिन्होंने बिना किसी स्टडी के या तो बिना किसी प्रॉपर फॉर्मल एजुकेशन के बहुत बड़ी इकोनॉमिक फाइनेंशियल सिद्धियां प्राप्त की है बड़े धनपति हुए हैं तो यह आदमी यदि ग्रेजुएट हो भी जाता तो कोई ठीक नहीं है कि वह धनी होता आज देखिए कि ग्रेजुएट अन अन एंप्लॉयड ग्रेजुएट की संख्या भारत में कितनी है तो आज मेरी फाइनेंशियल कंडीशन अच्छी नहीं है इसका रिस्पांसिबल में आज से 30 साल पहले 40 साल पहले मेरे पेरेंट्स के घर में जो परिस्थिति थी उसको मैं यदि दाई ठहरा आता हूं दोषी ठहरा आता हूं तो वह ठीक नहीं होगा क्यों क्योंकि मनुष्य का मन हमेशा किसी ना किसी सिंपल सॉल्यूशन को खोजने का प्रयास करता है हमारा मन कभी भी यह कॉम्प्लेक्शन नहीं होता आज जो हो रहा है उसके पीछे देर आर कॉम्प्लेक्शन हुआ उसके लिए उनको दाई ठहराया जाता है किंतु यदि आप अपने अ 1850 से लेकर के 1800 50 से लेकर के 1950 1850 टू 1950 यह जो 100 इयर्स का हिस्ट्री आप स्टडी करेंगे तो आपको पता चलेगा इतने कितने हजारों हजारों फैक्टर्स थे लाखों लाखों फैक्टर्स थे जो कि ग्राउंड लेवल पर कार्य कर रहे थे गांधी जी होते कि ना होते गांधी जी की जगह और कोई जद लीडर होता भारत का देयर इज नो गारंटी कि आप यह कह पाएंगे ठीक-ठीक कि हां भारत के पार्टी भारत का पार्टीशन नहीं हुआ होता ऐसा किसी भी तरह से कहना मुश्किल है तो क्योंकि क्या है कि फैक्टर्स इतने सारे कॉम्प्लिकेटेड है किंतु हम मनुष्य स्वभाव है मनुष्य स्वभाव कैसा है कि सभी चीजों को सिंपलीफाई करके देखने का जिसकी वजह से मैं अपने मन को सध्या दे पाऊं कि आज जो मैं मेरे साथ में जो फेलियर है आज मेरे साथ में जो कोई ट्रबल है इसका रिस्पांसिबल मैं नहीं हूं और कोई है दूसरों के सर पर दोष का टोपला डाल देना दूसरों को अपनी परिस्थिति के लिए जिम्मेवार बताना या तो फिर इन जनरल जो इकोनॉमिक पॉलिटिकल परिस्थितियां है उसके लिए किसी एक व्यक्ति के सर के ऊपर में दोष डाल देना यह सब सिंपलीसिटी मनुष्य स्वभाव को अच्छी लगती है और वे लोग पॉलिटिक्स में खास कर के ऐसे लोगों की कमी नहीं है जैसे कि अभी जर्मनी की ही हालत सेकंड वर्ल्ड वॉर के बाद बाद में कि यह हिटलर ने सबको बता दिया कि तुम लोगों की जो आज की आर्थिक अव दशा है उसके पीछे में यह ब्रिटन और फ्रांस ने आपके ऊपर में इतना बड़ा रिपरेशन ऋण का ऋण लगाया है वोह वह कारण भूत है अभी उस परिस्थिति के पीछे में भी बहुत सारे फैक्टर्स थे स्टॉक मार्केट टूट गया था इन्वेस्टर्स का वो रिस्क लेने की क्षमता कम हो गई थी यह कॉलोनियलिज्म की भारत वगैरह देशों पर राज करके यह लोग पैसा ले आते थे तो कॉलोनिस्ट की आर्थिक अव दशा बहुत सारी बुरी हो गई थी कि जिसकी वजह से कॉलोनी में से आप पैसा लेके आए तो देयर आर थाउजेंड्स एंड थाउजेंड्स ऑफ फैक्टर्स हिटलर जैसे लोग क्या करते हैं कि लोगों के मन को इस तरह के भ्रम में डाल देते हैं कहते हैं कि यह सिंपल रीजन है जिसकी वजह से आपके साथ में ऐसा है इस सिंपल रीजन को आप दूर कर दीजिए आपकी सब समस्याएं दूर हो जाएगी तो यह प्रजा भी भोल पन में आकर के इन लोगों से भ्रमित होकर के ऐसे लोगों को अपने सर पर बिठा देती है फिर यही लोग देश का चकनाचूर कर देते हैं देश को तोड़फोड़ करके डिस्ट्रॉय कर देते हैं तो देखिए कि यह रिफॉर्म सोसाइटीज थी उस समय की हमने देखा स्वामी जी जब माय प्लान ऑफ कैंपेन में कहते हैं यह रिफॉर्म सोसाइटी बनी तो थी जगत का कल्याण करेंगे हिंदू धर्म की उन्नति का करेंगे इस तरह की बड़ी-बड़ी बातें करके फिर यही रिफॉर्म सोसाइटीज ने क्या किया यही ठाकुर के सर्वश्रेष्ठ डिसाइल स्वामी विवेकानंद उनके रास्ते में पत्थर डालना शुरू किया उनके विरोध में दुनिया भर के षड्यंत्र शुरू किए अभी आपका प्रारंभ ही हुआ है रिफॉर्म सोसाइटीज का कि जगत के कल्याण के लिए और जगत के कल्याण के लिए जो सर्वश्रेष्ठ महापुरुष उस समय अवती हुए थे स्वामी जी उ को आप विरोध कर रहे हैं तो रिफॉर्म सोसाइटी किस काम की इसीलिए ठाकुर यहां पर कहते हैं तुम लोग क्या समझते हो जगत क्या इतना छोटा सा है हम लोगों का कर्म प्रवाह जगत को जो फैक्टर्स चलाते हैं वह क्या छोटे-मोटे फैक्टर्स है कि आप लोग उसको कंट्रोल करके जगत का कल्याण करोगे बिल्कुल नहीं तुम ही के ठाकुर दो बातें कहते हैं जगत की य तो टुक होगा जगत क्या इतना सा है कि तुम लोग जगत का कल्याण करोगे फिर दूस बात क्या कहते हैं आर तुम के और तुम कौन हो जगत ज जगत उपकार करवे तुम हो कौन की जो जगत का उपकार करोगे ताके साधने द्वारा साक्षात्कार करो ईश्वर को साधन भजन के द्वारा साक्षात्कार कीजिए ताकि लाभ करो ईश्वर प्राप्त कीजिए तीनी शक्ति दिले तबे श कोलेर हित करते पारो नचत नहीं ईश्वर जद शक्ति देंगे तब जगत का हित कर पाओगे वरना तो जगत का हित नहीं होगा देखिए कि भारत को जो फ्रीडम मूवमेंट भारत का जो था इसके साथ में ही और भी बहुत सारे देश आजाद हुए थे या तो फिर मॉडर्नाइज हुए थे उसमें यह सोवियत यूनियन था चाइना था आज का पाकिस्तान है फिर यह जो साउथ ईस्ट एशियन कंट्रीज है फिर ये अफ्रीकन कंट्रीज है यह टर्की है वगैरह यह सऊदी अरेबिया है ईरान है इराक है यह सब या तो मॉडर्नाइज हो रहे थे या तो फिर उनके कॉलोनियल जो स्लेवरी थी उससे वह मुक्त हो रहे थे इन सबका ट्रेजे क्ट्री देखिए और भारत का ट्रेजे क्ट देखिए यहां पे ठाकुर कहते हैं दो बातें कहते हैं पहला तो जगत कोई छोटा सा नहीं है या तो जगत कोई एक एक्वेरियम चलाने जैसा नहीं है कि वहां पर आप रोज नया फ्रेश पानी डाल दीजिए और मछलियों को खाने के लिए कुछ डाल दीजिए तो एक्वेरियम चलता रहेगा जगत है बड़ा ही कॉम्प्लेक्शन है बड़े ही कॉम्प्लेक्शन होती है उसको कुछ वेरी सिंपल फैक्टर्स के ऊपर में लाकर के रख देते हैं अब अभी हम लोग सोचेंगे कि भारत का भारत को जो गुलाम बनाया गया 1000 साल तक क्योंकि हमारे पास में इतनी स्ट्रांग आर्मी नहीं थी चलो जैसे ही इंडिपेंडेंस मिला एक बहुत स्ट्रांग आर्मी तैयार करते हैं अभी देखिए कि यदि हम लोग एक स्ट्रांग आर्मी तैयार करने में अपनी भारत की सभी शक्तियां डाल देते तो आज पाकिस्तान जैसी हमारी हालत होती आर्मी ने पाकिस्तान के ऊपर में इस तरह का कंट्रोल करके रखा है कि वहां पर ना ही एज केशन है ना ही वह म्युनिसिपालिटी की सर्विस है ना ही वह गवर्नमेंट सर्विस ठीक से काम करती है भीतर से कंप्लीट बैंकर हो गया है किंतु एक बहुत पावरफुल आर्मी है वे लोग दावा करके कहते हैं कि जगत की फिफ्थ ना सिक्स्थ मोस्ट पावरफुल आर्मी क्या फर्क पड़ता है इतनी बड़ी पावरफुल आर्मी लेकर के क्या फर्क पड़ता है कि आपके पास में न्यूक्लियर वेपन है हम लोग एक न्यूक्लियर वेपन स्टेट है वहां पर आप स्टेटिस्टिक्स देखेंगे 60 पर बच्चे दे आर बोर्न स्टंटेड अर्थात कि जब जन्म होता है तो बच्चे का एक मिनिमम वेट होना चाहिए मिनिमम हेल्थ होनी चाहिए तो 60 पर से ज्यादा बच्चे लोग तो उनका वेट जो नॉर्मल होना चाहिए उससे कम होता है स्टंटेड ग्रोथ इसको कहते हैं तो अभी इस तरह की आर्मी लेकर के आपके देश को क्या फायदा हुआ क्यों क्योंकि अपनी छोटी बुद्धि से ठीक कर दिया कि भारत के साथ में दुश्मनी करनी है इसके साथ में दुश्मनी करनी है इसके लिए हमको न्यूक्लियर वेपन चाहिए बहुत पावरफुल आर्मी चाहिए जबकि भारत में क्या हुआ स्वामी जी ने पहले ही कह दिया था एजुकेशन एजुकेशन एजुकेशन यह शिक्षा ही है जो कि हमारे देश को उन्नत बनाएगी और इसी शिक्षा के परिणाम में देखिए कि हमारे आईआईटी के ग्रेजुएट्स आज उनकी डिमांड कितनी सारी है आज भारत की यूनिवर्सिटियोफकालीकट कंपनिया है उसके सर के ऊपर में जाकर के बैठे हैं माइक्रोसॉफ्ट का सीईओ सत्य नडेला या तो फिर ये ग का सीईओ सुंदर पिचाई तो ये अपनी एजुकेशन सिस्टम स्वामी जी ने जो थिंकिंग करके गए थे बाद में भी अपने फ्रीडम मूवमेंट चलाने वाले अपने देश को चलाने वालों का एक तो मैच्योरिटी और विजडम था कि चलो आर्मी के भीतर में पूरा इन्वेस्टमेंट नहीं करना है स्ट्रांग आर्मी चाहिए कोई प्रश्न ही नहीं है किंतु यदि ऑल राउंड ग्रोथ करना है तो आपको इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट भी इतना चाहिए आपको एजुकेशनल डेवलपमेंट भी इतना चाहिए म्युनिसिपल सर्विसेस जैसे कि रोड है बिजली है पानी है डैम है एयरपोर्ट है पोर्ट है यह सबका भी इतना ही डेवलपमेंट चाहिए पाकिस्तान और भारत को आज 75 इयर्स के बाद में कंपेयर कीजिए देखिए कि हमारे जो पुरखे थे भारत के जो स्वप्न दृष्टा थे उनका लॉन्ग टर्म विजन कितना पावरफुल था यही लोग हमारे साथ में इंडिपेंडेंट हुए थे आज ना ही डैम है वहां पे ना ही रोड है ना ही एयरपोर्ट है ना ही पोर्ट है ना ही वहां पे एजुकेशन है ना ही हेल्थ सिस्टम है पूरा देश भीतर से करप्ट हो गया है टेररिज्म के अटैक होते हैं बार-बार आपस में झगड़ा करते हैं तो उनके साथ में कंपेयर करके हमको लगता है कि हां हम लोग आज कितनी बेटर परिस्थिति में है डेमोक्रेसी को हम लोग प्रतिदिन गाली देते हैं किंतु डेमोक्रेसी कितनी प्रेशियस है चाइना के साथ में हम यदि अपने को कंपेयर करके देखते हैं आप कहेंगे कि चाइना का इकोनॉमिक डेवलपमेंट टेक्नोलॉजिकल इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट भारत से पांच गुना है आप कह सकते हैं किंतु यह जो लाइफ सेटिस्फेक्शन जो है हैप्पीनेस इंडेक्स हालांकि वर्ल्ड हैप्पीनेस इंडेक्स में भारत आता है बड़ा पीछे किंतु पता नहीं किस वो हिसाब से वे लोग करते हैं वो सब कैलकुलेशन यह स्पिरिचुअल सेटिस्फैक्ट्रिली ने कहा है जब अमेरिका गए थे तो उन्होंने कहा कि अमेरिका के जो गरीब लोग हैं ना दे आर लाइक डेमोंस डेमोनियक नेचर है उनका डेमोनियक नेचर है मने शैतानी स्वभाव है उनका ना ही कल्चर है ना ही कोई अंडरस्टैंडिंग है राक्षस की तरह भौतिक वादियों की तरह बिहेव करेंगे जबकि भारत के गरीब इतने धार्मिक है गरीब होने के बावजूद वे लोग इतने धार्मिक है कि उनके जीवन में एक तरह से सेटिस्फैक्ट्रिली सक्सेस तो यह जो विजडम होना चाहिए लोगों के भीतर में जो लोग देश के स्वप्न दृष्टा है जो लोग देश के चालक हैं जो लोग देश को गवर्न करते हैं इतना विजन होगा तब तो कहीं जाकर कि यह लोग कर पाएंगे स्वामी जी का जो विजन था इसको बाद में फ्रीडम मूवमेंट के जो अग्रणी नेता थे उन्होंने अपनाया और आज के भारत की रचना की कोई ऐसा नहीं कहता कि भारत परफेक्ट है किंतु भारत की कंपेयर आप बाकी के जो उस समय हमारे साथ में ही जिनको फ्रीडम मिला था या जो लोग मॉडर्नाइजेशन कर रहे थे उनके साथ में कीजिए सऊदी अरेबिया ईरान इराक टर्की ये अफ्रीका के जितने भी देश हैं साउथ अफ्रीका फिर यह चाइना यह साउथ ईस्ट एशिया आज का रशिया सबके साथ में आप कंपेयर करके देख लीजिए भारत इज इन अ वेरी गुड सिचुएशन भले ही चाहे हम लोगों को इंटरनल सेटिस्फैक्ट्रिली एज वेल एज दिस मटेरियल वर्ल्ड इन दोनों को कंबाइन करके देखेंगे वीी आर इन अ वेरी गुड पोजीशन 75 साल में जितना हो सकता है हमारे देश ने किया है तो यह विजन कहां से आया विजन तो स्वामी जी का था स्वामी जी के विजन को ही तो बाद में लोगों ने अपना करके मोर और लेस उसको अप्लाई किया है तो यह रिफॉर्म सोसाइटी वाले होते कौन है अपनी छोटी सी बुद्धि लेकर के जगत को सिंपलीफाई करके उसके ऊपर में कल्याण साधन करने वाले अभी यहां पर यह भी एक बात र याद रखना है आज यदि हम ठाकुर की इस बात को करना पढ़ने को जाते हैं तो हमको यह सोच समझना होगा कि ठाकुर ये हमको एड्रेस करके नहीं कह रहे हैं उन लोगों को एड्रेस करके कह रहे हैं जिन लोगों की बुद्धि कम थी और कम बुद्धि से वे लोग भारत का कल्याण करना चाहते थे और बाद में होता क्या है देखिए ठाकुर क्या कहते हैं कि तीनी शक्ति दिले तबे श कलेर हित करते पारो न चेत नहीं यदि ईश्वर शक्ति देते हैं तब तुम लोगों का हित करो वरना तो यह सब छोड़ो सबसे पहले ईश्वर के पास में शक्ति की प्रार्थना करो देखिए यदि एक ग्रेट डिवाइड कहा जाएगा अपनी हिस्ट्री में तो यह डिवाइड एक और है प्री विवेकानंद एंड पोस्ट विवेकानंद जहां तक यह देश के कल्याण की रिफॉर्म सोसाइटीज की सोशल सर्विस की बात जाती है प्री विवेकानंद जो थिंकिंग था उस समय के बंगोल का और जनरली इन जनरल भारत का वे लोग चाहते थे कि यह क्रिश्चियनिटी जैसा हमको कुछ भारत में लाना पड़ेगा यूरोप अमेरिका जैसा भारत को बनाना पड़ेगा तभी भारत का उत्थान होगा वरना नहीं होगा और यह फिर यह बाकी जो रिलीजियस क्षेत्र में जो उनके विचार थे यह पॉलीथिस्म जिसको कहते हैं मूर्ति पूजा जिसको कहते हैं वह सब भारत में से निकाल देना पड़ेगा क्यों क्योंकि क्रिश्चियनिटी में यह सब नहीं है तो बिना किसी सोच समझ कर के भारत के लिए जो सब रेमेडीज लोग प्रिस्क्रिप्शन होगा कि बात यह नहीं है कि ठाकुर को यह सब हिस्ट्री है या तो फिर करंट अफेयर्स है या तो फिर यह यूरोप अमेरिका और भारत इन दोनों में क्या डिफरेंस है यह सब चीजों को ठाकुर ने स्टडी किया है यह बात नहीं है ठाकुर इंस्टिंक्टिवली समझते हैं कि ये फॉरेन रेमेडीज यह विदेश के विचारों को भारत में यदि अप्लाई करेंगे तो यहां पर अप्लाई नहीं होंगे हित तो नहीं ही होगा अहित हो जाएगा और इसके लिए ठाकुर इस तरह के उपदेश देते हैं तो यह तो एक बात हुई दूसरी बात तो फिलोसॉफिकल है जैसे कि हमने बड़ा उसके बारे में डिटेल में डिस्कशन भी किया है कि यदि जगत का हित करना यह उद्देश्य है मनुष्य जीवन का ना कि फिर ईश्वर प्राप्त करना वह मनुष्य जीवन का उद्देश्य है तो यह कंफ्लेक्स आप यह कहेंगे कि ईश्वर की सत्ता सर्वोपरि है सर्वोच्च है और यह जगत एक अलग से एक एंटिटी है यहां पर यदि हम लोगों का कल्याण करेंगे लोगों को हेल्प करेंगे तो मेरा ईगो पुष्ट होगा मेरे अहंकार की पुष्टि होगी मेरा ईगो नर्चर होगा तो इस मेरे अपने ईगो को नर्चर करने के लिए अहंकार की पुष्टि के लिए मैं लोगों को हेल्प कर रहा हूं इस तरह की बात हमारे मन में आएगी तो लोगों को हेल्प करने से आध्यात्मिक बेनिफिट तो नहीं ही मिलेगा किंतु उसके उल्टा ऐसा हो जाएगा कि ईगो अपने सर में ऐसा बैठ जाएगा कि जो रेगुलर एक प्रोग्रेशन होना है स्पिरिचुअल लाइफ में वह भी अटक जाएगा तो यह एक बात है इसके विरुद्ध में एक आर्गुमेंट वैसे हम कर सकते हैं जैसे कि मास्टर महाशय और नरेण की विद्यासागर को लेकर के बात हुई थी मास्टर महाशय नरेण को कहते हैं नरेंद्र तो जब ठाकुर विद्यासागर को मिलने के लिए गए थे तो नरेंद्र तो वहां पर उपस्थित नहीं था मास्टर महाशय थे तो मास्टर महाशय ने नरेण को कहा कि देखो जब ठाकुर उनको मिलने के लिए गए बाद में ठाकुर का मंतव्य है कि इसको पता नहीं है विद्यासागर को कि भीतर में सोना पड़ा हुआ है इसीलिए वह जगत का उपकार करेगा लोगों को लोगों को शिक्षा देगा इस तरह की बातें कर रहा है यदि भीतर में सोना पड़ा है इसको पता चल जाए भीतर में ईश्वर है यह समझ ले तो बाहर का काम वह कहां पर पड़ा रहेगा वह पूरा ईश्वर में डूब जाएगा जब मास्टर महाशय इस तरह की बात करते हैं तो नरेण क्या कहता है कि देखो जिसको एक बात पता नहीं है उसको बाकी की 10 बातें कैसे पता चली अर्थात कि यदि विद्यासागर को यह नहीं पता है कि हृदय में ईश्वर है तो उसको यह बात कैसे पता चली कि जगत का कल्याण करना है आज के जगत में 99 पर लोग ऐसा होंगे ऐसे होंगे कि वह अपनी ही बारे अपने ही बारे में सोचते हैं दूसरों के बारे में सोचने की फुर्सत किसको है इस तरह की इस तरह की स्पिरिचुअल मैच्योरिटी किन लोगों में है तो यदि वो य ऐसे जो महा स्वार्थी है महा तामसिक है महा घिनोदा कि हां मैं जगत का कल्याण करूंगा तो जब नरेण ऐसा ऐसी बात करता है तो साथ-साथ में ही हमको ठाकुर की एक दूसरी बात याद आती है ठाकुर क्या कहते हैं कि एक मीठी रोटी है गुड़ डाली हुई चीनी डाली हुई मीठी रोटी है उसको आप सीधी करके खाए ना कि आड़ी करके खाए टेढ़ी करके खाए आपको तो मीठी ही लगने वाली है तो जगत का कल्याण आप यह सोच के करें कि मैं जगत का कल्याण कर रहा हूं ना कि जैसे कि स्वामी जी कहते शिव ज्ञाने जीव सेवा लोगों के भीतर में शिव है शिव की मैं पूजा कर रहा हूं जैसे भी करके हो आज एक डॉक्टर किसी को ट्रीट कर रहा है तो वह सामने में पेशेंट देखता है यह सोचेगा कि पेशेंट के पास में से मुझे इतना रुपया मिलेगा या तो फिर यह देखता है कि पेशेंट के भीतर में शिव है शिव की मैं पूजा कर रहा हूं उसका एटीट्यूड चाहे कुछ भी हो उसकी एक्शन तो उस पेशेंट के लिए बेनिफिशियल है तो यह पुण्य तो उसको मिलेगा कि नहीं मिलेगा तो यह बात भी हमको याद रखनी है कि जब ठाकुर इन लोगों को ऐसा कहते हैं बारबार कि जगत क्या इतना है तुम क्या इत तुम्हारी औकात क्या है जगत का कल्याण करने की तब यह देखना है कि देखिए कि जो लोग घोर तमस में डूबे हुए हैं जो लोगों को अपने खुद की स्वार्थ पूर्ति के अलावा और कुछ नहीं दिखता है जो लोग अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिए लोगों की हत्या करना लोगों के ऊपर में अत्याचार करने से भी झिझक नहीं है ऐसे लोगों से तो यह लोग बहुत ज्यादा आगे हैं और इसलिए तो ठाकुर उनको उपदेश दे रहे हैं ठाकुर क्या रास्ते में जाते जाते 10 लोगों को पकड़ कर के थोड़ी ना उपदेश देते हैं कि भाई तुम लोग ईश्वर की चिंता करो ठाकुर तो ऊपर से क्या कहते हैं देखिए कि कलकाता के रास्ते से जा रहा था देखा ज्यादातर लोगों की निम्न दृष्टि है बस एक दो लोगों को देखा कि उनकी उर्ध्व दृष्टि है तो ठाकुर तो तो जिन लोगों की निम्न दृष्टि है जो लोग घोर तामसिक है जो लोग घोर वासना में डूबे हुए हैं ऐसे लोगों को जाकर के क्या बोलेंगे ऐसे लोगों को बोलने का अर्थ है कि पत्थर के ऊपर में पानी डालना भैंस के सामने भागवत पढ़ना कोई लाभ नहीं होने वाला है या तो फिर यदि लाभ होगा तो जन्म जन्मांतर लगेंगे ये ठाकुर खुद जब उनको कैंसर हो गया था उनके मुंह से ज्यादा बात नहीं निकल रही थी तब क्या कहते हैं कि ये मास्टर है ना कि ये सुरेन है ऐसे तीन-चार लोगों को ईश्वर जदी कुछ विद्या दे दे और यह लोग जाकर के दूसरे लोगों के साथ में बात करते हैं फिर वह दूसरे लोग नए आए हुए डिवोर्स उसके बाद में जब मेरे पास में आते हैं तो मैं दो-तीन बातें करके ही उनकी समस्या का समाधान कर दूंगा मुझसे मुझे इतना लंबा-लंबा बोलने की जरूरत नहीं रहेगी तो ठाकुर खुद चाहते हैं कि यदि ज्यादातर लोगों के पास में पहुंचना है तो ऐसे लोगों की आवश्यकता है जो लोग स्पिरिचुअली मैचोर है और यह जो नए आए हुए डिवोर्स को तैयार कर दे एक तरह से बेस बना दे फाउंडेशन डाल दे तो फिर ठाकुर को ऊपर ऊपर से कुछ बता करके ही उनको गाइड करने की जरूरत है बिल्कुल जीरो से स्टार्ट करने की आवश्यकता नहीं रहेगी तो ठाकुर यह ब्रह्म भक्तों को जब इतना उपदेश देते हैं तब हमको यह ख्याल में रखना है क्योंकि क्या है कि जो लोग रामकृष्ण संघ के साथ में एसोसिएटेड है उनका एक टेंडेंसी कभी-कभी हो जाता है कि बाकी प्रथाएं बाकी जो संघ है बाकी ऑर्गेनाइजेशन है उनके प्रति एक तुच्छ दृष्टि से देखना कि हमारी फिलोसोफी बहुत प्योर है अपना ऑर्गेनाइजेशन तो बहुत ही हाई है ग्रेट है व हमारे सामने बाकी लोग बड़े तुच्छ हैं ऐसा एक एटीट्यूड आ जाता है कभी-कभी तो हमको यह बात ख्याल में रखनी है कि ठाकुर ने खुद इन ब्राह्मण भक्तों को अभी जैसे हम लोग ठाकुर के पास में कैसे आए ठाकुर ने तो छत के ऊपर में जाकर के पुकारा था तब हम लोग तो ठाकुर के पास में आए ठाकुर ने बुलाया है इसके लिए आए तो ब्रह्म भक्त भी ठाकुर के पास में कैसे आए ठाकुर ने खुद कहा कि मुझे देवेंद्रनाथ टैगोर को मिलना है मुझे केशव सेन से मिलना है यह लोग जो थे ब्राह्मण समाज के अग्रणी नेता थे इन दोनों को जाकर के ठाकुर मिले थे उनके घर जाकर के तब कहीं जाकर के उनको लगा अभी ये देवेंद्रनाथ का तो पता नहीं किस तरह का उस का ठाकुर का इंप्रेशन था ठाकुर जब देवेंद्रनाथ टैगोर के पास में आए थे तब वो शर्ट नहीं पहना था तो अभी टैगोर कहता है कि अच्छा ठीक है आप मेरे मेरे सामने शर्ट नहीं पहनते हैं वो तो ठीक है अभी इतना कोई मतलब मैं इस सब चीजों को इतना सीरियसली नहीं रहता किंतु जब आप मेरे समाज में आएंगे इनवाइट करता है कि हमारे ब्राह्मण समाज में आप आइएगा सबके साथ में बात कीजिएगा तो ऐसा करके इनवाइट तो करता है किंतु कहता है कि आप शर्ट पहन के आइएगा मन ने ऊपर में कुछ पहन के रखिएगा अपना शरीर खुला मत छोड़िएगा तो अभी ठाकुर उसका कुछ उत्तर देते हैं फिर जब वोह घर जाते हैं दक्षिणेश्वर वापस आते हैं तब देवेंद्रनाथ टैगोर एक पत्र लिखता है यह कहते हुए कि मैंने आपको जो इनवाइट इन्विटेशन दिया था ब्रह्म समाज में आने का वो इन्विटेशन मैं वापस ले रहा हूं क्यों क्योंकि बिना शर्ट पहने कि बिना उत्तरीय पहने यदि आप वहां पर जाएंगे तो असभ्य होगी वो इसके लिए आप मत आइए तो अभी यह इस तरह का यह मूर्ख आदमी है कि ठाकुर को दिया हुआ इन्विटेशन उसने वापस ले लिया तो उसकी जो बुद्धि थी जड़ बुद्धि थी उसके अनुसार उसने कार्य किया किंतु केशव सेन था ठाकुर जब उसको प्रथम बार सामने से मिलने को गए किंतु उसके बाद में सब समय केशव अपने से ठाकुर के पास में आता था उनकी श्री वाणी का उनके कथामृत का एकदम शांति से बैठ कर के श्रवण करता था तो इनके कुछ सद् भाग्य होंगे तभी तो ठाकुर जाकर के इनको उपदेश देते हैं रास्ते में 10 लोगों को खड़े रह कर के तो उनको तो ठाकुर उपदेश देने को नहीं जाते तो यह सब चीजें हमको ख्याल में रखनी है कि जो ब्रह्म भक्तों को यह ठाकुर बातें करते हैं वे लोग ऑलरेडी इतना तो जनसाधारण से एक स्टेप ऊपर आ गए थे कि जगत का कल्याण करना है बस वही है कि जगत का कल्याण इस तरह से करो कि जिससे जगत का सही सही कल्याण हो हित करते करते हित से विपरीत ना हो जाए जाए कल्याण करते-करते अकल्याणेंकीलम चलाना तो यह बात उन्होंने ने केशव को क्यों नहीं कही तो जैसे कि हमने देखा कि अपने इस भारत के ये जो रिफॉर्म मूवमेंट है या तो फिर यह जो सोशल सर्विस ऑर्गेनाइजेशंस है उनकी जो कार्य पद्धति है इनको हम दो हिस्सों में बांट सकते हैं एक तो प्री विवेकानंद दूसरा है पोस्ट विवेकानंद प्री विवेकानंद स्वामी जी के आने से पहले स्वामी जी ने जो जगत कल्याण के महामंत्र दिए थे सिरदार तो सरदार तो मैंने ये जो एक के बाद उ एक के बाद एक उन्होंने जो हमको बातें बताई थी वो बातें समझने से पहले यदि आप लोक कल्याण करने को जाएंगे तो फस जाने की एक बड़ी संभावना है इसलिए जो स्वामी जी को ठाकुर ने कहा था कि सबसे पहले ईश्वर प्राप्ति करो सबसे पहले आत्म कल्याण प्राप्त करो सबसे पहले निर्विकल्प समाधि प्राप्त करो या तो फिर ईश्वर का किसी भी तरह से किसी ना किसी तरह की आध्यात्मिक अनुभूति प्राप्त करो इसके बाद में कर्मक्षेत्र में जाना तो यह बात ठाकुर ने बहुत सारे लोगों को बताई थी जिसमें कि नरेण एक सफल हुआ और फिर नरेंद्र ने जब यह आत्मन मोक्षार्थम जगत हिताय च रूपी सायंस पूरा डेवलप किया तब कहीं जाकर के पोस्ट विवेकानंद फेज स्टार्ट हुआ अब हम कहीं जाकर के स्वामी जी के आदेश के अनुसार दोनों कार्य एक साथ में कर सकते हैं क्योंकि ठाकुर का जो फर्स्ट प्रिंसिपल है कि ब्रह्मा और शक्ति अभेद ब्रह्म भी सत्य है जगत भी सत्य है तुर्या अंद जी महाराज ने आखिरी आखिरी समय में उन्होंने कहा था कि लोग कहते हैं कि ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या मैं कहता हूं कि ब्रह्म भी सत्य जगत भी सत्य तो ये पोस्ट विवेकानंद फेज यहां पर हमको यह अकल आ गई है यह बड़ा अच्छे से समझ में आया है कि जगत कल्याण जदी करना है तो इसके पीछे का साइंस क्या है साइंस ये है कि लोगों के भीतर में शिव को देखिए ईश्वर को देखिए और उनकी आराधना करते हैं इस तरह से उनकी सेवा कीजिए मंदिर में जैसे कि आप ईश्वर के सामने शरणागति की प्रार्थना करते हैं कहते हैं कि ईश्वर यदि मैं आपकी सेवा करता हूं आपकी पूजा करता हूं तो मेरे मन में घमंड ना आ जाए मेरे मन की जितनी भी कामना है वासना एं हैं उनको आप दूर कर दीजिए इस तरह से जो प्रार्थना करते-करते हम मंदिर में पूजा करते हैं वही प्रार्थना इन दरिद्र नारायण चंडाल नारायण यह रोगी नारायण इनकी सेवा करते-करते हमको करनी है यही प्रार्थना कि यह सेवा करते करते हमारे मन में किसी तरह का घमंड ना आ जाए हमारी कामनाएं वासना एं कहीं बढ़ ना जाए ईश्वर के पति या तो फिर इनके भीतर में जो शिव विद्यमान है उनके प्रति हमारी पूरी श्रद्धा भक्ति आए यह प्रार्थना करते-करते हमको सेवा करनी है सो दैट इज पोस्ट विवेकानंद तो जब तक स्वामी जी आकर के हमको ये सेवा का साइंस नहीं समझाते हैं तब तक तो ठाकुर को लोगों को इसी तरह से बताना था जो बात उन्होंने स्वामी जी को कही वही बात उन्होंने सबको कही कि कैसे भी करके पहले तो ईश्वर प्राप्ति कर लीजिए या तो किसी ना किसी तरह की आध्यात्मिक अनुभूति प्राप्त कर लीजिए इसके बाद में जगत में आकर के आपको जो करना है वह कीजिए सो दैट वास प्री विवेकानंद फेज और आज जो हम रह रहे हैं दैट इज पोस्ट विवेकानंद फेज अच्छा अब भी एक ब्रह्म भक्त प्रश्न करता है जतोग होए ततो दिन सब कर्म त्याग करबो जितने दिन तक ईश्वर प्राप्ति नहीं होती है तब तक क्या हम लोग सभी कर्म का त्याग कर देंगे श्री राम कृष्ण ना त्याग करबे केनो ठाकुर कहते हैं ना ना आप त्याग क्यों करेंगे ईश्वर चिंता तार नाम गुणगान नित्य कर्मों ई शोप करते हुए ईश्वर की चिंता ईश्वर का नाम गुणगान नित्य कर्म यह सब करना होगा ब्राह्मण भक्तो व प्रश्न करता है संसार कर्मो विषय कर्मो एक ब्राह्मण भक्त प्रश्न करता है कि संसार का कर्म और विषय कर्म क्या इनको करें कि नहीं करें श्री राम कृष्ण हां ताओ करवे हां वो भी करना है संसार जात्रा जनन ट को दरकार घर चलाने के लिए जितनी आवश्यकता है उतना यह सब भी करना होगा जैसे देखिए ठाकुर खुद ठाकुर को जब कालीवाड़ा नौकरी मिली थी पुजारी की तो वह नित्य पूजा तो करते ही थे हालांकि उन्होंने एक शरत रखी थी पुजारी का पद लेने से पहले पद ग्रहण करने से पहले कि यह जो ठाकुर के अर्थात की ईश्वर की जो मूर्ति है उनके जो गहने हैं वो गहनों की जिम्मा जवाबदारी मैं नहीं लूंगा वो वस्त्र पहनाने की वह सब जवाबदारी वो श्रंगार की जवाबदारी वो मैं नहीं लूंगा अब ये शार की जवाबदारी में शोर नहीं हूं गहनों की जवाबदारी के बारे में ने एकदम क्लियर कह दिया था क्यों क्योंकि आपको फिर सब समय अलर्ट रहना पड़ता है गहने कोई चोरी कर गया कि नहीं क्या हुआ तो वह क्या एक विषय बुद्धि आ जाती है तो सिर्फ पूजा करनी है तो मैं करूंगा किंतु गहनों की जवाबदारी नहीं लूंगा तो फिर इसके ऊपर में कालीवाड़ा करु ने पूजा करनी प्रारंभ की तो वह ठाकुर को पूजा भी तो करनी ही पड़ती थी बिना पूजा किए पुजारी का पद नहीं मिलेगा खाना कौन खिलाएगा शुरू शुरू में तो कालीवाड़ा तो की कालीवा वाड़ी है कई वर्त अर्थात की रानी रास मणि वह तो एक फिशरमैन उसकी जाति में से आती थी तो फिर उसने यह मंदिर बनाया है तो मंदिर में वह किस तरह से वह खाना खाएंगे तो इसके लिए तो अपने से वह भिक्षा करके लाते थे वो गंगा के किनारे बैठ कर के अपने से खाना बनाते थे खाते थे किंतु यह सब कुछ ज्यादा दिन टिका नहीं क्यों क्योंकि आपको फिर घर भी तो अपना खाना भी तो प्रतिदिन खाना है यह तो मने जो भी एक मिनिमम रिक्वायरमेंट होती है वो भी तो आपको चाहिए जो कुछ लड़के कुछ त्यागी साधु मां के पास में गए कहते हैं कि हम काशी जाएंगे भिक्षा करते करते काशी जाएंगे वहां पर रहकर तपस्या करेंगे तब मां ने क्या कहा कि ठाकुरे पाय शर बाटी माछ मुंडो माछ मुंडो मथुर जोगा तो तो मादे जनन के करवे अर्थात कि ठाकुर के लिए खीर की कटोरी और मछली का माथा यह तो मथुर बाबू देते थे मथुर बाबू कालीवाड़ा थे तो वह तो ठाकुर के लिए सैलरी है फिर खाना पना है सेवक है और हृदय को रखा था तो हृदय तो मुफत में तो काम नहीं करता था उसको तो सैलरी मिलती थी तब वह काम करता था हृदय को यदि सैलरी नहीं मिलती होती तो वह कितने दिन ठाकुर के साथ में रहकर उनकी सेवा करता यह तो एक बहुत बड़ा प्रश्न है हमको तो पता है कि हृदय कितना बड़ा भौतिकवादी था तो मां यहां पर कहती है कि ठाकुर के लिए मछ खीर की बाटी और मछली का माथा तो ठाकुर ये मथुर बाबू जुगाड़ करते थे तुम लोगों के लिए यह सब जुगाड़ कौन करेगा बिना मतलब भिक्षा करते-करते दिन पसार करोगे दूसरी भिक्षा कहां से आएगी उसकी चिंता करोगे इसके वजह तुम मठ में चले जाओ वापस बेलूर मठ में वहां पर जो ड्यूटी मिलती है ड्यूटी करना जो खाना मिलता है वोह खाना और फिर शांति से साधन भजन करना तो इवन यहां पर भी रामकृष्ण मठ में भी यदि साधु के रूप में रहते हैं तो आपको ड्यूटी करनी होगी बिना मतलब मुफत में बैठ कर के खाना आपको कोई नहीं देने वाला है तो यह रोटी कपड़ा मकान यह तो सबको चाहिए साधु को भी चाहिए गृहस्थ को भी चाहिए और उसके लिए जो कर्म करना पड़ेगा वह कर्म तो करना ही है तो ऐसा नहीं है कि सब कर्म त्याग करो हां अभी जैसे ठाकुर जैसी एक अवस्था हो जाए कि आपकी ईश्वर के प्रति निष्ठा इतनी बढ़ जाए कि फिर ईश्वर स्वयं आपकी सब चिंता करें वो सुदामा सुदामा के घर में खाने को कुछ नहीं है उनकी बीवी परेशान करती है पत्नी बार-बार कहती है जाइए वो मथुरा में आपके वो जो बंधु है सखा है भगवान कृष्ण जाइए उनके पास में से कुछ माग करके लाइए तो अब यह सुदामा बेचारा सोचता है किस मुंह से मित्र के पास जाएंगे किस मुंह से कुछ मांगेंगे जगत में जीवन में मांगने वाला कार्य तो कभी किया नहीं है जहा कोरेन रघुवीर यह जो ठाकुर के पिताजी का जो सूत्र था खुदीराम का जहा कोरेन रघुवीर जो करे रघुवीर जो रघुवीर करेंगे वो खाएंगे जो देंगे वो खाएंगे जो देंगे वो पहनेंगे क्या है इसमें तना किंतु अभी पत्नी इतनी बोलती है तो गए वो भगवान के पास में व रास्ते में से वह कुछ सूखे पोहे ले लिए अभी वह पोहे अपनी छुपा कर के जा रहे हैं किस मुंह से भगवान कृष्ण को ये सुखे पोहे दे तो वहां पर कृष्ण के पास में बैठे हैं कृष्णा ने उनके हास में छीन कर के वोह सूखे पोए खा लिए और कोई बात तो की नहीं वह सब उनकी सेवा बहुत की किंतु आपको क्या चाहिए घर में क्या तकलीफ है ऐसी कोई बात पूछी नहीं किंतु जब वही सुदामा वापस आ देखा उनकी गरीब की कुटिया उसकी जगह पर बहुत बड़ा महल बना हुआ है सोना जवाहरा से उनके भंडार भरे हुए हैं कितने नौकर चाकर है उनकी उनकी पत्नी की खातिर कर रहे हैं तो फिर देखिए कि उस लेवल पे जदी अपना मन चला जाता है ईश्वर के प्रति या तो फिर वैराग्य में इतना दृढ़ हो जाता है कि भगवान को स्वयं अपनी चिंता करनी पड़े तो वह बात अलग है किंतु हम सभी लोगों के साथ में जो है प्रॉब्लम कि हमारा मंद वैराग्य कि चाहते तो है ईश्वर प्राप्ति हो किंतु ईश्वर प्राप्ति करने के लिए जो मेहनत करनी पड़ती है जो खाटू नहीं टते होए बांगला से बोले वो करने को कौन तैयार है तो इसके लिए यहां पर ठाकुर को पता है कि ये ब्राह्मण भक्तों की क्या परिस्थिति है इसके लिए यहां पर कहते हैं कि तुम लोग कर्म त्याग क्यों करोगे यहां पर कर्म की दो तरह से बात है एक तो साधन भजन जो करते हैं वो भी कर्म है इसके लिए यहां पर ठाकुर कहते हैं कि ईश्वर की चिंता उनके नाम गुणगान नित्य कर्म यह सब भी करना है और संसार कर्म संसार धर्म रोटी कपड़ा मकान अपने परिवार जनों की जो उनकी मदद करनी है उनको सपोर्ट करना है जो हमारा धर्म है सब निभाना है तब कहीं जाकर के इसके बीच में से रास्ता निकाल कर के ईश्वर प्राप्ति के लिए साधन भजन करना है और इसी टॉपिक के ऊपर में और भी बहुत सारा डिस्कशन है इस नवम परिच्छेद में जिसको कि अभी हम कल आगे देखेंगे आज यहीं तक ओम शांति शांति शांति हरि ओम तसत श्री राम कृष्णर्पण मस्तु यहां पर ना मैं भी इसी तरह से काफी

प्रश्न: ठाकुर की शिक्षा कि हमें पहले ईश्वर को प्राप्त करना चाहिए - केवल उच्चाधिकारियों के लिए है। तामसिक लोगों के लिए कर्म आवश्यक है| जो व्यक्ति समाज सेवा करता है वह निकम्मे व्यक्ति से तो बेहतर है।

कुछ सोचता था जैसे आपने कहा कि जो आदमी बिल्कुल अनप्रिटेंशस महाशय ठाकुर के पास में लेकर आए तो ठाकुर पूछते हैं कि तुम क्या करते हो तो मास्टर महाशय ने कहा एक तरह से यह कुछ नहीं करते हैं घर में रहते हैं मां पिता की बड़ी सेवा करते हैं तो ठाकुर कहते हैं ताह ले तो तुम ही कुमड़ काटा बट ठाकुर होलेन अर्थात कि अभी जितने भी घर होते हैं ना उसमें ऐसा होता है कि घर में स्त्रियों को कुमड़ा नहीं काटना है पंपकिन नहीं काटना है अभी जो भी कारण हुए इसके पीछे तो घर में एक निकम्मा आदमी बैठा रहता है वो वहां पर बरामदे में बैठ करके वो हुक्का पीता रहता है अभी जब भी वो पंपकिन काटना होता है कुमड़ काटना होता है तो स्त्रियां कहती है वो ठाकुर बड़े ठाकुर को बुलाइए वो आक के वो कुमड़ एक बार काट देंगे फिर वो फरदर जो करना है वो स्त्रिया कर लेगी किंतु फर्स्ट कटिंग ये कर देंगे तो फिर वो आदमी भीतर में जाएगा कुमड़ काट देगा और फिर वो बाहर आकर के वो तंबाकू खाएगा तो इसको कहते हैं कुमड़ काटा बट ठाकुर बट ठाकुर अर्थात कि बड़ा देवर ना कि जो भी है तो ठाकुर कहते हैं कि तुम काम धाम कुछ नहीं करते हो तुम तो कोड़ो काटा ब ठाकुर होलन तो फिर एक प्रथम द्वितीय दर्शन में ही है कि एक एक ल एक आदमी वहां पर काली मंदिर में रह रहा था ठाकुर के साथ में इच्छा है जब ध्यान करेंगे किंतु ठाकुर ने उसकी तामसिक परिस्थिति पहचान ली तो उसको डांट कर के भगा दिया कि तुम्हारे जो परिवार जन है उनकी चिंता कौन करेगा तुम्हारे पड़ोसी आकर के उनको खिलाएंगे कि क्या जाओ तुम यहां से जाओ तो ठाकुर ये तमस समझ कर के ऐसे लोगों को एकदम काम करने के लिए लगा देते थे यह बिल्कुल सही बात है किंतु ठाकुर ईश्वर प्राप्ति की बात माने सब छोड़कर के ईश्वर प्राप्ति सबसे पहले कर दो यह बात सिर्फ उन्होंने विद्यासागर को ही नहीं यहां पर ब्राह्मण भक्तों को भी कही है और केशव सिर्फ वहां पर उपस्थित नहीं था बाकी सब मंद वैराग्य वाले भी लोग वहां पर थे तो फिर यह थिरी जो है वह इतनी परफेक्टली काम नहीं करती अदर वाइज ठाकुर बहुत सारे लोगों को कहते हैं कि तुम लोग कार्य पहले करो बाकी सब ईश्वर आराधना बाद में करना या तो फिर दोनों को साथ में करना तो यहां पे अप टू एन एक्सटेंट जैसे हमने कहा अधिकारी वाद काम करता है किंतु उसके बाद में यदि आपको बेटर जद एक डीपर माने या तो फिर मोर ग्रेन्यूलर एक्सप्लेनेशन चाहिए तो यह प्री विवेकानंद पोस्ट विवेकानंद एनालिसिस करना पड़ेगा पोस्ट विवेकानंद हमको पता है कि यह कर्म किस तरह से प्रॉपर्ली किए जाए प्री विवेकानंद इवन ठाकुर ने भी इस थिरी को बड़ा डेवलप नहीं किया कि कर्म करते-करते ईश्वर का मनुष्य के भीतर में दर्शन करके आप कैसे करें व्हिच इज वेरी सरप्राइजिंग कि हमको ऐसा लगेगा कि यदि ठाकुर को यह थिरी डेवलप करनी ही थी कि इन्होंने स्वामी जी के माध्यम से क्यों नहीं की या तो फिर स्वामी जी भले उस थिरी को एक्सपें करते अपने खुद के उपदेशों में उनको यह सब ट्रेस रख के जाने थे जिससे कि भविष्य की जनरेशन को कंफ्यूजन ना हो इवन गुरु भाइयों को भी जो कंफ्यूजन हो गया था कि स्वामी जी बिल्कुल नई बात करते हैं तो इस तरह का बाद में ना हो तो उनके खुद के उपदेश में इस तरह के वोह सीड्स रख के जाने थे जिसको कि लेटर ऑन हम एक्सपें कर पाए या तो फिर स्वामी जी के साथ में कनेक्ट कर पाए तो अभी यह कनेक्शन किंतु क्या है पता है ठाकुर ने भले ही चाहे अपने उपदेशों में इतना क्लीयरली ना बताया हो ठाकुर्स लव फॉर नरेण वास क्लियर इंडिकेशन कि नरेण व्हाट ही इज डूइंग हिज इन अकॉर्डेंस विद ठाकुर क्योंकि उनके गुरु भाई भी आखिर में इसी बात से कन्वींस हुए थे थे बात यह नहीं है कि नरेंद ने इनको फिलोसॉफिकली जीत लिया था उन्होंने ठाकुर का नरेंद के प्रति प्रेम अपनी आंखों से देखा था और फिर एट द एंड ऑफ द डे यह बात आ जाती है कि जिनको ठाकुर इतना प्रेम करेंगे वह क्या ठाकुर के सिद्धांतों के विरुद्ध में जाकर कुछ करेगा बिल्कुल नहीं हो सकता दिस वाज दी क्लें चिंग आर्गुमेंट कि जिसने गुरु भाइयों को कन्विंसिबल कहीं जाकर उन्होंने स्वामी जी के कंप्लीट वर्स को ठीक से पढ़ा तब कहीं जाकर वह फिलोसॉफिकली वह कन्वींस हुए थे तब तक तो वह सिर्फ ठाकुर का नरेण के प्रति प्रेम और नरेंद का उनके प्रति प्रेम इसी बात पर सब चला रहे थे सो दैट इज व्हाट इज माय लेटेस्ट अंडरस्टैंडिंग के प्री विवेकानंद पोस्ट विवेकानंद एनालिसिस एक बार हमको करना पड़ेगा कि प्री विवेकानंद साइंस इतना डेवलप नहीं था सर्विस सोशल सर्विस का कि ठाकुर सबको उसकी बात करते घूमते इसीलिए हम लोग एक सप्ताह ठाकुर का

प्रश्न: हमें ठाकुर, मा, स्वामीजी की शिक्षाओं को एक साथ अभ्यास करना ​​चाहिए

एक मां का एक स्वामी जी का ऐसा रखे तीनों को साथ में स्टडी [हंसी] [प्रशंसा] करें और एक फेज ऐड करने को मैं सोच रहा हूं शास्त्र को लेंगे गीता है फिर ये वेदांत सार है किंतु इट विल टेक सम टाइम किंतु एक वन वीक उनके लिए फिर बाद में फोर्थ वीक एक ऐसा रखेंगे ये आर्किटेक्चर होता है ना उसमें कांसेप्ट है केप स्टोन का अर्थात कि जब आप एक आर्च बनाते हैं तो आर्च में क्या होता है कि वह सर्कुलर आर्च होता है तो पत्थर जो होते हैं ना उसको काटकाट करके वह दोनों ओर से बढ़ाते जाते हैं किंतु यदि एक सपोर्ट नहीं रहेगा आर्च यदि आपने देखा ही होगा सर्कुलर ऐसा होता है तो वह क्या गिर नहीं जाएगा नहीं उसके ऊपर में कैप स्टोन लगाते हैं कैपस्टोन की वजह से आर्च लॉक हो जाता है उसको आप काटे हुए पत्थर भी रख देंगे ना तो भी आर्च गिरेगा नहीं क्योंकि वह लॉक कर देता है कैपस्टोन उसको तो वैसे ही ठाकुर महा स्वामी जी के जो उपदेश है उसका फिर शास्त्र क्या करता है ना दे आर लाइक ए कैपस्टोन हमने पढ़ लिया है सब कुछ और किंतु कुछ कुछ चीजें होती है ना जो क्लिक करनी होती है जो किय सबको लॉक कर देता है एकदम फर्म फिट कर देता है अपने माइंड में तो अी ये उसके रिलेटेड कौन सा श्लोक है कौन सा वेदांत में क्या कहा गया है उपनिषद का क्या है वो जैसे इट इज लाइक ए कैप स्टोन तो बहुत सारे लोग क्या सोचते हैं पहले शास्त्र पढ़ो फिर ठाकुर म स्वामी जी को अच्छे से समझ में आएगा मेरा रिवर्स थिरी है पहले ठाकुर महा स्वामी जी को अच्छे से पढ़ो उसके बाद में जब शास्त्र को जाएंगे उपनिषद में इट विल बी म एकदम क्रिस्टल क्लियर हो जाएगा विदाउट एनी कंफ्यूजन कि हां ये इसका अर्थ यही है इट विल बी लाइक अ कैपस्टोन ऑफ अवर स्टडी ठाकुर म स्वामी जी का जो टीचिंग है वह शास्त्र की ही कंटिन्यूटी है बस वही है कि हमको व एक दृष्टि डेवलप करनी होगी शास्त्र अभी जैसे मैं पीपीटी से मैं बेलूर मठ में गया था जवाइन करने के लिए वहां पर अभी क्या है जो पीपीटीसी में आते हैं जॉइन करने के लिए लिए बेलूरमठ में वो बड़े इमेच्योर होते हैं माने जस्ट आए हैं कुछ भी इतना डिटेल में नहीं पता है पूरा लाइफ टाइम लाइफ टाइम पड़ा है स्टडी के लिए तो अभी एक लड़का था मेरे साथ में रह रहा था वो भी जॉइन करने के लिए आया था मुझे कहता है कि मुझे ना विवेक चूड़ामणि ज्यादा अच्छा लगता है गीता की जगह गीता में यह कर्म कर्म क्या सब लिखा है विवेक चूड़ामण सिर्फ जब ध्यान तपस्या वैराग्य इसके बारे में है तो मैं वही करना चाहता हूं फिर ऐसा कह के वो एक सप्ताह के बाद में वोह बेलूर मट छोड़ के चला गया बोलता है मैं हिमालय में जाकर तपस्या करूंगा तो वह हिमालय चला गया फिर बाद में उसके साथ में क्या हुआ पता नहीं किंतु उसकी जो बातें हैं ना मेरे मन में काफी समय तक रही थी मैं भी सोचता था कि अच्छा ठीक है मैं तो वैसे रूरल डेवलपमेंट करते-करते रामकृष्ण मिशन में आया हूं तो मेरे लिए वह सब कंफ्यूजन नहीं था कि कर्म करना है कि नहीं करना है किंतु उस लड़के की बात जब मैं सुनता था तब मुझे भी लगता था कि जो जिसको प्योर प्रॉपर ट्रेडिशनल स्पिरिचुअलिटी कहते हैं उसके साथ में क्या कंफ्यूजन नहीं है अपना रामकृष्ण संघ का तो वह होता था तो अभी बात ऐसी है ना उस लड़के ने जो विवेक चूड़ामणि पढ़ा था इट वाज इमेच्योर ऑन हिज पार्ट पहले यदि ठाकुर मा स्वामी जी को पढ़ता फिर वह विवेक चूड़ामणि पढ़ता तो उसको कंफ्यूजन या तो कंट्रक्शन नहीं दिखता सो दैट इज वन थिंग वी हैव टू रिमेंबर दूसरी बात क्या है ना देखिए अब जो ट्रेडिशनल एक वेदांत पढ़ा जाता था काफी डिटेल में पढ़ाने वाले आचार्य भी होते थे उनका भी एक कैपेसिटी होता था चरित्र होता था उन लोगों का उनकी समझाने की एक क्षमता होती थी आजकल जिस तरह से पॉपुलर वेदांत को प्रेजेंट किया जाता है चच आई एम नॉट श्यर कि वो प्रॉपर होता है उसका तो फिर यह क्या है ना कि आधा आधा वेदांत पढ़कर के वेदांत का इनडाइजेशन उसके जैसा कुछ हो जाता है सो ट इज अनदर प्रॉब्लम रिस्पांसिबल

प्रश्न: समाज में हर कोई एक-दूसरे पर निर्भर है। इस तरह हर कोई एक-दूसरे की सेवा कर रहा है। यह कैपिटलिज्म की खूबसूरती है। हम सभी अपने हित के लिए काम करते हैं, लेकिन इससे सभी को फायदा होता है। इस तरह एक सीईओ एक साधु की तुलना में समाज को अधिक लाभ पहुंचाता है।

हियर यह जो आप जो बात कर रहे हैं ना इसका काफी बहुत डिटेल में डिस्कशन यह सोशलिज्म वर्सेस कैपिट इज्म इसमें हुआ है अब यह सोवियत सिस्टम था एक जिन्होंने सोचा कि सब कुछ स्टेट ओन बना देते हैं ऑल द एंटरप्राइज विल बी ओन बाय द स्टेट एंड ऑल दिस एंटरप्राइज फैक्टरी इंडस्ट्री इट विल वर्क फॉर द बेनिफिट ऑफ द सोसाइटी तो अभी ये 50 इयर्स 19 आप से 1970 से लेकर के यह सोवियत सिस्टम डिसइंटीग्रेट हुई वो 1989 में तो आप ऑलमोस्ट 70 ईयर का आप उसका हिस्ट्री देख लीजिए कि सोवियत सिस्टम आखिर आखिर में इतना कोलप्पन के लिए लाइन लगती थी ऑन द अदर हैंड जो कि मोस्ट ग्रोसेस कैपिट सिस्टम है अमेरिका व्हिच हैज प्रोड्यूस मोर गुड्स फॉर द सोसाइटी देन एनी अदर नेशन आज अमेरिका अपनी एंबेसी खोल दे भारत के सभी सिटीज में कि जिसको माइग्रेट होना है सब आ जाए तो पूरा इतना लंबा लाइन लग जाएगा आज इंडियंस आर द थर्ड लार्जेस्ट इल्लीगल इमीग्रेंट इन अमेरिका तो क्या है कि कोई भी इस तरह के देश में नहीं रहना भारत का ही सोशलिस्ट एक्सपेरिमेंट आप देख लीजिए कि इंडिपेंडेंस के बाद में नेहरू ने सोचा सोशलिस्ट करेंगे सोशलिज्म करेंगे फाइव ईयर प्लान चलाएंगे फाइव ईयर प्लान के आखिर में यह बात हुई 1993 में कि वर्ल्ड बैंक से ऋण लेना पड़ा और इकोनॉमी ओपन करनी पड़ी और यह जो कैपिट इज्म का जो फंडामेंटल आइडिया है लेजस फेयर अर्थात कि सब लोग अपने-अपने स्वार्थ के लिए सोचे तो सोसाइटी बेटर चलेगी व्हिच इज वेरी सरप्राइजिंग यदि सभी लोग कलेक्टिव फार्म है हम सब लोग कलेक्टिव फार्म में पार्टिसिपेट करते हैं जो प्रोडक्ट होगी सबको इक्वल बांटी जाएगी व्हिच इज साउंड्स वेरी गुड कांसेप्ट इन थिरी किंतु जब तक मेरा स्वार्थ नहीं होगा मैं काम ही नहीं करूंगा यह वो जो एक कहानी है एक राजा ने कहा कि यह पूरा जो तालाब है उसको दूध से भर दो दूसरे दिन सुबह को देखा तो पूरा पानी से भरा हुआ था क्यों किसी ने दूध नहीं डाला सब लोग सोच रहे हैं दूसरे लोग दूध डालेंगे मैं पानी डाल देता हूं तो कलेक्टिव रिस्पांसिबिलिटी में ये आती है बात कि दूसरे लोग तो कर रहे हैं मुझे क्या जरूरत पड़ी है यदि मुझे अपने लिए दूध पीना होता तो मैं अवश्य दूध का जुगाड़ करता तो सेल्फ इंटरेस्ट इज ड्राइविंग द सोशल गुड ये अपेरेंटली कंट्रा इक्टर बात 20th सेंचुरी में सिद्ध हुई है सो एस फार एज प्योर प्रोडक्टिविटी इज कंसर्न कि यू आर वेरी राइट कि जो सेल्फ इंटरेस्ट है व्हिच इज मच बेटर फैक्टर मच बेटर ड्राइविंग फैक्टर देन एनीथिंग एल्स और बिल्कुल सही है किंतु यह एक बात है कि सही में यदि यह रामकृष्ण जो स्वामी जी की जो सर्विस मेथड है इस मोर देन फोकसिंग अपॉन प्रोडक्टिविटी इट इज डिपेंडिंग अपॉन कंपेज या तो फिर आप कहेंगे कि टू सी द गॉड इन ह्यूमन बीइंग सो ट इज अवर ड्राइविंग फैक्टर ने ऐसा नहीं है कि हमको प्रोडक्टिविटी की चिंता नहीं करनी है बात यह है कि प्रोडक्टिविटी के पीछे में ड्राइविंग फैक्टर क्या है सोशलिज्म में था कि कलेक्टिव गुड दैट वाज वन ड्राइविंग फैक्टर कैपिट इज्म में ड्राइविंग फैक्टर है सेल्फ इंटरेस्ट अपने यहां पर ड्राइविंग फैक्टर है ईश्वर प्राप्ति या तो फिर कंपेज सो व्हिच ड्राइविंग फैक्टर अल्टीमेटली प्रूव ट्र ह्यूमन नेचर जो होता है ह्यूमन नेचर किस बात को ए स्ट्रंग लेगा तो सो फार हिस्ट्री में तो यही प्रूव हुआ है कि सेल्फ इंटरेस्ट इज अ वेरी स्ट्रांग ड्राइविंग फैक्टर यह रामकृष्ण संघ की जो विचार सारणी है जो कि हम कुछ चंद साधुओं तक सीमित है कुछ चंद भक्तों तक सीमित है कि शिव ज्ञान जीव सेवा दिस ड्राइविंग फैक्टर हमको कितना प्रोडक्टिव बना बताता है या बनाता है द फ्यूचर विल टेल कि वेदर वी विल बी एबल टू सरपास सेल्फ इंटरेस्ट र नॉट इन टर्म्स ऑफ प्रोडक्टिविटी तभी तो कहीं जाकर के इस बात का सही टेस्ट होगा ना कि अदर वाइज जैसे भारत में हमेशा के लिए होता आ रहा है कि वी प्रीच हाईएस्ट ऑफ द फिलोसोफी बट इन प्रैक्टिस वी आर द लिस्ट ऑफ ऑल यह बार-बार होता रहा है यहां पर वेदांत कहता है सभी के भीतर में वही आत्मन है सोसाइटी पूरी नात जात में बटी हुई है सो विल द सेम थिंग रिपीट अगेन कि हाईएस्ट हमने प्रूव कर दिया कि शिव ज्ञान जीव सेवा कुड बी द बेस्ट ड्राइविंग फैक्टर इन टर्म्स ऑफ प्रोडक्टिविटी बट वेदर वी आर एबल टू रियलाइफ अ लार्ज स्केल र नॉट दैट हिस्ट्री विल टेल ना यहां पे अभी जैसे देखिए इवन

प्रश्न: अधिकांश लोगों के लिए स्वार्थ ही सबसे प्रभावी होगा

हिस्टोरियंस जैसे आर्नोल्ड टोयन भी वन ऑफ द बेस्ट हिस्टोरियन अ तो वोह क्या कहता है कि देयर इज ऑलवेज अ क्रिएटिव माइनॉरिटी अभी यह क्रिएटिव माइनॉरिटी सोसाइटी को किस डायरेक्शन में लेके जाती है उसके ऊपर डिपेंड करता है जब यह रशिया इंपीरियल रशिया 1910 1920 की जो बात है वहां की जो क्रिएटिव माइनॉरिटी यानी कि लेनिन य स्टेलिन वगैरह ने ठीक किया कि कम्युनिज्म की ओर देश को लेक जाना है अभ ये इंडिया की जो क्रिएटिव माइनॉरिटी थी स्वामी जी है गांधी जी है या नेहरू जिन लोगों के पास में रियल पावर था उन लोगों ने अपने लिए एक रास्ता चुना चाइना की जो क्रिएटिव माइनॉरिटी थी उन्होंने उसके लिए एक रास्ता चुना सो एक क्रिएटिव माइनॉरिटी जद इसको अप्लाई करती है अभी यहां पर सुभाष चंद्र बोस है या वगैरह जितने भी है है कि जिन लोगों के जिन लोगों ने भारत के नव निर्माण में उनकी बड़ी ही महत्त्वपूर्ण भूमिका ऐसे 15-20 लोग ही होते हैं तो ऐसे क्रिएटिव माइनॉरिटी यदि इसको अप्लाई कर देती है अपने लाइफ में या तो फिर उसको यह करते हैं यूज करते हैं देन द डायरेक्शन ऑफ सोसाइटी विल चेंज फिर आप ऐसा कहे कि 90 पर लोगों के लिए 95 पर लोगों के लिए सेल्फ इंटरेस्ट ही ड्राइविंग फैक्टर है दैट डज नॉट मैटर एज फार एज क्रिएटिव माइनॉरिटी एक्सेप्ट दिस हाईएस्ट ऑफ द आइडियल जर्मनी में जो हुआ कि हाईएस्ट आइडियल एक्सेप्ट करने वाला ना ही हिटलर था ना ही कोई था तो उन्होंने पूरे देश को गड्ढे में गिरा दिया जो सेकंड वर्ल्ड वॉर के बाद में जर्मनी की जो हालत हुई थी उस सेकंड वर्ल्ड वॉर में 1000 बॉम्बर्स जाकर के रेड करते थे 1000 बॉम्बर एक रात में जाकर के बॉम फेंकें क्या अवस्था होगी देश की तो ऐसी भयानक परिस्थिति में पूरे देश को डाल दिया क्योंकि क्रिएटिव माइनॉरिटी पूरी करप्ट थी तो एटलीस्ट क्रिएटिव माइनॉरिटी एक्सेप्ट दिस आइडियल एंड डायरेक्ट्स द कंट्री एंड द रेस्ट ऑफ देम डज मैटर दे फॉलो देर ओन सेल्फ इंटरेस्ट तो भी बात बन जाएगी