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Sri Ramakrishna Kathamrita ·

श्रीरामकृष्ण कथामृत || 16 Dec 1883 - श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ दक्षिणेश्वर में || 4 Nov 2025

प्रार्थना

ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णायते नमः श्री श्री रामकृष्ण कथामृत श्रीमद् द्वारा कथित 16th दिसंबर 1883 दोपहर के 4:00 बजे हैं। उस समय की बात हम कर रहे हैं। ऑलरेडी हमने देख लिया कि जनाई के एक मुखेय बाबू आए हैं ठाकुर के पास में और उनके साथ में ठाकुर वार्तालाप कर रहे हैं। जो टॉपिक हमारा चल रहा था ठाकुर उनको कहते हैं विषय

ब्रह्मचर्य ही है आध्यात्मिक साधना की नींव

बुद्धि का एक लेश मात्र भी रहने से ईश्वर दर्शन या तो ब्रह्म ज्ञान होगा नहीं। कामिनी कांचन में मन थोड़ा सा भी रहेगा तो भी चलेगा नहीं। संपूर्ण रूप से अपना मन किसी भी तरह की कामना वासना से दूर होगा। तभी आध्यात्मिक जीवन के उच्च चरण जो है आध्यात्मिक जीवन के सर्वोच्च सोपान है वहां तक हम जा पाएंगे। और फिर ठाकुर उदाहरण देकर के कहते हैं कि गिरिराज को उनकी बिटिया पार्वती ने विभिन्न तरह के दर्शन तो दिए किंतु जब गिरिराज ने यह कहा कि बिटिया अभी मुझे ब्रह्म ज्ञान करवाओ ब्रह्म साक्षात्कार करवाओ। तब मां पार्वती ने कहा कि बाबा आपको यदि ब्रह्म ज्ञान प्राप्त करना है तो साधु संग करना होगा। इस अर्थ में कि आपको त्याग और वैराग्य और सन्यास का मार्ग आश्रय करना होगा। इंटरेस्टिंगली और एक जगह पर ठाकुर कहते हैं साधु संघ के बारे में ही कि कोई-कोई साधु संघ इसलिए करता है वो गांजा पीने के लिए। अर्थात कि ये साधुओं के पास में तो यह सब रहता है। तो स्मोकिंग का मटेरियल अ तो क्या है कि भारत के सन्यासियों को इतना तो अलाउ है कि चरस गांजा है या तो फिर और कुछ टोबेको वगैरह है उसका स्मोक कर सकते हैं। उसका पान सेवन कर सकते हैं। तो कोई-कोई साधु संग करता है गांजा का सेवन करने के लिए। तो तो वह भी एक है कि साधु संग आप किस दृष्टि से करते हैं वह भी एक बहुत ही महत्वपूर्ण है। सिर्फ साधु संग करने से होगा नहीं। मैंने दो तरह के डिवोटी को देखे हैं। एक तरह के डिवोटी है कि जो कि जैसे ही आश्रम में आएंगे वह साधु या तो फिर बड़े महाराज जो कोई भी होंगे उनको यदि सामने मिल जाएंगे तो उनको प्रणाम करेंगे। किंतु फिर प्रणाम करने के बाद में वे लोग मंदिर में जाकर बैठेंगे आरती वगैरह अटेंड करेंगे और समय होगा तो जब ध्यान करेंगे और ज्यादा समय होगा तो कुछ किताबें पढ़ेंगे और ज्यादा समय होगा तो आश्रम की जो विभिन्न एक्टिविटी है उसमें वे लोग पार्टिसिपेट करेंगे और इस तरह के भी डिवोटी है कि उनको साधु संग थोड़ा सा ज्यादा अच्छा लगता है तो किसी भी महाराज के पास में उनकी ऑफिस में जाकर बैठ जाएंगे और लंबी लंबी बातें करना शुरू कर देंगे। अपनी पूरी बायोग्राफी जो है जैसे कि यह लोग उनको कह देंगे। तो इस दोनों तरह से है। साधु संग अच्छा ही है। आप चाहे ठाकुर कहते हैं ना कि वो शुगर डाली हुई रोटी मीठी रोटी उसको आप सीधा करके खाओ ना कि टेढ़ा करके खाओ। वो तो मीठी ही लगने वाली है। वो तो स्वीट ही लगने वाली है। किंतु फिर भी यहां पर ठाकुर कहते हैं कि ब्रह्म ज्ञान प्राप्ति के लिए यदि साधु संग किया जाए तो इससे अच्छा अपने जीवन में और कुछ नहीं है। तो यह तो ठाकुर

सन्यासी के लिए ब्रह्मचर्य की महत्ता

का उपदेश हुआ। उसके बाद में मास्टर महाशय अपना एक कमेंट लिखते हैं। क्या कहते हैं? ठाकुर की बोल छे संसारी लोक बा सन्यासी जदी कामिनी कांचन ये थाके ता होले ब्रह्म ज्ञान हो ना ठाकुर क्या यह कहना चाहते हैं कि संसारी या तो फिर सन्यासी यदि कामिनी कांचन को ले रहेंगे तो ब्रह्म ज्ञान होगा नहीं यहां पर देखिए मास्टर महाशय एक मास्टर स्ट्रोक यहां पर लगाते हैं। यह तो कहते ही हैं कि संसारी लोग यदि अह विषय वासना में डूबे हुए रहेंगे तो ब्रह्म ज्ञान नहीं होगा। किंतु सन्यासियों के लिए भी वही क्या सन्यासी भी यदि इस तरह से इंद्रिय सुखों में डूबे हुए रहेंगे तो ब्रह्म ज्ञान नहीं होगा क्या? तो यह नेचुरली है कि पढ़कर के हमको थोड़ा सा तो आश्चर्य होगा कि सन्यासी को यहां पर क्यों गिन रहे हैं? सन्यासी बाय इट्स वेरी डेफिनेशन कि संसार से ऊपर हो चुका है। संसार से बाहर निकल आया है। किंतु फिर भी देखिए हम सबको पता ही है कि सन्यासी के कपड़े पहनना, सन्यास का व्रत लेना, सन्यास का नाम ग्रहण करना, सन्यास की विधि करना वह सब एक चीज है। और हृदय को गेरवा रंग में रंगना अपने बिहेवियर चाल चलन अपनी साधन पद्धति अपना पूरा पर्सनालिटी अपनी मेमोरीज अपने संस्कार स्मृति सब कुछ को गेरुआ रंग में रंगना वह बिल्कुल ही अलग बात है। तो क्या है कि उसके लिए आपको बहुत ही परिश्रम करना पड़ता है। बहुत ही तपस्या करनी पड़ती है। वो जब आप करेंगे तभी आप उस सही-सही सन्यास के कैंडिडेट होंगे। सही-सही सन्यासी होंगे। किंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि कोई भी सन्यासी कभी कोई गलती करता है या तो फिर उसमें कुछ कमी दिखाई देती है तो फिर आप उसकी निंदा शुरू कर दें। क्योंकि हमको पता ही है सन्यास के दो दो तरह से या तो फिर दो तरह की परिस्थितियों में सन्यास ले सकते हैं। एक तो है कि यदि आप ईश्वर प्राप्ति करने के मार्ग पर आगे बढ़ना चाहते हैं तो साधन भजन में उद्दीपना हो। साधन भजन करने के लिए हमको उत्साह मिले। इसके लिए आप गेरुआ धारण कर सकते हैं। इसको कहते हैं विविधिशा सन्यास और दूसरा सन्यास है कि साधना में सिद्धि प्राप्त करके ईश्वर दर्शन हो चुका है या तो फिर आत्म साक्षात्कार हो चुका है और फिर संसार से कोई लेना देना नहीं रहा तो फिर गेरुआ धारण किया जाता है। उसको कहते हैं विध्वत सन्यास। तो हम सबको तो वैसे पता ही है कि रामकृष्ण मिशन के जो साधु है वह विविध दिशा सन्यासी है। यहां तक कि स्वामी विवेकानंद ने स्वयं वराह नगर मठ में जब पहला सन्यास होम वीजा होम इसको कहते हैं। सन्यास की विधि को विजा होम कहते हैं। तो सर्वप्रथम विजा होम जब हमारे संघ में हुआ था। जब इन गुरु भाइयों ने सन्यास धारण किया था। स्वामी जी ने अपना सबसे पहला नाम ही रखा था स्वामी विविधानंद। तो हम सबको पता है कि हम लोगों ने सन्यास के मार्ग पे साधन भजन के मार्ग पे अभी तो पहला कदम ही रखा है। गलतियां होने की संभावना है। बीच-बीच में पैर फिसल सकते हैं। यह सब कुछ होगा। किंतु देखिए कि यह जो रामकृष्ण मिशन है वह एक ऐसा सेफ एनवायरमेंट हमको प्रोवाइड करता है कि विद इन दिस सेफ एनवायरमेंट विद इन दिस एनकरेजिंग विद इन दिस होली एटमॉस्फियर हम लोग अपनी यह जो यात्रा है उसको सेफली हम लोग इसके ऊपर में आगे बढ़ सकते हैं। यदि और कहीं पे रहते जहां पे भी एनवायरमेंट इतना सेफ नहीं है। इतना सिक्योर नहीं है तो क्या होगा? जैसे ही मन में कोई वासना उदित हुई, जैसे ही कोई वासना प्रकट हुई, साथ-साथ में ही उस वासना को फुलफिल करने के लिए जितने भी साधन सामग्री चाहिए नजर के सामने ही है। तो उस समय क्या है कि मन के ऊपर में बांध रखना मुश्किल है। मन के ऊपर में संयम रखना मुश्किल है। तो फिर उस परिस्थिति में जब आपने एक बार विषय वस्तु का सेवन करना प्रारंभ कर दिया तो फिर वहां से वापस आना मुश्किल है। जबकि रामकृष्ण मिशन में है कि विषयों के जो प्रलोभन है वह अभी तक तो आश्रम के भीतर में प्रवेश नहीं किए हैं। इस अर्थ में कि यदि आपको विषय वासना की कोई लालच आपके मन में प्रकट हुई है तो उसको फुलफिल करने के लिए कोई सहज उपाय अभी तक यहां पे नहीं है। इस अर्थ में रामकृष्ण मिशन इंस्टट्यूट जो है इट इज द सेफेस्ट एनवायरमेंट। ठाकुर कहते हैं ना कि पौधा जब छोटा होता है तो उसको एक गार्ड रेल में बांध करके रखा जाता है। इसके बाद में जब पौधा बड़ा होता है तो उसके आसपास की यह जो फेंस है उसको आप हटा दीजिए। यहां तक कि पौधे को आप एक हाथी को भी एक चैन से पौधे के साथ में बांध दीजिए। यह पेड़ के साथ में पेड़ गिरेगा नहीं। हाथी चाहे जितना ही खींचे उस चैन से बंधा हुआ हाथी किंतु पेड़ फिर भी गिरेगा नहीं। क्यों? क्योंकि उसकी जड़े जो है जमीन के भीतर में बहुत गहराई में जा चुकी है। जबकि यह पौधा होता है छोटा होता है। उसकी जड़ जो है मुश्किल से अभी 5 इंच 6 इंच ना कि 1 फुट इतनी वो जमीन के भीतर में गई है। तो यह जो जड़ों को जमीन के भीतर में जाना है। जितनी गहराई में जमीन में जाएगी उतना जो पौधे की शक्ति जो है ये जो जीवन के जितने भी चैलेंजेस है ये विषय वासनाओं के ये जितने भी साइक्लोन है ये जैसे यहां पर एक साइक्लोन आया था तो विषय वासना रूपी भी एक साइक्लोन होता है और मैं यहां पर देख रहा था एक दिन हमारे तो समुंदर के सामने ही अपना यह मठ का एक बिल्डिंग है लाइब्रेरी है तो लाइब्रेरी की छत पे मैं जाकर के समुंदर को देख रहा था। तो बाप रे माने जनरली तो मैं समुंदर को देखता हूं तो क्या होता है कि किनारे पे वह वेव्स आते रहते हैं। किंतु डीप में जब जाएंगे दूर-दूर जैसे आपकी नजर जाती जाएगी होराइजोन तक जाएगी तब देखेंगे कि समुंदर की जो सतह है एकदम निर्मल शांत प्रशांत ट्रंकविल होकर के पड़ी हुई है। किंतु उस दिन मैंने भयानक नजारा देखा जिस दिन साइक्लोन आया था मैंने देखा कि ये जो पूरा समुंदर जो है ना ऐसा ऊपर नीचे हो रहा है। मैंने सोचा अरे बाप रे माने कितने करोड़ों-करोड़ों टन उसमें पानी होगा। यदि वो ऐसे आ जाएगा किनारे पर पानी उछल करके तो पूरा यह जो विशाखापट्टनम सिटी है उसको ध्वस्त करके ले जाएगा। तो यह क्या है कि नेचुरल फोर्सेस होती है। वह जब तक शांत है तब तक देखने में बड़ा ही सुंदर है। सुबह को आप जाएंगे समुंदर के किनारे वॉकिंग करने के लिए देखेंगे कि वहां पे सनराइज हो रहा है समुंदर के उस पार होराइजन के ऊपर में तो देखने में बड़ा सुंदर लगता है। किंतु जब प्रकृति अपना विराट विकट स्वरूप कराल स्वरूप धारण करती है। भयंकरा स्वरूप धारण करती है। तब पता चलता है कि यह जो जनरली यूजुअली शांत दिखने वाली यह सब जो प्राकृतिक नजारे हैं वो कितने भयावह हो सकते हैं। कितने खूनी हो सकते हैं। कितने मर्डररस हो सकते हैं। तो उस दिन मुझे पता चला कि समुंदर वैसे तो शांत है किंतु साइक्लोन होने से पता चल जाएगा कि उस शांति को किस तरह से वह तूफान में बदल सकता है। तो यह जो विषय वासना रूपी साइक्लोन है वैसे तो हमारा मन शांत है। किंतु जैसे ही विषय वासना रूपी तूफान मन में खड़ा हुआ तो सब कुछ अपना अपने यह जो व्रत लिया है, अपने यह जो प्रॉमिस किया है, गुरु महाराज से जो दीक्षा ली है, जो कुछ भी अपना है, जिसके सहारे हम लोग साधक जीवन को पार करना चाहते हैं। साधक जीवन पर आगे बढ़ना चाहते हैं। सबको कहां पर उठा के लाकर के फेंक देगा पता ही नहीं चलेगा। उस समय यह सेफ एनवायरमेंट क्या है कि हमको एक प्रोटेक्शन देता है कि भले ही चाहे मन में विषय वासना का यह साइक्लोन उठा हो किंतु जब तक उसको फुलफिल करने के लिए सामने कुछ मिलता नहीं है तब तक यह जो साइक्लोन है मन के भीतर में ही चलता रहेगा। उसके बाहर आकर के कुछ डैमेज नहीं करेगा। किंतु जैसे कि आपको पता ही होगा बहुत सारी जगह ऐसी तो होती है कि वहां पर आप देखेंगे कि धर्म या अध्यात्म की बातें तो होती है किंतु वहां पे इतना आपको वाटर टाइट सेफ आपको जो प्लेस जो है सिक्योर प्लेस साधना करने के लिए नहीं मिलेगा। अब जैसे ठाकुर ने दक्षिणेश्वर में साधना की वो हमको तो पता है कि कितनी भयानक वो कि जैसे-जैसे आप विषयों से अपने मन को वापस लाना शुरू करेंगे वैसे-वैसे ही आप देखेंगे कि थोड़ा सा भी टेंप्टेशन जो होता है वो बहुत ही बड़ा होकर के हमारी नजर के सामने आता है। जब तक हम विषय में डूबे रहते हैं [गला साफ़ करने की आवाज़] तब तक क्या होता है कि वैसे ही चलो घर में रह रहे हैं। वैसे ही भोग के विषय चारों ओर फैले हुए हैं। तो अभी और कोई टेंपटेशन नजर के सामने आ गया तो वैसे ही टेंप्टेशन के भीतर में ही रह रहे हैं। वैसे ही तो दिन रात इसका भोग कर ही रहे हैं। तो छोटे-मोटे टेंप्टेशन हमको इतना ज्यादा असर नहीं करते। क्योंकि वो एक एक होता है ना कि आपका एक इम्यूनिटी बन जाता है। एक इम्यूनिटी कैसे बनता है? पता है ना कि यदि कोई वायरस है उसके सामने जैसे कि पोलियो वगैरह तो उसका आपको इम्यूनिटी चाहिए तो होता क्या है उसी के डेड वायरस को आप वैक्सीन बना करके अपने बॉडी में डालते हैं तो अभी मान लीजिए पोलियो है ना कि ऐसा कोई भी एक वैक्सीन आपने उसका लिया तो एक्चुअली उसी के वायरस उसी के बैक्टीरिया की वो वैक्सीन बनी है जो कि वायरस या बैक्टीरिया जो कुछ भी होगा जो कि हमारे बॉडी में वो डिसीज खड़ा करते हैं तो आप बोलेंगे अरे यह तो बड़ा ही डेंजरस बात है। यह कैसा हो गया? जिस वायरस से हमको बचना है उसी वायरस को आप वैक्सीन बना करके बॉडी में डाल रहे हैं। किंतु इसके पीछे लॉजिक क्या है? कि जिस वायरस को जैसे ही आपने बॉडी में डाला वैसे ही बॉडी में से अपने शरीर में से ना उसका एंटीबॉडीज बनना शुरू हो जाएगा। अभी इन जनरल एंटीबॉडीज नहीं बनेंगे। जब तक वायरस नहीं जाएगा तब तक एंटीबॉडीज नहीं बनेंगे। किंतु जैसे ही वायरस गया शरीर के भीतर में साथ-साथ में ही यह एंटीबॉडीज बनना शुरू हो गया। तो ठीक है यह कंट्रोलोल्ड लेवल पर हुआ है। कुछ ही अल्पसंख्यक वायरस को ही प्रवेश करवाया गया है शरीर के भीतर में जैसे कि एक कंट्रोलोल्ड सेफ एनवायरमेंट में एंटीबॉडीज बने। इसके बाद में जब रियल अटैक होता है डिजीज का तो पता चलेगा कि जो एकदम बहुत बड़ी मात्रा में जो वायरस प्रवेश करते हैं किंतु ऑलरेडी शरीर के भीतर में एंटीबॉडीज बने हुए हैं तो वह उस वायरस का प्रतिकार करते हैं। तो यहां पे भी यदि आप संसार में रहते हैं विषय वासना में डूबे रहते हैं तो भीतर में से एक तरह का एंटीबॉडीज प्रकट हो जाएगा। अभी आपके सामने टेंप्टेशन आएगा भी तो वह भीतर का एंटीबॉडीज आपको रेजिस्ट करने के लिए सक्षम है। किंतु जिस क्षण आपने विषय वासना का त्याग किया भीतर में से एंटीबॉडीज बनना बंद हो गया। उसके अगेंस्ट में जो एक क्या कहेंगे कि बहुत ज्यादा भोग करके एक तरह का जो विराग आ जाता है वह होना बंद हो गया। अभी इवन जो सिंगल वायरस भी है इस तरह के त्यागी के सामने यदि आता है तो वह इतना बड़ा टेंपटेशन खड़ा करेगा कि सही में उसके सामने बचना मुश्किल है। तो यह जो है मास्टर महाशय जो कहते हैं ठाकुर ने तो सिर्फ इतना ही कहा कि कामिनी कांचन में मन होने से बिल्कुल होगा नहीं। किंतु इसके इंटरप्रिटेशन में मास्टर महाशय कहते हैं कि यदि संसारी हो ना कि सन्यासी दोनों के लिए है। यदि विषय वासना में थोड़ा सा भी मन रहा तो भी साधन भजन के क्षेत्र में आगे नहीं बढ़ पाएंगे। तो कल इसके बारे में हमने एक कहानी भी देखी कि किस तरह से उस स्त्री जो एक सुंदर स्त्री थी ठाकुर को लुभाने के लिए आई। ठाकुर ने जब उसके सामने देखा भी नहीं तो आश्चर्यचकित होकर कहती है कि मैं तो बहुत सारे आश्रम में गई हूं। बहुत सारे जो तथाकथित जो धार्मिक प्रैक्टिशनर्स हैं उनके साथ में मैंने वार्तालाप किया है। सभी लोग मुझे आश्रम में रुकने को बोलते हैं। किंतु आपने मेरे सामने नजर उठाकर के देखा भी नहीं। यह किस तरह का त्याग है? किस लेवल की आपकी यह साधना है? तो वह एक कहानी हमने देखी और एक

काशी यात्रा की कहानी: श्रीरामकृष्ण पैसे को छू नहीं सकते थे

इंटरेस्टिंग बात है। वो तो हो गया कि काम के बारे में। यहां पे तो काम और कांचन अर्थात कि स्त्रियों के प्रति पुरुषों का स्त्रियों के प्रति या तो स्त्रियों का पुरुषों के प्रति। वह जो वैजातीय आकर्षण होता है उसके बारे में जो यह कहानी थी तो साथ में ही यह जो धन है वैभव है पैसा है उसका भी तो त्याग करना है उसके प्रति जो लोभ या मोह होता है उसका भी तो त्याग करना है तो उसके बारे में एक छोटी सी ठाकुर की ही एक रेमिनेशंस है ठाकुर अपने शब्दों में यह बात कहते हैं कि एक समय था जबकि हृदय मुझे बहुत ज्यादा त्रास देता था। अभी हृदय का तो पता है कि ठाकुर का भांजा था और वैसे तो उसने ठाकुर की बहुत सहाय की थी। कथामृत में ही एक सुंदर प्रसंग है कि हृदय काली मंदिर में आया हुआ है। अभी उसको तो काली मंदिर से निकाल दिया गया था। क्यों? क्योंकि उसने वह जो थे वहां के इंचार्ज उसकी लड़की का उसने कुमारी के रूप में पूजा की थी। तो फिर वे लोगों को डर लग गया कि यह ब्राह्मण होकर के हमारी लड़की की इस तरह से पूजा करता है तो क्या अमंगल तो नहीं होगा बोलकर के उसको काली मंदिर से निकाल दिया था। तो अभी हृदय को यह लोग जो है अंतरंग भक्त वे लोग इतना पहचानते नहीं थे क्योंकि इनके आने से पहले ही हृदय को भगा दिया गया था। तो किंतु एक दिन हृदय ठाकुर को मिलने के लिए काली मंदिर में आया। अभी गेट के भीतर में तो उसको आने का हुक्म नहीं है। तो बाहर में ही खड़े रहकर के मैसेज पहुंचाया। ठाकुर और मास्टर महाशय हृदय को देखने के लिए गए और मास्टर महाशय इस सीन का वर्णन करते हैं। कहते हैं कि ठाकुर जब हृदय के साथ में बात करते हैं तो सही में उनके ठाकुर के भीतर में हृदय के प्रति जो करुणा है वो स्पष्ट रूप से छलक आती है। ठाकुर बाद में कहते भी हैं कि इसने जितना मुझे त्रास दिया उतनी ही उसने मेरी सेवा भी की है। या तो फिर उसने जितनी मेरी सेवा की है उतना ही उसने मुझे त्रास भी दिया है। मैं एक बार गंगा में झापंप लगाने को गया था। गंगा में गिर कर के सुसाइड करने को गया था। इतना वो मुझे टॉर्चर कर रहा था। तो अभी क्या है कि हृदय का था। अभी कि ठाकुर को जितनी सेवा की है ठाकुर खुद जाकर के उसको कहते हैं क्यों तुम यहां पर आए? तुमने तो कहा था ना कि तुम अपने भाव में रहो। मैं अपने भाव में रहता हूं। वैसा तो तुमने मुझे कहा था। तो हृदय उत्तर देकर कहता है कि उस समय थोड़ी ना मुझे पता था कि मैं जो कह रहा हूं इसका इतना दुष्परिणाम आएगा या तो फिर मैं आपको मिस करूंगा इतना तो जो भी है तो यह तो एक हमको पता है कि ठाकुर के हृदय में उसके भांजे उनके भांजे हृदय के प्रति करुणा तो थी किंतु हृदय ने ठाकुर को इतना कष्ट भी दिया था। तो एक दिन ठाकुर यह बात मास्टर महाशय को कहते हैं कि देखो कि एक समय था कि हृदय मुझे इतना मेरे पर अत्याचार कर रहा था कि मैंने सोचा कि मैं काशी चला जाऊंगा। अभी यहां पर नहीं रहना। तो अभी काशी जाना है। अब ठाकुर तो वैसे पता है ना मां के ऊपर में पूरा भरोसा करके रहने वाले हैं। प्लान करना, स्कीम करना या तो फिर स्ट्रेटजी बनाना या तो फिर भविष्य का विचार करके एक्शन लेना यह सब बेचारे ठाकुर से कहां होने वाला है और काशी जाना तो कोई इतना सहज तो नहीं है। तो फिर भी ठाकुर ने सोचना शुरू किया कि अच्छा मैं यदि काशी जाता हूं तो मुझे साथ में क्या-क्या ले जाना चाहिए? तो उन्होंने सोचा कपड़े मुझे लेने पड़ेंगे। एक कपड़े एक जोड़ी कपड़ों से तो होगा नहीं। एक गमछा चाहिए पहनने के लिए दो-तीन धोती चाहिए वगैरह-वगैरह। तो ठाकुर ने कहा कि हां मैंने सोचा कि मैं कपड़े लूंगा। फिर पैसा भी चाहिए। मुफ्त में थोड़ी ना आपको काशी जाने को मिलेगा। खाना खाना है तो सब समय तो भिक्षा मिलेगी नहीं। काशी तक लंबा चलना वह भी तो शायद ठाकुर से संभव नहीं। तो कोई ट्रांसपोर्ट में, ट्रेन में कहां पर बैठना होगा तो पैसे भी चाहिए। तो ठाकुर कहते हैं कि जहां तक कपड़ों का मैंने सोचा मैंने ठीक किया कि हां मैं कपड़ों का तो एक बंडल बांध दूंगा किंतु पैसा मैं साथ में कैसे लूं? पैसों का तो मैंने संपूर्ण रूप से त्याग किया है। वही जो फेमस घटना कि टाका माटी माटी टाका यह पैसा मिट्टी है। मिट्टी पैसा है। ऐसा बोलकर के पैसों को उन्होंने गंगा में डाल दिया था। जैसे कि पैसों के ऊपर में संपूर्ण रूप से वैराग्य प्रकट हो। तो ऐसा करने के बाद में हमको यह भी बहुत सारी कहानियां है। ठाकुर कहते हैं मैं पैसों को स्पर्श भी नहीं कर पाता। बोल के जब ठाकुर ऐसा कहते हैं तो नरेंद्र ने भविष्य के विवेकानंद ने यह टेस्ट करने के लिए ठाकुर के बेड के नीचे बिस्तर के नीचे एक सिक्का रख दिया। देखा कि ठाकुर सही में यदि पैसों को नहीं स्पर्श कर सकते तो उनको सिक्के पर बैठने दीजिए। बिस्तर पे देखते हैं कि वह ठीक सही बोल रहे हैं कि गप लगा रहा है। तो जैसे ही ठाकुर अपने बिस्तर पर बैठने को गए फटाक करके खड़े हो गए। जैसे कि उन्होंने किसी बिच्छू ने काट लिया हो तो खड़े हो गए और फिर यह बिस्तर टेस्ट करके पता चला उसको जैसे ही उठाया कि नीचे में एक सिक्का पड़ा था। तो नरेंद्र तो उस समय कुछ बोला नहीं किंतु ठाकुर समझ गए कि उसी ने यह टेस्ट किया है मेरा। तो यह है ठाकुर। तो ठाकुर कहते हैं कि इतना तो मैंने सोच लिया कि मैं कपड़े लेकर के साथ में जाऊंगा। किंतु जैसे ही यह सोचा कि पैसा भी तो चाहिए साथ में पैसा भी लेकर जाना पड़ेगा। तब मुझे लगा कि अरे नहीं पैसा तो मैं छू नहीं पाऊंगा। पैसा तो मैं साथ में ले जा नहीं पाऊंगा। बोल कर के ठीक है। चलो काशी जाने का प्रोग्राम वहीं पर कैंसिल हुआ। तो देखिए कि यह है ठाकुर कि काम और कांचन दोनों के प्रति संपूर्ण रूप से निष्प्रूह

सम्पूर्ण ब्रह्मचर्य: स्वामी विवेकानन्द की विश्व धर्म परिषद में सफलता का असली रहस्य

तो स्वामी जी का भी ऐसा है स्वामी जी के बारे में वैसे तो बहुत सारी कहानियां प्रसिद्ध है कि कितना उनका त्याग और उनका संयम था। एक कहानी है। देखिए कि स्वामी जी जब भारत में भ्रमण करके परिव्राजक के रूप में जब अमेरिका गए तो उस समय वो अपनी शक्ति के सर्वोच्च शिखर पर विराजमान थे। उनकी ये जो स्पिरिचुअल जो फोर्स थी इट हैड मैनिफेस्टेड इटसेल्फ टू इट्स फुलेस्ट। उनकी ये जो स्पिरिचुअल शक्ति संपूर्ण रूप से विकसित हुई थी। उस समय 1893 की यह बात है। स्वामी जी ने अमेरिका में जो मैसेज दिया वही कुछ अल्प वर्षों में अल्प कुछ समय के दरमियान 1893 से प्रारंभ करें तो फर्स्ट विजिट का अंत आया था 1896 में। मुश्किल से 3 साल का 4 साल का यह पीरियड रहा होगा। और उसके बाद में डेढ़ साल के लिए दूसरी बार गए थे। तो यह प्रथम विजिट और सेकंड विजिट इन दोनों के दरमियान स्वामी जी ने अपनी संपूर्ण आध्यात्मिक शक्ति जैसे कि अमेरिका में खर्च कर दी थी। और जब स्वामी जी भारत लौटे थे फर्स्ट टाइम तब यह सच्चिदानंद जी थे एक साधु अपने बेलूर मठ में सब लोग उनको बूढ़ो बाबा करके पुकारते थे। तो यह बूढ़ो बाबा ने एक बार स्वामी जी को कहा कि आप तो महादेव स्वयं है। आपके पास में तो निर्विकल्प समाधि स्पर्श मात्र से निर्विकल्प समाधि करवा देने की शक्ति है। तो आप मुझे निर्विकल्प समाधि करवाइए। तब स्वामी जी ने उनको कहा कि अरे मैंने अमेरिका जाकर के मेरे पास में जितनी आध्यात्मिक शक्ति थी सब खर्च हो गई। अभी मेरे पास कुछ नहीं बचा है। यदि फिर से मुझे वह शक्ति चाहिए तो फिर से मुझे कोपिन पहन करके तपस्या करनी होगी। तो यह स्वामी जी ने उस समय कहा था। अभी देखिए इसका अर्थ यह नहीं है आध्यात्मिक शक्ति का खर्च हो जाना और आध्यात्मिकता होना। ऐसा नहीं है कि स्वामी जी आध्यात्मिक होने का बंद हो गए थे। उनकी जो सिद्धि है निर्विकल्प समाधि उनकी खुद की उनके भीतर का खुद का जो त्याग वैराग्य का प्रवाह उनके भीतर की यह जो ईश्वर दर्शन सतत ईश्वर दर्शन जो होते रहते हैं उससे यह जो शांति और प्रशांति बनी रहती है वह सब नहीं चली गई। वह तो वैसी की वैसी ही है। किंतु उसका जो एक्सटर्नल मैनिफेस्टेशन है वह धीरे-धीरे करके कम हो गया था। तो उस समय देखिए कि प्रथम और द्वितीय दोनों जो स्वामी जी की विजिट है वो पूरी हो गई थी और 1900 की साल की बात है 1900 यह जो कैलिफोर्निया में अपना फाइनल मैसेज देकर के स्वामी जी गए थे कैमप टेलर तो वहां पे स्वामी जी उस समय कुछ विदेशी महिलाएं लेडी डिवोटीज उनके साथ में थी उस समय स्वामी जी उनको कहते हैं कि देखिए आप सबको आपको लगता होगा कि मैं जब वर्ल्ड पार्लियामेंट ऑफ रिलीजन में यह कहा कि सिस्टर्स एंड ब्रदर्स ऑफ अमेरिका और इतने हजारों हजारों का ऑडियंस एक साथ में खड़े होकर के मुझे स्टैंडिंग ओवेशन दिया। एक माने एक साथ सब ने जिस तरह से मेरा स्वागत किया मुझे बधाई दी तो आपको लगेगा कि मेरे पास में क्या कोई मिरेकुलस पावर है क्या? मेरे पास में क्या कोई मैजिकल पावर है क्या? तो स्वामी जी जब ऐसा कहते हैं तो वो तो लेडी डिवोटीज तो वो तो बेचारी वही सोचेगी कि हां ऐसा तो कुछ होना ही चाहिए। अदरवाइज यह इतना अमेरिका में क्या है ना कि इजीली आपको इतना रिकॉग्निशन तो मिलेगा नहीं। वो मजूमदार फजूमदार वहां पे हर साल जाते थे। वे लोग सोचते थे कि हम अमेरिका हमने जय कर लिया है। किंतु जब स्वामी जी की प्रसिद्धि देखी तब वह बेचारे को उनको समझ में आया कि असली प्रसिद्धि किसको कहते हैं? असली पॉपुलैरिटी किसको कहते हैं? और तब से लेकर के वे लोग स्वामी जी के विरोधी हो गए थे। स्वामी जी की निंदा हर जगह किया करते थे। तो वो जो रियल पॉपुलैरिटी है, रियल रिकॉग्निशन है, वह एक इंस्टेंट में किसी को मिल जाना वो भी अमेरिका में। यह तो कोई सहज बात नहीं है। आप मेरे जैसे हजारों लोग वहां पर जाकर के हजारों प्रवचन दे देंगे। किंतु थोड़ी ना हमको इस तरह की प्रसिद्धि मिलने वाली है। तो स्वामी जी कहते हैं कि आपको लगेगा कि मेरे पास में कोई मैजिकल पावर है या इस तरह की शक्ति है। तो वे लोग सोचते हैं लेडी डिवोटी जो इस मैसेज ये रेमिनेशंस कहती है वो कहती है कि हां हो सकता है कि ऐसा कुछ हो। तो स्वामी जी ने कहा कि देखिए कि मेरे पास में सही में इस तरह की एक शक्ति है और यह शक्ति है। स्वामी जी खुद अपने शब्दों में कहते हैं कि यू मे वंडर दैट व्हाट मेड देम डू दिस। यू मे वंडर इफ आई हैड सम स्ट्रेंज पावर। आप सोचेंगे आपको आप आपको यह बात से आश्चर्य होगा कि इन लोगों को हजारों लोगों को एक साथ में स्टैंडिंग ओवेशन किस तरह से दिया। आप आप सोचते होंगे कि मेरे पास में क्या कोई विचित्र शक्तियां है? लेट मी टेल यू। मुझे आपको कहने दो दैट आई डिड हैव ए पावर। मेरे पास में सही में इस तरह की शक्ति है। एंड दिस इज इट। और यह शक्ति यह है। क्या है? नेवर वंस इन माय लाइफ डिड आई अलव मायसेल्फ टू हैव इवन वन सेक्सुअल थॉट। मेरे संपूर्ण जीवन में एक बार भी मैंने अपने मन में काम का एक विचार भी उठने नहीं दिया। नेवर वंस इन माय लाइफ डिड आई अलव मायसेल्फ टू हैव इवन वन सेक्सुअल थॉट। पूरे जीवन में एक विचार भी काम का मेरे मन में मैंने उदित नहीं होने दिया। आई ट्रेंड माय माइंड माय थिंकिंग एंड द पावर्स दैट मेट यूजुअली यूज अलोंग दैट लाइन आई पुट इनू अ हायर चैनल। मैंने अपने मन को तैयार किया। मैंने अपने विचारों को सक्षम बनाया। ट्रेन किया और यूजुअली जनरली जो पुरुष लोग अपनी शक्ति को इस लाइन में जो गवाते हैं अपनी शक्तियों को इस तरह से जो गवाते हैं उसी शक्तियों को मैंने एक हायर चैनल में प्रवाहित किया एक हायर चैनल में फ्लो किया एंड इट डेवलप्ड अ फोर्स सो स्ट्रांग दैट नथिंग कुड रेजिस्ट इट। और इसने मेरे मन में एक इस तरह की प्रचंड शक्ति को उदय किया, उदित किया कि इस शक्ति को कोई भी नहीं रोक सकता। देखिए कितना पावरफुल स्टेटमेंट है। एक बार भी स्वामी जी कहते हैं कि मैंने अपने मन के भीतर में वाणी या वर्तन के भीतर में किसी भी तरह के काम या वासना के विचारों को उदित नहीं होने दिया। उम राइज नहीं होने दिया और इसकी वजह से जो आम लोग जो है जो कि अपनी शक्तियों को गवाते हैं अपनी शक्तियों का व्यय करते हैं उसी शक्ति को मैंने एक हायर चैनल में डायरेक्ट किया और इसकी वजह से आज मेरे पास में एक इस तरह की फोर्स खड़ी हुई है जिसको कि कोई भी रेजिस्ट नहीं कर सकता। स्वामी जी अपने मुंह से यह बात हमको बताते हैं।

स्वामी विवेकानन्द किस तरह ब्रह्मचर्य-पालन में सिद्ध हुए

देखिए कि मनुष्य का जो मन है ऐसा नहीं है कि आप 100% इसको कंट्रोल कर पाएंगे। बात यह है कि आपके मन में इस तरह का संदेह भी यदि प्रकट हो कि हां मेरे मन में इस तरह का कोई विचार प्रवेश कर रहा है तो आप इमीडिएटली काउंटर स्टेप ले सकते हैं। इसी को सही में सिद्धि कहते हैं। ठाकुर की खुद की बात हमको पता है। उन्होंने पंचवटी के नीचे में वह बैठे थे। एकाएक उनको लगा कि काम वासना का कोई विचार उनके मन में आने का प्रारंभ होगा या हो रहा है। साथ-साथ में ही ठाकुर ने रोते-रोते मां को पुकार करके कहा मां काली को कि मां मेरे मन में इस तरह का एक भी विचार आएगा तो मैं अपने गले में चाकू मार दूंगा। तो क्या है कि विचार ना आए यह तो शायद संभव नहीं किंतु विचार आने से उसके जो काउंटर मेजर्स जो होते हैं उसको रेजिस्ट करने की जो कैपेसिटी होती है यह ठाकुर और स्वामी जी में 100% ही स्वामी जी की ही एक इंटरेस्टिंग कहानी है। जैसे वर्ल्ड पार्लियामेंट ऑफ रिलीजन थी शिकागो में वैसे ही पेरिस में एक एक्सपोजिशन था। पेरी प्रदर्शनी बांग्ला में वो पेरी प्रदर्शनी बोलकर के एक आर्टिकल भी है। तो वो पेरिस में था एक एक्सपोजिशन तो स्वामी जी वहां पर गए थे। तो एक दिन की घटना है कि स्वामी जी वहां पर मेले में टहल रहे होंगे। एकाएक उन्होंने एक बड़ी ही सुंदर युवती को देखा। तो अब जैसे कि ह्यूमन माइंड जिस तरह से कार्य करता है ब्यूटी जो होती है सौंदर्य जो होता है किसी भी फॉर्म में हो चाहे प्राकृतिक सौंदर्य या तो फिर किसी इंसान का सौंदर्य मनुष्य का सौंदर्य तो उसको देखने की क्यूरियोसिटी तो मन में प्रकट होती ही है। तो स्वामी जी के मन में भी ऐसा हुआ। वैसे आगे जा रहे थे। उनकी नजर के सामने से एक वही वह सुंदरी लड़की पसार हुई। तो स्वामी जी ने सोचा कि क्यों नहीं यह उसका सौंदर्य इतना मतलब इट इज सो एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी कि फिर से उसको देखा जाए। तो जैसे ही स्वामी जी ने उसकी ओर अपनी नजर घुमाई देखा कि उसका चेहरा एक बंदरिया में परिणत हो गया है। तो देखिए कि व्हिच इज वेरी सरप्राइजिंग कि आप यदि मनुष्य के भीतर में ब्यूटी खोजना चाहते हैं तो पता चलेगा कि यह जो ब्यूटी है वो ट्रांजिटरी है। वो आज आपका युवावस्था है तो कल वृद्धावस्था हो जाएगी। आज आपका जो चेहरा इतना चमक रहा है, कल है जो संपूर्ण रूप से मलिन हो जाएगा। तो यह ट्रांजिटरीनेस जो है वह जो पूरा इवोल्यूशन है बंदर में से मनुष्य होना या तो फिर उसका डिववोल्यूशन है मनुष्य में से बंदर होना यह तो हमको पता है कि यह पूरा इवोल्यूशन एक ट्रांजिटरी फेज है। यह पूरा इवोल्यूशन चलता ही रहता है। आपके संस्कारों के अनुसार आपके कर्मों के अनुसार आप बंदर में मनुष्य बंदर में से मनुष्य भी होंगे और या तो मनुष्य में से बंदर भी हो जाएंगे। किंतु यूजुअली इस सब घटनावली को लाखों लाखों साल लगते हैं। स्वामी जी की नजर में यह लाखों साल का जो इवोल्यूशन है वो पलक झपकते ही वह उनकी नजर के सामने से पसार हो गया और जैसे ही सुंदरी लड़की के सामने दूसरी बार देखा तो उसकी जगह उनको एक बंदरिया दिखी। यानी कि देखिए कि भीतर से उन्होंने यह जो एंटीबॉडीज अभी यह मैं दूसरे अर्थ में बता रहा हूं। एंटीबॉडीज तपस्या करके जो बनती है वह एंटीबॉडीज बनती है वह आपके भीतर में उसी काम कांचन के वायरस प्रवेश करवा करके दैट इज अनदर मैटर किंतु तपस्या करके भी आप एंटीबॉडीज प्रकट कर सकते हैं और वह जो भीतर में जो रेजिस्टेंस था पवित्रता थी भीतर में जो ब्रह्म ज्ञान था वह स्वामी जी को गलती करके भी गलती नहीं करने देगा। ठाकुर कहते हैं ना परमहंस पा कखोनो बेचाले पड़ेना अर्थात कि परमहंस गलती करके भी गलती नहीं कर पाएगा उसके भीतर में ब्रह्म ज्ञान जो है इतना संपूर्ण रूप से प्रतिष्ठित है। एक दिन की घटना है। अमेरिका की ही बात है। मिसेज फंकी स्वामी जी की एक लेडी डिसाइपल थी। वह इस घटना का वर्णन कर रही है। एक दिन स्वामी जी मां सीता के चरित्र के बारे में बात कर रहे हैं। कहानी बता रहे हैं। और यह मिसेज फंकी खुद कहती है अभी क्या अमेरिकन लोगों को तो मां सीता के बारे में ऐसा कुछ आईडिया होता नहीं है। उनको तो पता भी नहीं है कि मां का चरित्र, मां की पवित्रता, मां का जो एक आध्यात्मिक उपलब्धि है वह किस लेवल का है। किंतु हम हिंदू लोगों को क्या है? बचपन से ही यह सब कहानियां पढ़ते आ रहे हैं। तो मां सीता का जैसे ही नाम उल्लेख करेंगे वैसे ही वह पवित्रता स्वरूपिणी तपस्यामई यह जो मां है उनका जो स्वरूप हमारी नजर के सामने प्रकट हो जाएगा। किंतु विदेशी लोगों के मन में तो ऐसा कुछ होता नहीं है। प्री जो प्री ट्रेनिंग आजकल वो जो एआई को करते हैं ना प्री ट्रेन तो ऐसा प्री ट्रेनिंग तो उनका होता नहीं है। उनके लिए जरूरी है पोस्ट ट्रेनिंग। तो ये स्वामी जी पोस्ट ट्रेनिंग करते-करते मां सीता का चरित्र उनको कह रहे हैं। और मिसेज फंकी लिखती है कि स्वामी जी की कहानी कहने की जो स्टाइल है वो इतनी अद्भुत है। आप जैसे कि उस कहानी में डूब जाएंगे। आप उस कहानी में एकाकार हो जाएंगे। जिनका चरित्र वर्णन स्वामी जी कर रहे हैं। वो चरित्र जैसे कि अपनी नजरों के सामने जीवंत होकर के प्रकट होगा। मां का मां की पवित्रता मां की तपस्या मां का ये जो अपने प्रति पति के प्रति भगवान राम के प्रति जो समर्पण है भगवान राम के प्रति उनकी श्रद्धा है सब कुछ इतना सुंदर रूप से व्यक्त कर रहे हैं कि जैसे कि मेरा मन मां सीता के चरित्र के भीतर में डूब गया। किंतु साथ-साथ में ही मेरे मन में एक बात प्रकट हुई कि यह हिंदू संस्कृति है या हिंदू सभ्यता है उसमें यदि यह आदर्श है मां सीता का पवित्रता मई मां सीता का तो पश्चिम में जो स्त्रियों का आदर्श है सौंदर्य का जो आदर्श है एक एक पुरुष को प्रलोभित करने का पुरुष को प्रलोभित कैसे किया जाए वो जो सब स्किल जो होती है। कुछ-कुछ सुंदरी महिलाओं में इस तरह से होती है कि उनके प्रलोभन के सामने यह बड़े-बड़े जो किंग या प्रिंस या एपरर जो होते हैं वे लोग भी उनके सामने हार जाते हैं। तो यह मिसेस फंकी ऐसा अपने मन में सोच रही है कि कहां यह हिंदुओं का यह आदर्श और कहां यह पश्चिम में एक इस तरह का एक कल्चर डेवलप हुआ है कि सौंदर्य और प्रलोभन यह दोनों हाथ साथ-साथ में जाता है और पुरुषों को लुभाता है। तो अब जैसे क्या है ना कि हम लोग जो इंडियन लोग हैं अपने मन में जो विचार आता है बहुत सारे विचार अपने मन में ही रखते हैं। तो सबके सामने उसको प्रगटित नहीं करते। किंतु विदेशियों का खास करके अमेरिकनों का उनका ऐसा है कि कोई भी विचार आने से वे लोग प्रकट कर देते हैं। तो साथ-साथ में ही मिसेज फंकी ने स्वामी जी को पूछा कि स्वामी जी आप तो इस तरह की संस्कृति से संस्कृति से आए हैं। इस तरह की सभ्यता से आए हैं और इस तरह का आपका खुद का जीवन चरित्र है। किंतु आपके सामने यह जो वेस्टर्न सोसाइटी की इस तरह की महिलाएं जो कि लोगों पुरुषों को प्रलोभित करने में माहिर है। इस तरह की कोई महिला आपके सामने आकर खड़ी हो जाएगी तो आप किस तरह से बिहेव करेंगे? तो अब जैसे उसने पूछा तो सही किंतु साथ-साथ में वह लिखती भी है कि मेरे पूछने से कुछ गलती तो नहीं हो गई तो स्वामी जी कहीं नाराज वगैरह तो नहीं हो जाएंगे। तो किंतु स्वामी जी एकदम शांत रूप से जो उत्तर देते हैं क्या कहते हैं? इफ द मोस्ट ब्यूटीफुल वुमन इन द वर्ल्ड वेयर टू लुक एट मी इन एन इमोडेस्ट और अनवुमनली वे शी वुड इमीडिएटली टर्न इंटू अ हिडियस ग्रीन फ्रॉग एंड वन डज नॉट ऑफकोर्स एडमायर फ्रॉग्स। यदि इस जगत की सबसे सुंदरी स्त्री यदि मेरे सामने प्रलोभन लेकर के आए या तो फिर मेरे सामने एक इस कामुक दृष्टि से देखे तो मेरी नजर में उसका सौंदर्य है वो एक कुरूप एक ग्रीन कलर के फ्रॉग फ्रॉग अर्थात कि मेंढक वो मेंढक के रूप में वह परिणत हो जाएगी वो सुंदरी स्त्री और ऑफकोर्स एक कोई भी पुरुष एक मेंढक को तो प्रेम नहीं करने वाला है। तो देखिए कि स्वामी जी स्पष्ट रूप से कहते हैं कि उनके भीतर का जो ब्रह्म ज्ञान है वो उनको इस तरह से प्रोटेक्ट करता है। यहां पर तो स्वामी जी ने सिर्फ शब्दों में ऐसा कहा है। किंतु वो जो पेरिस एक्सपोजशन जो था उसकी कहानी में तो हमने देखा कि लिटरली ऐसा होता है। सिर्फ यह बातों की बातें नहीं है। स्वामी जी को सुंदरी स्त्री का चेहरा या तो एक मेंढक के रूप में या तो एक बंदरिया के रूप में ही दिखता है। यह तो एक कहानी दो है। साथ में ही एक तीसरी कहानी है। अभी फर्स्ट यह डिस्क्लोज़र कि यह कहानी मैंने पढ़ी है। यह तो मुझे पक्का पता है। किंतु मैं इसका रेफरेंस खोजने का प्रयास कर रहा था। तो मुझे यह रेफरेंस मिला नहीं। तो व्हाटएवर वि दिस डिस्क्लोज़र मैं यह कहानी कहता हूं। कि स्वामी जी को एक दिन स्वप्न आया। सपने में उन्होंने देखा कि एक स्त्री घूंघट लगा के बैठी हुई है। उसको देखकर के ही ऐसा लगेगा कि वह बड़ी ही रूपवती है। किंतु ऑफ कोर्स चेहरे पर घूंघट डाला हुआ है। तो स्वामी जी ने सोचा कि उसका घूंघट उठा के देखना चाहिए कि कितनी सौंदर्य वो है। उसका सौंदर्य कैसा है। बोल के सपने की बात है। स्वामी जी ये पूरा सपने का ही बात बता रहे हैं। तो जैसे ही उन्होंने घूंघट उठाकर देखा ना कि सच एंबरेसमेंट देखा कि ठाकुर बैठे हुए हैं वहां पे [हंसी] घूंघट के भीतर में तो मतलब क्या है कि देखिए कि ठाकुर और स्वामी जी का ब्रह्म ज्ञान यह दोनों स्वामी जी को कैसे प्रोटेक्ट करते हैं। किंतु यह बात फिर से मैं डिस्क्लोज कर देता हूं कि यह कहानी का सोर्स मुझे मिला नहीं। बहुत पहले पढ़ी थी मैंने। सो विद दिस देखिए कि यह है कि आप यदि आध्यात्मिक जीवन में आगे बढ़ना जाएंगे आध्यात्मिक जीवन में प्रगति करेंगे तो आपको अपना विल पावर जो है यह जो साइक्लोन है कामना वासना का उसके सामने टिकने के लिए आपके विल पावर को बहुत ही प्रचंड रूप से मजबूत बनाना होगा। स्ट्रेंथन करना होगा। और यदि ठाकुर की कृपा से ना कि ईश्वर की कृपा से आपको एक सिद्धि प्राप्त हो जाती है आध्यात्मिक जगत में तो यह सिद्धि या आपकी तपस्या ही आपके बॉडी के भीतर में इस तरह के एंटीडोट एंटीबॉडीज प्रकट करेगी। इस तरह का एक रेजिस्टेंस खड़ा करेगी। अपनी इम्यून सिस्टम को इस तरह से स्ट्रेंथन करेगी कि यदि अपने मन के भीतर में इस तरह के विचार प्रवेश भी करें तो ऑटोमेटिकली इसके सामने एक बैरियर आकर के खड़ी हो जाएगी। तो यह तो स्वामी जी के बारे में राजा महाराज के

धन के प्रति स्पृहा के त्याग की कहानी : स्वामी ब्रह्मानन्द, श्रीरामकृष्ण, और माँ सारदा

बारे में एक सुंदर कहानी है कि धन के बारे में ही कांचन कांचन त्याग के बारे में दो कहानियां है। सर्वप्रथम तो एक बार राजा महाराज को यानी कि स्वामी ब्रह्मानंद जी को ठाकुर के रहते-रते की ही बात है। रास्ते में एक सिक्का गिरा हुआ दिखा। पड़ा हुआ दिखा। तो राजा महाराज ने सोचा कि यह सिक्का पड़ा है तो पड़ा है तो वहां पर वह वेस्ट हो जा रहा है तो उन्होंने सिक्के को उठाया और एक भिखारी कहां पर बैठा था तो भिखारी को यह सिक्का दे दिया और फिर वह दक्षिणेश्वर आकर के ठाकुर को बता रहे हैं कि इस तरह से रास्ते में गिरा सिक्का मैंने किसी भिखारी को दिया तो ठाकुर नाराज होकर के बोलते हैं कि तुमको मछली नहीं खाना है तो तुम फिर मछली बाजार में गए क्यों तुमको यदि पैसे का कोई प्रयोजन नहीं है तो उसको उठाकर के भिखारी को दिया ही क्यों? यह पैसे को उठाना, पैसे को गिनना, पैसे को नजर के सामने लाना, यह सब चीजों से ही तो प्रलोभन खड़ा होता है। मां के बारे में है कि जयराम भाटी में मां के लिए मनी ऑर्डर आता था। या तो फिर शरद महाराज भेजेंगे पैसा ना कि कोई डिवोटी पैसा भेजेंगे। तो मनी ऑर्डर का जैसे होता है वह जो पोस्टमैन जो होता है टपाली वह लेके आएगा मनी ऑर्डर। फिर वह मां को साइन करनी होती है। फिर साइन करके वह पैसा रिसीव करेगी और फिर पैसे को अपने वो जहां पे भी वह बॉक्स सेफ है वहां पर रखेगी। अभी मां का नियम ऐसा था कि पैसा जब मिलता है हमको पोस्टमैन के पास में से तो उसको गिनना नहीं है। तो नेचुरली है कि यह जो त्यागी संतान थे मां के वहां पे वे लोग तो प्रोटेस्ट करेंगे ही कि मां यदि यह ₹10 का मनी ऑर्डर आया है तो हमको तो यह गिनना तो होगा ना कि यह ₹10 हमने रिसीव किया है। यह जो पोस्टमैन है वैसे तो ₹10 ही देगा। इतना तो गवर्नमेंट एफिशिएंसी था ब्रिटिश राज का किंतु हो सकता है कि गलती से कम हो जाए गलती से ज्यादा भी हो जा सकता है तो वो तो मॉनिटरी ट्रांजैक्शन जो होता है वो तो बड़ा ही क्लियर होना चाहिए स्वामी जी तो बेलूर मठ चालू करके गए उसमें जो सब नियम बनाए हैं पैसों का अकाउंटिंग है 100% पक्का होना है यह डोनेशन का पैसा है दक्षिणा का पैसा है दान का पैसा है उसमें इधर-उधर हुआ तो अपना पब्लिक क्रेडिबिलिटी खत्म हो जाएगा तो यहां यहां पर जब हम पैसा रिसीव करते हैं तो काउंट तो करना चाहिए ना। तो मां स्पष्ट रूप से कहती है कि देखो बेटा ये पैसे को हाथ में लेना, पैसे को गिनना, पैसे के साथ में कार्य करना, पैसे के सामने देखना इस सब चीजों से ना प्रलोभन प्रकट होता है। उससे जितना दूर रह सको उतना रहो। बिना पैसे के तो चलेगा नहीं। ऑफ कोर्स कुछ भी खरीद करना है तो आपको हाथ में पैसा लेना ही है। सामने दुकानदार को देना ही है। किंतु जितना हो सके उतना मिनिमम उसके साथ में इंटरेक्शन करो। यानी कि मां पैसे गिनने भी नहीं देती थी। जैसे ही वह पोस्टमैन ने पैसा दिया वैसे ही उसको बॉक्स में रख दिया। बस मामला खत्म हो गया। जब तक काम नहीं होता है तो पैसे को बाहर निकालना नहीं है। तो यहां पे भी ठाकुर राजा महाराज को स्पष्ट कहते हैं तुम मछली नहीं खाओगे तो मछली बाजार में गए क्यों? मछली बाजार तभी जाओगे ना कि खरीद करना चाहते हो। वो जो एक मल्लिक कौन सा मलिक था यदु मलिक ना कि उसके घर ठाकुर गए। तो देखा कि सब साहिब लोग जो है बड़े-बड़े धनपति वगैरह लोग आकर के बैठे हुए हैं। और यह भी जो है यदु मलिक ही होगा मोस्ट प्रोबेबबली। तो वह क्या करता है कि सबको पूछता है कि अच्छा यह प्रॉपर्टी है वह कितने की है? यह प्रॉपर्टी मार्केट में बिक रही है कि क्या है? यह जमीन कितने की है? वगैरह-वगैरह जैसे यह होता है ना बिजनेसमैन लोगों का होता है जो वहीवट करते हैं ऐसे सब लोगों का कि वो सब चलाते रहते हैं बाजार में एक वायरल खड़ा वायरल ट्रेंड खड़ा करके रखते हैं। जैसे कि उनका एक रिलेवेंस बना रहे मार्केट में। तो ठाकुर सब देख रहे हैं और हंस रहे हैं। और फिर जब वो बीच-बीच में फिर थोड़ी देर के बाद में ठाकुर कहते हैं तुमको खरीद तो करना नहीं है। फिर भी झूठमुट क्यों सब पूछते रहते हो ये सब कि ये प्रॉपर्टी कितने की है? ये कितने में बेचोगे? कितने में लोगे? यह सब लेना तो है नहीं तुमको। फिर भी क्यों झूठ-मुठ का ये सब भवताल करते रहते हो। तो वो यदुम मलिक सामने हंसता है। देखिए दोनों एक दूसरे को मूर्ख समझ रहे हैं इस अर्थ में कि ठाकुर सोचता है जगत जब माया है तो प्रॉपर्टी लेनी है तो ठीक है भावताल करो लेनी नहीं है तो बीच बिना मतलब का भावताल क्यों कर रहे हो और यदु मलिक सोचता है कि ठाकुर भी इतने मतलब नेव है इतने वो अधर वर्ल्डली है कि उनको समझ में नहीं आता कि ये मार्केट किस तरह से काम करता है हमेशा परसेप्शन जो होता है मार्केट में इट इज मोर पावरफुल देन रियलिटी अभी ये जो अमेरिका की ये बड़ी-बड़ी टेक कंपनीज़ है तो उसमें देखेंगे कि उनका प्रॉफिट और उनका वैल्यू्यूएशन इन दोनों के बीच में कोई कनेक्शन नहीं है। अभी रिसेंटली सेम ओल्टमैन का एक इंटरव्यू चल रहा था तो किसी ने पूछा कि आपका वैल्यू्यूएशन 1 ट्रिलियन के आसपास है किंतु आपका प्रॉफिट तो नहीं कितना 1015 बिलियन के आसपास प्रॉफिट और वैल्यू्यूएशन में कैसे आप कोरिलेशन करवाना चाहते हैं? तो वह सेम व्ट में सामने उत्तर देता है कि आपको यदि अपने शेयर बेचने हैं ना तो मुझे बोलिएगा मैं आपके लिए बायरर्स खरीद करके मैं आपके लिए बायरर्स खड़ा करके रखूंगा आपको दे दूंगा कि कौन परचेस करने वाला है करके तो क्या है कि ये ये एआई का परसेप्शन हो गया है। अभी इसके सामने आपका रेवेन्यू कितना ही हो कितना ना हो किंतु परसेप्शन के बेस पे इनका अभी ट्रिलियन ट्रिलियन डॉलर का वैल्यू्यूएशन चल रहा है। सो यह मार्केट में आपको परसेप्शन खड़ा करना आवश्यक है। तो यहां पर यदुम मलिक सोचता है कि ठाकुर इतने मूर्ख है उनको समझ में नहीं आ रहा है कि मार्केट कैसे काम करता है और ठाकुर सोच रहे हैं कि यह यदुमलिक इस जगत को माया को सत्य मानकर बैठा है। वो भी कितना मूर्ख है। सो दिस इज व्हाट कि ठाकुर का पॉइंट ऑफ व्यू और एक संसारी का पॉइंट ऑफ व्यू। तो यहां पे ठाकुर राजा महाराज को स्पष्ट कहते हैं तुमको मछली बाजार मछली खानी नहीं है। तुम मछली बाजार में क्यों जाओगे? जब पैसा तुमको काम का नहीं है। पैसे को हाथ क्यों लगाओगे? तो अभी हुआ ऐसा कि यह जो बात है राजा महाराज के माइंड में एकदम फिट बैठी हुई है। अभी कुछ सालों के बाद में ठाकुर की महासमाधि के बाद में ही कुसुम सरोवर के किनारे राजा महाराज तपस्या कर रहे हैं। साथ में है हरि महाराज स्वामी तुरानंदा जी दोनों बैठकर के तपस्या कर रहे हैं। तो वहां पर भरतपुर बोल करके एक होगा कोई भी जगह वहां की एक रानी वहां पर आई और रानी ने देखा कि वैसे तो वह तपस्वीयों को साधुओं को मिल रही थी प्रणाम कर रही थी किंतु उसने देखा कि यह दो जो तपस्वी है वे लोग इतने दोनों के भीतर में एक शक्ति ऐसी पड़ी हुई है आध्यात्मिक शक्ति कि वे दोनों बाकी सब तपस्वीयों से कहां फार बेटर लग रहे हैं। तो यह भरतपुर की रानी जो है बड़ी इंप्रेस हो गई और उसने क्या किया राजा महाराज को मिठाई का एक डब्बा उपहार में दिया दक्षिणा में दिया तो ऑफरिंग में तो राजा महाराज ने कहा अच्छा ठीक है चलो मिठाई दी है तो दी है खाएंगे कभी तो यह रानी तो चली गई फिर राजा महाराज को कभी भूख लगी होगी तो मिठाई का डब्बा खोल के मिठाई खाने का प्रयास किया जैसे ही खाने का प्रयास किया पता चला उसके भीतर में एक सोना मोहर रखी है तो अभी देखिए रानी का तो उद्देश्य बड़ा अच्छा है कि यह साधु लोगों की सेवा करनी है और साधुओं को सामने से पैसा वगैरह देंगे तो ये लोग नहीं एक्सेप्ट करेंगे। तो मिठाई के भीतर में सोना मोहर छुपा करके वो निकल गई है। यहां पे राजा महाराज ने जैसे ही देखा मिठाई के भीतर में सोने की ये मोहर पड़ी हुई है। इमीडिएटली उन्होंने मिठाई को रख दिया और तुरियानंद जी को कहा कि हरि भाई देखिए यह रानी ने तो हमको यह सोने की ये सब ये सिक्के दिए हैं। तो हरि महाराज भी टेंशन में आ गए। सोचा कि ये रानी वापस आएगी पूछेगी कि आपको और ज्यादा चाहिए क्या मिठाई? तो हम क्या उत्तर देंगे? बोल कर के उन्होंने उसी रात को कुसुम सरोवर छोड़कर के वहां से निकल गए। देखिए कि नजर के सामने पैसा आ भी गया तो ऐसे डर गए हैं कि तपस्या छोड़कर के कुसुम सरोवर से दोनों निकल गए हैं। तो ये राजा महाराज के मन में यह बात एकदम दृढ़ रूप से बैठ गई है कि पैसा जो है पैसा इस तरह से आध्यात्मिक जीवन में किसी काम का नहीं। ऑब्वियसली कि आपको संघ चलाना है, इंस्टीट्यूशन चलाना है तो बिना पैसे के चलेगा नहीं। किंतु जैसे मां करती थी कि पैसे को हाथ में लेकर के पैसा गिनना, पैसे के सामने देखते रहना, पैसे का मैनेजमेंट करना यह सब जितना कम हो सके उतना हमको करना है। तो आज यहीं तक अभी नेक्स्ट क्लास में। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु।

प्रश्न: यदु मल्लिक और श्रीरामकृष्ण के बारे में

और उसमें भक्ति भी थी। अदरवाइज ठाकुर सामने से क्यों जाते? ठाकुर तो हो कोई हर एरे गरे के घर नहीं जाएंगे ना। उसमें भक्ति होगी बोल के तो ठाकुर जाते थे। तो यह वही यदुम मलिक है कि जिसके घर ठाकुर गए थे तो वो उठकर के उनका सम्मान नहीं किया। तो वह डिवोटी कहते हैं उसके घर क्यों जाना है? ठाकुर कहते हैं अरे देखो वो भक्त है। वो मां की प्रतिष्ठा की है तो फिर उसका प्रणाम करने के लिए तो जाता हूं ना। दुर्गा पूजा ना कि ऐसा कोई रखा होगा उसने घर में तो मां की प्रतिष्ठा की होगी। मैं तो मां को प्रणाम करने को जा रहा हूं ना। उसको थोड़ी ना प्रणाम करने के लिए जा रहा

प्रश्न: ठाकुर भी बेचारे समझ न पाए कि यादु मल्लीक का लोभ कितनी गहराई तक जाता है — शायद इसी लिए उन्होंने कहा, “भाव-ताल की क्या ज़रूरत है?”

हूं। या तो फिर अगेन ठाकुर का परसेप्शन तो शार्प था ही समझते होंगे। किंतु फिर उनको यह लगता होगा कि देखिए अब जैसे स्वामी जी स्वामी जी ने रतन टाटा को क्या कहा कि आप यह जो लेना बेचना कर रहे हैं ना दैट इज नॉट अ वे फॉरवर्ड भारत के लिए आपको मैन्युफैक्चरिंग करना है। दैट इज अ बेटर वे फॉरवर्ड फॉर अस। तो आज इतने सालों के बाद में देखिए आज चाइना को देखिए तो स्वामी जी की वो जो भविष्यवाणी बिल्कुल ठीक निकली कि जो मैन्युफैक्चर करता है वह सुपर पावर है। इवन अमेरिका आज पिछड़ गया है। वो लोग डिजाइन डिजाइन के मामले में अभी पूरा मैन्युफैक्चरिंग चाइना को आउटसोर्स कर दिया। अभी ये ट्रंप बेचारा मारामारा घूमता है कि मैन्युफैक्चरिंग को कैसे भी करके अमेरिका वापस लाओ। तो ठाकुर का हो सकता है माने इवन डिपर लेवल पे जाके कि इवन फॉर द सेक ऑफ इकोनॉमिक प्रोस्पेरिटी यह सब जो कर रहे हो दो नंबर के धंधे किसी काम के नहीं है।

प्रश्न: मैंने कई अमीर लोगों को देखा है जिनकी धन की लालसा दिन-ब-दिन बढ़ती जाती है।

ये एक गायक है वो दक्षिणेश्वर आया और ठाकुर को प्रश्न करता है काम और कामना में फर्क क्या है? तो ठाकुर ने कहा काम जो है ना वह जड़ है और कामनाएं है ना वह पेड़ की शाखा प्रशाखाएं हैं। एक कामनाएं आप शाखा प्रशाखाएं एक जगह से काटेंगे ना दूसरी जगह से निकलेगी। दूसरी जगह से काटेंगे तो तीसरी जगह से निकलेगी। किंतु जब तक उसकी जड़ है वो तब तक वह कामना वासनाएं फैलती ही रहेगी। तो यह क्या है कि कामना वासना जैसे आपने कहा ना कि फिजिकल एंजॉयमेंट कम हो जाएगा तो यह एक सेकंड डायरेक्शन में यह निकल आएगा कि यह पैसों के बारे में स्टॉक मार्केट के बारे में बातें करना क्यों क्योंकि वो जड़ तो वही है ना काम की वो भूख तो जो है विषयों की वो तो वैसी की वैसी है। तो फिजिकल कंडीशन के अनुसार छोटा बच्चा होगा तो उसको यह खिलौने की कामना है। बड़ा होगा तो पैसों की कामना होगी और थोड़ा बड़ा होगा तो यह परिवार की कामना होगी और थोड़ा सा बड़ा होगा पावर और पोजीशन की कामना होगी। आपके स्टेशन के अनुसार कामनाएं बदलती जाएगी। आपको लगेगा यह खत्म कब होगी? किंतु खत्म नहीं होगी जब तक आप उसको जड़ से नहीं काटेंगे। काम रूपी जो जड़ है उसको आप जब तक धगधबीज नहीं करेंगे तब तक तो यह वन वे और अनदर फैलती ही रहेगी। इवन वृद्ध आदमी भी वह वही ठाकुर की फेमस कहानी कि केशव सेन के एक संबंधी को देखा बूढ़ी उम्र में वह ताश खेल रहा है। बोल रहा है कि मैं बिना काम के बैठ नहीं पा रहा हूं इसलिए मैं ताश खेल रहा हूं। ठाकुर बोलते हैं कहां वो ठाकुर ईश्वर का नाम लेगा ना कि वो ताश खेल रहा है। [हंसी] बस सिर्फ आप ही नहीं हम लोग भी। हा मास्टर महाशय ने इसलिए कहा ना कि सन्यासी और गृहस्थ दोनों के लिए ये है। [हंसी]

प्रश्न: कामना-वासना से मुक्त होने का उत्तम उपाय क्या है? भक्ति और शरणागति या पुरुषार्थ और तपस्या

अब जब जहां तक भक्ति और ज्ञान की बात है या तो परिश्रम या पुरुषार्थ और परमार्थ की बात है। देखिए कि कल ही हमने देखा कि ठाकुर की दीनहीन शरणागत होकर के रहना ठाकुर कहते हां तू मैं क्यों पिंजरे में बद्ध पंखी होने को जाऊंगा। यानी कि ठाकुर की जो शरणागति भी है ना ये वो उर्जिता भक्ति है। है हसे कांधे नाचे गाए माने हंसता है रोता है नाचता है हंसीखुशी मनाता है तो क्या है ना कि दिस फुल ऑफ आत्मश्रद्धा सो दैट इज ठाकुर भक्ति और स्वामी जी का जो ज्ञान है ये ज्ञान गुरु के चरणों पे प्रतिष्ठित है एक बार स्वामी जी मां को कहते हैं कि मां आजकल आर सबकी छु उड़े जा छे आजकल मेरा सब कुछ उड़ जा रहा है तो मां हंसते-हंसते कहती है कि बेटा आमा के उड़िए देवे ना तो बेटा बेटा तुम मुझे मत उड़ा देना। तो स्वामी जी साथ-साथ में ही कहते हैं मां गुरु चरण उले ज्ञान दाणा बे कोथा म गुरु के चरण को उड़ा दूंगा तो यह ज्ञान खड़ा कहां रहेगा? गुरु के चरणों पे ही तो ज्ञान खड़ा रहता है। सो ठाकुर की भक्ति है वो उर्जिता भक्ति और स्वामी जी का जो ज्ञान है गुरु के चरणों में समर्पित ज्ञान। सो शुद्ध भक्ति शुद्ध ज्ञान एक स्वामी जी का वो फेमस कि मैं बाहर से पूरा ज्ञान हूं भीतर से पूरा भक्ति और ठाकुर का उल्टा है। बाहर से पूरा भक्ति भीतर में से पूरा ज्ञान। सो अल्टीमेटली दोनों का संयम मतलब संगम करना ही रामकृष्ण मिशन की साधन पद्धति है। एक्चुअली इंडिया में हुआ क्या? जहां हम कल सूरदास की बात कर रहे थे ना। देखिए इन लोगों का लाइफ और टाइम्स इस तरह के समय में बीता है कि भारत में फिर भी सत और शक्ति था। अ किंतु बात बातबात का खास करके लास्ट टू 300 इयर्स इस तरह से हमारे चरित्र में गिरावट आई है कि भक्ति भी हम जो करना प्रयास करते हैं ना तो आउट ऑफ कॉन्टेक्स्ट और मिस इंटरप्रेटेड यह दोनों हो गया है। अदरवाइज आप उपनिषद युग देखिए ना अपने ऋषि मुनियों में क्या आत्मश्रद्धा थी। अब नचिकेता देखिए कि आत्मश्रद्धा से भरपूर था। ये लोग भक्ति की बात करते तो उनको जचता है। किंतु ये गुलाम भारत जो भी आया हमको लात मार के चला गया। हम लोग मंजीरा बजा के भक्ति की बात करें हमको थोड़ी ना जचेगा। सो दैट आउट ऑफ कॉन्टेक्स्ट मिस इंटरप्रिटेड पूरा हो गया था पिछले दो300 साल में। दैट इज द थिंग वी हैव टू अंडरस्टैंड। बाकी स्वामी जी ने देखिए ना अमेरिका जाकर के वही उपनिषदों के संदेश की ही तो बात की है। सो उस टाइम तो उनको कहीं उसको नंस खड़ा करने की जरूरत नहीं पड़ी क्योंकि वो ऑलरेडी उन लोगों के भीतर में आत्मश्रद्धा है ही है। अभी आप उनको इवन भक्ति योग भी सिखाए तो डज नॉट मैटर। वे लोग ले लेंगे उसको।

प्रश्न: ठाकुर के थूकने के पीछे भी इतनी गहराई है यह जान कर आश्चर्य हुआ

एंड आल्सो नॉट के वो असंस्कृत या असभ्य थे। ऐसा भी नहीं है। [हंसी] वो थे वैसे गाली गलौज करते थे किंतु दे आर लेयर्स ऑफ मीनिंग इन लोगों की लाइफ और कार्यकलाप में लेयर्स ऑफ मीनिंग

प्रश्न: आप तो एडिटर थे. किताबे एडिट करने में कितना nuance रखना पड़ता है!

देखिए नवांस की बात की ना कंप्लीट वर्स की एक बात करता हूं मैं जब एडिट कर रहा था तो वही वो शिकागो लेक्चर्स में ही एक जगह पे स्वामी जी मनी लेंडर की बात करते हैं। तो अभी देखिए नवांस कहां पे आता है कि ज़्यादातर अब मैं एग्जैक्टली डिटेल भूल गया मैंने क्या किस पर्पस किस कौन से सेंटेंस पे ये हुआ है मैं एग्जैक्ट भूल गया वो सेंटेंस किंतु समथिंग लाइक कि एक मनी लेंडर के बारे में ही ऐसा कुछ है। अभी ये वेस्टर्न कल्चर है ना उसमें मनी लेंडर कौन होता है? तो एक ज अब जैसे यहां पे एक बनिया का एक एक हो गया है ना एक आपका बन गया है कि एक बनिया है तो वो ब्याज उधार पे देगा लोगों को ये सरदार जी सरदार जी के बहुत सारे जोक चलते हैं। बनिया के जोक चलते हैं। मद्रासी के जोक चलते हैं। तो क्या है कि एक तरह का एक यह बना दिया गया है इन लोगों को। एक कैरेक्टर खड़ा कर दिया गया है पॉपुलर इमेजिनेशन में। तो वेस्टर्न कंट्रीज में भी इस तरह का एक जू का यहूदी का एक कैरेक्टर है कि वो बड़ा ही जैसे कि ये स्क्रूज है ना चार्ल्स डिकंस की स्टोरी है क्रिसमस के रोल तो उसमें एक स्क्रूज का एक एबेजनर स्क्रूज बोल के एक कैरेक्टर है। बहुत ही कंजूस है। बड़ा धनपति है। किंतु बहुत ही कंजूस है। लोगों से पैसा वो निकालने में लोगों का शोषण करने में बड़ा ही उस माहिर है। तो इस तरह का एक बन गया है कि एक पैसा लोगों से छीनेगा लोग विधवाओं का अनाथों का वह शोषण करेगा। यह एक यहूदी मनी लेंडर है। तो इस मनी लेंडर के बारे में ऐसा कुछ स्वामी जी ने एक स्टेटमेंट दिया है। तो आत्मूपानंद जी जिनके साथ में मैं काम कर रहा था। उन्होंने नीचे में एक फुटनोट लिखा। यह फुटनोट में लिखा कि स्वामी विवेकानंद का हिस्ट्री का नॉलेज इतना अच्छा नहीं है। बोल कर के स्वामी जी ने यहूदी का यह जो एक है मनी लेंडर का इस तरह से एक उन्होंने यूज किया है। किंतु आजकल खास करके ऐसा करके उन्होंने एक कमेंट लिखा फुटनोट लिखा क्योंकि क्या है कि अमेरिका में वेस्टर्न कंट्रीज में यह सब बहुत सेंसिटिविटीज है आजकल कि आप यहूदी को इस तरह से यह मत बनाइए स्केपगोट मत बनाइए। इसको एंटीसेमिटिज्म आजकल कहते हैं। इस्लामोफोबिया, एंटीसेमिटिज्म कि पूरी प्रजाति को आप एक दो लोगों की गलती के लिए आप जिम्मेदार ठहराते हैं। तो ये तो एंटीसेमिटिक कमेंट हो गया। तो उसके कमेंट में ऐसा लिखा आत्मूपानंद जी ने कि स्वामी जी को वेस्टर्न हिस्ट्री का इतना नॉलेज नहीं है बोलकर ट्रॉप बोलते हैं। इंग्लिश में इसको कहते हैं ट्रॉप। यानी कि एक पूरी जा ये सरदार जी। सरदार जी इज अ ट्रॉप। बनिया इज अ ट्रॉप। यह मद्रासी जोक इट्स अ ट्रॉप। तो यह यहूदी का इट्स अ ट्रॉप। तो स्वामी जी डजंट अंडरस्टैंड वेस्टर्न हिस्ट्री। इसलिए उन्होंने यह जुइश ट्रॉप यूज किया है। तो फिर मैंने इस कमेंट के नीचे अपना कमेंट लिखा कि देखिए पहली बात तो है कि स्वामी जी जिस समय और काल में यह बात की है ना उस समय यह जइश ट्रॉप बड़ा इनोसेंट था। ये चार्ल्स डिकंस जैसा इतना फेमस ऑथर भी यह एबेजेनर क्रूज जैसा एक कैरेक्टर लिख सकता है कि एक जइश मनी लेंडर लोगों का शोषण करता है। किंतु यह सब इनोसेंट था। जैसे भारत में सरदार जी जोक्स चलते हैं, मद्रासी जोक्स चलते हैं, बनिया जोक्स चलते हैं। ऐसा एक इनोसेंट यह ट्रॉप था। किंतु सेकंड वर्ल्ड वॉर में जब यह हिटलर ने यहूदियों का मास मर्डर किया, जेनोसाइड किया तब से यह एंटीसेमिटिज्म बहुत ही सेंसिटिव टॉपिक हो गया है। इससे पहले यदि आप कहते कि यहूदी है, मनी लेंडर है, लोगों का शोषण करता है तो लोग हंसते थे। किंतु हिटलर ने इसी ट्रॉप्स का यूज़ करके जुओं का जेनोसाइड करने में यूज़ किया। सिंस दैट डे एंटीसेमिटिज्म हैज़ बिकम वेरी सेंसिटिव टॉपिक। सो यहां पर कमेंट एक्चुअली ऐसा होना चाहिए कि स्वामी जी ने यह ट्रॉप यूज किया है 1895 के आसपास में। जबकि एंटीसेमिटिज्म इतना सेंसिटिव पॉइंट नहीं था। ऐसा आप करके लिखिए। रेदर देन कि आप ऐसा लिखिए कि स्वामी जी को वेस्टर्न हिस्ट्री का अंडरस्टैंडिंग नहीं था। आपको किसको कहते हैं कि वेस्टर्न हिस्ट्री अरे स्वामी जी जैसा वेस्टर्न हिस्ट्री का अंडरस्टैंडिंग और किसी का नहीं होगा। वेस्टर्न का नहीं होगा। तो आप किस हिसाब से आपने ये कमेंट लिख दी? सो दैट इज न्यूस। देखिए ना भारत में आपने सरदार जी के जोक्स आज000 देखने को मिल जाएंगे। किंतु कल कहीं जाके ऐसा हुआ खुदा ना खास्ता कि भारत में जितने भी सरदार जी है सबका मर्डर कर दो। क्यों? क्योंकि सरदार जी बुद्धू है। सरदार जी ये है, सरदार जी वो है। ऐसा करने के बाद में जब आप किसी को सरदार जी जो कहेंगे तो एक एकदम भयानक परिस्थिति खड़ा हो जाएगी। वो सामने अरे ऐसा बात मत करो। हमने तो वैसे ही उन लोगों पे ऐसा अत्याचार किया है। है ना? सो एक इनोसेंट युग होता है और फिर उसको मिसयूज करके आपने पूरा ये जेनोसाइड करवाया तो फिर ये एंटीसेमिटिज्म इतना स्ट्रांग हो गया आजकल अमेरिकन पब्लिकेशन में वे लोग बड़े ही केयरफुल रहते हैं। इस्लामोफोबिक कंटेंट नहीं होनी चाहिए। एंटीसेमेटिक कंटेंट नहीं होनी चाहिए। राइट? सो आपको फुटनोट लिखना है तो लिखिए कि यह क्लियरली एक एंटीसेमेटिक ट्रॉप स्वामी जी ने यूज किया है। बट गिव अ प्रॉपर कॉन्टेक्स्ट रेदर देन सेइंग कि स्वामी जी को समझ में नहीं आता है।

प्रश्न: एक और आप साधुओ को पैसो का त्याग करना है, दूसरी और इतना बड़ा रामकृष्ण मिशन चलाना है जिसके लिए करोडो रुपये चाहिए!

किंतु देखिए यही तुरियानंद जी वो तुरियानंद जी और वह ब्रह्मानंद जी की एक सिक्का मिला भाग गए जब रामकृष्ण मिशन की स्थापना हुई यही तुरियनंद जी गुजरात में पैसा मांगने के लिए गए थे। तो वह जो ठाकुर की कहानी है ना कि वह कौवा है मछली को लेकर के उड़ता है तो जितनी भी यह है वो समी वो सब उसके पीछे में लगती है। जैसे उसने मछली छोड़ दिया वो शांति से रह रहा है। [हंसी] तो ठाकुर ने स्वामी जी ने सबको मछली पकड़ा दी है। अभी जस्ट रिसेंटली हमारा ये गवर्निंग कमेट का मीटिंग होता है ना तो उसमें एक डिवोटी मेंबर है। हमारे प्रेसिडेंट है। वो बता रहे हैं वो बड़े धनपति है। करोड़पति है। तो मुझे बोलते हैं कि 100 सेंटर के महंत मुझे फोन करते हैं पैसा मांगने के लिए। अभी रिसेंटली मैसूर के महंत ने फोन किया वहां पर बहुत बड़ा फंक्शन हो रहा है तो आप पैसा दीजिए। तो मैंने उनको 2 लाख दिया। तो अभी देखिए कि 100 सेंटर के महंतों को बेचारे को इस तरह के धनपतियों को फोन करके पूछना पड़ता है। कहना पड़ता है कि अच्छा थोड़ा सा डोनेट कर दीजिए। बहुत सारा खर्चा यहां पे है। [हंसी] वो बेचारी दो-ती साल आगे आ गई। वो सब बाद में आना था। वो बोलेंगे अभी भूख लगी है फिर से मिठाई को और एक डब्बा दे दीजिए ना किंतु देखिए कि ये साधना करके ना अब जैसे देखिए ठाकुर के बारे में लोग कहते ब्रह्म समाज वाले ठाकुर के बारे में क्या कहते हैं पता है कि परमहंस महाशय के बारे के पास में ना फैकल्टी ऑफ़ ऑर्गेनाइजेशन नहीं है। उन्होंने तो साधना तपस्या ही कर दी है। वो शंभू मलिक को जाके यही कहा है कि लेबेच की बात क्यों करते हो? अर्थात कि उनको ऑर्गेनाइजेशन के बारे में कुछ नहीं पता। किंतु आप देखिए आफ्टर 150 इयर्स और समथिंग कि ब्राह्म समाज का नाम सिर्फ इसीलिए है क्योंकि रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य में उसको उल्लेख किया गया है। अदर देन दैट कोई अस्तित्व नहीं। तो आप यदि तपस्या करेंगे ना तो एवरीथिंग एल्स विल कम। मास्टर महाशय एक कथामृत में ही ये लिखते हैं फनी इंसिडेंट। ठाकुर कहते हैं कि कहां गए थे दुर्गा पूजा की छुट्टी में। तो मास्टर महाशय कहते हैं केशव सेन के वहां पर गया था और केशव ने बहुत ही चमत्कार दुर्गा पूजा की व्याख्या की तो ठाकुर कहते हैं क्या व्याख्या की तो मास्टर महाशय कहते हैं केशव कहता है कि यदि मां दुर्गा को हृदय में स्थापित करोगे तो लक्ष्मी सरस्वती ये जया विजय लक्ष्मी सरस्वती गणेश और कार्तिकेय सब लोग आकर के मां दुर्गा के साथ में आ जाएंगे यानी कि श्री विजय धन विद्या सब आएंगे मां दुर्गा के साथ-साथ में सो व्हिच इज वेरी गुड एक्चुअली कि यदि आप साधना करेंगे तो श्री है, विजय है, विद्या है, सरस्वती धन है, सब आएगा। तो मास्टर ठाकुर ये सब सुन लेते हैं। फिर कहते हैं कि देखो तुम एक काम करो इधर-उधर जाना नहीं सिर्फ यहां पे ही आना। [हंसी] मैं जब पहली बार सुना मैं लगा कि ठाकुर इतने जेलस क्यों है अपने भक्तों के बारे में? किंतु देखिए कि वी हैव टू अंडरस्टैंड। एक तो है कि निष्ठा होनी चाहिए। गुरु भक्ति होनी चाहिए। यह भी हो सकता है कि ठाकुर बताना चाहते हैं। दूसरा कि यदि आप इस इंटेंशन से साधना करेंगे कि मां दुर्गा को मैं बिठाऊंगा तो लक्ष्मी, सरस्वती, श्री विजय सब आ जाएगा। सो दैट इंटेंशन इज रॉन्ग। कि निस्वार्थ होकर के मां दुर्गा को हृदय में बिठाना है। बाकी आए ना आए वो आपके वो फिर भगवान की इच्छा और इनफ उदाहरण है भारतीय धार्मिक साहित्य में कि धर्म के नाम पर जो लोग आगे बढ़े हैं इतना बेचारों को कष्ट सहन करना पड़ा। वो हरिश्चंद्र की कहानी तो फेमस है। फिर ठाकुर खुद यह दो-तीन कहानी कहते हैं कि वो एक कौन सा एक राजा था ना कि क्या था। वह मां भगवती का वरपुत्र था। इसके बावजूद उसको जेल में डाला गया और उसकी छाती पर इतना बड़ा पत्थर रखा गया। तो नॉट नेसेसरी कि आप यह कामना करके आप प्रार्थना करेंगे कि इसके साथ में बाकी सब आए। सो वो प्रार्थना व्यर्थ ही होगी। ओम