प्रार्थना
ओम स्थापकाय धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय रामकृष्णाायते नमः श्री रामकृष्ण कथामृत श्रीमद् द्वारा लिपिबद्ध 14th दिसंबर 1883 मास्टर महाशय दक्षिणेश्वर में रहने के लिए आए हैं और ठाकुर के साथ में रहकर करके जैसे ठाकुर कहते हैं थोड़ी सी साधना करने से गुरु आके आपको बता देंगे कि अभी आगे क्या करना है। ए ए ऐसा करके बता देंगे। तो उसी दिन का यह षष्ठ परिच्छेद है। ठाकुर श्री रामकृष्ण और प्रतिमा पूजा श्री रामकृष्ण और प्रतिमा पूजा व्याकुलता और ईश्वर लाभ व्याकुलता और ईश्वर लाभ
एक बार हम माया को पहचान लें, तो वह भाग जाती है
मणि पंचवटी और कालीबाड़ी अन्नानो स्थाने एकाकी विचरण करते छे मणि अर्थात कि मास्टर महाशय काली मंदिर में और इस काली मंदिर के कैंपस में विभिन्न जगहों पे टहल रहे हैं अकेले-अकेले टहल रहे हैं। ठाकुर बोलिया छे एकू साधन कर ले ईश्वर दर्शन करा जाए। ठाकुर ने कहा है थोड़ा सा साधन भजन करने से ईश्वर के दर्शन प्राप्त कर सकते हैं। मणि की ताई भाभी ते छ तो मणि क्या यही सोच रहे हैं? आर तीव्र वैराग्य कथा और तीव्र वैराग्य की बात आर माया के चिन ले अपनी पा लिए जाए और फिर ठाकुर ने कहा था माया को यदि आप पहचान सकते हैं तो माया अपने से भाग जाएगी जैसे कि कल ठाकुर ने उदाहरण जो दिया था कल यानी ठाकुर के लिए तो एक ही दिन था हमारे लिए कल का दिन ठाकुर ने कहा कि यह हरे बोलकर के एक लड़का है वह बाघ मग का चमड़ी पहन करके वो मास्क पहन करके वो लोगों को डर दिखा रहा है। उसको देखकर के एक आदमी ने उसको पहचान लिया। कहा अरे तुम तो हमारे हरे हो। जैसे ही ऐसा कहा तो यह लड़का वो हंसते-हंसते चला गया और और किसी को डर दिखाने लगा। तो क्या है कि माया जैसे सामने आती है। आप यदि उसका सही स्वरूप पहचान लेंगे तो वह सही में वहां से भाग जाएगी। इसका यदि हम कोई प्रैक्टिकल कोई एप्लीकेशन यदि हम देखना चाहे तो देखिए अब जैसे कि परीक्षा की तैयारी है राइट परीक्षा का डर अभी बाघ का जिस तरह से लोगों को डर लगता है कि अभी मृत्यु भय सामने आ गया है तो हृदय कैसे धक-धक करने लगता है तो वैसे ही दो-तीन बड़े-बड़े डर है हमारे उनको वह यदि सामने आ जाते हैं तो सही में ऐसा लगेगा कि शेर हमको खाने के लिए आया है। एक तो है कि परीक्षा। हम सबको पता है सभी लोग स्कूल में से पसार होकर के आए हैं। यहां पे जैसे ही परीक्षा आती है सामने के दिन या तो फिर जब हम एग्जामिनेशन हॉल में बैठते हैं तो वैसे और जैसे ही पेपर नजर के सामने आया ऐसा लगता है पहली नजर में तो कि इसमें से कुछ भी हमने पढ़ा नहीं है। यह कहां-कहां से यह सब प्रश्न इन लोगों ने कलेक्ट किए हैं। तो वो एक बड़ा माने शेर की नजर के सामने आ जाने जैसा भय है। दूसरा एक सर्जरी का यदि किसी को सर्जरी करवाने का यदि हुआ होगा जीवन में तो पता है कि जिस क्षण हम ये ऑपरेशन थिएटर में जाते हैं तो हृदय में कैसा धग-धग करने लगता है। तो यह सब जीवन में बड़े-बड़े डर है। अभी हम लोग जंगल में तो रहते नहीं है कि रास्ते में जा रहे हो और एकाएक शेर हमारी नजर के सामने आ जाए। किंतु हम यह जो शहर में रहते हैं तो शहर के जो इस तरह के डर है वह कोई जंगल के डर से कम नहीं है। अभी यहां पर जैसे कि हम लोगों को साधुओं को बीच-बीच में स्टेज के ऊपर में से बोलना होता है। तो मैंने किसी किसी को ऐसा कहते हुए सुना है कि हमको बड़ा ही एक्यूट स्टेज फ्राइट है। स्टेज फ्राइट अर्थात कि वैसे तो बहुत कुछ आता है। ठाकुर मास्वामी जी की बहुत सारी बातें कर लेंगे। वैसे ही बैठे होंगे तो गप लगाते लगाते किंतु जैसे ही बोला गया स्टेज के ऊपर में जाकर के बोलो तो जैसे कि मुंह बंद हो जाता है। ठाकुर ने कहा ना कि ब्रह्म ज्ञान क्या है? आध्यात्मिक जीवन की सर्वोच्च अनुभूतियां क्या है? उसको यदि मैं बताने को जाता हूं तो जैसे कि मां मेरा कोई मेरा मुंह दबा के बंद कर देता है ऐसा लग रहा है तो यहां पर भी यदि स्टेज पर जाकर के बोलेंगे कुछ बोलने का कुछ प्रयास करेंगे तो वैसे ही ऐसा डर ज हृदय में बैठ जाता है मतलब हम लोगों की तो बात ही छोड़ दीजिए हम तो सब आम आदमी है स्वामी जी जैसे स्वामी जी का भी हमको पता है कि वर्ल्ड पार्लियामेंट ऑफ रिलीजन में उनको जैसे ही डॉक्टर बेरोज बेरोज बोलने के लिए खड़ा होने के लिए आमंत्रण देते थे कि स्वामी जी नाउ इट इज योर टर्न प्लीज कम एंड एड्रेस द असेंबली तो स्वामी जी ने चार पांच बार उसको मना कर दिया कि अभी नहीं बाद में तो अभी देखिए उनके मन में मन में डर होगा कि संदेह होगा कि संशय होगा कि शायद ठाकुर का आदेश प्राप्त नहीं हुआ होगा और जैसे ही ठाकुर का आदेश प्राप्त हुआ तो फिर बाद में उन्होंने बोलना शुरू किया वी डू नॉट नो किंतु हमारी कमजोरी उनके ऊपर में प्रोजेक्ट करके हम लोग ऐसा सोच सकते हैं कि शायद हो सकता है स्वामी जी को भी स्टेज फ्राइट का अनुभव हुआ होगा मोमेंटरीली उस समय हालांकि पता है ना स्वामी जी ने इस तरह से पब्लिक लेक्चर पहले कहां पर दिया था सबसे पहले वैसे तो स्वामी जी जब प्रवरज्या करते थे और प्रवरज्या के पहले भी ठाकुर के पास में थे तो स्वामी जी तो मुंह बंद रखने वाले थे नहीं ठाकुर ने खुद खुद कहा है खूब वक्त पा रहे यानी कि बहुत बातें कर सकता है तो वह हाजरा के साथ में इधर-उधर जो भी मिला यह गुरु भाई है सबके साथ में वेद वेदांत की चर्चा करने में तो स्वामी जी कम नहीं थे और बाद में भी जब प्रवृजिया प्रारंभ की उस समय भी यह राजाओं के महल में गरीब की कुटिया में यदि या तो फिर यह स्टेशन मास्टर की ऑफिस में वो जो उनके जो गुप्त महाराज थे वो वो तो स्टेशन मास्टर थे उनके सदानानंद ंद स्वामी सदानानंद उनके शिष्य बन गए बाद में उनको तो रेलवे स्टेशन में मिले थे तो हर जगह पर स्वामी जी वेदांत की बात करने से कतराते कभी नहीं थे किंतु जब पब्लिक में बोलना होता है स्टेज के ऊपर में एक फॉर्मल सेटिंग में तो कभी डर लगता है। हालांकि स्वामी जी ने इस तरह से पहली बार बोला था हैदराबाद में। चेन्नई से हैदराबाद गए थे। वहां पे महबूब कॉलेज मोस्ट प्रोबेबबली वहां पे जाकर के उन्होंने अपना पहला पब्लिक लेक्चर दिया था और फिर शायद हो सकता है कि सेकंड पब्लिक स्पीकिंग उनका सीधा वर्ल्ड पार्लियामेंट के स्टेज ऊपर से ही हो तो व्हाटएवर तो देखिए कि यह सब बड़े-बड़े डर है जो कि हमारे जीवन में आते हैं। मेरा टॉन्सिल का ऑपरेशन हुआ था। उस समय में बहुत छोटा था। आई थिंक फिफ्थ ना सिक्स्थ स्टैंडर्ड में था। तो मुझे याद है कि मैं कितना रोया था उस समय ऑपरेशन के पहले तो याद नहीं आ रहा है किंतु ऑपरेशन के बाद में मैं बहुत रोया था तो क्या है कि ये ऑपरेशन सर्जरी ये ये सब बड़ी-बड़ी चीजें बड़े-बड़े भय है जो कि हमारे जीवन में आते हैं और फिर जब ठाकुर इस तरह की बात करते हैं कि अच्छा शेर को पहचान लिया शेर कोई नहीं है ये तो मास्क पहना है शेर का वो तो मेरा मित्र ही है तो हमको लगता है कि क्या यह सब बातों की बातें नहीं है क्या? सर्जरी करनी है। ऑपरेशन थिएटर में मैं जा रहा हूं। उस समय ऐसा लगने वाला है कि जिसके ऊपर में यह चाकू चलाने वाले हैं। यह वो चाकू नहीं है। वह तो सिर्फ यह केक है। ऐसा कुछ थोड़ी ना हमको लगने वाला है। तो दिस इज अ रियली प्रैक्टिकल कंसर्न। इन सब चीजों का कोई इजी सॉल्यूशन नहीं है। लाइफ टाइम हमको प्रैक्टिस करना पड़ेगा। अपने मन को अपने देह से सेपरेट करने का कि यह देह में नहीं देह के भय देह की वासनाएं देह के जो फोबिया है किसी किसी को स्पाइडर का डर लगता है। किसी किसी को चूहे का बड़ा डर लगता है। तो ये सब जो फोबियास है हमारे इन सबसे में डिसएसोसिएटेड हूं। और मैं तो वही अनंत अजर अमर आत्मा हूं। वि इज बिय्ड स्पेस एंड टाइम वि इज बिय्ड हैप्पीनेस एंड मिजरी वि इज बिय्ड दिस कंस्ट्रेंट्स ऑफ माइंड एंड बॉडी ऐसा लाइफ टाइम का जब स्टडी करेंगे तब कहीं जाकर के यह जो सब क्रिटिकल मोमेंट आती है अपने जीवन में जब यह हमारा मित्र शेयर का मास्क पहन करके हमको डराने के लिए आता है तो फिर हम पहचान जाएंगे कि इस मास्क के पीछे में वही जग जगत जननी जगदंबा ही है। किंतु इस तरह की पोजीशन आने से पहले हमको लंबी प्रैक्टिस करनी होगी। हमारे एक एक प्रॉब्लम यदि हम हिंदू धर्म में देखें तो हमारे आइडियल्स इतने उच्च है कि हमको कभी-कभी लगता है कि यह सब चीजें प्रैक्टिकल भी है कि नहीं। क्योंकि यदि आप दूसरी जगह पर जाएंगे दूसरे धर्मों में उनके आइडियल शायद हमको थोड़े से मैनेजेबल दिखते हैं। डिवोशन टू द गॉड यदि ईश्वर के ऊपर में शरणागति हो तो फिर आपके जीवन में आप सब कुछ प्राप्त कर सकते हैं। ज्यादा से ज्यादा आपको क्या मतलब आपके जीवन में यदि क्या मैनिफेस्टेशन होने वाला है ये डिवोशन का तो स्टिग्माटा बोलकर के क्रिश्चियनिटी में है। यदि कोई सेंट है उसका जीसस के ऊपर में बहुत श्रद्धा है तो उसके जैसे जीसस को क्रुसिफाई किया गया था तो हाथों में वो खिल्ले डाले गए थे नेल्स नेल्स के मदद से उनको क्रॉस पे उनको क्रुसिफाई किया गया था तो जैसे कोई सेंट है जीसस के प्रति बड़ा ही एक एक ही म आइडेंटिफिकेशन हो गया है तो क्या होगा जैसे यह हाथों में यह खिले डाले गए थे जीसस थे तो जो वो घाव हो गए थे हाथों में तो इनके हाथों में भी यह जो सेंट है उसके हाथों में भी यह घाव दिखाई देंगे हाथों में दिखाई देंगे पैर में दिखाई देंगे जो पैरों को वो खिले से मारा गया था तो और फिर यह जो कमर ये जो यह अपना जो पेट है पेट के ऊपर में भाला मारा गया था साइड पे जीसस को तो इस तरह की इंजरीज उनके देह में दिखाई देगी यह हो गया कि जीसस के साथ में कंप्लीट आइडेंटिफिकेशन तो यह सब चीजें माने बहुत ज्यादा सुपर नेचुरल लेवल पर जाएंगे वहां पे तो यही सब है। इससे ज्यादा और कुछ नहीं आपको देखने को मिलेगा। जबकि आप हिंदू धर्म में आइए। यहां पर स्वामी जी इस तरह का क्लेम करते हैं कि आपने यदि प्राण का विज्ञान समझ लिया तो आप सूर्य चंद्र नक्षत्रों की गति को परिवर्तित कर सकते हैं। माने अभी तक तो ऐसा सुना था कि यह जो नक्षत्र है वो हमारे जीवन पर असर करते हैं। उसके ऊपर में ज्योतिष शास्त्र है। यहां तक तो फिर भी हमने सुना है। किंतु यह रिवर्स क्या पॉसिबल है कि हम सीधे उसी नक्षत्रों को ही इधर-उधर कर दें। वो जैसे वो फेमस कहानी है। मैं भूल गया किसकी है किंतु काफी फेमस है कि वो किसी एक लड़के को किसी ने कहा कि तुम्हारे हाथ में ना विद्या की रेखा नहीं है। तो उसने क्या किया? चाकू लेकर के वो विद्या की बताओ। तो उसने पूछा कि कहां पे विद्या की रेखा होती है? तो उसने बताया कि इस तरह से वो होती है रेखा। तो इस लड़के ने चाकू लेकर के अपने हाथ में वो विद्या की रेखा आंक दी। तो ये माने देखिए कि अपने बलबूते पे अपना भविष्य बनाएंगे। बड़ा होकर के बड़ा फेमस भी बना था यह लड़का। तो यदि हमारे नक्षत्र, हमारे ग्रह यदि विपरीत है तो हम चाहे तो ग्रहों को ही सीधा अपनी गति उनकी जो पोजीशन है उसको हटा करके वह जो हमारे लिए हितकारक है उस तरह की पोजीशन में ले आए। दिस इज इवन पॉसिबल अकॉर्डिंग टू स्वामी जी। यहां पर ठाकुर कहते हैं कि जीवन के जो सबसे बड़े-बड़े भय है उसको यदि हम समझ ले तो इसके पीछे में जो दिव्य तत्व है सीधा हमको दिखाई देगा। हम भय से मुक्ति प्राप्त कर लेंगे। तो यह जो इतने बड़े-बड़े जो क्लेम है बुद्धिज्म में देखिए कि चलो आपने बहुत ज्यादा मेहनत करके जप ध्यान करके मेडिटेशन करके ये जो सम्यक अष्टांग योग है मिडिल पाथ उसका सहारा लेकर के आप हाईएस्ट क्या प्राप्त करेंगे तो निर्वाण तो ये फिर भी हमको थोड़ा बहुत लॉजिकल लगता है किंतु हिंदू धर्म के ये जो कुछ-कुछ क्लेम्स है हमको लगता है कि दीज़ आर ओवरब्लोन बहुत ज्यादा कुछ बढ़चढ़ के यह लोग बोल रहे हैं। कहां हमने तो कोई प्रूफ देखा नहीं है। दूसरी बात है कि फिर हम ही लोग क्लेम करते हैं कि हां यह सब पॉसिबल है। किंतु फिर इसको ना आपको प्रदर्शन कभी नहीं करना है। वरना तो आपका रास्ता भटक जाएंगे ईश्वर प्राप्ति के मार्ग से। तो हम कभी-कभी कहेंगे कि अरे भाई एक बार तो प्रदर्शन कर दो। तो हमको भी तो थोड़ा सा सधेरा मिले जो हम इस रास्ते पर चल रहे हैं कि हां भाई जीवन को हम वेस्ट नहीं कर रहे हैं। किंतु फिर भी देखिए कि दिस इज वन ऑफ दोस थिंग्स कि मुझे मैं कभी-कभी सोचता हूं कि इतने ज्यादा बड़े-बड़े क्लेम करके क्या सही में प्रैक्टिकल है कि भी नहीं मुझे नहीं पता। अपने यहां पे एक साधु की कहानी मैंने सुनी थी। अ एक वो रिलीफ करने के लिए जा रहे थे। बड़े डेडिकेटेड थे और ठाकुर पे बड़ी श्रद्धा थी और उस समय आई थिंक मोस्ट प्रोबेबबली गुजरात में ही वह रिलीफ के लिए जा रहे थे कहीं पे एकाएक हुआ ऐसा कि वो जिस जीप में बैठे थे उस समय तो वो जीप हुआ करती थी तो तो वो उलट गई रास्ते से और एक जलाशय में गिरी। अभी आप सोच सकते हैं जीप के दरवाजे बंद है और आप जलाशय में गिरे हैं तो बाहर से जो प्रेशर आएगा ना जीप के ऊपर में पानी का उसकी वजह से वह दरवाजा खोलना मुश्किल हो जाता है। जो इस जीप में वह इस तरह के व्हीकल में बैठा है मान लीजिए उसकी जल समाधि हो ही गई। तो इन साधुओं को भी लगा कि अभी तो बस गए हाथ से ही मतलब अभी तो बचने का कोई मौका नहीं है। किंतु फिर भी चलो ठाकुर की कृपा से कैसे भी करके वो बाहर तो आ गए पानी में से किंतु जब वो किनारे पर बैठे थे अपने वो इमेज वी कैन इमेजिन कि वो क्या परिस्थिति हुई होगी। कितना भयानक डर और कितना बड़ा टेंशन उनके ऊपर में सवार होगा जब वह पानी में जिप में बैठे हुए डूब रहे होंगे। तो जो भी है जब भी बाहर आकर के थोड़ा सा वो रेस्ट करने के लिए किनारे पर बैठे होंगे अचानक उनको याद आया कि यह मृत्यु की घड़ी में तो मैंने ठाकुर का नाम स्मरण किया ही नहीं है। मैं तो अपने देह की रक्षा करने के लिए ही आतुर था। उस समय तो ऐसा नहीं हुआ कि चलो ठाकुर आपका दो-तीन बार नाम ले लूं तो यदि जल समाधि हो जाएगी तो आपके नाम के साथ में होगी। तो ऐसा तो हुआ नहीं। तो इस साधु को ऐसा लग गया इस बात से कि उन्होंने सीधा हेड क्वार्टर जाकर के कहा कि देखिए यह बहुत हो गया रिलीफ वगैरह। अभी मैं चाहता हूं कि मैं बस ईश्वर के चिंतन के लिए ठाकुर के उन जप में ही अब मैं बाकी का जीवन बिताऊं। ऐसा करके उन्होंने कहा था। तो बाद में क्या हुआ मुझे पता नहीं। इतना डिटेल मोस्ट प्रोबेबबली उन्होंने इसी तरह से बाकी का जीवन बिताया होगा। किंतु देखिए कि यह जो हम अपना आध्यात्मिक जीवन है उसमें जैसे धीरे-धीरे करके बढ़ते जाते हैं और फिर एकाएक इस तरह के क्लेम सुनते हैं कि जब ईश्वर का नाम अभी जैसे यहां पर ठाकुर ने कहा कितनी सिंपल बात कही है मणि टहलते टहलते सोच रहे हैं। क्या कहते हैं ठाकुर एक टू साधन को ले ईश्वर दर्शन करा जाए। थोड़ा सा साधन भजन करने से ईश्वर दर्शन हो सकते हैं। तो हमको एकाएक डाउट होगा कि अरे हम लोग तो थोड़ा बहुत नहीं कर रहे। काफी कुछ कर रहे हैं। फिर भी ईश्वर दर्शन क्यों नहीं हो रहे हैं? फिर भी कोई क्यों आध्यात्मिक अनुभूति नहीं हो रही है? तो यह सब क्वेश्चन प्रैक्टिकल क्वेश्चन है। यदि हम इन सब चीजों को बड़ा सीरियसली लेंगे तो फिर हमको अपने पे ही डाउट होना शुरू हो जाएगा। यदि ठाकुर ऐसा कहते हैं कि थोड़ी सी साधना करने से ईश्वर दर्शन होगा और मुझे नहीं हो रहा है। उसका अर्थ है कि मैं साधना ठीक से नहीं कर रहा हूं। मैं ये जो स्पिरिचुअल प्रैक्टिससेस है उसमें ज्यादा मैं अपना मनोयोग नहीं दे पा रहा हूं। या तो फिर मुझ में ही ऐसी कमी है। मेरे जो संस्कार है वही इतने बुरे हैं कि शायद हो सकता है कि इस जीवन में कुछ ना हो पाए। किंतु इस तरह के जितने भी डाउट नजर के सामने आते हैं, जितने भी बार हमको ऐसा लगता है कि अरे यह शेयर का जो मास्क पहन के जो हमारे पास में यह माया आई है, तो उसका सही स्वरूप तो हम नहीं पहचान पा रहे हैं। उस सब सब समय के लिए वही एक बात याद में रखनी है। और जैसे वह कल हमने वह कहानी देखी थी कि दो साधुओं की साधना कर रहे हैं। वो नारायण ने उनको कहा कि पेड़ के ऊपर में जितने पत्ते हैं उतने उस उतने जीवन बीत जाने के बाद में उतने जीवन काल के बाद में उतने जन्म मृत्यु जरा व्याधि के चक्र में से पसार होने के बाद में आपको ईश्वर दर्शन होगा। तो एक साधु बड़ा उत्साहित होकर के नृत्य करने लगा। सो यह सोच के कि चलो उस समय तो ईश्वर का दर्शन होगा और दूसरा साधु है बेचारा बड़ा ही निराश होकर के एक जगह पर बैठ गया। वह सोचता है कि अरे इतने दिनों तक तो साधना की है। अभी और इतने जन्म जन्मांतर साधना करनी है तो कैसे मेरा काम होगा? तो यहां पर देखिए कि एक चीज हमको बड़ी इंपॉर्टेंट सीखनी है कि बिना एक्सपेक्टेशन के साधना करनी है। यह एक बहुत बड़ी बात है। यदि साधना करते-करते मेरे हाथ में कुछ भी ना आए तो डज नॉट मैटर। ठाकुर ने क्या कहा? जो खानदानी ये जो किसान है अर्थात कि जिसके पुरखे हमेशा से किसान रहे हैं उसके खेत में यदि उसके वो गांव में यदि अकाल भी आ जाए दो-ती साल तो क्या वो किसानी का काम करना छोड़ देगा खेती काम करना छोड़ देगा नहीं छोड़ेगा| भले ही चाहे तीन-चार साल उसको लॉस हो वो अपना खेती चालू ही रखेगा क्यों क्योंकि उसको एक ही चीज आती है खेती ही आती है। ऐसा नहीं है कि वह शहर में माइग्रेंट हो करके आएगा। फिर वहां पे वह कंस्ट्रक्शन साइट में वह कड़िए का काम करेगा। फिर जैसे वह लगा कि बारिश आ गया है तो शहर में से वो रिवर्स माइग्रेट होकर के गांव में चला जाएगा। फिर से खेती करेगा। ऐसा नहीं है। इसलिए ठाकुर ने खानदानी चाशा ऐसा शब्द यूज किया है। खानदानी अर्थात कि वह जो वंश परंपरा से जो किसान का खेती का काम कर रहा है उस तरह का किसान। बाकी आजकल के खैर किसानों को दोष भी नहीं देना चाहिए। इनकम तो ऑगमेंट करनी ही है। हम लोग यदि अपनी इनकम के बारे में सोचेंगे तो वे लोग क्यों नहीं सोचेंगे? किंतु खैर यहां पर ठाकुर एक उपमा ही सिर्फ दे रहे हैं। तो इस तरह से कि यदि बीच-बीच में अकाल भी पड़ जाए, बीच-बीच में यदि संदेह भी अपने मन पर सवार हो जाए, फिर भी यह कार्य हमेशा साधन भजन हमेशा हमेशा कंटिन्यू रखना है। भले ही चाहे नजर के सामने ये परीक्षा के हॉल में ना कि ऑपरेशन थिएटर में ना कि स्टेज के ऊपर में इस तरह की जो क्रिटिकल सिचुएशन है भले ही चाहे हमको भय लगे भले ही चाहे हम यह जो शेर के पीछे में जगत जननी स्वयं है यह ना पहचान पाए उस क्षण हम भय से मुक्त ना भी हो पाए डज नॉट मैटर कीप डूइंग तपस्या कीप डूइंग साधन भजन यह जो गुरु ने जो मंत्र दिया है उसका सतत जप करते रहना है। मैं कभी-कभी अभी किसी के साथ बात करता हूं इस तरह से अच्छा कि वो आपने तो मंत्र लिया वो जप करते हैं कि नहीं तो वह जिस तरह से हां कहते हैं उसी से मैं समझ जाता हूं कि वह पूरी बात को ही भूल गए होंगे शायद कि मंत्र भी लिया है और जप भी करना है। तो क्या है कि अभी साधु पूछता है तो आपको हां तो बोलना पड़ेगा। तो ऐसा करके शायद हो सकता है कि बोल लेते हैं। लेकिन इसके पीछे में क्या है? रास क्या है? सीक्रेट क्या है? कि उनको लगता नहीं है कि इस तरह के मंत्र जप करने से कुछ मिलने वाला है। जैसे मैं यहां पे स्टूडेंट्स को यह सिखाता हूं। मेडिटेशन सिखाता हूं। तो प्रतिदिन मैं उनको कहता हूं। देखिए कि आप तो इस इस तरह से मैं क्या-क्या सिखाता हूं। पहले तो यह ओमकार प्राणायाम तो प्राणायाम मेडिटेशन यानी कि आप गहरी सांस लीजिए। फिर यह ओमकार का उच्चारण कीजिए। तो यह प्राणायाम भी हो गया और यह मेडिटेशन भी हो गया। तो यह प्राणायाम मेडिटेशन उसके बाद में चटिंग मेडिटेशन। तो यह निर्वाण शटकम है। उसका पाठ करेंगे और माइंड को पूरा अपने जो पाठ है या चेंटिंग है उसके ऊपर में फोकस करना है। गीता चेंटिंग है मेडिटेशन तो गीता का 15th चैप्टर है उसका पाठ करना है। चेंट करना है और अपना माइंड उसी पे फोकस रहना चाहिए। फिर जैसे कि एक है जप मेडिटेशन। तो वह कर जप की जो पद्धति है कि किस तरह से हम अपने कर पर जप करते हैं वह मैंने उनको सिखाया और कहा कि 108 जप करेंगे हम। तो इसमें मंत्र ओम ही है। माने एक स्टैंडर्ड मंत्र। फिर मैं कहता हूं यदि आपके कोई पर्टिकुलर इष्ट देवता है तो उनके मंत्र का आप जप कर सकते हैं। मैं श्री रामकृष्ण देव के नाम का जप करूंगा। आपको कोई स्पेशल मंत्र है आपका तो कीजिए वरना तो ओमकार इज इनफ। तो यह कर जप की मेथड हो गई। और इसके बाद में हृदय में अनाहत चक्र पर आपको विजुअलाइज करना है कि आपके हृदय में ओमकार है। और फिर यदि कोई पर्टिकुलर इष्ट है आपके तो वो अदरवाइज तो ओमकार है ही है। तो ओमकार को विजुअलाइज करना है और आंख बंद करके सीधा उस पे फोकस करना है। फिर एक हैप्पीनेस मेडिटेशन कि हैप्पीएस्ट मेमोरी ऑफ योर लाइफ। उसको विजुअलाइज कीजिए। इमेजिन कीजिए कि इट इज फिल विद डिविनिटी और फिर वहां पर बैठकर के अगेन फिल दिस हैप्पीनेस प्लस डिविनिटी परकुलेटिंग इन योर हार्ट। तो यह सब कुछ मेथड्स है। मैं उनको समझाता हूं। अब यह लड़के लोग करते भी हैं। किंतु मैं देखता हूं कि वो स्केप्टिसिज्म जो है ना कि अच्छा इस तरह से बैठकर के इस तरह से प्रैक्टिस करने से क्या लाभ है। अब यह बाबा जी बोल रहे हैं तो हमको करना पड़ेगा। नहीं करेंगे तो वे लोग नाराज हो जाएंगे शायद क्योंकि अपना तो बड़ा इंस्टट्यूट है तो उसमें यह लोग स्टूडेंट है तो वो भी एक फैक्टर है कि यदि यहां पे कंप्यूटर कंप्यूटर सीखना है तो इनकी बात थोड़ी सुननी पड़ेगी इस तरह का भाव मैं बहुत लोगों में देखता हूं। कुछ-कुछ लोग हैं क्योंकि जेनुइनली बड़ा ही इंटरेस्ट लेकर के यह सब सीखते हैं। किंतु बहुत सारे ऐसे भी हैं कि जिनका इंटरेस्ट इन सब चीजों में होता ही नहीं है। मैं सिखाता हूं बोल कर के सीखते हैं। तो मैं कभी-कभी उनको कहता हूं कि देखो मैं जब तुम लोगों की उम्र का था, मुझे तो यह सब बताने वाला यह सब सिखाने वाला कोई नहीं था। मैं लाइब्रेरी में जाकर के किताब पढ़ के पढ़ के यह सब अपने से यह सब सीखा है। मुझे अभी भी याद है। हमारे शहर में एक सेंट्रल लाइब्रेरी थी और मतलब यह जो मैं उस समय मैंने ठीक कर लिया था कि यह जो कररियर वाला रास्ता है फैमिली फिर यह बच्चे फिर यह जॉब या बिजनेस या व्हाटएवर या तो फिर जैसे हमारे यहां पे बहुत सारे लोग विदेश में चले जाते हैं। तो यह रास्ता जो है उस रास्ते पे मुझे नहीं चलना। आई वांट टू डू समथिंग यूनिक। आई वांट टू सर्व द सोसाइटी। किंतु सर्विंग द सोसाइटी मींस व्हाट? यह एक बड़ा प्रश्न था। तो यह जो एक्सप्लोर कर रहा था मैं अपने ये जो फ्यूचर को, अपने आइडियाज को उस समय मुझे अभी भी याद है कि हमारे यहां पे एक सेंट्रल लाइब्रेरी हुआ करती थी। बड़ी सुंदर लाइब्रेरी थी। सुंदर इस अर्थ में कि वह जो पुराने-पुराने स्ट्रक्चर होते हैं ना महल जैसे स्ट्रक्चर वह पत्थर की बड़ी-बड़ी दीवार होती है चौड़ी चौड़ी 2 फुट चौड़ी दीवार होती है पत्थर की वो जो पुराने जमाने के जो आर्किटेक्चर हुआ करते थे तो हमारे शहर के राजा ने इसको बनाया था आई थिंक सो 200 साल पहले तो वो एकदम आपको वो भव्य फीलिंग आता था उसके भीतर में आप जाएंगे ना उसकी छत इतनी ऊंची थी उसका वह जो साइज इतना बड़ा था तो आपको एकदम वो एक मैजेस्टिक फीलिंग आएगा और फिर किताबों से भरा हुआ है, साइलेंस है और उस उस समय में ना लोग फिर भी किताबें पढ़ते भी थे। अभी आज हमारी जो लाइब्रेरी है यहां पे मैं जाकर के बैठता हूं कभी-कभी कोई किताब ये नहीं करता है। वो वहां से लेता नहीं है। क्यों? क्योंकि सभी कुछ आजकल मोबाइल पर मिलने लगा है। फिर यह जो शॉर्ट वीडियो यह शॉर्ट ये टेक्स्ट ऐसा फिर एआई इस सब की वजह से जो इंफॉर्मेशन कंज्यूमिंग जो अपना हैबिट है वह पूरा चेंज हो जा रहा है। तो जो भी है मैं उस लाइब्रेरी में जाता था। लाइब्रेरी में जाकर के यह सब किताबें एक के बाद एक पढ़ता था। उस समय मुझे अभी भी याद है कि शिव आनंद बोल के वो एक है वो ऑथर। उनकी किताबें मैंने मेडिटेशन के ऊपर में पढ़नी शुरुआत की थी। बिल्कुल पहली पहली बार हां उस समय मैंने स्वामी जी को पढ़ा भी नहीं था। ठाकुर के बारे में ऐसा कुछ पता भी नहीं था। पता था कि वो है किंतु इससे ज्यादा और कुछ नहीं। तो बिल्कुल पहली पहली जो इस तरह की स्पिरिचुअल किताबें पढ़ना शुरू किया तो वह शिवनंद जी की थी और फिर कुछ समय के बाद में मैं ऐसा इंप्रेस भी हो गया कि उन लोगों का वही हिमालय में कोई आश्रम है तो वहां पर मैंने एक लेटर भी लिखा कि मैं आपके वहां पर आकर के ये मेडिटेशन प्रैक्टिस करना चाहता हूं। तो किस तरह से करना होगा मुझे बताइए। तो एक्चुअली मैं उस समय स्कूल में पढ़ता था। आई थिंक 10थ में पढ़ता था। तो वहां से मुझे एक लेटर भी आया और वहां से लेटर में लिखा था पहले तुम ग्रेजुएट कर लो फिर यहां पर आना। हम लोग स्कूल स्टूडेंट को यहां पे नहीं रखते हैं। तो देखिए कि उस समय मेरी ये जो सब इच्छाएं थी कि मैं जो एक्सप्लोर कर रहा था स्पिरिचुअल साइड मुझे कितने दिनों के बाद में 12th के बाद में मुझे पता चला। मैंने सीरियसली ये ठाकुर मां स्वामी जी है। अ नहीं मुझे पता चला था 10थ के बाद में और छ साल बीत गए थे। उसके बाद में मैंने मेरे हाथ में स्वामी जी आए थे। वो भी कैसे हुआ था कि गुजरात में अर्थक्वेक हुआ था। मैंने अपने पिताजी को कहा कि मैंने यह सब तो काफी एक्सप्लोर कर दिया थ्यरी। अभी कुछ प्रैक्टिकल करना है। तो किस तरह से मैं करूं बताइए। तो उन्होंने कहा कि वो वहां पर प्राइवेट सेंटर है। चलो वहां चलते हैं। मतलब प्राइवेट सेंटर हमारी भाषा में आज की भाषा में उस समय था कि वो रामकृष्ण विवेकानंद केंद्र है। वहां पर जाते हैं। तो वहां पर जाकर के देखते हैं वो क्या गाइड करते हैं। तो वहां पर थे एक सज्जन वहां के सेक्रेटरी। तो उन्होंने कहा कि ठीक है तुम लिमड़ी चले जाओ। मैं वहां पर तुमको वहां के महाराज को लिख देता हूं लेटर। तो मैंने सोचा यह साधु लोगों के साथ में रहना। ये लोग रिलीफ बिलीफ करेंगे कि भी नहीं करेंगे क्या करते होंगे तो जैन साधुओं को देखा है मैंने तो जो भी है दैट वास माय फर्स्ट सीरियस कांटेक्ट और लिमड़ी में रिलीफ कर रहा था उस समय में पहली बार ठाकुर को और स्वामी जी को पढ़ना शुरू किया तब तो कहीं जाकर के मुझे समझ में आया कि ये जो स्पिरिचुअलिटी जिसको कहते हैं जो जेन्युइन स्पिरिचुअल पर्सन होते हैं दे आर द कैटेगरी अपार्ट मैं ये जो पहले पहले ये सब किताबें पढ़ रहा था ये शिवनंद जी की भी पढ़ी और भी इस तरह से स्पिरिचुअल किताबें जो भी आती थी पढ़ता रहता था। मुझे किसी डिनॉमिनेशन में इंटरेस्ट नहीं था। धर्म वगैरह में नहीं। किंतु यह जो योगा है, मेडिटेशन है, एक इनर लाइफ है, एक हायर लाइफ है, सिंपल लिविंग हायर थिंकिंग इस तरह से जो कुछ भी है उस सब में मुझे बड़ा इंटरेस्ट था। किंतु ठाकुर मां स्वामी जब स्वामी जी तक आते-आते मुझे इसके बाद में और छ से सात साल लगे थे। तो मैं ये स्टूडेंट को कहता हूं या ये कंप्यूटर क्लास में हमारे कि देखो मुझे तो पता भी नहीं था तुम लोगों की उम्र में कि ठाकुर मां स्वामी जी कौन है? जेन्युइन स्पिरिचुअलिटी क्या है? जेन्युइन साधना क्या है? मैं तुमको सिखा रहा हूं। तो टेक म आज तुमको शायद इसकाेंस नहीं पता चलेगा। किंतु हो सकता है 10 ईयर 20 ईयर 30 ईयर डाउन द लाइन जब जीवन इस तरह से मुसीबतों से गिर जाएगा और सी क्राइसिस आने ही वाली है। इट्स नॉट लाइक के ठाकुर इस तरह से सिचुएशन खड़ी करते हैं कि आपको उनका नाम लेना पड़ेगा। ये माया के जगत में ये क्राइसिस आने ही वाली है। एक के बाद एक और उस समय यदि हम बैड हैबिट्स में चले जाए, डिप्रेशन में चले जाए, स्ट्रेस में चले जाए, इससे बट बेटर है कि ऑलवेज हैव अ बेटर ऑप्शन एट योर एंड। यह बहुत बार मैंने देखा है कि जो लोगों को भगवान पर श्रद्धा नहीं होती है उन लोगों को भूत पर बहुत श्रद्धा होती है। ग्रहों पर बड़ी श्रद्धा होती है। यह विधि विधानों पर बड़ी श्रद्धा होती है। यह कोई विधि कर दो इसको इतने रुपए दे दो। वह अपने ग्रहों नक्षत्रों को शांत करवा देगा और फिर आपका सब ठीक हो जाएगा। तो यह सब चीजों में बड़ी उनकी श्रद्धा और आस्था होती है। किंतु भाई एक जेनुइन स्पिरिचुअल लाइफ है। स्टूडेंट डे से ही यह बचपन से ही अपने जीवन को इस तरह से धीरे-धीरे करके अंदर से मॉडिफाई करते जाइए। भीतर में से अपग्रेड करते जाइए कि बाय द टाइम आप एडल्ट हो। बाय द टाइम यह गृहस्थ आश्रम की क्राइसिस को आप फेस करें। यू हैव अ वेरी स्ट्रांग वेपन एट योर हैंड। आप रेडी हो जाएंगे बाय दैट टाइम कि किस तरह से क्राइसिस मैनेज करना है। किस तरह से स्ट्रेस मैनेज करना है। किस तरह से ट्रोमा मैनेज करनी है। भगवान ना करे सीरियस एक्सीडेंट हो गया कुछ हो गया अपने शरीर को और उस समय जो एक क्राइसिस अपने सामने आती है कि अपना पूरा जीवन को हमको चेंज करके अभी रहना है। अपने दूसरों के ऊपर में भरो अभी तो माने आपको डिपेंड होकर के रहना है। व्हाट वी विल डू एट दैट टाइम। बहुत सारे इस तरह से जिनके साथ में होता है ट्रोमा में चले जाते हैं। ट्रॉमा में से जैसे बाहर ही नहीं आते हैं। तो यह क्या है कि ठाकुर ना करे कि ऐसा किसी के साथ हो। बट ऑलवेज प्रिवेंशन इज बेटर देन क्योर। बचपन से ही इस तरह से धीरे-धीरे करके क्योंकि क्या है कि देखिए अभी जैसे मैं कहता हूं कि आइडियल क्या है बचपन से इस तरह से सीखने का तो यहां पे जो हमारे संडे क्लासेस है वंस ए वीक आप इस तरह से बच्चों को भेजते हैं तो बच्चा यदि बाय द टाइम वो एडल्ट होता है उसने काफी कुछ इंबाइब कर लिया है। अभी हमारे बच्चे गीता चेंटिंग भी सीख गए हैं। वैदिक चेंटिंग भी सीख गए हैं। काफी कुछ भजन भी वे लोग गाते हैं। फिर ठाकुर मास्वामी जी की कहानियां भी उनको पता चल गई है। हम लोग मेडिटेशन सिखाते हैं। वे लोग आंख बंद करके बैठते भी हैं। पता नहीं मन में क्या चल रहा होगा। किंतु एटलीस्ट उन्होंने किसी को देखा तो है इस तरह से मेडिटेशन करते। मेडिटेशन के बेसिक आइडियाज क्या है? उसको सुना भी तो है। तो क्या है कि यह सब बीज के रूप में हृदय में पड़ा रहता है। और फिर जब बड़े होकर के सुपर क्राइसिस या तो यह जो मेजर ट्रोमा हमारी नजर के सामने आते हैं उस समय वी हैव समथिंग फ्रॉम टू ड्रॉ अपॉन। यह जो बैंक में पैसा रखा है वैसा होता है ना अभी विदेशों में ऐसा होता है यहां पर भी तो कि बच्चा अभी वहां पर एक्चुअली क्या है फॉरेन कंट्रीज में खास करके अमेरिका में कॉलेज एजुकेशन बड़ा ही एक्सपेंसिव होता है अपने यहां पे तो फिर भी ये गवर्नमेंट यूनिवर्सिटीज है तो वहां पे वो बड़ा एक्सपेंसिव होता है तो जैसे ही बच्चे का जन्म होता है तो कॉलेज फंड बोल करके उसके पेरेंट्स जो है उसके नाम पे कुछ रुपया रख देते हैं तो वह इंटरेस्ट के साथ में मल्टीप्लाई होते-होते बाय द टाइम वह लड़का कॉलेज में जाएगा तो वह कॉलेज फंड में से वह ड्रॉ कर पाएगा अपना एजुकेशन एक्सपेंस। तो वैसे ही यह सब आपका वो जो ट्रोमा फंड है भविष्य में जब भी ट्रोमा होगा तो इस तरह से स्पिरिचुअलिटी का जो फंड आपने पहले से ही जुगाड़ करके रखा होगा। देन यू कैन ड्रॉ अपॉन इट ड्रॉ फ्रॉम इट टू फेस द क्राइसिस टू मैनेज द ट्रोमा एंड स्ट्रेस। तो यहां पर जब ठाकुर यह कहते हैं कि थोड़ा सा कुछ करने से ईश्वर दर्शन करा कर सकते हैं। माया को यदि पहचान लेंगे तो माया अपने से भाग जाएगी। तो यह सब पढ़कर के ना हमको ख्याल में रखना है कि लाइफ टाइम ऑफ प्रैक्टिस यह सब चीजों के लिए आवश्यक है। आज मैंने पढ़ा और मैं कल सोचता हूं कि अभी यह प्रॉब्लम आ गया। क्यों मुझे स्पिरिचुअलिटी हेल्प नहीं कर रहे? तो इस तरह से नहीं चलेगा। हमने जितने भी ठाकुर मां स्वामी जी डायरेक्ट डिसाइपल जिनको भी देखा है देखिए कि बचपन से ही उन्होंने ये सब प्रैक्टिस प्रारंभ की थी तो यहां पे भी एस फार एस पॉसिबल अभी देखिए कि हम लोगों की तो एक सर्टेन एज पे हम लोग पहुंच गए हैं। अभी यह जो फिर से वापस जाकर के आज मैं यदि यह कितना ही सोचता रहूं कि मुझे उसी समय जब मैं 10थ में था पहली पहली बार यह सब आइडियाज मेरे माइंड में आ रहे थे। उसके बाद में मुझे क्यों यह छ सात साल का समय लगा स्वामी जी को ठाकुर को मां को प्राप्त करने के लिए यह अभी भी मुझे लगता है कि यदि 10थ में ही मुझे यह सब पता चल गया होता कथामृत मेरे हाथ में आ गया होता तो मेरा बाद का जो जीवन है वह कितना सहज सरल हो जाता मेरा स्पिरिचुअल लाइफ तो यह सब विचार मुझे कभी-कभी आते हैं ना अभी मेरे पास में तो वह पॉसिबल नहीं है कि मैं टाइम मशीन में बैठकर के भूतकाल में जाऊं और मेरे हाथ हाथ में वो कथामृत की किताब थमा दूं। मैं वहां पर वो 10थ के वेकेशन में बैठा था अपने कमरे में। वहां जाकर के उसको बताऊं कि भाई यह किताब पढ़ तो तुम्हारा कल्याण होगा। बाकी सब फेंक दे अभी। तो ऐसा तो होने वाला नहीं है। तो एटलीस्ट लेट अस हेल्प आवर नेक्स्ट जनरेशन कि कैसे भी हो ठाकुर मां स्वामी जी का थोड़ा बहुत उनको आइडियाज मिले और नॉट नेसेसरी ठाकुर मां स्वामी जी स्पिरिचुअल स्ट्रीम्स जिसके साथ में हम जुड़े हुए हैं। अभी कल ही मेरा किसी के साथ में बात हो रहा था तो उसका जो लड़का है वो छ साल का है। फर्स्ट स्टैंडर्ड में अमेरिका में है। तो वहां पर अमेरिका के स्कूलों में तो यह इंडियन स्पिरिचुअलिटी कुछ सीखने का कोई प्रश्न ही नहीं आता। किंतु वहां पर वह पाठशाला है वह जैन लोगों की। तो वहां पर वह लड़का जाता है। तो वह जोकार मंत्र है वह जप करना सीख गया है। फिर ये जो गायत्री मंत्र उसने सीख लिया है। महामृत्युंजय मंत्र सीख लिया है। तो मैंने कहा तो अच्छी बात है ना। बहुत अच्छी बात है। अभी ठाकुर मास्वामी जी की बच्चों की कहानियां होती है। वो किताबें आती है। चिल्ड्रंस रामकृष्ण ऐसा करके बालकोना रामकृष्ण गुजराती मुझे याद है। अभी इंग्लिश देखना पड़ेगा क्या है। किंतु ये सब किताबें हैं। वो पिक्टोरियल स्टोरी बुक्स है ठाकुर मास्वामी जी की तो अभी से उसको पढ़ाना शुरू कर दो। देखो कि भविष्य में नॉट नेसेसरी कि वो देखो कि वह ही माइट इवन फॉरगेट जब वह बड़ा होता है शायद भूल भी जाएगा। वो शायद हो सकता है कभी स्पिरिचुअलिटी के रास्ते पर वापस ना आए। बट वी वी डीड आवर बेस्ट टू हेल्प हिम एक एक जो निधि होती है एक फंड होता है। जैसे यह कॉलेज फंड तो यह स्पिरिचुअल फंड हमने उसके हाथ में रख दिया। फिर उसका कर्म का प्रवाह, उसका भविष्य उसको किस डायरेक्शन में ले जाएगा वह तो अभी ठाकुर ही जाने। बट द पेरेंट्स डीड देर बेस्ट। राइट? तो ऐसे ही यह सब जब हम पढ़ते हैं तो यह एक बात खास ख्याल में रखना है कि बचपन से यह सब प्रैक्टिस हमारे जीवन में होती तो आज हम एडल्ट होकर के वी कुड हैव रियली एक्सपीरियंस सम ऑफ दिस थिंग्स जो कि यहां पर बताई जा रही है। तो फिर क्या है कि देखिए बहुत हताश होने की भी जरूरत नहीं है। क्योंकि यह तो कोई अंतिम जीवन तो है नहीं। ठाकुर को ऐसी प्रार्थना करें कि ठाकुर जब नेक्स्ट जन्म जब होता है तो इस जन्म में तुमको जो मैंने याद किया तुम्हारा नाम स्मरण किया वह मेरे साथ में ही नेक्स्ट जन्म में अवश्य आए और नेक्स्ट जन्म में जितना यंग एज में हो मैं आपके नाम गुणगान करना सीख पाऊं आपकी कहानियां पढ़ पाऊं सुन पाऊं और कथामृत कोई मेरे हाथ में थमा दे। दिस इज वेरी इंपॉर्टेंट गिफ्ट। यह जो मैं साउथ इंडिया में जब भ्रमण कर रहा था एज अ परिव्राजक तो मैं सोचा था उस समय कि अभी क्या करना है साधु होना है नहीं होना है वो जो सब मेरे मन में चल रहा था भागदौड़ तो उस समय में साउथ इंडिया में इस तरह से वो खास करके केरल में तो केरल में एक गांव से दूसरे गांव फिर पैदल चल के जा रहा हूं मुझे किसी ने एक आदमी के साथ में मुलाकात हो गई तो बोलता है चलो आप मेरे घर पे आइएगा मैं आपको खिलाऊंगा मैं इस तरह से बेशर्म होकर के खाना मांग लेता था। तो कोई ज्यादातर लोग खिला भी देते थे। किसी ने कहा चलो ये होटल है। सामने धाबा है तो ढाबे में चले जाते हैं। आप जो भी ऑर्डर करना है कर दीजिए। मैं पैसा दे दूंगा। तो ठीक है चलो बढ़िया सा इडली डोसा खा लिया। तो ऐसे ही एक आदमी को मैंने पूछा कि मुझे यहां पे कुछ दिन रहना है और खाना की व्यवस्था करनी होगी। तो किसी ने मुझे बताया उस आदमी के साथ बात कीजिए। वह आदमी इस तरह से लोगों को काफी हेल्प करता है। तो मैंने कहा अच्छा ठीक है। मैं उसके पास में गया। उस आदमी ने कहा आप मेरे घर आइए। तो मैंने सोचा डायरेक्ट घर बुला रहा है तो अच्छी बात है। उसके घर पर जाकर के वो जैसे ही उसके घर में एंटर हुआ मैं इमीडिएटली समझ गया कि उसने मुझे क्यों बुलाया है। वो चारों ओर क्रॉस लगे हैं। वो जीसस की वो फोटो है। वो क्रिश्चियन है। मतलब वो सोच रहा होगा कि शायद इसको कन्वर्ट करेंगे। ठीक है? तो मुझे तो कोई आपत्ति ही नहीं उसके साथ में गप लगाने की और खाना खाने की। बढ़िया मजे से उसके फैमिली के साथ में बैठ के खाना भी खा रहा हूं। और हुआ ऐसा कोइंसिडेंटली कि उसकी जो वाइफ थी शी वाज़ फ्रॉम माय ओन सिटी। गुजरात में जहां पे मैं रहता हूं उसी शहर से वो थी। तो व्हिच इज वेरी सरप्राइजिंग कि कहां से कहां यह कनेक्शन लग गया। वो आदमी खुद था केरलाइट। पक्का वो मलयाली था। सो एनीवे उसके साथ में बात हुआ। फिर वो कहता है कि अच्छा एक काम कीजिए। अभी हम प्रेयर करते हैं तो उसके और भी कुछ लोग आकर के मिले अगल-बगल से और एक वो पादरी भी था लोकल वो भी आ गया उसने वो वाइट कपड़े पहने थे गले में क्रॉस था सब कुछ था तो मुझे बोलता है यह किताब है हमारी हमारे साथ में प्रेयर कीजिए मैंने कहा करेंगे कोई दिक्कत नहीं है मैं बढ़िया मजे से प्रेयर करना शुरू कर दिया वो मुझे क्रिश्चियनिटी मैं वो कंपेरेटिव रिलीजन पढ़ा था उस समय बाय दैट टाइम तो ये किस तरह से प्रेयर वगैरह होती है ग्रेगोरियन चट वगैरह क्या है वो अच्छे से पता था तो फटाफट मैंने ने उनके साथ में उन्हीं के इस तरह से प्रेयर करना शुरू कर दिया। वो लोग बड़े खुश हो गए कि ये बंदा अभी हमारे हाथ में आ ही गया है। तो देखिए कि उस तरह से उस समय ये जो मैं इस तरह से मैं घूम रहा था। मैंने देखा कि ये जो स्पिरिचुअल लाइफ है ये स्पिरिचुअल लाइफ सही-सही में क्या है? उसको आपको एक्सप्लोर करना होगा। डेप्थ में जाना होगा। एक समय आएगा कि ठाकुर आपको सही में रास्ता दिखा देंगे। ऐसा कोई चांस नहीं था कि मैं उसके वहां पर रह जाऊं क्योंकि मेरे भीतर में से जो प्रवाह था अल्टीमेटली यह जो सब्लिमल प्रवाह ठाकुर की ओर जाने का बड़ा स्ट्रांग था। एक समय ऐसा आया कि एक तांत्रिक के ग्रुप में मेरा हो गया पहचान। तो वे लोग कहते हैं तुम चलो मेरे साथ में हमारे आश्रम में रुकना। तो मैं गया वहां पे सब तांत्रिक लोग इकट्ठा हुए थे। और एक्चुअली यह जो संप्रदाय था उसका हेड क्वार्टर था बंगाल में और मैं भूल गया उनका नाम अभी फेमस संप्रदाय है वो तांत्रिक लोगों का बहुत बड़ा है वो 10,000 ना कि ऐसा कोई उन लोगों की ये मोनेस्टिक्स है अभी उनके मोनेस्टिक्स और मतलब क्या क्वालिटी होगी वो तो अभी वही लोग जाने किंतु ये लोग कहते हैं तो जो भी है उनके आश्रम में रहा और उस समय उनके हेड क्वार्टर से उनके जनरल सेक्रेटरी आए हुए थे विजिट के लिए तो वह खुद मुझे अपने साथ में घुमा रहे हैं। वो किसी के घर पर गए फिर कोई वहां पे आश्रम में ही बैठकर के बोलते हैं पूरा रात जप करेंगे। मैंने कहा करते हैं मेडिटेशन। चलिए तो बाय दैट टाइम मैंने मेडिटेशन की भी अपने घर में काफी प्रैक्टिस कर ली थी। मैं देखता हूं कि मैं जितना वो सीधा बैठकर के जितने लंबे टाइम तक मैं जप कर सकता मतलब ध्यान कर सकता था उन लोग उसके सामने ये लोगों का कुछ नहीं है। 10-15 मिनट में इधर-उधर होना शुरू हो जाएंगे। क्योंकि नेचुरली है कि इस तरह की बातें करना तो बड़ा आसान है किंतु प्रैक्टिस करना बड़ा ही मुश्किल। तो उस समय ही वह कहते थे कि आप लोग आप यहीं पे आ जाइए। तुम यहीं पर रह जाओ। तुम्हारी सब हम केयर करेंगे। सब कुछ करेंगे। तो खैर तो देखिए कि ये जो ठाकुर की ओर जाने का यदि हमारे भीतर में यह होता मतलब संस्कार या तो फिर ठाकुर की ओर आने का यदि हमारे भीतर में यह रहेगा तो फिर यह सब चीजें हमको कभी भी विचलित नहीं कर पाएगी। बट व्हाटएवर यहां पे जैसे है कि इस तरह से बचपन से ही यदि हम बच्चों को थोड़ा बहुत इस सब चीजों का ज्ञान देना शुरू करें तो देखेंगे कि रास्ते में इस तरह के प्रलोभन है या तो फिर ट्रोमा है, स्ट्रेस है, जो कुछ भी आएंगे हम सबको मैनेज कर पाएंगे। तो इसलिए यहां पे अह मणि जो है मास्टर महाशय वो ठाकुर की इन सब बातों को याद करते-करते टहल रहे हैं। और यह देखिए कि सिचुएशन भी कितनी सुंदर है। हम लोग तो कल्पना भी नहीं कर सकते कि हमारा यह गुड फॉर्च्यून होता। मैं यह सब जब एक्सप्लोर कर रहा था 10थ स्टैंडर्ड में पहली पहली बार मेरी यह जो सब हायर थिंकिंग की फैकल्टी सही-सही में ओपन हो रही थी। उस समय यदि मैं कोलकाता में होता, उस समय यदि पास में ही दक्षिणेश्वर में किसी ने मुझे बता दिया होता कि ठाकुर है जाओ और मैं ठाकुर का दर्शन करने के लिए आया होता और फिर वहां पे दक्षिणेश्वर के गार्डन में टहलते टहलते यह सब सोच रहा होता कि अच्छा ठाकुर ये जो सब कहते हैं इसके पीछे में सही-सही वो है कुछ ना फिर ये अदर वाइज तो फिर ये बहुत सारे लोग यह भी कहते हैं कि यह शराब-बरा पी के वो पागलामी कर रहा है। माने ऐसा बोलने वालों की भी तो कमी नहीं थी। वो जो मोस्ट प्रोबेबबली आई थिंक विज्ञानंद जी महाराज की बहन उसने शायद कहा था ऐसे ही किसी ने कहा था एक लेडी ने वहां पे वो जो कपड़े धोने के लिए आती है ना कि यह जो पागल साधु है यहां पे वो रहता है और उसने कोलकाता के 10,000 लड़कों के दिमाग खराब करके रखे हैं। तो ऐसा बोलने वालों की भी कमी नहीं थी। यह जो मां के पास में ये जो मछन वगैरह आती थी वो मछली पकड़ उनके हस्बैंड मछली पकड़ते होंगे। शायद यह लोग जाल वगैरह धोती होगी जो भी है तो वह आकर के मां को कहती थी कि उनको इस तरह की दवाई दीजिए इस तरह का औषध दीजिए तो आपको लड़का होगा वरना बिना लड़के के आप कैसे रह सकती है ठाकुर सुन लिए थे वो डर के मारे आकर के इमीडिएटली मां को कहते हैं कि देखो मेरे पास में सब कुछ है ईश्वर ने मुझे सब दिया है किंतु मैंने वो सब ईश्वर प्राप्ति की साधना में सब चीजों को मैंने बलिदान दे दिया है तो तुम मुझे कोई यह दवाई फवाई मत खिलाना मेहरबानी करके नहीं तो वो हरी ऋष को उसकी पत्नी ने दवाई खिलाई थी। कैसा पागल हो गया था। तो इस तरह से ऐसा बोलने वालों की भी कमी नहीं। किंतु आई होप कि उन सब लोगों की बातें नहीं सुनकर के जेनुइनली ठाकुर के ऊपर में मेरी श्रद्धा होती और इस तरह से मास्टर महाशय की तरह दक्षिणेश्वर गार्डन में टहलते टहलते उस समय संध्या का समय होगा। वैसे ये दोपहर का समय है तो क्योंकि जो भी है वहां पे यदि मैं टहलते टहलते इस एक ओर गंगा है ऊपर में सुंदर खुला आकाश है और आज की तरह पोल्यूशन पोल्यूशन तो होगा नहीं सुंदर स्वच्छ हवा पानी है उस समय यदि मैं ईश्वर का चिंतन कर रहा होता तो कितना अच्छा होता तो यह सब तो अभी हमारे लिए मन के दृश्य से मन की आंखों से यह सब कर सकते हैं यह जो अपना कंस्ट्रक्ट बनाना यह तो इसी सब चीजों के बेस पर हमको कंस्ट्रक्ट बनाने हैं। ये यहां पे मणि है मास्टर महाशय पंचवटी और कालीवाड़ी के अन्य जगह पे टहल रहे हैं और ठाकुर जो कह कहे थे उनको उसके बारे में चिंतन कर रहे हैं। तो यही सब हमको अपने मन में एक मन की आंखों से कल्पना का दृश्य बना करके उसमें से आध्यात्मिक रस का हमको पान करना है। बेला प्राय 3 होइया छ पर ऑलमोस्ट 3:30 हुए हैं दोपहर के ठाकुर श्री रामकृष्णन घरे मणि आ बसिया आ ठाकुर के कमरे में मणि आकर के फिर से बैठे हैं ब्राउटन इंस्टीट्यूशन होते एकटी शिक्षक को एकटी छात्रों लैया ठाकुर के दर्शन कोते आशिया छे ब्राउटन इंस्टीट्यूशन से एक टीचर कुछ बच्चों को स्टूडेंट्स को लेकर के ठाकुर के दर्शन करने के लिए आए हैं ठाकुर ठाकुर तहा देर शंगे कोथा कोहते छन ठाकुर उनके साथ में वार्तालाप कर रहा है। यह देखिए यह बड़ा इंटरेस्टिंग है कि टीचर अपने स्टूडेंट को लेकर के आते हैं। यह मास्टर महाशय के साथ में ऐसा हो गया था कि वो जो बार-बार ठाकुर के पास में आते हैं तो फिर विद्यासागर उनसे नाराज हो गए थे। और यहां तक कि पूर्ण जो है उसके पिताजी ने उसको उनकी स्कूल में से हटा लिया था। यह बोल के कि मास्टर महाशय उसका ब्रेन वाश कर रहे हैं। वो पागल परमहंस के पास में ले जाकर के। तो फिर यह ठाकुर चिंतित हो गए थे और मास्टर महाशय को कहते हैं कि अच्छा तुमको इससे कोई प्रॉब्लम तो नहीं होगा। यह विद्यासागर जो है तुम पर नाराज तो नहीं हो जाएंगे। तो मास्टर महाशय कहते हैं यदि नाराज भी हो जाते हैं तो मुझे पता है कि मुझे क्या उत्तर देना है? तो ठाकुर बोलते हैं क्या उत्तर दोगे? बताओ। तो मास्टर महाशय कहते हैं कि मैं विद्यासागर को कहूंगा कि आपने ही तो अपनी किताब में लिखा है ना कि ईश्वर के ऊपर में संपूर्ण निर्भर होकर रहना चाहिए। तो आप तो यह मैं परमहंस के पास में ले जा रहा हूं जो कि ईश्वर के ऊपर में निर्भर है। तो फिर मैं जो किताब में जो लिखा है आपकी टेक्स्ट बुक में वही तो मैं उसको करवा रहा हूं ना। मेरी गलती कहां है? ऐसा बोलकर के मैं उत्तर दूंगा। तो ठाकुर भी बड़े खुश हो गए थे। और फिर एक बार हुआ ऐसा। ठाकुर कहते हैं एक काम करता हूं। मैं तुम्हारी स्कूल में आता हूं। स्कूल में आकर के देखता हूं कि और भी ऐसे कौन-कौन से लड़के हैं। मास्टर वहां से थोड़े टेंशन में आ गए। वैसे ही तो वो जो उनके दक्षिणेश्वर ले जाते हैं उसी में वो लोग तो टेंशन में सब उसके पेरेंट्स अभी यदि ठाकुर स्वयं स्कूल में आ जाए और विद्यासागर को पता चले कि वो पागल परमहंस आया था बच्चों का दिमाग बिगाड़ने के लिए स्कूल में तो फिर मास्टर महाशय सोच में पड़ गए थोड़ी देर के लिए कि कैसे मैनेज करेंगे इसको। फिर कहते हैं कि अच्छा अच्छा ठीक है आप आइए। हमारे यहां पर ऐसी है ऐसा है कि कन्वेंशन ऐसा है कि बीच-बीच में कोई वीआईपी आकर के स्कूल में विजिट करते हैं। तो आप ही इस तरह से वीआईपी हो के स्कूल में आइए विजिट कीजिए। देखिए कौन-कौन से बच्चे हैं जिसका आप ब्रेन वाश कर सकते हैं। उनको कर लीजिए आप सिलेलेक्ट। तो यहां पे देखिए कि वो टीचर और स्टूडेंट को लेकर के आए हैं। तो ठाकुर के हम समझ सकते हैं कि ठाकुर में वो दिमाग के भीतर में वो सब घंटी लगना शुरू हो गया होगा कि अच्छा इन बच्चों में से कौन है जिसको कि ईश्वर की ओर ले पकड़ करके ले जा सकते हैं। तो
प्रतिमा पूजा : अस्ति भाती प्रिय
ठाकुर तहा देर शंगे कोथा कोहते छ ठाकुर उन लोगों के साथ में वार्तालाप कर रहे हैं। शिक्षक टी माझे एक एक टी प्रश्न करते छ टीचर बीच-बीच में एक-एक प्रश्न कर रहे हैं। प्रतिमा पूजा संबंध कथा होते छे प्रतिमा पूजा के बारे में वार्तालाप हो रहा है। श्री रामकृष्ण शिखो के प्रति श्री रामकृष्ण टीचर को कहते हैं प्रतिमा पूजा ते दोष की प्रतिमा पूजा में दोष क्या है? वेदांते बोले जे खाने अस्ति भाति आर प्रिय शेखाने तार प्रकाश वेदांत में कहते हैं जहां पे अस्ति भाति प्रिय है वहीं पर उसका प्रकाश है ताई तीनी छाड़ा कोनो जीनी शाई इसीलिए उनको छोड़कर के ईश्वर को छोड़कर के और कोई चीज है ही नहीं देखिए यह जो श्लोक ठाकुर ने कहा वह दृगदृश्य विवेक में है श्लोक क्या है अस्ति भाति प्रियम रूपम नाम चेतंश पंचकम आध्यत्रयंम ब्रह्म रूपम जगत रूपम ततोध्वयम अर्थात कि यह जो अस्तिभाति प्रिय और नाम रूप यह प्रत्येक पदार्थ के भीतर में ये पांच एलिमेंट होते हैं। एक तो है अस्तिभाति प्रिय और दूसरा है नाम और रूप। ऐसा दो सेट है 3 + 2 जो कि फाइव अह एट्रिब्यूट्स या तो फिर फाइव कैरेक्टरिस्टिक ऑफ किसी भी एक पदार्थ का है। आद्य त्रयं ब्रह्म रूपम जगत रूपम ततोध्वयंम पहले जो तीन है अस्तिभाति प्रिय वह ब्रह्म के रूप के बारे में है और जो बाकी के दो है रूप और नाम यह है जगत के बारे में जगत रूपम अर्थात कि जगत के बारे में रिलेटेड टू वर्ल्ड नेचर ऑफ द वर्ल्ड एंड फर्स्ट थ्री आर दी नेचर ऑफ ब्रह्मण ब्रह्मण का स्वरूप क्या है कोई भी एक पदार्थ है उसको उसको आप लीजिए तो उसके बारे में आप पांच चीजें कह सकते हैं। यदि यह मनुष्य है, यदि यह पेड़ है, यदि यह पौधा है, यदि यह गुलाब का फूल है, यदि यह खाने का केला है, ना कि यह जो माइक है मेरे सामने, ना कि फिर यह मकान है, ना कि यह पृथ्वी ग्रह है, ना कि यह तारे हैं। जो कुछ भी है। जड़ और चेतन इस जगत में सभी चीजों के बारे में यह पांच उसके यह स्वरूप है। उसके जो कैरेक्टरिस्टिक पांच है उसमें से है अस्तिभाति प्रिय और फिर नाम और रूप तो यह जो अस्थिभा प्रिय है ब्रह्मन का रिलेशन मतलब नेचर ऑफ ब्रह्मण और यह नेचर ऑफ द वर्ल्ड कोई भी पदार्थ होगा इसका एक स्पिरिचुअल एस्पेक्ट होता है। एक वर्ल्डली एस्पेक्ट होता है। तभी तो वो पदार्थ बनेगा। और यह जो हमारी थरी है कि ब्रह्मा और शक्ति एक और अभेद इसके साथ में एग्जैक्टली मैच हो जाता है। यदि ब्रह्मन ही है वो कार्य करते हैं तो शक्ति के रूप में दिखाई देते हैं। स्थिर है तो वह ब्राह्मण के रूप में तो वो यदि ऐसा कहे कि समुंदर है उसमें लहरें हैं। तो सिर्फ समुंदर है तो शांत समुंदर हमको दिखाई देता है। किंतु समुंदर की जो लहर है उसमें शांत समुंदर का जो जल है उसके साथ-साथ में उसका एक अलग से रूप दिखता है और अलग से उसको नाम दिया गया है। हालांकि उसका जो कंस्टिट्यूएंट एलिमेंट है वो तो पानी ही है। वही पानी शांत है तो हमको समुंदर की तरह दिखता है और वही पानी में तरंग की उत्तोल तरंग जब खड़ी होती है तब वो हमको ये तरंग के रूप में ये वेव्स के रूप में दिखता है। तो वेव्स में नाम रूप का वेव्स है किंतु उसका जो जल है तो वही वो अस्थिभा प्रिय रूप जल है। तो इस तरह से यह ब्रह्म समुद्र में जितनी भी तरंगे उठती है उसके भीतर का जो कंस्टीटुएंट एलिमेंट है वह तो वही ब्राह्मण ही है। बस वही है कि उसके ऊपर में नाम रूप का एक मास्क हमने पहना दिया है। यह जो कल की बात कि ठाकुर कहते हैं कि वह शेर का मास्क पहन करके शेर का बाघ का चमड़ी पहन करके वह एक आदमी लोगों को डरा रहा है। जैसे ही आपने उसको पहचान लिया तो वो मास्क और ये फेंक करके वो अपना सही स्वरूप प्रकट करेगा। हंसता हंसता चला जाएगा। तो वैसे ही जैसे हमको पता चला कि यह तरंग जो है वह और कुछ नहीं है। पानी ही है। बस पानी के रूप में नाम रूप वाला इस एक मास्क पहना दिया गया है। तो जैसे ही पता चलेगा तो हम उसको पानी के रूप में ही पहचानेंगे। ऐसा नहीं कहेंगे कि तरंग है। ऐसा ही कहेंगे ही। पानी ही है। वहां पे पानी स्थिर है। यहां पे पानी जो है वह डायनेमिक है। वहां पे वह स्टैटिक है। यहां पे डायनेमिक है। बस इसी तरह से अदरवाइज तो यह पानी ही है। तो इसीलिए ठाकुर यहां पे कहते हैं कि जब ये टीचर कहते हैं कि प्रतिमा पूजा तो ठाकुर कहते हैं कि प्रतिमा पूजा में दोष क्या है? अस्तिभाति प्रिय जहां पर ब्रह्मण है वहां पर नाम रूप है। तो यह प्रतिमा भी देखिए ब्रह्मन की ही बनी हुई है। बस प्रतिमा रूपी एक मास्क उसने पहना हुआ है। ताई तीनी छाड़ा कोनो जीशय नहीं। इसीलिए ईश्वर तीनी अर्थात कि उनको छोड़कर के और कोई पदार्थ नहीं है। उनको के रूप में आप ईश्वर को भी ले सकते हैं। ब्राह्मण को भी ले सकते हैं। इसके अलावा और कोई भी चीज इस जगत में नहीं है। आबार देखो छोटू मेरा पुतुल खेला कतो दिन कोरे और फिर देखो कि छोटी लड़कियां है वह जो खिलौने लेकर के कितने दिन खेलेगी जतो दिन ना विवाह होए जितने जब तक विवाह नहीं होता है तब तक गुड़िया के साथ में खेलेगी और जतो दिन ना स्वामी शहबाश कोरे जितने दिन तक पति के साथ में रहना नहीं होता तब तक ही वह खिलौने के साथ में खेलेगी विवाह होले पुतुलगुली पेट्राय तुले फैले पहले जब विवाह होगा पति के साथ में रहने को जाएगी तो जितने भी गुड़िया है खिलौने हैं एक बक्से में भर करके वह रख देगी ईश्वर लाभ होले आर प्रतिमा पूजा की दरकार ईश्वर लाभ होगा तो फिर प्रतिमा पूजा की क्या आवश्यकता है अच्छा तो आज यहीं तक अभी कल आगे देखेंगे ओम शांति शांति शांति हरि ओम ॐ तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु तो वंदना दी अच्छा अच्छा अच्छा महाराज जी प्रणाम महाराज जी प्रणाम महाराज जी जय ठाकुर जय मां महाराज जय मां महाराज आज बहुत इसलिए भी बोल रहा हूं और कल रात को अहमदाबाद में बारिश हुई। ओ अच्छा तोफिकल बहुत होता है। ओके अच्छा बहुत सारी राइट ठाकुर जी कई बातें मतलब हम बेटा भी कभी सुना होता सुनी थी बट कनेक्टिंग देम इज नॉट इट डजंट कम जैसे वो अस्थि होता है व्हाट इज द डेफिनेशन
प्रश्न: अस्ति भाती प्रिय क्या है?
कोई भी पदार्थ होता है उसका एक अस्तित्व है उसका एक एग्जिस्टेंस है तो सत हो गया अस्ति फिर चित यानी कि हम उसको ये कर सकते हैं डिटेक्ट कर सकते हैं अदरवाइज यदि हम उसको ये नहीं कर पाएंगे उसके साथ में कोई रिलेशन नहीं बिठा पाएंगे तो हमारे लिए तो उस बात का कोई अस्तित्व ही नहीं है। तो भाति अर्थात कि वी कैन एक्चुअली डिटेक्ट इट और प्रिय तो सतचित आनंद यानी कि वह हमको प्रिय है क्योंकि वह ब्रह्मन का बना है। तो यह आनंद यह सतचित आनंद जो है ना दैट इज इन अनदर वर्ड अस्तिभाति प्रिय यानी कि कोई भी चीज है वो वो उसका अस्तित्व है। हम उसको डिटेक्ट कर सकते हैं और फिर वह वह हमको आनंद देती है क्योंकि वह ब्रह्मन की बनी हुई है। दे कहते हैं ना कि नाम रूप से ही यह जगत बना है। तो एक्चुअली नाम और रूप आप किसको यह पहनाएंगे? सिर्फ नाम और रूप से तो होगा नहीं। उसका एक एक्चुअल एग्जिस्टेंस होना चाहिए। दैट एग्जिस्टेंस इज सतचित आनंद या तो फिर अस्तिभति प्रिय। यदि पानी नहीं है तो तरंग कभी नहीं बनने वाली है। अब यह जो वाटर लॉगिंग हुई इसीलिए रहा है क्योंकि बारिश हुई बारिश नहीं होगी तो वाटर लॉगिंग होने ही वाला नहीं है। तो बारिश अस्तिभति प्रिय और यह वाटर लॉगिंग है नाम रूप। यह जो जब तक यह पंचलेश दगधबीज
प्रश्न: हम इस नाम-रूप के भ्रम से कब मुक्त होंगे?
नहीं हो जाएंगे तब तक यह परमानेंट तो जाने वाला नहीं है। सेंस ऑफ इल्यूजन तो बीच-बीच में जैसे ठाकुर कहते हैं ना कि एकाएक हम कभी-कभी ऐसा होता है कि हम नींद से जग जाते हैं और एकाएक देखते हैं अरे यह क्या है? यह क्या है? फिर से सो जाते हैं क्योंकि रात अभी खत्म नहीं हुई है। राइट? वो बीच-बीच में रात को नींद से उठना पड़ता है। वह पानी पीने के लिए, बाथरूम जाने के लिए वगैरह-वगैरह जैसे-जैसे उम्र बढ़ती जाएगी ऐसा होता जाएगा। किंतु फिर हम परमानेंटली कब उठेंगे? वह सुबह होने पे तो ऐसा है कि जब तक यह पंचक्लेश है अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश यह दग्ध बीज नहीं हो जाएंगे। निर्विकल्प समाधि में तब तक यह परमानेंट जाने वाला नहीं। बीच-बीच में ऐसा एहसास होगा कि हां मुझे समझ में आ रहा है कि इसका असली स्वभाव क्या है? किंतु फिर से वह आकर के गिर लेगा हमको। ये कैसा है पता है कि अभी जैसे देखिए न्यूटन जो था उसने ये लॉज़ ऑफ डायनेमिक्स खोज निकाले। ये फोर्स इज मल्टीप्लिकेशन ऑफ मास एंड एक्सीलरेशन। f = maa तो यह जो लॉ है लॉ ऑफ फिजिक्स यह तो पूरे ब्रह्मांड में सब जगह पर सेम ही रहेगा। किंतु इस लॉ के ऊपर में आप जब स्पेसशिपिप बनाते हैं तो यह टेस्ला वाले अपने हिसाब से बनाएंगे। यह अपना इसरो वाले अपने हिसाब से बनाएंगे। चाइना वालों का अपना यह है बनाने का तरीका। अपना-अपना एक रहता है कि डेवलप किया है उन्होंने ओवर ए लॉन्ग पीरियड ऑफ़ टाइम। तो साइंस इज़ वन थिंग। टेक्नोलॉजी इज़ क्वाइट अनदर। इन दैट सेंस कि टेक्नोलॉजी आप अपनी-अपनी डेवलप कर सकते हैं। बट यू कैन नॉट हैव योर ओन लॉज़ ऑफ फिजिक्स। वह तो लो फिजिक्स जो है सो है। तो यहां पे भी प्रत्येक साधक ने अपने-अपनी जो साधना की है हमको वो मार्गदर्शन देते गए हैं कि ब्राह्मण का स्वरूप माया का स्वरूप जो है वह वेदांत में हमको बता दिया है कि दिस इज अ लॉ ऑफ नेचर। उसमें कहीं पर भी फर्क नहीं पड़ने वाला। आप तंत्र मार्ग, कश्मीरी शैविज्म, ये योग मार्ग, ये टेोइस्म, ये ज़न बुद्धिज्म, व्हाट व्हाटएवर यू फॉलो ए नेचर ऑफ़ ब्रह्म एंड नेचर ऑफ़ माया विल रिमेन द सेम थ्रूउ। बट दैट वे ऑफ़ गेटिंग रीड ऑफ माया एंड वे ऑफ़ एटेनिंग ब्रह्म। वो सभी साधकों ने सभी परंपराओं ने अपना-अपना डेवलप किया है। तो अपने स्वभाव के अनुसार जो भी मेथड हमको लगती है अच्छी अपने स्वभाव के अनुसार यदि हम कॉम्बिनेशन करना चाहते हैं मेरा खुद का एक बुद्धिज्म पे खास करके एक है एक सॉफ्ट कॉर्नर खास करके जैन बुद्धिज्म पे तो मैं पढ़ता रहता हूं बीच-बीच में उसको थोड़ा सा प्रैक्टिस करने का भी माइंडफुलनेस ट्राई करता हूं। सो विवर द वे यू कैन कंबाइन योर साधना इट इज इट्स ऑल गेम जैसे कहते हैं ऑल ऑल वैलिड ऑल वैलिड रास्ता है। देखिए हम लोग जब ड्राइविंग करते हैं तो हमको वो सेफ ड्राइविंग सिखाया जाता है। सिटी लिमिट में आपको 30-4 के वह स्पीड लिमिट होती है। उसी पे ड्राइव करना है। व्हाट आर द बेस्ट वे ऑफ मेथड्स कि कैसे ड्राइव करना है। मैं एक बार एक इंटरव्यू पढ़ रहा था। वो अमेरिका के प्रेसिडेंट का वो जो लिमो होता है ना लिमोजिन तो उसको कैसे ड्राइव करना है। तो उसके मिलिट्री के सब ड्राइवर होते हैं वो सब तो उनको सिखाया जाता है। सुपर फास्ट स्पीड पे चलाना है। यदि वह दुश्मन अटैक करें तो इतने शार्प टर्न लेने हैं। वगैरह-वगैरह हाईली रिस्की वो देखेंगे आप तो हमारा हृदय धड़कने लगेगा। इतना म डेंजरस वे लोग स्टंट करते हैं कि यह फार्मूला वन रेसिंग ड्राइवर है। कैसा वह गाड़ी चलाते हैं? तो एक नॉर्मल वे ऑफ गाड़ी चलाना है और फिर वो हाई रिस्क गाड़ी चलाना है। राइट? तो अभी जिसकी छाती में जितना दम है वो इस तरह से चला है। तो हम लोग वो फार्मूला वन कि ऐसा कुछ करने को जाएंगे तो अपना हार्ट ही फेल हो जाएगा। राइट? सो यह जो बिना एक्सपेक्टेशन के साधना करना वो माने यदि हमारे में दम है तो मैं मां के सामने जाकर के कहूंगा दर्शन दो वरना यह खड़ग उठा के अपना गला काट दूंगा मैं बोलूंगा तो किंतु ये काटने का मेरे में साहस है कि नहीं वो तो एक बड़ी बात है ना ठाकुर ने बोला है तो मैं बोलता हूं ठाकुर खुद कहता है क्या कहता है कि राम प्रसाद को दर्शन दिया मुझे क्यों नहीं दे रही हो तो अभी वो ठाकुर उस लेवल तक जाने को तैयार थे हम लोगों के लिए तो बातों की ही बातें हो जाएगी ना कि दर्शन दो वरना खड़ग उठा के गला काटूंगा। मैं कभी नहीं करने वाला ऐसा। राइट? सो दिस इज कॉल्ड मैनेजिंग आवर एक्सपेक्टेशन। स्वामी जी ठाकुर जिस लेवल पर जाने को तैयार थे तपस्या के वो जाने को मैं तैयार नहीं हूं। सो आई हैव टू मैनेज माय एक्सपेक्टेशन एंड डू साधना अकॉर्डिंगली।