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Sri Ramakrishna Kathamrita ·

श्रीरामकृष्ण कथामृत 27 Oct 1882 केशव सेन के साथ ठाकुर का नौका विहार 19 Aug 2024

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ठाकुर कहते हैं मास्टर महाशय लिखते हैं द के अय को कोलकातार अभिमुख चोली दे इस तरह ठाकुर की एक और ठाकुर की अमृतम वाणी चल रही है दूसरी र ठाकुर यह जहाज कलकाता की ओर चल रहा है घरेर म श्री राम कृष्ण के जहारा दर्शन ताहा अमृतम कथा श्रवण कोरीते न तरा जोहा चते छ कि ना एक कोथा जानी तेव पारले ना केबिन के भीतर में जो लोग ठाकुर की अमृतम वाणी का श्रवण कर रहे थे उन लोगों को पता भी नहीं चल रहा है कि जहाज चल रहा है कि नहीं भ्रमर पुष्पे बोसले आर की भन भन करे भ्रमर जब पुष्प के ऊपर में विराजित होता है और मधुपाल करने का प्रारंभ करता है तभी वह क्या गाना गुनगुनाए जब तक वो पुष्प खोज रहा है जंगल के भीतर में के भीतर में तब तक कुछ ना कुछ गुनगुना आएगा तब तक कुछ ना कुछ गाना गाएगा किंतु एक बार पुष्प पर विराजित हो कर के मधु पान प्रारंभ कर दे तो क्या फिर भ्रमर कोई भी आवाज करेगा नहीं करेगा उस समय उसका पूरा मन प्राण मधु पान में ही व्यस्त है उसी में उसका मन एकाग्र है क्रम पोत दक्षिणेश्वर छड़ा लो धीरे धीरे करके अग्नि जहाज ये जहाज दक्षिणेश्वर से दूर जाने लगा सुंदर देवालय छवि दृश्य पटेल बहिर भूत होलो सुंदर देवालय की छवि आंखों से ओझल हो गई पोत चक्र विक्षुब्ध नीलाभ गंगा बारी तरंग आई तो फेनिल कलोल पूर्ण ईते लागलो जहाज के चलने से जिस नदी में तरंगों की बो छार उठ रही है वो तरंगों से तरंगों की कलोल से पूर्ण होने लगी भक्तो देर कोण से कलेल आर पहुची लो ना यह जो कलोल है यह वेव जो है तरंग है उसकी जो संगीत है वह अभी भक्तों के कानों में नहीं जा रहा क्यों क्योंकि भक्तों के कानों में तो ठाकुर की अमृतम वाणी ही जा रही है ताहा मुग्ध होया देखीते न वे लोग मुग्ध होकर के देख रहे हैं हास बदन आनंदमय प्रेमानुरागम होकर के सहस्य वदन होकर के आनंदमय प्रेमानुरागम कर रहे हैं उनका दर्शन कर रहे हैं तरा मुक्त होया देखीते छन सर्व त्यागी एक जन प्रेमी वैरागी वे लोग मुग्ध होकर के देख रहे हैं सर्व त्यागी एक प्रेमिक वैरागी ईश्वर बोई आर किछु जाने ना ईश्वर के अलावा और कुछ नहीं जानते ठाकुरे दद के कोथा चते और यहां पर ठाकुर की वाणी चल रही है श्री राम कृष्ण वेदांत वादी ब्रह्मज्ञानी रा बोले सृष्टि स्थिति प्रलय जीव जगत सब र खेला जो लोग वेदांत वादी ब्रह्मज्ञानी है वे लोग कहते हैं सृष्टि स्थिति प्रलय और जीव जगत यह सब शक्ति के इलाके में है शक्ति का खेल है शक्ति की लीला है विचार कोते गेले ए श स्वपन व विचार जब आप करेंगे नित्या नित्य वस्तु विवेक करेंगे क्या सही है क्या मिथ्या है वो विचार करने से सब स्वप्न दिखाई देगा ब्रह्म वस्तु आर सब अवस्ता ब्रह्म ही वस्तु है बाकी सब अवस्ता है शक्तियों स्वप्नवउम का शक्ति का इस राज्य को छोड़ कर के जाने की कोई उम्मीद नहीं है आमी ध्यान करछ आमी चिंता करछ सब शक्ति इलाक मध शक्ति श्वर मध में ध्यान कर रहा हूं मैं चिंता कर रहा हूं यह सब शक्ति के राज्य के भीतर में ही है शक्ति के ऐश्वर्य के भीतर में ही है ताई ब्रह्मो आर शक्ति अभेद और इसीलिए ब्रह्मा और शक्ति अभेद है एक के मानले आर एकटी के मानते होए यदि आप एक को स्वीकार करेंगे तो दूसरी को स्वीकार करना ही होगा जेमोन अग्नि आर तार दाही का शक्ति जैसे अग्नि है और उसकी दाही का शक्ति है अग्नि मान ले दाहिद मानते हुए दहि का शक्ति छड़ा अग्नि भावा जाना अग्नि को जद आप स्वीकार करेंगे तो अग्नि की दहि का शक्ति को मानना ही पड़ेगा दहि का शक्ति छोड़ कर के अग्नि के बारे में आप कल्पना भी नहीं कर सकते आबार अग्नि के बाद दिए दाही का शक्ति भाबा जाए ना दूसरी ओर अग्नि को छोड़ कर के अग्नि की दाही का शक्ति इसको भी आप सोच नहीं सकते कल्पना नहीं कर सकते सूरज के बाद दिए सूर्य रश्मी भावा जाना सूर्य रश्मी के छेड़े सूर्य के भावा जाना सूर्य को छोड़ कर के सूरज की किरणों के बारे में कल्पना नहीं कर सकते सूरज की किरणों को सूरज को ले यदि सूरज के बारे में सोचते हैं तो बिना सूरज की किरणों के सूरज को भी नहीं सोच सकते अच्छा तो ये पूरा लंबा पैसेज हमने एक बार पढ़ लिया अभी इसके ऊपर में थोड़ा सा विचार करते हैं कि ठाकुर ऐसा कहते क्यों है मैं जब पहली पहली बार कथामृत पढ़ता था तो ये जब ठाकुर शक्ति और ब्रह्म अभेद ये जब कहते थे तभी मुझे लगता था कि ठाकुर इस किस परिप्रेक्ष्य में कर रहे हैं किस क्योंकि इसमें जो कहा है वो इतना सहज है समझने के लिए कि ठाकुर को इसके बारे में कहना भी पड़े यह भी एक आश्चर्य की बात होती है यह तो ऐसा हो गया कि अब दिन को प्रकाश होता है रात को अंधेरा होता है ठाकुर क्या ऐसा उपदेश देंगे मूर्ख लोगों को ही है या तो फिर जिसकी जो कि दिव्य जिसको जिसको कि हम लोग आजकल दिव्यांग कहते हैं दिव्य चक्षु कहते हैं जो लोग आंखों से नहीं देख पाते उन्हीं को शायद कहना पड़ेगा कि हां भाई दिन में उजाला होता है रात को अंधेरा बाकी जिन लोगों की आंखें है वे लोग तो बिल्कुल जन्म से लेकर के यही चीज देखते आए हैं कि दिन में उजाला ही होगा रात को अंधेरा ही होगा एक्सेप्ट कुछ एक्सेप्शनल केसेस हो जाए जैसे कि सोलर एक्लिप्स है वगैरह इसको छोड़ कर के ये तो बड़ा ही स्वयं सिद्ध है ऐसी स्वयं सिद्ध चीजों को ठाकुर क्यों बोलेंगे ऐसा मुझे लगता था उस समय किंतु जैसे-जैसे मैं ये वेदांत का स्टडी करता गया हालांकि मैं इतना डीप में नहीं गया हूं जितना मुझे जाना चाहिए जितना कि कुछ-कुछ साधु लोगों को मैं पहचानता हूं वे लोग जितना डीप में गए हैं किंतु मुझे एक जनरल आउटलाइन पता है कि अपना वेदांत का इवोल्यूशन किस तरह से हुआ है और वेदांतिका इसके पीछे का रहस्य क्या है इसी बात को लेकर के काफी लोगों ने अपने संग में विभिन्न विभिन्न किताबें भी लिखी है और नई नई फिलोसोफी भी उन्होंने चालू की है तो अभी देखते हैं कि इस विचार के पीछे में अपने इतिहास में अपने शास्त्र क्या कहते हैं अपने शास्त्रों का दर्शन शास्त्र का इवोल्यूशन क्या है फिर उसके बाद में इस पैसेज को यदि समझेंगे उसके बारे में विचार करेंगे तो बड़ा ही सम सहज से समझ में आ जाएगा कि ठाकुर ने यह बात क्यों कही है तो सबसे पहले हम स्वामी जी का विचार लेते हैं स्वामी जी कहते हैं कि पहले सांख्य डेवलप हुआ और उसके बाद में सांख्य के फाउंडेशन के ऊपर में वेदांत रूपी महल की रचना हुई तो सबसे पहले हम सांख्य देखते हैं कि सांख्य दर्शन क्या कहता है जबकि एक समय था अभी हम जद हिंदू धर्म के भी थोड़ा सा बाहर निकल कर के जनरल मानव सभ्यता को देखें कि मानव सभ्यता धर्म के बारे में और आध्यात्मिकता के बारे में क्या सोचती है तो एक समय था जब कि हम जंगल में रहते थे जब कि हम ओपन मैदानों में रहते थे और शिकार करके और पेड़ पौधों से ये जड़ीबूटी फल यह सब इकट्ठा करके हम लोग अपना जीवन व्यतीत करते थे इस फेस को कहते हैं हंटर गैदरर फेस अपने जो लोग सिविलाइजेशन का स्टडी करते हैं ह्यूमन हिस्ट्री का स्टडी करते हैं वे लोग इसको हंटर गैदरर फेस कहते हैं हम लोग शिकार करते थे और यह फल मूल वगैरह जो है वो कलेक्ट करते थे तो इस समय की जो मान्यता थी कि हां एक ऐसा क्रूर ईश्वर शायद हमारे एक ऐसी क्रूर सत्ता एक ऐसी क्रूर देवी सत्ता हम सबके ऊपर में राज्य कर रही है जो जब चाहे तूफान ला दे बारिश ला दे फ्लड ला दे वाइल्ड फ्लायर वाइल्ड फायर ला दे ना कि धरती कम अर्थक्वेक ला दे और हमारे प्रियजन और हमको कब मृत्यु के ग्रास में पतित कर दे हमको पता भी नहीं चलेगा अभी तो रास्ते से जा रहे हैं शेर आ गया अपने बच्चे को उठा कर के ले गया बात खत्म जिसको मैं इतना प्रेम करता था वो बच्चा मेरी नजरों के सामने एक क्षण में ही गायब हो गया तो क्या ऐसा कोई क्रूर देवता है जो कि मेरे साथ में इस तरह का कटाक्ष करता है तो हो सकता है कि हो तो फिर क्यों नहीं इनको बलिदान देकर के सैक्रिफाइस देकर के खुश रखा जाए तो ऐसा करके एक क्रूर एक जिसको कहते हैं ना कैप्रियो अंग्रेजी में वर्ड है कैप्र शियस अर्थात कि वो जब जो इच्छा हो तब वो करे उसका कोई लॉजिक नहीं है उसका कोई मने कोई पर्सनालिटी नहीं है उसकी इच्छा हो गई नाराज होने की तो नाराज हो जाएगा उसकी इच्छा हो गई खुश होने की तो खुश हो जाएगा ऐसे एक कपीश एक एक देवता हमारे पर राज करते हैं इनको सैक्रिफाइस दो ये यहां से एक ईश्वर की अवधारणा प्रारंभ हुई कि जो कि नेचुरल फोर्सेस है इससे भी पहले नेचुरल फोर्सेस को हम लोग सैक्रिफाइस करते थे बारिश हो रही है तो बारिश का एक देवता है जल है तो जल का एक देवता है ऐसा करके तो एक नेचुरल फोर्सेस उसके बाद में कैपियस गॉड उसके बाद में किंतु जैसे जैसे षि मुनियों माने ऐसे मनुष्य जिन लोगों ने आध्यात्मिक जगत में डूब लगा कर के डुबकी मार करके डाइव लगा करके गहनता से सोचने का प्रयास किया उनको लगा कि नहीं ईश्वर तो प्रेममय है क्योंकि जैसा जितना हम ईश्वर चिंतन करते हैं उतना ही हमको देखिए कि हमारे हृदय में आनंद और शांति प्राप्त होते जाते हैं तो यहां पर दो चीज हुई सबसे पहले तो है ईश्वर के बारे में अपनी अवधारणा का क्रम विकास होता है इवोल्यूशन होता है दूसरा कि साधन पद्धति का इवोल्यूशन होता है पहले यदि आप हंट अर्थात की शिकार करेंगे तो शिकार को किसी देवता को आप डेडिकेट करेंगे इस देवता को बलिदान लेकर के चलो हम शिकार करते हैं जैसे कि हमने मां के जीवन में देखा था कि तेलो भेलो बोलकर के एक मैदान है वहां पर डाका तेर काली अर्थात की डाका लोगों की एक मा काली की मूर्ति है वे लोग जब डाका करने को जाएंगे उस उसके पहले डके करने के जाने से पहले उस मां काली को कुछ ना कुछ शिकार वे लोग भोग धराए कोई कोई तो कहते हैं कि नर बलि भी दी जाती थी किंतु खैर अभी इसके बारे में सत्य असत्य पता नहीं है किंतु पशुबली तो देते ही थे तो इस तरह से सैक्रिफाइस करके हम लोग देवता को खुश करते थे तो वो साधन पद्धति से अभी एक साधन पद्धति आई कि वरशिप की हाउ टू वशिप अभी वशिप में भी थाउजेंड ऑफ मेथड्स है अग्नि प्रकट करके वशिप करना फल मूल चंदन दे कर के वशिप करना पुष्प अर्पण करके वशिप करना किसी मनुष्य के भीतर में ईश्वर का दर्शन ईश्वर को मान कर के उनकी वरशिप करना किसी पत्थर की वरशिप करना किसी पेड़ की पूजा करना बहुत सारी पूजा पद्धतियां है वशिप मेथड से तो यह सब साथ-साथ में डेवलप होती गई दो चीज पैरेलल हमेशा डेवलप होती है एक तो है कि दर्शन शास्त्र दूसरा है साधन पद्धति दर्शन शास्त्र अर्थात कि हम ईश्वर के बारे में क्या सोचते हैं दूसरा है कि इस ईश्वर की जो हम कल्पना करते हैं उस ईश्वर की हम प्राप्ति के लिए ईश्वर को खुश करने के लिए या तो ईश्वर का दर्शन करने के लिए जो भी आपकी दर्शन दर्शन शास्त्र आपका कहता हो वो करने के लिए आपको क्या करना पड़ेगा वो हो गई साधन पद्धति तो एक हो गया दर्शन शास्त्र अर्थात कि ईश्वर के बारे में हमारी अवधारणा दूसरी हो गई साधन पद्धति अर्थात की ईश्वर को प्राप्त करने की ईश्वर का दर्शन करने की जो भी टर्मिनोलॉजी आप यूज करते हो वो करने के लिए क्या करना चाहिए तो यह दोनों धीरे-धीरे इवोल्व होते गए प्रेममय ईश्वर से धीरे-धीरे करके सांख्य दर्शन क्या कहता है कि उन्होंने पूरे जगत को 24 तत्त्वों में बांट दिया पंच महाभूत पंच तन मात पंच ज्ञानेंद्रिय पंच कर्मेंद्रिय मन बुद्धि चित्त अहंकार महत वगैरह सब कुछ आप बांट करके आखिर में देखते हैं कि ये जो बाह्य विश्व जो कुछ भी है इससे परे एक पुरुष है एक चेतन मय पुरुष जोक ये समय और अवकाश और काल जो देश काल पात्र जिसको कि कहते हैं अपने शास्त्र में और मॉडल लैंग्वेज में कहा जाएगा कि स्पेस टाइम एंड कोजन इन सबके परे एक ऐसी चेतन सत्ता है और यह हमारे भीतर में है और इस चेतन सत्ता को यदि हम प्राप्त कर लेंगे तो हमारे दुख सब समय के लिए चले जाएंगे हम अमरत्व प्राप्त करेंगे अमरत्व प्राप्त इस अर्थ में नहीं कि यह शरीर कभी मृत्यु नहीं प्राप्त होगा किंतु यह शांति का प्रवाह चीर काल के लिए बहता जाएगा तो यह हो गई सांख्या दर्शन की ये अवधारणा और इसको लेकर कि योग शास्त्र डेवलप हुआ सांख्य योग इस तरह से हमेशा कहा जाता है तो योगशास्त्र का उस समय पैरेलल डेवलपमेंट चल रहा था तो यह हो गया सांख्य किंतु यहां पे देखिए कि यहां पर अभी भी एक थोड़ा सा डेवलपमेंट बाकी है कि सांख्य भले कहता हो कि एक चेतन मय सत्ता है जो कि एक मटेरियल इसिक वर्ल्ड से परे हैं किंतु सभी के भीतर में एक एक पुरुष है प्रत्येक मनुष्य है आज पृथ्वी की पॉपुलेशन है मान लीजिए 700 करोड़ 7 बिलियन तो सभी के भीतर में एक एक पुरुष है 700 बिलियन और फिर यदि यह मानना शुरू कर दे पशु पक्षी जीव जंतु बैक्टीरिया वायरस सभी के भीतर में एक एक जद है पुरुष तो तो फिर पुरुषों की संख्या अनंत हो जाएगी किंतु यहां पर वेदांत का प्रारंभ होता है वेदांत कहता है कि पुरुष कहो ना कि आत्मन कहो एक ही है वो विभिन्न रूप से हमको दिखाई देता है तो यह हो गया वेदांत का प्रारंभ और साथ में ही यह हायर साधन प्रणालियां है जिसको कि हम आजकल ज्ञान योग कर्म योग भक्ति योग और राजयोग का नाम देते हैं वो स्टार्ट हुई यह उपनिषद में यह वाणी कि ब्रह्मण ही एकमात्र है माने ब्रह्मण एक ही है विभिन्न नहीं है वो हमारी हमारे अज्ञान की वजह से हमको विभिन्न विभिन्न दिखते हैं जैसे कि एक घड़ा है घड़े में पानी भरा हुआ है अभी आकाश में एक सूरज प्रकाशित हो रहा है तो आप क्या कहेंगे कि जो पानी के भीतर में जो प्रतिबिंब है प्रत्येक घड़े के भीतर में एक एक प्रतिबिंब जो है वो क्या एक इंडिविजुअल उसका अस्तित्व है नहीं है इसका अस्तित्व तो सिर्फ एक ही ब्रह्मण का है या तो फिर कहेंगे एक ही सूरज का है वो सूरज प्रत्येक घड़े के भीतर में दिखाई दे रहा अब ये घड़े को तोड़ दो तो उसके प्रतिबिंब भी नष्ट हो जाएगा और इसके साथ साथ में ही यह पुनर्जन्म वाद भी प्रारंभ हुआ यह पुनर्जन्म वाद क्या कहता है कि एक है ब्रह्मण एक है पंच महाभूत का बना हुआ शरीर और इसके बीच में जिसको की मिसिंग लिंक कहते हैं इवोल्यूशन की लैंग्वेज में या तो फिर यह सेतु ब्रह्मण और शरीर के बीच में सेतु है जीवात्मा हमारे भीतर में जैसे कि घड़े के भीतर में पानी भरा है पानी में सूरज का प्रतिबिंब दिख रहा है तो ये जो प्रतिबिंबित सूर्य है वो तो जो ईश्वर का या तो ब्रह्मण का जो प्रकाश मेरे हृदय में है जो मेरे शरीर को चेतन वंत बनाता है वो है जीवात्मा और यह जीवात्मा जो है इसका मृत्यु शरीर के मृत्यु के साथ में नहीं होता हालांकि इसका जन्म भी है मृत्यु भी है जीवात्मा का तो ये तो पक्का है किंतु ये शरीर के जन्म और मृत्यु के साथ में इसका संबंध नहीं है जैसे कि वो गियर पता है आपने गियर देखा होगा घड़ी जो होती है उसके भीतर में गियर होते हैं ये जो सेकंड का कांटा 60 सेकंड जब समाप्त होती है तो वो गियर जो है मिनट के कांटे को एक मिनट चलाता है उसके बाद में मिनट का कांटा 60 मिनट जब चलता है गियर पूरा तब एक घंटे को एक घंटा आगे बढ़ाता है तो 60 सेकंड पे एक मिनट होती है 60 मिनट पे एक घंटा होता है तो यहां पे भी है कि ये शरीर एक के बाद एक जन्म मृत्यु जन्म मृत्यु लेता ही रहेगा किंतु जब तक यह जीवात्मा जो है प्रत्येक जन्म में कुछ नान कुछ कर्म करेगा अच्छा कर्म करेगा बुरा कर्म करेगा अच्छे कर्म से उसका बैंक बैलेंस बढ़ेगा पुण्य का बैंक बैलेंस बुरे कर्म से पुण्य का बैंक बैलेंस खत्म होता जाएगा बहुत ज्यादा पाप किए तो ये नेगेटिव में भी बैलेंस चला जाएगा अर्थात कि जब हम नया पुण्य कर्म करते हैं तो पहले नेगेटिव बैलेंस को तो आपको फुलफिल करना है पुराना जो डेट है उसको आपको भरपाई करना है पुराना जो ऋण है फिर तो कहीं जाकर के आपकी एसेट बढ़ोतरी वेल्थ क्रिएशन स्टार्ट होगा तो यह हो गया अपने वैदिक समय का विचार कि एक ब्रह्मण है एक जीवात्मा है एक पंचमहाभूत का शरीर है ये तीन बेसिक एंटिटीज है इसके साथ में ये कर्म का सि सिधांत है जो कि कहता है कि जन्म जन्मांतर की जीवात्मा की यात्रा है जैसे 60 सेकंड घूमने पर एक मिनट होता है तो वैसे ही समझ लीजिए कि पहली सेकंड प अर्थात कि हमारे पहले जन्म के समय हमारा जीवात्मा प्रकट होता है और हमारा जो आखिरी जन्म है जिस जन्म में हमने सभी कर्म समाप्त कर दिए हो उस समय जीवात्मा का विघटन होता है मृत्यु नहीं कहेंगे क्योंकि ये तो मृत्यु तो उसी चीज का होता है इसका जन्म होता है इसका तो जन्म नहीं हुआ ये ये तो एक प्रतिबिंब है प्रतिबिंब का गठन हुआ और प्रतिबिंब विघटित हो गया तो वैसे ही ये सर्वप्रथम जन्म के समय जीवात्मा सर्वप्रथम गठित होता है आखिरी जन्म में जीवात्मा विघटित होता है और उसके दौरान ये दोनों जो फेज है प्रथम जन्म और आखिरी जन्म उसके दौरान इसकी ये पूरी यात्रा जो है लेखा जोखा बैंक बैलेंस अच्छे कर्म का पूरे कर्म का वो चलता रहेगा यह हो गया हमारा वेद का बेसिक विचार इसके बाद में यह आचार्यों का युग प्रारंभ हुआ इन लोगों ने थोड़ा सा गहराई से सोचना शुरू किया कि ये जीवात्मा है और यह ब्रह्मण है इन दोनों का संबंध कैसे है आप क्या कहेंगे कि ये जीवात्मा ब्रह्मण का ही एक हिस्सा है या तो फिर जीवात्मा हमेशा ब्रह्मण से अलग रहेगा जैसे कि आप कहे सूरज तो यहां से कितना लाखों किलोमीटर दूर है पृथ्वी पे अभी पृथ्वी पर घट बना पृथ्वी प घट टूट गया पृथ्वी पर प्रतिबिंब बना पृथ्वी पर प्रतिबिंब विघटित हो गया अदृश्य हो गया उस सूरज के साथ में तो इसका कोई लेना देना नहीं ये दोनों तो हमेशा सेपरेट ही बने रहेंगे तो ये एक हो गया वाद जिसको कि धत वाद कहते हैं कि ईश्वर या तो ब्राह्मण और जीवात्मा हमेशा सेपरेट रहेंगे इन दोनों के मिलन की कोई को संभावना नहीं है आप और इसके साथ में एसोसिएटेड साधन पद्धति वो है भक्ति आप ईश्वर की भक्ति कीजिए ईश्वर खुश होकर के आपको दर्शन देंगे आपका जीवन पवित्र कर देंगे ऋषि मुनियों की कक्षा में रख देंगे किंतु आप ईश्वर स्वयं कभी नहीं होने वाले हैं ईश्वर सदृश्य आप होंगे आपकी जो आध्यात्मिक उन्नति आध्यात्मिक सिद्धियां आध्यात्मिक उपलब्धियां इतनी बढ़ जाएंगी कि आप ईश्वर सदृश हो जाएंगे किंतु ईश्वर अपने आप में कभी नहीं होंगे ये दोनों के बीच में जो सेपरेशन है वो हमेशा बना रहेगा तो यह हो गया द्वैतवाद इसके बाद में थोड़ा सा इवोल्यूशन होकर के विशिष्ट अद्वैतवाद की रचना हुई विशिष्ट अद्वैतवाद क्या कहता है जैसे कि मेरा शरीर है मेरे शरीर में दो हाथ है दो पैर है अब ये दो हाथ और दो पैर वैसे तो मेरे शरीर के ही भाग है किंतु फिर भी मैं कहूं कि मेरे शरीर से मेरे हाथ पैर आप तोड़ भी दे तो भी मैं तो जिंदा रहूंगा दे आर नॉट क्रिटिकल पार्ट ऑफ मी भले ही चाहे मेरे पार्ट हो क्रिटिकल पार्ट नहीं है तो यह हो गया कि मेरा ही दो हाथ प रहे एट द सेम टाइम मैं यह क्लेम कर सकता हूं कि मैं मेरा हाथ नहीं हूं मेरा हाथ यदि चला भी जाए तो भी मैं तो जीवित ही रहूंगा तो ये एक भी है और अलग भी है तो इसको कहेंगे विशिष्ट अद्वैतवाद और विशिष्ट अद्वैतवाद के साथ में साधन पद्धति व भक्ति ही प्रमाणिक साधन पद्धति कही जाती है इसके बाद में आया इसके बाद अजी देखिए आगे पीछे का हम बोलना मुश्किल है क्योंकि भारत के इतिहास में कौन सा शास्त्र कब प्रारंभ हुआ तो सभी लोग ऐसा ही क्लेम करते हैं कि वही सनातन काल से हमारा विचार हमारा दर्शन शास्त्र चला रहा है इसलिए आगे पीछे ऐसा नहीं कह के मैं कहूंगा कि यह एक विचार है विशिष्ट अ द्वैत दूसरा विचार है विशिष्ट अद्वैत और यह जो थर्ड स्कूल ऑफ वेदांत है उसको कहते हैं अद्वैत अद्वैत अर्थात कि ये एक सूर्य है ओरिजिनल सूर्य और यह प्रतिबिंबित सूर्य हजारों लाखों है यह हजारों लाखों सूर्य से प्रतिबिंब ही है वो रहेंगे नहीं रहेंगे आएंगे जाएंगे इससे असली सूर्य को कोई भी फर्क नहीं पड़ने वाला है वो मात्र एक आभास ही है वो एक इल्यूजन ही है एक मिथ्या एक प्रमाण ही है जैसे कि आप मरू बहुत सारे उदाहरण फेमस उदाहरण है मरुभूमि में जा रहे हैं एका एक मिराज दिख गया एका एक एक वो मरीचिका दिख गई जी आपको ऐसा लगता है कि ये रण प्रदेश में तालाब है फिर ये पाम ट्रीज ये जो कोकोनट के पेड़ है वहां पर चलो जाकर के मैं वहां पर जाता हूं पानी पीता हूं कोकोनट ये खाता हूं तो जितना आप दौड़ते जाएंगे इतना ही यह तालाब आपसे दूर का दूर ओआसिस जिसको कहते हैं इंग्लिश में ओआसिस दूर का दूर ही चला जाता देखेगा आखिर में आपके हाथ में कुछ नहीं आएगा क्यों क्योंकि वो सिर्फ एक दृष्टि भ्रम था रास्ते में आप जा रहे हैं अंधेरे में किसी ने एक रस्सी फेंकी है रस्सी को देख कर के एकाएक आपको लगा साफ है आपके हृदय की धड़कन बढ़ गई फिर ये मोबाइल को खोल कर के मोबाइल में तो आजकल टोर्च लाइट होती है वो ओपन करके देखा तो अरे वो तो रस्सी है अरे रस्सी से क्या डरना रस्सी को क्रॉस करके आप चले गए तो एक आभास मात्र होता है रस्सी के ऊपर में सर्प का यह रण प्रदेश के ऊपर में मरु मरी जी का का सिर्फ एक आभास ही होता है तो वैसे ही जीवात्मा या जगत एक आभास मात्र है ब्रह्मण ही सही सत्य है और इस ब्रह्मण को प्राप्त करने की जो साधन पद्धति है वो है त्याग और या तो फिर कहेंगे ज्ञान योग सब समय ये विचार करना कि मैं यह शरीर नहीं मन नहीं प्राण नहीं बुद्धि नहीं शरीर के यह जो विकार अभी यह तो थोड़ा सा एब्स्ट्रेक्ट हो गया कि चलो मैं शरीर नहीं हूं वगैरह किंतु थोड़ा सा कांक्रीट सोचे कि आज सुबह को मैं किसी के साथ बात कर रहा था एकाएक में उसके साथ में किसी बात पर नाराज हो गया अभी पूरा दिन भर उसकी नाराजगी मेरे स सर के भीतर में चलती रहेगी अरे मैं ऐसा उस आदमी ने ऐसा क्यों कहा क्यों किया ये वो मने मैं इस तरह से उसको दिखा दूंगा इस तरह से मैं मने ये जो एक रि जो होता है अपने भीतर में तो रिएक्शन तो मैं नहीं हूं क्योंकि ना ही मैं जो कि ये रिएक्ट करता है ना ही वो जो कि मुझे रिएक्शन ट्रिगर करवाता है वो दोनों मिथ्या है मेरा असली स्वरूप तो सत चित आनंदमय परम ब्रह्मण ही है यदि मैं किसी चीज के ऊपर में बड़ा ही आकर्षित हूं जैसे कि एक समय था मुझे मिठाई खाना बड़ा अच्छा लगता था फिर मैंने देखा कि वेट बढ़ता जाता है और आजकल तो लोगों को बड़ी छोटी उम्र में डायबिटीज भी हो जाता है और मंदिर में रहने से होता क्या है घर पर रहने से आप बोलेंगे कि मिठाई कंट्रोल में करेंगे तो वो हो सकता है घर में कब मिठाई आएगी कोई उत्सव होगा कुछ प्रसंग होगा तभी तो यहां मंदिर में तो प्रतिदिन मिठाई का भोग लगता है प्रतिदिन अच्छी-अच्छी मिठाई मिलती है तो जद आप ऐसा कहेंगे कि मैं मिठाई को कंट्रोल में खाऊंगा तो फिर तो बड़ा मुश्किल हो जाता है जब भी कोई अच्छी मिठाई आई इसको खाऊं कि ना खाऊं प्रलोभन तो फट कर के मन के सामने आ जाता है तो आखिर में मैंने ठीक किया कि नहीं बिल्कुल बंद कर दो ये खाऊंगा ये नहीं खाऊंगा इस दिन खाऊंगा उस दिन नहीं खाऊंगा इससे कंट्रोल नहीं होता संपूर्ण रूप से बंद कर दो तो जब मैंने संपूर्ण मिठाई छोड़ दी जिस दिन और उसके बाद में स्ट्रगल तो होती है ना ये जो प्रलोभन है प्रलोभन तो वैसे तो जाने वाला नहीं है तो जितनी भी बार मिठाई धरंग नजर के सामने महाराज ये लेंगे तब ना कहना कितना कठिन होता है तो उस समय ये विचार करना कि ये मिठाई का प्रलोभन जिसको है वो ये मिठाई भी मिथ्या है मिठाई का प्रलोभन जिसको है वो भी मिथ्या है मेरा सही स्वरूप तो सच्चित आनंदमय आत्मन है और साथ में ये विल पावर विल पावर जो है यह एक क्रुशल इंग्रेडिएंट्स जो कि ज्ञान योग को ज्ञान योग पर चलने के लिए हमको चाहिए यह तोतापुरी जब आंख बंद करके जब ध्यान करने के लिए बैठते थे व मैंने ये तोतापुरी जिस चंडीगढ़ में के वो पंजाब में कहीं प जो उनका का आश्रम था उसके बारे में मैंने एक बार कहीं पर पढ़ा था कि वे लोग तो दिगंबर रहते थे तो किस तरह से ये लोग प्रैक्टिस करते हैं तो पहले जब वो कोई नया लड़का जाएगा जॉइन करने के लिए साधु बनने के लिए तो पहले तो उसको किसी आसन पर बैठ के ध्यान करने को कहेंगे कि तुम आसन पर बैठ के ध्यान करो और वस्त्र भी हो सकता है कि कहेंगे कि तुम जो है हो सकता है कि ऊपर का वस्त्र निकाल करके फिर बाकी का धोती वगैरह पहने रखो इसके बाद में जाएगा तो मोटा आसन जदी होगा पतला आसन देंगे और पतला आसन देकर के कहेंगे कि अभी इसके ऊपर में बैठो और अभी ये जो धोती है उसको भी निकाल दो और कपिन पहन के रहो तो ऐसा कहेंगे उसके बाद में जद कुछ दिन जाएगा कहेंगे कि आप संपूर्ण रूप से दिगंबर हो जाइए और जमीन प बैठ के ही आप जब ध्यान कीजिए तो ऐसा करने से धीरे धीरे करके स्टेप बाय स्टेप आपको ध्यान और ये त्याग के रास्ते के ऊपर में आपको ले जाएंगे के किछ बोल बार-बार अपना रज हैंड देखा जा अच्छा तो इस तरह से वो धीरे-धीरे करके इनको त्याग करवाएंगे तो अभी ये जो जैसे जैसे त्याग होता जाएगा देखिए कि प्रत्येक स्टेप में जो साधक है उसके मन के ऊपर में कितना एक प्रलोभन कि ना वस्त्र तो पहन के रखने है या तो फिर लज्जा तो एक चीज है उसके बाद में ये बड़े आसन पर बैठना है कंफर्टेबल आसन पे ये मिट्टी प जमीन पर बैठ के ध्यान करना कितना मुश्किल है पैरों को कमर को कितना कष्ट पहुंचता है उस समय ये विल पावर को दृढ़ बना करके रखना कि नहीं मैं जमीन पर बैठने को बोले हैं तो जमीन पर बैठूंगा ही बैठूंगा भले ही चाहे कुछ भी हो जाए यदि तीन घंटा ध्यान करना है तो तीन घंटा ध्यान करूंगा ही करूंगा शरीर पूरा टुकड़े टुकड़े क्यों ना हो जाए शरीर के ये जो प्रचंड विल पावर चाहिए मुझे ये खाना खाना है तो यही खाऊंगा ये नहीं खाऊंगा मेरे विचारों को जो नियमन करना है नियमन करूंगा ही करूंगा नहीं करने से नहीं मैं अपने को पनिशमेंट देना है फिर ये पनिशमेंट का कांसेप्ट है स्वामी जी ने बेलूर मठ में किया था कि मंगल आरती में ना पाओ तो उस दिन भिक्षा उस दिन किचन में खाना नहीं मिलेगा डाइनिंग होल में भिक्षा करके खाके आओ तो मने ऐसा अभी तक कुछ कुछ मेरे मित्र है मेरे साथी सन्यासी वे लोग मुझे कहते हैं कि हम लोगों को यदि ऐसे कोई कोई साधु थे कि उस समय यदि हम मंदिर में नहीं जाते थे मंगल आरती में तो कह देते थे कि आज उपवास करो आज तुम डाइनिंग हल में खाने के लिए मत आना तो इस तरह से अपने को पनिश करना है यदि मैं अपना ही लिया हुआ नियम को तोडू तो ये इसके लिए जो प्रचंड विल पावर चाहिए तो यह हो गई अद्वैत की साधना किंतु यहां पर देखिए कि इतना सब कुछ समझने के बाद में ठाकुर क्या कहते हैं ठाकुर कहते हैं ब्रह्मा और शक्ति एक ही है अभेद है अर्थात कि जिसको कि हम जीवात्मा कहते हैं और हम जिसको आत्मन कहते हैं वो दोनों एक ही है अभी कहेंगे कि अद की दृष्टि से भी तो सब कुछ एक ही है जीवात्मा तो आभास मात्र है तो क्या जीवात्मा का सही सही अस्तित्व है यदि जीवात्मा का इंडिविजुअल अस्तित्व है ये तो ध्व वाद हो गया क्योंकि ध्व वाद में कहते हैं कि जीवात्मा है और ब्राह्मण है दोनों के बीच में हमेशा के लिए सेपरेशन बना रहेगा तो यह सेपरेशन इसलिए है क्योंकि ईश्वर की कृपा से शायद जीवात्मा का आविर्भाव हुआ होगा किंतु ईश्वर का अभिन्न अंश वो नहीं है तो क्या ये तवादु महाशय स्वयं जब आप कथामृत पढ़ेंगे तो मास्टर महाशय लिखते हैं कि ठाकुर का विशिष्ट अद्वैतवाद तो ये ठाकुर क्या द्वैतवाद के बारे में बोल रहे है विशिष्ट अद्वैतवाद के बारे में बोल रहे है किसके बारे में बोल रहे है तो ठाकुर खुद इस प्रश्न का उत्तर देते हैं कि जब हम साधन करते हैं भजन करते हैं उस समय हमको अद्वैतवाद स्वीकार करके नेति नेति करके मेरे मन के जितने भी विकार है मेरे मन की जितनी भी इच्छाएं है जितनी भी वासना है प्रलोभन है राग है द्वेष है सब कुछ का त्याग करना होगा नेति नेति करके प्रचंड विल पावर डेवलप करके और आखिर में जब निर्विकल्प समाधि प्राप्त होगी साक्षात्कार होगा अद्वैतवाद की दृष्टि से उस समय फिर जब आप ईश्वर की इच्छा से अभी ये पूरा कंट्रा डिक्शन है ईश्वर है कि नहीं ईश्वर की इच्छा है कि नहीं ये सब कैसे कहेंगे किंतु उस लेवल पर अपनी वाणी जो है छोटी पड़ जाती है इसलिए ये सब कंट्रा टर्म यूज करके हम कहते हैं कि यदि ईश्वर की इच्छा हुई तो निर्विकल्प समाधि के बाद भी शरीर टिका रहेगा और जैसे हम नेति नेति करके ऊपर गए थे अपना जो जीवात्मा वो परमात्मा के भीतर में विलीन हो गया था वही परमात्मा के भीतर में से जीवात्मा फिर से बाहर आता है किंतु देखिए कि यदि एक कप पानी आपने समुंदर में डाल दिया फिर उस समुंदर में से आपने दूसरा एक कप पानी भर के निकाला तो आप ये कहेंगे कि व वही एक कप पानी है जो कि भीतर में डाला था नहीं वो तो विलीन हो गया उस जीव परब्रह्म के परब्रह्म रूपी महासागर के भीतर में अभी जो दूसरा एक कप पानी भर के निकाला है एक दूसरा ही एक व्यक्ति है जिसको कि पहले जो व्यक्ति मृत हो चुका है निर्विकल्प समाधि में इसके साथ में इसका कोई लेना देना नहीं किस अर्थ में शरीर तो भले चाहे वो है किंतु जन्म जन्मांतर के जितने भी कर्म है वो सब निर्विकल्प समाधि के साथ में स्वाहा हो जाते हैं हमने यह जितना भी बैंक बैलेंस भर कर के ले आए हैं हम कैरी फॉरवर्ड आफ्टर वन बर्थ आफ्टर अनदर एक जन्म से दूसरे जन्म तक ये जो कैरी फॉरवर्ड होता है वो सब कुछ जब ब्रह्म साक्षात्कार होता है तो यह बैंक ही जैसे की पूरी टूट जाती है बैंक ही जैसे वो आजकल की बैंक के साथ में होता है ना तो बैंक में ऐसा कोई गड़बड़ हुआ कि बैंक ही पूरी उठ गई तो वैसे ही अपना खाता अकाउंट तो क्लोज हो ही जाता है बैंक भी पूरी बंद हो जाती है तो और इसके बाद में जो अहम एक नया प्रकट होता है वो तो एक सोने का अहम है जैसे ठाकुर ने तोतापुरी के साथ में वो फेमस जो ला है तोतापुरी ने कहा कि यह जो लोटा है उसको प्रतिदिन घिसना पड़ेगा अर्थात की प्रतिदिन जब ध्यान करना पड़ेगा तब कहीं जाकर के यह स्वच्छ रहेगा तो ठाकुर ने क्या उत्तर दिया सबको पता है लोटा जद सोने का हो जाए तो क्या करेंगे सोने को लोटे को प्रतिदिन धोना नहीं पड़ता थोड़ा सा वो कपड़े से साफ कर दे उसी में यह स्वच्छ हो जाता है उसके ऊपर में कभी भी काली मां नहीं लगेगी तो ये है जो एक नया अहम प्रकट हो है विद्या का अहम ना कि यह भक्त का अहम यह अहम से कल्याण ही होगा जगत का कभी भी किसी का यह अपकार नहीं होगा उपकार ही होगा किसी की हानि नहीं होगी सभी का कल्याण ही होगा तो यह ठाकुर का यह जो विचार है यह अद्वैतवाद के भी परे जाता है जिसको कि कोई कोई लोग विज्ञान वाद करके पुकारते हैं किंतु मेरा स्वयं ऐसा मानना है कि इसको कोई नया नाम नहीं देकर के श्री राम कृष्ण देव का वेदांत या तो फिर श्री राम कृष्ण देव की दृष्टि से वेदांत वेदांत क्या है इसको ठाकुर इस तरह से एक्सप्लेन करते हैं तो देखिए अभी फिर से हम पूरा विचार कर लेते हैं त कहता है कि दोनों हमेशा सेपरेट रहेंगे जीवात्मा और ब्रह्मण विशिष्ट द्वैत कहता है जीवात्मा और ब्रह्मण वैसे तो एक ही शरीर के विभिन्न अंग है एक भी है और अलग भी है अद्वैत कहता है कि जीवात्मा है ही नहीं वो सिर्फ एक दृष्टि भ्रम है एक मिथ्या मात्र है और फिर जब हम यहां तक किंतु ठाकुर देखिए कि शंकर का अद्वैद को अस्वीकार नहीं करते ठाकुर कहते हैं कि शंकराचार्य के अद्वैत मत के अनुसार दो चीज देखिए यहां पे सबसे पहले तो है कि ठाकुर साधन पद्धति सभी की स्वीकार कर लेते हैं यानी कि ध्व और विशिष्ट द्वैत का ये जो भक्ति मार्ग है उसको भी स्वीकार करते हैं शंकराचार्य का जो ज्ञान मार्ग है उसको भी स्वीकार करते हैं फिर ये जो योग मार्ग है जो कि सांख्य के साथ में जनरली जुड़ा हुआ है उसको भी स्वीकार करते हैं और गीता का जो कर्म मार्ग है उसको भी स्वीकार करते हैं चार मार्ग को ठाकुर स्वीकार करते हैं कर्म ज्ञान भक्ति और ध्यान इस अर्थ में साधन पद्धति ठाकुर ने सब की सब स्वीकार कर ली अभी जहां तक दर्शन शास्त्र की बात है दर्शन शास्त्र में ठाकुर सबसे पहले तो शंकर करके अवेश से प्रारंभ अवश्य करते हैं कहते तो है कि हां नेती नेती करके त्याग तो करना ही चाहिए खुद ने कितना त्याग किया जो एक बड़ा ही सुंदर उदाहरण ठाकुर के खुद के त्याग के बारे में तो कुछ कहना ही नहीं है किंतु वो जो उदाहरण भी देते हैं इतने मतलब वो थ्रिलिंग उदाहरण देते हैं जैसे कि चैतन्य महाप्रभु का वो जो सार्वभौम उनकी झप के ऊपर में चीनी रखने को गया देखते हैं कि महाप्रभु की जीप जदी चीनी को ग्रहण करती है कि नहीं तो चीनी का स्वाद भी नहीं जैसे कि झप जैसे काष्ट की लकड़े की जैसी हो गई और चीनी जो उनकी झप पर डाली थी वो सब हवा में उड़ गई वो भीगी तक नहीं तो ये था ठाकुर की त्याग का आदर्श कि त्याग तो इतना करना है इतना संपूर्ण त्याग करना है कि भूल कर के भी मन कोई भी तरह की भूल ना करे वो पंचवटी के नीचे में जब वो ध्यान कर रहे थे साधन कर रहे थे तो एकाएक उनके मन में कोई एक विचार आया अभी जैसे ही यह विचार आया ठाकुर ने कहा कि मां यदि मेरे साथ में ऐसा कुछ भी होगा तो मैं अपने गले में छोरी मार दूंगा चाकू मार दूंगा आत्महत्या कर दूंगा तो यहां तक ठाकुर त्याग को पकड़ कर के रखते हैं ठाकुर यानी कि त्याग के राजा त्याग के महाराजा त्याग ही ठाकुर का सर्वश्रेष्ठ आभूषण था जो कोई कहता है मां के पास में जाकर के कोवाल पाड़ा के जो अध्यक्ष थे केदार बाबू मां को कहते हैं कि मां ठाकुर तो इस बार सर्वधर्म समन्वय करने के लिए ही तो आए थे ना तो मां ने कहा कि नहीं त्याग ही थी ठाकुर की असली शिक्षा त्याग ही है ठाकुर का असली प्राण ठाकुर की दर्शित साधन प्रणाली का असली प्राण तो त्याग तो अद्वैत वेदांत का ही तो मुख्य सिद्धांत है मने साधन प्रणाली जद हम ट्रेडिशनल देखें तो त्याग साधन प्रणाली अद्वैत वेदांत के साथ में ही घनिष्ठ रूप से संकलित है ऐसा कोई नहीं कहेगा वैष्णव भी नहीं कहेंगे कि कोई भी नहीं कहेगा कि आप भोग कीजिए किंतु साथ में ही त्याग के ऊपर में इतना प्रचंड एक एमफसिस देना ये अद्वैत वेदांत की एक लाक्षणिक है तो त्याग ठाकुर ने संपूर्ण लिया अर्थात की अद्वैत वेदांत की दृष्टि से उन्होंने यह सब कुछ पूरे पूरा जो जगत है उसको उन्होंने त्याग करके ईश्वर में पूरा शरण तो ले ली किंतु जब ईश्वर प्राप्त जब हुई जब ब्रह्म साक्षात्कार जब हुआ तब वो इती इती करके इस जगत में वापस आए यह कह के कि यह जो जीवात्मा है ये जितने भी पशु पक्षी अन्य स्त्री पुरुष बच्चे आबा वृद्ध वनिता जैसे कि अपनी कहानियों में कभी-कभी कहते हैं कि अबलु वनिता अर्थात की बच्चे बूढ़े स्त्रियां सभी लोग मिलकर के यह जो पूरा समाज है इन सबके भीतर में वही ब्रह्मण की ही किरण है वही ईश्वर ही इन सबके माध्यम से लीला कर रहे हैं और इसके साथ में रहकर इस लीला में सहाय होकर के इस लीलाम जगत में ईश्वर की नाम की वाणी का प्रचार करना और प्रचार कोई हम लोग जिस तरह से प्लानिंग करके जैसे कि ये प्रवचन देते हैं ऐसा कुछ नहीं यह सब तो उनके लिए सहज हो जाता है तो सहज रूप से ईश्वर की वाणी ईश्वर का नाम लेकर रहना इस जगत में यही उनका उद्देश्य हो जाता है यही उन जीवन हो जाता है इसीलिए देखिए कि पहले तो ठाकुर सबका त्याग करते हैं किंतु फिर जब वो सिद्धि प्राप्त कर लेते हैं तो जहां पर मथुर बाबू रहते थे उस कुठी घर के छत के ऊपर में जाकर के भक्तों को पुकारते हैं कि अरे भक्तों तुम लोग कहां पे हो आओ ये सब मैंने विषय लोगों की वाणी सुन कर के मेरे कान झुलस गए तो ऐसा करके ठाकुर लोगों को बुलाते हैं ठाकुर घर घर जाते हैं ऐसा जब त्याग करते हैं तो किसी के घर नहीं जाना किसी के साथ में बातें नहीं का संग जो है वो पसंद नहीं करना किंतु न द अदर हैंड जब सिद्धि प्राप्त कर लेते हैं तो साधक है भक्त है जो लोग इस तरह से ईश्वर में आस्था रखते हैं घर घर जाकर के ठाकुर उनको उपदेश देते हैं साधन भजन उस मार्ग की शिक्षा देते हैं तो यह हो गया ठाकुर का वेदांत वाद तो ठाकुर का वेदांत वाद की दो लाक्षणिक काए हैं तीन लाक्षणिक कहेंगे सर्वप्रथम तो शंकर के अद्वैतवाद को उन्होंने स्वीकार किया है साधन के प्रथम पद के रूप में साधन के फर्स्ट स्टेज के रूप में दूसरी लाक्षणिक है कि सभी तरह की साधन पद्धतियां स्वीकार कर ली है वो चाहे फिर विशिष्ट अद्वैत की हो ना कि द्वैत की हो ना कि सांख्य की हो कोई भी हो साधन पद्धतियां सभी स्वीकार कर ली है और तीसरा है कि ये जो साधना के सेकंड स्टेज के रूप में फर्स्ट स्टेज के रूप में अद्वैतवाद जद स्वीकृत किया है तो सेकंड स्टेज के रूप में अद्वैतवाद का ही एक विशिष्ट परिणति कहो ना कि आप कुछ भी कहो कि पूरा विश्व वही ब्रह्मण का ही बना हुआ है जद ठाकुर कहते हैं कि राम प्रसाद का वो एक गाना है एक जगत वो दुखेर टाटी मने ये जो जगत जो है वो जगत में दुख और दुख ही भरा हुआ है किंतु आमी बोलची जगत बचे मजार कुटी आ खाई दाई मजा लूटी अर्थात की जगत जो है वो आनंद की हार्ट बजार है मैं खाऊंगा पिऊंगा आनंद करूंगा भक्तों के साथ में तो यह हो गया साध दर्शन पद्धति का और साधना का सेकंड स्टेज तो देखिए कि ठाकुर यह जो एक जो बात कहते हैं उसमें तीन लाक्षणिक का सभी तरह की साधन पद्धतियों की स्वीकृति साधना के फर्स्ट स्टेज के रूप में अद्वैत वेदांत और साधना के सेकंड स्टेज के रूप में सर्व जगत ईश्वर सर्व जगत में मिले हुए हैं ये एक भाव तो ये हो गया ठाकुर की दृष्टि से वेदांत वाद और इस अभी इस बात को हम लोग फिर से पढ़ते हैं ये जो आइडिया को ख्याल में रख के कि ठाकुर ने क्या कहा है और मतलब ठाकुर की वाणी और इसके पीछे के आइडियाज मैं फिर से पढ़ता हूं ठाकुर क्या कहते हैं वेदांत वादी ब्रह्मज्ञानी रा बोले सृष्टि स्थिति प्रलय जीव जगत ईशव शक्ति खेला अर्थात की वेदांत वादी ब्रह्मज्ञानी कहते हैं कि सृष्टि स्थिति प्रलय जीव जगत यह सब शक्ति का शक्ति की लीला है विचार करते गले श स्वपन जद सोच के बै बोलेंगे नेति नेति नेति तो सब स्वप्न वत है ब्रह्म वस्तु आर सब अवस्ता है बाकी सब अ वस्तु है शक्ति और स्वप्नवउम ला का छाड़ जाब जो नहीं आप हजार विचार करेंगे समाधि जब तक नहीं होंगे तब तक शक्ति के राज्य से आप बाहर नहीं जा सकते आमी ध्यान कोछी चिंता कोछी ए शब शक्ति इलाक म शक्ति श्वर जर म मैं ध्यान करता हूं चिंता करता हूं सब कुछ शक्ति के राज्य के वितर में ही है इसलिए अभी देखिए कि ठाकुर ने यह जो कहा है वो कहने के दो तात्पर्य है एक तो है कि आप जब नेती नेती करके ऊपर जा रहे हैं उस समय भी आप शक्ति के इलाके में है इसके लिए आप कहेंगे कि मैं अद्वैतवाद ही हूं सिर्फ ज्ञान विचार ही करूंगा ऐसा नहीं शक्ति के भीतर में है तो भक्ति को भी आपको साथ में लेना होगा तो भक्ति ज्ञान भक्ति कर्म यह सबको ज्ञान योग के साथ मिलाने के लिए फर्स्ट स्टेज में भी शक्ति और ब्रह्मण है सेकंड स्टेज में भी शक्ति और ब्रह्मण है इस अर्थ में कि ब्रह्मण शक्ति के साथ में मिले हुए किंतु हजार विचार करो समाधि ना होले शक्ति का छाड़ जाब जो नहीं इसके बाद में कहते हैं ताई ब्रह्मो आर शक्ति अभेद एक के मानले आर एकटी के मानते हो यह शक्ति और ब्रह्म अभेद है फर्स्ट स्टेज में ये किस तरह से ये रिफ्लेक्ट होगा फर्स्ट स्टेज में रिफ्लेक्ट इस तरह से होगा कि सिर्फ नेति नेति करने से नहीं चलेगा सिर्फ ज्ञान विचार करने से नहीं चलेगा भक्ति को भी शरणागति को भी साधन पद्धति के रूप में स्वीकार करना होगा ये फर्स्ट स्टेज का इंप्लीकेशन है सेकंड स्टेज का लिकेशन क्या है ब्रह्म और शक्ति अभेद का कि जद ब्रह्मण ही शक्ति के रूप में लीला कर रहे हैं यानी कि मेरा मन जिस तरह से संपूर्ण रूप से जो जन्म जन्मांतर के कर्म करके विघटित हो गया है अभी मेरा मन सोने का हो गया है मैं कमल की तरह इस संसार में रहूंगा संसार मुझे स्पर्श नहीं करेगा क्योंकि संसार भी तो ब्रह्मण का ही एक एक मेनिफेस्टेशन है तो यह ब बमा और शक्ति अभेद इसके दो इंप्लीकेशन दो अलग अलग स्टेज में है साधन करते हैं जब तक हम साधक है उस स्टेज का एक इंप्लीकेशन है सिद्ध हो गए हैं उस समय का एक इंप्लीकेशन है तो यह हो गया ठाकुर का वेदांत इसके बाद में अभी हम कल देखेंगे ओ शांति शांति शांति हरि ओम तत श्री राम कृष्णा इसके ऊपर में भी एक एक बड़ा ही एक सूक्ष्म एक विचार है देखिए कि ठाकुर ने जैसे कहा कि ब्रह्म और शक्ति अब है तो दो इंप्लीकेशन है जब त साधना करते हैं उस समय का इंप्लीकेशन है कि सभी तरह की साधन पद्धतियों को अपनाओ या तो फिर एटलीस्ट निंदा मत करो ऐसा मत कहो कि मैं ज्ञानी हूं तो भक्त झूठे हैं और मैं मैं भक्त हूं तो ज्ञानी लोग सब बेकार लोग है ऐसा कभी मत कहो एक उदार दृष्टि रखो ये एक इंप्लीकेशन हो गया और दूसरा की जद सिद्ध हो जाते हैं तो उसके बाद में कोई प्रश्न ही नहीं है कि आप सब कुछ आपका मन हृदय इतना विशाल हो जाएगा विस्तृत हो जाएगा कि आप सब कुछ स्वीकार कर ही लेंगे किंतु यहां पर एक बात है कि यदि मान लीजिए कि मैं जब साधक की अवस्था में हूं जब तक मैं फर्स्ट स्टेज में हूं तब मैं जद ये निष्ठा नहीं रखूंगा तो फिर ब्रह्म ज्ञान भी नहीं होगा यदि मैं ये कह लूंगा कि चलो ये शक्ति भी जद सही है तो फिर ये मैं जद भोग कर लेता हूं थोड़ा बीच-बीच में तो उसमें कौन सी बड़ी बात है फिर ये लोग चालाकी भी बहुत होती है इन लोगों की जब जब मन जब भोग करने लगता है ना तो उसकी बुद्धि शक्ति मेता शक्ति बहुत बढ़ जाती है एक्सक्यूज देते है ठाकुर क्या कहते हैं ठाकुर कहते हैं छोटे मोटे भोग को करके समाप्त कर दो बड़े बड़े भोग को संपूर्ण रूप से त्याग कर दो तो मैं तो छोटा मोटा भोग कर रहा हूं तो ऐसा करके वो एक्सक्यूज देते हैं तो उस समय निष्ठा बड़ी चीज है तो निष्ठा भी रहे बरकरार रहे साथ-साथ में हृदय भी विस्तृत हो ये दोनों चीजें साथ में रखना कभी-कभी मुश्किल हो जाता है तो यदि सिलेक्ट ही करना है मुझे कि मैं क्या सिलेक्ट करूंगा तो मैं निष्ठा को सिलेक्ट करूंगा भले ही चाहे वो आदमी कितना ही ऑर्थोडॉक्स क्यों ना हो स्वामी जी ने यह बात कही है कि आजकल की ये जो लिबरल कुछ कुछ लोग होते हैं इनके भीतर में कुछ भी कैरेक्टर जैसा नाम निशान नहीं मिलता अपने भारतीय जितनी भी संस्कृति है प्रथाएं हैं सबको गाली देंगे और विदेश से जो कुछ भी आया है आंख बंद करके स्वीकार कर लेंगे इससे तो बेटर वो लोग ऑर्थोडॉक्स जो पहले के जमाने के थे भले ही चाहे हृदय संकुचित था किंतु जो निष्ठा थी उनमें कितनी ज्यादा थी तो यदि दोनों में से एक को सिलेक्ट करना हो मेरी सीमित है ग्रहण शक्ति तो मैं निष्ठा को सिलेक्ट करूंगा नहीं कि लिबरलिज्म को कि सब कुछ स्वीकार कर दू राइट तो अभी देखिए कि तोतापुरी के साथ में एक ऐसा हुआ था कि निष्ठा इतनी प्रचंड थी किंतु कैपेसिटी निष्ठा तक ही सीमित थी तो बाद में उनको हृदय को विस्तृत करना पड़ा तो किंतु यह अच्छा है देखिए कि तोतापुरी को ही तो फिर आखिर में ठाकुर ने गुरु के रूप में स्वीकार किया ना ऐसा कहने वाले हजार लोग ब्र ये जो ब्रह्म समाजी थे जो कि भारत में रहते थे और अर्धा क्रिश्चियनिटी को स्वीकार करते थे ऐसे किसी को तो ठाकुर गुरु नहीं बनाएंगे यानी कि ये एक सूक्ष्म विचार है कि तोतापुरी का भले ही चाहे तोतापुरी में कुछ कमी थी जो कि ठाकुर के पास आकर के संपूर्ण हुई किंतु वो कमी इसलिए थी क्योंकि उनकी निष्ठा प्रचंड थी और निष्ठा प्रचंड थी बोलकर के ही ठाकुर के गुरु हो पाए तो ये एक चीज खास इसके बारे में ये एक विचार है और दूसरा राजा महाराज का जो कहना है कि समाधि के बाद में ही सही आध्यात्मिक जीवन प्रारंभ होता है तो वो तो अभी ठाकुर की बात से ये तो स्वयं सिद्ध है कि जब तक हम साधक है हम लोगों को ये त्याग करते करते जो प्रचंड तपस्या करते करते हम अपना सब कुछ इस परे दांव प लगा देते हैं राजा महाराज का ही उदाहरण कि जब वृंदावन में कुसुम सरोवर के किनारे तपस्या करते थे भारत में भ्रमण करके जो तपस्या की वो एक ऐसी थी कि और किसी का संग नहीं रेयरली किसी के साथ में बात करना वरना पूरा समय अपने आप में आत्म निष्ठ होकर के रहना ये एक समय था और रामकृष्ण संघ के प्रेसिडेंट जब हुए तब उनको चारों और कैसा एक आध्यात्मिक वातावरण बन जाता था एक दिन की बात है कि जैसे राजा महाराज ने नियम बनाया है बेलूरमठ जब स्थापित हो गया जब वो प्रेसिडेंट है उस समय कि जितने साधु ब्रह्मचारी मंदिर में जाएंगे उस समय तो यदि आपने बेलूरमठ गए होंगे देखा होगा कि पुराना जो श्राइन है उसके पीछे में ही राजा महाराज का ये कमरा है और वो जो फर्स्ट फ्लोर प जाने के लिए ब्रिज भी है मने आपको जमीन प आना भी नहीं पड़ेगा तो राजा महाराज ने नियम बनाया कि सभी साधु ब्रह्मचारी मंदिर में जाएंगे ठाकुर के सामने जब ध्यान करेंगे बाद में उनके कमरे में आकर के भजन गान वार्तालाप वगैरह होगा तो एक दिन राजा महाराज के कमरे में सभी लोग इकट्ठा हुए हैं गप लगा रहे हैं भजन वगैरह चल ही रहा है चल ही रहा है कोई निकल ही नहीं रहा है उनके कमरे से बाहर तो बाबूराम महाराज नीचे से जोर से चिल्लाते हैं अरे बेटा रा तोरा सुदू कथा ही बोल भी ना की साधन भजनी करवी ना काच के कोरबे अर्थात की अरे तुम लोग ये सब गफी लगाते रहोगे मठ का काम कौन करेगा और मठ में तो उस समय पानी भी जमीन जो गंगा में से लेके आना सब कुछ साधु ब्रह्मचार्य को करना आज की तरह वर्कर कहा पर थे तो यह बात सुनकर के राजा महाराज थोड़े से नाराज हो गए तो बाबूराम महाराज को कहते है कि महाशय आप इनको ब्रह्मज्ञान दे दीजिए इसलिए सब सब वो जो प्रॉब्लम है सब चला जाए तो क्या है कि साधु भक्त ब्रह्मचारी सबको लेकर के आध्यात्मिक वातावरण बनाना वो तो सिद्ध होने के बाद में ही बनेगा तो यह दोनों के बारे में देखि मैं जो शब्द यूज करता हूं हाईएस्ट एंड अल्टीमेट निर्विकल्प समाधि हाईएस्ट ही है उसमें कोई प्रश्न ही नहीं है किंतु अल्टीमेट क्या है आध्यात्मिक जगत में तो वो है कि निर्विकल्प समाधि से लौट करके पूरे जगत को अपना करके ईश्वर मय होके ना तो हाईएस्ट एंड अल्टीमेट वो जो आयन के साथ में जो मेरा हाईएस्ट एंड अल्टीमेट तो जो इसके साथ में जो मेरा डिस्कशन हुआ था आयन यही वो बोलता है कि हाईएस्ट इ दिस की शक्ति और ब्रह्म एक मैंने कहा नहीं भाई तुम ठाकुर को ही देखो ठाकुर खुद कहते हैं कि नेती नेती करके ऊपर जाना है अर्थात की हाईएस्ट ऊपर जाने को हुआ ना वो तो इती इती करके नीचे आना है जो नीचे आना उसको हास्ट कैसे कहोगे [हंसी] भाई समाधि के अलग-अलग तरह के प्रकार है स विकल्प समाधि निर्विकल्प समाधि सीज समाधि निर्ब समाधि वगैरह संप्र ज्ञात असप उसमें जो निर्विकल्प समाधि या तो असप समाधि है उसको हय समाधि कहते हैं और वो हाईएस्ट समाधि जो है वही आध्यात्मिक जीवन की हाईएस्ट प्राप्ति है उसके बाद में आध्यात्मिक जीवन का अल्टीमेट एम यदि कहा जाएगा तो वो बाकी सब है किंतु हाईएस्ट निर्विकल्प समाधि ही है ठाकुर ने स्वयं यह बात कही